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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

१४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्ष फल खण्ड

(३) तृतीय मास प्रवेश का

(इष्ट-पंदित) अंतर-०“-६”-२-७७८१५१२ समीप का कुछ बड़ा अंक

गति=५७-३६=०-०१७७२८८ २.७७८१५१२=२ घ० ६ प०

शेष=२-७६०४२२४

(३) चतुथं मास प्रवेश का

(इष्ट सूर्य-पंक्ति) अंतर २७-१४-०-३३३ ५८१३ शेप के समीप का कुछ बड़ा बंक

गति ५७-३ =०-०२१८९५६ ०:३२१७३४२=२८घ. ३६१.

शेष =०-३२१६८५८

(४) पंचम मास प्रवेश का ८

. (सूर्य इष्ट-पंवित)- ६-९-०"९८९२७६१ शेष के समीप का कुछ बड़ा अंक

गति-५७-५८-०"०२१६४१९ ०"९६८५९१५-६घ० २७१०

| दोष-०'९६७६३४२

(५) षष्ठ मास प्रवेश का - र

(इष्ट सूर्य-पंकिति)=२९-२६=०३०९३११८ शेष के समीप का कुछ बड़ा अंक

. गति=५७-४४०:०१६७२४६ ०.२९२६६६४-३०घ० २३प०

४; शेष=०"२९२५८७२

(६) सप्तम मास प्रवेश का. : * -

(इष्ट सूर्य-पंक्ति)-२५-२३-०"३७०७६०३ शेष के समीप का कुछ बड़ा अंक

गति-५८-ढ ३८० ००९३८९९ ०३६१५१०७-२६घ० ६प०

शेष--०"३६१२७०४

(७) अष्टम मास प्रवेश का

(पंक्ति-सूर्यं इष्ट) १४- ५८०.६२९४८४५८ शेष के समीप का

गति ५९-५४--०"०००७२४४ कुछ बडा अंक

झेष=०.६२८७२१४ ०६२८९३२१

अ रघ. प.

१४-६

नवम, दशम, एकादश एवं द्वादश मास प्रवेश में सूर्य की गति ६० से अधिक होने

से यह सारिणी काम नहं देगी ।

यदि भाज्य मंतर से भाजक गति अल्प हो तो उसकी दूसरी रीति है। जव

भाजक गति, अंतर से छोटा हो तो अंतर भाज्य में से भाजक गति को घटा देना ।

जितने बार घट सके उतने दिन होंगे और शेष के सारिणी अंक में भाजक का सारिणी

अंक घटाने पर जो मंक प्राप्त हो सारिणी में उस शेष के समीप का जो उससे कुछ

बड़ा अंक सारिणी में मिले उसे लेना ओर उससे जो घड़ी पल प्राप्त हो वह लेना ।

मास प्रवेश साधन का उदाहरण : १४९

जितनी' बार गति घट जाय उतने दिन और इतने घड़ी पल उत्तर चालन प्राप्त

हुआ । उदाहरण--

मान लो पंक्ति और इष्ट का अंतर भाज्य ५७८४ है और सूर्य की गति भाजक

छोटा ५६-३० है ।

यहाँ ५७-४ में भाजक ५६-३० घटायो=१ वार घटा=१ दिन ५

मंतर ५७-४ शेष ०-३४=२०१४८२२६ इसके समीप का कुछ बड़ा

गति ५६-३० गति५६-३०=००२६१०२८ अंक=२.०००००००

शेष ०-३४ शेष=१.९९८७२०८ घ. प.

घ. प, ०-३६

यहाँ १ बार घटाया था तो १ दिन ओर ०-३६ चालत प्राप्त हुआ ।

यहाँ गति और छोटी होती तो अंतर से घटाने पर जो दोष बचता है यदि वहू

गति से बड़ी बचती तो पहिले घटाये हुए शेप में फिर उसी गति को घटाना बारंबार

घटाते जाना जब तक कि दोष अंक गति से छोटा अंक न प्राप्त हो जाय । यहाँ

जितनी वार गति घटाई गई उतने दिन और शेष के सारिणी अंक से गति के सारिणी

अंक घटाने पर उससे जो घटी पल प्राप्त हो वह लेना ।

अब इसी उपरोक्त उदाहरण को गणित द्वारा करते हैं--

५७.४ ___३४२४ __दिन घ. प. ३३९०)३४४४(१दिन ५६-३० ३३९० १ ०-३७ ३३९०

३४ > ६०

२०४०(०घड़ी'

१०१७०

२०७००

२०३४० `

३६०

डिप्पणो--पंक्ति के बार के आगे घड़ी पल ०-०दिया है क्योंकि पंक्तिस्थ सूरये

का इष्ट ० है। यदि मिश्र कालीन पंक्ति सूर्ये हो तो वार के आगे मिश्र काळ की

घड़ी पल भी देनी चाहिए ।

प्रत्येक मास प्रवेश का इष्ट निकाल चुके हैं। अब उस इष्ट पर से लग्न सारिणी

के. सहारे लग्न निकाल कर नीचे दिया है । F

१५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

मास प्रवेश का इष्ट लग्न दिन समय मुन्था'

घ. प. वि.

(२) द्वितीय मा. प्रवेश ५८-१९-३३ मीन बुधवार चैत्र शुक्ल७ सं० २००२ मकर

(३) तृतीय ,, ०- ६-१५ मेष इतवार वैशाख शुक्ल, , मकर

(४) चतुर्थ ,, २८-३६-२१ वृश्चिक बुधवार ज्येष्ठ शुक्ल १० ,, मकर

(५) पंचम , ६-२७-५१ सिह इतवार आषाढ़ शुक्ल १२ ,, कुम्भः

(६) षष्ठ ,, ३०-३५-२० मकर बुधवार श्रावण शुक्ल १४ ,, कुम्भ

(७) सप्तम ,, २६- ६-३० कुम्भ शनिवार आश्विन कृष्ण १ ,, कुम्भ

(८) अष्टम , ४५-३१-३६ ककं सोमवार कातिक कु० १ ,, कुम्भ

(९) नवम ,, ३४-३८- २ मिथुन बुधवार मार्ग शीषं कृ० २ ,, कुम्भ

(१०) दशम ,, ०-४१- ८ धन शुक्रवार पौष क० ३ „ कुम्भ

(११) एकादश , २०-१०- १ मिथुन शनिवार माघ कु०२ ,, कुम्भ

(१२) द्वादश ,, ५१- २-२३ धनं इतवार फाल्गुन कु० १ ,, कुम्भ

सास प्रवेशा की मुन्या स्पष्ट करना

वर्ष आरम्भ के मुंया स्पष्ट में प्रति मास २॥ अंश जोडते जाने से आगे के मास

की मुंथा स्पष्ट होती है जैसा पहिले बता चुके हैं ।

(१) गत वर्षे ५५-१२=४६-श्ेष ७+ जन्म लग्न ३:१० राशि मुंथा

(२) जन्म लूग्न २रा-२०९-२१” वर्ष प्रवेश के समय मुंथा स्पष्ट

+यताब्द ५५ ९२००-१६-२१” यह प्रथम मास की

१२) ५७-२०-१६-२१(४ मुंथा हुई ।

४८ ड

पोष. ९-३०-१६३१

इसमें २॥ अंश जोड़ा तो दूसरे मास की मुंथा हुई। इसी प्रकार प्रत्येक मास में

२॥ अंशच जोडते जाने से प्रत्येक मास की मुंथा निकळ आयगी जैसा आगे दिया है ।

मुंया स्पष्ट चक्र (प्रत्येक मास प्रवेश के समय का)

