सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
१८ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जिस प्रकार सूर्य के अनुसार घड़ी का समय होता है और कोई पूछता है कि क्या बजा है तो घड़ी देखकर ठीक बतला सकते हैं कि ४ बजकर ४१ मिनट १० सेकेण्ड हुआ है अर्थात् सूर्य आकाश में इतना चढ़ा है। इसी प्रकार ज्योतिष गणना में प्रत्येक ग्रह की स्थिति बताई जाती है। जैसे सूर्य की स्थिति २ राशि ४ अंश ४१ कला १० विकला पर है। उसको लिखने में इस प्रकार लिखेंगे सूर्य स्पष्ट २-४°-४१'।
आकाश में अंशों का अनुमान करना
किसी मैदान में खड़े होकर देखें तो चारों ओर पृथ्वी से आकाश लगा हुआ दिखेगा और चारों ओर आकाश की गोलाई दृष्टि गोचर होगी। जहाँ आकाश पृथ्वी से मिला हुआ दिखाता है उसे क्षितिज Horizon कहते हैं।
जिस स्थान पर खड़े हैं वह उस स्थान का केन्द्र हुआ। उससे ठीक सिर के ऊपर जो आकाश का बिन्दु है उसे ख स्वस्तिक या शिरोबिन्दु Zenith कहते हैं। इसी का नाम 'ख' भी है।
क्षितिज से शिरोबिन्दु तक एक गोलाई ( वृत्त ) का चतुर्थांश हुआ, जिसमें ९०° होते हैं। इस प्रकार यदि क्षितिज से अंश गिनना आरम्भ करें तो शिर पर ९०° होते हैं।
शिरोबिन्दु को सदा दशम स्थान समझें। जैसा चित्र संख्या १३ में बताया है। क्षितिज में पूर्व की ओर लग्न का स्थान होता है। उसके विषय में और भी अधिक बातें भाव के वर्णन क्रम में मिलेंगी।
लग्न ( क्षितिज ) और दशम ( शिरोबिन्दु ) के बीच के स्थान के ३ भाग करें १० ÷ ३ = ३.३३° हुए। यही एक-एक भाग की १-१ राशि हुई। प्रत्येक राशि ३०° की
चित्र संख्या १३—आकाश में अंशों का अनुमान
नक्षत्र : १९
होगी। प्रत्येक विभाग (१ राशि) ३०° का होगा। देखें चित्र संख्या १३। इसका अभ्यास आकाश की ओर देखकर प्रत्येक दिशा में करें।
उत्तर की ओर ध्रुव तारे को देखें। वह जितने अंश ऊँचा है वही ऊँचाई उस स्थान का अक्षांश होगा। इसी प्रकार सब दिशाओं में आकाश के विभाग कर १ राशि=३०° कितना होगा, अनुमान करें तो १° कितना होगा इसका भी अनुमान हो जायगा।
अध्याय ५
नक्षत्र Constallations या Asterisms
पहिले बता चुके हैं कि राशि-चक्र के २७ सम विभाग करने से २७ नक्षत्र होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र १३°—२०' का होता है और १ राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। नक्षत्र का प्रत्येक चरण (चतुर्थ भाग) ३°—२०' का होता है।
नक्षत्रों के नाम ये हैं—
| क्रम | नक्षत्र | अंग्रेजी नाम | फारसी नाम | हिन्दी चिन्ह |
|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | Beta Arietis | बीटा अरायटिस | शरती |
| २ | भरणी | 41 arietis | ४१ अरायटिस | वर्तान |
| ३ | कृतिका | Eta Tauri | ईटा टाउरी | सुरैया |
| ४ | रोहिणी | Aldebaran | अल्डे बरान | द्वारा |
| ५ | मृगशिर | Lambda Orionis | लामडा ओरियोनिस | हकुआ |
| ६ | आर्द्रा | Gamma Geminorum | गामा जेमिनोरम | हनसा |
| ७ | पुनर्वसु | Pollux | पोल्लक्स | क्षिरा |
| ८ | पुष्य | Delta Cancri | डेल्टा कंकरी | नसरा |
| ९ | आश्लेषा | Zeta Hydrac | झीटा हायड्राई | तुर्फा |
| १० | मघा | Regulus | रेगुलस | जवहा |
| ११ | पूर्वाफाल्गुनी | Theta leonis | थीटा लियोनिस | झाहेरा |
| १२ | उत्तराफाल्गुनी | Denebola | डेनेबोला | सफा |
| १३ | हस्त | Delta Corvi | डेल्टा कोरवी | अवा |
| १४ | चित्रा | Spica | स्पीका | समाक |
| १५ | स्वाती | arcturus | आर्कटयूरस | गफरा |
२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
| १६ | विशाखा | Alpha Librae | अल्फा लिब्राई | झवा | वि. |
|---|---|---|---|---|---|
| १७ | अनुराधा | Delta Scorpii | डेल्टा स्कारपी | अकली | अनु. |
| १८ | ज्येष्ठा | Antares | अंटारेस | कलब | ज्ये. |
| १९ | मूल | Lambda Scorpii | लामडा स्कार्पी | सोला | मू. |
| २० | पूर्वाषाढा | Delta Sagittarii | डेल्टा सागिट्टारी | नवा | पूषा. |
| २१ | उत्तराषाढा | Phi Sagittari | फी सागिट्टारी | वरुवा | उषा. |
| २१अ | अभिजित् | Vega | व्हेगा | झावे | अभि. |
| २२ | अवण | Altair | आल्टायर | वला | अ. |
| २३ | धनिष्ठा | Alpha Delphini | अल्फा डेल्फिनी | सोळव | ध. |
