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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक २२ ]

  • साधक-संजीवनी *

११४५

व्याख्या—'पृथक्त्वेन तु' यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान्'—राजस ज्ञानमें 'राग' की मुख्यता होती है—'रजो रागात्मकं विद्धि' (गीता १४। ७)। रागका यह नियम है कि वह जिसमें आ जाता है, उसमें किसीके प्रति आसक्ति, प्रियता पैदा करा देता है और किसीके प्रति द्वेष पैदा करा देता है। इस रागके कारण ही मनुष्य, देवता, यक्ष-राक्षस, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि जितने भी चर-अचर प्राणी हैं, उन प्राणियोंकी विभिन्न आकृति, स्वभाव, नाम, रूप, गुण आदिको लेकर राजस ज्ञानवाला मनुष्य उनमें रहनेवाली एक ही अविनाशी आत्माको तत्त्वसे अलग-अलग समझता है। 'वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्'—इसी तरह जिस ज्ञानसे मनुष्य अलग-अलग शरीरोंमें अन्तःकरण, स्वभाव, इन्द्रियाँ, प्राण आदिके सम्बन्धसे प्राणियोंको भी अलग-अलग मानता है, वह ज्ञान 'राजस' कहलाता है। राजस ज्ञानमें जड-चेतनका विवेक नहीं होता।

परिशिष्ट भाव—क्रिया और पदार्थ—दोनोंको सत्ता देकर उनके साथ रागपूर्वक सम्बन्ध जोड़नेके कारण सब अलग-अलग दीखते हैं।

सम्बन्ध—अब तामस ज्ञानका वर्णन करते हैं।

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥ २२॥

तु = किन्तु, यत् = जो (ज्ञान), अर्थात्, जिस ज्ञानके द्वारा, मनुष्य, एकस्मिन् = एक, कार्ये = कार्यरूप, शरीरमें ही, कृत्स्नवत् = सम्पूर्णकी तरह, सक्तम् = आसक्त रहता है, च = तथा (जो), अहैतुकम् = युक्तिरहित, अतत्त्वार्थवत् = वास्तविक, ज्ञानसे, रहित, (और), अल्पम् = तुच्छ है, तत् = वह, तामसम् = तामस, उदाहृतम् = कहा गया है।

व्याख्या—'यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम्'—तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पांचभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था, मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा; मैं भोगी, बलवान् और सुखी हूँ; मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है; इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है—'इत्यज्ञानविमोहिताः' (१६। १५)। 'अहैतुकम्'—तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है, शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है, दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्यों-का-त्यों रहता है; अतः यह शरीर और तू कैसे हो सकते हैं?—इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता। 'अतत्त्वार्थवदल्पं च'—यह शरीर और मैं दोनों अलग-अलग हैं—इस वास्तविक ज्ञान-(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको 'ज्ञान' कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है। अतः भगवान्ने 'ज्ञान' पद न देकर 'यत्' और 'तत्' पदसे ही काम चलाया है।

१-यहाँ 'तु' पद राजस ज्ञानको सात्त्विक ज्ञानसे भिन्न बतानेके लिये आया है। २-इस श्लोकमें राजस ज्ञानसे भी तामस ज्ञानको भिन्न बतानेके लिये 'तु' पद आया है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

‘ततामसमुदाहृतम्’—युक्तिरहित, अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना ‘तामस’ कहा गया है। जब तामस समझ ‘ज्ञान’ है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ‘ज्ञान’ कहनेमें संकोच हुआ है, तो फिर इसका

परिशिष्ट भाव —तामस ज्ञानमें आसुरी सम्पत्ति विशेष है। इस श्लोकमें ‘ज्ञान’ शब्द न देनेका तात्पर्य है कि वास्तवमें यह ज्ञान नहीं है, प्रत्युत अज्ञान ही है। यह तामस मनुष्योंकी बुद्धि है, जिसको ‘पशुबुद्धि’ कहा गया है— त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि। न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नृश्यसि॥

(श्रीमद्भा० ११।५।२)

(श्रीशुकदेवजी बोले—) ‘हे राजन्! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा। जैसे शरीर पहले नहीं था, पीछे पैदा हुआ और फिर मर जायगा, ऐसे तुम पहले नहीं थे, पीछे पैदा हुए और फिर मर जाओगे—यह बात नहीं है।’

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।

नियतं सद्गुरुहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥

यत्= जोसद्गुरुहितम्= कर्तृत्वाभिमानसे रहितअरागद्वेषतः= बिना राग-द्वेषके
कर्म= कर्मही (तथा)कृतम्= किया हुआ हो,
नियतम्= शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ (और)अफलप्रेप्सुना= फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारातत्= वह
सात्त्विकम्= सात्त्विक
उच्यते= कहा जाता है।

व्याख्या —‘नियतं सद्गुरुहितम्’……‘सात्त्विक-मुच्यते’—जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है, उसके लिये वह कर्म ‘नियत’ हो जाता है।

यहाँ ‘नियतम्’ पदसे एक तो कर्मिका स्वरूप बताया है और दूसरे, शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है।

‘सद्गुरुहितम्’ पदका तात्पर्य है कि वह नियत-कर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता, पर उनकी भी वृद्धि आनेपर पत्तीका झड़ना, नये पत्तीका निकलना, शाखा कटनेपर घावका मिल जाना, शाखाओंका बढ़ना, फल-फूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा

अपने-आप ही होती हैं; ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़ना-घटना, खाना-पीना, चलना-फिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपने-आप ही रही हैं। इन क्रियाओंके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है, न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है, तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है, वह संगरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है।

यहाँ सांख्य-प्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे ‘अरागद्वेषतः कृतम्’ पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ ‘सद्गुरुहितम्’ पदका अर्थ कर्तृत्व-अभिमानरहित लिया गया है*।

‘अरागद्वेषतः कृतम्’ पदोंका तात्पर्य है कि राग-द्वेषसे

  • यहाँ संन्यास-(सांख्ययोग-) में ‘सद्गुरुहितम्’ पदसे कर्तृत्व-अभिमानसे रहित होनेकी बात आयी है और त्याग-(कर्मयोग-) में ‘सद्गुरुत्वका फलं चैव’ (१८।१) पदोंसे आसक्ति तथा फलेच्छासे रहित होनेकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि सांख्ययोगीका शरीरमें थोड़ा भी अभिमान रहेगा तो उसका शरीरके साथ सम्बन्ध बना रहेगा, जो कि

श्लोक २४ ] * साधक-संजीवनी * ११४७

रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण

रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा

कर्म करनेके जितने साधन (शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण

आदि) हैं, उनमें भी राग-द्वेष न हो।

'अरागद्वेषतः' पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया

है और 'अफलप्रेप्सुना' पदसे भविष्यमें रागका अभाव

बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी

इच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया

और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असंगतापूर्वक कर्म किया

जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है।

इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है, जबतक

अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब

प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब यह कर्म

'अकर्म' हो जाता है।

सम्बन्ध-अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।

क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥

तु = परन्तु | वा = अथवा | क्रियते = किया जाता है,

यत् = जो | साहङ्कारेण = अहंकारसे | तत् = वह

कर्म = कर्म | पुनः = और | राजसम् = राजस

कामेप्सुना = भोगोंकी इच्छासे | बहुलायासम् = परिश्रमपूर्वक | उदाहृतम् = कहा गया है।

व्याख्या-'यत्तु* कामेप्सुना कर्म'-हम कर्म करेंगे

तो हमें पदार्थ मिलेंगे, सुख-आराम मिलेगा, भोग मिलेंगे,

आदर-सम्मान-बड़ाई मिलेगी आदि फलकी इच्छासे कर्म

किया जाय।

अपनी विशेषताको लेकर (अहंकारपूर्वक) कर्म किया

जाय-इन दोनों भावोंमेंसे एक भाव होनेपर भी वह

कर्म राजस हो जाता है, यह बतानेके लिये यहाँ 'वा

पुनः' पद आये हैं। तात्पर्य है कि फलेच्छा और

अहंकार-इन दोनोंमेंसे जब एक भाव होनेपर भी कर्म

'राजस' हो जाता है, तब दोनों भाव होनेपर वह कर्म राजस

हो ही जायगा।

'साहंकारेण'-लोगोंके सामने कर्म करनेसे लोग

देखते हैं और वाह-वाह करते हैं तो अभिमान आता है

और जहाँ लोग सामने नहीं होते, वहाँ (एकान्तमें) कर्म

करनेसे दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विलक्षणता, विशेषता

देखकर अभिमान आता है। जैसे-दूसरे आदमी हमारी

तरह सुचारुरूपसे सांगोपांग कार्य नहीं कर सकते; हमारेमें

काम करनेकी जो योग्यता, विद्या, चतुरता आदि है, वह

हरेक आदमीमें नहीं मिलेगी; हम जो भी काम करते हैं,

उसको बहुत ही ईमानदारीसे और जल्दी करते हैं, आदि-

आदि। इस प्रकार अहंकारपूर्वक किया गया कर्म राजस

कहलाता है।

'क्रियते बहुलायासम्'-कर्म करते समय हरेक

व्यक्तिके शरीरमें परिश्रम तो होता ही है, पर जिस व्यक्तिमें

शरीरके सुख-आरामकी इच्छा मुख्य होती है, उसको कर्म

करते समय शरीरमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।

जिस व्यक्तिमें कर्मफलकी इच्छा तो मुख्य है, पर

शारीरिक सुख-आरामकी इच्छा मुख्य नहीं है, अर्थात् सुख-

आराम लेनेकी स्वाभाविक ही प्रकृति नहीं है, उसको कर्म

करते हुए भी शरीरमें परिश्रम नहीं मालूम देता। कारण कि

'वा पुनः'-आगे भविष्यमें मिलनेवाले फलको

लेकर (फलेच्छापूर्वक) कर्म किया जाय अथवा वर्तमानमें

भीतरमें भोगों और संग्रहकी जोरदार कामना होनेसे उसकी

वृत्ति कामनापूर्तिकी तरफ ही लगी रहती है; शरीरकी तरफ

तत्त्वप्राप्तिमें बाधक होगा; परन्तु कर्मयोगीका शरीरमें थोड़ा अभिमान रह भी जायगा तो वह सांख्ययोगीकी तरह उतना बाधक

नहीं होगा। कारण कि (कोई भी कर्म अपने लिये न करनेसे) कर्मयोगीका कर्तृत्व-अभिमान केवल कर्तव्य-पालनके लिये

ही होता है अर्थात् वह जिस समय जो कार्य करता है, उसी समय उसमें तात्कालिक कर्तृत्व-अभिमान रहता है। कार्यका अन्त

होनेपर वह कर्तृत्व-अभिमान उसी कार्यमें लीन हो जाता है।

  • राजस कर्मको सात्त्विक कर्मसे भिन्न बतानेके लिये यहाँ 'तु' पदका प्रयोग हुआ है।

११८४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८

नहीं। तात्पर्य है कि शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता होनेसे फलेच्छाकी अवहेलना हो जाती है और फलेच्छाकी मुख्यता होनेसे शरीरके सुख-आरामकी अवहेलना हो जाती है।

