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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

( १४ )

चित्रपृष्ठ
बारह राशियों के कल्पित स्वरूप
४२ मेष३७
४३ वृष३७
४४ मिथुन३७
४५ कर्क३७
४६ सिंह३७
४७ कन्या३७
४८ तुला३८
४९ वृश्चिक३८
५० धन३८
५१ मकर३८
५२ कुंभ३८
५३ मीन३८
५४ अक्षांश और देशान्तर३९
५५ ध्रुव की ऊँचाई का नाप४२
५६ इलाहाबाद में मध्याह्न में
सूर्य की ऊँचाई४३
५७ नरासिंह पुर में मध्याह्न में
सूर्य की ऊँचाई४३
५८ नाड़ीवृत्त, क्रांतिवृत्त, भोग
और शर४८
५९ दूसरा उदाहरण शर भोग
आदि का४९
६० क्षितिज, क्रांतिवृत्त,
नाड़ीवृत्त ध्रुव५०
६१ सम्पात बिन्दु५५
६२ क्रांति सीमा नाड़ी वृत्त
आदि५६
६३ आकाश में पूर्व दशम अस्त
पाताल१०६
६४ आकाश की दिशाओं दर्शक
चित्र१०६
चित्रपृष्ठ
६५ आकाश का चौकोर चित्र१०८
६६ लग्न दशम अस्त पाताल
दर्शक चौकोर चित्र१०९
६७ आकाश में द्वादश भाव११०
६८ लग्न कुंडली११०
६९ भाव सूचक लग्न कुंडली१११
७० आकाश में लग्न से अस्त
तक भाव११६
७१ राशियों के घूमने का क्रम
और स्वराशि१३२
७२ स्वराशि दर्शक चित्र१३३
७३ ग्रह की दृष्टि सूचक चित्र
ग्रहों के कल्पित स्वरूप के चित्र१४६
७४ रवि१५९
७५ चन्द्र"
७६ मंगल"
७७ बुध"
७८ शुक्र"
७९ शुक"
८० शनि"
८१ राहु"
८२ केतु"
८३ ध्रूपघड़ी बनाना१७४
८४ ध्रूपघड़ी का चक्र बनाना१७५
८५ समय सूचक चक्र और ध्रुव
का अक्षांश१७५
८६ सू्मि पर ध्रूपघड़ी बनाना
८७ कुण्डली के भिन्न-भिन्न प्रकार
और पाश्चात्य पद्धति से कुंडली२३३-२३६
८८ दिशाओं की राशियाँ
और भाव२६७

३३

ज्योतिष-शिखा

[ प्रारम्भिक ज्ञानखण्ड ]

बुद्धि विनायक विघ्न हर, बिनवों बारम्बार । विनय करू वागीश की, विमल बुद्धि दातार ॥ १ ॥ जय महेश जिन तन लसै, वर नक्षत्र की माल । जाकी आज्ञा से भ्रमत, ग्रह आदिक अरु काल ॥ २ ॥ ग्रह प्रभाव से प्रगट हो, पूर्व जन्म का कर्म । कष्ट कटै प्रभु ध्यान से, अरु प्रगटै शुभ धर्म ॥ ३ ॥ धरू ध्यान कल्याण हित, किरपा करहु कृपाल । शीघ्र पूर्ण हो ग्रन्थ यह, दो शस्ती तत्काल ॥ ४ ॥

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अध्याय १

ज्योतिष शास्त्र के भेद

ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि ज्योतिष शास्त्र के कितने भेद हैं। इसके मुख्य दो भेद हैं—

( १ ) गणित ज्योतिष Astra-Nomy ( एस्ट्रा नमी ) = जिससे पंचाङ्ग आदि बनाये जाते हैं।

( २ ) फलित ज्योतिष Astra-logy ( एस्ट्रा लजी ) = जिससे ग्रहों के फल का विचार होता है।

इनके भी कई भेद हो गये हैं जो नीचे समझाये जाते हैं:—

१ गणित ज्योतिष—इससे ग्रहों का स्वरूप अवस्था गति आदि का निश्चय किया जाता है। इसके तीन भेद हैं—

( १ ) सिद्धान्त—जिसमें कल्प ( सूक्ति के आदि ) से ग्रह आदि स्पष्ट करने के लिए गणित करने की रीति दी है।

( २ ) तन्त्र—जिसमें युग ( वर्तमान कलियुग ) से गणित करने की रीति दी है।

( ३ ) करण—जिसमें इष्ट शाका से गणित करने की रीति दी है।

गणित ज्योतिष के अन्तर्गत वह गणित भी है जिसमें जोडना, घटाना, गुणा, भाग वर्गमूल आदि निकालना तथा भूमि, आकाश आदि के नापने की विधि बतलाई गई है। इसी गणित द्वारा ग्रहों की स्थिति आदि निकाली जाती है।

२ फलित ज्योतिष ( नजूम )—ग्रहों की स्थिति पर से शुभाशुभ फलों का विचार इससे होता है। इसके भेद इस प्रकार हैं—

( १ ) होरा अर्थात् जातक—आधान कुंडली से दुःख सुख का विचार।

( २ ) ग्रहूत—कार्य आरम्भ करने में ग्रह, तिथि, नक्षत्र, वार आदि के प्रमाण से शुभाशुभ फल का विचार।

( ३ ) ताजिक—वर्ष प्रवेश, मास प्रवेश, दिन प्रवेश आदि बनाकर वर्ष भर के शुभाशुभ फल का विचार।

( ४ ) प्रश्न ज्योतिष—किसी भी समय इष्टकाल पर से किसी भी प्रश्न का तत्सम्बन्धी दुःख सुख आदि के परिणाम का विचार।

( ५ ) मेदनीय किंवा राष्ट्र ज्योतिष—किसी देश या राष्ट्र की उन्नति-अवन्ति दुःख सुख आदि का विचार।

