भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

५६८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त यो.वा.सि०

वस्तु उपलब्ध होकर भी अभाव दशाको प्राप्त हो जाती है, वह नष्ट ही है; क्योंकि उपलब्धका अदर्शन ही नाश है। यदि नाशकी कोई और परिभाषा हो तो वह कैसी है, यह तुम्हीं बताओ। यदि कहें कि नष्ट हुई वस्तु ही फिर उत्पन्न हुई है तो ऐसी प्रतीति किसको होती है ? अतः जो वस्तु उत्पन्न है, उसका नाश अवश्य होता है। और पुनः-पुनः दूसरेकी ही उत्पत्ति या प्रवृत्ति होती है; यही कहना उचित है।

वृक्षके बीच-बीचमे जो स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प तथा फलादिरूप अवयव हैं, उनमें समस्त वृक्ष-शरीरको व्याप्त करके स्थित एक बीज-सत्ता ही है। जब सर्वत्र एक ही सत्ता है, तब उसमें कार्यकारणभावकी कल्पना कैसे की जा सकती है ? विचार तथा अपने अनुभवरूप प्रमाणसे यह सब शान्त, अनादि, अनन्त और आकाशके समान निर्मल केवल बोधस्वरूप परमात्मा ही है, क्योंकि सब कुछ परमात्माका ही स्वरूप है। वह परमपदरूप परमात्मा वाणीका अविषय, अव्यक्त, इन्द्रियातीत, नाम-रूपसे रहित, सर्व-भूतस्वरूप, शून्यमय है तथा सत् एव असत् भी वही है। वस्तुतः वह न वायु है, न आकाश है, न मन है, न बुद्धि आदि है और न शून्यरूप ही है। वह कुछ न होकर भी सर्वरूप है। कोई और ही (विलक्षण एव अनिर्वचनीय) परम व्योम (चिन्मय आकाशरूप) है। उस परमपदमें स्थित एवं समस्त कल्पनाओंसे मुक्त तत्त्वज्ञानी ही उस परमात्मवस्तुका अनुभव करता है, दूसरे लोग तो केवल अभ्यासमें लाये गये शास्त्रोंके अनुसार ही उसका वर्णन करते हैं। वास्तवमें वह परमात्मा न काल है, न मन है, न जीव है, न सत् है, न असत् है, न देश है, न दिशा है, न इनका मध्य है, न अन्त है, न बोध है और न अबोध ही है।

योगी लोग उस परमात्मपदको सर्वात्मक और समस्त पदार्थोंसे रहित देखते हैं। वह आदि पद ज्ञानयोगी महात्माओंकी दृष्टिमें सर्वरूप, सर्वात्मक, सर्वार्थरहित और सर्वार्थपरिपूर्ण है। जिसका अन्तःकरण स्वच्छ है, जो तत्त्वज्ञ एवं शान्त है और परम प्रकाशस्वरूप परमात्माको प्राप्त है, वही उसके यथार्थ स्वभावको देख या समझ पाता है। जैसे सुवर्ण-पिण्डके भीतर आभूषण तथा मुद्रा आदिका समूह कल्पित है, उसी प्रकार 'यह', 'तुम' और 'मैं' इत्यादिके रूपमें प्रतीत होनेवाला भूत, वर्तमान और भविष्यत्कालके जगत्का भ्रम उस परमात्मामें कल्पनासे ही स्थित है, वास्तवमें नहीं। परब्रह्मरूपी काष्ठ-स्तम्भमें यह त्रिलोकीरूपिणी पुतली यद्यपि खुदी हुई नहीं है तो भी प्रतीत हो रही है, साक्षीरूपी शिल्पीकी दृष्टिमें समायी हुई है। खम्भेमें तो खुदी हुई पुतलियाँ ही दृष्टिगोचर होती हैं। परंतु उस क्षोभरहित परब्रह्म परमात्मारूपी महासागरमें बिना हुए ही ये सृष्टिकी तरंगें दृष्टिगोचर हो रही हैं, नित्य निरतिशयानन्दमय जलसे भरे हुए चैतन्य-रूपी सरोवरमें चिन्मय मेघोंकी अमृतमयी वर्षाके समान ये दृष्टिगत सृष्टियाँ भासित हो रही हैं। वह परमात्मा विभागशून्य—अखण्ड एकरस है तो भी उसमें ये सृष्टि-दृष्टियाँ विभागपूर्वक स्थित प्रतीत होती हैं। ब्रह्म क्षोभ-रहित है तो भी उसमें ये क्षुभित-सी देखी जाती है तथा वह परमात्मा सच्चिदानन्दघन है। उसमें इन दृष्टिगत सृष्टियोंका कहीं पता नहीं है तो भी ये उसके भीतर प्रतीत होती हैं।

(सर्ग ५२)


परमात्मामे सृष्टिभ्रमकी असम्भवता, पूर्ण ब्रह्मके स्वरूपका निरूपण तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उस शुद्ध बुद्ध परमात्मामे सृष्टिके कारणभूत मल, आकार, बीज, माया, मोह और भ्रम आदि किसीका भी होना वास्तवमें सम्भव नहीं है। वह केवल (अद्वितीय), शान्त, अत्यन्त निर्मल

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमात्मामें सृष्टिभ्रमकी असम्भवता * ५६९


और आदि-अन्तसे रहित है। वह इतना सूक्ष्म है कि उसके भीतर आकाश भी प्रस्तरके समान स्थूल कहा जा सकता है। जिसकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है, उस दृश्य-प्रपञ्चकी सत्ता यहाँ कदापि सम्भव नहीं है। तथा जो सदा स्वानुभवैकगम्य नित्य परमात्मवस्तु है, उसकी सत्ताका निराकरण करनेकी शक्ति किसमें है ? संसार ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण चैतन्यमय ही है। इसमें जो जड आकारकी प्रतीति होती है, वह भ्रमसे ही है। इसलिये सब कुछ एक, अजन्मा, शान्त, द्वैताद्वैतसे रहित तथा निरामय ब्रह्म ही है। पूर्ण परब्रह्म परमात्मासे पूर्णका ही विस्तार हो रहा है। पूर्णमें पूर्ण ही विराज रहा है। पूर्णसे पूर्णका ही उदय हुआ है तथा पूर्णमें पूर्ण ही प्रतिष्ठित है। वह पूर्ण ब्रह्म शान्त, सम, उत्पत्ति-विनाशसे रहित, निराकार, अजन्मा, आकाशकी भाँति व्यापक, विशुद्ध और अद्वितीय है। वह सर्वरूप है और सत्-असत् स्वरूप तथा एक होकर ही सदा स्थित रहता है। सबका आदि वही है। मोक्ष उसका अपना ही स्वरूप है तथा वह उत्कृष्ट ज्ञानरूप है।

'तू', 'मैं' और 'यह जगत्'—इत्यादि जो शब्द हैं, इनका अर्थ ब्रह्म ही है और वह ब्रह्ममें ही विद्यमान है। वह ब्रह्म शान्त, सबमें समानरूपसे ही प्रकाशित होनेवाला तथा सत् है। वह पृथक् स्थित न होकर ही अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित है। समुद्र, पर्वत, मेघ, पृथ्वी तथा विस्फोट आदिसे युक्त होकर भी यह जगत् वास्तवमें अजन्मा तथा काष्ठमौनके समान निष्क्रिय ब्रह्मरूप ही है। उस ब्रह्ममें न तो ज्ञातापन है, न कर्त्तापन है, न जडता है और न भोक्तापन है, न शून्यता है, न अर्थरूपता है और न आकाशरूपता ही है। वह सत्य, घन, अद्वितीय, जन्म आदिसे रहित, सर्वव्यापी, सर्वरूप, शान्त, अनादि, अनन्त तथा एक रूप ही है। मरना-जीना, सत्य-असत्य तथा शुभ और अशुभ जो कुछ भी है, वह सब एकमात्र जन्मरहित चेतनाकाश-स्वरूप है। जैसे लहरोंका समुदाय जलरूप ही होता है, उसी प्रकार सब कुछ ब्रह्म ही है। जन्मनेमें भी परम शान्त चेतनाकाशस्वरूप ब्रह्मका ही रूप यह जगत् है, जो आदि और अन्तमें अव्यक्त तथा मध्यकालमें ही इस प्रकार व्यक्त होता है। जैसे जल ही फेन आदिके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही जगद्रूपमें भासित होता है। जो उत्पन्न होता है और उत्पन्न है, वह कार्यरूप तथा जो उत्पन्न नहीं होता है और उत्पन्न नहीं है, वह कारणरूप भी उस चेतन परमात्मासे भिन्न नहीं है। अतः इस सृष्टिका ब्रह्मसे भिन्न कोई कारण नहीं है। जैसे प्रयत्नपूर्वक खोज करनेपर भी खरगोशके सींगका पता नहीं आ सकता, वैसे ही इस सृष्टिका वास्तविक कोई कारण नहीं उपलब्ध होता।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जैसे वटबीजके भीतर भावी विशाल वृक्ष विद्यमान होता है, वैसे ही ज्ञानमय परमाणु परमात्मामें यह सारी सृष्टि विद्यमान रहती है, ऐसा क्यों न मान लिया जाय !

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जहाँ बीज है, वहाँ वटवृक्षकी विशाल शाखा हो सकती है; क्योंकि वह सहकारी कारणोंसे उत्पन्न होती और फैलती है; परन्तु जब सम्पूर्ण भूतोंका प्रलय हो जाता है, तब कौन-सा बीज शेष रह जाता है और उसका सहकारी कारण भी क्या रहता है; जिसके सहयोगसे जगत्‌की उत्पत्ति हो। जो शान्त परब्रह्म है, उसमें जगत्‌की कल्पना हो सकती है। उसमें तो परमाणुत्वका भी योग नहीं होता, फिर बीजत्व कैसे आ सकता है ? इस प्रकार विचार करनेपर बीजभूत कारणका होना जब सर्वथा असम्भव है, तब जगत्‌की सत्ता किस प्रकार, किस साधनसे, किस निमित्तसे, कहाँ और क्या हो सकती है, इसलिये जो ब्रह्मरूप परमानन्द है, वही अपने स्वरूपभूत संकल्पसे यह जगद् बनकर स्थित

५७० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

है। यहाँ न तो कोई वस्तु उत्पन्न होती है और न उसका नाश ही होता है, जैसे आकाशमें अवकाश और जलमें द्रवत्व है, उसी प्रकार परमात्मामें सृष्टि स्थित है। (सर्ग ५३-५४)


ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना तथा जगत्‌का ब्रह्मसे अभेद, पाषाणोपाख्यानका आरम्भ—वसिष्ठजीका लोकगतिसे विरक्त हो सुदूर एकान्तमें कुटी बनाकर सौ वर्षोंतक समाधि लगाना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उत्पत्ति, विनाश, ग्रहण, त्याग, स्थूल, सूक्ष्म, चर, अचर आदि सभी पदार्थ सृष्टिके आरम्भ-कालमें उत्पन्न नहीं हुए थे; क्योंकि इनकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं था। जैसे नदियोंकी तरङ्ग-रेखा पहलेकी भाँति आज भी बह रही है, वैसे ही चेतनका संकल्प ही कल्पके आदिसे प्रलयपर्यन्त पदार्थोंके स्वभावका व्यवस्थापक है। पदार्थोंकी रचना दृष्टियोंमें ही प्रकट है। उनकी वास्तविक सत्ता नहीं है। जैसे जल-तरङ्गोंकी शोभा ही नदियोंकी रचना बन गयी है, उसी तरह चेतन आकाशमें विद्यमान चैतन्यरूप बीजकी सत्ता ही उसके भीतर सृष्टिरूपताको प्राप्त हो गयी है अर्थात् सृष्टिकी सत्ता चेतन सत्तासे पृथक् नहीं है। सब प्रकारके भेदज्ञानका निवारण हो जानेपर पुरुषमें जो एक शुद्ध ज्ञानका उदय होता है, तद्रूप ही वह बन जाता है। इसीसे वह मुक्त कहा जाता है। इसलिये उसमें बन्धन और मोक्षकी दृष्टियाँ कैसे रह सकती हैं? चेतन आकाशमें जो यह जगत्-नामक मलिनता प्रतीत हो रही है, पूर्वोक्तरूपसे विचार करनेपर यह निष्कलङ्क एवं निर्वाणरूप ब्रह्म ही सिद्ध होता है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ यह ब्रह्म व्याप्त न हो। यह जगत् अनेक रूप नहीं है, अपितु आकाशमें शून्यत्व तथा समुद्रमें द्रवत्वके समान ब्रह्मसे अभिन्न ही है।

