सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
सम्पात : ५७
यह २१ जून के लगभग होता है जब सूर्य सायन मेघ से चल कर उत्तर गोलयात्रा में वह इस क्रांतिसीमा पर २१ जून के लगभग पहुँच जाता है, उस समय सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर समकोण बनाती हैं। इस समय सूर्य सबसे दूर रहता है और सूर्य के उदय अस्त का घेरा बहुत बड़ा होता है अर्थात् उस दिन, दिन मान सबसे बड़ा होता है। इसी को सायन कर्क संक्रमण कहते हैं। इसके उपरांत सूर्य लौट कर २१ जून के लगभग उत्तर गोलार्द्ध की यात्रा समाप्त कर सायन तुला पर आता है। इस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य दक्षिण की ओर मुड़ता है और सूर्य दक्षिणायन हो जाता है इस कारण ग्रीष्म क्रांति को दक्षिणायन बिन्दु भी कहते हैं।
४. शरदक्रांति—उत्तरायण बिन्दु winlet solstice—यह २१ दिसम्बर को होता है, जब सूर्य विषुवरेखा से बहुत दूरी पर बहुत दक्षिण की ओर रहता है। यह क्रांति वृत्त की दक्षिण सीमा है। लगभग २२ दिसम्बर को जब सूर्य की किरणें मकर रेखा पर समकोण बनाती हैं उस समय सायन मकर संक्रांति होती है। इस समय सूर्य की दक्षिण क्रांति २३°-२८' होती है। उसी दिन सूर्य पूर्व बिन्दु के दक्षिण में प्रायः २५° पर उगता है। उस दिन से सूर्य उत्तर की ओर आने लगता है। उस दिन, रात्रि (रात्रि मान) सबसे बड़ी होती है। इस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य उत्तर की ओर आने लगता है तब उत्तरायण का आरम्भ होता है। इसी कारण इसे उत्तरायण बिन्दु कहते हैं।
अयनबिन्दु आकाश में सदा एक ही जगह नहीं रहते, ये पश्चिम की ओर खिसकते रहते हैं। जिस नक्षत्र के पास आजकल उत्तरायण या दक्षिणायन होता है पुराने समय में उस स्थान में नहीं होता था। आजकल उत्तरायण का आरम्भ मूल के आधे भाग पर और दक्षिणायन का आरम्भ आर्द्रा के आरम्भ में होता है। सूर्य की उत्तर-दक्षिण गति का स्पष्टीकरण
सूर्य जब २१ मार्च को उत्तर सम्पात पर आता है तो दिन रात बराबर होते हैं अर्थात् ६ बजे प्रातः काल ठीक पूर्व में उदय होता है और ठीक पश्चिम दिशा में अस्त होता है। इसके उपरान्त अवलोकन करने तो प्रकट होगा कि सूर्य ठीक पूर्व बिन्दु पर उदय नहीं हो रहा है। वह कुछ उत्तर की ओर बढ़ रहा है। सूर्य इस प्रकार ३ मास तक उत्तर की ओर बढ़ता ही जाता है और २१ जून को विषुव रेखा से सबसे अधिक दूरी पर चला जाता है। उस समय सबसे बड़ा दिन होगा। क्योंकि सूर्य इस समय सबसे दूर हो जाता है और पूर्व में बहुत दूर हट कर उत्तर की उदय होगा। पूर्व और उत्तर के बीच का जो अन्तर है उस अन्तर का लगभग ३ भाग सूर्य उत्तर को चला जाता है। यही क्रांतिसीमा है। उस समय सूर्य पश्चिम में क्रांतिसीमा पर ही दृढ़ता दिखाएगा।
इसके उपरान्त सूर्य विषुवरेखा की ओर आने लगता है और २१ सितम्बर को फिर विषुववृत्त पर आ जाता है और उसी प्रकार उदय अस्त होगा जैसे २१ मार्च को होता है। उस समय दिन रात बराबर होती है। क्रांति सीमा से विषुववृत्त में
१८ : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
सूर्य को आने में ३ मास लगते हैं। इस प्रकार ६ महीने में, जिसमें गर्मी की भी बहुत सम्मिलित है, सूर्य अपनी पूरी यात्रा कर ठीक उसी जगह आ जाता है। सूर्य इस समय तक उत्तरी गोलार्द्ध में रहा और इसके उपरान्त दक्षिण गोलार्द्ध में आ जाता है।
सूर्य जब दक्षिण को जाने लगता है तो दिन छोटा होने लगता है। २१ दिसम्बर को जब सबसे छोटा दिन होता है, सूर्य दक्षिण क्रांतिसीमा पर ३ मास की यात्रा कर पहुँच जाता है। दक्षिण में क्रांतिसीमा में उदय अस्त होते दिखता है। उपरान्त ३ मास की और विषुववृत्त की ओर यात्रा कर २१ मार्च को विषुववृत्त पर फिर आ जाता है।
इस कारण जब सूर्य के उदय अस्त में अन्तर पड़ता है तो मध्याह्न ( दोपहर ) की ऊँचाई में भी अन्तर पड़ता है जिसके कारण दिन छोटे-बड़े होते हैं। जून के बीच सबसे अधिक ऊँचाई होती है इससे सबसे बड़ा दिन होता है। सूर्य के उदय काल पर दिन की लम्बाई छुटाई अवलम्बित है। सूर्य ज्यों-ज्यों विषुव रेखा से उत्तर को जाता है दिन की लम्बाई बढ़ती जाती है।
पहिले सम्पात, अयन बिल्कु, और सूर्य की उत्तर दक्षिण गति समझा चुके हैं इन्हीं के कारण भिन्न-भिन्न ऋतुएँ होती हैं।
सायन राशियाँ संक्रांति की तारीख एवं ऋतुएँ
नीच | राशि | संक्रांति की | ऋतु | ---|---|---|---|--- राशियाँ | | तारीख | | उच्च | १ मेष | २१ मार्च | वसंत और ग्रीष्म की राशियाँ वर्षा और शरद की राशियाँ | ये ६ राशियाँ " | २ वृष | १९ अप्रैल | नाड़ी " | ३ मिथुन | २० मई | मंडल के नीच | ४ कर्क | २१ जून | उत्तर " | ५ सिंह | २२ जुलाई | में " | ६ कन्या | २२ अगस्त | है नीच | राशि | संक्रांति की | ऋतु | राशियाँ | | तारीख | | उच्च | ७ तुला | २३ सितम्बर | शरद और हेमन्त की राशियाँ शिषिर और वसंत की राशियाँ | ये ६ राशियाँ " | ८ वृश्चिक | २३ अक्टूबर | नाड़ी " | ९ धन | २२ नवम्बर | मंडल के नीच | १० मकर | २१ दिसम्बर | दक्षिण | ११ कुंभ | २० जनवरी | में | १२ मीन | १९ फरवरी | है
जब सूर्य उपरोक्त ३ राशियों में से किसी में होता है तो उसकी क्रांति बढ़ती है और दूसरी ३ राशियों में होता है तो क्रांति घटती है। इस कारण पहिली उच्च राशियाँ और दूसरी नीच राशियाँ हैं।
अध्याय १३
सायन और निरयन
राशि ग्रह आदि २ प्रकार के हैं ( १ ) सायन movable ( २ ) निरयन fixed zodic
सायन—अयन सहित with Procession
निरयन—अयन रहित without Procession
अयनांश—अयन के अंश । हिन्दूमत से माना हुआ प्रथम बिन्दु और शरद सम्पात के बीच जो अन्तर है वह निश्चित बिन्दु से नापा जाता है, उसे अयनांश कहते हैं ।
अयन Procession of equinoxes