( ६ ) संहिता खण्ड—किसी सम्बत का शुभाशुभ, भूकम्प, इन्द्र धनुष, केतु उदय आदि का फल, शुभाशुभ शकुन, शरीर बिल्ह द्वारा मरण होने का ज्ञान, स्वरोदय, पल्लीपतन, सामुद्रिक, अङ्ग स्फुरण आदि का विचार।

अध्याय २

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास

इस ग्रन्थ में फलित ज्योतिष का अध्ययन करने के लिए ही प्रारम्भिक बातें बताई गई हैं। फलित ज्योतिष में कई मनुष्य विश्वास करते हैं कई नहीं करते और कहते हैं कि यह इतने दूर होते हुए पृथ्वी पर किस प्रकार प्रभाव पहुँचा सकते हैं। इस कारण प्रारम्भ में ही संक्षेप में ग्रहों के प्रभाव के विषय में थोड़ा बता देना अनावश्यक न होगा।

यह निर्विवाद सिद्ध है कि सूर्य के आस-पास पृथ्वी आदि कई ग्रह परिक्रमा करते हैं और समस्त ग्रह आदि एवं सूर्य अन्ततः विश्व के अन्तरिक्ष में निराधार लटके हुए निरन्तर नियमित रूप से गतिशील रहते हैं। सूर्य के आस पास चन्द्र सहित पृथ्वी एवं बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि आदि ग्रह घूम रहे हैं। इन सबों के समुदाय को सौर जगत् या सूर्य का परिवार कहते हैं।

ये सब ग्रह सूर्य की आकर्षण शक्ति के वशीभूत होकर विशेष नियम के अनुसार सूर्य के आस पास घूम रहे हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहों की भी पृथक-पृथक आकर्षण शक्ति है जिसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा, पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से खिंचा हुआ पृथ्वी के आस पास घूम रहा है और सूर्य की आकर्षण शक्ति से खिंचे हुए चन्द्र और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इसी प्रकार शनि आदि ग्रहों के भी उपग्रह हैं जो उन ग्रहों के आकर्षण के प्रभाव से इन ग्रहों की परिक्रमा करते हुए सूर्य के आकर्षण से प्रभावित होकर सूर्य की भी परिक्रमा कर रहे हैं।

पृथ्वी से १.३६ लाख मील दूर होते हुए भी जब समस्त पृथ्वी पर सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव पड़ता है तो पृथ्वी में रहने वाले जड़ एवं चैतन्य पशु-पक्षी, मनुष्य आदि भी सूर्य के प्रभाव से प्रभावित होने से कैसे बच सकते हैं।

प्रत्यक्ष देखने में आता है कि जब सूर्य विशेष राशियों में आता है तो किस प्रकार जाड़ा, गर्मी, बरसात आदि ऋतुओं में परिवर्तन होता है जिसका प्राणी मात्र पर प्रभाव पड़ता है। सूर्य के ही कारण प्रकाश, उष्णता, ग्रह गति होती है। सूर्य न हो तो प्राणी मात्र का जीना असम्भव हो जाय। आज कल सूर्य की किरणों से चिकित्सा भी होने लगी है।

प्रातः काल सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। मध्याह्न में सीधी पड़ती है और रात्रि में किरणों का अभाव रहता है। इस प्रकार जैसे समय में जिस बालक का जन्म हो उस समय का प्रभाव उसके स्वभाव में परिणत हो जाता है। अर्थात् समय के अनुसार ही स्वभाव पड़ जाता है। भीष्म में ( वृष और मिथुन के सूर्य में ) सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। हेमन्त ऋतु में ( वृश्चिक-धनु के सूर्य में ) तिरछी पड़ती

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास : ३

है। इस लिए इन सूर्य की राशियों में जिस बालक का जन्म होगा उसी के अनुसार शरीर में प्रभाव बढ़ेगा।

सूर्य का प्रभाव पौधों और वृक्षों पर भी पड़ता है। वर्षा ऋतु में इस्लिया अधिक उत्पन्न होती है और कृषि को हानि पहुँचाती है। बुखार का प्रकोप भी समयानुसार बढ़ता है। इस प्रकार समस्त जड़ चैतन्य पर सूर्य का प्रभाव पड़ता है। सब ग्रहों में सूर्य बड़ा बलवान् है इसी कारण सूर्य को मनुष्य की आत्मा कहा है।

जहाँ जो जिस परिस्थिति में उत्पन्न हुआ है वही उसका प्राकृतिक स्वभाव बन जाता है। इसी प्रकार विशेष ग्रह स्थिति और समय से उत्पन्न बालक का विशेष स्वभाव बन जाता है। जैसे ठंडी प्रकृति में उत्पन्न हुए वृक्ष को यदि उष्ण प्रकृति के स्थान में लगाओ तो नहीं होगा, यदि हुआ भी तो शक्ति हीन, रोगी होगा। कारण कि ठंडे वातावरण में उत्पन्न होने से उसका जीवन भी जन्म समय के वातावरण से प्रभावित होकर वहाँ की प्रकृति का स्वभाव ग्रहण करता है। इसी कारण भिन्न-भिन्न स्थिति में उत्पन्न हुए बालकों की प्रकृति भी भिन्न-भिन्न हो जाती है। किसी विशेष ग्रह का प्रभाव भिन्न-भिन्न मनुष्यों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है।

Dr. Maurice Faure (डाक्टर मारिस फाउर) ने सन् १९२७ में फ्रेंच अकादमी के समक्ष डाक्टरी और ज्योतिष सम्बन्धी रिकार्ड उपस्थित कर बताया था कि सूर्य के धब्बे भी सूर्य के आस पास एक ही दिशा में परिक्रमा करते हैं। २५६ दिन में उनकी एक परिक्रमा होती है। जब धब्बे दिखाई देते हैं तो उस समय साधारण मृत्यु संख्या से दुगुनी मृत्यु संख्या हो जाती है। इसका पूरा प्रमाण भी उपस्थित किया गया था।

चन्द्र का प्रभाव सूर्य से दूसरे नम्बर का है। इसका महत्तम पृथ्वी से अन्तर २५२९४८ मील है। यह पृथ्वी के सब ग्रहों से समीप होने के कारण अधिक प्रभावित करता है। चन्द्र की भी आकर्षण शक्ति समुची पृथ्वी पर पड़ती है, जिससे जड़ चैतन्य सभी प्रभावित हो रहे हैं। प्रत्यक्ष में देखा जाता है कि चन्द्र की घटावृद्धी के कारण समुद्र की लहरों पर प्रभाव पड़ता है। पूर्णिमा को ज्वारभाटे का पूर्ण प्रभाव देखने में आता है। जब समुद्र सरीखे जड़ पदार्थ पर भी इतना प्रभाव पड़ता है कि जल राशि को अपनी ओर आकर्षित कर बड़ी-बड़ी लहरों का उत्पादक होता है तो यह इतर प्राणियों पर क्यों न प्रभाव करेगा ?

