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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ
श्रीसाम्बपुराणम्

प्रायश्चित्तविधानञ्च तथाचार्यस्य लक्षणम्।
दीक्षां सर्वशिष्याणां मन्त्रेणापि विनिश्चयः ॥२३॥
स्तवाश्च विविधाश्चैवं यस्मिन् ग्रन्थे समासतः।
भविष्यन्ति यथान्यायमाधाय विविधाश्रयाः ॥२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे उद्देशानुक्रमणिकाकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः


वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, स्तम्भन, उच्चाटनादि एवं प्रतिमालक्षण, पूजागृह-विधान, मण्डल, क्रियायाग, सिद्धियाग साधन, महामण्डल याग एवं द्वादशात्मक सूर्य का सान्निध्य, भूमि का तोषण, पुष्प तथा धूपविधि, सप्तमी की विशेष पूजाविधि तथा उपवासविधि कही गयी है। प्रोक्षण (यज्ञार्थ मन्त्रों से शुद्ध किया गया मांसादि) तथा दान का फल भी कहा गया है। वेलाकाल विधान (जिस काल में जिस कार्य को करना होता है) एवं धर्मविधि भी वर्णित है। धूपदान की विधि, जय-प्राप्ति का विधान, संयम, असंयम तथा स्वप्न-वृत्तान्त (स्वप्न-दर्शन का शुभा शुभ फल) भी वर्णित है।

प्रायश्चित्त-विधान, आचार्य-लक्षण, सकल शिष्य-दीक्षा तथा किसके लिये कौन-सा मन्त्र उपयोगी है? इसका निश्चय किया गया है। ग्रन्थ में विविध स्तव भी संक्षेप में कहे गये हैं। यथायथ रूप से भी नाना विधि से विषय का सन्निवेश किया गया है (ऐसा यह साम्बपुराण है)॥१८-२४॥

श्री साम्बपुराण का उद्देशानुक्रमणिका-कथन नामक प्रथम अध्याय समाप्त

द्वितीयोऽध्यायः

(आदित्यमहिमा)

सूत उवाच
वसिष्ठं स्वस्थमासीनं मुनिराजं बृहद्वलः।
रघुवंशोद्भवोऽपृच्छद् गुरुं निःश्रेयसं परम्॥१॥

सूत कहते हैं—रघुवंशोद्भूत राजा बृहद्वल आसन पर आसीन ऋषिश्रेष्ठ अपने गुरु वशिष्ठ से परम निःश्रेयस् की जिज्ञासा करते हैं॥१॥

भगवन् श्रोतुमिच्छामि परं ब्रह्म सनातनम्।
यस्मिन्न पुनरावृत्तिं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः॥२॥

हे भगवन्! सनातन परब्रह्म की बात सुनने की इच्छा करता हूँ; जहाँ जाने पर मनीषीगण पुनः जन्मग्रहण नहीं करते॥२॥

गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः।
य इच्छेन्मोक्षमास्थातुं देवतां कां यजेत्तु सः॥३॥

गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा भिक्षुक (संन्यासी) इत्यादि को मोक्षाभिलाषी होने पर किस देवता की अर्चना करनी चाहिये?॥३॥

कुतो ह्यस्य ध्रुवः स्वर्गः कुतो निःश्रेयसं परम्।
स्वर्गतश्चैव किं कुर्याद् येन न च्यवते पुनः॥४॥
देवतानां हि को देवः पितृणामपि कः पिता।
यस्मात् परतरं नास्ति तस्मै ब्रूहि महामुने॥५॥

मोक्ष चाहने वालों का स्थिर स्वर्ग कहाँ है? परम मंगल कहाँ है? स्वर्ग जाने हेतु क्या करना चाहिये, जिससे कि वहाँ से पतन न हो। देवताओं का कौन देव है? पितृगणों का कौन पिता है, जिससे पर (श्रेष्ठ) कोई नहीं है, हे महामुने! वह मुझसे कहिये॥४-५॥

कुतः सृष्टमिदं ब्रह्मन् विश्वं स्थावरजङ्गमम्।
प्रलयश्च कमभ्येति तद्भवान् वक्तुमर्हसि॥६॥

हे ब्रह्मन्! कहाँ से यह स्थावर-जंगम विश्व सृष्ट हुआ है तथा प्रलय के समय किसका आश्रय लेकर स्थित रहता है? यह आप बतायें॥६॥

६ श्रीसाम्बपुराणम्

वशिष्ठ उवाच

उद्यन् पश्यन् हि कुरुते जगद् वितिमिरं करैः ।
नातः परतरो देवः कश्चिदन्यो नराधिपः ॥७॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—जो उदित होकर देखते-देखते ही अपने कर से (किरणों से) जगत् को वितिमिर (अन्धकाररहित) कर देते हैं, हे नराधिप! उनसे परतर कोई भी देवता नहीं है।।७।।

अनादिनिधनो ह्येष पुरुषः शाश्वतोऽव्ययः ।
तापयत्येष लोकांस्त्रीन् भ्रमन् रश्मिभिरुल्बणैः ॥८॥

यह पुरुष आदि-अन्तरहित है। शाश्वत तथा अव्यय है। ये भ्रमण करते-करते अपनी तीक्ष्ण रश्मियों से त्रिभुवन को तापित कर देते हैं।।८।।

सर्वदेवात्मको ह्येष तपसां चानुभावनः ।
सर्वस्य जगतो नाथः कर्मसाक्षी विभावसुः ॥९॥

ये ही सर्वदेवात्मक, तपस्या के अनुभावक, जगत् के नाथ, कर्म के साक्षी तथा प्रभा से युक्त हैं।।९।।

संक्षिपत्येष भूतानि तथा विसृजते पुनः ।
एको भाति तपत्येष कर्षते च गभस्तिभिः ॥१०॥
एष धाता विधाता च भूतानिर्भूतभावनः ।
न ह्येष क्षयमायाति नित्यमक्षयमण्डलः ॥११॥

ये ही समस्त प्राणियों का विनाश करते हैं और पुनः उनकी सृष्टि करते हैं। अकेले प्रकाशित होते हैं, ताप देते हैं तथा रश्मियों द्वारा आकर्षण करते हैं। ये ही धारणकर्त्ता तथा सृष्टिकर्त्ता हैं। समस्त प्राणियों के आदि तथा सभी के उत्पादक हैं। इनका कोई क्षय नहीं है। ये नित्य अक्षय (अविनश्वर) मण्डल में अवस्थित हैं।।१०-११।।

