भारतकोश
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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( २५ ) अर्थ—सत्वगुण प्रकाश करनेवाला, रजोगुण न प्रकाश और न आवरण करनेवाला, तमोगुण आवरण करनेवाला। जब यह तीनों गुण समान रहते हैं, उस दशा का नाम प्रकृति है; क्योंकि वर्तमान दशा में सत्वगुण, तमोगुण का परस्पर विरोध है। इस समय जिस शरीर में सत्त्वगुण रहता है, वहाँ तमोगुण का वास नहीं और इसी तरह जहाँ तमोगुण का निवास है वहाँ सत्वगुण नहीं; परन्तु कारण अर्थात् परमाणु की दशा में एक दूसरे के विरुद्ध नहीं कर सकते, उस समय पास ही पास रह सकते हैं। अब उस प्रकृति से महत्तत्त्व अर्थात् मन उत्पन्न होता है और मन से अहङ्कार और अहङ्कार से पंच सूक्ष्म तन्मात्रा या रूप रस, गंध, स्पर्श और शब्द उत्पन्न होते हैं, उनसे पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय उत्पन्न होते हैं, और पञ्चतन्मात्राओं से पाँच भूत अर्थात् पृथिवी, अप, तेज, वायु, और आकाश होते हैं, और जब इनसे पुरुष अर्थात् जीव और ब्रह्म मिल जाता है तो २५ गुण कहलाते हैं। प्र०—अनेक पुरुषों ने महत्तत्त्व का अर्थ बुद्धि किया है, तुम 'मन' किस प्रकार लेते हो ? उ०—बुद्धि जीवात्मा का गुण है। जीव के सत्य होने से वह नित्य है, वह प्रकृति का कार्य्य नहीं और मन सूक्ष्म अन्य का विकार है, अतएव मन ही लेना चाहिये। प्र०—मन की इन्द्रियों में गणना की जाती है, अतएव भिन्न करने से बुद्धि का ही प्रयोजन प्रतीत होता है ? उ०—यदि १० इन्द्रियों में ११ वां मन भी लिया जाय तो तुम्हारी संख्या ही अशुद्ध हो जायगी, इस हेतु से महत्तत्त्व का अर्थ मन ही है।

( २६ ) स्थूलात् पञ्चतन्मात्राय ॥ ६२ ॥ अर्थ—इन पांच प्रकाशवान् तत्त्वों से उन सूक्ष्म तन्मात्रों का अनुमान होता है, जिस प्रकार कार्य्य को देखकर कारण का अनुमान होता है ; जैसे लिखा है— कारणगुणपूर्वकं कार्य्य गुणो दृष्टः ॥ अर्थ—कार्य्य के गुणों के अनुसार कारण और कारण के अनुसार कार्य्य के गुणों का अनुमान होता है । इसी प्रकार यहां कार्य्य तत्त्वों को देख कर कारण तन्मात्रा का ज्ञान हो जाता है । बाह्याभ्यन्तराभ्यां तैश्चाहङ्कारंस्य ॥ ६३ ॥ अर्थ—बाहर की और आभ्यन्तर्रीय इन्द्रियों से पञ्च तन्मात्रा रूप कार्य का ज्ञान होकर उसके कारण अहङ्कार का भी ज्ञान होता है, क्योंकि स्पर्शादि विषयों का ज्ञान समाधि और सुषुप्ति अवस्था में जबकि अहङ्कार रूप वृत्ति का अभाव होता है नहीं होता, इससे अनुमान होता है कि यह इस वृत्ति से उत्पन्न होते हैं, अर्थात् अहङ्कार के कार्य्य हैं और अहङ्कार इनका कारण है ; क्योंकि यह नियम है कि जो जिसके बिना पैदा न हो सके वह उसका कारण होता है, और भूत विना अहङ्कार के सुषुप्ति अवस्था में दृष्टिगत नहीं होते, अतएव यही उनका कारण अनुमान से प्रतीत होता है । तेनान्तःकरणस्य ॥ ६४ ॥ अर्थ—और अहङ्काररुपी कार्य्य से उसके कारण अन्तःकरण का अनुमान होता है, क्योंकि प्रथम मन में वस्तु की अस्तित्व का निश्चय करके उसमें अहङ्ककार किया जाता है, अर्थात् उसे अपना

