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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

आचार्य चाणक्य कूटनीति और राजनीति के महान स्तम्भ हैं। उन जैसा नीतिज्ञ पिछले दो हजार वर्षों में अवतरित नहीं हुआ। चाणक्य के ग्रन्थों में उनका अर्थशास्त्र और चाणक्य नीति दो प्रमुख ग्रन्थ हैं। वे एक ऐसे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने मगध के अत्याचारी राजा नन्द का समूल नाश कर, उसके स्थान पर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की तथा अर्थशास्त्र जैसे राजनीति विषयक गूढ़ ग्रन्थ की रचना कर संसार में अपना नाम अमर कर दिया।

विषय सूची • प्रथम अध्याय 15 • द्वितीय अध्याय 28 • तृतीय अध्याय 41 • चतुर्थ अध्याय 52 • पंचम अध्याय 62 • षष्ठम अध्याय 72 • सप्तम अध्याय 84 • अष्टम अध्याय 94 • नवम अध्याय 103 • 'दशम अध्याय 110 • एकादश अध्याय 118 • द्वादश अध्याय 127 • त्रयोदश अध्याय 138 • चतुर्दश अध्याय 146 • पंचदश अध्याय 154 • षोडश अध्याय 163 • सप्तदश अध्याय 172

अध्याय १-३: धर्म, विद्या व सज्जन-दुर्जन लक्षण

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पाद-टिप्पणी (Footer Metadata): CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

॥ अथ प्रथम अध्याय ॥ प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम्। नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम्॥ सर्वशक्तिमान तीनों लोकों के स्वामी श्री विष्णु भगवान को शीश नवाकर मैं अनेक शास्त्रों से निकाले गए राजनीति सार के तत्त्व को जन कल्याण हेतु समाज के सम्मुख रखता हूं॥1॥ राजनीति के प्रकाण्ड विद्वान चाणक्य तक्षशिला विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के आचार्य थे। यहां प्रारम्भ में वे उस परम पिता परमात्मा का स्मरण करते हैं और राजनीति के सार तत्त्व को जन-मानस के संम्मुख रखते हैं। अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः। धर्मोपदेशविख्यातं कार्याऽकार्य शुभाशुभम्॥ इस राजनीति शास्त्र का विधिपूर्वक अध्ययन करके यह जाना जा सकता है कि कौन-सा कार्य करना चाहिए और कौन-सा कार्य नहीं करना चाहिए। यह जानकर वह एक प्रकार से धर्मोपदेश प्राप्त करता है कि किस कार्य के करने से अच्छा परिणाम निकलेगा और किससे बुरा। उसे अच्छे बुरे का ज्ञान हो जाता है॥2॥ 15 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

चाणक्य का मत है कि राजनीति में कभी-कभी कुछ कर्म ऐसे दिखाई पड़ते हैं जिन्हें देखकर सोचना पड़ता है कि यह उचित हुआ या अनुचित, परंतु जिस अनीति कार्य से भी जन-कल्याण होता हो अथवा धर्म का पक्ष प्रबल होता हो तो उस अनैतिक कार्य को भी नीति सम्मत ही माना जाएगा। उदाहरण के रूप में महाभारत के युद्ध में युधिष्ठिर द्वारा 'अश्वत्थामा' की मृत्यु का उद्घोष करना यद्यपि नीति विरुद्ध था, पर नीति कुशल योगीराज कृष्ण ने इसे उचित माना था, क्योंकि वे गुरु द्रोणाचार्य के विकट संहार से अपनी सेना को बचाना चाहते थे। तदहं संप्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया। येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते॥ लोगों की हित कामना से मैं यहां उस शास्त्र को कहूंगा, जिसके जान लेने से मनुष्य सब कुछ जान लेने वाला-सा हो जाता है॥3॥ यहां चाणक्य ने संकेत दिया है कि जो व्यक्ति राजनीति से सम्बन्धित उनकी नीतियों को जान लेगा, वह राजनीति का प्रकाण्ड पंडित हो जाएगा। वस्तुतः चाणक्य ने राजनीति के विषय में शास्त्रों का गूढ़ अध्ययन किया था तथा उनका सूक्ष्म परीक्षण भी किया था। अपने जीवन का अनुभव उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ इन श्लोकों में उतार दिया है। मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च। दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति॥ मूर्ख छात्रों को पढ़ाने तथा दुष्ट स्त्री के पालन-पोषण से और दुःखियों के साथ संबंध रखने से, बुद्धिमान व्यक्ति भी दुःखी होता है। तात्पर्य यह कि मूर्ख शिष्य को कभी भी उचित 16

उपदेश नहीं देना चाहिए, पतित आचरण वाली स्त्री की संगति करना तथा दुःखी मनुष्यों के साथ समागम करने से विद्वान तथा भले व्यक्ति को दुःख ही उठाना पड़ता है॥4॥ वास्तव में शिक्षा उसी व्यक्ति को देनी चाहिए जो सुपात्र हो। जो व्यक्ति बताई गई बात को न समझे, उसे परामर्श (शिक्षा) देने से कोई लाभ नहीं। मूर्ख व्यक्ति को शिक्षा देकर समय ही नष्ट किया जाता है। इसी तरह पतिता स्त्री का भरण-पोषण अथवा उसकी संगति करके विद्वान व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंच सकती है, उसका अपमान हो सकता है। यही बात दुःखी व्यक्ति के साथ संबंध रखने की है। दुःखी व्यक्ति हर पल अपना ही रोना रोता रहता है। इससे विद्वान व्यक्ति की साधना और एकाग्रता भंग हो जाती है। एकाग्रता भंग होना अथवा साधना में व्यवधान पड़ना बुद्धिमान व्यक्ति को बहुत कचोटता है। दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः। ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः॥ दुष्ट स्त्री, छल करने वाला मित्र, पलटकर तीखा जवाब देने वाला नौकर तथा जिस घर में सांप रहता हो, उस घर में निवास करने वाले गृहस्वामी की मौत में संशय न करें। वह निश्चित मृत्यु को प्राप्त होता है॥5॥ घर में यदि दुष्ट और दुश्चरित्र पत्नी हो तो उसके पति का जीना, न जीने के बराबर ही है। वह अपमान और लज्जा के बोझ से एक तो वैसे ही मृतक समान है, ऊपर से उसे सदैव यह भय भी बना रहता है कि यह स्त्री अपने स्वार्थ के लिए कहीं उसे विष न दे दे, क्योंकि ऐसी दुष्ट और पतिता स्त्रियों 17 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

का कोई पतिव्रत धर्म नहीं होता। उन्हें तो केवल अपनी ऐयाशी से मतलब होता है। दूसरे, यदि उस गृहस्वामी का मित्र भी दगाबाज हो, धोखा देने वाला हो तो ऐसा 'मित्र' आस्तीन का सांप होता है। वह कभी भी अपने स्वार्थ के लिए गृहस्वामी को ऐसी स्थिति में डाल सकता है, जिससे उबरना उसकी सामर्थ्य से बाहर की बात होती है, तब वह जीते-जी मर जाता है। तीसरे, घर में यदि नौकर बद्जुबान हो, बात-बात में झगड़ा करने वाला हो, पलटकर तीखा जवाब देने वाला हो तो समझ लेना चाहिए कि ऐसा नौकर निश्चित रूप से घर के भेद जानता है और जो घर के भेद जान लेता है, वह उसी तरह से घर-बार का विनाश कर सकता है, जैसे विभीषण ने घर के भेद देकर रावण का विनाश करा दिया था, तभी मुहावरा भी बना—'घर का भेदी लंका ढाये।' जब घर का ही विनाश हो जाए तो उस घर के गृहस्वामी की स्थिति मरे हुए के ही समान है। चौथे, जिस घर में छिपकर रहने वाले सांप की सम्भावना हो तो गृहस्वामी को निरन्तर यह भय बना रहेगा कि सांप उसे डस न ले। इस प्रकार मृत्यु का भय मृत्यु से भी भयानक होता है। वह शीघ्र ही भय और चिंता से ग्रसित होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार चाणक्य ने राजा अथवा गृहस्वामी को दुष्टा स्त्री, आस्तीन के सांप मित्र, वाचाल नौकर और घर में छिपे सांपों अर्थात दुश्मनों से सदैव सतर्क रहने की शिक्षा इस श्लोक में दी है। भाव यह है कि राजा को अपनी पत्नी, नौकर और मित्र का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना चाहिए ताकि घर में छिपे दुश्मनों का सिर कुचला जा सके। 18 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥ विपत्ति के समय काम आने वाले धन की रक्षा करें। धन से स्त्री की रक्षा करें और अपनी रक्षा धन और स्त्री से सदा करें॥6॥ संकट के समय धन की जरूरत सभी को होती है इसलिए संकट काल के लिए धन बचाकर रखना उत्तम होता है। धन से अपनी पत्नी की रक्षा की जा सकती है, अर्थात यदि परिवार पर कोई संकट आए तो धन का लोभ नहीं रखना चाहिए, परंतु यदि अपने ही ऊपर कोई संकट आ जाए तो उस समय धन व स्त्री दोनों का बलिदान कर देना चाहिए। चाणक्य का कहना यह है कि यद्यपि परिवार में धन और अपनी स्त्री का सर्वाधिक महत्त्व है किन्तु यदि अपना ही जीवन संकट में पड़ जाए तो वह न तो अपने धन की रक्षा कर पाएगा और न अपनी स्त्री की ही रक्षा कर पाएगा। इससे तो अच्छा यही है कि वह अपने को बचाने के लिए धन और स्त्री का मोह छोड़ दे, अर्थात परिवार की स्त्रियों की लाज बचाने के लिए उन्हें जौहर व्रत का पालन करने की आज्ञा दे देनी चाहिए। अपादर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुतआपदः। कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति। आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करें क्योंकि पता नहीं कब आपदा आ जाए। लक्ष्मी तो चंचल है। संचय किया गया धन कभी भी नष्ट हो सकता है॥7॥ लक्ष्मी का स्वभाव चंचल माना गया है, अर्थात धन आज है, कल नहीं होगा। वह कभी भी साथ छोड़कर जा सकता 19 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

है इसलिए संकटकाल के लिए धन की रक्षा अत्यंत जरूरी है, इसका एक आशय यह भी है कि मनुष्य को सदैव लक्ष्मी का ही विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि लक्ष्मी तो चंचल होती है। उसे अपने पुरुषार्थ और कर्म पर भी भरोसा रखना चाहिए, ताकि लक्ष्मी के साथ छोड़े जाने के बाद वह अपने आपको असहाय अनुभव न करने लगे। यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः। न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत्॥ जिस देश में सम्मान नहीं, आजीविका के साधन नहीं, बन्धु-बांधव अर्थात परिवार नहीं और विद्या प्राप्त करने के साधन नहीं, वहां कभी नहीं रहना चाहिए॥8॥ यह एक सामान्य-सी बात है कि आदमी वहीं रहना पसंद करता है, जहां उसे सम्मान मिले। जीवन-यापन के साधन जहां सुलभ हों, जहां उसके बंधु-बांधव और मित्रगण आदि रहते हों तथा जहां रहकर वह स्वयं और अपने बच्चों को शिक्षित करा सके, अर्थात जहां विद्याध्ययन के अच्छे साधन उपलब्ध हों। जहां ऐसी परिस्थितियां और साधन उपलब्ध नहीं होते, वहां रहने वाले लोग सम्पूर्ण संसार से कटकर जल्दी ही नष्ट हो जाते हैं। धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्॥ जहां धनी, वैदिक ब्राह्मण, राजा, नदी और वैद्य, ये पांच न हों, वहां एक दिन भी नहीं रहना चाहिए। भावार्थ यह कि जिस जगह पर इन पांचों का अभाव हो, वहां मनुष्य को एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिए॥9॥ मनुष्य-जीवन के लोक-परलोक को संवारने में इन 20 .

पांचों का विशेष महत्त्व है। जहां धनी व्यक्ति होंगे, वहां व्यापार अच्छा होगा। व्यापार अच्छा होगा तो आजीविका के साधन अच्छे होंगे। जहां श्रुतियों अर्थात वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण होंगे, वहां मनुष्य जीवन के धार्मिक तथा ज्ञान के क्षेत्र में विस्तृत रूप से फैले हुए सभी शैक्षिक कार्यों को सहज रूप से सम्पन्न कर सकेगा। जहां स्वच्छ जल की नदी होगी, वहां जल का अभाव नहीं रहेगा और जहां कुशल वैद्य होंगे, वहां बीमारी पास नहीं आ सकेगी। इसी तरह शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप देने के लिए राजा की आवश्यकता होती है और नदी अर्थात जल के बिना तो जीवन अधूरा है ही—इस प्रकार ये पांचों मनुष्य के सामाजिक जीवन के लिए परम आवश्यक हैं। जहां इनका अभाव हो वहां भूलकर भी निवास नहीं करना चाहिए। लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्त तत्र संस्थितिम्॥ जहां जीविका, भय, लज्जा, चतुराई और त्याग की भावना, ये पांचों न हों, वहां के लोगों का साथ कभी न करें॥10॥ जिस स्थान पर जीवन-यापन के साधन न हों, जहां सदैव भय की स्थितियां बनी रहती हों, जहां लज्जाशील व्यक्तियों की जगह बेशर्म और खुदगर्ज लोग रहते हों, जहां कला-कौशल और हस्तशिल्प का सर्वथा अभाव हो और जहां के लोगों के मन में जरा भी त्याग और परोपकार की भावनाएं न हों, वहां के लोगों के साथ न तो रहें और न ही उनसे व्यवहार करें। इसका भाव यही है कि आदमी को ऐसे स्थान पर रहना चाहिए जहां के लोग ईश्वर-भक्त हों, परोपकारी हों, व्यवहार-कुशल हों, आत्मसम्मानी हों, कर्मठ हों और बुद्धिमान हों। 21

जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनाऽऽगमे। मित्रं चाऽऽपत्तिक़ालेषु भार्यां च विभवक्षये॥ नौकरों को बाहर भेजने पर, भाई-बंधुओं को संकट के समय तथा दोस्त को विपत्ति में और अपनी स्त्री को धन के नष्ट हो जाने पर परखना चाहिए, अर्थात उनकी परीक्षा करनी चाहिए।।11।। चाणक्य ने समय-समय पर अपने सेवकों, भाई-बंधुओं, मित्रों और अपनी स्त्री की परीक्षा लेने की बात कही है, समय आने पर ये लोग आपका किस प्रकार साथ देंगें, इसकी जांच उनके कार्यों से होती है। वास्तव में इस संसार में मनुष्य का संपर्क अपने सेवकों, बंधु-बांधवों, मित्रों और सबसे निकट अपनी पत्नी से होता है। यदि ये लोग छल करने लगें तो जीवन दूभर हो जाता है, इसलिए समय-समय पर अपने मित्रों, सेवकों, बंधु-बांधवों व अपनी पत्नी की परीक्षा करके पहचान करना जरूरी हो जाता है कि वे उसे धोखा तो नहीं दे रहे हैं। इस संसार में मित्र और पत्नी से बड़ा सहायक कोई दूसरा नहीं होता, परंतु इनकी पहचान तभी हो पाती है जब संकट का समय उपस्थित होता है। आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे। राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥ बीमारी में, विपत्तिकाल में, अकाल के समय, दुश्मनों से दुःख पाने या आक्रमण होने पर, राजदरबार में और श्मशान-भूमि में जो साथ रहता है, वही सच्चा भाई अथवा बंधु है।।12।। आचार्य चाणक्य के अनुसार संसार में मनुष्य के बंधु-बांधव तो बहुत होते हैं, लेकिन सच्चे बंधु कम ही मिलते हैं। अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग अपना उद्देश्य (स्वार्थ) पूरा