पितॄणां हि पिता ह्येष देवानामेष देवता ।
ध्रुवं स्थानं भजन्नेष यस्मान्न च्यवते पुनः ॥१२॥
सर्गकाले जगत् कृत्स्नमादित्यात् सम्प्रसूयते ।
प्रलये च तमे भाति आदित्यं दीप्ततेजसम् ॥१३॥

ये ही पितृगण के पिता एवं देवताओं के भी देवता हैं। ये ध्रुव (स्थिर) स्थान में अवस्थान करते हैं। उससे इनकी विच्युति नहीं होती। सृष्टिकाल में समस्त जगत् आदित्य से ही उत्पन्न होता है और प्रलय में यह दीप्ततेजा आदित्य में ही प्रवेश कर जाता है।।१२-१३।।

द्वितीयोऽध्यायः ७

द्वितीयोऽध्यायः ७

योगिनश्चान्ते सांख्याश्च देहं त्यक्त्वा पुरातनम्। संशुद्धास्तु विशन्त्यस्मिंस्तेजोराशौ दिवाकरे ॥१४॥

अन्तकाल में योगीगण तथा सांख्यगण पुरातन देह का त्याग करके सम्यक् शुद्ध होकर इस तेजोराशि दिवाकर में ही प्रविष्ट हो जाते हैं।।१४।।

अस्य रश्मिसहस्राणि शाखा इव विहङ्गमाः। वसन्त्राश्रित्य मुनयः ससिद्धा दैवतैः सह ॥१५॥

जैसे पक्षीगण शाखा का सहारा लेकर निवास करते हैं, उसी प्रकार इस सूर्यरश्मिरूपी शाखा का अवलम्बन लेकर सिद्ध मुनिगण देवताओं के साथ वास करते हैं।।१५।।

गृहस्था जनकाद्याश्च राजानो योगधार्मिकाः। बालखिल्यादयश्चैव ऋषयो ब्रह्मचारिणः ॥१६॥ वानप्रस्थाश्च वर्णाद्या भिक्षुः पञ्चशिखस्तथा। योगमास्थाय ते सर्वे प्रविष्टाः सूर्यमण्डले ॥१७॥

गृहस्थ, जनकादि योगधर्माश्रित राजागण, बालखिल्यादि मुनिगण, ऋषिगण, ब्रह्म-चारीगण, वानप्रस्थावलम्बीगण, वर्णश्रेष्ठ ब्राह्मणगण, पञ्चशिख (मुनिगण) तथा संन्यासी गण—सभी योग का अवलम्बन लेकर सूर्यमण्डल में ही प्रविष्ट होते हैं।।१६-१७।।

विशेष—पञ्चशिख = कपिल के शिष्य आसुरि तथा उनकी पत्नी कपिला ने एक बालक को तत्त्वज्ञानोपदेश दिया था। यही बालक पञ्चशिख कहलाया। इसने २२ सूत्रात्मक तत्त्वमास ग्रन्थ से षष्टितन्त्र का प्रणयन किया था।

शुको व्यासात्मजः श्रीमान् योगधर्ममवाप्य सः। आदित्यकिरणान् पीत्वा ह्यपुनर्भवमास्थितः ॥१८॥

व्यासपुत्र शुकदेव ने योगधर्म का अवलम्बन करके सूर्यकिरण का पान करते हुये अपुनर्भव (जिससे पुनरागमन न हो, ऐसा मोक्ष) प्राप्त किया था।।१८।।

शब्दमात्रश्रुतिमुखा ब्रह्मविष्णुशिवादयः। प्रत्यक्षोऽयं परो देवः सूर्यस्तिमिरनाशनः ॥१९॥ तस्मादन्यत्र भक्तिर्हि मा कार्या शुभमिच्छता। दृष्टेन बाध्यते यस्माददृष्टं नित्यमेव हि ॥२०॥ त्वयातः सततं राजन्नभ्यर्च्यो भगवान् रविः। स हि माता पिता चैव कृत्स्नस्य जगतो गुरुः ॥२१॥

इति श्रीसाम्बपुराणे आदित्यमहिमा नाम द्वितीयोऽध्यायः

८ श्रीसाम्बपुराणम्

ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवताओं को केवल श्रुति में (शब्दों में सुना जाता है, देखा नहीं जा सकता) सुना गया है; किन्तु सूर्य तो प्रत्यक्षरूपेण अन्धकार के नाशक परम देवता हैं। इसीलिये शुभ चाहने वाले लोगों के लिये अन्यत्र भक्ति करनी उचित नहीं है। जिन्हें प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता, उन ब्रह्मादि देवगण की अप्रत्यक्ष में अनिश्चयता विद्यमान है। अतएव हे राजन्! तुम सर्वदा भगवान् सूर्य की आराधना करो। ये ही सम्पूर्ण जगत् के माता-पिता तथा गुरु भी हैं।।१९-२१।।

श्रीसाम्बपुराण का आदित्य-महिमा नामक द्वितीय अध्याय समाप्त

तृतीयोऽध्यायः

(साम्बशापः)

बृहद्वल उवाच

आद्यं स्थानं रवेः कुत्र कस्मिन् द्वीपे महामुने ।
यत्र पूजां विधानोक्तां प्रतिगृह्णात्यसौ स्वयम् ॥१॥

साम्ब को शाप—बृहद्वल पूछते हैं—हे महामुने! रवि का प्रथम पूजास्थान कहाँ है, जहाँ वे प्रथम बार पूजित हुये हैं। किस द्वीप में वे स्वयं यथाविधि की गई पूजा को ग्रहण करते हैं॥१॥

वशिष्ठ उवाच

चन्द्रभागातटे रम्ये पुरं यत् साम्बसंज्ञितम् ।
भूर्लोके शाश्वतं स्थानं तत्र सूर्यस्य नित्यता ॥२॥
प्रीत्या साम्बस्य तत्रार्को जगतोऽनुग्रहाय च ।
स्थितो द्वादशभोगेन मित्रो मैत्रेण चक्षुषा ॥३॥

वशिष्ठ मुनि कहते हैं—पृथ्वी पर चन्द्रभागा नदी के तट पर साम्ब नामक एक पुरी है। वह शाश्वत स्थान है, जहाँ सूर्य की नित्यता है (नित्य विद्यमानता है)। वहाँ सूर्य साम्ब से प्रीति के कारण तथा जगत् पर अनुग्रहार्थ बन्धु के समान दृष्टि के साथ द्वादश भाग में विराजित हैं॥२-३॥

विशेष—चन्द्रभाग हिमालय का एक अंश है। वहाँ से उत्पन्न नदी है—चन्द्रभागा नामक काश्मीर देशीय नदी। यहाँ स्नान करके चन्द्र दक्षशाप से मुक्त हो गये थे। वर्तमान में इसे चेनाब नदी कहते हैं। वेदों में यही असिक्णी नदी कही गई है।

