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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

३३२ सात्वतसंहिता एवं विज्ञाप्य तत्पवित्रं ब्रह्मयाने वा समारोप्य वेदवाद्यघोषैः सह तीर्थसमीपं नीत्वा तत्र प्राङ्मुखमवरोप्य पवित्रमादाय वामकरतले भूमण्डलगतिमिव निधाय तन्मध्यं दक्षिणपाणिना गृहीत्वा तीर्थमध्येऽवतीर्य तेन सह स्नायादित्याह—एवमिति चतुर्भिः ॥ १९-२३ ॥ इस प्रकार परावर मन्त्रमूर्त्ति भगवान् से निवेदन कर उन्हें किसी पत्ते के पात्र में, अथवा किसी ब्रह्मयान में समारोपित कर वेद गान की ध्वनिपूर्वक शङ्ख बजाते हुए, माङ्गलिक जय-जयकार शब्द करते हुए, किसी तीर्थ स्थान में ले जाकर उसके तट पर उन्हें स्थापित करे। उस यान को पूर्वाभिमुख कर उसमें से उस पवित्रक को लेकर, अपने बायें हाथ पर भूमण्डल के समान स्थापित करे ॥ १९-२१ ॥ फिर अपने दाहिने हाथ से उन्हें मध्य भाग में ग्रहण कर जल में उतर कर उनके साथ ही डुबकी लगावे। (उसी समय वहाँ समस्त तीर्थ भी उनके साथ पहुँच जाते हैं) ॥ २२-२३ ॥ सन्निधिं तत्र तत्कालं प्रकुर्वन्त्यचिरात् तु वै ॥ २३ ॥ निःशेषाणि च तीर्थानि लोकत्रयगतानि च। मन्त्रात्मा यत्र रक्षार्थं क्षणमास्ते जलाशये ॥ २४ ॥ तत्रायतनतीर्थानां सर्वेषां स्यात् समागमः। किं पुनर्यत्र भगवान् मन्त्रमूर्तिरधोक्षजः ॥ २५ ॥ साधकाभ्यर्थितः स्नायात् सर्वानुग्रहया धिया। तत्काले तत्तीर्थे सर्वतीर्थसान्निध्यप्रभावमाह—सन्निधिमिति त्रिभिः ॥ २३-२६॥ जब मन्त्रात्मा प्रभु रक्षा के लिये, क्षण भर के लिये भी जलाशय में उपस्थित हो जाते हैं, तभी तीनों लोकों के समस्त तीर्थ उस जलाशय में पहुँच जाते हैं ॥ २३-२४ ॥ इस प्रकार उस जलाशय में समस्त आयतनों तथा समस्त तीर्थों का एकत्र समागम हो जाता है। जहाँ अधोक्षज भगवान् विष्णु मन्त्रमूर्त्ति रूप से विराज रहे हों वहाँ सभी तीर्थ आयतन क्यों न उपस्थित हो? ॥ २५ ॥ साधकों से अभ्यर्थित जो तीर्थ प्राप्त कर इस विधि से स्नान करता है वह तत्त्ववेत्ता है। सभी साधकों को इसी प्रकार सर्वानुग्रह बुद्धि से स्नान करना चाहिये ॥ २६ ॥ विद्वान् योऽनेन विधिना तीर्थमासाद्य तत्त्ववित् ॥ २६ ॥ स्नापयेद् बन्धुमित्रादीन् प्राप्नुवन्त्यचिराच्च ते। तैर्थं फलमनायासान्मन्त्रमूर्तेः प्रसादतः ॥ २७ ॥ एवं कूर्च्चद्वारा दूरदेशगतानां जनानामपि तीर्थस्नानं फलाधायकमित्याह—विद्वा-

पञ्चदशः परिच्छेदः ३३३ निति सार्धेन । बान्धवादीनामिति कर्मणि षष्ठी । ते बान्धवादय इत्यर्थः ॥ २६ - २७ ॥ जो विद्वान् इस प्रकार तीर्थ में आकर स्नान करता है वह तत्त्ववेत्ता साधक है । इसी प्रकार अपने सभी बन्धुओं और मित्रों को तीर्थ में स्नान कराना चाहिये । ऐसा करने से वे सभी बन्धु-बान्धव मन्त्रमूर्ति के कृपा प्रसाद से उस तीर्थ स्नान का फल अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं ॥ २६-२७ ॥ किन्तु तद्यानवादित्रवर्जितस्तु भवेद् विधिः । इमं विद्धि महाबुद्धे विशेषं चात्र कर्मणि ॥ २८ ॥ अत्र विशेषमाह—किन्त्विति । यानारोपणं मङ्गलवाद्यान्वितत्वं च भगवत एवा- र्हम्, नान्यस्येति भावः ॥ २८ ॥ किन्तु हे महाबुद्धे ! इस कर्म में यह एक विशेषता है कि तीर्थ स्नान में वाहन, बाजा आदि वर्जित रखे ॥ २८ ॥ सामान्यमविनाशं यच्चिन्मयं रूपमैश्वरम् । विशेषसंज्ञासम्बन्धं जीवहंसं विभाव्य तम् ॥ २९ ॥ पवित्रकं तदाकारं स्मृत्वा स्नाप्यस्ततोऽम्भसा । अस्य शरीरस्य भगवच्छरीरभूतत्वादेनमपि भगवदात्मकं स्मृत्वा पवित्रद्वारा स्नानं कारयेदित्याह—सामान्यमिति सार्धेन ॥ २९-३० ॥ उस पवित्रक में सामान्य अविनाशी सच्चिन्मय ऐश्वर स्वरूप विशेष संज्ञा सम्बन्ध वाले जीव रूप हंस की संभावना करे । इस प्रकार के आकार का ध्यान कर उसे जल में स्नान करावे ॥ २९-३० ॥ एवं तेनैव चान्येषां बहूनां बहुभिस्तु वा ॥ ३० ॥ सम्पाद्यं विष्टरैः स्नानं दूरस्थानां सदैव हि । तेनैकेनैव पवित्रेण बहूनां बान्धवादीनां यद्वा पृथक् पवित्रैः स्नानं कारयेदि- त्याह—एवमिति । दूरस्थानां ग्रामान्तरगतानां लोकान्तरगतानां वेत्यर्थः ॥ ३०-३१ ॥ इसी प्रकार उस पवित्रक के साथ अन्यों को अनेक लोगों के साथ स्नान करावे । फिर दूर के लोगों को भी स्नान करा कर भगवान् के स्नानान्तर के पश्चात् उन्हें विष्टर सम्पादन करे ॥ ३०-३१ ॥ सम्पन्ने स्नपने त्वेवं द्वितीयेऽह्नि महामते ॥ ३१ ॥ रथे कृत्वार्चिते तं वै प्रपूज्य च यथाविधि । यात्राख्यमुत्सवं कुर्यादन्नदानपुरस्सरम् ॥ ३२ ॥ सनृत्तगेयवादित्रं जागरणेन समन्वितम् । एकरात्रं द्विरात्रं वा त्रिरात्रं भक्तिपूर्वकम् ॥ ३३ ॥

३३४ सात्वतसंहिता एवमवभृथानन्तरं ब्रह्मरथे पवित्रस्थं देवमारोप्याभ्यर्च्य तदीयाराधनपूर्वकं ग्रामप्रादक्षिण्येने यात्रोत्सवं कुर्यादित्याह—सम्पन्न इति सार्द्धद्वाभ्याम् । उत्सवानन्तरं तद्रात्रौ जागरणं च कार्यमिति भावः । द्विरात्रं त्रिरात्रमावृत्तिरुत्सवस्यैव न तु स्नानस्य ॥ ३१-३३ ॥ हे महामते ! इस प्रकार स्नान सम्पन्न हो जाने पर दूसरे दिन रथ निर्माण कर, यथाविधि अर्चन पूजन कर, अन्नदान पुरः सर यात्रोत्सव करे । यह यात्रोत्सव वृत्त गेय वादित्र और जागरण पुरस्सर भक्तिपूर्वक एक रात, दो रात अथवा तीन रात तक निरन्तर होना चाहिये ॥ ३१-३३ ॥ सकृत् संवत्सरस्यान्ते उत्सवं स्नपनादिकम् । कुर्याद् यो मन्त्रनाथस्य स सिद्धिं लभते पराम् ॥ ३४ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां पवित्रस्नानविधिर्नाम पञ्चदशः परिच्छेदः ॥ १५ ॥ — ❦ ❖ ❦ — पवित्रोत्सवप्रकरणे फलमाह—सकृदिति ॥ ३४ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये पञ्चदशः परिच्छेदः ॥ १५ ॥ — ❦ ❖ ❦ — जो संवत्सर के अन्त में एक बार भी इस प्रकार मन्त्रनाथ का स्नपनोत्सव करता है, वह शीघ्र ही परा (= श्रेष्ठ) सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ ३४ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के पवित्रस्नानविधि नामक पञ्चदश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १५ ॥ — ❦ ❖ ❦ —

