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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

नवीन संस्करण : 2012 ● सम्पूर्ण चाणक्य नीति : आचार्य चाणक्य © सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन ISBN: 81-7604-812-7 भारतीय कॉपीराइट एक्ट के तहत प्रस्तुत पुस्तक में निहित समस्त प्रकाशित सामग्री के कॉपीराइट राजा पॉकेट बुक्स के पास सुरक्षित हैं। अतः कोई भी व्यक्ति अथवा कम्पनी इस पुस्तक का नाम, कवर डिजाइन, प्रकाशित लेख इत्यादि को किसी भी तरह से तोड़-मरोड़कर आंशिक या पूर्ण रूप से किसी पुस्तक अथवा किसी सामयिक (न्यूजपेपर, मैगजीन इत्यादि) में प्रकाशक से बिना लिखित अनुमति के प्रकाशित करने की चेष्टा न करें, अन्यथा समस्त कानूनी हर्जे-खर्चे के स्वयं जिम्मेदार होंगे। किसी भी प्रकार के मुकदमे के लिए न्यायक्षेत्र दिल्ली रहेगा। प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स 330/1, मेन रोड, बुराड़ी, दिल्ली-110084 फोन : 27611410, 27612036, 27612039, 32938774 ई-मेल : sales@rajcomics.com वेबसाइट : www.rajapocketbooks.com शोरूम (होलसेल व रिटेल बिक्री केंद्र) राजा पॉकेट बुक्स 112, फर्स्ट फ्लोर, दरीबा कलां, दिल्ली-110006 फोन : 23251092, 23251109, 32500860 मुद्रक दुर्गा ऑफसेट प्रिंटर्स फेस-4, नं.-82, कुंडली (हरियाणा) मूल्य : ₹ 80/-

प्रकाशकीय 'चाणक्य नीति' भारतीय इतिहास और संस्कृति की ऐसी अनमोल निधि है, जिस पर हम भारत के नागरिक गर्व से मस्तक ऊंचा करके इस बात को कह सकते हैं कि भारतीय दार्शनिक, चिंतक, विचारक और लेखक यूनान के विद्वानों से किसी भी तरह कम नहीं रहे। लगभग दो हज़ार चार सौ वर्ष पूर्व नालन्दा महाविद्यालय के आचार्य चाणक्य ने उस काल की व्यवस्था का वर्णन अपनी 'चाणक्य नीति' में किया है, जिसके द्वारा मित्र-भेद से लेकर दुश्मन तक की पहचान, पति-परायण तथा चरित्रहीन स्त्रियों में विभेद, राजा का कर्त्तव्य और जनता के अधिकारों तथा वर्ण-व्यवस्था का उचित निदान हो जाता है। महापण्डित आचार्य चाणक्य की 'चाणक्य नीति' के सत्रह अध्याय हैं। वे वेदान्त द्वारा निर्दिष्ट मानव के सूक्ष्म शरीर के सत्रह अवयवों—पांच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान), पांच ज्ञानेन्द्रियां (नेत्र, श्रोत्र, नासिका, जिह्वा तथा त्वचा), पांच कर्मेन्द्रियां (हाथ, पैर, गुदा, लिंग व वाणी), एक मन, एक बुद्धि (5+5+5+1+1=17) के प्रतीक हैं। इस प्रकार इस ग्रंथ के सत्रह अध्यायों के ज्ञान से मनुष्य के सूक्ष्म शरीर के सत्रह अवयवों का कल्याण होता है। महात्मा चाणक्य की एक और रचना 'चाणक्य सूत्र' अपने आप में एक महान ग्रंथ है। इस रचना में आचार्य ने एक-एक सूत्र में मानो गागर में सागर भर दिया है। यह रचना न केवल भारत की भावी पीढ़ियों के लिए वरदान है, बल्कि संपूर्ण संसार इसी से अभिभूत है। आचार्य चाणक्य ने अपने छोटे-छोटे सूत्रों में राजा से लेकर जन-साधारण तक के लिए जैसी आचार संहिता बनाई थी, वह आचार्य चाणक्य जैसे किसी अत्यंत निपुण व्यक्ति द्वारा ही संभव थी। चाणक्य के सूत्रों से जो तेज, दृढ़ता, साहस,

