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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

अध्याय १०

आकाशीय कल्पित रेखाओं का स्पष्टीकरण

जिस प्रकार अक्षांश और देशान्तर से पृथ्वी के किसी स्थान को ठीक स्थिति प्रकट की जाती है उसी प्रकार आकाशीय तारागण आदि की स्थिति ठीक प्रकार से प्रकट करने के लिए आकाशीय अक्षांश और विषुवांश या रेखांश भी होते हैं। आगे इन्हीं को समझाते हैं। आकाशीय अक्षांश को शर और रेखांश को भोग या भोगांश कहते हैं।

आकाशीय विषुव वृत्त Celestial equator

जिस प्रकार पृथ्वी के बीचों-बीच पूर्व-पश्चिम विषुववृत्त (भूमध्यरेखा) गई है उसी प्रकार आकाशीय विषुववृत्त भी है।

पृथ्वी की विषुव रेखा के सीध में प्रत्येक बिन्दु से यदि सीधे आकाश तक रेखा बढ़ाई जावे तो आकाश में भी उसी की सीध में एक कल्पित रेखा बन जायगी। इसी आकाशीय कल्पित रेखा को विषुववृत्त या नाड़ीवृत्त भी कहते हैं। इसे निरक्ष भी कहते हैं अर्थात् यहाँ पर अक्षांश शून्य रहता है।

विषुववृत्त (नाड़ीवृत्त) आकाश के २ समान विभाग करता है। इसका १ भाग उत्तर में और दूसरा भाग दक्षिण में हो जाता है। उत्तर में जो है वह उत्तर गोल और दक्षिण का दक्षिण गोल कहलाता है। ध्यान रहे कि सूर्य इस नाड़ीवृत्त पर से नहीं घूमता, वह क्रांतिवृत्त पर से घूमते दिखता है।

क्रांतिवृत्त Ecliptic

आकाश में जिस मार्ग से सूर्य घूमते हुए दिखता है वही क्रांतिवृत्त है। वास्तव में यही पृथ्वी की कक्षा Orbit है जिस पर से होकर पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। यह मार्ग अण्डाकार है। देखें चित्र संख्या ७।

क्रांति प्रदेश Zodiac

क्रांतिवृत्त के दोनों ओर ९°-९° का एक कल्पित चौड़ा पट्टा है जिसके भीतर सब ही ग्रह घूमते हैं। इस प्रकार १८° के चौड़े पट्टे को क्रांतिप्रदेश कहते हैं। इसके भीतर १२ राशियां और २७ नक्षत्र हैं।

क्रांतिवृत्त का धरातल Plane of ecliptic

क्रांतिवृत्त के जिस धरातल में ग्रह परिक्रमा करते हैं उसे क्रांतिवृत्त का धरातल कहते हैं।

आकाशीय ध्रुव Celestial pole

जिस प्रकार पृथ्वी के उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं उसी प्रकार ठीक इन्हीं के सीध में आकाश में आकाशीय उत्तर या दक्षिण ध्रुव हैं। ये भी कल्पित स्थान हैं।

४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

यामोत्तरवृत्त Meridian

आकाशीय दोनों ध्रुवों से जो रेखाएं आकाशीय नाड़ीवृत्त पर लम्ब होकर जाती हैं वे कल्पित रेखाएं यामोत्तरवृत्त कहलाती हैं। यह रेखा उसी प्रकार की हैं जैसे पृथ्वी की देशान्तर रेखा हैं। यामोत्तर=याम+उत्तर। याम=दक्षिण। उत्तर से दक्षिण जाने वाली कल्पित रेखाएं जो नाड़ीवृत्त को काटती हुई जाती हैं वे ही रेखायें यामोत्तरवृत्त हैं।

इसी यामोत्तरवृत्त से पूर्व या पश्चिम का जो अन्तर है वह भोग का भोगांश या क्षेत्र Celestial longitude कहलाता है। आकाश में एक मुख्य यामोत्तरवृत्त से यह पूर्व या पश्चिम को नापा जाता है और यह अन्तर क्रांतिवृत्त पर नापा जाता है। इसका मुख्य यामोत्तरवृत्त वसन्त सम्पात है जिसके विषय में आगे बताया गया है।

ऊपर जो नाड़ीवृत्त का वर्णन किया है उसके विषय में ध्यान रहे कि इस नाड़ीवृत्त का आकाश में कोई स्थिर और पक्का वृत्त नहीं है। जैसे पृथ्वी में भूमध्य रेखा को स्थिति निश्चित है ठीक वैसी स्थिति इस आकाशीय नाड़ीवृत्त की नहीं है। क्योंकि बहुत वर्षों के उपरान्त उसके स्थान में कुछ परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण भिन्न-भिन्न काल में वह आकाश का भिन्नता पूर्वक भाग करता है, क्योंकि सारा विश्व चल रहा है। इसी कारण नाड़ीवृत्त से आकाशीय अक्षांश नहीं नापा जाता।

क्रांति Declination

आकाशीय नाड़ीवृत्त से क्रांतिवृत्त की ओर ग्रहों का अन्तर इस नाड़ीवृत्त से नापा जाता है जिससे प्रकट हो कि कोई तारा नाड़ीवृत्त से उत्तर या दक्षिण को कितने अन्तर पर है। जितने अंश की दूरी पर वह ग्रह या तारा उपरोक्त नाप से निकलेगा वही तारा उस ग्रह या तारे की उत्तर या दक्षिण क्रांति होगी।

अक्षांश=शर=celestial latitude

आकाश में अक्षांश क्रांतिवृत्त से नापे जाते हैं क्योंकि क्रांतिवृत्त की स्थिति स्थिर और निश्चित है।

क्रांतिवृत्त के समानान्तर उत्तर या दक्षिण दूरी पर जितने अंश की दूरी पर वह ग्रह होगा वही उसका अक्षांश होगा। आकाशीय अक्षांश को शर भी कहते हैं। इसी को विलेप भी कहते हैं।

क्रांतिवृत्त से उत्तर या दक्षिण के ग्रहों या तारा के अन्तर को शर या अक्षांश कहते हैं परन्तु नाड़ीवृत्त से ग्रह आदि की उत्तर या दक्षिण की दूरी को क्रांति कहते हैं।

सूर्य सदा क्रांतिवृत्त पर ही चलता है। इससे उसका कोई शर नहीं होता परन्तु नाड़ीवृत्त से उसका अन्तर घटता बढ़ता-रहता है, इस कारण सूर्य की क्रांति घटती-बढ़ती रहती है। उसी प्रकार चन्द्र आदि ग्रह जब क्रांतिवृत्त पर रहते हैं तब उनका कोई शर नहीं रहता।

आकाशीय कल्पित रेखाओं का स्पष्टीकरण : ४७

क्रांति से प्रगट होता है कि वह ग्रह नाड़ीवृत्त से कितने कोणात्मक अन्तर पर उत्तर या दक्षिण गोल में है अर्थात् नाड़ीवृत्त से उत्तर या दक्षिण किसी तारा या ग्रह का अन्तर यामोत्तरवृत्त पर नापने से जो मिले वही क्रान्ति कहलाती है।

ये सब वार्तें आगे चित्र संख्या ५८, ५९ और ६० देखने से समझ में आ जायेंगी।

सम्पात विन्दु Equinox

आकाशीय विषुववृत्त और क्रान्तिवृत्त एक दूसरे को ( २३°-२८' का कोण बनाते हुए ) दो स्थानों में काटते हैं। उन दो विन्दुओं को सम्पात विन्दु कहते हैं। इसे ही अथन विन्दु या विषुव विन्दु भी कहते हैं।