मनुष्य के चित्त पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ता है, इसी कारण चन्द्रमा को मनुष्य का मन कहते हैं। बहुधा देखा जाता है कि चन्द्र के घटाव वृद्धाव का प्रभाव पागल पर अधिक पड़ता है। इसी कारण पागलपन को चन्द्र के नाम से अंग्रेजी में लूनेसी Lunecy कहते हैं। सर इसाक न्यूटन Isaac Neutan ने सिद्ध कर बताया है कि पागलपन चन्द्र से सम्बन्धित है और मानसिक दशा पर चन्द्र का बहुत प्रभाव पड़ता है।

४ : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

केवल जीवों पर ही नहीं वनस्पतियों आदि पर भी इसका पूरा प्रभाव पड़ता है। जंगल में जो दास आदि उजले पक्ष में काटे जाते हैं, वे शीघ्र घुन जाते हैं क्योंकि शुक्ल पक्ष का अधिक प्रभाव वृक्ष आदि की उत्पादक शक्ति पर पड़ता है। इससे उनमें कीड़े शीघ्र उत्पन्न हो जाते हैं।

अभी ब्रिटिश कालोनीयल (उपनिवेश) आफिस के विशेषज्ञ ने खोजकर प्रगट किया है कि मछलियों पर चन्द्र का विशेष प्रभाव पड़ता है। पूर्णमासी के समय मछलियों अधिक पकड़ी जाती है, कृष्ण पक्ष में इस सम्बन्ध से लाभजनक स्थिति नहीं रहती।

खोज से यह भी पता लगा है कि अपनी मध्यान्ह रेखा के अनुसार चन्द्र की विशेष तिथियों को ही ओस्टर और मुसेल (घोंघा मछलियों की जाति) अपने घोंघे खोलते और अपना पालन करते हैं।

इसी प्रकार इतर ग्रहों को भी आकर्षण शक्ति सूर्य की आकर्षण शक्ति से प्रभावित होकर पृथ्वी आदि समस्त ग्रहों पर प्रभाव उत्पन्न करती है और वे ग्रह भी अपने डीलडोल के अनुसार सम्पूर्ण सूर्य सम्प्रदाय पर प्रकाश डालते हैं तो फिर जीव जन्तु वनस्पति आदि प्रभावित होने से कैसे बच सकते हैं?

ग्रह के प्रभाव से हीरा आदि अमूल्य रत्न भी अपना विचित्र प्रभाव धारण करते हैं।

अभी हाल में एक होप (आशा) नाम के प्रसिद्ध हीरे के विचित्र प्रभाव की कथा प्रकाशित हुई थी। यह हीरा जिसके-जिसके पास गया उसका नाश हुआ। यह हीरा भारतवर्ष के किसी मन्दिर की मूर्ति की आँख में लगा था। वह किसी प्रकार वेलजियम के निवासी के हाथ लगा। उसने फ्रांस के बादशाह लुइस-१४ को बेचा। पश्चात् मेरी एण्टोनिटी ने उसे पहिला, उसकी बपबाद से मृत्यु हुई। अमस्टरडम के विलियम फेल्स ने उस हीरे को काटा, उसका सर्वनाश हुआ। फ्रांसिस बिकलिङ्ग ने उसे प्राप्त किया, उसकी मृत्यु क्षुधा पीड़ा से हुई। सन् १९०१ में इसका कोलोट ने उसे मोल लिया, उपघात से उसकी मृत्यु हुई। उपरान्त वह होरा रूस के राजकुमार कन्टोस्की के पास पहुँचा जिसने अभिनय के समय एक सुन्दर नर्तकी को पहिनने को दिया था, वह अभिनय करते समय गोली से मारी गई। उपरान्त राजकुमार भी शस्त्राघात से मारा गया। इसके बाद वह हीरा किसी यूनान निवासी के पास पहुँचा, उसकी अपनी स्त्री और बच्चे सहित फिसलने से मृत्यु हुई। पूर्व सुल्तान अब्दुल हमीद ने वह हीरा कान्स्टेननोपल में अपनी प्रेमिका को पहिनने को दिया वह गोली से मारी गई। बाद में हवीब नाम के अरबीनियन के पास पहुँचा। वह सिंघापुर में डूब कर मर गया। सन् १९११ में एवलिन मेकलीन ने उसे मोल लिया, उसका लड़का विन्सेन्ट मोटर से दब कर मर गया; स्त्री भिसेस एवलिन मेकनील रेनोल्ड ने उसे पहिला तो उसकी अचानक मृत्यु हो गई।

इन्हीं सब सिद्धान्तों पर पाश्चात्य देशों में भी ग्रहों के प्रभाव को मान कर फलित ज्योतिष पर विश्वास करने लगे हैं। यहाँ तक कि भविष्य कथन करते हैं। उनके

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास : ५

सम्बन्ध की बातें भी प्रमाणित की जाती हैं कि कहाँ तक भविष्य कथन सत्य निकला जिन पर विचार करने से भविष्य कथन की सत्यता पर लोगों का विश्वास होने लगा है।