आत्म-विश्वास और समाज-सुधार की भावनाएं हमें प्राप्त होती हैं, उनका कोई साक्षी नहीं है। निःसंदेह आचार्य चाणक्य का जीवन-चरित्र अनुकरणीय है। विश्वबंधुत्व का प्रथम सूत्रपात उन्होंने ही किया था। संकट को भांप लेने की उनमें अद्भुत शक्ति थी। उनके व्यक्तित्व में कूटनीति की पराकाष्ठा थी। वे स्वार्थ या लालच से कोसों दूर थे। यदि चाणक्य न होते तो चंद्रगुप्त का नाम इतिहास के पन्नों पर न मिलता। चाणक्य अपने आप में एक इतिहास हैं। ढाई गज की मात्र एक धोती पहनने वाले इस ब्राह्मण ने अपने बुद्धि-चातुर्य से न केवल अपना संकल्प पूरा किया, बल्कि विश्व विजय का स्वप्न देखने वाले सिकंदर को भी चंद्रगुप्त के हाथों करारी शिकस्त दिलवाई। 'संपूर्ण चाणक्य नीति' नामक इस पुस्तक में चाणक्य की नीतियों को प्रकाशित किया गया है। जिससे पाठकों को चाणक्य की नीतियों की जानकारी प्राप्त हो सके। साथ ही चाणक्य का संक्षिप्त जीवन परिचय भी दिया गया है। इस बहुमूल्य ग्रंथ का संस्कृत भाषा से हिन्दी भाषा में अनुवाद इस उद्देश्य से किया जा रहा है, ताकि साधारण हिन्दी जानने वाले भी इससे लाभान्वित हो सकें। प्रस्तुत पुस्तक में ज्ञान का ऐसा सम्मिश्रण है कि जो एक बार इसका अध्ययन कर लेता है, वह न केवल कार्यक्षेत्र का, बल्कि अपने व्यक्तित्व का समुचित विकास भी कर सकता है। 'राजा पॉकेट बुक्स' से ही एक बड़ी पुस्तक 'सम्पूर्ण चाणक्य नीति, सूत्र व जीवन परिचय' मात्र 150/- में प्रकाशित की गई है। अगर आपने उसे न पढ़ा हो तो अवश्य पढ़ें। —प्रकाशक CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

प्रस्तावना 'चाणक्य' विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक चरित्र है। नालन्दा विश्वविद्यालय का आचार्य, महापण्डित चाणक्य अपने समय का एक ऐसा क्रान्तिदृष्टा विचारक और प्रबुद्ध राजनीतिज्ञ था, जो इतिहास को एक नया मोड़ देने की क्षमता रखता था। वह अत्यन्त दूरदर्शी और कुशाग्र बुद्धि का स्वामी था। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी का यह वह काल था, जब भारत के पश्चिमोत्तर इलाके से विदेशी शक्तियां भारत पर आक्रमण कर रही थीं। भारत की विपुल सम्पदा का लालच उन्हें यहां खींचकर ला रहा था। उस समय समस्त भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। कोई भी राजा अपने पड़ोसी राजा की सहायता के लिए तैयार नहीं था। सभी अपने-अपने राज्य की सीमाओं में सिमटे, अपनी स्वार्थ-सिद्धि में ही अपनी शक्ति को नष्ट कर रहे थे। एक राष्ट्र की भावना को दूर-दूर तक कोई नहीं जानता था। दूसरे अर्थों में यह भी कहा जा सकता है कि राष्ट्र की भावना को कोई भी पहचानना ही नहीं चाहता था। ऐसे समय में सर्वप्रथम आचार्य चाणक्य ने भारत में एक राष्ट्र की कल्पना की। वे यह बात अच्छी तरह से समझ चुके थे कि जब तक भारत के ये छोटे-छोटे राज्य एक झण्डे के नीचे नहीं आएंगे, जब तक इनके भीतर देशप्रेम की भावना का उदय नहीं होगा, जब तक ये संगठित होकर विदेशी आक्रमणकारी शत्रु का सामना नहीं करेंगे, जब तक एक राष्ट्र के लिए ये अपने तुच्छ और निजी स्वार्थों का परित्याग नहीं करेंगे, तब तक भारत की अखण्डता और अस्मिता को सुरक्षित रख पाना कदापि सम्भव नहीं होगा। भारत की स्वाधीनता के बाद विभिन्न रियासतों और रजवाड़ों को भारतीय संघ में मिलाने का जो दुष्कर कार्य सरदार CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