तत्र भक्तिमतः सर्वाननुगृह्णाति भास्करः ।
विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान् स्वयम् ॥४॥

वहाँ भगवान् भास्कर सभी भक्तों पर अनुग्रह करते हैं और विधि से प्रयुक्त पूजन को स्वयं ग्रहण करते हैं॥४॥

बृहद्वल उवाच

कोऽयं साम्बः कुतः कस्य पुत्रो नाम्ना रवेः प्रियः ।
यस्य चायं सहस्त्रांशुर्वरदः पुण्यकर्मणः ॥५॥

१० श्रीसाम्बपुराणम्

बृहद्वल पूछते हैं—यह साम्ब कौन है? कहाँ से आये अर्थात् कहाँ रहते थे? किसके पुत्र हैं, जो रवि को प्रिय हैं तथा सहस्र किरणयुक्त सूर्य ने जिन्हें घर प्रदान किया है?॥५॥

वशिष्ठ उवाच

अदितेर्द्वादशपुत्रो विष्णुर्यः स पुनस्त्विह।
वासुदेवत्वमापन्नस्तस्य साम्बोऽभवत् सुतः ॥६॥
स तु पित्रा भृशं शप्त्वा कुष्ठरोगमवाप्तवान्।
तेनायं स्थापितः सूर्यः स्वनाम्ना च पुरः कृतः ॥७॥

वशिष्ठ कहते हैं—देवमाता अदिति के बारहवें पुत्र जो विष्णु हैं, वे ही वसुदेव के पुत्ररूप से अवस्थित हैं (वासुदेव हैं)। उनके ही पुत्र हैं—साम्ब।

किन्तु पिता से भीषण अभिशाप पाकर उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। उन्होंने ही इन सूर्य की स्थापना (चन्द्रभागा के तट पर) की और अपने नाम से पुरी का भी निर्माण कराया॥६-७॥

बृहद्वल उवाच

शप्तः कस्मिन्निमित्तोऽसौ पित्रा पुत्रः स्वसम्भवः।
भाव्यं हि कारणेनात्र येनासौ शप्तवान् सुतम् ॥८॥

बृहद्वल पूछते हैं—पिता द्वारा उनके ही आत्मज (पुत्र) क्यों अभिशप्त हुये? अवश्य ही इसमें कोई विशेष कारण है, जिस कारण से पिता ने अपने पुत्र को ही शाप दिया॥८॥

वशिष्ठ उवाच

शृणुष्वावहितो राजंस्तस्य तच्छापकारणम्।
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो नारदो नाम यो मुनिः ॥९॥
ब्रह्मलोके मुनेस्तस्य विष्णुलोके तथैव च।
सूर्यलोके च सततं रुद्रलोके तथैव च ॥१०॥

ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—हे राजन्! तुम सावधान होकर सुनो। उनके शाप का कारण कहता हूँ। ब्रह्मा के मानसपुत्र नारद नामक मुनि हैं। इनकी ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, सूर्यलोक तथा रुद्रलोक में अप्रतिहत गति है॥९-१०॥

पितृराक्षसनागानां यमस्य वरुणस्य च।
इन्द्रस्य चामरावत्यां पुर्यां तु धनदस्य च ॥११॥
पृथिव्यां पार्थिवाद्यां ये ये पातालसमुद्भवाः।
सदा वेश्मसु तेषां च तस्याप्रतिहतां गतिः ॥१२॥

तृतीयोऽध्यायः ११

तृतीयोऽध्यायः ११

पितृलोक, राक्षस लोक, नागलोक, यमलोक, वरुणलोक, इन्द्र की अमरावती तथा कुबेर की पुरी में एवं पृथ्वी पर जितने राजागण हैं, जो पाताल में हैं, उन सभी के स्थान पर इनकी बाधाहीन अप्रतिहत गति है।।११-१२।।

वासुदेवं स वै द्रष्टुं नीत्वा द्वारावतीं पुरीम्।
आयान्तं ऋषिभिः सार्द्धं क्रोधनो मुनिसत्तमः ॥१३॥

एक बार वह नारद कोपन स्वभाव ऋषियों के साथ वासुदेव का दर्शन करने के लिये द्वारिकापुरी आये।।१३।।

अथात्रागच्छतस्तस्य सर्वे यदुकुमारकाः।
प्रद्युम्नप्रमुखा ये ते प्रह्वेनावनताः स्थिताः ॥१४॥
अभिवाद्यार्घ्यपाद्यैश्च पूजां कुर्वन्ति यत्नतः।
साम्बस्त्ववश्यम्भावित्वात्तस्य शापस्य मोहितः ॥१५॥

तदनन्तर प्रद्युम्न आदि सभी प्रमुख यदुकुमारगण ने वहाँ आकर तथा सविनय अवनत होकर अभिनन्दन-पाद्य-अर्घ्य प्रभृति द्वारा यत्नपूर्वक उनका पूजन किया। अवश्यम्भावी के कारण साम्ब उस शाप से मोहित हो गया।।१४-१५।।

अवज्ञां कुरुते नित्यं नारदस्य महात्मनः।
ततः क्रीडासु सततं रूपयौवनगर्वितः ॥१६॥
अविनीतं सुतं ज्ञात्वा चिन्तयामास नारदः।
अस्याहमविनीतस्य करिष्ये विनयं भृशम् ॥१७॥

साम्ब अपने रूप एवं यौवन से गर्वित होकर सतत् क्रीड़ा में मत्त रहता था और सर्वदा महात्मा नारद की अवज्ञा किया करता था। इस वासुदेवपुत्र को अविनीत देखकर नारद चिन्तित हो गये और विचार किया कि इस अविनीत को मैं अच्छी तरह संयत करूँगा।।१६-१७।।

एवं सञ्चिन्तयित्वा तु वासुदेवं ततोऽब्रवीत्।
इमाः षोडशसाहस्र्यः पत्न्यो देवस्य यास्तव।
सर्वासां च मनांस्यासां साम्बेन किल केशव ॥१८॥
हृतानि पुण्डरीकाक्ष रूपयौवनशालिना।
रूपेणाप्रतिमः साम्बो लोकेऽस्मिन् सचराचरे।
अतो हीच्छन्ति तास्तस्य दर्शनं ह्यपि ते प्रियः ॥१९॥

ऐसा विचार करके नारद ने वासुदेव से कहा—हे केशव! आपकी जो १६००० पत्नियाँ हैं, उन सबका मन साम्ब ने अपहृत कर लिया है। हे पुण्डरीकाक्ष! रूप-

