शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम्
१८४
जिस प्रकार से उपाय द्वारा सर्प, हाथी तथा सिंह को अपने वश में किया जाता है उसी प्रकार से यथायोग्य उपायों से मित्र तथा शत्रु को अपना वशवर्ती बनाना चाहिये ।
भूमिष्ठाः स्वर्गमायान्ति वज्रं भिन्दन्त्युपायतः ॥ २५ ॥
क्योंकि उपाय से मनुष्य भूमि में रहकर स्वर्ग पहुँच जाता है और वज्र को भी विदीर्ण कर देता है ।
सुहृत्संबन्धिस्त्रीपुत्रप्रजाशत्रुषु ते पृथक् ।
सामदानभेददण्डाश्चिन्तनीयाः स्वयुक्तितः ॥ २६ ॥
मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश—
मित्र, संबन्धी, पुत्र, प्रजा और शत्रु इन सबों के विषय में उक्त साम, दान, तथा दण्ड का अपनी युक्ति से पृथक् २ विचार करना चाहिये ।
एकशीलवयोविद्याजातिव्यसनवृत्तयः ।
साहचर्ये भवेन्मित्रमेभिर्यदि तु सार्जवैः ॥ २७ ॥
मित्रता होने के कारणों का निर्देश— जिनके परस्पर स्वभाव, अवस्था, विद्या ( ज्ञान ), जाति, व्यसन ( आदत ), आजीविका ये सब समान हैं वे यदि निष्कपट भाववाले सरल होकर एक जगह मिलते हैं तो मित्र हो जाते हैं ।
त्वत्समस्तु सखा नास्ति मित्रे साम इदं स्मृतम् ।
मम सर्वं तवैवास्ति दानं मित्रे सजीवितम् ॥ २८ ॥
मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण— तुम्हारे समान मेरा दूसरा कोई मित्र नहीं है' ऐसा मित्र के लिये कहना 'साम वाक्य' कहलाता है । और 'जीवन के सहित मेरी सभी वस्तुयें तुम्हारी ही हैं' यह मित्र के लिये कहना 'दान वाक्य' कहलाता है ।
मित्रेऽन्यमित्रसुगुणान् कीर्तयेद् भेदनं हि तत् ।
मित्रे दण्डो न करिष्ये मैत्रीमेवंविधोऽसि चेत् ॥ २६ ॥
भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण— 'मित्र के सामने अन्य मित्र के सुन्दर गुणों की प्रशंसा करना' यह मित्र के लिये 'भेद-वाक्य' और 'तुम यदि ऐसे हो तो मैं तुम्हारे साथ मित्रता नहीं रक्खूंगा' यह कहना मित्र के लिये 'दण्ड-वाक्य' कहलाता है ।
यो न संयोजयेदिष्टमन्यानिष्टमुपेक्षते ।
उदासीनः स न कथं भवेच्छत्रुः सुसान्ध्विकः ॥ ३० ॥
उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश— जो स्वयं अभीष्ट कार्य की सिद्धि
१८६ | शुक्रनीतिः
न करे और दूसरे के किये हुये अनिष्ट की उपेक्षा करे, वह उदासीन भलीभांति सन्धि करने पर भी क्यों न शत्रु हो अर्थात् सन्धि करने पर भी वह शत्रु ही हो जाता है ।
परस्परमनिष्टं न चिन्तनीयं त्वया मया ।
सुसाहाय्यं हि कर्तव्यं शत्रौ साम प्रकीर्तितम् ॥ ३१ ॥
शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण—'तुम्हें और हमें परस्पर एक दूसरे के अनिष्ट का विचार नहीं रखना चाहिये, बल्कि सहायता ही करनी चाहिये' ऐसा शत्रु के लिये कहना 'सामवाक्य' कहलाता है ।
करैर्वा प्रमितैर्ग्रामैर्वत्सरे प्रबलं रिपुम् ।
तोषयेत्तद्धि दानं स्याद्यथायोग्येषु शत्रुशु ॥ ३२ ॥
शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश—'प्रबल शत्रु को वर्ष में थोड़ा सा कर ( मालगुजारी ) या छोटा सा कोई ग्राम देकर या योग्यतानुसार कुछ देकर संतुष्ट करना' शत्रु के लिये 'दान' कहलाता है ।
शत्रुसाधकहीनत्वकरणात् प्रबलाश्रयात् ।
तद्धीनतोज्जीवनाच्च शत्रुभेदनमुच्यते ॥ ३३ ॥
शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश—'शत्रु के सम्पूर्ण साधनों को हीन बना देना, शत्रु से अधिक बलशाली का आश्रय लेना एवं शत्रु से हीन बलवालों को प्रबल बना देना' इन सबों से 'शत्रु का भेद' होना कहा है ।
दस्युभिः पीडनं शत्रोः कर्षणं धनधान्यतः ।
तच्छिद्रदर्शनादुग्रबलैर्नीत्या प्रभीषणम् ॥ ३४ ॥
प्राप्तयुद्धानिवृत्तित्वैस्त्रासनं दण्ड उच्यते ।
शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश—'डाकुओं से शत्रु को पीड़ा पहुँचाना ( लुटवाना ), धन-धान्य को क्षीण कर देना, दोष देखना, उग्र सेना तथा नीति से अत्यन्त डराना, यदि युद्ध हो रहा हो तो उस पर डटे रहने से त्रास पहुँचाना' ये सब शत्रु के लिये 'दण्ड' कहलाता है ।
क्रियाभेदादुपाया हि भिद्यन्ते च यथार्हतः ॥ ३५ ॥
योग्यतानुसार क्रिया में भिन्नता होने से सामादिक उपायों में भी भिन्नता होती है ।
सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।
यथा स्वाभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ३६ ॥
**मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने का निषेध—**नीति के जाननेवाले राजा को हर एक उपायों से यही करना चाहिये कि उसके मित्र, उदासीन तथा शत्रु राजा लोग अपने से अधिक बलवान न होने पावें ।
चतुर्थाध्याये भिन्नप्रकरणम् १८७
चतुर्थाध्याये भिन्नप्रकरणम् १८७
सामैव प्रथमं श्रेष्ठं दानं तु तदनन्तरम् ।
सर्वदा भेदनं शत्रोर्दण्डनं प्राणसंशये ॥ ३७ ॥
सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश— शत्रु के लिये सर्वप्रथम साम-नीति का व्यवहार करना ही श्रेष्ठ होता है, इससे भी कार्य न होने पर उसके बाद दाननीति का प्रयोग उचित होता है, यदि इससे भी कार्यसिद्धि न हो तो सभी प्रकारों से भेदनीति करनी चाहिये और इसके भी विफल होने पर यदि प्राण-संकट उपस्थित हो जाय तो अन्त में शत्रु के लिये दण्डनीति का प्रयोग उचित होता है।
प्रबलेऽरौ सामदाने साम भेदोऽधिके स्मृतौ ।
भेददण्डौ समे कार्यों दण्डः पूज्यः प्रहीनके ॥ ३८ ॥
शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश— अत्यन्त प्रबल शत्रु के लिये साम और दान का, अपने से अधिक बलवान् के लिये साम और भेद का, अपने बराबर के लिये भेद तथा दण्ड का एवं अपने से हीन शत्रु के लिये केवल दण्ड का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है।
मित्रे च सामदाने स्तो न कदा भेददण्डने ।
मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश— मित्र के लिये साम तथा दान का ही प्रयोग उचित होता है और कभी भी उसके लिये भेद तथा दण्ड का प्रयोग उचित नहीं होता।