| २४ | शतभिषक् | Lambda Aquarii | लामडा अक्वेरी | अखवा | श. |
| २५ | पूर्वाभाद्रपद | Markab | मर्काब | मुकड़ | पूषा. |
| २६ | उत्तराभाद्रपद | Algenib | अल्गेनिब | मुगख | उषा. |
| २७ | रेवती | Zeta Piscium | झीटा पीशियम | रिशा | रे. |
२७ नक्षत्रों में अभिजित् नक्षत्र ( २१ अ ) की गणना नहीं होती। क्योंकि यह नक्षत्र क्रान्ति प्रवेश के बाहर है। इसका उपयोग मुहूर्त विषय में होता है। यह नक्षत्र आकाश में उत्तराषाढा और अवण के बीच में कुछ दृष्ट कर है।
उत्तराषाढा नक्षत्र का चतुर्थ चरण अर्थात् अन्तिम चतुर्थ भाग और अवण नक्षत्र के आदि का एक भाग जो ४ घड़ी का है अर्थात् अवण नक्षत्र के आदि का पन्द्रहवाँ भाग इतना सब मिलकर अभिजित् नक्षत्र का भोग माना जाता है। अर्थात् इतना अभिजित् नक्षत्र होता है।
प्रत्येक राशि में २३ नक्षत्र=९ चरण होते हैं। प्रत्येक राशि में किस नक्षत्र का कौन-कौन चरण आता है नीचे के चक्र से समझ में आ जायेगा।
| क्रम | राशि | नक्षत्र | चरण | क्रम | राशि | नक्षत्र | चरण |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | मेष ( १ ) | अश्विनी | |||||
| ( २ ) | भरणी | ५ | |||||
| ( ३ ) | कृतिका | ०० | ( ११ ) | पू. फा. | |||
| २ | वृष ( ३ ) | कृतिका | ० | ||||
| ( ४ ) | रोहिणी | ६ | |||||
| ( ५ ) | मृगशिर | ०० | ( १३ ) | हस्त | |||
| ३ | मिथुन ( ५ ) | मृगशिर | ०० | ( १४ ) | |||
| ( ६ ) | आर्द्रा | ७ | |||||
| ( ७ ) | पुनर्वसु | ० | ( १५ ) | ||||
| ४ | कर्क ( ७ ) | पुनर्वसु | ००० | ( १६ ) | विशाखा | ||
| ( ८ ) | पुष्य | ८ |
नक्षत्र : २१
( १७ ) अनुराधा | |||| | ( २३ ) धनिष्ठा | ||०० ---|---|---|--- ( १८ ) ज्येष्ठा | |||| | ११ कुम्भ ( २३ ) धनिष्ठा | ००|| ९ धन ( १९ ) मूल | |||| | ( २४ ) शतभि० | |||| ( २० ) पू. वा. | |||| | ( २५ ) पू. भा. | |||० ( २१ ) उ. वा. | ||००० | १२ मीन ( २५ ) पू. भा. | ०००| १० मकर ( २१ ) उ. वा. | ०||| | ( २६ ) उ. भा. | |||| ( २२ ) श्रवण | |||| | ( २७ ) रेवती | ||||
प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण होते हैं। इन चरणों में से जो चरण लिए गए हैं उनके लिए खड़ी लकीर और जो नहीं लिए गए उनके लिए ० बताया गया है। एक खड़ी लकीर को १ चरण समझना चाहिए।
| ऊपर बताये १ चरण का चिन्ह। | } | जैसे अश्विनी के ४ चरण, भरणी के |
|---|---|---|
| २ " " " | ||
| ३ " " " | ||
| ४ " " " |
ये कृतिका के अन्तिम ३ चरण, रोहिणी के ४ चरण और मृगशिर के आदि के २ चरण मिल कर वृष राशि बनती है। मृगशिर के अन्तिम २ चरण मिथुन राशि में चले जाते हैं। इसी प्रकार चक्र देखकर समझ लेना चाहिए। प्रत्येक राशि में इस प्रकार ९ चरण होते हैं। ये ९ चरण मिलकर २७ नक्षत्र पूरे हो जाते हैं।
प्रत्येक चरण के लिए एक अक्षर होता है। जिस चरण में किसी बालक का जन्म होता है उसी चरण के अक्षर पर बालक का नाम रखा जाता है। चरण के अनुसार अक्षर बताने वाले चक्र को होड़ाचक्र कहते हैं। प्रत्येक पंचांग में यह चक्र दिया रहता है। यह विषय आगे समझाया जायेगा।
अध्याय ६
ध्रुव की पहिचान
आकाश में नक्षत्रों को पहिचानने के पहिले ध्रुव को पहिचान लेना आवश्यक है। क्योंकि सब ग्रह आदिक एवं नक्षत्र-समुदाय ध्रुव के आस पास घूमते हुए प्रतीत होते हैं। ध्रुव की पहिचान हो जाने पर नक्षत्रों का उदय अस्त और क्रान्तिवृत्त की गोलाई आदि समझ में आ जायेगी।
२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जिस प्रकार पृथ्वी का उत्तर और दक्षिण ध्रुव है और जिस प्रकार पृथ्वी का भूकाव ध्रुव की ओर जमीन के घरातल से २३°-१७' पर है उसी प्रकार आकाशीय उत्तर ध्रुव भी नीचे के घरातल से ऊपर उठा हुआ दिखता है। घरातल से यह ध्रुव का भूकाव वहाँ के स्थानिक अक्षांश के अनुसार ही होता है। इस विषय का वर्णन आगे होगा।
ध्रुव तारा Pole Star के आस पास सप्तश्वषि Great Bear के ७ तारे हैं। वे ध्रुव की परिक्रमा करते रहते हैं जिससे ध्रुव तारों की पहिचान सरलता से हो सकती है। इस लिए इन सप्तश्वषि तारों को पहिचानना आवश्यक है। सप्तश्वषियों के पास ही लघुश्वष little Bear के तारे भी हैं जिन्हें लघु सप्तश्वषि भी कहते हैं। कभी-कभी सप्तश्वषि तारागण नीचे की ओर रहने से नहीं दिखते उस समय उसके विरुद्ध दिशा में और सीध में एक तारागणों का समुदाय दिखता है, जो अंग्रेजी के 'एम' M के आकार के हैं जिन्हें महषि या कश्यप मंडल Cassiopez