१२ श्रीसाम्बपुराणम्

यौवनयुक्त साम्ब का रूप चराचर में अतुलनीय है। इसलिये सभी स्त्रीगण उसे देखने की इच्छा करती हैं, यहाँ तक कि आपकी पत्नियाँ भी॥१८-१९॥

वशिष्ठ उवाच
श्रुत्वैतन्नारदाद्वाक्यं भाविनाऽर्थेन मोहितः।
अविचार्र्यैव तत् सर्वं देवः प्रोवाच नारदम्॥२०॥

वशिष्ठ कहते हैं—नारद की यह बात सुनकर भवितव्यता के कारण ही वासुदेव ने विना कोई विचार किये नारद से इस प्रकार कहा॥२०॥

वासुदेव उवाच
न ह्यहं श्रद्दधाम्येवं यदेतद् व्याहृतं त्वया।
ब्रुवाणमेवं देवं तु नारदः प्रत्युवाच ह॥२१॥

वासुदेव ने कहा—(हे नारद!) आपने जो कुछ कहा, उसका मैं तनिक भी विश्वास नहीं करता। वासुदेव का यह उत्तर सुनकर नारद ने प्रत्युत्तर दिया—मैं वैसा करूँगा, जिससे आपको विश्वास हो॥२१॥

वशिष्ठ उवाच
एवमुक्त्वा ययौ भूत्वा नारदस्तु यथागतः।
ततः कतिपये चाह्नि द्वारकां पुनरभ्यगात्॥२३॥
तस्मिन्नहनि देवोऽपि सहान्तःपूरिकाजनैः।
अनुभूय जलक्रीड़ा यानमासेवते रहः॥२४॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—ऐसा कहकर नारद यथाभिलषित देश को चले गये। तदनन्तर कुछ दिनों के उपरान्त पुनः द्वारिका आये। उस दिन श्रीकृष्ण भी अन्तःपुर की रमणियों के साथ जलक्रीड़ा करके निर्जन में अवस्थित थे॥२३-२४॥

रम्ये रैवतकोद्याने हर्म्यमालोपशोभिते।
सर्वर्तुकुसुमैर्नित्यं वासिते चित्रकानने॥२५॥
नृत्यद्भिर्बर्हिभिर्नित्यं केकाशतनिनादिते।
कोकिलारावसंघुष्टे चक्रवाकोपशोभिते॥२६॥

रैवतक (द्वारका के निकट पर्वत) के रम्य उद्यान में अट्टालिकावली शोभित थी। वह सभी ऋतुओं के पुष्पों द्वारा नित्य आमोदित थी। वह विचित्र कानन नित्य नृत्यरत मयूर तथा १००-१०० केका के शब्द से गूंजा करता था। वह कोकिल के शब्द से शब्दित तथा चक्रवाक पक्षियों द्वारा उपशोभित था॥२५-२६॥

कोकिलामधुरालापे जलकुक्कुटनादिते।
षट्पदोद्गीतमधुरे शुकचातकनादिते॥२७॥

तृतीयोऽध्यायः १३

तृतीयोऽध्यायः १३

नानाजलजपुष्पाभिर्दीर्घिकाभिरलङ्कृते । हंसारावसुसंघृष्टे सारसैः समलङ्कृते ॥ २८ ॥ तस्मिन् स रमते देवः स्त्रीभिः परिवृतस्तदा । हारनूपुरकेयूररशनाद्यैः विभूषणैः ॥ २९ ॥

कोकिलों के मधुर आलाप, जलकुक्कुट के शब्द, भ्रमर के मधुर गुञ्जन, शुक-चातक की ध्वनि से युक्त, नाना जलज पुष्पविशिष्ट दीर्घिकासमूह में हंसध्वनि तथा सारस पक्षियों से समलंकृत उस स्थान में हार, नूपुर, केयूर, कटिभूषण प्रभृति अलंकार से अलंकृत स्त्रीगण से परिवृत वासुदेव रमण कर रहे थे॥२७-२९॥

भूषितानां वरस्त्रीणां चार्वङ्गीणां विशेषतः । क्रीड़ार्थं पद्मपत्रेषु नियुक्तानां यथार्हतः ॥ ३० ॥ तत्तस्मिन् दीयते तासां मिष्टं पानं सुरासवम् । मणिकाञ्चनपात्रेषु नानापुष्पाधिवासितम् ॥ ३१ ॥

विशेषतः मधुर अवयवों वाली, श्रेष्ठ रमणीगण की क्रीड़ा हेतु यथायोग्य पद्मपत्र के पात्रों में (दोनों में) मीठा पान रखा था। मणिकाञ्चन के पात्रों में नाना पुष्पों की गन्ध से सुवासित सुरा, आसव रक्खा था॥३०-३१॥

वृन्तैश्च सहकाराणां भग्नैर्नीलोत्पलैरपि । एतस्मिन्नन्तरे बुद्ध्वा मद्यमत्ता इति स्त्रियः ॥ ३२ ॥ उवाच नारदः साम्बं सुबोध्य त्वरयन्निदम् । गच्छ रैवतकं साम्ब मा तिष्ठस्व कुमारक ॥ ३३ ॥ त्वां समाह्वयते देवो न युक्तं स्थातुमत्र ते ।

साथ ही आम्र का भग्न वृन्त तथा नीलोत्पल भी दिया जा रहा था। इस अवसर पर नारद ने यह देखा कि रमणीगण मद्य पीकर उन्मत्त हैं। अब नारद तीव्र वेग से साम्ब के पास जाकर बोले—हे साम्ब! रैवतक उद्यान में जाओ। उपेक्षा न करो। तुमको वासुदेव ने बुलाया है। अतः तुम्हारा यहाँ रुकना उचित नहीं है॥३३-३४॥

तद्वाक्यार्थमबुद्ध्वैव भाविनाथेन चोदितः ॥ ३४ ॥ गत्वा तु सत्वरं साम्बः प्रणाममकरोत् पितुः । एतस्मिन्नन्तरे तत्र याः काश्चित्तुल्यसात्त्विकाः ॥ ३५ ॥ दृष्ट्वा ताः सहसा साम्बं सर्वाश्चक्षुभिरे स्त्रियः । न च दृष्टः पुरा याभिः पुष्पकेतुसमो युवा ॥ ३६ ॥

उनके वाक्य का निहित अर्थ समझे बिना दैवप्रेरित साम्ब शीघ्रता से वहाँ गये और श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। इस बीच वहाँ जितनी भी तुल्यसात्विक रमणीगण थीं, जिन्होंने