रघुनन्दन ! चिन्मय आकाश परब्रह्म परमात्मामें सर्वत्र और सदा सब कुछ भलीभाँति विद्यमान है। साथ ही वह सर्वथा स्वच्छ है अर्थात् वह अपनी मलिनतासे ब्रह्मको दूषित नहीं करता है। वैसे ही जैसे सम्पूर्ण आकाशमें नीलरूपसे भासित होनेवाली शून्यता अपने मलसे मलिनता पैदा करके उसे दूषित नहीं करती। श्रीराम ! इस विषयमें पाषाणाख्यान सुना रहा हूँ, सुनो—यह अविद्यारूपी रोगको दूर करनेके लिये रसायन है। पूर्वकालमें मैने ही जो कुछ देखा था, उसीका इस आख्यायिकामें वर्णन है। यह विचित्र होनेके साथ ही इस प्रसङ्गके अनुकूल है। एक समयकी बात है, मै जानने योग्य परमात्म-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेनेके कारण पूर्णकाम हो गया था। इसलिये मेरे मनमें यह इच्छा हुई कि घनीभूत भ्रमसे भरे हुए इस लोकव्यवहारको छोड़ दूँ, तब ध्यानमें एकतान होकर धीरे-धीरे दीर्घकालिक विश्रामके लिये सम्पूर्ण चञ्चलताका त्याग करके मैंने एकान्त स्थानमें रहनेकी अभिलाषा की और शीघ्रतापूर्वक शान्तिकी ओर अग्रसर होने लगा। उस समय मै किसी देवताके स्थानमें स्थित था और जगत्‌की विविध एवं क्षणभङ्गुर गतियोंका अवलोकन कर रहा था। इतनेमें ही मै यह सोचने लगा कि इस लोककी अवस्था बड़ी नीरस है। देखनेमें सुन्दर और परिणाममे विनाशशील होनेके कारण आपातक्रमणीय है, इसलिये मै ऐसा मानता हूँ कि यह कहीं किसीको, किसी भी कारणसे और कभी भी सुख नहीं दे सकती। अतः कौन-सा ऐसा प्रदेश होगा, जो बिल्कुल सूना हो और जहाँ रहनेसे इन पाँचो बाह्य विषयोंकी वेदनाएँ अनुभवमें न आवे? मेरे विचारसे तो यह आकाश ही, जो सब ओरसे सूना होनेके कारण विक्षेपके उपकरणोसे रहित है, मेरी समाधिके लिये अधिक उपयोगी होगा।

४६- विद्याधरीका पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना और उन्हें समाधिसे जगाना, उनके और देवतादिके द्वारा वसिष्ठजीका स्वागत-सत्कार, वसिष्ठजीके पूछनेपर ब्रह्माजीका उन्हें अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना और उस कुमारी नारीको वासनाकी देवी बताना

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * अहंकाररूपी पिशाचकी शान्तिका उपाय * ५७१

मैं इसके किसी दूरवर्ती कोनेमें उत्तम योगयुक्तिका आश्रय लेकर स्थित रहूँगा, आकाशके एक कोनेमें संकल्पसे ही कुटी बनाकर उसके भीतर शुद्ध हो वासनारहित होकर निवास करूँगा।'

ऐसा सोचकर निर्मल आकाशमें ज्यों ही मैं आगे बढ़ा, त्यों ही देखता हूँ कि इस आकाशका भी सारा अन्तःप्रान्त विक्षेपके कारणोंसे व्याप्त है। अनेक प्रकारके भूतगण यहाँ विचर रहे हैं। तब मैं आकाशवर्ती भूतगणोंको त्यागकर वहाँसे दूरतिदूर एकान्त स्थानमें जा पहुँचा, जो अत्यन्त विस्तृत और सूना था। वहाँ बहुत धीमी-धीमी हवा चल रही थी। स्वप्नमें भी भूतगण वहाँ नहीं पहुँच सकते थे। न तो वहाँ मङ्गलसूचक शुभ शकुन होते थे और न उत्पातसूचक अपशकुन। तुम उस स्थानको संसारी पुरुषोंके लिये अलभ्य समझो। उस शून्य प्रदेशमें मैंने अपने संकल्पसे ही एक कुटीका निर्माण किया। उसका भीतरी भाग स्वच्छ एवं विशद था। उसकी दीवारोंमें कहीं छेद नहीं थे। इसलिये वह घनीभूत जान पड़ती थी तथा देखनेमें कमल-कोशके समान सुन्दर लगती थी। फिर मैंने मन-ही-मन यही मन्तव्य स्थिर किया कि यह कुटी समस्त भूतोंके लिये अगम्य हो जाय। तदनन्तर मैं उन सब भूतोंके लिये अगम्य कुटीरमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ पद्मासन लगाकर शान्त-चित्त हो मैंने अत्यन्त मौन धारण कर लिया। साथ ही यह निश्चय किया कि मैं इसके बाद ही मैं इस समाधिसे उठूँगा। इसके बाद मैं निर्विकल्प समाधिमें स्थित हो गया। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो मैंने निद्राकी मुद्रा धारण कर ली हो। मेरी बुद्धिमें समता थी। मैं निर्मल आकाशके समान शुद्धभागमें अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित था। ऐसा लगता था मानो आकाशसे खोदकर मेरी प्रतिमा प्रकट की गयी हो। छ सौ वर्षोंका समय मेरे लिये एक पलके समान व्यतीत हो गया; क्योंकि समाधिमें चित्तको एकाग्र करनेवाले पुरुषोंके लिये बहुत समयतक रहनेवाली कालकी गतियाँ भी थोड़ी प्रतीत होती हैं। तदनन्तर काल्पनिक अहंकाररूपी पिशाच इच्छारूपिणी पत्नीके साथ वहींसे मेरे पास आ धमका। (सर्ग ५५-५६)


अहंकाररूपी पिशाचकी शान्तिका उपाय—सृष्टिके कारणका अभाव होनेसे उसकी असत्ता तथा चिन्मय ब्रह्मकी ही सृष्टिरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीरामभद्र ! अज्ञानसे अपने अन्तःकरणमें अहंभावरूपी पिशाचकी कल्पना कर ली गयी है, जो वास्तवमें है नहीं। जैसे हाथमें दीपक लेकर ढूँढ़नेवालेको अन्धकारका स्वरूप नहीं दिखायी देता, वैसे ही विचारशील पुरुष यदि देखे तो उसे अज्ञानकी उपलब्धि नहीं हो सकती। अहंता-रूपिणी पिशाचीके स्वरूपपर विचार करते हुए जैसे-जैसे उसकी ओर देखा जाता है, वैसे-ही-वैसे वह छिपती जाती है। सृष्टिकी सत्ता होनेपर ही अविद्याका अस्तित्व सम्भव हो सकता है, और किसी हेतुसे नहीं। परंतु यह सृष्टि तो कभी उत्पन्न हुई ही नहीं। केवल अज्ञानियोंके अनुभवमें आती है। वास्तवमें वह है नहीं। जैसे आकाशमें कभी वृक्ष पैदा नहीं हुआ, उसी प्रकार सृष्टिका कोई कारण न होनेसे वह पूर्वकालमें ही उत्पन्न नहीं हुई थी। मनसहित छः इन्द्रियोंके दृश्य न होने-वाला निराकार परब्रह्म मनसहित छः इन्द्रियोंके विषय-भूत साकार जगत्‌का वस्तुतः कारण कैसे हो सकता है। कहते हैं बीजरूपी कारणसे अङ्कुररूपी कार्य उत्पन्न होता है। परंतु जहाँ बीज भी नहीं है, वहाँ अङ्कुर कैसे हो सकता है ? कारणके बिना कार्यकी उत्पत्ति कदापि सम्भव नहीं है। आकाशमें वृक्ष, जिनके होने-सा कुछ स्पष्टरूपसे देख पा रहा है।

५७२* अविच्छिन्नश्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रहनेवाला चिन्मयाकाशरूप ईश्वर ही अपने स्वरूपमें सृष्टि-रूपसे स्फुरित हो रहा है। उसका स्वभाव ही सृष्टिके नामसे विख्यात है। अतः चिन्मय होनेके कारण यह सृष्टि चैतन्यरूप ही है। सृष्टिके आरम्भमें विषयज्ञानशून्य जो शुद्ध एक अजन्मा अव्यय आदि और अन्तसे शून्य परब्रह्म स्थित था, वही हमारे समक्ष सृष्टिरूपसे विराजमान है। वास्तवमें यहाँ सृष्टि नामकी कोई वस्तु है ही नहीं और न ये भूगोल तथा खगोल आदि ही हैं। सब कुछ शान्त, अवलम्बनशून्य, ब्रह्ममात्र ही है और ब्रह्ममें ही स्थित है। भाव्य, भावक और भाव आदिकी जो निरन्तर उत्पत्ति प्रतीत होती है, वह सब स्वच्छ चिन्मयाकाश ही स्वयं अपने आपमें स्थित है। ऐसी अवस्थामें कहाँसे सृष्टि हुई, कहाँसे अविद्या आयी और कहाँ अज्ञता एवं अहंकार आदिकी स्थिति है? सब शान्त, चिद्घन ब्रह्म ही तो है। इस प्रकार मैने तुमसे अहंकारकी शान्तिका उपाय बताया है। अहंभावको यदि अच्छी तरह जान लिया जाय तो बालकल्पित पिशाचकी भाँति वह स्वतः शान्त हो जाता है।

समस्त सृष्टियाँ ब्रह्ममें ही कल्पित हैं—इस दृष्टिसे परमात्मा ब्रह्मका कोई अणु अंश भी ऐसा नहीं है, जो सृष्टियोंसे ठसाठस भरा हुआ न हो। परंतु वे सृष्टियाँ भी वास्तवमें कहीं उपलब्ध नहीं होती हैं। वह सब कुछ परब्रह्म-रूप आकाश ही है। सृष्टियोंमें कोई सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग भी ऐसा नहीं है, जो सदा ब्रह्मस्वरूप न हो। इसलिये ब्रह्म और सृष्टि इन नामोंमें ही उच्चारणमात्रका भेद है, इनसे प्रतिपादित होनेवाली वस्तुमें नहीं। सृष्टि ही परब्रह्म है और परब्रह्म ही सृष्टि है। अग्नि और सूर्यकी उष्णताओंके समान इनमें तनिक भी भेद नहीं है। श्रीराम! व्यवहारमें लगे हुए ज्ञानीके लिये भी यह सब कुछ शान्त, एक, अनादि, अनन्त, स्वच्छ, निर्विकार, शिलाके सदृश अत्यन्त घन और मौन ब्रह्मरूप ही है। (सर्ग ५७-५८)


