सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
चन्द्र शत्रु द्रेष्काण में हो-गुण रूप से हीन ।
चन्द्र सपं द्रेष्काण में हो-उग्न स्वभाव ।
चन्द्र उद्दत आयुध द्रे में हो-प्राण घात के लिए हथियार उठाये रहे ।
चन्द्र चौपाया द्रेष्काण में-गुरुजन की स्त्री गमन करना ।
चन्द्र अंडज ( पक्षी ) द्वे० में हो-फिरने वाला ।
जहाँ जहाँ अपने द्रेष्काण और सपं द्रेष्काण में भी हो तो दोनों फल हों ।
द्रेष्काण के अनुसार चन्द्र का फल
(१) मेष के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-छोगों का घातक हो । यदि मित्र द्रेष्काण
हो तो सुन्दर तेजस्वी ।
दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर, तेजस्वी, गुरुजन की पत्नी से रमण करने
वाला ।
तीसरे ब्रे० में चन्द्र हो-पहिले द्रेष्काण के अनुसार फल ।
(२) वृष के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-गुरु स्त्रियों से गमन करता, शुक्र दृष्टि हो:
तो शुभ फल।
दुसरे द्वे० में चन्द्र हो-गुरु स्त्रियों में पाप बुद्धि ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-लोगों का घात करने वाला ।
(३) मिथुन के पहिले द्वे० में चन्द्र हो-पुरुष सुन्दर तेजस्वी ।
दुसरे द्रे० में चन्द्र हो-गुणहीन, परिभ्रमण करने वाला ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-रूप व गुण कम हो ।
(४) ककं के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर व तेजस्वी । बूसरे ३० में चन्द्र हो-उग्न स्वभाव ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो पर उग्र हो । (५) सिह के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-हिसा करने वाला, सुन्दर तेजस्वी । दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, परस्त्री से गमन करे । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-परस्त्रियों से गमन करे, उग्र हो । (६) कन्या के पहिले ३० में चन्द्र हो-परिभ्रमण करे । दुसरे द्रे में चन्द्र हो-परिभ्रमण करे । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-भ्रमण करे. दुर्गति हो । (७) तुळा के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-कोमरू हो, भ्रमण करे । दुसरे ३० में चन्द्र हो-निस्तेज हो, भ्रमण करे । तीसर 8० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, परस्त्री पर लक्ष करे । (८) वृश्चिक के पहिले ३० में चन्द्र हो-उग्र हो । दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर ग्रुणवान् हो, उम्र हो । तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर तेजस्वी हो, परस्त्री से गमन करे | (९) घन के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-तेजस्वी हो, हिसा, करने वाला हो ।
षड्वर्ग विचार : ८५५
दुसरे द्रे० में चन्द्र हो-उग्र हो ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो हिसा करने वाला हो | '
(१०) मकर के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-गुरु पत्नी से गमन करे ।
दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-परस्त्री से समन करे ।
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-आपस वाले को स्त्री से संग हो ।
(११) कुंभ के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-लोगों का घात करने वालो ।
दूसरे द्वे० में चन्द्र हो-छोगों का घात करने वाला 1
तीसरे द्रे० में चन्द्र हो-छोगों का घात करने वाला ।
(१२) मीन के पहिले द्रे० में चन्द्र हो-घात करने वाला 1
दूसरे द्रे० में चन्द्र हो-सुन्दर हो, वात करने वाला $
तीसरे द्रे में चन्द्र हो-उग्र हो ।
द्रेष्काण का विशेष फल विचार
(१) द्रेष्काण में उच्च या स्ववर्ग के सौम्य ग्रह हों--वर देने वाली सत्य वादिनी
लक्ष्मी का भोग करवाते हैं ।
(२) स्व द्रेष्काण में सौम्य ग्रह त्रिकोण या केन्द्र में बली होकर पड़े--द्रव्य. का
संचय करने वाला, मान तथा गुण से युक्त विद्यावान्, कलाओं में चतुर ।
(३) द्रेष्काणेश शुभ ग्रह की राशि का बैठा हो या शुभ ग्रह या शुक्र से दुष्ट
हो-अनेक प्रकार का सौख्य, आरोग्य, मान, यश की वृद्धि, स्वदेश के हित के कायं
करने से संसार में विख्यात किन्तु दूसरी समस्याओं के विरुद्ध रहे ।
(४) द्रेष्काणेश चन्द्र से युत या दृष्ट या मंगल से दृष्ट या श् क्र युत या दृष्ट--
उसकी आयु के प्रमाणानुसार कर्म फलता है, धमं के निमित्त, अनेक प्रकार से धन
प्राप्त होता है ।
(५) द्रेष्काणेश उच्च में रहते केन्द्र में हो--राजा हो ।
द्वेष्काणेश स्वक्षेत्री हो पूर्ण धन युक्त ।
द्रेष्काण मित्र गृही हो--सम्मान युक्त ।
द्रेष्काणे शपणफर में मित्र क्षेत्री उच्च का-अच्छे मित्र सहित,राजा सदृश धनी।
्रेष्काणेश आपोक्लिम में मित्र गृही या स्वगृही-संतति सदाचार युक्त हो, सुबोध
हो, खेती से धन प्राप्त करे ।
(६) शत्रु या नीच धर में जितने ग्रह हों उसी तुल्य जन्म लग्न में भी हो-उसी के
अनुसार देह में प्रण या चोट छगने का योग हो ।
वह ग्रह जिस राशि में हो-उसी राशि तुल्य शरीर में चोट से व्रण होता है ।
(७) द्रेष्काणेश अपने वर्ग में हो या शुभ ग्रह युक्त हो या अपने उच्च या मित्र घर
में हो यदि उदित त्रिगांश, द्वादशांश यो होरा ( लग्न ) का स्वामी बली होकर उक्त
