भारतकोश
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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

१२ ] [ प्रथम पटल भूतादिकादहङ्कारात्पञ्च भूतानि जज्ञिरे । शब्दात्पूर्वं वितत्स्पर्शाद्वायूरूपादधुताशनः ।२० उन सदाशिव से ईश होते हैं और फिर उनसे रुद्र का समुद्भव हुआ करता है। उनसे भगवान् विष्णु होते हैं और फिर ब्रह्मा होते हैं । इनका इसी रीति से समुद्भव हुआ करता है । १६ । फिर मूलभूत अव्यक्त जो पर भूत है विक्रत से गुणान्तःकारण स्वरूप वाला महत्तत्व हुआ था । उस महत्तत्व से विधि भेद से तीन गुणो वाला अर्थात् सत्व- रजः — तमोगुणों वाला अहंकार हुआ था । वैकारिक अहङ्कार से दश वैकारिक देव हुये थे । १७ । १८ । दिक्, वायु-सूर्य-प्रचेता-अश्विनी- कुमार — वहिन इन्द्र — उपेन्द्र — मित्रक हुये । तेज से तन्मात्राओं के क्रम के योग से इन्द्रियाँ हुई हैं । १६। भूतादिक अहङ्कार से पाँच भूतों ने जन्म धारण किया था। पहिले शब्द से आकाश — स्पर्श से वायु — रूप से हुताशन हुआ था । २० । रसादम्भः क्षमा गन्धादिति तेषां समुद्भवः । स्वच्छंवियन्मरुत्कृष्णोरक्तोऽग्निर्विशदं पयः ।२१ पीता भूमिः पञ्च भूतान्येकैकाधारतोविदुः । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा भूतगुणाः स्मृताः ।२२ वृत्तं दिवस्तत्षड् बिन्दुलाञ्छितं मातरिश्वनः । त्रिकोणं स्वस्तिकोपेतं वह्ने रद्धेन्दुसंयुक्तम् । २३ अम्भोजमम्भसो भूमेश्चतुरस्रं सवज्रकम् । तत्तद्भूतसमाभानि विदुर्बुधाः ।२४ वर्णैः स्वैरञ्चितान्याहुः स्वस्वनामावृतान्यपि । धरादिपञ्चभूतानां निवृत्त्याद्याः कलाः स्मृताः ।२५ रस से जल, गन्ध से भूमि, इस रीति से उनकी उत्पत्ति होती है । आकाश स्वच्छ है—मरुत् का कृष्ण वर्णहोता है—अग्नि रक्तवर्ण वाला है, पय विशद होता है। भूमि पीतवर्ण वाली होती है । ये पाँच भूत हैं जो एक एक के आधार से समझे जाते हैं । शब्द — स्पर्श — रूप —

श्री शारदा तिलक ] [ १३ रस और गन्ध भूतों के गुण होते हैं—ऐसा कहा गया है। २१। २२। दिव वृत्त है, उससे षड्विन्दुओ से लाञ्छित वायु है-यह स्वस्तिक से युक्त त्रिकोण है—वह्नि अर्ध चन्द्र से संयुक्त होता है। २३। भूमि के अम्भ से चतुरस्र वज्र सहित अम्भोज होता है। बुध गण उस भूत के समान आभा वाले मन्डलों को जानते हैं। २४। इनको अपने वर्णों से अञ्चित और अपने-अपने नामों से आकृत भी है। धरा आदि पाँच भूतों को निवृत्ति आदि कलाएं कही गयी हैं। २५। निवृत्तिः सुप्रतिष्ठा स्याद्विद्या शान्तिरनन्तरम् । शान्त्यतीतेति विज्ञेया नाददेहसमुद्भवाः ।२६ पञ्चभूतात्मकं सर्वं चराचरमिदं जगत् । अचरा बहुधा भिन्ना गिरिवृक्षादिभेदतः ।२७ चरास्तु त्रिविधाः प्रोक्ता स्वेदाण्डजजरायुजाः । स्वेदजाः क्रिमिकीटाद्या अण्डजाः पन्नगादयः ।२८ जरायुजा मनुष्याद्यास्तेषु नृणां निगद्यते । उद्भवः पुंस्त्रियोयोगात् (१) शुक्रशोणितसंयुतान् ।२६ बिन्दुरेको भवेद्गर्भमुभयात्म क्रमादसौ । रजोऽधिके भवेन्नारी भवेद्र्रेतोऽधिके पुमान् । ३० निवृत्ति-सुप्रतिष्ठा-विद्या-शान्ति-शान्त्यतीता ये नायदेह से समुद्भव वाली कलाएं जाननी चाहिये । २६। यह स्थावर-जङ्गम चराचर जगत् सम्पूर्ण पांचों भूतों के ही स्वरूप वाला है। अचर पर्वत और वृक्ष आदि के भेदोंसे बहुत प्रकारके भिन्न-भिन्न होते हैं। २७। चर अर्थात् जङ्गम तीन प्रकार के होते हैं-कुछ स्वेदज हैं कुछ अण्डज होते हैं-और कुछ जरायुज हुआ करते हैं । स्वेद अर्थात् पसीने से समुत्पन्न होने वाले कृमि और कीट आदि होते हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पन्नग आदि हैं। २८। जरायुज मनुष्य आदि हैं उनमें नर-नारी कहे जाया करते हैं । इनकी उत्पत्ति पुरुषों और स्त्रियोंके योगसे हुआ करती है, अर्थात् पुरुषके वीर्य और स्त्री के रज के संयोग होने से होती है । २६। वह एक बिन्दु क्रम

१४ ] [ प्रथम पटल से उभय स्वरूप वाला गर्भ होता है । रज के अधिक हो जाने पर नारी की उत्पत्ति होती है और वीर्य के अधिक होने पर पुमान् होता है ॥३०॥ उभयोः समतायां तु नपुंसकमिति स्थितिः। पूर्वकर्मा नुरूपेण मोहपाशेन यन्त्रितः ।३१ कश्चिदात्मा तदा तस्मिन् जीवभावं प्रपद्यते । अथ मात्राहृतैरन्नपानाद्यैः पोषितः क्रमात् ।३२ दिनात् पक्षात् ततो मासात् वर्द्धते तत्वदेहवान् । दोषैर्दूष्यैः सुखं प्राप्तो व्यक्ति याति निजेन्द्रियैः ।३३ वातपित्तकफा दोषाः दूष्याः स्युः सप्त धातवः । त्वगसृङ् मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि तान्विदुः ।३४ ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वग् दृग्जिह्वानासिका विदुः । ज्ञानेन्द्रियार्थाश्शब्दाद्याः स्मृताः कर्मेन्द्रियाण्यपि ।३५ वाक्पाणिपादपाय्वन्धुसंज्ञान्याहुर्मनीषिणः । वचनानादानगतयो विसर्गानन्दसंयुताः ।३६ यदि रज और वीर्य दोनोंकी समता होती है अर्थात् दोनो ही परि- माण में समान होते हैं तो नपुंसक की उत्पत्ति हुआ करती है। जो पूर्व जन्म के किये हुए कर्मों के अनुसार मोह के पाश से यन्त्रित होकर ही जन्म का ग्रहण किया जाता है। ३१। कोई भी आत्मा उस समय में उसमें जीव के भाव को प्राप्त किया करता है। इसके अनन्तर मात्रा के द्वारा समाहृत अन्न-पानादि से क्रम से वह पोषित हुआ करता है। ३२। वह तत्व देहधारी दिन पक्ष-मास के क्रम से बड़ा हो जाया करता है। दोषों से दूष्य अपनी इन्द्रियों के द्वारा सुख को प्राप्त होकर व्यक्तित्व को प्राप्त हुआ करता है, अर्थात् प्रकट होता है। वात-पित्त- कफ में दोष दूष्य हैं। सात धातुएं होती हैं अर्थात् शरीरमें रहने वाली सात धातुएं कहलाती हैं । त्वचा-रुधिर-मांस-मेद-अस्थि-मज्जा और शुक्र ये सात धातुएं हैं ।३३-३४। ज्ञानेन्द्रियाँ-श्रोत्र-त्वचा-नेत्र-जिह्वा-

श्री शारदा तिलक ] [ १५ नासिका ये पाँच हैं । ज्ञानेन्द्रियों के शब्द आदि अर्थ अर्थात् विषय होते हैं। ऐसा बताया गया है। पाँच ही कर्मेन्द्रियाँ होती हैं, कर्मेन्द्रियों के नाम ये हैं-वाक्-पाणि (हाथ)-पाद-पायु और अन्धु अर्थात् लिङ्ग । मनीषियोंने इनको विषय अर्थात् कर्मभी बतलाये जातेहैं-वचन, आदान, गमन, विसर्ग और आनन्द ये पाँचों क्रम से कर्म हैं ।३५-३६। कर्मेन्द्रियार्थाः संप्रोक्ता अन्तःकरण मात्मनः । मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं च परिकीर्तितम् ।३७ दशेन्द्रियाणि भूतानि मनसा सह षोडश । विकाराः स्युः प्रकृतयः पञ्चभूतान्यहङ्कृतिः ।३८ अव्यक्तं महदित्यष्टौ तन्मात्राश्च महानपि ।४ साहङ्कारा विकृतयः सप्त तत्त्वविदोविदुः ।३६ अग्नीषोमात्मकोदेहो बिन्दुर्यदुभयात्मकः । दक्षिणांशः स्मृतः सूर्यो वामभागो निशाकरः ।४० नाडीदेश विदुस्तासु मुख्यास्तिस्रः प्रकीर्त्तिताः । इडा वामे तयोर्मध्ये सुषुम्णा पिङ्गला परे ।४१ मध्या भास्वपि नाडीस्यादग्नीषोमस्वरूपिणी । गान्धारी हस्तिजिह्वाख्यासुपूषाऽलम्बुषा मता ।४२ यशस्विनी शंखिनी च कुहूः स्युः सप्त नाडयः (डिकाः) । नाड्योऽनन्ताः समुत्पन्नः सुषुम्णा पञ्चपर्वसु ।४३ मूलाधारोद्गतप्राणस्ताभिर्व्याप्नोति तत्तनुम् । वायवोऽत्र दश प्रोक्ता वह्नयश्च दश स्मृताः ।४४ प्राणाद्या मरुतः पञ्चः नागः कूर्मो धनञ्जयः । कृकलः स्याद्देवदत्त इति नामभिरीरिताः ।४५ ये कर्मेन्द्रियाँ बतला दी गयी हैं। अब आत्मा के अन्तकरण अर्थात् अन्दर में रहने वाली इन्द्रियाँ मन-बुद्धि-अहङ्कार-और चित ये कही गयी हैं ।३७। दश ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँचभूत और सोल- हवाँ मन ये विकार हैं जो प्रकृतियों के हैं । पाँचभूत-अहङ्कार-अव्यक्त

१६ ] [ प्रथम पटल और महतत्व ये आठ हैं। तन्मात्राएँ-महान् अहङ्कार के सहित सात विकृतियाँ हैं ऐसा तत्वों के ज्ञाता कहते हैं। ३८-३६। यह देह अग्नि और सोम के स्वरूप वाला होता है क्योंकि बिन्दु उभयात्मक ही होता है। दाहिना अंश सूर्य कहा गया है और वाँया भाग सोम होता है। दश नाड़ियाँ होती है उनमें भी तीन नाड़ियाँ मुख्य कही गयी हैं-शरीर के मध्य में नवाभाग में इडा नाड़ी है। दूसरी सुषुम्ना और पिङ्गला है। उनमें भी मध्य में रहने वाली नाड़ी अग्नि और सोम के स्वरूप वाली होती है। गान्धारी-हस्तिजिह्वा-सुपूषा-अलम्बुषा-यशस्वनी-शंखिनी और कुहू ये सात नाड़ियाँ होती हैं। इन से अनन्त नाड़ियाँ समुत्पन्न हुई हैं। सुषुम्णा पाँच पर्वों में से सब में सब ओर बलवान् प्राण वायु है जो मूलाधार से उद्गत होता है और उसके शरीर में व्याप्त रहता है। इसमें दश वायु कही गयी हैं और वह्नियां भी दश हैं।४०-४४। प्राण- अपान-उदान-ज्ञान और समान ये पाँच हैं और नाग-कूर्म-धनञ्जय- कृकल और देवदत्त ये पाँच इनके नाम कहे गये हैं।४५। अग्नयो दोषदूष्येषु संलीना दश देहिनः । बुभुक्षा च पिपासा च प्राणस्य, मनसः स्मृतौ ।४६ शोकमोहौ, शरीरस्य जरामृत्यू षडूर्मयः । स्वाय्वस्थिमज्जानः शुक्रात् त्वङ् मांसास्रोणि शोणितात् ।४७ षाट्कौशिकमिद प्रोक्तं सर्वदेहेषु देहिनाम् । इत्थभूतस्तदा गर्भे पूर्वजन्मशुभाशुभम् ।४८ स्मरंस्तिष्ठति दुःखात्मा च्छन्नदेहो जरायुजा। कालक्रमेण स शिशुर्मातरं क्लेशयन्नपि ।४६ स पिण्डितशरीरोऽथ जायतेऽयमवाङ्मुखः । क्षणन्मिषते निश्चेष्टी मीत्या रोदितु (दन) मिच्छति ।५० देहधारियों के दोष दूष्यों में दश अग्नियां संलीन रहती हैं। उनके नाम ये हैं-कल्माष-कुसुम-दहन-शोषण-महाबल-पीडर-पतङ्ग-स्वर्ण-

श्री शारदा तिलक ] १७ अगाध हैं। भूख और पिपासा प्राण के-शोक और मोहमन के-जरा और मृत्यु शरीर की-ये छँ ऊर्मियाँ कही गयी हैं । स्नायु-मज्जा और अस्थि शुक्रसे त्वक्-मांस शोणित से-वह देहधारियोंके देहों में षाट्कौशिककहा गया है । इस प्रकारसे स्थित यह गर्भमें आता है और उस समयमेंअपने पूर्व जन्म में किये हुए शुभ-अशुभ कर्मों का स्मरण करता है । यह बहुत ही दुःखित रहतेहुये स्थित रहता है, इसकासब शरीर जरायुसे ढकाहुआ होता है । काल स क्रमसे वह शिशु अपनी माता को क्लेशित करताहुआ भी गर्भ में रहता है । उसका शरीर पिण्डित रहता है और वह नीचेकी ओर मुख वाला जन्म लिया करता है । क्षण में ही यह विस्मृति वाला- निश्चेष्ठ होता हुआ अपने रुदन करनेकी इच्छा किया करता है।६ ५०। ततश्चैतन्यरूपा सा सर्वगा विश्वरूपिणी । शिवसन्निधिमासाद्य नित्यानन्दगुणोदया ॥५१ दिक्कालाद्यनवच्छिन्ना सर्वदेहानु (वेदार्थ) गा शुभा । परापरविभागेन पराशक्तिरियं स्मृता ॥५२ योगिनां हृदयाऽम्भोजे नृत्यन्ती नित्यमञ्जुला । आधारे सर्वभूतानां स्फुरन्ती विद्युदाकृति ॥५३ शंखवर्त्तक्रमाद्देवी सर्वमावृत्य तिष्ठति । कुण्डलीभूतसर्पाणामङ्गश्रियमुपेयुषी ॥५४ सर्वदेवमयी देवी सर्वमन्त्र (वर्ण) मयी शिवा । सर्वतत्त्वमयी साक्षात् सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरा विभुः ॥५५ इसके अनन्तर वह चैतन्यरूप वाली-सबमें स्थित-विश्व रूपिणी- शिव के सान्निध्य को प्राप्त करके नित्यानन्द गुणों के उदययुता-दिशा और काल आदि से अनवच्छिन्ना-सबके देहों में अनुगमन करने वाली शुभा पर और अपर के विभागसे यह पराशक्ति कहीं गयी है ।५१-५२। योगियों के हृदय कमल में नित्य ही सहसा नृत्य करती हुई-समस्त प्राणियों के आधार में विद्युत की आकृति वाली यह स्फुरण करती हुई ।५३। शंख के आवर्त के क्रम से यह देवी सबकी आवृत्त करके स्थित रहा करती है । यह कुण्डलीभूत सर्पों की अङ्गश्री को प्राप्त होने

१८ [ प्रथम पटल वाली है ।५३-५४। यह देवी सब देवों से परिपूर्ण है और सब मन्त्रों से पूर्ण शिवा है। सब तत्त्वों से परिपूर्ण साक्षात् सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतरा और विभु है ।५५। त्रिधामजननी देवी शब्दब्रह्मस्वरूपिणी । द्विचत्वारिंशद्वर्णा मा पञ्चाशद्वर्णरूपिणी । ५६ गुणिता सर्वगात्रेषु (ण) कुण्डली परदेवता । विश्वात्मना प्रबुद्धा सा सूते मन्त्रमय जगत् ।५७ एकधा गुणिता शक्तिः सर्वविश्वप्रवर्त्तिनी । वेदादिबीजं श्रीबीजं शक्तिबीजं मनोभवम् ।' ८ प्रासादं तुम्बुरु पिण्डं (बीज) चिन्तारत्नं गणेश्वरम् । मार्त्तण्डभैरवं दौर्गं नारसिंहं वराहजम् ।।५६ वासुदेवं हयग्रीवं बीजं श्रीपुरुषोत्तमम् । अन्यान्यपि च बीजानि तदात्पादयति ध्रुवम् ।।६० यह त्रिधाम जननी है और यही देवी शब्द ब्रह्म के स्वरूप वाली है। बयालीस वर्णों के रूप वाली तथा पचास वर्णों के स्वरूप में रहने वाली है। सब गात्रों में गुणिता यह कुण्डली पर देवता है। विश्वात्मा के द्वारा प्रबुद्ध की गयी वह मन्त्रमय जगत् को प्रसूत किया करती है ।५६। ५७। एक प्रकार से गुणिता शक्ति सम्पूर्ण विश्व के प्रवर्त्तन करने वाली है। वेदादि बीज को-श्री बीज को-शक्ति बीज को-मनोभव को-प्रसाद- तुम्बुरुपिण्ड को-चिन्तारत्न को-गणेश्वर को-मार्त्तण्ड भैरव, दौर्ग, नारा- सिंह-वराहज वासुदेव-हयग्रीव बीज को-श्रीपुरुषोत्तम को और अन्यान्य बीजों को भी उस समय वे उत्पादित निश्चित रूप से किया करती है ।५८-६०। यदा भवति सा संवित् द्विगुणीकृतविग्रहा । हंसवर्णौ परात्मानौ शब्दार्थौ वासरक्षये ।।६१ सृजत्येषा परा देवी तदा प्रकृतिपूरुषौ । यद्यदन्यज्जगत्यस्यः युग्मं तत्तदजायत ।।६२