षोडशः परिच्छेदः अघशान्तिकल्पः नारद उवाच प्रभुर्मुनीश्वरा भूयश्चादितो वनमालिना । सर्वलोकहितार्थं तु यत् तद्वक्ष्याम्यतः परम् ॥ १ ॥ अथ षोडशः परिच्छेदो व्याख्यास्यते । अत्र सङ्कर्षणेन वासुदेवो यत्पृष्टस्तद्वक्ष्या- मीत्याह—प्रभुरिति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे मुनीश्वर ! सङ्कर्षण के द्वारा पुनः पूछे जाने पर भगवान् वासुदेव ने लोकहित के लिये जो कहा उसे अब कहता हूँ ॥ १ ॥ सङ्कर्षण उवाच देव सम्प्रतिपन्ना ये क्रमेऽस्मिन् ब्राह्मणादयः । दीक्षणीयाः कथं ते वा एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ २ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—देवेति ॥ २ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे देव ! इस क्रम में जो ब्राह्मणादिक सम्बद्ध हैं उनको किस प्रकार दीक्षित करना चाहिये अब मैं यह सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥ भगवानुवाच यथाक्रमेणोदितानां वर्णानां शृणु लाङ्गलिन् । त्रिविधं दीक्षणोपायं संक्षेपात् सर्वसिद्धिदम् ॥ ३ ॥ एवं पृष्टो वासुदेवस्त्रिविधदीक्षोपायं शृण्वित्याह—यथाक्रमेणेति ॥ ३ ॥ श्रीभगवान् ने कहा—हे लाङ्गलिन् यथाक्रम कहे गये इन ब्राह्मणादि वर्णों के सर्वसिद्धिप्रद तीन प्रकार के दीक्षा के उपायों को सुनिए ॥ ३ ॥ त्रिविधदीक्षोपायनिरूपणम् पूर्वोक्तलक्षणो ज्ञात्वा कश्चिद् दृढतरः पुमान् ।

३३६ सात्वतसंहिता संसारभयभीतस्तु निर्वाणमभिवाञ्छति ॥ ४ ॥ वैराग्यधीरचपलश्चिरकालं गुरोगृहे । संस्थितो दासभावेन खेदोद्वेगविवर्जितः ॥ ५ ॥ दीक्षार्थं प्रथमं गुरुकुलवासः कार्य इत्याह—पूर्वोक्तेति द्वाभ्याम् ॥ ४-५ ॥ दीक्षा के लिये सर्वप्रथम गुरुकुल में वास करे, इस सम्बन्ध में कहते हैं— आचार्य सर्वप्रथम गुरुगृह में संसार के भय से मुक्ति की इच्छा रखने वाले, वैराग्यबुद्धि सम्पन्न, चाञ्चल्य रहित (स्थिर बुद्धि वाले), दासभाव से संस्थित, खेद एवं उद्वेग से रहित शिष्य को निवास कराए ॥ ४-५ ॥ प्रायश्चित्तशान्त्यादिनिर्देशः ज्ञात्वा तस्यार्थितां नूनमाहूयाग्रे निवेश्य च । कृताकृतं च प्रष्टव्य आ स्मृतेस्तत्क्षणावधि ॥ ६ ॥ ज्ञात्वा दोषबलं सम्यक् प्रायश्चित्तैर्यथोदितैः । कृच्छ्रातिकृच्छ्रपूर्वैस्तु शोधनीयं प्रयत्नतः ॥ ७ ॥ आचार्यस्तद्दोषबलाबले ज्ञात्वा यथोदितैः प्रायश्चित्तैस्तच्छान्तिं कुर्यादित्याह— ज्ञात्वेति द्वाभ्याम् ॥ ६-७ ॥ इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षण सम्पन्न ऐसे दृढ़तर शिष्य के दोषादोष की जब परीक्षा कर लेवे तब शास्त्रीय रीति से उसके दोषों का प्रायश्चित्त करे । सर्वप्रथम उसकी दीक्षा विषयक प्रार्थना सुने । फिर निश्चयपूर्वक उसे अपने सामने बुला कर बैठावे । फिर तत्क्षण पर्यन्त उसके किये गये समस्त स्मृत कृत्याकृत्य के विषय में प्रश्न करे । इस प्रकार उसके दोष-बल का ज्ञान कर शास्त्र में यथोदित कृच्छ्रातिकृच्छ्र प्रायश्चित्त करा कर प्रयत्नपूर्वक उसके पाप का शोधन कर उसे शुद्ध करे ॥ ६-७ ॥ बहूनां परिपीडानामसामर्थ्यात् तु लाङ्गलिन् । मनःप्रसादपर्यन्तं कालं वा द्वादशाह्निकम् ॥ ८ ॥ नियोक्तव्यो मिते पूतेऽयाचिते नक्तभोजने । स्तुतिसम्मार्जनस्नानपुष्पाद्याहरणोद्यमे ॥ ९ ॥ आश्रमे वैष्णवानां तु दिव्याद्यायतने विभोः । अनिशं भगवद्बिम्बमा पीठादवलोकने ॥ १० ॥ बहुदिनमुपोषणाशक्तौ मनःप्रसादपर्यन्तं द्वादशदिनं वा मिते नक्तभोजने भगव- स्तोत्रादिसत्कार्येषु च नियोजयेदित्याह—बहुनामिति त्रिभिः । भगवद्बिम्बमापीठा- दवलोकने आपीठान्मौलिपर्यनतं भगवद्बिम्बदर्शन इत्यर्थः,

षोडशः परिच्छेदः ३३७ आपीठान्मौलिपर्यन्तं पश्यतः पुरुषोत्तमम्। पातकान्याशु नश्यन्ति किं पुनस्तूपपातकम्॥ (शाण्डिल्य स्मृ० २।८८) इति प्रसिद्धेः ॥ ८-१०॥ हे लाङ्गलिन् ! यदि शिष्य बहुत दिन तक उपोषण में अशक्त हो तो उसके मन को शुद्ध होने तक, अथवा द्वादश दिन पर्यन्त, अथवा अयाचित नक्त काल में भोजन की आज्ञा देकर, अथवा भगवत्स्तोत्रादि सत्कार्य में उसे लगा कर उस शिष्य को शुद्ध करे ॥ ८ ॥ अथवा उसके दोष की शान्ति के लिये वैष्णवों के आश्रम में, अथवा भगवान् विभु के दिव्य आयतन में, स्तुति, सम्मार्जन, स्नान, पुष्पाद्याहरण कार्य में नियुक्त करे, अथवा भगवान् के पीठ से लेकर बिम्बपर्यन्त निरन्तर दिन रात दर्शन कार्य में लगाकर उसे शुद्ध करे ॥ ९-१० ॥ ब्रह्मकूर्चसहितं प्रायश्चित्तकथनम् अभिजाततनूर्यः प्राग् दुष्कृतैर्मलिनीकृतः । साम्प्रतं भगवद्भक्त्या पवित्रीकृतमानसः ॥ ११ ॥ अहोरात्रोषितो भूत्वा नखकेशादिलुण्ठितः । पञ्चगव्यमथापाद्यं हृदाद्यैः सकुशोदकम् ॥ १२ ॥ मन्त्रैस्तद् वासुदेवाद्यैः समावर्त्य चतुःशतम्। एवं दिनचतुष्कं तु स्नापयेत् तेन तं सुधीः ॥ १३ ॥ प्रत्यहं चतुरो वाराना प्रभातनिशागमम्। ब्रह्मतीर्थं चतुष्कं स त्वापूर्यापूर्य संपिबेत् ॥ १४ ॥ क्रमात् सञ्चोदितैर्मन्त्रैः समाचम्यान्तराऽन्तरा । अतृप्तमशनं कुर्यादन्ते क्षीराज्यभावितम् ॥ १५ ॥ क्षपयेत् फलमूलैर्वा अहोरात्रचतुष्टयम् । इति भक्त्या प्रपन्नानामा जीवमपि दुष्कृतात् ॥ १६ ॥ कथितं विरतानां च देहशुद्धिकरं परम्। ब्रह्मकूर्चसमेतं तु प्रायश्चित्तं मयाऽद्य ते ॥ १७ ॥ ब्रह्मकूर्चसहितं प्रायश्चित्तमाह—अभिजाततनुरित्यादिभिः ॥ ११-१७ ॥ अब ब्रह्मकूर्च सहित प्रायश्चित्त कहते हैं—पापी शिष्य का जो शरीर पापों के कारण अत्यन्त मलिन हो गया था। अब वह दोषों के प्रायश्चित्त करने से सर्वथा नवीन और निर्मल हो गया और भगवद् भक्ति से सर्वथा कार्य, वाणी तथा मन तक पवित्र हो गया ॥ ११ ॥