( २७ ) मानते हैं। जिस समय तक वस्तु की अस्तित्व का निश्चय न हो तब तक उसमें अभिमान नहीं होता है, अर्थात् मैं हूँ, और यह मेरा है, यह ज्ञान जबतक अपने-अपने और चीज़ की अस्तित्व का ज्ञान न हो, किस तरह हो सकता है ? ततः प्रकृतेः ॥ ६५ ॥ अर्थ—और उस मन से प्रकृति, जो मन का कारण है, उसका अनुमान होता है, क्योंकि मन मध्यम परिणाम वाला होने से कार्य्य है और प्रत्येक कार्य का कारण अवश्य होता है ; अब मन का कारण प्रकृति के अतिरिक्त और कुछ हो नहीं सकता । क्योंकि पुरुष तो परिणाम रहित है, और मन का शरीर की तरह मध्यम परिणामवाला होना श्रुति, स्मृति और युक्ति से सिद्ध है ; क्योंकि मन, सुख-दुःख और मोह धर्मवाला है, इस वास्ते उसका कारण भी मोह धर्मवाला होना चाहिये । दुःख परतन्त्रता का नाम है, और पुरुष की परतन्त्रता हो नहीं सकती । परतन्त्रता केवल जड़ प्रकृति का धर्म है और उसका कार्य्य मन है । संहतपरार्थत्वात् पुरुषस्य ॥ ६६ ॥ अर्थ—प्रकृति के अवयवों की संहति सर्वदा दूसरे के वास्ते होती है, अपने लिये नहीं । इससे पुरुष का अनुमान होता है ; क्योंकि मन आदिक जो प्रकृति के कार्य्य हैं, उन से पुरुष को लाभ होता है । मन आदिक अपने लिये कुछ भी नहीं कर सकते, और जितने शरीर से लेकर अन्न, वस्त्र, पात्रादि प्रकृति के विकार हैं, उन से दूसरों का ही उपकार होना है, और पुरुष की क्रिया का भोग पदार्थ नहीं है ; क्योंकि उपनिषद् में लिखा है "नवाअरे सर्वस्य कामाय सर्वंप्रियंभवति नतुकामायसर्वंप्रियंभवति”—अर्थात् सम्पूर्ण वस्तुओं के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी नहीं,

( २८ ) किन्तु आत्मा के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी प्रतीत होती हैं । प्र०—क्या प्रकृति का कोई कारण नहीं है, ब्रह्म को कारण सुना जाता है ? उ०—ब्रह्म जगत् का निमित्त-कारण है । प्रकृति का उपादान कारण नहीं । प्र०—प्रकृति को क्यों अकारण मानते हो ? उ०—मूले मूला भावादमूलं मूलम् ॥ ६७ ॥ अर्थ—२२ तत्त्वों का मूल उपादान कारण प्रकृति है, और मूल अर्थात् जड़ की जड़ नहीं होती, इसवास्ते मूल बिना मूल के ही होता है । प्र०—प्रकृति को मूल क्यों मानते हो ? उ०—यदि मूल का मूल मानोगे, तो उसके मूले की भी आ- वश्यकता होगी । इस प्रकार अनवस्था आजायगी । प्र०—जैसे घट का कारण मृत्तिका है, और मृत्तिका का कारण परमाणु है ? उ०—पारम्पर्येऽप्येकत्र परिनिष्ठेति संज्ञा- मात्रम् ॥ ६८ ॥ कारणों की परम्परा के विचार से परमाणु ही घट का कारण है, मृत्तिका तो नाममात्र है । समानः प्रकृतेर्द्वयोः ॥ ६६ ॥ घट और मृत्तिका के साथ प्रकृति का समान सम्बन्ध है, अर्थात् परम्परा से प्रकृति ही घट और मृत्तिका का कारण है, और निरवयव होने से नित्य है, उसका कोई कारण नहीं ।

( २६ ) अधिकारित्रैविध्यान्ननियमः ॥ ७० ॥ यद्यपि प्रकृति सबका उपादान कारण है; परन्तु प्रत्येक कार्य्य में जो तीन प्रकार के कारण माने जाते हैं अर्थात् ☸ १ उपादान, २ निमित्त, और ३ साधारण—इन की भी व्यवस्था न रहेगी, क्योंकि जब कुम्हार मिट्टी दण्डादि का कारण प्रकृति ही ठहरी, तो इन तीन कारणों की अनावश्यकता होने से बहुत गोलमाल हो जायगा। इस में हेतु यह है, कि फिर कोई भी किसी का निमित्त व असाधारण कारण न रहेगा, अतएव जहाँ-जहाँ कारणत्व कहा जाय, वहाँ-वहाँ प्रकृति को छोड़कर कहना चाहिये, क्योंकि प्रकृति तो सबका कारण है ही, उसके कहने की कोई भी आवश्यकता नहीं है; जैसे—कुम्हार के पिता को घट का कारण कहना अनावश्यक है, क्योंकि वह तो अन्यथा सिद्ध है। यदि वही न होता तो कुलाल कहां से आता ? परन्तु घट के बनने में कुलाल के पिता की कोई भी आवश्यकता नहीं है, ऐसा ही नवीन नैयायिक भी मानते हैं, कि कारणत्व प्रकृति को छोड़कर कहना चाहिये। ☸ १ उपादान कारण, जैसे घट का मृत्तिका। २ निमित्त कारण, जैसे घट का कुलाल। ३ साधारण, जैसे घट के दण्ड आदि। महदाख्यमाद्यं कार्य्यं तन्मनः ॥ ७१ ॥ अर्थ—प्रकृति का पहिला कार्य महत् है, और वह मन कहलाता है। मन से अहङ्कारादि उत्पन्न होते हैं, मन की उत्पत्ति ६१ सूत्र में कहचुके हैं। चरमोऽहङ्कारः ॥ ७२ ॥ अर्थ—और प्रकृति का दूसरा कार्य अहङ्कार है। इन तीनों सूत्रों का अभिप्राय यह है कि यदि प्रकृति को कारणत्व

