सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
.
ताजिक के १६ योग : २५५
'अधम सम कम्बू हुआ । इससे कठिन उपाय से अति यल से कष्ट पुर्वक भाग्य "सम्बन्धी लाभ होगा ।
(१३) सम उत्तम कम्बल
चन्द्रमा पादोन (अधिकार रहित) हो अर्थात् समग्रही हो और कार्येश लग्नेश
स्वगृह या उच्च में हो यहाँ धन सम्वन्धी कार्येश बुध और लग्नेक्ष सुयं स्वगृही हैं इनका इत्थशाल योग है । चन्द्र अपने सम गुरु के घर में है जो इन दोनों से इत्थशाल करता है । यह सम उत्तम कम्बूल हुआ । धन प्राप्ति उत्तमता से होगी । पादोन--२ प्रकार का है ।
(१) समगही हद्दा द्रेष्काण नवां आदि में सच या नीच या शत्रु गर्दी नहो दि में हो स्वग्रही उच्च स्व हृद्दा आदि में
(२) सम गृह हह द्रेष्काण नवांश के आदि व अन्त में सन्धि गत होने से ।
Fr
(१४) सन मध्यम कम्बूल
(१५) सम अधम कम्बुल
चंद्र सम- ग्रह हृद्दा आदि में हों और
लग्नेश कार्येश नीच या शत्रू ग्रही हों ।
धन भाव के प्रश्न में कार्यश बुध
में है। लग्नेश शुक्र भी नीच में है।
इनका इत्थशांल योग है । चंद्र अपने सम
गुरु के घर में है जो इन दोनों से इत्थशाल
करता है । यह समाधम कम्वूल हुआ ।
धन की प्राप्ति कष्ट साध्य होगी ।
चन्द्र समग्रह हृददा आदि में हो
लग्नेश कार्येश स्व हद्दा नवांश आदि में
हों लाभ प्रश्न में लाभेश मंगल कार्येश
यह् स्व नवांश में हुँ । लग्नेश बुध भी स्व
नवांश में हैं । इनका इत्यशाल है । चन्द्र
अपने सम गुरु के घर में है जो इन दोनों
से इत्थशाल करता है । यह सम मध्यम
कम्बूल हुआ । लाभ मध्यम होगा यत्न
करने पर लाभ होगा ।
२५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड
(१६) सम समाख्य कम्बल
ह
चंद्र एवं कार्येश लग्नेश भी सम ग्रह
रे हृदुदा आदि में हो यहाँ लाभ प्रश्न में:
लाभेश मंगल, लग्नेश शनि सम हुद्दा में
है । दोनों का इत्थश्याळ योग है । चंद्र भो
सम शुक्र की हद्दा में है दोनों से इत्थशालः
- पथ८ | करता है यह सम समाख्य कम्बूल हुआ । | लाभ मध्यम होगा। न वहुत न अल्प होगा ।
यहाँ पीछे वताई मैत्री के अनुसार ही २-६-८-१२ स्थान के ग्रह सम समझे
जाते हैं उसी अनुसार सम का विचार करना । सम ग्रह के विचार से सम ग्रह की हृददा, सम ग्रह का द्रेष्काण सम ग्रह का नवांश इसमें इनमें से कोई होना ।
९ गैर कम्बुल-गैर' कबूल-अस्वीकार
जव लग्नेश और कार्येश का इत्थशाल हो और चंद्रमा शून्य मार्गी हो । चन्द्रमा के लग्नेश तथा कार्येश इनमें से किसी का इत्थशाल योग न हो | ऐसा चन्द्र यदि
राशि के अन्त में हो जो आगे की राशि में प्रवेश करने वाला हो । जव चन्द्र आगे
की राशि में प्रवेश करे वह राशि जिस ग्रह का स्त्र गृह या उच्च स्थान हो वह ग्रह
यदि इसी राशि में वहाँ स्थित हो और उस ग्रह के साथ चंद्र इत्थशाल करे तो वह गैर कम्बूल योग होता है ।
इस योग में तीसरे मनुष्य की सहायता से काम होगा ।
यदि अन्य राशि में स्थित चन्द्र इस राशि में स्थित स्त्रग्रह आदि अधिकारों सेः रहित ग्रह के साथ इत्यशाल करे तो वह अशुभ फल देने वाला है।
शुन्य सार्गो--जो ग्रह स्वगृही अपने उच्च में या अपनी हददा, अपने द्रेष्काण
अपने नवमांश ऐसे कोई शुभ अधिकार का न हो तथा नीच शत्रु गुही! आदि अशुभ
अधिकारी भी नहीं हो तथा पदहीन सम द्रेष्काण हदूदा नवांश अधिकार भी न हो
और उस पर पाप या शुभ किसी प्रकार के ग्रह की दृष्टि भी न हो तो यह शून्य मार्गी या शून्याध्वग कहलाता है। यह भी कम्वूल भेद के तुल्य फल देता है। दुसरे जो राशिस्थ शून्याध्वग गैर कम्वूल अशुभ फल देता है । उदाहरण--
२९ ९ यहाँ लग्नेश सूर्य सप्तम में ६० पर
जज है । नवम भाव सम्वन्धी प्रश्न में कायेंश
3
मंगल नवम भाव में है। इन दोनों का
इत्यशाल है । चंद्र धन भाव में २९? पर
है । यहाँ चंद्र शून्य मार्गो है वह लग्नेश
। EE १मं१० कार्येश किसी से इत्थशाळ नहीं करता
परन्तु चंद्र जब आगे सहज भाव में