रिपोः प्रजानां संभेदः पीडनं स्वजयाय वै ॥ ३९ ॥
रिपुप्रपीडितानां च साम्ना दानेन संग्रहः ।
गुणवतां च दुष्टानां हितं निर्वासनं सदा ॥ ४० ॥
रिपु-पीडित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश— शत्रु की प्रजाओं के साथ मेल करके शत्रु को पीड़ा पहुंचाना अपनी विजय का कारण होता है। और शत्रु से पीड़ित लोगों को साम तथा दान से अपने पास संग्रह करना चाहिये। और दुष्ट गुणवानों को भी देश से निकाल देना सदा उचित होता है।
स्वप्रजानां न भेदेन नैव दण्डेन पालनम् ।
कुर्वीत सामदानाभ्यां सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ४१
स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश— अपनी प्रजाओं का भेद तथा दंड से नहीं किन्तु यत्नपूर्वक सर्वदा साम तथा दान से ही पालन करना उचित है।
स्वप्रजादण्डभेदैश्च भवेद्राष्ट्रविनाशनम् ।
हीनाधिका यथा न स्युः सदा रक्ष्यास्तथा प्रजाः ॥ ४२ ॥
१८८ | शुक्रनीतिः
**प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य-नाशका निर्देश—**अपनो प्रजाओं का दण्ड तथा भेद से पालन करने से राज्य का विनाश हो जाता है। अतः जिस प्रकार से प्रजायें क्षीण-बल और प्रबल न हों किन्तु समबल में रहें उसी प्रकार से उनका पालन करना चाहिये।
निवृत्तिरसदाचाराद्दमनं दण्डतश्च तत् ।
येन संदम्यते जन्तुरुपायो दण्ड एव सः ॥ ४३ ॥
**दण्ड के लक्षण—**दण्ड के द्वारा असत् ( बुरे ) आचरण से निवृत्ति और दमन होता है अतः जिस उपाय से मनुष्य का अच्छी तरह से दमन होता है उसे ‘दण्ड’ कहते हैं।
स उपायो नृपाधीनः स सर्वस्य प्रभूर्यतः ।
वह दण्ड नामक उपाय राजा के अधीन रहता है क्योंकि वही सर्वो का स्वामी है ( अतः दण्ड वही दे सकता है ) ।
निर्भर्त्सनं चापमानोऽनशनं बन्धनं तथा ॥ ४४ ॥
ताडनं द्रव्यहरणं पुरान्निर्वासनाङ्कने ।
व्यस्तक्षौरमसस्थानमङ्गच्छेदो वधस्तथा ॥ ४५ ॥
युद्धमेते ह्युपायाश्च दण्डस्यैव प्रभेदकाः ।
**दण्ड के भेद का निर्देश—**झिड़कना, अपमान ( सम्मान पद से अलग कर देना ), उपवास कराना, बांधना, मारना, धन हर लेना, शहर या राज्य से निकाल देना, दाग देना, बुरे ढङ्ग से सिर मुड़वा देना, गदहे आदि पर चढ़ा देना, किसी अङ्ग ( नाक-कान आदि ) को कटवा देना, प्राणदण्ड देना, युद्ध करना, ये सभी उपाय दण्ड के ही भेद माने जाते हैं।
जायते धर्मनिरताः प्रजा दण्डभयेन च ॥ ४६ ॥
करोत्याधर्षणं नैव तथा चासत्यभाषणम् ।
क्रूराश्च मार्दवं यान्ति दुष्टा दौष्ट्यं त्यजन्ति च ॥ ४७ ॥
पशवोऽपि वशं यान्ति विद्रवन्ति च दस्यवः ।
पिशुना मूकतां यान्ति भयं यान्त्याततायिनः ॥ ४८ ॥
करदाश्च भवन्त्यन्ये वित्रासं यान्ति चापरे ।
अतो दण्डधरो नित्यं स्यान्नृपो धर्मरक्षणे ॥ ४९ ॥
**दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थ दण्डधर होने का निर्देश—**दण्ड के भय से प्रजा अपने २ धर्मों में रत रहती है । और वह किसी दुर्बल पर आक्रमण तथा असत्य-भाषण नहीं करती है। क्रूर लोग कोमलता को धारण कर लेते हैं, दुष्ट लोग दुष्टता को छोड़ देते हैं, पशु भी वश में हो जाते हैं, डाकू लोग भाग जाते हैं, चुगलखोर जबान बन्द कर लेते हैं, आततायी लोग डर
चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८६
चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८६
जाते हैं, जो कोई कर नहीं देते हैं वे कर देने लग जाते हैं, और जो कोई नहीं डरने वाले होते हैं वे विशेषतः डरने लगते हैं। अतः राजा को नित्य धर्मरक्षार्थ दण्डधर ( दण्ड देनेवाला ) होना चाहिये।
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ॥ ५० ॥
घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश— घमण्डी, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य कर्म को नहीं जाननेवाला, और कुमार्ग पर चलनेवाले गुरुजन को भी दण्ड देना राजा का कर्त्तव्य होता है।
राज्ञां सदण्डनीत्या हि सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ।
दण्ड एव हि धर्माणां शरणं परमं स्मृतम् ॥ ५१ ॥
दण्ड-सहित नीति का व्यवहार करने से राजा के सभी कार्य सिद्ध होते हैं, क्योंकि धर्मों का परम रक्षक दण्ड ही माना गया है।
अहिंसैवासाधुहिंसा पशुवच्छ्रुतिचोदनात् ।
दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश— और जैसे वेद की आज्ञा होने से यज्ञ में पशु की हिंसा अहिंसा मानी जाती है वैसे ही दुष्ट पुरुषों की हिंसा भी अहिंसा होती है।
दण्ड्यस्यादण्डनान्नित्यमदण्ड्यस्य च दण्डनात् ॥ ५२ ॥
अतिदण्डाच्च गुणिभिस्त्यज्यते पातकी भवेत् ।
उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश— नित्य दण्ड देने योग्य व्यक्ति को दण्ड न देने से, नहीं दण्ड देने योग्य को दण्ड देने से एवं अपराध से अधिक दण्ड देने से विद्वान् लोग ऐसे अनुचित दण्ड देनेवाले राजा का परित्याग कर देते हैं और वह राजा उक्त कर्म से पातकी होता है।
अल्पदानान्महत् पुण्यं दण्डप्रणयनात् फलम् ॥ ५३ ॥
शास्त्रेषूक्तं मुनिवरैः प्रवृत्त्यर्थं भयाय च ।
'अल्प ( थोड़ा जो कुछ ) दान करने से भी बहुत बड़ा पुण्य होता है एवं शास्त्रानुसार दण्ड देने से बहुत बड़ा फल होता है' यह जो शास्त्रों में मुनिवरों ने कहा है, वह क्रम से लोगों को दान में प्रवृत्ति कराने एवं पाप से भयभीत होने के लिये ही कहा है।
अश्वमेधादिभिः पुण्यं तत् किं स्यात् स्तोत्रपाठतः ॥ ५४ ॥
क्षमया यत्तु पुण्यं स्यात्तत्किं दण्डनिपातनात् ।
स्वप्रजादण्डनाच्छ्रेयः कथं राज्ञो भविष्यति ॥ ५५ ॥
तद्दण्डाज्जायते कीर्तिर्धनपुण्यविनाशनम् ।
अश्वमेधादि यज्ञों से जो पुण्य होता है वह क्या केवल स्तोत्रों के पाठमात्र
| १६० | शुक्रनीतिः |