मडळ २. ३४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२

सुया मास मास मास मास मास मास मास मास मास मास मास मास

राशि ९ ९ ९ ९ १० १० १० १० १० १० १० १० अंश २० २२ २५ २७ ० २ ५ ७ १० १२ १५ १७ कला १६ ४६ १६ ४६ १६ ४६ १६ ४६ १६ ४६ १६ ४६ विकला २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१ २१

SS 305, Mr ar dS 25 ° IS जरा क

मास प्रवेश साधन का उदाहरण : १५१

मुंथा का स्थान लग्न कुण्डली से वर्ष प्रवेश ( ५५ गताव्द ) की कुण्डली में जन्म लग्न कुण्डली वपं लग्न कुंडली ५५ गताब्द की

  1. (२) द्वितीय मास प्रवेश सं० २००२ चैत्र शुक्ल ७ बुधवार इष्ट ५८-२९-३३ मीन लग्न

मास के ६ अधिकारी

१ जन्म छग्नेश=बुध

र वर्ष , च्युध

३ मास , च्बुध

४ मुंथेश ,, =शनि `

(०2) ५ त्रिराशि पति 52. रात्रि>मीन } न

६ समय पति .. 00 0 ‘~ ` रात्रि चंद्रराशीश }

हे लग्न पर बुध और गुरु की दृष्टि नहीं है। शनि व चंद्र की १० गुप्त बैरा दृष्टि हैं दोनों में शनि बली है तो मासेश शनि हुआ ।

(३) तृतीय मास प्रवेश कुंडली । वैशाख शु० ९ रविवार इष्ट ०-६-१५ मेष लग्न

षड अधिकारी - (१) जन्म र्ने च्बुध

(३) वर्ष , च्बुध (३) मास ,, =मंगल

(४) मुंयेश ,, ऱ्झनि (५) त्रिराशीश छ दिन, भेष इं

(६) समय पति

दिन, सूये, राशीश } ति

केवल शनि की ११ गुप्त वैरा दृष्टि है मर किसी की दृष्टि नहीं है। इससे

मासेश शनि हुआ ।

१५२ :-सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(४) चतुर्थ मास प्रवेश की कुण्डली । ज्येष्ठ शु० १० बुधवार २८-३६-३१ वृश्चिक लग्न

84 ५/ षड्धिकारी

१ जन्म लग्नेश=बुध २वर्ष , =बुंध

३ मास ,, =मंगलं ४ मुंयेश ,, शनि

५ त्रिराशीश दिन लग्न वृश्‍चिक लग्न-मंगल

६ समय पति दिन सूर्य राशीश=्वुध

« लग्न पर किसी. की दष्टि नहीं हैं

जम्म लग्न ३ पर शनि की गुप्त स्नेहा

दृष्टि है । इससे मांसेश शनि हुआ ।

(५) पंचम मास प्रवेश कुंडली । आषाढ़ शु० १२ इतवार इष्ट ६-२७-५१ सिंह लग्न

वळ षडधिकारी

३श,रा| २ वर्षे ,, च्बुध ३ मास ,, स्पूरय.

४ (टा » शनि शर दिन सिह .छग्न-चंद्र ६ समय पति दिन सूर्य राशीश=चंद्र

लग्न पर सूर्य बुध की दृष्टि नहीं है ।

शनि की ३ गुप्त स्नेहा दृष्टि और चंद्र

की ५ प्रत्यक्ष स्नेहा दृष्टि ४५ की है । जों

शनि से बलवान दृष्टि है । इससे मासेश

शनि हुआ । चंद्र मासेश नहीं होगा ।

(६) षष्ठ मास प्रवेश कुण्डली । श्रावण शुक्ल १४ बुधवार इष्ट ३०-३५-२० मकर लग्न ।

षड़धिकारी ` १ जन्म छग्नेश-बुध २ वर्ष ,, च्बुध ३ मास ,, =शनि

४ मुंथेश ,, ¦ =शनि ५ तिराशीश दिन मकर लग्न-मंगल ६ समय पति दिन सूयं राशीश=सूये

लग्न पर शनि और मूर्यं की दृष्टि नहीं है । बुध की प्रत्यक्ष बैरा दृष्टि है

और मंगळ की प्रत्यक्ष स्नेहा दृष्टि है।

बुध मासेश हुआ क्योंकि उसकी ६०” दृष्टि है ।

मास प्रवेश साधन का उदाहरण : १५३

(७) सप्तम मास प्रवेश कुंडली । आदिवन कृ० १ शनिवार इष्ट २६-६-कुंम लग्न

पड़धिकरारी

१ जन्म ळग्नेश=वृघ २:वपं ,,. च्बुध ३ मास ,, =शनि

४ मुंयेश , = शनि ५ त्रिराशीश दिन कुंभ लग्न-गुरु

६ समय पति दिन सूयं राशीश-बुध

केवल बुध की लग्न पर प्रत्यक्ष वैरा

दृष्टि है । मासेश बुध हुआ ।

(८) अष्टम मास प्रवेश कुण्डली । कातिक कृ० १ सोमवार इष्ट ४५-५३-३६ ककं लग्न

३ मास ,, न्चंद्र

४ मुंथेश ,, =षानि ५ त्रिराशिपति रात्रि ककं लग्न=मं गछ

६ समय पति रात्रि चंद्र राशीश=मंगल

लग्ने-पर शनि व मंगळ की दृष्टि

नहीं है । बुध अर र चंद्र की लग्न पर गुप्त

बैरा दृष्टि'है । इसमें चन्द्र बलवान है ।-

चन्द्र मासेश नहीं होगा बुध मासेश होगा ।

(९) नवम मा० प्र० कुण्डली । मार्गशीर्षं कृ० २ बुध वार इष्ट ३४-३८-२ मिथुन लग्न

¥ १ / ` पड़धिकारी न . 4 जन्म रूग्नेश=्बुध

२वर्ष ,, च्बुध ३ मास ,, च्बुध ४ मुंथेश ,, =शनि

५ त्रिराशीश मिथुन लग्न=बुघ ६ समय पति राविऱ्बुध

लग्न पर किसी की दृष्टि नहीं है ।

जन्म लग्न को भी कोई नहीं देखता

इससे मुधेश शनि मासेश हुआ ।

१५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(१०) दशम मा० प्र० कुण्डली । पौष कृ० ३ शुक्रवार इष्ट ०-४१-८ धन लग्नः

१ जन्म लग्नेश च्बूध

२ वर्षे ,, च्बुध

३ मार्स २ ऱ्गुरु

४ मुंयेदा ,, =शनि

५ त्रिराशीश दिन धन लग्नम्शनि

६ समय पति दिनऱ्गुर ८”