[] ६
'८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
स्थान में हो तो अच्छे गुण प्राप्त हों सदा पबित्र रहे, प्रवीण, दयावान्, धनवान्, संतान
“युक्त, कीतिमान्, दीर्घायु और राजा सरीखा हो ।
(८) चन्द्र स्व या मित्र द्रेष्काण में हो-तो जातक, सतगुणी हो, देखने में सुन्दर
हो, चन्द्र उत्तम वर्ग में हो तो भाग्यवान् हो । 9
यदि कोई दूसरे स्थान में हो तो जातक को वह गुण देवे जो उस ग्रह के हों
जिसके साथ चन्द्र पैदा हो ।
(९) जो ग्रह स्व द्रेष्काण में हो तो उसका कारक ग्रह उसे सब फल देगा ।
(१०) ग्रह अपने स्व या उच्च के घर में हो उसी समय मित्र ग्रह से युक्त या दृष्ट
हो तो वह धन युक्त राजा हो ।
(११) द्विस्वभाव राशि में द्रेष्काण-क्रमानुसार अधमा, मध्यमा, उत्तमा ।
चर राशि में द्रेष्काण-उल्टा क्रम-उत्तमा, मध्यमा, अधमा ।
स्थिर राशि मैं द्रेष्काण-अच्छा बुरा मिश्रित फल होगा ।
सप्तमांश फल |
(१) सप्तमांशेश चन्द्र युक्त या दृष्ट हो या सौम्य ग्रह से दृष्ट हो-सहोदर
भाइयों से युक्त, श्रढ़ती कांति, यश, उत्तम मित्र, अति प्रगल्भ । र (२) सप्तमांशेश सूर्य रहित जितने ग्रह नीच में बैठे हो उनमें जो सवसे वली हो- उसी के अनुसार उसकी भाइयों के निमित्त से चिन्ता युक्त स्थिति होती है । (३) उप्तमांशेश उच्च में या शुभ वर्ग में हो-राजा सम पुज्य, सव कार्यों में सफ- लता पावे, धन से अति सम्पन्न हो ।
“ (४) सप्तमांश में सहज भाव में सूर्य, गुरु या मंगल हो-तो अधिक लक्ष्मी को प्राप्त, मित्र को मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र जन्मे हों । (५) युक्त स्थान में शुक्र, बुध या चन्द्र हों-कन्या का जन्म होता है । (६) स्व सप्तमांश में सभी ग्रह उच्च में हो-महा धनी हो । स्व सप्तमांश में सभी नीच क्षेत्र में हों-दरिद्री हो । (७) सप्तमांशेश-पाप ग्रह होकर पाप ग्रह के सप्तमांश में-वे क्रूर ( दुष्ट ) होते
हैं, बुरा फल देते हैं । शुभ ग्रह होकर शुभ ग्रद् के सप्तमांश में-उत्तम फल देते हैं । मित्र ग्रह हो तो -मिश्र फल देते हैं।
नवांश फल
राशियों के भिन्न भिन्त नवांश का फल झे
१-मेष लग्न में दृष्टि हो तो शुभ फल हो व परस्त्री पर (१) पहिला नवांश हो-चोरों का स्वामी, प्रेम करे ।
मुखिया अधिकारी हो । इस पर मंगळ की (२) नवांश हो-उपभोग करने वाळा
षड्वर्ग विचार : ८३
(३) नवांश हो-पंडित हो । - (७) नवांश-पापी हो । (४) नवांश हो-मुख्य मालिक हो। (५) नवांश-घातकी हिंसक (४) नवांश हो-राजा हो। (९) नवांश-ढीट धीर । (६) नवांश हो-नपुंसक हो । ४-सिंह लग्न का नवांश फल (७) नवांश हो-शूर हो । (१) नवांश-चोर । (८) नवांश हो-हम्माल आदि हो। (२) नवांश-भोक्ता । (९) नवांश हो-चाकर हो। (३) नवांश-पंडित ।
२-वृष लग्न में (४) नवाश-स्वामी । (१) नवांश-नाना प्रकार का पाप करे। (५) नवांश-राजा । (२) नवांश-हिसा करे । (६) नवांश-नपुंसक । (३) नवांश-ढीठ व निर्भय । (७) नवांश-शूर । (४)-नवांश-चोर हो । (८) नवांश-हम्माल । (५) नवांश-भाइयों में प्रसिद्ध । (९) नवांश-चाकर ।
(६) नवांश-पंडित हो । ६-कन्या लग्न के नवांश का फल (७) नवांश-घर में स्वामी हो । (१) नवांश-पापी । (८) नवांश-राजा प्रमाण हो । (२) नवांश-त्रातकी । (९) नवांश-नपुंसक हो । : (३) नवांश-ढीठ।
३-मिथुन में (४) नवांश-चोर । (१) नवांश मे-शरवीर हो । (५) नवांश--भोक्ता ।
(२) नवांश में-हेम्माल हो । (६) नवांश--पंडित ।
(३) नवांश में-चाकर हो'1 (७) नवांश-मारिक । (४) नवांश में-पाप करने वाळा । (=) नवांश--राजा । (५) नवांश में-घातकी । (९) नवांश--नपुंसक । (६) नवांश में-ढीट । ७--तुला लग्न के नवांश का फल '७) नवांश मॅ-चोर । (१) नवांश-शूर । ८) नवांश में-उपभोग कर्ता । (२) नवांश--मजदुर । ९) नवांश में-पंडित । ` (३) नवांश--चाकर । ४-ककं लग्न का नवांश फल (४) नवांश--पापी ।
॥) नवांश-मालिक हो. (५) नवांश--घातकी । () नवांश-राजा हो 1 (६) नवांश--ढीठ । () नवांश-नपुंसक हो । - ` (७) नवांश--चोर | () नवांश-शूर हो । (८) नवांश--भोक्ता ।
($ नवांश-हस्माल हो । (९) नवांश--पंडित ।
,(६नवांश-चाकर हो ।
८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
८--वृश्चिक लग्न के नवांश का फक (५) नवांश--भोक्ता ।
(१) नवांश--मालिक ।
(२) नवांश---राजा ।
(३) नवांश--नपुंसक ।
(४) नवांश--शूर ।
(५) नवांश---मजदूर ।
(६) नवांश--चाकर ।
(७) नवांश--पापी ।
(८) नवांश--घातकी ।
(९) नवांश--धै्येवान् ।
९--धन लग्न के नवांश का फल
(१) नवांश--चोर ।
(२) नवांश--भोक्ता ।
(३) नवांश--पंडित ।
(४) नवांश--स्वामी ।
(५) नवांश--राजा ।
(६) नवांश- नपुँसक ।
(७) नवांश--शूर ।
(८) नवांश--हम्माल ।
(९) नवांश--चाकर ।
१०--मकर के नवांश का फल
(१) नवांश--पापी ।
(२) नवांश--घातकी ।
(३) नवांश--धर्यवान् ।
(४) नवांश--चोर ।
(६) नवांश--पंडित ।
(७) नवांश--मालिक ।
(८) नवांश--राजा ।
(९) नवांश--नपुंसक ।
११--क्रुभ के नवांश का फल
(१) नवांश--शूर ।
(२) नवांश--मजदूर ।
(३) नवांश--चाकर ।
(४) नवांश--पापी ।
(५) नवाश--घातकी ।
(६) नवांश--धैयंवान् ।
(७) नवांश--चोर ।
(८) नवांश--भोक्ता ।
(९) नवांश--पंडित ।
१२--मीन लग्न के नवांश का फल
(१) नवांश--स्वामी ।
(२) नवांश--राजा । .
