संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता * ३९५
हानि नहीं होती। जिस प्रकार मनोराज्यमें उत्पन्न शरीर आदि पदार्थोंका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी हानि नहीं होती, जिस प्रकार स्वप्नमें उत्पन्न पदार्थोंका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी हानि नहीं होती अथवा जिस प्रकार मृगतृष्णिका-नदीके जलका क्षय या विनाश हो जानेपर वास्तविक जलकी कुछ भी हानि नहीं होती, उसी प्रकार एकमात्र सङ्कल्पसे उत्पन्न, स्वभावतः विनाशशील इस शरीररूपी यन्त्रका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी हानि नहीं होती। अतः शरीरके लिये शोक करना निरर्थक ही है। चित्तके संकल्पसे कल्पित तथा दीर्घकालीन स्वप्नमय इस देहके अलङ्कारोंसे भूषित या आधि-व्याधिसे दूषित हो जानेपर चेतन आत्माकी कुछ भी हानि नहीं है। श्रीराम ! देहका विनाश होनेपर चेतन आत्मा विनष्ट नहीं होता।
अज्ञानरूपी चक्रके ऊपर स्थित हुआ जीवात्मा जिस देहके जन्म-मरणरूपी चक्रको देखता रहता है, वह उत्तरोत्तर अधिक भ्रान्तिको देनेवाला, स्वयं भ्रान्तिरूप, पतनोन्मुख खड्गसे ग्रस्त, भली प्रकार अनर्थ-गर्तमें गिराया गया, हत एवं हन्यमान ही दीख पड़ता है। इसलिये मनुष्यको उत्तम धैर्यका भली प्रकार आश्रय लेकर इस अनादि दृढ़ीभूत भ्रमका परित्याग कर देना चाहिये। मिथ्या अज्ञानके द्वारा एकमात्र सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ यह शरीर सत्य-सा होनेपर भी वास्तवमें असत्य ही है; क्योंकि जो वस्तु अज्ञानसे उत्पन्न हुई है, वह किसी समय भी सत्य नहीं हो सकती। श्रीराम! जड पदार्थके द्वारा जो कुछ किया जाता है, वह किया हुआ नहीं माना जाता, इसलिये यह देह कार्य करता हुआ भी कहीं कुछ भी नहीं करता। जड देह तो इच्छासे रहित है और इस निर्विकार आत्मामें इच्छा रहती नहीं, इसलिये कोई कर्ता है ही नहीं। आत्मा शरीरका द्रष्टामात्र है। अपने शरीररूपी घरसे चित्तरूपी वेतालको हटा देनेपर इस मसाररूपी शून्य नगरमें पुरुष कभी भी नहीं डरता। विमल बुद्धिसे अहंकारकी वासना छोड़कर और अहंकारको सर्वथा भूलकर शीघ्रातिशीघ्र अपनी आत्माका ही अवलम्बन करना चाहिये। अहंकारसे युक्त बुद्धिसे जो क्रिया की जाती है, विषवल्लीके सदृश उसका फल मरणरूप ही होता है। विवेक एवं धैर्यसे रहित जिस मूर्खने अपने अहंकाररूपी महोत्स्रवका अवलम्बन किया, उसे तुम तत्काल विनष्ट हुआ ही समझो। राघव ! जिन बेचारोंको अहंकाररूपी पिशाचने अपने अधीन बना लिया, वे सब नरकरूपी अग्नियोंके इन्धन ही बन गये अर्थात् वे नरककी ज्वालासे जलते रहते हैं। पापशून्य राघव ! 'हा ! हा ! मैं मर गया हूँ', 'मै जल गया हूँ' इत्यादि जो दुःखवृत्तियाँ हैं, वे अहंकाररूपी पिशाचकी ही शक्तियाँ हैं, दूसरेकी नहीं। जिस प्रकार सर्वत्र व्यापक आकाश यहाँ किसीसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र व्यापक आत्मा भी अहंकारसे लिप्त नहीं होता। श्रीराम ! प्राणवायुसे युक्त यह चञ्चल देहरूपी यन्त्र जो कुछ करता एव जो कुछ लेता है वह सब अहंकारकी ही चेष्टा है।
श्रीराम ! जड चित्तका, जो आत्मासे सर्वथा पृथक् है, चेतन आत्माके साथ कभी सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। चित्त ही आत्मा है—यो अज्ञानसे ही प्रतीत होता है। यह जो आत्मा है, वह ज्ञानस्वरूप (चैतन्यरूप), अविनाशी, सर्वत्र विद्यमान और व्यापक है, जब कि अहंकाररूप चित्त तो मूर्ख और हृदयवर्ती सबसे बड़ा अज्ञान है। जिस पुरुषका चित्तरूपी वेताल शान्त हो चुका है, ऐसे पुरुषका गुरु, शास्त्र, धन और बन्धु उसी प्रकार उद्धार करनेमें समर्थ हैं, जिस प्रकार अल्प कीचड़में फँसे हुए पशुका मनुष्य उद्धार करनेमें समर्थ हों। इस जगत्रूपी महान् अरण्यमें अपनेद्वारा ही स्वयं दृढ़तासे धैर्य धारणकर अपना उद्धार कर लेना चाहिये। श्रीराम ! मनुष्यको उचित है कि विषयरूपी सर्पोंका बहिष्कार कर दे, आर्योंके मार्गका अनुसरण करे और महावाक्योंके अर्थका भली प्रकार विचार करके अपनी अद्वितीय आत्माका ही आश्रय ले। मनुष्यको अपवित्र, तुच्छ, भाग्यहीन तथा दुष्ट आकृतिवाले इस शरीरके आरामके लिये विषयभोगमें कभी नहीं फँसना चाहिये; क्योंकि इसमें फँसे हुए पुरुषोंकी चिन्तारूपी
३९६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
क्रूर राक्षसी खा डालती है। जैसे पत्थरका पत्थरपन अथवा जैसे घटका घटपना सामान्य सत्तारूप परमात्मा-से अभिन्न ही है, वैसे ही समष्टि-व्यष्टि मन आदि भी परमात्मासे अभिन्न ही हैं। श्रीराम ! इस विषयमें आगे कही जानेवाली महान् अज्ञानकी नाशक मानस-शिवपूजा-रूप यह दूसरी बात तुम श्रवण करो, जो चन्द्रमौलि भगवान् शंकरने कैलास पर्वतकी कन्दरामें जन्म-मरणरूप दुःखकी शान्तिके लिये मेरे समक्ष कही थी।
कैलासनामक एक पर्वतोंका राजा है। वह अपनी ऊँचाईसे स्वर्गलोकको भी पार कर गया है और वह उमापति भगवान् श्रीशंकरका निवासस्थान है। वहाँपर स्वयं प्रकाशमान भगवान् महादेवजी रहते हैं। पहले किसी समय उसी पर्वतपर उन देवाधिदेवकी पूजा करता हुआ मैं गङ्गाजीके किनारे आश्रम बनाकर रहता था। तपके लिये वहाँपर मैने दीर्घकालतक तपस्वियोंके आचरणका अनुसरण किया। वहाँपर मेरे चारो ओर सिद्धोंके समूह रहते थे। मैं उनसे विचार-विनिमय करके शास्त्रीय दुरूह तत्त्वोंका अनुशीलन करता था। मैने फूल चुननेके लिये एक डलिया रख छोड़ी थी और अनेक शास्त्रीय पुस्तकें भी जुटा रखी थीं। श्रीराम ! उस तरहके गुणोंसे सम्पन्न कैलासवनके कुञ्जोंमें तपश्चर्या करते हुए मेरा बहुत समय व्यतीत हो गया। इसके अनन्तर किसी एक समयकी बात है—श्रावणके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथि थी और रात्रिका प्रथम भाग यानी प्रदोषकाल पूजा, जप, ध्यान आदिमें व्यतीत हो चुका था। उस समय उस अरण्यमें मैने तत्काल ही उत्पन्न हुआ एक बड़ा तेज देखा। वह तेज सैकड़ों बादलोंके तुल्य सफेद एवं असंख्य चन्द्रबिम्बोंके सदृश चमकीला था, उस तेजकी चकाचौंधसे दिशाओंके समस्त कुञ्ज चमक उठे। उसे देखकर मैने भीतरकी प्रकाशमान दिव्य-दृष्टिसे उसके विषयमें विचार किया और तदनन्तर फिर बाह्यदृष्टिसे विशेष अवयवोंके अनुसंधानपूर्वक उसका अवलोकन किया। विचारकर ज्यों ही मैं सामनेका शिखर-प्रदेश देखता हूँ, त्यों ही चन्द्रकलाधर महादेवजी उपस्थित हो गये। वहाँ अर्घ्यपात्र लेकर सावधान एवं प्रसन्न-मन मैं उन गौरीपतिके निकट गया। तदनन्तर चन्द्रज्योत्स्ना-के समान कोमल, शीतल तथा समस्त संतापोंका अपहरण करनेवाली उस महादेवजीकी दृष्टिका मैं दीर्घकाल-तक भाजन बना रहा। पुष्पोंके शिखरपर उपविष्ट तीनों लोकोंके साक्षी उन देवाधिदेवको मैने समीप जाकर अर्घ्य, पुष्प तथा पाद्य समर्पण किया। उनके सामने मैने अनेक मन्दार-पुष्पोंकी अञ्जलियाँ बिखेर दीं और नानाविध नमस्कार एवं स्तोत्रोंसे शिवजीका अभ्यर्चन किया। तदनन्तर मैने शिवजीकी पूजाके सदृश ही पूजासे सखियोंसे युक्त तथा गणमण्डलसे परिवेष्टित भगवती गौरीका उत्तम रीतिसे पूजन किया। पूजाकी समाप्ति होनेपर उनकी आज्ञासे पुष्पमय शिखर-पर बैठे हुए मुझसे अर्धचन्द्रकी कला धारण करनेवाले भगवान् उमापति परिपूर्ण हिमांशुकी किरणके सदृश शीतल वाणीसे कहने लगे।
निर्वाण-प्रकरण पू० ] ❖ श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन ❖ ३१७
भगवान् उमापतिने कहा—ब्रह्मन् ! शान्तिसे युक्त, परमात्मामें विश्राम लेनेवाली तथा कल्याण करनेवाली तुम्हारी चित्तवृत्तियाँ अपने स्वरूपमें अवस्थित तो हैं ? तुम्हारा कल्याणकारी तप निर्विघ्नरूपसे बराबर चल रहा है न ? तुमने प्राप्तव्य वस्तु प्राप्त कर ली है न ? और सांसारिक भय शान्त हो रहे हैं न ?