३३८ सात्वतसंहिता प्रायश्चित्त करने के बाद शिष्य का नख केशादि समस्त कर्तन करावे । पञ्च- गव्य पिलावे और कुश जल से प्रोक्षण करे ॥ १२ ॥ वासुदेवादि के मन्त्रों का चार सौ जप करावे तथा चार दिन तक निरन्तर चार सौ की संख्या में स्नान करावे । इस प्रकार सुधी आचार्य चार दिन तक मन्त्र से शिष्य को स्नान करावे ॥ १३ ॥ अथवा प्रभातकाल से लेकर सायंकाल तक चार बार जल भर-भर कर चार बार ब्रह्मतीर्थ का जल पिलावे ॥ १४ ॥ प्रायश्चित्त के अन्त में आचमन कर बीच-बीच में मन्त्राभिषिक्त जल पीते हुए क्षीराज्यभावित भोजन उतना ही करे, जो न अधिक हो न कम हो । (भोजन की विधि यह है कि आधा पेट अन्न से भरे, शेष एक भाग जल से तथा एक भाग वायु सञ्चरण के लिये खाली रखे इसको अतृप्त अशन कहा जाता है) ॥ १५ ॥ अथवा चार रात एवं चार दिन केवल फल, मूल भोजन कर व्यतीत करे । यहाँ तक भक्तिपूर्वक भगवत् शरणागतों के जीवन पर्यन्त दुष्कृत्यों का प्रायश्चित्त कहा गया है । ब्रह्मकूर्च समेत यह सारा प्रायश्चित्त कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकारों के दोषों का महत्त्व समझा कर पाप से विरत के लिए कहा गया है ॥ १६-१७ ॥ ज्ञात्वा महत्त्वं दोषाणां त्रिविधानां तु वै पुरा । सम्भवे सति हेमादिदानं सततमाचरेत् ॥ १८ ॥ दोषाधिक्ये हेमदानादिकमपि कार्यमित्याह—ज्ञात्वेति । त्रिविधानां कायिक- वाचिकमानसानामित्यर्थः ॥ १८ ॥ यदि कायिक, वाचिक और मानसिक पाप अधिक हो, तब सुवर्णादि का सतत् दान भी करे ॥ १८ ॥ पूर्वोक्ताद् विहितात् कालाल्लघुदुष्कृतिना क्रमात् । चतुर्थांशेन हासस्तु ब्रह्मकूर्चं पिबेत् ततः ॥ १९ ॥ दोषकाले पूर्वोक्तब्रह्मकूर्चप्रायश्चित्तकालस्य चतुर्थांशेन हासं कुर्यादित्याह— पूर्वोक्तादिति । एवं ब्रह्मवर्णस्य सामान्यतः प्रायश्चित्तमुक्तम् ॥ १९ ॥ पूर्वोक्त काल में ब्रह्मकूर्च प्रायश्चित्त काल का चतुर्थांश कम कर देवे । इस प्रकार केवल ब्राह्मण वर्ण के लिये सामान्य प्रायश्चित्त कहा गया ॥ १९ ॥ कालेन वर्णोत्कर्षेण सह सामान्यमुच्यते । प्रायश्चित्तं हि सर्वेषां सर्वकल्मषनाशनम् ॥ २० ॥ उत्तरोत्तरतां बुद्ध्वा प्रथमं दुष्कृतस्य च । क्षपयेत् तद् द्विजेन्द्रस्तु मासैर्द्वित्रिचतुर्गुणैः ॥ २१ ॥

षोडशः परिच्छेदः ३३९ दोषाधिक्ये तत्रापि द्वित्रिचतुर्गुणमासाभिवृद्धिः कार्येत्याह—कालेनेति द्वाभ्याम्। तद्दुष्कृतं क्षपयेद् नाशयेदित्यर्थः॥ २०-२१॥ जब पाप का दिन अधिक बढ़ता जाय तब काल के अनुसार उत्तरोत्तर एक गुना द्विगुणित, त्रिगुणित मास के क्रम से प्रायश्चित्त में भी वृद्धि करे॥ २०-२१॥ नृपविट्शूद्रजातीय एकैकं वर्धयेत् क्रमात्। मासमेकादिकात् कालात् समारभ्य यथाक्रमम्॥ २२॥ नृपादीनां द्विगुणत्रिगुणचतुर्गुणक्रमेण प्रायश्चित्ताभिवृद्धिमाह—नृपेति॥ २२॥ नृपादि के लिये क्रमश द्विगुणित, त्रिगुणित, चतुर्गुणित प्रायश्चित्त कहते हैं— राजा ब्राह्मण की अपेक्षा उतने ही पाप का द्विगुणित, वैश्य त्रिगुणित और शूद्र चतुर्गुणित प्रायश्चित्त करे। इस प्रकार एक मास से आरम्भ कर यथाक्रम प्रायश्चित्त काल भी वर्णानुसार बढ़ाते रहना चाहिये॥ २२॥ दुराचारोऽपि सर्वाशी कृतघ्नो नास्तिकः पुरा। समाश्रयेदादिदेवं श्रद्धया शरणं यदि॥ २३॥ निर्दोषं विद्धि तं जन्तुं प्रभावात् परमात्मनः। किं पुनर्योऽनुतापार्तः शासनेऽस्मिन् हि संस्थितः॥ २४॥ विरतो दुष्कृताचैव भक्तिच्छायां समाश्रितः। भगवच्छासनोल्लङ्घनपरोऽपि तच्छरणागत्या निर्दोषो भवति। एतच्छासननिष्ठ- स्य शरणागतस्य निर्दोषत्वं किंपुनर्न्यायसिद्धमित्याह—दुराचार इति सार्धद्वाभ्याम्। कृताकृताद्विरत इत्यनेन सर्वधर्मपरित्यागः सूचितो भवति। भक्तिच्छायां भक्तेश्छायेव छाया यस्यास्तां शरणागतिमित्यर्थः॥ २३-२५॥ दुराचारी, कुत्ते, चाण्डाल के समान सब का सब कुछ खाने वाला, सर्वाशी, कृतघ्न, नास्तिक भी यदि श्रद्धापूर्वक आदिदेव की शरण ग्रहण करे, तो उसे परमात्मा के प्रभाव से सर्वथा दोषमुक्त समझना चाहिये। फिर जो पाप कर के भी उसके अनुताप से आर्त होकर भगवत् शरणागत हो जाता है अथवा जो भक्ति के शरणागत होकर पापों से विरत हो गया है उसके विषय में क्या कहा जा सकता है॥ २३-२५॥ एवं संशुद्धदोषाणां बहुजन्मार्जितस्य च॥ २५॥ कल्मषस्य विघातार्थं नारसिंही महामते। कृत्वा वै साम्प्रतं दीक्षां दद्याद् वै मन्त्रपूर्वकम्॥ २६॥ आराधनं हि तस्यैव वैष्णवीयस्य वै विभोः। सबाह्याभ्यन्तरं चैव सम्यङ्मासचतुष्टयम्॥ २७॥ मासाष्टकं वत्सरं वा बुद्ध्वा भावबलं पुरा।