सूत्रों से स्पष्ट करते हैं।

( ३० ) कहा जावे, तो केवल इन्हीं दो कार्यों का कहना अन्य कार्यों का कारण महदादि को कहना चाहिये। इसी बात को अगले सूत्रों से स्पष्ट करते हैं। तत्कार्यत्वमुत्तरेषाम् ॥ ७३ ॥ अर्थ—महत् और अहङ्कार को छोड़ बाक़ी सब प्रकृति के कार्य नहीं, किन्तु उनके कारण महदादि हैं। प्र०—जब तुमने पहिले इसको प्रकृति का कार्य कहा, अब उसे अलग करते हो, कि औरों को महदादिकों का कार्य कहना चाहिये। अब यहाँ यह सन्देह होता है, कि पहिले प्रकृति को सबका कारण कहचुके। अब महदादिकों को क्यों कारण कहते हैं ? तो इसका उत्तर यह है कि— उ०—आद्यहेतुता तद्द्वारा पारम्पर्येऽप्यणुवत् ७४ अर्थ—जिस प्रकार परम्परा सम्बन्ध से घटादि के कारण अणु माने थे, उसी भाँति परम्परा सम्बन्ध से महदादिकों का कारण भी प्रकृति ही है, अतएव कुछ दोष न रहेगा। पूर्वभावित्वे द्वयोरेकतरस्य हानेऽन्यतरयोगः ७५ अर्थ—पहिले होने में एक यह भी युक्ति है, कि कार्य नाश होकर कारण में मिल जाता है, और अन्त में सब कार्य पदार्थ प्रकृति में लय हो जाते हैं। यदि कोई शङ्का करे कि जब प्रकृति और पुरुष दोनों कार्य जगत् से पहिले थे, तो अकेली प्रकृति को क्यों कारण माना जावे ? इसका उत्तर यह है कि पुरुष परिणामी नहीं और उपादान कारण का परिणाम ही कार्य कहलाता है, और पुरुष के अपरिणामी होने में १५-१६ के सूत्र प्रमाण हैं। यदि प्रकृति

( ३१ ) सम्बन्ध से प्रकृति द्वारा पुरुष में परिणाम मानें और दोनों को कारण मानें तो वृथा गौरव होगा। प्र०—कारण से उपादान-कारण का क्यों ग्रहण करते हो, निमित्त को क्यों नहीं लेते ? उ०—उपादान-कारण के गुण ही कार्य में रहा करते हैं। हमें जगत् में जिस आनन्द की खोज है, यदि वह जगत् के कारण में होगा तो मिलेगा अन्यथा पुरुषार्थ निरर्थक जायगा ; इसलिये विवेक के लिये उपादान कारण की ही आवश्यकता है। प्र०—प्रकृति एक-देशी है वा व्यापक ? परिच्छिन्नं न सर्वोपादानम् ॥ ७६ ॥ उ०—एक-देशी और अनित्य पदार्थ सर्व जगत् का उपादान कारण नहीं हो सकते ; क्योंकि अनित्य पदार्थ को कार्य होने से स्वयम् कारण की आवश्यकता है। प्र०—एक देशी पदार्थ की उत्पत्ति में क्या प्रमाण है ? उ०—तदुत्पत्तिश्रुतेश्च ॥ ७७ ॥ अनित्य और एक-देशी पदार्थों की उत्पत्ति श्रुति में मानी है और जिसकी उत्पत्ति है उसका विनाश अवश्य होगा। प्र०—अविद्या सम्बन्ध से जगदुत्पत्ति है, इस में क्या दोष है ? इसका उत्तर महात्मा कपिलजी यह देते हैं। नावस्तुनो वस्तुसिद्धिः ॥ ७८ ॥ उ०—जो अविद्या द्रव्य नहीं है केवल गुण मात्र है या कोई वस्तु नहीं है, उस से यह जगत् जो द्रव्य और वस्तु है, किस प्रकार उत्पन्न होसकता है ? क्योंकि गुण द्रव्य का एक अवयव होता है। एक अवयव से अवयवी की उत्पत्ति नहीं हो सकती और न

( ३२ ) अभाव से भाव की उत्पत्ति होती है ; जैसे—मनुष्य के सींग नहीं तो उस सींग से कमान कैसे बन सकती है । प्र०—यह संसार भी अवस्तु है, इसवास्ते यह अविद्या से बना है ? अवाधाददुष्टकारणजन्यत्वाच्चनावस्तुत्वम् ॥ ७६ उ०—यदि कहो जगत् भी अवस्तु है, तो यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि न तो स्वप्न के पदार्थों के तुल्य जगत् का किसी अवस्था विशेष में बाध होता है, जैसे—स्वप्न के पदार्थों का जाग्रत अवस्था में बाध होजाता है, और न जगत् किसी इन्द्रिय के दोष से प्रतीत होता है, जैसे—पीलिया रोग की अवस्था में सब वस्तुओं. को पीला प्रतीत करता है परन्तु यह पीलापन सत्य नहीं जगत् । इस प्रकार के किसी दोषयुक्त कारण से उत्पन्न नहीं हुआ, इस कारण जगत् को अवस्तु नहीं कह सकते । प्र०—जब श्रुतियों में जगत् का मिथ्या होना कहा गया है तब जगत् वस्तु नहीं हो सकता ? उ०—क्या तुम श्रुति को जगत् के अन्दर मानते हो या बाहर । यदि अन्दर मानो तो जगत् के मिथ्या होने से श्रुति का स्वयं ही बाध होजायगा और वह मिथ्या श्रुति प्रमाण ही न रहेगी । यदि जगत् से बाहर मानो, तो अद्वैतवादी के सिद्धान्त की हानि होगी । प्र०—“नेति नेति” इस प्रकार की श्रुतियों का क्या अर्थ करोगे ? उ०—यह श्रुतियें ब्रह्म का जगत् से भेद याने भिन्नता को बताने वाली हैं और जगत् को स्वरूप से अवस्तु बतलाने वाली नहीं ।