(श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—) रघुनन्दन ! समस्त लोकोंके एकमात्र हेतु देवाधिदेव महादेवजीके उस प्रकार कहनेके अनन्तर विनययुक्त वाणीसे मैने उनसे निवेदन किया—'महेश्वर ! देवाधिदेव ! त्रिलोचन ! आपकी निरन्तर स्मृतिसे प्राप्त हुए उत्तम कल्याणसे सम्पन्न पुरुषोंके लिये इस संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है और न किसी तरहके भय ही है । आपके निरन्तर स्मरणसे जनित आनन्दके कारण जिनका चित्त चारो ओरसे मुग्ध हो गया है, ऐसे पुरुषोंको इस जगत्कोशमें सभी प्राणी प्रणाम करते हैं । एकमात्र आपके अनुस्मरणमें निरन्तर जिनका मन लगा रहता है, ऐसे पुरुष जहाँ स्थित रहते हैं, वे ही देश, वे ही जनपद, वे ही दिशाएँ और वे ही पर्वत प्रशस्ततम हैं । प्रभो ! आपका अनुस्मरण पूर्व-संचित, वर्तमान और भविष्यके पुण्यसमूहकी वृद्धि करता है । आपका अनुस्मरण ज्ञानरूपी अमृतका एकमात्र आधारभूत कलश है, धृतिरूपी ज्योत्स्नाके लिये चन्द्रमा है और मोक्षरूपी नगरका द्वार है । समस्त भूतोंके अधिपते ! आपके निरन्तर चिन्तनरूपी उदार चिन्तामणिसे शोभित मैने समस्त वर्तमान और भविष्यत्कालीन आपत्तियोंको पैरसे ठुकरा दिया है ।' श्रीराम ! सुप्रसन्न उन भगवान् शंकरजीसे यों कहकर फिर नतमस्तक हो मैने जो कुछ कहा, उसे तुम सुनो ! 'भगवन् ! यद्यपि आपकी अनुकम्पासे मेरे लिये समस्त दिशाएँ अभीष्ट पदार्थोंसे परिपूर्ण हैं, तथापि देवेश ! मुझे जो एक सन्देह है, उसके विषयमें आपसे निर्णय पूछता हूँ । प्रभो ! वह देवार्चन-विधान किस तरहका है, जो उद्वेगका नाशक, विकाररहित, समस्त पापोंका विनाशकारी तथा समस्त कल्याणोंका अभिवर्धक है ? उसे प्रसन्नमतिसे आप मुझसे कहिये ।'
श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मज्ञानियोंमें अग्रगण्य मुनिवर ! मै तुमसे सर्वश्रेष्ठ वह देवार्चनका विधान कहता हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे तत्काल ही मनुष्य मुक्त हो जाता है । जो आदि और अन्तसे रहित, वास्तविक ज्ञानस्वरूप है, वही 'देव' कहा जाता है । सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला सत्-स्वरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही 'देव' शब्दका वाच्य है, इसलिये उसीकी पूजा करनी चाहिये । कौन पूज्य है, इस विषयका तात्त्विक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि एकमात्र निर्गुण निराकार विज्ञानानन्दघन विशुद्ध परमात्मा शिव ही पूज्य है और उसकी पूजन-सामग्रीमें ज्ञान, समता और शान्ति—ये सबसे श्रेष्ठ पुष्प हैं । महर्षे ! ज्ञानस्वरूप परमात्मदेवकी ज्ञान, समता और शान्तिरूप पुष्पोंसे जो पूजा की जाती है, उसीको आप वास्तविक देवार्चन जानिये । परमात्मा ही विज्ञानस्वरूप देव, भगवान् शिव और परम कारणस्वरूप है । अतः ज्ञानरूप पूजन-सामग्रीसे उसीकी सदा-सर्वदा पूजा करनी चाहिये । वसिष्ठजी ! आप जीवात्माको चिन्मय आकाशस्वरूप अविनाशी अकृत्रिम सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप ही जानिये । एकमात्र वह परमात्मा ही पूज्य है, उसके सिवा दूसरा कोई पूज्य नहीं है । अतः उस विज्ञानानन्दघन परमात्माकी पूजा ही पूजा है । महर्षे ! जो परमार्थतः सबसे श्रेष्ठ है, जो आपका—'तत्' पदार्थका, मेरा तथा समस्त जगत्का स्वरूपभूत है, एव जो स्वय परिपूर्णस्वरूप है, ज्ञानरूप सामग्रीसे पूजा करने योग्य उस देवका मैने आपसे वर्णन कर दिया । सभी वस्तुओंका, समस्त जगत्का. दूसरेका, आपका और मेरा सर्वव्यापी चिन्मय परमात्मा ही पारमार्थिक स्वरूप है, दूसरा नहीं ।
(सर्ग २९)
३९८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
चेतन परमात्माकी सर्वात्मता
श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मन् ! इस रीतिसे यह समस्त संसार एकमात्र परमात्मस्वरूप ही है। ब्रह्म ही परम आकाश है और यही सबसे बड़ा देव कहा गया है। इस परमदेवका पूजन सबमे कल्याणकर है। उसीसे सब कुछ प्राप्त होना है। वही समस्त जगत्-सृष्टिके आरोपका अधिष्ठान है और उसीमें यह सब व्यवस्थित है। स्वाभाविक आदि-अन्तसे रहित, अद्वितीय, अखण्ड नित्य परमानन्द उसी एकमात्र देवके अर्चनसे प्राप्त होता है। वह सच्चिदानन्द कल्याणस्वरूप शिव समस्त गुणोंसे अतीत और सम्पूर्ण सङ्कल्पोंसे रहित है। मुने ! देश और काल आदि परिच्छेदोंसे रहित, समस्त संसारका प्रकाश करनेवाला विशुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मा ही देव कहा जाता है। वही परब्रह्म परमात्मा 'ॐ', 'तत्', 'सत्' —इन नामोंसे कहा गया है। वह स्वभावतः महान्, ध्रुव, सत्यस्वरूप है, सर्वत्र समभावसे व्यापक है; वही महान् चेतन और परमार्थस्वरूप कहा जाता है। पापशून्य मुने ! अरुन्धतीका और आपका जो चैतन्य तत्त्व है, पार्वतीजी-का, मेरा और गणोंका जो चैतन्य तत्त्व है तथा जो चैतन्य तत्त्व तीनो जगत्में परिपूर्ण है, उत्तममति तत्त्वज्ञ लोग उसे ही परमदेव परमात्मा समझते हैं। एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही इस दृश्य संसारका सार है; इसलिये सकल-सारभूत वस्तुओंकी भी साररूपताको प्राप्त हुआ वह सर्वरूप परम देव परमात्मा मे हूँ। ब्रह्मन् ! वह परमात्मा सर्वव्यापी होनेसे किसीके लिये भी दूर नहीं है; अत वह किसीके लिये दुष्प्राप्य भी नहीं है। वह शरीरके बाहर-भीतर—सर्वत्र स्थित है। वही यह परमात्मा चिन्मय, सूक्ष्म, सर्वव्यापी और मायारहित है। देव, दानव और गन्धर्वों तथा पर्वत, समुद्र आदिसे युक्त यह सम्पूर्ण जगत् उस चैतन्यमें स्थित होकर कर्मानुसार उसी प्रकार घूमता रहता है, जिस प्रकार जल-भँवरमें जल।
ब्रह्मन् ! चिन्मय परमात्माने ही गदा, चक्र आदि आयुधोंसे युक्त चतुर्भुज विष्णुरूपसे समस्त असुर-समूहका उसी प्रकार विनाश कर दिया था, जिस प्रकार वर्षाऋतु इन्द्रधनुषसे युक्त मेघरूपसे आतपका विनाश कर देती है। चेतन परमात्माने ही वृषभ और चन्द्रमाके चिह्नोंसे युक्त त्रिनेत्र रूप धारण कर गौरीको प्राप्त किया है। चेतन परमात्मा ही भगवान् विष्णुके नाभि-कमलमें भ्रमरके समान ध्यानमे तल्लीन एवं वेदत्रयीरूपी कमलिनीका महान् सरोवरस्वरूप ब्रह्माजीका रूप धारण करता है। इसी महाचैतन्य परमात्माके सकाससे सूर्य-चन्द्रमा आदि सदा प्रकाशित होते है। निर्मल चेतनरूपी चन्द्रबिम्बमें खरगोश-की तरह सम्बन्ध प्राप्तकर यह जगत्में स्थित पदार्थोंकी शोभा सर्वत्र दिखायी पड़ती है। भद्र ! सुनो, यद्यपि इस देह-रूपी वृक्षमें हाथ, पैर आदि अपने अङ्ग ही शाखाएँ हैं और केशोंका समूह ही सुन्दर लताओंका समूह है, तथापि यह वृक्ष क्या पर्याप्तरूपसे चेतनके सम्बन्धके बिना किसी तरह शोभित हो सकता है ? चराचर पदार्थोंका निर्माण करनेवाला भी यह चेतन ही है, दूसरा नहीं। इसलिये एकमात्र चेतन ही अपने सङ्कल्पसे जगतरूपमे प्रकट है। ब्रह्मन् ! वस्तुतः इस जगत्में दो प्रकारका सर्वभूत-स्वरूप चेतन है—एक तो चञ्चलस्वभाव 'जीवात्मा और दूसरा निर्विकल्प परम चेतन परमात्मा। वह चेतन परमात्मा ही अपने सङ्कल्पसे जीवात्माके रूपमें अपनेसे भिन्न-सा होकर स्थित है। वह चेतन परमात्मा ही अपने संकल्पसे आकाश आदि पाँच भूतो, शब्दादि पाच विषयो, प्राणा-पानादि पाँच प्राणों और देश-कालके रूपमें परिणत होता है। सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही नारायण होकर समुद्रमे शयन करता हे, ब्रह्मा होकर ब्रह्मलोकमें ध्यानस्थित रहता है, हिमालय पर्वतपर पार्वतीके सहित महादेवजीका रूप धारण कर निवास करता है और वैकुण्ठमे देवेश्रेष्ठ विष्णुका रूप धारणकर रहता है। वह परमात्मा ही सूर्य बनकर
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शुद्ध चेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन * ३९९
दिवसका निर्माण करता है, मेघ बनकर जल बरसाता है, वायु बनकर बहता है। सबका आत्मा, सर्वत्र व्यापक एवं अपनी समस्त संकल्पशक्तिके प्रभावसे सर्वस्वरूप होनेके कारण वह चिन्मय ब्रह्म जगत्-रूप हो जाता है। वास्तवमें तो वह विज्ञानानन्द परमात्मा आकाशसे भी बढ़कर निर्मल और सूक्ष्म है। वह परमात्मा जब-जब जहाँपर जिस भावसे जिस तरह संकल्प करता है, तब-तब वहाँ वैसा ही बन जाता है। (सर्ग ३०)
शुद्ध चेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन
श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मन्! चेतन जीवात्मा अज्ञानके कारण 'मैं दुखी हूँ' इस भावनासे व्यर्थ ही दुखी होता है और 'मै नष्ट हो गया; मै मर गया' यों भावना करता हुआ रोता रहता है। किंतु जिस प्रकार पत्थरमें तेल नहीं रहता, उसी प्रकार शुद्ध चेतन आत्मामें दृश्य, दर्शन और द्रष्टाकी त्रिपुटी नहीं रहती। जैसे चन्द्रमामें कालिमा नहीं रहती, वैसे ही शुद्ध आत्मामें कर्त्ता, कर्म और करण नहीं रहते। जिस प्रकार आकाशमें नवीन अङ्कुरका अभाव है, उसी प्रकार आत्मा-में प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण—इन तीनोंका अभाव है। जिस प्रकार नन्दन-वनमें खैरके वृक्षका अभाव है, उसी प्रकार शुद्ध आत्मामें मन, मनन और दृश्य विषयका अभाव है। जैसे आकाशमें पर्वतका अभाव है, वैसे ही शुद्ध चेतनमें मै-पना, तू-पना और वह-पना आदि नहीं है। जैसे काजलमें सफेदी नहीं रहती, वैसे ही चेतनमें अपनी देह तथा परायी देहका भाव नहीं रहता। वह शुद्ध चेतन आत्मा केवल, निर्विकल्प, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण तेजोंको भी प्रकाशित करनेवाला, स्वच्छ और परम श्रेष्ठ है। वह सम्पूर्ण पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला, सर्वव्यापक, नित्य शुद्ध, नित्य प्रकाशरूप, मनसे रहित, निर्विकार और निरञ्जन है। एक वही घट और पटमें, वट और दीवाल-में, शकट और वानरमें, गदहे और असुरमें, सागर और आकाशादि भूतोंमें तथा नर और नागमें—सर्वत्र व्यापक होकर स्थित है। वह शुद्ध हुआ भी मलिन-सा, निर्विकल्प हुआ भी सविकल्प-सा, चेतन हुआ भी जड-सा और सर्वव्यापी हुआ भी एकदेशीय-सा प्रतीत होता है।