मेघ का आरम्भ विन्दु जिसे उत्तर सम्पात या वसन्त सम्पात Vernal equinox कहते हैं, इससे आकाशीय रेखांश का पूर्व पश्चिम नाप होता है और यह पृथ्वी की गति की दिशा में, अर्थात् पश्चिम से पूर्व की ओर नापा जाता है।

यहाँ पर यह बात ध्यान में रखने की है कि ध्रुव भी दो प्रकार के हैं। नाड़ीवृत्त के ध्रुव को ध्रुव Pole of the celestial equator कहते हैं। और ध्रुव से जो यामोत्तरवृत्त नाड़ीवृत्त पर समकोण बनाते हुए खींचे जायें उन्हें ध्रुव प्रोतवृत्त meridian of the celestial equator कहते हैं। और क्रान्तिवृत्त के ध्रुव को कदम्ब pole of the ecliptic कहते हैं। कदम्ब से जो वृत्त समकोण बनाते हुए क्रान्तिवृत्त पर खींचे जायें वे कदम्ब प्रोतवृत्त कहलाते हैं।

किसी ग्रह से विषुववृत्त ( नाड़ीवृत्त ) पर जो अन्तर ध्रुव प्रोतवृत्त पर से नापा जावे उसे क्रान्ति कहते हैं। ग्रह से ध्रुव प्रोतवृत्त विषुववृत्त एक खींचा जावे तो ध्रुव प्रोतवृत्त के नापने से जो अन्तर ग्रह और विषुववृत्त का होगा वही अन्तर उस ग्रह की क्रान्ति होगी।

किसी ग्रह से क्रान्तिवृत्त का अन्तर कदम्ब प्रोतवृत्त पर होता है। वही अन्तर उस ग्रह का शर या विशेष होता है। कदम्ब से एक कदम्ब प्रोतवृत्त उस ग्रह से होते हुए इस प्रकार खींचें जो क्रान्तिवृत्त पर समकोण बनाती हुई मिले तो उस ग्रह का जो अन्तर क्रान्तिवृत्त तक होगा वह अन्तर, कदम्ब प्रोतवृत्त पर से नापने में जो मिले, वह अन्तर उस ग्रह का शर होगा। ग्रह से जो ध्रुव का अन्तर होता है वह ध्रुव अन्तर Polar distance कहलाता है। यह दक्षिण ध्रुव के पास हो तो दक्षिण ध्रुव से और उत्तर ध्रुव के पास हो तो उत्तर ध्रुव से अन्तर निकाला जाता है।

भोग या भोगांश Longitude

कदम्ब प्रोतवृत्त जो कदम्ब से निकल कर ग्रह या तारा पर से होते हुए क्रान्तिवृत्त पर समकोण बनाते हुए मिले, तो उत्तर सम्पात विन्दु से उस मिलन विन्दु तक नापने से जो अन्तर होगा वही उस ग्रह का भोगांश होगा। और उस ग्रह से उस मिलन विन्दु तक नाप में जो अन्तर होगा वह उस ग्रह का शर होगा।

विषुवांश Right Ascension

R. A. M. C. = Ark in Right ascension of the meridian

४८ : सचित्र ज्योतिषशास्त्र, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उत्तर सम्पात से नाड़ीवृत्त पर यह नापा जाता है। ऋक् प्रोतवृत्त जो ग्रह से होकर नाड़ीवृत्त पर समकोण बनाते हुए जहाँ मिलता है उस बिन्दु तक उत्तर सम्पात से नापने में जो अन्तर आवे वह उस ग्रह का विषुवोत्त होना। यह ग्रह की गति की ओर अर्थात् पश्चिम से पूर्व को नापा जाता है। यह सब आगे उदाहरण देकर समझाया गया है।

चित्र संख्या ५८—नाड़ीवृत्त, क्रांतिवृत्त, भोग और शर

विषुववृत्त (नाड़ीवृत्त) के नाप के अंश होने से इन्हें विषुवोत्त भी कहते हैं।

चित्र संख्या ५८ में ग्रह का शर और भोग समझाया है। शर और भोग क्रांतिवृत्त पर ही नापे जाते हैं। देखो चित्र संख्या ५८।

ना. डी=नाड़ीवृत्त

घ्र. व=उत्तर और दक्षिणध्रुव

कां. ति=क्रांतिवृत्त

क=कदम्ब=क्रांतिवृत्त का उत्तर ध्रुव

द= " " " दक्षिण "

सं=उत्तर सम्पात बिन्दु जहाँ नाड़ीवृत्त

और क्रांतिवृत्त एक दूसरे को काटते हैं।

ग्र. एक ग्रह।

क. ग्र. भो.=कदम्ब से एक कदम्ब प्रोतवृत्त ग्रह पर से होते हुए इस प्रकार खींचा गया है जो क्रांतिवृत्त पर भो. स्थान पर समकोण बनाते हुए मिला है।

श. भो.=उस ग्रह का शर हुआ।

सं. भो.=उस ग्रह का भोग हुआ। ग्रह सं. (सम्पात बिन्दु) से भो. स्थान तक जो अन्तर है वही भोग हुआ। यह भोग उत्तर सम्पात बिन्दु से आरम्भ होकर

पश्चिम से पूर्व को नापा जाता है, जैसा दूसरे उदाहरण से समझ पड़ेगा। दूसरा उदाहरण (चित्र संख्या ५८)

आकाशीय कल्पित रेखाओं का स्पष्टीकरण : ४९

ह. दूसरा ग्रह है

द. ह. प.=दक्षिण कदम्ब से एक कदम्बवृत्त ह. ग्रह पर से होते हुए इस प्रकार खींचा गया है जो क्रांतिवृत्त पर समकोण बनाते हुए प. स्थान पर मिला है।

ह. प.=यह ग्रह का शर हुआ यह दक्षिण में होने से दक्षिण शर हुआ।

सं. भो. ति. कां. प. यह ग्रह का भोग हुआ अर्थात् सम्पात बिन्दु से पूर्व की ओर जाकर, फिर घेरते हुए कां से प. बिन्दु आने तक जो दूरी होगी, उसी का नाम भोगांश होगा।

यां प. सं. अन्तर को ३६०° में घटा दे तो भी ग्रह का भोग निकल आवेगा।

ग्रह की क्रांति और विषुवांश नाडीवृत्त से नापे जाते हैं। उसका उदाहरण देकर समझाते हैं। देखें चित्र संख्या ५९।

ना. ई. नाडीवृत्त

ध्रु.=नाडीवृत्त का उत्तर ध्रुव

व.=, दक्षिण,,

कां. ति.=क्रांतिवृत्त

क. द.=कदम्ब उत्तर-दक्षिण

सं. पा.=दो सम्पात बिन्दु

सं=उत्तर सम्पात

ग्र.=एक ग्रह

ध्रु. ग्र. वि.=ध्रुव से एक ध्रुव प्रोतवृत्त ग्र. ( ग्रह ) पर से होते हुए इस प्रकार खींचा गया है जो नाडीवृत्त पर समकोण बनाते हुए वि. स्थान पर मिलता है।

चित्र संख्या ५९—भोग, शर, नाडीवृत्त, क्रांतिवृत्त, आदि

ग्र. वि.=ग्रह की उत्तर क्रांति

ध्रु. ग्र. वि.=ग्रह का ध्रुवान्तर=( ९०°-ग्र. वि. )

सं. वि.=ग्रह का विषुवांश

५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

दूसरा उदाहरण देखें चित्र संख्या ५९ ।

र. रवि यह सदा कान्तिवृत्त पर रहता है ।

ब. ल-एक ध्रुव प्रोतवृत्त ( यामोत्तरवृत्त ) जो ब. दक्षिण ध्रुव से र. ( रवि ) पर से होते हुए नाड़ी वृत्तपर ल. स्थान पर समकोण बनाते हुए मिला है ।

व. र=ध्रुवात्तर हुआ ।

र. ल=सूर्य की दक्षिण क्रांति हुई

सं. वि. डी. पा. ना. ल.=यह सूर्य का विषुवांग हुआ ।

यह विषुवांग सं.=उत्तर सम्रात से पूर्व की ओर नापा जाता है । इस कारण सं. विन्दु से होकर डी. पर से पूरा चक्कर घूमते हुए ना पर से होते हुए ल. तक आने में जितनी दूरी होगी वही विषुवांग होगा ।

यां=(३६०—ल. सं. की दूरी=सूर्य का विषुवांग )

आकाश में नक्षत्र आदि या ग्रह क्यों तिरछे घूमते हुए दृष्टिगोचर होते हैं ? चित्र संख्या ६० के देखने से समझ में आयेगा ।

पृथ्वी के ध्रुव का मुकाव उत्तर की ओर है । इसी प्रकार आकाश का भी उत्तर ध्रुव कुछ उत्तर की ओर मुका हुआ है । इसी कारण यह तिरछापन दिखता है ।

किसी स्थान में खड़े होकर चारों ओर देखें तो पृथ्वी के चारों ओर आकाश लगा हुआ दिखेगा । इसी को क्षितिज कहते हैं । जहाँ आकाश पृथ्वी से लगा हुआ दिखता है वही उस स्थान का ( जहाँ से खड़े होकर देख रहे हैं ) क्षितिज है ।

क्षितिज के ठीक ऊपर शिरोविन्दु है । नाड़ीवृत्त पर, नाड़ीवृत्त के शिरोविन्दु से उत्तर ध्रुव लम्ब रूप है, परन्तु उत्तर ध्रुव कुछ मुका हुआ होने के कारण नाड़ीवृत्त भी तिरछा दिखता है ।

चित्र संख्या ६०—क्षितिज, नाड़ीवृत्त, क्रांतिवृत्त और ध्रुव

अपना वाधा विषुववृत्त ( नाड़ीवृत्त ) क्षितिज पर दिखता है । अपने स्थान से ध्रुव जितना ऊँचा दिखता है उतना ही आकाश का नाड़ीवृत्त अपने सिर के स्थान

ग्रहों की गति : ५१

से क्षिण को दिखता है। इस कारण नाड़ीवृत्त में पूर्ण-पश्चिम को तिरछापन है। इसका एक छोर ठीक पूर्ण विन्दु पर है दूसरा पश्चिम में है।

अब क्रांतिवृत्त भी २३°-२८° का कोण बनाते हुए इस नाड़ीवृत्त को काटता हुआ तिरछा जाता है, इस कारण क्रांतिवृत्त में अधिक तिरछापन आ जाता है। इसी कारण नक्षत्र आदि क्रांतिवृत्त से तिरछे घूमते हुए दिखते हैं क्योंकि क्रांति प्रदेश ही तिरछा है।

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अध्याय ११

ग्रहों की गति Velocity or motion & Planets

प्रत्येक ग्रह की पृथक् २ गति ( चाल ) होती है। सब ग्रहों के साथ राहु केतु भी आकाशमार्गीय क्रांति प्रदेश के पथ पर घूमते हैं।

गति दो प्रकार की होती है ( १ ) परिभ्रमण Rotation और ( २ ) परिक्रमण Revolution

परिभ्रमण—जब ग्रह अपनी धुरी पर अपने ही आस पास पश्चिम से पूर्ण को घूमता है, उस गति को परिभ्रमण कहते हैं।

परिक्रमण—ग्रह जब अपने मार्ग से चलते हुए सूर्य के आस-पास घूमता है, जैसे परिक्रमा दे रहा हो, तो उस गति को परिक्रमण कहते हैं।

पृथ्वी जब अपनी धुरी पर दिन-रात में अर्थात् २४ घण्टे में अपने ही चहुँ और घूम लेती है तो उसे परिभ्रमण कहते हैं। पृथ्वी जब परिभ्रमण करते हुए अपनी कक्षा पर सूर्य की परिक्रमा करने को आगे बढ़ती है तो उसे परिक्रमण कहते हैं। जैसे सौरा अपने आस-पास चक्कर लगाते हुए भी आगे बढ़ता है।

परिक्रमण दो प्रकार का है ;—( १ ) मार्गी गति Acceleration or direct ( २ ) वक्रि गति Retrograde

( १ ) मार्गी—जब ग्रह अपने मार्ग में सीधा बढ़ते चला जाता है तो उसे मार्गी ग्रह कहते हैं। यह गति पश्चिम से पूर्ण को होती है जैसे कि सूर्य चलता है। जैसे कोई ग्रह येष राशि में है तो उसके उपरान्त वृष फिर मियुन आदि की ओर बढ़ता जायेगा। यही ग्रहों की सीधी गति है।

( २ ) वक्रि—जब ग्रह सीधी चाल जाते-जाते एकदम वापस लौट पड़ता है तो उसे वक्रि ग्रह कहते हैं। यह गति पूर्ण से पश्चिम को सूर्य की चाल के विरुद्ध होती है। जैसे कोई ग्रह मियुन राशि में है तो उसके उपरान्त कर्क की ओर जाना या परन्तु आगे न बढ़कर फिर वृष की ओर लौट पड़ें तो उसे ग्रह का वक्रि होना कहते हैं।

ग्रह जब वक्रि होकर फिर सीधा-सीधा रास्ता चलने लगता है तो उसे फिर मार्गी कहने लगते हैं।

५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस प्रकार प्रत्येक ग्रह की पृथक्-पृथक् गति होती है। कोई शीघ्र चलता है कोई धीरे-धीरे चलता है। इस प्रकार क्रांति प्रवेश में कोई ग्रह कभी आगे रहते हैं, कभी पीछे रहते हैं, कभी-कभी चलते-चलते मिल जाते हैं।

प्रत्येक ग्रहों की गति

(१) चन्द्र—सबसे शीघ्र चलने वाला ग्रह है। पृथ्वी के आस-पास प्रायः ३० दिन में घूम कर अपनी परिक्रमा पूरी करता है।

(२) शनि—सबसे धीमी चलने वाला ग्रह है। यह ३० वर्ष में अपनी परिक्रमा पूरी करता है।

(३) सूर्य—१ वर्ष (३६५.२५ दिन) में परिक्रमा पूरी कर लेता है। प्रतिदिन लगभग १° चलता है। इस प्रकार स्थूल मान से १ राशि में १ मास रहता है।

इस प्रकार १ राशि में चन्द्र २। दिन, मंगल १।। मास, बुध १ मास, गुरु १३ मास, शुक्र १ मास, शनि ३० मास, राहु १८ मास, केतु १८ मास, हर्षाल १ राशि में ७ वर्ष और नेपच्यून १३ वर्ष रहता है।

इस प्रकार कम ज्यादा समय परिक्रमा में लगने का कारण यह है कि जो ग्रह पास हैं उनकी परिक्रमा में अल्प समय लगता है और जो ग्रह दूर हैं उनकी परिक्रमा में दूरी के अनुसार अधिक समय लगता है। चित्र संख्या १ से परिक्रमा की दूरी समझ पड़ेंगी। ग्रहों की प्रतिदिन की मध्यम गति (औसत गति) भी इस प्रकार है :-

दैनिक मध्यम गतिदैनिक मध्यम गति
ग्रहअंश
सूर्य
चन्द्र१३
बुध
शुक्र

राहु केतु को छोड़ कर शेष ग्रहों की गति सदा बदलती रहती है। राहु केतु की गति कभी नहीं बदलती, सदा इनकी एक सरीखी गति रहती है। राहु केतु सदा बड़ी रहते हैं अर्थात् सदा एक सरीखी चाल से उल्टे चलते रहते हैं।

