सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
३०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
पीनस--१--व्यय भाव में पाप ग्रह हो, चंद्र छठे शनि आठवें भाव में हो लग्नेश पाप ग्रह के नवांश में होःतो पीनस रोग हो (जा० पारि०) । २--शनि मंगळ सूर्य ये अशुभ स्थान में एकत्र हों तो नासिका रोग हो अनेक ज्याधि व शत्रु भय हो ।
आमवात--१--क्रूर लग्न में जन्म हो और लग्नेश कूर ग्रहों से युक्त हो तो आमवात रोग से कष्ट हो (ल० चं०) । नाभि में रोग-षष्ठेश तृतीय में हो तो नाभि में दृढ़ रोग से दुःख हो सम्पूर्ण गाँव 'को दुःख देवे (जा० ल॑०) । | माता (चेचक)--१--मंगल लग्न में हो उसे शनि व सूर्य देखते हों तो शीतला हो (जा० पारि०) । ई श्वेत कुष्ठ--१--शुक्र शनि दोनों मंगल की राशि में हों चंद्र व्यय में हो, मंगल तीसरे भाव में हो तो एवेत कुष्ठ हो ।
२--षष्ठ में मीन या मेष के नवांश में स्थित चंद्र पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो श्वेत कुष्ठादि हो (जा० सं०) ।
३--युरु शनि दोनों अष्टम में हों चन्द्रमा षष्ठ में हो, बुध शुक्र नवप में हों तो चित्र देह हो (जा० सं०) । ; ४--चन्द्र लग्न में, सूर्य सप्तम, और शनि मंगल दूसरे या बारहवें हों तो श्वेत कुष्ठ हो (वृ० जा०) ।
५- लग्नेश अष्टम भाव में पाप युक्त या दृष्ट हो तो श्वेत कुष्ट, मंदारिनि, दाद खुजली आदि हो (शंभु ०) । ६--छग्नेश और बुध ये दोनों या मंगल और चन्द्र ये दोनों राहु या केतु से युक्त होकर कहीं हों तो श्वेत कुष्ठ साजन आदि रोग हो (जा० छ॑०) । ७--चन्द्रमा मेष या वृष राशि में मंगळ, शनि युक्त हो तो श्वेत कुष्ठ व रोगी हो (जा० लं०) ।
८-नीच में व चर राशि में शुक्र में चन्द्र का योग पाप युक्त हो तो पांडु कुष्ट हो (शंभु) ।
रक्त कुष्ट--१--सुर्य कहीं भी मंगल या शनि युक्त हो तो रक्त कुष्ठ, कृष्ण कुष्ठ (देह में लाल या काले चिट्ठे पड़े) हो ( जा० लं० )। २--शुक्र गुरु चंद्र या शनि ये चारों मीन या ककं या वृश्चिक राशि में हों तो रक्त कुष्ठ हो शरीर सुड रहित हो ( जा० ०) ' - ३--शनि के साथ चंद्र षष्ठ भाव में हो तो ४५ वर्ष में रक्त कुष्ठ हो (वृ० पा०)। कुष्ठ--१-नवम पंचम भाव में २,४,१०,८, राशि हो और पाप ग्रह युक्त या ` दृष्ट हो तो कुष्ठ हो ( जा० सं० ) |
२- चन्द्र, बुध ओर लग्नेश मङ्गल के साथ तीनों ग्रह हों तो कोढ़ हो ।
नीरोगता : ३०७
३--चन्द्र ५,१०,४,१२ राशि के नवांश में हो और शनि और मंगल से युक्त या
दृष्ट हो तो कोढ़ हो ( स० चि० )1
४---चन्द्रमा १,१०,४,१२ राशि के नवांश में शनि मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो
कुष्ठ हो ( शंभु० ) यदि शुभ ग्रह को दृष्टि हो तो कुष्ठ न होकर अंड वृद्धि, व्रण,
बवासीर, भगन्दर आदि हो ।
५- चन्द्रमा पाप ग्रह के बीच के नवांश में हो तो कुष्ट हो ( शंभु० ) ।
६- सप्तम में बुध तथा शनि हो । र
७--चन्द्र के घर का बुध हो तो कुष्ठ या क्षय रोग हो ( मौन० ) ।
८--लग्न में मंगल, अष्टम में सूर्य, चतुर्थ में शनि हो तो कुष्ठ हो ( मान० )।
९--मंगल या बुध लग्नेश होकर चन्द्र राहु या शनि से युक्त हो तो कुष्ठ हो
( बृ० पा० ) ।
१०--धन राशि में और घन नवांशक में या पाँचवें/नवांश में चन्द्र हो शनि या
मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो कुष्ठ हो ।
११--८,४,१० राशि त्रिकोण या लग्न में हो और पाप ग्रह से वह राशि दुष्ट
हो तो कोढ़ हो ( प्रा० यो० ) ।
१२---चन्द्रमा मंगल शनि और शुक्र जळ राशियों में पाप पीड़ित हो तो छूता
संज्ञक कुष्ठ हो ( शंभु० ) ।
१३--चतुर्थ में चन्द्र सहित राहु मंगळ दोनों हों तो २५ वर्ष में मंडल कुष्ठ
होवे ( जा० सं० )।
१४---४,५,१२ राशि कूर ग्रह युक्त हो तो अवलताकार कुष्ठ हो शरीर में मकड़ी
के समान फतकता हुआ क्लेश कारक कुष्ठ हो ( जा० लं० )।
१५---चन्द्रमा मंगल युक्त हो तो कुष्ट, ` भगन्दर, बवासीर, खुजली आदि रोगों
से पीड़ित रहे ( शंभु० ) ।
१६--शनि या मंगल से युक्त चन्द्र ४,१२,१० राशि के नवांश में हो शुभ योग
दृष्टि न हो तो कुष्ठ हो ( जा० पारि० ) ।
१७--पाप ग्रह नीच के हों उन पर पाप ग्रह की दष्टि हो या वे पाप ग्रह के
नवांश में होकर पंचम घर में हों तो कोढ़, रक्तपित्त आदि रोग हो ( प्राश यो० ) ।
१६--२,४,८,१० राशि में कोई राशि त्रिकोण में और लग्न में भी हो या पंचम
नवम से एक स्थान में और लग्न में हो वह राशि पाप युक्त या दृष्ट हो तो कुष्ठी हो
( वृ० जा० ) ।
१९--षष्ठ भाव में गुरु हो गुरु की राशि में चन्दर हो तो १९ या २२ वर्ष में
कुष्ठ हो ( बु» पा० ) ।
२०--चंद्र, बुध, लग्नेश, राहु या केतु के छठे घर में हो तो कमळ कुष्ठ हो ।
२१--छमग्नेश को छोड़कर उक्त ग्रह रन में हों तो कुष्ट हो ( स० चि० ) ।
इसी प्रकार इतरजनों का विचार--भाव कारक और भावेश से भी इसी प्रकार
३०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
मित्र आदि भावों में हो तो स्थिर से उत्पन्न कुष्ठ ग्रह के उक्त स्थान में अवश्य होगा
( स० चिं० ) ||
श्वेत कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो और लग्न में राहु युक्त हो ।
कष्ण कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो और लग्न में शनि युक्त हो ।
रक्त कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो ओर लग्न में मंगल युक्त हो ।(वृ० पा०)
कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य पाप ग्रह लग्न में हों ।
नील कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य शनि ग्रह लग्न में हों ।
रक्त कुष्ठ--छग्नेश को छोड़कर अन्य सूर्य ग्रह लग्न में हों । (जा० पारि०)
एवेत कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य मंगल ग्रह लग्न में हों ।
विचार--उपरोक्त योगों में चन्द्र पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो कुष्ठी न होगा किन्तु खाज, दाद, खुजली आदि चमं रोग होंगे ।
दब्रु--१-सप्तम में सूर्य बुध चन्द्र हो शेष ग्रह चतुथं में हो तो दद्रु ( दाद ) रोग हो ( जा? सं० ) ।