३४० सात्वतसंहिता ज्ञात्वा भव्याशयानां च प्रसादं पारमेश्वरम् ॥ २८ ॥ विभवव्यूहसूक्ष्माख्यां दीक्षां कुर्यादनन्तरम् । पूर्वोक्तब्रह्मकूर्चादिप्रायश्चित्तानामिह जन्मनि सम्पादितदोषमात्रशामकत्वात् प्राग् बहुजन्मार्जितदोषशामनार्थं नृसिंहमन्त्रदीक्षामपि दत्त्वा तेन नृसिंहाराधनं च कारयेत् । तन्मनःपरिशुद्ध्यादिकं तस्मिन् भगवदनुग्रहं च ज्ञात्वा परव्यूहविभवमन्त्रदीक्षां दद्यादि- त्याह—एवमिति चतुर्भिः ॥ २५-२९ ॥ इस प्रकार, हे महामते ! इस जन्म के समस्त दोषों के शुद्ध हो जाने पर बहुजन्मार्जित पापों के विनाश के लिये मन्त्रपूर्वक दीक्षा देकर नारसिंही मन्त्र की दीक्षा प्रदान करे ॥ २५-२६ ॥ फिर उससे चार मास या आठ मास अथवा एक वर्ष तक बाह्य एवं आभ्यन्तर नृसिंहाराधन करावे, जब उसका मन शुद्ध हो जाय तब उसके ऊपर भगवदनुग्रह जानकर परव्यूह विभव मन्त्र की दीक्षा देवे ॥ २७-२९ ॥ सङ्कर्षण उवाच परिज्ञेयो हि कैर्लिङ्गैः साधकानामघक्षयात् ॥ २९ ॥ सम्यगाराधनान्मन्त्रप्रसादः कमलापते । तस्मिन् भगवदनुग्रहो जात इति कथं ज्ञेय इति पृच्छति सङ्कर्षणः—परिज्ञेय इति ॥ २९-३० ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे भगवन् ! किन-किन चिह्नों से यह ज्ञात होता है कि अब इस उपासक का पाप विनष्ट हो गया है? हे कमलापते ! किन-किन चिह्नों से जाना जाय कि आराधक के ऊपर आराधन-मन्त्र का प्रसाद हो चुका है? ॥ २९-३० ॥ श्रीभगवानुवाच चित्तप्रसादस्त्वतुलस्तेजोवृद्धिरतीव हि ॥ ३० ॥ धैर्यमुत्साहसन्तोषावकार्पण्यादयो गुणाः । येषां तेषां हि बोद्धव्यं मन्त्रात्माऽभिमुखः स्थितः ॥ ३१ ॥ प्रयुक्तिः शान्तिकादीनां कर्मणामचिरादपि । प्रयाति यदि साफल्यं विज्ञेयं तेन हेतुना ॥ ३२ ॥ सम्पन्नः पापदाहश्च प्रसन्नश्चापि मन्त्रराट् । ददाति धर्मकामार्थानचिराद् यदि योजितः ॥ ३३ ॥ अणिमाद्यष्टकं चापि विविधा योगसिद्धयः । आत्मसिद्धिसमेताश्च परितुष्टास्तदा स्मृताः ॥ ३४ ॥ एवं पृष्टस्तज्ज्ञाने हेतूनाह—चित्तप्रसाद इत्यादिभिः ॥ ३०-३४ ॥

षोडशः परिच्छेदः ३४१ श्रीभगवान् ने कहा—जब चित्त अभूतपूर्व प्रसन्न हो जावे, तेज की वृद्धि अत्यन्त हो जावे, धैर्य, उत्साह, सन्तोष तथा अदैन्य एवं अकार्पण्य आदि गुण उत्पन्न हो जावे। जिनमें इतने गुण आ जावे, तब समझ लेना चाहिये कि मन्त्रात्मा इसके अनुकूल है ॥ ३०-३१ ॥ यदि शान्ति के कार्यों में प्रवृत्ति हो, अल्पकाल में कार्य का साफल्य हो, तब समझे कि मन्त्र साधक पर सफल हो गया है ॥ ३२ ॥ मन्त्रराट् के प्रसन्न हो जाने पर पाप का दाह सम्पन्न हो जाता है और वह धर्म अर्थ और काम प्रदत्त करता है ॥ ३३ ॥ मन्त्रराट् प्रसन्न होने पर अणिमादि आठों सिद्धियाँ तथा विविध योग सिद्धियाँ प्रदान करता है। सभी मन्त्र आत्मसिद्धि समेत उस पर परितुष्ट हो जाते हैं ॥३४॥ यस्मिन् वै वैभवे रूपे यस्याभिरमते मनः । तस्य कल्मषशान्त्यर्थं दीक्षां कुर्याच्च तेन वै ॥ ३५ ॥ तमाराध्य हि पूर्वोक्तं कालं तमनुयोज्य च । एवं नारसिंहमन्त्रेणैव दुरितक्षयार्थं दीक्षाराधनादिकं कार्यमिति नियमो नास्ति । वैभवमन्त्रेषु यस्य यस्मिन्नभिरुचिस्तेनैव तत्कार्यमित्याह—यस्मिन्निति सार्धेन। पूर्वोक्तं कालं मासचतुष्टयं मासाष्टकं संवत्सरं वेत्यर्थः ॥ ३५-३६ ॥ वैभव मन्त्रों में जिसकी जिस मन्त्र में अभिरुचि हो कल्मष नाश के लिये उसको उसी मन्त्र की दीक्षा देवे ॥ ३५ ॥ गुरु शिष्य को पूर्वोक्त (चार मास, आठ मास अथवा संवत्सर मास पर्यन्त) काल तक आराधना में अनुयोजन करे ॥ ३५-३६ ॥ योग्यतायाः परीक्षार्थमा शान्तेः सर्ववस्तुषु ॥ ३६ ॥ नारसिंहेन वान्येन मन्त्रेणाभिमतेन च। दीक्षयाऽऽराधनेनैव होमजापव्रतादिना ॥ ३७ ॥ कर्मणा केवलेनैव शान्तिकात्युच्छ्रितेन च। विनाऽणिमादिसिद्धिभ्यो बुद्ध्वा पापं क्षयं गतम् ॥ ३८ ॥ भावयेत् तेन कालेन ततः पद्मदलेक्षण । दीक्षितस्य मुमुक्षुत्वेन सर्वविषयेष्वप्याशाविरहे सति शान्तिकादिकर्मणामपि विरहात् तत्तत्सिद्धिलिङ्गानि विना चित्तप्रसादादिलिङ्गैरैव पापक्षयो ज्ञातव्य इत्याह— योग्यताया इति त्रिभिः ॥ ३६-३९ ॥ इसके बाद उसकी योग्यता की परीक्षा सभी वस्तुओं की शान्ति के लिये भी करे। नारसिंह मन्त्र से, अभिमतमन्त्र के जप से, दीक्षा से, आराधना से, होम,