( ३३ ) भावेत्तद्योगेन तत्सिद्धिरभावे तद्भावात् कुतस्तरां तत्सिद्धिः ॥ ८० ॥ अर्थ—कारण के होने से उसके संयोग से कार्य्य बन सकता है, और कारण के अभाव में किसके योग से द्रव्यरूप कार्य बनेगा, जैसे—मिट्टी के होने से तो उसका घट बन जायगा। जब मृत्तिका ही न तो किसका घट बनेगा ? प्र०—तुम प्रधान अर्थात् प्रकृति को क्यों कारण मानते हो ? कर्म को मानना चाहिये । उ०—न कर्मण उपादानत्वायोगात् ॥ ८१ ॥ अर्थ—कर्म से जगत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि कर्म द्रव्य तो हैं ही नहीं। द्रव्य के विना गुणादि में उपादान कारण होने की योग्यता नहीं। कारण यह है, कि द्रव्य का उपादान कारण द्रव्य ही होता है। यदि कहो हम ऐसी कल्पना करते हैं, तो कल्पना दृष्ट के अनुसार प्रामाणिक और विरुद्ध होने से अप्रामाणिक है और वैशेषिक में कहे हुये गुण और कर्म कहीं उपादान कारण होते नहीं। देखो यहाँ कर्म शब्द से अविद्या और गुणों को भी लेना चाहिये, वह भी उपादान के योग्य नहीं। यहाँतक तो यह बतलाया गया कि प्रकृति में परिणाम है, परन्तु पुरुष अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा में परिणाम नहीं। दूसरे प्रकृति के जितने कार्य्य हैं, वह दूसरे के वास्ते हैं, क्योंकि उसमें स्वयम् भोगशक्ति नहीं। अब पाँच सूत्रों में मुक्ति का कारण कर्म नहीं विवेक है, यह कहेंगे । नानुश्रविकादपि तत्सिद्धिः साध्यत्वेनावृत्ति- योगादपुरुषार्थत्वम् ॥ ८२ ॥

( ३४ ) अर्थ—यह तो पहिले कह चुके हैं कि दृष्ट पदार्थों वा कर्म से दुखात्यन्त निवृत्ति नहीं होती। अब कहते हैं, कि ज्ञान के बिना वेदोक्त कर्म से भी मुक्ति नह होती ; क्योंकि वैदिक कर्मों से जो स्वर्गादि सुख मिलते हैं उनका भी नाश हो जाता है, इस वास्ते यह पुरुषार्थ नहीं। पहिले “न कर्मणा अन्य धर्मत्वात्” इस सूत्र में कर्म से बन्धन नहीं होता, इसका खण्डन किया गया था, अब कर्म से मुक्ति होती है इसका भी खण्डन कर दिया । प्र०—श्रुति में बतलाया गया है कि इस प्रकार के कर्म से ब्रह्मलोक कोँ प्राप्त होकर ब्रह्मलोक की आयु तक पुनरावृत्ति नहीं होती ? उ०—तत्रप्राप्तविवेकस्यानावृत्तिश्रुतिः ॥ ८३ ॥ अर्थ—इस श्रुति में भी प्राप्तविवेक ही के वास्ते वैदिक कर्मों से अनावृत्ति मानी गई है । यदि ऐसा न मानो तो दूसरी श्रुतियों से जो ब्रह्मलोक से पुनरावृत्ति का कथन करती हैं, विरोध होकर दोनों का प्रमाण नहीं रहेगा ; इसलिये प्राप्तविवेक ही से मुक्ति माननी चाहिये । दुःखाद् दुःखं जलाभिषेकवन्न जाड्यविमोकः ८४ अर्थ—जो कर्म शरीर से उत्पन्न होता है और शरीर वे न होने पर नहीं होता, इसवास्ते कर्म स्वयम् दुःख रूप य अविद्या स्वरूप है । जिस प्रकार दुःख से दुःख का नाश नई होता, उसी प्रकार कर्म से दुःख का नाश नहीं हो सकता, जैसे— जल में नहाने से शीत बढ़ता है, नाश नहीं होता, ऐसे ही विवेक रहित कर्म से मुक्ति नहीं होती । काम्येऽकाम्येऽपि साध्यत्वाविशेषात् ॥ ८५ ॥