(३) नवांश--नपुंसक ।
(४) नवांश--शूर ।
(५) नवांश--मजदूर ।
(६) नवांश--चाकर ।
(७) नवांश--पापी ।
(८) नवांश--घातकी ।
(९) नवांश--धैयंवान् ।
टिप्पणी--कुम्भ लग्न का कुम्भ नवांश या द्वादशांश हो तो-विशेष बुरा फल
होता है ।
चंद्र का नवाश फल
(१) मेष लग्न-में चन्द्र यहाँ बताये (४) गुरु की दृष्टि हो-राज्य का कार्य कारी ।
नवांश में किसी नवांश में हो परन्तु निम्न (५) शुक्र की दृष्टि हो-जिमीदार ।
ग्रहों की दृष्टि हो तो उसका फल-
(१) सूर्य की दृष्टि हो-नगर का रक्षक ।
(२) मंगल की दृष्टि हो-घातक ।
(३) बुध को दृष्टि हो-कलहकारी ।
(६) शनि की दृष्टि हो-कलहकारी 1
(२) वृष लग्त-क्ते किसी नवांश प
चंद्र हो तो ग्रहों की दृष्टि का फल- , ` (१) सूर्य को दृष्टि हो-मुर्ख ।
२ बुध को दृष्टि हो-काव्य करे । ३ शुक्र की दृष्टि हो-सुखी । ४ गुरु की दृष्टि हो-शास्त्र पढ़े । ५ मंगळ की दृष्टि हो-पर स्त्री रत । ६ शनि-पर स्त्री रत ।
(२) मिथुन लग्न-के किसी नवांश में चंद्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल- १ सूर्य को दृष्टि हो-कुश्ती खेले। २ मंगल की दृष्टि हो-चोरी करे । ३ बुध की दृष्टि हो-कविता करे । ४ गुरु की दृष्टि हो-कार्य भारी हो । ५ शुक्र की दष्टि हो-गायन करे । ६ शनि की दृष्टि हो-वढई हो शिल्पी ।
(४) ककं लग्न-में किसी नवांश पर चंद्र हो तो उस पर ग्रह दृष्टि फल-- १ सूर्यं की दृष्टि हो-दुवला । २ बुध की दृष्टि हो-तपस्वी । ३ मंगल की दृष्टि हो-कृपण । ४ गुरु की दृष्टि हो-मंती । ५ शुक्र की दृष्टि हो-स्त्री पालन करे। (६) शनि की दृष्टि हो-कार्य साधे । (५) सिंह लग्न-के किसी नवांश पर चंद्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल । १ सूर्यं से दृष्ट-क्रोधी । २ मंगल से दृष्टि-राजा को प्रिय । हे बुध से दृष्ट-गड़ा द्रव्य लाभ । ४ गुरु से दृष्ट-सव पर हुकूमत करे । ५ शुक्र से दृष्ट-पुत्र न हो । ६ शनि से दृष्ट-घातकी । (६) कन्या लग्न-में किसी नवांश में चंद्र हो उस पर ग्रह दृष्टि फल--
१ सूर्य से दृष्ट-कुश्ती खेले । २ मंगळ से दुष्ट-चोरी करे। ३ बुध से दृप्ट-कविता करे।
षड्वर्ग तिचार : ८५
४ गुरु से दृष्ट-प्रधान हो । ५ शुक्र से दुष्ट-गायन करे । ६ शनि से दुष्ट-बढ़ई का काम करे। (७) तुला लग्न-के किसी नवांश में चन्द्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल--
१ सूर्यं से दृष्ट-मूखं । २ मंगल से दुष्ट-पर स्त्री प्रेम । ३ बुध से दृष्ट-काव्य करे । ४ गुरु से दुष्ट-शास्त्र पढे । ५ शुक्र से दुष्ट-सुखी । ६ शनि से दृष्ट-दूसरी स्त्री तक जावे (८) वृश्चिक लग्न-के किसी नवांश में चंद्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल१ सूर्य से दृष्ट-नगर रक्षक। २ मंगल से दृष्ट-घातकी । ३ बुध से दृष्ट-कलह करे। ` ४ गुरु से दृष्ट-राजा हो । ५ शुक्र से दृष्ट-जिमीदार हो। ६ शनि से दुष्ट-क्रलहकारी । (९) घन लग्न-के किसी नवाँश में
चन्द्र हो उस पर इन ग्रहों को दृष्टि का
फल
१ सूर्य से दृष्ट-वरूबान् । २ मंगल से दृष्ट-युद्ध सिखावे । ३ बुध से दृष्ट-ठट्ठा करे । ४ गुरु से दृष्ट-मंत्री
५ शुक्र से दृष्ट-नपुंसक । ६ शनि से दृष्ट-धम बुद्धि हो । (१०) मकर लग्न-के किसी नवांश में चन्द्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल-- १ सूये से दृष्ट-थोडी संतति । २ मंगल से दुष्ट-दुःखित । ३ बुध से दृष्ट-गविष्ठ।
४ गुरु से दृष्ट-स्वकुल प्रमाण ।
८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
५ शुक्र से दृष्ट-बुरी स्त्री का संगं । ६ शनि से दृष्ट-कूपण हां 24
७ शनि से दृष्ट-कृपण हो । (१२)मीन लग्न-के किसी नवांश में
(११) कुम्म लग्न-के किसी नवांश चन्द्र हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल
में चन्द्र हो उस पर ग्रह दृष्टि काफल- १ सूर्य से दृष्ट-वलवान् ।
१ सूर्य से दृष्ट-संतति थोड़ी । २ मंगल से दृष्ट-युद्ध सिखावे ।
२ मंगल'से दृष्ट-दुखित । ३ वुध से दृष्ट-ठट्ठा करे ।
३ बुध से दृष्ट-गविष्ठ । ४ गुरु से दृष्ट-मंत्री हो ।
गुरु से दृष्ट-स्वकुल प्रमाण , १ शुक्र से दुष्ट-नपुंसक द्दो ।
५ शुक्र से दृष्ट-बुरी स्त्री का संग । ६ शनि से दृष्ट-धामिक हो ।
लग्न के किसी भी नवांश में चन्द्र हो उस चन्द्र पर सूर्य आदि ग्रहों की दृष्टि का
फल दे चुके हैं उसी के अनुसार यदि चन्द्र किसी भी ग्रह को देखता हो तो वह ग्रह
उस लग्न के नवांश में जो हो उसका फल वही होगा जो उस नवांश में चन्द्र होने
पर चन्द्र की दृष्टि का फल बताया है ।
नवांश की राशि अनुसार फल
१ जन्म मेष नवांश में हो-चोर हो । ७ तुला नवांश में जन्म-शूरमा।
२ जन्म वृष नवांश में हो-भोगवान् । ८ वृश्चिक नवांश में जन्म-विना पैर
भार ढोवे ३
३ जन्म मिथुन नवांश में हो-पंडित । ९ धन नवांश में जन्म-दास ।
४ जन्म ककं नवांश में हो-धनवान् । १० मकर नवांश में हो-पापी ।
५ जन्म सिंह नवांश में हो-राजा । ११ कुंभ नवांश में जन्म-क्रूर स्वभाव ।
६ जन्म कन्या नवांश में हो-नपुंसक । १२ मीन नवांश में जन्म-निर्भय ।
उपरोक्त फल केवल नवांश का है ।
इन योगों में वर्गोत्तम हो तो उपरोक्त का राजा होता है ।
जैसे मेष लग्न में मेष नवांश हो तो वर्गोत्तम होने से-चोरों कां राजा होगा ।
जैसे वृष लग्न में वृष नवांश हो तो वर्गोत्तम होने से-योगियों का राजा इत्यादि ।