३४२ सात्वतसंहिता जपादि कार्यों से भले ही उसे अणिमादि की सिद्धि न हुई हो किन्तु उन सिद्धि के लिङ्गों (=चिन्हों) के बिना यदि उसके चित्त के प्रसादादि लिङ्ग तथा शान्ति आदि चिह्न प्रगट हो गये हों तब उसके पाप का क्षय हो गया ऐसा समझ ले । हे पद्मदलेक्षण सङ्कर्षण ! शिष्य परीक्षित हो जाने पर गुरु से पर व्यूह एवं विभवादि (षाड्गुण्य) तीनों दीक्षा के प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करे ॥ ३६-३९ ॥ सिद्धीनां वैभवीयानां षाड्गुण्यमहिमाप्तये ॥ ३९ ॥ निःश्रेयसविभूत्यर्थं ग्राह्यं दीक्षात्रयं वरम् । अभ्यर्थितात् सुप्रसन्नात् प्रतिपन्नाच्च देशिकात् ॥ ४० ॥ तदनन्तरं गुरुं प्रार्थ्य तत्सकाशात् परव्यूहविभवदीक्षात्रयं ग्राह्यमित्याह—सिद्धी- नामिति सार्धेन ॥ ३९-४० ॥ सानुकम्पेन वा तेन स्वयमप्रार्थितेन च । कार्यं संशुद्धपापानां भीतानां शरणैषिणाम् । संस्कृतानां हि युक्तानामघक्षालनकर्मणि ॥ ४१ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायामघशान्तिकल्पो नाम षोडशः परिच्छेदः ॥ १६ ॥ — ❦ — अप्रार्थितोऽपि गुरुः स्वयमेव कृपया योग्यानां शिष्याणां दीक्षां कुर्यादित्याह— सानुकम्पेनेति सार्धेन ॥ ४१ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये षोडशः परिच्छेदः ॥ १६ ॥ — ❦ — इस प्रकार अपने निःश्रेयस प्राप्ति के लिये उक्त तीनों दीक्षा प्राप्त करे । अभ्यर्थना से, सुप्रसन्नता से, सेवा से, अनुग्रह से प्रसन्न हो कर बिना प्रार्थना के भी गुरु शिष्य को दीक्षा देवे । इस प्रकार गुरु परीक्षा द्वारा भी शरणागत शिष्य को पाप से विशुद्ध कर दीक्षा प्रदान करे ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अघशान्तिकल्प नामक षोडश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १६ ॥ — ❦ —

सप्तदशः परिच्छेदः वैभवीयनृसिंहकल्पः नारद उवाच अथ सञ्चोदितो भूयः श्रीपतिर्मुनि्सत्तमाः । हितार्थं भवभीतानां विभुना सीरपाणिना ॥ १ ॥ अथ श्रीनृसिंहकल्पपरिच्छेदो व्याख्यास्यते । इह सङ्कर्षणेन वासुदेवः परिपृष्ट इत्याह—अथेति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे मुनिसत्तम ! सङ्कर्षण द्वारा पुनः इस प्रकार पूछे जाने पर संसार के भय से समस्त जीवों के कल्याण के लिये वासुदेव ने इस प्रकार कहा ॥ १ ॥ सङ्कर्षण उवाच भगवन् विधिना केन प्रसादमधिगच्छति । नृणामाराधकानां तु विश्वत्राता नृकेसरी ॥ २ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—भगवन्निति ॥ २ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे भगवन् ! आराधना करने वाले अपने भक्त जनों पर विश्व की रक्षा करने वाले भगवान् नृसिंह किस प्रकार प्रसन्न होते हैं? ॥ २ ॥ श्रुत्वैवमाह भगवान् शृणुष्व गदतो मम । सिद्धिमोक्षप्रदं मन्त्रं वैभवं मूर्तिमोहजित् ॥ ३ ॥ कामरूपधरं नित्यं नृसिंहस्य महात्मनः । एवं पृष्टो वासुदेवः प्रथमं नारसिंहमन्त्रं शृणुष्वेत्याह—श्रुत्वेति सार्धेन ॥ ३-४ ॥ सङ्कर्षण की बात सुन कर भगवान् वासुदेव ने कहा—हे सङ्कर्षण! मै इस नृसिंह मन्त्र को कह रहा हूँ, आप सुनिये । आप मोह को जीतने वाले मूर्त्तिमान स्वरूप हैं, यह वैभव मन्त्र साक्षात् सिद्धि तथा मोक्ष का दाता है । इतना ही नहीं यह नृसिंह का महामन्त्र अपनी इच्छानुसार स्वरूप धारण करने वाला है ॥ ३ ॥

३४४ सात्वतसंहिता नृसिंहबीजोद्धारकथनम् वर्णचक्रं तु पूर्वोक्तं सुगुप्ते वसुधातले ॥ ४ ॥ उपलिप्ते तु संलिख्य पूजयित्वा यथाविधि । समुद्धरेत् ततो मन्त्रमनेकाद्भुतविक्रमम् ॥ ५ ॥ प्रणवं पूर्वमादाय तदन्ते विनियोज्य च । नवमं नाभिवर्णेभ्यस्तदूर्ध्वेऽराच्चतुर्दशम् ॥ ६ ॥ तस्योपरि तदन्तःस्थं वर्णं गोलकवन्न्यसेत् । नमोऽन्तं वर्णमेतद् वै वाचकं परमात्मनः ॥ ७ ॥ ज्ञानादयो गुणाः षड् वै प्रागुक्ता हृदयादयः । तदर्थमेव वर्णं तं षोढा संलिख्य केवलम् ॥ ८ ॥ द्वितीयतुर्यषष्ठैश्च द्वादशेनान्तिमेन च । चतुर्दशेनारात् वर्गात् क्रमाद् वै विनियोजयेत् ॥ ९ ॥ बीजवच्छिरसा सर्वान् लाञ्छयेत् पञ्चमं विना । सर्वेषां प्रणवः पूर्वः स्वसंज्ञान्ते नियोज्य च ॥ १० ॥ स्वकीया जातयश्चान्ते वौषदन्ताः क्रमेण तु । ॐ नमो भगवते नारसिंहायेत्यनेन तु ॥ ११ ॥ द्वादशाक्षरमन्त्रेण स्मृत्वा विग्रहवत् पुरा । सबाह्याभ्यन्तरस्थेन साङ्गेनाद्येन पूजयेत् ॥ १२ ॥ वर्णचक्ररचनापूर्वकं नृसिंहबीजोद्धारं तदङ्गमन्त्रप्रकारान् द्वादशाक्षरमन्त्रं चाह— वर्णचक्रमित्यादिभिः । पूर्वोक्तं नवमपरिच्छेदोक्तमित्यर्थः । तदूर्ध्वं क्षकारोर्ध्वं अरा- च्चतुर्दशम् औकारम्, तस्योपरि तदन्तःस्थमनुस्वारमित्यर्थः । तथा च-ॐ क्षौं नम इति भवति । तं केवलं क्षकारमात्रमित्यर्थः । द्वितीयतुर्यषष्ठैः आकार-ईकार-ऊकारैः । द्वादशेन ऐकारेण । अन्तिमेन विसर्गेण । चतुर्दशेन (ओ?औ)कारेणेत्यर्थः । अरा- द्वर्गादित्यस्य सर्वत्रान्वयः । शिरसा अनुस्वारेणेत्यर्थः । पञ्चमं विना विसर्गसहितं बीजं विनेत्यर्थः । स्वकीया जातयो नमःस्वाहादिषड्जातयः । तथा च—ॐ क्षां ज्ञानाय हृदयाय नमः । ॐ क्षीं ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा । ॐ क्षूं शक्त्यै शिखायै वौषट् । ॐ क्षैं बलाय कवचाय हुं । ॐ क्षः वीर्याय अस्त्राय फट् । ॐ क्षौं तेजसे नेत्रत्रयाय वौषट् इत्यङ्गमन्त्रा भवन्ति ॥ ४-१२ ॥ किसी विशुद्ध उपलिप्त एवं गुप्त वसुधातले में पूर्वोक्त वर्णचक्र की रचना करे । यथाविधि उस स्थान की पूजा करे । तदनन्तर अनेक अद्भुत विक्रम वाले इस नृसिंह मन्त्र का उद्धार लिखे ॥ ४-५ ॥ पहले प्रणव (ॐ) लिखे । उसके अन्त में क्षकार लिखे । उसके बाद अरा

सप्तदशः परिच्छेदः ३४५ से चतुर्दश औकार लिखे । फिर उस पर अनुस्वार लगावे । इस प्रकार 'ॐ क्षौं नमः' यह मन्त्र निष्पन्न होता है जो परमात्मा का वाचक है ॥ ६-७ ॥ पहले कहा गया है कि ज्ञानादि छः गुण ही हृदयादि कहे जाते हैं । अतः उन्हीं पर (न्यास के लिये) इस वर्ण (क्षं) को भी ६ प्रकार से लिखे । पहले पर द्वितीय मात्रा (आ), दूसरे पर चतुर्थ मात्रा (ई), तीसरे पर षष्ठ मात्रा (ऊ), चतुर्थ पर द्वादश (ऐकार), पञ्चम पर चतुर्दश (औ), फिर सभी छः वर्णों पर अनुस्वार लगावे । किन्तु पञ्चम पर अनुस्वार न लगाकर विसर्ग लगाये । फिर सबके अन्त में अपनी-अपनी जाति 'नमः स्वाहा' आदि लगाकर अङ्गमन्त्र निष्पन्न करे । (ॐ क्षां ज्ञानाय हृदयाय नमः, ॐ क्षीं ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा, ॐ क्षूं शक्त्यै शिखायै वषट्, ॐ क्षैं बलाय कवचाय हुं, ॐ क्षः वीर्याय अस्त्राय फट्, ॐ क्षौं तेजसे नेत्रत्रयाय वौषट्) इस प्रकार अङ्गमन्त्र निष्पन्न होते हैं ॥ ८-१० ॥ फिर 'ॐ नमो भगवते नारसिंहाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्र से विग्रहवत् उनकी पूजा करे । यह पूजा अङ्ग के सहित भीतर और बाहर सर्वत्र करे ॥ ११-१२ ॥ भगवदर्चाविधानम् अथ लब्धाधिकारस्तु मन्त्रेणानेन दीक्षितः । भक्तिश्रद्धापरो नित्यं मतिमांश्छिन्नसंशयः ॥ १३ ॥ गुर्वाज्ञाभिरतो नित्यं तर्कवाग्जालवर्जितः । स्वकर्मनिरतो नित्यं वानप्रस्थोऽथवा गृही ॥ १४ ॥ पूर्वमनेन मन्त्रेण दीक्षितो भगवदाराधनं कुर्यादित्याह—अथेति सार्ध- द्वाभ्याम् ॥ १३-१५ ॥ इस प्रकार अधिकार प्राप्त हो जाने पर इस मन्त्र की दीक्षा ग्रहण करे । दीक्षा लेने पर आराधन विधि के लिये सर्वप्रथम स्नानादि नियम ग्रहण करे । साधक शिष्य भक्ति एवं श्रद्धा में तत्पर रहे, बुद्धिमान बने, संशयालु न रहे, गुरु की आज्ञा का पालन करे, तर्क रूप वाग्जाल से सर्वथा वर्जित रहे और अपने कर्म का पालन करे ॥ १३-१४ ॥ मन्त्रमारधयेद् येन विधिना तं निशामय । उपार्ज्य भोगानखिलान् न्याय्योपायेन वै पुरा ॥ १५ ॥ स्नातो बद्धकचो मौनी शुद्धवासोऽर्घ्यपुष्पधृक् । कृत्वा द्वास्थ्यर्चनाद्यं तु उपविश्यासने ततः ॥ १६ ॥ तदाराधनविधिं दर्शयन् प्रथममाराधनसामग्रीसम्पादनम्, आराधकस्य स्नानादि- नियमम्, द्वारदेवार्चनपूर्वकमासनोपवेशनं चाह—उपार्ज्येति सार्धेन । पाठक्रमादर्थ- क्रमस्य बलीयस्त्वेन स्नानाद्यनन्तरमेव भोगोपार्जनमिति बोध्यम् । यद्वा, पुरा पूर्व- सा० सं० - 26

३४६ सात्वतसंहिता दिनेष्वित्यर्थो वर्णनीयः, पुष्पादीनि विना तण्डुलादीनां भोगानां पूर्वदिनेष्वपि संग्राह्यत्वात् ॥ १५-१६ ॥ अब हे सङ्कर्षण! जिस विधि से मन्त्राराधन करना चाहिये उस विधि को सुनिये । न्यायोचित उपायों से समस्त भोगों का उपार्जन करे ॥ १५ ॥ यहाँ तक दीक्षा के नियमों को कहा, फिर भगवदाराधन कहा, फिर आराधन विधि कह कर आराधन सामग्री का निरूपण करते हैं—आराधन के लिये साधक शिष्य स्नान करे, शिखाबन्धन करे, मौन धारण करे, शुद्ध वस्त्र धारण करे और शिर पर पूजा की माला धारण करे, सर्वप्रथम द्वारस्थ देवता की अर्चना करे, तदनन्तर शुद्ध आसन पर बैठे ॥ १६ ॥ सायामां भूतसंशुद्धिं धारणाभ्यां समाचरेत् । केवलेन तु मन्त्रेण भावनासहितेन तु ॥ १७ ॥ अथ प्राणायामपूर्विकां भूतशुद्धिं कुर्यादित्याह—सायामामिति । धारणाभ्यां दहनाप्यायनात्मिकाभ्यामित्यर्थः । तथा चोक्तं पारमेश्वरे— धारणापञ्चकं चैव संक्षिप्तं विहितं द्वयम् ॥ दहनाप्यायनाच्चैव यदा देहात् स्वशुद्धये । —(३।२२३-२२४) इति ॥ १७ ॥ दहन एवं आप्यायन रूप धारणाओं से प्राणायामपूर्वक भूतशुद्धि करे । यह प्राणायाम भावना सहित केवल मन्त्र से करे ॥ १७ ॥ प्राणायामप्रकारकथनम् नाभिदेशस्थितं ध्यात्वा देवं संगृह्य कल्मषम् । निस्सृतं वायुमार्गेण द्वादशान्तावधौ क्षिपेत् ॥ १८ ॥ निरस्तपापमाकृष्य वातचक्रसमन्वितम् । नासाग्रेण तु मन्त्रेशं देहसम्पूर्णाय च ॥ १९ ॥ तं ध्यायेद् हृदयस्थं च गतिरुद्धेन वायुना । चित्तोपशमनार्थं तु नूनं वायुजयाय च ॥ २० ॥ शनैः शनैरथ बहिः केवलं मारुतं क्षिपेत् । विनाऽन्त्यरेचकेनैवमन्येषामुत्तरोत्तरम् ॥ २१ ॥ कालाद् ह्रासं यथाशक्ति नित्यमेव समाचरेत् । प्राणायामप्रकारमाह—नाभिकेशस्थि(त इ?तमि)ति सार्धैश्चतुर्भिः । वायुमार्गेण प्रथमप्राणायामान्त्यरेचकवायुमार्गेणेत्यर्थः । वातचक्रसमन्वितं द्वितीयप्राणायामपूरक- वायुसहितमित्यर्थः । गतिरुद्धेन वायुना तृतीयप्राणायामकुम्भकेनेत्यर्थः । एवमेवैत- द्व्याख्यातं नित्यव्याख्याने ॥ १८-२२ ॥