चित्र संख्या १४—सप्तश्वषि लघुश्वष ध्रुव और महाष
नक्षत्रों की पहिचान : २३
कहते हैं। इनसे भी ध्रुव तारे की पहिचान हो सकती है। चित्र संख्या १४ देखने से ये तारागण और ध्रुव पहिचाने जा सकते हैं।
सप्तश्रृणि
यह ७ तारों का झुण्ड है जो सदा उत्तर में ध्रुव की परिक्रमा करते रहते हैं। ये ७ तारे ७ श्रृणि माने गये हैं। इनमें से ४ तारे खाट के पाये सदृश हैं जिनसे कुछ लम्बाई लिए एक चौकोन बनता है। इनके नीचे की ओर से एक तिरछी, छोर में कुछ उठी हुई पूछ सरीखी गई है जिसमें ३ तारे हैं। इस चौखेटे के सबसे आगे के दो पाये एक ऊपर एक नीचे हैं जिनको क्रतु और अत्रि कहते हैं। इन दोनों की सीध में यदि एक लकौर आगे उसी सीध की ओर बढ़ती हुई खींची जाये तो उसी सीध में एक तारा साधारण प्रकाश का दिखेगा। उसी तारे की ओर प्रतिदिन ध्यान दें तो वह कभी चलता नहीं दिखेगा और उसी तारे के आस पास सप्तश्रृणि घूमते दिखेंगे। दो चार बार ध्यान पूर्वक उत्तर की ओर देखने से यह ध्रुव तारा पहिचान में आ जायेगा।
कश्यप मण्डल में बाईं ओर ऊपर जो तारा है उससे एक लम्बी रेखा लम्ब स्वरूप खींची जावे तो वह भी ध्रुव में आकर मिलेगी। चित्र संख्या १४ के देखने से यह समझ में आ जायेगा। सप्तश्रृणि और महर्षि के बीचों बीच यह ध्रुव तारा है। इस ध्रुव के आस पास सप्तश्रृणि आदि पूर्व से पश्चिम को घूमते दिखते हैं।
अध्याय ७
नक्षत्रों की पहिचान
क्रान्ति प्रदेश में २७ तारागणों का समुदाय या नक्षत्र हैं और अश्विजत् नक्षत्र क्रान्ति मण्डल के बाहर है। इन सबको पहिचान लेना चाहिए। इन सब नक्षत्रों को पहिचान लेने से ज्योतिष की कई बातें शीघ्र समझ में आने लगेंगी। इस कारण इन सबकी पहिचान यहाँ देते हैं। आगे इनके नक्शे भी दिए हैं, जिनके सहारे आकाश में नक्षत्रों को पहिचानने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। देखें चित्र संख्या ३९,४०,४१ (आकाश के तीन चित्र परट)। इनके अतिरिक्त पृथक्-पृथक् नक्षत्रों को पहिचानने के लिए अलग चित्र दिये हैं। उनकी पहिचान यहाँ बताई जाती है।
१ अश्विनी—के ३ तारे हैं परन्तु उनकी पहिचान के लिए एक ओर आगे का तारा मिला देने से शीघ्र पहिचाने जा सकते हैं। २ तारे बीच में पास-पास कुछ तिरछे एक से दूसरा कुछ नीचा परन्तु बराबरी से हैं और ऊपर छोर पर १ तारा और नीचे १ तारा है। ये दोनों तारे चमकदार हैं परन्तु उत्तर का तारा अधिक
२४ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा; प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
चमकदार है और तीसरा तारा जो पूर्व में है वह सबसे तेजस्वी है। इसके पश्चिम में भी एक तारा है। देखें चित्र संख्या १५। यह नक्षत्र कुंभार के महीने में ८-९ बजे रात को पूर्व बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर हट कर उदय होने के ६ ३/४ घण्टा के उपरान्त सिर पर आता है और ६ ३/४ घण्टा के उपरान्त पश्चिम बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर अस्त होता है।
यह नक्षत्र जनवरी के आरम्भ में म्यालू के समय सिर पर आता है और शिरो-बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर दिखता है। इसके ३ तारों का आकार घोड़े के मुख सदृश होने से अभिवनी कहते हैं। कुंभार की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है।
२ भरणी—इसके ३ छोटे-छोटे तारे हैं जिनसे छोटा सा त्रिकोण बनता है। अभिवनी और भरणी के बीच में रेखा खींचने पर उस रेखा के उत्तर में यह त्रिकोण पड़ता है। यह अभिवनी के आगे पूर्व की ओर है इसका आकार योनि सरीखा बताया है परन्तु यह त्रिकोणाकार है। देखें चित्र संख्या १६।
३ कृतिका—यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है किसान लोग इसे अच्छी तरह पहिचानते हैं। वे लोग इसे घोड़ी का मांगरा कहते हैं। कालिक के महीने में म्यालू के समय यह पूर्व में दिखता है और इसी को देखकर कार्तिक स्नान करने वाले समय