ग्रह के नवांश में जन्म का फल
५--सूर्य के नवांश में-दुष्टात्मा, बलवान्, पुत्रवान्, धनवान्, कामी, पीतनेत्र ।
२--चन्द्र के नथांश में-भोग करने में दक्ष, परस्त्री विलास, गो त्रंश और धन
से पूर्ण, पंडित ।
` ३--मंगल के नवांश में-क्र्रकर्मी, चञ्चलबृद्धि, घूमनेवाला, पित्तरोगी, लोभी ।
४--बुध के नवांश में-त्यागी, रोगी, ललित शरीर, नामी विद्वान्, यशस्वी ।
५--गुरु के नवांश में-सुवर्ण के सदृश बाल, शरीर श्रेष्ठ, रूपवान्, मंत्री ।
६८ शुक्र के नवांश में-परस्त्री गामी, त्यागी, सुखी, पंडित ।
७--शनि के नवांश में-पाप बुद्धि, दरिद्र, स्थूल दाँत, रोगवान् ।
षड्वर्ग विचार : ८७
गुरु स्वनवांश में हो-उत्तम मित्रस्थरीघन से सुखी, श्रेष्ठ प्रतिष्ठ,सुख सम्पत्ति पूर्ण । गुरु नवांश में चन्द्र-अनेक धन सम्पन्न, पुत्रों से युक्त, पुण्य धन से युक्त, अतिथि प्रिय, सवको आनन्द देने वाला । "गुरु नीच नवांश में हो सेवा वृत्ति से अपनी आजीविका चलाने वाला । नवांश का और भी फल विचार १ लग्न और नवांश आरम्भ में पूर्ण फल देते हैं।
मध्य में मध्यम ,, ४)
अन्त में अशुभ, ,, २ सौम्य ग्रह या मित्र ग्रह के अंश--शुभ होते हैं ।
पाव गा गा शत्रु [1 | 31 "अशुभ गा ३ सूर्य शनि मंगल के नवांश सब शुभ कर्मो में वजित है । शुभ ग्रहों के रवांश शुभ हैं शेष कु नवांश हैं ।
४ भावेश ग्रह नीच नवांश में-मीच स्त्री वाला ।
is उच्च , --राजा
» स्वनवांश में--कुल समूह का स्वामी हो ।
„ मित्र नवांश में-सेनापति तथा भोग और गुणों से सम्पन्न ।
» शत्रू, ,, दुःखित और अति मलिन ।
५ अपने उच्च या स्वार्थ में होकर उच्च आदि वाहनों में कुशल ।
ग्रह अन्त नवांश में हो-शूरवीर, बन्धु रहित ।
६ पंचम में मंगल और चतुर्थ में गुरुतो १, ३ या ५ पुत्र हों । नवांश कुण्डली में पंचम भाव में बुध शुक्र शनि हों-२, ४, ६ या ७ पुत्र हों ॥ ७ लग्न से तीसरे घर में सिंह राशि हो पंचम में गुरु केतु हो ] इन योगों में लग्न से छठे घर में शनि, सप्तम में सूयं, केन्द्र मे राहु और ? संतानहीन हा । दशम में मंगल हो । है। (=) व्ययेश ग्रह कूर हो वह ९, ६, ३ या १२ घर में हो या ५ घर में केतु
हो=पुत्र हो होकर मरे ।
(९) जितने पुरुष ग्रह बली होकर लग्न से पंचम में हों या पंचम को देखें-उतने पुत्र हों ।
(१०) चन्द्र, शुक्र और बुध से युक्त या दृष्ट पंचम घर में हो=कन्या होती है ।
(११) पंचम ग्रह पूर्ण वली शनि से युक्त या दृष्ट हो-गर्भपात हो ।
ये सब नवांश कुण्डली से विचारना ।
मतांतर--उक्त बातें चन्द्र के नवांश से विचारना ।
नवांश के अनुसार धातु मूल जीव संज्ञा
विषम राशि में प्रथम नवांश से आरम्भ होकर धातु मूळ जीव से ३ आवृत्ति होती है।
सम ग २ 11 शा जीव मूल घातु से | 22
८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
परमोच्च तवांश--उच्च नवांश को ही परमोच्च नवांश समझो । क्योंकि कोई ग्रह
उच्च में हो उसे परमोच्च नवांश में लाने को उसका उच्च स्थान ही बदल जाता है।
दोदशांश का फल दया
किसी राशि के द्वादशांश का कोई क्रम हो उससे द्वादशांश में जो राशि आवे उस
राशि के फल के समान सभी राशियों के द्वादशांश के फल होंगे जसे यहाँ बताया गया है ।
मेष लग्न में प्रत्येक द्वादशांश का फल
(१) पहिला द्वादशांश ( मेष )--नेत्र लाळ, गोल, भोजन में उष्ण पदार्थ प्रिय,
अल्प भोजन जल्दी खाये, प्रसन्न कीति, अल्प यथुन, बहुत धन न हो, शूरवीर, स्त्रियों
का प्रिय, नौकरी करे, खुशामदी, मस्तक में फोड़ा, गविष्ठ, सबसे श्रेष्ठ, अति चपल, जल से भय करे, हाथ में चिह्न ।
(२) .दूसरा द्वादशांश ( वृष )--सुन्दर, विलास कर गमन करे, जांघ के ऊपरी
भाग, मुँह, पीठ का भाग व छाती के दोनों वाजू मोटे हों, दयालु, क्लेश सहन करने
वाला, मुख्य अधिकारी, अधिक #न्या हों, कफ प्रकृति, लोकप्रिय, क्षमाशील, बहुत खाने
वाला, स्त्री प्रिय, बहुत मित्र हों, वालपन में दु:खी, तरुणपन और वृद्धावस्था में सुखी, बंधु, धन, कुटुम्ब नहीं रहे ।
(३) तीसरा द्वा० ( मियन )--स्त्रियों का अभिलाष करे, कोक शास्त्र में
प्रवीण, लाळ नेत्र, कुञ्चित केश, चतुर, शास्त्र जानने वाला, नौकरी करे, बुद्धिमान्,
लोगों का इशारा जाने, जुआडी, सुन्दर शरीर मधुर भाषण, अधिक भोजन करे, गीत नृत्य प्रिय, नपुंसक की संगति, नाक ऊँची और लम्बी ।
(४) चौथा द्वा० ( कर्क ) - कुटिल, जल्दी चलने वाला, स्त्रियों के कहुने में रहे,
उत्तम, सित्र, ज्योतिष का ज्ञान हो, बहुत घर फिरने वाला, भ्रमण, द्रव्य नाश, ठिगना,
गला बड़ा, मीठी वोली से वश में करने वाला, मित्रों का प्रिय, जलाशय या बगीचे में फिरे । कूल्हा बड़ा ।
(५) पञ्च हा० (सिंह) --अधाभि 5, क्रोधी, ठुड्डी गाल व मुँह बडा, पिग नेत्र,
अल्प संतति, स्त्री का द्वेषी, मांस, वन और पर्वत का प्रेमी, नौकरों की वात पर
क्रोध करे, असामयिक भूख व तृष्णा के कारण पेट दाँत को पीड़ा होवे, दाता व परा- क्रभी, स्थिर बुद्ध, यविष्ठ, मातृभक्त माता के कहने में रहे ।
(६) षष्ट द्वा० ( कन्या )--उत्तम शरीर, गम्भीर, लज्जालु, शीतल दृष्टि, सुखी,
प्रिय बोलने वाला, सत्य वक्ता, धार्मिक, परमार्थ सम्बन्धी वात करे, सूक्ष्म देह, नृत्य,
गीत, वाद्य व चित्रकारी में कुशल, पंडित, वुद्धिमान्, काम साधने में तत्पर, परदेश भ्रमण, दूसरों से द्रव्य मिले, बहुत कन्या, पुत्र अल्प ।
(७) सप्तम द्वा० ( तुला )--देव ब्राह्मण साधु सन्त को मान देवे, गई बात
स्मरण करे, बुद्धिमान्, विचारशील, लोगों के धन की इच्छा करे, शुद्ध, अग्निहोत्र करे,
स्त्री वश, अधिक ऊँचा, नाक ऊँची, दुबला, चञ्चल स्वभाव, अति भ्रमण, धन युक्त,
अङ्गहीन हो, क्रय-विक्रय करने में कुशल, बड़ी पदवी पावे, सभ्य, रोगी, कुटुम्ब पर उपकार करे, बांधवों से निद्य, बन्धुजनों को त्याग दे ।
षड्वगे वित्रार : ८९
(ऽ) अष्टम द्वा० (वृश्चिक) नेत्र व छाती बड़ी, गोल जाँघ, माँ बाप गुरु इनकी शिक्षा में रहे, संतान से दुःखी, राज दरबार में मान व महत्त्व, पिंगट वर्ग, बुरा स्वभाव, गुप्त पापी, मछली या पक्षी द्वारा कहीं भी चिह्न हो । (९) नवम ढ्वादशांश (धन)--मुँह व गर्दैन लम्बी, बाप का बहुत धन हो, दयालु, कवि, अच्छा बोलने वाळा, दाँत, कान व नाक बड़े, कार्य साधन में उद्योगी, कुबड़ा, लम्बे नख, लिखने पड़ने का ज्ञान हो, पुस्तक बाँधने व चित्रकारी का ज्ञान हो, प्रौढ़, धार्मिक प्रिय वोली बोले, वन्धुओं का दष करे । (१०) दशम द्वा० (मकर)--स्त्री पुत्र पर बहुत प्रेम, दांभिक, अन्ध, कृश, कमर के पास दुबल, छोटी कमर नेत्र उत्तम, सबकी सुनने वाला, सबका प्रिय, आळसी, शीत सहन करे, परिभ्रमण करे, बलिष्ठ, काव्य का करने वाला, विद्वान्, लोभी, जहाँ न जाना हो वहाँ जावे, निळंज्ज, निर्दय । (११) एकादश द्वा० (कुम्भ)--चूहे सरीखी गर्दन, अङ्गो पर बहुत नसे, कड़े केश, ऊँचा शरीर, पैर, जाँघ, जाँघ के ऊपर का भाग और पीठ का भाग लम्बा हो, मुँह, कमर व बस्ती मोटी, पर स्त्री में आसक्त, परद्रव्य लेने की वुद्धि, पापी, नाशक, मिलनसार, पुष्प चन्दन प्रिय, चलने वाला मित्रों को प्रिय । (१२) द्वादश ह्वा० (मीन)--जल में होते वाले पदार्थों का भोक्ता, मोती व शाक-भाजी वेचने वाळा, स्त्री में आसक्त, शरीर उत्तम, नाक ऊँची, बड़ा मस्तक, शत्रु का पराभव करने वाला, स्त्री के वश, नेत्र कांति उत्तम, धनवान्, गड़ाधन प्राप्त हो। मेष लग्न में पहिला द्वा० मेष राशि से आरम्भ होकर क्रमानुसार बारहवाँ मीन का होता है
(२) वृष के द्वादशांश का फल
६--पहिला द्वा० वृष का है--मेष में दुसरा द्वादर्शांश जो वृष राशि का है उसी अनुसार फल होगा अर्थात् सुन्दर विकास कर गमन करे आदि जो फल कहा हैः क्यों कि जो राशि होती है द्वादशांश में पहिले उसी राशि का द्वादशांश होता है । इससे जिस राशि का द्वादशांश हो उसी के अनुसार फल विचारना । २--वृष में दूसरा द्वा० मिथुन का है इससे मेष छूग्न के तीसरे द्वा० में मिथुन है उसके समान फल होगा ।
३--तीसरा द्वा० ककं का है-मेष के चौथे द्वा० में ककं है उस समान फल होगा । ४ चौथा द्वा० सिंह का है-मेष के पांचवे द्वा० में सिंह है उस समान फल होगा । ५--'पांचवा द्वा० कन्या का है-मेष के छठे द्वा० में कन्या है उस समान फल होगा ।
६--छठा द्वा० तुळा का है-मेष के सातवें द्वा० में तुला है उस समान फल होगा। ७--सातवां द्वा० चुश्चिक को है-मेष के आठवें द्वा० में वृश्चिक है उस समान फल होगा ।
८--आठवां द्वा० घन का है-मेष के नवमें द्वा० में धन है उस समान फल होगा । ९--नवां द्वा० मकर का है-मेष के दशम द्वा० में मकर है उस समान फ्रल होगा !
९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१०--दशवां द्वा० कुंभ का है-मेष के ग्यारहवें द्वो० में कुम्भ है उस समान
फल होगा ।
११--यारहवां द्वा० मीन काँ है- भेष के बारहवें द्वा० में मीन है उस समान
फल होगा ।
१२-बारहवां द्वा० मेष का है-मेष के पहिले द्वा० में मेष है उस समान फळ होगा ।
इस प्रकार किसी भी राशि के द्वादशांश का फल जान सकते हैं उस द्वाशांश में जो
राशि है उस राशि का फल मेष के द्वादशांश में जहाँ मिले उसके अनुसार फल जानना।
जैसे कुम्भ लग्न के दूसरे द्वादशांश का फल जानना है । कुम्भ में पहिला द्वादशांश
कुम्भ का होता है । दूसरा मीन का हुआ । मेष लग्न के द्वादशांश के फल वर्णन में
मीन राशि का फल मेष लग्न के अंतिम द्वादशांश में दिया है वही लेना अर्थात् जल में
होने वाले पदार्थों का भोक्ता मोती व शाक भाजी बेचने वाला स्त्री में आसक्त आदि ।
द्वादशांश का संक्षिप्त जन्म फल
मेष द्वा७ में जन्म--खलात्मा, चोर, पाप आचरण ।
वृष द्वा० में जन्म--स्त्री के धन से धनी, रोगवान् ।
मिथुन द्वा० में जन्म--जुआड़ी, सुशील ।
ककं द्वा० में जन्म--दुष्ट आचरण और तपस्वी ।
सिंह द्वा० में जन्म-सुशीळ, रःजकार्यं परायण ।
कन्या द्वा० में जन्म--जुआड़ी, स्त्री में लीन !
तुला द्वा० में जन्म-व्यापारी या धनी ।
वृश्चिक द्वा० में जन्म--धूते, चोरों का स्वामी, मारने की इच्छा वाला ।
घन द्वा० में जन्म--पिता तथा देव ब्राह्मण भक्त ।
मकर द्वा० में जन्म -शस्यादि युक्त और दूत वाळा ।
कुम्भ द्वा० में जन्म--खल ।
मीन द्वा० में जन्म--धनी और पंडित । र
ग्रह मित्र के या उच्च द्वा० में हो--अनेक स्त्रियों का अधिकारी और अनेक ऋद्धि
सिद्धि युक्त । द्वादशांश से आयु और मृत्यु विचार मेष आदि १२ राशियों के द्वादशांश के अनुसार आयु इस प्रकार है ।
राशि १ र ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ पश्चात्
आयु ८० ८४ ८५६ ८७ ८५ ६० ५६ ७० ९० ६६ ५६ १०० मृत्यु ।
पूर्वोक्त आयु के बीच में भी मृत्यु का भय होता है ।
१--प्रथम द्वा० वाला-१८ वर्ष में जल से भय ।
२--ढितीय द्वा० वाला-९ वर्ष में सपं से भय ।
३--तृतीय द्वा० वाला-१० वषं में घोर ज्वर से भय ।
४--चतुर्थ द्वा० वाला-३२ वर्ष में राजयक्ष्मा से भय ।
षड्वर्गः गिचार : ९१
५-- पंचम द्वा० वाला-२० वर्ष में रक्त विकार से भय ।
६--षष्ठ द्वा० वाला-२२ वर्ष में अग्नि से भय ।
७--सप्तम द्वा० वाला-२८ वर्ष में जलोदर से भय ।
=--अष्टम द्वा० वाला-३० वर्ष में व्याघ्र से भय ।
९--नवम द्वा० वाला-३२ वर्ष में वाण के पारेका से भय ।
१०-दशम द्वा० वाला-३० वर्ष में जल में डूवने या वायु विकार का भय ।
११-एकादश द्वा० वाळा-३१ वर्ष में भार्या तथा कन्या की मृत्यु के कारण तथ
जल से भय ।
१९--दडादश द्वा० वाला-२९ वर्षे में गाड़ी के पहिये से दबने का भय ।
इन सब अल्प मृत्युयों से बचने पर पूर्ण आयु भोगे ।
त्रिशांश फल
१ मंगल स्व त्रिशांश मॅ-स्त्री सहित हो, तेजस्वी, बल, पराक्रम, आभूषण युक्त,
साहस का काम करनेवाला ।
२ शनि स्व त्रिशांश मे--उसकी स्त्री शीघ्र मरे या भाग जावे या विवाह ही न
हो, परस्त्री से आसक्त, दुःखो, घर वस्त्र और परिवार से युक्त हो, मलिन रहे, क्रूर या क्रोधी स्वभाव का हो, रोगी रहें । ३ गुरु स्व त्रि० में-धन, कीति, सौख्य बुद्धि इनसे युक्त, तेजस्वी सब लोगों में
मान्य उद्योगी, भाग्यवान् ।
४ वध स्व त्रिं० में-वृद्धिमान, गीत नाच, वाद्य पुस्तक चित्र इनका ज्ञाता, कपटी,
कविता करे, बोलने में चतुर, साहसी, शास्त्रार्थ को जानने वाला, उत्तम आचार, लोक
में मान्य, वढ़ई आदि कला का काम जानने वाला ।
५ शुक्र स्व त्रि० मे--बहुत संतति, निरोग बहुत सुख, ऐश्वयंवान, धनवान्,
रूपवान्, स्त्री सुख हो, क्र स्वभाव, कोमल अंग, बहुत स्त्री वादी ।
त्रिं० में सूर्ष और चन्द्र का त्रिं० नहीं होता इससे सूर्य चन्द्र जिसके त्रि० में हो
उनके फल का प्रथम विचार होता है।
१ मंगल के त्रि० में सूयं हो--शूरवीर हो
मंगर के त्रि० में चन्द्र हो--शिथिल हो ( देर से काम करे। )
२ शनि के त्रि० में सूयं हो--विषम या क्रूर स्वभाव ।
शनि के त्रि० में चन्द्र हो--हिंसक ( जीवघाती ) ।
३ गुर के त्रि० में सूय हो--उत्तम गुणवान् ।
गुरु के त्रि में चन्द्र हो--धनवान्, शान्त स्वभाव ।
४ बुध के त्रि० में सूर्य हो--सुखी ।
बुध के नि० में चन्द्र हो- पंडित हो ।
५ शुक्र के वि० में सूर्य हो--उत्तम शोभागुक्त शरीर ।
शुक्र के त्रि० सें चन्द्र हो-संवें लोक प्रिय ।
९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
'साधारण त्रिशांश फल
१ मंगळ के त्रि० में जन्म--चपल, कठिन वचन बोलने वाला, क्रूर बुद्धि।
२ शनि के त्रि० में जन्म--घूमने वाला, मलिन बुद्धि ।
३ गुरु के त्रि० में जन्म--धनवान् ।
४ बुध के त्रि० में जन्ग--गुरु, देव, भक्ति में निरत, साधु प्रिय, बंधुमान् ।
५ शुक्र के त्रि० में जन्म--कामी सुंदंर शरीर सुखी । त्रिशांश विशेष फल ।
१ त्रि० कुंडली में भिन्नगही या उच्च के ग्रह हों--तो सब कायं करने में उत्साह रखने वाला, धर्मात्मा, सज्जनों से पूज्य । २ त्रि० कुण्डली में ग्रहों के सत रज तम गुण विचार कर इनमें जो अधिक बली
अकाशवान् हो--उसी ग्रह के अनुसार फल का विचार कर फल कहना ।
पे चन्द्र गुरु-सतगुणी । 3 बुध--रजोगुणी ।
शनि मंगल--तमोगुणी ।
सात्विक ग्रह बली हो दयालु स्थिरता युक्त, सत्यवक्ता, विनीत, देव ब्राह्मण का भक्त ।
रजोगुण ग्रह बली हो--काव्य करने वाला, शूरवीर, कुछ स्त्रियों में पूर्ण तन मन रखने वाला ।
तमोगुणी ग्रह बली हो तो दूसरों को ठगने वाला, मुखं, आलसी, क्रोधी, अति निद्रालु । इन के मेळ से फलों के भी कई भेद हो जाते हैं ।
अध्याय-५.
अष्टक वर्ग
फल कहने की विधि जन्म लग्न, चन्द्र लग्न, नवांश लग्न, द्वारा बताई ही जाती है परन्तु गोचर का अष्टक वर्ग द्वारा सूक्ष्म फळ भी निकाला जाता है । टर्न शरीर है जिससे शरीर का विचार होता है और चन्द्र मन है जिससे मान- सिक ऐहिक पारलौकिक आदि सभी कार्यों कां विचार होता है ये सब जन्म कुंडली से विचार होता है । जन्म चन्द्र की राशि को आदि लेकर गोचर के वर्तमान ग्र हों की स्थिति पर राशि अनुसार फल कुछ स्थूल हो जाता है जिससे उसमें सूक्ष्मता लाने को अष्टक द्वारा फल का विचार होता है जिसमें प्रत्येक ग्रह और लग्न को भी आदि मानकर उनके शुझ स्थानों की गणना कर अष्टक वर्ग चक्र बनाया जाता है जिससे सब द में इसके द्वारा फल का अच्छा या बुरा प्रभाव स्पष्ट रूप से प्राप्त हो जाता है ।
'अष्टक वर्ग से ४ प्रकार से फल का विचार होता है । (१) आयु साधन. करना, (२) भिन्न भिन्त वर्गों मे रेखाओं और बिन्दुओ के द्वारा अनेक प्रकार के शुभाशुभ फल बनाया जाता है । (३) ऊपर वर्ग के रेखा और
अष्टकवर्ग विचार : ९३
बिन्दु दारा गोचर फल का विचार होता है । (४) अष्टक वर्ग के त्रिकोण शोधन एवं ऐकाधिकत्व शोधन के पश्चात् फल विचारने की विधि है । अष्टक वर्ग विचार