सप्तदशः परिच्छेदः ३४७ अब प्राणायाम का प्रकार कहते हैं—केवल भावना सहित अथवा मन्त्र सहित देव को नाभिदेश में स्थित ध्यान करे । फिर वहाँ से पाप को संग्रहीत कर वायु के द्वारा आदि प्राणायाम के साथ अन्त्यरेचक वायु द्वारा बाहर निकाल कर उसे द्वादशान्त विधि में प्रक्षिप्त कर देवे । इस प्रकार पाप के बाहर हो जाने पर वातचक्र समन्वित मन्त्र को द्वितीय पूरक प्राणायाम के द्वारा नासाग्र से भीतर ले जा कर उसी से देह को पूर्ण करे । फिर कुम्भक के द्वारा उसकी गति को हृदय में ही रोक कर मन्त्रेश का वहीं ध्यान करे । यह प्राणायाम चित्त की शान्ति के लिये तथा वायु पर विजय प्राप्त करने के लिये बारम्बार अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ १८-२० ॥ फिर धीरे-धीरे वायु बाहर निकाले । इस प्रकार अन्त्य रेचक को छोड़कर उत्तरोत्तर यथाशक्ति काल का ह्रास करने का नित्य अभ्यास करे ॥ २१-२२ ॥ भूतशुद्धिप्रकारकथनम् द्वादशान्तेऽथ मन्त्रेशं तप्तहाटकसन्निभम् ॥ २२ ॥ सहस्ररविसंकाशं वृत्तमण्डलमध्यगम् । स्मृत्वाथ मुक्तं तन्मात्रैर्निर्दहेद् विग्रहं स्वकम् ॥ २३ ॥ दक्षिणाङ्घ्रेस्तथाङ्गुष्ठप्रान्तदेशे शिखाक्षरम् । ध्यात्वा युगान्तहुतभुग्रूपं ज्वालासमावृतम् ॥ २४ ॥ तेन स्वविग्रहं ध्यायेत् प्रज्वलन्तं समन्ततः । देहजां भावयेज्ज्वालां मन्त्रनाथे लयं गताम् ॥ २५ ॥ दिव्यं प्रशान्ताकारं तु तमधितिष्ठाय चेतसा । स्वमन्त्रादमृतौघेनासेचयेद् विग्रहं स्वकम् ॥ २६ ॥ ततः समन्त्रं तद्विम्बमाकृष्य हृदि विन्यसेत् । भूतशुद्धिप्रकारमाह—द्वादशान्त इति पञ्चभिः । द्वादशान्ते स्वमूर्ध्नो द्वादशा- ङ्गुलोपरीत्यर्थः । तथा च पारमेश्वरे— सौषुम्नाद् दक्षिणद्वारात्रिर्गमय्य हरिं बहिः ॥ सहस्ररविसंकाशं वृत्तमण्डलमध्यगम् । तप्तकाञ्चनवर्णाभमासीनं परमे पदे ॥ मन्त्रात्मानं तु तं ध्यात्वा ह्युपरि द्वादशाङ्गुलेः ॥ इति । —(३।१८४३-१८४५) तन्मात्रैर्मुक्तं तत्त्वसंहारक्रमेण गन्धतन्मात्रादिभिर्मुक्तमित्यर्थः । स्वमन्त्रात् तन्मन्त्र- प्रतिपाद्यद्वादशान्तस्थितभगवतः सकाशादित्यर्थः । तद्विम्बं स्वमन्त्रं द्वादशाङ्गुलोपरि वृत्तमण्डलमध्यस्थं देवमित्यर्थः ॥ २२-२७ ॥ तदनन्तर तपाये हुए सोने के समान सहस्ररश्मि सूर्य रूप मन्त्रेश का

३४८ सात्वतसंहिता द्वादशान्त में, वृत्तमण्डल मध्य में ध्यान कर, पञ्चतन्मात्राओं से निर्मुक्त उसी में अपने शरीर को जला देवे । फिर दाहिने पैर के अङ्गुष्ठ प्रान्त प्रदेश में युगान्त अग्निस्वरूप ज्वाला-शत स्वरूप शिखाक्षर का ध्यान कर चारों ओर उसी में जलते हुए अपने विग्रह का ध्यान करे ॥ २२-२५ ॥ फिर अपने देह की उस ज्वाला को मन्त्रनाथ में लीन होते हुए उसी का ध्यान करे । दिव्य प्रशान्ताकार उन मन्त्रनाथ को चित्त पर स्थापित कर, अपने मन्त्र से प्रतिपाद्य द्वादशान्त स्थित भगवान् से निकले हुए अमृत समूह रूप जल से अपने विग्रह का आसिञ्चन करे । तदनन्तर मन्त्र सहित उस बिम्ब को द्वादशाङ्गुल के ऊपर स्थित वृत्तमण्डल के मध्य में रहने वाले अपने हृदय में स्थापित करे ॥ २५-२६ ॥ करन्यासविधानम् अथ हस्तद्वये न्यसेद् दीप्तिमद् द्वादशाक्षरम् ॥ २७ ॥ मणिबन्धान्नखाग्रं तु मूलमन्त्रपुरस्सरम् । हृदादयोऽस्त्रपर्यन्ता अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीषु च ॥ २८ ॥ सर्वासु युग्मयोगेन नेत्रं नखमुखाश्रितम् । करन्यासमाह—अथेति द्वाभ्याम् । द्वादशाक्षरं पूर्वोक्तनृसिंहद्वादशाक्षरमि- त्यर्थः । मूलमन्त्रपुरस्सरं पूर्वोक्तनृसिंहबीजपुरस्सरमित्यर्थः । युग्मयोगेन हस्तद्वयेऽपि युगपदित्यर्थः ॥ २७-२९ ॥ इसके बाद दीप्तिमद् द्वादशाक्षर मूल मन्त्र से दोनों हाथों के मणिबन्ध से नखाग्र तक न्यास करे । इसी प्रकार हृदय से लेकर अस्त्र पर्यन्त तथा अङ्गुष्ठादि अङ्गुलियों में भी हृदयन्यास और करन्यास करे ॥ २७-२८ ॥ इसी प्रकार दोनों हाथों को एक में मिलाकर नख, मुख तथा शिर से ले कर चरण पर्यन्त सुधी साधक द्वादशाक्षर मन्त्र का देह में न्यास करे ॥ २९ ॥ अङ्गन्यासविधानम् आमूर्ध्नश्चरणान्तं तु द्वादशार्णं न्यसेत् तनौ ॥ २९ ॥ जीवभूतं तदन्तःस्थं मूलमन्त्रं तथा न्यसेत् । हृदाद्यं नेत्रपर्यन्तमङ्गषट्कं स्वगोचरे ॥ ३० ॥ स्वस्वाङ्गुलियुगेनैव तेजोरूपं विनाऽऽकृतेः । श्रीवत्सं वक्षसो वामे पूर्णेन्दुसदृशद्युतिम् ॥ ३१ ॥ अङ्गन्यासमाह—आमूर्ध्न इति द्वाभ्याम् । स्वगोचरे = हृदयादिस्थानेष्वि- त्यर्थः । स्वस्वाङ्गुलियुगेन = वक्ष्यमाणहृदादिमुद्रयेत्यर्थः । आकृतेर्विना = निराकार- मित्यर्थः ॥ २९-३१ ॥

सप्तदशः परिच्छेदः ३४९ अपने शरीर में रहने वाले हृदयादि-स्थानों में दो-दो अङ्गुलियों से आकृति के बिना (निराकार) वक्ष्यमाण मुद्रा से न्यास करे ॥ ३०-३१ ॥ भूषणायुधशक्तिन्यासकथनम् कौस्तुभं हृदये न्यस्य चण्डदीधितिलक्षणम् । नानाब्जवनपुष्पोत्थां वनमालां च कण्ठतः ॥ ३२ ॥ पद्मं दक्षिणपाणौ तु शङ्खं वामकरे न्यसेत् । गदां पद्मकरे भूयः शङ्खपाणौ तु चक्रराट् ॥ ३३ ॥ खड्गं दक्षिणहस्तेऽथ धनुर्वामकरे न्यसेत् । आचांसाद् दक्षिणे भागे न्यस्या श्रीरुत्तरे तथा ॥ ३४ ॥ पुष्टिर्गुल्फावसानं च वक्त्रमध्ये सरस्वती । पृष्ठतो विन्यसेन्निद्रां ततः पाणिद्वयेन तु ॥ ३५ ॥ भूषणायुधशक्तिन्यासमाह—श्रीवत्समित्यादिभिः । एवं भूषणादीनां न्यासो हस्तयोरपि कार्यः, सर्वमन्त्राणामपि करन्यासं विनाऽङ्गन्यासमात्रस्याविहितत्वात् । तथा च पारमेश्वरे— या विभोः परमा शक्तिर्हृत्पद्मकुहरान्तगा ॥ वायव्यं रूपमास्थाय दशधा संव्यवस्थिता । इच्छया सप्रवाहेण पाणिमार्गेण निर्गता ॥ नाडीदशकमाश्रित्य ता एवाङ्गुलयो मताः । अत एव द्विजश्रेष्ठ श(क्त्या)ख्ये प्रभुविग्रहे ॥ पूर्वं मन्त्रगणं न्यस्य ततो भूतमये न्यसेत् । (४।२०-२३) इति, व्यापारो मानसो ह्येष न्यासाख्यो यद्यपि स्मृतः । न बध्नाति स्थितिं सम्यक् तथापि क्रियया विना ॥ कराधिना पुनः साऽतः प्राङ्न्यासस्तु तयोः स्मृतः । (४।४-५) इति च । अत ऐवेश्वरपारमेश्वरादिषु (ई०सं० २।५७, पा०सं० ४।१७) हस्तयोरपि किरीटादिन्यास उक्तः । स तु मूलकारस्याप्यभिमतः । अन्यथाऽत्र हस्तयोर्हन्मन्त्रादि- न्यासोऽपि तेन नोच्येत ॥ ३१-३५ ॥ अब भूषणायुध शक्ति न्यास कहते हैं—पूर्णमासी के चन्द्रमा के समान प्रचण्ड प्रकाश करने वाले कौस्तुभ का हृदय में न्यास करे । अनेक प्रकार के वन में रहने वाले कमल के पुष्पों की वनमाला से कण्ठ पर्यन्त न्यास करे ॥ ३२ ॥ दाहिने हाथ में कमल से और बायें हाथ में शङ्ख का न्यास करे, फिर गदा से कमल वाले हाथ में तथा शङ्ख वाले हाथ में चक्रराज से न्यास करे ॥ ३३ ॥

३५० सात्वतसंहिता दाहिने हाथ में खड्ग का और बायें हाथ में धनुष का न्यास करे। फिर श्री का न्यास दक्षिण भाग में कन्धे तक तथा उसी (श्री) से उत्तर भाग में न्यास करे। गुल्फपर्यन्त पुष्टि का तथा मुखमध्य में सरस्वती का न्यास करे। पीठ में दोनों हाथों से निद्रा का न्यास करे॥ ३४-३५॥ स्वस्मिन् देवत्वभावनाकथनम् मुद्रां बद्ध्वा स्मरेद् ध्यानं देवोऽहमिति भावयेत्। अथ प्रणवपूर्वेण स्वनाम्ना नतिना सह॥ ३६॥ मूलादिमुद्राप्रदर्शनपूर्वकं स्वस्मिन् देवत्वभावनामाह—मुद्रामित्यर्धेन। एवमेव व्यक्तमुक्तं जयाख्येऽपि— अहं स भगवान् विष्णुरहं नारायणो हरिः। वासुदेवो ह्यहं व्यापी भूतावासो निरञ्जनः॥ एवं रूपमहङ्कारमासाद्य सुदृढं मुने। (१९।४१-४२) इति। नैतावता जीवात्मपरमात्मनोः स्वरूपैक्यं शङ्कनीयम्, यतः श्रीपञ्चरात्ररक्षायां तृतीयेऽधिकारे—‘‘एतेन लाञ्छनन्यासाद्यनन्तरम् ‘‘मुद्रां बद्ध्वा स्मरेद्देवं देवोऽहमिति भावयेत्’’ (सा०सं० १७।३६) इति समाराधनग्रन्थोऽपि निर्व्यूढः। ‘‘बद्ध्वा मूलादिकां मुद्रां देवोऽहमिति भावयेत्’’ इत्यादिसंहितान्तरग्रन्थाश्चात्र तुल्यन्यायाः। ‘‘अत्र मनो ब्रह्मेत्युपासीत’’ (छा०उ० ३।१८।१) इत्यादिविध्वेतिकारादिवशाद् दृष्टिविधित्वं सुस्पष्टम्। अत एव हि तथाविधभावनयाऽप्यनन्तरयोग्यतापादन- मात्रमुक्तम्— न्यासेन देवमन्त्राणां देवतादात्म्यभावनात्। अप्राकृताङ्ककरणात् पूजामर्हति साधकः॥ इति। अन्यथा— देवतारूपमात्मानमर्चयेदर्घ्यधूपकैः। धूपावसानिकैर्भोगैर्ध्यात्वा नारायणं हृदि॥ इति समनन्तरकर्तव्यं कथं संगच्छते। नहि स्वरूपैक्यभावनायां हृदि पुन- र्नारायणध्यानमिति किञ्चित् स्यात्। न च शेषवृत्तौ प्रवर्तमानस्य स्वरूपैक्यभावनं जा- घटीति। अतो दृष्टिविधिपक्षोऽत्र स्वीकार्यः। यद्वा, गत्यन्तरे संभवति दृष्टिविधिविवक्षा च न युक्ता। अतस्तच्छरीरतया तादधीन्यादिभिः सर्वानुवृत्तस्तद्व्यपदेशः। तदभिप्रायेण च ‘‘स्वनियाम्येत्यादिकं वक्ष्यति भाष्यकारः’’ (पृ० ८६-८७) इति सुस्पष्टमुप- पादितम्॥ ३६॥ मुट्ठी बाँधकर प्रणवपूर्वक अपने नाम के आगे चतुर्थ्यन्त लगाकर नमः के साथ 'हम देव हैं' इस प्रकार की भावना करते हुए ध्यान करे॥ ३६॥ शेषपूर्वं तु वह्नयन्तमासनं परिकल्पयेत्।

सप्तदशः परिच्छेदः ३५१ तदाक्रम्याथ तस्यैव कार्या स्वहृदि कल्पना ॥ ३७ ॥ अथ मानसाराधनार्थं स्वहृदये प्रणवादिनमोऽन्तैश्चतुर्थ्यन्तैस्तत्तन्नामभिरनन्तादि- वह्न्यन्तपीठपरिकल्पनं कार्यमित्याह—अथेति सार्धेन । पारमेश्वरे तु जयाख्योक्तरीत्या “नाभिमेढ्रान्तरे ध्यायेत्” (ज०सं० १२।२, पा०सं० ५।५) इत्यादिभिर्हृदि जाग्रदासनकल्पनमुक्तम् । अत्र तु स्वप्नासनस्योक्तत्वात् तत्रोक्तस्थानविभागोऽत्रापि यथासंभवं बोध्यः । स्वप्नजाग्रदासनभेदस्तु परमेश्वर एवं दर्शितः— स्वप्नः शेषादिपूर्वं तु वह्निपर्यन्तमासनम् । क्षीरार्णवादितो भावासनान्तं जाग्रदासनम् ॥ —(३।५७) इति ॥ ३७ ॥ इस प्रकार मानसारोधन करे । फिर पूर्व में शेष उसके ऊपर अग्नि की कल्पना कर आसन निर्माण करे । उस पर बैठे हुए इस प्रकार के आसन की हृदय में कल्पना करे ॥ ३७ ॥ ब्रह्मस्वरूपममलं स्वचैतन्यं तदूर्ध्वतः । विकल्पोपरतं कृत्वा इच्छया तु विवर्तते ॥ ३८ ॥ परध्वनिस्वरूपेण तत्प्रकाशात्मना पुनः । व्यक्तिभावेन तच्चापि एवं प्रविलये सति ॥ ३९ ॥ विसर्जनं तु बोद्धव्यं सम्पन्ने तु क्रियाक्रमे । क्रम एष क्रमोक्तानां मन्त्राणामवतारणे ॥ ४० ॥ तदासनोर्ध्वे भगवदभिव्यक्तिक्रममाराधनानन्तरं विसर्जनक्रममाह—ब्रह्मस्वरूप- मिति सार्धद्वाभ्याम् । विकल्पोपरतं = विशेषणरहितमित्यर्थः । केवलज्ञानस्वरूपमिति यावत्, ज्ञानेन्द्रियगणे चैव विकल्पं तनुते मनः । विकल्पो विविधः कॢप्तस्तच्च प्रोक्तं विशेषणम् ॥ धर्मेण सह सम्बन्धो धर्मिणश्च स उच्यते । विकल्पः पञ्चधा ज्ञेयो द्रव्यकर्मगुणादिभिः ॥ (५।६८-६९) इति लक्ष्मीतन्त्रोक्तेः । विवर्तते पुनर्विशेषणसम्बन्धेन व्यक्तीभवतीत्यर्थः ॥ ३८-४० ॥ इस प्रकार के परिकल्पित आसन पर ज्ञान स्वरूप भगवान् की अभिव्यक्ति क्रमपूर्वक आराधना करते हुए उनका विसर्जन कर देवे । क्रिया क्रम सम्पन्न हो जाने पर विसर्जन करने की विधि के अनुसार विसर्जन करे । इस प्रकार क्रमपूर्वक कहे गये सभी मन्त्रों के आराधन का क्रम कहा गया ॥ ३८-४० ॥ लाञ्छनादिक्रियाध्यानमेषां चैव हि कल्पना ।