चित्र संख्या-१५ चित्र संख्या-१६ चित्र संख्या-१७ चित्र संख्या-१८
१ अभिवनी २ भरणी ३ कृतिका ४ रोहिणी
का अनुमान करते हैं। इसके ६ तारे माने जाते हैं और इसका आकार खुरा सदृश कहा है। फरवरी में यह म्यालू के समय सिर पर आता है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। देखें चित्र संख्या १७।
४ रोहिणी—इसमें ५ तारे माने जाते हैं और आकार गाड़ी सदृश बताया गया है। परन्तु देखने में यह एक कोण सा दिखता है। यह कृतिका के कुछ बाजू से नीचे की ओर दिखता है। इसमें नीचे का तारा अधिक प्रकाशवान् है। ये तारे कृतिका से कुछ दक्षिण की ओर हैं। फरवरी में म्यालू के समय ये सिर पर आते हैं और कुछ दक्षिण की ओर रहते हैं। इनका आकार चित्र संख्या १८ देखने से समझ पड़ेगा।
कहते हैं शनि और मंगल जब इस शकट (गाड़ी) का भेदन करते हैं (इस त्रिकोण में से होकर जाते हैं) तब प्रलय होता है। इसलिए ये ग्रह शकट भेदन नहीं करते। केवल चन्द्र ही यहाँ से जाता है। इसी कारण रोहिणी को चन्द्र की स्त्री कहा है।
नक्षत्रों की पहिचान : २५
५ मृगशिर या मृगशिरा—इसे बहुधा सब किसान पहिचानते हैं। इसे वे हिरनी या खटोला कहते हैं। इसके चारों ओर चौकोन बनाते हुए ४ प्रकाशवान् तारे हैं। इनके बीच में ३ तारे एक दूसरे की सीध में हैं। इसे व्याघ्र का तीर कहते हैं। व्याघ्र का तारा बहुत नीचे हटकर अतिप्रकाशवान् है और शीघ्र पहिचाना जा सकता है। मृगशिर के अन्त में ३ तारे पास-पास एक सीध में हैं। इसे हिरन की पूँछ कहते हैं और सामने की ओर ३ तारों का एक छोटा त्रिकोण है उसे हिरन का मुख कहते हैं। अगहन के महीने में ब्यालू के समय यह पूर्व में दिखता है। अगहन की पूर्णिमा के लगभग चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। इन तारों में मृगशिर के ३ ही तारे माने जाते हैं। और आकार हिरन सदृश माना जाता है। ये तारे आकाश गंगा के किनारे हैं और जब सिर पर आते हैं तब दिखते हैं। ये रोहिणी से कुछ दूर हट कर दक्षिण की ओर हैं। मार्च के महीने में ब्यालू के समय ये सिर पर आते हैं। उदय के ६ घण्टा बाद सिर पर आते हैं। देखें चित्र संख्या १९।
चित्र संख्या-१९
५ मृगशिर
चित्र संख्या-२०
६ आर्द्रा
६ आर्द्रा—इसका एक तारा है। यह प्रायः भरणी के सीध में है और मृगशिर तथा पुनर्वसु के बीच में दिखता है। मार्च के महीने में लगभग ब्यालू के समय सिर पर आता है और सिर से कुछ दक्षिण की ओर दिखता है। इसका आकार मणि सदृश माना है। इसका प्रकार साधारण है। यह भी आकाश गंगा के बाहरी किनारे पर है। इसकी पहिचान के लिए और तारों को पहिचान कर इसे खोजें। देखें चित्र सं० २०।
७ पुनर्वसु—इसके ४ तारे हैं। घर सदृश इसका आकार बताया है। २ तारे इसके पहिली श्रेणी के ( अधिक प्रकाशवान् ) और तीसरा तारा भी पहिली श्रेणी का है। इस प्रकार उत्तर की ओर २ तारे हैं और दक्षिण की ओर २ तारे हैं। उत्तर की ओर के २ तारे सबसे पहिले उगते हैं। देखें चित्र संख्या २१। तारे किनरी श्रेणियों के हैं उनकी श्रेणी का क्रम चित्रपट ३९-४०-४१ देखने से प्रगट होगा।
८ पुष्य—इसके ३ तारे लिये जाते हैं और बाण सदृश इसका आकार माना जाता है। देखें चित्र संख्या २२। ये बारीक-बारीक तारे हैं जिनका छोटा त्रिकोण बनता है।
२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
है। जो देखने में एक ही तारा सदृश दिखता है। अप्रेल के महीने में म्यालू के समय यह सिर पर आता है। पूष के महीने में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है।
चित्र संख्या २१ ७ पुनर्वसु
चित्र संख्या २२ ८ पुष्य
चित्र संख्या २३ ९ आश्लेषा
६ आश्लेषा या अश्लेषा—इसके ५ तारे और चक्र सरीखा आकार बताया है। यह पुष्य के दक्षिण में है और उसी की बराबरी से सिर पर आता है। चन्द्र पुष्य से आश्लेषा पर शीघ्र आ जाता है। इसके बारीक तारे हैं जिनमें एक प्रकाशवान् तारा है। देखें चित्र संख्या २३।
