सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
व्यव्याय १४ : ६५
सन् ईस्वी के ३१०२ वर्ष पहिले कलियुग आरम्भ हुआ था। सन् ईस्वी आरम्भ होने के ५७ वर्ष पहिले विक्रम सम्बत प्रचलित हुआ था। इस प्रकार (३१०२-५७)= ३०४५ वर्ष हुए। ये वर्ष, सम्बत के आरम्भ होने के समय तक के कलि के गत वर्ष हुए।
हापर तक के वर्ष } इतने वर्ष सृष्टि आरंभ से सम्बत आरंभ सम्बत आरंभ तक कलि वर्ष+ ३०४५ } तक के हुए।
योग १९७२९४७०४५
इसमें इष्ट सम्बत और जोड़ दो तो इष्ट सम्बत तक के वर्ष प्राप्त होंगे।
कलियुग-सन् ईस्वी के ३१०२ B. C. ( बी. सी. ) ( इतने वर्ष पहिले ) आरंभ हुआ था। सम्बत २००० में ५०४४ वर्ष कलि के बीत चुके और ४२६९५९ वर्ष व्यतीत होने को शेष रहे। ता० १८ फरवरी ३१०२ बी.सी. (ईशा के जन्म के पहिले) अर्धरात्रि से कलियुग आरम्भ हुआ था। भाद्रपद मास, कृष्णपक्ष १३ रविवार आश्लेषा नक्षत्र व्यतीपात योग में अर्धरात्रि के समय कलियुग की उत्पत्ति हुई थी।
इस प्रकार यह कलियुग का प्रथम चरण है, ब्रह्मा का दूसरा पहर है, श्वेत वाराह कल्प है और वैवस्वत मन्वन्तर है। जब कलियुग आरम्भ हुआ था सूर्य चन्द्र आदि सब ग्रह एक ही राशि पर थे।
विक्रमादित्य ने ५७ बी. सी. में पहिले विदेशियों को भारत से भगाया था, उस समय से विक्रम सम्बत चला है। ईसा के जन्म के ७८ वर्ष के उपरान्त शालिवाहन राजा ने शाका चलाया है।
[ २ ] वर्ष प्रमाण—
| वर्ष ---|--- शाके + ७८ वर्ष=सन् ईस्वी | सन् ईस्वी—५८३=सन् हिजरी सम्बत—५७ ,, ,, ,, | सन् हिजरी—१००=सन् फसली सन् ईस्वी+५७,,=सम्बत | सन् फसली—१ =बंगला सन् ,, -७८ =शाका | सम्बत—१३५ =शाका |
विक्रम सम्बत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। सन् ईस्वी में सम्बत बनाने में यह ध्यान रहे कि सम्बत मार्च के महिना में बदल जाता है और पूस मास में सन् बदलता है। इस प्रकार एक सम्बत् में २ सन् या १ सन् में २ सम्बत् आ जाते हैं। इस कारण मास का विचार कर सन् या संवत् का निर्णय करना चाहिए। अर्थात् संवत् में ५७ घटाने से जो सन् आता है वह वर्ष आरम्भ का सन् होता है। आगे पूस में सन् बदल कर दूसरा सन् लग जाता है। जैसे सम्बत् २००२-५७=१९४५ सन् ईस्वी, यह सन् सम्बत् के आरम्भ में होगा और सम्बत् २००२ के पूस मास में सन् बदल कर १९४६ सन् हो जायगा।
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१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
वर्ष मान—वर्ष ४ प्रकार के हैं
दि० घ० पल = सूर्य १२ राशियों में १ बार घूम ( १ ) सौर वर्ष = ३६५ १५ ३० लेने से होता है। इस प्रकार १२ सौर मास का १ वर्ष होता है।
दि० घ० पल = शुक्ल प्रतिपदा से अमावस तक १२ ( २ ) चांद्र वर्ष = ३५४ ३० ० मास का या मलमास होने से १३ मास का एक वर्ष होता है।
( ३ ) सावन वर्ष = ३६० सावन दिन का=१२ सावन मास का दि० घ० पल=१२ नाक्षत्र मास का १ वर्ष
( ४ ) नाक्षत्र वर्ष= ३२४ ० ०
सम्बत्सर
पंचांग में सम्बत्सर का नाम दिया रहता है। संकल्प तर्पण आदि में जिसका उपयोग होता है और इससे फल भी बिचारते हैं
सम्बत्सर ६० होते हैं। किसी शाका में २४ जोड़कर ६० का भाग देने से जो शेष बचे उसी क्रमानुसार सम्बत्सर का नाम होता है। जैसे शाका १८५६+२४÷६०= १६० शेष २०=२० व्यय नाम का सम्बत्सर हुआ या सम्बत्+९÷६०= शेष सम्बत्सर। जैसे सम्बत् १९९९+९=२०००=शेष २० व्यय सम्बत्सर।
इसके अनुसार सम्बत्सर होता है, परन्तु कभी २ एक सम्बत् में २ सम्बत् आ जाते हैं। सम्बत् १९९३ में २२ वाँ सर्वधारी सम्बत्सर के उपरान्त २३ वाँ विरोधी सम्बत्सर भी उसी वर्ष लग गया था, जिससे १ अधिक हो जाता है। वास्तव में गुरु की गति के अनुसार गणित से सम्बत्सर निकाले जाते हैं। यहाँ तो सम्बत्सर निकालने की मोटी रीति दी है।
सम्बत्सर के नाम
| १ प्रभव | १६ चित्रभानु | ३१ हेमलम्बी | ४६ परिधावी |
|---|---|---|---|
| २ विभव | १७ सुभानु | ३२ विलंबी | ४७ प्रमादी |
| ३ शुक्ल | १८ तारण | ३३ विकारी | ४८ आनन्द |
| ४ प्रमोद | १९ पाथिब | ३४ श्रावरी | ४९ राक्षस |
| ५ प्रजापति | २० व्यय | ३५ प्लव | ५० नल |
| ६ अंगिरा | २१ सर्वजित् | ३६ शुभकृत् | ५१ पिंगल |
| ७ श्रीमुख | २२ सर्वधारी | ३७ शोभन | ५२ कालयुक्त |
| ८ भाव | २३ विरोधी | ३८ क्रोधी | ५३ सिद्धार्थ |
| ९ युवा | २४ विकृति | ३९ विश्वावसु | ५४ रौद्र |
| १० घाता | २५ खर | ४० पराभव | ५५ दुर्मति |
| ११ ईश्वर | २६ नन्दन | ४१ प्लवंग | ५६ दुर्दुभि |
| १२ बहुधान्य | २७ विजय | ४२ कीलक | ५७ संधिरोदगारी |
| १३ प्रमाथी | २८ जय | ४३ होम्य | ५८ रक्ताक्षी |
| १४ विक्रम | २९ मन्मथ | ४४ साधारण | ५९ क्रोधन |
| १५ वृष | ३० दुर्मुख | ४५ विरोधकृत् | ६० क्षय |
अध्याय १४ : ६७
जैसे सम्बत २००३+९=२०१२÷६०=शेष ३२+१=३३ विकारी सम्बत्सर । गुरु मध्यमगति जितने समय में १ राशि चलता है उसे सम्बत्सर कहते हैं । गुरु के १ अगण में १२ सम्बत्सर या ४३३२.३२०६ सावन दिन होते हैं । या १ सम्बत्सर में ३६१.०२६७२ सावन दिन होते हैं ।
[ ३ ] अयन
अयन २ होते हैं १ उत्तरायण २ दक्षिणायन
१ उत्तरायण=मकर संक्रांति से आरम्भ होता है और मिथुन संक्रांति की समाप्ति- तक रहता है । इसमें दिन क्रम-क्रम से बढ़ता है ।
२ दक्षिणायन—कर्क संक्रांति से लेकर धनु संक्रांति के अन्त तक दक्षिणायन सूर्य कहलाता है इसमें रात्रि क्रम-क्रम से बढ़ती है । इसमें, जो संक्रांति की राशियाँ बताई हैं वे सायन नहीं हैं अर्थात् निरयन हैं ।
[ ४ ] गोल
गोल २ हैं । आकाश के २ भाग इस प्रकार किए जाय कि ऊपर भाग के मध्य में आकाश का उत्तर ध्रुव हो और दूसरे भाग के मध्य में दक्षिण ध्रुव हो तो पहिले को उत्तर गोल और दूसरे को दक्षिण गोल कहेंगे ।
