सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५४७ बर्तन में तीन सप्ताह तक इस प्रकार स्थापित करे जिससे उसमें हवा न लगे । अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रमा की किरणें उसे स्पर्श न करें । इस प्रकार की मिट्टी को अच्छे काष्ठ पर स्थापित कर उसका बिम्ब निर्माण करे ॥ २६-२९ ॥ वस्त्रवच्चैव लोहानां कृत्वा प्रक्षालनं ततः । मार्जनं भूतिना भूयस्तथा तन्मन्त्रितेन च ॥ ३० ॥ लोहबिम्बनिर्माणार्थं लोहसंशोधनप्रकारमाह—वस्त्रवदिति । तन्मन्त्रितेन अस्त्रा- भिमन्त्रितेनेत्यर्थः ॥ ३० ॥ भक्त्या प्रवर्तमानस्तु बिम्बसाधनकर्मणि । सर्वत्र चास्त्रमन्त्रस्य कुर्यान्निर्विघ्नशान्तये ॥ ३१ ॥ पूजनं हवनं भूतबलिदानं सदक्षिणम् । सम्यग् ग्रहणकाले तु एतत् सामान्यमेव हि ॥ ३२ ॥ बिम्बनिर्माणप्रारम्भकाले सामान्यतस्तत्तन्मूर्तिमन्त्रार्चनादिकं कार्यमित्याह— भक्त्येति द्वाभ्याम् ॥ ३१-३२ ॥ अब लौह बिम्ब के निर्माण के लिये लौह संशोधन का प्रकार कहते हैं । लौह का वस्त्र के समान ही जल से प्रक्षालन करे फिर भस्म मन्त्र से अभिमन्त्रित भूति से उसका मार्जन करे । बिम्ब साधन के काम में भक्तिपूर्वक लगा हुआ साधक बिम्ब निर्माण की निर्विघ्न शान्ति के लिये सर्वत्र अस्त्र मन्त्र का जप करे । फिर पूजन करे, होम करे, बलिदान करे, दक्षिणा देवे, फिर लौह बिम्ब का निर्माण करे । सम्यग् लौह बिम्ब के निर्माण में यही सामान्य विधि है ॥ ३०-३२ ॥ सच्छैलदारुग्रहणे विशेषस्त्वधुनोच्यते । सर्वत्रारम्भकाले तु निमित्तमुपलक्ष्य च ॥ ३३ ॥ विशेषाद् वनयात्रायां तच्छुभेन शुभोदयः । अशुभेन निमित्तेन यात्रा विघ्नवती भवेत् ॥ ३४ ॥ विशेषेण शिलादारुसंग्रहणविधानमाह—सच्छैलदारुग्रहण इत्यारभ्य सर्वं चूर्णमयं तत इत्यन्तम् । एतत्प्रयोगस्तु श्रीसात्वतामृते सुविशदं प्रतिपादितो द्रष्टव्यः ॥ ३३-९० ॥ अब बिम्ब के लिये शैलदारु ग्रहण के प्रकार में विशेष कहते हैं—सर्वत्र बिम्ब के आरम्भ काल में निमित्त देखे । विशेष कर वन में जाने के लिये शुभ निमित्त दर्शन से शुभ का उदय होता है । साकाम अशुभ निमित्त के दर्शन से यात्रा विघ्नवती होती है ॥ ३३-३४ ॥ विरामेण तु जप्येन शान्तिस्वस्त्ययनादिना ।
५४८ सात्वतसंहिता निवर्त्तनेन तद्धन्याद् दहते शुभकृद् यतः ॥ ३५ ॥ यात्रा में अशुभ निमित्त का दर्शन होने पर यात्रा का विराम करे और जप करे । शान्ति-पाठ एवं स्वस्त्ययन पाठ करे । इस प्रकार करने वाला शुभकृत् अमङ्गल का दहन कर देता है ॥ ३५ ॥ मन्त्रमभ्यर्च्य यात्रायामभ्यर्थ्याज्ञां विनिन्द्य च । नैवेद्यशेषभुग् वामचारस्थः संयतेन्द्रियः ॥ ३६ ॥ यात्रा में मन्त्र की अर्चना करे, भगवान् से आज्ञा माँगे, प्रसन्न रहे, भगवान् के नैवेद्य शेष का भोजन करे, श्रेष्ठ आचरण करे, इन्द्रियों का संयम रखे ॥ ३६॥ प्राङ्मुखः संस्मरेन्मन्त्रं समुत्थायामृतोदये । परिज्ञाय पुरा मूर्त्तिं तन्मूर्त्यन्तरमेव वा ॥ ३७ ॥ अमृत बेला में शय्या से उठकर पूर्वाभिमुख हो मन्त्र का स्मरण करे । मूर्त्ति का अथवा अन्य मूर्त्ति का पता लगा कर उसी दिशा में यात्रा करे । यदि मूर्त्ति का पता न लगे तो अन्य जिस किसी दिशा में यात्रा करे । यात्रा में सावधान (होशियार) सहायकों को तथा शिल्पियों को साथ रखे ॥ ३७ ॥ यायात् तदीयं दिग्भागं तदभावात् तु चान्यदिक् । सहायैरप्रमत्तैस्तु शिल्पिभिः सह संवृतः ॥ ३८ ॥ लाजदध्यक्षतैः कुम्भैर्यायात् पुष्पपुरस्सरैः । सौमनस्यं महोत्साहस्त्वङ्गस्पन्दश्च दक्षिणः ॥ ३९ ॥ यात्रा में आगे लावा, दही, अक्षत, पूर्ण कुम्भ एवं पुष्प का दर्शन करे । मन को प्रसन्न रखे और महान् उत्साह से युक्त रहे । यात्रा में दाहिने अङ्ग का फड़कना शुभावह है ॥ ३८-३९ ॥ शुभा वाणी ध्वनिः शाङ्खस्तन्त्री वाद्यं फलादयः । गोगजाश्वाद्विजाः कन्या नवभाण्डं च मृद् दधि ॥ ४० ॥ आर्द्रमांसान्यलङ्कारो मदिराग्नी घृतं पयः । सिद्धान्नं शालिबीजादि दर्भाः सद्रुममञ्जरी ॥ ४१ ॥ छत्रवस्त्रध्वजा यानं रोचना कुङ्कुमं मधु । दर्पणं चामरश्चैव धातवः शस्त्रवर्जिताः ॥ ४२ ॥ रत्नानि वैबुधं बिम्बं मधुमत्तो ह्यकातरः । जीवन्मत्स्या निमित्तं च मनसो यदखेददम् ॥ ४३ ॥ तत्सर्वं दर्शने श्रेष्ठं यत् खेददमशोभनम् ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५४९ स्वगृहद्वारदेशाच्च पथि सप्तपदावधि ॥ ४४ ॥ क्रममाणे निमित्तं च फलं यच्छत्यनेन हि । निर्गत्य नगराद् ग्रामात् क्रोशार्धं क्रोशमेव वा ॥ ४५ ॥ गृह्णीयाच्छाकुनं चिह्नं नकुलादिमयं त्वतः । पूर्णात् सार्धाधिकात् क्रोशाद् हितकृन्मृगदर्शनम् ॥ ४६ ॥ शुभ वाणी, शङ्ख की ध्वनि, वीणा का वादन, फलादि, गाय, गज, घोड़ा, कन्या, नवीन भाण्ड (मिट्टी का बर्तन), मिट्टी, दही, आर्द्र, मांस, अलङ्कार, मदिरा, आग, घृत, दूध, सिद्धान्त शाली का बीज, कुशा, वृक्ष पर चढ़ी हुई लता, छत्र, वस्त्र, ध्वज, यान, हरदी, कुङ्कुम, मधु, दर्पण, चामर, शस्त्र रहित धातु, रत्न, देवता का बिम्ब आकार, मद्य में मस्त जीवित मछली तथा मन को प्रसन्न करने वाले समस्त निमित्त ये सभी निमित्त दर्शन मात्र से शुभावह होते हैं । जो मन को खिन्न करने वाले निमित्त हैं, वे अशुभ हैं । अपने घर के द्वार देश से सात पग पर्यन्त चलने पर देखे हुए निमित्त फल प्रदान करते हैं । नगर से अथवा गाँव से एक कोश अथवा आधा कोश चलने पर नकुलादिभय शकुन चिह्न शुभावह होते हैं । एक कोस पूरा होने पर अथवा डेढ़ कोश पूरा होने पर मृग दर्शन हितकारी होता है ॥ ४०-४६ ॥ दिङ्मुखे निर्मले सिद्धिर्व्रजेद् यत्र विशेषतः । सिद्धिकृच्चाम्बरं स्वच्छं सुदीप्ता भास्करादयः ॥ ४७ ॥ मरुत् सुखावहः स्निग्धः प्रदक्षिणगतिः स्थिरः । दिव्याद्युत्पातनिर्मुक्तः स कालः सिद्धिसूचकः ॥ ४८ ॥ जिस दिशा में जाना हो वह दिशा यदि सर्वथा निर्मल हो तो सिद्धि प्राप्त होती है । स्वच्छ आकाश सिद्धिकारक होता है और सुन्दर प्रकाश युक्त सूर्यादि सुखावह है । शीतल, मन्द, सुगन्ध से युक्त एवं दाहिनी ओर से बहने वाली वायु भी सुखावह होती है । इसी प्रकार दिव्य उत्पात रहित काल भी सिद्धि का सूचक कहा गया है ॥ ४७-४८ ॥ हंसः शुको भरद्वाजः कोकिलः खञ्जरीटकः । मयूरो भ्रमरश्चक्रवाकाद्याः खेचराः शुभाः ॥ ४९ ॥ हंस, शुक, भरद्वाज, कोकिल, खञ्जन, मोर, भ्रमर, चक्रवाकादि पक्षी यात्रा में शुभावह हैं ॥ ४९ ॥ भूचरा नकुलाः सौम्याः सिताहिर्गृहगोधिका । गन्धाखुर्जम्बुकश्चैव सर्वेषां दर्शनं शुभम् ॥ ५० ॥
५५० सात्वतसंहिता पृथिवी पर चलने वालों में नकुल, श्वेत सर्प, गृह गोधिका, विस्तूया, छुछुन्दर, जम्बुक इन सभी का दर्शन शुभावह है ॥ ५० ॥ मृगाणां हरिणः सिंहो व्याघ्रः शशकचित्रका । सिद्धिसंसूचकाः सर्वे सर्वेषां विहितं तु वै ॥ ५१ ॥ जङ्गली जन्तुओं में हरिन, सिंह, बाघ, खरगोश, चिता ये सभी सबके लिये सिद्धि प्रदान करने वाले हैं ॥ ५१ ॥ प्रदक्षिणं विशेषेण व्यत्यये जम्बुकः शुभः । द्विजादिकं रुतं स्निग्धं सिद्धिकृत् तच्च सौख्यदम् ॥ ५२ ॥ ये दक्षिण की ओर होने पर विशेष शुभकारक है । किन्तु जम्बुक बायें दिखाई पड़े तो शुभकारक है । दाहिने पक्षी आदि का मधुर शब्द सिद्धि करने वाला तथा सौख्य प्रदान करने वाला है ॥ ५२ ॥ समुत्पन्ने निमित्ते तु धातुसंक्षेपकर्मणि । प्रतीक्षितुं न युज्येत यदा शान्तिं तदाचरेत् ॥ ५३ ॥ धातु संक्षेप कर्म में शुभ निमित्त दिखाई पड़ने पर प्रतीक्षा न करे । जिससे शान्ति हो वैसा करे ॥ ५३ ॥ पूर्वोक्तां चित्तशुद्ध्यर्थं सविशेषां सदक्षिणाम् । प्रविश्य विधिवत् क्षेत्रं निरीक्षेत स्वतेजसा ॥ ५४ ॥ चित्त शुद्धि के लिये विशेषता के साथ तथा दक्षिणा के साथ क्षेत्र में जाकर अपने तेज से स्वयं क्षेत्र का निरीक्षण करे ॥ ५४ ॥ पश्येच्छिलां गुणवतीं तरुं वा कर्मणि क्षमम् । वर्जयेदतिवृद्धां च परिक्षीणत्वचं तथा ॥ ५५ ॥ क्षेत्र में गुणयुक्त शिला देखे, अथवा बिम्ब कर्म में समक्ष वृक्ष देखे । अत्यन्त बड़ी शिला का वर्जन करे एवं जिस वृक्ष पर त्वचा न हो ऐसे वृक्ष को भी वर्जित करे ॥ ५५ ॥ सभङ्गां दावदग्धां च निश्शब्दां रूक्षविग्रहाम् । सवालुकां च सच्छिद्रां बिन्दुयुक्तां पुटोद्वहाम् ॥ ५६ ॥ जो शिला टूटी हो, दावाग्नि से दग्ध हो, शब्द रहित हो, सर्वथा रूक्ष (शुष्क) हो, बालुका युक्त हो, छिद्र वाली हो, बिन्दु से युक्त हो और जो पुट (पात्र) से वहन करने योग्य हो उसे वर्जित करे ॥ ५६ ॥ आखुदर्दुरमीनाहिमार्जारशशकोपमाम् ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५१ सुवर्णपरवर्णोत्थशिराजालेन सन्तताम् ॥ ५७ ॥ प्रागुक्तरूपस्याभावादमीषां ग्रहणं हितम् । पारावतशुकाब्जाभा मधुमाञ्जिष्ठमाषभा ॥ ५८ ॥ गुर्वी हृद्या शुभा स्निग्धा अतो वान्याभिशस्यते । सुहृद्ये भूतले मग्ना जलाशयतलस्थिता ॥ ५९ ॥ छन्ना तरुवरेणैव वनराजिष्ववस्थिता । वेष्टिता वल्लिवृन्देन तथैवाैषधिभिर्वृता ॥ ६० ॥ चूहा, मेघा, मछली, सर्प, बिल्ली और खरगोश के तुल्य हो, सुवर्ण जाल अथवा अन्य वर्णोत्थ शिरा जाल से सन्तत हो, ऐसी शिला वर्जित करे । यदि गुणवती शिला अप्राप्त हो तब उसके अभाव में इस प्रकार की भी शिला ग्राह्य की जा सकती है । जिसकी आभा कबूतर एवं शुक की आभा के समान हो, अथवा मजीठी, मधु, माष के समान हो, जो गुर्वी हो, मनोहर हो, शुभा हो, चिकनी हो, इस प्रकार की अन्य शिला भी बिम्ब ग्रहण कार्य में प्रशस्त है । अच्छे भूतल से दबी हो, जलाशय के तल में गड़ी हो, उत्तम मङ्गलकारी वृक्षों से ढकी हो, वनराजी में स्थित हो, लताओं से परिवेष्टित हो और जो औषधियों से घिरी हो उसे ग्रहण करे ॥ ५७-६० ॥ ऊर्ध्वगा जानुदेशाच्च एकपिण्डीकृता भृगोः । मोक्षदा च खवक्त्रा वै भोगदा सुतलानना ॥ ६१ ॥ दिङ्मुखी चोभयकरी प्राङ्मूर्धा भूतिरायुषे । अतोऽन्यमस्तका कीर्तिर्यशोवृद्धिकरी मता ॥ ६२ ॥ वंशवृद्धिदमारोग्यशान्तिकृत्कं यदाप्यदिक् । पुष्टिमुन्नतिसन्मेधां यच्छत्युत्तरमस्तका ॥ ६३ ॥ जो जानुदेश से ऊपर स्थित हो, ऊँची शिलाओं से एक पिण्डी के रूप में हो, जिसका मुख ऊपर की ओर हो, ऐसी शिला मोक्षदा होती है । जिसका मुख सुन्दर तला वाला है ऐसी शिला भोग प्रदान करती है । किसी दिशा की ओर जिसका मुख है ऐसी शिला भोग, मोक्ष दोनों देती है । जिसका मुख पूर्व की ओर है ऐसी शिला वैभव और आयुष्य दोनों प्रदान करती है । इसके अतिरिक्त अन्यत्र मस्तक वाली शिला कीर्ति और यश की वृद्धि करने वाली होती है । जिसका शिर पश्चिम दिशा की ओर हो, ऐसी शिला वंश की वृद्धि करती है, आरोग्य एवं शान्ति प्रदान करती है । जिस शिला का मस्तक उत्तर दिशा में हो ऐसी शिला पुष्टि उन्नति तथा सन्मेधा प्रदान करती है ॥ ६१-६३ ॥ एवं पुरा परिज्ञाय पृष्ठोरुचरणं शिरः ।
५५२ सात्वतसंहिता बलात्मना सवीर्येण प्रोद्धृत्य सह शिल्पिभिः ॥ ६४ ॥ प्राङ्मुखं चोत्तरस्या दिक् प्राग्भागे चोत्तराननम्। स्थलेऽवतार्य मन्त्रेशमिष्ट्वा स्रक्चन्दनादिना ॥ ६५ ॥ ध्यात्वा शिलान्तःसंरुद्धं सम्पूज्य जुहुयात् ततः। उक्तदिग्द्वितयस्यैकदेशे कुण्डेऽथवा स्थले ॥ ६६ ॥ दत्वा पूर्णाहुतिं ध्यानजपयुक्तः क्षपेदहः। निशागमेऽर्चनं कुर्याद् बलिभिर्भूततर्पणम् ॥ ६७ ॥ इसी प्रकार शिला का पृष्ठ, ऊरु, अरण और शिर का ज्ञान करे। तदनन्तर शिल्पियों के साथ बलवीर्य लगाकर शिला को उखाड़े। यदि शिला का मुख उत्तर दिशा की ओर हो तो स्वयं पूर्व दिशा में और यदि शिला पूर्व में हो तब अपना मुख उत्तर दिशा की ओर करके शिला को उखाड़े। फिर उसे स्थल पर स्थापित करे। तदनन्तर मन्त्रेश की स्रक्, चन्दन आदि के द्वारा पूजा कर शिला के मध्य में मन्त्र के ईश का पूजन करे। हवन करे, फिर ऊपर कहे गये दिग् द्वितय के एक भाग में, अथवा कुण्ड में, अथवा स्थल में पूर्णाहुति देवे। फिर ध्यान, जप में परायण रहकर दिन बितावे। सन्ध्या होने पर अर्चन करे और बलि देकर भूतसन्तर्पण करे ॥ ६४-६७ ॥ नैवेद्यशेषमश्नीयान्मन्त्रविन्यस्तविग्रहः। तद्दक्षिणेन दर्भेषु प्राक्शिराः प्रस्वपेज्जपन् ॥ ६८ ॥ फिर मन्त्रवेत्ता अपने शरीर में मन्त्र द्वारा न्यास कर नैवेद्य शेष का भोजन करे। तदनन्तर उस शिला के दक्षिण में कुशा स्थापित कर मन्त्र का जप करते हुए पूर्व में कहे गये शुभ स्वप्न की प्राप्ति के लिये पूर्व की ओर शिर कर सो जावे ॥ ६८ ॥ पूर्ववत् स्वप्नलाभार्थमुत्थाय रजनीक्षये। कुर्यात् स्वकृत्यं जुहुयादशुभस्वप्नशान्तये ॥ ६९ ॥ रात बीत जाने पर स्वयं उठकर अपना कृत्य करे। यदि अशुभ स्वप्न दिखाई पड़ा हो तो उसकी शान्ति के लिये होम करे ॥ ६९ ॥ अभिनन्द्य शुभं स्वप्नं हृदयावर्जकं स्फुटम्। यदि स्पष्ट रूप से हृदयाकर्षक शुभ स्वप्न दिखाई पड़ा हो तब उसका अभिनन्दन करे ॥ ७० ॥ पर्वतं च स्वमात्मानं स्थानं तदुपलं स्थलम् ॥ ७० ॥ स्फटिकामलसंकाशं पश्येद् वा तप्तहेमवत्।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५३ निर्धूमाङ्गारकूटाभं तदाशु लभते शुभम् ॥ ७१ ॥ यदि स्फटिक के समान अत्यन्त स्वच्छ अथवा तपाये हुए सुवर्ण की भाँति चमकीला, अथवा धूमरहित अङ्गारे के समान जाज्वल्यमान पर्वत अपना स्थान, अथवा प्रस्तर खण्ड दिखाई पड़े तो उसका फल शीघ्र होता है ॥ ७०-७१ ॥ सशस्त्रमथ चादाय मुद्गरं चास्त्रमन्त्रितम् । प्राङ्मुखश्चतुरो वारांस्ताडयेन्मस्तकावधेः ॥ ७२ ॥ पाददेशाच्च वा मध्यादवेक्ष्य च फलं पुरा । तदनन्तर आराधक अस्त्राभिमन्त्रित सशस्त्र मुद्गर लेकर पूर्वाभिमुख हो फल देखते हुए चार बार शिला का मस्तक पर्यन्त ताडन करे । अथवा पैर पर्यन्त अथवा मध्य पर्यन्त फल का विचार करते हुए ताडन करे ॥ ७२-७३ ॥ चतुरश्रांयतां कृत्वां भिन्नां पीठेन यन्त्रगाम् ॥ ७३ ॥ आनाय्य वा पृथक्पीठां छन्नां कर्मालयं शुभम् । आनुगुण्यपुराणेन विधिना चोद्धरेच्छिलाम् ॥ ७४ ॥ उसके टुकड़े को चौकोर बनाकर पीठ से अलग किसी यन्त्र में स्थापित करे । पीठ से अलग उसे ढककर कर्मालय में ले आकर पुराण होने के कारण उसके अनुगुण विधि के अनुसार इस प्रकार शिला का उद्धार करे ॥ ७३-७४ ॥ पीठार्थं भिन्नवर्णां च तद्रूपां वा यथेच्छया । अङ्गाङ्गिभावगुणवद् दृषदां तु महामते ॥ ७५ ॥ पीठ के लिये भिन्न वर्ण की शिला अथवा उसी के समान रूप वाली अपनी इच्छा के अनुरूप अङ्गाङ्गीभाव के अनुसार गुणयुक्त अन्य शिला ग्रहण करे ॥७५॥ काष्ठलोहमणीनां चाप्यलाभे सति वै शुभम् । सति लाभे न वै कुर्याद्वैषम्यं व्यत्ययं च वा ॥ ७६ ॥ काष्ठ, लौह, मणि के अभाव में शिला का बिम्ब ही शुभदायक होता है । यदि काष्ठ, लौह, मणि आदि बिम्ब के लिये प्राप्त हो जावे तो आराधक विषमता या अदला-बदली न करे ॥ ७६ ॥ तत्काममेव चाहृत्य रत्नाधारशिलां शुभाम् । पुंस्त्रीनपुंसकोत्याभिः शिलाभिस्त्रितयं हितम् ॥ ७७ ॥ बिम्बाख्यं विद्धि चाभावात् सर्वबिम्बोपलात् तु वै। निषिद्धं भगवद्विम्बं रत्नपीठमयोपलात् ॥ ७८ ॥ उसी काष्ठ, लौह, मणि का ही बिम्ब निर्माण करे । यदि रत्नाधार शिला सा० सं० - ३९
५५४ सात्वतसंहिता मिल जावे तो बिना विलम्ब किये उसी को इच्छानुसार ग्रहण करे । पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक इन तीनों प्रकार से बनाया गया बिम्ब सभी प्रकार के बिम्ब के अभाव में हितकारी होता है । रत्न निर्मित पीठ पर अन्य बिम्ब का स्थापन निषिद्ध होता है ॥ ७७-७८ ॥ शिलालक्षणकथनम् लक्ष्म्याद्या देवताकाराः स्वोपलाः सर्वसिद्धिदाः । याऽऽहताऽनलबिन्दून् वै सनादमभिमुञ्चति ॥ ७९ ॥ पुमानिति शिला सा वै निस्तेजा सस्वनाऽबला । आदिमध्यावसानेषु नाग्निर्यस्या न च ध्वनिः ॥ ८० ॥ अब शिला के लक्षण कहते हैं—लक्ष्मी के आदि देवता के समान शिला सर्व सिद्धिदायिनी होती है । जो शिला आहत करने पर शब्द के साथ चिनगारी उत्पन्न करे वह शिला पुरुष है । जिसमें तेज नहीं है, मजबूती भी नही है, वह स्त्री शिला है । जिस शिला के आदि एवं मध्य में तथा अन्त में अग्नि न हो, शब्द न हो, वह शिला नपुंसक है ॥ ७९-८० ॥ नपुंसकेति सा ज्ञेया स्वपदस्था फलप्रदा । शिलाग्रहणमित्युक्तं दारुग्रहणमुच्यते ॥ ८१ ॥ ऐसी शिला अपने स्थान पर रहकर ही फल देती है । यहाँ तक बिम्ब के लिये शिला ग्रहण कहा गया । अब काष्ठ ग्रहण का विधान कहते हैं ॥ ८१ ॥ दारुग्रहणकथनम् आपर्वतान्तःसञ्चारो निर्व्रणं सरलं बृहत् । रोगमुक्तं न सिंहाद्यैः प्राङ्नखैः सक्षतीकृतम् ॥ ८२ ॥ नानिलाशनिदावाग्निहतवीर्यं न बाह्यगम् । सलक्षणे तु सुस्निग्धे भूभागे चोन्नते स्थितम् ॥ ८३ ॥ प्राग्वत् तमधिवास्यादौ परेऽहन्यर्चयेत् ततः । तदाश्रितामविज्ञातस्वरूपां देवतां पठन् ॥ ८४ ॥ इहाश्रितात्मने तुभ्यं नमः सर्वेश्वराय च । क्षमस्वावतरान्यत्र सन्तिष्ठात्र चिदात्मना ॥ ८५ ॥ जो पर्वत के अन्त तक (भीतरी भाग) पहुँचा हुआ है और प्राण रहित है, सीधा है, महान् है, उसके किसी भाग में रोग नहीं है, जिस पर सिंहादि द्वारा नखक्षत नहीं किया गया है, दावाग्नि, बिजली, अग्नि द्वारा जिसकी शक्ति क्षीण
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५५ नहीं हुई है, जो बाहर तक फैला है, जो लक्षण युक्त अत्यन्त चिकने भूभाग पर ऊँचे रूप में अवस्थित है। ऐसे दारु वाले वृक्ष को प्रथम अधिवासन करे। फिर दूसरे दिन उसका 'तदाश्रितामवज्ञातां ... सन्तिष्ठात्र चिदात्मना' पर्यन्त मन्त्र का पाठ करते हुए अर्चन करे ॥ ८२-८५ ॥ अथास्त्रोदकशुद्धेन विलिप्तेन घृतादिना । जपन् मन्त्रवरं वौषट् छिन्द्याद् वै क्रकचादिना ॥ ८६ ॥ तदनन्तर 'वौषट्' इस श्रेष्ठ मन्त्र का पाठ करते हुए अस्त्रोदक से शुद्ध घृतादि से अनुलिप्त क्रकच (आरा) से उस वृक्ष का छेदन करे ॥ ८६ ॥ प्राच्यामुदीच्यामैशान्यां पतत्यभिमुखं यदि । परिज्ञेयं शुभं कुर्यादन्यपातेऽर्चनादिकम् ॥ ८७ ॥ यदि वह वृक्ष पूर्व उत्तर अथवा ईशान दिशा में गिरे तब शुभ समझे। यदि अन्य दिशा में गिरे तब उसका अर्चन करे ॥ ८७ ॥ अनार्यं देवभागं चाप्यनादेयेन वै विना । बिम्बमिच्छति वै कर्तुं वार्क्षं चैवातिविस्तृतम् ॥ ८८ ॥ अनेकभुजवक्त्रास्त्रभूषितं तत् तरूत्थितैः । भिन्नैरवयवैर्मानयुक्तैः शिष्टैर्न दुष्यति ॥ ८९ ॥ उस वृक्ष के अनार्य भाग का त्याग कर देवभाग को ग्रहण करे। उसके भिन्न-भिन्न अवयवों (टुकड़ों) से मान (नाप) युक्त अनेक भुज, अनेक वक्त्र, अनेक अस्त्रों से युक्त जो बिम्ब निर्माण करता है ऐसे बिम्ब की शिष्ट लोग प्रशंसा करते हैं ॥ ८८-८९ ॥ बिम्बस्य मानोन्मानादिलक्षणकथनम् भक्तिश्रद्धावशाच्चैव सर्वं चार्णमयं यतः । एवमेकतमस्यापि भक्तिपूर्वस्य वस्तुनः ॥ ९० ॥ संग्रहं च पुरा कृत्वा कुर्यादाकारमीप्सितम् । तादर्थ्येन तु सामान्यं सौम्यमानं पुरा शृणु ॥ ९१ ॥ अथ बिम्बस्य सामान्यतो मानोन्मानादिलक्षणमाह—एवमेकतमस्यापीत्यारभ्य अयुग्जन्मोत्थितं शुभमित्यन्तम् ॥ ९१-१६० ॥ यतः भक्ति और श्रद्धा के कारण सभी वृक्ष शिलादि मन्त्रमय हैं। यहाँ तक 'सच्छैलदारुग्रहणम्' यहाँ से लेकर 'सर्व चार्णमयं ततः पर्यन्त 'शिला दारु संग्रहण' का विधान कहा (द्र २४.३३-९०) गया है। अब बिम्ब का सामान्य प्रकार से
५५६ सात्वतसंहिता मान एवं उन्मान कहते हैं—इस प्रकार किसी एक वस्तु का भक्तिपूर्वक संग्रह कर अपने अभीष्ट आकार का बिम्ब निर्माण करे । अब हे सङ्कर्षण ! बिम्ब के आकार का मान सुनिये ॥ ९१ ॥ ऋज्वाख्यमविकारं च व्यापकं त्वेकमूर्तिमत् । भूभागे सुसमे श्लक्ष्णे मानमुत्कीर्य तेन वै ॥ ९२ ॥ निरूप्यावयवानां च लक्ष्म विस्तृतपूर्वकम् । जो ऋजु हो, व्यापक हो, एक मूर्त्ति में रहने वाला हो, ऐसे मान समतल चिकने वाले भूभाग पर खोद कर लिख लेवे । फिर विस्तारपूर्वक तत्तद् अङ्गावयवों के समस्त लक्षणों को अच्छी तरह देख कर बिम्ब निर्माण करे ॥ ९२-९३ ॥ मानपरिभाषाविधानम् अष्टाधिकशतांशो यः स्वोन्नतेरङ्गुलं च तत् ॥ ९३ ॥ द्वे अङ्गुले कलानेत्रं गोलकं भाव एव च । अङ्गुलादष्टभागो यः स यवः परिकीर्तितः ॥ ९४ ॥ षट्कलं च परिज्ञेयं तालं बिम्बादिकर्मणि । मुखाङ्गनाभिमेढ्रक्ष्मास्तालमानास्त्वथोरुयुक् ॥ ९५ ॥ द्विकले च तथा जङ्घे गुल्फं जानुर्गलाञ्चकम् । त्र्यङ्गुलं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयमित्युन्मानमुदाहृतम् ॥ ९६ ॥ अब मान कहते हैं—मनुष्य की अपनी-अपनी ऊँचाई का मान एक सौ अङ्गुल कहा गया है । उसका १०८ वाँ भाग एक अङ्गुल होता है । दो अङ्गुल कला, नेत्र गोलक अथवा भाव कहा जाता है । एक अङ्गुल का आठवाँ भाग ‘यव’ कहा जाता है । छः कला का एक ताल होता है, जिसका उपयोग बिम्बादि कर्म में किया जाता है । मुखाङ्ग, नाभि, मेढ्र, क्ष्मा का मान एक ताल होता है तथा दोनों ऊरु दो-दो कला के होते हैं । जङ्घा, गुल्फ, जानु और गलाञ्चक तीन-तीन अङ्गुल के होने चाहिये । इस प्रकार उन्मान का निरूपण किया गया ॥ ९३-९६ ॥ जटाधराणां बिम्बानां दीर्घह्रस्ववशेन तु । चतुष्कलं च त्रिकलं मानं मानाद् बहिः क्षिपेत् ॥ ९७ ॥ जटाधारी बिम्बों के बड़े और छोटे होने के कारण चार कला का और तीन कला का मान कहा गया है । वह मान से बाहर भी हो सकता है ॥ ९७ ॥ त्रिपञ्चसप्तशिखरो मौलिरष्टकलोन्नतः ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५७ निर्जटानां ललाटोर्ध्वं मकुटं वा सुशोभनम् ॥ ९८ ॥ तालेन ह्रासवृद्धी तु कार्ये त्वत्र व्यपेक्षया । यथोदितेषु भागेषु एकैकेनाङ्गुलेन तु ॥ ९९ ॥ तीन, पाँच, सात शिखर का मौलि (मुकुट) आठ कला ऊँचा होना चाहिये । जटा रहित बिम्ब का ललाट के ऊपर सुन्दर मुकुट बनाना चाहिये । इसमें अपेक्षा के अनुसार यथोदित भाग में एक अङ्गुल से ताल पर्यन्त माप में घटा बढ़ी की जा सकती है ॥ ९८-९९ ॥ आस्यनासाललाटार्थं वदनांशं भजेत् त्रिधा । ततोऽग्रतः कलामानं घ्राणं स्यात् तिलपुष्पवत् ॥ १०० ॥ कलार्धेन तु विस्तारः सोन्नतिस्तत्पुटद्वये । नासाग्रग्रासनिर्मुक्तं गोजीमानं चतुर्यवम् ॥ १०१ ॥ तच्चतुर्यवमानेन घ्राणाग्रेणान्तरीकृतम् । अर्धाङ्गुलं चोत्तरोष्ठमधरोष्ठं तु चाङ्गुलम् ॥ १०२ ॥ मुख नासिका तथा ललाट के लिये मुख को तीन भागों में विभक्त कर बनाना चाहिये । उसमें सबसे आगे कला मान का घ्राण तिल पुष्प के समान बनाना चाहिये । नासिका के दोनो पुटों को ऊँचाई के साथ आधे कला के विस्तार (२ को) से युक्त बनावे । नासाग्र और ग्रास से बाहर गोजीमान चार यव का होना चाहिये । वह चार यव मान वाले घ्राण के अग्रभाग से अन्तरीकृत होना चाहिये । ऊपर का ओठ आधा अङ्गुल मोटा तथा अधरोष्ठ एक अङ्गुल मोटा होना चाहिये ॥ १००-१०२ ॥ गोलकं चिबुकं विद्धि सृक्किण्यौ चतुरङ्गुले । आद्यस्य नासिकांशस्य मध्यभागसमाश्रिते ॥ १०३ ॥ कुर्यान्नेत्रश्रुतिच्छिद्रे तत्र नेत्रे कलान्तरे । कलायामसमं दैर्घ्यात् कलार्धेन तु विस्तृतम् ॥ १०४ ॥ चिबुक गोलक प्रमाण का तथा दोनों सृक्किणी चार अङ्गुल प्रमाण में होनी चाहिये । पहली नासिका के मध्य भाग का आश्रय लेकर नेत्र और कान का छिद्र निर्माण करे । दोनों नेत्रों में एक कला का अन्तर होना चाहिये । उसकी लम्बाई एक कला और चौड़ाई आधी कला बनानी चाहिये ॥ १०३-१०४ ॥ यदुत्पलदलाकारं द्वियवेनाधिकं तु तत् । कुर्यात् पद्मदलाकारं नेत्रार्थं वृत्ततारकम् ॥ १०५ ॥
५५८ सात्वतसंहिता तारादैर्घ्यत्रिभागेन त्वाद्यस्यान्यस्य वाधिका। यवेनैकेन सार्धेन ज्योतिस्तत्पञ्चभागिकम्॥ १०६ ॥ जिसके नेत्र और कान कमल के समान बड़े हों, उन्हें दो यव से अधिक निर्माण करना चाहिए। गोलाकार तारे से युक्त नेत्र का अर्ध भाग कमल पत्र के आकार का बनावे। नेत्र का तारा चौड़ाई के तीन भाग में अथवा अन्य की अपेक्षा अधिक मान में निर्माण करे। उसके पाँचवे भाग में डेढ़ (१ १/२) यव ज्योति निर्माण करे॥ १०५-१०६ ॥ त्रिभागेनापि विहितं तत्पद्मदललोचन। द्विषड्यवं नेत्रकोशं विस्तरेण यवाधिकम्॥ १०७ ॥ हे पद्मलोचन! उस ज्योति का निर्माण तीसरे अंश से भी किया जा सकता है। नेत्र कोश बारह यव का तथा चौड़ाई में एक यव से अधिक निर्माण करना चाहिए॥ १०७ ॥ सार्धाङ्गुलद्वयं दैर्घ्याद् भ्रूलते द्विकले स्मृते। मध्यतो द्वियवे बालचन्द्रतुल्ये क्रमक्षते॥ १०८ ॥ भ्रूलता (भौंहें) ढाई अङ्गुल चौड़ी तथा दो कला की होनी चाहिये। दोनों मध्य बाल चन्द्रमा के समान टेढ़ी और क्रम क्षत दो यव की बनावे॥ १०८ ॥ तदन्तरं कलार्धं च तत्कोटी समसूत्रके। श्रोत्रे द्व्यङ्गुलविस्तीर्णे आयामेन द्विगोलके॥ १०९ ॥ उस भ्रू के दोनों किनारे समसूत्र तथा कलार्ध होने चाहिये। कान दो अङ्गुल चौड़े तथा लम्बाई में दो गोलक निर्माण करे॥ १०९ ॥ द्वियवः कण्ठपरिधिः पर्वणी द्वे चतुर्यवे। मध्यं ताभ्यां तथा विद्धि द्रोणी सार्धाऽङ्गुलाऽत्र वै॥ ११० ॥ कण्ठ की गोलाई दो यव तथा दोनो पर्व चार यव का बनाना चाहिये। उन दोनों का मध्य तथा द्रोणी डेढ़ १ १/२ अङ्गुल का बनाना चाहिये॥ ११० ॥ कलार्धेन तु तच्छिद्रं पाशमानं यथारुचि। अङ्गुलाद् द्विकलान्तं तु वैषम्यमपि तत्र यत्॥ १११ ॥ उसके छिद्र का मान आधा कला तथा पाश का मान इच्छानुसार करे। उसमें विषमता एक अङ्गुल से लेकर दो कला पर्यन्त होनी चाहिये॥ १११ ॥ अन्तश्छिद्रविनिर्मुक्तं तद्विज्ञेयं चतुर्यवम्। सदलं करणोपेतमेवं श्रोत्रद्वयं स्मृतम्॥ ११२ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५९ भीतरी भाग में छिद्र से विनिर्मुक्त चार यव के मान का सदल करणोपेत दोनो श्रोत्र होना चाहिये ॥ ११२ ॥ चतुष्कलं ललाटं तु शिखरे द्विगोलके । उच्छ्रायात् त्र्यङ्गुले चैव अग्रतोऽङ्गुलविस्तृते ॥ ११३ ॥ ललाट का विस्तार चार कला का तथा दोनों शिखर दो गोलक का होना चाहिये । उसकी ऊँचाई तीन अङ्गल तथा उसका अग्रभाग एक अङ्गुल विस्तृत होना चाहिये ॥ ११३ ॥ केशभूमेः समुद्भूतं ललाटोपरि संस्थितम् । कुर्यात् कलार्धमानं तु वक्त्रं चालकसञ्चयम् ॥ ११४ ॥ केश भूमि में उत्पन्न होने वाला ललाट के ऊपरी भाग में स्थित होने वाला मुख तथा अलक समूह (केश) कला के अर्धमान का होना चाहिये ॥ ११४ ॥ कपोलपरिधिं कुर्यात् कर्णात् कण्ठगतं समम् । तन्मध्ये वर्तुलौ गण्डौ परिच्छिन्नौ पुरोदितैः ॥ ११५ ॥ कान से आरम्भ कर कण्ठ पर्यन्त परिधि (गोला) का निर्माण करे उसके बीच में परिच्छिन्न और गोलाकार दो गण्डस्थल निर्माण करे ॥ ११५ ॥ शिरसः परिणाहं तु विद्धि षट्त्रिंशदङ्गुलम् । श्रोत्रकोटिद्वयाच्चैव मस्तकस्य यदन्तरम् ॥ ११६ ॥ तत्षोडशाङ्गुलं विद्धि वर्तिभ्यां पृष्ठतस्तथा । सार्धतालं परिज्ञेयं ललाटात् कगुहान्तरम् ॥ ११७ ॥ शिर का परिणाह (गोलाई) ३६ अङ्गुल में निर्माण करे, दोनों कान से लेकर मस्तक पर्यन्त १६ अङ्गुल होना चाहिये । ललाट से नासिका के छिद्र का अन्तर डेढ़ ताल (१ १/२) समझना चाहिये ॥ ११६-११७ ॥ सत्कम्बुसदृशी ग्रीवा मूलमध्याग्रतो हि सा । परिधेर्द्वादशकला एकविंशाङ्गुलाग्रतः ॥ ११८ ॥ बिम्ब की ग्रीवा मूल, मध्य तथा अग्रभाग में उत्तम प्रकार के शङ्ख के समान होनी चाहिये । परिधि से उसका मान द्वादश कला तथा आगे से २१ अङ्गुल होना चाहिये ॥ ११८ ॥ अष्टादशाङ्गुला चैव स्वांशात् त्र्यंशेन विस्तृता । तन्मूलं विस्तृतौ स्कन्धौ तुङ्गौ वृत्तायतौ समौ ॥ ११९ ॥ अथवा १८ अङ्गुल का होना चाहिये, उसका विस्तार अपने अंश से तीसरे
५६० सात्वतसंहिता अंश तक होना चाहिये। ग्रीवा का मूल एवं दोनों कन्धा विस्तृत, ऊँचा, गोल तथा आयताकार एवं सम होना चाहिये। उसका बाहुल्य छः अङ्गुल का होना चाहिये ॥ ११९ ॥ षडङ्गुलं तद्बाहुल्यं बाहुमानमथोच्यते। स्कन्धोत्तमाङ्गं त्रिकलं सन्ध्यन्तं षट्कलं स्मृतम् ॥ १२० ॥ अब बाहु का मान कहते हैं—कन्धे से लेकर शिर का मान तीन कला का और सन्ध्यन्त छः कला का कहा गया है ॥ १२० ॥ सन्धेर्वै मणिबन्धान्तं मानं नवकलं स्मृतम्। मणेर्मध्यमशाखान्तो हस्तः सप्ताङ्गुलो मतः ॥ १२१ ॥ सन्धि से लेकर मणिबन्ध तक का मान नव कला कहा गया है। मणि बन्ध से लेकर मध्यमाङ्गुलि पर्यन्त हाथ का मान सात अङ्गुल कहा गया है ॥ १२१ ॥ परिज्ञेयं कलाहीनं तन्मानं मध्यमाङ्गुलेः। तच्चतुर्यवहीना च साऽनामा तु प्रदेशिनी ॥ १२२ ॥ द्विकला च परिज्ञेया साङ्गुष्ठा तु कनीयसी। द्विपर्वा च स्मृतोऽङ्गुष्ठः सर्वाश्चाङ्गुलिविस्तृताः ॥ १२३ ॥ मणिबन्ध का मान मध्यमाङ्गुलि से एक कला कम समझना चाहिये और उससे चार यव कम अनामिका का तथा प्रादेशिनी का मान कहा गया है। कनिष्ठिका अङ्गुलि तथा अङ्गुष्ठ का मान दो कला कहा गया है। अङ्गुष्ठ में दो पर्व होते हैं, उसकी अपेक्षा सभी अङ्गुलियाँ लम्बी कही गई हैं ॥ १२२-१२३ ॥ सर्वासां मूलपर्यन्ताद् ह्रासयेच्च यवं यवम्। अग्रपर्वाधंमानेन कार्या लिङ्गोपमा नखाः ॥ १२४ ॥ सभी अङ्गुलियाँ मूल पर्यन्त परस्पर एक दूसरे से एक-एक यव कम हैं आगे के पर्व के आधे के मान में अङ्गुली की आकृति के समान नख का निर्माण करना चाहिए ॥ १२४ ॥ मानमङ्गुष्ठमूलस्य परिधेश्चतुरङ्गुलम्। तच्चतुर्यवहीनं च ज्ञेयं त्रिष्वङ्गुलीषु च ॥ १२५ ॥ अङ्गुष्ठ के मूल का मान परिधि की अपेक्षा चौगुना कहा गया है। शेष तीन अङ्गुलियों में वह मान चार यव कम होता है ॥ १२५ ॥ न्यूनाङ्गुलेः कला सार्धा प्राग्वद् ह्रासश्च वेष्टनात्। अङ्गुष्ठमङ्गुलं चाग्रात् तिस्रोऽन्याः षड्यवाः स्मृताः ॥ १२६ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६१ अर्धाङ्गुलाग्रतो न्यूना विद्धि मध्यं क्रमक्षतम् । निजलक्ष्मोपलं चाग्रात् साङ्गुलं द्विकलं करम् ॥ १२७ ॥ कनिष्ठा अङ्गुली सार्ध कला (१ १/२) तथा अङ्गुष्ठ मूल वेष्टन से कम होनी चाहिये । अन्य तीन अङ्गुलियाँ छः यव की कही गई हैं । मध्य अङ्गुलि आगे से आधा अङ्गुल कम तथा क्रमशः हीन निर्माण करे ॥ १२६-१२७ ॥ ईषन्निम्नतलं चैव लक्ष्मरेखाविभूषितम् । शाखामूलावधेः पाणी बाहुल्यं द्वे यवेऽङ्गुलम् ॥ १२८ ॥ चतुर्यवाधिकं चैव मणिबन्धावधेः स्मृतम् । मध्ये कलार्धहीनं तु तद्बाहुल्यमुदाहृतम् ॥ १२९ ॥ ईषन्निम्नतल तथा लक्ष्मरेखा से विभूषित अङ्गुली पर्यन्त हाथ का निर्माण करे और उसका बाहुल्य दो यव युक्त एक अङ्गुल बनाये तथा मणिबन्धावधि पर्यन्त चार यव से अधिक निर्माण करे । उसका बाहुल्य मध्य में आधा कला से कम रखे ॥ १२८-१२९ ॥ मणिबन्धावधेर्बाहुवेष्टनं षट्कलं स्मृतम् । सन्धेः सप्तकलं विद्धि साङ्गुलं त्रियवच्युतम् ॥ १३० ॥ हीनमर्धाङ्गुलेनैव मूलाद् वै नवगोलकम् । तथैव सन्धेरूर्ध्वात् तु विस्तारः प्राग्वदत्र च ॥ १३१ ॥ मणिबन्ध पर्यन्त बाहु का वेष्टन छः कला का निर्माण करे । सन्धि सात कला की तथा तीन यव कम एक अङ्गुल युक्त होनी चाहिए । वह मूल से आधा अङ्गुल कम नव गोलक की होनी चाहिये । उसी प्रकार सन्धि की लम्बाई भी बनावे ॥ १३०-१३१ ॥ अत्रापि पूर्ववद् दृष्ट्या कार्याऽन्तःस्था क्षितिः स्वयम् । तालं गलावधेस्त्यक्त्वा तन्मानेनान्तरीकृतम् ॥ १३२ ॥ यहाँ भी पहले की तरह गले की अवधि से एक ताल स्थान त्याग देवे और उतने ही मान के अन्तर में दृष्टि पर्यन्त भीतरी स्थान खाली रहने दे ॥ १३२ ॥ स्तनद्वयं समं कुर्यात् तद्धारा च समांसला । निम्नं हृद्गोलकार्धेन ऊर्ध्वतो रत्नराड्यूतम् ॥ १३३ ॥ दोनों स्तन समान आकृति में निर्माण करे । उसकी धार मांसल (मोटा) युक्त बनावे । उसका निचला भाग हृद्गोलक के आधे भाग से तथा ऊपरी भाग रत्नराज से युक्त बनावे ॥ १३३ ॥
५६२ सात्वतसंहिता स्तनाभ्यां त्रिकलौ पार्श्वौ त्रियवं स्तनमण्डलम् । यवोन्नतं तथा चाग्राद् विस्तृतं तेन चूचुकम् ॥ १३४ ॥ पार्श्व भाग स्तन से दूर दो कला का बनावे । स्तनमण्डल तीन यव का बनावे । स्तन का चुचुक आगे की ओर बढाते हुए एक-एक यव ऊँचा बनावे ॥ १३४ ॥ लोचनं त्रियवं सार्धं कक्षमानमुदाहृतम् । स्कन्धमानविनिर्मुक्तं पृष्ठमंसावधेः समम् ॥ १३५ ॥ कक्ष (काँख) का मान साढे तीन यव युक्त लोचन निर्माण करे । उसे स्कन्ध के मान से अलग रखे । पीठ एवं कन्धे तक उसे समान रूप में निर्माण करना चाहिए ॥ १३५ ॥ द्रोणीनिकाशसदृशं मध्यराशेः समांसलम् । कक्षान्तर्वेष्टनं विद्धि पञ्चतालं सुलोचनम् ॥ १३६ ॥ वह द्रोणी (दोना) के समान हो । मध्यराशि से मांसल युक्त हो । कक्षान्तर का वेष्टन पञ्चताल मान का होना चाहिए ॥ १३६ ॥ विनाङ्गुलद्वयेनैव द्वे ताले द्विगुणीकृते । यवत्रयसमायुक्ते विद्धि तत्कुक्षिवेष्टनम् ॥ १३७ ॥ त्रियवोनं कलामानं विज्ञेयं नाभिमण्डलम् । तन्मानं त्रियवोनं तु तन्निम्नत्वं विधीयते ॥ १३८ ॥ उस कुक्षि का वेष्टन दो अङ्गुल कम दो ताल का दुगुना करे । उसमें तीन यव और मिला देवे तब कुक्षि का वेष्टन बन जाता है । तीन यव से कम कला मान का नाभिमण्डल निर्माण करे । उसकी गहराई तीन यव से कुछ कम करे ॥ १३७-१३८ ॥ परिधिर्नाभिमध्ये तु त्रितालः सत्रिलोचनः । षड्गोलकं च तन्मानपरिध्यर्थं कटेः स्मृतम् ॥ १३९ ॥ नाभि के मध्य की परिधि सत्रिलोचन तीन ताल की बनावे । कटि पर्यन्त परिधि के लिये उसका मान छः गोलक करे ॥ १३९ ॥ करिकुम्भोपमौ पीनौ परितः पञ्चगोलकौ । स्फिजौ कौपीनराजी च द्व्यङ्गुला मूलतः स्मृता ॥ १४० ॥ हाथी के कुम्भ के समान मोटा, चारों ओर पाँच गोलक का परिमाण वाला स्फिक् (नितम्ब) करे कौपीन राजी मूल से दो अङ्गुल की बनावे ॥ १४० ॥ परितोऽङ्गुलमाना सा मेढ्रं तु त्रिकलं स्मृतम् ।
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६३ चतुर्यवं च तत्कोशं वेष्टनं तु षडङ्गुलम् ॥ १४१ ॥ द्व्यङ्गुलौ वृषणौ दैर्घ्यान्मूलान्तसमविस्तृतौ । परितो द्व्यङ्गुलं विद्धि वायुरन्ध्रं सुवर्तुलम् ॥ १४२ ॥ वह चारों ओर एक अङ्गुल प्रमाण में होनी चाहिये । मेढ्र (लिंग) तीन कला का होना चाहिये और उसका कोश चार यव का होना चाहिये । उसकी गोलाई छः अङ्गुल होनी चाहिये । अण्डकोश लम्बाई चौड़ाई में समान दो अङ्गुल का तथा वायु का रन्ध्र (गुदा) चारों ओर से गोला दो अङ्गुल का बनावे ॥ १४१-१४२ ॥ ऊरुमानं परिज्ञेयं मध्यभूमेर्नवाङ्गुलम् । षट्कलं मूलदेशाच्च अग्रान्तं त्रिकलं स्मृतम् ॥ १४३ ॥ मध्य भूमि से नव अङ्गुल के मान का ऊरु होना चाहिये । मूल देश से छः कला का तथा अग्रान्त तीन कला का होना चाहिये ॥ १४३ ॥ हीनमेकाङ्गुलेनैव द्विकलं जानुमण्डलम् । विस्तारेणोन्नतत्वेन चतुर्यवसमं तु तत् ॥ १४४ ॥ एक अङ्गुल से कम दो कला मान का जानु मण्डल होना चाहिये । विस्तार और उन्नति में उसे ४ यव का बनाना चाहिये ॥ १४४ ॥ जङ्घामूले परिज्ञेयं वेष्टनं नवगोलकम् । द्विसप्ताङ्गुलकं मध्ये सार्धपञ्चाङ्गुलं ततः ॥ १४५ ॥ जङ्घा, मूल में वेष्टन का मान नव गोलक होना चाहिये । मध्य में चौदह अङ्गुल और उसके बाद साढ़े पाँच अङ्गुल होना चाहिये ॥ १४५ ॥ अत्रापि वेष्टनाद् विद्धि तृतीयांशेन विस्तृतम् । मध्यमूलावसानेभ्यो विस्तारमनुगुण्य तु ॥ १४६ ॥ यहाँ पर भी वेष्टन से मध्य, मूल तथा अन्त तक का विस्तार तृतीयांश से विस्तृत करे ॥ १४६ ॥ भुजाभ्यां मध्यदेशस्य तथाङ्गुलिगणस्य च । ऊरुयुग्मस्य जङ्घाभ्यामापाद्या द्विपहस्तता ॥ १४७ ॥ दोनों भुजाओं के मध्य देश अङ्गुलिगणों को, दोनों ऊरुओं को, दोनों जाङ्घों को हाथी के हाथ के समान उतार चढ़ाव युक्त निर्माण करे ॥ १४७ ॥ सतालभागमानं च दैर्घ्यं वै चारणं स्मृतम् । पार्ष्णी द्विगोलकतते तन्मध्ये साङ्गुले कले ॥ १४८ ॥
५६४ सात्वतसंहिता चरण की दीर्घता ताल के भाग के मान के अनुसार होनी चाहिये। पाष्र्णी दो गोलक विस्तृत होना चाहिये। उन दोनों का मध्य एक अङ्गुलि सहित दो कला होना चाहिये ॥ १४८ ॥ त्रिकलं चायताञ्चैव बाहुल्येन कलासमम्। पादमङ्गुष्ठनिकटात् त्रियवोनं प्रकीर्तितम् ॥ १४९ ॥ बाहुल्यं च कलामानं गुल्फदेशाच्च साङ्गुलम्। कनीयोऽङ्गुलिमूलाच्च गुल्फान्तं पिण्डिकाङ्गुलम् ॥ १५० ॥ आगे से तीन कला बाहुल्य होना चाहिए और एक कला के समान अङ्गुष्ठ के निकट से पाद का मान तीन यव कम कहा गया है। गुल्फ प्रदेश से कला मान अङ्गुलि सहित एक कला रखे। कनिष्ठ अङ्गुलि के मूल से लेकर गुल्फ पर्यन्त पिण्डिका एक अङ्गुल निर्माण करनी चाहिए ॥ १४९-१५० ॥ जङ्घावसानदेशाच्च वेष्टनं सप्तलोचनम्। कलाहीनं तदैवाग्रात् परिणाहो विधीयते ॥ १५१ ॥ जङ्घा के अन्त तक वेष्टन (= गोलाई १) सात लोचन रखे। उसके आगे से परिणाह कलाहीन निर्माण करे ॥ १५१ ॥ चरणं विधिनानेन कूर्मपृष्ठं समाप्य च। त्र्यङ्गुलेन च तद्धैर्ध्यादङ्गुष्ठस्य च दीर्घता ॥ १५२ ॥ इस प्रकार कूर्मपृष्ठ के समान चरण का निर्माण समाप्त कर उसकी लम्बाई से तीन अङ्गुल के परिमाण में अङ्गुष्ठ का लम्ब निर्माण करे ॥ १५२ ॥ पञ्चाङ्गुलः परिज्ञेयः परिधिस्तस्य लाङ्गलिन्। यवद्वयाधिका कार्या तद्धैर्ध्यात् तु प्रदेशिनी ॥ १५३ ॥ हे लाङ्गलिन्! उसकी परिधि पाँच अङ्गुल निर्माण करे और प्रदेशिनी अङ्गुलि अङ्गुष्ठ की लम्बाई की अपेक्षा दो यव अधिक निर्माण करे ॥ १५३ ॥ अङ्गुष्ठायामतुल्याऽथ कार्या वै पादमध्यमा। मध्याङ्गुलेर्द्विरष्टांशहीना तदनु या स्थिता ॥ १५४ ॥ अङ्गुष्ठ के आयाम के तुल्य पैर की मध्यमा अङ्गुलि का निर्माण करे। मध्यमा अङ्गुलि के बाद जो (अनामिका) अङ्गुलि स्थित है उसका निर्माण मध्यमा की अपेक्षा १६ अंश कम में करे ॥ १५४ ॥ तद्वत् तदनुगा या च त्रिपर्वास्तास्तु पूर्ववत्। संयुक्ता नखजालेन कूर्मपृष्ठोपमेन च ॥ १५५ ॥
चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६५ उसी प्रकार उसके बाद वाली अङ्गुली जिसमें तीन ही पर्व (गाँठ) है वह उस कनिष्ठा का निर्माण करे। सभी अङ्गुलियाँ नखजाल से संयुक्त तथा कूर्मपृष्ठ के समान निर्माण करे ॥ १५५ ॥ द्विकलं तु कलाधोनं पादतर्जनिवेष्टनम्। चतुश्चतुर्यवोनं च तच्छेषाणां प्रकीर्तितम् ॥ १५६ ॥ पैर की तर्जनी का वेष्टन आधा कला कम कर दो कला का निर्माण करे। शेष अङ्गुलियों का वेष्टन क्रमशः ४-४ यव निर्माण करे ॥ १५६ ॥ त्र्यंशेन वेष्टनाद् विद्धि सर्वासां चैव विस्तृतिम्। सर्वा समांसलाः सौम्याः समास्त्ववयवाः शुभाः ॥ १५७ ॥ सभी अङ्गुलियों का विस्तार वेष्टन (गोलाई) की अपेक्षा तृतीयांश कम रखे। वे सभी अङ्गुलियाँ मांसल युक्त सौम्य तथा समान अवयव वाली हों तो शुभकारक कही गई है ॥ १५७ ॥ दर्शनावलिबाह्यस्थे दंष्ट्रे सप्तयवोन्नते। यवद्वयोन्नतं मानं मध्यदन्तचतुष्टये ॥ १५८ ॥ दर्शनावलि के बाहर वाले दो दाँत सात यव ऊँचे बनावे। शेष मध्य का चार दाँत दो यव उन्नत बनावे ॥ १५८ ॥ तत्पक्षाणां सर्वेषां मानं विद्धि चतुर्यवम्। त्रियवं द्विजविस्तारमग्रान्मूलाद् यवद्वयम् ॥ १५९ ॥ उसके पक्ष में रहने वाले सभी दाँतों का मान चार यव बनाना चाहिये। उनका विस्तार दो यव और उसके आगे का तथा मूल का विस्तार भी दो यव निर्माण करे ॥ १५९ ॥ तत्सार्धं मध्यदेशाच्च सर्वे दन्ता निरन्तराः। लोम प्रदक्षिणावर्तमयुग्जन्मोत्थितं शुभम् ॥ १६० ॥ मध्यदेश के साथ-साथ सभी दाँत अन्तररहित निर्माण करे। लोम प्रदक्षिणा- वर्त्त करे तथा उसमें विषय लोभ उत्पन्न हों तो वे शुभावह कहे गये हैं ॥ १६० ॥ सुनिश्चितं हितं चैतन्मानमव्यभिचारि यत्। मनोहारित्वमेकत्र रूपलावण्यभूषितम् ॥ १६१ ॥ सर्वदा चानयोर्विद्धि अन्योन्यत्वेन संस्थितिम्। एवमुक्तस्य मानादेः किञ्चिद्वैषम्येऽपि सौंदर्यातिशयविशिष्टं चेद् बिम्बमुपादेयम्, सौंदर्याभावेऽपि मानयुक्तं चेत् तदपि ग्राह्यम्। ताभ्यां द्वाभ्यामप्युज्झितं चेत्, तत्
५६६ सात्वतसंहिता त्याज्यमिति सलौकिकदृष्टान्तमाह—सुनिश्चितमिति सार्धैश्चतुर्भिः ॥ १६१-१६५ ॥ इस प्रकार पूर्व में कहे गये मान की अपेक्षा बिम्ब में मान की विषमता होने पर भी यदि वह सौन्दर्यातिशय से विशिष्ट है तो वह उपादेय (संग्राह्य) है । यदि सौन्दर्यादि गुण से रहित है किन्तु मान से प्रमाणित है तो उपादेय है । किन्तु सौन्दर्य एवं मान दोनों से रहित है तो वह त्याज्य है ॥ १६०-१६२ ॥ सुसौन्दर्यं तु मानस्य क्वचिदाक्रम्य वर्तते ॥ १६२ ॥ लावण्यस्य क्वचिन्मानं समाच्छाद्यावतिष्ठते । कहीं सुसौन्दर्य मान का अतिक्रमण कर विराजमान हो जाता है कहीं मान सुसौन्दर्य का अतिक्रमण कर विराजमान हो जाता है ॥ १६२-१६३ ॥ यथातिरूपवान् लोके दरिद्रोऽप्येति मान्यताम् ॥ १६३ ॥ विरूपोऽप्यतिवित्ताढ्यो नारूपो नैव निर्धनः । एवं द्वयोज्झितं बिम्बमनादेयत्वमेति च ॥ १६४ ॥ आदेयमेकयुक्तं च नित्यं यस्मान्महामते । जिस प्रकार दरिद्र होने पर भी अतिरूपवान् लोक में प्रतिष्ठित होता है अथवा अत्यन्त धनवान् होने से रूप रहित विरूप भी लोक में प्रतिष्ठित होता है । किन्तु जो अरूप है, निर्धन है, अर्थात् रूप और धन दोनों से रहित है, वह लोक में अप्रतिष्ठित रहता है । इसी प्रकार सौन्दर्य और मान रहित बिम्ब लोक में अनुपयोगी होता है ॥ १६३-१६५ ॥ सम्यङ्माने च सौन्दर्ये भक्तानुग्रहकाम्यया ॥ १६५ ॥ मान्त्रसन्निधिशक्तिर्वै सफला ह्यवतिष्ठते । सा सम्यक् प्रतिपन्नस्य बिम्बे दृग्गोचरस्थिते ॥ १६६ ॥ आमूर्ताह्लादयत्याशु ज्ञात्वैवं यत्नमाचरेत् । मानोन्मानप्रमाणानामथ सौन्दर्यसिद्धये ॥ १६७ ॥ एवं बिम्बस्य प्रमाणवत्त्वे सौन्दर्यवत्त्वे च "आभिरूप्याच्च बिम्बस्य" इत्युक्तरीत्या निरतिशयाह्लादजननी भगवत्सान्निध्यशक्ति(बि?र्बि)म्बे स्वत एवाविर्भूता सफलाऽवतिष्ठते, अतस्तदर्थं सुतरां यत्नः कार्य इत्याह—सम्यङ्माने चेति सार्धद्वाभ्याम् ॥ १६५-१६७ ॥ हे महामते सङ्कर्षण ! सौन्दर्य और मान इन दोनों में किसी एक से युक्त होने से बिम्ब निरतिशयाह्लाद जननी भगवत्सान्निध्य विष्णु शक्ति स्वतः आविर्भूत होकर सफला होकर प्रतिष्ठित हो जाती है । इसलिये साधक को वैसा ही प्रयत्न करना चाहिए ॥ १६५-१६७ ॥ ऋजोः सुसमपादस्य त्र्यङ्गुलं चरणान्तरम् ।