१० मघा—इसके ६ तारे माने जाते हैं और आकार भवन सदृश बताया गया है। परन्तु इन ६ तारों पर विचार करने से हंसिया सरीखा आकार दिखाई देता है। ध्यान में आते ही यह शीघ्र पहिचाना जा सकता है। इसके ४ बड़े तारे हैं। इनका आकार एक समानान्तर भुज चौकोन सा बनता है, जिस प्रकार दियासलाई की डिव्वी के ऊपर के ढक्कन को दवा देने से कुछ तिरछा चौकोन बनता है। इसके पश्चिम की ओर दक्षिण कोण का तारा तेजस्वी है और पहली श्रेणी का है। इसके दक्षिण में एक बारीक तारा है जो पाँचवाँ तारा है। पूर्व बाजू से दोनों दक्षिण के तारे अधिक तेजस्वी हैं। मई महीने के आरम्भ में म्यालू के समय यह सिर पर कुछ दक्षिण की ओर हटा हुआ दिखता है। माघ की पूर्णिमा को चन्द्रमा इसके समीप रहता है। कोई इसके ५ तारे मानते हैं। देखें चित्र संख्या २४।
११ पूर्वा फाल्गुनी } मघा के पूर्व में कुछ उत्तर को दोनों फाल्गुनी के ४ १२ उत्तरा फाल्गुनी } गरे हैं जो चौकोन सरीखे दिखते हैं। उसके पूर्व-पश्चिम बाजू का उत्तर-दक्षिण बाजू से अन्तर दुगने से कुछ कम है। पश्चिम की ओर के २ तारे पूर्वा फाल्गुनी हैं। इसके उत्तर की ओर का अधिक तेजस्वी है। पूर्व बाजू के दोनों तारों को उत्तरा फाल्गुनी कहते हैं। इसके नीचे दक्षिण का तारा अधिक तेजस्वी है। उत्तर का बारीक है। फाल्गुन में इस नक्षत्र पर पूर्णिमा को चन्द्र आता है फाल्गुन में ये दो नक्षत्र म्यालू के समय पूर्व में दिखते हैं। कोई जून में म्यालू के समय सिर पर दिखते हैं। और ठीक सिर पर आते हैं। देखें चित्र संख्या २५।
नक्षत्रों की पहिचान : २७
चित्र संख्या २४
१० मघा
चित्र संख्या २५
११ पूर्वा फाल्गुनी
चित्र संख्या २६
१३ हस्त
१२ उत्तरा फाल्गुनी
१३ हस्त—इसके ५ तारे हैं। आकार हाथ सदृश है। यह मघा के दक्षिण ओर है। यीघ्र पहिचाना जा सकता है। हाथ की अंगुलियों की ५ नोक सदृश ये पाँचों तारे दिखते हैं। जून के महीने में ये ब्यालू समय सिर पर दिखते हैं और शिरोविन्दु से ३०-४० अंश दक्षिण की ओर रहते हैं। देखें चित्र संख्या २६।
१४ चित्रा—हस्त के बाजू पूर्व को कुछ उत्तर की ओर यह एक ही तारा है जो बड़ा प्रकाशवान् है। आकार इसका मोती सदृश बताया है। जून के अन्तिम भाग में यह ब्यालू के समय सिर पर आता है। चैत्र की पूर्णिमा को चन्द्र इस पर आता है। यह तारा प्रायः आतिवृत्त पर है। देखें चित्र संख्या २७।
१५ स्वाती—यह अकेला और बहुत बड़ा तारा है। सरलता से पहिचाना जा सकता है। चित्रा से बहुत उत्तर को यह चमकता हुआ दिखता है। यह तारा चित्रा से भी अधिक प्रकाशवान् है। चित्रा के प्रायः ५० मिनट बाद यह शिरोविन्दु पर आता है और उसके १॥ घंटा बाद दूबता है। यह चित्रा से प्रायः ३०° दक्षिण को है। इसका एक ही तारा है और आकार मूंगा सदृश बताया है। यह कुछ लाल रंग का है। देखें चित्र संख्या २८।
१६ विशाखा—इसके २ तारे हैं। चित्रा के सामने ही नीचे की ओर २ तारे चमकते हुए दिखते हैं, परन्तु चित्रा से उनका तेज कम है। फरवरी में ५ बजे प्रातः के लगभग ये सिर पर दिखते हैं। पहिले तारे के उपरान्त दूसरा तारा २६ मिनट के अन्तर से उगता है। उसकी बराबरी से २ और छोटे तारे हैं जिनको मिला कर देखने से एक चौकोन सा बन जाता है। इसके ४ तारे और आकार तोरण सदृश
चित्र संख्या २७
१४ चित्रा
चित्र संख्या २८
१५ स्वाती
चित्र संख्या २९
१६ विशाखा
चित्र संख्या ३०
१७ अश्विनी
२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
मानते हैं। वैशाख में चन्द्रमा पूर्णिमा को इस नक्षत्र पर आता है। मई महीने में ब्यालू समय यह उदय होता है और उदय होने के समय पूर्व और आग्नेय कोण के बीच दिखता है। दोनों बड़े तारों में एक चित्रा के तारे के सामने नीचे की ओर दिखता है और दूसरा उसके बाईं ओर दिखता है। दोनों तारे एक से तेजस्वी हैं, परन्तु चित्रा से तेज कम है। कभी चन्द्र दोनों बड़े तारों के बीच से होकर जाता है। देखें चित्र संख्या २९।
१७ अनुराधा—इसके ४ तारे हैं, जो प्रायः एक सीध में उत्तर दक्षिण को हैं और विशाखा के नीचे पूर्व को हैं। विशाखा के बड़े तारों से एक सीधी रेखा अनुराधा के तारों की सरल रेखा के छोरों से मिलाई जावे तो उत्तर की अपेक्षा दक्षिण का अन्तर अधिक प्रगट होगा। इन तारों का आकार भात की बलि ( पिंड ) सदृश बताया है अर्थात् किसी ने भात की बलि के ४ कोर उठाकर ४ जगह में एक रेखा में एक के नीचे एक रख दिये हों। देखें चित्र संख्या ३०।