प्रायः यह भी देखा जाता है कि कई लोगों की भविष्यवाणी असत्य भी निकल जाती है। इसका मुख्य कारण कल्पना शक्ति है। क्योंकि यह तो कल्पना और तर्क शास्त्र है, जिसमें कल्पना और तर्क करने के सिद्धान्त दिये हैं, उनमें वे प्रभाव घटित होने का संकेत मिलता है। यदि कल्पना में भूल हुई तो भविष्य कथन में अवश्य अन्तर पड़ेगा। डाक्टर जो कई वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ कर डाक्टरी विद्या अध्ययन कर पद प्राप्त करता है, जब डाक्टर होकर किसी रोग का निदान करता है तो उस रोग के विषय में भिन्न-भिन्न डाक्टरों की भिन्न-भिन्न राय हो जाती है। जब असली रोग की जड़ पा जाते हैं तो निदान पक्का हो जाता है।

इस विषय में श्री स्टेनली लीफ इंग्लैण्ड के प्रमुख प्राकृतिक चिकित्सक एवं “हैलथ फार आल” मासिक पत्रिका के सम्पादक ने लिखा है। सर डेविड ब्रुमंड ने ग्लासगो की रायल फेकल्टी आफ सर्जरी के सभापति की हैसियत से अपने भाषण में कहा था कि ‘शव परीक्षा से यह बात अलीसांति प्रमाणित हो चुकी है कि औसत दर्जे के चिकित्सकों का निदान ८० प्रतिशत गलत हुआ करता है’।

बोस्टन के सुप्रसिद्ध चिकित्सक और निदान शास्त्री डाक्टर रिचर्ड केवट ने, जिन्होंने निदान पर एक शास्त्रीय पुस्तक लिखी और हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित अध्यापक है, अमेरिकन मेडिकल असोसियेशन के वार्षिक अधिवेशन में अपने विस्तृत अनुभव के आधार पर लिखित एक निबन्ध प्रस्तुत किया था। जिसमें उन्होंने एक हजार रोगियों का विवरण देकर विश्लेषण कर यह परिणाम निकाला था कि सब मिलाकर ५० प्रतिशत निदान सही और ५० प्रतिशत बिल्कुल गलत थे।

हृदय रोग के प्रसिद्ध चिकित्सक सर जेम्स मैकेंजी ने अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व एक भाषण में यह धारणा व्यक्त की थी कि जीवन पर्यन्त अनुसंधान और शव-परीक्षण करने के उपरान्त मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि चिकित्सक लोग साधारण रोगों में ७० प्रतिशत गलत निदान करते हैं। असाधारण रोगों में यह संख्या और अधिक होगी। जब उन्नति के शिक्षर पर पहुँची डाक्टरी विद्या का यह हाल है तो फिर ज्योतिष शास्त्र को क्यों बदनाम किया जाता है ?

इसी प्रकार बड़े-बड़े जज जो अनेक वर्षों तक विद्या अध्ययन कर कानूनों पुस्तकों का पूरा ज्ञान प्राप्त कर चुकते हैं किसी अभियोग का निर्णय कर अपराधी को प्राण दण्ड की सजा देते हैं। परन्तु अपील करने पर ऊँची अदालत उस जज के निर्णय को पलट कर अपराधी को उन्हीं साक्षियों के आधार पर निर्दोष पाकर छोड़ देती है। इसी को कहते हैं विचार शक्तियों में अन्तर। विचार करने में असावधानी या कोई विशेष बात की सूझ का अभाव या समझ की भूल वहाँ पर होने के कारण फल कथन में अन्तर पड़ सकता है।

६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस कारण बड़ी सावधानी से ज्योतिष के एक-एक विषय का क्रम पूर्वक अध्ययन और मनन करने की आवश्यकता है। अनुभव होने पर उसका परिणाम प्रत्यक्ष गोचर होने लगेगा।

अध्याय ३

सौर जगत् और ग्रह Solar System and Planets

उस सर्वव्यापी जगन्निर्मिता परमेश्वर की लीला कितनी विचित्र है। आप आकाश की ओर ध्यान दें तो विदित होगा कि आकाश में अनेक तारागण अक्षर में लटके हुए हैं। आकाश में करोड़ों तारागण हैं जो साधारण दृष्टि से गोचर नहीं होते। उनमें कई तारागण तो केवल बड़ी-बड़ी दूरबीनों के सहारे ही देखे जा सकते हैं।

अन्य तारागणों के मध्य तारागणों का एक मंडल है जिसे सौर जगत् या सौर परिवार या सूर्य सम्प्रदाय कहते हैं। उनके मध्य में अपना एक ही सूर्य है जिसके आस पास अपनी पृथ्वी और इतर ग्रह बुध, शुक्र, गुरु आदि परिक्रमा करते हैं, जिन सबका सूर्य से सम्बन्ध है और जो सब, सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से सूर्य को छोड़ कर कहीं दूसरी जगह भटक कर नहीं जा सकते। इसी कारण इन सब ग्रहों के समुदाय को और उन तारागणों को जो इन ग्रहों की परिक्रमा के मार्ग के आस पास पड़ते हैं, सौर जगत् कहते हैं।

आकाश में कई प्रकाशवान् तारागण दिखते हैं। उनमें कई तो अपने सूर्य से भी कई गुने बड़े हैं। बहुत बूरी के कारण यहाँ से छोटे दिखते हैं। इसी प्रकार जो ग्रह शुक्र, गुरु आदि देखने में छोटे दिखते हैं बड़े भीमकाय ग्रह हैं, जो अक्षर में लटके हुए हैं। इन सबके आकार आदि का वर्णन आगे होगा।

एक विचित्र तारे का पता लगा है जो सूर्य से १६० गुना बड़ा है। १० हजार वर्ष में उसका प्रकाश पृथ्वी पर पहुँचता है और वह पृथ्वी से ५२५६० लाख मील की दूरी पर है। ऐसे कई तारे हैं जो सूर्य से करोड़ गुना तेजस्वी हैं। इस प्रकार आकाश में अनेक सूर्य हैं। उनमें से अपना सूर्य एक हैं और इस अपने सूर्य का परिवार अलग है और इस परिवार के ग्रह इसी सूर्य की परिक्रमा करते हैं।