समाधिकालमें वसिष्ठजीके द्वारा अनन्त चेतनाकाशमें असंख्य ब्रह्माण्डोंका अवलोकन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघवेन्द्र! तदनन्तर, (सौ वर्षोंके पश्चात्) मैं ध्यानसे जगा—समाधिसे विरत हुआ। उस समय वहाँ मुझे एक मधुर ध्वनि सुनायी दी, जो बडी मनोरम थी; परंतु उसके पद और अक्षर अधिक स्पष्ट नहीं थे। वह ध्वनि पदार्थ और वाक्यार्थ-का बोध करानेमें समर्थ नहीं थी। किसी नारीके कण्ठसे निकली हुई वाणीके समान उसमें स्वाभाविक कोमलता और मधुरता थी, स्वरमें काफी लोच था, उच्चस्वरसे उच्चारित न होनेके कारण उस ध्वनिमें गम्भीरता (दूरसे सुनायी देनेकी योग्यता) नहीं थी। इस प्रकार उसके विषयमें मैने कुछ कालतक तर्क-वितर्क किया, वह आवाज ऐसी लगती थी, मानो भ्रमरोंका गुंजारव हो रहा हो, तन्त्रीके तार झंकृत होने लगे हों। वह न तो किसी बालकका रोदन था और न द्विजबालकके वेदाध्ययनका स्वर ही। कमलकोषमें गुंजारव करनेवाले भ्रमरकी ध्वनि-से वह आवाज मिलती-जुलती थी। उस शब्दको सुन-कर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मै दसों दिशाओंमें दृष्टि फैलाकर वह शब्द करनेवाले प्राणियोंका अन्वेषण करने लगा। उस समय वहाँ मेरे हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ—'अहो! आकाशका यह भाग लाखों योजनकी दूरी लाँघकर बहुत ऊँचाईपर स्थित है। जिन मागोंसे सिद्ध पुरुष ही विचरण करते हैं, उनसे भी शून्य यह प्रदेश है। इसलिये इस एकान्त स्थानमें ऐसे शब्दकी उत्पत्ति कहाँसे हो रही है? मै यत्नपूर्वक दृष्टिपात करने-पर भी शब्द करनेवालेको नहीं देख रहा हूँ। मेरे सामने यह जो अनन्त निर्मल आकाश है, सब ओरसे सूना-ही-सूना दीख रहा है। प्रयत्नपूर्वक देखनेपर भी यहाँ मुझे कोई प्राणी नहीं दीखता है। अच्छा तो मै अपने इस देहाकाशको ध्यानके द्वारा यहीं ज्यों-का-त्यों स्थापित करके चेतनाकाशस्वरूप होकर अव्याकृत आकाशके

४७- पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्‌की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्‌में जानेके लिये प्रेरित करना

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन * ५३३

साथ उसी तरह एक हो जाता हूँ, जैसे जलबिंदु साधारण जलके साथ मिलकर एकरूप बन जाता है।' यों सोचकर मैं इस शरीरका त्याग करनेके लिये पद्मासनसे बैठ गया और समाधि लगानेके लिये मैंने पुनः अपनी आँखें बंद कर लीं। तदनन्तर इन्द्रिय-सम्बन्धी बाह्य विषयोंका तथा आन्तरिक विषयोंका भी स्पर्श त्याग-कर मैं एकमात्र संकल्परूप चित्ताकाश बन गया । इसके बाद क्रमशः उस चित्ताकाशको भी त्यागकर मैं बुद्धितत्त्वके स्थानमें पहुँच गया। फिर उसे भी छोड़कर चेतनाकाशमय अपने वास्तविक स्वरूपमें पहुँच गया।

फिर तो चैतन्यमय महाकाशके साथ एक होकर मैं असीम और सर्वव्यापी बन गया। निराकार और निराधार रहकर समस्त पदार्थोंका आधार बन गया। तब वहाँ मुझे झुंड-के-झुंड त्रैलोक्य, सैकड़ों संसार तथा लाखों या असंख्य ब्रह्माण्ड दिखायी देने लगे। वे सब ब्रह्माण्ड मायामय निर्मल आकाशमात्र रूपवाले थे। अतः वे परस्पर एक दूसरेकी दृष्टिमें नहीं आते थे। वे नाना प्रकारके आचार-विचारोंसे सम्पन्न थे; परंतु एक दूसरेके लिये शून्यरूप ही थे। परम चेतन आकाशके कोषमें स्थित हुए वे सब लोक शून्यतारूप ही थे, सत्य नहीं थे। कबसे उनकी सृष्टि हुई थी, यह किसीको ज्ञात नहीं था। वे सब-के-सब अज्ञानरूप दोषसे युक्त चिन्मय परमात्मामें अनादिकालसे ही कल्पित थे। चैतन्यके चमत्कारसे चमत्कृत चेतनाकाशमें सैकड़ों समुद्र, सूर्य, आकाश तथा मेरु आदि पर्वतोंसे युक्त खम्भेके समान वे लोक भासित होते थे तथा रजोगुण और तमोगुणसे कलुषित जान पड़ते थे। गन्धर्वनगरमें कारणादिके न होनेसे कारणरहित पृथ्वी आदिका अनुभव तो भ्रममात्र ही था। अतः ब्रह्मरूप अधिष्ठानकी सत्ता लेकर ही वे सब जगत् विद्यमान थे। उस अधिष्ठान सत्ताको न लेकर तो वे स्वरूपतः विद्यमान नहीं ही थे। मृगतृष्णाके जल-प्रवाह तथा आकाशकी नीलिमाके समान वे केवल भ्रमरूप अनुभवसे ही उत्पन्न हुए थे। अतः स्वरूपतः सत्य नहीं थे। परंतु सत्यरूप अधिष्ठानकी सत्तासे सत्य जान पड़ते थे। परब्रह्मरूपी गूलरके वृक्षमें भाँति-भाँति-विचित्र रसोंसे परिपूर्ण ब्रह्माण्डरूपी फल लगे थे, जो हवाके झोंकोंसे झूम रहे थे। देवता, असुर और मनुष्य आदि प्राणी उन फलोंके भीतर जन्तुओंके समान प्रतीत होते थे। तुम, मैं और यह आदि अभिमानपूर्ण बुद्धिके द्वारा अत्यन्त दृढ़ बनाये गये वे सब लोक गीली मिट्टीद्वारा बने हुए उन खिलौनोंके समान जान पड़ते थे, जो सूर्यकी किरणोंसे सूखकर कड़े हो गये हों।

वास्तवमें वे जगत् परमार्थ चैतन्यरूप ही थे, तथापि उससे भिन्नके समान प्रतीत होते थे। उन्मत्त होनेपर भी प्राप्त-से जान पड़ते थे तथा सदा असत् होकर भी सद्रूप-से भासित होते थे। परमात्मारूपी मूँगेके तिनकेके भीतर वे केवल आभासरूप थे और वायुके स्पन्दनकी भाँति स्वतः उत्पन्न हुए थे। श्रीराम ! उस समाधिकालमें मैंने अनन्त चेतनाकाशके भीतर अकारण ही उत्पन्न एवं विनष्ट होनेवाले बहुत-से लोक देखे, जो तिमिर रोग (रतौंधी) से युक्त आँखोंवाले पुरुषके द्वारा देखे गये भ्रममात्र ही सिद्ध होते थे। (सर्ग ५९)


श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन और उनकी उपेक्षा करके अनेक विचित्र जगत्का दर्शन करना तथा महाप्रलयके समय सब जीवोंके प्रकृति-लीन हो जानेपर पुनः किसको सृष्टिका ज्ञान होता है, श्रीरामके इस प्रश्नका उत्तर देना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उपर्युक्त रूपसे पूर्वोक्त शब्दके कारणका विचार करता हुआ मैं आवरणरहित चेतनाकाशरूप होकर थोड़ी देर तक इधर-उधर भ्रमण करता रहा। इसके बाद देखा कि

सं० यो० व० अं० २०—

४८- पाषाण-शिलाके भीतर बसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन तथा ब्रह्माके सङ्कल्पके उपसंहारसे सम्पूर्ण जगत्‌का संहार क्यों होता है, इसका विवेचन

५७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

ध्वनिके समान वह शब्द मेरे कानोंमें पडा। क्रमशः उसके पद स्पष्ट होने लगे। फिर मुझे यह मालूम हुआ कि किसीके द्वारा आर्या छन्दका पद गाया जा रहा है। फिर जहाँसे वह शब्द प्रकट हो रहा था उस स्थानपर दृष्टि पडी। वहाँ मुझे एक स्त्री दिखायी दी, जो दूर नहीं थी। वह सुवर्ण-द्रवके समान गौरकान्तिसे आकाशमण्डलको प्रकाशित कर रही थी। उसके गलेके हार तथा शरीरके वस्त्र कुछ-कुछ हिल रहे थे। उसके नेत्रप्रान्त अलकावलियोसे किंचित् आवृत्त हो रहे थे। उसे देखकर ऐसा जान पडता था मानो दूसरी लक्ष्मी आ गयी हो। उसका मुखमण्डल पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था। वह जब हँसती थी, तब फूलोंके ढेर-से झरते जान पड़ते थे। आकाशका कोश ही उसके रहनेका घर था। उसका सौन्दर्य चन्द्रमाकी किरणोंको लज्जित कर रहा था। वह ऐसी जान पडती थी मानो मोतियोंके समूहसे उसका निर्माण हुआ हो। वह कमनीय कान्तिमती नारी मेरा अनुसरण करनेके लिये उद्यत जान पड़ती थी। मेरे पास खडी हो मधुर मुस्कान और उत्तम भाव-विलास-से सुशोभित वह मनोहारिणी स्त्री मधुर स्वरसे कोमल वाणीमें इस आर्या छन्दका पाठ करने लगी,—

असदुचितरिक्तचेतन-
संसृतिसरिति प्रमुह्यमानानाम्।
अवलम्बनतटविटपिन-
मभिनौमि भवन्तमेव मुने॥

‘मुने! आपका अन्तःकरण उन राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दोषोंसे सर्वथा शून्य है, जो असत्पुरुषोंके ही हृदयमें रहने योग्य हैं। आप संसार-सरितामें डूबकर मोहित होनेवाले प्राणियोंके आश्रयभूत तटवर्ती वृक्ष हैं; अतः मै सब ओरसे आपकी ही स्तुति करती हूँ।’

श्रीराम! यह सुनकर मैने उस मनोहर मुख एवं मधुर स्वरवाली स्त्रीकी ओर देखा और यह सोचकर कि ‘यह तो स्त्री है, इससे मेरा क्या प्रयोजन है?’ उसकी अवहेलना करके मै आगे बढ़ गया। तदनन्तर लोकसमूहोंसे युक्त माया दिखायी दी, उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। फिर उसका भी अनादर करके मै आकाशमें विचरण करनेको उद्यत हुआ। इसके बाद मैने आकाशमें स्थित हुई जगन्मायाका निरीक्षण करनेके लिये चिन्मयाकाशरूपसे ज्यों ही चेष्टा की, त्यों.ही वे सारे-के-सारे उग्र जगत् उसी तरह शून्यरूप हो गये जैसे स्वप्न, संकल्प (मनोराज्य) तथा कहानीमें वर्णित जगत् शून्यरूप होते हैं। इस प्रकार बताये गये वे सभी लोक होनेवाले प्रलयकालके दृश्यको वैसे ही नहीं जान पाते हैं, जैसे एक ही घरमें सोये हुए अनेक पुरुष एक दूसरेके स्वप्नमें होनेवाले रण-कोलाहलको नहीं सुनते हैं। श्रीराम! चेतनमें ही सब कुछ है, चेतनसे ही सब कुछ है, चेतन ही सब कुछ है और चारो ओरसे चेतन-ही-चेतन है। सारी सत्ता चिन्मय तथा सद् रूप ही है। यही मैने वहाँ पूर्णरूपसे देखा।* यह जो दृश्योंका दर्शन होता है, वह भ्रममात्र


* चिति सर्वं चितः सर्वं चित्सर्वं सर्वतश्च चित्।
चित्सर्वात्मिकेत्येतद् दृष्टं तत्र मयाखिलम्॥
(नि० प्र० उ० ६०। २३)

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * वसिष्ठजीद्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगत्तोंकी अभिन्नताका कथन * ५३०