१८ ज्येष्ठा—इसके ३ तारे प्रायः एक सीध में पूर्व पश्चिम को हैं। अनुराधा से सीधी रेखा में बीच से पूर्व को एक लम्ब बाँचा जावे तो उसकी सीध में ३ अनुराधा के तारे खड़े एक के नीचे एक हों तो ज्येष्ठा के तारे आड़े एक के बाद एक हों। ज्येष्ठा के बीच का एक तारा पहिली-श्रेणी का है। ज्येष्ठ मास में पूर्णमासी को चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। इसका आकार कुण्डली सरीखा बताया है देखें चित्र संख्या ३१।
१९ मूल—ज्येष्ठा के पूर्व में ११ तारे हैं, जो सिंह की पूँछ सरीखा या बिच्छू के डंक सरीखा आकार गोलाई लिये बनाते हैं। यह शीघ्र पहिचाना जा सकता है। आकाश गंगा में यह कांतिवृत्त के दक्षिण को है। देखें चित्र संख्या ३२। इसका आकार सिंह पुच्छ सरीखा माना है। यह जून के उत्तरार्द्ध में ब्यालू के समय उदय होता है। सितम्बर में ५ बजे संघा को और अप्रैल में प्रातः के समीप सिर पर दिखता है। अनुराधा आदि के तारों को मिला कर देखने से आकाश में एक बड़ा बिच्छू सरीखा आकार सिर से ५०-६० अंश दक्षिण की ओर लटकता हुआ दिखता है।
२० पूर्वाषाढ़ा } इनमें प्रत्येक के २-२ तारे हैं। इनके २-२ तारे मिल कर २१ उत्तराषाढ़ा } एक समकोण सरीखा बन जाता है। २ तारे पूर्वाषाढ़ा के आकाश गंगा के बाहर हैं। उत्तराषाढ़ा की उत्तर-दक्षिण लम्बाई से पूर्व-पश्चिम लम्बाई
नक्षत्रों की पहिचान : २९
का प्रमाण प्रायः कुमुना है । अत्रैल के प्रातः के लगभग यह चौकोन सिर पर आता है । देखें चित्र संख्या ३३ । पूर्वाषाढ़ा का आकार हाथी दांत और उत्तराषाढ़ा का आकार मंच ( मर्चैया ) सरीखा माना है ।
३३ अभिजित्—दोनों आषाढ़ा के बाद अभिजित् का तारा लिया जाता है । परन्तु यह क्रांतिबुत प्रवेश से दूर और बाहर है इस कारण इसे नक्षत्र की गणना करते समय छोड़ देते हैं । यह तारा उत्तर की ओर आकाश गंगा के किनारे है और बड़ा प्रकाशवान् है । इसके पास दो छोटे-छोटे तारे हैं जिनसे एक त्रिकोण सरीखा दिखता है । इस नक्षत्र को मिलाने से २८ नक्षत्र हो जाते हैं परन्तु इसे छोड़कर केवल क्रांति प्रवेश के ही २७ नक्षत्र लिये जाते हैं । यह प्रायः प्रथम श्रेणी का है । देखें चित्र संख्या ३४ ।
२२ श्रवण—इसके ३ तारे हैं जिनमें बीच का तारा पहिली श्रेणी का और बहुत चमकीला है । ये तारे आकाश गंगा में उत्तराषाढ़ा से बहुत उत्तर की कुछ पूर्व कोने में हैं । श्रावण मास की पूर्णमासी को चंद्र इस नक्षत्र के समीप आता है । ये तारे शीघ्र
चित्र संख्या ३३
चित्र संख्या ३५
चित्र संख्या ३६
३३ अभिजित्
२२ श्रवण
२३ धनिष्ठा
पहिलाने जा सकते हैं । एक सीध में ये तीनों तारे हैं और प्रायः उत्तर दक्षिण कुछ तिरछे हैं । इन तीन तारों का आकार वामन औरार के चरण सदृश माना जाता है परन्तु देखने में ये बाण सरीखे दिखते हैं । देखें चित्र संख्या ३५ ।
२३ धनिष्ठा—इसके ५ तारे हैं जो पास-पास हैं । श्रवण के पूर्व कुछ उत्तर बाजू इसका झुमका दिखता है । इसका आकार मूर्दंग सरीखा कहा गया है । नीचे का छोटा तारा छोड़ कर ४ तारों को देखें तो चपटा चौकोन सरीखा दिखता है । यह आकाश गंगा के बाहर है । ये ४ तारे पास-पास और संद ज्योति के हैं । देखें चित्र संख्या ३६ ।
२४ शतभिषक या शतभिषा—इसे शततारक भी कहते हैं । कहा जाता है कि इसमें १०० तारों का झुण्ड है । इसका आकार वृत्त Circle सरीखा बताया गया है परन्तु कोई इसमें से १० तारा को कोई १ ही तारा को ही शतभिषक मानते हैं । यह नवम्बर में व्यालू के समय सिर पर आता है और प्रायः २८ अंश सिर से दक्षिण की ओर दिखता है । इसीके सीध में बहुत नीचे दक्षिण में १ बहुत ही प्रकाशवान् तारा है जिसे याममत्य कहते हैं । दोनों का अन्तर ८ अंश का है । १०० तारे होने से इसका नाम शततार पड़ा है । वहाँ बहुत से तारेगण पास-पास हैं ।
३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
२५ पूर्व भाद्रपद } याममत्स्य और शतभिषक् के प्रकाशवान् तारा को सरल २६ उत्तर भाद्रपद } रेखा से मिलाओ और इस रेखा को उत्तर की ओर बढ़ाते जाओ तो इस रेखा के कुछ पश्चिम की ओर पूर्व भाद्रपद के २ तारे आते हैं। याममत्स्य से जितने अंश पर उत्तर में शतभिषक् है उतने ही अन्तर पर शतभिषक् से उत्तर में पूर्व भाद्रपद का १ तारा है और उसके बाजू ठीक उत्तर में १३° पर पूर्व भाद्रपद का दूसरा तारा है। ये दोनों तारे एक से तेजस्वी हैं। नवम्बर में व्यालू के समय सिर पर आते हैं इस समय शिरोबिन्दु के दक्षिण ५-६ अंश पर रहते हैं और दूसरा उतने पर ही उत्तर को रहता है। इन दोनों तारों के बीच जितना अन्तर है उससे भी अधिक अन्तर पर प्रत्येक के पूर्व में एक-एक तारा है इस प्रकार २ तारे हैं। इन दोनों को उत्तर भाद्रपद कहते हैं। इन दोनों में उत्तर का अधिक तेजस्वी है यह दूसरी श्रेणी का तारा है।