१४ | श्रीसाम्बपुराणम्

पूर्व में इस कामदेव के समान युवक को नहीं देखा था, वे सभी साम्ब को देखकर विक्षुब्ध हो गयीं।।३४-३६।।

मद्यदोषात्ततस्तासां स्मृतिलोपात्तथैव च।
योषितामल्पसत्त्वानां योन्यः शीघ्रं प्रसुस्रुवुः ॥३७॥

मद्यपान के दोष से उनका स्मृतिलोप हो गया था। उन सभी अल्पसत्त्व स्त्रीगण की योनि शीघ्र ही गीली हो गयी।।३७।।

श्रूयते चाप्ययं श्लोकः पुराणे पठते यथा।
ब्रह्मचर्येऽपि वर्त्तन्त्यः साध्व्यो ह्यपि तथा शृणु ॥३८॥
दृश्यं तु पुरुषं दृष्ट्वा योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रियः।
लोके च श्रूयते ह्येतन्मद्यस्यातिप्रसेवनात् ॥३९॥
लज्जां मुञ्चन्ति ह्रीमत्यो नार्यः सत्कुलजा अपि।

ऐसा श्लोक सुना जाता है कि ब्रह्मचर्य में विद्यमान (ब्रह्मचारिणी) स्त्रीगण के भी सम्बन्ध में सुनो—रम्य दर्शन पुरुष को देखकर स्त्रीगण की योनि प्रक्लिन्न हो जाती है। लोक में भी सुना जाता है कि अत्यन्त मद्यसेवन से सत्कुल में उत्पन्न लज्जावान रमणीगण भी लज्जा छोड़ देती हैं।।३८-३९।।

समांसैर्भोजनैः स्निग्धैस्तथा मधुसुरासवैः।
गन्धैर्मनोज्ञैर्वस्त्रैश्च कामः स्त्रीषु विजृम्भते ॥४०॥
एतद्बुद्ध्वा कुलस्त्रीणां श्रेयः परममिच्छता।
मद्यं न देयमल्पं वा पुरुषेण विपश्चिता ॥४१॥

इस प्रकार मांस-भोजन, मधु-सुरा-आसवपान, सुगन्ध द्रव्य तथा मनोज्ञ वस्त्र से स्त्रीगण का कामभाव प्रकाशित होता है। अतः यह समझकर मंगलकामी विज्ञजन की कुलस्त्रीगण को अत्यल्प मद्य भी देना उचित नहीं है।।४०-४१।।

वशिष्ठ उवाच
नारदोऽप्यथ तं साम्बं प्रेषयित्वा त्वरान्वितः।
आजगामाथ तत्रैव साम्बस्यानुपदेन तु ॥४२॥
आयान्तं तमभिप्रेक्ष्य गुरुं देवर्षिसत्तमम्।
सहसैवोत्थिताः सर्वाः स्त्रियस्ता मदविह्वलाः ॥४३॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—तदनन्तर नारद भी साम्ब को वहाँ जाने के लिये प्रेरित करके साम्ब के पीछे-पीछे वहीं पहुँच गये। गुरु देवर्षि नारद को आया देखकर मदविह्वल युवतीगण सहसा उठकर खड़ी हो गयीं।।४२-४३।।

तृतीयोऽध्यायः १५

तृतीयोऽध्यायः १५

तासामथोत्थितानां तु वासुदेवस्त्वपश्यत। भित्वा वासांसि शुक्लानि पत्रेषु पतितं मदम् ॥४४॥ तं दृष्ट्वा तु हरिः क्रुद्धस्तां शशाप तदा स्त्रियः। यस्माद् गतानि चेतांसि मां मुक्त्वान्यत्र वः स्त्रियः ॥४५॥ तस्मात् पतिकृतांल्लोकान्नायुषोऽन्ते न यास्यथ। पतिलोकात् परिभ्रष्टाः स्वर्गं चापि गते मयि। भूत्वा ह्यशरणा यूयं दस्युहस्तं गमिष्यथ ॥४६॥

तब वासुदेव ने देखा कि उठने पर उनके शुक्ल वस्त्र को भेदकर पत्र के ऊपर (योनि के ऊपर) मद पतित हो रहा है। यह देखकर हरि ने क्रुद्ध होकर उन रमणीगण को अभि- शाप दिया—हे स्त्रीगण! मेरा परित्याग करके तुम्हारा चित्त अन्यत्र धृत हो गया है, अतः परलोक में तुम्हें पतिलोक (आयु समाप्त होने पर) नहीं मिलेगा। मेरे स्वर्गारोहण के पश्चात् तुम परिभ्रष्ट होगी तथा अरक्षित होकर डाकुओं के हाथ में पड़ जाओगी।।४४-४६।।

वशिष्ठ उवाच

शापदोषात्ततस्तस्मात् स्त्रियः स्वर्गं गते हरौ। हृताः पाञ्चनदैश्चौरैरर्जुनस्य तु पश्यतः ॥४७॥ ततस्तास्तुल्यशापत्वादेवं संदूषिताः स्त्रियः। प्राप्तवत्यो महच्छापं मुक्त्वा तिस्रः पतिव्रताः ॥४८॥ रुक्मिणीं सत्यभामां च तथा जाम्बवतीमपि। शप्त्वैवं ताः स्त्रियः कृष्णः साम्बमप्यशपत्ततः ॥४९॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं कि तदनन्तर अभिशाप के कारण ही जब हरि ने स्वर्गगमन कर लिया था तब अर्जुन के सामने ही उन स्त्रीगण को पञ्चनद प्रदेश में चोरों ने अपहृत कर लिया था। पतिव्रता रुक्मिणी, सत्यभामा तथा जाम्बवती के अतिरिक्त सभी को यह अभिशाप लगा था। इस प्रकार से इन स्त्रीगण को शाप देकर भगवान् कृष्ण ने साम्ब को भी इस प्रकार शाप दिया था।।४७-४९।।

वासुदेव उवाच

यस्मादतीव कान्तं ते दृष्ट्वा रूपमिमाः स्त्रियः। क्षुब्धाः सर्वास्तु तस्मात्त्वं कुष्ठरोगमवाप्स्यसि ॥५०॥

वासुदेव कहते हैं—जिस कारण से सभी रमणीगण तुम्हारा अतीव सुन्दर रमणीय रूप देखकर क्षुब्ध हो गयीं, इसलिये तुम अब कुष्ठरोग से ग्रसित होगे।।५०।।

वशिष्ठ उवाच

यस्मिन् शप्तः क्षणे चासौ पित्रा पुत्रः स्वसम्भवः। प्राप्तवान् कुष्ठरोगित्वं विरूपत्वं च दुःसहम् ॥५१॥