जन्म राशि के अनुसार गोचर का फल आगे बताया गया है। गोचर फल माँ स्थूलता है क्योंकि एक ही राशि के अनेकों मनुष्य होते हैं। इसलिए गोचर फल मे सूक्ष्मता लाने के लिए आचार्यो ने अष्टक वर्ग अंक कहा है । गोचर में चन्द्र राशि को प्रधान मानकर शुभ स्थान की गणना कर प्रत्येक ग्रह का शुभाशुभ जाना जाता है परन्तु अष्टक वर्ग में प्रत्येक ग्रह की राशि को प्रधान मान कर उससे शुभ स्थान की गणना की जाती है इसमें ७ ग्रह और लग्न सहित ८ हो जाते हैं यहाँ ८ प्रकार से शुभत्व की गणना की जाती है इस कारण अष्टक वर्गे द्वारा फल विचारने में सूक्ष्मता आ जाती है । इसके लिए प्रत्येक ग्रह का पृथक् २ चक्र बनाना पड़ता है इस प्रकार ८ अष्टक वर्ग बन जाते हैं । इसमें शुभता सूचक रेखा और अशुभता सूचक ० शून्य वना दिया जाता है। कोई दो शुभ के लिए ० शून्य और अशुभ स्थान के लिए । रेखा का चिल्ल वना देते हैं । चिह्ल किसी प्रकार का हो वह तो अपनी इच्छानुसार बनाया जा सकता है जिससे शुभ या अशुभ स्थान प्रगट हो । पश्चात् प्रत्येक चक्र में शुभ रेखा का योग किया जाता है ।
चक्र बनाने के लिए १२ राशियों को ऊपर लिख लो। जिस राशि पर लग्न हो वहाँ लग्न रिख दो जहाँ जो २ ग्रह हो सव ग्रह लिख देना । उसके नीचे ८ लकीर देना _ जिनके बाँई भोर ग्रहों के नाम लिखे हों और ग्रह से शुभ स्थान गिनते जाना यहाँ शुभ हो वहाँ रेखा जहां अशुभ हो शून्य लिख दो । पश्चात् सव शुभ रेखाओं का योग
करो । इसके पश्चात् प्रत्येक चक्र की शुभ रेखाओं का एक ओर चक्र बना लो ।
इसको सब अष्टक वर्ग चक्र कहेंगे उसमें भी सब शुभ रेखाओं का योग कर दो जिससे स्पष्ट हो जावे किस राशि ने सम्पूर्ण कितनीं शुभ रेखा पाई है ।
पहिले प्रत्येक ग्रहों का अष्टक वर्ग शुभ चक्र देते हैं पश्चात् प्रत्येक का चक्र बनाना वतावेंगे ।
प्रत्येक ग्रहों का शुभ अष्टक वर्ग चक्र
(१) सूर्य का अष्टक वग (२) चन्द्र का अष्टक वग सूर्य चन्द्र मं० वु० गु० शु० श० लर्न | सूर्य चं० मं० बु० गु० शु० श० लग्न
१.३ १: ३-५. ६६ १ ये ३ १ रत वक ३ ३६३ २६२५६७२४1६३२३ ३०४७४५६ ४ ४ ६ ९ १२४ ६ | ७ ६ ५ ४ ७ ५ ६१० ७१० ७ ९ ११ ७ १० ८ ७ ६ ७ १ ७ ११ ११ द ११ ८ १० ८ ११ | १०१० ९ ८5११ ९
९ ९ ९१२ | ११ ११ ११ १० १२ ११ १० १० ११ १० ११ ११ १२ ११ ११ ११ १९
९४: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(३) मंगल का अष्टक वर्ग (४) बुध अष्टक वगं
सू० च० मं० बु० गु० शु० श० ल० सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० लग
३ ३१ ३६ ६ १ १ LRT EAR A
५ ६ २ ५१० ८ ४ ३ 3 ४८२० त का रा र, २
६ ११ ४ ६११ ११ ७ ६ ९ ६ ४ ५११ ३ ४ हैं
१० ७ ११ १२१२ ८१० ११ ८ ७ ६१२ ४ ७ ६
११ यु ९ ११ १२ १० ८ ९ ५ ८ ८
१० १० ११ ९ १० ८ ९ १०
११ ११ १० ११ ९ १० ११
& ११ १२ ११ ११ शुभ योग=३९ शुभ योग-५४
(५) गुरु अष्टक वर्गे (६) शुक्र अष्टक वे
सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० ल० सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० ल०
MERE ONS २ ३ १ ८ १ ३३ ५' १ ३ १
रका री २० २. ४ OW २:११. २ ५.५. RNR
३ ७ ४ ४ ३ ६ ६ ४ ६१२ ३ ६ ६ ९ हे ५ २ डी HU LUE ९. १२. ५ SRN Ef ie ढं,
७११ ८ ६ ७ १० ६ ५११११११ ५ ९ ५
द १० ९ ८ ११ ७ ८ १२ ८१० ८ ९ ११ १० १० ९ ९ ९ ११ ९
१० ११ ११ १० ११ १० ११
११ ११ . १२ ११ शुभ योग=५६ शुभ योग=५२
(७) शनि अष्टक बगे (८) लग्न अष्टक वर्गं
सू० चं० मं० बु० गु० शु० श० लग्न सू० च० मं० बु० गु० शु० श० लग्न
१ ३ ३ ६ ५ ६ २३ १ २२ १. १. १-१. ३
२ ६ ५ ८ ६ ११ ५ ३ पती RFR RR ४११ ६ ९१११२ ६ ४ ६१० ६ ४ ४ ३ ४ १० ७ १० १० १२ ११ ६.|१० ११ १० ६ ५ ४ ६ ११ द ११ ११ १०.५ ११ ११ ८ ६ ५ १० १० १२ १२ ११ | १२ १० ७ ८ ११ ११ ११ ०२९
१० ११
११ शुभ योग-३९ शुभ योग=४९
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बड्वगं विचार : ९५
राहु अष्टक वर्ग कि न एन 7 एरा एफए, छम १ १ २ २ १ ५ ३ ३
२ ३ ३ ¥ ३ ६ ४
३ श भ ७ ¥ ७ ७ पर
4 ७ १२ ८ ६ ११ १० ९
७ दु १२ दु १२ ११ १२
प्र ९
१० १०
शुभ योग=४३
अष्टक वर्ग में लग्न सहित ८ ही ग्रह लिये जाते हैं परन्तु “घुवताराप्रकाश' में राहु
का भी अष्टक वर्ग दिया हैं। वह भी यहाँ दे दिया गया है ।
प्रत्येक अष्टक वर्ग चक्र करना आगे बताया है । किसी ग्रह को आदि लेकर उसके
स्थान को गिनकर जहाँ शुभ हैं वहाँ रेखा बना देनी चाहिये जहाँ शुभ नहीं है केवल
शून्य रख देना चाहिये ।
पृथक् २ अष्टक वर्ग चक्र में शुभ रेखाओं का योग इस प्रकार है :-सूर्य=४८, चंद्र
में=४९, मंगल=३९, बुध-५४, गुरु-५६, शुक्र=५२, शनि=३९, लग्न>४ ९, राहु=४३।
उदाहरणस्वरूपं अष्टक वर्ग चक्र
अष्टक वर्ग चक्र बनाने का उदाहरण ( यहां जन्म कुण्डली के अनुसार राशियाँ
और ग्रह दिये है ) ।
(१) सूर्य का अष्टक वर्ग चक्र ।
राशियां ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९१०१११२ १
ग्रह लग्न श० ० ० मं के०गु० चं सू० ० ०
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रा० CID
पृशनि । ०। । ० । ० ०। | | 1
२।गु्ः- 05.0 yl 5 ०३५०३३०८७० NO
३मंगल। 1 । । ० | । ० | ० ० ।
४सूयं । ० ० 1॥ । । । ० ॥ ०
शुक्र ० ० । । ० ० ० ० 1 ० ० ०
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७ चन्द्र ० [| © o 06 1 1 ० 9 ० 1 ०
८लग्न ० ० | । ० 1 ० ० 9 ॥ । 1
शेखायोगश/ ३ ४ ६ २ ७ ४ २३ ३ ५ ४
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०
योग ३ ४ ६४ ३ ५ ७ ५ २
रेखायोग ५ ३ ५ १२ ४ ५ २
(३) मंगल का अष्टंक वर्ग चक्र
(२) चन्द्र का अष्टक वर्ग चक्र ।
राशियाँ
(४) बुध का अष्टक वर्ग चक्र
राशियाँ
९६: सचिव ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
राशियाँ
ग्रह
८ लग्न
१ शनि
२ गुरु ३ मंगल
४ सूर्य
भ शुक्र
६ बुध ७ चंद्र
८ लग्न
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अष्टक वर्ग विचार : ९७.
(५) गुरु का अष्टक वर्ग चक्र
राशि' ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० १११११ २
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू० ० ०
रा० बु० शु०
० ० । ० । || ०७ ७ ७ ©
॥ Il ० [| || [|
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रेखायोग ५ ५ ४ हिवा क PT) > पे पपपप्प्प्प्प्््््स
(६) शुक्र का अष्टक वर्ग चक्र
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १०१११२१ २
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू ० ०
१शनि । ० ० ० । | । ०८ ००-४४ 02,
२ गुरु ° ० 1 || 11 ० ० ० ० oI
मंग ० || ० । । ० ० । ० । । ०
है| सूर्य ७6००७७०७/७७० o ll ° ० । o (0 ©
श शुक्र । ० ० 195. | ॥ ° । । 1
६ बुघ || । ० ० I 0100 0० ० ० । ०°
७चन्द्र । ० ० । 1 ० । ॥ 1 1 [| [| घरून । । । ॥ । ० ० tr । ० | ०
योग ए ४ २ ४ ८ ३ ४ ५ ३ ४ ६ ४
(७) शनि का अष्टक वर्ग चक्र
राशि है। ४ HY OD है १०५११ वर Fi
ग्रह लग्न ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू ० ०
रा० बरु शु०
वशति । ० ० ० । ० | । ० ० ० ०
२ गुरु Io: Jone: Jess Jo 2 io, To) ‘of Jo El
३मगल ० ० | । । ० ० । ० । । ०
असूर्यं । ० ० । । ० ॥। । ० । । °
Et शुक्र ७०७ ७ t 0 ° ° ° 1 [| 6 0 0
६ बुध, 5०२ lo Is iI 71 115०० 2
७ चन्द्र ० || ° ० ७० ० 1 ॥ ० ० 1०
८ लग्न 1 ० 1 1 ० 1 ० ० ० [| । ०
रेखायोग ४ २ ३ ४ ४ ३ ५ ५ १ ३ ४ १
९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(८) लग्न का अष्टक वर्ग चक्र
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१ २
अह लर् ० श० ० ० मं० के० गु० चं० सू० ० ०
रा० बु० शु०
1 ०6 1 ०
1 ० [] 1
1
० 40 ०० न" ~ 4 ० 2” 9 ««
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प्रत्येक ग्रह का अष्टक वर्ग चक्र बनाने में कई लोग कुण्डली बनाकर उसमे रेखा भर देते हैं यह ठीक नहीं है उसमें कभी भूल हो जाती है । उपरोक्त प्रकार से चक्र चना कर उसमें शुभ रेखा एवं अशुभ का शून्य भी लिख दिया जावे तो भूल नहीं हो सकती और उसकी जाँच में सुविधा होती है ।
यहाँ उदाहरण में शुभ के स्थान में रेखा ओर अशुभ के स्थान में बिन्दु दिया है कई ग्रंथकार विन्दु को शुभ सूचक मानकर रेखा को अशुभ का चिल्ल मानते हैं । परन्तु रेखा को शुभत्व का चिह्न मान लेना उचित जेंचता है । ;
कोई ग्रन्थकार रेखा के स्थान में रेखा न बनाकर उसी ग्रह का सूचक संकेत अक्षर बना देते हैं जैसे रवि के लिए र० चंद्र के लिए चं इत्यादि इसको यहाँ उदाहरण देकर बताया है :--
सूर्ये का अष्टक वर्ग चक्र अन्य प्रकार
राशि ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२१ २
ग्रह् लग्न ० श० ० ० मृ» के० गु० चं० सु० ० ०
रा० बु० शु०
१ शनि श० ० श० श० ७ श० ० ० श० श० श० ए०
२ गुरु गु० ० ० गु० ० गुण 09 oo o ° ० गु०
३ मंगल मं० सं० मं० मं) ० -मं० मं० ० मं० ० ० मं०
४ सुय सू ० ० सू० सु० सु० सु० सू० ० सू० सु० ०
५ शुक्र ० २ शु० शु० ० ० ० ० शु० ० ० ०
६ बुध बु० बु० ० ० बु० बु० बु० बु० ० ० बु० ०
७ चन्द्र ० च० ० ० ० चूं०चूं० ० ० ७० 'चं० ०
झू ० ० ल० रलू० ० लढ ० ० ० ० छ० ल०
शुभयोग५ ३ ४ ६ २ ७ ४ २३ ३५ ४
अष्टक वर्ग विचार : ९९
इसमें विशेष कोई अन्तर नहीं है रेखा के स्थान में यहाँ ग्रह का नाम दिया है ।
परन्तु रेखा का चिह्न शुभता सूचक बना देना सरल जेंचता है ।
कई ग्रंथकार वाई ओर दिए गिए ग्रहों का क्रम इस प्रकार रखते हैं (१) सूर्य (२)
शनि (३) गुरु (४) शुक्र (५) मंगल (६) बुध (७) चन्द्र (०) लग्न परन्तु यहाँ
उपयोग किया हुआ क्रम ही उचित समझ पड़ता है ।
अष्टक वर्ग चक्र की शुभ रेखाओं में मत भेद
यहाँ जो अष्टक वर्ग शुभ रेखा चक्र दिया है उसमें कुछ मत भेद भी हैं-
(१) सूर्य अष्टक वर्ग में शुभ होरा में बुध और गुरु का ८दिया है परन्तु वृहज्जा०
जा० भ० आदि अन्य ग्रन्थों में ९ दिया है ८ नहीं दिया । यहाँ जातक पारिजात के
अनुसार ही बुध और गुरु में ९ दिया है । ८ नहीं दिया ।
(२) चन्द्र अ० वर्ग में गुरु में वृहस्पाराशर में २ दिया है १२ नहीं दिया । वृहज्जातक जा० भऽ, जा० पारि० आदि में २ नहीं दिया १२ दिया है। इससे यहाँ भी
२ नहीं दिया १२ दिया है।
(३) मंगल के अ० वर्ग में बुध का जा० भ० में ११ की जगह १२ दिया है।
बृहत्पारा० जा० पारि० आदि कई ग्रन्थों में ११ ही दिया है १२ नहीं है । इससे यहाँ
भी ११ दिया है १२ नहीं दिया ।
(४) बुध अ० वर्ग में चन्द्र का २फे वदले ५ जा० भ० में दिया है अन्य ग्रन्यो में
२ ही दिया है ५ नहीं दिया इससे जा० पारि० आदि के अनुसार २ दिया है ५
नहीं दिया। बुध अ० वर्ग में लग्न में जा० भ० में ८ के बदले ९ और १० के बदले
१२ दिया है परन्तु जा०'पारि० वृ० पारा० आदि में ८ और १० दिया है वही यहाँ भी
दिया है ।
(५) गुरु अ० वर्ग में शंभु होरा० में लग्न में ८ दिया है शेष ग्रन्थों गेंद नहीं दिया
९ दिया है उसी के अनुसार यहाँ भी दिया है ।
(६) शुक्र अ० वर्ग में वृहत्पारा० में मंगल का ४ दिया है वृ० जा०, जातक
यारि० आदि कई ग्रन्थों में ४ नहीं दिया इससे यहाँ ४ छोड़ दिया ।
(७) शनि अ० वर्ग में जा० भ० में २ के बदले ३ सूर्य का दिया है । जा०पारि०,
बु० पारा०, वु० जा० आदि में २ ही दिया है ३ नहीं दिया यही यहाँ दिया है ।
बुध में जा० भ० में ११ नहीं दिया जातक पारिजात आदि में ११ दिया है इससे
यहाँ भी दिया है। लग्न में जा० भ० में ९ अधिक दिया है जातक पारि० आदि में ९
नहीं दिया इससे यहाँ नहीं दिया ।