बल्लभ भाई पटेल ने किया था, कुछ वैसा ही दुष्कर कार्य आचार्य चाणक्य ने, आज की परिस्थितियों से सर्वथा विपरीत स्थिति में तब किया था, जब यह कार्य सर्वथा असम्भव समझा जाता था। तब इस प्रकार की कोई कल्पना ही नहीं कर सकता था, परंतु आचार्य चाणक्य ने तब असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया था। 'असम्भव' शब्द उनके कोष में नहीं था। बड़ी-से-बड़ी बाधा को वे नगण्य समझते थे। उस समय विदेशी आक्रमणकारियों में सर्वाधिक शक्तिशाली योद्धा यूनान का राजा सिकन्दर था। सिकन्दर ने जब भारत पर आक्रमण किया तो यहां के कुछ देशद्रोही राजाओं ने अपने स्वार्थ के लिए उसका साथ दिया था, परंतु आचार्य चाणक्य ने पश्चिमोत्तर भारत के कुछ देशप्रेमी राजाओं को संगठित कर आततायी सिकन्दर को जबरदस्त टक्कर दी और चन्द्रगुप्त जैसा एक महानायक देकर अखण्ड भारत की नींव रख दी। चन्द्रगुप्त के नेतृत्व में उन्होंने भारत को एक झण्डे के नीचे संगठित करने का सफल महायज्ञ सम्पन्न किया। यह उन्हीं की कुशल राजनीति का परिणाम था कि सिकन्दर के बाद सम्राट चन्द्रगुप्त से टक्कर लेने का साहस फिर कोई आक्रमणकारी नहीं कर सका। भारत के स्वाभिमान की रक्षा में आचार्य चाणक्य अविचल चट्टान की भांति उठ खड़े हुए थे। आचार्य चाणक्य को 'कौटिल्य' और 'विष्णुगुप्त' के नामों से भी जाना जाता है। चणक पुत्र होने के कारण उन्हें चाणक्य नाम मिला था और कुटिल राजनीतिज्ञ होने के कारण उन्हें 'कौटिल्य' के नाम से सम्बोधित किया गया। उनको पिता के द्वारा दिया गया वास्तविक नाम 'विष्णुगुप्त' था। कुछ विद्वानों का मत है कि कुटिल गोत्र के वंशज और अर्थशास्त्र ग्रन्थ के प्रणेता होने के कारण चाणक्य को 'कौटिल्य' कहा जाता है। आचार्य चाणक्य केवल अर्थशास्त्र के ही पंडित नहीं थे, वरन् दूसरे शास्त्रों और शस्त्र-विद्याओं के भी वे पूर्ण विद्वान थे। वे कूटनीतिक योद्धा और असाधारण कोटि के कुशल नीतिज्ञ

सेनापति थे। आचार्य चाणक्य का समस्त जीवन जन-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत था। वे महान आदर्शवादी, सामाजिक तथा राजनीतिक मर्यादाओं के प्रतिष्ठापक थे। विद्वानों का तो यहां तक मानना है कि जिन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन नहीं किया, वे राजतन्त्र का सफल संचालन ही नहीं कर सकते। आचार्य चाणक्य के जीवन की एक प्रारम्भिक घटना से उनके चरित्र का बहुत सुन्दर खुलासा होता है। एक बार वे अपने शिष्यों के साथ तक्षशिला से मगध आ रहे थे। मगध का राजा महानन्द उनसे द्वेष रखता था। वह एक बार भरी सभा में चाणक्य का अपमान कर चुका था। तभी से उन्होंने संकल्प कर लिया था कि वे मगध के सम्राट महानन्द को पदच्युत करके ही अपनी शिखा में गांठ बांधेंगे। इसके लिए वे अपने सर्वाधिक प्रिय शिष्य चन्द्रगुप्त को तैयार कर रहे थे। मगध पहुंचने के लिए वे सीधे मार्ग से न जाकर एक अन्य उबड़-खाबड़ मार्ग से अपना सफर तय कर रहे थे। उस मार्ग में कांटे बहुत थे। तभी उनके नंगे पैर में एक कांटा चुभ गया। वे क्रोध से भर उठे। तत्काल उन्होंने अपने शिष्यों से कहा—'उखाड़ फेंको इन नागफनों को। एक भी शेष नहीं रहना चाहिए।' उन्होंने तब उन कांटों को ही नहीं उखाड़ा, उन कांटों के वृक्ष की जड़ों में मट्ठा लाकर डाल दिया, ताकि वे दुबारा न उग सकें। इस प्रकार वे अपने शत्रु का समूल नाश करने में ही विश्वास करते थे। वे दूसरों के बनाए रास्तों पर चलने में विश्वास नहीं करते थे, अपने द्वारा नया मार्ग बनाने में उनका विश्वास था। कहा जाता है कि मगधपति धर्मनन्द ने चाणक्य के पिता चणक का वध किया था। वह राजा अत्यन्त अहंकारी था और सत्ता के नशे में चूर रहता था। प्रजा के सुख-दुःख से उसे कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही भोग-विलास में डूबा रहता था। चाणक्य ने ऐसे दुष्ट राजा का वंश समूल रूप से नष्ट करने का संकल्प किया CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

