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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

ग्रह विचार : १३५

विचार होता है। इस कारण सूर्य के युवराज वृध को यह स्थान ( कन्या राशि ) मिला। सूर्य से तीसरा तुला है, तीसरे से कण्ठ स्वर और वस्त्रादि का विचार होता है। यह सांसारिक सुखों का स्थान होने से दैत्यगुरु शुक्र को यह स्थान मिला, क्योंकि शुक्र सांसारिक सुखों के स्वामी माने गये हैं। सूर्य से चतुर्थ स्थान में वृश्चिक है। चतुर्थ से वाहन शू सम्पत्ति आदि का विचार होता है, वह स्थान सेनापति मंगल को मिला। मंगल शूभिपुत्र है, जमीन वाहन आदि का स्वामी है। सूर्य से पंचम धन है जिससे ईश्वर प्रेम विद्या आदि का विचार होता है, इससे गुरु को जो विद्या ईश्वर प्रेम आदि का दाता है, यह स्थान मिला। अन्त में सूर्य से षष्ठ स्थान में मकर है। षष्ठ स्थान रोग दुःख आदि का प्रगट करता है, इसीसे रोग दुःख आदि के स्वामी शनि को यह स्थान मिला।

इस प्रकार सूर्य राजा है जिसके समीप रानी चन्द्र है। सूर्य की रानी चन्द्र को इसलिये कहा है कि चन्द्र स्त्री ग्रह है और पृथ्वी के समीप होने से इसका सबसे बड़ा प्रभाव पड़ता है। सूर्य आत्मा है, चन्द्र मन है इस कारण सम्बन्ध होने से चन्द्र को रानी कहा है। इनके समीप युवराज वृध है। युवराज के वाजु से मंत्री शुक्र, फिर इसके बाद सेनापति मंगल को स्थान मिला है। इसके बाद मंत्री गुरु है और अन्त में शनि दास को स्थान मिला है। यही चित्र संख्या ७२ में बताया है।

अध्याय २६

ग्रह की उच्च नीच राशियाँ Exaltation and Debilitation or fall

जिस प्रकार प्रत्येक ग्रह का स्वस्थान होता है उसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों का एक और विशेष महत्व का स्थान माना हुआ है। यह अधिकार ग्रह की उच्चता सूचित करता है। कोई भारी अधिकार प्राप्त मनुष्य अपने अधिकार का पूर्ण उपयोग कर किसी को विशेष लाभ पहुँचा सकता है, परन्तु वह अधिकार चले जाने पर किसी को भी कोई लाभ नहीं पहुँचा सकता।

इसी प्रकार ग्रह के अधिकार सम्बन्ध का विचार अर्थात् उच्चता का विचार इससे होता है। इस उच्चता की पूर्ण अवधि को अर्थात् पूर्ण अधिकार होने को—deep exaltation कहते हैं। अधिकार हीन हो जाने पर—नीच कहलाता है। उस नीचता की पूर्ण अवधि को परम नीच deep debilitation or deep fall कहते हैं। परम नीच ग्रह होने पर लाभ तो कुछ नहीं कर सकता, परन्तु नीचतापूर्ण कार्य करने की ओर उसका झुकाव हो जाता है।

१३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

परम नीच की अवधि पूर्ण होने पर ग्रह क्रमशः उच्चता की ओर बढ़ने लग जाता है और अन्त में परम उच्च पद को प्राप्त होता है। ऐसे ग्रह की स्थिति को आरोही Ascending कहते हैं।

ग्रह उच्चता की पूर्ण अवधि प्राप्त कर फिर क्रमशः नीचता की ओर जाने लगता है ऐसे ग्रह को अवरोही Descending कहते हैं। क्रमशः घटते-घटते अन्त में ग्रह पुनः नीचता की पूर्ण अवधि को प्राप्त होता है।

परम उच्च से परम नीच का अन्तर सदा ६ राशि (१८०°) रहता है। उच्च का अधिकार स्वगृह की अपेक्षा बड़ा होता है। जैसे मेष यह अग्नि तत्व की राशि है, मंगल भी अग्नि तत्व का ग्रह है, मंगल का स्वगृह भी अग्नि तत्व का है रवि मेष राशि में रहता है तो अग्नि तत्व में आने से अधिक प्रबल हो जाता है, इस कारण मेष राशि रवि की उच्चता की राशि मानी गई है। रवि मेष राशि का होगा तो कहेंगे कि रवि उच्च का है। उच्चता की अन्तिम अवधि (सूर्य की) मेष राशि के १०° तक है। मेष के १०° के भीतर जब रवि होता है तो कहेंगे कि रवि परम उच्च का है। इसके उपरान्त रवि नीचे की ओर जाने लगता है।

मेष से ६ राशि उपरान्त तुला है, इस पर सूर्य आयगा तो कहेंगे कि नीच का सूर्य है। तुला के १०° के भीतर सूर्य आने से कहेंगे सूर्य परम नीच का है। तुला के १०° उपरान्त रवि उच्च की ओर जाने लगता है।

इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों के सम्बन्ध में समझना। प्रत्येक ग्रहों की उच्च-नीच राशियों पुष्क-पुष्क हैं। उच्च और नीच के बीच सदा ६ राशि का अन्तर रहता है।

ग्रह की उच्च नीच राशियाँ

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतु
उच्च राशिमेषवृषमकरकन्याकर्कमीनतुलावृषवृश्चिक
परम उच्च अंश१०२८१५२७२०२०२०
रारा

परमोच्च राशि ०-१०° १-३° ९-२८° ५-१५° ३-५° ११-२७° ६-२०° १-२०° ७-२०° अंश

नीच राशितुलावृश्चिककर्कमीनमकरकन्यामेषवृश्चिकवृष
परम नीच अंश१०२८१५२७२०२०२०
रा

परम नीच ६-१०° ७-३° ३-२८° ११-१५° ९-५° ५-२७° ०-२०° ७-२०° १-२०° राशि अंश

हर्षाल—यह ग्रह वायु राशि का है। मिथुन तुला में अच्छा माना जाता है। कुंभ राशि में विशेष कर बलवान होता है।

ग्रह की उच्च नीच राशियाँ १३७

नेपच्यून—यह ग्रह जल राशि का है। कर्क वृश्चिक और मीन में वलवान होता है। जल राशि मीन में अत्यन्त वलवान होता है।