है। आकाशमें प्रतीत होनेवाले वृक्षकी मञ्जरी है। सब कुछ चेतनाकाशका स्वरूप ही है। इस बातका मुझे वहाँ अनुभव हुआ। समष्टि बुद्धिरूप आकाशके साथ एकरूप होकर व्यापक, अनन्त एवं बोधरूप हुए मैंने इसका अनुभव किया। सम्पूर्ण जगत्का यह मायाजाल ब्रह्माकाशरूप ही है, दसों दिशाएँ ब्रह्माकाश ही हैं तथा काल, कला, देश, द्रव्य और क्रिया आदि भी ब्रह्माकाशरूप ही हैं। जो सब प्रकारके नाम और रूपसे रहित, पाषाणकी प्रतिमाके समान मौन और ज्योति-स्वरूप है, वही परब्रह्म परमात्मा यत्किंचित् नाम-रूपात्मक होकर जगत् कहलाता है। वहाँ समाधि-कालमें ऐसे लाखों जगत् भी अनुभवमें आये थे, जिनमें चन्द्रमण्डल भी उष्ण थे और सूर्य भी शीतलताकी मूर्ति जान पड़ते थे। श्रीराम ! कोई जगत् गिर रहे थे, कितने ही आकाशमें उड़ रहे थे और बहुतेरे सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रान्तिपूर्ण पदोंमें प्रतिष्ठित थे। इस तरह चैतन्य समुद्रके चञ्चल बुद्बुदोंके रूपमें दिखायी देनेवाले उन असंख्य लोकोंमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो मैंने न देखी हो।

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! महाकल्पके विनाशकालमें जब समस्त भूतोंका समुदाय मूलप्रकृतिमें विलीन हो जाता है, तब पुनः किसको किस तरह सृष्टिका ज्ञान होता है?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीरामभद्र ! महाप्रलय-कालमें पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश—इन सम्पूर्ण विशेष पदार्थोंका विनाश हो जानेपर ब्रह्मासे लेकर स्थावरतकके सभी जीव-जगत् जब मूलप्रकृतिमें विलीन हो जाते हैं, तब पुनः जिस प्रकार इस जगत्‌का अनुभव होता है, वह बताता हूँ, सुनो। महाप्रलयके पश्चात् जो द्रष्टा शेष रहता है, वह शब्दादि व्यवहारमें प्रयोग करने योग्य नहीं होता। उसे मुनिजन परमार्थ चिन्मयघन कहते हैं। यह जगत् उसका हृदय है। अतः उससे भिन्न नहीं है। वही परमात्मदेव यह संकल्प करता है कि जगत् मेरा अपना स्वभाव और हृदय है। जगन्निश्चयरूपसे वह जगत्‌की सत्ता नहीं मानता है। इस प्रकार जब हम विचार करते हैं, तब जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं रहती। फिर क्या नष्ट होता है और क्या उत्पन्न। जैसे परम कारण परमात्मा अविनाशी है, वैसे ही उसका हृदय भी। महाकल्प आदि भी उसके अवयव ही हैं। अतः वे भी परमात्मासे भिन्न नहीं हैं। केवल अज्ञान ही यहाँ जगत् और परमात्मामें भेदकी प्रतीति कराता है, परंतु विचारपूर्वक देखा जाय तो उस अज्ञानका भी कहीं पता नहीं लगता है। अतः एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही सदा और सर्वत्र विराजमान हैं। जगत्, उसकी उत्पत्ति तथा विनाश सर्वथा मिथ्या कल्पना हैं। इसलिए कभी कहीं किसीका कुछ भी न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है। यह जो दृश्य जगत् है, वह सदा शान्त, अजन्मा, ब्रह्मरूपसे ही स्थित है। यह अनादि जगत्‌रूप कभी उत्पन्न नहीं हुआ है। यहाँ इस जगत्‌के रूपमें केवल ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही हैं। इस प्रकार विचारदृष्टिसे देखनेपर भ्रष्ट निर्धनोंके तुच्छ ऐश्वर्य भी तृणके समान निःसार ही सिद्ध होता है। ऐसा जानने-वाला अधिकारी पुरुष अपनेमें ब्रह्मभावका निश्चय करके अपने आत्मामें ही पूर्ण संतुष्ट रहता है। (सर्ग ६०-६१)


वसिष्ठजीके द्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगत्तोंकी अपनेसे अभिन्नताका कथन, आशंका दूर करनेवाली स्त्रीके कार्य तथा सम्भाषण आदिके विषयमें श्रीरामके प्रश्न और वसिष्ठजीके उत्तरका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! उस समय आपने पक्षियोंकी भाँति आकाशमें उड़ते हुए जो जगत्-समूहका अवलोकन किया था, वह क्या देखने योग्य भिन्न होता हुआ देखा था या सम्पूर्ण चिन्मयाकाशमात्र द्वैतरूपत्वसे ?

४९- ब्रह्मा और जगत्‌की एकताका स्थापन तथा द्वादश सूर्योंके उदयसे जगत्‌के प्रलयका रोमाञ्चकारी वर्णन

५७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! उस समय तो मैं सर्वव्यापी, अनन्तात्मा चिन्मयाकाशरूप हो गया था, उस अवस्थामें मेरा कहीं आना-जाना कैसे सम्भव हो सकता था ? न तो एक स्थानपर खड़े हुए पुरुषकी भाँति ही स्थित था और न गतिशील ही था, इस प्रकार परमात्म-स्वरूप चिदाकाशमें ही रहकर मैने अपने इस व्यापक शरीरके द्वारा यह सारा जगत्समूह देखा था । जैसे शरीरा-भिमानीके रूपमें स्थित होनेपर मै पैरसे लेकर मस्तक तकके अपने सभी अङ्गोंको देखता हूँ, उसी प्रकार मैंने इन चर्मचक्षुओंके बिना भी चिन्मय नेत्रसे सारे जगत्समुदाय-का अवलोकन किया था। इस विषयमें तुम्हारे लिये प्रमाण है, सपनेमें देखा हुआ संसार-विभ्रम; क्योंकि स्वप्नमें जो दृश्य अनुभूत होता है, वह चेतनाकाशरूप ही है, उसके सिवा दूसरा कुछ नहीं है । जैसे वृक्ष अपने पत्र, पुष्प और फल आदिको देखता है, वैसे ही मैंने भी अपने ज्ञानरूपी नेत्रसे सारे जगत्‌को देखा था । जैसे अवयवी अपने अवयवोंको अपनेमें ही अभिन्नरूपसे देखता है, उसी प्रकार मैंने इन समस्त सर्गोंको अपनेसे अभिन्न ही देखा और समझा था । श्रीराम ! बोधस्वरूप परमात्माके साथ एकताको प्राप्त हुआ मैं आज इस समय भी उन विविध सर्गोंको शरीर, आकाश, पर्वत, जल और स्थलको भी उसी तरह देख रहा हूँ ।

श्रीरामजीने पूछा-ब्रह्मन् ! कमलनयन ! आप जब इस प्रकार अनुभव कर रहे थे, तब आर्याछन्दका पाठ करने-वाली उस कान्तिमती नारीने क्या किया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वह भी चिन्मयाकाशरूप-से ही आकाशमें मेरे समीप विनयपूर्वक खड़ी थी और उसी आर्याछन्दका पाठ कर रही थी । उस समय वह देवाङ्गना-सी जान पड़ती थी। जैसे मेरा शरीर चिन्मयाकाशमय था, उसी प्रकार उसका भी था । मैंने उस पूर्वशरीरसे वैसी ललना कभी नहीं देखी थी । मेरा शरीर चेतन-आकाश-मात्र था, वह भी चेतनाकाशमय रूप धारण किये हुए थी और सारा जगज्जाल भी उस समय वहाँ चिन्मयाकाशरूप-से ही स्थित था ।

श्रीरामजीने पूछा-भगवन् ! शरीरमें स्थित जीभ, तालु, ओठ तथा प्राणोंके प्रयत्नोंसे उत्पन्न हुए वर्णोंद्वारा जो वाक्य सम्पन्न होता है, वह आकाश-शरीरधारिणी उस स्त्रीके मुखसे कैसे प्रकट हुआ ? विशुद्ध चेतनाकाशरूप आत्माओंको रूपका दर्शन और आभ्यन्तर मनका अनुभव होना कैसे सम्भव है ? उस समय आपने जो जगत्‌के दर्शन और सम्भाषण आदि व्यवहार किये थे, उनकी सङ्गति कैसे लगती है ? आप इस विषयमें अपना यथार्थ निश्चय बताइये ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे स्वप्नमें चिन्मयाकाश आत्मा ही बाह्य तथा आभ्यन्तर पदार्थोंके रूपसे प्रकट होता है वैसे ही मेरे उस समाधिकालमें भी यह सारा दृश्य प्रपञ्च चिन्मयाकाशरूपसे ही स्थित था। केवल वही दृश्य चिन्मयाकाशरूप रहा हो, ऐसी बात नहीं है, किंतु ये जितने पदार्थ हमलोगोंकी बुद्धिके विषय हैं, ये सब-के-सब तथा यह सारा संसार भी स्वच्छ चिन्मयाकाशरूप ही है । हमारे लिये जैसा वह था, वैसा ही सारा जगत् है । जैसे स्वप्नमें पृथ्वीपर खेती आदिके रास्तोंपर आने-जाने-के तथा पर्वत-प्रासाद आदिके ऊपर शयन आदिके जो व्यवहार होते हैं, वे सब चिदाकाशरूप ही हैं, उसी तरह उस समय 'मैं', 'तुम', 'वह स्त्री' तथा 'वह' और 'यह' सब कुछ चिदाकाशरूप ही था । रघुनन्दन ! तदनन्तर जैसे स्वप्नमें स्वप्नगत मनुष्योंके साथ व्यवहारकार्य चलता है, उस समय उस स्त्रीके साथ मेरा वार्तालाप-व्यवहार भी उसी तरह आरम्भ हुआ । जैसे वह स्वप्न-सदृश व्यवहार चिदाकाशरूप ही था, उसी प्रकार तुम मुझको, इस आत्माको तथा जगत्‌को भी चिदाकाशरूप ही समझो ।

( सर्ग ६२ )

[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * स्वप्नजगत्‌की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन * ५७३

स्वप्नजगत्‌की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा-मुने ! मुख, जीभ आदि अवयवोंसे रहित एकमात्र संकल्परूप देहसे आपका उस स्त्रीके साथ सम्भाषण आदि व्यवहार कैसे हुआ ? उस दशामें आपने क च ट त प आदि वर्णोंका कैसे उच्चारण किया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा- श्रीराम ! चिदाकाशस्वरूप तत्त्वज्ञानियोंके संकल्पमय देहवाले मुखसे क च ट त प आदि वर्णोंका किसी कालमें भी वैसे ही उच्चारण नहीं होता, जैसे मृतकोंके मुखसे कोई अक्षर नहीं निकलता है । ( स्वप्नकी भाँति ही वहाँ भी हुआ । )