सूर्य और चन्द्र कभी बड़ी नहीं होते शेष ग्रह बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, हर्षाल और नेपच्यून सदा बड़ी और मार्गी होते रहते हैं और उनकी दैनिक गतियों में भी परिवर्तन होता रहता है।

उपरोक्त ग्रह अपनी इच्छानुसार बड़ी मार्गी नहीं होते परन्तु एक प्रबल शक्ति सूर्य के कारण ही गतियों में यह सब परिवर्तन होता है, क्योंकि सब ग्रह सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से खिंचे हुए हैं।

सूर्य के आस-पास जो परिक्रमा का मार्ग है वह एक सरीखा गोल नहीं बण्डाकार है, जिसके बीच में सूर्य है। देखें चित्र संख्या ७। चित्र से प्रकट होगा कि इस मार्ग

ग्रहों की गति : ५३

का कुछ भाग सूर्य के समीप पड़ जाता है कुछ दूर हो जाता है। कोई ग्रह जब चलते-चलते सूर्य के अधिक पास पहुँच आता है तो उसे सूर्य के समीप Perihelion कहते हैं ( यह घटना पृथ्वी के सम्बन्ध में लगभग १ जनवरी को होती है )। जब सूर्य से ग्रह अधिक दूरी पर चला जाता है तब उसे सूर्य से अधिक दूर Aphelion कहते हैं। पृथ्वी १ जुलाई के लगभग अधिक दूरी में होती है।

ग्रह जब सूर्य के समीप हो जाता है तो सूर्य की आकर्षण शक्ति बढ़ती है जिसके कारण सूर्य के खिंचाव से ग्रह की गति में अधिक तेजी आ जाती है और ज्यों-ज्यों वह ग्रह सूर्य से दूर होता जाता है उसकी गति धीमी होती जायेगी क्योंकि सूर्य से दूरी होने के कारण सूर्य का खिंचाव (आकर्षण शक्ति) कम होने लगता है और उस समय ग्रह बड़ी हो जाता है अर्थात् फिर लौट पड़ता है। परन्तु जब दूर से लौट कर ग्रह सूर्य की ओर बढ़ता है तो फिर ग्रह में भी सूर्य के प्रभाव से बल आ जाता है और समूहल कर फिर आगे बढ़ता है तब मार्गी ग्रह हो जाता है। अब समझ गये होंगे कि इसी अण्डाकार वृत्त के कारण उन पर सूर्य की आकर्षण शक्ति का घटाव-बढ़ाव होता है जिससे ग्रह बड़ी-मार्गी होते हैं।

कुचस्तम्भ Stationary

जब ग्रह बक होने से उसकी गति मन्द हो जाती है तब उस ग्रह का स्तम्भ होना कहते हैं। उस समय ग्रह एक राशि पर बहुत दिनों तक रहता है, इसे ही कुचस्तम्भ कहते हैं। परन्तु मंगल ग्रह के सम्बन्ध में ही कुचस्तम्भ शब्द का प्रयोग होता है। शेष ग्रहों की ऐसी स्थिति में स्तम्भ ही कहेंगे।

साधारण प्रकार से कौन ग्रह कितने दिनों में बड़ी मार्गी होता है, यह नीचे चक्र में बताया है।

उदय अस्त बड़ी मार्गी चक्र

ग्रहअस्त होने केउदय के उपरान्तबड़ी के उपरान्तमार्गी के उपरान्त
इतने मास उपरान्तइतने मास मेंइतने मास मेंइतने मास में
उदय होगाबड़ी होगामार्गी होगाअस्त होगा
मंगल४ मास१० मास२ मास१० मास
गुरु१ मास४३ मास४ मास४३ मास
शनि१३ मास३ मास४ मास३३ मास
ग्रह पूर्व में अस्तपश्चिम मेंबड़ी केपश्चिम मेंपूर्व में उदय
होने के उपरान्तउदय उपरान्तइतने दिनोंअस्त के बादके बाद के इतने
पश्चिम मेंइतने दिनोंबाद पश्चिमइतनेइतने दिनों
इतने दिनों मेंमेंमेंदिनों मेंमें पूर्व में
में उदय होगाबड़ी होगाअस्त होगाउदय होगामार्गी होगा अस्त होगा
शुक्र ३२ दिन३२ दिन४ दिन१६ दिन४ दिन ३२ दिन
शुक्र ७५ दिन२४० दिन२३ दिन९ दिन२३ दिन २४० दिन

५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

राहु केतु सदा बक्ती रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा कभी बक्ती नहीं होते। शेष ग्रह बक्ती मार्गी होते रहते हैं।

उदय अस्त ज्ञान Heliacal rising and setting of planets

सूर्य के पास कोई ग्रह आ जाने से उस ग्रह को अस्त होना कहते हैं। यदि वह ग्रह सूर्य के आगे चला जावे तो उसे उदय होना कहते हैं।

सूर्य के पास ग्रह आ जाने से ग्रह नहीं दिखता इस कारण उसे अस्त कहते हैं। जब सूर्य के दूर चले जाने के कारण वह ग्रह दिखने लगता है तो उसे उदय होना कहते हैं।

सूर्य को छोड़कर शेष ग्रहों का उदय अस्त होता है। इसमें भी यह प्रमाण है कि सूर्य से विशेष अंश दूर हो जाने पर कोई ग्रह दिखने लगता है कोई नहीं दिखता।

सूर्य के कितने अन्तर पर ग्रह चले जाने पर दिखने लगता है अर्थात् उदय होता है, नीचे दिया है। सूर्य से इतने अंशों के भीतर ग्रह हो तो वह ग्रह अस्त ही समझा जायेगा। जैसे सूर्य से चन्द्र का अन्तर १२ अंश के भीतर रहने तक चन्द्र अस्त ही रहेगा ( नहीं दिखेगा ) परन्तु १२° हो जाने पर चन्द्र उदय होगा ( दिखने लगेगा )। इसी प्रकार सब ग्रहों के विषय में समझना।

ग्रहों का कालांश

ग्रहचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
सूर्य से अंतर-कालांश ( अंशोंमें )१२१७१३१११५

इस अन्तर को कलांश भी कहते हैं।

अस्तोदय—२ प्रकार का है। एक तो प्रति दिन ग्रह उदय होते हैं और अस्त होते हैं। यहाँ जो बताया गया है वह इससे भिन्न है अर्थात् सूर्य के पास जब ग्रह होता है तो अस्त होना कहा जाता है। जब सूर्य के पास ग्रह होता है तो उसे सूर्य संनिध भी कहते हैं। उदय अस्त को और भी अच्छी तरह समझाते हैं।

उदय—सूर्य से अल्प गति वाले ग्रह ( मंगल, गुरु, शनि ) सूर्य से कालांश तुल्य अंतर पर ( कालांश अंतर जो ऊपर बताया है ) पूर्व दिशा में और थोड़ी रात्रि रहने पर उदय होते हैं सूर्य से अधिक गति वाला ग्रह चंद्र है। यह सूर्य से, अपने कालांश से अधिक होने पर पश्चिम दिशा में संध्या को उदय होता है। बुध, शुक्र, के लिये विशेष बात यह है कि ये सूर्य के अधिक पास हैं। ये दोनों दिशाओं ( पूर्व और पश्चिम ) से उदय और अस्त होते हैं। क्योंकि ये दोनों ग्रह वक्र होकर फिर सूर्य के कालांश तुल्य अंतर में आ जाने से इनका अस्त और उदय होता है अर्थात् दोनों ग्रह सूर्य से अधिक गति वाले होने के कारण अपने कालांश अन्तर होने पर सूर्य के आगे पश्चिम में संध्या को उदय होते हैं फिर वक्र होकर सूर्य के पास आकर पश्चिम में ही इनका अस्त होता है। फिर वक्र गति ही से सूर्य के पीछे होकर अपने कालांश अन्तर पर पूर्व दिशा में थोड़ी रात्रि रहने पर उदय होते हैं फिर मार्गी होकर पूर्व में ही अस्त होते हैं।

सम्पात : ५५

अस्त—सूर्य से अल्प गति वाले ग्रह ( मंगल, शुक्र, शनि ) सूर्य से, अपने कालांश के भीतर होने से पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं और अधिक गति वाला ग्रह चंद्र अपने कालांश के भीतर सूर्य के समीप आ जाने पर पूर्व दिशा में अस्त होता है ।

वक्री बुध, शुक्र का कालांश १° कम लेना अर्थात् बुध का कालांश १२° है तो वक्री बुध का ११° लेना । शुक्र का ९° है तो वक्री शुक्र का ८° लेना । वक्रीग्रह होने के कारण कालांश कम लिया जाता है ।

अध्याय १२

सम्पात equinox

पहिले बता चुके हैं कि क्रांतिवृत्त और नाडीवृत्त दोनों पृथक्-पृथक् वृत्त हैं, जो एक दूसरे को २३° २८' का तिरछा कोण बनाते हुए दो स्थानों में काटते हैं, जिससे दो पृथक्-पृथक् भाग हो जाते हैं । देखें चित्र संख्या ६१ ।

चित्र संख्या ६१—सम्पात बिन्दु

भाग ( १ ) क्रांतिवृत्त का ऊपर का आधा भाग सं० ति० प० और नाडीवृत्त का नीचे का आधा भाग सं० दो० पा० ।

भाग ( २ ) क्रांतिवृत्त का नीचे का आधा भाग सं० का० पा० और नाडीवृत्त का ऊपर का आधा भाग सं० ना० पा० ।

जहाँ एक दूसरे को काटते हैं वे दो बिन्दु सं० और पा० संपात बिन्दु हैं ।

इनमें से १ सं० को अयन मेघ या सायन मेघ या वसंत सम्पात Autumnal equinox कहते हैं । दूसरे को अयनतुला या सायनतुला या शरद सम्पात Autumnal equinox कहते हैं ।

इस प्रकार सूर्य क्रांति वृत्त में घूमते हुए दो बार नाडीवृत्त को पार करता है, उस समय दिन रात बराबर होता है ।

क्रांतिवृत्त की बक़ता के ही कारण सूर्य ६ मास उत्तर और ६ मास दक्षिण को उदय होता है । इसी से सूर्य की उत्तरायण और दक्षिणायन संज्ञा होती हैं ।

ज्यों ज्यों अयन बिन्दु के आगे बढ़ते हुए सूर्य जाता है त्यों त्यों दिन बढ़ता जाता

५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

है। सूर्य जब क्रांतिवृत्त के अंतिम [छोर पर पहुँच जाता है ता वहीं सूर्य की सबसे बड़ी क्रांति होती है और यह स्थान क्रांतिसीमा कहलाता है।

चित्र संख्या ६२—क्रांतिवृत्त, नाडीवृत्त और क्रांतिसीमा

चित्र संख्या ६२ देखें। ऊपर बताया गया ति० और नीचे का क्रा० स्थान ही क्रांति सीमा है। ये स्थान नाडीवृत्त से २३° २५' की दूरी पर हैं।

क्रांति सीमा Tropic

पृथ्वी के नक्शे में ये दो छोटे छोटे वृत्त नाडीवृत्त के समानान्तर २३° २५' की दूरी पर खींचे गये हैं। उत्तर में कर्क की क्रांतिसीमा Tropic of cancer और दक्षिण में मकर की क्रांतिसीमा Tropic of capricorn कहलाती है। यही चित्र संख्या ६२ में समझाया गया है।

सम्पात और अयन बिन्दुओं का स्पष्टीकरण

१. सायन मेघ, उत्तर सम्पात या बसंत Vernal equinox—सूर्य २१ मार्च को विषुववृत्त पर आता है, इसके उपरांत उत्तर गोलार्द्ध की ओर जाने लगता है। इसे बसंत सम्पात कहते हैं। क्योंकि इसी समय बसंत ऋतु होती है और सायन मेघ संक्रमण होता है। इस समय सूर्य ठीक पूर्व को उदय होता है और दिन रात बराबर होती है। अर्थात् सूर्य प्रातःकाल ठीक ६ बजे उदय होता है। नाडीवृत्त और क्रांतिवृत्त एक दूसरे को काटते हैं उनका यह पहिला स्थान है। इस स्थान से ग्रहों का भोगांश और विषुवांश नापा जाता है।

२. सायन तुला—दक्षिण सम्पात या शरद सम्पात Autumnal equinox नाडीवृत्त और क्रांतिवृत्त के एक दूसरे को काटने का यह दूसरा स्थान है। २१ सितम्बर के लगभग सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की क्रांतिसीमा पर से छोट कर ६ मास में उत्तरी गोलार्द्ध की यात्रा समाप्त कर जिस सम्पात बिन्दु पर आता है उसे सायन तुला कहते हैं। इस समय सूर्य लौटकर विषुववृत्त पर आ जाता है और ठीक पूर्व में उगता है तथा दिन रात्रि बराबर होती है। इसके उपरांत सूर्य की दक्षिण गोल की यात्रा आरम्भ होती है। इसी से इसे दक्षिण सम्पात भी कहते हैं। और इसके बाद ही शरद ऋतु आरम्भ होती है। अर्थात् सूर्य उत्तर गोल में सायन मेघ से सायन तुला तक रहता है और दक्षिण गोल में सायन तुला से सायन मेघ तक।

३. ग्रीष्म क्रांति—दक्षिणायन बिन्दु Summer solstice

सम्पात : ५७

यह २१ जून के लगभग होता है जब सूर्य सायन मेघ से चल कर उत्तर गोलयात्रा में वह इस क्रांतिसीमा पर २१ जून के लगभग पहुँच जाता है, उस समय सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर समकोण बनाती हैं। इस समय सूर्य सबसे दूर रहता है और सूर्य के उदय अस्त का घेरा बहुत बड़ा होता है अर्थात् उस दिन, दिन मान सबसे बड़ा होता है। इसी को सायन कर्क संक्रमण कहते हैं। इसके उपरांत सूर्य लौट कर २१ जून के लगभग उत्तर गोलार्द्ध की यात्रा समाप्त कर सायन तुला पर आता है। इस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य दक्षिण की ओर मुड़ता है और सूर्य दक्षिणायन हो जाता है इस कारण ग्रीष्म क्रांति को दक्षिणायन बिन्दु भी कहते हैं।

४. शरदक्रांति—उत्तरायण बिन्दु winlet solstice—यह २१ दिसम्बर को होता है, जब सूर्य विषुवरेखा से बहुत दूरी पर बहुत दक्षिण की ओर रहता है। यह क्रांति वृत्त की दक्षिण सीमा है। लगभग २२ दिसम्बर को जब सूर्य की किरणें मकर रेखा पर समकोण बनाती हैं उस समय सायन मकर संक्रांति होती है। इस समय सूर्य की दक्षिण क्रांति २३°-२८' होती है। उसी दिन सूर्य पूर्व बिन्दु के दक्षिण में प्रायः २५° पर उगता है। उस दिन से सूर्य उत्तर की ओर आने लगता है। उस दिन, रात्रि (रात्रि मान) सबसे बड़ी होती है। इस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य उत्तर की ओर आने लगता है तब उत्तरायण का आरम्भ होता है। इसी कारण इसे उत्तरायण बिन्दु कहते हैं।