पहुंचेगा तो वहाँ स्वग्रही शुक्र से वह
ताजिक के १६ योग : २५७
कर
इत्यशाल करेगा । यह गैर कंवूल योग हुआ । तीसरे मनुष्य की सहायता से कार्य होगा] इ्चंर > यदि इस कुंडली में तीसरे भाव में शुक्र के स्थान में बुध हो । यह बुध न तो स्वगृही है और न उच्च में है अधिकारहीन' है। यदि चंद्र बुध के साथ इत्यशाल क्रे
Do, तो यह भी गैर कम्बूल योग होता है वम्+ नो १मं१०| यह अशुभ फल देने वाला है ।
| (१०) खल्लासर-खलास=छूटा हुआ ।
चंद्रमा शून्य मार्गी हो (जैसा पहिले वता चुके हैं) यह चंद्र लग्नेश या कार्येश के साथ इत्थशाल न करे और न वह लग्नेश कायश में से किसी के साथ हो और लग्नेश कार्ये का इत्थशाल हो यह खल्लासर योग होता है और कम्बू के फल को नाश करता है। यह शुभ फल नहीं देता अशुभ फल देता है ।
यहाँ पुत्रभावेश गुरु कार्येश है ।
छग्नेश सूर्य से इत्यशाल है । चंद्र धन
भाव में २६० पर है । यह चंद्र लग्नेदा
या कार्येश किसी से इत्यशाल नहीं करता
और न लग्नेश कार्येश के साथ ही है।
यह खह्लासर योग पुत्र प्राप्ति में
वाधा करेगा ।
(११) रह=निकम्मा=दु्बेल=निस्तेज ।
दुर्बल प्रह लक्षण--जो ग्रह अस्त, नीच राशिगत, चत्रुगृही, वक्रगति व अस्त होने वाला हो या समीप में ही उदय हुआ हो या बाळ वृद्ध हो या खल स्थान अर्थात् तात्कालिक शत्रु स्थान या पाप युक्त व क्र्राक्रात हो वह ग्रह दुर्वळ कहलाता है। रद्द योग- ऐसा दुवंल या निस्तेज ग्रह जब किसी भावेश (कार्ये) के साथ इत्थशार करे तो वह ग्रह आदि में या अन्त में इत्यशाल से होने वाळे फल को नहीं देता गा निवँल होने से किसी का तेज न आप ले सकता है और न किश्ी को दे सकता है।
यहाँ इस रदूद योग के २ भेद हो जाते हैं।
(१) जब उपरोक्त प्रकार का दुर्बेल कार्येश ग्रह केन्द्र में हो ओर लग्नेश ग्रह
ु्वेल कार्योदा से आपोक्लिम (३-६--९-१२) घर में हो और दोनों का इत्यक्षाल योग
हो तो उस इःथशाल का समस्त फल नष्ट नहीं होता किन्तु वह कार्य सिद्ध होकर अन्त में नष्ट हो जायगा ।
१७
२४५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड
इसमें निर्वल कार्येश केन्द्र में हो कार्येश से लग्नेश ३-६-९-१२ घर में हो और
दोनों का इत्यशाल योग हो । यहाँ आपोक्लिम में ३ और ९ ही घर लिए जायेंगे।
क्योंकि ६ और १२ घर में इत्यशाल के लिए आवश्यक दृष्टि नहीं होती । केवल
३-९ स्थानों में ही दृष्टि होने से इत्यक्षाळ योग हो सकेगा ।
(२) कार्येश दुर्व होकर आपोक्छिम स्थान में हो और लग्नेश केन्द्र में हो इन
दोनों का इत्यशाल योग हो तो प्रथम उस भाव के कार्य को नष्ट करेगा पश्चात्
उस कायं को सिद्ध करेगा । (१) उदाहरण
लग्नेश बुध, कार्येश (दशमेश) गुरु
दोनों सूर्ये के साथ छठे घर में हैं अस्त
हैं । बुध के ४० गुरु के ५० हैं । दोनों का
इत्थशाल योग है । यहाँ लग्नेश कार्येश
` दोनों अस्त होकर पाप युक्त छठे स्थान
में हैं। इससे रद्द योग हो गया। राज्य
संबधी प्रश्न में राज्य सम्बन्धी कार्य का
नाश होगा ।
(२) उदाहरण
(२) यहाँ लग्नेश बुध पंचम भाव
कार्ये शुक्र से आपोक्लिम में ७? पर
है । कार्येश शुक्र केन्द्र में नीच का ८° पर
। है। यह निवे हुआ । लग्नेश कार्येश का
इत्थशाळ है। यह रद्द योग हुआ |
क्योंकि इत्थश्ञाळ कर्ता कार्येश नीच में
है । इस योग में प्रथम कार्य सिद्ध होकर
वाद में नष्ट हो जायगा ।
(३) यहाँ लग्नेश बुध शीघ्री ग्रह
नीच होने से निर्बल होकर केन्द्र में है।
पंचम भाव का कार्येण शुक्र लग्नेश से
आपोक्लिम में व्यय भाव में है। दोनों
का इत्यशाल योग है परन्तु लग्नेश नीच
में होने से रद्द योग हो गया ।
इसमें प्रथम कार्य नष्ट होकर फिर कार्य
की सिद्धि होगी ।
ताजिक के १६ योग : २५९
(१२) ढुष्फाली उत्य-कुत्य-शुमभ । दुष्फाली=दुःसाष्य । मंद गति वाला ग्रह स्वगृही या उच्च का या स्वद्रेष्काण, स्वहृददा, स्वनवांश में हो और शीघ्री ग्रह पादोन (अधिकार रहित) हो अर्थात् स्व, उच्च आदि अधिकार से रहित हो तव इन दोनों के इत्थशाल होने पर कार्य की सिद्धि कठिनाई से होती है । यदि शीघ्र ग्रह अस्त नीच शत्रु गृही वाल वृद्ध हो निवेल स्थान में स्थित होकर सी हो तो इस दुष्फाली कुत्थ योग में कार्य सिद्धि नहीं होगी और अनिष्ट ( गा।
यहाँ लग्नेश गुद स्व स्थानी लग्न में १६० पर है यह मंद ग्रह है। स्त्री सम्वन्धी अश्न में कार्येश बुध लाभ भाव में
१४? पर है यह शीघ्री यहाँ कार्यश और लग्नेश का इत्थशाल है। इसमें लग्नेश गुर स्वगृही होने से अधिकार युक्त
है और कायंश बुध पदहीन है। इससे
दुष्फाली कुत्य योग हो गया । इसमें स्त्री
सम्बन्धी कार्य कठिनता से सिद्ध होगा ।
यदि पदहीन शीघ्री ग्रह के साथ सूयं हो तो अस्त होने के कारण बुध निर्बल होक अनिष्ट फल देगा अर्थात् काये सिद्ध नहीं होगा । ST (१३) इुत्योत्यदिवौर योग या दुत्य दरी र-दुव्वार । तदवी र-दुष्प्राप्प-मध्यम । =दूसरे की सहायता से काम करने वाळा योग । जव लग्नेश कार्येश दोनों निर्बल हों अर्थात् अस्त नीच वत्रुगृही वक्री इत्यादि तेज से रहित होकर परस्पर इत्थश्ाली' हों । यदि इनमें से कोई ग्रह अन्य तीसरे ऐसे ग्रह से इत्थश्ाल करे जो स्वगृह उच्च स्वहदूदा द्रेष्काण नवांश आदि बळ से युक्त हो तो किसी दूसरे की सहायता से कार्य सिद्ध होगा ।
अथवा कोई दो शीघ्री ग्रह स्वग्रही उच्च स्वहद्दा द्रेष्काण नवांश मादि अधिकार सें होने से बल्वान हो और लग्नेश या कार्येश इनमें से किसी एक के साथ इत्यशाळ करे तो भी यह योग हो जाता है । किसी अन्य की सहायता से कायं सिद्ध होगा ।
और यहाँ स्त्री लग्नेश सम्बन्धी मंगल प्रश्न कर्के में का कार्येश नीच शुक्र में >>>
कन्या का नीच में है दोनों का इत्यशाळ योग होता है । यहाँ लग्नेश मंगल के
साथ उच्च का गुरु होने से स्त्री सम्बन्धी कार्य अन्य की सहायता से सिद्ध होगा
क्योंकि लग्नेश कार्येश निर्बल होने से कार्य सिद्ध नहीं होना था वह कायं
उच्चग्रही गुरु के मंगल से युक्त होने एवं
इत्यथशाल करने के कारण अन्य की सहायता से कार्य सिद्ध होगा ।
२६० ¦ सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
यहाँ मेष में २.शीघ्री ग्रह सूयं और
मंगल हैं। सूर्य उच्च का है और मंगल
स्वगृही है। इनके साथ नीच का शनि
लग्नेश है । इससे अन्य की सहायता से
कार्य होगा । तीसरे भाव सम्बन्धी कार्य
का कार्ये गुरु नीच में लग्न में है और
लग्नेश शनि मेष में नीच का है। इन
दोनों के इत्यशाल से कार्य नहीं होना
शा वर्योकि दोनों निर्बल हैं। परन्तु लग्नेश दो पद युक्त शीघ्री ग्रह के साथ होने से
यह कार्य अन्य की सहायता से होगा !
(१४) तंवीर योग-तदवीर ।
जब लग्नेश और कार्येश का इत्थशाल न हो और उनमें से एक ग्रह राशि के
अन्त में हो अर्थात आने वाली राशि में जाने वाला हो जहाँ अर्थात् आगे वाली राशि
में कोई ऐसा स्वगृही उच्च आदि पद युक्त बलवान ग्रह हो जो ऐसे अंशोंमें हो कि
वहाँ आने वाला उससे भविष्य में इत्यशाल कर सके तो यह तंवीर योग हो जाता है।
यहाँ राज्य सम्बन्धी प्रदन में राज्येश
सूर्य और लग्नेश मंगल इनका इत्यशालू
नहीं है। शीघ्रगामी सूर्य २९० पर राशि
के अन्त में कुंभ राशि में है। वह आगे
मीन राशि में जाने वाला है जहाँ स्वग्रही
(बलवान) गुरु है। मीन में सूर्य जाने
पर भविष्य में लग्नेश से इत्थशाल करेगा और वह गुरु से भी इत्यशाल करेगा ।
यह तंवीर योग हो गया । सूर्य ने अपना तेज गुरु को दे दिया । इस योग से अभीष्ट
कार्यं की सिद्धि होगी ।
(१५) कुत्थ योग-कुब्व-बलिष्ठ-शुभ ।
बल वा बहुत प्रकार से विचार होता है ।
(१) जो ग्रह स्वग्रही, उच्च, स्वनवांश, स्व. हृददा, स्व द्रेष्काण में हो । (२) केन्द्र में हो । (३) ग्रह जो लग्न में हों या लग्न को देखते हों । (४) ग्रह जो अच्छे ग्रहों (शुभ ग्रह) से युक्त या दृष्ट हों । (५) पाप ग्रहों का १, ४, ७, १० में योग या दृष्टि
से रहित हो, (६) उदयी हो, (७) जो काल बळ से युक्त हो । (८) जो ग्रह वक्री
होकर मार्गी हुआ हो ।
ताजिक के १६ योग : २६१
शुक्र चंद्र मंगळ यदि सायंकाळ में उदित हों तो बलवान होते हैं । गुरु शनि अर्द्धरात्रि के उपरांत वली होते हैं।
पुरुष ग्रह सूर्य मंगल गुरु दिन में बलवान होते हैं । स्त्री ग्रह चंद्र बुध शुक्र रात्रि में बलवान होते हैं । स्त्री ग्रह ४ से ९ भाव तक, पुरुष ग्रह १९ से ३ भाव तक बली' “होते हैं । सबसे बलवान लग्नस्थ ग्रह है। उसके अभाव से केन्द्रस्थ (४-७-१०) ग्रह उपरोक्त से कम वली है । पणफर (२-५-८-११) का ग्रह उससे कम वली, आपोबिलम (३-६-९-१२) का ग्रह उपरोक्त से कम वली है । मध्यगति वाळा ग्रह “बलवान होता है । मध्यम गति ५९-५” है ।
ग्रह छग्नगत पणफर आपोक्लिममें संधि में इसी वळू पूर्ण ६०० ३० १५१ अनुपात से बल
सूये जिस नवांश में हो उस नवांश की राशि में कोई ग्रह स्थित हो तो वह् -वळवान होता है। जैसे सूर्यं वृष के १०° पर है तो मीन का नवांश हुआ | यदि "कोई ग्रह मीन में हो तो वह बलवान समझा जायगा ।
'बल का प्रयोजन
कई प्रकार के बल कहने का प्रयोजन यह है कि इस्थशार कर्ता व इत्यशाल
"जिस ग्रह से हो ये जैसे बली हों वैसा फल देंगे । यह उक्त भेदों से किसी प्रकार वळी “जो इत्यश्षाली ग्रह है उसी को कुत्य योग कहते हैं। कुत्थ दाव्द से बली प्रह
नहीं समझना ।
(१६) इुरुफ या दुरित योग । दुरित=वना काम विगाड़ना ।
इभमें ग्रह वलहीन होते हैं । इस्थशाल योग में वे इच्छित कार्य करने में समर्थ नहीं होते ।
(१) जो ग्रह ६-५-११ स्थानों में हों (२) अस्तंगत हों (३) तत्रुक्षेत्री हों
(४) नीच राशि में हों। स्वगृही या उच्च का न हो। (५) वक्री हो । (६) वक्रा-
भिलाषी हो। (७) क्रूर ग्रहों से युक्त हो (८) पाप ग्रह नीच या शात्रुक्षेत्री ग्रह से इत्थशाल करता हो (९) क्रूर ग्रहों से क्षुत दृष्टि (१-४६-१०) से दृष्ट हो (१०) १२-६-८ स्थानों में स्थित ग्रह से इत्यशाल करने वाळा हो। (११) अपने
स्वग्रृह से सप्तम स्थान में स्थित हो, जैसे वृष राशि का शुक्र स्वगृही है उससे सप्तम
वृश्चिक राशि में यदि हो। (१२) जो ग्रह राहु के पुच्छ या मुख में हो (राहु का
पुच्छ=राहु का भुक्तांश । राहु का मुख-भोग्यांश) (१३) जो ग्रह लग्न को न देखे ।
चन्द्रमा--सुयं से १२वें स्थान में चन्द्र हो या तुला के उत्तरार्ध (६रा-१५०) के
-बाद और वृश्चिक के पूर्वाद्धं (७-१५०) तक में स्थित हो या क्षीण चन्द्र हो तो चन्द्र
-बलहीन होता है। चन्द्र जिस राशि में हो उसका स्वामी उसे न देखे । या चंद्र को
कोई ग्रह न देखे । या चन्द्रमा शून्याध्वग हो अर्थात् स्व उच्च आदि शुभ अधिकार से
“रहित (पदहीन) हो तो चन्द्रमा निर्बेल होता है ।
हि
२६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
अन्यमत--चन्द्रमा निर्बल होने के प्रकार
(१) नीच गत (२) नीचस्थ ग्रह से इत्यशाल करे (३) सूर्यं के समीप १२० के
भीतर हो (४) राहु के मुख में (राहु के भोग्यांशों में) हो (५) पाप ग्रहों के साथ
१२? के भीतर हो (६) अपने स्वगृह से सप्तम मकर राशि में हो (७) धन रागि में
धन नवांश में हो । यह स्थान ककं से छटवाँ है आगे सातवाँ मकर होता है परन्तु
मकर राशि के पूर्व धन का अन्तिम नवांश धन का होता है। उसके वाद नीच
राशि मकर आरम्भ होती है । (=) अस्तंगत हो (९) अस्तग्रह के साथ मुंथसिली हो (१०) शत्रु गही हो । (१) क्षीण चन्द्र-कृष्ण एकादशी से शुक्छ पंचमी तक मानते हैं अन्य मत सेः
कृष्ण अष्टमी से शुक्ल अष्टमी तक ।
(२) राशि के अन्त्य २४०-४०' के ऊपर अर्थात नवम नवाँश में चंद्रमा क्षीण (अशुभ) होता है।
(३) मंगल शत्रु दृष्टि (४-१०-७१) से शुक्ल पक्ष के चन्द्र को देखे ।
(४) या शनि ऐसी दृष्टि से कृष्ण पक्ष के चन्द्र को देखे तो चंद्रमा सम्पूर्ण कार्यों
छ होता है । क्योंकि शुक्ल पक्ष में मंगल और कृष्ण पक्ष में. शनि तेजयुक्त नहीं होते 1
(५) चंद्रमा के दुरफ योग में दोष में न्यूनता--
(अ) शुक्ल पक्ष और दिन में विषम (पुरुष) राशि में बैठा शनि चंद्र को देखे ॥
(व) तथा कृष्ण पक्ष और रात्रि में सम (स्त्री) राशि में वैठा मंगल चंद्र को देखे तो चंद्र का पूर्वोक्त (दुरफ) निर्वेलता का दोष न्यून हो जाता है । इस प्रकार शनि
मंगल की दृष्टि न होने से दोष प्रवल ही रहता है परन्तु पूर्वोक्त. राशियों में बैठा
शनि या मंगल चन्द्र को देखे तो दुरफ का दोष कम हो जाता है ।
इस प्रकार कुत्य (बली) और दुरफ (निर्वळ) योग पूर्व बताये इत्थशाल आदि योगो में सव प्रकार से विचारना । जो कुत्य वल अधिक हो तो वह ग्रह अशुभ स्थानों में भी शुभ फल देता है । वह शुभ स्थानों में हो तो अत्यन्त शुभ फल देगा ही । जो दुरफ का बल (निर्वेलता) अधिक हो तो वह ग्रह शुभ स्थानों में अशुभ फल देगा । अशुभ स्थान में अत्यन्त अशुभ फल देगा ही ऐसा. सव बुद्धि से विचार करः फल कहना ।
अध्याय २७
दशा बिचार
ग्रहों के बल विचार से यहाँ दशा कही गयी है । पंचवर्गीः वळ में जो ५ विवा से कम वल हो वह बलहीन, ५ से १० तक बल हो १० से कम हो तो मध्यम. वळ और १० से २० विश्वा तक बल हो वहु पुर्ण वली समझा जायगा ।:
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२) विकि
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दशा विचार : २६३
१. लग्न दशा फल
लग्न की अच्छी दशा=सोना मोती धन द्रव्य का लाभ अपने स्वामी से सन्मान श्रेष्ठ आरोग्यता, मध्यम दशा, मन में विकार, मानहीन लोगों की सेवा । अधम दशा=अपमान, अपव्यय, बुद्धि नाश, क्लेश, परदेश यात्रा । क्रूर लग्न की दशा-यदि मध्यम बल हो तो थोड़ा सुख, शरीर पीड़ा, धन का खच, देह दुवंछ विरोध या मरण ।
लग्न दशा-का फल अपने स्वामी के अनुसार कुछ और विशेष है । द्रेष्काण के अनुसार विचार ।
चर छरन में प्रथम द्वितीय तृतीय द्रेष्फाण शुभ मध्यम अशुभ
स्थिर ,, अनिष्ट शुभ समान फल
द्विस्त्रभाव ,, अशुभ मध्यम शुभ यहाँ शुभ ग्रह और स्वामी के योग दृष्टि से शुभ और पाप ग्रहु की दृष्टि योग से अशुभ फल होता है।
वर्ष में ग्रहों की दशा का फल
सूर्य की दशा-राज कुल से भय, पित्त से पीड़ा, धन का खर्च, भाइयों की
विपत्ति । सूर्य पूर्ण वली=अपने कुछ में प्रधान, तेज बढ़े, राजा हो, हाथी, घोड़े आदि
वाहन, वस्त्र सोना, रत्न लाभ यश, राजा से सन्मान, देव ब्राह्मण का पूजन ।
सूर्य मध्यम वली-पूणं वली का साधारण फल, ग्राम के शासन पंचायती आदि
कार्यों के अधिकार, सुख, नगर या ग्राम में द्रव्य लाभ, धैये से कुछ अनुसार सुख,
व्यापार में लाभ ।
सूर्य स्वल्प वली-स्त्रजन से दुःख, शत्रु से संघ, अपने पराक्रम की हानि, मति
भ्रम, पित्त रोग ।
सूर्य नष्ट बली-राजा या शत्रु से भय, धन हानि, स्त्री पुत्र मित्र से विरोध,
बुद्धि भ्रम, झगड़ा अनर्थ शोक, रोग, आधात ।
सूर्य निदित वल-धन हानि, कुटुम्ब से वैर, चोट, मनोवछ नष्ट ।
सूर्य का शुभ फल-वर्ष लग्न से ३, ६, १०, ११ घर में हो तो अशुभ भी सूर्य
शुभ फल देता है। मध्य वली हो तो उत्तम फल, हीन बली का मध्यम फछ और पूर्ण
बली अत्यन्त शुभ फल देता है ।
(२) चंद्र पुर्ण बली-अच्छे वस्त्र माला मणि मोती आदि प्राप्त हो, स्त्री लाभ
हो, राज्य सुख, भूमि लाभ, यश कांति वृद्धि, चित्त में सुख, राजा से पद की प्राप्ति।
चन्द्र मध्यम बली-उक्त फल मध्यम, व्यापार में सफलता, धर्म में वृद्धि, खेती से
लाभ मित्र वस्त्र घर इन से सुख, ऐश्वर्य बढ़े ।
चन्द्र अधम वली या स्वल्प बली-मित्र आदि इष्टजनों से विरोध, कफ रोग,
कांति नष्ट, धन धमं का नाश, कन्या का जन्म, चित्त में संताप, अल्प सुख भी हो ।
(
२६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड
चन्द्र नष्ट बली-धन ध्रमं का नाश, स्वजनों से विरोध, अपवाद से भय, ज्वर
कफ खांसी आदि रोग, दुष्ट स्थान प्राप्ति, बुरा भोजन, पाप की ओर झुकाव ।
विचार-पदि निदित हीन बली भी चन्द्र ६-५-१२ स्थानों को छोड़ कर भिन्न
स्थान में हो तो अपनी दशा में धन और सुख देता है । यदि हीन बली भी चन्द्र इन
भिन्न स्थानों में हो तो मध्यम फल देता है और पूर्ण वली विशेष शुभ फल देता है ।
(३) मंगल पूर्ण वली-युद्ध में जय, धन मिले, राजा के यहाँ अधिकार, सेनापति
बने, प्रिय कार्य के लिए साहस, सोना मू गा रत्न वस्त्र आदि का लाभ ।
मंगल मध्यम वल्ली-राजा से अधिकार प्राप्ति, कुल अनुमान से धन मिले,संग्राम
में जय, कांति और बल वढे ।
मंगल हीन बल-शत्रु से भव, वंधन, अपने जनों से विरोध, मुख से रक्त पात,
शरीर में पित्त रोग, गर्मी के रोग, चित्त विकलता ।
मंगल नष्ट वल्ली-लड़ाई, झगड़ा, चोर भय, पर धन हरण, रक्त विकार, ज्वर
खाज खुजली, विवाद विपत्ति ।
विचार-नष्ट मंगल ३-६-११ धर में हो तो आधा शुभ फल देता है। हीन बली=मध्यम फल । मध्यम वली शुभ फल और पुर्ण बली अति शुभ फल देता है। (४) बुध पूर्ण बली-गणित तथा उत्तम शिल्प विद्या से यश, राजा की सेवा से लाभ राजदूत हो, पांडित्य की वृद्धि, धन का लाभ हो, वड़ा यश ।
बुध मध्य वली-गुरु से मित्रों से लेख कविता कारीगरी से धन लाभ, वांधवों के
समागम से सामान्य सुख, धर्म की सिद्धि ।
बुध स्वल्प वली-बिना कायं निरर्थक क्रोध, धनहानि, रोग भय, गिरने आदि से
अनिष्ट, अपमान स्वजनों से कलंक ।
बुध हीन बली-अपनी बुद्धि का दोष, बंधन का भय, प्राण भय, देशान्तर गमन, बात और कफ रोग, धन हानि, मान नाश कष्ट । विशेष-तष्ठ बली बुध ६-८-१२ धर में न हो तो आधा फल शुभ । हीन बली= मध्यम फल मध्यबळी शुभ । शुभ हो तो अतिशुभ । (५) गुरु पूणं बली-राजा, मित्र और गुरुओं से गौरव प्राप्ति, यश, धन, छाभ की वृद्धि, शत्रु नाश, रोग नाश, पुत्र लाभ, राज्य लाभ, सुख, तेजस्वी मंडल का स्वामी या राजा हो।
गुरु भध्यवली-र्म में वृद्धि, राजा या मंत्रियों से मित्रता, अच्छा उत्साह और बळ से काये सिद्धि, समान धन सुख की अभिलाषा, राज्य का अधिकार प्राप्त, ्ारंत्र की प्राप्ति।
गुर न्यून बळी-शत्रु भय, रोग, दरिद्रता, धन धमं नाझ, वैराग्य, कर्ण रोग, न तो धन या गुण ही देता है । चित्त में संताप । गुर नष्ट बछ-हर प्रकार का दुःख व रोग, धन और धर्म का नाश, देह पीड़ा । स्त्री पुत्र बन्धु शत्रुओं से भय ।
दशा विचार : २६५
विशेष-नष्ट वली गुरु यदि ६-5-१२ घर में न हो तो आधा शुभ फल । हीन वली=्मध्यम फल, मध्यवली=शुभ फल । शुभ हो तो=अत्यन्त शुभ फळ । (६) शुक्र पूर्ण वछी-बाहन लाभ, आरोग्यता, संगीत से प्रेम, स्थान प्राप्ति, माला सुवर्ण वस्त्र स्त्री इनसे सुख, राज्य लक्ष्मी और धन की भोग प्राप्ति, कीति लाभ पुत्र मित्र से सुख । मध्यम वली शुक्र-व्यापार या खेती से धन लाभ, मित्र स्त्री पुत्र का सुख सव शास्त्रों को जानने वाला ।
अल्प वली शुक्र-ज्ञान यश और धन का नाश, बुद्धि का भ्रम, बुरे अन्न का भोजन, झंझट, रोगों से पीड़ा, शत्रु से झगड़ा, स्त्री पक्ष से विरोध, भ्रमण, सेवा निष्फल ।
शुक्र नष्ट वली-परदेश यात्रा, वंधुओं से विरोध, मति भ्रम, रोग, धन नाश पुत्र, स्त्री को विपत्ति, मागं में मृत्यु भय । 4 विशेष-६-८-१२ घर छोड़कर यदि शुक्र निदित भी हो तो आधा शुभ । उक्त से भिन्न स्थान में हीन वल भी हो तो मध्यम फल । मध्यम बली हो तो शुभ । शुभ हो तो अति शुभ ।
(७) शनि पूर्णं बली-नया घर जमीन और वस्त्र से सुख, वाग वगीचा कुथँ तालाव आदि का निर्माण राजा से तथा म्लेच्छों की संगति से धन लाभ देश का स्वामी हो ।
मध्यवली शनि-गधा ऊॅट पाखण्डी लोगों से धन लाभ, वृद्धा सत्री का संग, रस- हीन बुरा भोजन, कोष रक्षा करने वाळा या किला या मार्गे की रक्षा करने वाला ।
स्वल्प या हीन बली शनि-शत्रु या चोटों से कष्ट, दरिद्रता, स्वजनों से कलक
रोग भय हो और वायु का उम्र प्रकोप कलह वियोग !
नष्ट बली शनि-अनेक दुःख, त्रिदोष के प्रकोप से क्लेश, रोग वृद्धि, मरण तुल्य
कष्ट, स्त्री पुत्र मित्र परिजनों से विरोध, चोर से धन हानि, उद्वेग, नीच की सेवा ।
विशेष-३, ६, ११ स्थानों में शनि यदि हीन बली भी हो तो आधा शुभ फल ।
अल्प वली का मध्यम, शुभ का अति शुभ फल ।
वर्ष में राहु केतु का पंचवर्गी बल नहीं निकाला जाता इससे इनका साधारण
फल नीचे दिया है--
राहु की दशा में-राजा चोर विष अग्नि शस्त्र का भय, मति भ्रम, वन्धु हानि,
नीच से अपमान, वचन आदि भंग के कारण लांछन, पद च्युतिः कार्य की हानि,
येर में चोट । यदि शुभ युक्त होकर अच्छे घर में ६-८-१२ घर छोड़कर हो तो उसकी दशा अच्छी होती है । ओर शुभ हो तो इच्छा की पूर्ति हो धन प्राप्ति हो कीति बढ़े।
उच्च गत राहु शुभ फल तथा नीच गत बहुत अशुभ फल देता है।
केतु की दक्षा मे--राजा चोर शस्त्र से भय, चोट से पीड़ा, मिथ्या अपवाद,
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२६६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड
कुल में दोष लगना, अग्नि भय उष्णता से रोग। धन हानि, अनुचित कार्य करे,
भ्रमण, दाँत और पर में पीड़ा ।
केतु त्रिकोण या ३-६-११ भाव में हो शुभ राशि में सर्वोच्च या स्वगृह में हो
तो राजा से प्रीति मनोनुकूल देश ग्राम का आधिपत्य वाहन और पुत्र से सुख, मित्रों
से सुख हो।
२-८-१२ भाव में केतु हो या पाप युक्त या दुष्ट हो तो बन्धु और स्थान का
नाश, चिता, बन्धन, नीच का संग और रोग भय हो ।
राहु—दशा आरम्भ में धन हानि, मध्य में कुछ सुख, अपने देश में धन लाभ,
अन्त में कष्ट और चिन्ता ।
केतु--दशा आरम्भ में राज योग, मध्य में भय अन्त में दुर गमन रोग भय ।
अन्तर्दशा विचार
(१) शुभ ग्रह की महादशा में शुभ का अन्तर हो तो मनोरथ सिद्ध हो, स्त्री
पुत्र आदि से सुख, चित्त में सन्तोष, मित्रता बढ़े ।
ह ie शुभ की महादशा में पाप का अन्तर-आपत्ति, दुःख बन्धन मोह आदि 1 है।
(३) क्रूर ग्रह की दशा में शुभ का अन्तर-व्यसन, कष्ट आलस्य आदि होता है। (४) पाप में पाप का अन्तर-विरोध मिथ्या कलंक भय.क्रोध चिन्ता, घवड़ाहट, रोग लोगो से झगड़ा आदि होता है।
वर्षे में या जन्म में जो ग्रह उच्च का या मित्र ग्रही या स्वग्रही हो या मित्र की हदूदा नवांश आदि में हो या शुभ ग्रह से युक्त या दुष्ट हो उसकी दशा शुभ होती है। जो शत्रुयुही या नीच का या अस्त हो या ६-८-१२ घर का स्वामी हो या चन्द्र क्षीण हो उसकी दशा अशुभ होती है । ज्योतिष शिक्षा भाग ३ फलित खंड में अन्तर्दशा का फळ विस्तार से दिया है। यहाँ इस कारण संक्षिप्त में दिया है ।
योगिनी दशा विचार
(१) मंगला--(स्वामी चन्द्र) गौ ब्राह्मण देव में भक्ति, सद्धं, लोगों से प्रीत ऐश्वर्य प्राप्ति, यश वाहन सुख उत्तम, मंगल वस्त्र भूषण स्त्री प्राप्त हो । (२) पिंगला--(स्वामी सूर्य) हृदय रोग, शोक, अनेक रोग, चिन्ता, धन का व्यय, सज्जनों के प्रेम का नाश, सन्मान का नाश, व्याधियों से दुःख । र (३) धान्या--(स्वामी गुरु) धन का आगम, भोग मान वृद्धि, ज्ञान की वृद्धि, तीथं, देव सिद्ध जनों की सेवा में प्रीत, सुख प्राप्ति मित्र बन्धु व स्त्री लाभ । _ (४) भ्रामरी-¬ (स्वामी मंगळ) व्याकुल होकर घूमता फिरे, राजवंश में भी हो तो 'राजपाट छोड़कर कंगालों की तरह मारा २ फिरे, जन्म भूमि का हरण । (५) भद्रिका- (स्वामी बुध) गुरु ब्राह्मण और देव में भक्ति, घर में मंगल, मित्र
दशा विचार : २६७.
से सन्मान, व्यापार में भन लगे, स्त्रियों के साथ आना मन भोग सुख सम्पत्ति प्राप्त हो ।
(६) उल्का--(स्वामी शनि) धन व्यापार गौ वस्त्र और मन का नाश, राजा से चित्त क्लेश, स्त्री पुत्र और नौकर से वैर हृदय, नेत्र उदर कणं और पाँव में रोग, दुःख ।
(७) सिद्धा- (स्वामी शुक्र) कार्यों की सिद्धि, सुन्दर भोग मान तथा धन प्राप्ति,
व्यापार वस्त्र भूषण आदि लाभ, विवाह आदि मंगल कार्य हो राजा तुल्य प्रताप
बढ़े सद्धमं और ज्ञान में वृद्धि सुख प्राप्त हो ।
(८) संकटा--(स्वामी राहु) राज्य से भ्रष्ट, तृष्णा की वृद्धि, अग्नि दाह, अंग
में रोग, धातु क्षय, पुत्र स्त्री से वियोग, मनुष्यों से विरोध, शत्रु भय, वह संकट
व्याधि क्लेश और मुत्यु देने वाली है ।
इसकी अन्तर्दशा के विचार के लिए उनके स्वामी ग्रह के अनुसार फल का
विचार करना । ज्योतिष शिक्षा भाग ३ फलित खंड में अन्तर्दशा का फल दे चुके हैं
इस कारण यहाँ नहीं दिया ।
वर्ष फल लिखने की रीति
वालक के जन्म में जिस प्रकार उसकी जन्म पत्री लिखने का आरम्भ होता है ।
उसी प्रकार वर्ष फल लिखने में वर्ष प्रवेश का इष्ट समय ज्ञात होने पर वपं कुण्डली
बनायी जाती है। आरम्भ में कोई मंगलाचरण लिखकर वर्ष प्रवेश समय का
सम्वतु शाका मास तिथि वार पक्ष करण दिनमान वर्ष प्रवेश का इष्ट एवं सूर्य के
गतांश, लर्न गतांश, मुन्था की राशि, गत वर्ष आदि लिखकर जिसका वपंफल है
उसका नाम भी लिख देना | लिखने का प्रकार नीचे दिया है—
श्री गणेशाय नमः
एकदन्तो मह्दाबुद्धिः सर्वज्ञो गणनायकः ।
सर्वसिद्धिकरो देवो यस्यैषा वर्षपत्रिका ॥ १॥
अथास्मिन् शुभे विक्रमाकं सम्बत्"“““॥॥ शालिवाहन श्ञाके”””॥"
अयने ॥ "°`" गोले ॥'"***« ऋतौ ॥ महा मंगल प्रद" मासे ॥ शुभ” पक्षे ॥
००००५०७७ तिथौ ॥ घट्यः" ""'°"“'वासरे I ०५०५१५नक्षत्रे घटबः "“॥"“*““योगे
घट्यः”””॥ करणे घटघ:"““*“ एवं पञ्चांग शुद्धिः । तत्र दिनमान घट्यो”,
वर्षप्रवेशसमये श्री सूर्योदयादिष्ट घटब:/" "० ॥ ००००० कि गतांशा:""'"॥॥ ००००
लग्नं मुन्था ॥ गताव्दा:"“““॥ अस्यां शुभग्रहावलोकितवेलायां श्रीमान”
आत्मज" "`` “` ए संख्या वर्ष प्रवेश: । शुभमस्तु ॥ श्रीरस्तु ॥
पश्चात इसके नीचे वर्षप्रवेश कुण्डली और जन्म लग्न कुण्डली रिख देना ।
फिर पञ्चांग का फल लिखना । नीचे गति सहित ग्रह स्पष्ट, भाव स्पष्ट, चलित
कुण्डली लिखना । लघु पञ्चवर्गी चक्र बनाकर वर्षेश निर्णय करना । उच्च वळ
वृहत् पञ्चवर्गी चक्र बनाकर ग्रहों का बल ओर विएवाबळ लिखना ।. पश्चात मंत्री
२६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
चक्क और दृष्टि चक्र लिखना । षडवर्ग चक्र द्वादश वर्ग चक्र, हषेवल चक्र बनाना ।
मुंथा स्पष्ट करना 1
पश्चात् वर्षेश फळ, वर्ष कुण्डली का भाव फङ, मुंबा फ, मुंथेश फर , लिखना त्रिपताका चक्र बना कर वेध फ लिखता । मुग्धा दशा व उपकी अन्तर्दशा, योगिनी दशा और उसको अन्तर्दशा, पत्यांशी दशा और उपकी अन्तर्ददा लिखकर इन सब का फल लिखना ।
इसी प्रकार मास प्रवेश कुण्डली बनाकर या आवश्यकता हो तो दिन प्रवेश कुण्डली बनाकर किता उनका भाव फड मासेश और दिनेश फळ मुं था फछ मुंथेश 'फल, मास मुद्दा दशा और उसका फछ लिखना ।
परचात सहन चक्र व सहम कुण्डली बनाकर सहम फछ और सहमेश फल (लिखना इस प्रकार कितने ही विस्तार से वर्ष फल छिख सकते हो ।

(चित्र / चक्र पृष्ठ 277)

(चित्र / चक्र पृष्ठ 278)

(चित्र / चक्र पृष्ठ 279)
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बट. संचित्रे ज्योतिष शिक्षा
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ज्योतिष के ऱ्य, सकत में ही हैं। ल से अनभिज्ञ साया
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के लिए इस माध्यम से. | न
ऐसी पुस्तक की सरलता से अध्ययन Fe करस @\ ज्य
इस प्रयोजन को ध्यो रही प्रस्तूत : पुस्तक सात खण्डो में. प्रकाशित
की गई है । ये सात बण , फलित, वर्ष-फल, प्रश्न, मुहूत्त
तथा संहिता खण्ड हँ, 1
Cp
में पूरी जन्मपत्री बलाने-कीविधि है ।
दरण रीति देकर पूरी गणित-प्रक्रिया दी रर भागः र० १००; द्वितीय भाग : शीघ्र.
सम्बन्धी. बातें दी गई हैं और महापुरुषों 07 देकर] समझाया गया है । शीध्
दु , योग, वर्गे, स्थान आदि ज्योतिष के
प र् A विद 22 किया गया है। य? ५०. ` 20 ४४ |: 2. (1 कु दश -विचार के साथ भाग्य, धर्म, कीति, षयो पर विचार प्रकट किया गया है।
र सम्बन्धों म्बन्धो पर ग्रह-प्रभाव का ज्ञान प्राप्त (पामा अनुपम है । द० ६०
कोरा गणित उदाहरण देकर समझाया `
४५
-
- गया है। रु० ४०
& सम्प “जानकारी उपलब्ध है । शुभाशुभ
]. ह. रु० १६
श्री विषयों पर विस्तार से विचार. : “अ्रतिकल परिस्थितियों के अनुसार देश्या |
बताए गए हैं । किसी भी देशके ।
न: र छयोवरिविद् इस खण्ड का सफल उपयोग (भाज्य पय भ्रौर पाश्चात्य दोनों रीतियों का
| 2 २० ३०
POTD हुन सम्बन्ध
सीदास
पटना