लग्न पर बुध व शनि की दृष्टि नहीं

है । केवल गुरु की गुप्त स्नेहा दृष्टि है ।'

मासेश गुरु हुआ ।

(१ १) एकादक्ष मा० प्र० कुण्डली । माघ कु० २ शनिवार इष्ट २०-३०-३ मिथुन लग्नः

१ जन्म लग्नेश =वुध

र्‌ कँ >प्बुध

३मास ,, न्न्व्‌ध

४ भुंथेश ,, =्शनि

५ त्रिराशीश दिन मिथुन लग्न=शनि

६ समय पति दिनन्श्नि

लंग्न पर शनि की दृष्टि नहीं है ॥

केवल बुध की प्रत्यक्ष बैरा दृष्टि है।

मासेश बुध हुआ ।

(१२) द्वादश्च मा० प्र० कुण्डली । फाल्गुन कृ० १ इतवार इष्ट ५१-२२३ धन लग्नः

१ जन्म छरनेश =वुध

२ वर्ष „ स्बुध

३ मास ,, ऱ्बुध

४ मुंथेश 7३ स्शनि

५ तिराशीश रात्रि घन रग्न-दशनि

६ समय पति रात्रिस्सूर्य

शनि की प्रत्यक्ष बैरा दृष्टि है सूर्य

बुध और गुरु की गुप्त स्नेहा दृष्टि हे ।

शनि मासेश हुआ, क्योंकि उसकी ६० दृष्टि है ।

अध्याय १७

दिन अवेश साधन का उदाहरण

अभी वर्ष के १२ महीनों का मास प्रवेश का समय निकाल कर मास कुण्डली बनाः चुके हैं। उन्हीं में से सप्तमः मास को लेकर एक महीने भर का दिन प्रवेश. निकालते हैं ।

जन्म के या वपं प्रवेश के सूर्य में जिस प्रकार एक-एक राशि जोड़ने से अगलेः मास के मास प्रवेश का सूर्य बन जाता है। उसी प्रकार मास के सूर्य में प्रति दिनः

१-१ अंश जोडते जाने से प्रत्येक दिन का दिन प्रवेश के समय का सूर्य बन जाता है।'

दिन प्रवेश के समीप का पंचांग का सूर्य लेकर दिन प्रवेश के सूर्य का अंतर

निकालना और इस अंतर में सूर्यं की गति का भाग देकर + आत्मक चालन निकाल

कर पंक्ति के समय में ऊं करना दिन प्रवेश का वार घटी पल विपल निकल आता है। जिस प्रकार मास प्रवेश का समय निकाला था उसी प्रकार दिन प्रवेश का भीः

समय निकाला जाता है।

पहिले सप्तम मास प्रवेश के सूर्य में प्रति दिन का इष्ड सूर्य १-१ अंश जोड और उसके समीप का पंक्ति का सूर्य और उसकी गति के साथ नीचे चक्र में दिया है।

सप्तम मास का पंचांग से

दिन प्रवेश का सूर्य पंक्तिश्थ प्रातः रवि गति वार तारीख समय

क्रम सन्‌ सम्बत्‌ २००२ रा. अँ. क. वि. रा. मं. क. वि. क. वि. १९४५

१५ ५३३९ ४ ५ ७ ३६ ५८ ४३ शनिवार २२ सितं. आ०कृ० १.

२५ ६ ३३ ९ ५ ६ ६ २८ ५८ ४५.इतवार २२ ,, १ रै

३५ ८३३ ९ ५ ७ ५२० ५८ ४८ सोनवार २४ ,, ,, ३

४५ ८३३९ ५ ८ ४ ११ ५८ ५० मंगल २५ ,, गर ४

५५९३३९ ५ ९ ३ ३ ५८ ५२ बुधवार २६ ,, » %.

६% १० ३३ ९ ५१० ९ ५५ ५८ ५५ गुरुवार २७ ,, „ ६

७ ५ ११ ३३ ९ ५ ११ ० ४५ ५८ ५७ शुक्रवार २८ ,, » ७

८ ५ १२ ३३ ९ ५११ ५९ ३८ ५८ ५९ शनिवार २९ ,, »% ८

९ ५ १३ ३३ ९ ५ १२ ५८ ४६ ५९ २ इतवार ३० ,, SN

१० ५ १४ ३३ ९ ५ १३ ५७ ५५ ५९ ४ सोमवार १ अक्टु० , १०.

“१५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल' खण्ड

दिन प्रवेश का पंक्तिस्थल प्रातः

सयं सयं गति

क्रम रा. अं. क० वि. रा. मं. क. वि.क. वि वार तारीख समय

-११ ५ १५ ३३ ९ ५ १४ ५७ ३ ५९ _ ७ मंगलवार २ अक्टू. आ०$० ११

१२ ५ १६ ३३ ९ ५ “१५ ५६ १२ ५९ ९ बुत्रवांर ३ , » १२

१३ ५ १७ ३३ ९ ५ १६ ५५ २० ५९ ११ गुरुवार छ ४ ,, १ रै

१४ ५ १८ ३३ ९ ५ १७ ५४ २९ ५९ १३ शुक्रवार ५ ,, » 1%

१५ ५ १९ ३३ ९ ५ १८ ५३ ३७ ५९ १५ शनिवार ६ ,, „» ३०

१६ ५ २० ३३ ९ ५ १९ ५३ ४ ५९ १८ इतवार ७ , शुक्ल १

१७ ५ २१ ३३ ९ ५ २० ५२ ३० ५९ २१ सोमवार ८ ,, तर

१८ ५ २२ ३३ ९ ५ २१ ५१ ५७ ५९ २३ मंगलवार SN 11 ३

१९ ५ २३ ३३ ९ ५ २२ ५१ २४ ५९ २६ वुधवार १० ,, |

२० ५ २४ ३३ ९ ५ २३ ५० ५० ५९ २५ गुरुवार ११ ,, bo Uh

२१ ५ २५ ३३ ९ ५ २४ ५० १७ ५९ ३० शुक्रवार १२ ,, » पै

२२ ५ २६ ३३ ९ ५ २५ ४९ ४४ ५९ ३२ दानिवार १३२ ,, » 5

२३ ५ २७ ३३ ९ ५ २६ ४९ १० ५९ ३४ इतवार १४ ,, पा ७

२४ ५ २८ ३३ ९ ५ २७ ४८ ५४ ५९ ३७ सोमवार१५ ,, ५7९

२५ ५ २९ ३३ ९ ५ २८ ४८ ३७ ५९ ३९ मंगलवार१६ ,, ११ १०

२६ ६ ० ३३ ९ ५ २९ ४८ २१ ५९ ४१ बुधवार १७ ,, » ११

२७६ १३३ ९६ ० ४८ ५ ५९ ४३ गुरुवार १८ ,, » १२

"२८ ६ २३३९६ १ ४७ ४८ ५९-४६ शुक्रवार १९ ,, , १३

२९६ ३ ३३ ९ ६ २४७३२ ५९ ४८ शनिवार २० ,, 0). १४

३० ६ ४ ३३ ९६ ३ ४७१६ ५९ १० इतवार २१ १५

सप्तम मास प्रवेश का जो इष्ट और कुण्डली है वही सप्तम मास के पहिले दिन

“की' कुण्डली समझी जायगी । आगे के दिनों की गणित द्वारा निकाळनी पड़ेगी ।

अन्तर--चाछन ॐ इष्ट से पंक्ति कम हो तो +पंक्ति अधिक हो तो-(ऋण) चालन

*(२) इष्ट सूर्य ५रा-६०-३३-९” अन्तर २६-४१” १६०१” ० दिन २७घ.१५प.

पंक्ति ५ -६- ६ -२८ गति ५८-४५ =३५२५ = ३ वि.+चालन

अन्तर ० -०-४६-४१+ प्रात इष्ट ० में उपरोक्त चालन जोड़ने से इष्ट गति ५८-१५” २७ घ.-१४ प.-३ वि. आया (३) इष्ट सूये ५-७--३३-९ मंतर २७-४९” १६६९” दिन घ. प. वि.

पंक्ति ४-७- ५-२० गति ५८-४८ =३५२८ = ०-२८-२३-३

मंतर=०-०-२७=४९ =इष्ट घ. प. वि. चालन --

२८-२२-३

दिन प्रवेश साधन का उदाहरण : १५७

(४) इष्ट सूर्य ५-५-३२-१ अंतर २०-५८” _ १७३८” _ दिन ध. प, वि.

पंक्ति ५-८- ४-११ गति ५८-५० ३५३० ०-२९-३२-२७"

अंतर = -०¬२८-५८५ =इष्ट घ. प. वि. चालन+-

२-९-३२-२७

(५) इष्ट सूयं ५-९-३३-९ ` अंतर ३०-६” _ १८०६” _दि. घः प. वि.

पंक्ति ५-९- ३-३ गति ५८-५२ ३५३२ ०-३०-४०-४६.

अंतर =०-०-३०-६ + इष्ट घ. प. वि- चालन +

३०-४०-४६

(६) इष्ट सूर्यं ५-१०-३३-९ - अंतर ३१-१४” _ १८७४” _ दि. घ. प. वि.

पंक्ति ५-१०- १-५५ गति ५८-५५ ४८-५५ ०-३१-४८-२७-

अंतर =०¬ ०-३१-१४ =इष्ट घ. प. वि चालन --

३१-४८-२७

इसी प्रकार पुरे ३० दिन का दिन प्रवेश का इष्ट निकाल लेना चाहिए यहाँ पंक्ति:

इष्ट सूर्य बड़ा है। इससे चालन+है । अंतर कला विकला की विकला बना ली गतिः

'की विकला वनाकर यहाँ भाग देने से जो चालन+प्राप्त हुआ इष्ट काळ? होने से +

चालन जोड़ने से वही रहा जो चालन से अंक प्राप्त हुआ था इस प्रकार वही दिन

प्रवेश का इष्ट काल आया “जैसा ऊपर के गणित से प्रकट होगा । प्र त्येक दिन प्रवेशः

कॉ गणित द्वारा प्राप्त उत्तर नीचे चक्र में दिया है। |

दिन पक्ति अंतर

प्रवेश क, वि. घ.

२५ ३३ २६

२६ ४१ २७

२७ ४९ २८

रप ५८ २९

३० ६ २०

३१ १४ ३१

३२ २३ २२

३३ ३१ ३४ ३४

३५ १४ ३५

३६ ६ ३६

३६ ५७-३७

"0 न9छ NN 2८ ७ -० ॥WHS ० ७० ३७ ४९ ३८

००७ ७०९ ~ ~

प्राप्त इष्ट लग्न प. वि., नच.

६ ३० कुम्भ ३०- ३

१५ ३ कुम्भ २९८५९

२३ : ३ कुम्भ २९-५६

३२ २७ मीन २९-५३

४० ४६ मीन २९--४९

४८ २७ मीन २९-४६

५७ ३६ मेप २९-४३

प २९ मेष ९-४०

५६ ४६ मेष २९-३६

  • ३८ ५६ मेष २९-३३

३८ २२ वृष २९-३०

२८ ५१ वृष २९-२७

२० १८ वृष २९-२४

दिन मान दिन प्रवेश

प. रातया दिनमें

तारीख

सन्‌ १९४५

दिन में शनिवार २२ सितंबर”

दिन में इतवार २३

दिन में सोमवार .२४

दिन में मंगलवार २५

रात में बुधवार २६

रात में गुरुवार २७

रात में शुक्रवार २८

रात में शनिवार. २९

रात में इतवार ३०

रात में सोमवार १ भक्टूवरः

रात में मंगलवार २

रात में बुधवार ३

रात में गुरुवार ४

"१५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

नदन पंक्ति अंतर प्राप्त इष्ट दिन मान दिन प्रवेश तारीख

` अवेश क. वि. घ. प. वि. लग्न घ. प. रातया दिनमें दिन सन्‌ १९४५

१४ ३८ ४० ३९ १० ४१ वृष २९-२१ रात शुक्रवार ५ ,,

१४ ३९ ३२ ४० २ १ मिथुन २९-१८ रात शनिवार ६ ,,

१६ ४० ५ ४०३५ ६ „,, २९-१५ रात इतवार ७ ,,

-१७ ४० ३९ ४१ ५४२ „, २९-११ रात सोमवार ८ ,,

११५ ४१ १२ ४१ ३७ ४० „, २९-८ रात मंगलवार ९ ,,

-१९ ४१ ४५ ४२ ८५३ „» २९-४ रात बुधवार १० „,

-२० ४२ १९ ४२४१३६ „, २९-5 रात गुरुवार ११ ,,

२१ ४२ ५२ ४३ १३ ३६ ,, २८-५७ रात शुक्रवार १२ „,

“२२ ४३ ३५ ४३४५२५ ,, २८-५३ रात शनिवार १३ ,,

२३ ४३ ५९ ४४ १८ ११ कर्कं २८-५० रात इतवार १४ ,,

१२४ ४४ १५ ४४३२ ४ , २८-४७ रात सोमवार १५ ,,

६४ ४४ ३२ ४४ ४७ ४० |) २८-४४ रात मंगलवार १६ ,,

८२६ ४४ ४८ ४५२०१५ „ २८-४० रात बुधवार १७ ,,

"२७ . ४५ ४ ४५ १६ ४९ ,, २८-३७ रात गुरुवार १८ ,,

-२८ ४५ २१ ४४ ३१ ३७ ,, २८-३४ रात शुक्रवार १९ ,,

:२९ ४५ ३७ ४५ ४६ ९ , २८-३१ रात शनिवार २० ,,

(३० ४५ ५३ ४६ ० ४० २८-२८ रात इतवार २१

उपरोक्त इष्ट पर से लग्न निकाल कर इस चक्र में दे दिया है । आगे इसी लग्न

के अनुसार प्रत्येक दिन प्रवेश की कुंडली बना लेनी चाहिए । दिन प्रवेश की कुंडलियाँ

आगे दी हैं ।

दिन प्रवेश की सुन्या

प्रत्येक मास की मुथा में ५” कला जोडते जाने से प्रति दिन की मुंथा निकल

*आती है क्योंकि मुन्या की गति प्रतिदिन ५ कला है ।

यहाँ सप्तम मास प्रवेश के आगे का १ महीने का प्रत्येक दिन प्रवेश का दिया :है । सप्तम मास प्रवेश की मुन्या १० रा-५०-१६'-२१” थी । इस मास भर में कुंभ

में मुच्या रहेगी ।

दिन प्रवेश की मुन्या रा. अं. क. वि.