खोज से पता लगा है कि अपना सौर जगत् किसी और शक्तिशाली सूर्य के आस पास अपने परिवार सहित घूम रहा है। कृतिका नक्षत्र को केन्द्र मान कर अपना सौर जगत् घूम रहा है। अमेरिकन साइन्टिस्ट्स असोसियेशन ने कई वर्षों की जाँच के उपरान्त बताया है कि अपना सूर्य एक सेकेन्ड में १३० मील के हिसाब से Dragon बूँगो (बजगर) नक्षत्र की ओर अपने परिवार सहित घूम रहा है। यह नक्षत्र उत्तर ध्रुव तारे के पास है।

सौर जगत् और ग्रह : ७

ग्रहों के ज्योतिष शास्त्र का सम्बन्ध केवल अपने सौर जगत् से है। महर्षियों ने सूर्यादि सब ग्रहों की गति प्रभाव आदि का पूर्ण अध्ययन कर और अनुभव कर जिस शास्त्र का निर्माण किया है उसे ज्योतिष शास्त्र कहते हैं।

ग्रह ( Planets )

अपने सौर जगत् में सूर्य सब ग्रहों का प्रधान और केन्द्र है। उसके आस पास ग्रह घूमते हैं। चित्र संख्या १ और २ से, सूर्य से ग्रहों की दूरी का और ग्रहों की परिक्रमा का क्रम समझ पड़ेगा।

सूर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों में पृथ्वी को छोड़ कर शेष ग्रहों के नाम नीचे दिये हैं।

क्रम ग्रहअंग्रेजी नामफारसी नामअंग्रेजी चिन्हहिन्दी चिन्ह
१ सूर्यSunसनआफताब
२ चंद्रमाMoonमूनमाहताव
(कमर)चं.
३ मंगलMarsमार्समिर्रिख
४ बुधMercuryमरकरीउताखद
५ गुरु
(बृहस्पति)Jupiterजुपीटरमुश्तरी
६ शुक्रVenusवीनसजुहरा
७ शनिSaturnसेटर्नजुहल
८ राहुCaputकेपुटरास
या Dragon's Headडेगोन्स हैड
या Ascending Nodeअसेन्डिंग नोड
९ केतुCaudaकअडाजनव
या Dragon's Tailड्रैगोन्स टेल
या Descending Nodeडिसेन्डिंग नोड
१० वरुणNaptuneनेपच्यून
या
११ प्रजापतिHerschelहरशल
या Uranus

८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चित्र संख्या १—सूर्य के आसपास ग्रह इस प्रकार घूमते हैं ।

ग्रह और तारे में अन्तर

किसी निर्मल रात्रि को आकाश की ओर देखें तो अनेक तारागण दृष्टि गोचर होंगे; उनमें मुख्य दो प्रकार के तारागण हैं । एक साधारण तारे और दूसरे ग्रह ।

इनमें से ग्रह और तारे इस प्रकार पहिचाने जा सकते हैं—

सौर जगत् और ग्रह : ९

(१) तारे Stars : आकाश में कई तारे ऐसे हैं जो स्वयं प्रकाशवान् हैं। ऐसे तारागण रात्रि को दीपक की लंब सदृश जुग जुगाते दिखाई देते हैं अर्थात् उनके प्रकाश की लंब या किरणें छोटी बड़ी होती दिखाती हैं। इन्हें तारागण कहते हैं।

(२) ग्रह Planets : दूसरे प्रकार के ऐसे तारे दिखेंगे जिनका प्रकाश एक-सा रहता है अर्थात् जुग जुगाते नहीं दिखते। ऐसे दिखते हैं जैसे बिना लंब की अंगार हो जिनका एक सरीखा प्रकाश दिखाता है। ये ग्रह सूर्य के प्रकाश पड़ने से प्रकाशित होते हैं। वे स्वतः प्रकाशवान् नहीं हैं। ये ही ग्रह कहलाते हैं।

शुक्र ग्रह सूर्य के उदय होने के बहुत पहिले आकाश में देखा जाता है। इसे लोग 'भुन सरिया' तारा भी कहते हैं और उसे अधिकतर लोग इसे पहिचानते हैं। इसको ध्यान से देखो तो समझ पड़ेगा कि यह तारा है या ग्रह। कभी यह शुक्र ग्रह सूर्यास्त के बाद दिखाता है तब भी इसे पहिचान सकते हैं।

प्रतिदिन शुक्र, गुरु आदि ग्रहों और इतर तारागणों को अवलोकन करते रहने से ग्रह और तारागण में अन्तर समझ पड़ेगा।

अंग्रेजी के ज्योतिष ग्रन्थों में ग्रहों के स्थान में उपरोक्त चिन्हों का उपयोग हुआ

चित्र संख्या ३-ग्रहों के आकार का अनुपातिक मिलाप

है उस कारण उन चिन्हों को ध्यान में रखना चाहिए। इनमें से केवल ९ मुख्य ग्रह हैं। हर्शल और नेपच्यून ग्रह नवीन खोज किये हुए हैं और पाश्चात्य पद्धति में उनका भी वर्णन रहता है इस कारण उनको भी बता दिया है, जिनको मिलकर ११ ग्रह हो जाते हैं। इस प्रकार हर्शल और नेपच्यून के निकालने से बचे हुए ९ ग्रहों में से ७ ग्रह आकाश में दिखते हैं। दो ग्रह राहु और केतु अवश्य ग्रह हैं।

राहु-केतु

यद्यपि राहु और केतु की गणना ग्रहों में की गई है परन्तु वास्तव में ये ग्रह नहीं हैं। इनको अप्रकाश ग्रह Shadow Planets कहते हैं। अर्थात् आकाश में ये ग्रह नहीं दिखते और न इनका कोई आकार ही है। पृथ्वी के आस-पास चन्द्रमा परिक्रमा

१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

करता है और चन्द्रमा सहित पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। इस प्रकार पृथ्वी की परिक्रमा की परिधि को चन्द्र अपनी परिक्रमा में दो जगह काटता है। अर्थात् पृथ्वी और चन्द्र की परिक्रमा की परिधि एक दूसरे को दो जगह काटती है, उनमें से एक बिन्दु को राहु कहते हैं जो नीचे से ऊपर की ओर जाने वाला बिन्दु है। और दूसरे बिन्दु को जो उसके ठीक विपक्ष है, केतु कहते हैं। यह ऊपर से नीचे जाने वाला बिन्दु है इसीसे राहु को Ascending Node (असेन्डिंग नोड) और केतु को Descending Node (डिसेन्डिंग नोड) भी कहते हैं।

ये दोनों ग्रह बिन्दु मात्र हैं। एक दूसरे से सदा ६ राशि के अन्तर पर रहते हैं और सदा दूसरे ग्रहों की दिशा से विरुद्ध क्रम से चलते हैं। जब चन्द्रमा पूर्णमासी के समय या सूर्य अमावस्या के समय इन्हीं पातों के पास पहुँचता है तो चन्द्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण होता है। इस कारण राहु और केतु को भी ग्रह माना गया है।

जिस प्रकार चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय संसार के वातावरण में विचित्र प्रभाव

चित्र संख्या ४—राहु केतु की स्थिति

होता है इसी प्रकार राहु केतु की स्थिति के कारण भी अनुष्ठ पर प्रभाव पड़ता है। चित्र संख्या ४ से राहु केतु की स्थिति समझ में आवेगी।

पृथ्वी का प्रमण-मार्ग ही सूर्य का प्रमण-मार्ग कहा जाता है। इसे ही क्रान्ति वृत्त कहते हैं। इसी प्रकार चन्द्र पृथ्वी की परिक्रमा करते समय क्रान्ति वृत्त को २ स्थानों में काटता है जो चित्र संख्या ४ में तीर की नोक से बताये गये हैं इन्हीं स्थानों को चन्द्र के पात भी कहते हैं।

देखें चित्र संख्या ४। चन्द्रमा अ बिन्दु में पहुँचकर आ होते हुए अ बिन्दु पर जाता है इसलिए इस बदाव के बिन्दु अ को उत्तर पात या राहु कहते हैं। चन्द्रमा

सीर जगत् और ग्रह : ११

व बिन्दु से बा होते हुए अ बिन्दु पर जाता है इस व बिन्दु को दक्षिण पात या केतु कहते हैं।

चित्र संख्या ५

राशिचक्र और ग्रहों के घूमने की दिशा सूचक चित्र, इसमें पृथ्वी के आस-पास ग्रह घूमते हुए बताये हैं।

चन्द्रमा जिस मार्ग में परिक्रमा करता है उसे चन्द्रकक्षा कहते हैं। चन्द्रकक्षा क्रान्ति वृत्त को लगभग ५ अंश कोण बनाये हुए काटती है। अर्थात् जहाँ चन्द्र का मार्ग पृथ्वी के मार्ग को काटता है वहाँ लगभग ५ अंश का कोण बनता है इसी कोण को चन्द्र का विशेषण कहते हैं। विशेषण = शर = Celestial Latitue

सूर्य स्थिर है

सूर्य बाकाय में पूर्व दिशा में उदय होता है और पश्चिम में अस्त होते दिखता है, परन्तु वास्तव में सूर्य स्थिर है। पृथ्वी इतर ग्रहों के सदृश पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है इस कारण पृथ्वी लोक के रहने वालों को सूर्य प्रमण करता हुआ

१२ : सचित्र ज्योतिष विद्या, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

दिखता है। परन्तु ज्योतिष शास्त्र में गणित की सुविधा के लिए पृथ्वी को स्थिर मान कर सूर्य को चलित माना है। चाहे सूर्य को या पृथ्वी को स्थिर मानें परन्तु उनकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता। सूर्य को चलित मान लेने में गणित में बहुत सरलता प्रतीत होती है। इसी कारण सूर्य को चलित माना है परन्तु वास्तव में सूर्य स्थिर है इसका ध्यान रहे।

पृथ्वी ग्रह के स्थान में सूर्य ग्रह मानकर जो सूर्य का गणित किया जाता है वह पृथ्वी का ही गणित है। पीछे चित्र क्रम संख्या ५ में पृथ्वी को केन्द्र मानकर सूर्य आदि ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए बताये गए हैं।

राशि-चक्र पूर्व से पश्चिम की ओर घूमता है जिससे पहिले भेष फिर वृष इत्यादि क्रमानुसार राशियाँ आकाश में उदय होती दिखाई देती हैं। परन्तु ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओर घूमते हैं जैसा चित्र संख्या ५ में तीर द्वारा समझाया गया है।

इस राशि-चक्र में प्रत्येक राशियों के अंश भी बताये गए हैं जिनमें २ अंश का एक छोटा घर है। सब नक्षत्र और राशियाँ पूर्व (लम्ब = उदय स्थान) से शिरोबिन्दु (आकाश = क्षय स्थान) की ओर जाते दिखते हैं। और शिरोबिन्दु से पूर्व ( लम्ब ) की ओर चलते हैं।

अध्याय ४

राशिचक्र Zodiac

आकाश में सूर्य जिस मार्ग से भ्रमण करते हुए दिखता है उसे क्रान्तिवृत्त Ecliptic कहते हैं। इसे आपामंडल या क्रांतिमंडल भी कहते हैं। देखें चित्र संख्या ६। सब ही ग्रह इसी मार्ग से या इसके समीप होकर सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इसे रवि का मार्ग भी कहते हैं क्योंकि सूर्य एक वर्ष में १२ राशियों में प्रायः इसी मार्ग से एक बार परिक्रमा कर लेता है। क्रान्तिवृत्त वास्तव में पृथ्वी का परिक्रमा करने का मार्ग है और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक वर्ष में प्रायः १२ राशियों में कर लेती है। परन्तु साधारण प्रकार से यही कहा जाता है कि सूर्य क्रांतिवृत्त की १२ राशियों में एक वर्ष में परिक्रमा कर लेता है, इस बात का ध्यान रहे। यह क्रांतिवृत्त अंडाकार है। देखें चित्र संख्या ७