राहु केतु—कोई राहु का उच्च धन और केतु का उच्च वृष भी मानते हैं।

उच्च नीच—उच्च नीच राशियाँ ग्रहों के मन्दोच्च से सम्बन्ध रखती हैं जिनका उपयोग सिद्धांत ग्रंथ में दिया है।

इसके अतिरिक्त ग्रहों का उच्च-नीच विचार दूसरे प्रकार से भी होता है। सूर्य चन्द्र आदि ग्रहों का पृथ्वी से अन्तर सदैव समान नहीं रहता। कभी-कभी ग्रह पृथ्वी के समीप आ जाते हैं कभी दूर चले जाते हैं, क्योंकि सब ग्रह अण्डाकार मार्ग से सूर्य के आस-पास परिक्रमा कर रहे हैं।

सूर्य चंद्र का विग्य साधारण प्रकार से देखने में एक समान दिखता है, परन्तु ध्यान से देखोगे तो जहाँ पृथ्वी की दूरी समीप या अधिक हो जाती है तो विग्य के आकार में कुछ अन्तर प्रगट होने लगता है, कभी कुछ बड़ा कभी छोटा प्रगट होता है। पृथ्वी की कक्षा से जो विन्दु समीपवर्ती प्योति से बहुत दूर है उसे उच्च कहते हैं और जो पास है उसे नीच कहते हैं। सूर्य दिसम्बर के अन्त में अपनी कक्षा में नीच में होता है और जून के अन्त में उच्च का होता है। सूर्य चंद्र उच्च होते हैं तो पृथ्वी से सबसे लम्बी दूरी पर होते हैं और उस समय उसका विग्य छोटा दिखता है। जब सूर्य चंद्र पृथ्वी के पास होते हैं तब नीच होता है उस समय विग्य बड़ा दिखता है, ऐसे समय में ग्रहण हुआ तो खप्रास ग्रहण होता है। परन्तु यहाँ ऊपर जो ग्रहों की परम उच्च राशि अंश और परम नीच राशि अंश बताये गए हैं वे स्थिर कर लिए गए हैं और उनमें कभी परिवर्तन नहीं होता। इस कारण ऊपर बताये चक्र के अनुसार ही सदा उच्च नीच ग्रहण करना।

(३) ग्रहों का मूल त्रिकोण

जिस प्रकार ग्रहों का विशेष अधिकार उच्च के सम्बन्ध में पहिले बता चुके हैं उसी प्रकार एक और ग्रह का अधिकार है उसे मूल त्रिकोण कहते हैं। यह अधिकार उच्च से कुछ कम होता है। नीचे चक्र में बताया है कि किस राशि के कितने अंश पर होने से ग्रह मूल त्रिकोण में होता है। कुछ ग्रह की राशियाँ स्वक्षेत्र भी हैं, मूल त्रिकोण भी हैं और उच्च भी हैं, इसका स्पष्टीकरण करने के लिए यह भी चक्र में बतलाया है कि कितने अंश तक मूल त्रिकोण और कितने अंश तक उच्च या स्वक्षेत्र हैं। स्वक्षेत्र अधिकार से मूल त्रिकोण अधिकार बड़ा होता है।

साधारण प्रकार से ग्रहों के मूल त्रिकोण की राशि—

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनिराहुकेतु
राशिसिंहवृषमेघकन्याधनतुलाकुंभकुंभसिंह

१३६ : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

मूल त्रिकोण चक्र

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
मूल त्रिकोण राशिसिंहवृषमेषकन्याधनतुलाकुंभ
उच्च के अंशXX१५XXX
मूल त्रिकोण के अंश२०२७१२१०१०१५२०
स्वक्षेत्र अंश१०X१८२०१५१०

मूल त्रिकोण के अंशों में किसी-किसी का मतभेद है, परन्तु राशियों के बारे में कोई मतभेद नहीं है। यहाँ वृहस्पराशरी मत से मूल त्रिकोण के अंश दिए हैं।

चक्र का स्पष्टीकरण

सूर्य सिंह राशि में २०° तक मूल त्रि० होता है, शेष १०° उसके स्वक्षेत्र का है। चंद्र वृष के ३° तक उच्च उपरान्त २७° तक मूल त्रि० होगा। मंगल मेष के १२° तक मूल त्रिकोण, शेष स्वक्षेत्र होगा। बुध कन्या के १५° तक उच्च, उपरान्त १०° तक मूल त्रिकोण, शेष ५° स्वक्षेत्र। गुरु धन के १०° तक मूल त्रिकोण, उपरान्त स्वक्षेत्र होगा। शुक्र तुला के १५° तक मूल त्रिकोण, उपरान्त स्वक्षेत्र होगा। शनि कुंभ के २०° तक मूल त्रिकोण, उपरान्त स्वक्षेत्र होगा।

मूल त्रिकोण के विचार से ही ग्रह की नैसर्गिक मैत्री स्थिर हुई है, यह आगे बताया जायेगा।

अध्याय २७

ग्रहमैत्री Friendship

कुण्डली में ग्रहों की मैत्री का विचार होता है। यदि ग्रह अपने घर या मित्र के घर में होता है तो बलवान होता है। शत्रु के घर में बलहीन हो जाता है। यह सब विचारने के लिए देखना पड़ता है कि ग्रह जिस स्थान ( घर ) में बैठता है वह उसका

ग्रहमैत्री : १३९

मित्र, शत्रु या सम है, इस कारण ग्रहों की मैत्री जानना आवश्यक है। सम का अर्थ है कि वह न तो मित्र है और न शत्रु है, उदासीन ग्रह है।

मैत्री दो प्रकार की है—(१) नैसर्गिक मैत्री (२) तात्कालिक मैत्री। नीचे नैसर्गिक मैत्री चक्र दिया है, उससे जान सकते हैं कि कौन ग्रह का कौन मित्र या शत्रु है।

नैसर्गिक मैत्री चक्र Natural friendship—

ग्रहमित्र friendशत्रु enemyसम neutral
१ रवि केचंद्र, मंगल, गुरुशनि, शुक्र, राहुबुध
२ चंद्र ,,रवि, बुधराहुमंगल, गुरु, शुक्र, शनि
३ मंगल ,,रवि, चंद्र, गुरुबुध, राहुशुक्र, शनि
४ बुध ,,रवि, शुक्र, राहुचंद्रमंगल, गुरु, शनि
५ गुरु ,,रवि, चंद्र, मंगलबुध, शुक्रशनि, राहु
६ शुक्र ,,बुध, शनि, राहुरवि, चंद्रमंगल, गुरु
७ शनि ,,शुक्र, बुध, राहुरवि, चंद्र, मंगलगुरु
८ राहु ,,बुध, शुक्र, शनिरवि, चंद्र, मंगलगुरु

स्पष्टीकरण—

रवि का मित्र चंद्र, मंगल, गुरु है, जब रवि, चंद्र की राशि (कर्क) या मंगल की राशि (मेष, वृश्चिक) या गुरु की राशि (धन, मीन) में से किसी राशि में हो तो कहेंगे रवि मित्रगृही है। सूर्य का शत्रु शनि, शुक्र है, जब रवि इनके घर में अर्थात् मकर, कृत्त (शनि की राशि) या तुला, वृष (शुक्र गृह) में होगा तो कहेंगे सूर्य शत्रु क्षेत्री है या शत्रु गृही है। जब बुध के गृह मिथुन या कन्या राशि में से किसी में सूर्य होगा तो कहेंगे सूर्य समक्षेत्री है। इसी प्रकार दूसरे ग्रहों की भी मैत्री का विचार चक्र के अनुसार होता है। इस मैत्री में कोई परिवर्तन नहीं होता। इस कारण इसे नैसर्गिक मैत्री कहते हैं। यह मैत्री स्वाभाविक है।

नैसर्गिक मैत्री में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि कई ग्रहों की परस्पर मैत्री तो ठीक है (जैसे रवि का मित्र गुरु है तो गुरु का भी मित्र रवि है), परन्तु सब ग्रहों का ऐसा सम्बन्ध नहीं है। कोई ग्रह किसी से मैत्री तो मानता है, परन्तु दूसरा ग्रह उससे शत्रुता रखता है। जैसे चंद्र, बुध से मैत्री रखता है, परन्तु बुध, चंद्र से शत्रुता रखता है। इसी प्रकार परस्पर मैत्री में कहीं-कहीं विरोध पड़ता है, वह नीचे के चक्र में समझाया है जिसका ध्यान रखना चाहिए।

१४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

  • मैत्री सम्बन्ध सूचक चक्र

जहाँ परस्पर मैत्री में कोई अन्तर नहीं है

ग्रहका मित्र शत्रु सम

१ रवि का चं. मं. गु. . श. शु. रा. -

२चंद्रका रवि राहु लट

३ मंगल का र. गु. राहु शुक्र

४ बुध का शु. रा. न —

४५ गुरुका र. मं. — ण. रा.

६ णुक्रकाबु.श- रा. रवि मं

७3 शनि का शु. रा: रवि गुरु

८ राहु का बु. शु. श. चं. मं. र. गुरु

नैसर्गिक मैत्री की उत्पत्ति

ग्रहों की नैसगिक मैत्री मूल त्रिकोण के सम्बन्ध से स्थापित हुई है । मूल त्रिकोण

मुल त्रिकोण चक्र

जहाँ मैत्री में भिन्नता है ।

ग्रहका मित्र शत्रु सम

१रविका -- वुध

२चंद्रका वुध -- मं.गु.शु.श.

३ मंगल का चंद्र बुध शनि

४बुध का र. चं. ` चन्द्रम. गु. श.

शगुरुका चन्द्र बु.शु. --

६ शुक्रका -- ! चन्द्र गुरु

७शनिका वुध चं.मं. --

८राहुका 7 = `>

के स्थान से २-१२,५-९,४-८ स्थान पर

और उच्च के स्थान पर उस ग्रहका

अच्छा प्रभाव पड़ता है, इस कारण उस

स्थान के स्वामी से मित्रता होती है और

शेष स्थान पर विरुद्ध प्रभाव पड़ता है ।

इस कारण शेष स्थान के स्वामी से शत्रुता

होती है । यदि एक प्रकार से मित्र भाव

और दूसरे प्रकार से शत्रुभाव आवे तो

उसे सम समझना । जहाँ दोनों प्रकार से मित्र-भाव आवे वहाँ मित्र समझना नीचे चक्र में यही समझाया गया है।

रवि, चन्द्र मित्र १ वार-मित्र, शेप ग्रह

चिल्ल ‡= २ वार मित्र = मित्र `

%५=१वार, =,

० = मित्र शन्रु=सम

Ee पल

[ मित्र ‡- मित्र-मित्र मित्र + शत्रुच्सम

(शेष)

मित्र शत्र स्थान सम

६ ३+% १०१ ७

उच्च

दस्थात

मित्र स्थान

स्थान २ १२ ९५ ४

मूल ण

त्रिको क्रम गह

राशि ६

सिह

१ सूय

FX

S °

स्वामी ब.

मेष मंगल ३

मं. ग,

ए? छ?

ग्रहमैत्री : १४१

का र

Crop

७” पर?

स्वामी मं.

राशि शुक्र कुम्भ

चं. र.

शनि के । समान राहु कुम्भ ८

१४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस चक्र में मित्र और उच्च स्थान के सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दोनों स्थानों में से किसी स्थान में रवि या चंद्र १ ही बार आ जावे तो मित्र होते हैं, परन्तु दूसरे ग्रह इन स्थानों में २ बार आवे तब मित्र होते हैं, १ बार आने से सम होते हैं, शेष शत्रु होते हैं। जैसे मंगल का विचारना है, गुरु २ स्थान (१२-६) में आया है तो मित्र हुआ, परन्तु रवि, चंद्र १ ही बार, ५ रवि, ४ चंद्र आने से मित्र हुआ। शुक्र १ बार आया है, इसी प्रकार शनि उच्च में १ ही बार आया है तो शत्रु। शं. सम हुए। शेष बुध वषा वह शत्रु हुआ। इसी प्रकार सबकी मैत्री विचारना।

तात्कालिक मैत्री Temporal friendship

जिस प्रकार कोई किसी का मित्र होने पर भी तात्कालिक परिस्थिति के कारण विरोध या समता का भाव दिखाता है या शत्रु रहने पर भी तात्कालिक अवस्था के अनुसार कभी मित्रता कभी समता दर्शाता है, इसी प्रकार ग्रहों की नैसर्गिक मैत्री रहने पर भी परिस्थिति के अनुसार मैत्री में परिवर्तन हो जाता है। इसको तात्कालिक मैत्री कहते हैं, अर्थात् तात्कालिक अवस्था के अनुसार जो मैत्री होती है उसे तात्कालिक मैत्री कहते हैं। मित्र=२, ३, ४ और १२, ११, १० वें स्थान के ग्रह शत्रु=१, ५, ६, ७, ८, और ९ वें स्थान के ग्रह जन्म कुंडली या किसी कुंडली में कोई ग्रह जहाँ पर भी हो उस स्थान को छोड़

कर आगे के ३ स्थान और पीछे के ३ स्थानों में रहने वाले ग्रह उस ग्रह के तात्कालिक मित्र हो जाते हैं। शेष स्थान में रहने वाले ग्रह उसके शत्रु हो जाते हैं।

अर्थात् किसी विशेष स्थान से दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान में और दशम, ग्यारहवें और बारहवें स्थान में रहने वाले ग्रह मित्र हो जाते हैं, शेष स्थान के ग्रह शत्रु होते हैं। जैसे यहाँ पर शनि सप्तम स्थान में है, उससे कौन-कौन स्थान के ग्रह मित्र शत्रु होंगे अगर कुण्डली में बताया है।

यहाँ इसको और भी उदाहरण देकर तात्कालिक मैत्री समझाते हैं।

शहमीनी : १४३

लगन कुण्डली

(१) सूर्य—सूर्य से दूसरे घर में शनि बुध, तीसरे में गुरु चंद्र शुक्र, चौथे में राहु है, बारहवें में कोई ग्रह नहीं है, ग्यारहवें स्थान में मंगल और दशवें में केतु है ये सब सूर्य के मित्र हुए। शेष कोई नहीं बचे तो शत्रु कोई नहीं है।

(२) चन्द्र के—रा० बु० श० सू० मित्र हैं, क्योंकि राहु दूसरे घर में है, तीसरे

चौथे में कोई ग्रह नहीं है। बारहवें श० बु०, ग्यारहवें सूर्य, दशवें कोई ग्रह नहीं है। ये सब मित्र हुए, शेष शत्रु हुए। चंद्र के पहिले घर में जहाँ गुरु शुक्र हैं, आठवें में केतु नवम मंगल है। इस कारण गु० शु० के और मंगल शत्रु हुए। इसी प्रकार सब का निकालना।

(३) मंगल के—सू० श० बु० के० मित्र हैं, क्योंकि केतु बारहवें, तीसरे सूर्य, चौथे में शनि बुध हैं, दूसरे दशवें और ग्यारहवें स्थान में कोई ग्रह नहीं है। शेष ग्रह गुरु चन्द्र शुक्र राहु शत्रु हुए।

(४) बुध के—गु० चं० शु० रा० सू० और मं० मित्र, शेष श० और के० शत्रु हैं।

(५) गुरु के—रा० श० बु० सू० मित्र, शेष चं० शु० मं० और के० शत्रु हैं।

(६) शुक्र के—रा० श० बु० सू० मित्र, शेष गु० चं० मं० और के० शत्रु हैं।

(७) शनि के—गु० चं० शु० रा० सू० मं० मित्र, शेष बुध और केतु शत्रु हैं।

(८) राहु के—गु० चं० शु० श० बु० सू० मित्र, शेष मं० और के० शत्रु हैं।

पंचधा मैत्री Average friendship

पंचधा मैत्री = नैसर्गिक मैत्री + तात्कालिक मैत्री।

मित्र + मित्र = अघि मित्रशत्रु + शत्रु = अविशत्रु
मित्र + सम = शत्रुशत्रु + सम = शत्रु
मित्र + शत्रु = समशत्रु + मित्र = सम

नैसर्गिक और तात्कालिक मैत्री मिलाकर पंचधा मैत्री होती है। यदि दोनों में मित्र हो तो अघिमित्र, दोनों में शत्रु हो तो अविशत्रु होते हैं। एक में मित्र दूसरे में शत्रु हो तो सम हो जाता है। एक में मित्र और दूसरे में सम हो तो मित्र और एक में शत्रु और दूसरे में सम हो तो शत्रु होता है।

इसी प्रकार विचार कर पंचधा मैत्री निकालने का उदाहरण नीचे दिया है। पहिले जो तात्कालिक मैत्री निकाले हैं उसी पर से पंचधा मैत्री निकालते हैं।

१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

(१) नैसर्गिक मैत्री (स्थायी मैत्री)

(२) तात्कालिक मैत्री (जो पहिले निकोल चुके हैं)

ग्रहमित्रशत्रुसमग्रहमित्रशत्रु
१ रविचं. मं. गुशु. श.रा. बु.१ रविचं. बु. गु. शु. श. मं. रा.×
२ चन्द्रर. बु.रा.मं. गु. शु. श.२ चंद्रसू. बु. श. रा.मं. गु. शु.
३ मंगलर. चं. गु.बु. राशु. श.३ मंगलसू. बु. श.चं. गु. शु. रा.
४ बुधर. शु. रा.चं.मं. गु. श.४ बुधसू. चं. गु. शु. रा.शा.
५ गुरुर. चं. मं.बु. शु.श. रा.५ गुरुसू. बु. श. रा.चं. मं. शु.
६ शुक्रबु. श. रा.र. चं.मं. गु.६ शुक्रसू. बु. श. रा.चं. मं. गु.
७ शनिबु. श. रा.र. चं. मं. गु.७ शनिसू. चं. मं. गु. शु. रा.बु.
८ राहुबु. शु. श. र.चं. मं. गु.८ राहुसू. चं. बु. गु. शु. श.मं.

(३) पंचधा मैत्री (उपयुक्त दोनों को मिलाकर यहाँ रखा है)

ग्रहअधिमित्रमित्रसमशत्रुअधिशत्रु
१ रविचं मं गुंबुंशं शु रां
२ चंद्ररं बुंशंरांमं गुं शुं
३ मंगलरंशंचं गुं बुंशुं
४ बुधरं शुं रांमं गुं चंशं
५ गुरुरंशं रां चं मं बुंशुं
६ शुक्रबुं शं रांरंमं रांचं
७ शनिशुं रांगुंरं चं मं बुंरां
८ राहुबुं शुं शंगुंरं चंमं

यहाँ तात्कालिक में सूर्य का शनि मित्र है, परन्तु नैसर्गिक में शत्रु है तो मित्र शत्रु मिलकर पंचधा मैत्री में सम हो गया। बुध तात्कालिक में मित्र और नैसर्गिक में सम है तो मित्र+सम=मित्र हुआ। रवि का चंद्र और मंगल दोनों प्रकार से मित्र है तो दोनों अधिमित्र हुए। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों की मित्रता मिलान करके पंचधा मैत्री चक्र में स्थापित किया है।

ग्रहमैत्री : १४५

सम्पूर्ण ग्रहों का फल विचारते समय इसी पंचधा मैत्री चक्र के अनुसार ग्रहमैत्री का विचार होता है। जैसे लग्नकुंडली में लग्न में वृश्चिक राशि है। इसका स्वामी

लग्नकुंडली

मंगल हुआ, यह मंगल चतुर्थ भाव में शनि के घर (कुंभ) में बैठता है। पंचधा मैत्री में मंगल का शनि मित्र है। इस कारण मंगल मित्रस्थानी हुआ। वृष का शनि सप्तम में है वृषेश्वर (वृष का स्वामी) गुरु है, शनि का यह गुरु पंचधा मैत्री से अधिक मित्र है तो कहेंगे कि शनि अधिमित्र क्षेत्री है। इसी प्रकार सब ग्रहों की मैत्री का

विचार करना पड़ता है। मित्र क्षेत्र में ग्रह होने से उसका बल बढ़ेगा और शत्रु क्षेत्र में बल घटेगा। यह सब विचार के लिए मैत्री का उपयोग होता है।

जो ग्रह मित्रक्षेत्री, स्वक्षेत्री, अधिमित्रक्षेत्री या उच्च का हो वह शुभ फल देगा। शत्रुक्षेत्री, अधिशत्रुक्षेत्री या नीच में ग्रह हो तो अनिष्ट (बुरा) फल देगा। इस कारण यह का क्षेत्र जानने के लिए इस लग्नकुंडली से ग्रह क्षेत्र विचार कर नीचे देते हैं।

उपयुक्त लग्नकुंडली के ग्रहों का क्षेत्र विचार

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलवृषगुरुशुक्रशनिराहु
क्षेत्रअधि-अधि-मित्रअधि-समअधि-अधि-सम
मित्रगृहीमित्रस्थानीक्षेत्रीमित्रक्षेत्रीगृहीमित्रगृहीमित्रक्षेत्रीक्षेत्री

अध्याय १२

ग्रहों की दृष्टि Aspects of the planets

प्रत्येक भाव राशि या ग्रह पर किस-किस ग्रह की किस प्रकार की दृष्टि है, इसका विचार भी, ग्रहों के फल निर्णय करने के लिए करना पड़ता है, इस कारण ग्रहों की दृष्टि का जानना आवश्यक है।

दृष्टि का स्पष्टीकरण—

जब सूर्य चंद्र होता है तो उसकी किरण तिरछी होने के कारण गर्मी इस जगह पड़ती है। ज्यों-ज्यों सूर्य का अंश बढ़ता है त्यों-त्यों सूर्य का तेज बढ़ता है। जब सूर्य ९०° पर अर्थात् क्षिर पर आजाता है तो उसकी किरणें सामने पड़ने से सूर्य का प्रकाश

१०

१४६ : राशिच ज्योतिष शिक्षा प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अधिक बढ़ जाता है अर्थात् उस समय गर्मी बहुत बढ़ जाती है। जब दिन ठलने लगता है तो उसकी किरणें तिरछी पड़ती हैं और प्रभाव कम होते-होते अन्त में लुप्त हो जाता है। उसी प्रकार सब ही ग्रहों का प्रभाव होता है। जिस ग्रह के सामने दूसरा ग्रह होगा उस पर, उस ग्रह पर पूरा प्रभाव पड़ेगा, जब वाजू से होगा तो कम प्रभाव पड़ेगा।

जिस राशि पर कोई ग्रह हो उसके ठीक सामने सातवीं राशि होती है और उस समय दोनों ग्रहों का अन्तर १८०° का रहता है। इस कारण सातवें स्थान पर ग्रह का पूरा प्रभाव पड़ता है, इसी का नाम पूर्ण दृष्टि है। इसी प्रकार शेष दृष्टि में किरणें तिरछी पड़ती हैं। इस कारण उनका प्रभाव कम हो जाता है।

जो ग्रह देखता है उसे ब्रह्मा ग्रह कहते हैं। जिस ग्रह या भाव पर किसी दूसरे ग्रह की दृष्टि पड़ती है उसे दृश्य कहते हैं।

दृष्टि ४ प्रकार की होती है—(१) एक पाद दृष्टि या चौथाई दृष्टि, (२) द्विपाद दृष्टि या अर्द्ध दृष्टि, (३) त्रिपाद दृष्टि या तीन दृष्टि और (४) पूर्ण दृष्टि।

चित्र संख्या ७३ ग्रह की दृष्टि

चित्र संख्या ७३ में बताया है कि किसी ग्रह की अपने स्थान से किसी भाव पर या कितने अन्तर पर किस प्रकार की दृष्टि पड़ रही है। जहाँ दृष्टि नहीं है वहाँ बताया है। इस चित्र में ग्रहों की दृष्टि के प्रकार बतला कर उनकी किरणों का प्रभाव बताया गया है। इस चक्र में भीतर किनारे पर ३०-३०° की एक-एक राशियाँ दी हैं और ग्रह स्थान से अन्तर अंगों में बताया है। चक्र के ऊपर भी १२ भाव या स्थान दिये हैं। इससे प्रगट होगा कि ग्रह स्थान से कौन से स्थान पर या कितने राशि अन्तर पर किस प्रकार की दृष्टि होती है।

ग्रहों की दृष्टि : १४७

ग्रहों के पहिले, दूसरे, छठवें, ग्यारहवें और बारहवें स्थान पर कोई दृष्टि नहीं होती।

मंगल गुरु और शनि क्रमशः पृथ्वी की परिक्रमा मार्ग की परिधि के बाहर एवं सूर्य से दूर होने के कारण इनकी विशेष दृष्टि का विचार किया गया है।

ग्रह की चार प्रकार की दृष्टि होती हैं—

(१) पूर्ण दृष्टि=१° पुरी=६० कला दृष्टि

(२) त्रिपाद, =पौन दृष्टि=०°-४५' "

(३) द्विपाद, =अर्द्ध, =०-३० "

(४) एकपाद, =पाद, =०-१५ "

(१) पूर्ण दृष्टि—सम्पूर्ण ग्रह अपने स्थान से ( उस समय जिस राशि में वे हैं उस राशि से ) सातवीं राशि या सातवें स्थान पर पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। परन्तु मंगल गुरु और शनि की विशेष दृष्टि होने के कारण इनकी अतिरिक्त पूर्ण दृष्टि इस प्रकार भी है। ये अपने स्थान से इन स्थान या राशियों पर भी पूर्ण दृष्टि से देखते हैं—

(१) मंगल ४ और ८ स्थान या राशि पर

(२) गुरु ५ और ९ " " "

(३) शनि ३ और १० " " "

(२) त्रिपाद दृष्टि=मंगल को छोड़कर सब ग्रह अपने स्थान से ४ और ८ स्थान या राशि पर त्रिपाद दृष्टि से देखते हैं। मंगल की त्रिपाद दृष्टि नहीं होती, क्योंकि यही दृष्टि मंगल की पूर्ण दृष्टि हो जाती है।

(३) द्विपाद दृष्टि=गुरु को छोड़ कर शेष सब ग्रह अपने स्थान से ५ और ९ स्थान या राशि पर द्विपाद दृष्टि से देखते हैं। गुरु की द्विपाद दृष्टि नहीं होती, क्योंकि यही गुरु की पूर्ण दृष्टि है।

(४) एकपाद दृष्टि=शनि के सिवाय सब ग्रह अपने स्थान या राशि से ३ और १० स्थान या राशि को एकपाद दृष्टि से देखते हैं। शनि की एकपाद दृष्टि नहीं होती, क्योंकि यह शनि की पूर्ण दृष्टि है।

दृष्टिचक्र

दृष्टिसू. च. बु. श. रा.मंगलगुरुशनिभरतार राहुशुभ्य दृष्टि
पूर्ण दृष्टि७ वां स्थान७,४,८७,५,५७,३,१०५,७,९,१२१,२,६,११,१२
त्रिपाद "४,८४,८४,८
द्विपाद "५,९५,९५,९३,९
एकपाद "३,१०३,१०३,१०२,१०कन्या का=
अन्धा होता है।

चारों प्रकार की दृष्टि में पूर्ण दृष्टि का ही विशेष प्रभाव पड़ता है, केतु की दृष्टि नहीं होती।

१४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

• ग्रह जिस स्थान में पूर्ण दृष्टि से देखता है वह स्थान पूर्ण फल देता है। उदाहरण देकर ग्रहों की दृष्टि विचारना आगे समझाते हैं।

इस कुण्डली में मंगल चतुर्थ भाव में है ७, ४, ८, ९ स्थान पर इसकी पूर्ण दृष्टि होती है। मंगल में सातवें स्थान पर सिंह राशि दशम भाव पर है, चौथे स्थान में वृष

राशि सप्तम भाव में है जहाँ बुध शनि बैठे हैं। मंगल से अष्टम में कन्या राशि एकादश भाव में है। इस कारण सप्तम दशम और एकादश भाव पर और बुध शनि ग्रहों पर मंगल की पूर्ण दृष्टि पड़ रही है। इसी प्रकार सब ग्रहों की दृष्टि का विचार करना। दृष्टि का स्थान गिनते

समय जिस स्थान पर ग्रह हो उस स्थान को एक गिनना चाहिये। जैसे सूर्य की एकपाद दृष्टि तीसरे स्थान पर विचारना है तो सूर्य के स्थान मेघ को १ गिना तो तीसरे स्थान में अष्टम भाव आया जहाँ चं. गु. श. हैं, जिन पर सूर्य की एकपाद दृष्टि पड़ रही है।

आगे इसी कुण्डली का दृष्टिचक्र अभ्यास के लिए दिया है। इस चक्र में पूर्ण दृष्टि १° की अर्थात् ६० कला की बताई गई है। इसी प्रकार पौन दृष्टि ४५', अर्द्ध दृष्टि ३०' और पाव दृष्टि १५' की दी गई है, इस पर से दृष्टि समझ लेना।

इस चक्र के देखने से समझ में आ जायेगा कि सूर्य की पूर्ण दृष्टि बारहवें भाव और तुला राशि पर है, पौन दृष्टि लगन व वृषिचक राशि और नवम स्थान की कर्क राशि पर है, अर्द्ध दृष्टि द्वितीय स्थान की धनु राशि और दशम भाव की सिंह राशि पर है, पाव दृष्टि तृतीय स्थान की मकर राशि और अष्टम स्थान की मियुन राशि पर है शेष राशियों पर कोई दृष्टि नहीं है। सूर्य की एकपाद दृष्टि श. चं. गु. पर भी पड़ती है जो सप्तम स्थान में वृष राशि पर बैठे हैं और अष्टम भाव में हैं। राहु पर पौन दृष्टि है जो नवम भाव में कर्क राशि पर है। केतु पर सूर्य की पाव दृष्टि है जो तृतीय भाव में मकर राशि पर बैठे हैं और किसी ग्रह पर सूर्य की दृष्टि नहीं पड़ती। इसी प्रकार चक्र के अनुसार शेष ग्रहों की दृष्टि का विचार करना। यहाँ पर देखने वाला सूर्य ग्रह ब्रह्मा है और शु. चं. गु. जिनपर सूर्य की दृष्टि पड़ती है वे दृश्य हैं। कोई ग्रह किसी भाव या दूसरे भाव को देखता है तो कहते हैं कि उस ग्रह की दृष्टि अमुक ग्रह या भाव पर है।

ग्रन्थों की दृष्टि : १४९

कुण्डली का दृष्टि चक्र—

ग्रह व भाव जिन पर ग्रहों की दृष्टि पड़ती है ।

कुण्डलीग्रह व भाव जिन पर ग्रहों की दृष्टि पड़ती है ।
भावलग्न
राशि
ग्रह
द्रष्टा ग्रह
१—सूर्यकला
२—चन्द्र"
३—मंगल"
४—बुध"
५—गुरु"
६—शुक्र"
७—शनि"
८—यादु"

१५० : संचित्र ज्योतिष शिक्षा. प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

कालात्मक दृष्टि=६०' = १° पूर्ण, ४५' = ३/४, ३०' = ३/४, १५' = ३/४ दृष्टि ।

इन चारों प्रकार की दृष्टि में केवल पूर्ण दृष्टि का ही विचार होता है, क्योंकि उसका फल पूर्ण रूप से अनुभव में आता है । शेष दृष्टि उपयोगी नहीं हैं, क्योंकि उनका फल निश्चित नहीं होता । प्रहों का दृष्टिवल निकालने में चारों प्रकार की दृष्टि का काम पड़ता है ।