१० ५ १६ २१

१० ४ २१ २१

१० ५ २६ २१

१० १ ३१ २१

१० ५ ३६ २१

१० ५ ४१ २१

१० ५ ४६ २१

दिन प्रवेश की मुन्धा रा. भं. क. वि.

८. ३ १2 १० ५ ५१ २१

९ 0 1 १० ५ ५६ २१

१० 32 27 १० ६ १ २१

१७:00 TOW ६ रप

१२ „» 2२ १० ६ ११ २१

१२ Fr) 2 १० ६ १६ २१

१४ ,, 7 १० ६ २१२१

दिन प्रवेश साधन का उदाहरण : १५९

(दिन प्रवेश की मुन्था रा. अं. क. वि. दिन प्रवेश की मुन्था रा. भं. क. वि.

१५ 1) ११२ १० ६ २६ २१ २३ गर 7 १० ७ ६ २१ १६ , 7 १० ६ ३१ २१ र४॒,, ,, १० ७ ११ २१

१७ 27 २२ १० ६ -६ २१ २५ 1) = १० ७ १६ २१

१८ 11 | १० ६ ४१ २१ २६ 1] १२ 1० ७ २१ २१

१९ 31 ऱ्या १० ६ ४६ २ १ २७ 12 ११ १० ७ २६ २१

२० गर 1) १० ६ ५१ २१ २८ 1s , १० - ७ ३१ २१

२१ , ५८ १० ६ ५६ २१ २९ , =, १० ७ ३६२१

२२ 7 १० ७ १ २१ ३० १० ७ ४१ २१

प्रति दिन का फल जानने को दिन प्रवेश कुण्डली बनानी पड़ती है।

(२) दूसरे दिन की दिन प्रवेश कुण्डली' सम्वत्‌ २००२ आश्विन क्क० २ इतवार 'इष्ट २७१५-३ लग्न कुम्भ दिन ।

ee ५१२)? १ बिन सप्त अधिकारी

का \ रके १ जन्म की ९ क,| २ वर्ष लग्नेशरबूध

३ मास लग्तेशरशनि

४ दिन लगनेश=शनि

शर व्य

६ निराशीश-गुरु ७ समय पतिस्बुध,

केवल बुध की प्रत्यक्ष बैरा दृष्टि लग्न

पर है । दिनेश बुध हुआ ।

(३) तीसरे दिन की दि० प्र० कुण्डली । आरिव० कृष्ण ३ सोमवार इष्ट २८-

२३-३ दिन कुम्भ लग्न

१ जन्म लग्नेश=बुध

२ वर्ष लग्नेशस्बुध

३ मास ऊग्नेश=रत्ति

४ दिन छग्नेन=शनि

५ मुन्थेश-शनि

६ त्रिराशीष-गुरु ७ समयपति-बुध

लग्न पर किसी की दृष्टि नहीं है।

जन्म लग्न ३ को बुध गुरु गुप्त वेरा दृष्टि

से देखते हैं। इसमें स्वग्रही बुध बलवान्‌

है । दिनेश बुध हुआ ।

१६० : सचित्र ज्योतिष दिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(४) चतुर्थ दि प्र० की कुण्डली । आइ्वि. कृ० ४ मंगलवार दिन इष्ट २९-३२- ` २७ लग्न मी

१ जन्म लग्नेशऱ्वध

२ वर्ष लग्नेश=वृध

३ मास रूग्नेश-शनि

४ दिन=गुरु

५ मुन्थेश=शनि

६ त्रिराशीश=चन्द्र

७ समय पति=बु

शनि की प्रत्यक्ष स्नेह दृष्टि है परन्तु

बुध गुरु की प्रत्यक्ष वैरा ६०' दृष्टि है

इसमें बुध वली है । दिनेश बुध हुआ ।

(४) दि० प्र कुण्डली । आरिव० १ बुधवार रात्रि इष्ट ३०-४०-४६ लग्न मीना

१ जन्म लग्नेश-बुध द्‌

२ वर्ष लग्नेशस्बुधः )

३ मास रूग्नेश-शनि तं

४ दिन लग्नेश-गुरु

५ मुन्थेश-शनि

६ त्रिराशीश-चन्द्र

७ समय पतिर्शुक्र

शुक्र की दृष्टि लग्न पर नहीं है

  • पूर्वोक्त शनि बुध गुरु की दृष्टि है इनमें

बुध बलवान है । दिनेश बुध

(६) दिन प्रवेश कुण्डली । आदिव०कु० ६ गुरुवार रात्रि इष्ट ३१-४८-२७मीनलग्त.

सप्ताधिकारी उपरोक्त ही हैं

दिनेश बुध

~

फल विचार : १६१

इसी प्रकार शेष दिनों की या इच्छित दिन की दिनप्रवेश कुण्डली पंचांग पर से वना लेनी चाहिए । सूक्ष्म फल वर्ष की अपेक्षा मास से और मास की अपेक्षा दिन प्रवेश से प्रगट होता है ।

अध्याय १८

(वर्षं फल खंड का उत्तराद्ध-फलित भाग)