पूर्व भाद्रपद के २ तारे और उत्तर भाद्रपद के २ तारे मिलकर एक चौकोन सरीखा बनता है। देखें चित्र संख्या ३७। भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा इस नक्षत्र के
चित्र संख्या ३७
२५ पूर्वा भाद्रपद, २६ उत्तरा भाद्रपद
चित्र संख्या ३८
२७ रेवती
समीप आता है। पूर्व भाद्रपद का आकार मच्छ सरीखा और उत्तर भाद्रपद का आकार यमल ( जोड़ा ) सरीखा बताया है।
२७ रेवती—इनमें ३२ तारे हैं। आकार मूदङ्ग सरीखा है और वैसा ही दिखता है। ये छोटे-छोटे तारे हैं। उत्तर भाद्रपद के दोनों तारों में से दक्षिण के तारे के आग्नेय कोण के लगभग १०-१० अंश पर तारों की १ कतार है जो पूर्व-पश्चिम गई है। इसमें ६-७ तारे तेजस्वी हैं और प्रायः एक दूसरे के समानांतर पर हैं। इनके दक्षिण में अग्वनी है। देखें चित्र संख्या ३८।
इन नक्षत्रों के अतिरिक्त आकाश गंगा याममत्स्य आदि चित्र में दिये हैं जिनको देखकर आकाश में पहिचानने का प्रयत्न करें।
आकाश गंगा Milk way
यह आकाश में उत्तर से दक्षिण की ओर तिरछी गई है। इससे बहुत से तारों का घना समुदाय होता है, जिसके कारण आकाश का वह भाग श्वेत सरीखा दिखता है जैसे बापल के टुकड़े छाये हों।
नक्षत्रों की पहिचान : ३१
क्रांति प्रदेश का वर्णन आगे मिलेगा ।
अश्विनी से १२ नक्षत्र तक सब तारे विषुवत्बृत्त के उत्तर में हैं और स्वाती अभिजित श्रवण धनिष्ठा पूरवाभाद्रपद उत्तराभाद्रपद रेवती इनके तारे भी विषुवत् बृत्त के उत्तर में हैं । शेष तारे दक्षिण में हैं ।
चन्द्र का भ्रमण मार्ग—चन्द्रमा इस प्रकार नक्षत्रों में से होकर जाता है ।
१—इन १० नक्षत्रों के दक्षिण की ओर से चन्द्रमा जाता है । नक्षत्रों के नाम के आगे उनकी क्रम संख्या दी है ।
( १ ) अश्विनी १, ( २ ) भरणी २, ( ३ ) पुनर्वसु ७, ( ४ ) पू० फा० ११, ( ५ ) उ० फा० १२, ( ६ ) स्वाती १५, ( ७ ) श्रवण २२, ( ८ ) धनिष्ठा २३, ( ९ ) पू० भा० २५, ( १० ) उ० भा० २६ ।
२—इन ५ नक्षत्रों के उत्तर से चन्द्रमा जाता है ।
( १ ) मृग० ५, ( २ ) आर्द्रा ६, ( ३ ) आश्लेषा ९, ( ४ ) हस्त १३, ( ५ ) मूल १९ ।
३—शेष १२ नक्षत्रों के दोनों ओर से, कभी पास से कभी उन को डाकते हुए, चन्द्रमा जाता है ।
( १ ) कृतिका ३, ( २ ) रोहिणी ४, ( ३ ) पुष्य ८, ( ४ ) मघा १०, ( ५ ) चित्रा १४, ( ६ ) विशाखा १६, ( ७ ) अनुराधा १७, ( ८ ) ज्येष्ठा १८, ( ९ ) शतभिषक् २४, ( १० ) पू० वा० २०, ( ११ ) उ० वा० २१, ( १२ ) रेवती २७ ।
आकाश के नकशे को देखने की रीति
नकशे में जो दिखाएँ दी हैं उनके सम्बन्ध में कुछ प्रश्न हो सकता है । कारण यह है कि उत्तर के उपरान्त बाईं ओर पूर्व फिर दक्षिण फिर पश्चिम दिया है । पूर्व के स्थान में पश्चिम होने का कारण नीचे समझाया गया है ।
नकशे को आकाश से मिलान करने के लिये खुले मैदान में बैठें जहाँ से आकाश अच्छी तरह दिखे । मुँह ऊपर की ओर कर आकाश को देखें फिर नकशे को लोटाकर सिर के ऊपर रखें जिससे नकशे की पीठ आकाश की ओर रहे और नकशा पढ़ने में आ सके । नकशे में उत्तर दिया है वह उत्तर ध्रुव की ओर करे और नकशे के पूर्व को पूर्व की ओर रखें तो नकशे की शेष दिखाएँ ठीक स्थिति पर आ जायेंगी । इसके उपरान्त तारा देखने का जो समय बताया है उन्हीं यहीनों की उन्हीं तारीखों को जैसा आगे बताया है उस नकशे के अनुसार ताराओं को खोजें तो अवश्य मिलेगा ।
इसी प्रकार आकाश में देखते-देखते और पहिचानने का प्रयत्न करते रहने से मुख्य-मुख्य नक्षत्रों की अवश्य पहिचान होने लगेगी । जब आकाश खुला रहे और अंधेरी रात हो, तारा गणों का अवलोकन कर नक्षत्र पहिचानने का प्रयत्न करते हैं ।
३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जब नक्षत्रों की पहिचान हो जावे तो ग्रहों की भी खोज करें। किसी पञ्चांग से प्रगट हो सकता है कि अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र या राशि पर है। इनको समझ लेने से ज्योतिष शास्त्र की ओर बातें शीघ्र समझ में आने लगेंगी।