दीप्तांश Orbs of the planets

जब ब्रह्मा ग्रह ( देखने-वाला ) और दृश्यग्रह ( जिसपर दृष्टि पड़ रही हो ) इन दोनों में थोड़ा ही अंश का अन्तर हो या अंश साम्य हो तो उनकी दृष्टि होना समझी जायगी । जैसे वृष के २ अंश पर कोई ग्रह हो और दूसरा ग्रह उससे सातवें घर में वृश्चिक राशि के २° पर हो, अर्थात् दोनों में पू०=६०° का अन्तर हो तो कहेंगे कि वह ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखता है । परन्तु दूसरा ग्रह वृश्चिक के २८° पर हो तो पूर्ण दृष्टि है ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि दोनों में २०६° का अन्तर पड़ जाता है । वृष राशि के किसी भी अंश पर ब्रह्मा ग्रह हो और दृश्य ग्रह सप्तम स्थान में जहाँ वृश्चिक राशि है उसके कितने ही अंश पर हो तो भी पूर्ण दृष्टि से देखता है ऐसा कहना ठीक नहीं है । किसी भाव या ग्रह पर दृष्टि करने वाला ग्रह उसी अंश साम्य पर देखना चाहिए तब पूर्ण दृष्टि समझी जायेगी चाहे वह ब्रह्मा ग्रह भाव के बीच में क्यों न हो । आगे पीछे दृष्टि हुई तो निष्फल होती है ।

इस कारण दोनों ब्रह्मा और दृश्य ग्रह की दृष्टि किसी विशेष अंश के भीतर होना चाहिए जिससे वह दृष्टि प्रभावशाली होती है । प्रत्येक ग्रह की दृष्टि का कुछ विशेषअन्तर नियुक्त है जिसके भीतर दृष्टि रहने से वह दृष्टि प्रभावशाली समझी जाती है और इस अन्तर का विचार अंशों में होता है । इन अंशों के अन्तर को दीप्तांश कहते हैं । अर्थात् दो या अधिक ग्रह जो एक दूसरे पर दृष्टि योग करते हैं तब वे ग्रह, दृष्टि योग करने के पूर्व किसी विशेष अंशों के भीतर एक दूसरे पर प्रभाव डालने में समर्थ होते हैं उस अन्तर को दीप्तांश कहते हैं । दीप्तांश चक्र—

ग्रहसूर्यचंद्रमंगलबुधशुक्रशुक्रशनि
दीप्तांश१५१२

ब्रह्मा ग्रह की दृष्टि इन दीप्तांशों के भीतर ही दृश्य ग्रह पर उसके आगे पीछे हो तो कहेंगे कि दृष्टि दीप्तांश के भीतर है । ऐसी दृष्टि का विशेष फल होता है । यदि इन दीप्तांशों के अधिक आगे या पीछे दृश्य ग्रह हो तो फल मध्यम होगा । इसका उदाहरण देकर समझाते हैं ।

ग्रहों की दृष्टि : १५१

मान लो सूर्य वृष के १५° पर है और चन्द्र तुला के २८° पर है। वृष से तुला ६ राशि अन्तर पर अर्थात् सातवें स्थान पर होने से सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो जाती है। अब देखना है कि इनकी दृष्टि दीर्घांश के भीतर है या नहीं। इसके लिए दोनों के अंश देखा। दोनों के अंशों में (२८-१५)=१३° का अन्तर है। सूर्य का दीर्घांश १५ है तो यह अन्तर १३ दीर्घांश के भीतर है, तो कहेंगे कि सूर्य की दृष्टि चन्द्र पर दीर्घांश के भीतर है। इसका कारण पूर्ण दृष्टि का पूरा फल होगा। ऊपर जो दृष्टि कोण के दीर्घांश बताये गये हैं वे इसी प्रकार विचारे जाते हैं।

युति Conjunction=जब-जब यह एक ही राशि पर और एक ही अंश पर हो तो वह युति दृष्टि योग कहलाता है। यदि दीर्घांश के अनुसार उसमें ८-१० अंश से अधिक अन्तर पड़ जायगा तो वह युति योग प्रभाव पूर्ण नहीं होगा।

पाश्चात्य पद्धति से दृष्टि विचार

जिस ग्रह या भाव की दृष्टि निकालना है तो दोनों का अंशों में अन्तर निकालो और उस अन्तर के अनुसार दृष्टि का फल विचार करो। द्रष्टा और दृश्य इन दोनों के बीच में अंशों का न्यूनाधिक अन्त होने पर उस अन्तर के अनुसार दृष्टि का विशेष नाम होता है और दृष्टि योग से फल का अनुभव उसी के अनुसार होता है। यह दृष्टि का शुभाशुभ फल उसी दृष्टि के अनुसार होगा।

यह विचार नहीं रखना चाहिए कि देखने वाला ग्रह शुभ होगा तो सदा शुभ फल देगा या पाप ग्रह होगा तो सदा अशुभ फल देगा। कभी-कभी अशुभ दृष्टि योग से शुभ ग्रह भी अशुभ फल देते हैं और अशुभ ग्रह शुभ फल देते हैं।

पाश्चात्य लोग कोई ग्रह बिलकुल शुभ या अशुभ है ऐसा नहीं मानते, परन्तु दृष्टि योग से शुभाशुभ फल देना मानते हैं। जैसा गुरु यह शुभ ग्रह है उसका सम्बन्ध चंद्र के साथ होने से अति शुभ फल देगा, इसके विरुद्ध शनि ये पाप ग्रह है सूर्य या चंद्र के साथ शुभ दृष्टि योग करने से शुभ फल देता है। इस कारण योररोपीय जातक ग्रंथों के आधार पर यहाँ दृष्टि योग समझाते हैं, जिसमें यह भी बताया है कि कौन दृष्टि योग शुभ या अशुभ है। दृष्टि योग सूचक संकेत के चिह्न भी दिये हैं, क्योंकि अंग्रेजी पंचाङ्कों में केवल दृष्टि योग के चिह्न ही दिये रहते हैं।