सायन, मेघ, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और कन्या ६ ये राशियाँ उत्तर गोल में हैं और शेष ६ राशियाँ सायन तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुंभ और मीन ये ६ राशियाँ दक्षिण गोल में हैं ।
[ ५ ] ऋतुएँ
१२ मास में ६ ऋतुएँ होती हैं ।
| अयन | ऋतु | सूर्य | चन्द्रमास |
|---|---|---|---|
| १ उत्तरायण | १ शिशिर | मकर-कुंभ | माघ-फाल्गुन |
| " | २ वसन्त | मीन-मेघ | चैत-वैशाख |
| " | ३ ग्रीष्म | वृष-मिथुन | ज्येष्ठ-अषाढ |
| २ दक्षिणायन | ४ वर्षा | कर्क-सिंह | भाद्रपद-आश्विन |
| " | ५ शरद | कन्या-तुला | कार्तिक |
| " | ६ हेमंत | वृश्चिक-धन | मार्गशीर्ष-पौष |
अध्याय १५
[ ६ ] मास और पक्ष विचार ( Month and fortnight )
मास ४ प्रकार के हैं—
१ चान्द्रमास = लुप्त प्रतिपदा से अमावस्या तक १ चान्द्रमास है ।
२ सौरमास = सूर्य की १ संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक ।
६८ • सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
सूर्य जब १ राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है उस समय दूसरी राशि की संक्रान्ति होती है। जैसे भेष राशि के बाद सूर्य वृष राशि में जिस दिन आया उसी दिन वृष की संक्रान्ति कहलायगी।
३ सावन-मास = ३० सावन दिन = सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय तक के समय को १ सावन दिन कहते हैं। इस प्रकार ३० दिन का १ सावन मास होता है। सावन दिन यह नाक्षत्र दिन से ४ मिनट बड़ा होता है। सावन दिन का मान समान नहीं होता, इस कारण मध्यम सावन दिन का मान लिया जाता है और उसी का समय चक्रियों से जाना जाता है।
४ नाक्षत्र मास=आश्विनी आदि २७ नक्षत्रों में चन्द्र एक बार पूरा घूम लेता है तब चन्द्र मास होता है।
चन्द्र के बारह मास के नाम
| १ चैत्र ( चैत ) | ४ आषाढ़ ( आसाढ़ ) | ७ आश्विन ( कुआर ) | १० पौष ( पूस ) |
|---|---|---|---|
| २ वैशाख | ५ आषाढ़ ( सावन ) | ८ कार्तिक ( कासिक ) | ११ माघ |
| ३ ज्येष्ठ ( जेठ ) | ६ भाद्रपद ( भादों ) | ९ मार्गशीर्ष ( अगहन ) | १२ फाल्गुन ( फागुन ) |
इन महीनों के उपरोक्त नाम पड़ने का कारण यह है कि इन महीनों की पूर्णिमा के लगभग ये नक्षत्र पड़ते हैं।
| क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र | क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र | क्रम | चन्द्रमास | नक्षत्र |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | चैत्र | चित्रा | ५ | आषाढ़ | श्रवण | ९ | मार्गशीर्ष | भृगुशिरः |
| २ | वैशाख | विशाखा | ६ | भाद्रपद | भाद्रपद | १० | पौष | पुष्य |
| ३ | ज्येष्ठ | ज्येष्ठा | ७ | आश्विन | आश्विनी | ११ | माघ | मघा |
| ४ | आषाढ़ | आषाढ़ा | ८ | कार्तिक | कृतिका | १२ | फाल्गुन | फाल्गुनी |
चन्द्र मास २ प्रकार के हैं।
१ अमान्त मास=शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक १ मास होता है। यह दक्षिण में और महाराष्ट्र देश में चालू है।
२ पूर्णिमांत मास=कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १ मास यह उत्तर भारत में चालू है।
दोनों प्रकार के मास में कोई अन्तर नहीं आता, क्योंकि एक जगह पूर्णिमा या अमावस्या हुई तो सबत्र ही उस दिन पूर्णिमा या अमावस्या अवश्य होगी। केवल मास गणना में कृष्ण पक्ष में अपने यहाँ १ मास का अन्तर पड़ जाता है। जैसे अपने यहाँ चैत्र कृष्णपक्ष हुआ तो महाराष्ट्र लोग उसे फाल्गुन कृष्ण पक्ष कहेंगे अर्थात् कृष्ण पक्ष में अपने मास से १ मास कम महाराष्ट्र लोगों का मास होता है। मराठी पंचांग मिले तो कृष्णपक्ष में १ मास बढ़ा कर लेना चाहिए। परन्तु शुक्ल पक्ष में दोनों प्रकार के पञ्चांग में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
मास और पक्ष विचार : ६९
बंगला मास
सूर्य की नियरम-संक्रांति से आरम्भ होता है और मेपाकं ( मेघ की संक्रांति ) से नया बंगला सन् आरम्भ होता है । मीनाकं से चैत्र मास आरम्भ होता है और मेपाकं में वैशाख मास होता है । जब वर्ष आरम्भ होता है तब संक्रांति जिस दिन होती है उसके दूसरे दिन से बंगला की पहली तारीख ( तिथि ) गिनी जाती है । किसी महीने में २९, ३०, ३१ या कभी ३२ दिन पड़ जाते हैं ।
अंग्रेजी महिनों के नाम
क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास क्रम अंग्रेजी दिन चान्द्रमास
महीना
महीना
महीना
| १ जनवरी ३१ पूस | ५ मई ३१ वैशाख | ९ सितम्बर ३० भाद्रपद |
|---|---|---|
| २ फरवरी २८ माघ | ६ जून ३० ज्येष्ठ | १० अक्टूबर ३१ आश्विन |
| ३ मार्च ३१ फाल्गुन | ७ जुलाई ३१ आषाढ़ | ११ नवम्बर ३० कार्तिक |
| ४ अप्रैल ३० चैत्र | ८ अगस्त ३१ श्रावण | १२ दिसम्बर ३१ मार्गशीर्ष |
प्लुत वर्ष=Leap year जीप इयर=में फरवरी २९ दिन की होती है । जिस सन् में ४ का भाग पूरा लग जाय या सदी century में ४०० का भाग पूरा लग जावे तो उसे प्लुत वर्ष कहते हैं । शेष वर्षों में फरवरी २८ दिन की होती है ।
मुसलमानी महिनों के नाम अर्थात् हिजरी सन् के महीने
| १ मोहर्रम | ५ जमादि उल अब्बल | ९ रमजान |
|---|---|---|
| २ सफर | ६ जमादिउल आखर ( सानी ) | १० सव्वाल |
| ३ रबिउल अब्बल | ७ रज्जब | ११ जीकाद |
| ४ रबिउल आखर ( सानी ) | ८ सावान ( शववान ) | १२ जिल हिज्ज |
चाँद दिखने से महीना आरम्भ होता है और इनमें लौट का वष या अधिक मास नहीं होता । इस कारण प्रत्येक तीसरे वर्ष इनके महीनों से अन्तर पड़ता रहता है अर्थात् कभी मुहर्रम जाड़े में कभी बरसात में कभी गरमी में पड़ता है । मुहर्रम की १ तारीख से हिजरी सन् आरम्भ होता है और चाँद दिखने के दूसरे दिन महीने की पहली तारीख होती है । कभी २९ दिन कभी ३० दिन का महीना चन्द्र की तिथि की घटा बढ़ी के अनुसार होता है ।
फसली सन् में महीना प्रत्येक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होता है और रमजान महीना से नया सन् आरम्भ होता है । इसमें भी चन्द्र स्थिति के अनुसार कभी २९ कभी ३० दिन हो जाते हैं ।
सौर मास और संक्रांति
सूर्य जब १ राशि के अन्त में जाकर दूसरी राशि में संक्रमण करता है ( जाने लगता है ) तब उसे संक्रांति कहते हैं । अर्थात् जब २ राशियों की संधि पर सूर्य आता है तब आगे की राशि की संक्रांति होती है । इस प्रकार प्रत्येक सौर मास में एक संक्रांति होती है । जिस राशि पर सूर्य जाता है उस राशि की संक्रांति कहलाती है ।
७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जैसे धन का अन्त होने पर सूर्य मकरराशि में जाता है तो वह मकर-संक्रांति कहलावेगी। अर्थात् सूर्य ने मकर राशि में संक्रमण किया ऐसा कहेंगे।
मेष से तुला संक्रांति को विषुव संक्रांति कहते हैं।
कर्क से मकर संक्रांति को अयन संक्रांति कहते हैं।
अधिक मास
जिस चान्द्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती उसे अधिक मास कहते हैं। अर्थात् जब दो पक्ष में संक्रांति नहीं होती तो उसे अधिक मास कहते हैं। जैसे सम्बत् १९९९ में वैशाख कृष्ण १३ (ता० १३ अप्रैल) को मेष संक्रांति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण १४ को (ता० १४ मई) वृष की संक्रांति हुई। इसके उपरान्त फिर (ता० १४ जून) शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन राशि पर सूर्य गया अर्थात् मिथुन की संक्रांति हुई। वृषार्क शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की १४ तिथि को था, उसके बाद अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष और फिर अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष बीत गया, परन्तु इन दोनों के बीच संक्रांति नहीं हुई। इस कारण ये दोनों पक्ष अधिक मास माने गये। इसके पहिले का ज्येष्ठ कृष्ण शुद्ध माना गया और फिर उसके बाद जो अधिक २ पक्ष बड़े उनमें से १ का नाम अधिक ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पड़ा और उसके आगे फिर अधिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष माना गया। ये दोनों अधिक पक्ष व्यतीत हो जाने पर शुद्ध ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मिथुन की संक्रांति हुई। इससे वह शुद्ध ज्येष्ठ मास माना गया।
३२ मास १६ दिन ४ घड़ी बीतने पर अधिक मास होता है। अर्थात् तीसरे वर्ष अधिक मास होता है और उस वर्ष में १३ मास हो जाते हैं।
अधिक मास को मल्ल मास या पुष्पोत्सव मास कहते हैं। चन्द्र मास के गणित से वर्ष में ३५४ दिन ९ घंटे और सूर्य मास के वर्ष में ३६५ दिन ६ घंटे प्रायः होते हैं। इस कारण सूर्य और चन्द्र के दिनों का अन्तर अधिक मास होने से बराबर हो जाता है।
क्षय मास
जिस चान्द्र मास के २ पक्ष में २ संक्रांति होती है उसे क्षयमास कहते हैं। क्षय मास केवल कार्तिक आदि ३ महीनों में पड़ता है और महीनों में नहीं पड़ता। जिस वर्ष क्षय मास होता है उस वर्ष एक वर्ष के भीतर २ अधिक मास होते हैं।
यह कई वर्षों में पड़ता है। यदि भाद्रपद अधिकमास होगा तो सूर्य की गति अधिक होने से मार्ग शीर्ष में २ संक्रांति वाला क्षयमास होगा और सूर्य की गति अल्प हो जाने के कारण चैत्र मास भी अधिक होगा।
जिस सम्बत् में क्षयमास होता है उसके १४१ या १९ वर्ष उपरान्त पुनः क्षयमास होना सम्भव होता है अर्थात् कभी १४१ वर्ष में कभी १९ वर्ष में संभव होता है।
जैसे सम्बत् १७४ में क्षयमास होकर पुनः आगे सम्बत् (१७४ + १४१) = १११५ में और (१११५ + १४१) = १२५६ सम्बत् में क्षय मास होगा, इसी प्रकार आगे और भी जानें। शविष्य में सम्बत् २०२० में क्षय मास होगा।
पंचाङ्ग के अंग : ७१
( ७ ) पक्ष
चान्द्र मास में २ पक्ष—( पखवाड़ा या पंढरवाड़ा ) होते हैं। जब सूर्यास्त के उपरान्त कुछ समय तक अग्नेरी रात आ जाती है या सम्पूर्ण रात भर या रात के कुछ भाग तक ही सूर्यास्त के बाद अग्नेरा रहे उसे कृष्ण पक्ष कहते हैं। जब सूर्यास्त के उपरान्त कुछ समय या सम्पूर्ण रात भर चन्द्र का प्रकाश रात्रि को रहे तब उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं।
कृष्णपक्ष=वदी। शुक्ल पक्ष=शुद्ध या सुदी।
अध्याय १६
पंचाङ्ग के अंग
तिथि—यह पंचाङ्ग का प्रथम अंग है। पंचाङ्ग में पहिले तिथि ही दी रहती है। चान्द्र मास की तिथियाँ ३० होती हैं।
| १ प्रतिपदा (परिवा) | ५ पंचमी (पाँचें) | १० दशमी (दसें) | १४ चतुर्दशी (चौदस) |
|---|---|---|---|
| परमा या पांडुवा | ६ षष्ठ (छठें) | ११ एकादशी | १५ पूर्णिमा (पूनों) |
| २ द्वितीया (दोज) | ७ सप्तमी (सातें) | (ग्यारस) | ३० अमावस्या |
| ३ तृतीया (तीज) | ८ अष्टमी (आठें) | १२ द्वादशी (बारस) | (अमावस) |
| ४ चतुर्थी (चौथ) | ९ नवमी (नवें) | १३ त्रयोदशी (तेरस) | या अमावास्या |
तिथियाँ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से गिनी जाती हैं और १५ तिथि पूर्णिमा को होती है, इस कारण पूर्णिमा के स्थान में १५ तिथि लिखते हैं। इसके उपरान्त कृष्ण पक्ष की तिथियाँ आरम्भ होती हैं। वे भी प्रतिपदा से आरम्भ होकर अमावस्या तक गिनी जाती हैं। परन्तु अमावस्या को ३० वीं तिथि कहते हैं। अमावस्या के स्थान ३० तिथि लिखी जाती है। जहाँ ३० तिथि लिखी हो वहाँ अमावस्या समझें।
जिस दिन सूर्य और चन्द्र एक स्थान में आ जाते हैं तब अमावस्या होती है अर्थात् सूर्य के पास चन्द्र आ जाता है (अस्त हो जाता है) तब अमावस्या होती है। गणित करने से जिस समय सूर्य और चन्द्र का पूर्व पश्चिम अन्तर शून्य हो जाता है उसी समय अमावस्या तिथि होती है।