अयन क्या है ? यह जानने के लिए सम्पात बिन्दु का जानना आवश्यक है, जिसके विषय में पहिले अच्छी प्रकार समझा चुके हैं । माईवृत्त और कान्तिवृत्त एक दूसरे को जगह-जगह काटते हैं, वे ही सम्पात बिन्दु equinox ctial points हैं । इनमें १ शरद सम्पात दूसरा वसंत सम्पात है । इन्हीं दोनों बिन्दुओं को अयन भी कहते हैं । इन्हीं बिन्दुओं पर सूर्य आने से दिन रात बराबर होता है ।
इन सम्पात बिन्दुओं की वक्र गति होती है अर्थात् उल्टे चलते हैं । ( जिस प्रकार राहु केतु उल्टे चलते हैं ) । शरद सम्पात का बिन्दु अपनी पूर्व स्थिति से पीछे हटता जा रहा है इसी कारण इसे वक्र गति कहते हैं । पहिले बता चुके हैं कि अयन बिन्दु पश्चिम की ओर खिसक रहे हैं ।
इस सम्पात बिन्दु की पूर्व स्थिति, ज्योतिष शास्त्र में रेवती नक्षत्र से मानी है, परन्तु ज्योतिष चक्र ( भचक्र ) में सम्पात बिन्दु मेष के प्रथम अंश से माना गया है ।
इस सम्पात बिन्दु की वार्षिक गति होती है और यही गति अयन चलन कहलाता है । इसे विषुवत्कान्ति—बल्य पात चलन भी कहते हैं ।
जहाँ इस सायन का उपयोग होता है उसे सायन (चलित ग्रह) movable zodic कहते हैं । निरयन में स्थिर मेष के पहिले अंश से यह सम्पात बिन्दु आरम्भ होना मानते हैं और इसमें अयन का उपयोग नहीं होता इस कारण निरयन को स्थिर fixed zodic कहते हैं ।
इसी सम्पात की गति को अयनांश Procession कहते हैं । इस सम्पात का पूर्ण चक्र २५-६-८ वर्ष में अर्थात् लगभग २६०० वर्ष में पूरा होता है । इस कारण इस प्रमाण से इसकी गति १ अंश चलने को ७२ वर्ष लगते हैं । अर्थात् १ वर्ष में प्राय ५० विकला के हिसाब से अयन की गति होती है ।
अयनांश सहित ग्रह—चलित ग्रह—सायन ग्रह—सायन यत
६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
अयनांश रहित ग्रह—स्थिर ग्रह—निरयन ग्रह—निरयन मत
सायन मत को पाश्चात्य लोग भविष्य कथन में उपयोग करते हैं और उनके पंचांग में सायन ग्रह दिये रहते हैं, परन्तु हिन्दू लोग प्रायः निरयन मत से ही भविष्य कथन करते हैं। कहीं कहीं महाराष्ट्र में भी सायन मत का उपयोग करते हैं।
जो कोई ग्रह में अयनांश मिलाकर ग्रह को सायन बनाकर सायन ग्रह का उपयोग करते हैं वे सायन मत के हैं और जो सायन में से अयनांश निकाल कर ( घटा कर ) उसे निरयन बनाकर या निरयन ग्रह हो तो बिना अयनांश मिलाए ही ग्रह का बहुधा उपयोग करते हैं वे निरयन मत के हैं।
सायन मतवालों का कहना है कि ग्रह को सायन बनाकर सायन ग्रह की स्थिति पर से जो फल कहा जायगा वह सच्चा निकलेगा। निरयन मतवालों का कहना है कि बिना अयनांश मिलाए ही ग्रह की स्थिति पर से जो फल कहा जायगा वह सच्चा उतरेगा। यही सायन और निरयन वाद है अर्थात् दोनों मतवालों में इस प्रकार मतभेद है।
अयनांश का उपयोग निरयन मत में भी कई जगह होता है। जैसे भाव स्पष्ट करने के लिए निरयन सूर्य में अयनांश मिलाकर उसे सायन सूर्य बनाकर उस पर से लग्न साधन करते हैं और फिर सायन लग्न निकलने पर अयनांश घटाकर निरयन ग्रहण करते हैं। अयनांश का उपयोग आगे जन्म कुंडली आदि बनाने के गणित में काम पड़ेगा इस लिए इसको जानना आवश्यक है।
किसी वर्ष के अयनांश निकालने की ग्रह छाषण मत के अनुसार सरल रीति :— शाके ४४४ में रेवती का तारा सम्पात बिन्दु पर था। उस समय पर से किसी वर्ष का अयनांश निकालने के लिए इष्ट, शाका में ४४४ घटाना, इसके घटाने से जो शेष बचे वही अयनांश की कला होती है। उनमें ६० का भाग देकर उनके अंश बनालें तो वही अयनांश वर्ष आरम्भ का होगा।
अयनांश— ( इष्ट शाका—४४४ ) : ६० = अयनांश
जैसे शाका १७६९ का अयनांश निकालना है तो शाका में ४४४ घटा कर शेष में ६० का भाग दिया तो उत्तर अंश कला में अयनांश आता है।
| इष्ट शाका | १७६९ | ६०) | १३२५ | (२२° | उत्तर | २२-६ अंश कला यह वर्ष |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ४४४ | १२० | आरम्भ का अयनांश हुआ। | ||||
| शेष | १३२५ | १२५ | ||||
| १२० | ||||||
| ५ |
अध्याय १४
कुछ प्रारम्भिक ज्ञान होने के उपरान्त यही इच्छा होती है कि हमें पंचाङ्ग देखना आ जावे। पंचाङ्ग के मुख्य ५ अंग ( १ ) तिथि, ( २ ) वार, ( ३ ) नक्षत्र, ( ४ )
अध्याय १४ : ६१
योग, और ( ५ ) करण, होने से उसे पंचाङ्ग कहते हैं । ये सब क्या हैं यह बतलाने के उपरान्त पंचाङ्ग देखना बतायेंगे । पंचाङ्ग के उपरोक्त ५ अंगों के अतिरिक्त सम्बत्सर, मास, अयन, ऋतु, ग्रह स्थिति, दिनमान, सूर्यादय आदि कई और आवश्यक विषय भी पंचाङ्ग में दिये रहते हैं । इन सबको पहिले समझ लेना चाहिए । वर्ष प्रमाण आदि जानने के पूर्व काल प्रमाण प्रत्येक को जानना आवश्यक है ।
काल प्रमाण Division of Time
त्रुटि—कमल के कोमल से कोमल १ पत्र में अति नुकीली सुई चुभाने में जो समय लगता है उसे त्रुटि कहते हैं ।
निमेष—पलक झपकाने में जो समय लगता है उसे निमेष कहते हैं ।
गुरु अक्षर—एक गुरु अक्षर के उच्चारण में जो समय लगे वह गुरु अक्षर है ।
प्राण—एक गुरु अक्षर के उच्चारण में जो समय लगे उसके १० गुने समय को प्राण कहते हैं ।
भगण काल—कोई ग्रह १ भगण (३६०°) चक्कर पूरा करने में जो समय लगावे ।
सावन दिन—एक दिन सूर्यादय होने के उपरान्त दूसरे दिन के सूर्यादय होने तक का जो समय है वह सावन दिन कहलाता है ।
१०० त्रुटि=१ लय=१ तत्पर
३० मुहूर्त=१ दिन रात
३० लय=१ निमेष
७ दिन=१ सप्ताह
१० गुरु अक्षर=१ प्राण=१ असु
३० दिन=१ मास
४५ निमेष=१ प्राण
१२ मास=१ वर्ष
६ प्राण=१ पल=विनाड़ी=विघटिका
३० नक्षत्र जहोरात्रि=१ सावन मास
३० सावन दिन=१ सावन मास
या=विघटी
३० चान्द्र तिथि=१ चान्द्र मास
१० विपल=१ प्राण या असु
१ संक्रांति से दूसरी संक्रांत तक } =१ सौर मास
६० विनाड़ी=१ नाड़ी=घटी
१२ मास (१ वर्ष)=१ दिव्य दिन
(पल)=घड़ी-दंड
३६० वर्ष=१ दिव्य वर्ष
६० नाड़ी=१ नक्षत्र दिन
(घटी)=जहोरात्रि=१ दिन रात
७३ घटी=१ ग्रहर
६० तत्परति विकला=१ प्रति विकला
६० प्रतिविकला=१ विकला
६० विकला=१ कला
८ ग्रहर=२४ घण्टा (होरा)
६० कला=१ अंश
=१ दिन रात