भचक्र या राशिचक्र—यह क्रान्तिवृत्त के उत्तर दक्षिण ९-९° की चौड़ाई का एक कल्पित पट्टा माना जाता है। इसे भचक्र या राशिचक्र कहते हैं, क्योंकि सब ही ग्रह इस कल्पित पट्टे के भीतर क्रांतिवृत्त पर या उसके उत्तर या दक्षिण होकर घूमा

राशिचक्र : १३

चित्र संख्या ६-विषुववृत्त, कांतिवृत्त, राशिचक्र और ध्रुव

चित्र संख्या ७-पृथ्वी की कक्षा ( परिक्रमा का मार्ग ) Orbit of the Earth

करते हैं देखो चित्र संख्या ६ ।

कांति=कांतिवृत्त है जिसके उत्तर और दक्षिण में ९-९° का चौड़ा पट्टा है। इस पूरे चौड़े पट्टे को राशि चक्र कहते हैं ।

विषुववृत्त=यह आकाशीय विषुववृत्त, पृथ्वी के विषुववृत्त के सीध में आकाश में एक कल्पित रेखा है ।

आकाशीय विषुववृत्त=Celestial Equator इस विषुववृत्त पर कांतिवृत्त २२°-२८' का कोण बनाते हुए एक दूसरे को काटते हैं ।

१४ : सचित्र-ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस राशिचक्र का आदि अन्त नहीं हैं किन्तु नापने के लिये जो बिन्दु स्थान नियत किया गया है वह शेष राशि का आदि स्थान है। यह राशिचक्र वृत्त में एक बार पूर्व से पश्चिम को घूमते दिखता है जैसे चित्र ५ में बताया है।

इसे पढ़ते ( राशिचक्र ) के १२ समान विभाग करने से १२ राशियाँ बनी हैं और इसी के २७ समान विभाग किये जायें तो २७ नक्षत्र होते हैं। अधिवनी नक्षत्र से आरम्भ होने वाले और रेवती नक्षत्र के अन्त में पूरे होने वाले २७ नक्षत्र कैहसी चक्र को भी भगण कहते हैं।

जिस प्रकार भारत वर्ष में अनेक ग्राम है परन्तु किसी विशेष ग्राम को जाने में चाहे पक्की सड़क या रेल से जाओ जितने ग्राम उस मार्ग में या उसके आस पास समीप ही मिलते हैं, मार्ग के ग्रामों में केवल उन्हीं ग्रामों की गणना होती है, यद्यपि अन्य ग्राम समुदाय अनेक हैं। इसी प्रकार कोटचनुकोटि तारागणों में से केवल २७ ही नक्षत्रों की गणना की है। राशि चक्र के पढ़ते के भीतर अर्थात् जिस मार्ग से सब ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, केवल उसी मार्ग में जो-जो तारागणों का समुदाय है, उनमें से २७ तारागणों के समुदाय को ही चुन लिया गया है, जिनके समीप से ग्रह प्रमण करते हैं। मान लो कि ये ही मार्ग के २७ ग्राम हैं। इस कारण केवल उन्हीं तारागणों के समुदाय की गणना ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्रों में की गई है, जिससे ग्रहों के स्थान आदि प्रकट करने में सुविधा हो कि अमुक ग्रह अमुक समय पर अमुक स्थान पर है। इन नक्षत्रों के नाम और परिचय आगे दिये हैं।

राशियाँ Sign बुज्

राशिचक्र के १२ समान विभाग करने से १२ राशियाँ बनती हैं। उनके नाम ये हैं। फारसी में इन्हें बुज् कहते हैं।

क्रमराशिअंग्रेजी नामफारसी नामअंग्रेजी चिन्हहिन्दी चिन्ह
मेषAriesएरीजहामल♈ मेष
वृषTaurusटॉरससूर♉ वृष
मिथुनGeminiजेमिनीजोझा♊ मि०
कर्कCancerकेन्सरसर्तान♋ क०
सिंहLeoलियोअसद♌ सि०
कन्याVirgoविरगोसुंवला♍ क०
तुलाLibraलिब्रामौझान♎ तु०
वृश्चिकScorpioस्कार्पियोअक्रब♏ वृ०
धनSagittariusसगीट्टारसकौस♐ ध०
१०मकरCapricornकेप्रीकर्नजदी♑ म०
११कुंभAquariusअक्वारियसदलु♒ कुं०
१२मीनPiscesपिसेसहूत♓ मी०

राशियन्त्रकः १५

राशियन्त्रक विभाग

प्रत्येक चक्र Circle में ३६० अंश होते हैं। इनके १२ विभाग करने से ३६० ÷ १२ = ३० अंश की प्रत्येक राशि होती है।

इसी प्रकार ३६० अंश के २७ विभाग किये = ३६० ÷ २७ = १३°-२०' तो प्रत्येक विभाग १३ अंश २० कला का हुआ अर्थात् राशियन्त्रक को २७ नक्षत्रों में बाँटने से प्रत्येक १३°-२०' का हुआ। अर्थात् एक राशि में २३ नक्षत्र हुए।

प्रत्येक नक्षत्र के ४ विभाग किये तो प्रत्येक विभाग को चरण कहते हैं। इसकारण १ राशि = ३०° = २३ नक्षत्र = ९ चरण। १ चरण = ३°-२०''

१ चक्र = ३६० अंश degree ( डिगरी )} ये कोणत्मक अंशादि है।
१ राशि = ३०° ( कला )
१ अंश = ६०' ( कला ) minute ( मिनट )
१ कला = ६०'' ( विकला ) Second ( सेकेण्ड )

ये चिन्ह अंश कलादि के अंकों की इकाई वाली संख्या के ऊपर दाहिनी ओर कुछ तिरछे लगाये जाते हैं जैसा ऊपर बताया गया है। जहाँ अंश, कला आदि लिखना हो वहाँ केवल ये चिन्ह लगा देते हैं जिसे समझ लेना चाहिये।

कोणत्मक अंश Angular distance

ऊपर जो कोणत्मक अंशादि बताये गये हैं इनके विषय में अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिये, क्योंकि उनका अधिक काम पड़ता है।

कोणत्मक अंश को कुछ उदाहरण देकर समझाते हैं।

कोण Angle

जब दो रेखाएँ किसी एक बिन्दु पर परस्पर मिलती हैं तो बीच में एक कोण बन जाता है। देखें चित्र संख्या ८। यहाँ अ. व. एक लकीर, दूसरी लकीर अ. स. पर अ.

चित्र संख्या ८-कोण Angle

चित्र संख्या ९-समकोण

विन्दु पर मिली है जिससे ब अ स कोण बन गया है। वह कोण चित्र में तीर और विन्दुओं से बताया गया है। इसी कोण का नाप अंश, कला, विकला में होता है।

१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्राथमिक ज्ञान खण्ड

अब चित्र संख्या ९ को देखें। एक वृक्ष भूमि पर बिल्कुल सीधा खड़ा है। इसके कारण वृक्ष और भूमि के बीच में दोनों ओर यहाँ एक-एक समकोण बन गया है। वृक्ष सीधा होने के कारण ९० अंश का समकोण दोनों ओर बनाता है। किसी भी समकोण Right Angle में ९० अंश होते हैं। उसके दूसरी ओर भी ९० अंश का दूसरा समकोण बनाता है। दोनों समकोणों का योग ९० + ९० = १८०° होता है।

वृक्ष की तरह किसी भूमि या रेखा पर जो सीधी खड़ी रेखा होती है उसे लम्ब Perpendicular Line कहते हैं। इस प्रकार किसी आधार (भूमि आदि) पर लम्ब खड़ा करने से दोनों ओर एक-एक समकोण ९०°-९०° होते हैं। पूरे चक्र में ३६०° होते हैं। पूरे चक्र में ४ समकोण होते हैं। अर्द्ध चक्र में २ समकोण और चौथाई चक्र में १ समकोण होता है। जैसा चित्र संख्या १० में बताया गया है। इसी प्रकार एक

चित्र संख्या १० एक चक्र के ४ समकोण

चित्र संख्या ११ उर्द्ध रेखा के दोनों ओर के कोण

राशि चक्र में ३६० अंश होते हैं और इन अंशों को १२ राशियों में विभक्त करने से प्रत्येक राशि ३६० ÷ १२ = ३०° की हुई।

यदि कोई एक वृक्ष एक ओर सीधा झुक जाता है तो उसी मान से झुकाव की ओर के कोण का अंश कम हो जाता है परन्तु दूसरी ओर उसी प्रमाण से कोण बढ़ जाता है, परन्तु दोनों कोणों का योग १८०° ही होता है। क्योंकि दो समकोण का योग १८०° ही होता है। चित्र संख्या ११ देखें। वृक्ष के झुकाव के कारण जहाँ अधिक झुका है उस ओर ४५° का कोण है तो दूसरी ओर (१८०° - ४५°) १३५° का कोण अवश्य होगा। अर्थात् १८०° में से एक ओर का कोण घटाने से दूसरी ओर के कोण का अंश प्रकट हो जाता है।

कोण और कोणालम्बक दूरी का नाप

किसी नाप का कोण बनाने के लिये एक पैमाने की आवश्यकता पड़ती है जैसा चित्र संख्या १२ में बताया है।

राशिचक्र : १७

चित्र संख्या १२—कोण नापने का चक्र

एक अर्द्धवृत्त Semi circle बनाओ ( इसमें २ समकोण और १८०° होते हैं क्योंकि प्रत्येक समकोण में ९०° होते हैं )। अब इस १८०° के अर्द्धवृत्त में एक-एक अंश का चिह्न यहाँ चित्र में बताये अनुसार बनाकर विभाग कर लें तो यह कोण नापने का चक्र या पैमाना बन जायगा। इससे किसी भी नाप का कोण बना सकते हैं।

मान लो २३° का कोण बनाना है तो १५° के आगे ८° और लो। जहाँ चित्र में तीर का निशान बनाया है वहाँ २३° हो जाते हैं। फिर जिस कागज में कोण बनाना है एक सीधी लकीर खींचकर उसमें किसी एक बिन्दु पर ( को. ) स्थान मान कर चिन्ह लगा दो। फिर उस सीधी लकीर पर इस पैमाने को इस प्रकार जमा दो जिससे पैमाने के नीचे की लकीर कागज की लकीर के ठीक ऊपर रहे और उसका ( को. ) चिन्ह पैमाने के ( को. ) बिन्दु के ठीक नीचे रहे। फिर पैमाने में जहाँ २३° पूरे हुए थे ( ण. ) स्थान के ठीक नीचे एक बिन्दु का चिह्न कागज में बनाकर उस ( ण. ) स्थान के बिन्दु से और ( को. ) बिन्दु से मिलती हुई रेखा खींचो तो ( ति. को. ण. ) से जो कोण बनेगा वह २३° का होगा।

इसी प्रकार किसी भी इच्छित अंश का कोण बना सकते हैं और किसी भी कोण को नापकर जान सकते हैं कि वह कितने अंश का है। कोण नापने का पैमाना धातु आदि का बना हुआ वाज़ार में डाईंग का सामान बेचने वाले के यहाँ मिल सकता है।

अंश के विभाग

जिस प्रकार घड़ी में १२ बजे तक के सब अंक अंकित रहते हैं और प्रत्येक खण्ड १ घण्टे का होता है; एक घण्टे के ६० विभाग करने से प्रत्येक विभाग एक मिनट का और १ मिनट के ६० विभाग करने से प्रत्येक विभाग एक सेकेण्ड का माना जाता है, इसी प्रकार राशि-चक्र के भी विभाग हैं। जहाँ राशि अंश आदि का उपयोग हुआ है।