फल विचार

वर्षं फल में फल के विचार में वर्षेश, मासेश, दिनेश, मुन्था, मुन्थेश,सहम,सहमेश

एवं मैत्री दृष्टि, पंचवर्गी वळ, हं वल, हद्दा आदि का विशेष विचार होता है ।

इनके अतिरिक्त भाव फल, दशाफल,राज योग,राजयोग भंग,भ रिष्ट योग, अरिष्ट

भंग,एवं अन्य कई प्रकार के योग जातक के अनुसार ही विचारणीय है । ज्योतिष

दिक्षा भाग ३ फलित खण्ड में इनका पूरा फल विस्तार पूर्वक दिया है । इसी कारण

यहाँ अरिष्टयोग राजयोग आदि एवं मुद्दा ध्रिशोत्तरी दशा योगिनी दशा आदि का

संक्षिप्त वर्णन दिया गया है ।

आशा है कि पाठक उपरोक्त फलित खण्ड अवश्य देख चुके होंगे। यदि अभी

तक उक्त फलित खण्ड को न देखा हो तो निवेदन करता हू कि उसे अवश्य देखें।

उससे वर्ष प्रवेश, मास प्रवेश या दिन प्रवेश कुण्डली में उक्त फलित खण्ड के सहारे

कई योग खोजने में सहायता मिलेगी जैसे ऊपर से गिरने या चोट लगने या सर्प आदि

के काटने का योग, इसी प्रकार के अनेक योग हैं जो इष्ट कुण्डली में हैं या नहीं

खोजना पड़ेगा । ऐसे अनेक योग फलित खंड में दिये हैं जिन को जानना आवइयक

है । ग्रंथ के विस्तार होने के भय से वे यहाँ नहीं दिये इस आशय से कि पाठक उनको

देख चुक्रे होंगे ।

इन के अतिरिवत नीलकंठी के १६ योग भी यहाँ दिये हैं और उदाहरण देकर

उनको समझाया है । ये योग अधिकतर प्रश्‍न सम्वन्ध में काम आते हैं । परन्तु वर्ष के

फक वर्णन में भी इनका उपयोग हुआ है । इस कारण उनको भी यहाँ दे दिया है

जि्षसे पाठक उनसे अनभिज्ञ न रहें और यहाँ वणित फल को समझ सके ।

वर्ष में किस भाव से क्या विचारना

(१) लग्न से-शरीर वर्ण चिह्न घाव आयु सुख दुःख जाति स्वभाव ।

(२) दवितीय से--पोना चाँदी रत्न धातु आदि सव द्रव्यो की स्थिरता और मित्रों

का विचार । * ११

१६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(३) तृतीय से--भाइयों का सुख और उन से धन की प्राप्ति, साहस, मार्ग,

नोकर, पितृ सम्वन्धी हानि ।

(४) चतुर्थ--माता और पिता से सुख, भूमि आदि का लाभ, गडी सम्पत्ति,खेत,

बाड़ी घर, वाहन का सुख, पिता का धन ।

(५) पंचम--विद्या और संतान का लाभ तथा गर्भपात का विचार, यन्त्र-मन्त्र,

पुत्र-कन्या, गर्भनेत्र, धन का उपाय ।

(६) षष्ठ--रोग, मामा, शत्रुभय, शरीर क्लेश, पशु, पराश्रय, भथ, घाव, फोड़ा आदि ।

(७) सप्तम--स्त्री, व्यापार, खोई हुई चीज, भूले-भटके की वात-चीत, चोरी

गया द्रव्य, रास्ता, यात्रा, झगड़।। सप्तम में कोई ग्रह रहने से अच्छा फल नहीं देता । यदि शुक्र हो तो कामी होता है ।

(=) अष्टम--पुर्वजनों का धन, मरे हुए की सम्पत्ति, संग्राम, शत्रु, किले की चढ़ाई का विचार, मरण विचार, नष्ट धन का, परिवार का तथा मानसिक दुःख का विचार, युद्ध से भय,आयु । इसमें मरण विचार इस प्रकार है, अष्टम भाव की नवांश राशि स्थिर--घर में, चर--परदेश में, द्विस्वभाव-मार्ग में । शुभ युक्त दृष्ट- तीर्थ में । पाप युक्त दृष्ट-कुत्सित स्थान में क्लेश से मरण । उसमें भी द्रेष्काण वश फाँसी से या दूसरे के मारने से या अपने द्वारा, पानी में डूबने आग में गिरने विष आदि से मरने का विचार करना ।

(९) नवम- भाग्य धर्म आदि का विचार, मार्ग, स्त्री संग ।

(१०) दशम--कमं, राज्य का लाभ, माता पिता से धन मुद्रा, अत्यन्त पुण्य विपय, तीर्थं यात्रा, यज्ञ महादान, आरोग्यता ।

(११) लाभ से--राज्य लाभ, सन्मान आदि से लाभ, प्रत्येक धनों का प्रयोजन, अनाज का भाव, मित्र लड़की, चतुष्पद, राजा धन, वहुत-सी आमदनी की युक्ति, परिवार ।

(१२) व्यय भाव से--शत्रु से दुःख वहुत खर्च,शत्रु को रोकना,पकड़ना, हराना, पीड़ा ।

जन्म लान से वर्ष लान का विचार

  • वर्ष कुण्डली जब बन जाती है तब देखना वर्ष में जन्म की लग्न राशि कहाँ पड़ी है। जैसे यदि जन्म कुण्डली में कुम्भ राशि है और वर्ष कुण्डली में ककं राशि है। तो यह कुम्भ राशि वर्ष कुण्डली में आठतें स्थान में है । तव नीचे बताये अनुसार अष्टम का फल बुरा बताया हे । रट

(१) प्रथम स्थान--यह पुनर्जन्म वर्षे है। शरीर कष्ट या मृत्यु सम्भव है । स्वास्थ्य हानि वाधाऐं चिता आदि । (२) दूसरे सें--इस वर्ष ऐक्सीडेन्ट का भय हो, चिता बीमारी आदि हो । परन्तु सम्पत्ति लाभ के विचार से यह्‌ वर्षे अच्छा होगा धन लाभ के नये जरिये निकळेंगे ।

फल विचार : १६३

(३) तीसरे में--समाज के कायं में सम्मान एवं कीर्ति वढ, पराक्रम वढ़े,भाइयों में सद्भाव एवं उन्नति ।

(४) चौथे में--वाहन एवं धन लाभ, सुख प्राप्त, प्रसन्नता, ऐश्वर्य साधन संबंध से खर्च बढ़े ।

(५) पंचम--यह उद्यमी वर्ष है । परीक्षा में सफलता, परिश्रम में सफलता प्राप्त करे, कार्य सिद्ध हो, सुख प्राप्त हो, मोगलिक कार्य हो संतान सुख हो । (६) छठें-शत्रु चिता, बाधाएँ, धन हानि, कलह, पराजय, पश्चात्ताप हो, संघर्ष करना पड़े ।

(७) सप्तम--अनुकूछ कार्य हो, इच्छित सफलता प्राप्त करे, मांगलिक कार्य हो । (८) अष्टम--असफछता, धन एवं मान हानि, कष्ट ऐक्सी डेन्ट, रोग,वहुत दुःख । (९) नवम--यह्‌ भाग्योदय का वर्ष है । आथिक लाभ,सुख, व्यापार में सफलता इच्छित कार्य में प्रसन्नता, सम्मान प्राप्त हो ।

(१०) दशम--यह्‌ सफल वर्ष है। सम्मान प्राप्त हो, विशेष आथिक लाभ, इच्छित काये में सफलता, सुख, व्यापार में लाभ ।

(११) एकादश--अकस्मातु धन लाभ, सम्मान का पद प्राप्त हो, व्यापार में अच्छा लाभ, आथिक चिता का समाधान हो।

(१२) द्वादश--यह दुर्भाग्य का वर्ष है। व्यथं का खचे, कजं वढे, झूठी निंदा, मानसिक चिता, इच्छा तृप्ति के लिए अनावश्यक व्यय, आथिक चिता बहे ।

वर्षेश निर्णय

पंचाधिकारियों में जो लग्न को देखे वह वर्षेश होता है। बलूवान्‌ होने पर भी वह लग्न को न देखे तो वर्षेश नहीं हो सकता । द्रष्टा ग्रहों में जिसकी दृष्टि लग्न पर विशेष हो वह वर्षेश होगा । यदि द्रष्टा ग्रह बल और दृष्टि में समान हों या सब निर्वळ हो तो मुन्थेश वर्षेश होगा ।