लोगोंके सामने कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक मिलनेसे और शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता न होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें परिश्रम नहीं मालूम देता। परन्तु एकान्तमें कर्म करते समय अहंकारजन्य सुखकी खुराक न मिलनेसे और शरीरके सुख-आरामकी मुख्यता होनेसे राजस मनुष्यको कर्म करनेमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।

'तद्राजसमुदाहृतम्'—ऐसे फलकी इच्छावाले मनुष्यके द्वारा अहंकार और परिश्रमपूर्वक किया हुआ जो कर्म है, वह 'राजस' कहा गया है।

परिशिष्ट भाव—राजस मनुष्य अपनी आवश्यकताओंको अधिक बढ़ा लेता है, जिससे प्रत्येक काममें उसको अधिक वस्तुओंकी जरूरत पड़ती है। अधिक वस्तुओंको जुटानेमें परिश्रम भी अधिक होता है। राजस मनुष्य कर्मोंका विस्तार अधिक करता है, इसलिये भी उसको परिश्रम अधिक होता है। शरीरमें राग रहनेके कारण राजस मनुष्य शरीरका आराम चाहता है, जिससे उसको थोड़े काममें भी अधिक परिश्रम मालूम देता है।

सम्बन्ध—अब तामस कर्मका वर्णन करते हैं।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ २५॥

यत् = जो कर्म = कर्म अनुबन्धम् = परिणाम, क्षयम् = हानि, हिंसाम् = हिंसा च = और पौरुषम् = सामर्थ्यको अनवेक्ष्य = न देखकर मोहात् = मोहपूर्वक आरभ्यते = आरम्भ किया जाता है, तत् = वह तामसम् = तामस उच्यते = कहा जाता है।

व्याख्या—'अनुबन्धम्'—जिसको फलकी कामना होती है, वह मनुष्य तो फलप्राप्तिके लिये विचारपूर्वक कर्म करता है, परन्तु तामस मनुष्यमें मूढ़ताकी प्रधानता होनेसे वह कर्म करनेमें विचार करता ही नहीं। इस कार्यको करनेसे मेरा तथा दूसरोंके प्राणियोंका अभी और परिणाममें कितना नुकसान होगा, कितना अहित होगा—इस अनुबन्ध अर्थात् परिणामको न देखकर वह कार्य आरम्भ कर देता है।

'क्षयम्'—इस कार्यको करनेसे अपने और दूसरोंके शरीरोंकी कितनी हानि होगी; धन और समयका कितना खर्चा होगा; इससे दुनियामें मेरा कितना अपमान, निन्दा, तिरस्कार आदि होगा, मेरा लोक-परलोक बिगड़ जायगा आदि नुकसानको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।

'हिंसाम्'—इस कर्मसे कितने जीवोंकी हत्या होगी; कितने श्रेष्ठ व्यक्तियोंके सिद्धान्तों और मान्यताओंकी हत्या हो जायगी; दूसरे मनुष्योंकी मनुष्यताकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी; अभीके और भावी जीवोंके शुद्ध भाव, आचरण, वेश-भूषा, खान-पान आदिकी कितनी भारी हिंसा हो जायगी; इससे मेरा और दुनियाका कितना अध:पतन होगा आदि हिंसाको न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।

'अनवेक्ष्य च पौरुषम्'—इस कामको करनेकी मेरेमें कितनी योग्यता है, कितना बल, सामर्थ्य है; मेरे पास कितना समय है, कितनी बुद्धि है, कितनी कला है, कितना ज्ञान है आदि अपने पौरुष-(पुरुषार्थ-) को न देखकर ही वह कार्य आरम्भ कर देता है।

'मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते'—तामस मनुष्य कर्म करते समय उसके परिणाम, उससे होनेवाले नुकसान, हिंसा और अपनी सामर्थ्यका कुछ भी विचार न करके, जब जैसा मनमें भाव आया, उसी समय बिना विवेक-विचारके वैसा ही कर बैठता है। इस प्रकार किया गया कर्म 'तामस' कहलाता है।

श्लोक २६ ]

  • साधक-संजीवनी *

११४९

परिशिष्ट भाव —तामस मनुष्य अपनी शक्ति, परिणाम आदिका विचार न करके मूढ़तासे काम करता है*। वह स्वाभाविक ही ऐसे काम करता है, जिनसे दूसरोंको बाधा पहुँचे; जैसे—रास्तेमें खड़े होकर बात करने लग जाना, रास्तेमें साइकिल खड़ी कर देना आदि। दूसरोंको लगनेवाली बाधाकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता।

सात्त्विक स्वभाव स्वतः उत्थानकी तरफ जाता है, राजस स्वभावमें उन्नति रुक जाती है और तामस स्वभाव स्वतः पतनकी तरफ जाता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक कर्ताके लक्षण बताते हैं।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।

सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥

कर्ता | = (जो) कर्ता | समन्वितः | = धैर्य और उत्साहयुक्त | निर्विकारः | = निर्विकार है, (वह) ---|---|---|---|---|--- मुक्तसङ्गः | = रागरहित, | | (तथा) | सात्त्विकः | = सात्त्विक अनहंवादी | = कर्तृत्वाभिमानसे रहित, | सिद्ध्यसिद्धयोः | = सिद्धि और असिद्धिमें | उच्यते | = कहा जाता है।

व्याख्या —‘मुक्तसंगः’—जैसे सांख्ययोगीका कर्मके साथ राग नहीं होता, ऐसे सात्त्विक कर्ता भी रागरहित होता है।

कामना, वासना, आसक्ति, स्पृहा, ममता आदिसे अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिमें आसक्ति, लिप्तता होती है। सात्त्विक कर्ता इस लिप्ततासे सर्वथा रहित होता है।

‘अनहंवादी’—पदार्थ, वस्तु, परिस्थिति आदिको लेकर अपनेमें जो एक विशेषताका अनुभव करना है—यह अहंवदनशीलता है। यह अहंवदनशीलता आसुरी-सम्पत्ति होनेसे अत्यन्त निकृष्ट है। सात्त्विक कर्तामें यह अहंवदनशीलता, अभिमान तो रहता ही नहीं, प्रत्युत ‘मैं इन चीजोंका त्यागी हूँ, मेरेमें यह अभिमान नहीं है, मैं निर्विकार हूँ, मैं सम हूँ, मैं सर्वथा निष्काम हूँ, मैं संसारके सम्बन्धसे रहित हूँ’—इस तरहके अहंभावका भी उसमें अभाव रहता है।

‘धृत्युत्साहसमन्वितः’—कर्तव्य-कर्म करते हुए विघ्न-बाधाएँ आ जायँ, उस कर्मका परिणाम ठीक न निकले, लोगोंमें निन्दा हो जाय, तो भी विघ्न-बाधा आदि न

आनेपर जैसा धैर्य रहता है, वैसा ही धैर्य विघ्न-बाधा आनेपर भी नित्य-निरन्तर बना रहे—इसका नाम ‘धृति’ है और सफलता-ही-सफलता मिलती चली जाय, उन्नति होती चली जाय, लोगोंमें मान, आदर, महिमा आदि बढ़ते चले जायँ—ऐसी स्थितिमें मनुष्यके मनमें जैसी उम्मेदवारी, सफलताके प्रति उत्साह रहता है, वैसी ही उम्मेदवारी इससे विपरीत अर्थात् असफलता, अवनति, निन्दा आदि हो जानेपर भी बनी रहे—इसका नाम ‘उत्साह’ है। सात्त्विक कर्ता इस प्रकारकी धृति और उत्साहसे युक्त रहता है।

‘सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः’—सिद्धि और असिद्धिमें अपनेमें कुछ भी विकार न आये, अपनेपर कुछ भी असर न पड़े अर्थात् कार्य ठीक तरहसे सांगोपांग पूर्ण हो जाय अथवा पूरा उद्योग करते हुए अपनी शक्ति, समझ, समय, सामर्थ्य आदिको पूरा लगाते हुए भी कार्य पूरा न हो; फल प्राप्त हो अथवा न हो, तो भी अपने अन्तःकरणमें प्रसन्नता और खिन्नता, हर्ष और शोकका न होना ही सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार रहना है।

‘कर्ता सात्त्विक उच्यते’—ऐसा आसक्ति तथा अहंकारसे

*बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछिताय। काम बिगारे आपनो, जग में होत हैसाय॥ जग में होत हैसाय, चित्त में चैन न पावै॥ खान पान सनमान, राग-रैग मन नहि भावै॥ कह गिरधर कविराय करमगति टरत न टारे। खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥

११५०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८

रहित, धैर्य तथा उत्साहसे युक्त और सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार कर्ता 'सात्त्विक' कहा जाता है।

इस श्लोकमें छ: बातें बतायी गयी हैं-संग,

अहंवदनशीलता, धृति, उत्साह, सिद्धि और असिद्धि। इनमेंसे पहली दो बातोंसे रहित, बीचकी दो बातोंसे युक्त और अन्तकी दो बातोंमें निर्विकार रहनेके लिये कहा गया है।

परिशिष्ट भाव-सिद्धि-असिद्धिमें निर्विकार, सम रहनेकी बात गीतामें तीन बार आयी है-'सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा' (२।४८), 'सम: सिद्धावसिद्धौ च' (४।२२) और यहाँ 'सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकार:'। तात्पर्य है कि सिद्धि-असिद्धि हाथकी बात नहीं है, पर उसमें निर्विकार रहना हाथकी बात है। जो हाथकी बात है, उसको ठीक करना है।

'अनहंवादी'-सात्त्विक मनुष्य 'जैसा मैं कर सकता हूँ, वैसा दूसरा नहीं कर सकता'-इस तरह न तो बाहरसे बोलता है और न भीतरसे बोलता है। अपनेमें विशेषताका अनुभव करना ही भीतरसे बोलना है।

सम्बन्ध-अब राजस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि:। हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित:॥ २७॥

कर्ता =(जो) कर्ता

रागी =रागी

कर्मफलप्रेप्सु: =कर्मफलकी इच्छावाला,

लुब्ध: =लोभी,

हिंसात्मक: =हिंसाके स्वभाववाला,

अशुचि: =अशुद्ध (और)

हर्षशोकान्वित: =हर्ष-शोकसे युक्त है, (वह)

राजस: =राजस

परिकीर्तित: =कहा गया है।

व्याख्या-'रागी'-रागका स्वरूप रजोगुण होनेके कारण भगवान्ने राजस कर्ताके लक्षणोंमें सबसे पहले 'रागी' पद दिया है। रागका अर्थ है-कर्मोंमें, कर्मोंके फलोंमें तथा वस्तु, पदार्थ आदिमें मनका खिंचाव होना, मनकी प्रियता होना। इन चीजों जिसपर रंग चढ़ जाता है, वह 'रागी' होता है।