( ३५ ) अर्थ—चाहे कर्म निष्काम हो चाहे सकाम हो, परन्तु ज्ञान के बिना मुक्ति का साधन नहीं हो सकता ; क्योंकि दोनों प्रकार के कर्मों में साध्यत्व अर्थात् शरीर से उत्पत्तिवाली होना समान है, और श्रुति में भी लिखा है “न कर्मणा न प्रजया” इत्यादि अर्थात् न तो कर्म से मुक्ति होती, न प्रजा से, न धन से, ज्ञान के बिना किसी साधन से मुक्ति नहीं होती । प्र०—ज्ञान दुःख का विरोधी नहीं, इसलिये ज्ञान से दुःख का नाश कैसे हो सकता है ? उ०—दुःख जन्म-मरण से होता है ; जन्म-मरण कर्म से होते हैं, कर्म प्रवृत्ति से होता है, प्रवृत्ति राग-द्वेष से होती है, राग-द्वेष मिथ्याज्ञान से होते हैं, ज्ञान मिथ्या-ज्ञान का विरोधी है, जब मिथ्या ज्ञान का नाश ज्ञान से हो जायगा तब उसकी सन्तान को दुःखादि उत्पन्न ही नहीं होंगे । प्र०—जब ज्ञान को साधन मानोगे तो ज्ञान साध्य होने से भी मुक्ति दुःखरूप हो जायगी ; क्योंकि ज्ञान भी तो देहस्थ आत्मा ही को होगा और ज्ञान साध्य होने से मुक्ति ऐसी ही अनित्य होगी जैसा कर्म का फल है ? उ०—निजमुक्तस्य बन्धध्वंसमात्रं परं न समानत्वम् ॥ ८६ ॥ अर्थ—कर्म का फल तो भावरूप सुख है, इसलिये वह अनित्य है ; परन्तु ज्ञान का फल तो अविद्या का विनाश रूप है । जब कार्याभाव रूप नहीं तो उसका नाश न होगा । दूसरे कर्म देहात्मविशिष्ट से होता है और उसका फल भी देहात्मा मिलकर भोगते हैं, परन्तु देह विनाशी है, इसलिये कर्म का फल भी विनाशी ज्ञानात्मा का धर्म आत्मा में नित्य हो सकता है ।

( ३६ ) प्र०—क्या आत्म निज मुक्त है ? उ०—अविद्यादि दोषों से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसके दूर होने से जीवात्मा मुक्ति सुख को लेता है। यहाँ आचार्य ऋषि का यह आशय है कि स्वभाव से तो जीवात्मा बद्ध नहीं केवल अविवेक से बद्ध होता है और अविवेक के नाश से मुक्त होता है, तो मुक्ति ध्वंस अर्थात् नाशरूप है, भावरूप नहीं। द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थ परिच्छित्तिः प्रमा तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं प्रमाणम् ॥ ८७ ॥ अर्थ—ज्ञाता और ज्ञेय के पास-पास होने से जो ज्ञान होता है, उसे प्रमा कहते हैं। इस प्रमा के साधन तीन प्रकार के प्रमाण हैं—एक प्रत्यक्ष, दूसरा अनुमान, तीसरा शब्द। जो पदार्थ भौतिक और नजदीक हैं, उनका ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण से होता है, और जो पदार्थ अभौतिक तथा दूर हैं, उनका शब्द और अनुमान से होता है, यहाँ दूर का आशय परोक्ष है। जिन पदार्थों का तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उनका शब्द प्रमाण से बोध होता है। यहाँ शब्द का आशय योगी और ईश्वर की आज्ञा है। जहाँ भौतिक पदार्थों का परोक्ष होने में शब्द प्रमाण लिया गया है, वहाँ सत्यवादी आप्त पुरुष का वाक्य समझना चाहिये। प्र०—एक शब्द प्रमाण के दो अर्थ क्यों लिये जावें ? उ०—शब्द कहते हैं आप्त के वाक्य को और आप्त कहते हैं जिसने धर्म से धर्मों का निश्चय किया हो, सो अभौतिक पदार्थों का यथार्थ ज्ञान तो बिना परमात्मा और योगी के दूसरे को हो नहीं सकता और भौतिक पदार्थों के ज्ञान के साधन इन्द्रियों के होने से आप्त पुरुष का वाक्य भी प्रमाण मानना चाहिये। प्र०—क्या यह तीन ही प्रमाण हैं उपमानादि नहीं ?

( ३७ ) उ०—तत्सिद्धौ सर्वसिद्धेर्नाधिक्यसिद्धिः॥८८॥ अर्थ—इन तीन प्रमाणों के सिद्ध होने से सब पदार्थों की सिद्धि हो जाती है, इसलिये और प्रमाण माँगने की आवश्यकता नहीं ; क्योंकि महात्मा मनु ने भी लिखा है । प्रत्यक्षञ्चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् । त्रयं सुविदितं कार्य्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता । अर्थ—प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र के अनुकूल जानकर कार्य करना चाहिये ; क्योंकि धर्म की शुद्धि की इच्छावालों की इच्छा इनसे पूरी होसकती है और उपमानादि प्रमाण इन्हीं के अन्दर आजाते हैं । यत्सम्बद्धं सत्तदाकारोल्लेखि विज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् ॥ ८९ ॥ जिस सामने उपस्थित पदार्थ के साथ ज्ञानेन्द्रिय का सम्बन्ध हो और मन को भी उस इन्द्रिय के द्वारा उसका यथार्थ बोध होजाय, तो उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और इस ज्ञान का कारण ज्ञानेन्द्रिय और मन की वृत्ति है । इसलिये मन और इन्द्रियें प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाती हैं और इनका विषय केवल प्राकृत पदार्थ ही हैं । प्रत्यक्ष से अप्राकृत पदार्थों का ज्ञान नहीं होसकता । प्र०—योगियों को तीनों काल के पदार्थों का साक्षात ज्ञान हो सकता है और योगी समाधि अवस्था में आत्मा और अन्दर के पदार्थों को प्रत्यक्ष करता है, इस वास्ते तुम्हारा प्रत्यक्ष का लक्षण ठीक नहीं ? उ०—योगिनामबाह्यप्रत्यक्षत्वान्नदोषः ॥ ९० ॥

( ३८ ) अर्थ—यह लक्षण बाह्य प्रत्यक्ष का है और योगियों को अबाह्य प्रत्यक्ष भी होता है, इसलिये योगियों का प्रत्यक्ष बाह्य रूप न होने से दोष नहीं। इसके लिये और युक्ति देते हैं। लीनवस्तु लब्धातिशयसम्बन्धादऽदोषः ॥ ९१ ॥ योगी लोग ऐसी वस्तु का जो दूर हो अथवा दूसरे के चित्त में हो उसके साथ भी सम्बन्ध रखते हैं, इस वास्ते योगियों के ऐसे प्रत्यक्ष में दोष नहीं आता। प्र०—योगियों का ऐसा प्रत्यक्ष क्यों माना जावे ? क्योंकि यह साध्य अर्थात् प्रमाण की आवश्यकता रखता है, इसलिये इन्द्रियग्राह्य पदार्थ का ही प्रत्यक्ष मानना चाहिए और अतीन्द्रिय पदार्थ का प्रत्यक्ष न कहना चाहिए। उ०—मन के इन्द्रिय होने से मानसिक प्रत्यक्ष भी मानना चाहिए, इसलिये मानसिक प्रत्यक्ष जो योगियों को होता है वह सिद्ध है साध्य नहीं। प्र०—प्रमाण वह होता है जो सबके लिये एक सम हो, जो प्रत्यक्ष योगियों को हो अन्य पुरुषों को न हो, उसे प्रत्यक्ष नहीं कह सकते ? उ०—इन्द्रियों के विकारी होने से इन्द्रियजन्य ज्ञान किसी को भी नहीं होता, जैसे—अन्धे को रूप का ज्ञान, बहिरे को शब्द- ज्ञान इत्यादि। प्र०—क्या सबके मन में दोष है जो मानसिक प्रत्यक्ष नहीं होता ? उ०—जिसके मन में मल, विक्षेप, आवरण, तीन दोष हों उसे मानसिक प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, जैसे—दर्पण से अपनी आँख देख सकते हैं, परन्तु दर्पण के मैला तथा स्थिर न होने अथवा कोई आवरण होने से नहीं देख सकते। जैसे गंगा में यह शक्ति है कि

( ३६ ) वह बड़े-बड़े मकानों को बहा ले जाय, परन्तु यदि उसी गंगा को छोटी-छोटी नालियों में विभक्त कर दिया जाय तो एक ईंट को भी नहीं बहा सकती। इसी प्रकार मन सूक्ष्म पदार्थों को जान सकता है, परन्तु विक्षिप्त वृत्ति होने से उसकी शक्ति का तिरोभाव हो जाता है। प्र०—इन्द्रियों के प्रत्यक्ष मानने और मानसिक प्रत्यक्ष के न मानने में क्या दोष होगा ? उ०—ईश्वरासिद्धेः ॥ ६२ ॥ मानसिक प्रत्यक्ष के न मानने से ईश्वर की सिद्धि न होगी। क्योंकि रूप न होने से वह चक्षु का विषय नहीं; सुगंध न होने से वह नासिका का विषय नहीं; रस न होने से वह रसना का विषय नहीं। जब ईश्वर का प्रत्यक्ष न हुआ तो अनुमान भी न होगा, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्ष-पूर्वक होता है। जिसका तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उसमें अनुमान हो नहीं सकता और शब्द प्रमाण से भी काम न चलेगा; क्योंकि वेद के ईश्वर-वाक्य होने से वेद को प्रमाण मानते हैं। जब ईश्वर स्वयम् असिद्ध होगा तो उसका वाक्य वेद कैसे प्रमाण माना जायगा ? यहाँ अन्योन्या- श्रय दोष है, क्योंकि ईश्वर की सिद्धि बिना वेद का प्रमाण हो नहीं सकता, आर वेद के बिना ईश्वर-वाक्य सिद्ध हुये प्रमाण ही नहीं हो सकता। प्र०—अनुमान क्यों नहीं होगा। क्योंकि कार्य को देखकर कारण का अनुमान से ज्ञान हो सकता है। ऐसे ही सृष्टि को प्रत्यक्ष देखकर उसके कारण का अनुमान कर लेंगे ? उ०—अनुमान का होना व्याप्ति के अधीन है, और व्याप्ति प्रत्यक्ष के अधीन है। जब तक प्रत्यक्ष प्रमाण से नियत कारण कार्य का सम्बन्ध ज्ञान न हो जाय, तब तक व्याप्ति नहीं हो

( ४० ) सकती, और जब तक व्याप्ति न हो तब तक अनुमान नहीं हो सकता। जैसे जब बादल होता है, तभी वृष्टि होती है, बिना बादल के कभी वृष्टि होती नहीं देखी ; इसलिये जिसका तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उसका अनुमान से ज्ञान नहीं हो सकता। प्र०—हम नियम-पूर्वक कार्य को बिना चेतन कर्ता के नहीं देखते, इससे हम नियमित कार्य से चेतन का अनुमान करते हैं। यह जगत् भी परिणामी होने से कार्य, और नियम पूर्वक होने से अपने चेतन कारण के अनुमान का साधक होगा ? उ०—मुक्तबद्धयोरन्यतराभावान्न तत्सिद्धिः। ६३ अर्थ—संसार में कोई चेतन मुक्त और बद्ध से भिन्न नहीं। यदि तुम ईश्वर को बद्ध मानो तो वह सृष्टि करने की शक्ति नहीं रखता। यदि मुक्त मानो तो इच्छा के अभाव से सृष्टि उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि संसार में जितनी सृष्टि को नियमित देखते हैं, वह कर्ता की इच्छा से होती है। उभयथाप्यसत्करत्वम् ॥ ६४ ॥ इस प्रकार मुक्त, बद्ध दोनों प्रकार के चेतन से सृष्टि का होना अनुमान से सिद्ध न होगा। इसलिये मानसिक प्रत्यक्ष अवश्य मानना पड़ेगा। ईश्वर योगियों को समाधि अवस्था में प्रत्यक्ष होते हैं, क्योंकि स्थिर मन के बिना ईश्वर का बोधक कोई प्रमाण नहीं। ईश्वर को बद्ध और मुक्त दोनों प्रकार का नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों सापेक्ष हैं, अर्थात् जो पहिले बँधा हो, वह ही बंध से छूटने से मुक्त कहला सकता है। ईश्वर इन दोनों अवस्थाओं से पृथक् है। जगत् का करना उसका स्वभाव है, इसलिये इच्छा की आवश्यकता नहीं।

( ४१ ) प्र०—एक वस्तु में दो विरुद्ध स्वभाव हो नहीं सकते । यदि रचना ईश्वर का स्वभाव मानोगे तो विनाश किसका स्वभाव मानोगे ? उ०—यह शङ्का परतन्त्र और अचेतन में हो सकती है, क्योंकि कर्त्ता स्वतन्त्र होता है, और स्वतन्त्र उसे कहते हैं, जिसमें करने न करने और उलटा करने की सामर्थ्य हो । मुक्तात्मनः प्रशंसा उपासासिद्धिस्य वा ॥ ६५ ॥ उपासना के सिद्ध होने से जो मुक्तात्मा की प्रशंसा की जाती है, इससे प्रतीत होता है, कि ईश्वर है, जिसकी उपासना से अविवेक की निवृत्ति और विवेक की प्राप्ति होकर आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है । तत्सन्निधानादधिष्ठातृत्वं मणिवत् ॥ ६६ ॥ प्रकृति क्रिया रहित है। उसको क्रियाशक्ति ईश्वर की समीपता से प्राप्त होती है, जैसे—मणि को काँच की समीपता से सुरखी प्राप्त होती है, परमात्मा में इच्छा के न होने से उस अकर्त्ता कहा जाता है, और बिना उसकी समीपता के प्रकृति करने में असमर्थ है, जैसे—बिना हाथ के जीव उठा नहीं सकता, इस वास्ते कहते हैं, उठाना जीव का धर्म नहीं, परन्तु हाथ में जीव के बिना क्रियाशक्ति नहीं। इस वास्ते जीवात्मा को कर्ता माना जाता है। विशेषकार्येष्वपि जीवानाम् ॥ ६७ ॥ जो कार्य सामान्यरूप से जगत् में होते हैं, वह तो परमात्मा की सत्ता से होते हैं, और जो कार्य विशेषरूप से प्रति शरीर में भिन्न-भिन्न होतें हैं, वे जीव की सत्ता से होते हैं। संसार के आत्मा को परमात्मा और शरीर के आत्मा को जीवात्मा कहते हैं।

( ४२ ) प्र०—यदि प्रत्यक्ष प्रमाण से व और प्रमाणों से ईश्वर की सिद्धि हो गई, तो वेद का क्या प्रमाण माना जाय ? क्योंकि अभौतिक पदार्थों का तो प्रत्यक्ष से ज्ञान हो ही जायगा, और अभौतिक का योगियों के अवाह्य प्रत्यक्ष से हो जायगा। उ०—सिद्धरूपबोद्धृत्वाद्वाक्यार्थोपदेशः ॥९८॥ अर्थ—अन्य प्रमाणों से ईश्वर के होने की तो सिद्धि हो जायगी, परन्तु उसके स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं होगा, जैसे— पुत्र को देखकर उसके पिता के होने का ज्ञान तो अनुमान से हो सकता है, परन्तु उसके रूप और आयु आदि के ज्ञान के वास्ते शब्द की आवश्यकता है। इस वास्ते वेद का अवश्य प्रमाण मानना चाहिये। अन्तः करणस्य तदुज्ज्वलितत्वाल्लोहवदधि- ष्ठातृत्वम् ॥ ९९ ॥ अन्तःकरण भी चैतन्य के संयोग से उज्ज्वलित ( प्रकाशित ) है, अतएव संकल्प विकल्पादि कार्यों का अधिष्ठातृत्व अन्तःकरण को है, जैसे—अग्नि से तपाये हुए लोहे में यद्यपि दाहशक्ति अग्नि संयोग के कारण है तथापि अन्य पदार्थों के दाह करने को वह लोहशक्ति भी हेतु हो सकती है। प्रतिबन्धदृशः प्रतिबद्धज्ञानमनुमानम् ॥ १०० ॥ जो इन्द्रिय-ग्राह्य पदार्थ नहीं दीखता, उसके ज्ञान के साधन को अनुमान कहते हैं; जैसे—अग्नि प्रत्यक्ष नहीं दीखती, किन्तु धूम को देखकर उसका ज्ञान हो जाना, इसी का नाम अनुमान है। यह अनुमान व्याप्ति और साहचर्य नियम के ज्ञान बिना नहीं होता ; जैसे—जब तक कोई पुरुष पाकशाला आदि में धूम और