२--चन्द्रमा स्निग्ध राशि का सप्तम में हो, चौथे नवांशक स्थित शनि से दृष्ट हो तो दाद रोग से पीड़ित रहे ( शंभु० ) ।
३--जछचर राशि स्थित चन्द्र लग्न से दूसरे स्थान में हो या शनि युक्त हो या लग्न में सूर्य हो तो दाद रोग हो ( जलचर, कर्क, मकर पराद्धे और मीन राशि ) ( जा० लं० )।
खजुली--१-मीन या मेष के नवांश में चन्द्र शुभ ग्रह से दुष्ट हो (जा० सं०) । २--जलचर राशि में चन्द्र पाप युक्त हो शनि से दृष्ट हो ( शंभु० ) । ३--तृतीय भाव में मंगळ शनि बली हों तो खजूली आदि हो ( जा० पारि० )1 रक्त रोग--१--चन्द्र बुध और लग्नेश सूर्य युक्त हो तो रक्त का रोग हो ( स० चि०)।
२--मंगल १, १२, ६,७ भाव में शनि युक्त सूर्य से दुष्ट या अस्तंगत, शत्रु गुही हो तो रुधिर का रोग हो ( स० चिं० )।
३--छठे स्थान में मंगल या शनि हो । मंगल हो तो रक्तविकार से शनि होतो अन्य विकार से रोग हो ( शंभु० ) ।
४--सप्तम में पाप युक्त सूर्य हो तो रुधिर विकार एवं वातोदर से पीड़ा हो ( शंभु० ) ।
५--लग्न में शनि, मंगल राहु और सूर्य हो तो उसे रक्त दोष हो और संताप हो ( लू० चं० ) ॥
६--चन्द्रमा ६ या ८ भाव में हो मंगल से दृष्ट हो लग्न में शनि हो तो रक्त रोग हो ( जा० पारि० ) ।
७--षष्ठेश ८ या ४ राशि के नवांश में हो शनि से दृष्ट हो तो रुधिर ओर पवन विकार पीड़ित हो ( जा० सं० ) ।
नीरोगता : ३०९
८--राहु, मंगल, सूर्य से युक्त शनि हो शुभ दृष्टि न हो तो रुधिर ताप करने वाला हो ( जा० सं० )। र
रक्त पित्त--१--मंगल सप्तम में हो तो रक्त पित्त रोग हो ( जा० पोरि० )।
२--छठे स्थान में मंगल, षष्ठेश पाप युक्त या दृष्ट हो तो रक्तपित्त पीड़ा हो ( स० चिं० ) । क
३--छठे स्थान में मंगल क्रूर नवांश में पाप दृष्ट हो तो रक्तपित्त व्याधि हो
{ स० चिं० )। 2
(४) चन्द्र के क्षेत्र में मंगल हो तो रक्त के निमित्त से हीनांग ऑर नाना प्रकार
की व्याधि से युक्त हो ( मान० ) । व
ब्रण या चिह्ल--१--पाप ग्रह अष्टम हो तो व्रण युक्त या चोट लगने के दाग या
किसी प्रकार का चिह्न उसके गुह्मस्थान में होवे तथा बांई कमर में घाव व लांछत
हो ( शंभू ) ।
शरीर में घाव--२-लग्नेश और अष्टमेश दोनों शनि, राहु या केतु से यृक्त हो
तो उनमें जो बलवान् हो उसकी दशा में शरीर में घाव होवे ( जा० ल॑० )1
३--चतुर्थ में मंगल हो तो व्रण पीड़ित या अग्नि से दग्ध हो ( शंभु० ) ।
४--पंचम मंगल हो तो अग्नि व शस्त्र से पीड़ा हो संतान बराबर मरती रहे
मनुष्य दुखित हो ( शंभु० ) ।
५--लाभ में राहु शनि हो तो तद् भावोक्त अंग में काष्ठ या पत्थर की चोट हो
या मनुष्य व्यथा युक्त रहे ( शंभु० ) ।
६-शनि युक्त चंद्र १-२ या ३ राशि में हो तो पक्षियों से स्थूल घाव हो (जा.सं.) ।
७--षष्ठेश मंगल युक्त हो तो रुधिर और शस्त्र से संतप्त देह पत्थर तथा पृथ्वी
और पवन इनके प्रहार से युक्त करता है । भूख से संतप्त, देशाटन करने में राजदर्शन
से युक्त हो । ( जा० सं० ) ।
८--लग्नेश, षष्ठेश, और चंद्र एक साथ हो मंगल भी साथ हो तो चेचक, घाव,
फोड़ा या युद्ध में शारीरिक क्लेश हो ।
९- षष्ठ में पाप ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो ब्रणादि हो शारीरिक या मानसि
कष्ट, शत्रु, भय, मिथ्या अपवाद हो ।
१०- छठे स्थान में मंगल या सूर्य हो तो शस्त्र से चोट व्रण या प्रमेह या अग्नि
विष से उत्पन्न पीड़ा हो या हड्डी टूटने से पीड़ा हो । या रुधिर से उत्पन्न अति पीड़ा
या स्त्री के जंघा में या दाहिने पैर में चिह्न हो ( शंभु० ) ।
११- बुध के स्थान में सूर्य हो उस पर गुरु की दृष्टि हो तो शस्त्र की चोट से
शरीर विदीर्ण हो ।
१२-लग्नेश मंगल के साथ त्रिक में हो तो शस्त्र से घाव या व्रण या गठिया
वात हो ।
१३--लग्नेश बुध के घर में हो बुध से युक्त या दृष्ट हो तो गुह्य स्थान में ब्रण
हो ( जा० पारि० ) ।
घाव--१४--व्यय में शुक्र युक्त राहु हो तो अति घाव हो ( जा० सं० )।
॥
३१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१५-छग्न में मंगल हो सूर्य शनि से दृष्ट हो तो शस्त्र की चोट लगे (स० चि ०) ।
१६--कर्क लग्न में मंगल हो तो शस्त्र से चोट लगे ( जो० वगं० ) ।
१७--तीसरे भाव में शनि हो क्रूर दृष्ट हो तो बाहु में चिल्ल या शस्त्राघात हो ।
या छोटे भाई को पित्त से उत्पन्न गंड माला हो ( शंभुर ) ।
१८-मंगर अष्टम में पाप ग्रह से दृष्ट हो, केतु २ या ८ भाव में हो तो ब्रण या घाव हो ( जा० पारि० )।
१९--सूर्ये व मंगल दशम में हो तो पीठ की हड्डी के समीप या जांघ की जड़ में शस्त्र की चोट या अग्निदाह से ब्रण या दाग हो ( शंभु० ) ।
२०--चतुर्थ भाव पाप युक्त हो तो तीखी चोट कंधा या कुक्षि या हृदय में छगे।
२१--सूर्यं मंगल चतुर्थ में दशमेश से युक्त या दृष्ट हो या चतुर्थेश से युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर.की चोट लगे ।
२२---चतुर्थेश शत्रु शनि से युक्त मंगल से दृष्ट हो शुभ दृष्टि न हो तो पत्थरों से पीड़ित हो ( स० चि० ) ।
२३--चतुर्थेश सूर्यं या शनि से युक्त मंगल से दृष्ट हो शुभ दृष्टि न हो तो पत्थर की चोट लगे । ः
(२४) सप्तमेश शनि हो, चतुर्थ में मंगल और शनि हो दशमेश से युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर की चोट से मारा जावे या चट्टान से चोट लगे (स० चि० )। (२५) शुक्र की राशि का गुरु तीसरे भाव में हो कोई पाप ग्रह वक्री हो तो ११ वर्षे में पत्थर का प्रहार होवे (जा० सं०) ।
(२६) व्यय भाव में मंगल हो तो दाहिने और बायें भाग संबधी कमर में घाव हो, वाये नेत्र और बायें कर्ण में रोग हो खोटे कमं से ब्रण आदि भय हो । स्त्री की अधिक अंगता होवे (जा० सं०) । (२७) हितीय स्थान में पाप ग्रह हो तो मुख नेत्र या दक्षिण कंधे में या कर्ण में व्रण घाव या और कोई प्रहार हो (जा० सं०) ।
(२८) षष्ठेश क्रूर ग्रह होकर लग्न या अष्टम में हो तो शरीर में विस्फोट (ब्रण) आदि का चिल्ल हो (० चि०)।
(२९) ऐसा ही दशम स्थान में पाप युक्त षष्ठेश हो पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो अंत में व्रण हो (स चि०) ।