१६श्रीसाम्बपुराणम्

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—जब पिता ने अपने पुत्र को इस प्रकार शाप दिया, तभी उसे कुष्ठरोग हो गया तथा वह कुरूप हो गया।।५१।।

साम्बेन पुनरप्येवं दुर्वासां कोपिता मुनिः।
भाव्येनार्थेन चात्यर्थं पूर्वानुस्मरणेन वै ॥५२॥
प्राप्तवान् सुमहच्छापं साम्बो वै मनुजोत्तमः।
तच्छापान्मुसलं जातं कुलं येनाऽस्य पातितम् ॥५३॥

इसी प्रकार एक बार साम्ब से दुर्वासा मुनि कुपित हो गये थे और भवितव्यता के चलते पूर्व वृत्तान्त का स्मरण न रहने से नरश्रेष्ठ साम्ब ने सुमहत् शाप पाया था। उस शाप से उनके पेट से मूसल उत्पन्न हुआ था, जिसके द्वारा यदुवंश का संहार हो गया था।।५२-५३।।

श्रुत्वा दुर्विनयाद्दोषानेवमादीन् विपश्चिता।
नित्यं भाव्यं विनीतेन गुरुदेवद्विजातिषु ॥५४॥

दुर्विनय के इस प्रकार के दोष को सुनकर विज्ञजनों को गुरु, देवता तथा ब्राह्मणों के सम्मुख विनीत हो जाना चाहिये।।५४।।

ततः शापाभिभूतेन साम्बो नाराध्य भास्करम्।
पुनः सम्प्राप्य तद्रूपं स्वनाम्नार्को निवेशितः ॥५५॥
नारदो दर्शयित्वा तु स्त्रीणां भावविपर्ययम्।
साम्बं शापेन संयोज्य तत्रैवान्तरधीयत ॥५६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे साम्बशापो नाम तृतीयोऽध्यायः

तदनन्तर अभिशप्त साम्ब ने भास्कर की आराधना से पुनः अपना रूप प्राप्त किया और अपने नाम से सूर्य की स्थापना (चन्द्रभागा के तट पर) किया। इधर नारद भी स्त्रीगण के भावविपर्यय को दिखलाकर तथा साम्ब को शाप दिलवाकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये।।५४-५६।।

श्री साम्बपुराण का साम्बशाप नामक तृतीय अध्याय समाप्त

चतुर्थोऽध्यायः

(द्वादशमूर्त्युपाख्यानम्)

बृहद्वल उवाच
स्थापितो यदि साम्बेन सूर्यश्चन्द्रसरित्तटे।
तस्मान्नाद्यमिदं स्थानं यथैतद् भाषितं त्वया ॥१॥

राजा बृहद्वल पूछते हैं—यदि साम्ब ने चन्द्रभागा नदी के तट पर सूर्य के मूर्त्ति की स्थापना की थी, तब उसे आपने जिस प्रकार कहा है (उससे प्रतीत होता है कि) यह सूर्य का आद्य स्थान नहीं है॥१॥

वशिष्ठ उवाच
आद्यं स्थानमिदं भानोः पश्चात् साम्बेन निर्मितम्।
विस्तरेणास्य चाद्यत्वं कथ्यमानं निबोध मे ॥२॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—यही सूर्य का आद्य स्थान है। बाद में साम्ब ने यहाँ निर्माण कराया। मैं विस्तार से इस आद्यत्व का वर्णन करता हूँ, तुम सुनो॥२॥

अनाद्यो लोकनाथः स विश्वमाली जगत्पतिः।
मित्रत्वेऽवस्थितो देवस्तपस्तेपे नराधिपः ॥३॥

अनादि लोकनाथ जगत्पति नरगण के अधिपति मित्ररूपेण अवस्थित देवता ने पूर्व में एक बार तपस्या किया था॥३॥

अनादिनिधनो ब्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च।
सृष्ट्वा प्रजापतीन् सर्वान् सृष्ट्वा च विविधाः प्रजाः ॥४॥

जिनकी उत्पत्ति तथा विनाश नहीं है, ऐसे नित्य अक्षररूप (क्षररहित) ब्रह्मा ने समस्त प्रजापतियों एवं विविध प्रजा की सृष्टि की॥४॥

ततः स च सहस्त्रांशुरव्यक्तपुरुषः स्वयम्।
कृत्वा द्वादशधात्मानमदित्यमुदपद्यत ॥५॥

तदनन्तर उन अव्यक्त पुरुष सहस्त्रांशु (सूर्य) स्वयं द्वादश रूपों में देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुये॥५॥

इन्द्रो धाताथ पर्जन्यः पूषा त्वष्टाऽर्यमा भगः।
विवस्वान् विष्णुरंशुश्च वरुणो मित्र एव च ॥६॥

१८ | श्रीसाम्बपुराणम्

आभिर्द्वादशभिस्तेन सूर्येण परमात्मना।
सर्वं जगदिदं व्याप्तं मूर्त्तिभिस्तु नराधिपः॥७॥

इन्द्र, धाता, पर्जन्य, पूषा, त्वष्टा, अर्यमा, भग, विवस्वान्, विष्णु, अंशु, वरुण तथा मित्र। हे नराधिप! परमात्मा सूर्य अपनी इन द्वादश मूर्तियों से समस्त जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं॥६-७॥

तस्या या प्रथमा मूर्त्तिरादित्यस्येन्द्रसंज्ञिता।
स्थिता सा देवराजत्वे देवानामनुशासिनी ॥८॥

आदित्य की प्रथम मूर्त्ति इन्द्र के नाम से विख्यात है। यह मूर्त्ति देवगण के शासक देवराजरूप में वर्त्तमान है॥८॥

द्वितीयार्कस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना धातेति कीर्त्तिता।
स्थिता प्रजापतित्वे सा विविधाः सृजते प्रजाः ॥९॥

सूर्य की द्वितीय मूर्त्ति का नाम है—धाता। यह प्रजापति रूप से नानाविध प्रजा की सृष्टि करती है॥९॥

तृतीयार्कस्य या मूर्त्तिः पर्जन्य इति विश्रुता।
मेघे व्यवस्थिता सा तु वर्षते च गभस्तिभिः ॥१०॥

सूर्य की तृतीय मूर्त्ति पर्जन्य के नाम से ख्यात है। यह मेघमण्डल में स्थित होकर अपनी किरणों से वर्षा करती है॥१०॥

चतुर्थी तस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना पूषेति विश्रुता।
अन्ने व्यवस्थिता सा तु प्रजाः पुष्णाति नित्यशः ॥११॥

इनकी चतुर्थ मूर्त्ति पूषा नाम से विख्यात है। यह अन्न में स्थित होकर नित्य समस्त प्रजा का पोषण करती है॥११॥