अध्याय १६

वर्षफल में भाव फल विचार

(१) लग्न भाव--

लग्न में सूयं मंगल शनि या ये तीनों या प्रत्येक ग्रह लग्न में हो तो-ज्वर पीडा, धन क्षय हो । ६ * लग्न में सूर्य-पित्त ज्वर । मंगछ-रक्त चिह्न, शोत ज्वर। दनि-वायु मूलक ज्वर । तीनों-त्रिदोंष उत्पन्न करें । पाप युक्त क्षीण चंद्र-ज्वर कफ, धन क्षय ।

१६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

शुभ युक्त पूर्ण चंद्र-सुख हो ।

गुरु बुध शुक्र ये प्रत्येक या तीनों-धन लाभ, धान्य लाभ ।

लगत में सूर्य - वात पित्त रोग हो, स्त्री के शरीर में पीड़ा, मस्तक में कफ रोग,

अपने कुटुम्बियों से विवाद और गुप्त चिन्ता । रवि की दशा अंतर्दशा का फक

अनिष्ट हो ।

चन्द्र--शरीर में विकलता, कफ, क्षय रोग, ज्वर पीड़ा पाप युक्त या दृष्ट हो

तो शरीर को नष्ट करे-तथा बहुत खर्च करावे ।

मंगल--शत्रुओ से विवाद, कठिन वात रोग, फोड़ा, नेत्र और मस्तक में पीड़ा

खाँसी, उल्टी, स्त्री को कष्ट, राजा से भय, लोहा तथा अग्नि से भय । घर में कलह ।

वुध--बल की वृद्धि, स्त्री को सुख, शत्रु का नाश, राज पक्ष से लाभ, धन, जन

ओर मित्र लाभ, तेज और धैय की वृद्धि ।

गुरु--धन की अति वृद्धि, कीति वृद्धि, व्यापार की वृद्धि, स्त्री का सुख, मोती,

धन, स्वर्ण लाभ, शत्र का नाश, शरीर आरोग्य, श्रेष्ठ बुद्धि ।

लगत में शुक्र--विशेष प्रतिष्ठा, धन लाभ, शत्र, नाश, राजा से सन्मान एवं

जय, आभूषण लाभ । वंश वृद्धि, उत्सव, ।

शनि--मंद बुद्धि करे, शत्र भय वात पीड़ा, उपवास, स्त्री कष्ट, ज्वर, शिर

तथा जठर में पीड़ा, मुख में पीड़ा, मित्रों से वेर ।

उच्च का हो तो पुत्र लाभ, स्वगृही हो तो शरीर पुष्ट ।

राहु--स्त्री को पीड़ा, शत्रु से भय, धन खर्च, विकलता, राजा से भय, मानभंग,

सिर या नेत्र में रोग, पुत्र मित्र आदि से कष्ट । राज भय ।

केतु--भय, विकलता, चिता, शत्रु से भय, शिर या नेत्र में पीड़ा, राज भय ।

हीन वल सूर्य--यदि जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, मुंथेश, वर्षश, त्रिराशीश इन

सव में कोई अधिकार वाला होकर सूर्य हीनवळ हों तो त्वचा के रोग, नेत्र रोग

करते हैं आल्स्य नीचता क्षुद्र वृत्ति से निर्वाह, माता पिता से भी कष्ट ।

चंद्र--पूर्वोक्त अधिकारी होकर चंद्र हीन वली हो तो नेत्र रोग, कार्य नाश,

दरिद्रता, पराभव, रोगभय, मन में संताप, घर में कलह ।

मंगरू--उक्त अधिकारी हीन वल मंगल---चं चछता कायरता

वुध-- 27 र „ - मति भ्रम, क्लेश प

गुर छ ह] 9१ --धर्मेनाश, जीवन में अंत के क्लेश

शुक „» ५ ¬ भ्लेश, दुःख, स्त्रियों से कलह

दानि-- 4, वायु कोप, सेवक से दुख लग्नेश वली होकर लग्न में--अति सुख, कांति, मध्यम वली हो तो मध्यम फल । अल्पबळी--अल्प फल ।

लग्नेश केन्द्र या त्रिकोण में_बहुत सुख देवे । विजय वृद्धि। ६-८-१२ भाव में रोग मरण, खर्च ।

वर्ष फल में भाव फल विचार: १६५

लग्नेश पूर्ण बली हो तो--सुख, आरोग्य, धन छाभ, मनोविनोद ये सब प्राप्त

हों । मध्यवली में सुख धन लाभ आदि प्राप्त हो । हीनवछी--विशेष क्लेश और

(विपत्ति हो ।

वर्ष छग्नेश यदि पाप युक्त हो शुभ युक्त न हो तो विवाद, प्रतारण, कदभन्न भोजन |

जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, अष्टमेश, वर्षश मुंथेश ये सभी ग्रह वल युक्‍त हों

६-८-१२ भाव में न हों तो सम्पूर्ण वर्ष शुभ हो सुख यश धन लाभ हो। ये सब

निवल हों ६-३-१२ भाव में हों तो दुःख, भय प्रद हो । इन में शुभ की दृष्टि न

हो तो सम्पूर्ण बर्ष अशुभ रहे ।

लग्न में बुध्--तरुध वर्गेश होकर मुंबा युक्त लग्न में हो तो पठन लेखन आदि

से लाम ।

लग्न में गुर—गुरु वर्षेश होकर पाप ग्रहों से पीडित होकर वर्ष लग्न में हो तो

धन हानि, राजा से भय हो ।

अष्टमेश --पाप युक्त अण्टमेश लग्न में हो और लग्नेश चंद्र युक्त अष्टम में हो

तो उम वपं रोग शोक आदि से शरीर क्षय हो।

पष्ठेश लाभेश--पष्ठेश और लाभेश एक ही होकर लग्न में हो तो उस वर्ष

चाहन और राजा से मान मिले ।

पाप ग्रह्‌-लग्न में पाप ग्रह हों शुम दृष्टि न हो तो बह वर्ष मध्यम होता है

मनुष्यों से विवाद अधिक हो ।

सूर्य -लग्न में कन्या के या सिंह के सूर्य हों और सप्तम या दशम भाव पाप युक्त

हो तो कष्ट हो और स्त्री की मृत्यु हो ।

अष्टमेश --लग्न में अष्टमेश हो और लग्नेश पष्ठ में हो तो उस वपं में मृत्यु हो।

पाप ग्रह--१, २, ७, १२ घर में पाप ग्रह हों शुम दृष्टि न हो तो अंधा हो।

नीच ग्रह--लग्न में नीच का ग्रह हो, लग्नेश सूये से युक्त हो, तृतीयेश वारहवें

हो तो विष का भय हो ।

मंगल--लग्न में पाप युक्त मंगल हो, पंचम में .चंद्र, ऊग्नेश अष्टम हो क्रूर ग्रह

शति का योग या दृष्टि हो तो बिजली से मुत्यु हो ।

शनि चंद्र-लग्न में शनि युक्त चंद्र हो तो स्त्री को कष्ट वात रोग ज्वर इवास

आदि का कष्ट या वंधन हो ।

राइ--ळग्न में राहु, पंचम में शनि अष्टम में चंद्र युक्त लग्नेश हो तो वात रोग

गुल्म आदि रोग से मृत्यु हो ।

अष्ठमेश--लग्न में अष्टमेश हो तो वात कफ रोग से शरीर क्षय हो, मुख कंठ

आदि में रोग हो।

लूग्नेश--लग्नेश नीच का लग्न में हो नीच ग्रह से युक्त हो तो शरीर में रोग

स्त्री पुत्र को कष्ट हो ।

१६६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

शनि--शनि लग्न या अष्टम में हो और वर्षेश भी शनि युक्त अष्टम हो तो सर्पे

स्पश का कष्ट हो ।

सूय-लग्न में उच्च का सूर्य हो, गुरु चतुर्थ और मंगळ दशम हो तो सव राजा

उसके पराक्रम की बड़ाई करें ।

लग्नेश--लग्नेश लग्न में हो कर्कं का वलवान्‌ गुरु चतुर्थ में हो और शुभप्रह

युक्त दृष्ट हो तो बहुत सुख हो ।

शनि, चंद्र->लग्न में शनि युक्‍त चंद्र हो, नवम गुरु और तीसरे शुक्र हो | तो

पराक्रम और कीति लाभ, संताप वृद्धि हो ।

गुरु चंद्र--लग्न में चंद्र युक्त गुरु हो दशम में शुक्र के साथ बुध हो तो उसकी

बुद्धि का सवंत्र प्रकाश हो ।

सौम्य या पाप ग्रह--छग्न में ३ सौम्य ग्रह हों तो अनेक सुख हो ३ पाप ग्रह

हों तो दुःख शोक आदि करते हैं ।

लाभेश पष्ठेश--लाभेश षष्ठेश एक होकर लग्न में हों तो वाहन और राजा से

सन्मान प्राप्त हो ।

यदि कोई भी ग्रह लग्न को न देखे तो पंचाधिकारियो में जो सबसे वली हो

बह वर्षेश होगा पंचवर्गी बल के अनुसार बल का विचार करना ।

अन्य मत है कि वल और दृष्टि में समानता हो और दिन में वर्ष प्रवेश हो तो

सूर्य जिस राशि पर हो उस राशि का स्वामी वर्षश होता है । यदि रात्रि का जन्म है

तो जिस राशि पर चंद्र हो उस राशि का स्वामी वर्षेश होता है । उ

अन्य मत है पाँचों में वल और दृष्टि से पूर्ण कोई न हो तो वर्ष लग्नेश ही

वर्षश होता है ।

किसी का मत है कि ऐसी स्थिति में जिसके स्वग्रृही, उच्च, नवांश, द्रेष्काण,

हुद्दा आदि में बहुत अधिकार हों वह वर्षश होता है ।

किसी का मत है कि इन पाँचों में जिसके ३ या अधिक अधिकार मिलें वह

वर्षेश होगा । इनमें जिनके बळ और दृष्टि अधिक हो वह वर्षश होगा ।

यदि उपरोक्त नियम से चंद्रमा वर्षश होता हो तव भी वह वर्षेश नहीं होगा ।

ऐसी परिस्थिति में यदि वह चंद्र पंचाधिकारियो में से किसी से इत्थशाल करता हो

तो वह इत्थशाल' करने वाला ग्रह वर्षश होगा ।

यदि किसी में चंद्र इत्थशाछ न करता हो तब दिन या रात्रि में वर्ष प्रवेश के

अनुसार सूर्य राशीश या चंद्र राशीश वर्षश होगा जेता कि ऊपर वता चुके हैं । यदि

ऐसी परिस्थिति में चंद्र राशीश स्वयं चंद्रमा हुआ तो वही वर्पेश होगा । इसी कारण वर्षश चन्द्र का वर्णन किया है।

वर्ष प्रवेश के पंचांग का फल

(१) तिथि- वर्षे प्रवेश के समय, नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा तिथि शुम फल प्रद हैं | द्वादशी और रिक्ता तिथि अशुभ हैं ।

वर्ष फल में भाव फल विचार : १६७

(२) वार--वषं प्रवेश में चंद्रवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार उत्तम है रविवार

मंगलवार शनिवार ये हानिकारक हैं ।

(३) नक्षत्र--वर्ष प्रवेश में अश्विनी, मृग ०, हस्त, पुष्य,पुन०, स्वा० और रेवती

शुभ हैं कृ० रो० आद्रा, ज्ये०, म्‌» श्र० अनु» तीनों पूर्वा तीनों उत्तरा मध्यम हैं ।

भर० म० चि० वि० शत० धनि० इले० अति निदित हैं जिस वपं प्रवेश में भद्रा

हो या निदित योग हो वह शुभ नहीं होता ।

(४) लग्न--वपे प्रवेश में लग्न शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो या वर्षेश से युक्त दृष्ट

हों तो स्त्री पुत्र आदि का सुख होता है आपत्तियाँ दूर हों यदि वर्ष लग्न क्रूर हो या

पाप ग्रह से युक्‍त्र दुष्ट हो तो घन हानि ज्र, भय, रोग आदि हों ।

(५) रग्नेश--वपं लग्नेश सूर्य-पराधीनता व्याकुलता दुःख ।

चंद्र-परान्न भोजी, धातुक्षीण, स्वजनों से आश्रय हीन ।

मंगल--रोग, सवसे विरोध और विवाद ।

बुध--विद्या वुद्धि आदि की वृद्धि ।

गुरु या शुक्र--अति सुख ।

शनि--फ़लूह उद्वेग विकार आदि अशुभ फल होते हैं ।

वर्षं का साधारण फल विचार

जन्म ळग्नेश,वर्प लग्नेश, अष्टमेश और मुंयेश बळत्र।न्‌ हों ६-८-१२ स्थान में न

हों तो पूरा वर्ष शुभ होता है. यश धन और सुख की प्राप्ति होती है। यदि वे

६-८-१२ स्थान में हों तो दुःख और भयदायक हैं ।

यदि वे वल हीन हों और शुभ ग्रह की दृष्टि रहित हों तो वपं अशुभ होता है।

द्विजन्माइय योग--जिस वर्प में जन्म लग्न तथा वर्षे लग्न एक ही हो तब यह

योग होता है जिसका फल कष्ट या मुत्यु है ।

जगल्लग्न विचा र--मेष का सूर्य प्रवेश के समय जो लग्न हो उसे जगल्लग्न

कहते हैं ।

जन्म लग्न से जित भाव में सूर्य का मेषाक प्रवेश हो यदि वह भाव शुभ ग्रह

युक्त दृष्ट हो तो उस वपं में उस भाव की वृद्धि होती है। यदि वह भाव पाप युक्‍त

दृष्ट हो तो वर्ष में उस भाव की हानि होती है ।

इस कारण यह देखना कि मेषाकं का जो लग्न हो उसे देखे कि वह जन्म लग्न

से क्रिस भाव में पड़ा है। यदि वह--

(१) जन्म लग्न में हो--देह सुख ।

(२) धन स्थान में--धन लाभ ।

(३) तृतीय में--कुटुम्ब की वृद्धि।

(४) चतुर्थ में--मित्र सुख ।

(५) पंचम में--पृत्र प्राप्ति ।