सूर्य की गति से चन्द्र की गति अधिक है। जब दोनों का अन्तर बढ़ने लगता है तो १ तिथि का आरम्भ होने लगता है। अर्थात् प्रतिपदा तिथि का आरम्भ होने लगता है, जब वह बढ़ते-बढ़ते बारह अंश का अन्तर हो जाता है तो प्रतिपदा तिथि पूरी हो जाती है। ३६०° एक चक्र में होते हैं—३० तिथि=१२=१ तिथि। अर्थात् सूर्य चन्द्र में जब १२° का अन्तर पड़ता है तो १ तिथि होती है।
७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
यह अन्तर ( अर्थात् १ तिथि ) मध्यम मान से ५९ घण्टा ३ पल का होता है। चान्द्रमास २९है दिन का होता है, जिसमें ३० तिथियाँ व्यतीत होती हैं। इस प्रकार १२ मास में ३५४ दिन हुए जिसमें ३६० तिथियाँ होती हैं अर्थात् तिथियों का क्रम वृद्धि आदि होकर ६ दिन कम हो जाते हैं।
चन्द्र गति कभी ६६ घंटी से घटते घटते ५० घंटी तक कम हो जाती है। जब तिथि का मान ६० घंटी से अधिक होता है तो वृद्धि तिथि और ६० घंटी से कम होता है तो क्षय तिथि होती है।
वृद्धि तिथि
जैसे सोमवार को ५८ घंटी तक द्वितीया है। १२ अंश अन्तर होने में चन्द्र की गति के अनुसार तृतीया पूर्ण होने को ६५ घंटी लगी। सोमवार को ५८ घंटी के उपरान्त द्वितीया व्यतीत होकर शेष में तृतीया रहेगी। फिर मंगलवार को सब दिन अर्थात् ६० घंटी तृतीया रही और बुध को सूर्योदय के अनन्तर ३ घंटी और तृतीया रही। इस प्रकार सोमवार, मंगलवार और बुधवार को मिलाकर ६५ घंटी तृतीया रही। इसके उपरान्त चतुर्थी आरम्भ हुई।
पंचांग में सोमवार को द्वितीया ५८ घंटी लिखा होगा। मंगल को और बुध को भी तृतीया लिखा रहेगा।
सूर्योदय के उपरान्त वह तिथि चाहें १ घंटी क्यों न हो, जो तिथि सूर्योदय पर होगी वही तिथि पंचांग में लिखी रहेगी। जैसे बुधवार को ३ घंटी तक तृतीया है तो भी उस दिन तृतीया ३ घंटी लिखी रहेगी। इससे समझ जाना चाहिए कि सूर्योदय के उपरान्त ३ घंटी तक तृतीया तिथि थी उसके उपरान्त चतुर्थी तिथि आरम्भ हुई।
इस प्रकार जब दो दिन एक ही तिथि पंचांग में लिखी देखो तो उसे वृद्धि तिथि जानो।
क्षय तिथि
मान लो सोमवार को सूर्योदय के अनन्तर २ घंटी दशमी है। पंचांग में उस दिन २ घंटी लिखा होगा। इसके बाद एकादशी तिथि मान लो ५५ घंटी रही फिर द्वादशी आरम्भ हुई, तो सोमवार को पूरे ६० घंटी में २ घंटी दशमी के गये, बचे ५८ घंटी। इसमें ५५ घंटी एकादशी के गये तो ३ घंटी द्वादशी के बचे तो उस दिन ३ घंटी ही द्वादशी रही। दूसरे दिन मंगलवार को भी शेष द्वादशी रहेगी ही। इस कारण मंगलवार को द्वादशी तिथि पंचांग में लिखी मिलेगी। परन्तु एकादशी तिथि पंचांग में लिखी हुई न मिलेगी। परन्तु ऊपर बताई रीति से जान सकते हो कि ग्यारस कब से कब तक रही। ऐसा नहीं समझना कि पंचांग में ग्यारस नहीं लिखा तो ग्यारस है ही नहीं। सूर्योदय पर जो तिथि किसी भी दिन पंचांग में नहीं बताई गई वह क्षय तिथि समझना।
पंचाङ्ग के अंग : ७३
पूणिमा और अमावस्या के नाम
| तिथि | चतुर्दशी मिश्रित | प्रतिपदा मिश्रित |
|---|---|---|
| अमावस्या ३० | सिनी | कुह |
| पूणिमा १५ | अनुमति | राका |
( २ ) वार ( दिन ) Day
यह पंचांग का दूसरा अंग है। पंचांग में तिथि के पास वार दिया रहता है। वार ७ हैं।
| क्रम | वार नाम | फारसी नाम | अंग्रेजी नाम |
|---|---|---|---|
| १ | रविवार—सूर्यवार | ||
| (इतवार) | आदित्यवार | एक संवा | |
| Sunday | |||
| २ | चन्द्रवार | ||
| (सोमवार) | दुसंवा (पीर) | Monday | |
| ३ | भोमवार | ||
| (मंगलवार) | शिशंवा | Tuesday | |
| ४ | बुधवार | चहार संवा | Wednesday |
| ५ | गुरुवार | ||
| (बृहस्पतिवार) | पंच संवा (जुमेरात) | Thursday | |
| ६ | शुक्रवार | ||
| (शुक्रवार) | जुमा | Friday | |
| ७ | शनिवार | ||
| (शनीचर) | संवा | Saturday |
ये दिन के नाम ग्रहों के उमर से पड़े हैं। जिस ग्रह का होरा प्रातः काल होता है उसी ग्रह के नाम से उस दिन का नाम पड़ता है। पृथ्वी भर में सर्वत्र इसी क्रम से ही दिन माने जाते हैं और ७ दिन होते हैं।
ग्रहों का होरा
आकाश में पृथ्वी से अधिक दूरी के क्रम से— इस प्रकार ग्रहों की स्थिति है— (१) शनि, (२) गुरु, (३) मंगल, (४) रवि, (५) शुक्र, (६) बुध, (७) चन्द्र। अर्थात् पृथ्वी से सबसे पास चन्द्र हैं फिर उससे कुछ दूर बुध, फिर शुक्र, फिर रवि, मंगल, गुरु और शनि क्रम से एक दूसरा ग्रह अधिक दूरी पर है। होरा के विचार में उपर्युक्त ग्रहों का क्रम जिसमें आदि शनि है लिया है, क्योंकि पृथ्वी से शनि सबसे अधिक दूरी पर है चित्र सं० ४ देखें।
१होरा एक घंटे का होता है इस कारण होरा (Hour) को घंटा भी कहते हैं। दिन रात में २४ घंटा होते हैं। इस प्रकार दिन रात में २४ होरा हुए। ७ ग्रहों का प्रभाव क्रमशः एक २ होरा में होता है—२४ होरा ÷ ७ ग्रह=३.३३। अर्थात् २४ घंटा में ७ ग्रह के पूरे ३ चक्कर होकर शेष ३ होरा (घंटे) बच रहते हैं, जिसमें प्रति ग्रह १ घंटा के हिसाब से ३ ग्रह और भोग सकते हैं। इस प्रकार ३ ग्रह और भोग चुकते हैं। इस प्रकार ( २४ घण्टे ) पूरे होने पर चौथे ग्रह के होरा में दूसरे दिन का आरम्भ होता है।
जैसे प्रातः शनि का होरा या शनि से दूसरा गुरु, तीसरा मंगल का होरा, शनिवार के २४ घंटा में व्यतीत हो गये। अब दूसरे दिन प्रातः काल चौथा ग्रह ( शनि से
७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
चौथा रवि है) रवि का होरा आया। उस दिन प्रातः काल रवि का होरा था, इस कारण उस दिन का नाम रविवार पड़ा।
इसके बाद रवि से चौथा चन्द्र है। इसमें रविवार के दिन भर के बाद दूसरे दिन प्रातः चन्द्र का होरा आया, इसलिए उस दिन का नाम चन्द्रवार ( सोमवार )होगा। अब सोमवार के बाद चौथा ग्रह ( १ चन्द्र, २ शनि, ३ गुरु ) चौथा मंगल हुआ तो दूसरे दिन प्रातः काल मंगल का होरा होने से मंगलवार दिन का नाम पड़ा। मंगल से चौथा ग्रह ( १ मंगल, २ रवि, ३ शुक्र और चौथा ) बुध हैं तो दूसरे दिन बुधवार होगा। इसी प्रकार बुध से चौथा गुरु है, गुरु से चौथा शुक्र है, शुक्र से चौथा शनि है। इस क्रम से प्रातः काल जिस ग्रह का होरा होता है उसी ग्रह के नाम से वार का नाम पड़ता है।