३० अंश=१ राशि
२ घटी=१ मुहूर्त
१२ राशि=१ सूचक=भगण=ज्योतिष
चक्र
• ६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
-
६० तत्परस=१ परस
-
६० परस=१ विलिप्ता
-
६० विलिप्ता=१ लिप्ता
-
६० लिप्ता=१ विघटिका=पल
-
६० विघटिका=१ घटिका=दंड
-
६० घटिका=१ दिन रात्रि
-
६० अनुपल=१ विपल=३ सेकेण्ड
-
६० विपल=१ पल=२४ सेकेण्ड
-
६० पल=१ घड़ी=२४ मिनट
-
६० घड़ी=१ दिन रात्रि=२४ घण्टा
-
२३ विपल=१ सेकेण्ड
-
२३ पल=१ मिनट
-
२३ घड़ी=१ घण्टा
-
११३ निमेष=१ सेकेण्ड
-
१ असु (प्राण)=४ सेकेण्ड
स्मरण रहे कि अंग्रेजी समय घण्टा मिनट में रहता है। वह अर्द्ध रात्रि के १२ बजे के उपरान्त से आरम्भ होता है और हिन्दू समय घड़ी पल में सूर्योदय के उपरान्त से आरम्भ होता है।
सूर्योदय का समय प्रत्येक पंचाङ्ग में घण्टा मिनट में दिया रहता है। इष्ट समय यदि घण्टा मिनट में हो तो सूर्योदय का समय घटा देने से सूर्योदय के बाद के घण्टा मिनट निकल आवेंगे। जैसे ८ बजे दिन किसी बालक का जन्म है। पंचाङ्ग में देखा उस दिन ६ बजे प्रातः सूर्योदय है। ८ घण्टा में से ६ बजे सूर्योदय को घटाये तो शेष २ घण्टा बचे। अब दो घण्टा के घड़ी पल बना लो। २ X २१॥=४ घड़ी हुई। वस यही सूर्योदय के उपरान्त का अपना समय घड़ी पल में हुआ। इसी प्रकार जहाँ घड़ी पल में समय दिया हो आवश्यक होने पर उसके घण्टा मिनट बना लो।
नाप का प्रमाण Measurement
- ६० तत्प्रति अंगुल=१ प्रति अंगुल=व्यंगुल
- ६० व्यंगुल=१ अंगुल
| नवीन नाप | प्राचीन नाप | अंग्रेजी मील और योजन का मिलान |
|---|---|---|
| २३ इंच=१ गिरह | ८ जब की चौड़ाई=१ अंगुल | यदि १३ फुट का १ हाथ |
| ४ गिरह=१ बीता | २४ अंगुल=१ हाथ | माना जावे तो |
| ४ बीता=१ गज | ४ हाथ=१ दण्ड | १ दण्ड २ गज |
| १२ इंच=१ फुट | २००० दण्ड=१ कोस | १ कोस=४००० गज |
| ३ फुट=१ गंज | ४ कोस=१ योजन | अर्द्ध कोस (मील)=२००० गज |
| १७६० गज=१ मील | १० हाथ=१ बाँस | अंग्रेजी मील=१७६० गज |
| २ मील=१ कोस | दोनों का अन्तर=२४० गज | |
| १ नाट Knot=अक्षांश की १ कला | अंग्रेजी मील २४० गज छोटा है। | |
| इस प्रकार | ||
| ४ कोस=१ योजन में=१६२० |
अध्याय १४ : ६३
१ नाट=१०१५ साधारण
मील=२०२८ गज
गज या मील-गज
१-१६० का
अन्तर पड़ेगा
∴ १ योजन=१३१/३ मील
या=मील-गज
१-१६०
[ १ ] युग प्रमाण
काल प्रमाण जानने के उपरान्त युग प्रमाण भी जानना चाहिए, क्योंकि पंचाङ्ग में दिया रहता है कि कलियुग के इतने वर्ष बीत गये हैं इत्यादि ।
कलियुग ४३२००० वर्ष का होता है । कलियुग का दूना द्वापर, तिगुना त्रेता, चोगुना सतयुग होता है । इन ४ युग का १ महायुग होता है । ७१ महायुग का १ मन्वंतर और १००० महायुग का १ कल्प या ब्रह्मा का एक दिन होता है । ३६० कल्प का ब्रह्मा का १ वर्ष होता है । प्रत्येक मन्वंतर के आदि और अन्त में सतयुग प्रमाण की १ संधि होती है । संधि को प्रलय काल भी कहते हैं । १५ संधि समेत एक मन्वंतर का १ कल्प होता है । ब्रह्मा की आयु ३६० कल्प X १०० वर्ष की होती है ।
| सतयुग=१७२८००० वर्ष | मनु १४ हैं उनके नाम | वर्तमान कल्प के |
|---|---|---|
| त्रेता=१२९६००० ,, | १ स्वायम्भुव | आरम्भ से ७ संधियों |
| द्वापर=८६४००० ,, | २ स्वारोचिष | समेत ६ मनु व्यतीत |
| कलियुग=४३२००० ,, | ३ उत्तमज (औत्तमि) | हो चुके हैं उनके नाम- |
| १ महायुग=४३२०००० वर्ष | ४ तामस | (१) स्वायम्भुव मनु |
| ७१ महायुग=१मन्वंतर= | ५ रैवत | (२) स्वरोचिष ,, |
| ३०६७२०००० वर्ष | ६ चाक्षुष | (३) उत्तमज ,, |
| १००० महायुग=१ कल्प | ७ वैवस्वत | (औत्तमि) ,, |
| ४३२००००००० वर्ष | ८ सावणि | (४) तामस ,, |
| =ब्रह्मा का १ दिन | ९ दश सावणि | (५) रैवत ,, |
| ३६० कल्प=१ वर्ष ब्रह्मा का | १० ब्रह्मा ,, | (६) चाक्षुष ,, |
| आयु १०० वर्ष | ११ धर्म ,, | इस समय सातवाँ |
| प्रत्येक मन्वंतर के आदि और | १२ रुद्र ,, | वैवस्वत मनु वर्तमान |
| अन्त से १ संधि सतयुग | १३ देव ,, | हैं । इसके आरम्भ से |
| प्रमाण=१७२८००० | १४ इन्द्र ,, | आज तक २७ महायुग |
बीत चुके हैं २८ वें महायुग में ३ युग बीत कर चौथा युग कलियुग वर्तमान है ।
६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
प्रत्येक मन्वंतर के आदि अन्त में प्रलय काल की सन्धि होती है । इस प्रकार ६
मन्वंतर में आदि सन्धि मिलकर ७ सन्धि गत हो चुकी और सातवें मन्वंतर के २७
महायुग बीत चुके हैं। अब देखना है कि कलियुग के आरम्भ तक कितने वर्ष व्यतीत
हो चुके हैं ।
१ महायुग=४३२००० 0 वर्ष
१९२७
१ सन्धि-१२२८००० १ सतयुग १७२८०००
२७ र त्रेता १२९६०००
& २७ महायुग-1१६६४००००,, ७ संधि=१२०९६००० ३ द्वापर ८६४०००
१ सतयुग=४३२००० % ४=१७२७८००० वर्ष
२ त्रेता= » %३=१२९६००० ,,
३ इपर= २ > रेप ८६४००० २
४ कलियुगः » %१- ४३२००० ,,
एकं महायुग=४३२०००० „,
% ७१
७१ महायुग=१ मन्वंतर=३०६७२०००० ,,
२६):
६ मन्वेतर "११११ २१८४०३२००० ०,
इनकी ७ संधियाँ ‡ १२०९६०००,,
७ संधियों समेत ) त आ योग=१८५२४१६०००
गत २७ महायुग 1. ११६६४०००० ,,
योग=१९६९०५६००० ,:
0गत ३ युग सतयुग ;
चेता,दापर के वर्ष || WU F000 कट
योग=१९७२९४४००० ,,
कलि आरम्भ होने के समय । से सन् ईस्वी आरम्भ तक] 1२१०२
योग=१९७२९४७१०२ ,,
0 ३युग=३८८८०००
यहाँ ६ मन्वंतर. के वर्ष निकाल
कर उनकी संधियाँ जोड़ी तो
गत ६ मन्वंतर तक के वर्ष
हुए । वर्तमान सातवें मन्वंतर
में २७ महायुग बीत चुके है।
इससे इनके वर्ष और जोड़ा ।
२८ थें महायुग में ३ युग केवल
बीते हुँ, इस कारण ३ युग
के वर्षे और जोड़े तो कलियुग
आरम्भ होने तक के सृष्टि
आरम्भ के वर्ष निकल आये ।
सन् ईस्वी के आरम्भ तक
कलियुग के गत वर्ष .३१०२
और जोड़ा तो सन् ईस्वी
आरम्भ समय तक. के वर्ष सृष्टि आरम्भ के प्राप्त हुए ।
सृष्टि आरम्भ होने से वर्तमान कलियुग आरम्भ होने तक १९७२९४४००० वर्ष याः
ईसा के जन्म समय तक ( सन् ईस्वी आरम्भ होने तंक ) = १९७२९४१०२ वर्षं हो
चुके हैं ।
इसके आगे वर्तमान सन ईस्वी जोड़ दो तो वर्तमान सन ईस्वी तक सृष्टि आरंभ
होने का वर्ष निकल आयेगा ।
या द्वापर तक के वर्ष १९७२९४४००० में ३०४५ ओर जोड़ दो तो सम्वत
आरम्भ होने तक का सृष्टि आरम्भ का समय निकल आयगा.।
£)
व्यव्याय १४ : ६५
सन् ईस्वी के ३१०२ वर्ष पहिले कलियुग आरम्भ हुआ था। सन् ईस्वी आरम्भ होने के ५७ वर्ष पहिले विक्रम सम्बत प्रचलित हुआ था। इस प्रकार (३१०२-५७)= ३०४५ वर्ष हुए। ये वर्ष, सम्बत के आरम्भ होने के समय तक के कलि के गत वर्ष हुए।
हापर तक के वर्ष } इतने वर्ष सृष्टि आरंभ से सम्बत आरंभ सम्बत आरंभ तक कलि वर्ष+ ३०४५ } तक के हुए।
योग १९७२९४७०४५
इसमें इष्ट सम्बत और जोड़ दो तो इष्ट सम्बत तक के वर्ष प्राप्त होंगे।
कलियुग-सन् ईस्वी के ३१०२ B. C. ( बी. सी. ) ( इतने वर्ष पहिले ) आरंभ हुआ था। सम्बत २००० में ५०४४ वर्ष कलि के बीत चुके और ४२६९५९ वर्ष व्यतीत होने को शेष रहे। ता० १८ फरवरी ३१०२ बी.सी. (ईशा के जन्म के पहिले) अर्धरात्रि से कलियुग आरम्भ हुआ था। भाद्रपद मास, कृष्णपक्ष १३ रविवार आश्लेषा नक्षत्र व्यतीपात योग में अर्धरात्रि के समय कलियुग की उत्पत्ति हुई थी।
इस प्रकार यह कलियुग का प्रथम चरण है, ब्रह्मा का दूसरा पहर है, श्वेत वाराह कल्प है और वैवस्वत मन्वन्तर है। जब कलियुग आरम्भ हुआ था सूर्य चन्द्र आदि सब ग्रह एक ही राशि पर थे।
विक्रमादित्य ने ५७ बी. सी. में पहिले विदेशियों को भारत से भगाया था, उस समय से विक्रम सम्बत चला है। ईसा के जन्म के ७८ वर्ष के उपरान्त शालिवाहन राजा ने शाका चलाया है।
[ २ ] वर्ष प्रमाण—
| वर्ष ---|--- शाके + ७८ वर्ष=सन् ईस्वी | सन् ईस्वी—५८३=सन् हिजरी सम्बत—५७ ,, ,, ,, | सन् हिजरी—१००=सन् फसली सन् ईस्वी+५७,,=सम्बत | सन् फसली—१ =बंगला सन् ,, -७८ =शाका | सम्बत—१३५ =शाका |
विक्रम सम्बत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। सन् ईस्वी में सम्बत बनाने में यह ध्यान रहे कि सम्बत मार्च के महिना में बदल जाता है और पूस मास में सन् बदलता है। इस प्रकार एक सम्बत् में २ सन् या १ सन् में २ सम्बत् आ जाते हैं। इस कारण मास का विचार कर सन् या संवत् का निर्णय करना चाहिए। अर्थात् संवत् में ५७ घटाने से जो सन् आता है वह वर्ष आरम्भ का सन् होता है। आगे पूस में सन् बदल कर दूसरा सन् लग जाता है। जैसे सम्बत् २००२-५७=१९४५ सन् ईस्वी, यह सन् सम्बत् के आरम्भ में होगा और सम्बत् २००२ के पूस मास में सन् बदल कर १९४६ सन् हो जायगा।
५
१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
वर्ष मान—वर्ष ४ प्रकार के हैं
दि० घ० पल = सूर्य १२ राशियों में १ बार घूम ( १ ) सौर वर्ष = ३६५ १५ ३० लेने से होता है। इस प्रकार १२ सौर मास का १ वर्ष होता है।
दि० घ० पल = शुक्ल प्रतिपदा से अमावस तक १२ ( २ ) चांद्र वर्ष = ३५४ ३० ० मास का या मलमास होने से १३ मास का एक वर्ष होता है।
( ३ ) सावन वर्ष = ३६० सावन दिन का=१२ सावन मास का दि० घ० पल=१२ नाक्षत्र मास का १ वर्ष
( ४ ) नाक्षत्र वर्ष= ३२४ ० ०
सम्बत्सर
पंचांग में सम्बत्सर का नाम दिया रहता है। संकल्प तर्पण आदि में जिसका उपयोग होता है और इससे फल भी बिचारते हैं
सम्बत्सर ६० होते हैं। किसी शाका में २४ जोड़कर ६० का भाग देने से जो शेष बचे उसी क्रमानुसार सम्बत्सर का नाम होता है। जैसे शाका १८५६+२४÷६०= १६० शेष २०=२० व्यय नाम का सम्बत्सर हुआ या सम्बत्+९÷६०= शेष सम्बत्सर। जैसे सम्बत् १९९९+९=२०००=शेष २० व्यय सम्बत्सर।
इसके अनुसार सम्बत्सर होता है, परन्तु कभी २ एक सम्बत् में २ सम्बत् आ जाते हैं। सम्बत् १९९३ में २२ वाँ सर्वधारी सम्बत्सर के उपरान्त २३ वाँ विरोधी सम्बत्सर भी उसी वर्ष लग गया था, जिससे १ अधिक हो जाता है। वास्तव में गुरु की गति के अनुसार गणित से सम्बत्सर निकाले जाते हैं। यहाँ तो सम्बत्सर निकालने की मोटी रीति दी है।
सम्बत्सर के नाम
| १ प्रभव | १६ चित्रभानु | ३१ हेमलम्बी | ४६ परिधावी |
|---|---|---|---|
| २ विभव | १७ सुभानु | ३२ विलंबी | ४७ प्रमादी |
| ३ शुक्ल | १८ तारण | ३३ विकारी | ४८ आनन्द |
| ४ प्रमोद | १९ पाथिब | ३४ श्रावरी | ४९ राक्षस |
| ५ प्रजापति | २० व्यय | ३५ प्लव | ५० नल |
| ६ अंगिरा | २१ सर्वजित् | ३६ शुभकृत् | ५१ पिंगल |
| ७ श्रीमुख | २२ सर्वधारी | ३७ शोभन | ५२ कालयुक्त |
| ८ भाव | २३ विरोधी | ३८ क्रोधी | ५३ सिद्धार्थ |
| ९ युवा | २४ विकृति | ३९ विश्वावसु | ५४ रौद्र |
| १० घाता | २५ खर | ४० पराभव | ५५ दुर्मति |
| ११ ईश्वर | २६ नन्दन | ४१ प्लवंग | ५६ दुर्दुभि |
| १२ बहुधान्य | २७ विजय | ४२ कीलक | ५७ संधिरोदगारी |
| १३ प्रमाथी | २८ जय | ४३ होम्य | ५८ रक्ताक्षी |
| १४ विक्रम | २९ मन्मथ | ४४ साधारण | ५९ क्रोधन |
| १५ वृष | ३० दुर्मुख | ४५ विरोधकृत् | ६० क्षय |
अध्याय १४ : ६७
जैसे सम्बत २००३+९=२०१२÷६०=शेष ३२+१=३३ विकारी सम्बत्सर । गुरु मध्यमगति जितने समय में १ राशि चलता है उसे सम्बत्सर कहते हैं । गुरु के १ अगण में १२ सम्बत्सर या ४३३२.३२०६ सावन दिन होते हैं । या १ सम्बत्सर में ३६१.०२६७२ सावन दिन होते हैं ।
[ ३ ] अयन
अयन २ होते हैं १ उत्तरायण २ दक्षिणायन
१ उत्तरायण=मकर संक्रांति से आरम्भ होता है और मिथुन संक्रांति की समाप्ति- तक रहता है । इसमें दिन क्रम-क्रम से बढ़ता है ।
२ दक्षिणायन—कर्क संक्रांति से लेकर धनु संक्रांति के अन्त तक दक्षिणायन सूर्य कहलाता है इसमें रात्रि क्रम-क्रम से बढ़ती है । इसमें, जो संक्रांति की राशियाँ बताई हैं वे सायन नहीं हैं अर्थात् निरयन हैं ।
[ ४ ] गोल
गोल २ हैं । आकाश के २ भाग इस प्रकार किए जाय कि ऊपर भाग के मध्य में आकाश का उत्तर ध्रुव हो और दूसरे भाग के मध्य में दक्षिण ध्रुव हो तो पहिले को उत्तर गोल और दूसरे को दक्षिण गोल कहेंगे ।