और उसे नष्ट कर डाला। उसे खत्म करके चाणक्य ने अपने प्रिय शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य को राजसिंहासन पर बैठाया। राजसत्ता प्राप्त करके भी उन्हें राज-मोह कभी नहीं हुआ। राजमहलों से दूर वन में कुटी बनाकर रहने वाला यह आचार्य, चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन को सुदृढ़ करने में निरन्तर लगा रहा। उसने अपने से पूर्ववर्ती चिन्तकों के ग्रन्थों और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। प्राचीन भारत की शासन-व्यवस्था को बारीकी से समझा तथा परखा, पौराणिक ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित मान्यताओं और नीतियों का आकलन किया, वैदिक साहित्य में वर्णित सामाजिक व्यवस्था के गुण-अवगुण का परिशीलन किया। जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास ने 'नाना पुराण निगमागम सम्मत' आदर्शों व व्यवस्थाओं का व्यावहारिक परिशीलन करके महान ग्रन्थ 'रामचरितमानस' की रचना की थी, उसी प्रकार चाणक्य ने अपने पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा स्थापित नीति-सूत्रों का गहन अध्ययन किया और सम्राट चन्द्रगुप्त की शासन-व्यवस्था के लिए दिशा-निर्देश तय किए व इतिहास प्रसिद्ध ग्रन्थ 'अर्थशास्त्र' की रचना की। यह ग्रन्थ 'कौटिल्य अर्थशास्त्र' के नाम से कालजयी रचना के रूप में राजनीति का महाकाव्य सिद्ध हुआ। इसीलिए चाणक्य द्वारा रचित जो नीति श्लोक आज उपलब्ध होते हैं, उनमें अधिकांशतः शुक्र नीति, 'रामायण' में वर्णित राम-राज्य की नीति और 'महाभारत' में नारद, कृष्ण, विदुर, भीष्म आदि के द्वारा जिस प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था और राजा-प्रजा के संबंधों की विस्तृत व्याख्या की गई है, उसका अधिकांश अंश लेकर चाणक्य ने अपने नीति ग्रन्थ की रचना की, परंतु उन्होंने नकल नहीं की, अपितु उनका अनुशीलन करके केवल उन्हें युगानुकूल स्वरूप दिया, बल्कि उनका वर्तमान युग की परिस्थितियों से पूरा-पूरा तालमेल स्थापित किया। प्राचीन काल में, भारतीय चिन्तकों और मनीषियों ने मनुष्य-जीवन की प्रत्येक भंगिमा को बहुत करीब से देखा

था। उनकी प्रत्येक भावनाओं को जांचा-परखा था और जिस प्रकार उन्हें सरलता से कंठस्थ किया जा सके, उसे ध्यान में रखकर मनुष्य की भलाई के लिए, उन्होंने अपने उस चिन्तन को छोटे-छोटे सरल नीति वाक्यों में बांध लिया। महर्षि पातंजलि का योग सूत्र, नारद का भक्ति सूत्र, वात्स्यायन का कामसूत्र, भारत मुनि का नाट्य सूत्र, शुक्राचार्य की शुक्रनीति, कामन्दकीय नीतिसार, धर्मसूत्र, मनुस्मृति, वैदिक साहित्य सूत्र, उपनिषद, पुराण, संस्कृत महाकाव्य, पाणिनि की अष्टाध्यायी, शतपथ ब्राह्मण, रामायण, महाभारत, बौद्ध और जैन साहित्य आदि अति प्राचीन ग्रन्थ हैं, जिनसे सम्पूर्ण धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन की छोटी-से-छोटी बात का उल्लेख प्राप्त होता है। विद्वानों का मत है कि ये ग्रन्थ ईसा के जन्म से सैकड़ों वर्ष पहले लिखे जा चुके थे और चाणक्य के काल से भी काफी पहले इनका प्रचुरता के साथ प्रचलन था। दरअसल इसमें कोई विभेद नहीं है कि हमारी प्राचीन राज्य-व्यवस्था उतनी ही पुरानी है, जितनी कि हमारी सभ्यता, संस्कृति और हमारा धर्म है। प्राचीन भारतीय साहित्य में राज्य-व्यवस्था को राजधर्म, राजनीति, राज्यशास्त्र, दण्डनीति, नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि नामों से ही जाना जाता रहा है। कौटिल्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में अपने से पूर्ववर्ती अर्थशास्त्र के ज्ञाता, उन्नीस आचार्यों के नामों का उल्लेख किया है। इनके रहते हुए भी प्राचीन भारत के राजशास्त्रियों में चाणक्य का स्थान सर्वोपरि है। उन्हें शासन-कला और कूटनीति का महान प्रतिपादक माना जाता है। 'कौटिल्य का अर्थशास्त्र' राजनीति शास्त्र का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। उनके इस ग्रन्थ में उनके नीति वाक्य सरल संस्कृत श्लोकों और सूत्रों के रूप में बिखरे पड़े हैं। आज बाजार में 'चाणक्य नीति' के रूप में कितनी ही पुस्तकें उपलब्ध हैं। उनमें कितने ही श्लोकों की पुनरावृत्ति भी प्राप्त होती है। संस्कृत भाषा का दोष भी काफी मिलता है और जगह-जगह अर्थ का अनर्थ भी किया गया है। इन सभी बातों को देखते हुए हमने चाणक्य द्वारा रचित नीतियों को संग्रहीत