आकाश का नक्शा देखने का समय
तारागण प्रतिदिन पश्चिम को १° पीछे हटते हैं। जो तारा आज संध्या को ७ बजे सिर पर है वह कल ७ बजने को ४ मिनट शेष रहेंगे तब सिर पर आवेगा। अर्थात् ४ मिनट यहिले दिखेगा।
वृत्त में ३६०° होते हैं और २४ घण्टे में एक वृत्त का चक्कर पूरा होता है। अर्थात् एक दिन रात में सूर्य या नक्षत्र का पूरा एक चक्कर हो जाता है। इस प्रकार से १ घण्टे में १५° या ४ मिनट में १° नक्षत्र चलते हैं। इसी हिसाब से प्रति दिन नक्षत्रों की चाल में १° का अन्तर पड़ जाता है। अन्तर=१ दिन में=४ मिनट। १५ दिन=१ घण्टा। १ मास=२ घण्टा। ३ मास=६ घण्टा।
कारण यह है कि सावन मास से नक्षत्र दिन का मान २३ घण्टा ५६ मि० ४.०९०६ से० का है अर्थात् सावन दिन से नक्षत्र दिन लगभग ४ मिनट छोटा है। नक्षत्र उदय होने से अस्त होकर फिर दूसरे दिन उदय होने तक १ नक्षत्र दिन होता है। वह सूर्य के समय से ४ मिनट छोटा है अर्थात् सूर्य का विषुवांश प्रतिदिन ४ मिनट बढ़ता है।
नक्षत्रों की पहिचान : ३३
३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
तारा की श्रेणी
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भीहमी दूसरी तीसरी चौथी अन्तर्धे हट्टयो
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चित्र संख्या ४०—आह्नपद मास का आकाश का चित्र पट
नक्षत्रों की पहिचान : ३५
तारा की श्रेणी
... त्रिहोत्रे इत्येते मीनस्ये-पोषी संघेनी कटकी
चित्र संख्या ४१—मार्गशीर्ष मास का आकाश का चित्र पट
३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
इस हिसाब से आज ७ बजे संध्या को जो नक्षत्र सिर पर दिखेगा वह कल ७ बजे संध्या को १° पश्चिम में हुटा दिखेगा। १५ दिन में वहीँ तारा ( १५ × ४ ) = ६० मिनट ( १ घण्टा ) पहिले अर्थात् ६ बजे संध्या को सिर पर आवेगा। ७ बजे संध्या को उसे देखेगे तो १५° पश्चिम को वह तारा हुटा दिखेगा। जो नक्षत्र आज ७ बजे संध्या को सिर पर है वह तीन महीना बाद ७ बजे संध्या को आकाश में दूबते दिखेगा; अर्थात् ३ महीने में ९०° का अन्तर पड़ जाता है। जो तारा आज १० बजे रात सिर पर दिखेगा, एक महीना बाद वह सिर पर ८ बजे रात दिखेगा अर्थात् १ महीने के बाद वह तारा आज से २ घण्टा पहिले उस स्थिति में आवेगा।
इस नियम को ध्यान में रख कर नक्षत्र पर ( नकशा ) देखने का समय जान सकते हैं कि किस-किस तारीख को किस-किस समय पर चित्रपट में दिए हुए तारागण दिखाई देंगे।
नक्षत्र पट ( नकशा ) देखने का समय।
| चित्रपट संख्या ३९ | चित्रपट संख्या ४० | चित्रपट संख्या ४१ |
|---|---|---|
| तारीख | महीना | समय |
| २० नवम्बर ४ बजे रात | ८ मई ५ बजे रात | २२ अगस्त ४ बजे रात |
| ६ दिसम्बर ३ " | २३ " ४ " | ६ सितम्बर ३ " |
| २१ " २ " | ७ जून ३ " | २१ " २ " |
| ५ जनवरी १ " | २२ " २ " | ६ अक्टूबर १ " |
| २० " १२ " | ७ जुलाई १ " | २१ " १२ " |
| ४ फरवरी ११ " | २२ " १२ " | ५ नवम्बर ११ " |
| २० " १० " | ६ अगस्त ११ " | २० " १० " |
| ७ मार्च ९ " | २१ " १० " | ६ दिसम्बर ९ " |
| १२ " ८ " | ५ सितम्बर ९ " | २१ " ८ " |
| ६ अप्रैल ७ " | २० " ८ " | ५ जनवरी ७ " |
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अध्याय ८
राशियों के स्वरूप
आकाश में इन नक्षत्रों का आकार यदि ध्यान पूर्वक देखें तो कुछ आकृतियाँ बनी हुई प्रतीत होंगी। इन्हीं आकृतियों के अनुमान से राशियों का नाम पड़ा है। जैसे :-
१—मेघ=भेड़ा
२—वृष=वैल
राशियों के स्वरूप : ३७
३—मिथुन=स्त्री पुरुष का जोड़ा ।
४—कर्क=केकड़ा ।
५—सिंह=सिंह ।
६—कन्या=नाव में बैठी कुमारी ।
७—तुला=तराजू ।
८—वृश्चिक=विच्छू ।
९—धन=धनुषधारी पुरुष जिसका धड़ घोड़े सरीखा है ।
१०—मकर=सिर हिरन सरीखा और धड़ घोड़े सरीखा ।
११—कुम्भ=हाथों में चड़ा लिए हुए पुरुष ।
१२—मीन= मछलियाँ जिनमें १ का मुँह दूसरी की पूछ की ओर है ।
इनके आगुमानिक चित्र संख्या ४२ से ५३ तक में दिए हैं ।
राशियों के कल्पित चित्र
चित्र संख्या ४२ मेष
चित्र संख्या ४३ वृष
चित्र संख्या ४४ मिथुन
चित्र संख्या ४५ कर्क
चित्र संख्या ४६ सिंह
चित्र संख्या ४७ कन्या