१५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

दृष्टियोगग्रहों का अन्तरफलचिह्नदीर्घांश
दृष्टियोग नामराशि या अंश
१-साई केन्द्रयोग
Semi Square or
Semi Quartile१३=४५अशुभ∠ या
S □२-३ अंश
२-द्विरेकादश (द्विराश्यंतर)
Sextile२=६०शुभ* या
  • | २-३ ३-केन्द्र (वर्तुलपाद) Square | ३=९० | अति शुभ | □ | ४-५ ४-त्रिकोण (नवम-पंचम) Trine | ४=१२० | अति शुभ | △ | ४-५ ५-साई चतुष्टय राश्यंतर Sesqui quadrate | ४३=१३५ | अशुभ | ⊥ या ⊠ | २-३ ६-षड्स्क Quincunx | ५=१५० | अशुभ | ∇ या ∟ | २-३ ७-पूर्ण दृष्टियोग ( प्रतियोग ) प्रतियुति (सप्तम दृष्टि) Opposition | ६=१८० | अशुभ | ⊙ या ⊗ | ८-१० ८-युति दृष्टियोग ( युति योग ) Conjunction | ० राशि अंश | युति करने वाले ग्रह के शुभाशुभ | ⊙ | ८-१० | समान | धर्म पर अवल- म्बित है | | ९-एक राश्यंतर युति Semi Sextile | १=३० | सदा अच्छा | ∨ या S * | २-३ Semi Quintile | | | | १०-चक्र दशमांश Quintile | १३=३३ | | ⊥ | २-३ ११-चक्र पंचमांश Biquintile | २३=७२ | कुछ अच्छा | Q | २-३ १२-चक्र साई द्वितीयंश | ४३=१४४ | " | ± | २-३ १३-समकांति दृष्टियोग Parallel or Declination | जब नाईवृत्त युति से बराबर कांति समान अन्तर पर हो | | P | २

ग्रहों की दृष्टि : १५१

इन ग्रहों का योग अच्छा है—

(१) गुरु का—नेप. हर्षल. श. सृ. बु. या चं. के साथ अच्छा है।

(२) शुक्र का—बुध या चंद्र से योग अच्छा है।

(३) वृष—चंद्र का भी योग अच्छा है।

(४) शेष ग्रहों का योग कम या अधिक, स्थिति के अनुसार हानि कारक है।

युति योग—रवि-गुरु, गुरु-चंद्र, चंद्र-बुध, चंद्र-शुक्र, रवि-शुक्र इनकी युति अच्छी मानी जाती है।

जब २ या अधिक ग्रह एक राशि में जितने पास-पास हों उतना ही अधिक युति का प्रभाव होता है। जैसे वृष के ४° पर गुरु है और मेष के २६° पर सूर्य है। यहाँ सूर्य गुरु के पास जा रहा है उस समय वह संयोगी applying or approaching कहलायेगा। जब सूर्य गुरु के पास मिलकर उसके आगे बढ़ेगा अर्थात् गुरु के अंश से सूर्य के अंश अधिक बढ़ने लगे तब सूर्यवियोगी Separating ग्रह कहलायेगा। जब ग्रह वियोगी होता है तो वह संयोगी अवस्था से अधिक शक्तिशाली होता है। मान लो गुरु वृष के ४ अंश पर है और सूर्य वृष से १२° पर है तो गुरु और सूर्य का युत योग का अधिक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि वह वियोगी (उससे दूर हटने की) अवस्था है।

क्रांतिसाम्य दृष्टियोग

जब दोनों ग्रहों की स्पष्ट क्रांति (चाहे दोनों की क्रांति एक दिशा में या भिन्न दिशा में हो) अंशादि में समान आ जावे, उस समय क्रांति साम्य दृष्टियोग होता है। इसका परिणाम युति के परिणाम से भी अधिक महत्व का समझा जाता है।

प्रति योग—जयुष ग्रह की अयुष दृष्टि हो तो विशेष अयुष दायक होती है। ग्रहों का योग इस प्रकार विचार किया जाता है :—

(१) चंद्र का—सब ग्रहों के साथ, क्योंकि यह शक्तिशाली है।

(२) वृष का—शु. सृ. मं. गु. श. हर्षल और नेपच्यून के साथ।

(३) शुक्र का—सृ. मं. गु. श. ह. और ने. के साथ

(४) सूर्य का—मं. गु. श. ह. और ने. "

(५) मंगल का—गु. श. ह. और ने. "

(६) गुरु का—श. ह. और ने. "

(७) शनि का—ह. और ने. "

(८) हर्षल का—ने. "

(९) नेपच्यून का किसी भी ग्रह के साथ योग नहीं होता क्योंकि वह सबसे कम चलने वाला है।

१४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अपवाद— वक्की ग्रह का दूसरे ग्रहों के साथ योग हो सकता है। हर्षल जब वक्की होता है तब उसका योग किसी भी ग्रह के साथ या चन्द्र के साथ भी हो सकता है।

पाश्वत्या मत्त से ग्रहों के दीप्तांश।

( १ ) बु. गु. शु. श. ह.—जब संयोगी हों=६°, वियोगी में ८° दीप्तांश। मान लो शुक्र शनि का युति योग है। यह योग संयोगी है, जब शुक्र शनि से ६° अन्तर पर होगा तो उस दृष्टि का प्रभाव होगा और दोनों का योग होकर शुक्र ८° चला जायगा तब तक इसका प्रभाव रहेगा। इसी प्रकार सब ग्रहों का विचारना।

( २ ) सूर्य का दीप्तांश अधिक है, संयोगी में १२° और वियोगी में १७° है। ये दीप्तांश केवल युतियोग, द्विराशि अन्तर योग, त्रिकोण योग और प्रतियोग में विचारना।

( ३ ) छोटे-छोटे दृष्टि योगों के दीप्तांश।

( १ ) एक राशि अन्तरयोग, ७२° अन्तरयोग, १४४° अन्तरयोग में संयोगी में २° और वियोगी में ३°

( २ ) साढ़े केन्द्रयोग, साढ़े चतुष्टयराश्यंतरयोग में, संयोगी ३°, वियोगी ४°

( ३ ) सूर्य और चन्द्र के दृष्टि योग में इन दीप्तांशों से १° और अधिक लेना।

( ४ ) सम क्रान्तियोग में २° से अधिक नहीं लेना। मान लो मंगल की क्रान्ति १३° उत्तर और शनि की ११° दक्षिण है तो इन दोनों का सम क्रान्तियोग हुआ। इसी प्रकार भाव के भी दीप्तांश होते हैं।