पञ्चमी तस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना त्वष्टेति विश्रुता।
स्थिता वनस्पतौ सा तु ओषधीषु च सर्वशः ॥१२॥

इनकी पञ्चम मूर्त्ति त्वष्टा के नाम से प्रसिद्ध है। यह वनस्पति तथा औषधियों में सर्वतोभावेन स्थित है॥१२॥

मूर्त्ति षष्ठी रवेर्या तु अर्यमा इति विश्रुता।
वायोः सञ्चरणार्था सा देहेष्वेव समाश्रिता ॥१३॥

इनकी षष्ठ मूर्त्ति को अर्यमा कहते हैं। यह वायु के संचरण के कारण सभी देह में स्थित है॥१३॥

चतुर्थोऽध्याय ९९

चतुर्थोऽध्याय ९९

भानोर्या सप्तमी मूर्त्तिर्नाम्ना भग इति श्रुता।
भूमौ व्यवस्थिता सा तु शरीरेषु च देहिनाम्॥१४॥

सूर्य की सप्तम मूर्त्ति का नाम है—भग। यह भूमि में स्थित होकर सभी देहधारियों के शरीर में स्थित है॥१४॥

मूर्त्तिर्या चाष्टमी वास्य विवस्वानिति विश्रुता।
अग्नौ व्यवस्थिता सा तु पचत्यन्नं शरीरिणाम्॥१५॥

अष्टम मूर्त्ति विवस्वान् कहलाती है। यह अग्नि में स्थित होकर शरीरधारियों का अन्नपाक करती है॥१५॥

नवमी मित्रभानोर्या मूर्त्तिविष्णुश्च नामतः।
प्रादुर्भवति सा नित्यं देवानामरिसूडनी॥१६॥

सूर्य की नवम मूर्त्ति का नाम है—विष्णु। देवगण के शत्रुओं का नाश करने के लिये यह मूर्त्ति (विष्णु) नित्य प्रादुर्भूत होती है॥१६॥

दशमी तस्य या मूर्त्तिरंशुमानिति विश्रुता।
वायौ प्रतिष्ठिता सा तु प्रह्लादयति वै प्रजाः॥१७॥

इनकी दशम मूर्त्ति को अंशुमान कहा गया है। यह वायु में प्रतिष्ठित होकर सभी प्रजावर्ग का आनन्दवर्धन करती है॥१७॥

मूर्त्तिस्त्वेकादशी या तु भानोर्वरुणसंज्ञिता।
सा जीवयति वै कृत्स्नं जगदप्सु प्रतिष्ठितम्॥१८॥

इनकी एकादश मूर्त्ति 'वरुण' कहलाती है। यह जल में प्रतिष्ठित होकर जगत् को जीवनदान देती है॥१८॥

अपां स्थानं समुद्रस्तु वरुणोऽप्सु प्रतिष्ठितः।
तस्माद्वै प्रोच्यते नाम्ना सागरो वरुणालयः॥१९॥

जल का स्थान है—समुद्र। वरुण जल में प्रतिष्ठित होकर समस्त जगत् को जीवनदान देते हैं। तभी तो सागर को वरुणालय कहा गया है॥१९॥

मूर्त्तिर्या द्वादशी भानोर्नामितो मित्रसंज्ञिता।
लोकानां सा हितार्थाय स्थिता चन्द्रसरित्तटे॥२०॥

सूर्य की बारहवीं मूर्त्ति का नाम है—मित्र। यह लोकालय का हित चाहती है, तभी तो चन्द्रभागा नदी के तट पर अवस्थित है॥२०॥

वायुभक्षस्तपस्तेपे स्थितो मैत्रेण चक्षुषा॥२१॥

२० श्रीसाम्बपुराणम्

वह मित्र वायुभक्षण करता है और वह बन्धु के समान चक्षु में स्थित होकर तपस्या कर रहे हैं।।२१।।

अनुगृह्णन् सदा भक्तान् वरैर्नानाविधैस्तु सः।
एवमाद्यमिदं स्थानं पश्चात् साम्बेन निर्मितम् ।।२२।।

वे सर्वदा नानाविध वरों से भक्तों पर अनुग्रह करते हैं। यही है—सूर्य का आदि स्थान (चन्द्रभागा नदी का तट); जिसका निर्माण साम्ब ने कराया था।।२२।।

तत्र मित्रस्थितो यस्मात् तस्मान्मित्रवनं स्मृतम्।
एवं द्वादशभिस्तेन सवित्रा परमात्मना ।।२३।।

मित्र जहाँ अवस्थान करते हैं, उसे मित्रवन कहा गया है। इस प्रकार से सविता द्वादश मूर्तियों में स्थित हैं।।२३।।

इत्येवं द्वादशादित्यं जगद् ज्ञात्वा तु मानवः।
नित्यं श्रुत्वा पठित्वा च सूर्यलोके महीयते ।।२४।।

इति श्रीसाम्बपुराणे द्वादशमूर्त्युपाख्यानं नाम चतुर्थोऽध्यायः

मनुष्यस्वरूप द्वादश आदित्य लोक को जानकर, नित्य सुनकर तथा पाठ करके साधक सूर्यलोक में पूजनीय हो जाता है।।२४।।

श्री साम्बपुराण का द्वादश मूर्त्ति-वर्णन नामक चतुर्थ अध्याय समाप्त

पञ्चमोऽध्यायः

(मित्रवरुणयोस्तपः)

बृहद्वल उवाच
यदि तावदसौ सूर्यश्चादिदेवः सनातनः।
तत् किमर्थं तपस्तेपे वरैस्तु प्राकृतो यथा ॥१॥

बृहद्वल जिज्ञासा करते हैं—यदि सूर्य सनातन आदिदेव हैं, तब वर-प्राप्ति हेतु प्राकृत व्यक्ति के समान उन्होंने तप क्यों किया?॥१॥

वशिष्ठ उवाच
एतत्तेऽहं प्रवक्ष्यामि परं गुह्यं विभावसोः।
पुरा मित्रेण यत् प्रोक्तं नारदाय महात्मने ॥२॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—सूर्य के इस परम रहस्य की कथा तुमसे कहता हूँ। पहले मित्र ने महात्मा नारद से इसे कहा था॥२॥

प्राङ् मयोक्ताश्च यास्तुभ्यं रवेर्द्वादशमूर्त्तयः।
मित्रश्च वरुणश्चोभौ तासां तु तपसि स्थितौ ॥३॥

पहले मैंने तुमसे सूर्य की जिस द्वादश मूर्ति की कथा कही है, उनमें से मित्र तथा वरुण तपस्या में लगे थे॥३॥

अब्भक्षौ वरुणस्ताभ्यां तस्थौ पश्चिमसागरे।
मित्रो मित्रवने चास्मिन् वायुभक्षोऽचरत्तपः ॥४॥

उनमें से वरुण केवल जल पीकर (तप करते हुये) पश्चिम सागर में अवस्थित थे तथा मित्र इस मित्रवन में वायुभक्षण करके तप कर रहे थे॥४॥

अथ मेरोगिरिशृङ्गात् प्रच्युतो गन्धमादनात्।
नारदः सुमहद्भूतः सर्वलोकानचीवरत् ॥५॥
आजगामाथ तत्रैव यत्र मित्रोऽचरत्तपः।
तद्दृष्ट्वा तु तपस्यन्तं तस्य कौतूहलं ह्यभूत् ॥६॥

तदनन्तर मेरुपर्वत के शृङ्ग गन्धमादन से सभी लोकों से होते हुये विचरण करते नारद (देवर्षि) वहाँ आये, जहाँ मित्र तपस्या कर रहे थे। उनको तप करते देखकर नारद को अत्यन्त कुतूहल हो गया॥५-६॥

२२ श्रीसाम्बपुराणम्

योऽक्षयश्चाव्ययश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः।
धृतं चैकात्मना येन त्रैलोक्यमिदमात्मना ॥७॥
यः पिता सर्वदेवानां दैवतं चापि यः परम्।
यजते देवतां कास्तु पितॄन् कान् यजते च सः ॥८॥

जो अक्षय, अव्यय, प्रकट-अप्रकट, सनातन हैं; जिनके एक रूप से यह त्रिभुवन धृत है, जो सभी देवताओं के पिता तथा परम देवता हैं, वे स्वयं किस देवता का यजन कर रहे हैं? किस पितृगण का पूजन कर रहे हैं॥७-८॥

इति सञ्चिन्त्य मनसा तं देवं नारदोऽब्रवीत्।
वेदेषु च पुराणेषु साङ्गोपाङ्गेषु गीयते ॥९॥

नारद मन ही मन ऐसा चिन्तन करके मित्र से पूछने लगे—साङ्गोपाङ्ग वेद तथा पुराणों में कहा गया है कि॥९॥

नारद उवाच

त्वमजः शाश्वतो धाता महाभूतमनुत्तमः।
भूतं भव्यं भविष्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥१०॥

आप ही शाश्वत, अज, धाता (सृष्टिकर्त्ता-धारणकर्त्ता) अनुत्तम महाभूत हैं। भूत-भविष्य-वर्त्तमान सब आपके अन्दर प्रतिष्ठित है॥१०॥

चत्वारो ह्याश्रमा देव गृहस्थाद्यास्तथैव च।
यजन्ते त्वामहरहः नानामूर्त्तिसमाश्रितम् ॥११॥
पिता माता च सर्वस्य दैवतं त्वं हि शाश्वतम्।
यजसे पितरं कं त्वं देवं चापि न वेद्यहम् ॥१२॥

हे देव! गृहस्थ प्रभृति चारो आश्रम दिन-रात नाना मूर्तियों में विद्यमान आपकी पूजा करते रहते हैं। आप ही सभी के पिता, माता तथा नित्य देवता हैं। आप किस पिता अथवा देवता का यजन कर रहे हैं, यह मैं नहीं जानता॥११-१२॥

मित्र उवाच

अवाच्यमेतद् वक्तव्यं परं गुह्यं सनातनम्।
त्वयि भक्तिमति ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि यथातथम् ॥१३॥

मित्र कहते हैं—यह अकथनीय कथा है, परम गोपनीय है। हे ब्रह्मन्! तुझ भक्तिमान से मैं वह यथायथ रूपेण बतलाता हूँ॥१३॥

यत्तत् सूक्ष्ममविज्ञेयमव्यक्तमचलं ध्रुवम्।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च सर्वभूतैश्च वर्जितम् ॥१४॥

पञ्चमोऽध्यायः २३

पञ्चमोऽध्यायः २३

स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चैव कथ्यते।
त्रिगुणव्यतिरिक्तोऽसौ पुरुषश्चेति विश्रुतः ॥१५॥

जो सूक्ष्म, अविज्ञेय, अव्यक्त (अप्रकाश), अचल, ध्रुव (नित्य) हैं; इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ तथा सभी प्राणियों से जो बहिर्भूत हैं, सभी प्राणीगण की अन्तरात्मा तथा क्षेत्रज्ञ हैं। वे त्रिगुणातिरिक्त पुरुषरूपेण विश्रुत हैं॥१४-१५॥

हिरण्यगर्भो भगवान् स वै बुद्धिरिति स्मृतः।
धृतेनैकात्मना येन त्रैलोक्यमिदमात्मना ॥१६॥

वे हिरण्यगर्भ भगवान् जो बुद्धिस्वरूप कहे जाते हैं, जो अपने एक रूप से त्रिलोक को धारण करते हैं॥१६॥

अशरीरः शरीरेषु सर्वेषु निवसत्यसौ।
वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्यति कर्मभिः ॥१७॥

सभी देव-देवियों के शरीर में वे अशरीरी रूपेण निवास करते हैं। सभी शरीर में वास करने पर भी वे कर्मों से लिप्त नहीं होते॥१७॥

ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहसंज्ञिताः।
सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित्क्वचित् ॥१८॥
सगुणो निर्गुणो विश्वो ज्ञानगम्यो ह्यसौ स्मृतः ॥१९॥

वे हम सबकी अन्तरात्मा हैं तथा सभी देहधारियों के साक्षी-स्वरूप हैं। वे कभी भी किसी के द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं हैं। वे सगुण-निर्गुण विश्वरूप तथा ज्ञानगम्य कहे जाते हैं॥१८-१९॥

सर्वतः पाणिपादोऽसौ सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः।
सर्वतः श्रुतिमांल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥२०॥

वे सर्वतः पाणि-पादयुक्त, चक्षु, मस्तक तथा मुखयुक्त हैं। वे सर्वतः (सबके) कर्ण हैं तथा समस्त लोक के सब कुछ को घेर कर अवस्थित हैं॥२०॥

सर्वेन्द्रियगुणावासः सर्वेन्द्रियमथो ह्यसौ।
यथा दीपसहस्राणि स च एकः प्रसूयते ॥२१॥
बुध्यते स यदात्मानं तदा भवति केवलः।
एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च प्रवर्त्तनात् ॥२२॥
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।
ऋते तमेकमीशानं भूतं स्थावरजङ्गमम् ॥२३॥