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से होगा ? अर्थात् कभी नहीं। क्षमा करने से जो पुण्य होता है वह क्या दण्ड देने से होगा ? अर्थात् कभी नहीं। अतः अपनी प्रजाओं को दण्ड देने से राजाओं का कैसे कल्याण होगा अर्थात् कभी नहीं, बल्कि उन सर्वो को दण्ड देने से उल्टे राजा की कीर्त्ति, धन तथा पुण्य का नाश ही होगा।
नृपस्य धर्मपूर्णत्वादण्डः कृतयुगे न हि ॥ ५६ ॥
त्रेतायुगे पूर्णदण्डः पादाधर्माः प्रजा यतः ।
द्वापरे चार्धधर्मत्वात् त्रिपादण्डो विधीयते ॥ ५७ ॥
प्रजा निःस्वा राजदौष्ट्याद् दण्डार्धं तु कलौ यथा।
सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश— सत्ययुग में धर्म चारों पादों से परिपूर्ण था, अतः उस समय किसी के लिये भी दण्ड नहीं दिया जाता था, त्रेतायुग में प्रजाओं में तीन पाव ( १२ आने ) धर्म के साथ २ एक पाद ( ४ आने ) अधर्म भी रहता था, अतः उस समय पूर्ण दण्ड दिया जाता था, द्वापरयुग में आधा अंश धर्म और आधा अंश अधर्म अर्थात् दोनों समान भाव से थे, अतः तीन पादों के साथ ( १२ आने ) दण्ड का विधान था तथा कलियुग में राजाओं की दुष्टता से प्रजायें कर अधिक बढ़ जाने से एवं राजा द्वारा धन हरण करने से अत्यन्त निर्धन होती हैं अतः आधा अंश दंड देने का विधान है।
युगप्रर्वतको राजा धर्माधर्मप्रशिक्षणात् ॥ ५८ ॥
युगानां न प्रजानां न दोषः किन्तु नृपस्य हि ।
राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश— प्रजाओं को धर्म तथा अधर्म की शिक्षा देनेवाला राजा के होने से वही सत्ययुग आदि ४ युगों का प्रवर्तक होता है, अतः अधर्म की प्रवृत्ति में युगों का या प्रजाओं का दोष नहीं है अर्थात् युग या प्रजाओं के ऊपर अधर्म भावना नहीं अवलम्बित है प्रत्युत राजा के ऊपर अवलम्बित है अर्थात् राजा के अधार्मिक होने से प्रजाओं में या युग में अधर्म फैलता है।
प्रसन्नो येनं नृपतिस्तदाचरति वै जनः ॥ ५६ ॥
लोभाद्भयाच्च किं तेन शिक्षितं नाचरेत् कथम् ।
धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश— जब कि लोभ से प्रजायें जिससे राजा प्रसन्न हो वैसा आचरण करने लगती हैं तब भला राजा के भय से उसके द्वारा सिखाये जाने पर तदनुसार कैसे नहीं वे चलेंगी -अर्थात् अवश्य चलेंगी।
सुपुण्यो यत्र नृपतिर्धर्मिष्ठास्तत्र हि प्रजाः ॥ ६० ॥
महापापी यत्र राजा तत्राधर्मपरो जनः ।
चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १६१
जिस राज्य में राजा अत्यन्त धर्मात्मा होता है वहां पर प्रजायें भी धर्मिष्ठ होती हैं और जहां पर राजा अत्यन्त पापी होता है वहां पर प्रजायें भी अधर्म में लीन रहती हैं ।
न कालवर्षी पर्जन्यस्तत्र भूर्न महाफला ॥ ६१ ॥
जायते राष्ट्रह्रासश्च शत्रुवृद्धर्धनक्षयः ।
**पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश—**और वहां पर अधर्म अधिक होने से मेघ समय पर पानी बरसानेवाला नहीं होता है और पृथ्वी अधिक धान्य तथा फल से युक्त नहीं रहती है, एवं राज्य (देश या राष्ट्र) का दिन-प्रतिदिन ह्रास होने लगता है तथा शत्रुओं की वृद्धि और धन का क्षय होता है ।
सुराप्यपि वरो राजा न स्त्रैणो नातिकोपवान् ॥ ६२ ॥
लोकांश्चण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान् विलुम्पति ।
**स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश—**मद्य (शराब) पीनेवाला राजा अच्छा है किन्तु स्त्री में आसक्त (ऐयाश) तथा अत्यन्त क्रोधी राजा का होना अच्छा नहीं है क्योंकि अत्यन्त क्रोधी राजा लोगों को संताप देता है और स्त्री में आसक्त (लम्पट) राजा ब्राह्मणादि जातियों का लोप कर देता है अर्थात् व्यभिचार द्वारा वर्ण-सङ्कर उत्पन्न करके वर्णों को दूषित कर देता है ।
मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्ध्या च व्यवहारतः ॥ ६३ ॥
कामक्रोधौ मद्यतमौ सर्वमद्याधिकौ यतः ।
**राजा को काम-क्रोध त्याग करने का निर्देश—**मद्य पीनेवाला अकेले स्वयं बुद्धि तथा व्यवहार में भ्रष्ट होता है किन्तु प्रजाओं की बुद्धि तथा व्यवहार को भ्रष्ट नहीं करता है। और काम तथा क्रोध ये दोनों मद्य से भी अधिक हैं क्योंकि सभी मादक वस्तुओं से बढ़कर मादक होते हैं ।
धनप्राणहरो राजा प्रजायाश्चातिलोभतः ॥ ६४ ॥
तस्मादेतत् त्रयं त्यक्त्वा दण्डधारी भवेन्नृपः ।
**काम, क्रोध तथा लोभ त्याग कर दण्ड देने का निर्देश—**राजा अत्यन्त लोभ से प्रजा का धन तथा प्राण का हरण करनेवाला होता है, इसलिये काम, क्रोध तथा लोभ इन तीनों को छोड़ कर राजा को दण्ड देनेवाला होना चाहिये ।
अन्तर्मृदुर्बहिः क्रूरो भूत्वा स्वां दण्डयेत् प्रजाम् ॥ ६५ ॥
अत्युग्रदण्डकल्पः स्यात् स्वभावाद्धि तकारिणः ।
**'राजा ऊपर से क्रूर होकर दण्ड देवे' इसका निर्देश—**राजा को हृदय में
१९२ शुक्रनीतिः
कोमलता रखते हुये ऊपर से क्रूर (तीक्ष्ण) होकर अपनी प्रजा को दण्ड देना चाहिये। अर्थात् ऊपर से अत्यन्त कठोर दण्ड देनेवाले के समान और स्वभाव से हितकारी होना चाहिये।
राष्ट्रं कर्णेजपैर्नित्यं हन्यते च स्वभावतः ॥ ६६ ॥
अतो नृपः सूचितोऽपि विमृशेत् कार्यमादरात् ।
चुगुलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश— स्वभावतः चुगुलखोर लोग चुगुलखोरी से परस्पर बिगाड़ कराकर राज्य को नष्ट करने की चेष्टा करते हैं, अतः राजा किसी की चुगुली सुनने पर यत्नपूर्वक विचार कर तदनुसार कार्य करे।
आत्मनश्च प्रजायाश्च दोषदर्शद्युत्तमो नृपः ॥ ६७ ॥
विनियच्छति चात्मानमादौ भृत्यांस्ततः प्रजाः ।
उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश— अपने तथा प्रजाओं के दोषों को देखनेवाला राजा उत्तम कहलाता है और वह प्रथम अपने को दोषमुक्त बनाता है पश्चात् भृत्यों को, उसके बाद प्रजाओं को दोषमुक्त बनाता है।
कायिको वाचिको मानसिकः सांसर्गिकस्तथा ॥ ६८ ॥
चतुर्विधोऽपराधः स बुद्धयबुद्धिकृतो द्विधा ।
अपराध के ४ भेद पुनः प्रत्येक के दो-दो भेदों का निर्देश— कायिक (शरीर से होनेवाला), वाचिक (वाणी से होनेवाला), मानसिक (मनसे होनेवाला), सांसर्गिक (संसर्ग से होनेवाला), इस प्रकार से अपराध ४ प्रकार का होता है। और उसमें प्रत्येक बुद्धिकृत (जानबूझ कर होनेवाला) एवं अबुद्धिकृत (बिना जाने होनेवाला) भेद से दो-दो प्रकार का होता है।
पुनर्द्विधा कारितश्च तथा ज्ञेयोऽनुमोदितः ॥ ६९ ॥
सकृदसकृदभ्यस्तस्वभावैः स चतुर्विधः ।
पुनः उक्त अपराधों के २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश— वह अपराध पुनः दो प्रकार का होता है एक कारित (कराया हुआ) दूसरा अनुमोदित (अनुमोदन किया हुआ) और वह अपराध सकृत्कृत (एक बार किया हुआ), असकृत्कृत (बार-बार किया हुआ), अभ्यस्तकृत (निरन्तर किया हुआ), स्वभावकृत (स्वभाव से किया हुआ) इस प्रकार से ४ प्रकार का होता है।
नेत्रवक्त्रविकाराद्यैर्भावैर्मानसिकं तथा ॥ ७० ॥
क्रियया कायिकं वीक्ष्य वाचिकं क्रूरशब्दतः ।
सांसर्गिकं साहचर्यैर्ज्ञात्वा गौरवलाघवम् ॥ ७१ ॥
प्रथमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ॥ ७२ ॥
चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् । १६३
उत्पन्नोत्पत्स्यमानानां कार्याणां दण्डमावहेत् ।
मानसिकादि ४ अपराधों की परीक्षा का निर्देश— नेत्र तथा मुख की भङ्गी आदि भावों से मानसिक अपराध को एवं क्रिया के द्वारा कायिक, कर्कश वचनों से वाचिक और सहवास से सांसर्गिक अपराध के गौरव और लाघव को समझकर उत्पन्न हुये तथा आगे होनेवाले कार्यों (अपराधों) के संबन्ध में दण्डविचार करना चाहिये ।
प्रथमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ॥ ७२ ॥
न्याय्यं किमिति संपृच्छेत् तवैवेयममत्कृतिः ।
दण्ड के योग्य पुरुषों के लक्षण— उत्तम पुरुष यदि प्रथम बार साधारण साहस (चोरी आदि पाप) करे तो क्या यह तुम्हारा कार्य न्याय युक्त हुआ है ? और क्या तुम्हारा ही किया हुआ यह अपराध है । इसको उससे पूछ कर छोड़ देना चाहिये । उसके बाद पुनः करने पर प्रथम साहसदण्ड नामक (२५० पैसों का) दण्ड (जुर्माना) करना चाहिये ।
अपराधं यथोक्तं च द्विगुणं त्रिगुणं ततः ॥ ७३ ॥
यदि उत्तमजन दुबारा वही (अपराध करे तो उससे दूना अर्थात् ५०० पैसों का, तिबारा करे तो ७५० पैसों का दण्ड (जुर्माना) करना चाहिये ।
मध्यमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ।
धिग्दण्डं प्रथमं चाद्यसाहसं तदनन्तरम् ॥ ७४ ॥
यथोक्तं तु तथा सम्यग्यथावृद्धि ह्यनन्तरम् ।
उत्तम पुरुष पूर्वकी अपेक्षा अधिक मध्यम साहस (अपराध) करे तो उसे दण्ड इस प्रकार देना चाहिये अर्थात् उत्तम पुरुष यदि प्रथम उक्त अपराध साधारण रीति से करे तो उसे धिक्कार वचन सुनाकर दण्ड देना चाहिये उसके बाद यदि करे तो प्रथम साहस दण्ड (२५० पैसों का जुर्माना) करना चाहिये उसके बाद अपराधों की वृद्धि के अनुसार उक्त रूप से द्विगुण, त्रिगुण दण्ड (जुर्माना) अच्छी तरह से करे ।
उत्तमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ॥ ७५ ॥
प्रथमं साहसं चादौ मध्यमं तदनन्तरम् ।
यथोक्तं द्विगुणं पश्चादवरोधं ततः परम् ॥ ७६ ॥
उत्तम पुरुष के विषय में प्रथमादि अपराधों के दण्डों का एवं अन्त में रोक देने का निर्देश— और उत्तम पुरुष यदि उत्तम साहस (अत्यधिक अपराध) करे तो इस भांति दण्ड देना चाहिये कि—प्रथम अपराध होने पर प्रथम साहस दण्ड (२५० पैसों का जुर्माना), उसके बाद पुनः अपराध करने पर मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का जुर्माना), उसके बाद भी अपराधः
१३ शु०
१६४ | शुक्रनीतिः
करने पर उससे दूना ( १००० पैसों का जुर्माना ) करना चाहिये उसके बाद जेल भेज देना चाहिये । बुद्धिपूर्वनृघातेन विनैतद्दण्डकल्पनम् । उपरि लिखित दण्ड की व्यवस्था बुद्धिपूर्वक नरहत्या नहीं करनेवालो के लिये ही है, अन्य के लिये नहीं समझनी चाहिये । उत्तमत्वं मध्यमत्वं नीचत्वं चात्र कीर्त्यते ॥ ७७ ॥ गुणेनैव तु मुख्यं हि कुलेनापि धनेन च । यहाँ पर उत्तम, मध्यम तथा अधम की व्याख्या मुख्य रूपसे, अपराधी के गुण, कुल तथा धन के अनुसार ही समझनी चाहिये । प्रथमं साहसं कुर्वन् मध्यमो दण्डमर्हति ॥ ७८ ॥ धिग्दण्डमर्थदण्डं च पूर्णदण्डमनुक्रमात् । मध्यम पुरुष यदि प्रथम साहस ( अपराध ) करे तो उसे धिग्दण्ड ( तुम्हें धिक्कार है ऐसा वचन दण्ड ) देना चाहिये, उसके बाद प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का जुर्माना ) का आधा दण्ड ( १२५ पैसों का ) करना चाहिये । उसके बाद पूर्ण दण्ड ( २५० पैसों का ) अनुक्रम से अर्थात् अपराध के बारं बार करने या गौरव-लाघव के क्रम से करना चाहिये । द्विगुणं त्रिगुणं पश्चात् संरोधं नीचकर्म च ॥ ७६ ॥ संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण—उसके बाद प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का ), दुगुना ( ५०० ) तिगुना ( ७५० ) उसके बाद कैद और नीच कर्म ( मल-मूत्रादि साफ करना आदि ) का अपराध के न्यूनाधिक्य के अनुसार दण्ड देना चाहिये । मध्यमं साहसं कुर्वन्मध्यमो दण्डमर्हति । पूर्वं साहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ८० ॥ ताडनं बन्धनं पश्चात्पुरान्निर्वासनाङ्कने । शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण—मध्यम पुरुष यदि मध्यम साहस ( अपराध ) करे तो उसे प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का ) पुनः करने पर दूना ( ५०० पैसों का ) उसके बाद मारना-पीटना उसके बाद बांध रखना, पीछे से शहर से या राज्य से निकाल देना, दाग देना इस प्रकार से योग्यतानुसार दण्ड देना चाहिये । उत्तमं साहसं कुर्वन् मध्यमो दण्डमर्हति ॥ ८१ ॥ मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं तदनन्तरम् । द्विगुणं त्रिगुणं पश्चाद्यावज्जीवं तु बन्धनम् ॥ ८२ ॥ आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण—मध्यम पुरुष यदि उत्तम साहस
चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६५
(अपराध) करे तो इस भांति से दण्ड देना चाहिये कि—प्रथम मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का), तदनन्तर दुगुना (१००० पैसों का), तिगुना (१५००), पश्चात् आजीवन बांधकर रखना। ये सब योग्यतानुसार करने चाहिये।
प्रथमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
अर्धं यथोक्तं द्विगुणं त्रिगुणं बन्धनं ततः ॥ ८३ ॥
अधम पुरुष यदि प्रथम साहस (अपराध) करे तो आधा प्रथम साहस दण्ड (१२५ पैसों का जुर्माना) उसके बाद पूर्ण दण्ड (२५०) पुनः द्विगुण (५०० पैसों का), पुनः त्रिगुण (७५० पैसों का) दण्ड उसके बाद जेल का दण्ड देना चाहिये।
मध्यमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
पूर्वसाहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ८४ ॥
ततः संरोधनं नित्यं मार्गसंस्करणार्थकम् ।
मार्गों पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण— अधम पुरुष यदि मध्यम साहस (अपराध) करे तो उसे पहले प्रथम साहस दण्ड (२५० पैसों का), उसके बाद द्विगुण (५०० पैसों का) दण्ड, उसके बाद कैद तथा नित्य सड़क पर झाडू दिलाने का दण्ड देना चाहिये।
उत्तमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ॥ ८५ ॥
मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं द्विगुणं ततः ।
यावज्जीवं बन्धनं च नीचकर्मैव केवलम् ॥ ८६ ॥
अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार— अधम पुरुष यदि उत्तम साहस (अपराध) करे तो उसे प्रथम मध्यम साहस दण्ड (५०० पैसों का) देना चाहिये। उसके बाद द्विगुण दण्ड (२०० पैसों का) उसके बाद आजीवन जेल एवं केवल नीच कार्य (मल-मूत्रादि साफ कराने) का दण्ड देना चाहिये।
हरेत् पादं धनात्तस्य यः कुर्याद्धनगर्वतः ।
पूर्वं ततोऽर्धमखिलं यावज्जीवं तु बन्धनम् ॥ ८७ ॥
धनगर्व से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश— जो धन के गर्व से अपराध करे उसे प्रथम बार उसके पास के धन से चौथाई धन दण्ड रूप में ले ले, उसके बाद यदि अपराध करे तो आधा उसके बाद सम्पूर्ण धन छीन ले, उसके बाद आजीवन जेल का दण्ड दे।
सहायगौरवाद् विद्यामदाच्च बलदर्पतः ।
पापं करोति यस्तं तु बन्धयेत् ताडयेत्सदा ॥ ८८ ॥
१६६ | शुक्रनीतिः
बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण— जो सहायकों की श्रेष्ठता से पूर्व विद्या या बल के अहङ्कार से पाप (अपराध) करता है उसे सदा कैद में बन्द रखे तथा मारे-पीटे।
भार्या पुत्रश्च भगिनी शिष्यो दासः स्नुषाऽनुजः ।
कृतापराधास्ताड्यास्ते तनुरज्जुसुवेणुभिः ॥ ८९ ॥
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कथञ्चन ।
अतोऽन्यथा तु प्रहरेच्चोरवद्दण्डमर्हति ॥ ९० ॥
पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण— अपनी स्त्री, पुत्र, बहन (छोटी), शिष्य (छात्र), दास, पुत्रवधू (पतोहू), छोटा भाई यदि अपराध करे तो इन्हें पतली रस्सी या छड़ी से अथवा पतली रस्सी वाले चाबुक से शरीर पर पीठ में मारना चाहिये किन्तु कभी भी शिर में नहीं मारना चाहिये, इससे अन्यथा यदि कोई मारता है तो उसे चोर की भांति दण्ड देना चाहिये ।
नीचकर्मकरं कुर्याद् बन्धयित्वा तु पापिनम् ।
मासमात्रं त्रिमासं वा षण्मासं वाऽपि वत्सरम् ॥ ९१ ॥
यावज्जीवं तु वा कश्चिन्न कश्चिद्वधमर्हति ।
नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश— किसी भी अपराधी (हत्या करनेवाले को छोड़कर) को एक मास, तीन मास, छ मास, १ वर्ष या आजीवन भर कैद रखकर नीच कर्म (मल-मूत्रादि फिकवाना आदि) का दण्ड देना चाहिये किन्तु किसी को वध का दण्ड नहीं देना चाहिये ।
न हिंस्याच्च भूतानि त्विति जागर्ति वै श्रुतिः ॥ ९२ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वधदण्डं त्यजेन्नृपः ।
वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश— क्योंकि 'प्राणियों का वध नहीं करना चाहिये' ऐसी श्रुति का वचन (वेद का वचन) है। अतः राजा को अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक वध का दण्ड देना त्याग देना चाहिये ।
अवरोधाद् बन्धनेन ताडनेन च कर्षयेत् ॥ ९३ ॥
लोभान्न कर्षयेद्राजा धनं दण्डेन वै प्रजाम् ।
बल्कि वध दण्ड के बदले, हथकड़ी-बेड़ी के साथ कैद रखना, मारना-पीटना, पीड़ा पहुंचाना उचित है । और राजा को लोभवश धनदण्ड (जुर्माना करने) से प्रजा को पीड़ा न पहुँचानी चाहिये ।
नासहायास्तु पित्राद्या दण्ड्याः स्युरपराधिनः ॥ ९४ ॥
क्षमाशीलस्य वै राज्ञो दण्डग्रहणमीदृशम् ।
सहायहीन अपराधी के माता-पिता आदि को दण्ड न देने का निर्देश—
चतुर्थोऽध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६७
अपराधी के सहायहीन पिता आदि को दण्ड नहीं देना चाहिये। क्षमाशील राजा को इसी प्रकार से अपराधी के लिये दण्ड देना उचित है।
नापराधं तु क्षमते प्रचण्डो धनहारकः ॥ ६५ ॥
नृपो यदा तदा लोकः क्षुभ्यते भिद्यते परैः।
अतः सुभागदण्डी स्यात् क्षमावान् रञ्जको नृपः ॥ ६६ ॥
राजा जब अपराधी को तीक्ष्ण दण्ड देनेवाला एवं धन हरण करनेवाला होकर अपराध को नहीं क्षमा करता है अर्थात् अनुचित दण्ड देता है तब प्रजा क्षुभित हो उठती है और उसे शत्रु लोग फोड़कर अपनी ओर कर लेते हैं, अतः राजा को जितना अपराध हो उतना ही विचार कर दंड देना चाहिये एवं क्षमाशील तथा प्रजा का अनुरञ्जन करनेवाला होना चाहिये ।
मद्यपः कितवः स्तेनो जारश्चण्डश्च हिंसकः ।
त्यक्तवर्णाश्रमाचारो नास्तिकः शठ एव हि ॥ ६७ ॥
मिथ्याभिशापकः कर्णेजपाथैदेशदूषकौ ।
असत्यवाङ् न्यासहारी तथा वृत्तिविघातकः ॥ ६८ ॥
अन्योदयासहिष्णुश्च ह्युत्कोचग्रहणे रतः ।
अकार्यकृतमित्राणां कार्याणां भेदकस्तथा ॥ ९९ ॥
अनिष्टवाक् परुषवाग् जलारामप्रबाधकः ।
नक्षत्रसूची राजद्विट् कुमन्त्री कूटकार्यवित् ॥ १०० ॥
कुवैद्यामङ्गलाशौचशीलो मार्गनिरोधकः ।
कुसाद्यूद्धतवेशश्च स्वामिद्रोही व्ययाधिकः ॥ १०१ ॥
अग्निदो गरदो वेश्यासक्तः प्रबलदण्डकृत् ।
तथा पाक्षिकसभ्यश्च बलाल्लिखितग्राहकः ॥ १०२ ॥
अन्यायकारी कलहशीले युद्धे पराङ्मुखः ।
साक्ष्यलोपी पितृमातृसतीस्त्रीमित्रद्रोहकः ॥ १०३ ॥
असूयकः शत्रुसेवी मर्मभेदी च वञ्चकः ।
स्वकीयद्विङ्गुप्तवृत्तिर्बुधलो ग्रामकण्टकः ॥ १०४ ॥
बिना कुटुम्बभरणात्तपोविद्यार्थिनः सदा ।
तृणकाष्ठादिहरणे शक्तः सन् भैक्ष्यभोजकः ॥ १०५ ॥
कन्याया अपि विक्रेता कुटुम्बवृत्तिहिंसकः ।
अधर्मा सूचकश्चापि राजानिष्टमुपेक्षकः ॥ १०६ ॥
कुलटा पतिपुत्रघ्नी स्वतन्त्रा वृद्धनिन्दिता ।
गृहकृत्योझिता नित्यं दुष्टाचारा प्रियस्नुषा ॥ १०७ ॥
स्वभावदुष्टानेतान् हि ज्ञात्वा राष्ट्राद् विवासयेत् ।
| १६८ | शुक्रनीतिः |
|---|
देश-निष्कासन योग्य अपराधियों के लक्षण—मद्यप (शराबी), धूर्त, चोर, जार (परस्त्रीगामी), अत्यन्त क्रोधी, हिंसा करनेवाला (खूनी), वर्ण (ब्राह्मणादि ४ वर्ण) तथा आश्रम (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास) के अनुकूल आचारों का त्याग करनेवाला, नास्तिक (परलोकादि को नहीं माननेवाला), खल, झूठा दोषारोप करनेवाला, एक को-दूसरे से आपस में कह सुनकर विरोध करानेवाला, अच्छे साधु पुरुषों को दोष लगानेवाला एवं देवताओं को अपवित्र करनेवाला अथवा मूर्त्ति को तोड़नेवाला, झूठ बोलनेवाला, धरोहर को हजम करनेवाला, किसी की जीविका को नष्ट करनेवाला, दूसरी की उन्नति को नहीं सहन करनेवाला, घूस लेने में तत्पर, नहीं करने योग्य बुरे कार्यों को करनेवाला, किसी के गुप्त विचार को प्रकट करनेवाला, किसी के कार्यों को नष्ट करनेवाला, अप्रिय (अनुचित) वचन बोलनेवाला, कठोरभाषी, जलाशय या बगीचे को हानि पहुँचानेवाला, झूठ-मूठ का बना हुआ ज्योतिषी (भाग्य फल बतानेवाला), राजद्रोही, बुरी सलाह देनेवाला (दुष्टमन्त्री), कूट कार्य (जालसाजी) जाननेवाला, कुवैद्य (अनाड़ी वैद्य), अभद्र तथा अपवित्र आचार तथा वेश भूषा रखनेवाला, रास्ता रूधनेवाला, ठीक २ गवाही नहीं देनेवाला, उद्धत वेश रखनेवाला, अपने स्वामी के साथ द्रोह रखनेवाला, अनाप-शनाप व्यय करनेवाला, आग लगानेवाला, विष देनेवाला, वेश्या में आसक्त, अत्यन्त उग्र दंड देनेवाला, अफसर, न्यायालय में सदस्य (जूरी) होकर पक्षपात करनेवाला, बलपूर्वक लिखित पत्र को अन्याय से ग्रहण करनेवाला, अन्याय करनेवाला, झगड़ालू, युद्ध से भाग आनेवाला, गवाही को नहीं माननेवाला या उचित गवाही नहीं देनेवाला, पिता-माता-सती स्त्री-मित्र इनके साथ द्रोह करनेवाला, दूसरे के गुणों में भी दोषारोप करनेवाला, राजा के शत्रुओं की सेवा करनेवाला, मर्मान्तक पीड़ा पहुँचानेवाले वचनों को बोलनेवाला या कार्यों को करनेवाला, ठगनेवाला, आत्मीयों के साथ द्वेष करनेवाला, गुप्त व्यापार (ब्लैक मार्केटिंग-चोर बाजारी) करनेवाला, वृषल (किसी भी धर्म पर आघात पहुँचानेवाला), ग्रामवासियों को पीड़ा पहुंचानेवाला अर्थात् उनके कार्यों में बाधा पहुँचानेवाला, गृहस्थ होकर भी कुटुम्ब का भरण-पोषण न करके सदा तपस्या या विद्या पढ़नेवाला, तृण (घास), काष्ठ आदि लाकर आजीविका चलाने की सामर्थ्य रहने पर भी भिक्षा वृत्ति से पेट पालनेवाला, कन्या को भी बेचनेवाला, कुटुम्ब की आजीविका को घटानेवाला, अधार्मिक (अपने धर्म पर नहीं चलनेवाला), चुगुली करनेवाला अथवा अधर्म की सूचना देनेवाला (पापवार्त्ता करनेवाला), राजा के अनिष्ट की पर्वाह नहीं करनेवाला, ऐसे पुरुषों एवं कुलटा, पति पुत्र की हत्या करनेवाली,
चतुर्थोऽध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६६
स्वतन्त्र होकर घूमनेवाली, वृद्धजनों से निन्दिता, गृह के कार्यों को छोड़ देनेवाली (न करनेवाली), नित्य दुष्ट आचरण करनेवाली, गुरुजनों के साथ अप्रिय व्यवहार करनेवाली, पतोहू या पतोहुओं के साथ अप्रिय व्यवहार करनेवाली ऐसी स्त्रियों को स्वभावतः दुष्ट जानकर राजा अपने राज्य से निकाल दे।
द्वीपे निर्वासितव्यास्ते बद्धा दुर्गोदरेऽथवा ॥ १०८ ॥
मार्गसंस्करणे योज्याः कदन्नन्यूनभोजनाः।
तत्तज्जात्युक्तकर्माणि कारयीत च तैनृपः ॥ १०९ ॥
मार्ग संरक्षण योग्य का निर्देश— अथवा उक्त मद्यप आदि लोगों को किसी टापू में ले जाकर रखना चाहिये किंवा किसी—किले के भीतर कैद करके रखना चाहिये और वहां पर उन सबों से रास्ता साफ कराना चाहिये एवं खराब अन्न तथा थोड़ी मात्रा में उन्हें भोजन देना चाहिये। और उन सबों से उनके जाति के अनुकूल कर्म राजा को कराना चाहिये।
एवंविधानसाधूंश्च संसर्गेण च दूषितान्।
दण्डयित्वा च सन्मार्गे शिक्षयेत्तान्नृपः सदा ॥ ११० ॥
संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश— और राजा सदा इस प्रकार से पूर्वोक्त दुष्ट पुरुषों को एवं उनके साथ संसर्ग करने से दुष्ट हुये पुरुषों को दण्ड देकर सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा दे।
राज्ञो राष्ट्रस्य विकृतिं तथा मन्त्रिगणस्य च।
इच्छन्ति शत्रुसम्बन्धाद्ये तान् हन्याद्धि द्राङ्नृपः ॥ १११ ॥
राजादिकों से बिगाड़ करवानेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश— और जो राजा राज्य या मन्त्री लोगों को शत्रु से मिलकर हानि पहुंचाना चाहते हों उन्हें राजा शीघ्र वध करने का दण्ड दे।
नेच्छेच्च युगपद्ध्वंसं गणदौष्ट्ये गणस्य च।
एकैकं घातयेद्राजा वत्सोऽश्नाति यथा स्तनम् ॥ ११२ ॥
गणों की दुष्टता करने पर उपाय का निर्देश— यदि बहुत से गण (समूह) दुष्ट हो गये हों तो प्रत्येक गण का एक साथ ही नाश करने की इच्छा राजा को नहीं करनी चाहिये बल्कि उनमें से एक-एक को क्रम से नष्ट करना चाहिये। जैसे बछड़ा एक-एक करके क्रम से स्तनों को पीता है न कि एक साथ ही।
अधर्मशीलो नृपतिर्यदा तं भीषयेज्जनः।
धर्मशीलातिबलवद्रिपोराश्रयतः सदा ॥ ११३ ॥
अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश— जब राजा अधर्म पर चलनेवाला हो जाय तो प्रजा 'धर्मशील, बलवान् उस राजा
२०० शुक्रनीतिः
के शत्रु का आश्रय लेने' का भय उसे दिखा कर सदा डराना चाहिये। अर्थात् यदि आप अधर्म पर चलना नहीं छोड़ेंगे तो हम सब प्रजा आपका साथ छोड़कर आपके शत्रु धर्मशील बलवान् से मिल जायँगे ऐसा कहकर उस राजा को डराना चाहिये।
यावत्तु धर्मशीलः स्यात् स नृपस्तावदेव हि । अन्यथा नश्यते लोको द्राङ्नृपोऽपि विनश्यति ॥ ११४ ॥
अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश—जब तक राजा धर्मशील बना रहता है अर्थात् प्रजा के साथ धर्मपूर्वक व्यवहार करता है तभी तक वह राजा बना रहता है। अन्यथा (यदि ऐसा न हो तो) राजा के अधर्मशील होने पर उसकी प्रजा एवं स्वयं राजा भी शीघ्र नष्ट हो जाता है अर्थात् उसका राज्य नष्ट हो जाता है।
मातरं पितरं भार्यां यः संत्यज्य विवर्त्तते । निगडैर्बन्धयित्वा तं योजयेन्मार्गसंस्कृतौ ॥ ११५ ॥ तद्भृत्यथं तु सन्दद्यात्तेभ्यो राजा प्रयत्नतः ।
माता आदि के भरण-पोषण त्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश— जो कर्मचारी माता, पिता और स्त्री (पत्नी) इनका भरण-पोषण करना छोड़कर मनमाना अपना व्यवहार रखता है, उसे हथकड़ी-बेड़ी डालकर कैद रखना चाहिये एवं उससे रास्ता साफ़ करने या बनाने का कार्य कराना चाहिये। और उसके तनख्वाह का आधा द्रव्य उन सबों को प्रयत्नपूर्वक राजा को देना चाहिये।
विद्यात् पणसहस्रं तु दण्ड उत्तमसाहसः ॥ ११६ ॥ दशमाषमितं ताम्रं तत्पणो राजमुद्रितम् । वराटिसार्धशतकमूल्यः कार्षापणश्च सः ॥ ११७ ॥
उत्तमादि साहस दण्ड के लक्षण एवं पण आदि के लक्षण—१००० पणों (पैसों) का जुर्माना उत्तम साहस दण्ड कहलाता है। राजा के द्वारा स्वीकृत चिह्न से अंकित १० मासे भर तांबे के सिक्के को 'पण' (पैसा) कहते हैं। और १५० कौड़ियों के मूल्य के उसी (पण) को 'कार्षापण' भी कहते हैं।
तदर्धश्च तदर्धश्च मध्यमः प्रथमः क्रमात् । प्रथमे साहसे दण्डः प्रथमश्च क्रमात् परौ ॥ ११८ ॥ मध्यमे मध्यमो धार्य्यश्चोत्तमे तूत्तमो नृपैः ।
और क्रम से उसके (१०००) आधे (५००) पणों के जुर्माने को मध्यम तथा उसके आधे (२५०) पणों के जुर्माने को प्रथम साहस दण्ड कहते हैं। प्रथम श्रेणी के साहसों (अपराधों) में प्रथम साहसदण्ड (२५०
चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०१
पणों का), मध्यम साहसों में मध्यमसाहस दण्ड (५०० पणों का) एवं उत्तम साहसों में उत्तम साहस दण्ड (१००० पणों का) विधान अपराधियों के लिये राजा को देना चाहिये।
सोपायाः कथिता मिश्रे मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ११६ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य सुहृदादिलक्षणप्रकरणम्।
इस प्रकार से इस मिश्र अध्याय में सामादिक उपायों के साथ मित्र, उदासीन तथा शत्रु के विषय में कहा गया।
इस प्रकार हिन्दीव्याख्या में चतुर्थाध्याय का सुहृदादिप्रकरण समाप्त।
अथ चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम्
अथ कोशप्रकरणं ब्रूवे मिश्रे द्वितीयकम्।
एकार्थसमुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक् ॥ १ ॥
कोश के लक्षण— अब 'मिश्र' अध्याय के अन्तर्गत दूसरा 'कोशप्रकरण' का वर्णन करता हूँ। किसी भी एक (समान) वस्तुओं के समूह को 'कोश' कहते हैं वह पृथक् २ अनेक प्रकार का होता है।
येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयान्नृपः।
तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः ॥ २ ॥
राजा को जिस किसी भी प्रकार से धन एकत्र करना चाहिये। और उस धन से राष्ट्र (राज्य), सेना तथा यज्ञादि कर्मों की रक्षा करनी चाहिये।
बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थं कोशसंग्रहः।
परत्रेह च सुखदो नृपस्यान्यश्च दुःखदः ॥ ३ ॥
सुखप्रद कोश का निर्देश— अतः सेना तथा प्रजा की रक्षा के लिये एवं यज्ञ के लिये जो कोश का संग्रह किया जाता है वह राजा के लिये इस लोक तथा परलोक दोनों के लिये सुखप्रद होता है, इससे भिन्न कार्य के लिये किया हुआ कोशसंग्रह दुःखप्रद होता है।
स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यश्च स्वोपभोगाय केवलम्।
नरकायैव स ज्ञेयो न परत्र सुखप्रदः ॥ ४ ॥
दुःखप्रद कोश का निर्देश— जो कोशसंग्रह स्त्री-पुत्र के लिये तथा केवल अपने उपभोग के लिये किया जाता है उसे केवल नरक देनेवाला ही समझना चाहिये क्योंकि वह परलोक में सुखप्रद नहीं होता है।
| २०२ | शुक्रनीतिः |
|---|
अन्यायेनार्जितो यस्माद् येन तत्पापभाक् च सः।
सुपात्रतो गृहीतं यद्दत्तं वा वर्धते च यत् ॥ ५ ॥
**अन्यायोपार्जित कोष के दुष्टफलों का निर्देश—**जिसने अन्याय से धन उपार्जन किया है अतः वह उस (अन्यायोपार्जन) के पाप का फल भोगने-वाला होता है और जो धन सुपात्र से लिया जाता है या सुपात्र को दिया जाता है वह धन बढ़ता है।
स्वागमी सद्व्ययी पात्रमपात्रं विपरीतकम्।
अपात्रस्य हरेत् सर्वं धनं राजा न दोषभाक् ॥ ६ ॥
**सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश—**जो न्याय से धन का उपार्जन करनेवाला तथा सत्कार्य में व्यय करनेवाला होता है वह 'सुपात्र' कहलाता है। इससे विपरीत अर्थात् अन्याय से धनोपार्जन तथा कुमार्ग में धन व्यय करनेवाला 'अपात्र' कहलाता है अतः यदि अपात्र के सम्पूर्ण धन को हरण करनेवाला राजा हो तो दोषभागी नहीं होता है।
अधर्मशीलनृपतेः सर्वतः संहरेद्धनम्।
छलाद् बलाद्दस्युवृत्त्या परराष्ट्राद्धरेत्तथा ॥ ७ ॥
**अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश—**राजा को अधर्मशील राजा के पास से सभी प्रकारों से अर्थात् चाहे छल, बल या डाकुओं की वृत्ति (डाका डालने) से धन हरण करना चाहिये। तथा इसी तरह शत्रु के राज्य से भी धनहरण करना चाहिये।
त्यक्त्वा नीतिबलं स्वीयप्रजापीडनतो धनम्।
सञ्चितं येन तत्तस्य सराज्यं शत्रुसाद्भवेत् ॥ ८ ॥
**शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश—**जिसने नीति-बल का परित्याग करके अर्थात् अन्याय से अपनी प्रजा को पीड़ा पहुँचाकर धन संचय किया है उसका वह धन राज्य के साथ साथ शत्रु के अधीन हो जाता है।
दण्डभूभागशुल्कनामाधिक्यात् कोशवर्धनम्।
अनापदि न कुर्यात् तीर्थदेवकरग्रहात् ॥ ९ ॥
**देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश—**बिना विशेष आपत्ति पड़े प्रजा के ऊपर अधिक जुर्माना, मालगुजारी या चुंगी बढ़ाकर एवं तीर्थ स्थान तथा देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाकर राजा को अपना कोश (खजाना) नहीं बढ़ाना चाहिए।
यदा शत्रुविनाशार्थं बलसंरक्षणोद्यतः।
विशिष्टदण्डशुल्कादि धनं लोकात्तदा हरेत् ॥ १० ॥
**आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश—**जिस समय राजा शत्रु का
चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०३
चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०३
विनाश करने के लिये सेना की रक्षा करने में तत्पर हो उस समय विशेष प्रकार का अधिक जुर्माना या चुंगी लगाकर प्रजा से धन का हरण करे तो उचित है।
धनिकेभ्यो भृतिं दत्त्वा स्वापत्तौ तद्धनं हरेत्। राजा स्वापत्समुत्तीर्णस्तत् स्वं दद्यात् सवृद्धिकम् ॥ ११ ॥ आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश—और अपने ऊपर आपत्ति आ पड़ने पर 'मैं सूद दूंगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर धनिकों से उसके धन को जबरदस्ती राजा को ले लेना चाहिये। तथा जब वह आई हुई अपनी आपत्ति को पार कर जाय तब उस लिये हुये धन को सूदसहित उस (धनिक) को लौटा देना चाहिये।
प्रजाऽन्यथा हीयते च राज्यं कोशो नृपस्तथा । हीनाः प्रबलदण्डेन सुरथाद्या नृपा यतः ॥ १२ ॥ प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल—अन्यथा अर्थात् धनाभाव से सेना की रक्षा न कर सकने से प्रजा, राज्य, कोश तथा राजा क्षीण हो जाता है। क्योंकि प्रबल दंड के करने से सुरथ आदि राजा लोग हीन अर्थात् राज्यच्युत हो गये।
दण्डभूभागशुल्कैस्तु बिना कोशाद् बलस्य च । संरक्षणं भवेत् सम्यग् यावद्विंशतिवत्सरम् ॥ १३ ॥ तथा कोशस्तु संधायैः स्वप्रजारक्षणक्षमः । कोश संग्रह करने का प्रमाण—बिना जुर्माना, मालगुजारी तथा चुंगी से प्राप्त धन के भी केवल राजा के कोश से ही २० वर्ष तक सेना की रक्षा भली भांति जितने से हो सकता है उतने कोश का तथा अपनी प्रजा की रक्षा के लिये उपयुक्त संग्रह करना उचित है।
बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम् ॥ १४ ॥ बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरिरिक्षयः । जायते तत्त्रयं स्वर्गः प्रजासंरक्षणेन वै ॥ १५ ॥ प्रजा-संरक्षण के फल—कोश का मूल सेना है अर्थात् सेना के द्वारा कोश का संग्रह होता है, और सेना का मूल कोश है अर्थात् कोश के द्वारा सेना का संग्रह होता है, और सेना तथा कोश की रक्षा करने से कोश तथा राष्ट्र (राज्य) की वृद्धि एवं शत्रुओं का नाश होता है और प्रजा की रक्षा करने से पूर्वोक्त कोश तथा राष्ट्र की वृद्धि एवं शत्रु नाश ये तीनों होते हैं और अन्त में स्वर्ग भी मिलता है।
यज्ञार्थं द्रव्यमुत्पन्नं यज्ञः स्वर्गसुखायुषे ।
| २०४ | शुक्रनीतिः |
|---|
अर्यंभावो बलं कोशो राष्ट्रवृद्धयै त्रयं स्त्रिदम् ॥ १६ ॥
**राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण—**यज्ञ के लिये द्रव्य (धन) उत्पन्न हुआ है और यज्ञ स्वर्ग सुख एवं आयु की वृद्धि के लिये है, और शत्रु का अभाव, सेना, कोष ये तीनों राष्ट्र की वृद्धि के लिये हैं।
तद्बुद्धिर्नीतिनैपुण्यात् क्षमाशीलनृपस्य च ।
जायतेऽतो यतेतैव यावद्बुद्धिबलोदयम् ॥ १७ ॥
**नीति-निपुणता से कोशवृद्धि का यत्न करने का निर्देश—**क्षमाशील राजा की नीतिसंबन्धी निपुणता से ही उपर्युक्त विषयों की वृद्धि होती है अतः जितना बुद्धिबल हो उतना लगाकर वृद्धि के लिये प्रयत्न करना चाहिये।
मालाकारस्य वृत्त्यैव स्वप्रजारक्षणेन च ।
शत्रुं हि करदीकृत्य तद्धनैः कोशवर्धनम् ॥ १८ ॥
करोति स नृपः श्रेष्ठो मध्यमो वैश्यवृत्तितः ।
अधमः सेवया दण्डतीर्थदेवकरग्रहैः ॥ १९ ॥
**श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण—**जो माली की भांति व्यवहार रखकर अर्थात् अपने बाग के वृक्षों को सींच कर जैसे माली उसकी रक्षा करता है उसी भांति प्रजा की रक्षा करने के साथ-साथ शत्रु को कर (मालगुजारी) देनेवाला बना-कर उनके धनों से कोश को बढ़ाता है वह नृप श्रेष्ठ कहलाता है, जो वैश्य-वृत्ति व्यवसाय आदि से कोश बढ़ाता है वह मध्यम, एवम् सेवा से तथा जुर्माना, तीर्थ स्थान तथा देवमन्दिरों पर कर लगाकर जो कोश बढ़ाता है वह अधम राजा कहलाता है।
प्रजा हीनधना रक्ष्या भृत्या मध्यधनाः सदा ।
यथाधिकम् प्रतिभुवोऽधिकद्रव्यास्तथोत्त्माः ॥ २० ॥
हीन धन तथा मध्यम धनवाली प्रजा की रक्षा वेतन देकर राजा को स्वामी की भांति करनी चाहिये। तथा अधिक धनवाली उत्तम प्रजा की रक्षा जामिनदार होकर करनी चाहिये।
धनिकाश्चोत्तमधना न हीना नाधिका नृपैः ।
क्योंकि उत्तम धनवाली धनिक प्रजा राजा से न हीन और न अधिक अर्थात् राजतुल्य होती हैं।
द्वादशाब्दप्रपूरं यद्धनं तन्नीचसंज्ञकम् ॥ २१ ॥
पर्याप्तं षोडशाब्दानां मध्यमं तद्धनं स्मृतम् ।
त्रिंशदब्दप्रपूरं स्यात् कुटुम्बस्योत्तमं धनम् ॥ २२ ॥
**नीचादि धन के लक्षण—**जो धन १२ वर्ष तक परिवार की रक्षा करने लायक होता है वह 'नीच' संज्ञक, जो १६ वर्ष तक रक्षा करने योग्य होता है