'कर्मफलप्रेप्सु:':-राजस मनुष्य कोई भी काम करेगा तो वह किसी फलकी चाहनाको लेकर ही करेगा; जैसे-मैं ऐसा-ऐसा अनुष्ठान कर रहा हूँ, दान दे रहा हूँ, उससे यहाँ धन, मान, बड़ाई आदि मिलेंगे और परलोकमें स्वर्गादिके भोग, सुख आदि मिलेंगे; मैं ऐसी-ऐसी दवाइयोंका सेवन कर रहा हूँ तो उनसे मेरा शरीर नीरोग रहेगा, आदि।

'लुब्ध:':-राजस मनुष्यको जितना जो कुछ मिलता है, उसमें वह संतोष नहीं करता, प्रत्युत 'जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई' की तरह 'और मिलता रहे, और मिलता रहे' अर्थात् आदर, सत्कार, महिमा आदि अधिक-से-अधिक होते रहें; धन, पुत्र, परिवार आदि अधिक-से-अधिक बढ़ते रहें-इस प्रकारकी लाग लगी रहती है, लोभ लगा रहता है।

'हिंसात्मक:':-वह हिंसाके स्वभाववाला होता है। अपने स्वार्थके लिये वह दूसरोंके नुकसानकी, दु:खकी परवाह नहीं करता। वह ज्यों-ज्यों अधिक भोग-सामग्री इकट्ठी करके भोग भोगता है, त्यों-ही-त्यों दूसरे अभावग्रस्त लोगोंके हृदयमें जलन पैदा होती है। अतः दूसरोंके दु:खकी परवाह न करना तथा भोग भोगना हिंसा ही है।

तामस कर्म (इसी अध्यायका पचीसवाँ श्लोक) और राजस कर्ता-दोनोंमें हिंसा बतानेका तात्पर्य यह है कि मूढ़ता रहनेके कारण तामस मनुष्यकी क्रियाएँ विवेकपूर्वक नहीं होतीं; अतः चलने-फिरने, उठने-बैठने आदिमें उसके द्वारा हिंसा होती है। राजस मनुष्य अपने सुखके लिये बढ़िया-बढ़िया भोग भोगता है तो उसको देखकर जिनको वे भोग नहीं मिलते, उनके हृदयमें जलन होती है, यह हिंसा उस भोग भोगनेवालेको ही लगती है। कारण कि कोई भी भोग बिना हिंसाके होता ही नहीं। तात्पर्य यह है कि तामस मनुष्यके द्वारा तो कर्ममें हिंसा होती है और राजस मनुष्य स्वयं हिंसात्मक होता है।

'अशुचि:':-रागी पुरुष भोग-बुद्धिसे जिन वस्तुओं,

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

११५१

पदार्थों आदिका संग्रह करता है, वे सब चीजें अपवित्र हो जाती हैं। वह जहाँ रहता है, वहाँका वायुमण्डल अपवित्र हो जाता है। वह जिन कपड़ोंको पहनता है, उन कपड़ोंमें भी अपवित्रता आ जाती है। यही कारण है कि आसक्ति-ममतावाले मनुष्यके मरनेपर उसके कपड़े आदिको कोई रखना नहीं चाहता। जिस स्थानपर उसके शवको जलाया जाता है, वहाँ कोई भजन-ध्यान करना चाहे तो उसका मन नहीं लगेगा। वहाँ भूलसे कोई सो जायगा तो उसको प्रायः खराब-खराब स्वप्न आयेंगे। तात्पर्य यह है कि

परिशिष्ट भाव—‘हिंसात्मकः’ —‘पहले तामस कर्ममें भी हिंसा बतायी गयी है, (इसी अध्यायका पचीसवाँ श्लोक); क्योंकि रजोगुण और तमोगुण—दोनों एक-दूसरेके नजदीक पड़ते हैं, पर सत्त्वगुण दोनोंसे दूर पड़ता है। रजोगुण रागात्मक होता है और तमोगुण मोहात्मक। रजोगुणमें तो होश और सावधानी रहती है, पर तमोगुणमें बेहोशी और असावधानी रहती है। राग, स्वार्थबुद्धि होनेसे जितनी हिंसा होती है, उतनी मोह होनेसे नहीं होती। इसलिये रजोगुणमें अधिक हिंसा होती है। राग, स्वार्थबुद्धिके कारण राजस मनुष्य ‘हिंसात्मक’ हो जाता है। उसकी हिंसामें तल्लीनता हो जाती है।

सम्बन्ध—अब तामस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोऽनैष्कृतिकोऽलसः ।

विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥

कर्ता= ( जो ) कर्ताअनैष्कृतिकः= उपकारीका अपकारदीर्घसूत्री= दीर्घसूत्री है,
अयुक्तः= असावधान,करनेवाला,( वह )
प्राकृतः= अशिक्षित,अलसः= आलसी,तामसः= तामस
स्तब्धः= ऐंट-अकड़वाला,विषादी= विषादीउच्यते= कहा
शठः= जिद्दी,= औरजाता है ।

व्याख्या—‘अयुक्तः’ —‘तमोगुण मनुष्यको मूढ़ बना देता है (गीता—चौदहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इस कारण किस समयमें कौन-सा काम करना चाहिये? किस तरह करनेसे हमें लाभ है और किस तरह करनेसे हमें हानि है?—इस विषयमें तामस मनुष्य सावधान नहीं रहता अर्थात् वह कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सोचता ही नहीं। इसलिये वह ‘अयुक्त’ अर्थात् असावधान कहलाता है।

‘प्राकृतः’ —‘जिसने शास्त्र, सत्संग, अच्छी शिक्षा, उपदेश आदिसे न तो अपने जीवनको ठीक बनाया है और न अपने जीवनपर कुछ विचार ही किया है, माँ-बापसे जैसा पैदा हुआ है, वैसा-का-वैसा ही कोरा अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्यको शिक्षासे रहित रहा है, ऐसा मनुष्य

उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी तरफ आकृष्ट होते ही आसक्ति-ममतारूप मलिनता आने लगती है, जिससे मनुष्यका शरीर और शरीरकी हड्डियाँ अधिक अपवित्र हो जाती हैं।

‘हर्षशोकान्वितः’ —‘उसके सामने दिनमें कितनी बार सफलता-विफलता, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति, घटना आदि आते रहते हैं, उनको लेकर वह हर्ष-शोक, राग-द्वेष, सुख-दुःख आदिमें ही उलझा रहता है।

‘कर्ता राजसः परिकीर्तितः’ —‘उपर्युक्त लक्षणोंवाला कर्ता ‘राजस’ कहा गया है।

‘प्राकृत’ अर्थात् अशिक्षित कहलाता है।

‘स्तब्धः’ —‘तमोगुणकी प्रधानताके कारण उसके मन, वाणी और शरीरमें अकड़ रहती है। इसलिये वह अपने वर्ण-आश्रममें बड़े-बूढ़े माता, पिता, गुरु, आचार्य आदिके सामने कभी झुकता नहीं। वह मन, वाणी और शरीरसे कभी सरलता और नम्रताका व्यवहार नहीं करता, प्रत्युत कठोर व्यवहार करता है। ऐसा मनुष्य ‘स्तब्ध’ अर्थात् ऐंट-अकड़वाला कहलाता है।

‘शठः’ —‘तामस मनुष्य अपनी एक जिद होनेके कारण दूसरोंकी दी हुई अच्छी शिक्षाको, अच्छे विचारोंको नहीं मानता। उसको तो मूढ़ताके कारण अपने ही विचार अच्छे लगते हैं। इसलिये वह ‘शठ’ अर्थात् जिद्दी कहलाता है*।

  • मूर्खस्य पंच चिन्हानि गर्वी दुर्वचनी तथा। हठी चाप्रियवादी च परोक्त नैव मन्यते ॥

१५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

'अनेच्छुतिकः' —जिनसे कुछ उपकार पाया है, उनका प्रत्युपकार करनेका जिसका स्वभाव होता है, वह 'नैच्छुतिक' कहलाता है। परन्तु तामस मनुष्य दूसरोंसे उपकार पा करके भी उनका उपकार नहीं करता, प्रत्युत उनका अपकार करता है, इसलिये वह 'अनेच्छुतिक' कहलाता है।

'अलसः' —अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार आवश्यक कर्तव्य-कर्म प्राप्त हो जानेपर भी तामस मनुष्योंको मूढ़ताके कारण वह कर्म करना अच्छा नहीं लगता, प्रत्युत सांसारिक निरर्थक बातोंको पड़े-पड़े सोचते रहना अथवा नींदमें पड़े रहना अच्छा लगता है। इसलिये उसे आलसी कहा गया है।

'विषादी' —यद्यपि तामस मनुष्यमें यह विचार होता ही नहीं कि क्या कर्तव्य होता है और क्या अकर्तव्य होता है तथा निद्रा, आलस्य, प्रमाद आदिमें मेरी शक्ति, मेरे जीवनके अमूल्य समयका कितना दुरुपयोग हो रहा है, तथापि अच्छे मार्गसे और कर्तव्यसे च्युत होनेसे उसके भीतर स्वाभाविक ही एक विषाद (दुःख, अशान्ति) होता रहता है। इसलिये उसे 'विषादी' कहा गया है।

'दीर्घसूत्री' —अमुक काम किस तरीकेसे बढ़िया और जल्दी हो सकता है—इस बातको वह सोचता ही नहीं। इसलिये वह किसी काममें अविवेकपूर्वक लग भी जाता है तो थोड़े समयमें होनेवाले काममें भी बहुत ज्यादा समय लगा देता है और उससे काम भी सुचारूपसे नहीं होता। ऐसा मनुष्य 'दीर्घसूत्री' कहलाता है।

'कर्ता तामस उच्यते' —उपर्युक्त आठ लक्षणोंवाला कर्ता 'तामस' कहलाता है।

विशेष बात

छब्बीसवें, सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोकमें जितनी बातें आयी हैं, वे सब कर्ताको लेकर ही कही गयी हैं। कर्ताके जैसे लक्षण होते हैं, उन्हींके अनुसार कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंको स्वीकार करता है, उन गुणोंके अनुसार ही कर्माका रूप होता है। कर्ता जिस साधनको करता है, वह साधन कर्ताका रूप हो जाता है। कर्ताके आगे जो करण होते हैं, वे भी कर्ताके अनुरूप होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा कर्ता होता है, वैसे ही कर्म, करण आदि होते हैं। कर्ता सात्त्विक, राजस अथवा तामस होगा तो कर्म

आदि भी सात्त्विक, राजस अथवा तामस होंगे।

सात्त्विक कर्ता अपने कर्म, बुद्धि आदिको सात्त्विक बनाकर सात्त्विक सुखका अनुभव करते हुए असंगतापूर्वक परमात्मत्वसे अभिन्न हो जाता है—'दुःखान्तं च निगच्छति' (गीता १८।३६)। कारण कि सात्त्विक कर्ताका ध्येय परमात्मा होता है। इसलिये वह कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे रहित होकर चिन्मय तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है; क्योंकि वह तात्त्विक स्वरूपसे अभिन्न ही था। परन्तु राजस-तामस कर्ता राजस-तामस कर्म, बुद्धि आदिके साथ तन्मय होकर राजस-तामस सुखमें लिप्त होता है। इसलिये वह परमात्मत्वसे अभिन्न नहीं हो सकता। कारण कि राजस-तामस कर्ताका उद्देश्य परमात्मा नहीं होता और उसमें जड़ताका बन्धन भी अधिक होता है।