कर प्रकाशित किया है और उनके अर्थ को सटीक बनाने की यथासंभव कोशिश की है। इस अर्थ की सार्थकता के लिए हमने इसे वर्तमान संदर्भों के साथ जोड़ने का भी प्रयास किया है। सरल और सहज भाषा में अर्थ की व्याख्या की गई है और यह भी प्रयास किया है कि पुस्तक केवल उपदेशात्मक बनकर ही न रह जाए। विश्व के इतिहास में ऐसा व्यक्ति आपको ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा, जिसने अपने बुद्धि चातुर्य से राजसत्ता को प्राप्त करने में विजय श्री प्राप्त की हो। राजा और प्रजा के मध्य चाणक्य ने एक ऐसा सेतु स्थापित किया था, जिसकी आधार-शिला ठोस भूमि पर स्थापित है। उनके द्वारा प्रस्तुत नीति वाक्यों और सूत्रों को पढ़कर जन-मानस में एक नया जोश, ओज, तेज, दृढ़ता, साहस, आत्मविश्वास और समाज के पुनः उत्थान की एक ऐसी नवचेतना जाग्रत होती है, जिसकी मिसाल इतिहास में प्राप्त नहीं होती। आचार्य चाणक्य के जीवन का उद्देश्य था—जन कल्याण। इसी उद्देश्य के निमित्त उन्होंने अपने ग्रन्थों की संरचना की थी। उनकी राजनीति सदाचार और धर्म से अलग नहीं थी। आज के संदर्भ में चाणक्य की नीतियां उतनी ही कारगर हैं, जितनी कि चाणक्य के काल में थीं। मनुष्य आज भी वही है, जो तब था। आज उसे जिस तरह की परिस्थितियों के मध्य से गुजरना पड़ रहा है, उस समय भी कमोबेश कुछ ऐसी ही स्थितियों से उसे दो-चार होना पड़ता होगा। आज जिस प्रजातन्त्र के मध्य हम जी रहे हैं, उस समय का राजतन्त्र कुछ ऐसा ही रहा होगा। चाणक्य की नीतियों से तत्कालीन समाज का स्पष्ट चित्रण हमें प्राप्त होता है। आज का प्रजातन्त्र तत्कालीन राजतन्त्र का ही बदला हुआ स्वरूप है। बस आज इतनी छूट अवश्य मिली है कि देश का एक अदना-सा व्यक्ति भी प्रधानमंत्री की आलोचना में मुंह खोल सकता है। तब शायद ऐसा न रहा हो, परंतु अपने ज्ञान की प्रबुद्धता के तेज से चाणक्य जैसा व्यक्ति ही तब भी राजा को स्पष्ट चुनौती देने की क्षमता

रखता था। इसी बात को ध्यान में रखकर सम्भवतः चाणक्य ने चन्द्रगुप्त के काल में राजा और प्रजा के मध्य समन्वय का सीधा और सरल मार्ग निश्चित किया था। राजा के सम्मुख आम जनता को महत्त्व देकर और कूटनीति के विविध अंगों का सांगोपांग चित्रण करके चाणक्य ने सम्राट चन्द्रगुप्त के राज्य को एक अत्यन्त मजबूत आधारशिला प्रदान की थी। चाणक्य के नीति वाक्य भले ही शब्द-विन्यास में छोटे हों, पर उनमें जो भाव भरे हैं, वे अत्यन्त विपुल हैं, गहन हैं और दूर तक प्रभावित करने वाले हैं। चाणक्य की नीतियों का सरल भाषा में अनुवाद करने तथा उन्हें आधुनिक संदर्भों के साथ जोड़ने के पीछे हमारा यही उद्देश्य है कि हम वर्तमान शासन-सत्ता और प्रजा के मध्य एक ऐसे सेतु का निर्माण कर सकें, जिस पर से होकर जनहित और राष्ट्रहित की भावनाएं एक दूसरे की ओर प्रवाहित हों। यदि यह सम्भव हो सका तो हमारा यह प्रयास सार्थक कहलाएगा। —महेन्द्र मित्तल