श्री शारदा तिलक ] २६ त्रिगुणीकृतसर्वाङ्गी चिद्रूपा शिवगेहिनी । प्रसूते त्रैपुरं मन्त्रं शक्तिविनायकम् । ६३ पाशाद्यं त्र्यक्षरं मन्त्रं त्रैपुरं चण्डनायकम् । सौरं मृत्युञ्जयं शक्ति शाम्भवं विनतासुतम् । ६४ वागीशीत्र्यक्षरं मन्त्रं नीलकण्ठं विषापहम् । यन्त्रं त्रिगुणितं देव्या लोकत्रयगुणत्रयम् ६५ जिस समय में वह संवित् द्विगुणी कृत विग्रह वाली होती है तो वासर के क्षय में हसवर्ण परात्मा शब्दार्थोका यह सृजन करती है। यह परा देवी उस समय में प्रकृति और पुरुष का सृजन किया करती है । जो-जो भी इस जगत् मे है वह युग्म उत्पन्न होता है ।६१-६२। यह चिद्रूपा अर्थात् चैतन्यके स्वरूप वाली शिवकी गृहिणी त्रिगुणी कृत सब अङ्गो वाली होकर त्रैपुर मन्त्रों और शक्ति विनायक मन्त्र को प्रसूत किया करती है ।६३। पाशाद्य तीन अक्षरों वाला मन्त्र है और त्रिपुर चण्डनायक मन्त्र है । सौर-मृत्युञ्जय शक्ति-शाम्भव-विनतासुत वागीशी-ये तीन अक्षरों वाला मन्त्र है। नीलकण्ठ विष के अपहरण करने वाला होता है । देवी का त्रिगुणित मन्त्र होता है। लोक तीन हैं और गुण तीन हैं ।६४-६५। धामत्रयं सा वेदानां त्रयं वर्णत्रयं शुभा । त्रिपुष्करं स्वरान्देवी ब्रह्मादीनां त्रयं त्रयम् । ६६ वह्नेः कालत्रयं शक्तित्रयं वृत्तित्रयं मतम् । नाडीत्रयं त्रिवर्गं सा यद्यदन्यत् त्रिधा मतम् । ६७ चतुःप्रकारगुणिता शाम्भवी शर्मदायिनी । तदानीं पद्मिनीबन्धोः करोति चतुरक्षरम् । ६८ चतुर्वर्णं महादेव्या देवीतत्त्वचतुष्टयम् । चतुरः सागरात्तन्तःकरणानां चतुष्टयम् । ६६ सूक्ष्मादींश्चतुरो भावान् विष्णोर्मूर्त्तिचतुष्टयम् । चतुष्टयं गणेशानामात्मादीना चतुष्टयम् । ७०

२० [ प्रथम पटल वह शुभा तीन धाम है तीन वेद हैं और तीन वर्ण है। देवी तीन पुष्कर-स्वर और ब्रह्मादिक का भी त्रय है ।६६। तीन अग्नियां हैं- तीन काल हैं, शक्तिका भी त्रय है और तीन वृत्तियाँ हैं। तीन नाड़ियां हैं तीन वर्ग हैं, वह ऐसी है और जो जोभी अन्य है वह सब तीनप्रकार का ही है ।६७। चार प्रकार से गुणित शाम्भवी कल्याण देने वाली है । उस समय में पद्मिनी-बन्धु का चार अक्षर वाला करती है। यह मन्त्रान्तर में कथित प्रणव-माया और हंस वर्णोंके स्वरूप वाला है ।६८। महादेवी के चार वर्ण है और रवी के तत्व भी चार होते हैं। चार ही सागर हैं और अन्तःकरण भी मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त चार होते हैं । सूक्ष्म आदि चार भाव है और भगवान् विष्णु की मूर्तियाँ भी चार ही होती हैं। गणेश आदि का चतुष्टय होता है और आत्मादि भी चार हैं ।६६-७०। तथापूजादिकं पीठं धर्मादीनां चतुष्टयम् । दमकादीन् गजान् देवा यद्यदन्यच्चतुष्टयम् ।७१ पञ्चधा गुणिता पत्नी शम्भोः सर्वार्थदायिनी । त्रिपुरा पञ्चकूटं सा तस्याः पञ्चाक्षरद्वयम् ।७२ पञ्चरत्नं महादेव्याः सर्वकामफलप्रदम् । पञ्चाक्षरं महेशस्य पञ्चवर्णं गरुत्मनः ।७३ सम्मोहनान्पञ्चकामान्बाणान्पञ्च सुरद्र मान् । पञ्चप्राणादिकान् वायून् पंच वर्णान् महेशितुः ।७४ मूर्त्तीः पंच, कलाः पंच पंच ब्रह्म ऋचः क्रमात् । सृजत्येषा परा शक्तिर्वेदवेदार्थरूपिणी ।७५ उसी प्रकार से पूजादिक पीठ और धर्मादिका भी चतुष्टय होता है । दमकादि-गज और देव जो जो भी अन्य हैं सबका चतुष्टय ही होता है। ।७१। सब अर्थों की देने वाली शम्भु की पत्नी पाँच प्रकार से गुणित होती हैं। वह त्रिपुरा पञ्चकूट है और उसके पञ्चाक्षर द्वय है। महा- देवी के पाँच रत्न हैं जो सब कामनाओं के फल के प्रदाता हैं। महेश

श्री शारदा तिलक ] २१ के पांच अक्षर हैं और गुह्यमान के पांच वर्ण होते हैं ।७२-७३। पाँच काम वाले समोहन हैं-पाँच वाण है और सुद्रुम भी पाँच होते हैं। पाँच प्राण आदिक वायु है और महेशिला के पाँच वर्ण हैं। मूर्त्तियाँ पाँच हैं-कलाएं पाँच हैं-पाँच ब्रह्म हैं और क्रम से पाँच ऋचाएं हैं। यह वेद और वेदार्थ के रूप वाली परा शक्ति सृजन किया करती है। ।७४-७५। षोढा सा गुणिता देवी धत्ते मन्त्रं षडक्षरम् । षट्कूटं त्रिपुरामन्त्र गाणपत्यं षडक्षरम् ।७६ षडक्षरं महेशस्य श्रीकृष्णस्य षडक्षरम् । षडक्षरं हिमरुचेर्नारसिंह षडक्षरम् ।७७ ऋतून् बसन्तमुख्यांश्च (१) आमोदादीन् गणाधिपान् । कोशानूर्मीन् रसान् शक्तीः शाकिन्याद्याः षडध्यनः ।७८ यन्त्रं षड्गुणितं शक्तेः षडाधारानजीजनत् । षड्विधं यज्जगत्यस्मिन् सर्वं तत्परमेश्वरी ।७६ सप्तधा गृणिता नित्या शङ्करार्द्धशरीरिणी । सप्तार्ण त्रिपुरामन्त्रं सप्तवर्णं विनायकम् ।८० छै प्रकार से गुणित शक्ति देवी षडक्षरों वाले मन्त्र को धारण करती है। त्रिपुरा का मन्त्र षटकूट है और गाणपत्य मन्त्रभी छै अक्षरों वाला होता है ।७६। महेश का मन्त्र छै अक्षरो वाला है और श्रीकृष्ण का मन्त्र भी षट् अक्षरोंसे युक्त होता है। हिमरुचि का मन्त्र छै अक्षरों वाला है तथा नरसिंह का मन्त्र भी षडक्षर है ।७७। बसन्त जिनमें प्रमुख है वे ऋतुएं छै हैं और आमोद आदि गणाधिप छै होते हैं। कोश-ऊर्मियाँ-शक्तियाँ- रसऔर शाकिनी आदिसब छै ही हैं। शक्ति का यन्त्र षड्गुणित है औरछै आधारों की उत्पन्न किया है। इस जगत् में जोभी है वह सब छै प्रकार काही हैं, ऐसीवह परमेश्वरी है ।७८-७६। अब शङ्कर के अर्ध शरीर वाली नित्या देवी सात प्रकार से गुणित

२२ [ प्रथम पटल होती हैं । त्रिपुरा का मन्त्र सात वर्णोंसे संयुक्त है और सात वर्णों वाला विनायक मन्त्र है ।८०। सप्तकं व्याहृतीनां सा सप्तवर्णं तुदर्शनम् । लोकान् गिरीन् स्वरान् धातून् मुनीन् द्वीपान् ग्रहानपि ।८१ समिधः सप्त संख्याताः सप्त जिह्वा हविर्भुजः । अन्यत्सप्तविधं यद्यत् तदस्याः समजायत ।८२ अष्टधा गुणिता शक्तिः शैवमष्टाक्षरद्वयम् । विष्णोः श्रीकरनामानं मन्त्रमष्टाक्षरं परम् । ३ अष्टाक्षरं हरेः शक्तेरष्टारयुगलं परम् । भानोरष्ठाक्षरं दौर्गमष्टार्ण परमात्मनः ।८४ अष्टार्णं नीलकण्ठस्य वासुदेवात्मकं मनुम् । यन्त्रं कामार्गलं दिव्य देवीयन्त्रं घटार्गलम् ।८५ वह व्याहृतियों का सप्तक है और सात वर्णों वाला सुदर्शन मन्त्र होता है । सात ही लोक है - पर्वत सात हैं-स्वर सात हैं-धातुएँ सात हैं-मुनि सात हैं—द्वीप सात हैं और ग्रह भी सात हैं ।८१। सात समिधाएं कही गई हैं और अग्नि की सात जिह्वाएं होती हैं । अन्य जो-जो भी सात प्रकार वाले हैं वे इसी से उत्पन्न हुए हैं ।८२। शक्ति आठ प्रकार से गुणित हुई है और शिव का भी अष्टाक्षर द्वय होता है । भगवान् विष्णु का श्रीसुकर नाम वाला मन्त्र आठ अक्षरों वाला श्रेष्ठ होता है । हरि का अष्टाक्षरों वाला मन्त्र होता है और शक्ति का अष्टा- क्षर युगल होता है, जो परमश्रेष्ठ है । भानुका आठ अक्षरसे संयुक्तमंत्र होता है-दुर्गा का परमात्मा नीलकण्ठ का तथा वासुदेव का भी आठ आठ अक्षरों वाला मन्त्र होता है । कामार्गल दिव्य मन्त्र है और देवी का यन्त्र घटार्गल होता है ।८३-८५। गन्धाष्टकं शुभं देवी देवानां हृदयङ्गमम् । ब्राह्मयाद्या भैरवान् सर्वान् मूर्त्तीराशा वसून्पि ।८६

श्री शारदा तिलक ] २३ अष्टपीठं महादेव्या अष्टाष्टकसमन्वितम् । अष्टौ ताः प्रकृतोर्विघ्नान्वक्रतुण्डादिकान्क्रमात् ।८७ अणिमादिगुणांन्नागान् वह्नेमूर्तीयमादिकान् । अष्टात्मकं जगत्यन्यत्सर्वं वितनुते सदा ।८८ गुणिता नवधा नित्या सूते मन्त्रं नवात्मकम् । नवक शक्तितत्वानां तत्त्वरूपा महेश्वरी ।८६ नवकं पीठशक्तीनां शृङ्गारादीन् रसान्नव । माणिक्यादीनि रत्नानि नव वर्गयुतानि सा ।६० देवी और देवों का हृदयङ्गम शुभ अष्ट गन्ध है । ब्रह्मागुणी आदि- भैरव-सर्प मूर्त्तियाँ-दिशाएं और वसुगण अष्टाष्टक आदि से सम- न्वित महादेवी के आठ पीठ है । घे प्रकृतियाँ आठ है—विघ्न क्रम से व ऋ्रतुण्ड आदिक-आणिमादि—गण—नाग—वह्िनकी मूर्ति-यमा- दिक अन्य सब जगत्में सदा विस्तार करते हैं सब अष्टात्मक ही है ।८६। ८७-८८। नित्या नौ प्रकार से गुणित नौ सख्य के स्वरूप वाले मन्त्र को प्रसूत करती है । तत्त्व रूपा महेश्वरी शक्ति तत्त्वों का नवक करती है ।८६। पीठ शक्तियाँ का नवक है और शृङ्गारादि रस नौ होते हैं । वह माणिक्य आदि रत्न भी जो वर्गों से युक्त है नौ ही है ।६०। नवकं प्राणदूतीनां मण्डलं नवक शुभम् । यद्यन्नवात्मकं लोके सर्वमस्या उदञ्चति ।६१ दशधा विकृता शम्भोर्भामिनी भवदुःखहा । दशाक्षरं गणपतेस्त्वरिताया दशाक्षरम् ।६२ दशाक्षरं सरस्वत्या यक्षिण्याः सा दशाक्षरम् । वासुदेवात्मकं मन्त्रमश्वारुढा दशाक्षरम् । ६३ त्रिपुरा दशकूटं स्यात् त्रिपुराया दशाक्षरम् । नाम्ना पद्मावतीमन्त्रं रमामन्त्रं दशाक्षरम् ।६४ दशकं शक्तितत्त्वानां तत्त्वरूपा महेश्वरी । नाडीनां दशकं विष्णोरवतारान् दशा क्रमात् ।६५ प्राणदूतियों का नवक है और परम शुभ मण्डल का नवक होता

२४ । प्रथम पटल है। जो-जो भी लोक में नवात्मक है वह सब इसकीही उदञ्चित करता है ।६१। शम्भु की भामिनी दश प्रकार से विकृत है जो भव के दुख का हरण करने वाली हैं। गणपति का मन्त्र दश अक्षरों वाला है और त्वरिता का दश अक्षरों वाला होता है ।६२। सरस्वती का मन्त्र दश अक्षरों से युत है तथा यक्षिणी का दशाक्षर है। वासुदेवके स्वरूप वाला मन्त्र और अश्वारूढ़ा का मन्त्र दशाक्षर होता है ।६३। त्रिपुरा दशकूट है और त्रिपुरा का दश अक्षरों वाला है। नाम से पदमवती का मन्त्र और रमा का मन्त्र दशाक्षर है ।६४। महेश्वरी तत्त्वरूपा हैं और शक्ति के तत्वों का दशक होता है। क्रम से विष्णु के दश अवतार है और नाड़ियोंका दशक होता है ।६५। दशकं लोकपालानां यद्यदन्यत् सृजत्यसौ । एकादश क्रमात्संविद्गुणिता सा जगन्मयी ।६६ रुद्रैकादशनीमाद्याशक्तेरेकादशाक्षरम् । एकादशाक्षरं वाण्या रुद्रानेकादश क्रमात् ।६७ समुद्धरति सर्वात्मा गुणिता द्वादश क्रमात् । नित्यामन्त्रं महेशान्याः वासुदेवात्मकं मनुम् ।६८ राशीन् मासान् (भानून्) हरेर्मूर्तीर्यन्त्रं सा द्वादशात्मकम् । अन्यदेतादृशं सर्वं यत्तदस्यामजायत ।६६ लोकपालों का दशक होता है और यह जो जो भी अन्य का सृजन करती है। वह जगन्मयी क्रम से गुणिता सम्वित् एकादश हैं ।६६। रुद्र एकादश हैं और नीमादि शक्ति के एकादश अक्षर हैं। वाणी का मन्त्र एकादश अक्षरों वाला है और क्रम से रुद्र एकादश होते हैं ।६७। गुणिता सर्वात्मा क्रम से द्वादश समुद्धरण करती हैं। महेशानी का नित्या मन्त्र-वासुदेव के स्वरूप वाला मन्त्र, राशियाँ—मांस—हरि की मूर्तियाँ आदि द्वादशात्मक ही हैं। अन्य ऐसा सब जो है वह इससे उत्पन्न हुआ है ।६८-६६।

श्री शारदा तिलक ] २५ चतुर्विंशति सत्त्वात्मा यदा भवति शोभना । गायत्रीं सवितुः शम्भोः गायत्रीं मदमात्मिकाम् ॥१०० गायत्रीं विष्णुगायत्रीं गायत्रीं त्रिपदात्मनः । गायत्रीं दक्षिणामूर्त्तेः गायत्रीं शम्भुयोषितः ॥१०१ चतुर्विंशतितत्त्वानि तस्यामासन् परात्मनि । द्वाविंशद्भेदगुणिता सर्वमन्त्रमयी विभुः ॥१०२ सूते मृत्युञ्जयं मन्त्रं नारसिंहं महामनुम् । लवणद्यं मनुं वरुणस्य महात्मनः ॥१०३ हयग्रीवं मनुं दौर्गं वाराहं वह्निनायकम् । गणेशितुर्महामन्त्रं मन्त्रमन्नाधिपस्य। सा (च) ॥१०४ मन्त्रं श्रोदक्षिणामूर्तेर्मालामन्त्रं मनोभवः । त्रैष्टुभं वनवासिन्या अघोराख्यं महामनुम् ॥१०५ चौबीस तत्वों के स्वरूप वाली शोभना होती है। सविता की गायत्री-मदनात्मिका शम्भू की गायत्री-गायत्री-विष्णु की गायत्री त्रिप दात्मा की गायत्री-दक्षिणामूर्त्ति की गायत्री-शम्भयोषित की गायत्री-उस परात्मा में चौबीस तत्त्व होते हैं। द्वाविंशत् (बाईस) भेद गुणिता सर्व- मन्त्रमयो विभु निम्नलिखित मन्त्रों को प्रसूत किया करती है-मृत्युञ्जय मन्त्र, नारसिंह महामन्त्र, लवणाद्य मन्त्र, महात्मा वरुणका मन्त्र, हयग्रीव- मन्त्र, दुर्गा का मन्त्र-बाराह मन्त्र, वन्हिनावक मन्त्र, गणेशका महामन्त्र, अन्नाधिप का मन्त्र-श्री दक्षिणामूर्त्तिका तन्त्र-मनोभव माता मन्त्र-वनवा- सिनीं का त्रैष्टुभ मन्त्र अघोर नामक महा मन्त्र को वह प्रसूत करती है ।१००-१०५। भद्रकालीमनुं लक्ष्म्या मालामन्त्रं यमात्मकम् । मन्त्रं सा देवकीसनोर्मन्त्रं श्रीपुरुषोत्तमम् ॥१०६ श्रीगोपालमन्त्रं भूमेमन्त्रं तारामन्त्रं क्रमात् । महामन्त्रं महालक्ष्म्यामन्त्रं भतेश्वरस्य सा ॥१०७ क्षेत्रपालात्मकं मन्त्रं मन्त्रमापन्निवारणम् । सूते सातङ्गिनों विद्यां सिद्धविद्यां शुभोदयाम् ॥१०८

२६ [ प्रथम पटल अनेन क्रमयोगेन गुणिता शिववल्लभा । षट् त्रिंशतं च तत्त्वानां (नि) शैवानां (न) रचयत्यहौ ॥१०६ अन्यान्मन्त्रांश्च यन्त्राणि शुभदानि प्रसूयते । द्विचत्वारिंशता मूले गुणिता विश्वनायिका ॥११० लक्ष्मीका भद्रकाली मन्त्र, यमात्मकमाया मन्त्र, देवकीसूनुका मन्त्र, श्री पुरुषोत्तम मन्त्र, श्री गोपाय का मन्त्र, भूमि का मन्त्र और क्रम से तारा का मन्त्र, महालक्ष्मी का महामन्त्र और भूतेश्वर के मन्त्र को वह प्रसूत करती है । क्षेत्रपाल के स्वरूप वाला मन्त्र और आपदाओं के निवारक मन्त्र को वह प्रसव किया करती है । वह मातङ्गिनी विद्याको तथा शुभोदय वाली सिद्ध विद्या को प्रसूत करती है ।१०६-१०८। इस क्रम से गुणों के योगसे शिववल्लभा गुणित होती है और यह शैव चौबीस तत्त्वों की रचना किया करती है ।१०६। मूल में बयालीस से गुणिता विश्वनायिका अन्य मन्त्रों को और शुभ पद मन्त्रों को प्रसूत किया करती है ।११०। सा प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभ । शक्तिं ततो ध्वनिस्तस्मात् नादस्तस्मान्निरोधिका ॥१११ ततोऽर्द्धेन्दुस्ततो विन्दुस्तस्मादामीतत्परा ततः । पश्यन्ती मध्यमा वाची वैखरी शब्दजन्मभूः ॥११२ इच्छाज्ञानक्रियात्माऽसौ तेजारूपा गुणात्मिका । क्रमेणानेन सृजति कुण्डली वर्णमालिकाम् ॥११३ अकारादिसकान्तां द्विचत्वारिंशदात्मिकाम् । पञ्चाशद्वारगुणिता पञ्चाशद्वर्णमालिकाम् ॥११४ सूते तद्वर्णतोऽभिन्ना कला रुद्रादिकान् क्रमात् । निरोधिका भवेद्वह्निरर्द्धेन्दुः स्यान्निशाकरः ॥११५ अर्कः स्यादुभयोर्योगे बिन्द्रात्मा तेजसां निधिः । जाता वर्णा यतो बिन्दोः शिवशक्तिभयादतः ।.११६

श्री शारदा तिलक ] २७ अग्निषीमात्मकास्ते स्युः शिवशक्तिमयाद्रवेः । येन संभवमापन्नाः सोमसूर्याग्निरूपिणः ॥११७ वह विभु शब्द ब्रह्ममयी कुण्डलिनीको प्रमूत करती है। उससे निरो- धिका शक्ति होती है फिर उसने ध्वनि होती है और उससे नाद हुआ करता है ।१११। फिर उससे अर्धेन्दु होता है फिर बिन्दु फिर उससे परा होती है। पश्यन्ती मध्यमा, वाणी में वैखरी शब्दों के जन्म का स्थान है। यह इच्छा-ज्ञान और क्रिया के स्वरूप वाली गुणात्मिका तेजके रूप वाली है। इसी क्रम से कुण्डली वर्णों की माला का सृजन किया करती है ।११२-११३। वह अकार के आदि से लेकर सकार के अन्त तक बया- लीस वर्णों के स्वरूप वाली होती है ।११४। उन वर्णों से अभिन्न कला क्रम से रुद्रादिक को प्रसूत करती है । दन्हि निरोधिका होती है और अर्धेन्दु निशाकर होता है ।११५। दोनों के योग में विन्दु के स्वरूप वाला तेजों की निधि सूर्य होता है। क्योंकि इस शिव-शक्ति के भय से वर्ण समुत्पन्न हैं ।११६। वे शिव शक्ति के स्वरूप वाले रवि से अपनी षोमात्मक होते हैं। जिससे सोम-सूर्य और अग्नि के रूप वाले सम्भव हुए हैं ।११७। ॥ द्वितीय पटल ॥ ततो व्यक्तिं प्रवक्ष्यामि वर्णानां वदने नृणाम् । प्रेरिता मरुता नित्यं सुषुम्णारन्ध्रनिर्गताः ॥१ काण्ठादिकरणैर्वर्णाः क्रमादाविर्भवन्ति ते । एषु स्वराः स्मृताः सौम्याः स्पर्शाः सौराः शुभोदयाः ॥२ आग्नेया व्यापकाः सर्वेसोमसूर्याग्निदेवताः । स्वराः षोडश विख्याताः स्पर्शास्ते पञ्चविंशतिः ॥३

२८ [ द्वितीय पटल तत्वात्मनः स्मृताः स्पर्शाः मकारः पुरुष यतः । व्यापका दश ते कामधनधर्मप्रदायिनः ॥४ ह्रस्वः स्वरेषु पूर्वोक्तः परो दीर्घः क्रमादिमे । शिवशक्तिमयास्ते स्युर्बिन्दुसर्गावसानकाः ॥५ इसके अनन्तर मनुष्यों के मुख में वर्णों की अभिव्यक्ति को बतलाया जायगा । नित्य ही वायु के द्वारा प्रेरित हुए सुषुम्णा के रन्ध्र से निर्गत हुए कण्ठ आदि करणों द्वारा क्रम से वर्ण आविर्भूत होते हैं । इनमें सौम्य-शुभोदय-स्पर्श-सौर स्वर कहे गये हैं ।१-२। सब सोम सूर्य और अग्नि देवता आश्रय और व्यापक हैं । स्वर सोलह विख्यात हैं और स्पर्श संज्ञक 'क' से आदि लेकर मकारपर्यन्त पच्चीस हैं । ये सभी स्पर्श संज्ञा वाले वर्ण तत्व के स्वरूप वाले कहे गये हैं मकार पुरुष अर्थात् परमात्मा विश्वरूप होता है । वे दश व्यापक हैं जो धन-धर्म और काम के प्रदान करने वाले होते हैं ।३-४। स्वरो में ह्रस्व पूर्वोक्त है और दीर्घ पर है । क्रम से ये शिव शक्तिमय होते हैं । जिनके अवसान में बिन्दु और विसर्ग हैं ।५। बिन्दुः पुमान् रविः प्रोक्तः सर्गः शक्तिर्निशाकरः । स्वराणां मध्यगं यच्च तच्चतुष्ट नपुंसकम् ॥६ पिङ्गलायां स्थिता ह्रस्वा इडायां सङ्गताः परे । सुषुम्णा मध्यगा ज्ञेयाश्चत्वारो ये नपुंसकाः ॥७ विना स्वरैस्तु नान्येषां जायते व्यक्तिरञ्जसा । शिवशक्तिमयान्प्राहुस्तस्माद्वार्णान्मनीषिणः ॥८ कारणात्पञ्चभूतानामुद्भूता मातृका यतः । ततो भूतात्मका वर्णाः पञ्चपञ्चविभागशः ॥६ वाय्वग्निभूजलाकाशाः पञ्चाशल्लिपयः क्रमात् । पञ्च ह्रस्वः पञ्च दीर्घा बिन्दुन्ता सन्धिसम्भवा ॥ १० पञ्चाशत्कादयः पक्षलसहान्ताः समीरिताः । सोमसूर्याग्निभेदेन मातृकावर्णसम्भवाः ॥११

श्रीशारदा तिलक ] २६ बिन्दु पुमान् है और रवि कहा गया है । विसर्ग शक्ति निशाकर है स्वरों में जो मध्य में स्थित है वह चतुष्क नपुंसक होता है ।६। ह्रस्व पिङ्गला में स्थित होते हैं-दूसरे इड़ा में सङ्गत हैं-मध्य में रहने वाले सुषुम्णा में जानने चाहिये जो चार नपुंसक हैं ।७। स्वरों के बिना अन्य वर्णों की अभिव्यक्ति शीघ्र नहीं हुआ करती है । इस कारण से मनीषी गण वर्णों को शिव शक्ति से परिपूर्ण कहा करते है ।८। क्योंकि पञ्च- भूतोंके कारण से मातृ का समुद्भूत हुई है । इससे पाँच-पाँच के विभाग से वर्ण भूतात्मक होते हैं ।६। वायु, अग्नि, भू, जल और आकाश क्रम से पचास लिपियाँ हैं । पाँच ह्रस्व है और पाँच दीर्घ है-जिनके अन्त में विन्दु है वे सन्धि सम्भव होते हैं । 'कादि ष-क्ष-ल-स' और 'ह' अन्त वाले पचास कहे गये हैं । ये सोम-सूर्य और अग्नि के भेद से मातृका वर्ण से सम्भव होने वाले हैं ।१०-११। अष्टत्रिंशत्कलास्तन्मण्डहेव व्यवस्थिताः । अमृता मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टीरतिवृतिः ॥१२ शशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा । पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः स्वरजाः कलाः ॥१३ तपिनी तापनी धू म्रा मरीचिर्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बोधिनी धारिणी क्षमा ॥१४ कभाद्या वसुदाः सौयष्ठडान्ता द्वादशेरिताः । धू म्रार्चिरुष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिकी ॥१५ उन-उनके मण्डली में अड़तीस कलाएं व्यवस्थित हैं । अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्तिज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा, पूर्णा, पूर्णामृत, ये स्वरों मे सात कलायें काम दायिनी हैं ।१२-१३। तपनी, तापना, धूम्रा, मरीचि, ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्णा, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी, क्षमा, कभाद्या, वसुदा, सौर्यष्ठडान्त द्वादश कही गयी है। धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वालिनी, विस्फु- लिङ्गिनी ।१४-१५।

३० [ द्वितीय पटल सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवहा अपि (इमाः) । यादीनां दशवर्णानां कला धर्म प्रदा इमाः (स्मृताः) ॥१६ अभयेष्टकरा ध्येयाः श्वेतपीतारुणाः क्रमात् । तारस्य पञ्चभेदेभ्यः पञ्चाद्वर्णगाः कलाः ॥१७ सृष्टिर्वृ (ऋ) द्धिः स्मृतिर्मेधा कान्तिर्लक्ष्मी धृतिः स्थिरा । स्थितिः सिद्धिरिति प्रोक्ताः कचवर्गकला क्रमात् ॥१८ अकारादु ब्रह्मणोत्पन्नास्तप्तचासीकरप्रभाः । एताः कर धृताक्षस्रक्पङ्कजद्वयकुण्डिकाः ॥१६ जरा च पालनी शान्तिरीश्वरी रतिकामुके । वरदा ह्लादिनी प्रीतिर्दीर्घाः स्पुष्टटवर्गगाः ॥२० सुश्री, स्वरूपा, कपिला, हव्यकव्यवहा और 'यादि' दश वर्णों की ये कलायें धर्म प्रद हैं । १६। क्रम से श्वेत-पीत और अरुण अभय तथा अभीष्ट की करने वाली ध्यान के करने के योग्य है । तार (प्रणव) के प्राप्त भेदों से पचास वर्णों में रहने वाली कलायें । १७। सृष्टि, वृद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति, लक्ष्मी, धृति, स्थिरा, स्थिति, सिद्ध ये क्रम से क च वर्णों की कलाये हैं । १८। ये अकार से ब्रह्मा के द्वारा उत्पन्न, तप्त सुवर्ण के समान प्रभा वाली हैं। ये करों में अक्ष माला, दो कमल और कुण्डिकाको धारण करने वाली हैं । १६। जरा, पालिनी, शान्ति, ईश्वरी, रति, कामुका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, दीर्घा ये वृत्त वर्गों में रहने वाली हैं ।२०। उकरा विष्णनोत्पन्नास्तमालदलसन्निभाः । अभीति शंख (वर) चक्रेष्टवाहवः परिकीर्त्तिताः ।२१ तीक्ष्णा रौद्रा भया निद्रा तन्द्री क्षुत् क्रोधिनी क्रिया । उत्कारी मृत्युरेताः स्युः कथिताः पयवर्गगाः ।२२ रुद्रेण मारुतादुत्पन्नाः शरच्चन्द्रनिभप्रभाः । उद्वन्त्योऽभय शूलं कपालं बाहुभिर्वरम् ॥२३

श्रीशारदा तिलक ] ३१ ईश्वरेणोदिता बिन्दोः पीता श्वेताऽरुणाऽसिता । अनन्ता च पवर्णस्था जपाकुसुमसान्निभाः ॥२४ अभयं हरिणं टङ्कं दधाना बाहुभिर्वरम् । निवृत्तिः यप्रतिष्ठा स्याद्विद्याशान्तिरनन्तम् ॥२५ उकार भगवान् विष्णु के द्वारा समुत्पन्न है और ये तमाल दल के सदृश हैं । इनके करकमलों में अभयदान शंख, चक्र, वरदान कीर्तित किये गये हैं ।२१। तीक्ष्णा, रौद्रा, भया, निद्रा, क्षुत्, क्रोधिनी, क्रिया, उत्कारी, मृत्यु, ये पय वर्गों में से स्थित कही गयी हैं !२२। ये रुद्रदेव के द्वारा मार्ग से समुत्पन्न हैं और शरत्काल के चन्द्र के समान प्रभा से युक्त है । ये अपनी बाहुओं के द्वारा अभयदान शूल, कपाल और वरदान को उद्वहन करने वाली हैं ।२३। ईश्वर के द्वारा उदित बिन्दु से पीत, श्वेत, करुण और असित और अनन्त है जो पवर्ण में स्थित होती है तथा जपा के पुष्प न सदृश है ।२४। ये अपनी बाहुओं से अभय, हरिण टंक और वरदान को धारण करने वाली हैं । ये निवृत्ति, सप्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति हैं ।२५। इन्दिरा दीपका चैव रेचिका मोचिका परा । सूक्ष्मा सूक्ष्मामृता ज्ञानामृता चाप्यायिनी तथा ॥२६ व्यापिनी व्योमरूपा स्युरनन्ताः स्वरसंयुताः सदाशिवेन सहिता नादादेताः सितत्विषः ॥२७ अक्षस्रक् पुस्तकगु णंकपालाढ्यकराम्बुजाः । न्यासे तु योजयेदादौ षोडशस्वरजाःकलाः । २८ इति पञ्चाशदाख्याताः कलाः सर्वसमृद्धिदाः । श्रीकण्ठानन्तसूक्ष्माश्च त्रिमूर्त्तिरमटेश्वरः ॥२६ अधींशोभारभूतिश्चातिथीशः स्थाणुको हरः । झिष्टीशो भौतिकः सद्योजातश्चानुग्रहेश्वरः ॥३० अक्रूरश्च महासेनः षोडशस्वरमूर्त्तयः । पश्चात् क्रोधोश-चण्डीश-पञ्चान्तक-शिवोत्तमाः ॥३१