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा- भगवन् ! जब यह जगत् स्वप्नरूप ही है, तब जाग्रत्-रूपसे कैसे स्थित है ? तथा असत्य होकर ही यह सत्य-सा कैसे हो गया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा- श्रीराम ! यह सब जगत् कैसे स्वप्नमय ही है, यह सुनो- स्वप्नके समान ही ये जगत् न तो आत्मासे भिन्नरूप हैं, न आत्माके समान सत्यरूप हैं और न स्थिर ही हैं । ये सब-के-सब एकमात्र अनिर्वचनीय आत्मसत्तासे स्थित हैं । वे सब जगत् एक-दूसरेको किंचिन्मात्र भी नहीं देख पाते तथा कोठीके भीतर रखे गये जड बीजोंकी एक राशिकी तरह भीतर-ही-भीतर सड़-गलकर नष्ट भी हो जाते हैं । नष्ट होकर भी वे चेतन-रूप ही रहते हैं, सर्वथा शून्य नहीं हो जाते । वे आपसमें एक-दूसरेको नहीं जानते । अज्ञानसे उनका चेतना-रूप ढक जानेके कारण निरन्तर सोये हुएके सदृश स्वप्नका अनुभव करते हैं । सोये हुए स्वप्नरूप जगज्जालकी व्यवस्थाके अनुसार व्यवहार करनेवाले जो राक्षस स्वप्नमें स्वप्नगत देवताओंद्वारा मारे गये, वे अब भी उसी स्वप्नमें स्थित हैं । श्रीराम ! बताओ तो सही, इस तरह जो स्वप्नमें मारे गये, वे क्या करते हैं ? अज्ञानके कारण मुक्त नहीं हुए तथा चेतन होनेके कारण पत्थरके सदृश भी स्थित न रहे । वे लोग पर्वत, सागर, पृथ्वी तथा अनेक जीव-जन्तुओंसे भरे इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चको चिरकाल-तक उसी तरह अनुभव करते हैं जैसे हमलोग ( इसीलिये उनका अपना-अपना स्वप्न चिरकालकी अनुवृत्तिसे हमलोगोंके अनुभवकी तरह जाग्रदवस्थारूप ही हो जाता है । ) उनके कल्प और जगत्की स्थिति भी वैसी ही है, जैसी हमलोगोंकी है और हमलोगोंके जगत्की स्थिति भी वैसी ही है जैसी उन लोगोंकी है । उनके स्वप्नके वे पुरुष अपने तथा अन्य पुरुषके भी अनुभवसे सत्य ही हैं; क्योंकि अपनी तथा दूसरेकी सत्ताका निमित्तभूत जो अधिष्ठानस्वरूप चेतन है, वह सर्वव्यापी होनेके कारण सत्य एवं सम है । जैसे आत्मामें वे स्वप्नके पुरुष सत्य हैं, वैसे ही दूसरे पुरुष भी, जिनका प्रत्येक स्वप्नमें मुझे अनुभव होता है, वे सत्य ही हैं । तुमने अपने स्वप्नमें जो अनेक नगर तथा नागरिक देखे थे, वे सब वैसे ही अब भी स्थित हैं; क्योंकि सर्वव्यापी ब्रह्म सर्वस्वरूप है । भीतमें, आकाशमें, पाषाणमें, जलमें और स्थलमें सर्वत्र भिन्न-भिन्न पदार्थोंके अंदर चिन्मात्र परमात्मा ही विराजमान है । वही सम्पूर्ण विश्वरूपसे स्थित है; अतः चिन्मात्र परमात्माके सर्वव्यापी होनेसे जहाँ तहाँ सर्वत्र ही जगत् हैं । इनकी संख्या यहाँ कैसे बतलायी जा सकती है ! तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टिमें वह सारा जगत् परब्रह्म ही हैं; परंतु अज्ञानियोंके मनमें दृश्य-प्रपञ्चरूपसे स्थित हैं ।

( सर्ग ६३ )


५०- प्रलयकालके मेघोंद्वारा भयानक वृष्टि होनेसे एकार्णवकी वृद्धि तथा प्रलयाग्निका बुझ जाना

५७८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन, अपनी युवावस्थाके व्यर्थ बीतनेका उल्लेख

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर मैंने उस सुन्दरी ललनासे, जिसके नेत्र नील कमल-से विकसित, खिले हुए मालती-पुष्पके समान शोभा पाते थे, उसकी ओर देखकर कौतुकपूर्वक पूछा—'कमलपुष्पके भीतरी भाग—केसरकी-सी सुनहरी कान्तिवाली सुन्दरी ! तुम कौन हो ? मेरे पास किसलिये आयी हो ? किसकी पुत्री या पत्नी हो ? क्या चाहती हो ? कहाँ गयी थी ? और कहाँकी रहनेवाली हो ?'

विद्याधरीने कहा—मुने ! मैं अपना वृत्तान्त ठीक-ठीक बतला रही हूँ, सुनिये । यद्यपि परायी स्त्रीके साथ एकान्तमें वार्तालाप करना उचित नहीं है तथापि मैं बड़े कष्टमें हूँ और संकटसे छुटकारा पानेके हेतु प्रार्थना करनेके लिये आयी हूँ; अतः आप करुणावश मुझसे बिना किसी हिचकके मेरा समाचार पूछ सकते हैं। महर्षे ! परमोत्कृष्ट चिन्मय आकाशके किसी छोटे-से कोनेमें आपका यह आश्रमरूपी विलक्षण संसार बसा हुआ है । इसमें पाताल, भूतल और स्वर्ग—ये तीन प्रकोष्ठ ( बड़े-बड़े आँगन ) हैं । वहाँ हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आकारमें स्थित हुई मायाने कल्पना नामक एक कुमारी-( गृह-स्वामिनी ) का निर्माण किया है। इन तीनोंमें जो भूतल है, वह कंगनकी-सी आकृतिवाले द्वीपों और समुद्रोंसे घिरा हुआ है; अतः उनके रंगोंसे अनुरञ्जित हो ताम्रवर्णका दिखायी देता है; साथ ही कुछ ऊँचा भी है । इस प्रकार यह भूतल उपर्युक्त कंगनसे विभूषित जगल्लक्ष्मीकी कलाईके समान जान पड़ता है । द्वीपों और समुद्रोंके अन्तमें चारों ओरसे दस हजार योजनोंतक सुवर्णमयी भूमि स्थित है । उसके अन्तिम छोरपर लोकालोक नामसे विख्यात पर्वत है, जो जगल्लक्ष्मीकी ऊँची कलाईके समान शोभा पानेवाले इस भूपीठको कंगनके समान चारों ओरसे घेरे हुए है । उस लोकालोक पर्वतके शिखरोंपर रत्नमयी बड़ी-बड़ी शिलाएँ हैं, जो आकाशके समान निर्मल हैं । उन शिलाओंके बीचमें लोकालोक पर्वतके उत्तर भागमें उसके पूर्ववर्ती शिखरकी जो एक शिला है, उसके भीतर मैं निवास करती हूँ । उस शिलाका त्वचा-भाग कभी क्षीण न होनेवाले वज्रसार मणिके समान कठोर है। विधाताने मुझे वहाँ बाँध रखा है और इस प्रकार विवश होकर मैं उस प्रस्तर-यन्त्रमें वास कर रही हूँ । मुने ! मैं समझती हूँ कि उस शिलामें रहते हुए मेरे असंख्य युग बीत गये । केवल मैं ही नहीं बँधी हूँ, मेरे पतिदेव भी उसके भीतर वैसे

५१- बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन .. ५७१


ही बँधे हैं, जैसे सायंकालिक कमलकोशमें भ्रमर बँध जाता है। उस शिलाके कोटरमें, उसके संकीर्ण स्थानमें पतिके साथ रहकर मैने दीर्घकालतक सुख-दुःखका अनुभव किया है और इस अनुभवमें मेरे असंख्य वर्ष-समूह बीत गये हैं; किंतु अभीतक हम दोनों अपने एकमात्र दोष (कामना) के कारण मोक्ष नहीं पा रहे हैं। उसी तरह परस्पर ममता बाँधे हम दीर्घकालसे वहीं रहते हैं।

मुनीश्वर ! उस पाषाणके संकटमें केवल हमीं दोनों नहीं बँधे हैं, हमारा सारा परिवार भी वहीं बँधा पड़ा है। उसमें बँधे हुए मेरे पति ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न हुए हैं और प्राचीन कालके वृद्ध पुरुष हैं। यद्यपि वे सैकड़ों वर्षोंसे जी रहे हैं तथापि एक स्थानसे दूसरे स्थानतक चल नहीं सकते। वे बचपनसे ही ब्रह्मचारी हैं। वेदाध्ययनमें तत्पर रहते और छात्रोंको पढ़ाते हैं, किंतु आलसी हैं। एकान्त स्थानमें अकेले ही बैठे रहते हैं। उनके बर्तावमें कुटिलता नहीं है। वे चपलतासे कोसों दूर रहते हैं। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! मैं उन्हींकी भार्या हूँ; किंतु मुझमे एक व्यसन है। मैं उन पतिदेवके बिना पलभर भी देह धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ। ब्रह्मन् ! मेरे पतिने मुझे पत्नीरूपमें किस प्रकार प्राप्त किया और हम दोनोंका यह स्वाभाविक स्नेह परस्पर किस प्रकार बढ़ा, यह बताती हूँ, सुनिये।

पहलेकी बात है, मेरे पतिने जन्मके पश्चात् बाल्यावस्थामें ही किंचित् ज्ञान प्राप्त कर लिया और एक सत्पुरुषकी भाँति अपने निर्मल गृहमें वे रहने लगे। उन दिनों उन्होंने विचार किया कि मैं वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहनेवाला ब्राह्मण हूँ। मुझे अपने ही अनुरूप ऐसी भार्या कहाँसे प्राप्त हो सकती है, जो उत्तम जन्मके कारण शोभा पा रही हो ? इस प्रकार चिरकालतक चिन्तन करके उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और स्वयं ही मेरे नाथने अनिन्द्य सौन्दर्यसे युक्त अङ्गवाली मुझ नारीको मान्त्रिक संकल्पसे प्रकट किया। मानो चन्द्रदेवने निर्मल चाँदनी प्रकट की हो। मनसे उत्पन्न होनेके कारण मैं उनकी मानसी भार्या हुई और जैसे वसंत ऋतुमें मन्दार वृक्षकी उत्तम एवं सुन्दरी मञ्जरी बढ़ती है, उसी प्रकार मैं भी बढ़ने लगी। मैं निरन्तर लीला-विलासमें ही निरत रहने लगी। मेरे नेत्र लीला-पूर्ण तिरछी चितवनसे देखने लगे। मुझे सदा गाना-बजाना ही प्रिय लगने लगा। भोगोंसे कभी मुझे तृप्ति नहीं होती थी। मेरा दिनोदिन भोगोंमें अनुराग बढ़ता गया। आदरणीय महर्षे ! मेरे पतिदेव दीर्घसूत्री और स्वाध्यायशील होनेके कारण तपस्यामें ही लगे रहे। उन्होंने किसी तरहकी भी अपेक्षा मनमें लेकर मेरे साथ अबतक विवाह नहीं किया। इसलिये यौवनसम्पन्न तरुणी भी मैं उन्हें प्राप्त न कर सकनेके कारण व्यसनकी आगसे उसी प्रकार जलने लगी, जैसे कोई कमलिनी आगसे झुलस रही हो। फूलोंकी वर्षासे हरी-भरी सारी उद्यान-भूमियाँ मेरे लिये तपी हुई बालुकाराशिसे आच्छादित सूनी मरुभूमियोंकी भाँति दाहक प्रतीत होने लगीं। जो पदार्थ सुन्दर, उचित, स्वादु और मनोहर हैं, उन्हें देखकर मेरी ये आँखें आँसुओंसे भर आतीं। मैं रमणीय स्थानमें रोती। जो स्थान न रम्य है न अरम्य—मध्यम कोटिका है, वहाँ मैं सौम्य हो जाती और जो असुन्दर स्थान है वहाँ मैं प्रसन्न रहती। न जाने मुझ दीना नारीकी ऐसी अवस्था कैसे हो गयी ? भगवन् ! इस प्रकार मेरे नवीन यौवनके बहुत-से दिन व्यर्थ बीत गये।

(सर्ग ६४)

५८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विद्याधरीका वैराग्य और अपने तथा पतिके लिये तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेके हेतु उसकी वसिष्ठ मुनिसे प्रार्थना

विद्याधरी बोली— मुने ! तदनन्तर जैसे शरत्काल बीतनेपर रसहीन हुए पल्लवोंकी लाली मिट जाती है, उसी प्रकार दीर्घकालके पश्चात् मेरा वह अनुराग वैराग्यके रूपमें परिणत हो गया। मैं सोचने लगी—'मेरा स्वामी बूढ़ा होनेके कारण एकान्तवासका रसिक, नीरस और स्नेहशून्य हो गया। यद्यपि उसकी बुद्धिमें कुटिलता नहीं है, तो भी वह मेरी ओरसे सदा मौन ही रहता है; अतः मैं समझती हूँ कि मेरे जीवनका कोई फल नहीं है, इसलिये अब इसे रखनेसे क्या लाभ। बचपनसे ही विधवा हो जाना अच्छा है, मर जाना भी अच्छा है अथवा रोगोंका आक्रमण तथा दूसरी-दूसरी विपत्तियोंका टूट पड़ना भी अच्छा है; परंतु जिसका स्वभाव मनके अनुकूल न हो, ऐसे पतिका मिलना अच्छा नहीं। उसी स्त्रीका जीवन सफल है, जिसका पति सदा उसके अनुकूल चलता हो; वही धन-सम्पत्ति सार्थक है, जिसका साधु-पुरुष उपयोग करते हैं तथा वही बुद्धि, वही साधुता और वही समदर्शिता उत्तम है, जो मधुर एवं उदार है। यदि पति और पत्नी एक-दूसरेके प्रति पूर्ण अनुराग रखते हों तो उनके मनको आधि-व्याधियाँ, विपत्ति-समूह तथा दुर्भिक्ष लानेवाले उपद्रव भी कष्ट नहीं पहुँचा सकते। जिन स्त्रियोंके पति प्रतिकूल स्वभाववाले हों अथवा जो स्त्रियाँ विधवा हो गयी हों, उनके लिये फूलोंसे भरी हुई पुष्प-वाटिकाएँ तथा नन्दनवनकी भूमियाँ भी मरुभूमिके समान दुःखद हो जाती हैं। संसारके सारे पदार्थ स्त्रियोंद्वारा स्वेच्छानुसार त्याग दिये जाते हैं, परंतु वे किसी भी दशामें पतिको नहीं त्याग सकतीं।

मुनीश्वर ! अब मेरा वह पतिविषयक अनुराग वैसे ही विरागरूपमें परिणत हो गया है, जैसे पालेकी मारी या जलायी कमलिनीका राग क्रमशः नीरस हो जाता है। मुने ! अब मुझे समस्त पदार्थोंके प्रति वैराग्य हो गया है, इसलिये मैं इस समय आपके उपदेशसे अपनी मुक्ति चाहती हूँ। जिन्हें मनोवाञ्छित वस्तुओंकी प्राप्ति नहीं हुई, जिनकी बुद्धि परमात्मपदमें विश्राम न पा सकी तथा जो मरणतुल्य दुःखोंके प्रवाहमें बहे जा रहे हैं, ऐसे लोगोंके लिये जीनेकी अपेक्षा मर जाना अच्छा है। मेरे पतिदेव भी अब मोक्ष पानेके लिये ही दिन-रात चेष्टा करते रहते हैं। जैसे राजा किसी राजाकी सहायतासे दूसरे राजापर विजय पानेके लिये सचेष्ट होता है, इसी प्रकार मेरे पति भी मनके द्वारा ही मनको जीतनेके प्रयत्नमें सावधानीके साथ लगे हुए हैं। महान् ! आप मेरे उन पतिका और मेरा भी अज्ञान दूर करनेके लिये न्याययुक्त वाणीद्वारा उपदेश देकर आत्मतत्त्वका ज्ञान कराइये। जब मेरे पति मेरी उपेक्षा करके ही परमात्म-तत्त्वके चिन्तनमें लग गये, तब वैराग्यने मेरे लिये संसारकी स्थितिमें नीरसता पैदा कर दी।

मैं संसारकी वासनाके आवेशसे शून्य हूँ, इसलिये आकाशमें विचरनेकी शक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाली खेचरी मुद्रानामक तीव्र एवं अभीष्ट धारणाको बाँधकर सुस्थिरचित्त हो गयी हूँ। उक्त धारणाके द्वारा आकाशमें विचरनेकी शक्ति पाकर मैने पुनः दूसरी धारणाका अभ्यास किया, जो सिद्ध पुरुषोंका सङ्ग एवं उनके साथ सम्भाषणरूप फल देनेवाली है। (इसीलिये आज यहाँ आकर आपके साथ वार्तालाप करनेका सौभाग्य प्राप्त कर सकी।) तत्पश्चात् मैं अपने निवासभूत ब्रह्माण्डके

५२- ब्रह्मलोकवासियों तथा द्वादश सूर्योंका निर्वाण, अहंकाराभिमानी रुद्रदेवका आविर्भाव, उनके अवयवों तथा आयुधका विवेचन, उनके द्वारा एकार्णवके जलका पान तथा शून्य ब्रह्माण्डकी चेतनाकाशरूपताका प्रतिपादन

निर्वाण-प्रकरण उ०] ❖ श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोकपर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना ❖ ५८१


पूर्वापर भागघटित (नीचे-ऊपरके सम्पूर्ण) आकारको भलीभाँति देखनेकी इच्छासे तदाकार भावनामयी धारणा बाँधकर स्थित हुई। वह धारणा भी मेरे लिये सिद्ध हो गयी। फिर मैं अपने उस ब्रह्माण्डके अंदरकी सभी वस्तुओंको देखकर जब बाहर निकली, तब वह लोकालोक पर्वतकी स्थूल शिला मुझे दिखायी दी। मेरे पतिदेव केवल शुद्ध वेदार्थके एकान्तचिन्तनमें ही लगे रहते हैं। उनकी सारी एषणाएँ दूर हो चुकी हैं। वे न तो किसीका आना जानते हैं न जाना—उन्हें न तो भूतकालका पता रहता है, न वर्तमान और भविष्यका ही। अहो ! उनकी कैसी अद्भुत स्थिति है ? परन्तु वे मेरे पति विद्वान् होते हुए भी अबतक परमपदको प्राप्त न कर सके। अब वे और मैं दोनों ही परमपदको पानेकी इच्छा रखते हैं। ब्रह्मन् ! आपको हमारी यह प्रार्थना सफल करनी चाहिये; क्योंकि महापुरुषोंके पास आये हुए कोई भी याचक कभी विफलमनोरथ नहीं होते। दूसरोंको मान देनेवाले महर्षे ! मैं आकाशमण्डलमें सिद्ध-समूहोंके बीच सदा घूमती रहती हूँ; परंतु यहाँ आपके सिवा दूसरे किसी ऐसे महात्माको नहीं देखती जो अज्ञानके गहन वनको दग्ध करनेके लिये दावानलके तुल्य हो। ब्रह्मन् ! करुणासागर ! संत-महात्मा अकारण ही प्रार्थीजनोंकी मनोवाञ्छा पूर्ण किया करते हैं, इसलिये आपकी शरणमें आयी हुई मुझ अबलाका आप तिरस्कार न करें। तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर मुझे और मेरे पतिको कृतार्थ करें।

(सर्ग ६५)


श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोकपर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना, उस शिलामें उन्हें विद्याधरीकी बतायी हुई सृष्टिका दर्शन न होना, विद्याधरीका इसमें उनके अभ्यासाभावको कारण बताकर अभ्यासकी महिमाका वर्णन करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! ब्रह्माण्डके पूर्ववर्णित ऊर्ध्व आकाशमें संकल्पद्वारा कल्पित आसनपर बैठे हुए मैने, उसी आकाशमें कल्पित आसनपर स्थित हुई वह नारी जब मेरे पूछनेपर उपर्युक्त बातें कह चुकी, तब पुनः उससे प्रश्न किया—'बाले ! शिलाके पेटमें तुम-जैसे देहधारियोंकी स्थिति कैसे हो सकती है ? उसमें हिलना-डुलना कैसे होता होगा ? तथा तुमने वहाँ किस लिये घर बनाया ?'

विद्याधरी बोली—मुने ! जैसे आपलोगोंका यह संसार बहुत ही विस्तृतरूपसे प्रकाशित हो रहा है, उसी प्रकार उस शिलाके उदरमें सृष्टि और संसारसे युक्त हम-लोगोंका जगत् भी स्थित है। वहाँ भी यहाँकी भाँति ही देवता, असुर, गन्धर्व, पृथ्वी, पर्वत, पाताल, समुद्र, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब वस्तुएँ हैं।

मुने ! यदि आप मेरी बातको असम्भव समझते हों तो आइये, उस सृष्टिको अच्छी तरह देख लीजिये, मेरे साथ चलनेके लिये कृपा कीजिये; क्योंकि बड़े लोगोंको आश्चर्ययुक्त वस्तुएँ देखनेके लिये बड़ा कौतूहल होता है। रघुनन्दन ! तब मैने 'बहुत अच्छा' कहकर उसकी बात मान ली और शून्य (आकाश)-रूप हो, शून्यरूपधारिणी उस नारीके साथ शून्य आकाशमें उसी तरह उड़ना आरम्भ किया, जैसे आँधी या ववंडरके साथ फूलोंकी सुगन्ध उड़ती है। तदनन्तर दूरतकका रास्ता तय करनेके बाद आकाशकी शून्यताको लाँघकर मैं उस नारीके साथ

५८२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

आकाशवर्ती भूतसमुदायके पास जा पहुँचा। चिरकालके बाद आकाशमें प्राणियोंके संचारमार्गको पारकर मैं लोकालोक पर्वतके शिखरके ऊपर आकाशभागमें पहुँच गया, उस शिखरके पूर्वोत्तर भागमें स्थित चन्द्रतुल्य उज्ज्वल बादलके पीठभागसे नीचे उतरकर वह नारी मुझे उस ऊँची शिलाके पास ले गयी, जो तपाये हुए सुवर्णकी बनी जान पड़ती थी। मैंने उस शुभ्र शिलाको जब अच्छी तरह देखना आरम्भ किया, तब उसमें वह जगत् मुझे नहीं दिखायी दिया। केवल वह सुवर्णमयी शिला ही अग्निलोक (सुमेरु) के उच्चतम तटकी भाँति दृष्टिगोचर हुई। तब मैंने उस कान्तिमती नारीसे पूछा—'तुम्हारी वह सृष्टिभूमि कहाँ है? उस लोकके रुद्र, सूर्य, अग्नि और तारे आदि कहाँ हैं तथा भूर्भुवः आदि सातों भिन्न-भिन्न लोक कहाँ हैं? समुद्र, आकाश और दिशाएँ कहाँ हैं? प्राणियोंके जन्म और नाश कहाँ हो रहे हैं? बड़े-बड़े मेघोंकी घटाएँ कहाँ घिरी हुई हैं? ताराओंकी तड़क-भड़कसे युक्त आकाश यहाँ कहाँ दिखायी देता है? कहाँ हैं शैलशिखरोंकी वे श्रेणियाँ? कहाँ है महासागरोंकी पङ्क्तियाँ? कहाँ हैं मण्डलाकार सातों द्वीप और कहाँ है तपाये हुए सुवर्णके सदृश वह भूमि? कार्य और कारणकी कल्पनाएँ कहाँ हैं? भूतों और उनके भवनोंका भ्रम कहाँ हो रहा है? कहाँ हैं विद्याधर और गन्धर्व? कहाँ हैं मनुष्य, देवता और दानव तथा कहाँ हैं ऋषि, राजा और मुनि? नीति-अनीतिकी रीतियाँ कहाँ चलती हैं? हेमन्त ऋतुकी पाँच पहरवाली रातें यहाँ कहाँ हो रही हैं? स्वर्ग और नरकके भ्रम कहाँ हैं? पुण्य और पापकी गणना कहाँ हो रही है? कल्प और कालकी क्रीड़ाएँ कहाँ होती हैं? देवताओं और असुरोंमें कहाँ वैर देखे जाते हैं तथा द्वेष और स्नेहकी रीतियाँ कहाँ उपलब्ध होती हैं?' मेरे इस प्रकार पूछनेपर निर्मल नेत्रवाली उस सुन्दरीने आश्चर्यचकित दृष्टिसे मेरी ओर देखकर इस प्रकार कहा।

विद्याधरी बोली—सर्वस्वरूप ब्रह्मर्षे! मैं भी अब पहलेकी भाँति अपने उस सम्पूर्ण जगत्‌को तो इस शिलाके भीतर नहीं देख रही हूँ; परंतु मैंने जिन मनुष्य, गन्धर्व आदिका पहले वर्णन किया है, उन सबको दर्पणमें स्थित प्रतिबिम्बकी भाँति इस शिलामें प्रतिबिम्बित देखती हूँ। इस समय जो कुछ दीखता है, वह पहले देखे गये नगरसे भिन्न-सा है। मुने! मुझे जो उस जगत्‌का कुछ-कुछ दर्शन हो रहा है, उसमें नित्यका मेरा अनुभव ही कारण है। आपको यह अनुभव नहीं है, इसीलिये आपको उसका दर्शन नहीं हो रहा है। इसके सिवा चिरकालतक हमलोगोंमें जो यह एक अद्वैतकी चर्चा चलती रही है, उससे विशुद्ध आतिवाहिक (सूक्ष्म मनोमय) देहका विस्मरण हो गया है। इसके कारण भी आपको वह जगत् नहीं दीखता और मुझको स्फुटरूपसे उसका दर्शन होता है। मैंने चिरकालसे जिसका अत्यन्त अभ्यास किया था, मेरा वह जगत् भी आकाश-लताके समान अदृश्य हो गया है; क्योंकि मैं स्पष्टरूपसे उसे नहीं देख पा रही हूँ। जो संसार पहले मेरे लिये अत्यन्त प्रकट था, उसीको इस समय मैं दर्पणमें प्रतिबिम्बितकी भाँति अस्पष्टरूपसे देख रही हूँ। नाथ! हम दोनोंमें परस्पर दीर्घकालतक जो सम्भाषण हुआ, उससे अपने अत्यन्त विशुद्ध एवं व्यापक स्वास्थ्य

५३- रुद्रकी छायारूपिणी कालरात्रिके स्वरूप तथा ताण्डव-नृत्यका वर्णन

[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोक पर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना * ५८३


( धारणाभ्यास-जनित मनोमयदेहरूपता ) का विस्मरण हो गया। प्रभो ! जो अभ्यासजनित संस्कार शुद्ध चेतन आकाशके रससे उद्बुद्ध होकर प्रकाशित होता है, उसीके आकारका आन्तरिक चित्त भी हो जाता है। बाल्यावस्थासे लेकर अबतक वही वस्तुस्थिति देखी जाती है। भगवन् ! यह जो आपके साथ संवाद हुआ है, इसने अपने जगत्‌के निरन्तर अभ्यासके कारण पूर्व जगत्‌के भ्रमसे युक्त हुई मुझको निश्चय ही वशमें कर लिया। इसीलिये वह संस्कार लुप्त-सा हो गया। भूत और वर्तमानकालके दो धर्मोंमेंसे वर्तमानकालका भ्रम ही बलवान् होनेके कारण विजयी हुआ।

मैं एक पाषाण-शिलामें निवास करनेवाली अबला हूँ, बाला एवं आपकी शिष्या हूँ; फिर भी मैं तो इस शिलाके भीतर स्थित हुई सृष्टिको देखती हूँ और आप सर्वज्ञ होकर भी नहीं देखते। देखिये, यह अभ्यासका विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है। अभ्याससे अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी चूर्ण हो जाता है और बाण अपने महान् लक्ष्यको भी वेध डालता है। देखिये, यह अभ्यासकी प्रबलता कैसी है ? मुने ! अभ्याससे कटु पदार्थ भी मनको प्रिय लगने लगता है—अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्याससे ही किसीको नीम अच्छा लगता है और किसीको मधु। निकट रहनेका अभ्यास होनेपर जो भाई-बन्धु नहीं है, वह भी भाई-बन्धु ( आत्मीय ) बन जाता है और दूर रहनेके कारण बारंबार मिलनेका अभ्यास न होनेसे भाई-बन्धुओंका स्नेह भी घट जाता है। भावनाके अभ्याससे ही यह आतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणाके अभ्यासकी भावनासे पक्षियोंके समान आकाशमें उड़नेकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिये, अभ्यासकी कैसी महिमा है ! निरन्तर अभ्यास करनेसे दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध ( सुलभ ) हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने इष्ट वस्तुके लिये अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्योंमें अधम है। वह कभी उस वस्तुको नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वन्ध्या स्त्री अपने गर्भसे पुत्र नहीं पाती। जो नराधम अपनी अभीष्ट वस्तुके लिये अभ्यास ( बारंबार प्रयत्न ) नहीं करता, वह अनिष्ट वस्तुमें ही रत रहता है; इसलिये वह अनिष्टको ही प्राप्त होता है और एक नरकसे दूसरे नरकमें गिरता रहता है। जिससे संसार असार बन जाता है। पर विवेकका सेवन करनेवाले जो श्रेष्ठ पुरुष आत्म-विचार नामक अभ्यासको नहीं छोड़ते, वे निश्चय ही इस बढ़ी-चढ़ी विस्तृत माया-नदीको पार कर जाते हैं। इष्ट वस्तुके लिये किया गया चिरकालिक अभ्यासरूपी सूर्य प्रजाजनोंके समक्ष ऐसा प्रकाश फैलाता है, जिससे वे देहरूपी भूतलपर रहकर जन्म-मरण आदि सहस्रों अनर्थोंको पैदा करनेवाली इन्द्रियरूपिणी रात्रिको नहीं देखते। बारंबार किये जानेवाले प्रयत्नको अभ्यास कहते हैं, उसीका नाम पुरुषार्थ है। उसके बिना यहाँ कोई गति नहीं है। अपने विवेकसे उत्पन्न हुए दृढ़ अभ्यास नामक अपने कर्मको यत्न कहते हैं। उसीसे यहाँ सिद्धि प्राप्त होती है, और किसी उपायसे नहीं। इन्द्रियोंपर विजय पानेमें समर्थ वीरपुरुषके लिये अभ्यास-

५८४* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रूपी सूर्यके तपते रहनेपर भूमिमें, जलमें और आकाशमें भी ऐसी कोई अभिलषित वस्तु नहीं है, जो सिद्ध नहीं हो सकती। भूमण्डलमें तथा पर्वतकी समस्त निर्जन गुफाओंमें जितने भयके कारण हैं, वे सब अभ्यासशाली पुरुषके लिये अभयदायक बन जाते हैं।

(सर्ग ६६-६७)


श्रीवसिष्ठजीके द्वारा आतिवाहिक शरीरमें आधिभौतिकताके भ्रमका निराकरण

विद्याधरीने कहा—अतः मुने! अब हम दोनों निर्मल परमात्मामें सर्वबोधानुकूल समाधिरूप धारणा-द्वारा अपने प्राचीन आतिवाहिक भावका पुनः अभ्यास करें। ऐसा करनेसे ही इस शिलाके भीतरका जगत् प्रकट होगा।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! उस पर्वतपर विद्याधरीने जब यह युक्तियुक्त बात कही, तब मैं पद्मासन लगाकर बैठ गया और समाधिमें स्थित हो गया। उस समय सम्पूर्ण बाह्य पदार्थोंकी भावनाका त्याग हो जानेपर चिन्मात्रस्वरूप होकर मैंने उस पूर्वके अर्थकी—आधिभौतिक देहादिकी भावना एवं उसके संस्कार-मलका भी सर्वथा त्याग कर दिया। तत्पश्चात् चेतनाकाशरूपताको प्राप्त हो मैंने उसी तरह उत्तम दृष्टि प्राप्त कर ली, जैसे शरत्काल आनेपर आकाश निर्मलताको धारण कर लेता है। तदनन्तर सत्यस्वरूप परमात्माके शुद्ध ध्यानाभ्याससे मेरी देहमें आधिभौतिकताकी भ्रान्ति निश्चय ही दूर हो गयी तथा तत्काल ही उदय एवं अस्तसे रहित होनेपर भी नित्य उदित रहनेवाली और अत्यन्त निर्मल महाचेतनाकाशरूपता प्रकट-सी हो गयी। इसके बाद जब मैं साक्षीरूप अपने ही निर्मल तेजसे देखने लगा, तब वास्तवमें मुझे न तो वह आकाश दीख पड़ा और न वह पाषाणशिला ही कहीं दिखायी दी। सब कुछ केवल परमतत्त्वमय ही दृष्टिगोचर हुआ। मैंने स्वरूपबोधके पहले कभी जिसकी आकृति शिलामयी देखी थी, बोधके पश्चात् उसे स्वच्छ चिद्घन ब्रह्माकाशरूप ही देखा, पृथ्वी आदि विकारोंके रूपमें उस सद्-वस्तुको कहीं नहीं देखा। प्रिय श्रीराम! यह जो वर्तमान-कालका दृश्य-प्रपञ्च मनको प्रत्यक्ष दिखायी दे रहा है, यह आधिभौतिक देह आदिकी कल्पनाद्वारा अत्यन्त असद्रूपसे ही प्रकट हुआ है। अतः इसे तुम प्रत्यक्ष ही असत् समझो और उस योगिप्रत्यक्षको ही मुख्य प्रत्यक्ष जानो; क्योंकि उसमें सद्रूप परमात्माके यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार होता है। अहो! परमेश्वरकी माया कैसी विचित्र है, जिससे प्राक्-प्रत्यक्षमें (अर्थात् पहलेसे ही जो प्रत्यक्ष है, उस साक्षी चेतनमें) तो परोक्षताका निश्चय हो रहा है और इस परोक्ष मनमें प्रत्यक्षभावकी कल्पना आ गयी है। यद्यपि सुवर्णसे कड़ा बनता है—इसका सभीको अनुभव है, तथापि यह निश्चय है कि सुवर्ण कड़ा नहीं है। उसी प्रकार सूक्ष्मशरीरमें आधिभौतिकता नहीं है। यह जीव विचार न करनेके कारण भ्रमको यथार्थ और यथार्थको भ्रम समझ रहा है। अहो! यह कैसी मूढ़ता है। जै

५४- रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्मसत्ताकी ही स्फूर्तिका प्रतिपादन तथा सच्चिदानन्दघनका विलास ही रुद्रदेवका नृत्य है—इसका कथन

[निर्वाण-प्रकरण उ०] * विद्याधरीका पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना * ७८५

सीपीमें चाँदी, मृगतृष्णामें जल और एक चन्द्रमामें दो चन्द्रमाकी बुद्धि मिथ्या ही है, उसी प्रकार आतिवाहिक (सूक्ष्म) शरीरमें आधिभौतिकता (स्थूल-रूपता) की बुद्धि भी मायासे ही हो रही है, वह वास्तविक नहीं है। जो असत् है, उसे सत्य मान लिया गया है और जो सत्य है, उसे असत् समझ लिया गया है। अहो! जीवके अविचारसे उत्पन्न हुए इस मोहकी कैसी महिमा है! जो आदि प्रत्यक्ष (सूक्ष्मशरीर) को छोड़कर इस वर्तमान प्रत्यक्ष (स्थूलशरीर) में ही सत्यबुद्धि करके स्थित है। वह मानो मृगतृष्णाका जल पीकर तृप्तिका अनुभव करता हुआ सुखपूर्वक बैठा है।

विषयोंका जो सुख है, वह क्षणभङ्गुर है, इसका सबको बारंबार अनुभव होता है। इसलिये उस सुख-को दुःखरूप ही कहा गया है तथा जो नित्य, अनादि और अनन्त आत्मसुख है, उसीको वास्तविक सुख बताया गया है। अज्ञानीकी दृष्टिमे यह जगद्रूप भ्रान्ति ही सत्यरूपताको प्राप्त हो गयी है। मदिरा पीकर मतवाले हुए पुरुषको ये सुस्थिर वृक्ष और पर्वत ही नाचते-से प्रतीत होते है। जो योगियोंके प्रत्यक्ष अनुभवमें आये हुए, सर्वत्र अप्रतिहत, अद्वैत बोधरूप, पूर्णानन्दैकरस चित्-स्वरूप ब्रह्मकी सत्ता प्रत्यक्ष होनेपर भी दूसरे तुच्छ प्रत्यक्ष नेत्र आदि इन्द्रियोंसे दीखनेवाले रूप आदि विषयको सत्य मानकर उसका आश्रय लेते हैं, वे महान् मूर्ख हैं। अपने-आपको ही धोखा देनेवाले उस तृणतुल्य अधम पुरुषोंसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है।

(सर्ग ६८)


विद्याधरीका पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना और उन्हें समाधिसे जगाना, उनके और देवतादिके द्वारा वसिष्ठजीका स्वागत-सत्कार, वसिष्ठजीके पूछनेपर ब्रह्माजीका उन्हें अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना और उस कुमारी नारीको वासनाकी देवी बताना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! तदनन्तर अबाध चेष्टावाली वह विद्याधरी उस शिलाके भीतर स्थित हुई सृष्टिमें प्रविष्ट हुई। फिर मैं भी उसके साथ संकल्परूप होकर वहाँ जा पहुँचा। वह उद्यमशील तथा उत्कृष्ट शोभासे युक्त नारी उस जगत्‌के ब्रह्मलोकमें पहुँचकर ब्रह्माजीके सामने बैठ गयी और बोली—'मुनिश्रेष्ठ! यही मेरे पति हैं, जो मेरा पालन करते हैं। इन्होंने पूर्वकालमें मेरे साथ विवाह करनेके लिये अपने मनके द्वारा मुझे उत्पन्न किया था। ये पुरातन पुरुष हैं और मैं भी अब जरावस्थाको आ पहुँची हूँ। इन्होंने आजतक मेरे साथ विवाह नहीं किया; इसलिये मैं विरक्त हो गयी हूँ। इनको भी वैराग्य हो गया है। ये उस परम पदको प्राप्त करना चाहते हैं, जहाँ न कोई द्रष्टा है, न दृश्य है और न शून्य ही है। इसलिये मुनीश्वर! आप मुझको और इनको भी तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर उस परब्रह्म परमात्माके पथमें लगा दीजिये, जो वैज्ञानिक प्रपञ्चनरूप रहनेवाली सारी सृष्टियोके मूल कारण हैं।'

मुझसे ऐसा कहकर वह उन ब्रह्माजीको जगानेके लिये इस प्रकार बोली—'नाथ! ये मुनिनाथ वसिष्ठजी आज इस घरमें पधारे हैं। ये मुनि दूसरे ब्रह्माण्ड-रूपी घरमें रहनेवाले ब्रह्माजीके पुत्र हैं। प्रभो! गृहस्थके घरपर आये हुए अतिथिके योग्य पूजाद्वारा आप इन गृहागत महर्षिका पूजन कीजिये। समाधिसे उठिये और अर्घ्य, पाद्य देकर इन मुनीश्वरकी पूजा कीजिये; क्योंकि आप-जैसे महात्माओंको महापुरुषोंकी पूजासे प्राप्त होनेवाला महान् फल ही रुचता है।'

श्रीराम! उस विद्याधरीके ऐसा कहनेपर वे परम बुद्धिमान् ब्रह्माजी समाधिसे जाग उठे। नीतिके ज्ञाता उन विद्वान् ब्रह्माने धीरेसे अपनी आँखें खोलीं। मानो शिशिर ऋतुकी समाप्ति होनेपर वसन्त ऋतुने पृथ्वीपर

५५- शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन

५८६* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

उत्पन्न हुए दो फूलोंको विकसित कर दिया हो। उनके वे विभिन्न अङ्ग धीरे-धीरे अपनी-अपनी सजगता (ज्ञानयुक्त चेष्टा) प्रकट करने लगे, मानो वसन्त ऋतुके नूतन पल्लव नूतन रसकी अभिव्यक्ति कर रहे हों। तदनन्तर देवताओ, सिद्धो और अप्सराओके समुदाय चारो ओरसे वहाँ उसी तरह आ पहुँचे, जैसे प्रातःकाल विकसित कमलोंसे सुशोभित सरोवरमें झुंड-के-झुंड हंस आ गये हों। ब्रह्माजीने सामने खड़े हुए मुझको और उस विलासशालिनी विद्याधरीको देखा। देखकर वे प्रणवपूर्वक स्वरसहित उच्चरित होनेवाली सुन्दर वेदवाणीके समान मधुर वचन बोले—

उस दूसरे संसारके ब्रह्माजीने कहा—मुने ! आपने हाथपर रखे हुए आँवलेके समान इस असार संसारके सारतत्त्वको देख और जान लिया है। आप ज्ञानरूपी अमृतकी वर्षा करनेवाले महामेघ हैं। आपका स्वागत है। महर्षे ! इस समय आप इस अत्यन्त दूरवर्ती मार्गपर आ पहुँचे हैं। बहुत दूरका रास्ता तै करनेके कारण आप बहुत थक गये होगे। यह आसन है, इसपर बैठिये।

उनके ऐसा कहनेपर मैं बोला—'भगवन् ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।' ऐसा कहता हुआ मैं उनकी दृष्टिके संकेतसे दिखाये गये एक 'मणिमय पीठपर बैठ गया। फिर तो देवता, ऋषि, गन्धर्व, मुनि और विद्याधरोंद्वारा मेरी स्तुति की जाने लगी। इसके बाद पूजा, नमस्कार तथा अन्य समुचित नीतियुक्त व्यवहार सम्पादित हुए। दो घड़ीमें जब सम्पूर्ण भूतगणोंद्वारा किया गया प्रणाम-समारोह शान्त हुआ, तब उन ब्रह्माजीसे मैने कहा—'भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी ब्रह्मदेव ! यह क्या बात है कि यह नारी मेरे पास गयी और कहने लगी कि 'आप अपने ज्ञानोपदेशसे प्रयत्नपूर्वक हमें बोधकी प्राप्ति कराइये' देव ! आप तो सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा समस्त ज्ञानोंमें पारंगत हैं। जगत्पते ! बताइये, यह काममूढा स्त्री आपके विषयमें क्या कहती है । देव ! जब आपने इसे अपनी पत्नी बनानेके लिये ही उत्पन्न किया था तब फिर इसे उस पदपर क्यों नहीं प्रतिष्ठित किया, इसको वैराग्यकी ओर आप क्यों ले गये ?'

दूसरे जगत्के ब्रह्माजी बोले—मुने ! सुनिये, जैसी बात है, उसे आपके सामने ठीक-ठीक बता रहा हूँ; क्योंकि सत्पुरुषोंके सामने सब बातें यथार्थ और पूर्णरूपसे कहनी चाहिये। मुने ! वह जो शान्त, अजन्मा, अजर एवं अनिर्वचनीय परमार्थ सद्रूप ब्रह्म है, उसीको चेतन अथवा चित्त्तत्त्व कहते हैं। चैतन्य ही उसका एकमात्र स्वरूप है। उसी परमात्माने अपने स्वरूपभूत चैतन्यसे मुझे प्रकट किया है। मैं चिदाकाशरूप ही हूँ और सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता हूँ, जब सृष्टि उत्पन्न होकर यथावत् रूपसे स्थित हो जाती है, तब मेरा व्यावहारिक नाम स्वयम्भू होता है। वास्तवमें न तो मैं उत्पन्न होता हूँ और न कुछ देखता ही हूँ। मैं समस्त आवरणोंसे मुक्त रहकर चेतनाकाशरूप हो चेतनाकाशमें ही स्थित हूँ। यह जो आप मेरे सामने हैं और मैं आपके सामने हूँ तथा हमलोगोंमें जो यह परस्पर सम्भाषण हो रहा है, यह वैसा ही है, जैसे समुद्रमें एक तरङ्गके आगे दूसरी तरङ्ग हो और स्वयं समुद्र ही उन तरङ्गोके घात-प्रतिघातके रूपमें शब्द कर रहा हो। इस विषयमें मेरी ऐसी ही मान्यता है। इस प्रकार समुद्रसे तरङ्गोंकी कल्पनाके समान जिसने अपनी और दूसरेकी दृष्टिसे देखे जानेवाले भेदकी किंचित् कल्पना कर ली है तथा कालवशात् अपने स्वरूपको भी किंचित् भुला देनेके कारण जिसकी आकृति कुछ मलिन-सी हो गयी है, वह मैं चिदाभासमात्र ही हूँ। ऐसे रूपवाले मुझ ब्रह्माके अन्तःकरणमें जो ममता और अहंताकी वासना

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखताका वर्णन * ५८७

उदित हुई है, वह उस कुमारी स्त्रीसे भिन्न जो आप हैं, आपको अन्य-सी प्रतीत होती है और मुझे अनन्य-सी जान पड़ती है। वह वासना हम दोनोंकी दृष्टिसे उदित (प्रकट) भी है और अनुदित (अप्रकट) भी। वस्तुतः मैं अविनाशिनी सत्तावाला हूँ; क्योंकि कभी मेरी उत्पत्ति नहीं हुई है। मैं आत्मरूपसे अपने आपमें ही स्थित हूँ। स्वभावसे ही मैं अच्युत, अपने आत्मामें रमण करनेवाला तथा स्वयं ही सब कुछ करनेमें समर्थ हूँ। यह कुमारी स्त्रीके रूपमें जो सामने खड़ी है, वासनाकी अधिष्ठात्री देवी ही है। यह न तो मेरी गृहिणी हैं और न गृहिणी बनानेके निमित्त मैंने इसका सङ्कल्प ही किया है। अपनी वासनाके आवेशवश इसके मनमें यह भाव उत्पन्न हो गया कि 'मैं ब्रह्माजीकी पत्नी हूँ।' इस भावनाको लेकर यह स्वयं ही अत्यन्त दुःख उठा रही है और वह भी व्यर्थ। यही सारे जगत्‌के भीतर वासना बनकर बैठी हुई हैं। (सर्ग ६९)


पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्‌की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्‌में जानेके लिये प्रेरित करना

अन्य जगत्‌के ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! (मैने अपने संकल्पसे कल्पित दो परार्ध वर्षोंकी आयु बिता दी) अब चिदाकाशरूप मैं निरतिशयानन्दरूप, ब्रह्माकाशमयी परम कैवल्यरूपा स्थितिको प्राप्त करना चाहता हूँ, इसीसे यहाँ मेरी वासनाद्वारा रचे गये इस संसारमें नित्य, नैमित्तिक, दैनन्दिन और आत्यन्तिक ये चारो प्रकारके प्रलय उपस्थित हो गये हैं। मुनीश्वर ! इस महाप्रलयकालमें अब मैने इसे त्याग देने—इस वासनाका मूलोच्छेद करके इसे अपनी सत्तासे गिरा देनेके उद्योग- का निश्चित रूपसे आरम्भ कर दिया है, इसीसे यह विरसताको प्राप्त अर्थात् विनाशोन्मुख हो गयी है। जब मैं चित्ताकाशरूपताको त्यागकर आदि चेतनाकाशरूप महाकाश होने जा रहा हूँ, तब यहाँ महाप्रलयका आना और वासनाका विनाश होना अवश्यम्भावी है। यही कारण है कि यह विरस होकर मेरे मार्गकी ओर दौड रही है। भद्र, ऐसा कौन उदारबुद्धि प्राणी है, जो अपने जन्मदाताका अनुसरण न करता हो ? आज यहाँ चारो युगोंका विनाश उपस्थित है, अन्तिम कल्प, अन्तिम मन्वन्तर तथा अन्तिम कलियुगकी समाप्तिका समय आ गया है, इसलिये आज ही प्रजा, मनु, इन्द्र तथा देवताओंका यह अन्तकाल आ पहुँचा है। आज ही यह कल्पका अन्त, महाकल्पका अन्त, मेरी वासनाका अन्त और मेरे देहाकाश- का भी अन्त होनेवाला है। ब्रह्मन् ! इसीलिये यह वासना अब क्षीण होनेको उद्यत है, जब कमलोंसे भरा हुआ सरोवर ही सूख रहा हो, तब गन्धलेश कहाँ ठहर सकती है ? केवल अभिमान ही जिसका शरीर है, ऐसी इस वासनाको स्वभावतः स्वयं ही आत्मदर्शनकी इच्छा होती है। आत्मसाक्षात्कारके लिये किये गये धारणाभ्यास- रूप योगसे इसने अन्य ब्रह्माण्डमें जाकर वहाँ आपके जगत्‌का दर्शन किया, जहाँ धर्म आदि चारो वर्गोंके अनुष्ठानमें लगी हुई स्वतन्त्र प्रजा निवास करती है। आकाशमें विचरती हुई इस विद्याधरीने उसी सिद्धिकी सामर्थ्यसे लोकालोक पर्वतके शिखरकी शिला देखी, जो इसके अपने जगत्‌की आधारभूत है तथा हमारी दृष्टिमें केवल आकाशरूप ही है। जिस जगत्रूपी पर्वतपर यह जगत् है और जिसमे उसकी शिलारूपता है, उस तथा हमारे जगद्रूप पदार्थोंमें ऐसे-ऐसे अनेक दूसरे जगत् भी हैं। यह जगत्रूपी भ्रान्ति जिनकी समझमें आ गयी अर्थात् जिनकी दृष्टिमें यह चेतनाकाशके साथ एकरूपताको प्राप्त हो गयी, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते