सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
सप्तदशः परिच्छेदः ४०९ तपो यज्ञं हि विधिवद् ब्रह्मभावनयाऽर्चयेत् ॥ ४२४ ॥ यथा स्यान्मोक्षफलदमचिराद् विष्णुयाजिनाम् । नानाद्रव्याङ्गदेहं यद् यज्ञं चानेकलक्षणम् ॥ ४२५ ॥ मूर्ततां यज्ञमन्त्रेण नीत्वैवं प्राक् समर्चयेत् । जुहुयादा समाप्यन्तं पूर्णान्ते हेममृच्छति ॥ ४२६ ॥ दानानां च व्रतानां च तपसां यज्ञकर्मणाम् । निवेदितव्यं यद् द्रव्यं दत्तं वा यत्र यत्पुरा ॥ ४२७ ॥ कर्तव्यमनुयागार्थं प्राक् तदेव हि केवलम् । तद्भावितमतोऽश्नीयात् पावनं प्रापणान्वितम् ॥ ४२८ ॥ भवेत् त्रिरात्रं फलदं भक्तानां शुभकारिणाम् । किं पुनस्तु समर्थानां चोदनाश्रयिणां तु वै ॥ ४२९ ॥ दानधर्मरतानां च व्रतिनां यज्ञयाजिनाम् । परत्र भवभीरूणामल्पार्थिनां शुभार्थिनाम् ॥ ४३० ॥ शमीपलाशश्रीवृक्षैः समिद्भिश्चामलद्रुमैः । अम्भसा चाम्बुमध्ये च मन्त्रतर्पणमाचरेत् ॥ ४३१ ॥ सप्ताहे समतीते तु मन्त्रमुत्थाप्य मण्डलात् । ध्यानयुक्तं जपं कुर्याल्लक्षसंख्यं समाहितः ॥ ४३२ ॥ ब्रह्मचर्यस्थितो मौनी दुष्टाहारविवर्जितः । क्षारारनालतैलानां परित्यागी ह्यलोलुपः ॥ ४३३ ॥ नित्यं कुशाजिनेशायी मानमात्सर्यवर्जितः । तप्तहाटकसंकाशं परिभ्रमणविग्रहम् ॥ ४३४ ॥ भूरिधारासमाकीर्णं वक्त्रमग्रे खगं स्मरेत् । तन्नाभिसंस्थितं मन्त्रमचलं चैव सम्मुखम् ॥ ४३५ ॥ नानारत्नप्रभाकान्तिमुद्गिरन्तं स्वविग्रहात् । हेमादिधातुनिचयं चन्द्रकान्तादिसन्मणीन् ॥ ४३६ ॥ एवं ध्यायेज्जपेच्चापि पूजयेदन्तरान्तरा । नियमादा समाप्त्येव जपान्ते वित्तपः स्वयम् ॥ ४३७ ॥ आज्ञावश्यो विधेयः स्यादात्मना च धनेन च । प्रयच्छत्यर्थिनां कामं भुङ्क्ते सोऽविरतं स्वयम् ॥ ४३८ ॥ आयुरारोग्यसंयुक्तो मन्त्रेशस्य प्रभावतः । प्रवर्ततेऽर्थयुक्तानां काम आशु च भोगिनाम् ॥ ४३९ ॥ सा० सं० - 30
४१० सात्वतसंहिता तत्साधनमथो वक्ष्ये साधकानां हिताय च । मण्डलं पूर्ववत् कृत्वा शुचौ देशे मनोरमे ॥ ४४० ॥ सङ्गुप्ते तत्र मन्त्रेशं समाहूय च संयजेत् । त्रिरात्रं सप्तरात्रं व जुहुयात् तदनन्तरम् ॥ ४४१ ॥ प्रागुक्तेन विधानेन जपध्याने समाचरेत् । सर्वाधारं हरिं ध्यायेत् पद्मरागरुचिं महत् ॥ ४४२ ॥ तन्मध्ये विद्रुमाभं च बन्धुजीवनिभोज्ज्वलम् । ध्यायेन्मन्त्रवरं मन्त्री जपेत् पूर्वोक्तसंख्यया ॥ ४४३ ॥ स्त्रीभोगं चेतसः कृत्वा जपान्ते साधकस्ततः । प्रार्थयन्तेऽत्र भीताश्च सन्तप्ता मदविह्वलाः ॥ ४४४ ॥ देवकिन्नरनार्यस्तु यक्षगन्धर्वकन्यकाः । सिद्धाः सुराङ्गनाश्चान्या नरनागस्त्रियोऽखिलाः ॥ ४४५ ॥ आजीवावधि वै सम्यक् कर्मणा मनसा गिरा । सेवन्ते साधकेन्द्रं तं मन्त्रस्यास्य प्रभावतः ॥ ४४६ ॥ यं यं समीहते कामं पातालोत्तिष्ठपूर्वकम् । लक्षजापात् तथा होमात् तं तं यच्छति मन्त्रराट् ॥ ४४७ ॥ अथ कामोपभोगात् तु विरतस्य च मन्त्रिणः । मोक्षदं सम्प्रदायं च कथयिष्ये यथार्थतः ॥ ४४८ ॥ कृत्वा यागवरं भूयः प्रसन्नेनान्तरात्मना । पूर्वोक्तं तु यजेत् कालं तत्र मन्त्रवरं क्रमात् ॥ ४४९ ॥ तर्पयित्वा विधानेन कुण्डे वाऽथ जलेऽम्भसा । सर्वदोषनिवृत्त्यर्थं प्रायश्चित्तार्थमेव च ॥ ४५० ॥ जपेदयुतमेकं तु प्रागुक्तं वा स्वशक्तितः । हृत्पुण्डरीकमध्येऽथ स्मरेन्मन्त्रं समाहितः ॥ ४५१ ॥ रोमकूपगणैः सर्वै रत्नज्वालाशतावृत्तम् । तन्मयं च स्वचैतन्यं कृत्वा तद् वह्निरश्मिभिः ॥ ४५२ ॥ भूतदेहं दहेत् कृत्स्नं तद्वियुक्तश्च साम्प्रतम् । मार्तण्ड इव पक्षीश आस्ते मन्त्रस्वरूपधृक् ॥ ४५३ ॥ अथ मन्त्राकृतिं स्वां वै ध्यायेत् परिणतां शनैः । तेजोगोलकसंकाशं सर्वाङ्गावयवोज्झितम् ॥ ४५४ ॥ तत्तेजोगोलकं पश्चाद् बृहत्परिमितं च यत् ।
सप्तदशः परिच्छेदः ४११ सर्वगं शब्दरूपं च भावरूपं तु चिन्मयम् ॥ ४५५ ॥ तस्मादप्यभिमानं तु ह्यस्मिताख्यं शनैः शनैः । विनिवार्य यथा शश्वद् ब्रह्म सम्पद्यते स्वयम् ॥ ४५६ ॥ इत्येवं वैभवीयस्य नृसिंहस्य महात्मनः । आराधनं च संक्षेपादुक्तं सिद्धिसमन्वितम् ॥ ४५७ ॥ नित्यक्रियापराणां च संसारोद्विग्नचेतसाम् । मद्भक्तानामिदं वाच्यं शुद्धानां संयतात्मनाम् ॥ ४५८ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां वैभवीयनृसिंहकल्पो नाम सप्तदशः परिच्छेदः ॥ १७ ॥ — ❧❦❧ — अथानेन नृसिंहमन्त्रेण धर्मार्थकाममोक्षाख्यचतुर्विधपुरुषार्थसाधनविधिमाह—अथ 'मन्त्रवराद्धर्मेंति' प्रक्रम्य यावत् परिच्छेदपरिसमाप्ति । सुगमस्तदर्थः ॥३५७-४५८॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनाकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये सप्तदशः परिच्छेदः ॥ १७ ॥ — ❧❦❧ — हे सङ्कर्षण! याग, होम एवं जपादि द्वारा अन्य सिद्धियों के लिये तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धि के लिये जो इस मन्त्रराज की उपासना करना चाहता है, अब उसकी प्राप्ति के उपायों को सुनिए । यह सद्धर्म लुप्त पिण्ड वाले पितरों को पिण्ड का निर्वापण कराने वाला है । जगद्धाता के प्रीति का कारण है और आत्मरक्षा करने वाला है । साधक अमावास्या को उपवास करे । फिर मण्डलान्तर्गत मन्त्र मूर्ति विभु का आवाहन कर पूर्व की भाँति भक्तिपूर्वक उनका पाद्य, अर्घ्य, पुष्प, सुवर्ण, गवादि, दान, तिल युक्त नैवेद्य जो सकुशल तथा तिलयुक्त हो, स्वच्छ जलपात्रों से युक्त हो और अञ्जलि पूर्ण करने वाला हो, इस प्रकार के पदार्थों से पूजन करता है, वह भगवत्प्रसाद से थोड़े ही काल में शाश्वत-पद प्राप्त कर लेता है और अपने नरक में रहने वाले पितरों को स्वर्ग लोक प्राप्त करा देता है ॥ ३५७-३६२ ॥
४१२ सात्वतसंहिता जो साधक विभव होने पर पत्र, पुष्प, फल, अन्न, सस्य, दधि, ओदनादि के द्वारा तथा रस, अन्न, सद् गन्ध, उत्कृष्ट वस्त्र, उत्कृष्ट धातु जैसे प्रवाल एवं मुक्ता मणि आदिकों के द्वारा भक्तिपूर्वक बिम्बस्थ, अथवा मण्डस्थ प्रभु का यजन करता है, अथवा जो मुख्य मुख्य ८६ पूर्णिमाओं में उपवास कर भगवान् का यजन करता है वह अवश्य उसे प्राप्त करता है ॥ ३६३-३६५ ॥ जो सद्धर्म चाहता है, अथवा महान् तीर्थ में गमन करना चाहता है, वह सर्वप्रथम मण्डल पर मन्त्रराज का यजन करे ॥ ३६६ ॥ स्नान के पूर्व समस्त पूजा सामग्री एकत्रित करे । तदनन्तर स्नान कर किसी सिद्ध प्रतिष्ठित बिम्ब में, अथवा स्वयं सिद्ध बिम्ब में, अथवा अपने द्वारा स्वयं स्थापित बिम्ब में, पञ्चगव्य, दधि, क्षीर, घृत, मधु, इक्षु, जल, सर्वौषधी, गन्ध, रत्न और फल पुष्पान्वित घटों से साङ्ग मन्त्र द्वारा आवाहन कर १०८ फलों से पूर्ण घटों द्वारा तथा शुद्ध जल से पूर्ण अर्घ्य समन्वित कलशों द्वारा श्रद्धापूत मन से भगवान् का ठीक-ठीक पूजन करता है, वह मन्त्रनाथ के पूर्व में कहे गये सभी प्रकार के प्रसाद को शीघ्र प्राप्त कर लेता है ॥ ३६६-३७० ॥ जो साधक सङ्क्रान्ति के दिन उपवास कर मण्डल में मन्त्रनायक का आवाहन कर ऋतु में उत्पन्न होने वाले फल पुष्पों से श्रद्धापूर्वक यजन करता है। सात दिन तक फल मूल खाकर रहता है । तीनों कालों में स्नान करता है । अष्टाङ्ग प्रणिपात कर अनेक प्रकार से प्रदक्षिणा करता है, वह निश्चय ही उस व्रत से होने वाले समस्त फलों को प्राप्त करता है, अथवा जो अभिमत दान द्वारा धर्म की इच्छा करता है, वह विषुवस्थ दिन प्राप्त कर उपवास करे और संयम से रहकर अपने मन में दिये जाने वाले दान से अभीष्ट धर्म की प्राप्ति का ध्यान करे । फिर मण्डल निर्माण करे, उसमें अग्नि का आगार निर्माण करे । गाय के दूध, घी, दही के भक्ष्य पदार्थों द्वारा तथा फल समन्वित मूलकों को नैवेद्य, उत्तमोत्तम माला, धूप, दीप, तिल, होमपात्र एवं जलपात्र के द्वारा भगवान् को समिधा, घृत, तिल, सघृत तण्डुल पदार्थों द्वारा होम कर सन्तर्पण करता है, उसको मूर्त आदान की अपेक्षा सौगुना धर्म से भी अधिक धर्म का अभिवर्धन होता है ॥ ३७१-३७७ ॥ अथवा दक्षिणायन में शुभ मण्डल का निर्माण करे और उस पर मन्त्रनाथ का आवाहन कर विधिपूर्वक माला, विलेपन, धूप, महादीप, घृतादि, गुड, खाँड़ एवं अन्य भक्ष्य पदार्थ, दूध, कृसर, नारिकेल के जल, सत्तू और घृत द्वारा भगवान् का पूजन करता है या घृतादिक से अग्नि के मध्य में होम कर उन्हें सन्तुप्त करता है, इस प्रकार के धर्माचरण करने से उस साधक को इष्टापूर्त्त का फल प्राप्त होता है ॥ ३७८-३८० ॥ चन्द्र एवं सूर्योपराग (= ग्रहण) में साधक दिन-रात पवित्र रहकर उपवास
सप्तदशः परिच्छेदः ४१३
करे। फिर सर्वप्रथम सभी उपकरणों से युक्त मण्डल का निर्माण करे और उस पर मन्त्रनाथ की प्रतिष्ठा करे। फिर साधक को अपनी शक्ति के अनुसार उनका यजन करना चाहिए ॥ ३८१-३८२ ॥ तदनन्तर अग्नि के मध्य में समिधा एवं घृतादिकों से होम कर मन्त्र के स्वरूप का ध्यान करते हुए मन से मन्त्रराज का जप करे ॥ ३८३ ॥ इस प्रकार जप करने वाला साधक जब तक जगत् में चन्द्रमा और सूर्य का दर्शन हो रहा है, तब तक अपने पूजा, जप और होम का अनन्त फल प्राप्त करता है ॥ ३८४ ॥ जो भक्त अर्थहीन हैं और सभी प्रकार के साधना से रहित हैं, किन्तु मन्त्र में एकमात्र नियमतः श्रद्धा रखने वाले हैं और फल की कामना करते हैं उनके लिये यह साधन कहा गया ॥ ३८५ ॥ स्नान, ध्यान, योग, जप, होम, उत्तम व्रत, उत्तम अन्न का भोजन, धन, सर्वस्व का त्याग, समय-धर्म का पालन ये सभी धर्म साधन कहे गये हैं विशेष कर धनिकों के लिये। जो मन्त्र के द्वारा शीघ्रातिशीघ्र अर्थ साधन चाहते हैं। चाहे ब्रह्मचारी, चाहे गृहस्थ, चाहे वानप्रस्थ, चाहे सन्यासी हों वे सात दिन पर्यन्त ठीक रीति से इस यज्ञ का सम्पादन करें, तीनों काल स्नान करें, नक्त में भोजन करें, तीनों काल घी तथा तत्काल में उत्पन्न हवि से उदर की अग्नि को तृप्त करें। अथवा बिल्व, आमलक एवं पद्म से उसके अभाव में कुशाङ्कुर से होम करें। इस प्रकार जो अनुष्ठान करता है तो उसका उस मन्त्रोद्धार के द्वारा तत्काल फल प्राप्त होता है ॥ ३८६-३९० ॥ वैशाख मास में, शुक्ल पक्ष में, जब सोमवार युक्त श्रवण नक्षत्र हो, उस दिन उपवास करे और मन्त्रेश का महान् अर्चन करे। पुण्य स्थल में, अथवा मण्डल में, अथवा बिम्ब में, अथवा जल पूर्ण कलश में, मन्त्रनाथ के दक्षिण और उत्तर दोनों पादों (गङ्गा, यमुना) का पूजन करे ॥ ३९१-३९२ ॥ भगवान् का दक्षिण पाद गङ्गा हैं तथा उत्तर पाद यमुना हैं, इनका पूजन 'प्रणव पूर्वक नमः' इस मन्त्र द्वारा करे। उनके पैर से निकली हुई गङ्गा के जल से घड़ा भरे। उसे पुष्प, वस्त्र एवं अनुलेपन से अलङ्कृत करे। उसमें तिल, होम तथा फल डालकर उनके मुख में स्थापित करे ॥ ३९२-३९४ ॥ इसी प्रकार मधु, घृत, शर्करादि, दधि, ओदनादि भी जलपूर्ण घट अथवा पत्ते से रहित पात्र आदि वस्तुयें मन्त्र मूर्ति को निवेदन करे। इसी प्रकार उपानह संयुक्त स्रक् (माला), चन्दन, अर्घ, धूप से, वस्त्र से अलङ्कृत करे। आतपत्र (छाता) भी मन्त्र द्वारा निवेदन करे। अर्घ्योदिक हाथ में देवे। इसके बाद घट प्रदान करे। इस प्रकार भगवान् की प्रीति के लिये उपर्युक्त सभी वस्तुयें प्रतिपादन
४१४ सात्वतसंहिता करे । इस प्रकार सभी ब्राह्मणादि वर्ण उन अनामय नारायण के शरणागत हो जाते हैं उनके समस्त पापों की शान्ति हो जाती है ॥ ३९५-३९९ ॥ उत्तमोत्तम नदियों के संगम में नाभि पर्यन्त जल में उतर कर स्नान करे । अञ्जलि में विमल जल भर कर देवता और पितरों का तर्पण करे । फिर भगवद् याग निवर्त्तन कर श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान देवे । यह सारा कार्य सभी लोक में रहने वाले देवताओं की प्राप्ति के लिये सतत् श्राद्ध की आकांक्षा करने वाले अपने कुल में उत्पन्न पितरों की मुक्ति के लिये, स्वयं श्वेत द्वीप की प्राप्ति के लिये तथा अपने सन्तति की वृद्धि के लिये साधक करे ॥ ४००-४०२ ॥ हे अमलेक्षण ! सङ्कर्षण चाहे शुक्ल पक्ष की द्वादशी हो, अथवा कृष्णपक्ष की द्वादशी हो, यदि वह श्रवण नक्षत्र से युक्त हो, अथवा अभिजित् नक्षत्र से युक्त हो, ऐसी तिथि उपर्युक्त सभी फलों की प्राप्ति के लिय विशिष्ट रूप से साधक बन जाती है ॥ ४०३-४०४ ॥ इस कारण ऐसा काल प्राप्त होने पर उस दिन उपवास करे और अपने विभव के अनुसार अथवा अपनी शक्ति के अनुसार मन्त्र के सम्मुख (= साक्षात्) की सिद्धि के लिये उस तिथि में मन्त्रराज का अर्चन करे ॥ ४०५ ॥ गौ, भूमि एवं सुवर्णादि जो-जो दान अनुरूप सदाचारी जनों को दिये जाते हैं, वे-वे सभी दान देने वालों को फल तो देते ही हैं संसार में उनकी अभिवृद्धि भी करते हैं । किन्तु वही दान यदि भावितात्मा भगवत् पाद लिप्सु भगवद् भक्तों को दिये जायें तो वे भवशान्ति के कारण बन जाते हैं । यह वाद है कि अच्युत हरि सर्वत्र विद्यमान हैं । विष्णु, नारायण, हंस, सर्वशक्तिमय प्रभु ही द्रव्य के रूप में विभक्त हैं यह बात ज्ञानकर्म में समझना चाहिये ॥ ४०६-४०९ ॥ जिस प्रकार जल में बुद्बुद् आदि तीन रूपों में विभक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार दान, स्वकीय आत्मा और नारायणात्मक पात्र इन तीन रूपों में वह द्रव्य भी प्रविभक्त हो जाता है ॥ ४१० ॥ इस प्रकार सामान्य बुद्धि से ज्ञान कर उन तीनों को दान काल उपस्थित होने पर सविशेष समझना चाहिये ॥ ४११ ॥ साधक सर्वप्रथम अपने मन से 'यह मुक्ति का किञ्चिद् द्रव्य अनन्तशक्ति के सामर्थ्य से अनश्वर है । दानाभिमानी प्रत्यगात्मा मैं हूँ तथा प्रभु मुझ पर कृपा करने की इच्छा से पात्रभावापन्न हैं, देव साक्षात् पञ्चतनु हैं, यह सब पञ्चभूतात्मक जगत् है, ऐसा समझ कर द्वादशार्ण मन्त्र से अपने शरीर पर न्यास करने वाला साधक मन्त्र को प्रत्यय का सहारा लेकर द्रव्य द्वारा होमादि क्रिया करे और अपने स्वरूप को न त्यागते हुए महान् रश्मि समूहात्मक मन्त्र का ध्यान करे । तदनन्तर बिना मन्त्र के अर्घ्य, पुष्प तथा अनुलेपन द्रव्य से बिना मन्त्र के यजन करे अथवा नृसिंह के
सप्तदशः परिच्छेदः ४१५ द्वादश मन्त्रों से यजन करे। तदनन्तर अङ्गन्यास के बिना पात्रभूत परात्मा से सकली- करण करे। फिर वस्त्र, माला एवं अनुलेपन से विधिवत् भगवान् की अर्चना करे । तदनन्तर हाथ में संकल्प का जल लेकर भगवत् प्रीतिपूर्वक दान देवे । इस प्रकार साधक भगवद्-भावित आत्मा से दान द्वारा भगवान् को प्रसन्न करे ॥४१३-४१८॥ ज्ञानात्मा के लिये दान वह है जिससे वह अच्युतवेत्ताओं के पास पहुँच जावे । नारायण ही परंब्रह्म से प्रतिशब्दित कहे जाते हैं ॥ ४१९ ॥ यतः संसार रूप अग्नि से सन्तृप्त भक्तों के मोह शान्ति में भगवान् ही कारण हैं। अतः उनके मन्त्र से उन्हीं की मूर्ति का दान करे ॥ ४२० ॥ प्रथम द्वादशाक्षर मन्त्र से अथवा अन्य जिस किसी मन्त्र से अनन्त एवं अमल उन नारायण को स्वयं गोद में स्थापित करे ॥ ४२१ ॥ उन मन्त्र की आकृति वाले भगवान् की सर्वदा अर्चना करे । इस प्रकार दान प्रदान करे ॥ ४२२ ॥ मन्त्रात्मना परब्रह्म की पूजा करे । फिर सद्व्रत की सिद्धि के लिये महामन्त्र द्वारा उनकी पूजा करे । इस प्रकार व्रती द्वारा किया गया भगवद् व्रत साधक को ब्रह्मत्त्व की प्राप्ति करा देता है ॥ ४२३ ॥ विभिन्न पदार्थों से युक्त दिया गया यह दान अनेक भेदों से भिन्न-भिन्न है । अतः तप एवं यज्ञ का अनुष्ठान सविधि ब्रह्म भावना से करे जिससे यज्ञ विष्णु- याजियों के लिये शीघ्र मोक्ष फल प्रदान करने वाला हो जाये । वह यज्ञ अनेक द्रव्यों वाला है उसके अनेक लक्षण हैं ॥ ४२४-४२५ ॥ सर्वप्रथम यज्ञ मन्त्र से मूर्ति निर्माण कर उसकी अर्चना करे । फिर समाप्ति पर्यन्त हवन करे । पूर्णाहुति के अन्त में सुवर्ण प्रदान करे ॥ ४२६ ॥ दान, व्रत, तप और यज्ञ कर्मों में जो द्रव्य निवेदनीय हो अथवा जो पहले दिया जा चुका हो, उससे पहले केवल अनुयाग के लिये कर्त्तव्य करे । भगवान् को निवेदित कर प्राणान्वित अन्न का भोजन करे क्योंकि वह पावन है । ऐसा अन्न शुभकारक भक्तों के लिये तीन रात में ही फल प्रदान करता है ॥ ४२७-४२९ ॥ जो समर्थ हैं, शास्त्र में कहे हुए धर्म के अनुसार चलते हैं, दानधर्म में निरत हैं, व्रत करने वाले हैं, यज्ञ द्वारा यजन करते हैं, परलोक का तथा इस लोक का भय करने वाले हैं, थोड़ा अर्थ होने पर भी कल्याण चाहते हैं ऐसे लोगों के विषय में क्या कहा जा सकता है ॥ ४३० ॥ साधक सर्वप्रथम जल के मध्य में शमी पलाश तथा श्री वृक्षों से समिधाओं से आँवला के वृक्षों से तथा जल से मन्त्र तर्पण करे ॥ ४३१ ॥ जब एक सप्ताह व्यतीत हो जावे, तब मन्त्र देवता को मण्डल से उठाकर
४१६ सात्वतसंहिता समाहित चित्त हो ध्यान करते हुए एक लाख की संख्या में जप करे ॥ ४३२ ॥ ब्रह्मचर्य में स्थित रहे, मौन धारण करे, दुष्टाहार वर्जित रखे क्षार (खारा), आरनाल (काँजी) तथा तेल का परित्याग रखे, लोलुपता का त्याग करे । मान मत्स्रता का त्याग करे । नित्य कुशा तथा अजिन पर शयन करे । फिर तपाये हुए सोने के समान तथा नित्य परिभ्रमणशील शरीर वाले एवं अनेक धारा से समाकीर्ण मुख वाले ऐसे गरुड़ का अपने आगे स्मरण करे । वहाँ पर स्थित अचल मन्त्र का भी उनके सम्मुख स्मरण करे ॥ ४३३-४३५ ॥ गरुड़ का ध्यान—वे गरुड़ अपने शरीर से नाना रत्न की प्रभा से युक्त कान्ति उगल रहे हैं, सुवर्णादि धातुओं के समूह तथा चन्द्रकान्ता आदि उत्तम मणियों का भी उद्गिर ण कर रहे हैं—इस प्रकार के गरुड़ का ध्यान और जप करना चाहिए । फिर बीच-बीच में पूजन करे । यह कार्य नियम से आरम्भ कर समाप्ति पर्यन्त नित्य स्वयं करे । ऐसे साधक के सभी लोग आज्ञा के वशीभूत हो जाते हैं । किं बहुना, अपनी आत्मा तथा धन से उसके विधेय हो जाते हैं, वह याचकों की कामना पूर्ण करने वाला तथा स्वयं समस्त भोगों का भोक्ता हो जाता है ॥ ४३६-४३८ ॥ अब जिस प्रकार मन्त्रेश्वर के प्रभाव से साधक आयु एवं आरोग्य से संयुक्त हो जाता है तथा जिस प्रकार अर्थी जनों के तथा भोगीजनों की कामना शीघ्र पूर्ण हो जाती है ऐसे साधकों के हित के लिये साधन को कहता हूँ । अत्यन्त पवित्र, मनोरम तथा सुरक्षित देश में मण्डल निर्माण करे । उस मण्डल पर मन्त्रेश का आवाहन कर यजन करे । तीन रात तथा सात रात पर्यन्त निरन्तर होम करे । तदनन्तर पूर्व में कही गई विधि के अनुसार जप एवं ध्यान करे । पद्मरागमणि के समान सर्वाधार हरि का ध्यान करे ॥ ४३९-४४२ ॥ उसके मध्य में विद्रुम की आभा वाले बन्धुजीव पुष्प के समान उज्ज्वल वर्ण वाले मन्त्रवर का मन्त्री पूर्वोक्त संख्या में जप करे ॥ ४४३ ॥ जप करने के उपरान्त साधक मानस रूप से स्त्रीभोग सम्पादन करे । ऐसा करने से काम सन्तप्त, भयभीत, मद विह्वल स्त्रियाँ उसकी प्रार्थना करती हैं । देव किन्नरों की स्त्रियाँ, यक्ष एवं गन्धर्वों की कन्यायें, सिद्ध, सुराङ्गनायें समस्त नरों एवं नागों की स्त्रियाँ आजीवन इस मन्त्र के प्रभाव से मन, वचन और कर्म से उसकी सेवा करती है ॥ ४४३-४४६ ॥ इसके बाद पुनः एक लक्ष के जप से तथा उतने ही होम से साधक जो-जो कामनायें करता है उन-उन कामनाओं को मन्त्रराज पूर्ण करते हैं ॥ ४४७ ॥ अब कामोपभोग से विरत मन्त्रज्ञ साधकों के लिये मोक्षप्रद सम्प्रदाय को यथार्थ रूप से कह रहा हूँ । इसके बाद साधक प्रसन्न अन्तरात्मा से पुनः वही
सप्तदशः परिच्छेदः ४१७ श्रेष्ठ याग सम्पादन कर पूर्वोक्त काल तक मन्त्रवर का यज्ञ करे । फिर विधिपूर्वक कुण्ड में उनका तर्पण करे अथवा जल में जल से सन्तृप्त करे । फिर सर्वदोषों की निवृत्ति के लिये तथा प्रायश्चित्त के लिये एक अयुत (दस हजार) जप अपनी शक्ति के अनुसार करे । समाहित चित्त होकर हृत्कमल के मध्य में मन्त्र का स्मरण करे ॥ ४४८-४५१ ॥ साधक मन्त्राग्नि से निकलती हुई ज्वाला रश्मियों से अपने सारे रोमकूप गणों को रत्नज्वाला शंतावृत कर उसमें अपने चैतन्य को मन्त्रमय बना कर, उसमें अपना भौतिक देह जला देवे । इस प्रकार भौतिक देह से रहित होने पर साधक मन्त्र का स्वरूप धारण कर सूर्य के समान तेजस्वी होकर साक्षात् गरुड़ बन जाता है ॥ ४५२-४५३ ॥ फिर अपने उस मन्त्राकृति को धीरे-धीरे परिणत होकर तेजो गोलक के समान सभी अङ्गावयवों से रहित देखे । इसके पश्चात् उसे तेजोगोलक को धीरे- धीरे परिणत होकर बृहत् परिमाण में सर्वत्र गमन करने वाला शब्दरूप, भावरूप और चिन्मयरूप में देखे ॥ ४५४-४५५ ॥ उसके बाद धीरे-धीरे अपने 'अस्मिता' नामक अभिमान का त्याग कर देने पर वह साधक स्वयं ब्रह्म स्वरूप बन जाता है । हे सङ्कर्षण ! इस प्रकार वैभवीय महात्मा नृसिंह की सिद्धि से समन्वित आराधन का प्रकार संक्षेप में कहा गया ॥ ४५६-४५७ ॥ यह वैभवीय नृसिंह के आराधन का प्रकार नित्य क्रिया में परायण, संसार से उद्विग्न चित्त वाले, संयतात्मा, शुद्ध मेरे भक्तों को ही सुनाना चाहिये । अन्य को नहीं ॥ ४५८ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के वैभवीयनृसिंहकल्प नामक सप्तदश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १७ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः अधिवासदीक्षाविधिः नारद उवाच एवमुक्ते सति पुनः कामपालो मुनीश्वराः । उवाचेदं हरिं वाक्यं लोकानुग्रहकाम्यया ॥ १ ॥ अथाष्टादशः परिच्छेदो व्याख्यास्यते। संकर्षण पृच्छतीत्याह—एवमिति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे मुनिश्वरों ! भगवान् वासुदेव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सङ्कर्षण ने संसार पर अनुग्रह करने की कामना से पुनः श्रीकृष्ण से कहा ॥१॥ सङ्कर्षण उवाच सम्प्राप्तप्रत्ययानां च द्विजातीनां च साम्प्रतम् । सम्यक् प्रक्षीणपापानामारूढानामिह क्रमे ॥ २ ॥ दीक्षात्रयस्य भगवन् ज्ञातुमिच्छामि निर्णयम् । यत्प्राप्य भगवद्भक्तः कृतकृत्योऽचिराद्भवेत् ॥ ३ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—सम्प्राप्तेति द्वाभ्याम् ॥ २-३ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे प्रत्यय! जिन द्विजातियों को आप में प्रत्यय (आस्था, विश्वास) प्राप्त हो गया है । जिनके पाप सर्वथा प्रक्षीण हो चुके हैं और जो वैष्णव दीक्षा-क्रम में आरुढ़ हो गये हैं । उन द्विजातियों के तीनों दीक्षा क्रमों को मै जानना चाहता हूँ, जिसे प्राप्त कर भगवद् भक्त अपने को कृतकृत्य बना लेता है ॥२-३॥ दीक्षामण्डपनिर्माणप्रकारकथनम् श्रीभगवानुवाच शुभेऽनुकूले नक्षत्रे तिथौ लग्ने ग्रहेक्षिते । भक्तानामधिवासार्थं क्ष्मापरिग्रहमाचरेत् ॥ ४ ॥ पुण्ये देशेऽनुकूले च मनोज्ञे साधुसेविते । मृद्वारिफलपुष्पाढ्ये समित्कुशसमन्विते ॥ ५ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४१९ एवं पृष्ठो वासुदेवः प्रथमं क्षमापरिग्रहपूर्वकं दीक्षामण्डपनिर्माणप्रकारमाह— 'शुभेऽनुकूले नक्षत्र' इत्यारभ्य 'बलिं सर्वत्र सर्वदा' इत्यन्तम् ॥ ४-२५ ॥ श्री भगवान् के कहा—शुभ अनुकूल नक्षत्र, तिथि, शुभ ग्रह से दृष्ट लग्न में भक्तों के निवास के लिये साधक सर्वप्रथम भूमि अधिग्रहण करे । वह भूमि उत्तम मिट्टी, जल, फल तथा पुष्प से समृद्ध हो । समिद् कुशा समन्वित हो, अनुकूल पुण्य प्रदेश में हो, मनोज्ञ हो और साधु सन्तों से सेवित हो ॥ ४-५ ॥ गोसस्यशालिसुभगे क्षुद्राप्राणिविवर्जिते । तत्र वर्णानुरूपाम् क्ष्माम् गच्छेत् पूर्वोक्तलक्षणाम् ॥ ६ ॥ सर्वदोषविनिर्मुक्तां सत्पक्षमृगसेविताम् । या शुभायतननोद्देशैर्मठैर्गोष्ठापणैर्गृहैः ॥ ७ ॥ तोयाशायाश्रमैः क्षेत्रैः सद्धैरन्तरीकृता । जलौघभयनिर्मुक्ता बलाद् भुक्त च सज्जनैः ॥ ८ ॥ वनैरुपवनैर्ग्रामैर्नगराङ्गैः समावृता । अलाभे सति लाभे वा स्वभूमेर्ब्राह्मणादिषु ॥ ९ ॥ स्वमन्त्रेणार्चनात् स्वत्वं कुर्याद् वर्णव्यपेक्षया । उद्धृतां कृतखातां च ज्ञात्वा दोषोज्झितां पुरा ॥ १० ॥ गाय एवं हरे भरे सस्यों से पूर्ण हो और वहाँ क्षुद्र प्राणि न हों । इस प्रकार अपने वर्ण के अनुरूप पूर्वोक्त लक्षण वाली भूमि का अधिग्रहण करे । वह भूमि समस्त दोषों से रहित तथा उत्तम पक्षियों के एवं उत्तम मृगों से सेवित होनी चाहिये । जो शुभायतन, शुभ उद्देश्य वाली, शुभ मठों, शुद्ध आपणों (बाजारों) तथा शुभ ग्रहों से समन्वित हो । वहाँ जलाशय, आश्रम क्षेत्र तथा सदाचारी सज्जनों का निवास हो । जल प्लावन की संभावना न हो तथा सज्जन लोग हठपूर्वक रहने के लिये विवश हों । वह भूमि वन, उपवन, ग्राम, नगर के अङ्गों से समावृत (घिरा) हो । यदि ऐसी भूमि न प्राप्त हो, तब ब्राह्मणादि से खरीद कर प्राप्त करे, अथवा अपने मन्त्र से भूमि का अर्चन कर अपने वर्णानुसार भूमि पर अधिकार करे ॥ ६-१० ॥ शुभमृत्पूरितां कृत्वा लध्वश्मभिरथान्तरा । ततस्त्वाकुट्टयेत् पश्चात् पञ्चगव्येन सेचयेत् ॥ ११ ॥ युक्तां हेमादिसद्रत्नैः समीकृत्योपलिप्य च । तत्रार्चनं विभोः कुर्याद् ध्यानान्तं चैव पूर्ववत् ॥ १२ ॥ वहाँ के ऊपर की मिट्टी अथवा खन कर भीतर की मिट्टी की परीक्षा करे । जब वह सर्वथा दोषरहित हो । तब वहाँ के गड्ढे आदि को शुभ मृत्तिका से पूर्ण
४२० सात्वतसंहिता करे अथवा छिद्रों में छोटे-छोटे पत्थरों को डाल कर उसे कुटवा देवे । इस प्रकार समतल बनवा कर पञ्चगव्य से सींच देवे । हेमादि रत्नों से युक्त कर समतल बनाकर लेप करे । ऐसी भूमि अधिग्रहण कर सर्वप्रथम वहाँ भगवान् का अर्चन करे, पूर्ववत् अर्चन के बाद ध्यान करे ॥ १०-१२ ॥ भूतानां बलिदानं च सुरभीणां च तर्पणम् । द्विजानां दक्षिणात्तं वै ततस्तत्र समापयेत् ॥ १३ ॥ पञ्चमहाभूतों के लिये बलिदान देवे, गायों को सन्तृप्त करे । ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर फिर उसे अपने अधिकार (समाप्त) में करे ॥ १३ ॥ प्राग्दिक्षु सिद्धिपूर्वं तु मण्टपं मण्डनान्वितम् । सुस्तम्भाद्वितयेनैव कोणगेनोपशोभितम् ॥ १४ ॥ ऐसी भूमि के पूर्वभाग में सिद्धिपूर्वक सर्वाभूषणभूषित मण्डप का निर्माण करे । दो खम्भा गाड़े जो कोणों वाले हों ॥ १४ ॥ पार्थिवेन च पीठेन मध्यगेन विराजितम् । विस्तरात्तु द्विजातीनां शूद्रान्तानां समं स्मृतम् ॥ १५ ॥ अष्टाश्रमथवा वृत्तं तुर्याश्रं सोपपीठकम् । अष्टाङ्गुलात् समुत्सेधादेकापायेन लक्षितम् ॥ १६ ॥ मध्य में मिट्टी का पीठ निर्माण करे । विस्तार की दृष्टि से द्विजातियों से लेकर शूद्रान्त तक सम (बराबर) होना चाहिये । अथवा वह पीठ आठ कोणों का तथा वृत्त (गोला) निर्माण करे । जिसमें चार कोणों का उपपीठ हो । उसकी ऊँचाई आठ अङ्गुल से एक अङ्गुल कम लक्षित हो ॥ १५-१६ ॥ स्वोन्नत्यर्थेनोपपीठं सर्वेषां परिकल्पयेत् । विस्तारमुपपीठानां पीठोच्छ्रायाद् द्विसङ्गुणम् ॥ १७ ॥ उपपीठस्य संलग्ना तन्मानेन तु चोन्नता । आप्यदिक् साय्रहस्ता च सम्पाद्याऽऽसनपिण्डिका ॥ १८ ॥ नैवेद्यमुपपीठे तु विनिवेद्य निधाय च । तस्य दक्षिणदिग्भागे त्वन्तर्गमनसंयुतम् ॥ १९ ॥ सभी के लिये ऊँचाई के अनुसार उपपीठ निर्माण करे । उपपीठों का विस्तार पीठ की ऊँचाई से दुगुना होना चाहिये । उपपीठ से लगा हुआ उसके मान के अनुसार उन्नत आसनपिण्डिका का निर्माण करे । नैवेद्य निवेदन करे और उपपीठ पर स्थापित करे । उसके दाहिनी ओर भीतर जाने का रास्ता बनावे ॥ १७-१९ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४२१ विविक्तलोचनोपेतं पिण्डिकाकुण्डभूषितम् । सुकवाटार्गलोपेतं कुर्याद् हवनमण्टपम् ॥ २० ॥ एकान्त में गवाक्ष एवं पिण्डिका का कुण्ड से भूषित सुन्दर कपाट तथा अर्गला से युक्त हवन मण्डप का निर्माण करे ॥ २० ॥ उपलिप्यास्त्रजप्तेन वारिणा गोमयेन तु । विधिवच्छोभनं कुर्यादित्येवं मण्टपद्वयम् ॥ २१ ॥ तदनन्तर अस्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित जल एवं गोमय से मण्डपों का उपलेप करे । इस प्रकार के दो मण्डपों का निर्माण करे ॥ २१ ॥ विहितो वित्तविरहादधिवासो द्विजालये । शिष्यैर्वाऽऽचार्यभवने तत्र कुर्यात् परिग्रहम् ॥ २२ ॥ यदि धन न हो तब किसी ब्राह्मण के घर में अधिवास निर्माण करे, अथवा शिष्य के भवन में, अथवा अपने आचार्य के भवन में ही अधिवास के लिये भूमि का परिग्रह करे ॥ २२ ॥ प्राग्वदर्चनपूर्वं तु भूततर्पणपश्चिमम् । ओदनं दधिलाजाज्यं मधुतोयपरिप्लुतम् ॥ २३ ॥ भूततर्पणमित्युक्तं तद्विना तत्र तेऽनिशम् । सन्तिष्ठन्ते बहिः क्रुद्धाः काङ्क्षमाणाः परं वधम् ॥ २४ ॥ वहाँ अधिवास निर्माण कर प्राक् कथनानुसार भगवदर्चन करे । तत्पश्चात् भूत तर्पण करे । ओदन, दही, लावा, घृत, मधु और जल यह भूत तर्पण की सामग्री है । यदि भूत तर्पण नहीं किया गया तो वे मण्डल के बाहर रात-दिन क्रुद्ध होकर किसी के वध की आकांक्षा करते हुए वहीं स्थित रहते हैं ॥ २३-२४ ॥ अतश्च विहितं यत्नात् स्थाने क्षेत्रे कृते सति । निर्विघ्नसिद्धये दद्याद् बलिं सर्वत्र सर्वदा ॥ २५ ॥ इसलिये नवीन स्थान और नवीन क्षेत्र बना लेने पर निर्विघ्नता की सिद्धि के लिये प्रयत्नपूर्वक सभी स्थानों पर सर्वदा बलिदान की विधि कही गई है ॥ २५ ॥ सम्भारार्जनकथनम् कृत्वैवं मङ्गलार्थं तु दीर्घं घण्टारवं शुभम् । स्वपदात् प्राग्वदुत्थाप्य प्रोच्चार्य प्रणवं महत् ॥ २६ ॥ प्रवेशयेत् ततस्तस्मिन् लाजान् सिद्धार्थकान् शुभान् । फलानि श्रीफलादीनि चन्दनादीनि रोचनाम् ॥ २७ ॥
४२२ सात्वतसंहिता श्वेतदूर्वाः सुमनसस्तन्महीरुहमञ्जरीम् । साग्रान् हरितदर्भांश्च सर्वरत्नानि काञ्चनम् ॥ २८ ॥ सर्वौषधीत्वगेलाद्यं सुगन्धिनिचयं शुभम् । पद्मकं शङ्खपुष्पं च विष्णुक्रान्ता च कुन्दरम् ॥ २९ ॥ सप्त सप्त च धान्यानि बीजानि च समानि षट् । शालिश्यामाकनीवारतण्डुलं भूरिसंस्कृतम् ॥ ३० ॥ सम्भारार्जनमाह—कृत्वैवमित्यादिभिः । सप्त सप्त च धान्यानि ग्राम्यारण्यभेद- भिन्नानीश्वरपारमेश्वरयोर्हविःपाकप्रकरणोक्तानि (ई.सं. २५।५८-५९, पा.सं. १८। १३४-१३६) ज्ञेयानि । अस्मिन्नवसरेऽङ्कुरप्रतिसरावीश्वरोक्तौ (२१।७५) ग्राह्यौ, अत्रापि सम्भारवर्गे “पालिकां घटिकाम्” (१८।३९) इत्युक्तत्वात् ॥ २६-४८ ॥ इस प्रकार अधिवास निर्माण कर लेने पर बलिदान के बाद कल्याणकारी घण्टा का शब्द करे । फिर अपने स्थान से पहले की तरह उठ कर जोर से प्रणव का उच्चारण कर उस अधिवास स्थान में सर्वप्रथम लाजा, शुभ सिद्धार्थक का प्रवेश करावे । फिर श्रीफलादि फल, चन्दनादि, रोचना (हरदी), श्वेत दूर्वा, उत्तमोत्तम पुष्प, माङ्गलिक वृक्ष की मञ्जरी, अग्रभाग सहित हरा-हरा कुश, सर्वरत्न सुवर्ण, सर्वौषधी, त्वक् इलायची, सुगन्धित पदार्थ, पद्मक, शङ्खपुष्पी, विष्णु- क्रान्ता, कुन्दर (?), सप्त ग्राम धान्य, सप्त आरण्य धान्य, षड् बीज शाली, श्यामाक नीवार, तण्डुल जो ठीक प्रकार से शुद्ध किया गया हो उसका प्रवेश करावे ॥ २६-३० ॥ गोसम्भवानि वै पञ्च पात्रेष्वौदुम्बरेषु च । तत् स्राववर्जितान्यानि तान्येव सुबहून्यपि ॥ ३१ ॥ प्रतिक्षणोपयोगार्थं भाण्डेष्वपि नवेषु च । पाद्याचमनकार्यार्थं दध्यन्नविनिवेदने ॥ ३२ ॥ गौ से उत्पन्न (मल मूत्र वर्जित) दूध, दही, घी पर्याप्त मात्रा में ताम्र पात्र में रखकर प्रवेश करावे । प्रतिक्षण पाद्य आचमन कार्य के लिये उपयोग किये जाने वाले तथा दधि एवं अन्न के निवेदन में उपयोग किये जाने वाले जलादि नवीन मिट्टी के पात्रों में रखकर प्रवेश करावे ॥ ३१-३२ ॥ हेमाद्युत्थानि पात्राणि मृदुपर्णपुटानि वा । पाण्डाराणि दुकूलानि वस्त्रयुग्मद्वयं नवम् ॥ ३३ ॥ उपवीतं सोत्तरीयं सुसिते धौतवाससी । कौशेयानि पवित्राणि कङ्कणं साङ्गुलीयकम् ॥ ३४ ॥ स्फाटिकं चाक्षसूत्रं च पत्राक्षं तु गणित्रकम् ।
अष्टादशः परिच्छेदः ४२३ पञ्चलोहमयं चक्रं सशङ्खं द्वादशारकम् ॥ ३५ ॥ कुतपं योगपट्टं च नेत्रवस्त्रं मृगाजिनम्। ब्रुसीकाशांशुकं पट्टं पादुके च उपानहौ ॥ ३६ ॥ दण्डं प्रतिग्रहं छत्रं पूर्णगोधूमकाष्ठकम्। चतुर्वर्णानि माल्यानि सुन्दरं पावनं लघु ॥ ३७ ॥ नीलशाद्वलसम्मिश्रं हरितं पत्रसञ्चयम्। गुग्गुलं मृष्टधूपं च दीपतैलं च वर्तयः ॥ ३८ ॥ दर्पणं धूपपात्रं च घण्टामर्घ्यादिपात्रकम्। रजांसि करणीयुग्मं पालिकां घटिकां सिताम् ॥ ३९ ॥ पञ्चाङ्गुलं तु सुदृढं हेमाद्यं कुशपञ्चकम्। अलक्तरञ्जितं सूत्रं सुसितं कर्तरी क्षुरम् ॥ ४० ॥ काण्डान्यष्टौ तु साग्राणि बर्हिपक्षान्वितानि च। प्रोन्नतानि स्थिराग्राणि लोहमृत्काष्ठजानि वा ॥ ४१ ॥ रञ्जितानि सुधाद्यैस्तु तदाधाराणि यानि च। कुल्लिकान्यम्बुकुम्भानि भृङ्गारं करवीं शुभाम् ॥ ४२ ॥ सुवर्ण से निर्मित पात्र अथवा कोमल पत्तों से निर्मित दोने आदि पात्र, श्वेत वर्ण के रेशमी, दो नवीन जो वस्त्र उत्तरीय सहित हों उन्हें, उपवीत, शुद्ध दो श्वेत धौत वस्त्र, कुशा निर्मित पवित्र, अंगूठी के सहित कङ्कण, स्फटिकमणि निर्मित अक्षसूत्र, पत्राक्ष, गणित्रक, पञ्चलोहमय चक्र, शङ्ख सहित द्वादशारक, कुतप योग पट्ट, नेत्र वस्त्र, मृगचर्म आसन, अंशुक, पट्ट, दो पादुका, दो उपानह, दण्ड, प्रतिग्रह, छत्र, पूर्णपात्र गेहूँ, काष्ठ, चार वर्ण वाली पुष्प माला, सुन्दर पावन लघु नीले शाद्वल से मिला हुआ हरित वर्ण के पत्र समूह, गुग्गुल, मृष्टधूप, दीपक, तेल, बत्तियाँ, दर्पण, धूपपात्र, घण्टा, अर्ध्यादि के पात्र, चूर्ण करणीयुग्म पालिका, श्वेत घटिका, पाँच अङ्गुल का सुदृढ़ हेम वर्ण का कुशपञ्चक, अलक्तक से रंगा हुआ सूत्र, श्वेत वर्ण की कैंची, छूरी, मोरपङ्ख से जुड़े अग्रभाग सहित आठ कुशा के काण्ड, अत्यन्त ऊँचे स्थिर अग्रभाग वाले पाँच की संख्या में लोहे, मिट्टी तथा काष्ठ निर्मित (पात्र) जो चूने आदि से रंगे हुए हों। उनके भी आधारपात्र, कुल्लिका, जल कुम्भ, भङ्गार एवं शुभ करवी प्रवेश कराए ॥ ३३-४२ ॥ अकालमूलनिर्गर्भं साधारं कलशं तथा। स्थालीं कमण्डलुं दर्वी तत्पिधानं तु चुल्लिकाम् ॥ ४३ ॥ भद्रपीठं चतुष्पादं चतुरश्रायतं नवम्। मात्रावित्तं सताम्बूलं दन्तधावनसञ्चयम् ॥ ४४ ॥
४२४ सात्वतसंहिता शुष्कगोमयसंयुक्तामरणं चाग्निजं मणिम्। पालाशदूर्वासमिधः साग्राः परिधयस्तु वै॥ ४५ ॥ प्रभूतमिन्धनं शुष्कमाज्याक्तं तिलतण्डुलम्। प्रागुक्तं स्रुकस्रुवाद्यं च होमोपकरणं च यत्॥ ४६ ॥ सर्वं पक्ष्मकपर्यन्तं बृहत्पात्रद्वयान्वितम्। पूर्वोक्तानां च भोगानां मध्याद् यः स्थण्डिलार्चने॥ ४७ ॥ संयाति चाङ्गभावं तद् ज्ञात्वा सर्वं प्रवेशयेत्। साधार कलश, स्थाली (बटुई), कमण्डल, कलछुल, ढाँकने वाला पात्र, चूल्ही, चार कोणों वाला लम्बा, नवीन, चतुष्पाद, भद्रपीठ मात्रा वित्त (मुद्गादि) जो ताम्बूल सहित हो, दन्त धावन समूह, शुष्क गोमय संयुक्त अरणि, अग्निजन्य मणि पालाश, दूर्वा, समिधायें जो अग्रभाग से युक्त हो, परिधियाँ, पर्याप्त इन्धन, घी में डुबोये गये शुष्क तिल, तण्डुल, पहले कहे गये स्रुक्-स्रुवादि जो होम के उपकरण हैं वे सभी बृहत्पात्र से युक्त पक्ष्मक पर्यन्त सभी वस्तुयें तथा स्थण्डिला- र्चन के लिये पूर्वोक्त कहे गये पदार्थों में जो-जो उपयोग में आते हों उन्हें अच्छी तरह से समझ कर यागगृह में प्रवेश करावे ॥ ४३-४८ ॥ अनुग्रहधियाऽऽचार्यो भक्तानां भविनां विभोः ॥ ४८ ॥ दिव्यभोगोपलिप्सूनां निःश्रेयसपदार्थिनाम् । प्रत्येकैकं हि यद् गाङ्गे वर्धयेद् द्रव्यमूर्त्तिना ॥ ४९ ॥ नित्येनाव्यक्ततत्त्वेन सन्मन्त्रब्रह्मणा सह । सार्थं सर्ष्यादिकं दद्यान्मन्त्रव्यूहं यथागमम् ॥ ५० ॥ फलदं स्यात् सकामानामकामानां हि मोक्षदम् । शिष्याणां बहुत्वे प्रत्येकं यागद्रव्याणा(मध्य ? मपि) वृद्धिमाह—अनुग्रहधियेति त्रिभिः ॥ ४८-५१ ॥ आचार्य भगवद् दीक्षा में प्रविष्ट होने वाले भक्तों की संख्या के अनुसार अनुग्रहपूर्वक याग द्रव्य में भी वृद्धि करावे, क्योंकि कुछ भक्त दिव्य भोगों को प्राप्त करना चाहते हैं । कुछ केवल निःश्रेयस (पारलौकिक कल्याण) चाहते हैं । अतः आचार्य हर एक के द्रव्य मूर्ति के द्वारा याग गङ्गा का अभिवर्धन करावे । तब नित्य अव्यक्त तत्त्व वाले, सन्मन्त्र स्वरूप वाले, ब्रह्म के साथ ऋषियों के सहित, शास्त्रीय विधि से उन्हें मन्त्रव्यूह प्रदान करे । ऐसा करने से ही वह मन्त्रव्यूह सकामों को फलदायी होता है तथा अकामों के लिये मोक्षदायी होता है ॥ ४८-५१ ॥ ससहायस्ततस्तत्र प्राग्वत् स्नात्वा कृताह्निकः ॥ ५१ ॥ सम्प्रविश्याप्यदिक्संस्थः प्राङ्मुखः प्रविशेत् ततः ।
अष्टादशः परिच्छेदः ४२५ पद्मासनादिना मार्गे चर्मण्याचामपूर्वकम् ॥ ५२ ॥ अथ स्नानाह्निकादिपूर्वकं स्वासनोपवेशनमाह—ससहाय इति । ससहायः सपरिचारक इत्यर्थः । मार्गे चर्मणि एणाजिन इत्यर्थः ॥ ५१-५२ ॥ परिचारक सहित आचार्य पूर्व की भाँति स्नान करे और अपना आह्निक कार्य करे । तदनन्तर पूर्वाभिमुख हो यागमण्डप में प्रवेश करे । फिर कृष्ण मृगचर्म पर पद्मासनादि से बैठे ॥ ५१-५२ ॥ कुर्याद् यदधिकारेण मन्त्रेणानुग्रहं शिशोः । तेनाङ्गसहितेनैव सर्वं कर्म समाचरेत् ॥ ५३ ॥ येन मन्त्रेण दीक्षा क्रियते, तेनैवाङ्गसहितेन सर्वकर्माचरणमाह— कुर्यादिति ॥ ५३ ॥ जिन भगवान् के मन्त्र अधिकार से शिष्य को दीक्षा देनी है, अङ्ग सहित सारा कर्म उसी मन्त्र दीक्षा के अनुसार करे ॥ ५३ ॥ समस्तैर्वैभवैर्मन्त्रैः कार्यो वाऽनुग्रहो यदि । सर्वाराधनदानार्थं वा द्विषट्काप्तये तदा ॥ ५४ ॥ विशाखयूपमन्त्रेण कुर्यात् तद्धारणाद्वयम् । तद्बीजेन तनुं व्याप्य प्राग्वत् तदभिमन्त्रितैः ॥ ५५ ॥ पुराहृतैर्यथाशक्ति मण्डलं च समाचरेत् । सर्वराधनादियोग्यतासिद्ध्यर्थं समस्तैरपि वैभवमन्त्रैर्युगपदेव दीक्षाप्रकरणे समस्तविभवदेवानामापि कारणभूतस्य विशाखयूपस्य मन्त्रेण दहनाप्यायनाख्यधारणा- द्वयात्मक भूतशुद्ध्यनुष्ठानं पूर्वोक्तेन विशाखयूपबीजेनैव स्वशरीरे व्यापकन्यासं तदभि- मन्त्रितैरेव सितादिरागैर्मण्डलपूरणं चाह—समस्तेति सार्द्धद्वाभ्याम् ॥ ५४-५६ ॥ यदि अनुग्रहपूर्वक समस्त वैभव मन्त्र की एक साथ ही दीक्षा देनी है । तब समस्त विभव देवों के कारणभूत 'विशाखयूप मन्त्र' से दहन एवं आप्यायन नामक दोनों धारणाओं से भूत शुद्धात्मक अनुष्ठान करे । फिर विशाखयूप के बीज से अपने शरीर में व्यापक न्यास सम्पादन कर उससे अभिमन्त्रित पहले लाए गए श्वेतचूर्ण आदि रंगों से मण्डल निर्माण करे ॥ ५४-५६ ॥ प्राक् समालभनैर्वस्त्रैः कटकाद्यङ्गुलीयकैः ॥ ५६ ॥ सितोष्णीषेण महता सितमाल्येन वै सह । मुखवासैः सताम्बूलैर्ललाटतिलकेन च ॥ ५७ ॥ कृत्वा शुभेन शारीरं योगपट्टेन संस्थितम् । आदौ स्वस्य गन्धाद्यलङ्करणादिकमाह—प्रागिति द्वाभ्याम् ॥ ५६-५८ ॥ सा० सं० - 31
४२६ सात्वतसंहिता अब स्वयं अलङ्कृत होने का उपकरण कहते हैं—आचार्य सर्वप्रथम समस्त समालभन वस्त्रों से, कटक एवं अँगूठियों से, श्वेत वस्त्र वाले उष्णीष (पगड़ी) से, बहुत बड़ी माला से, मुखावास ताम्बूलादि से और ललाट में तिलक से अपने शरीर को अलङ्कृत करे उसमें योगपट्ट बाँधे ॥ ५६-५८ ॥ हृत्पुण्डरीकमध्ये तु संन्यसेद् बीजमैश्वरम् ॥ ५८ ॥ करयोः पद्मनाभीयं ध्रुवाख्यमथ विग्रहे । शैषैरालभ्य पादान्तमामूर्ध्नश्चापि पूर्ववत् ॥ ५९ ॥ हस्तयोर्विग्रहे साङ्गं विन्यसेद् बीजमैश्वरम् । मुद्रावसानं कृत्वैवं सम्यक् तदनु चाहरेत् ॥ ६० ॥ पाणिभ्यां शङ्खचक्रे द्वे स्वमन्त्रेणाभिमन्त्रिते । भूत्वा तदात्मना पश्चात्ते निधाय धरातले ॥ ६१ ॥ अवलोक्याखिलं तत्स्थं प्रवर्तेताथ कर्मणि । हृदये विशाखयूपबीजन्यासं करयोः पद्मनाभबीजन्यासं शरीरे ध्रुवबीजन्यास- मवशिष्टैरनन्तादिषट्त्रिंशद्बीजैरामूर्ध्नः पादान्तमभिमर्शनं पुनर्हस्तयोर्विग्रहे च विशाख- यूपबीजेन षडङ्गन्यासं विभवमुद्रादर्शनं हस्ताभ्यां शङ्खचक्रादानं तन्मन्त्राभ्यां तयोरभि- मन्त्रणं स्वस्य तादात्म्यावलम्बनादिकमखिलसम्भाराणामपि चक्रशङ्खान्तर्गतत्वेनाव- लोकनपूर्वकं कर्मप्रारम्भं चाह—हृत्पुण्डरीकेति चतुर्भिः ॥ ५८-६२ ॥ तदनन्तर अपने हृत्पुण्डरीक मध्य में नृसिंह बीज से न्यास करे । हृदय में विशाखयूप न्यास, दोनों हाथों में पद्मनाभ बीज न्यास, शरीर में ध्रुव बीज न्यास, अवशिष्ट अनन्तादि ३६ बीजों से शिरःप्रदेश से लेकर पादान्त न्यास, फिर दोनों हाथों तथा शरीर में विशाखयूप बीज मन्त्र से न्यास करे । तदनन्तर षडङ्गन्यास एवं विभवमुद्रा का प्रदर्शन करे, दोनों हाथों में शङ्ख एवं चक्र ग्रहण करे, तन्मात्र मन्त्र से उनका अभिमन्त्रण करे । फिर साधक अपने तथा यज्ञीय संभारों को शङ्ख एवं चक्र के तादात्म्य की भावना करते हुए उनका अवलोकनपूर्वक कर्म प्रारम्भ करे ॥ ५८-६२ ॥ यागगेहशोधनालङ्करणकथनम् अस्त्राभिमन्त्रितं कृत्वा कर्म भृङ्गान्तरे स्थितम् ॥ ६२ ॥ तेनोपलिप्य सम्मार्ज्य यागस्थानं निघृष्य च । तद्ब्रह्माख्यावधौ भूयस्तेजसो हि विवृद्धये ॥ ६३ ॥ हेमपूर्वाणि रत्नानि बीजानि विनिवेश्य च । यागगेहशोधनालङ्करणमाह—अस्त्राभिमन्त्रितमिति द्वाभ्याम् ॥ ६२-६४ ॥ अब यागगेह की शोभा के लिये अलङ्कार कहते हैं—भृङ्गान्तर में स्थित
अष्टादशः परिच्छेदः ४२७ समस्त कर्म को अस्त्र से अभिमन्त्रित कर उससे यागगेह का मार्जन कर उपलेपन करे। उसे ब्रह्मावधि पर्यन्त पुनः तेज की वृद्धि के लिये सुवर्णपूर्वक रत्न तथा बीज सन्निविष्ट करे ॥ ६२-६४ ॥ गालितेनाम्भसाऽऽपूर्य ततः पात्रचतुष्टयम् ॥ ६४ ॥ एकस्मिन् चन्दनादीनि पूर्वं सिद्धार्थकानि च । साक्षतानि कुशाग्राणि तण्डुलानि तिलांस्तु वै ॥ ६५ ॥ सरत्नानुत्तमान् धातून् सफ़लान् विनिवेशयेत् । द्वितीये दधिमध्वाज्यक्षीरबिन्दुचतुष्टयम् ॥ ६६ ॥ कुशाग्रेण सबाहीकं सपुष्पं तिलतण्डुलम् । दूर्वा सविष्णुक्रान्तां च श्यामाकं शङ्खपुष्पिकाम् ॥ ६७ ॥ पद्मकं च तृतीये तु कुन्दरेणुसमन्वितम् । त्वगेलाद्यचयं सर्वं सकर्पूरं च चन्दनम् ॥ ६८ ॥ विनिक्षिप्य चतुर्थे तु द्रव्यं सर्वमिदं शुभम् । हृन्मन्त्रेण चतुर्णां तु कुर्याद् वै द्रव्ययोजनम् ॥ ६९ ॥ सास्त्रेण मूलमन्त्रेण सर्वं तच्चाभिमन्त्र्य तु । सषडङ्गेन तेनैव कुर्यात् पुष्पादिनाऽर्चनम् ॥ ७० ॥ यथाक्रमेण सर्वेषां ध्येयं सर्वं सुधोपमम् । अर्ध्यादिपरिकल्पनक्रममाह—गालितेनेत्यादिभिः । पात्रचतुष्टयम् अर्ध्याद्वितीया- र्घ्यपाद्याचमनपात्रचतुष्टयमित्यर्थः । एकस्मिन् प्रधानार्घ्ये । चन्दनादीनीत्यत्रादिपदेन कर्पूरकुङ्कुमे ग्राह्ये, "चन्दनं शशिबाहीकौ" (६।४२) इति पारमेश्वरे विवृतत्वात् । सिद्धार्थकं = श्वेतसर्षपः । साक्षतानि = शोभनाक्षतसहितानि । पारमेश्वरव्याख्याने तु क्षतरहितानीति कुशाग्रविशेषणं कृतम् । उत्तमान् धातून् सुवर्णरजतताम्रान् । तथा विवृतं पारमेश्वरे—"काञ्चनं रजतं ताम्रम्" (६।४३) इति । सफलान् कदल्यादि- फलान्वितानित्यर्थः । तथा च परमेश्वरे—"कदलीफलपूर्वाणि प्रधानार्घ्ये विनिक्षिपेत्" (६।४३) इति । सबाहीकं सकुङ्कुमम् । विष्णुक्रान्ता प्रसिद्धा । श्यामाकः = मुनिप्रियः । श्याम अरिशि, "श्यामाको नीलपुष्पः स्यात् स्मयाकश्च मुनिप्रियः" (३।८।५८) इति वैजयन्ती । शङ्खपुष्पं कर्णाटभाषायां विषप्रहरी । पद्मकं वैद्यग्रन्थे प्रसिद्धम् । कुन्दरेणुः कुन्देन सहिता रेणुः, कुन्दो नाम वालुक्याख्यस्तृणविशेषः । "वालुकं चाथ वालुक्यं मुकुन्दः कुन्दकुन्दरू" (अ० २।४।१२१) इति नैघण्टुकाः । कर्णाटभाषायां कर्णिकेय हल्लु । रेणुर्नाम रेणुका, तथैव प्रसिद्धो गन्धद्रव्यविशेषः । "हरेणु रेणुका कौन्ती" (२।४।१२०) इत्यमरः । अथवा "कुन्दरेण समन्वितः" इति पाठे कुन्दरः पूर्वोक्तः कुन्द एव । वस्तुतस्तु तथैव पाठः सरसः । पूर्वं सम्भा- रार्जनप्रकरणे "विष्णुक्रान्ता च कुन्दरम्" (१।८।२९) इति कुन्दमात्रस्योक्तत्वात्,
४२८ सात्वतसंहिता रेणुकाया अनुक्तत्वाच्च । त्वगेलाद्यचयं त्वग् लवङ्गः, ‘‘त्वक्पत्रमुत्कुटं भृङ्गम्’’ (२। ४।१३४) इत्यमरः । एला प्रसिद्धा । तदाद्यानां द्रव्याणां चयं समूहम् । अत्राद्यशब्देन तक्कोलजातिफले ग्राह्ये । तथोक्तं पारमेश्वरे—‘‘एलालवङ्गतक्कोलैः सह जाती- फलानि च’’ (६।६४) इति । एषामर्घ्यादीनां स्थाननियमादिकं षष्ठपरिच्छेदे (६।९- ९१) प्रदर्शितम् । दहनाप्यायनादिकं तु नृसिंहकल्पपरिच्छेदे (१७।१७-२७) प्रदर्शितम् । तत्सर्वं संग्रहेश्वरादिषु सुव्यक्तमुक्तं द्रष्टव्यम् ॥ ६४-७१ ॥ इसके बाद छाने हुए जल से चार घड़ा भर कर वहाँ प्रथम अर्घ्य पात्र, द्वितीय अर्घ्य पात्र, पाद्य पात्र और आचमन पात्र स्थापित करे । एक घट में चन्दनादि, सिद्धार्थकादि (श्वेत सर्षपादि), साक्षात् कुशाग्र, तण्डुल, तिल, सरल उत्तम धातु तथा कदली आदि फल डाल कर सन्निविष्ट करे । द्वितीय घट में दधि, मधु, घृत, दूध इन चार बिन्दुओं को कुशाग्र के साथ कुङ्कुम, पुष्प सहित तिल, तण्डुल, दूध विष्णुकान्ता, श्यामाक, शङ्खपुष्पी एवं पद्म डाल कर स्थापित करे । तृतीय घट में कुन्दरेणु समन्वित त्वक्, इलायची आदि, कपूर सहित चन्दन डालकर स्थापित करे । चतुर्थ घट में पहले कहे गये सभी द्रव्यों का समूह प्रक्षिप्त कर स्थापित करे । फिर अस्त्र सहित मूल मन्त्र से सभी का अभिमन्त्रण कर षडङ्ग सहित मन्त्र द्वारा पुष्पादि से उनका अर्चन करे । इस प्रकार क्रमशः सभी नैवेद्य वस्तुओं का अमृत के समान ध्यान करे ॥ ६३-७० ॥ आवाहने सन्निधाने सन्निरोधे तथार्चने ॥ ७१ ॥ विसर्जनेऽर्घ्यदानं तु प्राक्पात्रान्नित्यमाचरेत् । तदम्भसा चार्हणं तु तथैव परिषेचनम् ॥ ७२ ॥ कुर्यात् प्रणयनादानं प्रीणनं प्रीतिकर्म च । प्रधानार्घ्यस्य विनियोगमाह—आवाहन इति । प्रणयनादानं प्रणयनं पात्रान्तरे सेचनम्, तत्पूर्वकमादानं ग्रहणम् । तच्च ‘‘तर्पणं सम्प्रतिष्ठाप्य वासितं चार्घ्यवारिणा’’ (६।३७६) इति पारमेश्वराद्युक्तप्रकरणेषूपयुक्तं ज्ञेयम् ॥ ७१-७३ ॥ अब प्रथम कलश से प्रधान अर्घ्य का विनियोग कहते हैं—आवाहन, सन्निधान, सन्निरोध अर्चन एवं विसर्जन क्रिया में प्रथम पात्र से नित्य अर्घ्यदान देवे और उसी से पूजा करे तथा परिषेचन करे ॥ ७२ ॥ उसी पात्र से प्रणयन (पात्रान्तर का अभिषेचन) तथा आदान (जल ग्रहण) प्रीणन एवं प्रीतिकर्म करे ॥ ७३ ॥ द्वितीयार्घ्यपात्रविनियोगकथनम् प्रोक्षणं सर्ववस्तूनाम् अन्यस्मादुदकेन तु ॥ ७३ ॥ आरम्भे सर्वकार्याणां तत्समाप्तौ तथैव हि । न्यूनाधिकानां शान्त्यै तु ज्ञानव्यत्ययशान्तये ॥ ७४ ॥