ब्रण इतर लोगों को--(३०) ऐसा ही विचार मित्र आदि सभी भाव से करना अर्थात् पिता आदि के लिए उसका घर उसका स्वामी और उसका कारक देखो । फिर यहाँ दिये हुए योग का विचार करो । भावेश भाव कारक ग्रह के दृष्टि योग से तथा बलाबल के अनुसार मित्र आदिको को भी व्रण कहना ।
ब्रण--(३१) छठे स्थान में सूर्य हो, षष्ठेश पाप युक्त या दृष्ट हो तो नाभि स्थान में पित्त विकार से ब्रण हो (स० चि)।
नीरोगता : ३११
. (३२ ॥ चन्द्र छर्न में हो सूर्य मंगछ दोनों सप्तम में हों तो फोड़ा आदि से कष्ट हो (जा० सं०) । (३३) गुरु अशुभ ग्रह की राशि में हो शुक्र शुभ ग्रह की राशि में हो तो ७ वर्ष में ब्रण हो (जा० सं०) ।
(३४) व्यय में सूर्य हो तो राज पुत्र और चोरों से धन हरण हो उसके चरण में चिह्न हो लाठी के प्रहार से चोट हो (जा० सं०) ।
(३५) दशम में राहु या शनि हो तो वायु दोष से पीडित रहे ऐसे योग में माता- पिता आदि के पूर्वोक्त स्थान में श्याम रंग का चिह्न (लाखन) होगा । माता पिता का वह एक ही पुत्र हो यदि दूसरे भाई भी हों तो बह अपुत्र या मृत पुत्र, रोग से पीडित, पत्थर काष्ठ की चोट से, जल में डूबने से, वृक्ष से गिरने से या
चौपाये से पीड़ा युक्त चोट हो (शंभु) ।
(३६) पष्ठेश ६, २ या ८ भाव में हो तो शरीर में ब्रण हो (वृ० पा०) ।
षष्ठ भाव में जो राशि हो उसके आश्रित बंग में व्रण हो इसी प्रकार पिता आदि
(दशम स्थानोदि) के स्वामी पष्ठेश युक्त ६, ८ भाव में हों तो पिता आदि सम्बन्धियों
के व्रण कहना (वृ० पा०) । ;
(३७) लग्नेश मंगल की या बुध की राशि में किसी भाव में हो बुध से दृष्ट हो
तो मुख में व्रण हो (वृ० पा०) । ८ ४
(३८) षष्ठेश राहु या केतु युवत लग्न में हो तो शरीर में ब्रण हो (जा० पारि०)।
(३९) वृश्चिक लग्न में मंगल गुरु शुक्र से अदृष्ट हो तो फुन्सी घाव युक्त होवे (शंभु०) । (४०) चतुर्थ भाव में शनि, मंगल के नवांश का हो और केतु युक्त हो तो उपरोक्त फल हो (शंभु) ।
ब्रण--(४१) शनि मंगल के साथ ६,७,१२ भाव में कहीं हो तो भी उपरोक्त फल हो (शभु०) । ८ (४२) षष्ठेश सूर्य पाप युक्त नवम भाव में हो, छठे शुभ ग्रह और शनि मंगल गुरु
हो तो वह पापी हो, कृष्ण रंग के विरूप व्रण हों। ऐसे ही विकृत पैर भी होंवें (शंभु) ।
(४३) ६ या ८ घर में मंगल या केतु हो तो व्रण हो (लल०) । ; (४४) ६ या ८ घर में राहु और मंगल की दृष्टि हो तो पीठ का फोड़ा (दार
बन्द) हो (फल०) ।
(४५) षष्ठेश पाप युक्त लग्न या अष्टम में हो तो ब्रण (जा० सं०) । ः रे
(४६) षष्ठेश बुध से युक्त या दृष्ट हो तो गिरने या लोह प्रहार से अंग विदीर्ण
|, 'जा० स०) । ८ दो न सी होतो i पत्थर या चौपायों से चोट पहुँचे (जा०सं०)।
(४८) षष्ठेश चन्द्रमा मंगल युक्त हो तो शस्त्र प्रहार तथा अग्नि रोग या अग्नि
दाह से संतप्त देह हो (जा० सं०) ।
३१२१: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(४९) राहु या.शुक्र की दृष्टि हो तो जिस राशि में राहु.हो उस राशि के अंग
में व्रण हो (जा० पारि०) । र
म्ण के स्थान--(१) षष्ठेश पाप युक्त या दृष्ट होकर लग्न से अष्टम में हो तो
षष्ठेश के अनुसार यहाँ बताये स्थान में ब्रण होगा (जा० ल॑०) ।
(२) या ६, ८ भाव में षष्ठेश से युक्त जो ग्रह हो (जा० पारि०) ।
(३) या ६ भाव में जो ग्रह हो वे इन स्थानों में ब्रण करते हैं :--
सूर्य-सिर में घाव गुरु--नाभि या कटि में ब्रण
चंद्र—मुख में व्रण शुक्र--नेत्र पर व्रण
मंगल--कंठ में व्रण शनि--यांव में व्रण
बुध--हृदय में व्रण राहु केतु--ओठों में या पेट में या पीठ
र में ब्रण ।
(४) षष्ठेश या उसका कारक १, १० या ८ भाव में हो तो भी उपरोक्त स्थान
में ब्रण करते हैं (प्रा० यो०)।
हा अच्छे हों--इन उपरोक्त रोगों में शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो व्रण अच्छे हो जाते हैं ।
रोग बढ़े--यदि.उन पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो अच्छा न होकर उनमें
विकार होता है 1
कीड़े पड़ें--यदि शनि की दृष्टि हो तो व्रण में कीड़े पड़ें ।
काटना या चीरना पडे--यदि मंगल की दृष्टि हो तो ब्रण आपरेशन करना पड़े
(प्रा० यो०) । या लग्नेश षष्ठ स्थान में हो कर यदि :---
सूर्य से युक्त हो--जानवर से व्रण ।
चंद्र युक्त हो--जलचर के योग से व्रण ।
मंगल युक्त हो--शस्त्र लग कर व्रण ।
बुध युक्त हो--पित्त रोग से ।
गुरु युक्त हो--जीभ का रोग हो ।
शुक्र युक्त हो--पांडु रोग हो ।
शनि युक्त हो--चारों के उपद्रव से व्रण ।
राहु केतु युक्त हो--महामारी का उपद्रव ।
इनमें शुभ योग हो तो आरोग्य होता है । पाप योग से दुःख बढ़ता है(भा०यो०)। सिर में घाव (१) लग्न में लग्नेश ओर मंगल बुरे ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो सिर में घाव या फोडा. पत्थर या तलवार में हो । (२) लग्न में लग्नेश और शनि हो, पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो सिर में चोट गिरने से, चट्टान अग्नि या शस्त्र से हो। (३) पाप ग्रह कोई या सब लनन में हो तो सिर में बड़ा कटने का निशान या कुरूपता का चिह्न हो।
नीरोंगता : ३१३
(४) यदि ये पाप ग्रह बुरी स्थिति में हैं और लग्नेश निर्बल हो. तो ये चोट के
निशान बड़े भारी होंगे जिससे स्थाई चोट या कुरूपता हो .।
(५) यदि लग्नेश अच्छे साथी युक्त, उच्च में या शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो
चोट साधारण एवं अल्प होगी नाम मात्र को सिर में चोट का चिन्ह होगा। |
ग्रहों का बलाबल और अच्छा बुरा प्रभाव विचार कर फल कहना (स०चि०) ।
माता-पिता आदि के भी व्रण विचार--उपरोक्त योगों में जिस प्रकार जातक
को ब्रण होना बताया है उसी प्रकार माता-पिता पुत्र आदि को उनके भाव को लग्न
भाव मानकर विचारने से उनके ब्रण का भी फल प्रगट होगा । जेसे--
(४५) षष्ठेश पाप युक्त लग्न या अष्टम में हो तो शरीर में घाव हो । चतुर्थ
भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर चतुर्थ या चतुर्थ से अष्टम में हो-माता की
देह में व्रण ।
दशम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर दशम या दशम से अष्टम में हो-
पिता को ब्रण ।
पंचम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर पंचम या पंचम से अष्टम में हो- .
पुत्र को ब्रण ।
सप्तम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर सप्तम या सप्तम से अष्टम में
हो-स्त्री को व्रण ।
तीसरे भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर तीसरे या तीसरे से अष्टम में
हो-भाई को ब्रण ।
इत्यादि प्रकार से सबके सम्बंध में इस योग का विचार उपरोक्त प्रकार से कर
सकते हैं ।
गंड माला-(१) ६,८ भाव में मंगल शनि साथ हों उस पर शुभ दृष्टि न हो तो
गंड माला फोड़ा आदि रोग हो (शंभू) ।
मूत्र रोग-सप्तम में शनि व राहु हो तो मूत्र रोग हो ।
मूत्र कच्छ-(१) षष्ठ में जल राशि हो उसमें चन्द्र हो।
(२) या षष्ठेश जल राशि में हो और उस पर बुध की दृष्टि हो (स० चि० )।
(३) सप्तम में मंगळ पाप युवत या दृष्ट हो तो मूत्र कुच्छु रोग हो और पुरुषत्व
से हीन हो (शंभु०) । र
(४) षष्ठेश पाप युक्त नवम में हो या बष्ठेश व्ययेश युक्त कहीं हो पर शनि
दृष्ट हो तो मूत्रक्ृच्छू रोग हो (ज्यो० शा०)। ५
(५) ७,६ या ८ स्थान में बहुत पाप ग्रह क्र्रांशक में हों तो मूत्रकूच्छ रोग हां
(स० चि०) [| हि
(६) चन्द्रमा जलचर राशि में हो उसका स्वामी षष्ठ स्थान में हो उस पर जलचर राशि गत ग्रह की दृष्टि हो तो मृत्रकूच्छू हो (जा० पारि०) । प
प्रमेह--(१) पंचम स्थान में सूर्ये शनि शुक्र से युक्त हो या सूर्ये लर्न में, मंगल
३१४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
सप्तम या दशम मंगल शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो प्रमेह रोग हो (शंभु०) । (२) अष्टमेश अपने नवांश में होकर राहु के साथ अष्टम भाव से त्रिकोण में हो तो १८ या २२ वर्ष में प्रमेह आदि रोग या गठिया रोग हो (वृ० पा०) वीर्य विकार--लग्न में गुरु, सप्तम मंगल हो तो वीर्य विकार हो (जा० भ०) ।
उपदंश--(१) षष्ठ स्थान में शुक्र हो तो उपदंश रोग हो । (ज्यो० शा० ) 1 (२) चंद्र बुध और लग्नेश सूर्य युक्त राहु के साथ हो तो उपदंश हो यदि उप- रोक्त तीनों ग्रह सूयं के नवांश में हों दो भी वही फल हो (स० चि० )1 इन्द्रिय रोग--अष्टम में कई पाप ग्रह हों तो गुप्तांग में कई विकार हों (स०्चि०) (२) षष्ठेश बुध युक्त लग्न में हो तो शिश्न में रोग हो (स० चि०)। (३) चन्द्र ४८ या ११ राशि के नवांश में शनि युक्त हो तो भोग इन्द्रिय में रोग हो (स० चि०)।
४-छठे भाव में मंगल लग्नेश युक्त हो तो घाव से शिशन में रोग हो (जा. पारि.) । ५-शुक्र ७ या ८ घर में हो तो गुप्तांग में रोग हो ( फल० ) । ६~षष्ठेश शनि युक्त लय में हो तो किसी कठिन रोग से गुप्तेन्द्रिय में चीरफाड़ हो । शिशन कटे--१-षष्ठेश शनि युक्त लग्न में हो ओर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो शिश्न काटा जावे ( स० चि० ) | २-ष्ठेश बुध युक्त तया राहु युक्त लग्न में हो तो आप ही अपना लिंग कटा देवें ( स० चि० ) ।
३-यदि षष्ठेश मंगल सहित हो उस पर शुभ दृष्टि न हो तो किसी रोग से लिंग छेदन हो अर्थात् काटा जावे या लिग का रोग हो ( स० चि० ) । ४-सू्यं युक्त राशि लग्न में हो उस पर शुक्र या चन्द्र की दृष्टि हो और ' सूर्य ग्रहण लगता हो तो लिंग काटा जावे और वह अपयशी हो ( जा० ल॑० ) | नपुंसक--१-दशम में या अष्टम में शनि युक्त शुक्र हो शुभ दृष्टि रहित हो या शनि ६, १२ भाव में नीच का हो तो नपुंसक हो । २-विषम राशि में स्थित सूर्य, सम राशि में स्थित चंद्र हो परस्पर एक दूसरे पर दृष्टि हो।
३-विषम राशि में शनि, सम राशि में बुध हो, परस्पर दृष्टि हो । ४-विषम राशि में मंगल, सम राशि में सूर्य हो परस्पर दृष्टि हो । ५-विषम राशि में लग्न व चन्द्र दोनों हों ओर सम राशि में स्थित मंगल से दुष्ट हो।
६-विषम राशि में स्थित चन्द्र व बुध ये दोनों विषम राशि स्थित मंगल से दृष्ट हों ।
५-लग्न, शुक्र व चन्द्र ये तीनों पुरुष ग्रह राशि व नवांश में हों तो नपुंसक हो । “पाप ग्रह सप्तम स्थान में हों उन पर शुभ दृष्टि न हो तो नपुंसक हो । १-षष्ठेश ओर बुध राहु के साथ लग्नेश के सम्बन्धी हों तो नपुंसक हो ।
नीरोगता : ३१%.
१०-सप्तम में गुर के साथ राहु हो तो नपुंसक हो । ११-शुक्र से ६ या ८ स्थान में शनि हो तो नपुंसक नहीं होता किन्तु नपुंसक के समान होता है ।
अन्यमत--शुक्र से ६ या १२ स्थान में शनि हो तो उपरोक्त फल हो। इन्द्रिय सुख--यदि अष्टम भाव शुभ ग्रह युत या दृष्ट हो तो भोग इन्द्रिय के लिए बड़ा सुख होगा ।
विचार--फल कहते समय उस वात के कारक का भी विचार करना चाहिए । मान लो अष्टम में बुध और गुरु ये दो शुभ ग्रह हैं तो भोग इन्द्रिय स्वस्थ होगी परन्तु मान लो शुक्र मंगल और शनि सप्तम में है या चतुथं में है तो भोग इन्द्रिय रोगी होगी और उसका आचरण भी खराव होगा । गुप्त रोग--१-षष्ठेश वृश्चिक या ककं के नवांश में हो मंगल से दुष्ट हो तो भंग गुप्त रोग से पीड़ित रहे ( जा० सं० )1
२-चन्द्र वृश्चिक या ककं नवांश में पाप युक्त हो तो गुप्त रोग हो (वृ० जा०) । ३-गुरु छर्न से व्यय स्थान में हो तो ऐसा रोग हो जिसे वैद्य भी न जान सके ( जा० छं० ) ।
प्रगट रोग--१-शुक्र मंगल सप्तम हो उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो शरीर में बाहर से रोग प्रगट रहेगा ( वृ० जा० ) । अंड वृद्धि-१-अष्टम में मंगल युक्त शुक्र हो तो वायु विकार से अंडकोष की वृद्धि हो ।
२-मंगल की राशि में स्थित शुक्र व चन्द्र ये दोनों गुरु से दृष्ट हों तो वीयं व रक्त इन दोनों के मिश्रित विकार से अतिशय अंडकोष की वृद्धि हो ( जा० छं० ) | ३-राहु लनन में, गुलिक त्रिकोण में, मंगल ओर मांदि केन्द्र में हों तो बड़े अंडकोष हों ।
४-अष्टमेश का नवांश स्वामी राहु के साथ हो तो अंडवृद्धि हो ( स० चिं० ) । ४-तृतीय स्थान में शनि मंगल राहु हो पष्ठेश से दृष्ट हो ( जा० पारि० ) ।
६-छग्न में राहु मंगल या शनि के सांथ हो ( जा० पारि» )। ७-छग्नेश राहुं या गुलिक के साथ अष्टम में हो तो बड़े अंडकोष हों (जा पारि.)। ८-लग्नेश राहु या दुसरे पाप ग्रह युक्त अष्टम में हों तो अंड वृद्धि हो । यदि ग्रह बलवान् हो तो बुरा रोग हो, अशक्त हो तो साधारण रोग हो । अष्टम भाव गुप्तांग सूचक है ।
९-लग्नेश के नवांश स्वामी के साथ राहु आदि और मंगल हो तो अंड वृद्धि हो ।
यदि तीनों ग्रह साथ हों तो उपरोक्त फल होगा यदि उनमें एक ही ग्रह हो तो
कम फल होगा । १०-मंगळ राहु या राहु शनि के योग से अंड वृद्धि हो ( जा० पारि० ) | वृषण रोग--१-मीन लग्न में सूर्य हो मंगल से दृष्ट हो । या शुक्र घुक्त वृश्चिक
“३१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
खरन में जन्म हो तो वृषण रोग हो ।
२-रूग्न में मंगल हो तो नाभि में गुल्म तथा वृषण ( फोते ) में रोग हो
६ जा० पारि० ) ।
गुदा रोग--१-अष्टम भाव में पाप ग्रह व बारहवे स्थानः में चंद्र हो तो गुदा में
रोग होकर अरिष्ट हो ( प्रा० यो० ) ।
२-छग्नेश १,८,३,६ इनमें से किसी राशि में हो शत्रु ग्रह से दृष्ट हो तो गुदा में
रोग हो ( जा० ल॑० )1
३-पाप युक्त चंद्र ककं या कर्कांश में हो तो गुदा में रोग हो ( शंभु० ) ।
४-अष्टमेश सप्तम में, षष्ठेश अष्टम में हो तो गुदा से रक्त बहने का रोग हो
{ कल० ) ।
५-लग्नेश मंगल वुध चोथे या बारहवें भाव में एक साथ हो ।
६-या इन ग्रहों की दृष्टि चौथे या बारहवें भाव पर हो तो गुदा में रोग हो
(स० चिं० )।
७-चंद्रमा शुक्र ६ या ८ भाव में हो तो मंदाग्नि और गुदा में रोग हो (शंभु०) ।
८-सप्तम भाव शनि से युक्त या दृष्ट हो तो गुदा रोग, गुल्म तथा प्रमेह रोग
हो ( जा० सं० ) ।
९-पाप युक्त चंद्र अष्टमेश की राशि में हो अष्टमेश पर राहु की दृष्टि हो तो
अवासीर हो ( जा० पारि० )।
१०-अष्टम भाव ३ या ४ पाप ग्रहों से युक्त हो तो भी उपरोक्त फल हो । शुभ
अहों के योग होने से यह रोग नहीं होता ( जा० पारि० ) ।
११-ककं राशि पर सूर्यं हो उस पर शनि की दृष्टि हो तो मूल व्याधि (बवासीर
रोग) हो ।
१२-वृश्चिक राशि का स्वामित्व गुह्य भाग पर है इस राशि में मंगल या राहु
हो तो मूल व्याधि हो ।
१३-कक का चंद्र १, २, ६, ८ स्थान में कहीं हो तो रक्त पित्त या मूल व्याधि
रोग हो । चंद्र दशा में मंगल का अंतर आते पर यह रोग होगा ।
१४-अष्टमेश क्रूर ग्रह होकर सप्तम में शुभ दृष्टि रहित हो तो उसे अशं
( बवासौर ) हो ( शंभु० ) ।
१५-सप्तम में वृश्चिक का शनि, नवम में मंगल हो और दिन का जन्म हो तो अशं हो ।
१६-शनि वारहवें भाव में लग्नेश तथा मंगल से युक्त दुष्ट हो । १७-वृश्चिक या मंगळ चतुर्थ भाव में हो गुरु की दृष्टि न हो । १८-ऊग्न में शनि, सप्तम में मंगल हो तो भी अर्श हो (- शंभु० ) ।
१९-छग्नेश मंगल और बुध एकत्र होकर अशुभ भाव में हों या वे छठे भाव को देखते हों तो गुदा रोग बवासीर आदि हो ( जा० पारि० )1
नीरोगता : ३१७
२०-छग्नेश पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट होकर पीड़ित हो तो गुह्य विकार होना
संभव है ।
संग्रहणी--१-धन भाव में राहु या सूर्य हो तो संग्रहणी रोग हो ( शंभु० ) । २-धन भाव में राहु या शनि हो तो संग्रहणी रोग हो ( शंभु० ) । ३-छठे भाव में शुक्र हो ठो अतिसार रोग हो (स० चिं० ) । आसन में रोग--मंगल बुध की राशि में हो ।
मृगी--१-६ या ८ भाव में शनि मंगल युक्त हो तथा जन्म में सूर्य चन्द्र पर
परिवेश ( सोडल ) हो, लग्न त्रिकोण में गुरु न न हो तो मृगी रोग हो ( शंभु० ) ।
२-६ या ८ भाव में शनि और मंगळ हो ( स० चि० ) ।
३-पाप ग्रह ६ या ८ या १२ भाव में हो गुरु परिधि वाला हो केन्द्र में न हो तो मृगी हो ( स० चि० )।
४-लग्न में राहु और ६ भाव में चन्द्र हो तो मृगी हो ( ल० चं० ) । ५-मंगल शनि युक्त हो और चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो तो मृगी हो (पु. जा.) । ६-६ या १२ स्थान में चंद्र के साथ शनि या मंगल में से कोई हो । इनमें से
दूसरा ६ या १२ स्थान में उसके सन्मुख हो !
७-शनि मंगल और सूर्य अष्टम स्थान में आवें तो अपस्मार (मृगी) और नाना
प्रकार की व्याधि उत्पन्न करते हैं ।
८-चंद्र बुध पाप दृष्ट केन्द्र में हों पंचम या अष्टम भाव में पाप ग्रह हो तो यह सत्यपद नाम का योग होता है इसमें मृगी रोग हो ( शंभु० ) ।
९-शुक्र लग्न में और चंद्र छठे भाव में हो तो मृगी आदि रोग हो (जा० सं० )1
१०-अष्ठम भाव में चन्द्रमा राहु युक्त या बलहीन हो तो मृगी हो (स० चि०)।
११-सव पाप ग्रह ८ भाव में हों, चंन्द्र शुक्र केन्द्र में हों तो अपस्मार हो और संतप्त रहे ( स० चिं० ) ।
उन्माद--१-मंगल युक्त चन्द्र छठ भाव में हों तो भ्रांति (चित्त भ्रम) श्वेत पांडु
आदि रोग हो ( स० चि० )। २-लग्न में सूर्य, सप्तम में मंगल हो तो पागल हो ( जा० पारि० )।
३-लग्न में शनि, सप्तम या त्रिकोण में मंगल हो ( जा० पारि० ) । ४-लग्नेश और षष्ठेश बुध युक्त हो तो मन के रोग से पीड़ित रहे (स० चि०) ।
५-पंचम स्थान में पंचमेश पाप ग्रह हो या अस्तंगत या वक्री हो तो उसकी बुद्धि
भ्रम कर पागल पन हो ( प्रा० यो० ) ।
६-लग्न में गुरु सप्तम में मंगळ हो तो विक्षिप्त हो ।
७-शनि लग्न में हो, मंगल सप्तम या पंचम या नवम में हो तो उन्मादी या
स्खलित वाणीवाला हो ('स० चिं० ) 1
८-सूर्य ३, ६, १२ घर में हो और यदि मंगल या चन्द्र ५ या ९ घर में हो तो वह पागल, मूखं या अस्थिर मन का हो ।
३१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
९-सूर्य और चन्द्र लग्न या ५ या ९ घर में कहीं हों गुरु ३ भांव में या किसी
केन्द्र में हो और जन्म समय शनि सबसे बलवान् हो तो वह पागल हो ( स० चिं० ) ।
१०-क्षीण चन्द्र और शनि बारह में हों तो पागल हो ( वृ" जा० ) ।
११-चन्द्रमा पाप युक्त एवं राहु युक्त बारहवें में हो या सपाप चन्द्र ७,९ या १२
घर में हो तो उन्मादी एवं कलह प्रिय हो ( स० चिं० )
१२-सूय और चन्द्र १, ३, ९ भाव में कही साथ हों गुरु केन्द्र या ३ भाव में हों,
शनि या मंगल के होरा में दिन का जन्म हो तो बावला, अद्भुत ढंग का हो (शंभु) ।
१३-लग्न में गुरु सप्तम शनि हो तो बावळा और पातकी हो (शंभु०) ।
१४-लग्न में शनि राहु ग्रस्त हो ओर नवम या पंचम में पाप ग्रह शनि मंगल हो
तो पागल हो (प्रा० यो०) ।
१५--लग्न में शनि, बारहवें सूये और त्रिकोण में चन्द्र मंगल हो तो उन्माद वुद्धि
का जड़ मूर्ख या चंचल बुद्धि वाला हो ।
१६-लभ्न या त्रिकोण में सूर्य चन्द्रमा या शनि गुरु केन्द्र में हों तो उन्माद हो
(स० चि०) ।
१७-जन्म समय में शनि या मंगलवार हो बुध केन्द्र में चन्द्रमा शुभांश रहित हो
तो उन्माद बुद्धि भ्रम संयुक्त रहे (स चि०)।
१८-शुक्र कर्कं लग्न में हो तो उन्माद हो ।
१९-तुतीय या नवम स्थान में शनि हो ।
सनकी १-शनि लग्न में, मंगल सप्तम और शनि नीच में हो तो सनकी होवे
{स० चि०) 1
२-शनि मंगल युक्त लग्न से ६ या ८ भाव में हो (स० चि०)।
३-गुरु बलहीन हो पाप ग्रह २ या १० भाव में हो शुभ युक्त या दुष्ट न हो तो सनकी होगा । गुरु नीच, अस्त, दृष्ट षष्ठेश आदि में होने से बलहीन हो (स० चि०); ४-बुध और चन्द्र केन्द्र में हों तो वह सनकी और दुःखी होगा (स० चिं०) ।
प्रमाद (सनक आदि)--
द्वितीयेश पाप युक्त शनि युक्त--अतिवात रोग की पीड़ा से प्रमाद हो ।
द्वितीयेश पाप युक्त सूर्य युक्त---राजा के कोप भय से प्रमाद हो । द्वितीयेश पापयुक्त मंगल युक्त-अति उष्णता से पीड़ित होकर प्रमाद हो (स०च०) मुखे १-शनि चन्द्र सूयं केन्द्र में हों तो दूसरे का द्रव्य खाने वाला मूखं हो (स० चि०)
२-शनि सूर्यं व मंगल ये तीनों चन्द्र को देखें तो वह शीतळ स्वभाव वाला अर्थात मूर्ख हो (जा० ०) ।
` ३-दशमेश वारहवे भाव में हो, बारहवे भाव का स्वामी द्वितीय भाव में हों और पाप ग्रह तीसरे भाव में हों तो वह मूर्ख होगा। दूसरों के भरोसे रहेगा (स०चिं०) ४-३ ग्रह नीच या शन् गृही या क्रूरांश में हों तो मूखं ओर जिद्दी हो (स०चिं०)
नीरोगता : ३१९
पिशाच बाधा १-चन्द्र लग्न में हो राहु से ग्रस्त हो (ग्रहण का समय हो) और
५, ९ भाव में पाप ग्रह शनि मंगल हो तो उस पर पिशाच लगा रहे (वृ० जा०) । २-राहु केतु सप्तम हो तो पिशाच रोग हो (जा० पारि०) । ३-शनि सप्तम में हो, शुभ ग्रह लग्न में हों ओर चन्द्र कहीं हो पाप ग्रह से दुष्ट हो तो भूतप्रेत पिशोच आदि देखने से रोग हो (जा० पारि०) । ४-गुरु लग्न में या ४,१० भाव में हो गुलिक केन्द्र में हो तो देव के कोप से रोग हो (जा० पारि०)।
अभिचार १-लग्न पर मंगल की दृष्टि हो, षष्ठेश १० या ७ भाव में हो तो अभिचार (जादू टोने आदि) से रोग ही (जा० पारि०)।
२-चर राशि लग्न में हो उस पर षष्ठेश की दृष्टि हो या मंगल लाभ में हो या धर्म भाव में स्थिर राशि हो, सप्तम में द्विस्वभाव राशि हो तो शत्रु के किये अभिचार
(प्रयोग) से रोग होगा (जा० पारि०)।
सिर में पीड़ा १--छग्न या लग्न के होरा में णप ग्रह हो तो सिर में पीड़ा हो ।
वह होरा पूर्वदल में हो तो सिर के वाये भाग में हो ।
बह होरा उत्तर दल में हो तो सिर के दक्षिण भाग में हो (शंभु०) ।
शिर रोग २-यदि १ या ६ का स्वामी राहु या केतु युक्त हो तो सिर ददं,सिर में चक्कर आना, पाँव रोग, चोट या अग्नि भय हो (स० चिं०) ।
३-षष्ठेश बल रहित लग्न में हो या लग्न में मंगल हो तो सिर में पीड़ा, मुख
रोग या गुल्म रोग या ग्रन्थि व्रण हो (स० चि०)।
(षष्ठेश जिसके नवांश में हो उसकी धातु अनुसार ग्रहोक्त अंग में रोग हो ।)
यजा १-धन भाव में पाप ग्रह हो या व्यय भाव में पाप राशि पाप दृष्ट हो तो
खल्वाट हो (शंभु०) ।
२-चन्द्रमा ४,५,६,८,९ राशि का लग्न में मंगल से पुष्ट हो तो खल्वाट (गंजा) हो (शंभु०) ।
३-कम्न में पाप ग्रह की राशि १,८,५,१०,११ या २,९ राशि छगन में हो उस
पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो गंजा सिर हो (वृ० जा०) ।
४-लग्न में २ या ९ राशि पाप ग्रह युक्त हो तो चंदुवा (गंजा) हो (जार ल॑) ।
गर्दन का रोग १--तीसरे घर में नीच का ग्रह हो, छठे में अस्त ग्रह हो इन दोनों
पर पाप दृष्टि हो तो गर्दन में रोग का भय हो ।
२-तृतीयेश बुध के साथ हो तो गर्दन का रोग हो ।
३-तृतीय भाव में पाप ग्रह हो गर्दन का रोग हो यदि वह मांदि के साथ हो तो
रोग कठिन हो ।
४-तृतीयेश राहु या केतु युक्त होकर बुध के साथ हो ।
५-राहु केतु जिस घर में हों उसका स्वामी तृतीयेश और बुध के साथ हो तो
यन में रोग हो (स० चि०) ।
३२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
६-तीसरे भाव में मंगल पाप ग्रह से दृष्ट हो ते गले में पित्त से राग हो और
भुजा में घाव से चिह्नित हा (जा० सं०) ।
७-तृतीय भाव में शत्रु ग्रह युक्त पाप ग्रह हो तो गले में बात प्रकोप हो, भुजा
में व्यया और जुआड़ी हो.। ग्रहों के बलाबल विचार कर कहे ( जा० सं० ) ।
८-राहु और द्वितीयेश दोनों तृतीयेश से युक्त हो तो गला में कष्ट हो (जा.पा.)
९-तीसरे भाव में नीच का ग्रह शत्रु गृही या अस्त हो पाप ग्रह से दृष्ट हो तो
विष प्रयोग से या विष खाने से गले में रोग हो इस के अभाव में धन का नाश हो
( जा० पारि० ) ! : रमणीक कंठ-तृतीय घर बली हो या गुरु और बुध से युक्त या दृष्ट हो या तीसरे
भाव के केन्द्र में गुरु या बुध हो तो रमणीक कंठ स्वर हो' ( जा० पारि० )।
मुख रोग १-द्वितीय भाव में शुभ या पाप ग्रह शत्रुगृही या शत्रु ग्रह युक्त हो तो
मुख रोग हो ( शंभु० ) ।
२-द्वितीय भाव में मंगल हो तो सूयं से दृष्ट हो तो मुंह मे स्पशं रोग हो ।
( जा० पारि० ) |
३-१, २, ७ या ८ भाव में सूर्यं या मंगल हो इन्हीं दोनों मे से एक दूसरे को
देखते हों तो मुख में आज्य स्पशे रोग, अग्नि भय, मसूरिका रोग हो ( जा०पारि०)।
४-गुरु या शुक्र दोनों में से कोई षष्ठेश होकर लग्न में हो और कूर ग्रहों से दृष्ट हो तो मुख में सूजन हो ( जो० लं० )।
५-बुध, राहु था केतु के साथ द्वितीयेश छठे घर में हो या जहाँ राहु है उस
राशि का स्वामी द्वितीयेश के सांथ हो तो तालु, जबड़ा या मुख में रोग हो । राहु जहाँ
है उसके स्वामी को दशा में जब उनमें से किसी ग्रह की अंतर्दशा हो तब रोग होगा ।
(स० चि० )।
दुमुख १-धन स्थान ( मुख स्थान ) में पाप ग्रह हो तो दुमुंख हो ।
२-धन भाव गत पाप ग्रह को पाप ग्रह की दृष्टि हो तो क्रोधान्दित मुखवाला हो |
( जा० पारि० ) ।
सुन्दर मुख१-धन भाव में शुभ ग्रह यदि उच्चादि वर्ग मे हो तो सुन्दर मुख हो । ( जा० पारि० ) । र
२-धनेश उच्च में या अपने मित्र के वर्ग में हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो सुमुख होगा ।
३-घनेश केन्द्र में हो तो हँस मुख सौंदर्य युक्त हो ( जा० पारि० )1 दंत रोग १-द्वितीयेश राहु छठे भाव में हो या राहु जिस राशि में हो उसके स्वामी से युक्त हो तो उसकी दशा अंतर्दशा में दातों का रोग हो दांत गिर जार्वे । द्वितीयेश, षष्ठेश या राहु की दशा अंतदंशा में हो ।
२-षष्ठेश द्वितीयेश से युक्त जिस भाव में हो उसका स्वामी जिसके नवांश में हो वह पष्ठेश से युक्त होवे तो दांत रोग हो या दांत गिर जावे ( स० चि० )।
नीरोगता : ३२१
३-हितीय भाव में राहु हो तो दांत रोग हो ( जा० सं० ) ।
४-राहु या केतु द्वितीय भाव में हो तो बड़े दांतवाला हो या दंत रोगी हो(शंभु.) ।
५-चन्द्रमा पाप ग्रहों की राशि में हो सूर्य मंगल की दृष्टि हो तो दाँतों को हरने
वाला हो ( जा० सं० ) ।
६-पाप ग्रह सप्तम भाव में हो शुभ दृष्टि न हो तो बुरे दाँत वाला या ओठों में
घाव हो ( जा० सं० )1 ८
७-राहु या केतु षष्ठ भाव में हो तो दाँतों में य' ओठों में रोग हो (प्रा० यो०) ।
८-१, २ या ९ लग्न में जन्म हो उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो दाँत का
विकार हो ( जा० पारि० )।
९-द्वितीयेश राहु युक्त दुष्ट स्थान में हो या राहु से युवत जो स्थान है उसके
स्वामी से युक्त हो तो उनकी दशा अंतदंशा में दंत रोग हो । बुध की अंतदंशा में जीभ
रोग हो ( जा० पारि० ) ।
१०-सूयं शनि द्वितीय भाव में हो तो श्रवण शक्ति व दाँतों का हरण हो
( जा० सं० ) ।
११-लगन में सिंह का चन्द्र हो पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो दाँत रोग शोथ रोग या
मस्तक रोग हो ।
१२-शनि, सूर्य, चत्र सप्तम हो शुभ ग्रह युत या दृष्ट न हो तो दंत नाश हो ( जा० भ० )।
१३-लग्न से सप्तम में सूर्य, चन्द्र, मङ्गल या शनि हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो ती दंत रोग हो ( प्रा० यो० ) ।
१४-पंचम शनि, लाभ में सूर्य, तृतीय घर में चन्द्र हो तो दंत रोग हो (प्रा.यो.) ।
१५-पाप ग्रह मेष वृष राशि का लग्न में पाप दृष्ट हो तो दंत विकृत हों (शंभु) ।
१६-कर्क, कुम्भ, वृश्चिकांश का चंद्रमा राहु केतु युक्त चतुर्थ में हो ओर पाप
युक्त हो तो दाँत और कंठ रोग हो ( स० चिं० )।
दंत और मुख रोग का विचार अन्य प्रकार से
उप पद से, सप्तमेश से द्वितीय में राहु हो--बड़े दाँत वाला हो ।
उप पद से, सप्तमेश से द्वितीय में केतु हो--अस्फुट वक्ता ( रुक कर बोले ) 1
उप पद से, सप्तमेश से द्वितीय में शनि हो--कुरूप ।
उप पद से सप्तमेश जो हो उससे द्वितीय में राहु हो--मूक ।
उप पद से सप्तमेश जो हो उससे द्वितीय में पापग्रह हो--बिना दाँत, अधिक या
बड़े दाँत वाला ।
उप पद से सप्तमेश जो हो उससे द्वितीय में केतु हो-वात व्याधि,अस्फुट वक्ता ।
उप पद से सप्तमेश जो हो उससे द्वितीय में अन्य ग्रह हो-मिला हुआ फल
(जमिनि०) ।
दाँत सहित जन्म--शनि और मंगल किसी भी राशि में बुध के नवांश में हो तो
बालक दाँत सहित जन्मे ( जा० पारि० ) |
२१ [] ,
३२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
वाणी विचार ( शुभ वाणी ) १--घन भाव वाणी का भी बोधक है हितीयेश शुभ ग्रह होकर उच्च का या मित्र स्थानी या केन्द्र में हो या शुभ घर में हो तो मिष्ट वाणी युक्त वह कुटुम्बियो की सहायता करेगा ।
२--दितीयेश शुभ ग्रह युक्त हो या दृष्ट हो, द्वितीय भाव में शुभ ग्रह हो तो मधुर वाणी हो ( स० चि० )।
३--द्वादशेश लग्न में हे! तो मधुर भाषी हो ( जा० ल॑० )। ४--हितीय भाव में बलवान् गुरु या बुध हो तो अच्छा बोलने वाला और अच्छा मुख हो ( जा० सं० ) |
#--द्वितीय भाव शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो सुन्दर वाणी हो और धन सुख हो ( जा० सं० )।
६--छग्न व द्वितीय भाव में गुरु हो तो मीठे वचन बोलने वाला प्यारी व सत्य वाणी बोलने वाला हो ( शंभु० ) । > : ७ लग्न या द्वितीय में बुध हो तो भी वही फल हो ( शंभु० ) 1 ८--द्वितीयेश स्वक्षेत्री, मूल त्रिकोण, मित्रगृही, स्वक्षेत्री होया शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो वाचाल और उपाख्यान कर्ता हो ( ज्या० शा० ) । 5--धन भाव में शुभ ग्रह का वर्ग हो तो वाक्य सिद्धि हो ( जा० पारि० )। १०-द्वितीयेश शुभ ग्रह युक्त त्रिकोण में या केन्द्र में या शुभ स्थान में हो तो वाचाळ हो ( जा० पारि० )। ११-द्वितीयेश जिसके नवांश में हो उसका स्वामी शुभ हो अपने उच्च में हो या शुभ ग्रह॒ से दुष्ट हो या पारावतांश में हो तो वाचाल ओर चतुर हो (जा० पारि०) । १२-शनि मकर राशि में हो तो वह थोड़े प्रयोजन के लिए बहुत बोलने वाला हो ( जा० लं० ) ।
१३-मंगल बुध या चन्द्र ये बली ग्रह से दृष्ट हों तो शीघ्र बोलने वाला या शीघ्र जवाब देने वाला हो ( जा० ल॑० ) । १४-राहु केतु धीर ग्रह हैं इनके साथ द्वितीयेश हो तो सभा में पराजय न हो । वाणी विचार १५-द्वितीयेश केन्द्र में पारावतांशक और परमोच्चांशक हो। गुरु या शुक्र सिंहासनांश हो व वर्गोत्तम में हो बुध से युक्त हो तो वाचाल ( बहुत बोलने वाला ) हो।
१६-द्वितीयेश गुर युक्त हो या पारावतांश में हो उसका स्वामी शुक्र या बुध से युक्त हो या पारावतांश में हो तथा द्वितीयेश उच्च या मित्र राशि में हो तो वाचाल हो ( स० चि० )।
१७-धनेश पर काई पाप ग्रह का प्रभाव न हो या बुरे घर में न हो केवळ शुभ ग्रह देखते दों तो आम सभा में बड़ी ढिठाई से वोलेगा । वाणी दोष १- चन्द्र शनि युक्त हो और मंगल की दृष्टि हो तो कठोर वचन बोलने वाला हो ( वृ० जा० )1
नीरोगता : ३२३
च्या धनेश द्वादश या छठे भाव में हो जब चन्द्रमा शनि का योग हो ।
३--द्वितीयेश यदि नीच का हो ३, ६, ७, १२ स्थान में चन्द्र या गुरु किसी एक
से युक्त हो तो वाणी विफल हो ( ज्यो० शा० )।
४--धन भाव में चंद्र और शनि हो तो हकला के बोले ( ज्यो० शा० )।
५--बुध यदि धन स्थान में निर्वेल तथा पाप दृष्ट हो तो हकलाकर बोले
(स० चि० ) ।
६-- हितोयेश शक्ति हीन शुभ ग्रह हो जिस पर पाप दृष्टि हो तो वह बोलने में
हकलावे । त
७--हितीयेश निर्बल होकर कूर अश में हो और द्वितीय में क्रूर ग्रह होवे द्वितीयेश
पर कोई शुभ दृष्टि न हो पाप दृष्टि हो तो हकला कर बोले ।
_ पर--धन भाव में पाप युक्त शुक्र दुसरे द्रेष्काण में हो तो गूंगा हो । यदि तीसरे
द्रेष्काण में हो तो हकलावे ( शंभु० ) ।
९- शनि युक्त चंद्र पाप गृही हो और सूर्य मंगळ से दृष्ट हो तो वाणी को हरने
वाला है ( जा० सं० )।
गंगा १--बुध ४,८,१२ राशियों में कहीं हो, सूर्य चौथे भाव में हो चन्द्रमा से
दृष्ट हो । षष्देश पाप ग्रह से दृष्ट हो तो वह गूंगे स्वर वाळा हो ( शंभु० ) ।
२--शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा लग्न में मंगल युक्त हो तो गूँगा हो।
३--बुध ९ या १२ राशि का शनि से पूर्ण दृष्ट हो तो गद्गद् वाणी वाला हो ।
( शंभु० ) ।
४--चतुर्थ भाव में चर राशि हो और उ&का स्वामी और मंगल ६,१२ भाव में
हो तो गूँगा हो ( वृ० पा० ) ।
५--द्वितीयेश गुरु से युक्त अष्टम में हो तो गूँगा हो यदि स्वस्थानी यो उच्च का
हो तो दोष नहीं करता ( जा० पारि० ) ।
६-यदि षष्ठेश बुध हो तो जिह्वा नष्ट हो ( शंभु० ) ।
७--चन्द्रमा वृष राशि में हो पाप ग्रह सव ऋक्ष सन्धि में हों तो गूंगा हो
( जा० पारि० ) ।
( ऋक्ष सन्धि-कर्क, वृश्चिक, मीन के अन्त में)
८--पंचमेश या गुरु मित्र में हो तो गूंगा हो ( जा० ल॑० )।
इसी प्रकार त्रिक आदि जनों का उनके भाव में गूँगा होने का योग आदि का
विचार करना जैसे--
दशमेश, गुरु या पंचमेश युक्त त्रिक में हो तो- पिता गूंगा 1
तृतीयेश गुरु या पंचमेश यक्त निक में हो तो--भाई गूंगा ।
चतुर्थेश, गुर या पंचमेश युक्त निक में हो तो- माता गूंगी ।
सप्तमेश, गुरु या पंचमेश युक्त त्रिक में हो तो--स्त्री गूंगी ।
इसी प्रकार और भी लोगों का विचार करना । इसी प्रकार प्रत्येक योग से भी
३२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
विचारना । उनके भाव को लग्न मान कर योग का विचार करना ।
९--यदि द्वितीयेश गुरु के साथ ८या १२ स्थान में हो तो गूँगा हो (स० चि०) ।
यहाँ यह शंका होती है कि ८ स्थान में गुरु और द्वितीयंश होने से द्वितीय स्थान पर
पूर्ण दृष्टि पड़ती है तो इसका वाणी पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा विचारणीय है ।
गुरु यह वाणी का स्वामी है अष्टम स्थान में पड़ने से उसका प्रभाव कम हो जाता है।
१०-यदि उपरोक्त योग में चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो बहुत दिनों में
बाळक बोल्ने लगेगा ( जा० पारि० ) ।
जिह्वा रोग १--द्वितीयेश और लग्नेश बलहीन क्रूरांशक गत हो तो जिह्वा वायु
पीडित हो ।
२-द्वितीयेश निर्वेछ पाप दृष्ट हो तो जीभ अस्थिर अर्थात चलायमान हो
( स° चि०) 1
सुन्दर नेत्र १--नेत्र २ ओर १२ भाव से विचारना । दूसरा भाव दाहिना नेत्र है १२वाँ भाव बाँया नेत्र है। नेत्र का कारक सूर्य है ।
२--बारहवे भाव का स्वामी शुभ युक्त होकर शुभ नवांश या शुभ षष्ठचंश में हो और शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो नेत्र अच्छे होंगे ( स० चि० ) । ३-१-२ स्थान में बलवान् गुरु चन्द्र क्रूर ग्रहों की दृष्टि न हो तो नेत्र सुन्दर हों ( ज्यो० शा० )।
४--हितीयेश शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो नेत्र पूर्ण व बली होंगे (स० चि०) । ५--द्वितीयेश दुष्ट स्थान में नहीं हो ओर द्वितीय स्थान में शुक्र हो तो सुन्दर नेत्र हों ( स० चिं० ) ।
इ--लग्नेश लग्न में हो तो सुन्दर नेत्र हो ज्ञानी मंत्री या राजा हो सम्पदा युक्त हो ( जा० ०) | FE ७--लग्नेश गुरु व शुक्र युक्त केन्द्र मों हो । ८--छग्नेश उच्च में व मित्र क्षेत्री, शुभ ग्रह क्षेत्री होकर शुभ ग्रह से दृष्ट हो । ९--बली सूर्य दशम में हो तो नेत्र सुन्दर हो ( जा० सं० ) । १०--धनेश शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो या शुभाश में हो तो सुन्दर नेत्र हो ( जा० पारि० ) 1
११-नेत्र स्थान में शुभ ग्रह हो द्वितीयेश शुभ ग्रह युक्त हो या कारक शुभ ग्रह युक्त हो लग्नेश से भी युक्त दृष्टि हो तो बड़ी दृष्टि वाला हो (स० चि०) | १२--द्वितीयेश पर पाप ग्रह का प्रभाव न हो केन्द्र में. हो ओर शुक्र ( नेत्र स्वामी ) लाभ स्थान या केन्द्र में हो पाप ग्रहों को द नेत्र हे र i अ ह् ह दृष्टि न हो तो नेत्र निरोग रहे
नेत्र दोष १--दुसरे या बारहवें चन्द्र हो तो नेत्रों में दोष हो ( शंभु० ) । २--शुक्र पंचमेश ओर षष्टेश के साथ लन में हो ता राजा के कोप से नेत्र विकार हो ( जा० पारि० ) ।
नीरोगता : ३२५
३---बलवान् होकर शनि मंगल सूर्यं चन्द्र ये त्रिक और द्वितीय में हों तो बात
प्रकोप से नेत्र रोगी हो ( जा०्संट )॥ |
४--लग्नेश बहुत पाग ग्रह युक्त हो ओर शनि से दृष्ट हो तो नेत्र रोग हो ।
५--द्वितीयेश शनि मंगल से युक्त तथा गुलिक से भी युक्त हो तो नेत्र रोग हो ।
६--द्वितीय स्थान में बहुत पापग्रह हों और शनि से दृष्ट हों तों नेत्र रोग हो ।
७--हितीयेश जिसके अंशक में है यह पाप युक्त और पाप ग्रह की राशि में हो ।
८--द्वितीयेश सूर्य या मंगल हों और गुलिक पर सूर्यं की दृष्टि हो तो गर्मी से या
पित्त कफ के प्रमादों से नेत्र रोग हो ।
९--द्वितीयेश दृष्ट स्थान में शुभ युक्त हो तो बिना प्रमाद के नेत्र रोग हों ( स०
चि० ) इसी प्रकार इतर जनों के नेत्र का विचार उनके सम्वन्धी भावों से करना
जैसे पंचम स्थान को लग्न मान कर पुत्र का, सप्तम स्थान से स्त्री का इत्यादि ।
१०--धन भाव में पाप ग्रह हों द्वितीयेश पर शुभ दृष्टि हो तो निमीलित अक्षि
हो ( आधे खुले नेत्र जिसकी आधी दृष्टि हो अर्थात् मिकरा हो ।
११--द्वितीयश मंगल या सूर्य युक्त या दृष्ट हों तो नेत्र के कोने लाल रंग के
होंगे ( स० चि० )। द्
११--प्रहण कालीन सूयं लग्न में हो ओर पाप ग्रह ९,५ भाव में हो तो नेत्र दूर
करने वाला योंग है ( जा० सं० ) ।
१२--लग्नेश मंगल या बुध स्वक्षेत्री कहीं हों । उस मंगळ को बुध या बुध को
मंगल देखता हो तो नेत्र रोग हों ( प्रा० यो० )।
१३--लग्नेश मंगल या बुध के स्थान में हो और मंगल या बुध की दृष्टि हो
किसी भाव में हो तो नेत्र रोग हो ( जा० लं० ) ।
१४--द्वितीयेश पाप ग्रह होकर दृष्ट स्थान में हो तो बिना कोई प्रगट कारण के
नेत्र रोग हो ( स० चि० ) ।
नेत्र दोष १५--द्वितीयेश ओर नेत्र कारक पाप युक्त या दृष्ट हो तो दूषित दृष्टि
हो ( स० चि० ) ।
१६--लग्न से द्वादश भाव में मीन का सूर्य हो तो दक्षिण नेत्र में पीड़ा हो ।
यदि चन्द्र हो तो वाम नेत्र में पीड़ा हो ।
१७--लग्न में सिंह का शनि व शुक्र हो या दोनों द्वादश भाव में हों तो नेत्र
पीड़ा हो ( जा० सं०)। .
१८--द्वितीयेश निर्बल होकर धन स्थान में हो, लग्न व धन स्थान का स्वामी
६, ८, १२ भाव में हो तो नेत्र रोग हो परन्तु शुभ ग्रह के योग से थोड़ा सौख्य हो
(प्रा० यो०) ।
१९~ सप्तम में क्षीण चन्द्र हो तो नेत्र विकार हो या दरिद्री हो (प्रा० यो०) ।
२०--यदि मंगल बारहवें हों तो बांया नेत्र दूषित हो ।
यदि शनि वारहवें हों तो दाहिना नेत्र दूषित हो (जा० छं०) ।