अब यहाँ शंका हो सकती है कि कर्ताका सात्त्विक होना तो ठीक है, पर कर्म सात्त्विक कैसे होते हैं? इसका समाधान यह है कि जिस कर्मके साथ कर्ताका राग नहीं है, कर्तृत्वाभिमान नहीं है, लेप (फलेच्छा) नहीं है, वह कर्म सात्त्विक हो जाता है। ऐसे सात्त्विक कर्मसे अपना और दुनियाका बड़ा भला होता है। उस सात्त्विक कर्मका जिन-जिन वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, वायुमण्डल आदिके साथ सम्बन्ध होता है, उन सबमें निर्मलता आ जाती है; क्योंकि निर्मलता सत्त्वगुणका स्वभाव है—'तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्' (गीता १४।६)।

दूसरी बात, पतंजलि महाराजने रजोगुणको क्रियात्मक ही माना है—'प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्' (योगदर्शन २।१८)। परन्तु गीता रजोगुणको क्रियात्मक मानते हुए भी मुख्यरूपसे रागात्मक ही मानती है—'रजो रागात्मकं विद्धि' (१४।७)। वास्तवमें देखा जाय तो 'राग' ही बाँधनेवाला है, 'क्रिया' नहीं।

गीतामें कर्म तीन प्रकारके बताये गये हैं—सात्त्विक, राजस और तामस (इसी अध्यायके तेईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक)। कर्म करनेवालेका भाव सात्त्विक होगा तो वे कर्म 'सात्त्विक' हो जायेंगे, भाव राजस होगा तो वे कर्म 'राजस' हो जायेंगे और भाव तामस होगा तो वे कर्म 'तामस' हो जायेंगे। इसलिये भगवान्ने केवल क्रियाको रजोगुणी नहीं माना है।

परिशिष्ट भाव —'विषादी' पद रजोगुणमें आना चाहिये, पर यहाँ तमोगुणमें आया है। तामस वृत्तिका विवेकसे विरोध है, इसलिये तामस मनुष्यमें विषाद अधिक होता है।

श्लोक २९ ]

  • साधक-संजीवनी *

११५३

सम्बन्ध—सभी कर्म विचारपूर्वक किये जाते हैं। उन कर्मोंके विचारमें बुद्धि और धृति—इन कर्मसंग्राहक करणोंकी प्रधानता होनेसे अब आगे उनके भेद बताते हैं।

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥ २९॥

धनञ्जय = हे धनंजय! (अब तू) गुणतः = गुणोंके अनुसार बुद्धेः = बुद्धि च = और धृतेः = धृतिके एव = भी त्रिविधम् = तीन प्रकारके भेदम् = भेद पृथक्त्वेन = अलग-अलगरूपसे शृणु = सुन, अशेषेण = (जो कि मेरे द्वारा) पूर्णरूपसे प्रोच्यमानम् = कहे जा रहे हैं।

व्याख्या—[ इसी अध्यायके अठारहवें श्लोकमें कर्म-संग्रहके तीन हेतु बताये गये हैं—करण, कर्म और कर्ता। इनमेंसे कर्म करनेके जो इन्द्रियाँ आदि करण हैं, उनके सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन भेद नहीं होते। उन इन्द्रियोंमें बुद्धिकी ही प्रधानता रहती है और सभी इन्द्रियाँ बुद्धिके अनुसार ही काम करती हैं। इसलिये यहाँ बुद्धिके भेदसे करणोंके भेद बता रहे हैं।

बुद्धिके निश्चयको, विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारण-शक्तिका नाम धृति है। धारण-शक्ति अर्थात् धृतिके बिना बुद्धि अपने निश्चयपर दृढ़ नहीं रह सकती। इसलिये बुद्धिके साथ-ही-साथ धृतिके तीन भेद बताने आवश्यक हो गये*।

मनुष्य जो कुछ भी करता है, बुद्धिपूर्वक ही करता है अर्थात् ठीक सोच-समझकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है। उस कार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी उसको धैर्यकी बड़ी भारी आवश्यकता होती है। उसकी बुद्धिमें विचार-शक्ति तेज है और उसे धारण करनेवाली शक्ति—धृति श्रेष्ठ है, तो उसकी बुद्धि अपने निश्चित किये हुए लक्ष्यसे विचलित नहीं होती। जब बुद्धि अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहती है, तब मनुष्यका कार्य सिद्ध हो जाता है।

अभी साधकोंके लिये कर्मप्रेरक और कर्म-संग्रहका जो प्रकरण चला है, उसमें ज्ञान, कर्म और कर्ताकी ही खास आवश्यकता है। ऐसे ही साधक अपनी साधनामें दृढ़तापूर्वक लगा रहे, इसके लिये बुद्धि और धृतिके भेदको जाननेकी विशेष आवश्यकता है; क्योंकि उनके भेदको ठीक जानकर ही वह संसारसे ऊँचा उठ सकता है। किस प्रकारकी

बुद्धि और धृतिको धारण करके साधक संसारसे ऊँचा उठ सकता है और किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिके रहनेसे उसे ऊँचा उठनेमें बाधा लग सकती है—यह जानना साधकके लिये बहुत जरूरी है। इसलिये भगवान्ने उन दोनोंके भेद बताये हैं। भेद बतानेमें भगवान्का भाव यह है कि सात्त्विकी बुद्धि और धृतिसे ही साधक ऊँचा उठ सकता है, राजसी-तामसी बुद्धि और धृतिसे नहीं।]

'धनंजय'—जब पाण्डवोंने राजसूय यज्ञ किया था, तब अर्जुन अनेक राजाओंको जीतकर बहुत-सा धन लेकर आये थे। इसीसे उनका नाम 'धनंजय' पड़ा था। अब भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अपनी साधनामें सात्त्विकी बुद्धि और धृतिको ग्रहण करके गुणातीत तत्त्वकी प्राप्ति करना ही वास्तविक धन है; इसलिये तुम इस वास्तविक धनको धारण करो, इसीमें तुम्हारे 'धनंजय' नामकी सार्थकता है।

'बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु'—भगवान् कहते कि बुद्धि भी एक है और धृति भी एक है; परन्तु गुणोंकी प्रधानतासे उस बुद्धि और धृतिके भी सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीन-तीन भेद हो जाते हैं। उनका मैं ठीक-ठीक विवेचन करूँगा और थोड़ेमें बहुत विशेष बात कहूँगा, उनको तुम मन लगाकर, ध्यान देकर ठीक तरहसे सुनो।

धृति श्रोत्रादि करणोंमें नहीं आयी है। इसलिये भगवान् 'चैव' पदका प्रयोग करके कह रहे हैं कि जैसे बुद्धिके तीन भेद बताऊँगा, ऐसे ही धृतिके भी तीन भेद बताऊँगा। साधारण दृष्टिसे देखनेपर तो धृति भी बुद्धिका ही एक गुण

  • सांख्ययोगमें तो बुद्धि और धृतिकी खास आवश्यकता है ही; परमात्मप्राप्तिके अन्य जितने भी साधन हैं, उन सबमें भी बुद्धि और धृतिकी बड़ी भारी आवश्यकता है। इसलिये गीतामें बुद्धि और धृति—दोनोंको साथ-साथ कहा है; जैसे—'शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया' (६। २५), और 'बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च' (१८। ५१)।

१९५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

दीखती है। बुद्धिका एक गुण होते हुए भी धृति बुद्धिसे अलग और विलक्षण है; क्योंकि धृति स्वयं अर्थात् कर्तामें रहती है। उस धृतिके कारण ही मनुष्य बुद्धिका ठीक-ठीक उपयोग कर सकता है। धृति जितनी श्रेष्ठ अर्थात् सात्त्विकी होगी, साधककी (साधनमें) बुद्धि उतनी ही स्थिर रहेगी। साधनमें बुद्धिकी स्थिरताकी जितनी आवश्यकता है, उतनी आवश्यकता मनकी स्थिरताकी नहीं है। हाँ, एक अंशमें अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्तिमें मनकी स्थिरताकी आवश्यकता है; परन्तु पारमार्थिक उन्नतिमें तो बुद्धिके अपने उद्देश्यपर स्थिर रहनेकी ही ज्यादा आवश्यकता है।

साधककी बुद्धि भी सात्त्विकी हो और धृति भी सात्त्विकी हो, तभी साधक अपने साधनमें दृढ़तासे लगा रहेगा। इसलिये इन दोनोंके ही भेद जाननेकी आवश्यकता है।

‘पृथक्त्वेन’ —उनके भेद अलग-अलग ठीक तरहसे कहुँगा अर्थात् बुद्धि और धृतिके विषयोंमें भी क्या-क्या भेद होते हैं, उनको भी कहुँगा।

‘प्रोच्यमानमशेषेण’ —भगवान् कहते हैं कि बुद्धि और धृतिके विषयमें जाननेकी जो-जो आवश्यक बातें हैं, उन सबको मैं पूरा-पूरा कहुँगा, जिसके बाद फिर जानना बाकी नहीं रहेगा।

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विकी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्यं भयाभये ।

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन !कार्याकार्यं= कर्तव्य और= और
या= जोअकर्तव्यको,मोक्षम्= मोक्षको
(बुद्धि)भयाभये= भय औरवेत्ति= जानती है,
प्रवृत्तिम्= प्रवृत्तिअभयकोसा= वह
= और= तथाबुद्धिः= बुद्धि
निवृत्तिम्= निवृत्तिको,बन्धम्= बन्धनसात्त्विकी= सात्त्विकी है।

व्याख्या—‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च’ —साधकमात्रकी प्रवृत्ति और निवृत्ति—ये दो अवस्थाएँ होती हैं। कभी वह संसारका काम-धंधा करता है, तो यह प्रवृत्ति-अवस्था है और कभी संसारका काम-धंधा छोड़कर एकान्तमें भजन-ध्यान करता है, तो यह निवृत्ति-अवस्था है। परन्तु इन दोनोंमें सांसारिक कामनासहित प्रवृत्ति और वासनासहित निवृत्ति—ये दोनों ही अवस्थाएँ ‘प्रवृत्ति’ हैं अर्थात् संसारमें लगानेवाली हैं तथा सांसारिक कामनारहित प्रवृत्ति और वासनारहित निवृत्ति—ये दोनों ही अवस्थाएँ ‘निवृत्ति’ हैं अर्थात् परमात्माकी तरफ ले जानेवाली हैं। इसलिये साधक इनको ठीक-ठीक जानकर कामना-वासनारहित

प्रवृत्ति और निवृत्तिको ही ग्रहण करें।

वास्तवमें गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो कामना-वासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति भी यदि अपने सुख, आराम आदिके लिये की जायँ तो वे दोनों ही ‘प्रवृत्ति’ हैं; क्योंकि वे दोनों ही बाँधनेवाली हैं अर्थात् उनसे अपना व्यक्तित्व नहीं मिटता। परन्तु यदि कामना-वासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों केवल दूसरोंके सुख, आराम और हितके लिये ही की जायँ, तो वे दोनों ही ‘निवृत्ति’ हैं; क्योंकि उन दोनोंसे ही अपना व्यक्तित्व नहीं रहता। वह व्यक्तित्व कब नहीं रहता ? जब प्रवृत्ति और निवृत्ति जिसके प्रकाशसे प्रकाशित होती हैं तथा जो प्रवृत्ति और निवृत्तिसे रहित है, उस प्रकाशक अर्थात्