( ४३ ) अग्नि की व्याप्ति न समझ लेगा कि जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि अवश्य होती है, तब तक धूम को देखकर अग्नि का अनुमान कदापि नहीं कर सकता। वह अनुमान जितने प्रकार का है, इसका निर्णय आगे करेंगे। किन्तु प्रथम शब्द प्रमाण का लक्षण करते हैं। आप्तोपदेशः शब्दः ॥ १०१ ॥ यह सूत्र सब शास्त्रों में ऐसा ही है। जैसे तीनों वेदों में गायत्री मन्त्र एक सम है, इसी भाँति इस सूत्र को भी जानना चाहिये। जो पुरुष धर्मनिष्ठ वाह्य धर्म से धर्मी के ज्ञान को यथार्थ रीति पर जानते हैं, तथा शुद्ध आचरणवान् हैं, उनका नाम आप्त है। उनके उपदेश को शब्द प्रमाण कहते हैं। आप्ति का अर्थ योग्यता है, इस कारण तत्वज्ञान से युक्त अपौरुष-वाक्य वेद ही शब्द प्रमाण जानना चाहिये। अब अगले सूत्र से प्रमाण मानने की आवश्यकता को प्रकट करते हैं। उभयसिद्धिः प्रमाणात् तदुपदेशः ॥ १०२ ॥ जब तक मनुष्य को वस्तु का सामान्य ज्ञान हो, परन्तु यथार्थ ज्ञान न हो, तब तक वह संशय कहाता है। संशय की निवृत्ति बिना प्रमाण के हो नहीं सकती और संशय की निवृत्ति के बिना प्रवृत्ति नहीं हो सकती। प्रमाण से आत्म, अनात्म, सद्, असद्, दोनों प्रकार की सिद्धि होती है, इसी कारण प्रमाण का उपदेश किया है। सामान्यतोदृष्टादुभयसिद्धिः ॥ १०३ ॥ तीन प्रकार के अनुमान होते हैं—पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट। पूर्ववत् अनुमान उसे कहते हैं, जैसे धूम को देखकर अग्नि का अनुमान किया जाता है, क्योंकि पहिले पाक-

( ४४ ) शाला में धूम और अग्नि दोनों देखे थे, वैसे ही अन्यत्र होंगे, इस प्रकार का अनुमान पूर्ववत् कहाता है। जो विषय कभी प्रत्यक्ष नहीं किया उसका कारण द्वारा अनुमान करना शेषवत् अनुमान कहाता है; जैसे—स्त्री और पुरुष दोनों को नीरोग और हृष्ट-पुष्ट देखकर इनके पुत्रोत्पत्ति होगी यह अनुमान करना, वा मेघ को देखकर जल बरसेगा, यह अनुमान करना शेषवत् का उदाहरण है। जिस जातीय विषय को प्रत्यक्ष कर लिया है, उसके द्वारा समस्त जाति मात्र के कार्य्य का अनुमान करना सामान्यतो- दृष्ट कहाता है; जैसे—दो एक मनुष्य को देखकर यह बात निश्चय करली कि मनुष्य के सींग नहीं होते, तो अन्य मनुष्य मात्र के सींग न होंगे। यह सामान्यतोदृष्ट का उदाहरण है। इसी भाँति सामान्यतोदृष्ट अनुमान में यह बात भी आसकती है, कि जैसे बिना कारण के कार्य्य की अनुत्पत्ति सामान्यतोदृष्ट है। इससे यह निश्चय कर लेना चाहिये कि जहाँ-जहाँ कार्य्य होगा, वहाँ-वहाँ कारण भी अवश्य होगा। चिदवसानो भोगः ॥ १०४ ॥ चैतन्यता का जो अवसान अर्थात् अभाव है, उसे भोग कहते हैं। यहाँ पर महर्षि भोक्ता और भोग को पृथक्-पृथक् करते हैं, क्योंकि जड़ पदार्थ भोग होते और चैतन्य भोक्ता होता है, तथा भोग सदा परिणामी होता है, और भोक्ता एक रस और चैतन्य होता है। प्र०—क्या जड़, मन और इन्द्रियें भोक्ता नहीं ? उ०—नहीं, यह तो भोग के साधन हैं। प्र०—कर्म तो मन और इन्द्रियाँ करते हैं तो अकर्त्ता जीवात्मा उसका फल क्यों भोगता है ?