अयनबिन्दु आकाश में सदा एक ही जगह नहीं रहते, ये पश्चिम की ओर खिसकते रहते हैं। जिस नक्षत्र के पास आजकल उत्तरायण या दक्षिणायन होता है पुराने समय में उस स्थान में नहीं होता था। आजकल उत्तरायण का आरम्भ मूल के आधे भाग पर और दक्षिणायन का आरम्भ आर्द्रा के आरम्भ में होता है। सूर्य की उत्तर-दक्षिण गति का स्पष्टीकरण

सूर्य जब २१ मार्च को उत्तर सम्पात पर आता है तो दिन रात बराबर होते हैं अर्थात् ६ बजे प्रातः काल ठीक पूर्व में उदय होता है और ठीक पश्चिम दिशा में अस्त होता है। इसके उपरान्त अवलोकन करने तो प्रकट होगा कि सूर्य ठीक पूर्व बिन्दु पर उदय नहीं हो रहा है। वह कुछ उत्तर की ओर बढ़ रहा है। सूर्य इस प्रकार ३ मास तक उत्तर की ओर बढ़ता ही जाता है और २१ जून को विषुव रेखा से सबसे अधिक दूरी पर चला जाता है। उस समय सबसे बड़ा दिन होगा। क्योंकि सूर्य इस समय सबसे दूर हो जाता है और पूर्व में बहुत दूर हट कर उत्तर की उदय होगा। पूर्व और उत्तर के बीच का जो अन्तर है उस अन्तर का लगभग ३ भाग सूर्य उत्तर को चला जाता है। यही क्रांतिसीमा है। उस समय सूर्य पश्चिम में क्रांतिसीमा पर ही दृढ़ता दिखाएगा।

इसके उपरान्त सूर्य विषुवरेखा की ओर आने लगता है और २१ सितम्बर को फिर विषुववृत्त पर आ जाता है और उसी प्रकार उदय अस्त होगा जैसे २१ मार्च को होता है। उस समय दिन रात बराबर होती है। क्रांति सीमा से विषुववृत्त में

१८ : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

सूर्य को आने में ३ मास लगते हैं। इस प्रकार ६ महीने में, जिसमें गर्मी की भी बहुत सम्मिलित है, सूर्य अपनी पूरी यात्रा कर ठीक उसी जगह आ जाता है। सूर्य इस समय तक उत्तरी गोलार्द्ध में रहा और इसके उपरान्त दक्षिण गोलार्द्ध में आ जाता है।

सूर्य जब दक्षिण को जाने लगता है तो दिन छोटा होने लगता है। २१ दिसम्बर को जब सबसे छोटा दिन होता है, सूर्य दक्षिण क्रांतिसीमा पर ३ मास की यात्रा कर पहुँच जाता है। दक्षिण में क्रांतिसीमा में उदय अस्त होते दिखता है। उपरान्त ३ मास की और विषुववृत्त की ओर यात्रा कर २१ मार्च को विषुववृत्त पर फिर आ जाता है।

इस कारण जब सूर्य के उदय अस्त में अन्तर पड़ता है तो मध्याह्न ( दोपहर ) की ऊँचाई में भी अन्तर पड़ता है जिसके कारण दिन छोटे-बड़े होते हैं। जून के बीच सबसे अधिक ऊँचाई होती है इससे सबसे बड़ा दिन होता है। सूर्य के उदय काल पर दिन की लम्बाई छुटाई अवलम्बित है। सूर्य ज्यों-ज्यों विषुव रेखा से उत्तर को जाता है दिन की लम्बाई बढ़ती जाती है।

पहिले सम्पात, अयन बिल्कु, और सूर्य की उत्तर दक्षिण गति समझा चुके हैं इन्हीं के कारण भिन्न-भिन्न ऋतुएँ होती हैं।

सायन राशियाँ संक्रांति की तारीख एवं ऋतुएँ

नीच | राशि | संक्रांति की | ऋतु | ---|---|---|---|--- राशियाँ | | तारीख | | उच्च | १ मेष | २१ मार्च | वसंत और ग्रीष्म की राशियाँ वर्षा और शरद की राशियाँ | ये ६ राशियाँ " | २ वृष | १९ अप्रैल | नाड़ी " | ३ मिथुन | २० मई | मंडल के नीच | ४ कर्क | २१ जून | उत्तर " | ५ सिंह | २२ जुलाई | में " | ६ कन्या | २२ अगस्त | है नीच | राशि | संक्रांति की | ऋतु | राशियाँ | | तारीख | | उच्च | ७ तुला | २३ सितम्बर | शरद और हेमन्त की राशियाँ शिषिर और वसंत की राशियाँ | ये ६ राशियाँ " | ८ वृश्चिक | २३ अक्टूबर | नाड़ी " | ९ धन | २२ नवम्बर | मंडल के नीच | १० मकर | २१ दिसम्बर | दक्षिण | ११ कुंभ | २० जनवरी | में | १२ मीन | १९ फरवरी | है

जब सूर्य उपरोक्त ३ राशियों में से किसी में होता है तो उसकी क्रांति बढ़ती है और दूसरी ३ राशियों में होता है तो क्रांति घटती है। इस कारण पहिली उच्च राशियाँ और दूसरी नीच राशियाँ हैं।

अध्याय १३

सायन और निरयन

राशि ग्रह आदि २ प्रकार के हैं ( १ ) सायन movable ( २ ) निरयन fixed zodic

सायन—अयन सहित with Procession

निरयन—अयन रहित without Procession

अयनांश—अयन के अंश । हिन्दूमत से माना हुआ प्रथम बिन्दु और शरद सम्पात के बीच जो अन्तर है वह निश्चित बिन्दु से नापा जाता है, उसे अयनांश कहते हैं ।

अयन Procession of equinoxes

अयन क्या है ? यह जानने के लिए सम्पात बिन्दु का जानना आवश्यक है, जिसके विषय में पहिले अच्छी प्रकार समझा चुके हैं । माईवृत्त और कान्तिवृत्त एक दूसरे को जगह-जगह काटते हैं, वे ही सम्पात बिन्दु equinox ctial points हैं । इनमें १ शरद सम्पात दूसरा वसंत सम्पात है । इन्हीं दोनों बिन्दुओं को अयन भी कहते हैं । इन्हीं बिन्दुओं पर सूर्य आने से दिन रात बराबर होता है ।

इन सम्पात बिन्दुओं की वक्र गति होती है अर्थात् उल्टे चलते हैं । ( जिस प्रकार राहु केतु उल्टे चलते हैं ) । शरद सम्पात का बिन्दु अपनी पूर्व स्थिति से पीछे हटता जा रहा है इसी कारण इसे वक्र गति कहते हैं । पहिले बता चुके हैं कि अयन बिन्दु पश्चिम की ओर खिसक रहे हैं ।

इस सम्पात बिन्दु की पूर्व स्थिति, ज्योतिष शास्त्र में रेवती नक्षत्र से मानी है, परन्तु ज्योतिष चक्र ( भचक्र ) में सम्पात बिन्दु मेष के प्रथम अंश से माना गया है ।

इस सम्पात बिन्दु की वार्षिक गति होती है और यही गति अयन चलन कहलाता है । इसे विषुवत्कान्ति—बल्य पात चलन भी कहते हैं ।

जहाँ इस सायन का उपयोग होता है उसे सायन (चलित ग्रह) movable zodic कहते हैं । निरयन में स्थिर मेष के पहिले अंश से यह सम्पात बिन्दु आरम्भ होना मानते हैं और इसमें अयन का उपयोग नहीं होता इस कारण निरयन को स्थिर fixed zodic कहते हैं ।

इसी सम्पात की गति को अयनांश Procession कहते हैं । इस सम्पात का पूर्ण चक्र २५-६-८ वर्ष में अर्थात् लगभग २६०० वर्ष में पूरा होता है । इस कारण इस प्रमाण से इसकी गति १ अंश चलने को ७२ वर्ष लगते हैं । अर्थात् १ वर्ष में प्राय ५० विकला के हिसाब से अयन की गति होती है ।

अयनांश सहित ग्रह—चलित ग्रह—सायन ग्रह—सायन यत

६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अयनांश रहित ग्रह—स्थिर ग्रह—निरयन ग्रह—निरयन मत

सायन मत को पाश्चात्य लोग भविष्य कथन में उपयोग करते हैं और उनके पंचांग में सायन ग्रह दिये रहते हैं, परन्तु हिन्दू लोग प्रायः निरयन मत से ही भविष्य कथन करते हैं। कहीं कहीं महाराष्ट्र में भी सायन मत का उपयोग करते हैं।

जो कोई ग्रह में अयनांश मिलाकर ग्रह को सायन बनाकर सायन ग्रह का उपयोग करते हैं वे सायन मत के हैं और जो सायन में से अयनांश निकाल कर ( घटा कर ) उसे निरयन बनाकर या निरयन ग्रह हो तो बिना अयनांश मिलाए ही ग्रह का बहुधा उपयोग करते हैं वे निरयन मत के हैं।

सायन मतवालों का कहना है कि ग्रह को सायन बनाकर सायन ग्रह की स्थिति पर से जो फल कहा जायगा वह सच्चा निकलेगा। निरयन मतवालों का कहना है कि बिना अयनांश मिलाए ही ग्रह की स्थिति पर से जो फल कहा जायगा वह सच्चा उतरेगा। यही सायन और निरयन वाद है अर्थात् दोनों मतवालों में इस प्रकार मतभेद है।

अयनांश का उपयोग निरयन मत में भी कई जगह होता है। जैसे भाव स्पष्ट करने के लिए निरयन सूर्य में अयनांश मिलाकर उसे सायन सूर्य बनाकर उस पर से लग्न साधन करते हैं और फिर सायन लग्न निकलने पर अयनांश घटाकर निरयन ग्रहण करते हैं। अयनांश का उपयोग आगे जन्म कुंडली आदि बनाने के गणित में काम पड़ेगा इस लिए इसको जानना आवश्यक है।

किसी वर्ष के अयनांश निकालने की ग्रह छाषण मत के अनुसार सरल रीति :— शाके ४४४ में रेवती का तारा सम्पात बिन्दु पर था। उस समय पर से किसी वर्ष का अयनांश निकालने के लिए इष्ट, शाका में ४४४ घटाना, इसके घटाने से जो शेष बचे वही अयनांश की कला होती है। उनमें ६० का भाग देकर उनके अंश बनालें तो वही अयनांश वर्ष आरम्भ का होगा।

अयनांश— ( इष्ट शाका—४४४ ) : ६० = अयनांश

जैसे शाका १७६९ का अयनांश निकालना है तो शाका में ४४४ घटा कर शेष में ६० का भाग दिया तो उत्तर अंश कला में अयनांश आता है।

इष्ट शाका१७६९६०)१३२५(२२°उत्तर२२-६ अंश कला यह वर्ष
४४४१२०आरम्भ का अयनांश हुआ।
शेष१३२५१२५
१२०

अध्याय १४

कुछ प्रारम्भिक ज्ञान होने के उपरान्त यही इच्छा होती है कि हमें पंचाङ्ग देखना आ जावे। पंचाङ्ग के मुख्य ५ अंग ( १ ) तिथि, ( २ ) वार, ( ३ ) नक्षत्र, ( ४ )

अध्याय १४ : ६१

योग, और ( ५ ) करण, होने से उसे पंचाङ्ग कहते हैं । ये सब क्या हैं यह बतलाने के उपरान्त पंचाङ्ग देखना बतायेंगे । पंचाङ्ग के उपरोक्त ५ अंगों के अतिरिक्त सम्बत्सर, मास, अयन, ऋतु, ग्रह स्थिति, दिनमान, सूर्यादय आदि कई और आवश्यक विषय भी पंचाङ्ग में दिये रहते हैं । इन सबको पहिले समझ लेना चाहिए । वर्ष प्रमाण आदि जानने के पूर्व काल प्रमाण प्रत्येक को जानना आवश्यक है ।

काल प्रमाण Division of Time

त्रुटि—कमल के कोमल से कोमल १ पत्र में अति नुकीली सुई चुभाने में जो समय लगता है उसे त्रुटि कहते हैं ।

निमेष—पलक झपकाने में जो समय लगता है उसे निमेष कहते हैं ।

गुरु अक्षर—एक गुरु अक्षर के उच्चारण में जो समय लगे वह गुरु अक्षर है ।

प्राण—एक गुरु अक्षर के उच्चारण में जो समय लगे उसके १० गुने समय को प्राण कहते हैं ।

भगण काल—कोई ग्रह १ भगण (३६०°) चक्कर पूरा करने में जो समय लगावे ।

सावन दिन—एक दिन सूर्यादय होने के उपरान्त दूसरे दिन के सूर्यादय होने तक का जो समय है वह सावन दिन कहलाता है ।

१०० त्रुटि=१ लय=१ तत्पर

३० मुहूर्त=१ दिन रात

३० लय=१ निमेष

७ दिन=१ सप्ताह

१० गुरु अक्षर=१ प्राण=१ असु

३० दिन=१ मास

४५ निमेष=१ प्राण

१२ मास=१ वर्ष

६ प्राण=१ पल=विनाड़ी=विघटिका

३० नक्षत्र जहोरात्रि=१ सावन मास

३० सावन दिन=१ सावन मास

या=विघटी

३० चान्द्र तिथि=१ चान्द्र मास

१० विपल=१ प्राण या असु

१ संक्रांति से दूसरी संक्रांत तक } =१ सौर मास

६० विनाड़ी=१ नाड़ी=घटी

१२ मास (१ वर्ष)=१ दिव्य दिन

(पल)=घड़ी-दंड

३६० वर्ष=१ दिव्य वर्ष

६० नाड़ी=१ नक्षत्र दिन

(घटी)=जहोरात्रि=१ दिन रात

७३ घटी=१ ग्रहर

६० तत्परति विकला=१ प्रति विकला

६० प्रतिविकला=१ विकला

६० विकला=१ कला

८ ग्रहर=२४ घण्टा (होरा)

६० कला=१ अंश

=१ दिन रात

३० अंश=१ राशि

२ घटी=१ मुहूर्त

१२ राशि=१ सूचक=भगण=ज्योतिष

चक्र

• ६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

  • ६० तत्परस=१ परस

  • ६० परस=१ विलिप्ता

  • ६० विलिप्ता=१ लिप्ता

  • ६० लिप्ता=१ विघटिका=पल

  • ६० विघटिका=१ घटिका=दंड

  • ६० घटिका=१ दिन रात्रि

  • ६० अनुपल=१ विपल=३ सेकेण्ड

  • ६० विपल=१ पल=२४ सेकेण्ड

  • ६० पल=१ घड़ी=२४ मिनट

  • ६० घड़ी=१ दिन रात्रि=२४ घण्टा

  • २३ विपल=१ सेकेण्ड

  • २३ पल=१ मिनट

  • २३ घड़ी=१ घण्टा

  • ११३ निमेष=१ सेकेण्ड

  • १ असु (प्राण)=४ सेकेण्ड

स्मरण रहे कि अंग्रेजी समय घण्टा मिनट में रहता है। वह अर्द्ध रात्रि के १२ बजे के उपरान्त से आरम्भ होता है और हिन्दू समय घड़ी पल में सूर्योदय के उपरान्त से आरम्भ होता है।

सूर्योदय का समय प्रत्येक पंचाङ्ग में घण्टा मिनट में दिया रहता है। इष्ट समय यदि घण्टा मिनट में हो तो सूर्योदय का समय घटा देने से सूर्योदय के बाद के घण्टा मिनट निकल आवेंगे। जैसे ८ बजे दिन किसी बालक का जन्म है। पंचाङ्ग में देखा उस दिन ६ बजे प्रातः सूर्योदय है। ८ घण्टा में से ६ बजे सूर्योदय को घटाये तो शेष २ घण्टा बचे। अब दो घण्टा के घड़ी पल बना लो। २ X २१॥=४ घड़ी हुई। वस यही सूर्योदय के उपरान्त का अपना समय घड़ी पल में हुआ। इसी प्रकार जहाँ घड़ी पल में समय दिया हो आवश्यक होने पर उसके घण्टा मिनट बना लो।

नाप का प्रमाण Measurement

  • ६० तत्प्रति अंगुल=१ प्रति अंगुल=व्यंगुल
  • ६० व्यंगुल=१ अंगुल
नवीन नापप्राचीन नापअंग्रेजी मील और योजन का मिलान
२३ इंच=१ गिरह८ जब की चौड़ाई=१ अंगुलयदि १३ फुट का १ हाथ
४ गिरह=१ बीता२४ अंगुल=१ हाथमाना जावे तो
४ बीता=१ गज४ हाथ=१ दण्ड१ दण्ड २ गज
१२ इंच=१ फुट२००० दण्ड=१ कोस१ कोस=४००० गज
३ फुट=१ गंज४ कोस=१ योजनअर्द्ध कोस (मील)=२००० गज
१७६० गज=१ मील१० हाथ=१ बाँसअंग्रेजी मील=१७६० गज
२ मील=१ कोसदोनों का अन्तर=२४० गज
१ नाट Knot=अक्षांश की १ कलाअंग्रेजी मील २४० गज छोटा है।
इस प्रकार
४ कोस=१ योजन में=१६२०

अध्याय १४ : ६३

१ नाट=१०१५ साधारण

मील=२०२८ गज

गज या मील-गज

१-१६० का

अन्तर पड़ेगा

∴ १ योजन=१३१/३ मील

या=मील-गज

१-१६०

[ १ ] युग प्रमाण

काल प्रमाण जानने के उपरान्त युग प्रमाण भी जानना चाहिए, क्योंकि पंचाङ्ग में दिया रहता है कि कलियुग के इतने वर्ष बीत गये हैं इत्यादि ।

कलियुग ४३२००० वर्ष का होता है । कलियुग का दूना द्वापर, तिगुना त्रेता, चोगुना सतयुग होता है । इन ४ युग का १ महायुग होता है । ७१ महायुग का १ मन्वंतर और १००० महायुग का १ कल्प या ब्रह्मा का एक दिन होता है । ३६० कल्प का ब्रह्मा का १ वर्ष होता है । प्रत्येक मन्वंतर के आदि और अन्त में सतयुग प्रमाण की १ संधि होती है । संधि को प्रलय काल भी कहते हैं । १५ संधि समेत एक मन्वंतर का १ कल्प होता है । ब्रह्मा की आयु ३६० कल्प X १०० वर्ष की होती है ।

सतयुग=१७२८००० वर्षमनु १४ हैं उनके नामवर्तमान कल्प के
त्रेता=१२९६००० ,,१ स्वायम्भुवआरम्भ से ७ संधियों
द्वापर=८६४००० ,,२ स्वारोचिषसमेत ६ मनु व्यतीत
कलियुग=४३२००० ,,३ उत्तमज (औत्तमि)हो चुके हैं उनके नाम-
१ महायुग=४३२०००० वर्ष४ तामस(१) स्वायम्भुव मनु
७१ महायुग=१मन्वंतर=५ रैवत(२) स्वरोचिष ,,
३०६७२०००० वर्ष६ चाक्षुष(३) उत्तमज ,,
१००० महायुग=१ कल्प७ वैवस्वत(औत्तमि) ,,
४३२००००००० वर्ष८ सावणि(४) तामस ,,
=ब्रह्मा का १ दिन९ दश सावणि(५) रैवत ,,
३६० कल्प=१ वर्ष ब्रह्मा का१० ब्रह्मा ,,(६) चाक्षुष ,,
आयु १०० वर्ष११ धर्म ,,इस समय सातवाँ
प्रत्येक मन्वंतर के आदि और१२ रुद्र ,,वैवस्वत मनु वर्तमान
अन्त से १ संधि सतयुग१३ देव ,,हैं । इसके आरम्भ से
प्रमाण=१७२८०००१४ इन्द्र ,,आज तक २७ महायुग

बीत चुके हैं २८ वें महायुग में ३ युग बीत कर चौथा युग कलियुग वर्तमान है ।

६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

प्रत्येक मन्वंतर के आदि अन्त में प्रलय काल की सन्धि होती है । इस प्रकार ६

मन्वंतर में आदि सन्धि मिलकर ७ सन्धि गत हो चुकी और सातवें मन्वंतर के २७

महायुग बीत चुके हैं। अब देखना है कि कलियुग के आरम्भ तक कितने वर्ष व्यतीत

हो चुके हैं ।

१ महायुग=४३२००० 0 वर्ष

१९२७

१ सन्धि-१२२८००० १ सतयुग १७२८०००

२७ र त्रेता १२९६०००

& २७ महायुग-1१६६४००००,, ७ संधि=१२०९६००० ३ द्वापर ८६४०००

१ सतयुग=४३२००० % ४=१७२७८००० वर्ष

२ त्रेता= » %३=१२९६००० ,,

३ इपर= २ > रेप ८६४००० २

४ कलियुगः » %१- ४३२००० ,,

एकं महायुग=४३२०००० „,

% ७१

७१ महायुग=१ मन्वंतर=३०६७२०००० ,,

२६):

६ मन्वेतर "११११ २१८४०३२००० ०,

इनकी ७ संधियाँ ‡ १२०९६०००,,

७ संधियों समेत ) त आ योग=१८५२४१६०००

गत २७ महायुग 1. ११६६४०००० ,,

योग=१९६९०५६००० ,:

0गत ३ युग सतयुग ;

चेता,दापर के वर्ष || WU F000 कट

योग=१९७२९४४००० ,,

कलि आरम्भ होने के समय । से सन्‌ ईस्वी आरम्भ तक] 1२१०२

योग=१९७२९४७१०२ ,,

0 ३युग=३८८८०००

यहाँ ६ मन्वंतर. के वर्ष निकाल

कर उनकी संधियाँ जोड़ी तो

गत ६ मन्वंतर तक के वर्ष

हुए । वर्तमान सातवें मन्वंतर

में २७ महायुग बीत चुके है।

इससे इनके वर्ष और जोड़ा ।

२८ थें महायुग में ३ युग केवल

बीते हुँ, इस कारण ३ युग

के वर्षे और जोड़े तो कलियुग

आरम्भ होने तक के सृष्टि

आरम्भ के वर्ष निकल आये ।

सन्‌ ईस्वी के आरम्भ तक

कलियुग के गत वर्ष .३१०२

और जोड़ा तो सन्‌ ईस्वी

आरम्भ समय तक. के वर्ष सृष्टि आरम्भ के प्राप्त हुए ।

सृष्टि आरम्भ होने से वर्तमान कलियुग आरम्भ होने तक १९७२९४४००० वर्ष याः

ईसा के जन्म समय तक ( सन्‌ ईस्वी आरम्भ होने तंक ) = १९७२९४१०२ वर्षं हो

चुके हैं ।

इसके आगे वर्तमान सन ईस्वी जोड़ दो तो वर्तमान सन ईस्वी तक सृष्टि आरंभ

होने का वर्ष निकल आयेगा ।

या द्वापर तक के वर्ष १९७२९४४००० में ३०४५ ओर जोड़ दो तो सम्वत

आरम्भ होने तक का सृष्टि आरम्भ का समय निकल आयगा.।

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