आचार्य चाणक्य कूटनीति और राजनीति के महान स्तम्भ हैं। उन जैसा नीतिज्ञ पिछले दो हजार वर्षों में अवतरित नहीं हुआ। चाणक्य के ग्रन्थों में उनका अर्थशास्त्र और चाणक्य नीति दो प्रमुख ग्रन्थ हैं। वे एक ऐसे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने मगध के अत्याचारी राजा नन्द का समूल नाश कर, उसके स्थान पर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की तथा अर्थशास्त्र जैसे राजनीति विषयक गूढ़ ग्रन्थ की रचना कर संसार में अपना नाम अमर कर दिया।

विषय सूची • प्रथम अध्याय 15 • द्वितीय अध्याय 28 • तृतीय अध्याय 41 • चतुर्थ अध्याय 52 • पंचम अध्याय 62 • षष्ठम अध्याय 72 • सप्तम अध्याय 84 • अष्टम अध्याय 94 • नवम अध्याय 103 • 'दशम अध्याय 110 • एकादश अध्याय 118 • द्वादश अध्याय 127 • त्रयोदश अध्याय 138 • चतुर्दश अध्याय 146 • पंचदश अध्याय 154 • षोडश अध्याय 163 • सप्तदश अध्याय 172

अध्याय १-३: धर्म, विद्या व सज्जन-दुर्जन लक्षण

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पाद-टिप्पणी (Footer Metadata): CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

॥ अथ प्रथम अध्याय ॥ प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम्। नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम्॥ सर्वशक्तिमान तीनों लोकों के स्वामी श्री विष्णु भगवान को शीश नवाकर मैं अनेक शास्त्रों से निकाले गए राजनीति सार के तत्त्व को जन कल्याण हेतु समाज के सम्मुख रखता हूं॥1॥ राजनीति के प्रकाण्ड विद्वान चाणक्य तक्षशिला विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के आचार्य थे। यहां प्रारम्भ में वे उस परम पिता परमात्मा का स्मरण करते हैं और राजनीति के सार तत्त्व को जन-मानस के संम्मुख रखते हैं। अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः। धर्मोपदेशविख्यातं कार्याऽकार्य शुभाशुभम्॥ इस राजनीति शास्त्र का विधिपूर्वक अध्ययन करके यह जाना जा सकता है कि कौन-सा कार्य करना चाहिए और कौन-सा कार्य नहीं करना चाहिए। यह जानकर वह एक प्रकार से धर्मोपदेश प्राप्त करता है कि किस कार्य के करने से अच्छा परिणाम निकलेगा और किससे बुरा। उसे अच्छे बुरे का ज्ञान हो जाता है॥2॥ 15 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

चाणक्य का मत है कि राजनीति में कभी-कभी कुछ कर्म ऐसे दिखाई पड़ते हैं जिन्हें देखकर सोचना पड़ता है कि यह उचित हुआ या अनुचित, परंतु जिस अनीति कार्य से भी जन-कल्याण होता हो अथवा धर्म का पक्ष प्रबल होता हो तो उस अनैतिक कार्य को भी नीति सम्मत ही माना जाएगा। उदाहरण के रूप में महाभारत के युद्ध में युधिष्ठिर द्वारा 'अश्वत्थामा' की मृत्यु का उद्घोष करना यद्यपि नीति विरुद्ध था, पर नीति कुशल योगीराज कृष्ण ने इसे उचित माना था, क्योंकि वे गुरु द्रोणाचार्य के विकट संहार से अपनी सेना को बचाना चाहते थे। तदहं संप्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया। येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते॥ लोगों की हित कामना से मैं यहां उस शास्त्र को कहूंगा, जिसके जान लेने से मनुष्य सब कुछ जान लेने वाला-सा हो जाता है॥3॥ यहां चाणक्य ने संकेत दिया है कि जो व्यक्ति राजनीति से सम्बन्धित उनकी नीतियों को जान लेगा, वह राजनीति का प्रकाण्ड पंडित हो जाएगा। वस्तुतः चाणक्य ने राजनीति के विषय में शास्त्रों का गूढ़ अध्ययन किया था तथा उनका सूक्ष्म परीक्षण भी किया था। अपने जीवन का अनुभव उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ इन श्लोकों में उतार दिया है। मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च। दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति॥ मूर्ख छात्रों को पढ़ाने तथा दुष्ट स्त्री के पालन-पोषण से और दुःखियों के साथ संबंध रखने से, बुद्धिमान व्यक्ति भी दुःखी होता है। तात्पर्य यह कि मूर्ख शिष्य को कभी भी उचित 16

उपदेश नहीं देना चाहिए, पतित आचरण वाली स्त्री की संगति करना तथा दुःखी मनुष्यों के साथ समागम करने से विद्वान तथा भले व्यक्ति को दुःख ही उठाना पड़ता है॥4॥ वास्तव में शिक्षा उसी व्यक्ति को देनी चाहिए जो सुपात्र हो। जो व्यक्ति बताई गई बात को न समझे, उसे परामर्श (शिक्षा) देने से कोई लाभ नहीं। मूर्ख व्यक्ति को शिक्षा देकर समय ही नष्ट किया जाता है। इसी तरह पतिता स्त्री का भरण-पोषण अथवा उसकी संगति करके विद्वान व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंच सकती है, उसका अपमान हो सकता है। यही बात दुःखी व्यक्ति के साथ संबंध रखने की है। दुःखी व्यक्ति हर पल अपना ही रोना रोता रहता है। इससे विद्वान व्यक्ति की साधना और एकाग्रता भंग हो जाती है। एकाग्रता भंग होना अथवा साधना में व्यवधान पड़ना बुद्धिमान व्यक्ति को बहुत कचोटता है। दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः। ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः॥ दुष्ट स्त्री, छल करने वाला मित्र, पलटकर तीखा जवाब देने वाला नौकर तथा जिस घर में सांप रहता हो, उस घर में निवास करने वाले गृहस्वामी की मौत में संशय न करें। वह निश्चित मृत्यु को प्राप्त होता है॥5॥ घर में यदि दुष्ट और दुश्चरित्र पत्नी हो तो उसके पति का जीना, न जीने के बराबर ही है। वह अपमान और लज्जा के बोझ से एक तो वैसे ही मृतक समान है, ऊपर से उसे सदैव यह भय भी बना रहता है कि यह स्त्री अपने स्वार्थ के लिए कहीं उसे विष न दे दे, क्योंकि ऐसी दुष्ट और पतिता स्त्रियों 17 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

का कोई पतिव्रत धर्म नहीं होता। उन्हें तो केवल अपनी ऐयाशी से मतलब होता है। दूसरे, यदि उस गृहस्वामी का मित्र भी दगाबाज हो, धोखा देने वाला हो तो ऐसा 'मित्र' आस्तीन का सांप होता है। वह कभी भी अपने स्वार्थ के लिए गृहस्वामी को ऐसी स्थिति में डाल सकता है, जिससे उबरना उसकी सामर्थ्य से बाहर की बात होती है, तब वह जीते-जी मर जाता है। तीसरे, घर में यदि नौकर बद्जुबान हो, बात-बात में झगड़ा करने वाला हो, पलटकर तीखा जवाब देने वाला हो तो समझ लेना चाहिए कि ऐसा नौकर निश्चित रूप से घर के भेद जानता है और जो घर के भेद जान लेता है, वह उसी तरह से घर-बार का विनाश कर सकता है, जैसे विभीषण ने घर के भेद देकर रावण का विनाश करा दिया था, तभी मुहावरा भी बना—'घर का भेदी लंका ढाये।' जब घर का ही विनाश हो जाए तो उस घर के गृहस्वामी की स्थिति मरे हुए के ही समान है। चौथे, जिस घर में छिपकर रहने वाले सांप की सम्भावना हो तो गृहस्वामी को निरन्तर यह भय बना रहेगा कि सांप उसे डस न ले। इस प्रकार मृत्यु का भय मृत्यु से भी भयानक होता है। वह शीघ्र ही भय और चिंता से ग्रसित होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार चाणक्य ने राजा अथवा गृहस्वामी को दुष्टा स्त्री, आस्तीन के सांप मित्र, वाचाल नौकर और घर में छिपे सांपों अर्थात दुश्मनों से सदैव सतर्क रहने की शिक्षा इस श्लोक में दी है। भाव यह है कि राजा को अपनी पत्नी, नौकर और मित्र का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना चाहिए ताकि घर में छिपे दुश्मनों का सिर कुचला जा सके। 18 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥ विपत्ति के समय काम आने वाले धन की रक्षा करें। धन से स्त्री की रक्षा करें और अपनी रक्षा धन और स्त्री से सदा करें॥6॥ संकट के समय धन की जरूरत सभी को होती है इसलिए संकट काल के लिए धन बचाकर रखना उत्तम होता है। धन से अपनी पत्नी की रक्षा की जा सकती है, अर्थात यदि परिवार पर कोई संकट आए तो धन का लोभ नहीं रखना चाहिए, परंतु यदि अपने ही ऊपर कोई संकट आ जाए तो उस समय धन व स्त्री दोनों का बलिदान कर देना चाहिए। चाणक्य का कहना यह है कि यद्यपि परिवार में धन और अपनी स्त्री का सर्वाधिक महत्त्व है किन्तु यदि अपना ही जीवन संकट में पड़ जाए तो वह न तो अपने धन की रक्षा कर पाएगा और न अपनी स्त्री की ही रक्षा कर पाएगा। इससे तो अच्छा यही है कि वह अपने को बचाने के लिए धन और स्त्री का मोह छोड़ दे, अर्थात परिवार की स्त्रियों की लाज बचाने के लिए उन्हें जौहर व्रत का पालन करने की आज्ञा दे देनी चाहिए। अपादर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतां कुतआपदः। कदाचिच्चलते लक्ष्मीः सञ्चितोऽपि विनश्यति। आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करें क्योंकि पता नहीं कब आपदा आ जाए। लक्ष्मी तो चंचल है। संचय किया गया धन कभी भी नष्ट हो सकता है॥7॥ लक्ष्मी का स्वभाव चंचल माना गया है, अर्थात धन आज है, कल नहीं होगा। वह कभी भी साथ छोड़कर जा सकता 19 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

है इसलिए संकटकाल के लिए धन की रक्षा अत्यंत जरूरी है, इसका एक आशय यह भी है कि मनुष्य को सदैव लक्ष्मी का ही विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि लक्ष्मी तो चंचल होती है। उसे अपने पुरुषार्थ और कर्म पर भी भरोसा रखना चाहिए, ताकि लक्ष्मी के साथ छोड़े जाने के बाद वह अपने आपको असहाय अनुभव न करने लगे। यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः। न च विद्याऽऽगमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत्॥ जिस देश में सम्मान नहीं, आजीविका के साधन नहीं, बन्धु-बांधव अर्थात परिवार नहीं और विद्या प्राप्त करने के साधन नहीं, वहां कभी नहीं रहना चाहिए॥8॥ यह एक सामान्य-सी बात है कि आदमी वहीं रहना पसंद करता है, जहां उसे सम्मान मिले। जीवन-यापन के साधन जहां सुलभ हों, जहां उसके बंधु-बांधव और मित्रगण आदि रहते हों तथा जहां रहकर वह स्वयं और अपने बच्चों को शिक्षित करा सके, अर्थात जहां विद्याध्ययन के अच्छे साधन उपलब्ध हों। जहां ऐसी परिस्थितियां और साधन उपलब्ध नहीं होते, वहां रहने वाले लोग सम्पूर्ण संसार से कटकर जल्दी ही नष्ट हो जाते हैं। धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्॥ जहां धनी, वैदिक ब्राह्मण, राजा, नदी और वैद्य, ये पांच न हों, वहां एक दिन भी नहीं रहना चाहिए। भावार्थ यह कि जिस जगह पर इन पांचों का अभाव हो, वहां मनुष्य को एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिए॥9॥ मनुष्य-जीवन के लोक-परलोक को संवारने में इन 20 .

पांचों का विशेष महत्त्व है। जहां धनी व्यक्ति होंगे, वहां व्यापार अच्छा होगा। व्यापार अच्छा होगा तो आजीविका के साधन अच्छे होंगे। जहां श्रुतियों अर्थात वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण होंगे, वहां मनुष्य जीवन के धार्मिक तथा ज्ञान के क्षेत्र में विस्तृत रूप से फैले हुए सभी शैक्षिक कार्यों को सहज रूप से सम्पन्न कर सकेगा। जहां स्वच्छ जल की नदी होगी, वहां जल का अभाव नहीं रहेगा और जहां कुशल वैद्य होंगे, वहां बीमारी पास नहीं आ सकेगी। इसी तरह शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप देने के लिए राजा की आवश्यकता होती है और नदी अर्थात जल के बिना तो जीवन अधूरा है ही—इस प्रकार ये पांचों मनुष्य के सामाजिक जीवन के लिए परम आवश्यक हैं। जहां इनका अभाव हो वहां भूलकर भी निवास नहीं करना चाहिए। लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता। पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्त तत्र संस्थितिम्॥ जहां जीविका, भय, लज्जा, चतुराई और त्याग की भावना, ये पांचों न हों, वहां के लोगों का साथ कभी न करें॥10॥ जिस स्थान पर जीवन-यापन के साधन न हों, जहां सदैव भय की स्थितियां बनी रहती हों, जहां लज्जाशील व्यक्तियों की जगह बेशर्म और खुदगर्ज लोग रहते हों, जहां कला-कौशल और हस्तशिल्प का सर्वथा अभाव हो और जहां के लोगों के मन में जरा भी त्याग और परोपकार की भावनाएं न हों, वहां के लोगों के साथ न तो रहें और न ही उनसे व्यवहार करें। इसका भाव यही है कि आदमी को ऐसे स्थान पर रहना चाहिए जहां के लोग ईश्वर-भक्त हों, परोपकारी हों, व्यवहार-कुशल हों, आत्मसम्मानी हों, कर्मठ हों और बुद्धिमान हों। 21