सायन, मेघ, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और कन्या ६ ये राशियाँ उत्तर गोल में हैं और शेष ६ राशियाँ सायन तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुंभ और मीन ये ६ राशियाँ दक्षिण गोल में हैं ।
[ ५ ] ऋतुएँ
१२ मास में ६ ऋतुएँ होती हैं ।
| अयन | ऋतु | सूर्य | चन्द्रमास |
|---|---|---|---|
| १ उत्तरायण | १ शिशिर | मकर-कुंभ | माघ-फाल्गुन |
| " | २ वसन्त | मीन-मेघ | चैत-वैशाख |
| " | ३ ग्रीष्म | वृष-मिथुन | ज्येष्ठ-अषाढ |
| २ दक्षिणायन | ४ वर्षा | कर्क-सिंह | भाद्रपद-आश्विन |
| " | ५ शरद | कन्या-तुला | कार्तिक |
| " | ६ हेमंत | वृश्चिक-धन | मार्गशीर्ष-पौष |
अध्याय १५
[ ६ ] मास और पक्ष विचार ( Month and fortnight )
मास ४ प्रकार के हैं—
१ चान्द्रमास = लुप्त प्रतिपदा से अमावस्या तक १ चान्द्रमास है ।
२ सौरमास = सूर्य की १ संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक ।
६८ • सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
सूर्य जब १ राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है उस समय दूसरी राशि की संक्रान्ति होती है। जैसे भेष राशि के बाद सूर्य वृष राशि में जिस दिन आया उसी दिन वृष की संक्रान्ति कहलायगी।
३ सावन-मास = ३० सावन दिन = सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय तक के समय को १ सावन दिन कहते हैं। इस प्रकार ३० दिन का १ सावन मास होता है। सावन दिन यह नाक्षत्र दिन से ४ मिनट बड़ा होता है। सावन दिन का मान समान नहीं होता, इस कारण मध्यम सावन दिन का मान लिया जाता है और उसी का समय चक्रियों से जाना जाता है।
४ नाक्षत्र मास=आश्विनी आदि २७ नक्षत्रों में चन्द्र एक बार पूरा घूम लेता है तब चन्द्र मास होता है।
चन्द्र के बारह मास के नाम
| १ चैत्र ( चैत ) | ४ आषाढ़ ( आसाढ़ ) | ७ आश्विन ( कुआर ) | १० पौष ( पूस ) |
|---|---|---|---|
| २ वैशाख | ५ आषाढ़ ( सावन ) | ८ कार्तिक ( कासिक ) | ११ माघ |
| ३ ज्येष्ठ ( जेठ ) | ६ भाद्रपद ( भादों ) | ९ मार्गशीर्ष ( अगहन ) | १२ फाल्गुन ( फागुन ) |
इन महीनों के उपरोक्त नाम पड़ने का कारण यह है कि इन महीनों की पूर्णिमा के लगभग ये नक्षत्र पड़ते हैं।
| क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र | क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र | क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | चैत्र | चित्रा | ५ | आषाढ़ | श्रवण | ९ | मार्गशीर्ष | भृगुशिरः |
| २ | वैशाख | विशाखा | ६ | भाद्रपद | भाद्रपद | १० | पौष | पुष्य |
| ३ | ज्येष्ठ | ज्येष्ठा | ७ | आश्विन | आश्विनी | ११ | माघ | मघा |
| ४ | आषाढ़ | आषाढ़ा | ८ | कार्तिक | कृतिका | १२ | फाल्गुन | फाल्गुनी |
चन्द्र मास २ प्रकार के हैं।
१ अमान्त मास=शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक १ मास होता है। यह दक्षिण में और महाराष्ट्र देश में चालू है।
२ पूर्णिमांत मास=कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १ मास यह उत्तर भारत में चालू है।
दोनों प्रकार के मास में कोई अन्तर नहीं आता, क्योंकि एक जगह पूर्णिमा या अमावस्या हुई तो सबत्र ही उस दिन पूर्णिमा या अमावस्या अवश्य होगी। केवल मास गणना में कृष्ण पक्ष में अपने यहाँ १ मास का अन्तर पड़ जाता है। जैसे अपने यहाँ चैत्र कृष्णपक्ष हुआ तो महाराष्ट्र लोग उसे फाल्गुन कृष्ण पक्ष कहेंगे अर्थात् कृष्ण पक्ष में अपने मास से १ मास कम महाराष्ट्र लोगों का मास होता है। मराठी पंचांग मिले तो कृष्णपक्ष में १ मास बढ़ा कर लेना चाहिए। परन्तु शुक्ल पक्ष में दोनों प्रकार के पञ्चांग में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
मास और पक्ष विचार : ६९
बंगला मास
सूर्य की नियरम-संक्रांति से आरम्भ होता है और मेपाकं ( मेघ की संक्रांति ) से नया बंगला सन् आरम्भ होता है । मीनाकं से चैत्र मास आरम्भ होता है और मेपाकं में वैशाख मास होता है । जब वर्ष आरम्भ होता है तब संक्रांति जिस दिन होती है उसके दूसरे दिन से बंगला की पहली तारीख ( तिथि ) गिनी जाती है । किसी महीने में २९, ३०, ३१ या कभी ३२ दिन पड़ जाते हैं ।
अंग्रेजी महिनों के नाम
क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास
महीना
महीना
महीना
| १ जनवरी ३१ पूस | ५ मई ३१ वैशाख | ९ सितम्बर ३० भाद्रपद |
|---|---|---|
| २ फरवरी २८ माघ | ६ जून ३० ज्येष्ठ | १० अक्टूबर ३१ आश्विन |
| ३ मार्च ३१ फाल्गुन | ७ जुलाई ३१ आषाढ़ | ११ नवम्बर ३० कार्तिक |
| ४ अप्रैल ३० चैत्र | ८ अगस्त ३१ श्रावण | १२ दिसम्बर ३१ मार्गशीर्ष |
प्लुत वर्ष=Leap year जीप इयर=में फरवरी २९ दिन की होती है । जिस सन् में ४ का भाग पूरा लग जाय या सदी century में ४०० का भाग पूरा लग जावे तो उसे प्लुत वर्ष कहते हैं । शेष वर्षों में फरवरी २८ दिन की होती है ।
मुसलमानी महिनों के नाम अर्थात् हिजरी सन् के महीने
| १ मोहर्रम | ५ जमादि उल अब्बल | ९ रमजान |
|---|---|---|
| २ सफर | ६ जमादिउल आखर ( सानी ) | १० सव्वाल |
| ३ रबिउल अब्बल | ७ रज्जब | ११ जीकाद |
| ४ रबिउल आखर ( सानी ) | ८ सावान ( शववान ) | १२ जिल हिज्ज |
चाँद दिखने से महीना आरम्भ होता है और इनमें लौट का वष या अधिक मास नहीं होता । इस कारण प्रत्येक तीसरे वर्ष इनके महीनों से अन्तर पड़ता रहता है अर्थात् कभी मुहर्रम जाड़े में कभी बरसात में कभी गरमी में पड़ता है । मुहर्रम की १ तारीख से हिजरी सन् आरम्भ होता है और चाँद दिखने के दूसरे दिन महीने की पहली तारीख होती है । कभी २९ दिन कभी ३० दिन का महीना चन्द्र की तिथि की घटा बढ़ी के अनुसार होता है ।
फसली सन् में महीना प्रत्येक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होता है और रमजान महीना से नया सन् आरम्भ होता है । इसमें भी चन्द्र स्थिति के अनुसार कभी २९ कभी ३० दिन हो जाते हैं ।
सौर मास और संक्रांति
सूर्य जब १ राशि के अन्त में जाकर दूसरी राशि में संक्रमण करता है ( जाने लगता है ) तब उसे संक्रांति कहते हैं । अर्थात् जब २ राशियों की संधि पर सूर्य आता है तब आगे की राशि की संक्रांति होती है । इस प्रकार प्रत्येक सौर मास में एक संक्रांति होती है । जिस राशि पर सूर्य जाता है उस राशि की संक्रांति कहलाती है ।
७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जैसे धन का अन्त होने पर सूर्य मकरराशि में जाता है तो वह मकर-संक्रांति कहलावेगी। अर्थात् सूर्य ने मकर राशि में संक्रमण किया ऐसा कहेंगे।
मेष से तुला संक्रांति को विषुव संक्रांति कहते हैं।
कर्क से मकर संक्रांति को अयन संक्रांति कहते हैं।
अधिक मास
जिस चान्द्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे अधिक मास कहते हैं। अर्थात् जब दो पक्ष में संक्रांति नहीं होती तो उसे अधिक मास कहते हैं। जैसे सम्बत् १९९९ में वैशाख कृष्ण १३ (ता० १३ अप्रैल) को मेष संक्रांति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण १४ को (ता० १४ मई) वृष की संक्रांति हुई। इसके उपरान्त फिर (ता० १४ जून) शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन राशि पर सूर्य गया अर्थात् मिथुन की संक्रांति हुई। वृषार्क शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की १४ तिथि को था, उसके बाद अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष और फिर अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष बीत गया, परन्तु इन दोनों के बीच संक्रांति नहीं हुई। इस कारण ये दोनों पक्ष अधिक मास माने गये। इसके पहिले का ज्येष्ठ कृष्ण शुद्ध माना गया और फिर उसके बाद जो अधिक २ पक्ष बड़े उनमें से १ का नाम अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पड़ा और उसके आगे फिर अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष माना गया। ये दोनों अधिक पक्ष व्यतीत हो जाने पर शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन की संक्रांति हुई। इससे वह शुद्ध ज्येष्ठ मास माना गया।
३२ मास १६ दिन ४ घड़ी बीतने पर अधिक मास होता है। अर्थात् तीसरे वर्ष अधिक मास होता है और उस वर्ष में १३ मास हो जाते हैं।
अधिक मास को मल्ल मास या पुष्पोत्सव मास कहते हैं। चन्द्र मास के गणित से वर्ष में ३५४ दिन ९ घंटे और सूर्य मास के वर्ष में ३६५ दिन ६ घंटे प्रायः होते हैं। इस कारण सूर्य और चन्द्र के दिनों का अन्तर अधिक मास होने से बराबर हो जाता है।
क्षय मास
जिस चान्द्र मास के २ पक्ष में २ संक्रांति होती है उसे क्षयमास कहते हैं। क्षय मास केवल कार्तिक आदि ३ महीनों में पड़ता है और महीनों में नहीं पड़ता। जिस वर्ष क्षय मास होता है उस वर्ष एक वर्ष के भीतर २ अधिक मास होते हैं।
यह कई वर्षों में पड़ता है। यदि भाद्रपद अधिकमास होगा तो सूर्य की गति अधिक होने से मार्ग शीर्ष में २ संक्रांति वाला क्षयमास होगा और सूर्य की गति अल्प हो जाने के कारण चैत्र मास भी अधिक होगा।
जिस सम्बत् में क्षयमास होता है उसके १४१ या १९ वर्ष उपरान्त पुनः क्षयमास होना सम्भव होता है अर्थात् कभी १४१ वर्ष में कभी १९ वर्ष में संभव होता है।
जैसे सम्बत् १७४ में क्षयमास होकर पुनः आगे सम्बत् (१७४ + १४१) = १११५ में और (१११५ + १४१) = १२५६ सम्बत् में क्षय मास होगा, इसी प्रकार आगे और भी जानें। शविष्य में सम्बत् २०२० में क्षय मास होगा।
पंचाङ्ग के अंग : ७१
( ७ ) पक्ष
चान्द्र मास में २ पक्ष—( पखवाड़ा या पंढरवाड़ा ) होते हैं। जब सूर्यास्त के उपरान्त कुछ समय तक अग्नेरी रात आ जाती है या सम्पूर्ण रात भर या रात के कुछ भाग तक ही सूर्यास्त के बाद अग्नेरा रहे उसे कृष्ण पक्ष कहते हैं। जब सूर्यास्त के उपरान्त कुछ समय या सम्पूर्ण रात भर चन्द्र का प्रकाश रात्रि को रहे तब उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं।
कृष्णपक्ष=वदी। शुक्ल पक्ष=शुद्ध या सुदी।
अध्याय १६
पंचाङ्ग के अंग
तिथि—यह पंचाङ्ग का प्रथम अंग है। पंचाङ्ग में पहिले तिथि ही दी रहती है। चान्द्र मास की तिथियाँ ३० होती हैं।
| १ प्रतिपदा (परिवा) | ५ पंचमी (पाँचें) | १० दशमी (दसें) | १४ चतुर्दशी (चौदस) |
|---|---|---|---|
| परमा या पांडुवा | ६ षष्ठ (छठें) | ११ एकादशी | १५ पूर्णिमा (पूनों) |
| २ द्वितीया (दोज) | ७ सप्तमी (सातें) | (ग्यारस) | ३० अमावस्या |
| ३ तृतीया (तीज) | ८ अष्टमी (आठें) | १२ द्वादशी (बारस) | (अमावस) |
| ४ चतुर्थी (चौथ) | ९ नवमी (नवें) | १३ त्रयोदशी (तेरस) | या अमावास्या |
तिथियाँ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से गिनी जाती हैं और १५ तिथि पूर्णिमा को होती है, इस कारण पूर्णिमा के स्थान में १५ तिथि लिखते हैं। इसके उपरान्त कृष्ण पक्ष की तिथियाँ आरम्भ होती हैं। वे भी प्रतिपदा से आरम्भ होकर अमावस्या तक गिनी जाती हैं। परन्तु अमावस्या को ३० वीं तिथि कहते हैं। अमावस्या के स्थान ३० तिथि लिखी जाती है। जहाँ ३० तिथि लिखी हो वहाँ अमावस्या समझें।
जिस दिन सूर्य और चन्द्र एक स्थान में आ जाते हैं तब अमावस्या होती है अर्थात् सूर्य के पास चन्द्र आ जाता है (अस्त हो जाता है) तब अमावस्या होती है। गणित करने से जिस समय सूर्य और चन्द्र का पूर्व पश्चिम अन्तर शून्य हो जाता है उसी समय अमावस्या तिथि होती है।
सूर्य की गति से चन्द्र की गति अधिक है। जब दोनों का अन्तर बढ़ने लगता है तो १ तिथि का आरम्भ होने लगता है। अर्थात् प्रतिपदा तिथि का आरम्भ होने लगता है, जब वह बढ़ते-बढ़ते बारह अंश का अन्तर हो जाता है तो प्रतिपदा तिथि पूरी हो जाती है। ३६०° एक चक्र में होते हैं—३० तिथि=१२=१ तिथि। अर्थात् सूर्य चन्द्र में जब १२° का अन्तर पड़ता है तो १ तिथि होती है।
७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
यह अन्तर ( अर्थात् १ तिथि ) मध्यम मान से ५९ घण्टा ३ पल का होता है। चान्द्रमास २९है दिन का होता है, जिसमें ३० तिथियाँ व्यतीत होती हैं। इस प्रकार १२ मास में ३५४ दिन हुए जिसमें ३६० तिथियाँ होती हैं अर्थात् तिथियों का क्रम वृद्धि आदि होकर ६ दिन कम हो जाते हैं।
चन्द्र गति कभी ६६ घंटी से घटते घटते ५० घंटी तक कम हो जाती है। जब तिथि का मान ६० घंटी से अधिक होता है तो वृद्धि तिथि और ६० घंटी से कम होता है तो क्षय तिथि होती है।
वृद्धि तिथि
जैसे सोमवार को ५८ घंटी तक द्वितीया है। १२ अंश अन्तर होने में चन्द्र की गति के अनुसार तृतीया पूर्ण होने को ६५ घंटी लगी। सोमवार को ५८ घंटी के उपरान्त द्वितीया व्यतीत होकर शेष में तृतीया रहेगी। फिर मंगलवार को सब दिन अर्थात् ६० घंटी तृतीया रही और बुध को सूर्योदय के अनन्तर ३ घंटी और तृतीया रही। इस प्रकार सोमवार, मंगलवार और बुधवार को मिलाकर ६५ घंटी तृतीया रही। इसके उपरान्त चतुर्थी आरम्भ हुई।
पंचांग में सोमवार को द्वितीया ५८ घंटी लिखा होगा। मंगल को और बुध को भी तृतीया लिखा रहेगा।
सूर्योदय के उपरान्त वह तिथि चाहें १ घंटी क्यों न हो, जो तिथि सूर्योदय पर होगी वही तिथि पंचांग में लिखी रहेगी। जैसे बुधवार को ३ घंटी तक तृतीया है तो भी उस दिन तृतीया ३ घंटी लिखी रहेगी। इससे समझ जाना चाहिए कि सूर्योदय के उपरान्त ३ घंटी तक तृतीया तिथि थी उसके उपरान्त चतुर्थी तिथि आरम्भ हुई।
इस प्रकार जब दो दिन एक ही तिथि पंचांग में लिखी देखो तो उसे वृद्धि तिथि जानो।
क्षय तिथि
मान लो सोमवार को सूर्योदय के अनन्तर २ घंटी दशमी है। पंचांग में उस दिन २ घंटी लिखा होगा। इसके बाद एकादशी तिथि मान लो ५५ घंटी रही फिर द्वादशी आरम्भ हुई, तो सोमवार को पूरे ६० घंटी में २ घंटी दशमी के गये, बचे ५८ घंटी। इसमें ५५ घंटी एकादशी के गये तो ३ घंटी द्वादशी के बचे तो उस दिन ३ घंटी ही द्वादशी रही। दूसरे दिन मंगलवार को भी शेष द्वादशी रहेगी ही। इस कारण मंगलवार को द्वादशी तिथि पंचांग में लिखी मिलेगी। परन्तु एकादशी तिथि पंचांग में लिखी हुई न मिलेगी। परन्तु ऊपर बताई रीति से जान सकते हो कि ग्यारस कब से कब तक रही। ऐसा नहीं समझना कि पंचांग में ग्यारस नहीं लिखा तो ग्यारस है ही नहीं। सूर्योदय पर जो तिथि किसी भी दिन पंचांग में नहीं बताई गई वह क्षय तिथि समझना।
पंचाङ्ग के अंग : ७३
पूणिमा और अमावस्या के नाम
| तिथि | चतुर्दशी मिश्रित | प्रतिपदा मिश्रित |
|---|---|---|
| अमावस्या ३० | सिनी | कुह |
| पूणिमा १५ | अनुमति | राका |
( २ ) वार ( दिन ) Day
यह पंचांग का दूसरा अंग है। पंचांग में तिथि के पास वार दिया रहता है। वार ७ हैं।
| क्रम | वार नाम | फारसी नाम | अंग्रेजी नाम |
|---|---|---|---|
| १ | रविवार—सूर्यवार | ||
| (इतवार) | आदित्यवार | एक संवा | |
| Sunday | |||
| २ | चन्द्रवार | ||
| (सोमवार) | दुसंवा (पीर) | Monday | |
| ३ | भोमवार | ||
| (मंगलवार) | शिशंवा | Tuesday | |
| ४ | बुधवार | चहार संवा | Wednesday |
| ५ | गुरुवार | ||
| (बृहस्पतिवार) | पंच संवा (जुमेरात) | Thursday | |
| ६ | शुक्रवार | ||
| (शुक्रवार) | जुमा | Friday | |
| ७ | शनिवार | ||
| (शनीचर) | संवा | Saturday |
ये दिन के नाम ग्रहों के उमर से पड़े हैं। जिस ग्रह का होरा प्रातः काल होता है उसी ग्रह के नाम से उस दिन का नाम पड़ता है। पृथ्वी भर में सर्वत्र इसी क्रम से ही दिन माने जाते हैं और ७ दिन होते हैं।
ग्रहों का होरा
आकाश में पृथ्वी से अधिक दूरी के क्रम से— इस प्रकार ग्रहों की स्थिति है— (१) शनि, (२) गुरु, (३) मंगल, (४) रवि, (५) शुक्र, (६) बुध, (७) चन्द्र। अर्थात् पृथ्वी से सबसे पास चन्द्र हैं फिर उससे कुछ दूर बुध, फिर शुक्र, फिर रवि, मंगल, गुरु और शनि क्रम से एक दूसरा ग्रह अधिक दूरी पर है। होरा के विचार में उपर्युक्त ग्रहों का क्रम जिसमें आदि शनि है लिया है, क्योंकि पृथ्वी से शनि सबसे अधिक दूरी पर है चित्र सं० ४ देखें।
१होरा एक घंटे का होता है इस कारण होरा (Hour) को घंटा भी कहते हैं। दिन रात में २४ घंटा होते हैं। इस प्रकार दिन रात में २४ होरा हुए। ७ ग्रहों का प्रभाव क्रमशः एक २ होरा में होता है—२४ होरा ÷ ७ ग्रह=३.३३। अर्थात् २४ घंटा में ७ ग्रह के पूरे ३ चक्कर होकर शेष ३ होरा (घंटे) बच रहते हैं, जिसमें प्रति ग्रह १ घंटा के हिसाब से ३ ग्रह और भोग सकते हैं। इस प्रकार ३ ग्रह और भोग चुकते हैं। इस प्रकार ( २४ घण्टे ) पूरे होने पर चौथे ग्रह के होरा में दूसरे दिन का आरम्भ होता है।
जैसे प्रातः शनि का होरा या शनि से दूसरा गुरु, तीसरा मंगल का होरा, शनिवार के २४ घंटा में व्यतीत हो गये। अब दूसरे दिन प्रातः काल चौथा ग्रह ( शनि से
७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
चौथा रवि है) रवि का होरा आया। उस दिन प्रातः काल रवि का होरा था, इस कारण उस दिन का नाम रविवार पड़ा।
इसके बाद रवि से चौथा चन्द्र है। इसमें रविवार के दिन भर के बाद दूसरे दिन प्रातः चन्द्र का होरा आया, इसलिए उस दिन का नाम चन्द्रवार ( सोमवार )होगा। अब सोमवार के बाद चौथा ग्रह ( १ चन्द्र, २ शनि, ३ गुरु ) चौथा मंगल हुआ तो दूसरे दिन प्रातः काल मंगल का होरा होने से मंगलवार दिन का नाम पड़ा। मंगल से चौथा ग्रह ( १ मंगल, २ रवि, ३ शुक्र और चौथा ) बुध हैं तो दूसरे दिन बुधवार होगा। इसी प्रकार बुध से चौथा गुरु है, गुरु से चौथा शुक्र है, शुक्र से चौथा शनि है। इस क्रम से प्रातः काल जिस ग्रह का होरा होता है उसी ग्रह के नाम से वार का नाम पड़ता है।
इष्ट घड़ी के घंटा बना लो, उसमें ७ का भाग दो जो शेष बचे उतनी संख्या उस दिन के प्रातः समय के होरा से, उस दिन को १ गिनते हुए शेष संख्या तक गिनो, जिस ग्रह का होरा आवे उस समय वही होरा होगा ऐसा जानना।
जैसे २५ घड़ी दिन चढ़े पर कौन होरा होगा देखना है। २५ घड़ी=१० घंटा। उस दिन मानो मंगलवार था तो १० में ७ का भाग दिया शेष ३ बचा, मंगल का दिन था। इससे मंगल से गिनो तो (१) मंगल, (२) रवि, (३) तीसरा शुक्र आया। इस कारण उस समय शुक्र का होरा होगा ऐसा जानना।
नीचे दिए हुए चक्र से प्रगट होगा कि सूर्योदय के उपरान्त इष्ट घड़ी पर किस दिन कौन होरा होगा। घड़ी पल में समय दिया हो तो घड़ी पल में (घंटा बनाने को) ६ का गुणा कर ७ का भाग दो शेष जो बचे वही होरा होगा
इष्ट घड़ी ४६÷७=शेष ग्रह का होरा जैसे इष्ट घड़ी ४० है गुरुवार का दिन है ४०×२÷७=१६÷७=शेष २, दिन गुरुवार था तो गुरु से २ गिना। १ गुरु २ मंगल आया इस कारण उस समय मंगल का होरा हुआ। इसी के अनुसार नीचे चक्र से इष्ट घड़ी का होरा जान सकते हो। यदि समय घंटा में हो तो इसी चक्र से घंटा के अनुसार भी होरा जान सकते हो।
होरा चक्र
| किस घड़ी तक | रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि | घंटा तक |
|---|---|---|
| वार | वार | वार |
| २१। २० ३७। ५ | सूर्य | चंद्र |
| ५ २२। ४० ४७। | शुक्र | शनि |
| ७। २५ ४२। ६० | बुध | गुरु |
| १० २७। ४५ | ० | चंद्र |
| १२। ३० ४७। | ० | शनि |
| १५ ३२। ५० | ० | गुरु |
| १७। ३५ ५२। | ० | मंगल |
पंचाङ्ग के अंग : ७५
यहाँ दिया घंटा का समय सूर्योदय से लेना अर्थात् घड़ी के समय में सूर्योदय घटा कर लेना।
इस चक्र से प्रगट होगा कि शनि, गुरु, मंगल, रवि, शुक्र, बुध, चन्द्र इस क्रम से ग्रह का होरा होता है। रविवार को रवि, शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरु, मंगल का दिन रात में ३ बार पूरा चक्र होकर शेष रात्रि में ३ और ग्रह का होरा बुध का होरा तक होता है। बुध के बाद चन्द्र है इस कारण दूसरे दिन प्रातः चन्द्र का होरा होने से दूसरे दिन का नाम चन्द्रवार पड़ा। इसी प्रकार और यहाँ के सम्बन्ध में जानना।
(३) नक्षत्र
यह पंचांग का तीसरा अंग है।
नक्षत्र २७ हैं और अभिजित मिलाकर २८ नक्षत्र होते हैं, परन्तु पंचांग में २७ ही नक्षत्र दिए रहते हैं।
क्रांति प्रदेश के २७ समान भाग करने से प्रत्येक भाग १३°-२०' का, १ नक्षत्र होता है। इस कारण चन्द्रमा को १३°-२०' चलने में जो समय लगता है उसे नक्षत्र या दिन नक्षत्र कहते हैं। यहाँ नक्षत्र से चन्द्र नक्षत्र जानना।
मध्यम मान से चन्द्र नक्षत्र ६० व ४३ पल का होता है। कभी कभी इससे कम या अधिक का मान हो जाता है। इसी २४ नक्षत्र मिल कर चन्द्र की १ राशि होती है। प्रत्येक पंचांग में नक्षत्र के अतिरिक्त चन्द्र किस राशि में है यह भी दिया रहता है।
जिस प्रकार चन्द्र इन २७ नक्षत्रों पर से चलता है उसी प्रकार सूर्यादि ग्रह भी इन्हीं नक्षत्रों पर से चलते हैं। जिस प्रकार चन्द्र एक नक्षत्र एक दिन में चल लेता है उसी प्रकार सूर्य १३ या १४ दिन में एक नक्षत्र को पार कर करता है, ये सूर्य नक्षत्र कहलाते हैं। जब आद्री पर सूर्य आता है तो वर्षा ऋतु का आरम्भ समझा जाता है। खेती के सम्बन्ध से किसान इन नक्षत्रों पर विशेष ध्यान देते हैं। सूर्य नक्षत्र को महानक्षत्र भी कहते हैं।
जिस दिन जिस नक्षत्र पर सूर्य जाता है वह पंचाङ्ग में लिखा रहता है। जैसे आद्रीक=आद्री+अर्क (सूर्य)=अर्थात् आद्री नक्षत्र पर उस दिन सूर्य गया। किस घड़ी पल पर उस नक्षत्र में प्रवेश किया वह भी दिया रहता है।
इसी प्रकार बुध, मंगल, गुरु आदि ग्रह भी किसी नक्षत्र पर पहुँचते हैं तो उस नक्षत्र पर पहुँचने का दिन समय आदि भी पंचाङ्ग में दिया रहता है। उस नक्षत्र के किस चरण में वह ग्रह आया है यह भी दिया रहता है।
ऊपर सूर्य का जो सोर नक्षत्र बताया है, उसके अतिरिक्त पंचाङ्ग में सायन सूर्य किस नक्षत्र पर आया है वह भी दिया रहता है। कौन ग्रह किस राशि में है पंचाङ्ग
७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
में दिये रहते हैं। किसी पंचाङ्ग में दैनिक, किसी में साप्ताहिक दिये रहते हैं। २३ नक्षत्र की एक राशि होती है, इससे नक्षत्रों के प्रमाण से ग्रहों की राशि भी निकल जाती है। पंचाङ्ग में स्पष्ट ग्रह के अतिरिक्त कुण्डली चक्र भी दिए रहते हैं। इस प्रकार ग्रहों के सम्बन्ध की प्रत्येक सूचनाएँ पंचाङ्ग में दी रहती है।
(४) योग
यह पंचाङ्ग का चौथा अंग है।
योग २७ है। चन्द्र और सूर्य की गति में जब १३°-२०" का अन्तर पड़ता है तब एक योग होता है। ३६०° ÷ २७ = १३°-२०" = १ (योग) परन्तु नक्षत्र के प्रमाण से इन थोड़ी का आकाश की स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है। योग केवल सूर्य चन्द्र का अन्तर बतलाते हैं।
२७ योगों के नाम
| १ विष्कम्भ | ८ धृति | १५ वज्र | २२ साध्य |
|---|---|---|---|
| २ प्रीति | ९ शूल | १६ सिद्धि | २३ शुभ |
| ३ आयुष्मान | १० गंड | १७ व्यतीपात | २४ शुक्ल |
| ४ सोभाय | ११ वृद्धि | १८ वरीयान | २५ ब्रह्म |
| ५ शोभन | १२ ध्रुव | १९ परिच | २६ ऐन्द्र |
| ६ अतिगंड | १३ व्याघात | २० शिव | २७ वैधृति |
| ७ सुकर्मा ( सुकर्म ) | १४ हर्षण | २१ सिद्ध |
(५) करण
यह पंचाङ्ग का पाँचवा अंग है।
करण यह तिथि का आधा भाग है ( १ ) तिथि के पूर्वार्द्ध अर्थात् पहिले आधे भाग में एक करण और उत्तरार्द्ध ( अन्त के आधे भाग में ) दूसरा करण होता है। इस प्रकार १ तिथि में २ करण होते हैं।
१ चान्द्रमास में ३० तिथि और ६० करण होते हैं। सूर्य और चन्द्र के बीच ६° का अन्तर पड़ने पर १ करण होता है। करण कुल ११ है उनके नाम ये हैं।
चर करण—( १ ) वव, ( २ ) बालव, ( ३ ) कौलव, ( ४ ) तैतिल, ( ५ ) गर, ( ६ ) वणिज, ( ७ ) विष्टि।
स्थिर करण—( ८ ) शकुनि, ( ९ ) चतुष्पद, ( १० ) नाग, ( ११ ) किस्तुन। पूर्वार्द्ध=पूर्व दल ( पहिला आधा भाग ) उत्तरार्द्ध=परदल ( अन्त का आधा भाग )।