करने के लिए सच्चा मित्र, सच्चा बंधु होने का ढोंग रचाते हैं और जब अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाता है तो किनारा कर लेते हैं। सच्चा बंधु (सगा, संबंधी, घनिष्ठ मित्र) केवल वही है जो दैहिक, दैविक और भौतिक, किसी भी प्रकार का संकट पड़ने पर काम आए। यदि व्यक्ति रोगी हो गया है तो उसकी परिचर्या करने में और अकाल आदि पड़ने पर अपने बंधु की यथासंभव मदद करे। शत्रु द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर, किसी भी प्रकार की राजकीय समस्या आ जाने पर और शोक के अवसर पर बराबर साथ दे—वही सच्चे अर्थों में बंधु कहलाने का अधिकारी है। दूसरे अर्थों में जब मनुष्य के पास सभी सुख-समृद्धि हो, उसे किसी प्रकार का कोई दुःख न हो तो सभी उसके मित्र बने रहते हैं, परंतु जब वह दुःख से घिर जाता है तो उसका कोई साथ नहीं देता। इस संसार में सभी सुख के साथी हैं, दुःख पड़ने पर कोई भी सहायता करने को तैयार नहीं होता और जो सहायता करता है, वही मनुष्य का सच्चा बंधु अथवा मित्र कहलाता है। यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते। ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च॥ जो अपने निश्चित कर्मों अथवा वस्तु का त्याग करके, अनिश्चित की चिंता करता है, उसका अनिश्चित लक्ष्य तो नष्ट होता ही है, निश्चित भी नष्ट हो जाता है।।13।। किसी ने सही कहा है—'आधी को छोड़, सारी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे।' जो व्यक्ति अपने निश्चित लक्ष्य से भटक जाता है, उसका कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं होता। भाव यही है कि आदमी को उन्हीं कार्यों में हाथ डालना चाहिए, जिन्हें वह पूरा करने की सामर्थ्य रखता है। यदि वह अपनी 23

सामर्थ्य से बाहर का कोई काम पकड़ लेता है तो वह उसे पूरा नहीं कर पाता, तब वह बाद में पछताता है कि उसने अपने हाथ का काम छोड़कर दूसरे कार्य को क्यों पकड़ा। वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम्। रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले॥ बुद्धिहीन व्यक्ति को अच्छे कुल में जन्म लेने वाली कुरूप कन्या से भी विवाह कर लेना चाहिए, परंतु अच्छे रूप वाली नीच कुल की कन्या से विवाह नहीं करना चाहिए क्योंकि विवाह-संबंध समान कुल में ही श्रेष्ठ होता है।।14।। यहां चाणक्य ने विवाह संबंधों पर प्रकाश डालते हुए समाज को बताया है कि विवाह-संबंध समान स्तर और गुण वाले कुल में ही करने चाहिए। केवल रूप देखकर उसके पीछे नहीं भागना चाहिए। यह हो सकता है कि अच्छे रूप वाली युवती का पारिवारिक परिवेश उत्तम न हो, उसके संस्कार कुलीन अथवा श्रेष्ठ न हों। ऐसी पत्नी जीवन में विष घोलने का ही कार्य करती है। दूसरी ओर कम सुंदर युवती अच्छे संस्कारों में पली होने के कारण दाम्पत्य-जीवन को सुखमय स्वर्ग में परिवर्तित कर सकती है। अतः रूप देखकर नहीं, जीवन साथी के गुण, संस्कार और कुल की गरिमा को परखकर विवाह रचाना श्रेष्ठ होता है, परंतु आजकल युवक इस ओर ध्यान न देकर युवती के रूप पर ही आसक्त होते दिखाई पड़ते हैं। नखीनां च नदीनां च शृंगीणां शस्त्रपाणिनाम्। विश्वासो नैव कर्त्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च॥ लम्बे नाखून वाले हिंसक पशुओं, नदियों, बड़े-बड़े सींग वाले पशुओं, शस्त्रधारियों, स्त्रियों और राज-परिवारों का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।।15।। CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

यहां चाणक्य लम्बे-पैने नाखून और सींगधारी पशुओं के माध्यम से यही बताना चाहते हैं कि हिंसक पशुओं पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए। उनकी स्वाभाविक वृत्ति आक्रमणकारी होती है। वे कभी भी आक्रमण करके घायल कर सकते हैं और मृत्यु की ओर धकेल सकते हैं। इसी प्रकार नदी का वेग और उसकी गहराई के बारे में पूर्वानुमान लगाना कभी-कभी भारी खतरे में डाल देता है। नदी-तल में कोई गहरा गड्ढा छिपा हो सकता है और उसमें अचानक बाढ़ आ सकती है। पहाड़ों पर हुई वर्षा का जल कभी भी नदी में बढ़ सकता है इसलिए नदी के स्वभाव के बारे में भी कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, अर्थात अपने बचाव का प्रबंध किए बिना जल में प्रवेश नहीं करना चाहिए। यही दशा शस्त्रधारियों, स्त्रियों और राज-परिवारों की भी होती है। शस्त्रधारी कभी भी अपने शस्त्र का प्रयोग कर सकता है, स्त्री कभी भी धोखा दे सकती है और राज-परिवारों की स्वार्थ नीति पल-प्रतिपल बदलती रहती है। अतः इनसे सदैव सतर्क रहना चाहिए। विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम्। नीचादप्युत्तमा विद्या स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि॥ विष से अमृत, अशुद्ध स्थान से सोना, नीच कुल वाले से विद्या और दुष्ट स्वभाव वाले कुल की गुणी स्त्री को ग्रहण करना अनुचित नहीं है।।16।। चाणक्य की इस नीति का आशय यही है कि यदि विष से अमृत प्राप्त होता हो, अर्थात किसी ऐसी जहरीली जड़ी-बूटी से दुसाध्य रोग का निदान होता हो, जैसे सांप के जहर से ही सांप के काटे का इलाज करने वाली दवा बनाई जाती है तो उसे 25 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

स्वीकार करने में देर नहीं लगानी चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी अशुद्ध स्थान पर स्वर्ण अथवा स्वर्ण से निर्मित आभूषण पड़े मिलें तो उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। भाव यह है कि गुण जहां से भी मिलें, उन्हें ग्रहण करने में संकोच नहीं करना चाहिए। दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति में भी अगर कोई सद्गुण है तो उसे अवश्य ही ग्रहण करना चाहिए। यही बात आगे भी कही गई है कि यदि नीच कुल वाले व्यक्ति से श्रेष्ठ विद्या प्राप्त हो तो उसे तत्काल ग्रहण करें और दुष्ट कुल में जन्म लेने वाली स्त्री में यदि कुलीन गुणों अथवा किसी विशेष कला का प्रादुर्भाव हुआ हो तो उस स्त्री को पाने में संकोच नहीं करना चाहिए। भाव यही है कि श्रेष्ठ गुण जहां से भी और जिस स्थिति में भी प्राप्त होते हों, उन्हें ग्रहण करना श्रेष्ठता का ही प्रतीक है। स्त्रीणां द्विगुण आहारो बुद्धिस्तासां चतुर्गुणाः। साहसं षड्गुणं चैव कामोऽष्टगुण उच्यते॥ पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का भोजन दुगुना, लज्जा चौगुनी, साहस छः गुना और काम (रति इच्छा) आठ गुना अधिक होता है॥17॥ चाणक्य के अनुसार स्त्रियां पुरुषों से दो गुना भोजन करती हैं। स्त्रियों में लाज का भाव पुरुष से चार गुना होता है। उनमें साहस पुरुष से छः गुना होता है, अर्थात स्त्री किसी भी पुरुष से अधिक सहनशील और साहसी होती है। इसके अतिरिक्त स्त्री में रति इच्छा पुरुष से आठ गुना अधिक होती है। चाणक्य ने ये निष्कर्ष किस आधार पर निकाले थे इस विषय में विश्वासपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में आज की स्थिति सर्वथा भिन्न है। आज पुरुष 26

का भोजन निश्चित रूप से स्त्री से अधिक है। लज्जा के बारे में निश्चित ही कहा जा सकता है कि स्त्री में लज्जा पुरुष से कहीं अधिक होती है। स्त्री पुरुष की भांति बेशर्म नहीं हो सकती। तीसरे, साहस के मामले में भी पुरुष स्त्री से कहीं अधिक साहसी होता है परंतु सहनशीलता में स्त्री पुरुष से मीलों आगे है। स्त्री के मन की थाह पाना आसान नहीं है। वह अत्यन्त साहस के साथ कितनी ही निजी जीवन की बातों को छिपाकर रख सकती है। जहां तक उसमें काम-भावना की बात है, तो पुरुष ही उससे अधिक कामी दिखाई पड़ता है। स्त्री एक पुरुष के साथ सारा जीवन गुजार सकती है, पर एक कामुक पुरुष एक स्त्री से संतुष्ट नहीं हो पाता। इतना अवश्य सुना है कि स्त्री जब कामांध होती है, तब उसे रोक पाना किसी के भी बूते के बाहर होता है। यदि इसे चाणक्य ने आधार माना है तो ठीक ही है। 27

§ अथ द्वितीय अध्याय § अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलुब्धता। अशौचत्वं निर्दयत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥ झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, छल-कपट, मूर्खता, अत्यधिक लालच करना, अशुद्धता और दयाहीनता, ये सभी प्रकार के दोष स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से मिलते हैं।।1।। स्त्रियों के विषय में चाणक्य की उपर्युक्त धारणा का कारण क्या रहा था, यह कहना तो कठिन है, परंतु सभी स्त्रियों में ये स्वाभाविक दुर्गुण हों, यह संभव नहीं है। चाणक्य के काल में स्त्री-शिक्षा का निश्चित रूप से अकाल रहा होगा। इसी आधार पर चाणक्य ने स्त्री को मूर्ख, लालची, अशुद्ध, झूठी, छली आदि कहा होगा, लेकिन दयाहीनता की भावना स्त्री का स्वाभाविक दोष नहीं माना जा सकता। इनमें से बहुत-से दोष पुरुषों में भी देखे जा सकते हैं। बल्कि झूठ बोलना, छल-कपट करना, दयाहीनता, लालच आदि दोष तो पुरुष वर्ग में ही अधिक पाए जा सकते हैं। गुण और दोष स्वभाव से भी होते हैं और उन्हें अर्जित भी किया जाता है, परंतु ये सभी परिस्थिति पर अधिक निर्भर करते हैं। 28 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर्वर्रांगना। विभवो दानशक्तिश्च नाऽल्पस्य तपसः फलम्॥ भोजन करने तथा उसे अच्छी तरह से पचाने की शक्ति हो तथा अच्छा भोजन समय पर प्राप्त होता हो, प्रेम करने के लिए अर्थात रति-सुख प्रदान करने वाली उत्तम स्त्री के साथ संसर्ग हो, खूब सारा धन और उस धन को दान करने का उत्साह हो, ये सभी सुख किसी तपस्या के फल के समान हैं, अर्थात कठिन साधना के बाद ही प्राप्त होते हैं॥2॥ चाणक्य का विश्वास है कि शुद्ध और सुपाच्य भोजन का मिलना और उसे अच्छी तरह पचाने की शक्ति भाग्य से ही मिलती है या फिर अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा ही गरिष्ठ अथवा पौष्टिक भोजन पचाया जा सकता है और अच्छे स्वास्थ्य वाला व्यक्ति ही स्त्री के साथ रति-सुख का आनन्द ले सकता है। स्वस्थ व्यक्ति पूरे उत्साह के साथ धन भी उपार्जित कर सकता है और उसी उत्साह से उसे दान करने की क्षमता भी अपने भीतर उत्पन्न कर सकता है। जो स्वस्थ नहीं है, कमजोर है, जिसकी पाचन क्रिया ठीक नहीं है, जो सदैव बीमार और रोगग्रस्त रहता है, उसे यदि अच्छा भोजन, स्वस्थ और सुंदर युवती तथा विपुल धन-वैभव प्राप्त हो भी जाए तो वह उनका उपयोग नहीं कर सकता। अतः अच्छा स्वास्थ्य साधना के द्वारा ही संभव है। यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दाऽनुगामिनी। विभवे यश्च संतुष्टस्तस्य स्वर्ग इहैव हि॥ जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो, स्त्री उसके अनुसार चलने वाली हो, अर्थात पतिव्रता हो, जो अपने पास धन से संतुष्ट रहता हो, उसका स्वर्ग यहीं पर है॥3॥ 29 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

मनुष्य को आज के जीवन में अथवा किसी भी काल में क्या चाहिए? यही कि उसकी संतान उसके कहने में चलती हो, आज्ञाकारी हो। उसकी स्त्री पतिव्रता हो, अर्थात् उसी के प्रति पूरी तरह समर्पित हो और जो धन-वैभव उसे मिला हो, वह उसी पर संतोष धारण किए हो तो उसे किसी स्वर्ग को परलोक में तलाश करने की आवश्यकता नहीं है। वह सुख, वह स्वर्ग तो उसके पास इसी लोक में है। कहने का आशय यही है कि आदमी को सदैव संतोषी होना चाहिए। उसे परमात्मा ने जो दिया है या प्रयत्न से उसने जो कुछ भी अर्जित किया है, वह उसी पर संतोष करे। कहा भी है—'संतोष सबसे बड़ा धन है।' इसी प्रकार यदि उसने अपनी संतान में श्रेष्ठ गुणों का समावेश कराया है तो उसकी संतान निश्चित रूप से आज्ञाकारी होगी। यह स्वभाव भी तभी उत्पन्न होता है, जब उसने अपने बच्चों को भी संतोष करना सिखाया हो। यही स्थिति पत्नी के साथ भी है। पत्नी में यदि कहीं असंतोष की भावना पनप रही है तो वह भावना उसी तक सीमित नहीं रहती, वह उसके बच्चों में भी पनपने लगती है। इस प्रकार असंतोष के जन्म लेते ही सारा परिवार बिखरकर रह जाता है और जो व्यक्ति अपने ही परिवार से अप्रसन्न हो, परेशान हो, वह व्यक्ति धनवान होते हुए भी नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हो जाता है। मूल भाव यही है कि परिवार का पूरा उत्तरदायित्व यदि पिता संभालता है तो निश्चित रूप से उसकी पत्नी तथा उसकी संतान उसकी आज्ञाकारिणी होगी। 30

ते पुत्रा ये पितृर्भक्ताः सः पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या यत्र निर्वृतिः॥ पुत्र वे ही हैं जो पिता भक्त हैं। पिता वही है जो बच्चों का पालन-पोषण करता है। मित्र वही है जिसमें पूर्ण विश्वास हो और स्त्री वही है जिससे परिवार में सुख-शान्ति व्याप्त हो।।4।। जो पुत्र अपने माता-पिता की सेवा करता है, वही वास्तव में पुत्र कहलाने का अधिकारी है। इतिहास में श्रवण कुमार की पितृ-भक्ति की कथा मिलती है, परंतु यह तभी संभव है, जब पिता भी अपने बच्चों के भरण-पोषण के दायित्व को समझता हो। यदि पिता अपने बच्चों के भरण-पोषण की चिंता न करके अपने ही व्यसनों में लिप्त रहता है तो न तो उसके बच्चे उसका आदर करेंगे और न उसकी पत्नी ही उसके प्रति समर्पित होगी। मित्र की परख बड़ी कठिन है। कठिन स्थितियों में जो बराबर साथ देता है, उसे मित्र समझा जा सकता है। इसके अलावा जिस स्त्री के हाव-भाव से स्नेह की वर्षा होती है, जिसकी वाणी में मिठास होती है, जिसमें गहरी सहनशक्ति होती है, जो हर परिस्थिति में परिवार को संजोए रहती है, जो दुर्दिन में पति की सबसे बड़ी संबल बनी रहती है, जो कुशल गृहिणी के कर्तव्य का पूरा-पूरा पालन करती है, ऐसी पत्नी से घर सुख-शान्ति से भरपूर रहता है। परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥ जो मित्र प्रत्यक्ष रूप से मधुर वचन बोलता हो और पीठ पीछे अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से आपके सारे कार्यों में रोड़ा अटकाता हो, ऐसे मित्र को उस घड़े के समान त्याग देना चाहिए जिसके भीतर विष भरा हो और ऊपर मुंह के पास दूध भरा हो।।5।। 31