कर्मेन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें तत्परता संकल्पसे होती है। वह संकल्प मननजनित है। वह मनन चित्तकी अशुद्धिके कारण होता है और उन सबका साक्षी आत्मरूप चेतन सर्वविध मलोंसे रहित है। जिस प्रकार स्फटिक-शिलामें अरण्य, पर्वत, नदी आदिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार अपने स्वरूपमें ही स्थित प्रकाशस्वरूप नित्य चेतन-के अन्तःकरणमें इस जगत्का प्रतिबिम्ब पड़ता है। इस जगत्को अपने संकल्पमें धारण करनेवाला अद्वितीय, निर्विकार चेतन न उत्पन्न होता है न विनष्ट होता है, न क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। अर्थात् वह सब प्रकारके विकारोंसे रहित है। असत्स्वरूप यह जगत् अज्ञानके कारण विशाल खमकी तरह आत्मामें ही प्रतीत होता है। किंतु वास्तवमें मृगतृष्णिका-जलके सदृश प्रतीत होनेवाला यह जगत् तनिक भी सत्य नहीं है। मुने! यह परम चेतन आत्मा अपने पुर्यष्टकमें* ही प्रतिबिम्बित होता है, जैसे स्वच्छ दर्पणमें ही प्रतिमा दिखलायी पड़ती है। महर्षे! अनेक प्रकारकी कल्पनाओं-से ग्रस्त यह पुर्यष्टकरूप दृश्यसमूह शुद्ध चिन्मय आत्मा-से ही उत्पन्न होता है, उसीमें स्थित और विलीन हो जाता है। इसलिये यह सम्पूर्ण विश्व विशुद्ध चेतन आत्मस्वरूप ही है, दूसरा नहीं—यह जानिये।
* मनो बुद्धिरहंकारस्तथा तन्मात्रपञ्चकम् ।
इति पुर्यष्टकं प्रोक्तं देहोऽसावातिवाहिकः ॥
(नि० पू० ५१ । ५०)
'मन, बुद्धि, अहंकार एव पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ—इन आठोंका समूह 'पुर्यष्टक' कहा गया है और यही 'आतिवाहिक' देह कहा गया है।'
४०० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जिस प्रकार जड लोहा लोह-चुम्बकके सान्निध्यसे संचरणशील होता है, उसी प्रकार सर्वव्यापी सत्स्वरूप परमात्माके सान्निध्यसे यह जीवात्मा संचरणशील होता है। अर्थात् सर्वत्र स्थित परमात्मशक्तिसे ही यह जीव चेष्टा करता है। यह जीव अज्ञानसे अपने वास्तविक स्वरूपको भूल जानेके कारण देहके सम्बन्धसे जड-सा हो गया है तथा अपना विशुद्ध चैतन्यरूप स्वभाव भूल जानेके कारण ही यह चेतन चित्त-सा बन गया है। ब्रह्मन् ! परमात्माने ही शरीररूपी गाड़ी खींचनेके लिये मनःशक्ति और प्राण-शक्ति—ये दो सुदृढ़ बैल उत्पन्न किये है। सच्चिदानन्दघन निर्विकार परमात्माके सकाशसे ही यह जीव जीवन धारण करता है, जिस प्रकार दीपकके सकाशसे घर शोभा देता है। अज्ञानके कारण इस जीवकी आधियाँ एवं व्याधियाँ उसी प्रकार उत्तरोत्तर स्थूलता प्राप्त करती हैं, जिस प्रकार जलका तरङ्गरूप और उस तरङ्गरूपका फेनरूप उत्तरोत्तर स्थूलता प्राप्त करता है। सर्वशक्तिरूप होनेपर भी वही चेतन जीवात्मा अज्ञानके कारण 'मैं चेतन नहीं हूँ' इस भावनासे इस देहमें परवशता प्राप्त करता है, किंतु अपने स्वरूपके ज्ञानसे मोह-रहित हो जाता है। हृदयरूप कमल-पत्रके चेष्टा-रहित हो जानेपर ये प्राण शान्त हो जाते हैं, जिस प्रकार पंखेके कम्पनशून्य हो जानेपर पवनकी शक्तियाँ विलीन हो जाती है। हृदयरूप कमल-पत्रके स्फुरणसे यह पुर्यष्टक विस्पष्ट हो जाता है और हृदय-कमलरूप यन्त्र जब चलनेसे रुक जाता है यानी निश्चल हो जाता है, तब वह भी विनष्ट हो जाता है। द्विजवर ! जबतक देहमें पुर्यष्टक विद्यमान रहता है, तबतक देह जीवित रहती है और जब देहमेंसे पुर्यष्टक विलीन हो जाता है, तब देह 'मृत' कही जाती है। किंतु जब शरीरका हृदय-कमलरूपी यन्त्र सदा चलता रहता है, तब यह जीव अपने संकल्पवश प्रकृतिके अधीन हुआ कर्म करता रहता है। पर राग-द्वेषरहित विशुद्ध वासना जिनके हृदयमें रहती है, वे अटल एवं एकरूप रहनेवाले मनुष्य जीवन्मुक्त हैं। हृदय-कमलरूपी यन्त्रके रुक जाने तथा प्राणके शान्त हो जानेपर यह देह पृथ्वीपर लकड़ी और ढेले आदिकी भाँति गिर जाती है। मुने ! ज्यो ही हृदयाकाशके वायुमें अर्थात् प्राणमें यह पुर्यष्टक लीन हो जाता है, त्यों ही मन भी प्राणमें ही विलीन हो जाता है। जिस प्रकार घरके लोगोंके घर छोड़कर दूर चले जानेपर घर शून्य हो जाता है, उसी प्रकार मन एवं प्राणसे शून्य हुआ यह शरीर शवरूप हो जाता है। जिस प्रकार नाना प्रकारके पत्ते उत्पन्न हो-होकर समय पाकर वृक्षसे झड़ जाते हैं, उसी प्रकार प्राणियोंके ये शरीर भी झड़ जाते हैं—विनष्ट हो जाते हैं। जीवोंके ये शरीर और वृक्षोंके पत्ते उत्पन्न और नष्ट होते ही रहते हैं, अतः उनके विषयमें शोक ही क्या है। चैतन्य-समुद्र परमात्मामें ये देहरूपी बुद्बुद कहीं एक प्रकारके तो कहीं दूसरे प्रकारके उत्पन्न होते रहते हैं। बुद्धिमान् जन विनाशशील समझकर इनपर विश्वास नहीं करते।
( सर्ग ३१-३२ )
संकल्पत्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परमपद-स्वरूप परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—मस्तकमें अर्धचन्द्र धारण करनेवाले महादेव ! व्यापकरूप अनन्त एवं अद्वितीय चेतन ब्रह्म-तत्त्वमें द्वित्व ( भेद ) कैसे प्राप्त हुआ ? एवं उसका बुद्धिसे निवारण कैसे हो, ताकि जीवके दुःखोंका सर्वथा नाश हो जाय ?
श्रीमहादेवजीने कहा—जब वह ब्रह्म सत्स्वरूप, अद्वितीय और सर्वशक्तिमान् है, तब उसमे यह भेद और अभेदकी कल्पना ही निर्मूल है। जैसे तरङ्ग, कण, कल्लोल और जलप्रवाह जलसे विभक्त नहीं रहते, वैसे ही ब्रह्मकी सर्वशक्ति वास्तवमें ब्रह्मसे विभक्त नहीं रहती।
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * संकल्पत्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन * ४०१
जिस प्रकार फूल, कोंपल, पत्ते आदि लतासे वास्तवमें भिन्न नहीं हैं, वैसे ही द्वित्व, एकत्व, जगत्त्व, तू-पन, मैं-पन आदि भी चेतनसे भिन्न नहीं हैं। चेतनका देश, काल, क्रिया आदिरूप जो भेद किया गया है, वह भेद चेतनस्वरूप ही है। 'वास्तवमें चेतनमें द्वैत (भेद) है ही नहीं, तब उसमें भेद आया कहाँसे ?'—यह प्रश्न ही नहीं बनता; क्योंकि देश, काल और क्रियाकी सत्ता एवं नियति आदि शक्तियाँ स्वयं चेतनकी सत्तासे ही सत्तायुक्त होकर स्थित हैं, इसलिये वे सब चेतनस्वरूप परमात्मा ही हैं। वही यह चेतन तत्त्व परम ब्रह्म, सत्य, ईश्वर, शिव तथा निराकार, एक परमात्मा आदि अनेक नामोंसे कहा जाता है। इन नामों एवं रूपोंसे अतीत जो परमात्माका स्वरूप है तथा जो सम्पूर्ण मलोंसे रहित आत्मपदार्थ है, वह वाणी और मनका विषय नहीं है। जो यह संसार दिखायी दे रहा है, वह उस महाचेतन परमात्मारूपी लताके फल, पल्लव तथा पुष्प आदिरूप ही है, अतः उससे भिन्न नहीं। किंतु अज्ञानी जीवको अपने ही द्वैतसंकल्पसे एकमें ही द्वैतकी इसी प्रकार प्रतीति होती है, जैसे पुरुषकी वेताल-कल्पनासे उसे भयंकर वेतालकी प्रतीति होने लगती है। जैसे 'मैं कुछ नहीं करता' इस तरहके संकल्पसे पुरुषका कर्तृत्व निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार जीवात्मामें प्रतीत होनेवाला द्वैत भी अद्वैत-भावनासे निवृत्त हो जाता है।
द्वैत-संकल्पसे तो एक ही वस्तुमें द्वित्वकी प्राप्ति होती है, पर अद्वैतभावनासे अनेकात्मक जगत्का भी द्वित्व नष्ट हो जाता है। क्योंकि विकार आदिसे शून्य, सदा सर्वगामी तथा परमात्माका स्वरूपभूत होनेसे आत्मामें कभी द्वैतभाव नहीं रहता। मुने ! अपने संकल्पसे निर्मित मनोराज्य और गन्धर्वनगरकी तरह जो वस्तु अपने संकल्पसे बनायी गयी है, वह संकल्पके अभावसे नष्ट हो जाती है। केवल दृढ़ संकल्पसे जो यह संसाररूपी दुःख प्राप्त हुआ है, वह केवल संकल्पके अभावसे ही नष्ट हो जायगा, फिर इस विषयमें क्लेश ही क्या ? क्योंकि तनिक भी संकल्प करके मनुष्य दुःखमें डूब जाता है और कुछ भी संकल्प न करके वह अविनाशी सुख पाता है। अतः मुने ! अपने विवेकरूपी पवनसे संकल्परूप मेघोंका विनाश करके शरत्कालमें आकाश-मण्डलकी भाँति तुम उत्तम निर्मलता प्राप्त करो। अविवेकरूप प्रबल प्रवाहसे उमड़ती हुई उन्मत्त संकल्प-रूप नदीको तुम मणिमन्त्रसे सुखा दो और उसमें बहते हुए अपने-आपको धैर्य देकर मनसे रहित हो जाओ एवं अपने-आप अपने संकल्पात्मक कालुष्यका विनाश करके आत्माकी उत्तम विशुद्धता प्राप्त कर अविनाशी आनन्दरूप हो जाओ। यह आत्मा समस्त शक्तियोंसे परिपूर्ण है, अतः जब कभी वह किसी वस्तुकी जैसी भी भावना करता है, अपने संकल्पसे रचित उस वस्तुको उसी समय वैसी ही देखता है। ब्रह्मन् ! यह उत्पन्न हुआ मिथ्यारूप जगत् एकमात्र संकल्पात्मक ही है; अतः केवल संकल्पके अभावसे ही कहीं भी विलीन हो जाता है। इसलिये संकल्परूप जड़को उखाड़कर अत्यन्त दृढ़ताको प्राप्त हुई इस तृणारूपी करंजलताको आप सुखा डालिये। जिस प्रकार गन्धर्वनगरकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीतिमात्र ही हैं, उसी प्रकार यह संसाररूप भ्रमकी उत्पत्ति और विनाश भी प्रतीतिमात्र ही हैं। मुने ! मैं एक हूँ, मैं परमात्मा हूँ—इस प्रकारकी भावना कीजिये। इस भावनासे आप परमात्मा ही हो जायेंगे।
महर्षे ! चेतन जीवात्माने अज्ञानके कारण अपने संकल्पसे संसाररूपता प्राप्त की है; किंतु वास्तवमें मोहरूपी कलङ्कसे रहित वह असंसारी है तथा वह ब्रह्मसे अभिन्न और अद्वैत ब्रह्मरूप है। मैं दृश्य देहादि-स्वरूप हूँ—इस प्रकार मोहको प्राप्त हुआ चेतन जीवात्मा संसारमें फँस जाता है; पर वही शुद्ध चिन्मय
४०२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
परमात्मस्वरूपको, जो अपनेसे अभिन्न है, अनुभव करके संसारके बन्धनसे निर्मुक्त हो जाता है। पुनरावृत्ति-रहित निरतिशयानन्दस्वरूप परमात्माके ज्ञानसे परिपूर्ण चेतन जीवात्मा परमपद प्राप्तकर समस्त भ्रमोंसे निर्मुक्त हुआ व्यापक ब्रह्मपदमे विश्राम करता है। मनसे रहित यही चेतन जीवात्मा शान्तिसे सुशोभित सूर्य, चन्द्र आदि ज्योतियोंसे एवं अन्धकार-अज्ञान आदि जडतासे रहित तथा विस्तृत आकाशकी भाँति परम सुन्दर है। वह दोषरहित जीवात्मा अपने वास्तविक परमात्मस्वरूपमें स्थित हो जब तुर्यातीत अवस्थाको प्राप्त हो जाता है, तब वह परमपदको प्राप्त होता है। वह परमपद सभी उत्तमोत्तम अवस्थाओंकी परम अवधि है, परम मङ्गलस्वरूप होनेके कारण समस्त मङ्गलोंमें प्रधान मङ्गल है। वही एक अखण्ड परम पवित्र चेतनरूप है। मुने ! वह परमपद जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं और कल्पनासे अतीत है। उसीका आपसे मैंने वर्णन किया है। उसी पदमें आप सदा स्थित रहें। वह पद ही अविनाशी पूज्य देव है। मुनीश्वर ! इस समस्त जगत्का उपादान वही परमदेव है—इस ज्ञानसे यह समस्त विश्व चिन्मय ब्रह्मरूप ही है। यह विश्व ब्रह्मके संकल्पसे कल्पित होनेके कारण प्रतीत होता है; किंतु यथार्थ ज्ञान होनेपर वास्तवमें इसकी सत्ता नहीं रहती, इसलिये यह नहीं है। वह परमपद शान्त, शिव एवं वाणीके व्यापारसे अतीत है। 'ॐ' इस अक्षरकी जो आनन्दमयी तुरीयामात्रा है, वही परमगति है।
(सर्ग ३३-३४)
सबके परम कारण परम पूजनीय परमात्माका वर्णन
श्रीमहादेवजीने कहा—मुने ! आप पूर्वोक्त विचारका अवलम्बन करके अपने पारमार्थिक स्वरूपका ही प्रमाणोंसे शीघ्र निर्धारण करें एवं उसके विपरीत अनर्यरूप देहा-भिमानका अवलम्बन न करें। जो इस संसारमें जानने-योग्य है, उस परमात्माको तत्त्वज्ञानीने जान लिया। फिर संसारके भ्रमके साथ उसका कोई प्रयोजन नहीं रहा। अतः उस तत्त्वज्ञानीके लिये कर्तव्य या अकर्तव्य कुछ नहीं रहता, यह मै जानता हूँ। आप इन शान्तिमय और अशान्तिमय विकल्पोंका यदि दलन करते हैं तो आप धीर हैं। यदि वैसा नहीं करते तो आप धीर नहीं हैं। इसलिये आस्था रखकर आप परमार्थदर्शी बन जाइये। ब्रह्मज्ञानके लिये शीघ्र ही उपर्युक्त दृष्टिका आश्रय करके मेरे द्वारा जो कुछ कहा जाय, इसे सुनिये। आत्मज्ञानके प्रयत्नके बिना चुपचाप बैठे रहनेसे क्या लाभ ? त्रिशूलधारी भगवान् शंकर इस प्रकार कहकर फिर बोले कि 'आप बाह्यदेहमें आत्मबुद्धि मत कीजिये; क्योकि यन्त्रकी भाँति प्राणसे ही यह शरीर चेष्टा करता है और प्राणवायुसे रहित शरीर निश्चेष्ट हो मूकके सदृश स्थित रहता है; किंतु चेतन जीवात्मा आकाशसे बढ़कर निर्मल और अव्यक्त है। सद्रूप परमात्माकी सत्ता ही चेतन जीवात्माके अस्तित्वमें कारण है। जीवात्माके बिना तो प्राण और देह—ये दोनों नष्ट हो जाते हैं और देह-वियोगसे प्राण वायुमें विलीन हो जाता है; आकाशसे भी निर्मल चेतन आत्मा नष्ट नहीं होता। इसलिये संसार-भ्रमसे उसका क्या प्रयोजन है ? ब्रह्म-ज्ञानके द्वारा दोषोसे रहित हो जीवात्मा परमशिव परब्रह्म परमात्मा हो जाता है। वह परब्रह्म ही हरि है, वही शिव है, वही हिरण्यगर्भ है, वही चतुर्मुख ब्रह्मा है, वही इन्द्र है; वही वायु, वह्नि, चन्द्र एवं सूर्यरूप है और वही परमेश्वर है। वही सर्वव्यापी परमात्मा, सर्वचेतनोंका मूल स्रोत, देवेश, देवभृत्, धाता, देवदेव और स्वर्गका अधिपति है। जिस तरह पल्लवोंका मूलबीज वृक्ष है, उसी तरह सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिका मूल बीज है। वही सच्चिदानन्दघन परब्रह्म
निर्वाण-प्रकरण, पू० ] * परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियाँ * ४०३
ज्ञानी महात्माओंका वन्दनीय और पूजनीय है; क्योंकि सबका बल और नाम उसीके हैं। वही सर्वात्मक, प्रकाशरूप, समस्त ज्ञानोंका एकमात्र उत्पादक और सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला है। महर्षे! सबका आदि कारण तथा पूजा, नमस्कार, स्तुति और अर्घ्यके योग्य एवं समस्त देवताओंका स्वामी वही परम चेतन परब्रह्म परमात्मतत्त्व है—यह आप जान लें। वही बड़े-बड़े ज्ञातव्य पदार्थोंकी भी चरम सीमा है। जरा, शोक एवं भयके विनाशक इस परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करके मनुष्य फिर संसारमें भूने हुए बीजकी भाँति जन्म नहीं लेता। विप्रेन्द्र ! तत्त्वसे जान लिये जानेपर जो समस्त प्राणियोंको अभय कर देता है, जो सबका आदिकारण है और जो अनायास उपासनाके योग्य है, आप वही अज, परम एवं परमात्मरूप परमपद हैं।
मुने ! समस्त पदार्थोंके भीतर रहनेवाले अनुभवरूप एकमात्र विशुद्ध प्रकाशमय परमचेतन परमात्माको मुनिलोग महादेवरूप परमेश्वर समझते हैं। वह परमचेतन तत्त्व सम्पूर्ण कारणोंका कारण है, किंतु वास्तवमें उसका कोई कारण नहीं है; वह अपनी सत्तासे समस्त भावोंको सत्ता प्रदान करनेवाला है, किंतु स्वयं भावनाका विषय नहीं है। वह विशुद्ध और अजन्मा है। वही समस्त चेतनोंका चेतन, दृश्य विषयोंका प्रकाशक और दृश्य-संसारका परम आधार है। उसीको मुनिलोग चक्षु आदि एवं सूर्य आदि प्रकाशकोंको प्रकाशक, स्वयं चक्षु-सूर्य आदि प्रकाशकोंद्वारा प्रकाशित न होनेवाला, अलौकिक, समस्त बीजोंका भी बीज, ज्ञानस्वरूप और विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मा कहते हैं। सत्य प्रतीत होनेवाला दृश्य संसार और असत्य न प्रतीत होनेवाली प्रकृति—इन दोनोंका कारण होनेसे वह चिन्मय परमात्मा तत्स्वरूप है; किंतु वास्तवमें वह प्रकृति और संसारसे रहित, परमशान्त है। इस महान् चिन्मय परमात्मामें पहले करोड़ों जगद्रूपी मरु-मरीचिकाएँ हो चुकी हैं, आगे भी होती रहेंगी और वर्तमान कालमें भी हो रही हैं। महान् मेरु पर्वत एवं महान् कल्प आदि काल उस चेतन तत्त्व परमात्मामें समाये हुए हैं। फिर भी वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतम है। कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण यह परमात्मा कुछ न करते हुए ही संसारकी रचना करता है और यह संसारका उद्धाररूप महान् कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता। जिस परमात्माके संकल्पमें यह समस्त संसार विद्यमान है, जिससे यह सारा संसार उत्पन्न हुआ है, जो सर्वस्वरूप है, जो सब ओर व्याप्त है एवं जो सर्वमय है, उस सर्वात्मक परमात्माको बार-बार नमस्कार है।*
(सर्ग ३५-३६)
परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियाँ
श्रीमहादेवजीने कहा—महर्षे ! उस समस्त जगत्सत्ता-स्वरूप मणिकी पिटारी परम चेतन सर्वेश्वर परमात्मामें उनकी शक्तियाँ प्रत्यक्ष आविर्भूत होती रहती हैं। उनमेंसे परमात्माकी एक शक्ति महाकाशरूप दर्पणके अंदर अपनी सत्ताके प्रतिबिम्बके सदृश कल्प-निमेषनामक निर्मल कालात्मक शरीर धारण करती है। जैसे घरमें दीपकके रहनेपर घरभरकी क्रियाएँ प्रकाशित हो जाती हैं, वैसे ही साक्षीरूपी उस प्रकाशात्मक, सत्यस्वरूप चेतन-तत्त्वके रहनेपर ही जगद्रूप चित्तकी परम्पराएँ प्रकाशित होती हैं।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—जगत्के स्वामिन् ! इन सदाशिवकी कौन-सी शक्तियाँ हैं, वे किस तरहसे रहती हैं,
* यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः। यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ (नि० पू० ३६। १८)
४०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उनकी साक्षिताका क्या स्वरूप है, उनका व्यवहार क्या है और वे कितनी हैं ?
श्रीमहादेवजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सौम्य ! उस निराकार, सर्वात्मक, अप्रमेय, परमशान्त, सच्चिदानन्दघन सदाशिव परमात्माकी इच्छासत्ता, व्योमसत्ता, कालसत्ता तथा नियति-सत्ता और महासत्ता—ये पाँच सत्तात्मक शक्तियाँ हैं। (तात्पर्य यह है कि 'सोऽकामयत बहु स्याम्' इस श्रुतिके अनुसार सबसे पहले उनकी इच्छासत्ता अभिव्यक्त हुई। तदनन्तर आकाशकी अभिव्यक्ति होनेपर आकाशसत्ता, तदनन्तर कालात्मक सूत्रकी अभिव्यक्ति होनेपर कालसत्ता, सद्रूपके नियत संस्थानवाले भूत एवं भौतिक पदार्थोंका आविर्भाव होनेपर नियति-सत्ता अभिव्यक्त हुई और तदनन्तर उनमें अनुस्यूत महासत्ता अभिव्यक्त हुई ।) इनके सिवा ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति कर्तृत्वशक्ति और अकर्तृत्वशक्ति आदि परमात्माकी अनेक शक्तियाँ हैं। उन सदाशिवस्वरूप परमात्माकी इन शक्तियोंका कोई अन्त नहीं है।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—देव ! ये उपर्युक्त शक्तियाँ हुईं किस निमित्तसे ? इनमें बहुत्व कैसे आया ? इनका उदय कैसे हुआ ? एवं शक्ति और शक्तिमान् दोनोंमें परस्पर-विरुद्ध भेद और अभेद किस युक्तिसे रह सकते हैं ?
श्रीमहादेवजीने कहा—महर्षे ! अनन्त असीम आकारवाले सदाशिवरूप परमात्माकी यह चिन्मात्ररूपता ही उसकी शक्ति कही जाती है। एकमात्र कल्पनासे ही वह चेतन परमात्मासे भिन्न-सी प्रतीत होती है, वास्तवमें कुछ भी भेद नहीं है। ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, साक्षित्व आदि कल्पनाओंसे परमात्माकी ये शक्तियाँ उसी प्रकार विविध स्वरूप धारण करती हैं, जैसे समुद्रमें तरङ्ग आदि भेद-कल्पनाओंसे जल विविध रूप धारण करता है। गमनशील ब्रह्माण्डरूपी नृत्य-मण्डपमें ऋतु, मास आदि काल नियति-क्रमद्वारा महाकालरूपी नटसे उत्तम रीतिसे शिक्षित हुई उस प्रकारकी शक्तिरूपिणी नटियाँ नाचती हैं। यही परा और अपरा एवं नियति कही जाती है। ईश्वरकी क्रिया, कृति, इच्छा या काल इत्यादि उसीके नाम हैं। तृणसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त जितने चराचर जीव हैं, उनको मर्यादामें रखनेवाली नियति कही जाती है। महर्षे ! नाट्यशास्त्रमें प्रसिद्ध स्वेद, स्तम्भ, रोमाञ्च आदि विकारोंसे व्याप्त, चिरकालसे प्रवृत्त हुए इस संसारनामक नाटकके नाट्योंमें सारभूत नियति नटीके विलासमें अधिपति होकर देखनेवाला सदा उदितस्वभाव यह परमेश्वर अद्वितीय होकर ही स्थित है। वह परमार्थतः उस नटी और नाट्यसे भिन्न नहीं है। ( सर्ग ३७ )
सच्चिदानन्दघन परमदेव परमात्माके ध्यानरूप पूजनसे परमपदकी प्राप्ति
श्रीमहादेवजी कहते हैं—महर्षे ! उस परमात्मदेवके पूजनके जितने क्रम हैं, उन सबमें पहले देहाभिमानको प्रयत्नपूर्वक छोड़ देना चाहिये। ध्यान ही इस परमात्मदेवकी पूजा है। इसलिये तीनों भुवनोंके आधारभूत इस परमात्मदेवकी निम्न प्रकारके ध्यानसे सदा पूजा करनी चाहिये। वह चेतन परमात्मा ज्ञानके द्वारा लाखों सूर्योंके समान देदीप्यमान, सूर्य आदि समस्त प्रकाशकोंका भी प्रकाशक तथा सबसे परे रहनेवाला ज्ञानस्वरूप है। उसका मनसे चिन्तन करना चाहिये।
इस नियति-नाटकके साक्षी परमात्माका इतना बड़ा स्वरूप है कि सबसे बड़े असीम आकाशका जो विपुल विस्तार है, वह उसकी गर्दन है; नीचेके आकाशका जो असीम विस्तार है, वह उसका चरण-सरोज है। सीमा-शून्य दिशाओंके किनारोंका यह जो विस्तार है, वही उसका भुजमण्डल है और उसीसे वह सुशोभित है; उन हाथोंमें उसने विविध ब्रह्माण्डोंमें विद्यमान बड़े-बड़े सत्य आदि लोकरूप श्रेष्ठ आयुधोंको ग्रहण कर रखा है। उसके हृदय-कोशके एक कोनेमें अनेक ब्रह्माण्ड-समूह
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सच्चिदानन्दघन परमदेव परमात्माके ध्यानरूप पूजनसे परमपदकी प्राप्ति * ४०५
छिपे हुए हैं। वह प्रकाशस्वरूप एवं तमसे परे है और उसके स्वरूपका कहीं पार भी नहीं पाया जा सकता। पूर्वोक्त नियतिके नाटकका साक्षी यह परमात्मा ही परमदेव है। यही समस्त पदार्थोंका आश्रय, सर्वव्यापक, चिन्मय और अनुभवरूप है। सभी सज्जनोंद्वारा यही सर्वदा पूजनीय है। यही परमदेव परमात्मा घटमें, पटमें, वटमें, दीवालमें, छकड़ेमें और वानर आदि प्राणियोंमें समभावसे स्थित है। यही परमात्मा शिव, हर, हरि, ब्रह्मा, इन्द्र, कुबेर और यमस्वरूप है। अनेक प्रकारकी घट-पट आदि आकृतियोंको लेकर असंख्य पदोंसे बोधित होनेवाली तथा उन आकृतियोंको छोड़नेपर एक पदसे बोधित होनेवाली सत्तारूप इस जगज्जालका उत्पादक महाकाल इस परमात्मदेवका द्वारपाल है। पर्वतों एवं चौदह भुवनोंके असीम विस्तारसे युक्त यह ब्रह्माण्ड-मण्डल इस परमात्मदेवके किसी एक देह-कोणमें स्थित होकर उसके अङ्गका अवयवरूप हो गया है।
महर्षे ! जिसके हजारों कान एवं आँखें हैं, हजारों मस्तक हैं और जो स्वयं हजारों भुजाओंसे विभूषित है, ऐसे शान्तस्वभाव महादेवका चिन्तन करना चाहिये। वह परमात्मा सभी जगह दर्शन-शक्तिसे परिपूर्ण है यानी सर्वत्र देखता है, सब ओर घ्राण-शक्तिसे समन्वित है, सर्वतः स्पर्शन-शक्तिसे युक्त है, सभी ओर रसन-शक्तिसे परिपूर्ण है, सर्वत्र श्रवण-शक्तिसे व्याप्त है, सर्वत्र मनन-शक्तिवाला है; तथापि वह सर्वथा संकल्पसे रहित है एवं सभी ओर सर्वश्रेष्ठ कल्याणस्वरूप है। उस परमात्मदेवका चिन्तन करना चाहिये। नित्य, सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, सबको अपने-अपने संकल्पके अनुसार समस्त पदार्थ प्रदान करनेवाले, सारे प्राणियोंके अन्तःकरण-में स्थित और सभीके लिये एकमात्र साध्य, सर्वरूप उस परमात्मदेवका चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार ध्यानके द्वारा उस देवाधिदेवकी पूजा करनी चाहिये। अनायास प्राप्त होने योग्य, शान्तिमय, अविनाशी, अमृतस्वरूप एकमात्र परमात्मस्वरूपके ज्ञानसे सदा इस देवकी पूजा की जा सकती है। जो यह हृदयप्रदेशमें स्थित शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माका निरन्तर अनुभव है, यही श्रेष्ठ ध्यान है और यही परम पूजा कही गयी है। देखते-सुनते, स्पर्श करते सूँघते-खाते, चलते-सोते, श्वास-प्रश्वास लेते, बोलते, त्याग करते और ग्रहण करते—सभी समय मनुष्यको शुद्ध चिन्मय परमात्माके ध्यानमें ही तत्पर रहना चाहिये। इस परमात्माके लिये शुद्ध ज्ञानरूप ध्यान ही प्रियतम वस्तु है, अतः ध्यानसे ही उसके लिये उपहार है। ध्यान ही उसके लिये अर्घ्य, पाद्य और पुष्प है। मुने ! यह परमात्मदेव ध्यानसे ही प्रसन्न होता है। इस प्रकार आठों पहर ध्यानद्वारा पूजन करनेसे मनुष्य परमधाममें निवास करता है। महर्षे ! जो यह परमात्मदेवका उत्तम पूजन मैंने आपसे कहा है, यही परम योग है, यही वह उत्तम कर्म है। आत्मरूप वसिष्ठजी ! जो मनुष्य दुःख और विक्षेपसे रहित हो सारे पापोंके विनाशक एवं परम पवित्र इस ध्यानरूप पूजनको करेगा, उस समस्त बन्धनोंसे मुक्त और ब्रह्मतत्त्वको प्राप्त पुरुषकी जगत्में सुर एवं असुर वैसे ही वन्दना करेंगे, जैसे वे मेरी वन्दना करते हैं।
महर्षे ! यह ध्यान पवित्र करनेवालोंको भी पवित्र करनेवाला तथा सम्पूर्ण अज्ञानोंका नाशक है। अतः शरीरमें स्थित, समस्त ज्ञानोंके उत्पादक एवं बोधक परम कल्याणस्वरूप इस परमात्मदेवका अपने अन्तः-करणसे नित्य ही ध्यान करना चाहिये। सबके हृदयरूपी गुहामें स्थित, समस्त ज्ञान और ज्ञेयके ज्ञाता, सम्पूर्ण कर्मोंके कर्ता और समस्त ज्ञानोंके स्मर्ता, सम्पूर्ण प्रकाशों-से भी अधिक प्रकाशस्वरूप तथा सर्वव्यापी परम शिव परमात्माका ध्यान करना चाहिये। वह परमात्मा मनकी मननात्मिका शक्तिमें, प्राण एवं अपानके मध्यमें तथा हृदय, कण्ठ, तालु और भौंके मध्यमें स्थित (व्यापक) है। वह कथाओंकी कल्पनाओंसे रहित और देहके एक-
४०६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
देशभूत सुन्दर हृदय-कमलमें विशेषरूपसे और सम्पूर्ण देहमें समानरूपसे स्थित है। वह परमात्मा केवल चेतन और शुद्ध ज्ञानस्वरूप है। उसका चिन्तन करना चाहिये।
इसके सिवा ध्यानका एक दूसरा प्रकार यह है कि 'मैं जीवात्मा ही परिच्छेदशून्य आकारवाला, अनन्तरूप, सम्पूर्ण पदार्थोंसे परिपूर्ण, सब वस्तुओंका पूरक एवं अखण्ड अद्वितीय शिवस्वरूप परमात्मा हूँ'—इस प्रकार स्वच्छ और अलौकिक भावना करके देवभावसे परिपूर्ण यह जीवात्मा महान् परमात्मा बन जाता है। वह परमात्माको प्राप्त पुरुष सबमें सम रहता है। उसका व्यवहार भी समान होता है। उसका ज्ञान भी सम होता है। उसका भाव भी सम होता है। उस सौम्य पुरुषका उद्देश्य भी महान् सुन्दर होता है। वह देहपातपर्यन्त अखण्ड तत्त्वज्ञानसे युक्त होता हुआ चिरकालतक निरन्तर परमात्माका ध्यानरूप पूजन ही करता रहता है। इसलिये मनुष्यको उचित है कि सज्जनोंके हृदयमें रहनेवाली, चन्द्रमाकी भाँति शीतल, मधुर-स्वभाव, दृढ़ मैत्रीसे हृदय-प्रदेशमें स्थित उस परमात्मदेवकी ध्यानरूप पूजा करे। दुष्टोंकी उपेक्षा, दुखियोंपर दया, पुण्यात्माओंके प्रति हृदयकी नित्य मुदिता (प्रसन्नता) की भावनासे, शुद्ध सामर्थ्यकी पद्धतिसे और ज्ञानरूप ध्यानसे उस परमात्मदेवकी पूजा करे।
प्रारब्धसे प्राप्त सम्पूर्ण इष्ट एवं अनिष्ट पदार्थोंमें सर्वदा ही परम समताका आश्रय लेकर नित्य चेतन परमात्माका ध्यानरूप व्रत करना चाहिये। अनुकूल और प्रतिकूलकी प्राप्तिमें सम होकर नित्य चिन्मय परमात्माके ध्यानरूप व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। 'यह मैं हूँ और यह मैं नहीं हूँ'—इस प्रकारके भेदको छोड़ देना चाहिये तथा 'यह सब ब्रह्म ही है' इस प्रकार निश्चय करके नित्य चिन्मय परमात्माके ध्यानरूप व्रतका आचरण करना चाहिये। महर्षे! इस परमात्माके ध्यानरूप पूजाके विधानमें जो द्रव्य-सम्पत्तियाँ बतलायी गयी हैं, वे सब एकमात्र समतारूप रससे परिपूर्ण होनेके कारण मधुर-रसवती ही हो जाती हैं। रसमयी शक्ति-समता मधुर और अतीन्द्रिय है। उस समतासे जो भी दृश्य विषय भावित होगा, वह तत्क्षण ही अमृततुल्य मधुर हो जायगा। समतारूप अमृतसे जो-जो भावित होता है, वह सब परम मधुरताको प्राप्त होता है। ब्रह्मैक्य-दर्शनस्वरूप समतासे स्वयं आकाशकी तरह विकारशून्य होकर मनके लय होनेपर जो स्वाभाविक स्थिति है, वही परमात्माकी ध्यानरूप पूजा कही जाती है। महात्मा ज्ञानीको पूर्णचन्द्रकी भाँति परिपूर्ण, समताके द्वारा समान ज्ञानवान्, एक, चिन्मय, स्वच्छ और स्फटिक-शिलाकी तरह निर्मल एवं दृढ़ होना चाहिये। जो भीतर आकाशकी तरह विशाल और बाहर न्यायतःप्राप्त कार्योंको करनेवाला, आसक्तिसे रहित एवं परमात्माके यथार्थ तत्त्वका पूर्णतया ज्ञाता है, वही सच्चा उपासक है। अज्ञानरूप मेघोंके नष्ट होनेपर स्वप्नमें भी जिसमें राग-द्वेष आदि हृदय-विकार नहीं देखे जाते तथा जिसका अहंता-ममतारूप कुहरा शान्त हो चुका है, ऐसे निर्मल आकाशके समान वह तत्त्वज्ञ सुशोभित होता है।
महर्षे ! यथासमय और यथाशक्ति आप जो कुछ भी कर्म करते हैं अथवा नहीं करते, उसीको चिन्मय शिवस्वरूप परमात्माका अन्तःपूजन समझना चाहिये। इस प्रकारके पूजनसे ही साधक अपने पारमार्थिक निरतिशय आनन्दमय स्वरूपका अनुभव करता है। शिव, शान्त, अन्यसे प्रकाशित न होनेवाला, स्वप्रकाशरूप परमात्मा ही जगत्के रूपमें प्रतीत हो रहा है। ब्रह्मन् ! भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत्में व्यापक, परम विशुद्ध चेतन-परमात्मारूप ईश्वरके स्वरूपका वाणीसे वर्णन भी नहीं किया जा सकता। इसलिये वसिष्ठजी ! तुच्छ दृष्टिका परित्याग करके और अपनी अखण्ड दृष्टिका आश्रय लेकर सम,
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, दुःखनाशका उपाय * ४०७
निर्मलमना, शान्त, राग और दोषसे रहित तथा शोक-रहित बुद्धिसे युक्त होकर आप न्यायतःप्राप्त पदार्थोंसे परमात्मदेवकी पूजा करते हुए स्थित रहें।
(सर्ग ३८-४०)
शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, ब्रह्मके नाम-भेदोंका और स्वरूपका रहस्य एवं दुःखनाशका उपाय
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—देव ! शिव, परब्रह्म, आत्मा और परमात्मा किसके नाम कहे गये हैं? तीनों लोकोंके स्वामिन् ! भगवन् ! 'तत्', 'सत्', 'किंचित्', 'न किंचित्', 'शून्य' और 'विज्ञान' आदि भेद किसके कहे गये हैं ?
श्रीमहादेवजीने कहा—मुने ! आदि और अन्तसे रहित, प्रकाशान्तरकी अपेक्षा न रखनेवाली, स्वतःप्रकाश-स्वरूप जो सत् वस्तु अपनी महिमामें अपने-आप विद्यमान है, वही 'किंचित्' शब्दसे कही जाती है; और वह इन्द्रियोंके द्वारा जाननेमें नहीं आती, इसलिये 'न किंचित्' शब्दसे कही जाती है ।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—ईशान ! जो बुद्धि आदिसे युक्त चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके जाननेमें नहीं आता, उस परब्रह्मका संशयरहित अधिकारीद्वारा कैसे साक्षात्कार किया जाता है ?
श्रीमहादेवजीने कहा—महर्षे ! जिसमें अविद्याका नाममात्र अंश है, ऐसा केवल सात्त्विक और मोक्षकी चाह रखनेवाला साधक शास्त्राभ्यास आदि सात्त्विक उपायोंसे अविद्याका प्रक्षालन करता है, तब अविद्याका क्षय होनेपर वह अपने-आप ही अपनेद्वारा परमात्माका अनुभव करता है । आत्मा ही परमात्माको देखता है और आत्मरूपसे ही उसका विचार करता है । इस संसारमें एकमात्र परमात्मा ही सत् है, अविद्या नहीं; इसे ही अविद्याका क्षय कहते हैं। जो कुछ यह नाना-विध विनाशीशील दृश्य वस्तु है, इसे आप परमात्मा न समझिये; क्योंकि यह मिथ्या है । परब्रह्म परमात्मा तो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके क्षयसे प्राप्य है । जो वस्तु जिसका नाश होनेपर प्राप्त होती है, वह वस्तु उसके उपस्थित रहते कभी प्राप्त नहीं हो सकती । शिष्यके बोधके लिये किये गये गुरूपदेशसे अनिर्देश्य और अव्यक्त परमात्मा उसे स्वयं प्राप्त हो जाता है । गुरुके उपदेशों और शास्त्रार्थोंके बिना भी परमात्माका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि इन सबके संयोगसे ही परमात्माका ज्ञान होता है । कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय आदिका नाश तथा सुख, दुःख आदिका अभाव होनेपर जो बच रहता है, वह शिवस्वरूप परमात्मा ही 'तत्'-'सत्' इत्यादि नामोंसे कहा गया है । वास्तवमें तो यह सम्पूर्ण जगत् है नहीं, बल्कि परमात्माका सङ्कल्प होनेके कारण यह उसका स्वरूप ही है । वह सत्-स्वरूप परमात्मा आकाशसे भी अत्यन्त बढ़कर निर्मल और अनन्त है । विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुमुक्षु पुरुषोंने मोक्षके उपासकोंके बोधके लिये नाम-रूपरहित सच्चिदानन्द परमात्मामें चेतन, ब्रह्म, शिव, आत्मा, ईश, परमात्मा और ईश्वर आदि पृथक्-पृथक् नाम रूपोंकी कल्पना कर रखी है । वसिष्ठजी ! इस तरह जगतत्त्व एवं शिवनामक परमात्मतत्त्व ही सर्वदा सब तरहसे सब कुछ है। इसलिये आप इसे जानकर सुखपूर्वक स्थित हो जायें । प्राचीन मुमुक्षु लोगोंने शिव, आत्मा और परब्रह्म इत्यादि नामोंसे उस परमात्माकी भिन्न-भिन्न कल्पना की है; वस्तुतः एक परमात्मा ही है, उसमें कुछ भी भेद नहीं है । मुनिनायक ! इस प्रकार ज्ञानपूर्वक ध्यानरूप पूजा करनेवाला ज्ञानी पुरुष उस परमपदको प्राप्त हो जाता है ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—भगवन् ! मिथ्या होते हुए भी
४०८ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
यह जगत् किस प्रकार सद्-सा प्रतीत होता है, वह सब कुछ फिर संक्षेपमें मुझसे कहनेकी कृपा कीजिये।
**श्रीमहादेवजीने कहा—**मुने ! जो यह ब्रह्म, शिव, ईश्वर इत्यादि शब्दोंका अर्थ है, उसे ही विशुद्ध चिन्मय परमात्मा समझिये जैसे जलके आधारभूत समुद्रमें जल ही तरङ्गके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही परब्रह्म परमात्मामें केवल अद्वितीय सद्रूप ब्रह्म ही जगत्के रूपमें प्रकट हो रहा है; क्योंकि सारा जड दृश्यसमूह चेतन परमात्मरूप ही है, इस प्रकारका ज्ञान होनेपर वह दृश्यसमूह मनोराज्यके संकल्पनगरकी तरह हो जाता है। यह जगत् परमात्माका संकल्प है, इस यथार्थ अनुभवसे सम्पूर्ण दृश्य जगत् कल्याणमय परमात्मा ही बन जाता है।
**श्रीवसिष्ठजीने पूछा—**भगवन् ! इस जगत्की भले ही गन्धर्वनगरसे अथवा स्वप्नके मनुष्यसे उपमा दी जाय, फिर भी यह दुःखका कारण तो है ही। अतः दुःखके नाशके लिये यहाँ कौन-सी युक्ति है?
**श्रीमहादेवजीने कहा—**महर्षे ! वासनाके कारण दुःख उत्पन्न होता है और वह वासना सत् पदार्थमें हुआ करती है; किंतु यह जगत् तो मृगतृष्णाके जलकी तरङ्गके समान मिथ्या ही है। इसलिये वासना कैसे, किसमें, किसको, कहाँसे होगी? स्वप्नावस्थाका पुरुष भला कैसे मृगतृष्णाके जलका पान कर सकता है। द्रष्टाके सहित, अहंतासे युक्त और मन तथा मनन आदिके साथ इस जगत्का जब स्वप्नवत् अस्तित्व ही नहीं है, तब जो शेष रह जाता है, वही सद्रस्तु परमात्मा है। उस परमात्मामें न तो कोई वासना रहती है, न कोई वासना करनेवाला और न कोई वासनाका विषय ही रहता है। किंतु एकमात्र वह परमात्मा ही रहता है, जिसमें कल्पना-भ्रमका अत्यन्त अभाव है। प्रतीत होनेके कारण सत्य और वास्तवमें असत्य संसाररूप वेताल शून्यस्वरूप होनेके कारण जिस ज्ञानवान्की दृष्टिमें असत्य ही है, उसकी दृष्टिमें केवल परमात्माके सिवा और दूसरा क्या अवशिष्ट रह सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं। इस प्रकार शून्यमें ही वेतालकी तरह यह चित्त-वासना उत्पन्न हुई है, जिसका नाम जगत् है। उसकी शान्ति हो जानेपर अक्षय शान्ति ही अवशिष्ट रहती है। किंतु अहंतामें, जगत्में तथा मृगतृष्णाके जलमें जिस अज्ञानी मनुष्यकी आस्था (सत्तावुद्धि) बँधी हुई है, उसको बार-बार धिक्कार है ! वह अज्ञानी उपर्युक्त उपदेशके योग्य नहीं। इस जगत्में ज्ञानीलोग जिज्ञासु विवेकी मनुष्यको ही उपदेश दिया करते हैं, न कि उस बालवुद्धिवाले अविवेकीको, जो अनेक प्रकारकी भ्रान्तियोंसे ग्रस्त है, श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा त्याज्य है एवं देह आदिमें अभिमान रखता है।
(सर्ग ४१)
समष्टि-व्यष्ट्यात्मक जो संसार है, वह सब माया ही है—यह उपदेश देकर भगवान् श्रीशंकरका अपने वासस्थानको जाना तथा श्रीवसिष्ठजी और श्रीरामजीके द्वारा अपनी-अपनी स्थितिका वर्णन
**श्रीवसिष्ठजीने पूछा-**भगवन् ! सृष्टिके आदिमें देहके सम्बन्धसे संसारमें भ्रमण करनेवाला वह जीवात्मा मायारूप आकाशमें स्थित हुआ किस अवस्थाको प्राप्त करता है ?
**भगवान् शंकरने कहा-**मुने ! जिस प्रकार स्वप्न-मनुष्य स्वप्नके संसारको देखता है, उसी प्रकार वह जीवात्मा भी परम सूक्ष्म मायामय आकाशमें कर्मानुसार शरीरोंको देखता है। जैसे आज भी स्वप्नमनुष्य चैतन्य-घन आत्माके सर्वत्र व्यापक होनेसे स्वप्नमें कार्य करता है, वैसे ही देहधारी जीवात्मा भी जाग्रदवस्थामें कार्य करता है। जिस तरह शून्यस्वरूप वेताल वास्तविक
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * समष्टि-व्यष्ट्यात्मक जो संसार है वह सब माया ही है * ४०९
दृष्टिसे असद्रूप है, किंतु भ्रमसे सद्रूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार यह समस्त जगत् वास्तवमें असत् है, किंतु भ्रमसे सद्रूप प्रतीत होता है; इसलिये जगत्का कारण वास्तवमें अहंकार ही है। यह संसार वास्तवमें सत् नहीं है; न यह कल्पित है न क्षणिक है, न यह कुछ उत्पन्न ही होता है और न कुछ विनष्ट ही होता है। वास्तवमें इसका अत्यन्त अभाव है। चेतन जीवात्मा ही सम्पूर्ण प्रपञ्चकी संकल्परूपसे अपनेमें उसी प्रकार कल्पना करता है, जिस प्रकार मनुष्य स्वप्नमें नगरका निर्माण और विनाश करता है पर जागनेपर वास्तवमें उसका स्वप्नके देश और कालसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता। इस विनाशशील संसारका वास्तविक स्वरूप तत्त्वसे समझ लेनेपर इस मायारूप संसारकी भेदसत्ताका अभाव हो जाता है। तदनन्तर ज्ञानपूर्वक ध्यानके अभ्याससे कल्याणमय शिवरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। नहीं तो यह जीवात्मा अपने कर्मानुसार देह, इन्द्रिय आदिके संयोग-क्रमसे मृगी, लता, कीट, देव, असुर आदिरूप हो जाता है। नित्य, व्यापक, अनन्त दृढ और विश्वमें व्याप्त एवं विश्वके कर्ता जिस परब्रह्ममें यह जगत् कल्पित है, विवेक होनेपर वह जगत् न दूर है न समीप, न ऊपर न नीचे, न आपका है न मेरा, न पहले था न आज है, न प्रातःकालमें है न सत् है न असत् और न सत् और असत्के मध्यमें है अर्थात् वास्तवमें यह कल्पनामात्र ही है। मुने ! जैसा आपने पूछा; वैसा ही मैंने उत्तर दे दिया। आपका कल्याण हो। अब हमलोग अपनी अभिलषित दिशाकी ओर जा रहे हैं। पार्वती ! आओ, उठो।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! ऐसा कहकर वे नीलकण्ठ भगवान् शंकर जिनके ऊपर मैंने उस समय पुष्पाञ्जलि समर्पित की थी अपने परिवारके साथ आकाशकी ओर चले गये। तब पहलेसे ही शान्तस्वभाववाला मैं त्रिभुवनके अधिपति उमापतिके जानेके बाद क्षणभर चुप रहकर उनके स्मरणपूर्वक उनके द्वारा उपदिष्ट परमात्मदेवका ज्ञानपूर्वक ध्यानरूप पूजन नवीन (परिष्कृत) और श्रद्धा आदिसे पवित्र हुई बुद्धिसे करने लगा।
रघुनन्दन ! महादेव शंकरजीने सच्चिदानन्द परमात्माका ध्यानरूप यह सर्वोत्कृष्ट पूजन मुझसे कहा है और स्वयं मैं भी उसे तत्त्वसे जानता हूँ। जिस तरहका यह जगत्का स्वरूप है, उसे तुम भी तत्त्वसे जानते ही हो। जैसे जलका द्रवत्व स्वभाव है, जैसे वायुका स्पन्दत्व स्वभाव है और जैसे आकाशका शून्यत्व स्वभाव है, वैसे ही परमात्माका सर्गत्व (सृजन) स्वभाव है। श्रीराम ! तबसे लेकर आजतक उसी क्रमसे मैं शान्तिपूर्वक परमात्माका ध्यानरूप पूजन करता आ रहा हूँ। इसलिये मनुष्यको धन और बन्धुओंकी उत्पत्ति और विनाश होनेपर हर्ष
| ४१० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
|---|
और विषाद नहीं करना चाहिये; क्योंकि ये सभी संसारके अनुभव सदा विनश्वर ही हैं। श्रीराम ! प्रमथन-शील चित्र-विचित्र परिस्थितियाँ जिस प्रकार आती हैं, जाती हैं और पुरुषको पराजित करती हैं, यह सब तुम भी जानते ही हो। इसी प्रकार प्रेम और धन आते रहते हैं और यों ही चले भी जाते हैं। वे जगत्के व्यवहार वास्तवमें न तो तुम्हारे अंदर हैं और न तुम ही उनके अंदर हो। इस प्रकार यह जगत् तुच्छ ही है। केवल चेतनस्वरूप व्यापक देहवाले श्रीराम ! यह जगत् तुम्हारा संकल्प होनेके कारण तुम्हारा स्वरूप ही है। अतः तुम्हारे लिये हर्ष और शोकका प्रसङ्ग ही क्या है। तात ! तुम चिन्मात्र स्वरूप हो। यह जगत् तुमसे पृथक् नहीं है। इसलिये तुमको किस प्रकार और कहाँ हेय और उपादेयकी कल्पना हो सकती है ? तुम सम, ज्ञानस्वरूप और उदारधी होकर सदा ब्रह्मके ध्यानमे तत्पर होते हुए समुद्रकी तरह परिपूर्ण (परितृप्त) रूपसे स्थित रहो ! रघुनन्दन ! यह सब तुमने सुना और परिपूर्ण-बुद्धि होकर तुम स्थित भी हो; इस विषयमे और जो कुछ पूछना चाहो, पूछो। पहले जो तुमने प्रश्न किये थे, उनमेंसे यदि कोई उत्तरके बिना रह गया हो तो उसे भी आज पूछ लो।
श्रीरामजीने कहा—ब्रह्मन् ! न तो आत्मा उत्पन्न होता है न मरता है और न मायासे कलङ्कित ही है तथा 'यह सारा जगत् ब्रह्ममय है' इस प्रकारका निश्चय मेरा है। भगवन् ! मेरा मन शुद्ध और सब प्रकारके प्रश्नोंसे, संशयोंसे और इच्छित पदार्थोंसे निवृत्त है। इस चराचर संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसकी मुझे इच्छा और अनिच्छा हो तथा ऐसी कोई वस्तु भी नहीं है, जो मेरे लिये त्याज्य और ग्राह्य हो। मुझे न स्वर्गकी आकांक्षा है और न नरकसे द्वेष है; किंतु मन्दराचलकी तरह संशयरहित हुआ मै अपने स्वरूपमें स्थित हूँ। यह जगत् जिस स्वरूपका दिखायी देता है, उसी स्वरूपका है, उससे भिन्न उसका कोई दूसरा स्वरूप नहीं है—यों जो मूर्ख जानता है, उसके हृदयमें ज्वालाके सदृश अधिक संतापदायिनी, कुत्सित संशय-समूहोंसे होनेवाली 'यह वस्तु है और यह अवस्तु है' इस प्रकारकी कल्पनाएँ पर्याप्तरूपसे उत्पन्न होती रहती है। मूढ पुरुष जिन धन आदि विषयोंके लिये कृपणता करता है, जगत्की वे वस्तुएँ वास्तवमें हैं ही नहीं। परमेश्वर ! हमने सम्पत्तियोंकी अवधि जान ली, आपत्तियोंकी सीमाका भी अन्त देख लिया। हम सर्वसार अपने स्वरूपमे दीनरहित और परिपूर्ण हुए स्थित है।
(सर्ग ४२-४३)
ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वासना, आसक्ति और अज्ञानके नाशसे मनके विनाशका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! आसक्तिसे तथा कर्तृत्वाभिमानसे रहित एवं न्याययुक्त व्यवहार करनेवाले अन्तःकरणसे इन्द्रियोंके साथ तुम जो कुछ करते हो, वह कर्म कर्म ही नहीं है। जिस तरह प्राप्तिकालमें विषय तुष्टिकारक होता है, उसी तरह उसके बाद दूसरे कालमें नहीं होता। इसलिये बालबुद्धि अविवेकी ही क्षणिक सुख देनेवाले विषयोंमें आसक्त होता है, विवेकी नहीं। श्रीराम ! तुम आत्मज्ञानी हो। इसलिये
अहंकार तुम्हारा पतन नहीं कर सकता; क्योंकि जिसने निरन्तर असीम सत्यस्वरूप ब्रह्मका स्मरण किया है और जो तत्त्वज्ञानरूप सुमेरु पर्वतके शिखरपर स्थित है, उस पुरुषका पुनर्जन्मरूप पतन नहीं हो सकता। श्रीराम ! तुम्हारा जो यह समता एवं सत्यतामय स्वभाव मुझे दिखायी देता है, इससे मै मानता हूँ कि तुम सङ्कल्प-विकल्प और अविद्यासे रहित हो, अपने स्वरूपमें भलीभाँति स्थित हुए तुम मानो मुझे यह
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शिलाके रूपमें ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन * ४११
प्रत्यक्ष करा रहे हो कि सागरके समान पूर्ण समता तुममें विद्यमान है । जिस-जिस वस्तुको तुम देख रहे हो, उस-उस वस्तुमें समानभावसे सत्तारूप सच्चिदानन्द-घन परमात्मा स्थित है ।
जिस प्रकार चित्रलिखित पुरुषमें संसारकी भावना नहीं हो सकती, उसी प्रकार दृश्य और दर्शनके सम्बन्धका अभाव होनेपर हृदयमें जगत्की भावना उत्पन्न नहीं हो सकती । चित्तके संकल्पसे उत्पन्न जगत् चित्तके संकल्पका अभाव होनेपर उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जिस प्रकार जलकी चञ्चलतासे उत्पन्न तरङ्ग जलकी चञ्चलताका अभाव होनेपर विलीन हो जाती है । वासनाके त्यागसे, परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे अथवा प्राणोंके निरोधसे चित्तके संकल्परहित हो जानेपर जगत् कहाँसे उत्पन्न होगा ? जब चित्त-संकल्पके अभावसे अथवा प्राणोंके निरोधसे चित्तका विनाश हो जाता है, तब जो बच रहता है, वही परमपद है । जहाँ चित्तका अभाव है, वहाँ वह सारा सुख स्वाभाविक ब्रह्मसुखरूप ही है । वह सुख स्वर्गादि भोगभूमियोंमें नहीं हो सकता । चित्तका विनाश होनेपर जो ब्रह्मविषयक सुख होता है, वह वाणीसे भी नहीं कहा जा सकता । वह सुख सब समय एकरस रहता है—न घटता है न बढ़ता है । परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे चित्तका अन्त ( अभाव ) हो जाता है । बालकल्पित वेतालकी तरह अज्ञानसे मोह घनरूपता प्राप्त करता है । उस अज्ञानसे ही चित्तकी सत्ता प्रतीत होती है । ज्ञानीका चित्त चित्त नामसे नहीं कहा जाता, किंतु सत्त्व नामसे कहा जाता है । चित्तका स्वरूप वास्तवमें किसी भी कालमें नहीं है । उसका स्वरूप भ्रान्तिसे प्रतीत होता है । इसलिये भ्रान्तिका नाश होनेपर उसका विनाश हो जाता है । वह मिथ्या भ्रान्ति तत्त्वज्ञानसे शान्त हो जाती है; क्योंकि जो सद् वस्तु है, उसका अभाव कभी नहीं होता । जैसे खरगोशके सींगकी सत्ताका अभाव है, वैसे ही विकल्परूप मन आदिका भी अभाव है । वे सब आत्मामें आरोपित हैं । इसलिये उनका परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे विनाश हो जाता है । ( सर्ग ४४-४५ )
शिलाके रूपमें ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघवेन्द्र ! प्रेममय होनेसे स्निग्ध ( चिकनी ), स्वयम्प्रकाश होनेसे स्पष्ट, आनन्दमय होनेसे मृदुल स्पर्शवाली, अनन्त होनेके कारण महाविस्तारसे युक्त, प्रचुर होनेसे घन, नित्य विकाररहित एक ब्रह्मरूप महती शिला है । उस महाशिलाके भीतर मनःकल्पनाओसे अनन्त वे सभी भुवनादिरूप कमल विराज रहे हैं । यहाँपर मैंने यह कोई अपूर्व शिला ही दृष्टान्तरूपसे आपके समक्ष उपस्थित की है, जिसकी महाकुक्षिक भीतर यह सब जगत् प्रतीत होनेके कारण तो है, किंतु वास्तवमें नहीं है । तुमसे उस चिन्मय ब्रह्मरूप शिलाका ही मैंने कथन किया है, जिसके सङ्कल्पमें ये सारे जगत् विद्यमान हैं । इस सच्चिदानन्द ब्रह्ममें शिलाकी ज्यों घनता, एकरूपता आदि हैं । अत्यन्त घनीभूत अद्वैतांशी और पोलसे रहित इस सच्चिदानन्दघनरूप शिलाके अङ्दर यह जगत्-समूह कलित है । यद्यपि उस चेतनरूप शिलामें स्वर्ग, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियों और दिशाएँ विद्यमान प्रतीत होती हैं, तथापि उसमें वस्तुतः तनिक भी अवकाश नहीं है । इस चेतनरूप शिलामें घनीभूत अवयवोवाला जगद्रूपी कमल विकसित हो रहा है । वह यद्यपि उससे पृथक्-सा प्रतीत होता है, तथापि वास्तवमें उससे पृथक् नहीं है । श्रीराम ! जैसे पत्थरमें चित्रकारकी मनःकल्पनासे शङ्ख, खड्ग आदि चित्र निर्मित किये जाते हैं, वैसे ही एकमात्र मनकी कल्पनासे इस चेतनरूप शिलामें भूत, वर्तमान और भविष्यत्—सारा संसार चित्रित किया गया है । प्राकृत शिलामें
४१२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जैसे पुतली आदि वास्तविक-से प्रतीत होते हैं, पर वास्तविक हैं नहीं; अपितु शिलारूप ही हैं, वैसे ही चेतन शिलामें सभी पदार्थ वास्तविक-से प्रतीत होनेपर भी वास्तविक नहीं हैं, किंतु चिन्मय ब्रह्म ही हैं। भीतर स्थित शङ्ख, कमल आदि आकारोंसे युक्त शिला अनेकरूपसे प्रतीत होती हुई भी जैसे घनीभूत एक शिला ही है, वैसे ही कल्पित आकारोंसे युक्त होकर अनेक आकृतियोंके रूपमें प्रतीत होता हुआ भी वास्तवमें घनीभूत एक ब्रह्म ही है। जिस प्रकार पाषाण-शिलाके भीतर शिल्पीद्वारा लिखित कमल, उस शिला-कोशसे अभिन्न होनेपर भी, अपने परिच्छिन्न आकारसे युक्त होकर उससे भिन्न-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार चेतनके स्वरूपसे अभिन्न होनेपर भी यह सृष्टि उससे अन्य—परिच्छिन्न आकारवाली होकर उससे भिन्न-सी प्रतीत होती है, वास्तवमें भिन्न नहीं है। वास्तवमें ये प्रतीत होनेवाले भुवन आदि विकार विकारादि अर्थोंसे शून्य ब्रह्मरूप ही हैं। विषयोंका ग्रहण और अग्रहण भी ब्रह्मरूप ही हैं; क्योंकि ब्रह्म अनन्त है। विकार आदि रूपसे ब्रह्म ही अवस्थित है और ब्रह्म ही क्रमशः विकार आदिके रूपमें उत्पन्न हुआ है। इस चेतन शिलाके भीतर जो ये विकारादि पदार्थ प्रतीत हो रहे हैं, उन्हें तुम मृगतृष्णा-जलके सदृश समझो। जिस प्रकार रेखाओं एवं उपरेखाओंसे युक्त एक ही स्थूल शिला दीखती है, उसी प्रकार अद्वितीय ब्रह्म ही त्रैलोक्यसे युक्त प्रसिद्ध जगद्रूपसे दीखता है। जैसे इस लौकिक शिलाके भीतर सर्वदा स्थित शिल्पीके वासनास्वरूप कमल आदि वास्तवमें न उदित होते हैं और न अस्त ही होते हैं, वैसे ही इस चेतन शिलामें मनोरूप जगत्की गति भी वास्तवमें न उदित होती है और न अस्त ही होती है। जिस तरह शिलाके भीतरकी रेखा आदि शिलासे भिन्न नहीं हैं, किंतु शिलामय ही हैं, उसी तरह कर्तृत्व आदि जगत् चेतनका संकल्प होनेसे चिन्मय ब्रह्मसे भिन्न नहीं हैं, किंतु ब्रह्मरूप ही हैं।
रघुनन्दन ! देश, काल, क्रिया आदि भी ब्रह्मरूप ही हैं; अतः 'यह अन्य है', 'यह अन्य है' इस प्रकारकी कल्पना यहाँ नहीं बन सकती। जिस प्रकार चिन्तामणिके अन्तर्गत चिन्तकोंके अनन्त फल पर्याप्त-रूपसे रहते हैं, उसी प्रकार परम चेतन परमात्मरूप मणिमें अनन्त जगत् रहते हैं। समुद्रमें स्थित आवर्त, तरङ्ग आदिरूप जलस्पन्दनके विलासकी तरह और शिलाके भीतर अङ्कित कमलकी तरह यह अद्वितीय चेतन परमात्मा जगद्रूपसे नाना प्रतीत होता है। जो वर्तमान-कालिक जगत् है, वह चेतनमें एक तरहसे शिलामें खुदी गयी मूर्तिके सदृश है और जो जगत् वर्तमानकालमें नहीं है यानी भूत एव भविष्यत्कालिक जो जगत् है, वह एक तरहसे चेतन शिलामें न खोदी गयी मूर्तिके सदृश है। जैसे कमल आदि शब्द और उनके अनेकों अर्थ शिलाको छोड़कर नाना-से प्रतीत होते हैं, वास्तवमें शिलासे उनका पृथक् अस्तित्व नहीं है। वैसे ही अद्वय चेतन परमात्माको छोड़कर ये जगदादि शब्द और उनके अर्थ नाना-से प्रतीत होते हैं; वास्तवमें चिन्मय परमात्मासे पृथक् उनका अस्तित्व नहीं है, किंतु वे चिन्मय परमात्मा ही हैं। श्रीराम ! मरु-मरीचिका मृगकी दृष्टिमें तो निर्मल जलराशि ही है, किंतु विवेक-बुद्धिसे सम्पन्न विद्वानोंको स्थलपर सूर्यकी किरणें ही पडती हुई दिखायी देती हैं। वहाँ जैसे साक्षरूप किरणें ही असत् जलराशिके रूपमें दिखायी पड़ती हैं, वैसे ही सच्चिदानन्द-स्वरूप तुम ही असत् जगद्रूपसे प्रतीत होते हो। वास्तवमें तो तुम सच्चिदानन्द-स्वरूप हो। जैसे सच्चिदानन्दघन परमात्मामें उत्पत्ति-विनाशका अभाव है, वैसे ही जगत्में भी उत्पत्ति-विनाशका अभाव है; क्योंकि जिस प्रकार मरुभूमिमें सूर्यकी किरणें जलरूपसे प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्रह्म ही जगद्रूपसे प्रतीत होता है। जैसे सूर्यकी धूपसे बर्फ गलकर जलरूप ही हो जाता है,
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * परमात्माके स्वरूपका और अविद्याके अत्यन्त अभावका निरूपण * ४१३
वैसे ही मेरु, तृण, गुल्म, मन और जगत् आदि सारे पदार्थ परमात्माके यथार्थज्ञानसे परम विशुद्ध परमात्मा ही हो जाते हैं, यों ब्रह्मज्ञानी लोग जानते हैं। (सर्ग ५६-५७)
परमात्माके स्वरूपका और अविद्याके अत्यन्त अभावका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! अपने अतिशय परमानन्दमय स्वरूपका अनुभव करनेवाले ज्ञानी मुनि, देवतागण, सिद्ध और महर्षिलोग सर्वदा तुरीय पदमें स्थित रहते हैं। व्यवहारमें लगे हुए जो लोग बाह्य दृश्य विषयोंमें सत्यताकी भावनासे रहित हैं, जो पुरुष विषयेन्द्रिय-सम्बन्धोंका परित्याग करके समाधिमें निरत हैं, चित्रलिखित देहधारियोंकी भाँति जो प्राणोंके स्पन्दनसे रहित हैं और उन्हींकी भाँति जो मनोगतिसे भी शून्य हैं, वे सब अपने उस परमपद-स्वरूप परमात्मामें—जहाँ मनका एव दृश्यकी आसक्तिका अभाव है—समानभावसे नित्य स्थित हैं। वह विशुद्ध चिन्मय परमात्मा न तो दृष्टिका विषय है और न उपदेशका ही विषय है। वह न तो अत्यन्त समीप है और न दूरवर्ती ही है; किंतु केवल अनुभवसे ही प्राप्य और सब जगह समानभावसे स्थित है। शुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मा न देहरूप है न इन्द्रिय एवं प्राणरूप है, न चित्तस्वरूप है न वासनारूप है, न स्पन्दस्वरूप है न ज्ञानरूप है और न जगद्रूप ही है, बल्कि इन सबसे अति परे महान् श्रेष्ठ है। वह न सद्रूप है न असद्रूप है और न सत् एव असत्के मध्यवर्ती ही है। वह न तो शून्यस्वरूप है और न अशून्य-स्वरूप ही है; वह देश, काल एवं वस्तु भी नहीं है; किंतु ब्रह्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न कुछ नहीं। वह ब्रह्म देह आदि समस्त पदार्थोंसे रहित है और जिसके रहनेपर यह दृश्य जगत् आविर्भाव, तिरोभाव आदिरूपसे स्पन्दित होता है वह परमात्मपद ही है। ये हजारों देहरूप घड़े उत्पन्न होते हैं और नष्ट भी होते हैं; किंतु बाहर एव भीतर व्याप्त इस परमात्म-स्वरूप आकाशका नाश नहीं होता (अर्थात् जिस प्रकार घड़ोंका नाश होनेपर भी घटाकाशका नाश नहीं होता, उसी तरह देहका नाश होनेपर भी परमात्माका नाश नहीं होता। ) आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! उपर्युक्त देहादि सम्पूर्ण जगत् परमात्मरूप ही है, किंतु वह जगत् केवल अज्ञानवश ही परमात्मासे पृथक्-सा प्रतीत होता है। तुम्हें तो अपनी पवित्र बुद्धिसे यह ज्ञात ही है कि यह विश्व परमात्मस्वरूप है। स्थावर एवं जङ्गम-स्वरूप जो कुछ यह जगत् दीखता है, वह सब ब्रह्म ही है; किंतु वास्तवमें वह ब्रह्म लक्षणों और गुणोंसे, मलोंसे, विकारोंसे तथा आदि और अन्तसे रहित एवं नित्य, शान्त और समस्तरूप है।
श्रीराम ! दही बन जानेसे दूध पुनः अपने दूध-रूपमें नहीं आता। किंतु ब्रह्म-ऐसा नहीं है। आदि, मध्य और अन्त—किसी भी दशामें ब्रह्म तो निर्विकार ब्रह्मरूप ही ज्ञात होता है। इसलिये दूध आदिके समान ब्रह्ममें विकारिता नहीं है। समस्तरूप ब्रह्मका आदि और अन्तमें जो क्षणभरके लिये विकार दिखलायी पड़ता है, उसे तुम जीवात्माका भ्रम समझो; क्योंकि अविकारी ब्रह्ममें कोई विकार नहीं हो सकता। उस ब्रह्ममें दृश्य-दर्शनका अत्यन्त अभाव है। वास्तवमें वह ब्रह्म संसारके सम्बन्धसे रहित, सच्चिदानन्दघन कहा गया है। आदि और अन्तमें जिस वस्तुका जो स्वरूप है, वही उसका नित्य स्वरूप है। यदि मध्यमें उसका अन्य रूप दिखलायी पड़ता है तो वह केवल अज्ञानके कारण ही दिखायी देता है। वास्तवमें परमात्मा तो आदि, अन्त और मध्यमें सर्वत्र सदा एकरूप है; क्योंकि स्वरूप परमानन्दत्त्व कभी भी विषमभावको प्राप्त नहीं होता। निराकार, अद्वितीय
४१४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तथा नित्यस्वरूप होनेके कारण यह परब्रह्म परमात्मा कभी भाव-विकारोंसे युक्त नहीं होता ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! अद्वितीय तथा अत्यन्त शुद्ध नित्य ब्रह्ममें जीवात्माके भ्रमरूप अविद्याका आगमन कैसे हुआ ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! विकार तथा आदि और अन्तसे रहित यह पूर्ण ब्रह्मसत्त्व पहले भी था, इस समय भी है और भविष्यमें भी सदा रहेगा । वास्तवमें अविद्याका किंचिन्मात्र भी अस्तित्व नहीं है, यह मेरा दृढ़ निश्चय है । 'ब्रह्म' इस शब्दसे जो वाच्य एवं वाचकका पृथक्-पृथक् वर्णन किया जाता है, उसका भी भेदमें तात्पर्य नहीं है, किंतु वह समझानेके लिये ही है । श्रीराम ! तुम और मैं, यह संसार और दिशाएँ, आकाश और पृथ्वी अथवा अनल आदि सब-के-सब आदि और अन्तसे रहित ब्रह्म ही हैं, अविद्या तो वास्तवमें है ही नहीं; क्योंकि मुनिलोग 'अविद्या'को भ्रममात्र और असत् कहते हैं । श्रीराम ! वास्तवमें जो वस्तु है ही नहीं, वह सच कैसे समझी जा सकती है । वेद-रूप वाणीका रहस्य जाननेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ विद्वानोंने 'यह अविद्या है और यह जीव है' इत्यादि कल्पना अज्ञानी जनोंको उपदेश देनेके लिये ही की है । केवल युक्तिसे ही बोध कराकर इस जीवको परमात्मामें नियुक्त किया जा सकता है; क्योंकि जो कार्य युक्तिसे सम्पादित होता है, वह सैकड़ों अन्य उपायोंसे नहीं होता । अज्ञानी दुर्मतिके सम्मुख उसे सुहृद् समझकर 'यह सब कुछ ब्रह्म है' यों जो पुरुष कहता है, उसका वह कथन एक ठूँठको दुःख निवेदन करनेके समान है । उससे कोई लाभ नहीं है । क्योकि मूर्ख युक्तिसे प्रबोधित होता है और प्राज्ञ तत्त्वसे । युक्तिसे बोध कराये बिना मूर्खको ज्ञान नहीं होता । श्रीराम ! मैं ब्रह्म हूँ, तीनो जगत् ब्रह्म हैं, तुम ब्रह्म हो और यह दृश्य पृथ्वी भी ब्रह्म ही है; ब्रह्मसे पृथक् कोई दूसरी कल्पना ही नहीं है । रघुनन्दन ! सोते जागते, चलते-फिरते, बैठते, श्वास लेते—सब समय अपने हृदयमें 'सर्वव्यापी सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही मैं हूँ' ऐसा समझना चाहिये । क्योंकि तुम वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित, शान्त, चिन्मय ब्रह्म हो यथा सर्वव्यापी, अद्वितीय, शुद्ध ज्ञान-स्वरूप, आदि और अन्तसे रहित, प्रकाशात्मक परम-पदस्वरूप हो एव ब्रह्म, तुरीय, आत्मा, अविद्या, प्रकृति—ये सब भी अभिन्न, अद्वितीय नित्य परमात्मस्वरूप ही हैं । जैसे मिट्टीसे घड़ा पृथक् नहीं है, वैसे ही परमात्मासे प्रकृति पृथक् नहीं है । जैसे वायु और उसका स्पन्दन एक ही पदार्थ हैं और नामसे दोनो भिन्न होते हुए भी वास्तवमें भिन्न नहीं हैं वैसे ही परमात्मा और प्रकृति—ये दोनों एक हैं और नामसे भिन्न होते हुए भी वास्तवमें भिन्न नहीं हैं । जैसे अज्ञानसे रज्जुमें सर्पकी प्रतीति होती है, वैसे ही अज्ञानसे इन दोनोमें भेद जान पड़ता है और वह भेद यथार्थ ज्ञानसे ही विनष्ट हो जाता है । तात्पर्य यह कि परमात्माके सिवा—उससे भिन्न कोई वस्तु नहीं है । (सर्ग ४८-४९.)
जीवात्माका अपनी भावनासे लिङ्गदेहात्मक पुर्यष्टक बनकर अनेक रूप धारण करना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ब्रह्मन् ! मुझे सम्पूर्ण ज्ञातव्य (जानने योग्य) वस्तुका ज्ञान है और अविनाशी द्रष्टव्य वस्तुका अनुभव है तथा मैं आपके सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मज्ञानरूप उपदेशामृतसे तृप्त हूँ । सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्म परमात्मासे यह पूर्ण संसार परिपूर्ण है । पूर्णब्रह्म परमात्मासे ही यह संसार उत्पन्न होता है, पूर्ण-ब्रह्म परमात्माद्वारा ही यह संसार पूरित है एवं पूर्णब्रह्म परमात्मामें ही यह संसार स्थित है; तथापि ब्रह्मन् ! बहुत लोगोंके ज्ञानकी अभिवृद्धिके लिये लीलासे मैं आपसे यह प्रश्न पूछता हूँ । मृत प्राणीके श्रोत्र, चक्षु, त्वचा,