इष्ट घड़ी के घंटा बना लो, उसमें ७ का भाग दो जो शेष बचे उतनी संख्या उस दिन के प्रातः समय के होरा से, उस दिन को १ गिनते हुए शेष संख्या तक गिनो, जिस ग्रह का होरा आवे उस समय वही होरा होगा ऐसा जानना।
जैसे २५ घड़ी दिन चढ़े पर कौन होरा होगा देखना है। २५ घड़ी=१० घंटा। उस दिन मानो मंगलवार था तो १० में ७ का भाग दिया शेष ३ बचा, मंगल का दिन था। इससे मंगल से गिनो तो (१) मंगल, (२) रवि, (३) तीसरा शुक्र आया। इस कारण उस समय शुक्र का होरा होगा ऐसा जानना।
नीचे दिए हुए चक्र से प्रगट होगा कि सूर्योदय के उपरान्त इष्ट घड़ी पर किस दिन कौन होरा होगा। घड़ी पल में समय दिया हो तो घड़ी पल में (घंटा बनाने को) ६ का गुणा कर ७ का भाग दो शेष जो बचे वही होरा होगा
इष्ट घड़ी ४६÷७=शेष ग्रह का होरा जैसे इष्ट घड़ी ४० है गुरुवार का दिन है ४०×२÷७=१६÷७=शेष २, दिन गुरुवार था तो गुरु से २ गिना। १ गुरु २ मंगल आया इस कारण उस समय मंगल का होरा हुआ। इसी के अनुसार नीचे चक्र से इष्ट घड़ी का होरा जान सकते हो। यदि समय घंटा में हो तो इसी चक्र से घंटा के अनुसार भी होरा जान सकते हो।
होरा चक्र
| किस घड़ी तक | रवि चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि | घंटा तक |
|---|---|---|
| वार | वार | वार |
| २१। २० ३७। ५ | सूर्य | चंद्र |
| ५ २२। ४० ४७। | शुक्र | शनि |
| ७। २५ ४२। ६० | बुध | गुरु |
| १० २७। ४५ | ० | चंद्र |
| १२। ३० ४७। | ० | शनि |
| १५ ३२। ५० | ० | गुरु |
| १७। ३५ ५२। | ० | मंगल |
पंचाङ्ग के अंग : ७५
यहाँ दिया घंटा का समय सूर्योदय से लेना अर्थात् घड़ी के समय में सूर्योदय घटा कर लेना।
इस चक्र से प्रगट होगा कि शनि, गुरु, मंगल, रवि, शुक्र, बुध, चन्द्र इस क्रम से ग्रह का होरा होता है। रविवार को रवि, शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरु, मंगल का दिन रात में ३ बार पूरा चक्र होकर शेष रात्रि में ३ और ग्रह का होरा बुध का होरा तक होता है। बुध के बाद चन्द्र है इस कारण दूसरे दिन प्रातः चन्द्र का होरा होने से दूसरे दिन का नाम चन्द्रवार पड़ा। इसी प्रकार और यहाँ के सम्बन्ध में जानना।
(३) नक्षत्र
यह पंचांग का तीसरा अंग है।
नक्षत्र २७ हैं और अभिजित मिलाकर २८ नक्षत्र होते हैं, परन्तु पंचांग में २७ ही नक्षत्र दिए रहते हैं।
क्रांति प्रदेश के २७ समान भाग करने से प्रत्येक भाग १३°-२०' का, १ नक्षत्र होता है। इस कारण चन्द्रमा को १३°-२०' चलने में जो समय लगता है उसे नक्षत्र या दिन नक्षत्र कहते हैं। यहाँ नक्षत्र से चन्द्र नक्षत्र जानना।
मध्यम मान से चन्द्र नक्षत्र ६० व ४३ पल का होता है। कभी कभी इससे कम या अधिक का मान हो जाता है। इसी २४ नक्षत्र मिल कर चन्द्र की १ राशि होती है। प्रत्येक पंचांग में नक्षत्र के अतिरिक्त चन्द्र किस राशि में है यह भी दिया रहता है।
जिस प्रकार चन्द्र इन २७ नक्षत्रों पर से चलता है उसी प्रकार सूर्यादि ग्रह भी इन्हीं नक्षत्रों पर से चलते हैं। जिस प्रकार चन्द्र एक नक्षत्र एक दिन में चल लेता है उसी प्रकार सूर्य १३ या १४ दिन में एक नक्षत्र को पार कर करता है, ये सूर्य नक्षत्र कहलाते हैं। जब आद्री पर सूर्य आता है तो वर्षा ऋतु का आरम्भ समझा जाता है। खेती के सम्बन्ध से किसान इन नक्षत्रों पर विशेष ध्यान देते हैं। सूर्य नक्षत्र को महानक्षत्र भी कहते हैं।
जिस दिन जिस नक्षत्र पर सूर्य जाता है वह पंचाङ्ग में लिखा रहता है। जैसे आद्रीक=आद्री+अर्क (सूर्य)=अर्थात् आद्री नक्षत्र पर उस दिन सूर्य गया। किस घड़ी पल पर उस नक्षत्र में प्रवेश किया वह भी दिया रहता है।
इसी प्रकार बुध, मंगल, गुरु आदि ग्रह भी किसी नक्षत्र पर पहुँचते हैं तो उस नक्षत्र पर पहुँचने का दिन समय आदि भी पंचाङ्ग में दिया रहता है। उस नक्षत्र के किस चरण में वह ग्रह आया है यह भी दिया रहता है।
ऊपर सूर्य का जो सोर नक्षत्र बताया है, उसके अतिरिक्त पंचाङ्ग में सायन सूर्य किस नक्षत्र पर आया है वह भी दिया रहता है। कौन ग्रह किस राशि में है पंचाङ्ग
७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
में दिये रहते हैं। किसी पंचाङ्ग में दैनिक, किसी में साप्ताहिक दिये रहते हैं। २३ नक्षत्र की एक राशि होती है, इससे नक्षत्रों के प्रमाण से ग्रहों की राशि भी निकल जाती है। पंचाङ्ग में स्पष्ट ग्रह के अतिरिक्त कुण्डली चक्र भी दिए रहते हैं। इस प्रकार ग्रहों के सम्बन्ध की प्रत्येक सूचनाएँ पंचाङ्ग में दी रहती है।
(४) योग
यह पंचाङ्ग का चौथा अंग है।
योग २७ है। चन्द्र और सूर्य की गति में जब १३°-२०" का अन्तर पड़ता है तब एक योग होता है। ३६०° ÷ २७ = १३°-२०" = १ (योग) परन्तु नक्षत्र के प्रमाण से इन थोड़ी का आकाश की स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है। योग केवल सूर्य चन्द्र का अन्तर बतलाते हैं।
२७ योगों के नाम
| १ विष्कम्भ | ८ धृति | १५ वज्र | २२ साध्य |
|---|---|---|---|
| २ प्रीति | ९ शूल | १६ सिद्धि | २३ शुभ |
| ३ आयुष्मान | १० गंड | १७ व्यतीपात | २४ शुक्ल |
| ४ सोभाय | ११ वृद्धि | १८ वरीयान | २५ ब्रह्म |
| ५ शोभन | १२ ध्रुव | १९ परिच | २६ ऐन्द्र |
| ६ अतिगंड | १३ व्याघात | २० शिव | २७ वैधृति |
| ७ सुकर्मा ( सुकर्म ) | १४ हर्षण | २१ सिद्ध |
(५) करण
यह पंचाङ्ग का पाँचवा अंग है।
करण यह तिथि का आधा भाग है ( १ ) तिथि के पूर्वार्द्ध अर्थात् पहिले आधे भाग में एक करण और उत्तरार्द्ध ( अन्त के आधे भाग में ) दूसरा करण होता है। इस प्रकार १ तिथि में २ करण होते हैं।
१ चान्द्रमास में ३० तिथि और ६० करण होते हैं। सूर्य और चन्द्र के बीच ६° का अन्तर पड़ने पर १ करण होता है। करण कुल ११ है उनके नाम ये हैं।
चर करण—( १ ) वव, ( २ ) बालव, ( ३ ) कौलव, ( ४ ) तैतिल, ( ५ ) गर, ( ६ ) वणिज, ( ७ ) विष्टि।
स्थिर करण—( ८ ) शकुनि, ( ९ ) चतुष्पद, ( १० ) नाग, ( ११ ) किस्तुन। पूर्वार्द्ध=पूर्व दल ( पहिला आधा भाग ) उत्तरार्द्ध=परदल ( अन्त का आधा भाग )।
पंचाङ्ग के अंग : ७७
किस करण में कौन-कौन तिथि होती है नीचे चक्र में दिया है
पक्ष | करण | किस्तुल | बव | वालव | कौलव | तैतिल | गरल | वणिज | विष्टि | शकुनि | चतुष्यद | नाग | ---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|--- शुक्ल पक्षापूर्वदश | | १ | ५,१२ | २,९ | ६,१३ | ३,१० | ७,४ | ४,११ | ८,१५ | ० | ० | ० | की तिथि उत्तर,, | ० | १,८,१५ | ५,१२ | २,९ | ६,१३ | ३,१० | ७,१४ | ४,११ | ० | ० | ० | | कृष्ण पक्षापूर्व,, | ० | ४,११ | १,८ | ५,१२ | २,९ | ६,१३ | ३,१० | ७,१४ | ० | ३० | ० | | की तिथि उत्तर,, | ० | ७ | ४,११ | १,८ | ५,१२ | २,९ | ६,१३ | ३,१० | १४ | ० | ३० | | तिथियाँ
चक्र में जो अच्छा दिष्ट है ये तिथियों के अच्छे हैं। १५ से पूर्णिमा, ३० से अमावस्या समझना। ऊपर के चक्र से प्रगट होगा कि शुक्ल प्रतिपदा को पहिले किस्तुल फिर बव करण होता है। शुक्ल द्वितीया को वालव फिर कौलव होता है। १५ पूर्णिमा को पहिले चतुष्यद फिर नाग होता है।
इसी को अच्छे प्रकार से समझाने के लिए किस तिथि में कौन करण होता है यह तिथि के अनुसार करण नीचे दिए हैं।
शुक्ल तिथि १ २-९ ३-१० ४-११ ५-१२ ६-१३ ७-१४ ८-१५ X X पूर्व दल किस्तुल वालव तैतिल वणिज बव कौलव गरल विष्टि विष्टि चतुष्यद पर दल बव कौलव गरल विष्टि वालव तैतिल वणिज बव शकुनि नाग कृष्ण तिथि X १-८ २-९ ३-१० ४-११ ५-१२ ६-१३ ७ १४ ३०
भद्रा—विष्टि करण का दूसरा नाम है, जो शुभ कार्यों में अनिष्ट कारक होती है। यह केवल मूहूर्त आदि में विचारणीय है।
पंचाङ्ग में किसी तिथि के पूर्वार्द्ध में जो करण होता है प्रायः वही किस समय तक रहेगा दिया रहता है। इसके बाद जो दूसरा करण आना चाहिए वह नहीं दिया रहता। इस चक्र से समझ में आ जावेगा कि किस तिथि के उत्तरार्द्ध में कौन करण होगा।
दिनमान—सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन की अवधि को दिनमान कहते हैं। इससे प्रगट होता है कि दिन कितने घड़ी पल तक है। अर्थात् दिन कितने घड़ी पल लम्बा है।
दिन रात में ६० घड़ी होती है—( ६० घटी—विनमान )—रात्रिमान।
प्रतिदिन विनमान घटता-बढ़ता रहता है। २१ मार्च से प्रतिदिन बढ़ते-बढ़ते ता० २१ जून को सबसे बड़ा दिन होता है। उसके उपरान्त घटना आरम्भ होता है। इसको पहिले समझा चुके हैं।
७८ : सचित्र ज्योतिष शिखा. प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
अक्षांश के अनुसार भी प्रत्येक स्थान में दिन छोटा बड़ा होता है। इसके विषय में भी यहाँ कुछ बतला देना है।
जब सूर्य उत्तर गोल में होता है तब पृथ्वी के ध्रुव प्रदेश में ६ मास तक बराबर सूर्य दिखलाई देता है। उस समय दक्षिण ध्रुव पर ६ मास बराबर अन्धकार रहता है। जब सूर्य दक्षिण गोल में होता है तो इसके विरुद्ध होता है अर्थात् दक्षिण ध्रुव में ६ महीने का दिन और उत्तर ध्रुव में ६ महीने की रात्रि रहती है।
उत्तर और दक्षिण ध्रुव के बीच में दोनों ध्रुवों से बराबर १०° पर पृथ्वी की मध्य रेखा होती है। मध्य रेखा के स्थान को निरक्ष देश भी कहते हैं, क्योंकि वहाँ पर अक्षांश शून्य होता है। निरक्ष देश में १२ घंटे का दिन और १२ घंटे की रात्रि होती है। मध्यरेखा से अक्षांशों की दूरी के अनुसार परम दिन रात्रि में अन्तर पड़ता है। मध्य रेखा से ६६° उत्तर के देश में सबसे बड़ा दिन २४ घण्टे का और ७०° पर सबसे बड़ा दिन २ मास का, ७८° पर ४ मास का और ९०° पर ( ध्रुव देश में ) परम दिन (सबसे बड़ा दिन) ६ मास का होता है। दूसरी ओर दक्षिण गोल में ठीक इसके विरुद्ध होता है अर्थात् जब उत्तर गोल में सबसे बड़ा दिन, जिस मान का होगा तो दक्षिण गोल में उसी मान की सबसे बड़ी रात्रि होगी।
सायन सूर्य भेष पर जब आता है तब दिन रात्रि बराबर होती है। जब सूर्य सायन कर्क पर आता है तो सबसे बड़ा दिन और सबसे छोटी रात्रि होती है। जब सूर्य सायन तुला पर जाता है तब फिर दिन रात्रि बराबर होती है, जब सायन मकर पर आता है तो सबसे बड़ी रात्रि और सबसे छोटा दिन होता है। यह उत्तर गोल में होता है और दक्षिण गोल में इसके विपरीत होता है।
अंशों के अनुसार देशों का परम दिन का प्रमाण छोटा बड़ा होता है। ज्यों-ज्यों अक्षांश बढ़ता जायगा महा दिन ( परम दिन ) का प्रमाण बढ़ता जायगा। महादिन का प्रमाण अक्षांशों के अनुसार नीचे चक्र में दिया है।
अक्षांश के अनुसार महादिन चक्र
| लघु | अक्षांश | परम दिन- | लघु | अक्षांश | परम दिन- |
|---|---|---|---|---|---|
| शू से | तक | मान | शू से | तक | मान |
| मेखला अंश | कला अंश | कला घं० मि० | मेखला अंश | कला अंश | कला घं० मि० |
| १ | १ | ० | ८ | ३४ | १२ |
| २ | ८ | ३४ | १६ | ४४ | १३ |
| ३ | १६ | ४४ | २४ | १२ | १३ |
| ४ | २४ | १२ | ३० | ४८ | १४ |
| ५ | ३० | ४८ | ३६ | ३१ | १४ |
| ६ | ३६ | ३१ | ४१ | २४ | १५ |
| ७ | ४१ | २४ | ४५ | ३२ | १५ |
| ८ | ४५ | ३२ | ४९ | २ | १६ |
अध्याय १७ : ७९
| ९ | ४९ | २ | ५१ | ५९ | १६ | ३० | २४ | ६६ | २९ | ६६ | ३२ | २४ | ० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १० | ५१ | ५९ | ५४ | ३० | १७ | ० | २४ | ६६ | ३२ | ६७ | १८ | १ | महीना |
| ११ | ५४ | ३० | ५६ | ३८ | १७ | ३० | २६ | ६७ | १८ | ६९ | ३३ | २ | " |
| १२ | ५६ | ३८ | ५८ | २७ | १८ | ० | २७ | ६९ | ३३ | ७३ | ५ | ३ | " |
| १३ | ५८ | २७ | ७९ | ५९ | १८ | ३० | २८ | ७३ | ५ | ७७ | ४० | ४ | " |
| १४ | ५९ | ५९ | ६१ | १८ | १९ | ० | २९ | ७७ | ४० | ८२ | ५९ | ५ | " |
| १५ | ६१ | १८ | ६२ | २६ | १९ | ३० | ३० | ८२ | ५९ | ९० | ० | ६ | " |
अध्याय १७
पंचाङ्ग में मुहूर्त आदि के सम्बन्ध से इतर विषय भी दिये रहते हैं उनके सम्बन्ध में संक्षिप्त ज्ञान यहाँ कराया जाता है।
पंचाङ्ग में सिद्ध योग ऋकच योग आदि दिये रहते हैं वे सब मुहूर्त से सम्बन्ध रखते हैं। मुहूर्त का स्वतंत्र विषय है यहाँ तो बहुत ही संक्षेप में आवश्यक बातें दी जाती हैं, जिनका उल्लेख कभी पंचांग में आता है तो नया विद्यार्थी विचार में पड़ जाता है कि ये क्या है, इस कारण यहाँ समझाया जाता है।
पंचक
जब चन्द्र कुंभ और मीन राशियों में होता है तो पंचक होता है। अर्थात् जब धनिष्ठा नक्षत्र का उत्तराद ( अन्त का आधा भाग ) और शतभिषा, पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती नक्षत्र पर चन्द्र होता है तो पंचक कहलाता है।
इस पंचक में काम करने का फल पचगुना होता है अर्थात् पचगुनी हानि होती है। घर छाना, प्रेत दाह, घास लकड़ी आदि इकज करना, खाट बुनना, चूल्हा बनाना आदि कार्य पंचक में करना मना है, क्योंकि कहा जाता है कि पंचक में कोई काम करने से पाँच बार बड़ी काम करना पड़ेगा। आवश्यक कार्य प्रेत दाह आदि करना होता है तो उसका फल कम करने को-पूथक विधान बताया गया है। दक्षिण यात्रा में भी यह वर्जित है।
द्विपुष्कर और त्रिपुष्कर योग
मृत्यु, विनाश, वृद्धि आदि का फल इसमें दुगुना या त्रिगुना होता है जैसे त्रिपुष्कर में कोई वस्तु घूमें तो ३ वस्तु घूमेंगी। द्विपुष्कर में कोई हानि हो तो २ बार हानि होगी। इसी प्रकार सबका विचार होता है। अर्थात् द्विपुष्कर में हानि या लाभ दुगुना और त्रिपुष्कर में त्रिगुना होता है।
६०
८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
| द्विपुष्कर योग | त्रिपुष्कर योग |
|---|---|
| तिथि | वार |
| २ | शनिवार |
| ७ | मंगलवार |
| १२ | रविवार |
| कृतिका, उत्तराषाढ़ा योग होते हैं । |
मुहूर्त—दिनमान—१५=१ मुहूर्त
मुहूर्त लगभग २ घड़ी का होता है। दिनमान के प्रमाण से उसका १५ वां भाग करना तब एक मुहूर्त होता है। दिनमान के प्रमाण से मुहूर्त २ घड़ी से कम या अधिक भी हो जाता है। दिन में १५, रात में १५, सब ३० मुहूर्त दिन रात में होते हैं।
मुहूर्त चक्र
| वार | रविवार | चंद्रवार | भौमवार | बुधवार | गुरुवार | शुक्रवार | शनिवार |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कुलिक ( दुर्गुहूर्त ) | १४ वां | १२ | १० | ८ | ६ | ४ | २ |
| कालवेला | ८ | ६ | ४ | २ | १४ | १२ | १० |
| यमघंट | १० | ८ | ६ | ४ | २ | १४ | १२ |
| कंटक | ६ | ४ | २ | १४ | १२ | १० | ८ |
| यमाई | ७ | ९ | ३ | ९ | १५ | ५ | १ |
जैसे रविवार को १४ वां मुहूर्त कुलिक है, ८ वां मुहूर्त कालवेला है, १० वां यमघंट है इत्यादि इस चक्र के अनुसार जानो। इस चक्र में यह बताया है, कौन वार को गिनती में कौन से मुहूर्त का क्या नाम है।
मुहूर्त निकालना ।
| वर्तमान वार से शनि तक गिनो | २२=कुलिक | } यं मुहूर्त शुभकार्य में वजित हैं । |
|---|---|---|
| " | बुधवार | " |
| " | गुरुवार | " |
| " | मंगल | " |
जैसे रविवार हैं शनिवार तक गिना=७ X २=१४ वां मुहूर्त कुलिक हुआ ।
कालवेला में यात्रा करने से मृत्यु, विवाह में स्त्री विधवा हो, व्रतबन्ध में यह योग हो तो ब्रह्महत्या होती है। इससे सब कार्यों में कालवेला वजित है।
यमाई—वारवेला
दिन में ४ प्रहर होते हैं। १ प्रहर=लगभग ८ घड़ी का होता है।
यमाई=३ प्रहर=४ घड़ी
दिनमान—८=यमाई घटी दिन की
रात्रिमान—८= , रात्रि की
दिन मान कभी-कभी २, १६ घटी का होता है। इस कारण उपरोक्त विचार में यमाई ४ घटी का बताया है परन्तु दिन मान के ठीक विभाग करने से दिनमान की
अध्याय १७ : ८१
और रात्रिमान से रात्रि की यमाई की घटी निकल आती है। दिन रात में सब मिलाकर ८ यमाई होते हैं। यमाई को ही बारबेला कहते हैं। इसमें दिन और रात का पृथक् २ चौषडिया दिया रहता है और उस चौषडिया का नाम भी दिया रहता है। उसका फल नाम सद्रूष होता है। नीचे चौषडिया दिया है उसमें चौषडिया का नाम संकेताक्षर में दिया है वे ये हैं।
च=वर अ=अमृत शु=शुभ उ=उद्देश्य ला=लाभ का=काल रो=रोग ।
ये ७ ही हैं नाम सद्रूष इनका फल होता है। दिन में ७ यमाई होते हैं फिर आठवें यमाई में वही पहिला मुहूर्त आता है। इस प्रकार आगे क्रमानुसार सब मुहूर्त होते हैं।
दिन का चौषडिया
| रवि | चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
|---|---|---|---|---|---|---|
| वार | वार | वार | वार | वार | वार | वार |
| उ | अ | रो | ला | शु | च | का |
| च | का | उ | अ | रो | ला | शु |
| ला | शु | च | का | उ | अ | रो |
| अ | रो | ला | शु | च | का | उ |
| का | उ | अ | रो | ला | शु | च |
| शु | च | का | उ | अ | रो | ला |
| रो | ला | शु | च | का | उ | अ |
| उ | अ | रो | ला | शु | च | का |
रात का चौषडिया
| रवि | चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
|---|---|---|---|---|---|---|
| वार | वार | वार | वार | वार | वार | वार |
| च | का | उ | अ | रो | ला | शु |
| ला | शु | च | का | उ | अ | रो |
| अ | रो | ला | शु | च | का | उ |
| का | उ | अ | रो | ला | शु | च |
| शु | च | का | उ | अ | रो | ला |
| रो | ला | शु | च | का | उ | अ |
| उ | अ | रो | ला | शु | च | का |
| च | का | उ | अ | रो | ला | शु |
६
८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
इतवार के दिन को पहिले यमाई में उद्देश्य, दूसरे में चर, तीसरे में लाभ इत्यादि क्रमानुसार मुहूर्त यमाई में शोभते हैं। जैसे मंगलवार को दिनमान २९ घ.-२० प. है \div ८ = १ यमाई ३ घ. ४० प. का हुआ। मान लो इष्ट ८ घड़ी है तो ७-२० तक २ यमाई पूरे होकर तीसरा यमाई वर्तमान है। मंगलवार को तीसरा=च=चर मुहूर्त हुआ। इसी प्रकार मुहूर्त निकाल लेना।
राहु वारवैला और कालवैला
यमाई पर से और भी विचार
| वार | रवि वार | सोम वार | मंगल वार | बुध वार | गुरु वार | शुक्र वार | शनि वार |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यमाई-राहु का वारवैला | ४ चौथा | ७ | २ | ५ | ८ | ३ | ६ |
| दिन का कालवैला | ५ वां | २ | ६ | ३ | ७ | ४ | १-८ |
| रात्रि ,, ,, | ६ छठवां | ४ | २ | ७ | ५ | ३ | १-८ |
यहाँ बताया है कि किस दिन के कौन से यमाई में राहु का वारवैला होता है और दिन के या रात्रि के कौन से यमाई को कालवैला कहते हैं।
नक्षत्र विषघटी
४-४ घटी की विषघटी होती है।
नीचे नक्षत्रों के आगे विषघटी दी है उससे ४ घटी आगे तक विषघटी रहती है।
नक्षत्र विषघटी चक्र
| क्रम नक्षत्र | घटी | क्रम नक्षत्र | घटी | क्रम नक्षत्र | घटी | क्रम नक्षत्र | घटी |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ अश्विनी | ५० | ८ पुष्य | २० | १५ स्वाती | १४ | २२ श्रवण | १० |
| २ भरणी | २४ | ९ आश्लेषा | ३२ | १६ विशाखा | १४ | २३ धनिष्ठा | १० |
| ३ कृत्तिका | ३० | १० मघा | ३० | १७ अनुराधा | १० | २४ शतभिषा | १८ |
| ४ रोहिणी | ४० | ११ पू. फा. | २० | १८ ज्येष्ठा | १४ | २५ पू. भा. | १६ |
| ५ मृगशिर | १४ | १२ उ. फा. | १८ | १९ मूल | ५६ | २६ उ. भा. | २४ |
| ६ आर्द्रा | २१ | १३ हस्त | २१ | २० पू. वा. | २४ | २७ रेवती | ३० |
| ७ पुनर्वसु | ३० | १४ चित्रा | २० | २१ उ. वा. | २० |
जैसे अश्विनी नक्षत्र में ५० घड़ी उपरांत ४५ घड़ी तक या रेवती में ३० घड़ी उपरांत ३४ घड़ी तक उस नक्षत्र में विषघटी होती है। इसका विचार नक्षत्र की घटियों पर से करना। नक्षत्र जब से आरम्भ हो उसके बाद ये घटियाँ गिन कर विष घटी निकाल लेना।
अध्याय १७ : ८३
वार विषष्टी
| वार | सूर्यवार | चन्द्रवार | मंगलवार | बुधवार | गुहवार | शुक्रवार | शनिवार |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घटी | २० | २ | १२ | १० | ७ | ५ | २५ |
तिथि विषष्टी
| तिथि | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घटी | १५ | ५ | ८ | ७ | ७ | ११ | ४ | ८ | ७ | ११ | ३ | १३ | १४ | ७ | ८ |
विषष्टी नक्षत्र वार या तिथि में पूरी ४ घड़ी तक रहती है। ये शुभ कार्यों में वजित है।
यदि नक्षत्र आदि में पूरा ६० घटी का मान न हो तो अनुपात से (त्रैराशिक से) घटी निकाल लेनी चाहिये और तिथि या वार नक्षत्र आरम्भ होने के बाद इतनी घटी ( जो विषष्टी में बताई है ) गिनो, उसके आगे ४ घटी तक और विषष्टी रहेगी।
विषष्टी दोष नाश—यदि चंद्र केन्द्र या त्रिकोण में बली हो या लगनेश शुभ ग्रह युक्त हो तो विषष्टी का दोष नहीं लगता।
गंड
राशि चक्र में किसी राशि के साथ किसी नक्षत्र का भी अन्त होता हो तो उस स्थान को गंड कहते हैं अर्थात् जहाँ दोनों का अंत हो ( केवल १ का नहीं )।
जैसे—(१) मेष राशि के आरम्भ और मीन राशि के अन्त का सन्धि स्थल—गंड है।
(२) कर्क राशि और आश्लेषा के अन्त पर व सिंह राशि और मघा के प्रारम्भ में।
(३) वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा के अन्त पर व धन राशि और मूल के आरम्भ
में। इन तीनों गंड का नाम १ संघ्या गंड, २ राशि गंड, ३ दिवा गंड।
गंडांत [ नक्षत्र ]
| नक्षत्र | मघा, आश्लेषा | मूल, ज्येष्ठा | अश्विनी और रेवती |
|---|---|---|---|
| घटी | २+२=४ घटी | २+२=४ घटी | २+२=४ घटी |
इन नक्षत्रों के आदि की २ घटी और अन्त की २ घटी इस प्रकार ४ घटी का एक [ प्रत्येक ] गंडांत होता है।
मूल—जन्म समय में मूल लगे हैं या नहीं इसका विचार।
ऊपर जो ६ नक्षत्र गंडांत के बताये गये हैं उन्हीं में मूल लगते हैं। वे नक्षत्र ये हैं १ आश्लेषा, २ मघा, ३ ज्येष्ठा, ४ मूल, ५ रेवती, ६ अश्विनी।
इन नक्षत्रों में बालक का जन्म होने से मूल लगता है। मूल भी यदि प्रकार के हैं। गंडांत में बालक का जन्म हो तो पिता को कुछ समय तक बालक का मुख न
८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
देखना चाहिये। जब मूल की शान्ति करने का समय हो जावे तब शान्ति कराकर मुख देखने का विधान है। इसका विचार फलित और मूहूर्त खण्ड में विशेष प्रकार से मिलेगा।
भद्रा
विशिष्ट करण को भद्रा कहते हैं यह शुभ कार्य में वर्जित है। विष, घात, तान्त्रिक कार्य में भद्रा में कार्य करने का विचार होता है। युद्ध, राजदर्शन, दैव बुलाना, जल तरना, शत्रु उच्चाटन, स्त्री सेवन, यज्ञ कार्य में इसका विचार करना पड़ता है।
इन तिथियों में भद्रा होती है—
| पक्ष | शुक्ल पक्ष | कृष्णपक्ष |
|---|---|---|
| तिथि | ८, १५ | ४, ८ |
| पूर्वाह्न | पराह्न |
तिथि के आधे भाग में ही भद्रा होती है। इसका मोटा प्रमाण ३० घटी का होता है। भद्रा के आरम्भ और अन्त समय [ घटी पल ] पंचाङ्ग में दिया रहता है।
अंग में भद्रा का वास इस प्रकार समझा जाता है।
| अंग | मुख | कंठ | छाती | नाभि | कटि | पुच्छ |
|---|---|---|---|---|---|---|
| घटी | ५ | १ | ११ | ४ | ६ | ३ |
| फल | कार्यनाश | सरण | धननाश | बुद्धिनाश | कलह | विजय |
वृश्चिकी भद्रा=शुल्क पक्ष की भद्रा=कोई रात्रि की भद्रा को ही वृश्चिकी कहते हैं।
सर्पिणी " =कृष्ण " = ' दिन " " सर्पिणी "
आवश्यक कार्य में सर्प का मुख और वृश्चिक की पूँछ का एक भाग त्याग कर कार्य कर सकते हैं।
चन्द्र की राशि के अनुसार भद्रा का वास
| चन्द्रराशि | लोक | फल | विशेष |
|---|---|---|---|
| १, २, ३, ८, | स्वर्ग | शुभ | धन धान्य मिले |
| ६, ७, ९, १० | पाताल | शुभ | धन प्राप्ति |
| ४, ५, ११, १२, | मृत्यु | अशुभ | कार्य सिद्ध नहीं हो। |