१-बुद्धिके द्वारा तो अपना ध्येय (लक्ष्य) ठीक-ठीक समझमें आता है और धृतिके द्वारा कर्ता स्वयं उस लक्ष्यपर दृढ़ रहता है। साधक पहले कैसे ही भावों और आचरणोंवाला अर्थात् पापी-से-पापी और दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न रहा हो, वह भी ‘मुझे तो परमात्मप्राप्ति ही करनी है’—इस उद्देश्यपर दृढ़ रहता है, तो उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका तीसवाँ श्लोक)।

२-प्रवृत्तिको छोड़कर कोई एकान्तमें भजन-ध्यान करता है तो वहाँ उसके सामने द्रव्य, पदार्थ तो नहीं हैं, पर ‘लोग मेरेको ज्ञानी, ध्यानी, साधक समझेंगे, तो मेरा आदर-सत्कार होगा’ इस प्रकार भीतर एक सूक्ष्म इच्छा रहती है, जिसे ‘वासना’ कहते हैं।

श्लोक ३० ]

  • साधक-संजीवनी *

११५५

तत्त्वकी प्रापतिके उद्देश्यसे ही प्रवृत्ति और निवृत्ति की जाय। प्रवृत्ति तो की जाय प्राणिमात्रकी सेवाके लिये और निवृत्ति की जाय परम विश्राम अर्थात् स्वरूप-स्थितिके लिये।

‘कार्याकार्य’ —शास्त्र, वर्ण, आश्रमकी मर्यादाके अनुसार जो काम किया जाता है, वह ‘कार्य’ है और शास्त्र आदिकी मर्यादासे विरुद्ध जो काम किया जाता है वह ‘अकार्य’ है।

जिसको हम कर सकते हैं, जिसको जरूर करना चाहिये और जिसको करनेसे जीवका जरूर कल्याण होता है, वह ‘कार्य’ अर्थात् कर्तव्य कहलाता है और जिसको हमें नहीं करना चाहिये तथा जिससे जीवका बन्धन होता है, वह ‘अकार्य’ अर्थात् अकर्तव्य कहलाता है। जिसको हम नहीं कर सकते, वह अकर्तव्य नहीं कहलाता, वह तो अपनी असामर्थ्य है।

‘भयाभये’ —भय और अभयके कारणको देखना चाहिये। जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका अनिष्ट होनेकी सम्भावना है, वह कर्म ‘भय’ अर्थात् भयदायक है और जिस कर्मसे अभी और परिणाममें अपना और दुनियाका हित होनेकी सम्भावना है, वह कर्म ‘अभय’ अर्थात् सबको अभय करनेवाला है। मनुष्य जब करनेलायक कार्यसे च्युत होकर अकार्यमें प्रवृत्त होता है, तब उसके मनमें अपनी मान-बड़ाईकी हानि और निन्दा-अपमान होनेकी आशंकासे भय पैदा होता है। परन्तु जो अपनी मर्यादासे कभी विचलित नहीं होता, अपने मनसे किसीका भी अनिष्ट नहीं चाहता और केवल परमात्मामें ही लगा रहता है, उसके मनमें सदा अभय बना रहता है। यह अभय ही मनुष्यको सर्वथा अभयपद—परमात्माको प्राप्त करा देता है।

‘बन्धं मोक्षं च या वेत्ति’ —जो बाहरसे तो यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत आदि उत्तम-से-उत्तम कार्य करता है; परन्तु भीतरसे असत्, जड़, नाशवान् पदार्थोंको और स्वर्ग आदि लोकोंको चाहता है, उसके लिये वे सभी कर्म ‘बन्ध’ अर्थात् बन्धनकारक ही हैं। केवल परमात्मासे ही सम्बन्ध रखना, परमात्माके सिवाय कभी किसी अवस्थामें असत् संसारके साथ लेशमात्र

भी सम्बन्ध न रखना ‘मोक्ष’ अर्थात् मोक्षदायक है।

अपनेको जो वस्तुएँ नहीं मिली हैं, उनकी कामना होनेसे मनुष्य उनके अभावका अनुभव करता है। वह अपनेको उन वस्तुओंके परतन्त्र मानता है और वस्तुओंके मिलनेपर अपनेको स्वतन्त्र मानता है। वह समझता तो यह है कि मेरे पास वस्तुएँ होनेसे मैं स्वतन्त्र हो गया हूँ, पर हो जाता है उन वस्तुओंके परतन्त्र! वस्तुओंके अभाव और वस्तुओंके भाव—इन दोनोंकी परतन्त्रतामें इतना ही फर्क पड़ता है कि वस्तुओंके अभावमें परतन्त्रता दीखती है, खटकती है और वस्तुओंके होनेपर वस्तुओंकी परतन्त्रता परतन्त्रताके रूपमें दीखती ही नहीं; क्योंकि उस समय मनुष्य अन्धा हो जाता है। परन्तु हैं ये दोनों ही परतन्त्रता, और परतन्त्रता ही बन्धन है। अभावकी परतन्त्रता प्रकट विष है और भावकी परतन्त्रता छिपा हुआ मीठा विष है, पर हैं दोनों ही विष। विष तो मारनेवाला ही होता है।

निष्कर्ष यह निकला कि सांसारिक वस्तुओंकी कामनासे ही बन्धन होता है और परमात्माके सिवाय किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, देश, काल आदिकी कामना न होनेसे मुक्ति होती है*। यदि मनमें कामना है तो वस्तु पासमें हो तो बन्धन और पासमें न हो तो बन्धन! यदि मनमें कामना नहीं है तो वस्तु पासमें हो तो मुक्ति और पासमें न हो तो मुक्ति!

‘बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी’ —इस प्रकार जो प्रवृत्ति-निवृत्ति, कार्य-अकार्य, भय-अभय और बन्ध-मोक्षके वास्तविक तत्त्वको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।

इनके वास्तविक तत्त्वको जानना क्या है? प्रवृत्ति-निवृत्ति, कार्य-अकार्य, भय-अभय और बन्ध-मोक्ष—इनको गहरी रीतिसे समझकर, जिसके साथ वास्तवमें हमारा सम्बन्ध नहीं है, उस संसारके साथ सम्बन्ध न मानना और जिसके साथ हमारा स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, ऐसे (प्रवृत्ति-निवृत्ति आदिके आश्रय तथा प्रकाशक) परमात्माको तत्त्वसे ठीक-ठीक जानना—यही सात्त्विकी बुद्धिके द्वारा वास्तविक तत्त्वको ठीक-ठीक जानना है।

परिशिष्ट भाव —प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको—दोनोंको जाननेका तात्पर्य संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे ही है। अगर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद न हो तो वह जानना वास्तवमें जानना नहीं है, प्रत्युत सीखना है।

  • एक कामना होती है और एक आवश्यकता होती है। संसारकी कामना होती है और परमात्माकी आवश्यकता। कामनाकी कभी पूर्ति होती ही नहीं, उसकी तो निवृत्ति होती है, पर आवश्यकताकी पूर्ति ही होती है।

परमात्माकी आवश्यकता भी संसारकी कामना होनेसे ही पैदा होती है। कामनाका अत्यन्त अभाव होनेपर आवश्यकता रहती ही नहीं अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।

१९५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

गीताका 'सात्त्विक' गुणातीत करनेवाला, संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेवाला है। इसलिये इसमें बन्धन और मोक्षतकका विचार होता है—'बन्धं मोक्षं च या वेत्ति'। सात्त्विकी बुद्धिमें वह विवेक होता है, जो तत्त्वज्ञानमें परिणत होता है। विवेकवती बुद्धि 'ब्रह्मलोककी प्राप्तितक सब बन्धन है'—ऐसा जानती है।

सम्बन्ध—अब राजसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।

अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥

पार्थ= हे पार्थ !अधर्मम्= अधर्मकोअयथावत्= ठीक
यया= (मनुष्य)= तथातरहसे नहीं
जिसकेकार्यम्= कर्तव्यप्रजानाति= जानता,
द्वारा= औरसा= वह
धर्मम्= धर्मअकार्यम्= अकर्तव्यकोबुद्धिः= बुद्धि
= औरएव= भीराजसी= राजसी है।

व्याख्या —'यया धर्ममधर्मं च'—शास्त्रोंने जो कुछ भी विधान किया है, वह 'धर्म' है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा दी है और जिससे परलोकमें सद्गति होती है, वह धर्म है। शास्त्रोंने जिसका निषेध किया है, वह 'अधर्म' है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा नहीं दी है और जिससे परलोकमें दुर्गति होती है, वह अधर्म है। जैसे, अपने माता-पिता, बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेमें, दूसरोंको सुख पहुँचानेमें, दूसरोंका हित करनेकी चेष्टामें अपने तन, मन, धन, योग्यता, पद, अधिकार, सामर्थ्य आदिको लगा देना 'धर्म' है। ऐसे ही कुओं-बावड़ी खुदवाना, धर्मशाला-औषधालय बनवाना, प्याऊ-सदावर्त चलाना; देश, ग्राम, मोहल्लेके अनाथ तथा गरीब बालकोंकी और समाजकी उन्नतिके लिये अपनी कहलानेवाली चीजोंको आवश्यकतानुसार उनकी ही समझकर निष्कामभावसे उदारतापूर्वक खर्च करना 'धर्म' है। इसके विपरीत अपने स्वार्थ, सुख, आरामके लिये दूसरोंकी धन-सम्पत्ति, हक, पद, अधिकार छीनना; दूसरोंका अपकार, अहित, हत्या आदि करना; अपने तन, मन, धन, योग्यता, पद, अधिकार आदिके द्वारा दूसरोंको दुःख देना 'अधर्म' है।

वास्तवमें धर्म वह है, जो जीवका कल्याण कर दे और अधर्म वह है, जो जीवको बन्धनमें डाल दे।

'कार्यं चाकार्यमेव च'—वर्ण, आश्रम, देश, काल, लोक-मर्यादा, परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रोंने हमारे लिये जिस कर्मको करनेकी आज्ञा दी है, वह कर्म हमारे लिये 'कर्तव्य' है। अवसरपर प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन

न करना तथा न करनेलायक कामको करना 'अकर्तव्य' है। जैसे, भिक्षा माँगना; यज्ञ, विवाह आदि कराना और उनमें दान-दक्षिणा लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये तो कर्तव्य हैं, पर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये अकर्तव्य हैं। इसी प्रकार शास्त्रोंने जिन-जिन वर्ण और आश्रमोंके लिये जो-जो कर्म बताये हैं, वे सब उन-उनके लिये कर्तव्य हैं और जिनके लिये निषेध किया है, उनके लिये वे सब अकर्तव्य हैं।

जहाँ नौकरी करते हैं, वहाँ ईमानदारीसे अपना पूरा समय देना, कार्यको सुचारूरूपसे करना, जिस तरहसे मालिकका हित हो, ऐसा काम करना—ये सब कर्मचारियोंके लिये 'कर्तव्य' हैं। अपने स्वार्थ, सुख और आराममें फँसकर कार्यमें पूरा समय न लगाना, कार्यको तत्परतासे न करना, थोड़ी-सी घूस (रिश्वत) मिलनेसे मालिकका बड़ा नुकसान कर देना, दस-पाँच रुपयोंके लिये मालिकका अहित कर देना—ये सब कर्मचारियोंके लिये 'अकर्तव्य' हैं।

राजकीय जितने अफसर हैं, उनको राज्यका प्रबन्ध करनेके लिये, सबका हित करनेके लिये ही ऊँचे पदपर रखा जाता है। इसीलिये अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके जिस प्रकार सब लोगोंका हित हो सकता है, सबको सुख, आराम, शान्ति मिल सकती है—ऐसे कामोंको करना उनके लिये 'कर्तव्य' है। अपने तुच्छ स्वार्थमें आकर राज्यका नुकसान कर देना, लोगोंको दुःख देना आदि उनके लिये 'अकर्तव्य' है।

श्लोक ३२ ]

  • साधक-संजीवनी *

११५७

सात्त्विकी बुद्धिमें कही हुई प्रवृत्ति-निवृत्ति, भय-अभय और बन्ध-मोक्षको भी यहाँ 'एव च' पदोंसे ले लेना चाहिये।

'अथयावत्यजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी'— राग होनेसे राजसी बुद्धिमें स्वार्थ, पक्षपात, विषमता आदि दोष आ जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए बुद्धि धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य, भय-अभय, बन्ध-मोक्ष आदिके वास्तविक तत्त्वको ठीक-ठीक नहीं जान सकती। अतः किस वर्ण-आश्रमके लिये किस परिस्थितिमें कौन-सा धर्म कहा जाता है और कौन-सा अधर्म कहा जाता है? वह धर्म किस वर्ण-आश्रमके लिये कर्तव्य हो जाता है और किसके लिये अकर्तव्य हो जाता है; किससे भय होता है और किससे मनुष्य अभय हो जाता है? इन बातोंको जो बुद्धि ठीक-ठीक नहीं जान सकती, वह बुद्धि राजसी है।

जब सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया, पदार्थ आदिमें राग (आसक्ति) हो जाता है, तो वह राग दूसरोंके प्रति द्वेष पैदा करनेवाला हो जाता है। फिर जिसमें राग हो जाता है उसके दोषोंको और जिसमें द्वेष हो जाता है, उसके गुणोंको मनुष्य नहीं देख सकता। राग और

परिशिष्ट भाव— जो धर्म और अधर्मको तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बन्धन और मोक्षको कैसे जानेगा? नहीं जान सकता। बुद्धि रागात्मिका होनेसे वह इनको ठीक तरहसे नहीं जानता; क्योंकि रागकी मुख्यता होनेसे वह विवेकको महत्त्व नहीं दे पाता। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका रंग चढ़नेसे उसका विवेक लुप्त हो जाता है।

सम्बन्ध—अब तामसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन!अधर्मम्= अधर्मकोसर्वार्थान्= सम्पूर्ण चीजोंको
तमसा= तमोगुणसेधर्मम्= धर्म—विपरीतान्= उलटा
आवृता= घिरी हुईइति= ऐसा(मान लेती है),
या= जोमन्यते= मान लेती हैसा= वह
बुद्धिः= बुद्धि= औरतामसी= तामसी है।

व्याख्या— 'अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसावृता'— ईश्वरकी निन्दा करना; शास्त्र, वर्ण, आश्रम और लोक-मर्यादाके विपरीत काम करना; माता-पिताके साथ अच्छा बर्ताव न करना; सन्त-महात्मा, गुरु-आचार्य आदिका अपमान करना; झूठ, कपट, बेईमानी, जालसाजी, अभक्ष्य भोजन, परस्त्रीगमन आदि शास्त्रनिषिद्ध पाप-कर्मोंको धर्म

द्वेष—इन दोनोंमें संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। संसारके साथ सम्बन्ध जुड़नेपर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। ऐसे ही परमात्मासे अलग रहनेपर मनुष्य परमात्माको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे अभिन्न होकर ही परमात्माको जान सकता है। वह अभिन्नता चाहे प्रेमसे हो, चाहे ज्ञानसे हो।

परमात्मासे अभिन्न होनेमें सात्त्विकी बुद्धि ही काम करती है; क्योंकि सात्त्विकी बुद्धिमें विवेकशक्ति जाग्रत् रहती है। परन्तु राजसी बुद्धिमें वह विवेकशक्ति रागके कारण धुँधली-सी रहती है। जैसे जलमें मिट्टी घुल जानेसे जलमें स्वच्छता, निर्मलता नहीं रहती, ऐसे ही बुद्धिमें रजोगुण आ जानेसे बुद्धिमें उतनी स्वच्छता, निर्मलता नहीं रहती। इसलिये धर्म-अधर्म आदिको समझनेमें कठिनता पड़ती है। राजसी बुद्धि होनेपर मनुष्य जिस-किसी विषयमें प्रवेश करता है, उसको उस विषयको समझनेमें कठिनता पड़ती है। उस विषयके गुण-दोषोंको ठीक-ठीक समझे बिना वह ग्रहण और त्यागको अपने आचरणमें नहीं ला सकता अर्थात् वह ग्राह्य वस्तुका ग्रहण नहीं कर सकता और त्याज्य वस्तुका त्याग नहीं कर सकता।

मानना—यह सब अधर्मको 'धर्म' मानना है। अपने शास्त्र, वर्ण, आश्रमकी मर्यादामें चलना; माता-पिताकी आज्ञाका पालन करना तथा उनकी तन-मन-धनसे सेवा करना; संत-महात्माओंके उपदेशोंके अनुसार अपना जीवन बनाना; धार्मिक ग्रन्थोंका पठन-पाठन करना; दूसरोंकी सेवा-उपकार करना; शुद्ध-पवित्र भोजन करना आदि

१५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

शास्त्रविहित कर्मोंको उचित न मानना—यह धर्मको 'अधर्म' मानना है।

तामसी बुद्धिवाले मनुष्योंके विचार होते हैं कि 'शास्त्रकारोंने, ब्राह्मणोंने अपनेको बड़ा बता दिया और तरह-तरहके नियम बनाकर लोगोंको बाँध दिया, जिससे भारत परतन्त्र हो गया; जबतक ये शास्त्र रहेंगे, ये धार्मिक पुस्तकें रहेंगी, तबतक भारतका उत्थान नहीं होगा, भारत परतन्त्रताकी बेड़ीमें ही जकड़ा हुआ रहेगा, आदि-आदि। इसलिये वे मर्यादाओंको तोड़नेमें ही धर्म मानते हैं।

'सर्वार्थान्विपरीतांश्च' —आत्माको स्वरूप न मानकर शरीरको ही स्वरूप मानना; ईश्वरको न मान करके दृश्य जगत्को ही सच्चा मानना; दूसरोंको तुच्छ समझकर अपनेको ही सबसे बड़ा मानना; दूसरोंको मूर्ख समझकर

परिशिष्ट भाव —जिनकी बुद्धि तामसी होती है, उनको व्यवहारमें और परमार्थमें सब जगह उलटा ही दीखता है। इसका उदाहरण वर्तमान समयमें स्पष्ट दीखनेमें आ रहा है। जैसे—पशुओंके विनाशको 'मांसका उत्पादन' कहा जाता है! गर्भपातरूपी महापापको और मनुष्यकी उत्पादक शक्तिके विनाशको 'परिवार-कल्याण' कहा जाता है! स्त्रियोंकी उच्छृंखलताको, मर्यादाके नाशको 'नारी-मुक्ति' कहा जाता है! पहले स्त्री घरकी स्वामिनी (गृहलक्ष्मी) होती थी, अब घरसे बाहर अनेक पुरुषोंकी दासता (नौकरी) करनेको 'नारीकी स्वाधीनता' कहा जाता है! इस प्रकार पराधीनताको स्वाधीनताका लक्षण माना जाता है। नैतिक पतनको उन्नतिकी संज्ञा दी जाती है। पशुताको सभ्यताका चिह्न माना जाता है। धार्मिकताको साम्प्रदायिकता और धर्मविरुद्धको धर्म-निरपेक्ष कहा जाता है। जब विनाशकाल समीप आता है, तभी ऐसी विपरीत, तामसी बुद्धि पैदा होती है—'विनाशकाले विपरीतबुद्धिः '; 'बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ' (गीता २।६३)।

सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विकी धृतिके लक्षण बताते हैं।

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।

योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥

पार्थ= हे पार्थ!द्वाराधारयते= धारण करता है
योगेन= समतासे युक्त(मनुष्य)अर्थात्
यया= जिसमनःप्राणेन्द्रिय-संयम रखता है,
अव्यभि-क्रियाः= मन, प्राणसा
चारिण्या= अव्यभिचारिणीऔर इन्द्रियोंकीधृतिः
धृत्या= धृतिकेक्रियाओंकोसात्त्विकी

व्याख्या—'धृत्या यया धारयते'... 'योगेनाव्यभिचारिण्या'—सांसारिक लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख, आदर-निरादर, सिद्धि-असिद्धिमें सम रहनेका नाम 'योग' (समता) है।

परमात्माको चाहनेके साथ-साथ इस लोकमें सिद्धि, असिद्धि, वस्तु, पदार्थ, सत्कार, पूजा आदि और परलोकमें

अपनेको ही पढ़ा-लिखा, विद्वान् समझना; जितने संत-महात्मा हो गये हैं, उनकी मान्यताओंसे अपनी मान्यताको श्रेष्ठ मानना; सच्चे सुखकी तरफ ध्यान न देकर वर्तमानमें मिलनेवाले संयोगजन्य सुखको ही सच्चा मानना; न करनेयोग्य कार्यको ही अपना कर्तव्य समझना; अपवित्र वस्तुओंको ही पवित्र मानना—यह सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मानना है।

'बुद्धिः सा पार्थ तामसी' —तमोगुणसे आवृत जो बुद्धि अधर्मको धर्म, धर्मको अधर्म और अच्छेको नुरा, सुलटेको उलटा मानती है, वह बुद्धि तामसी है। यह तामसी बुद्धि ही मनुष्यको अधोगतिमें ले जानेवाली है—'अधोगच्छन्ति तामसाः ' (गीता १४।१८)। इसलिये अपना उद्धार चाहनेवालेको इसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये।

सुख-भोगको चाहना 'व्यभिचार' है और इस लोक तथा परलोकके सुख, भोग, वस्तु, पदार्थ आदिकी किंचिन्मात्र भी इच्छा न रखकर केवल परमात्माको चाहना 'अव्यभिचार' है। यह अव्यभिचार जिसमें होता है, वह धृति 'अव्यभिचारिणी' कहलाती है।

अपनी मान्यता, सिद्धान्त, लक्ष्य, भाव, क्रिया, वृत्ति,

श्लोक ३४ ]

  • साधक-संजीवनी *

११५९

विचार आदिको दृढ़, अटल रखनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। योग अर्थात् समतासे युक्त इस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है। मनमें राग-द्वेषको लेकर होनेवाले चिन्तनसे रहित होना, मनको जहाँ लगाना चाहें, वहाँ लग जाना और जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाना आदि मनकी क्रियाओंको धृतिके द्वारा धारण करना है।

प्राणायाम करते हुए रेचकमें पूरक न होना, पूरकमें रेचक न होना और बाह्य कुम्भकमें पूरक न होना तथा आभ्यन्तर कुम्भकमें रेचक न होना अर्थात् प्राणायामके

परिशिष्ट भाव —जीव परमात्माका अंश है, इसलिये परमात्माके सिवाय कहीं भी जाना 'व्यभिचार' है और केवल परमात्माकी तरफ चलना 'अव्यभिचार' है। केवल परमात्माकी तरफ चलनेवाली धृति 'अव्यभिचारिणी धृति' है।

सम्बन्ध—अब राजसी धृतिके लक्षण बताते हैं।

यया तु धर्मकामार्थाभ्युत्था धारयतेऽर्जुन।

प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥

तु = परन्तु पार्थ = हे पृथानन्दन अर्जुन = अर्जुन! फलाकाङ्क्षी = फलकी इच्छावाला मनुष्य

यया = जिस धृत्या = धृतिके द्वारा धर्मकामार्थान् = धर्म, काम ( भोग ) और धनको प्रसङ्गेन = अत्यन्त

आसक्तिपूर्वक धारयते = धारण करता है, सा = वह धृतिः = धृति राजसी = राजसी है।

व्याख्या —'यया तु धर्मकामार्थाभ्युत्था ..... सा पार्थ राजसी'—राजसी धारण-शक्तिके मनुष्य अपनी कामनापूर्तिके लिये धर्मका अनुष्ठान करता है, काम अर्थात् भोग-पदार्थोंको भोगता है और अर्थ अर्थात् धनका संग्रह करता है।

अमावस्या, पूर्णिमा, व्यतिपात आदि अवसरोंपर दान करना, तीर्थोंमें अन्नदान करना; पर्वोंपर उत्सव मनाना; तीर्थयात्रा करना; धार्मिक संस्थाओंमें चन्दा-चिढ़ाके रूपमें कुछ चढ़ा देना; कभी कथा-कीर्तन, भागवत-सप्ताह आदि करवा लेना—यह सब केवल कामनापूर्तिके लिये करना ही 'धर्म' को धारण करना है*।

सांसारिक भोग-पदार्थ तो प्राप्त होने ही चाहिये;

नियमसे विरुद्ध श्वास-प्रश्वासोंका न होना ही धृतिके द्वारा प्राणोंकी क्रियाओंको धारण करना है।

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन विषयोंको लेकर इन्द्रियोंका उच्छृंखल न होना, जिस विषयमें जैसे प्रवृत्त होना चाहें, उसमें प्रवृत्त होना और जिस विषयसे निवृत्त होना चाहें, उससे निवृत्त होना ही धृतिके द्वारा इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करना है।

'धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी'—जिस धृतिसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंपर आधिपत्य हो जाता है, हे पार्थ! वह धृति सात्त्विकी है।

क्योंकि भोग-पदार्थोंसे ही सुख मिलता है, संसारमें कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जो भोग-पदार्थोंकी कामना न करता हो; यदि मनुष्य भोगोंकी कामना न करे तो उसका जीवन ही व्यर्थ है—ऐसी धारणाके साथ भोग-पदार्थोंकी कामनापूर्तिमें ही लगे रहना 'काम' को धारण करना है।

धनके बिना दुनियामें किसीका भी काम नहीं चलता; धनसे ही धर्म होता है; यदि पासमें धन न हो तो आदमी धर्म कर ही नहीं सकता; जितने आयोजन किये जाते हैं, वे सब धनसे ही तो होते हैं; आज जितने आदमी बड़े कहलाते हैं, वे सब धनके कारण ही तो बड़े बने हैं; धन होनेसे ही लोग आदर-सम्मान करते हैं; जिसके पास धन नहीं होता, उसको संसारमें कोई पूछता ही नहीं; अतः धनका खूब

  • धर्मका अनुष्ठान धनके लिये किया जाय और धनका खर्चा धर्मके लिये किया जाय, तो धर्मसे धन और धनसे धर्म—दोनों परस्पर बढ़ते रहते हैं। परन्तु धर्मका अनुष्ठान और धनका खर्चा केवल कामनापूर्तिके लिये ही किया जाय तो धर्म ( पुण्य ) और धन—दोनों ही कामनापूर्ति करके नष्ट हो जाते हैं।

११६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

संग्रह करना चाहिये—इस प्रकार धनमें ही रचे-पचे रहना 'अर्थ' को धारण करना है। संसारमें अत्यन्त राग (आसक्ति) होनेके कारण राजस पुरुष शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार जो कुछ भी शुभ काम करता है, उसमें उसकी

यही कामना रहती है कि इस कर्मका मुझे इस लोकमें सुख, आराम, मान, सत्कार आदि मिले और परलोकमें सुख-भोग मिले। ऐसे फलकी कामनावाले तथा संसारमें अत्यन्त आसक्त मनुष्यकी धारण-शक्ति राजसी होती है।

सम्बन्ध—अब तामसी धृतिके लक्षण बताते हैं।

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।

न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥

पार्थ= हे पार्थ !भयम्= भय,विमुञ्चति= छोड़ता
दुर्मेधाः= दुष्ट
बुद्धिवाला
मनुष्यशोकम्= चिन्ता,अर्थात्धारण
यया= जिस धृतिकेविषादम्= दुःखकिये रहता है,
द्वारा= औरसा= वह
स्वप्नम्= निद्रा,मदम्= घमण्डकोधृतिः= धृति
एव= भीतामसी= तामसी है।
= नहीं

व्याख्या—'यया स्वप्नं भयं'... सा पार्थ तामसी'—तामसी धारण-शक्तिके द्वारा मनुष्य ज्यादा निद्रा, बाहर और भीतरका भय, चिन्ता, दुःख और घमण्ड—इनका त्याग नहीं करता, प्रत्युत इन सबमें रचा-पचा रहता है। वह कभी ज्यादा नींदमें पड़ा रहता है, कभी मृत्यु, बीमारी, अपयश, अपमान, स्वास्थ्य, धन आदिके भयसे भयभीत होता रहता है, कभी शोक-चिन्तामें डूबा रहता है, कभी दुःखमें मग्न रहता है और कभी अनुकूल पदार्थोंके मिलनेसे घमण्डमें चूर रहता है।

निद्रा, भय, शोक आदिके सिवाय प्रमाद, अभिमान, दम्भ, द्वेष, ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंको तथा हिंसा, दूसरोंका अपकार करना, उनको कष्ट देना, उनके धनका किसी तरहसे अपहरण करना आदि दुराचारोंको भी 'एव च' पदोंसे मान लेना चाहिये।

इस प्रकार निद्रा, भय आदिको और दुर्गुण-दुराचारोंको पकड़े रहनेवाली अर्थात् उनको न छोड़नेवाली धृति तामसी होती है।

भगवान्ने तैत्तिरीय-चौतीसवें श्लोकोंमें 'धारयते' पदसे सात्त्विक और राजस मनुष्यके द्वारा क्रमशः सात्त्विकी और राजसी धृतिको धारण करनेकी बात कही है; परन्तु यहाँ तामस मनुष्यके द्वारा तामसी धृतिको धारण करनेकी बात नहीं कही। कारण यह है कि जिसकी बुद्धि बहुत ही दुष्ट है, जिसकी बुद्धिमें अज्ञता, मूढ़ता भरी हुई है, ऐसा मलिन

अन्तःकरणवाला तामस मनुष्य निद्रा, भय, शोक आदि भावोंको छोड़ता ही नहीं। वह उनमें स्वाभाविक ही रचा-पचा रहता है।

सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन तीनों धृतियोंके वर्णनमें राजसी और तामसी धृतियोंमें तो क्रमशः 'फलाकाङ्क्षी' और 'दुर्मेधाः' पदसे कर्ताका उल्लेख किया है, पर सात्त्विकी धृतियोंमें कर्ताका उल्लेख किया ही नहीं। इसका कारण यह है कि सात्त्विकी धृतियोंमें कर्ता निलिप्त रहता है अर्थात् उसमें कर्तृत्वका लेप नहीं होता; परन्तु राजसी और तामसी धृतियोंमें कर्ता लिप्त होता है।

विशेष बात

मानवशरीर विवेक-प्रधान है। मनुष्य जो कुछ करता है, उसे वह विचारपूर्वक ही करता है। वह ज्यों ही विचारपूर्वक काम करता है, त्यों ही विवेक ज्यादा स्पष्ट प्रकट होता है। सात्त्विक मनुष्यकी धृति- (धारणशक्ति-) में यह विवेक साफ-साफ प्रकट होता है कि मुझे तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। राजस मनुष्यकी धृतियोंमें संसारके पदार्थों और भोगोंमें रागकी प्रधानता होनेके कारण विवेक वैसा स्पष्ट नहीं होता; फिर भी इस लोकमें सुख-आराम, मान-आदर मिले और परलोकमें अच्छी गति मिले, भोग मिले—इस विषयमें विवेक काम करता है और आचरण भी मर्यादाके अनुसार ही होता है। परन्तु तामस मनुष्यकी

श्लोक ३६-३७ ]

  • साधक-संजीवनी *

११६१

धृतिमें विवेक बिलकुल ही दब जाता है। तामसभावोंमें उसकी इतनी दृढ़ता हो जाती है कि उसे उन भावोंको धारण करनेकी आवश्यकता ही नहीं रहती। वह तो निद्रा, भय आदि तामसभावोंमें ही रचा-पचा रहता है।

पारमार्थिक मार्गमें क्रिया इतना काम नहीं करती, जितना अपना उद्देश्य काम करता है। स्थूल क्रियाकी प्रधानता स्थूलशरीरमें, चिन्तनकी प्रधानता सूक्ष्मशरीरमें और स्थिरताकी प्रधानता कारणशरीरमें होती है, यह सब क्रिया ही है। 'क्रिया तो शरीरोंमें होती है, पर मेरेको तो केवल पारमार्थिक मार्गपर ही चलना है'—ऐसा उद्देश्य या लक्ष्य स्वयं-(चेतनस्वरूप-) में ही रहता है। स्वयंमें जैसा

लक्ष्य होता है, उसके अनुसार स्वतः क्रियाएँ होती हैं। जो चीज स्वयंमें रहती है, वह कभी बदलती नहीं। उस लक्ष्यकी दृढ़ताके लिये सात्त्विकी बुद्धिकी आवश्यकता है और बुद्धिके निश्चयको अटल रखनेके लिये सात्त्विकी धृतिकी आवश्यकता है। इसलिये यहाँ तीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक कुल छः श्लोकोंमें छः बार 'पार्थ' सम्बोधनका प्रयोग करके भगवान् साधकमात्रके प्रतिनिधि अर्जुनको चेताते हैं कि 'पुथानन्दन! लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियोंके लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्यको दृढ़तासे धारण किये रहो। अपनेमें कभी भी राजस-तामसभाव न आने पायें—इसके लिये निरन्तर सजग रहो!'

परिशिष्ट भाव —निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख, घमण्ड आदि दोष तो रहेंगे ही, दूर हो ही नहीं सकते—ऐसा निश्चय करनेवाले मनुष्य 'दुर्मेधा' हैं। ऐसे मनुष्योंका दोषोंको छोड़नेकी तरफ खयाल ही नहीं जाता, छोड़नेकी हिम्मत ही नहीं होती, प्रत्युत वे इनको स्वाभाविक ही धारण किये रहते हैं।

अधिक निद्रा ही बाधक होती है। आवश्यक, यथायोग्य निद्रा बाधक नहीं होती (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ-सत्रहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—मनुष्योंकी कर्मोंमें प्रवृत्ति सुखके लोभसे ही होती है अर्थात् सुख कर्म-संग्रहमें हेतु है। अतः आगेके चार श्लोकोंमें सुखके भेद बताते हैं।

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्भमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥

भरतर्षभ= हे भरतवंशियोंमेंरमते= रमण होता हैआसक्तिके कारण)
श्रेष्ठ= और (जिससे)अग्रे
अर्जुन!दुःखान्तम्= दुःखोंका अन्तविषम्
इदानीम्= अबनिगच्छति= हो जाता है,इव
त्रिविधम्= तीन प्रकारकेतत्= ऐसा वह
सुखम्= सुखकोआत्मबुद्धि-परिणामे
तु= भी (तुम)प्रसादजम्= परमात्मविषयकअमृतोपमम्
मे= मुझसेबुद्धिकी प्रसन्नतासे
शृणु= सुनो।यत्= पैदा होनेवालातत्
यत्र= जिसमेंसुखम्= जोसात्त्विकम्
अभ्यासात्= अभ्यासे= सुख (सांसारिक)प्रोक्तम्

व्याख्या—'भरतर्षभ' —इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! तुम राजस-तामस सुखोंमें लुब्ध, मोहित होनेवाले नहीं हो; क्योंकि

तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है; क्योंकि स्वर्गकी उर्वशी-जैसी सुन्दरी अप्सराको भी

१६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है; क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है, उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम 'गुडाकेश' हुआ है।

'सुखं तु इदानीम्' —ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृतिके तीन-तीन भेद बतानेके बाद यहाँ 'तु' पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं, उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्न-बाधा है, तो वह है—सुखकी इच्छा।

सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य—ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय, तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं, अगर समाधिक सुख भी लिया जाय, तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है—'सुखसंगेन बध्नाति' (गीता १४।६)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें? वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता, प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता—पौंचवें अध्यायका इक्कीसवाँ और छठे अध्यायका इक्कीसवाँ तथा अठ्ठाईसवाँ श्लोक)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय सुख स्वतः—स्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष ख्याल करानेके लिये भगवान् यहाँ 'तु' पदका प्रयोग करते हैं।

यहाँ 'इदानीम्' कहनेका तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते हैं; अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृतिके तीन-तीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही रहता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।

'त्रिविधं शृणु मे' —लोग रात-दिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण 'सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है; प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है; राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है; वे इन बातोंको समझ ही

नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया! वह सुख तीन प्रकारका होता है, उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजस-तामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजस-तामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।

'अभ्यासादमते यत्र' —सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतः—स्वाभाविक ही आकर्षण होता है।

राजस-तामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर, मन-बुद्धिका भोग-संग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य, अभिमानजन्य, प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं, उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं; और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं, दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है; क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।

इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है? श्रवण-मनन भी अभ्यास है, शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है और राजसी-तामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतः—स्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है, उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम 'अभ्यास' है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है, पर रमण करना बाधक है।

यहाँ 'अभ्यासादमते' पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय, प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि, प्रियता, प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।

'दुःखान्तं च निगच्छति' —उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्यों-ज्यों रुचि, प्रियता बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता, सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता—दूसरे अध्यायका पैंसठवाँ श्लोक)।

'च' अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा,

श्लोक ३६-३७ ]

  • साधक-संजीवनी *

११६३

तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है—‘आत्मबुद्धिप्रसादजम्।’ जो उत्पन्न होनेवाला होता है, वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा? इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है, गुणातीत हो जाता है।

‘आत्मबुद्धिप्रसादजम्’—जिस बुद्धिमें सांसारिक मान, बड़ाई, आदर, धन-संग्रह, विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता, केवल परमात्म-विषयक विचार ही रहता है, उस बुद्धिकी प्रसन्नता(गीता—दूसरे अध्यायका चौसठवाँ श्लोक) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है, वह सुख सात्त्विक है।

‘यत्तदग्रे विषमिव’—यहाँ ‘यत्तत्’ कहनेका भाव यह है कि ‘यत्’—जो सात्त्विक सुख है; ‘तत्’—वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है, जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनाता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है, उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है—‘अग्रे विषमिव।’ तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं—उसका रस अभी मिला नहीं; इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।

राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है; इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।

वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है, प्रत्युत

राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे, बालकको खेल-कूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृंखलता, खेल-कूद छूट जाता है, तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एक-दो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि, प्रियता होने लगती है।

वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है, जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है, जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन, सत्संग, कथा-कीर्तन, साधन-भजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान, कर्म, बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं, उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट, परिश्रम, कठिनाता आदि मालूम ही नहीं देते।

‘परिणामेऽमृतोपमम्’—साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता, ज्ञानकी दीप्ति, शान्ति, निर्विकारता आदि सद्भाव-सदगुण प्रकट हो जाते हैं*। इन सदगुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता—पाँचवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।

‘तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम्’—सत्संग, स्वाध्याय, संकीर्तन, जप, ध्यान, चिन्तन आदिसे जो सुख होता है, वह मान, बड़ाई, आराम, रुपये, भोग आदि विषयेन्द्रिय-सम्बन्धका नहीं है और प्रमाद, आलस्य, निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

  • सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण अन्तःकरणमें अमूर्तरूपसे रहते हैं। इनका पता वृत्तियोंसे ही लगता है, जिसका वर्णन चौदहवें अध्यायमें ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक हुआ है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परिशिष्ट भाव —चौदहवें अध्यायमें तो सात्त्विक सुखको बाँधनेवाला बताया था—‘सुखसंगेन बध्नाति ’ (१४।६), पर यहाँ उसको दुःखोंका नाश करनेवाला बताते हैं—‘दुःखान्तं च निगच्छति ’। इसका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक सुखमें रमण (भोग) करनेसे वह बाँधनेवाला हो जाता है अर्थात् गुणातीत नहीं होने देता। अगर रमण न करे तो वह सात्त्विक सुख दुःखोंका नाश करनेवाला हो जाता है। सुख भोगनेसे दुःखका नाश नहीं होता। भोगका त्याग करनेसे ही योग होता है। इसलिये सात्त्विक सुखसे भी असंगता होनी चाहिये। संग होनेसे बन्धनकारक रजोगुण आ जाता है। सत्त्वगुणमें रजोगुण आनेसे पतन होता है।

विवेकको महत्त्व न देनेके कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह दीखता है। राजस मनुष्य विवेकको आदर नहीं देता। अतः सात्त्विक सुखका आरम्भमें विषकी तरह दीखना राजसपना है। तात्पर्य है कि सात्त्विक सुख दुःखदायी नहीं होता, प्रत्युत मनुष्यकी बुद्धिमें राजसपना होनेसे सात्त्विक सुख भी उसको विषकी तरह दुःखदायी दीखता है। उसका उद्देश्य तो सात्त्विक सुखका है, पर भीतर राजस भाव पड़ा है।

सम्बन्ध—अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥

यत्= जोअग्रे= आरम्भमें(अतः)
सुखम्= सुखअमृतोपमम्= अमृतकी तरह
(और)तत्= वह
विषयेन्द्रियसंयोगात्= इन्द्रियों और
विषयोंके संयोगसे
(होता है),परिणामे= परिणाममेंराजसम्= राजस
तत्= वहविषम्= विषकीस्मृतम्
है।
इव= तरह प्रतीत होता है;

व्याख्या —‘विषयेन्द्रियसंयोगात् ’—विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला जो सुख है, उसमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। कारण कि यह प्राणी किसी भी योनियें जाता है, वहाँ उसको विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला सुख मिलता ही है। शब्द, स्पर्श आदि पाँचों विषयोंका सुख पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि सभी प्राणियोंको मिलता है। अतः उस सुखमें प्राणिमात्रका स्वाभाविक अभ्यास रहता है। मनुष्यजीवनमें भी बचपनसे देखा जाय तो अनुकूलतामें राजी होना और प्रतिकूलतामें नाराज होना स्वाभाविक ही होता आया है। इसलिये इस राजस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है।

‘यत्तदग्रेऽमृतोपमम्’ —राजस सुखको आरम्भमें अमृतकी तरह कहनेका भाव यह है कि सांसारिक विषयोंकी प्राप्तिकी सम्भावनाके समय मनमें जितना सुख होता है, उतना सुख मस्ती और राजीपन विषयोंके मिलनेपर नहीं रहता। मिलनेपर भी आरम्भमें (संयोग होते ही) जैसा सुख होता है, थोड़े समयके बाद वैसा सुख नहीं रहता और उस विषयको भोगते-भोगते जब भोगनेकी शक्ति क्षीण हो जाती है, उस समय सुख नहीं होता, प्रत्युत विषयभोगसे

अरुचि हो जाती है। भोग भोगनेकी शक्ति क्षीण होनेके बाद भी अगर विषयोंको भोगा जाय तो दुःख, जलन पैदा हो जाती है, चित्तमें सुख नहीं रहता, इसलिये यह राजस सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है।

अमृतकी तरह कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब मन विषयोंमें खिंचता है, तब मनको वे विषय बड़े प्यारे लगते हैं। विषयों और भोगोंकी बातें सुननेमें जितना रस आता है, उतना भोगोंमें नहीं आता। इसलिये गीतामें आया है—‘यामिमां पुष्यितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ’ (२।४२); राजस पुरुष स्वर्गके भोगोंका सुख सुनते हैं तो उनको वह सुख बड़ा प्रिय लगता है और वे उसके लिये ललचा उठते हैं। तात्पर्य है कि वे स्वर्गके सुख दूरसे सुनकर ही बड़े प्रिय लगते हैं; परन्तु स्वर्गमें जाकर सुख भोगनेसे उनको उतना सुख नहीं मिलता और वह उतना प्रिय भी नहीं लगता!

‘परिणामे विषमिव’ —आरम्भमें विषय बड़े सुन्दर लगते हैं, उनमें बड़ा सुख मालूम देता है; परन्तु उनको भोगते-भोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत