श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षय- | महिमान्वित स्वरूप और कर्मके कारण रहितमीशं पश्यत्ययमहमस्मीति | होनेवाले वृद्धि एवं क्षयसे रहित ईश्वर- | रूप उस आत्माको देखता है; अर्थात् साक्षाज्जानाति यः स वीतशोको | 'यही मैं हूँ' इस प्रकार साक्षात् जानता | है, वह शोकरहित हो जाता है । किन्तु भवति । केन तर्ह्यसौ पश्यति ? | यह देखता किसकी सहायतासे है ? धातुरीश्वरस्य प्रसादात् । प्रसन्ने | [ इसपर कहते हैं— ] विधाता यानी | ईश्वरकी कृपासे, क्योंकि ईश्वरके प्रसन्न हि परमेश्वरे तद्याथात्म्यज्ञान- | होनेपर ही उसके वास्तविक स्वरूप- मुत्पद्यते । अथवेन्द्रियाणि धातवः | का ज्ञान होता है । अथवा शरीरको | धारण करनेके कारण इन्द्रियाँ ही धातु शरीरस्य धारणात्तेषां प्रसादा- | हैं, उनके प्रसाद यानी विषयोंमें दोष- द्विषयदोषदर्शनमलाद्यपनयनात् । | दर्शनके द्वारा मलादिकी निवृत्ति | होनेपर उसे देखता है, अन्यथा अन्यथा दुर्विज्ञेय आत्मा कामिभिः | सकाम प्राकृत पुरुषोंके लिये तो प्राकृतपुरुषैः ॥ २० ॥ | आत्मा दुर्विज्ञेय ही है ॥२०॥
आत्मस्वरूपके विषयमें ब्रह्मवेत्ताका अनुभव उक्तमर्थं द्रढयितुं मन्त्रदृगनु- | उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करनेके लिये भवं दर्शयति— | श्रुति मन्त्रद्रष्टाका अनुभव दिखाती है— वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥२१॥
१. अथवासे लेकर जो व्याख्या है वह मूलमें 'धातुप्रसादात्' पाठ मानकर की गयी है।
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३
ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्मका अभाव बतलाते हैं, और जिसे नित्य कहते हैं उस जराशून्य पुरातन सर्वात्माको, जो विभु होनेके कारण सर्वगत है, मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥ वेदाहमेतमिति । वेद जाने- 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । इस ऽहमेतमजरं विपरिणामधर्मवर्जितं अजर अर्थात् विपरिणामधर्मशून्य और पुराणं पुरातनं सर्वात्मानं सर्वेषा- पुराण—पुरातन सर्वात्माको सबके मात्मभूतं सर्वगतं विभुत्वादाकाश- स्वरूपभूतको, जो विभु—आकाशके वद्व्यापकत्वात् । यस्य च जन्म- समान व्यापक होनेके कारण सर्वगत निरोधमुत्पत्त्यभावं प्रवदन्ति ब्रह्म- है तथा ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्म- वादिनो हि नित्यम् । स्पष्टोऽर्थः का अभाव नित्य बतलाते हैं, मैं ॥ २१ ॥ जानता हूँ। शेष अर्थ स्पष्ट है ॥२१॥*
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
- श्रीशङ्करानन्दजीने इस मन्त्रके उत्तरार्धकी व्याख्या इस प्रकार की है—"जन्म च निरोधश्च जन्मनिरोधमुत्पत्तिनाशावित्यर्थः प्रवदन्ति प्रकर्षेण कथयन्ति मूढा इति शेषः, यस्य आत्मनः······ब्रह्मवादिनः उत्पन्नतत्त्वसाक्षात्कारा हि प्रसिद्धाः प्रवदन्ति प्रकर्षेण कथयन्ति नित्यम्।" अर्थात् "जन्म और निरोधका नाम जन्मनिरोध है यानी उत्पत्ति और नाश-इन्हें मूढलोग जिस आत्माके बतलाते हैं और जिसे ब्रह्मवादीलोग —जिन्हें तत्त्वसाक्षात्कार हो गया है नित्य प्रतिपादन करते हैं।" भाष्यकी अपेक्षा यह अर्थ अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, क्योंकि भाष्यके अनुसार अर्थ करनेसे यहाँ 'प्रवदन्ति' क्रियाका दूसरी बार प्रयोग होनेका कोई प्रयोजन नहीं जान पड़ता।
चतुर्थ अध्याय
चतुर्थ अध्याय परमेश्वरसे सद्बुद्धिके लिये प्रार्थना गहनत्वादस्यार्थस्य भूयो भूयो | [ प्रस्तुत ] विषय गम्भीर होनेके | कारण इसका पुनः-पुनः निरूपण। वक्तव्य इति चतुर्थोऽध्याय | करना आवश्यक है, इसलिये अब | चतुर्थ अध्याय आरम्भ किया आरभ्यते— | जाता है— य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगा- द्धर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥ सृष्टिके आरम्भमें जो एक और निर्विशेष होकर भी अपनी शक्तिके द्वारा बिना किसी प्रयोजनके ही नाना प्रकारके अनेकों वर्ण (विशेष रूप) धारण करता है तथा अन्तमें भी जिसमें विश्व लीन हो जाता है वह प्रकाश- स्वरूप परमात्मा हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १ ॥ य एक इति । य एकोऽद्वि- | ‘य एको’ इत्यादि । जो तीयः परमात्मावर्णो जात्यादि- | परमात्मा सृष्टिके आरम्भमें एक— रहितो निर्विशेष इत्यर्थः । बहुधा | अद्वितीय और अवर्ण—जाति नानाशक्तियोगाद्वर्णाननेकान्नि- | आदिसे रहित अर्थात् निर्विशेष | होनेपर भी शक्तिके योगसे निहितार्थ हितार्थोऽगृहीतप्रयोजनः स्वार्थ- | —कोई प्रयोजन न लेकर अर्थात् निरपेक्ष इत्यर्थः । दधाति विदधा- | स्वार्थकी अपेक्षा न करके बहुधा— | नाना प्रकारके अनेकों वर्ण (विशेष-
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५
त्यादौ । वि चैति व्येति चान्ते | रूप ) धारण करता है तथा अन्तमें प्रलयकाले । चशब्दान्मध्येऽपि | —प्रलयकालमें जिसमें विश्व लीन यस्मिन्विश्वं स देवो द्योतनस्व- | हो जाता है। ‘चान्ते’ के ‘च’ शब्द- भावो विज्ञानैकरस इत्यर्थः । स | से यह तात्पर्य है कि मध्यमें भी नोऽस्माञ्छुभया बुद्ध्या संयुनक्तु | जिसमें विश्व स्थित है वह देव— | प्रकाशस्वरूप अर्थात् विज्ञानैकरस संयोजयतु ॥ १ ॥ | परमात्मा हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त | करे ॥ १ ॥ परमात्माकी सर्वरूपता यस्मात्स एव स्रष्टा तस्मिन्नेव | क्योंकि वही जगत्का रचयिता | है और उसीमें उसका लय होता है लयस्तस्मात्स एव सर्वं न ततो | अतः वही सर्वरूप है, उससे भिन्न | कुछ भी नहीं है—यह बात आगेके विभक्तमस्तीत्याह मन्त्रत्रयेण— | तीन मन्त्रोंसे कही जाती है— तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥ २ ॥ वही अग्नि है, वही सूर्य है, वही वायु है, वही चन्द्रमा है, वही शुक्र (शुद्ध) है, वही ब्रह्म है, वही जल है और वही प्रजापति है ॥२॥ तदेवेति । तदेवात्मतत्त्वमग्निः। | ‘तदेवाग्निः’ इत्यादि । वह | आत्मतत्त्व ही अग्नि है, वही सूर्य तदादित्यः । एवशब्दः सर्वत्र | है। आगे ‘तदेव शुक्रम्’ ऐसा देखा संबध्यते तदेव शुक्रमिति दर्श- | जाता है इसलिये ‘एव’ शब्दका | सबके साथ सम्बन्ध है। शेष अर्थ नात् । शेषमृजु । तदेव शुक्रं | सरल है । वही शुक्र यानी शुद्ध है
१७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ शुद्धमन्यदपि दीप्तिमन्नक्षत्रादि । तथा और भी जो दीप्तिशाली नक्षत्रादि पदार्थ हैं वह भी वही है, तद्ब्रह्म हिरण्यगर्भात्मा तदापः स तथा वही ब्रह्म—हिरण्यगर्भस्वरूप है, वही जल है और वही विराट्- प्रजापतिर्विराडात्मा ॥ २ ॥ रूप प्रजापति है ॥ २ ॥ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३॥ तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार या कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर दण्डके सहारे चलता है तथा तू ही [ प्रपञ्चरूपसे ] उत्पन्न होने- पर अनेकरूप हो जाता है ॥ ३ ॥ स्पष्टो मन्त्रार्थः ॥ ३ ॥ | इस मन्त्रका अर्थ स्पष्ट है ॥ ३॥ नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्ष- स्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः । अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥ तू ही नीलवर्ण भ्रमर, हरितवर्ण एवं लाल आँखोंवाला जीव ( शुकादि निकृष्ट प्राणी ), मेघ तथा [ ग्रीष्मादि ] ऋतु और [ सप्त ] समुद्र है । तू अनादि है और सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित है तथा तुझहीसे सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुए हैं ॥ ४ ॥ नील इति । त्वमेवेति सर्वत्र 'नीलः' इत्यादि । यहाँ 'त्वमेव' ( तू ही ) इस पदका सबके साथ संबध्यते । त्वमेव नीलः पतङ्गो सम्बन्ध है । तू ही नीलवर्ण पतङ्ग-
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ भ्रमरः, पतनाद्गच्छतीति पतङ्गः । भ्रमर है। नीचे गिरते चलनेके कारण हरितो लोहिताक्षः शुकादि- भ्रमरको पतङ्ग कहते हैं। तू ही निकृष्टाः प्राणिनस्त्वमेवेत्यर्थः । हरित लोहिताक्ष है, अर्थात् शुकादि निकृष्ट प्राणिवर्ग भी तू ही है। तू तडिद्गर्भो मेघ ऋतवः समुद्राः । ही तडिद्गर्भ—मेघ, ऋतु एवं समुद्र यस्मात्त्वमेव सर्वस्यात्मभूतस्त- है। इस प्रकार क्योंकि तू ही सब- का आत्मा है इसलिये तू अनादि स्मादनादिस्त्वमेव त्वमेवाद्यन्त- है—तेरा आदि और अन्त नहीं शून्यः, विभुत्वेन व्यापकत्वेन है, जिससे कि विभु अर्थात् व्यापक यतो जातानि भुवनानि विश्वानि होनेके कारण, सम्पूर्ण भुवन उत्पन्न ॥ ४ ॥ हुए हैं ॥ ४ ॥ ❧❧❧ प्रकृति और जीवके सम्बन्धका विचार इदानीं तेजोऽबन्नलक्षणां प्रकृतिं अब छान्दोग्योपनिषद्में प्रसिद्ध तेज, अप् और अन्नरूपा प्रकृतिको छान्दोग्योपनिषत्प्रसिद्धामजारूप- श्रुति अजारूपसे कल्पित करके कल्पनया दर्शयति— दिखलाती है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥ अपने अनुरूप बहुत-सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली एक लोहित, शुक्ल और कृष्णवर्णा अजा (बकरी—प्रकृति) को एक अज (बकरा—जीव) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा अज उस भुक्तभोगाको त्याग देता है ॥ ५ ॥
१७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ अजामेकामिति । अजां प्रकृतिं | 'अजामेकाम्' इत्यादि । सरूपा लोहितशुक्लकृष्णां तेजोऽबन्नलक्षणां | —एक समान आकारवाली बहुत- बह्वीः प्रजाः सृजमानामुत्पाद- | सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली लोहित- यन्तीं ध्यानयोगानुगतदृष्टां देवा- | शुक्ल-कृष्णा—तेज, अप् और अन्न- त्मशक्तिं वा सरूपाः समानाकारा | रूपा अजा—प्रकृतिको अथवा ध्यान- अजो ह्येको विज्ञानात्मानादिकाम- | योगमें स्थित ब्रह्मवादियोंद्वारा देखी कर्मविनाशितः स्वयमात्मानं | गयी देवात्मशक्तिको एक अज-- | विज्ञानात्मा, जो अनादि काम और | कर्मद्वारा स्वरूपसे भ्रष्ट कर दिया मन्यमानो जुषमाणः सेवमानो- | गया है, इस प्रकृतिको ही अपना ऽनुशेते भजते । अन्य आचार्योप- | स्वरूप मानकर सेवन करता हुआ देशप्रकाशावसादिताविद्यान्धकारो | भोगता है और दूसरा गुरुदेवके जहाति त्यजति ॥ ५ ॥ | उपदेशरूप प्रकाशसे अविद्यान्धकार- | के नष्ट हो जानेके कारण इसे छोड़ | देता है ॥ ५ ॥ जीव और ईश्वरकी विलक्षणता इदानीं सूत्रभूतौ परमार्थ- | अब परमार्थतत्त्वका निश्चय वस्त्ववधारणार्थमुपन्यस्येते— | करानेके लिये दो सूत्रभूत मन्त्रोंका | उल्लेख किया जाता है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ६ ॥ सदा परस्पर मिलकर रहनेवाले दो सखा ( समान नामवाले ) सुपर्ण ( सुन्दर गतिवाले पक्षी ) एक ही वृक्षको आश्रित किये हुए हैं ।
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९
उनमें एक उसके स्वादिष्ट फलोंको भोगता है और दूसरा उन्हें न भोगता हुआ देखता रहता है ॥ ६ ॥
द्वेति । द्वा द्वौ विज्ञानपरमा- | 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि । द्वा-- त्मानौ । सुपर्णा सुपर्णौ शोभन- | दो विज्ञानात्मा और परमात्मा, जो सुपर्ण पतनौ शोभनगमनौ सुपर्णौ पक्षि- | हैं अर्थात् शुभ पतन--शुभ गमन- सामान्याद्वा सुपर्णौ सयुजा | वाले होनेसे सुपर्ण हैं, अथवा सयुजौ सर्वदा संयुक्तौ । सखाया | पक्षियोंके समान होनेसे जो सुपर्ण सखायौ समानाख्यानौ समा- | कहलाते हैं, और सयुज्--सर्वदा नाभिव्यक्तिकारणौ । एवंभूतौ | संयुक्त रहते हैं तथा सखा हैं-- सन्तौ समानमेकं वृक्षं वृक्षमिवो- | जिनके आख्यान ( नाम ) यानी च्छेदसामान्याद्वृक्षं शरीरं परि- | अभिव्यक्तिके कारण समान हैं । षस्वजाते परिष्वक्तवन्तौ समा- | ऐसे वे दोनों समान यानी एक ही श्रितवन्तावेतौ । | वृक्षको--वृक्षके समान नाशमें | समानता होनेके कारण शरीर वृक्ष | है, उसे परिष्वक्त किये हैं अर्थात् | ये दोनों उसपर आश्रित हैं । तयोरन्योऽविद्याकामवासनाश्र- | उनमें एक--अविद्या, काम और यलिङ्गोपाधिर्विज्ञानात्मा पिप्पलं | वासनाओके आश्रयभूत लिङ्गदेहरूप कर्मफलं सुखदुःखलक्षणं स्वादु | उपाधिवाला विज्ञानात्मा अविवेकवश अनेकविचित्रवेदनास्वादरूपमत्ति | उसके स्वादु--अनेक विचित्र वेदना- उपभुङ्क्तेऽविवेकतः । अनश्नन्नन्यो | रूप खादवाले पिप्पल--सुख- नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः परमे- | दुःखरूप कर्मफलोंको भोगता है श्वरोऽभिचाकशीति सर्वमपि पश्य- | तथा अन्यं--नित्यशुद्धबुद्धमुक्त- न्नास्ते ॥ ६ ॥ | स्वरूप परमात्मा उन्हें न भोगता हुआ | उन सभीको देखता रहता है ॥६॥
१८० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१८० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ तत्रैवं सति— | ऐसा होनेपर— समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो- ऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ ७ ॥ उस एक ही वृक्षपर जीव [ देहात्मभावमें ] डूबकर मोहग्रस्त हो दीनभावसे शोक करता है । जिस समय यह [ अनेकों योगमार्गोसे ] सेवित और देहादिसे भिन्न ईश्वर और उसकी महिमाको देखता है उस समय शोकरहित हो जाता है ॥ ७ ॥ समाने वृक्षे शरीरे पुरुषो | एक ही वृक्ष यानी शरीरमें पुरुष | —भोक्ता जीव अविद्या, काम, कर्म, भोक्ताविद्याकामकर्मफलरागादि- | कर्मफल और रागादिके भारी भारसे गुरुभाराक्रान्तोऽलाबुरिव समुद्र- | आक्रान्त हो समुद्रके जलमें डूबे हुए | तूँबेके समान यानी निश्चय ही जले निमग्नो निश्चयेन देहात्म- | देहात्मभावको प्राप्त हुआ—'यह भावमापन्नः'अयमेवाहममुष्य पुत्रो- | देह मैं हूँ, मैं अमुकका पुत्र हूँ, | उसका नाती हूँ, कृश हूँ, स्थूल हूँ, ऽस्य नप्ता कृशः स्थूलो गुणवान्नि- | गुणवान् हूँ, गुणहीन हूँ, सुखी हूँ, र्गुणः सुखी दुःखी'इत्येवंप्रत्ययो | दुःखी हूँ' इस प्रकारके प्रत्ययोंवाला | हो, ऐसा समझकर कि इस देहसे नान्योऽस्त्यस्मादिति जायते म्रि- | भिन्न कोई और नहीं है जन्मता, यते संयुज्यते च संबन्धिवान्धवैः। | मरता एवं अपने सम्बन्धी वन्धुओंसे | संयुक्त होता है । अतः अनीशतासे अतोऽनीशया 'न कस्यचित्सम- | —'मैं किसी कार्यके लिये समर्थ नहीं र्थोऽहं पुत्रो मम नष्टो मृता मे | हूँ, मेरा पुत्र नष्ट हो गया, स्त्री मर
[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १८१
[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १८१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भार्या किं मे जीवितेन' इत्येवं दीन- | गयी अब मेरे जीनेसे क्या लाभ है?' |
| इस प्रकारका दीनभाव ही अनीशा | |
| भावोऽनीशा तया शोचति सन्त- | (असमर्थता) है उससे युक्त होकर |
| और मोहग्रस्त होकर यानी अनर्थके | |
| प्यते मुह्यमानोऽनेकानर्थप्रकारै- | अनेकों प्रकारोंसे अविवेकवश विचित्र |
| रविवेकतया विचित्रतामापद्यमानः। | स्थितिको प्राप्त होकर शोक अर्थात् |
| सन्ताप करता है। | |
| स एव प्रेततिर्यङ्मनुष्यादि- | वही प्रेत, तिर्यक् एवं मनुष्यादि |
| योनिष्वापतन्दुःखमापन्नः कदा- | योनियोंमें पड़कर दुःख भोगता है। |
| जब कभी अनेक जन्मोंके सञ्चित | |
| चिदनेकजन्मशुद्धधर्मसञ्चयन- | पुण्यकर्मविपाकसे कोई परमकृपालु |
| निमित्तं केनचित्परमकारुणिकेन | आचार्य उसे योगमार्गका उपदेश |
| दर्शितयोगमार्गोऽहिंसासत्यब्रह्म- | कर देते हैं तो वह अहिंसा, सत्य, |
| ब्रह्मचर्य एवं सर्वत्यागके द्वारा समा- | |
| चर्यसर्वत्यागसमाहितात्मा सन् | हितचित्त और शमादि साधनोंसे |
| शमादिसम्पन्नो जुष्टं सेवितमनेक- | सम्पन्न हो अनेक योगमार्गोंसे सेवित |
| योगमार्गैर्यदा यस्मिन्काले पश्यति | अन्य यानी वृक्ष (देह) रूप |
| उपाधिसे भिन्न, संसारधर्मशून्य, | |
| ध्यायमानोऽन्यं वृक्षोपाधिलक्षणा- | क्षुधादिसे असंस्पृष्ट, सर्वान्तर्यामी ईश्वर |
| द्विलक्षणमसंसारिणमशनायाद्यसं- | परमात्माका ध्यान करता हुआ उसे |
| देखता है। अर्थात् 'मैं यह हूँ, अर्थात् | |
| स्पृष्टं सर्वान्तरं परमात्मानमीशम् | मैं सबमें समान और समस्त प्राणियोंके |
| 'अयमह मस्मीत्यात्मा सर्वस्य समः | भीतर स्थित आत्मा हूँ, अविद्याजनित |
| सर्वभूतान्तरस्थो नेतरोऽविद्या- | उपाधिसे परिच्छिन्न मायात्मा नहीं |
| हूँ' इस प्रकार साक्षात्कार करता है | |
| जनितोपाधिपरिच्छिन्नो मायात्मा' | और उसकी विभूतिरूप महिमाको |
| इति विभूतिं महिमानमिति जगद्रूप- | देखता है यानी यह जगद्रूप महिमा |
१८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ मस्यैव महिमा परमेश्वरस्येति | इस परमात्माकी ही है—ऐसा जिस | समय देखता है उस समय यह यदैवं पश्यति तदा वीतशोको | शोकरहित हो जाता है । अर्थात् | सम्पूर्ण शोकसागरसे मुक्त यानी भवति । सर्वस्माच्छोकसागराद्वि- | कृतकृत्य हो जाता है । अथवा | [ ऐसा अर्थ करना चाहिये कि ] मुच्यते कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः । | जिस समय इस भोक्ता जीवको यह अथवा जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- | योगिसेवित अन्य-ईश्वररूप अर्थात् | इस प्रत्यगात्माकी ही महिमारूप मस्यैव प्रत्यगात्मनो महिमानम् | देखता है उस समय शोकरहित हो इति तदा वीतशोको भवति ॥७॥ | जाता है ॥७॥ ब्रह्मकी अधिष्ठानरूपता और उसके ज्ञानसे कृतार्थता इदानीं तद्विदां कृतार्थतां | अब श्रुति ब्रह्मवेत्ताओंकी कृतार्थता दर्शयति— | प्रदर्शित करती है— ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥ जिसमें समस्त देवगण अधिष्ठित हैं उस अक्षर परव्योममें ही वेदत्रय स्थित हैं [ अर्थात् वे भी उसीका प्रतिपादन करते हैं ] । जो उसको नहीं जानता वह वेदोंसे ही क्या कर लेगा ? जो उसे जानते हैं वे तो ये कृतार्थ हुए स्थित हैं ॥ ८ ॥ ऋच इति । वेदत्रयवेद्येऽक्षरे | 'ऋचः' इत्यादि । वेदत्रयवेद्य परमे व्योमन्व्योम्याकाशकल्पे | अक्षर परमाकाशमें—आकाशसदृश
अध्याय ४ ] · ·शाङ्करभाष्यार्थ १८३
अध्याय ४ ] · ·शाङ्करभाष्यार्थ १८३ यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः— | परब्रह्ममें, जिसमें समस्त देवगण आश्रितास्तिष्ठन्ति । यस्तं | अधिष्ठित हैं—उसके आश्रयसे स्थित हैं परमात्मानं न वेद किमृचा | उस परमात्माको जो नहीं जानता करिष्यति ? य इत्तद्विदुस्त इमे | वह वेदसे क्या कर लेगा ? और जो समासते—कृतार्थास्तिष्ठन्ति ॥८॥ | उसे जानते हैं वे तो ये सम्यक् प्रकारसे रहते हैं अर्थात् कृतार्थ हुए स्थित हैं ॥ ८ ॥ मायोपाधिक ईश्वर ही सबका स्रष्टा है इदानीं तस्यैवाक्षरस्य मायोपाधिकं जगत्स्रष्टृत्वं तन्निमित्तत्वं च भेदेन दर्शयति— | अब श्रुति उस अक्षर परमात्माका ही मायारूप उपाधिके कारण जगत्स्रष्टृत्वं और जगन्निमित्तत्वं अलग-अलग दिखलाती है— छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति । अस्मान्मायी सृजते विश्वमेत- त्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ६ ॥ वेद, यज्ञ, क्रतु, व्रत, भूत, भविष्य और वर्तमान तथा और भी जो कुछ वेद बतलाते हैं वह सब मायावी ईश्वर इस अक्षरसे ही उत्पन्न करता है, और उस ( प्रपञ्च ) में ही मायासे अन्य-सा होकर बँधा हुआ है ॥ ९ ॥ छन्दांसीति । छन्दांसि ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गिरसाख्या वेदाः । | ‘छन्दांसि’ इत्यादि । ऋग्, यजुः, साम और अथर्वसंज्ञक वेद छन्द हैं, देवयज्ञादयो यूपसंबन्धरहितवि- | जिनमें यूपका सम्बन्ध नहीं होता वे देवयज्ञादि विहित कर्म यज्ञ कहलाते १. जगत्का उपादानकारणत्व । २. जगत्का निमित्तकारणत्व ।
१८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ हितक्रियाश्च यज्ञाः । ज्योतिष्टोमा- | हैं, ज्योतिष्टोमादि याग क्रतु हैं, तथा दयः क्रतवः । व्रतानि चान्द्रायणा- | चान्द्रायणादि व्रत हैं । भूत--जो दीनि । भूतमतीतम् । भव्यं | बीत चुका है, भव्य—जो होनेवाला भविष्यत् । यदिति तयोर्मध्य- | है । 'यत्' यह पद उनके मध्यवर्ती वर्ति वर्तमानं सूचयति । चशब्दः | वर्तमानका सूचक है और 'च' शब्द समुच्चयार्थः । यज्ञादिसाध्ये | सबका समुच्चय करनेके लिये है । कर्मणि प्रपञ्चे भूतादौ च वेदा | तात्पर्य यह है कि यज्ञादिसाध्य कर्म एव मानमित्येतत् । यच्छब्दः | और भूतादि प्रपञ्चमें वेद ही प्रमाण सर्वत्र संबध्यते । अस्मात्प्रकृता- | हैं । मूलमें 'यत्' शब्दका सबके दक्षरब्रह्मणः पूर्वोक्तं सर्वमुत्पद्यत | साथ सम्बन्ध है । इसका सम्बन्ध इति संबन्धः । | इस प्रकार है कि जो कुछ पहले अविकारिब्रह्मणः कथं प्रपञ्चो- | कहा गया है सब इस प्रकृत अक्षर पादानत्वम्? इत्यत आह-मायीति। | ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता है । कूटस्थस्यापि स्वशक्तिवशात्सर्व- | अविकारी ब्रह्म किस प्रकार स्रष्टृत्वमुपपन्नमित्येतत् । विश्वं | प्रपञ्चका उपादान कारण हो सकता पूर्वोक्तप्रपञ्चं सृजत उत्पादयति। | है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती स्वमायया कल्पिते तस्मिन्भूता- | है—'मायी सृजते' इत्यादि। तात्पर्य दिप्रपञ्चे माययैवान्य इव संनि- | यह है कि कूटस्थ ब्रह्मका भी अपनी रुद्धः संबद्धोऽविद्यावशगो भूत्वा | शक्तिके द्वारा सबका रचयिता होना संसारसमुद्रे भ्रमतीत्यर्थः ॥ ९ ॥ | सम्भव ही है । वह विश्व अर्थात् | पूर्वोक्त प्रपञ्चको उत्पन्न करता है । | तथा अपनी मायासे कल्पित हुए उस | भूतादि प्रपञ्चमें वह मायासे ही अन्य- | सा होकर बँध गया है, अर्थात् | अविद्याके वशीभूत होकर संसार- | समुद्रमें भटकता रहता है ॥ ९ ॥
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
प्रकृति और परमेश्वरका स्वरूप तथा उनकी सर्वव्यापकता पूर्वोक्तायाः प्रकृतेर्मायात्वं पूर्वोक्त प्रकृति माया है और तदधिष्ठातृसच्चिदानन्दरूपब्रह्मण- उसका अधिष्ठाता सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म उस ( मायारूप ) उपाधिके स्तदुपाधिवशान्मायित्वं च चिद्रू- कारण मायावी है तथा उस चिद्रूप पस्य मायावशात्कल्पितावयव- ब्रह्मके मायाके कारण कल्पित हुए भूतैः कार्यकारणसंघातैः सर्वं अवयवरूप कार्य-कारणसंघातसे यह दिखायी देता हुआ भूर्लोकादि सम्पूर्ण भूरादीदं परिदृश्यमानं जगद्व्याप्तं जगत् व्याप्त है—इस आशयसे श्रुति चेत्याह— कहती है— मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१०॥ प्रकृतिको तो माया जानना चाहिये और महेश्वरको मायावी । उसीके अवयवभूत [ कार्य-कारणसंघात ] से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है ॥ १० ॥ मायां त्विति । जगत्प्रकृति- ‘मायां तु’ इत्यादि । पीछे जिसका जगत्की प्रकृति ( कारण ) त्वेनाधस्तात्सर्वत्र प्रतिपादिता रूपसे सर्वत्र प्रतिपादन किया गया प्रकृतिर्मायैवेति विद्याद्विजानी- है—वह प्रकृति माया ही है— ऐसा जाने । यहाँ ‘तु’ शब्द यात् । तुशब्दोऽवधारणार्थः । निश्चयार्थक है। जो महान् और ईश्वर महांश्चासावीश्वरश्चेति महेश्वरस्तं होनेके कारण महेश्वर है उसे मायावी —मायाको सत्ता-स्फूर्ति आदि मायिनं मायायाः सत्तास्फूर्त्यादि- देनेवाला तथा अधिष्ठानरूपसे उसे प्रेरित करनेवाला जानना चाहिये— प्रदं तथाधिष्ठानत्वेन प्रेरयितारमेव इस प्रकार इसका पूर्वोक्त ‘विद्यात्’ विद्यादिति पूर्वेण संबन्धः । तस्य क्रियासे सम्बन्ध है । उस प्रकृत
१८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ❦ ══════════════════════════════ ❦ प्रकृतस्य परमेश्वरस्य रज्ज्वाद्यधि- | परमेश्वरके, रज्जु आदि अधिष्ठानोंमें ष्ठानेषु कल्पितसर्पादिस्थानीयैः | कल्पित सर्पादिरूप मायिक अवयवोंसे मायिकैः स्वावयवैरध्यासद्वारेदं | अध्यासद्वारा यह भूर्लोकादि सम्पूर्ण भूरादि सर्वं व्याप्तमेव पूर्णमित्ये- | जगत् व्याप्त यानी पूर्ण है । यहाँ भी तत् । तुशब्दस्त्ववधारणार्थः॥१०॥ | 'तु' शब्द निश्चयार्थक ही है॥१०॥ ───────────ꕥꕥ─────────── कारण-ब्रह्मके साक्षात्कारसे परम शान्तिकी प्राप्ति मायातत्कार्यादियोनेः कूट- | माया और उसके कार्यादिका | मूलभूत कूटस्थ ब्रह्म अपने स्वतन्त्र- स्थस्य स्ववशतोऽधिष्ठातृत्वं विय- | रूपसे सबका अधिष्ठाता है तथा दादिकार्याणामुत्पत्तिहेतुत्वं तेनैव | आकाशादि कार्योंकी उत्पत्तिका हेतु | है और उस शुद्धस्वरूपसे ही उसके सर्वाधिष्ठातृत्वोपलक्षितसच्चिदान- | सर्वाधिष्ठातृत्वसे उपलक्षित होनेवाले | सच्चिदानन्दस्वरूपसे 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा न्दवपुषा ब्रह्मास्मीत्येकत्वज्ञाना- | एकत्व-ज्ञान होनेसे मुक्ति होती है; न्मुक्तिं च दर्शयति— | यह बात श्रुति दिखलाती है— यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥११॥ जो अकेला ही प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता है, जिसमें यह सब सम्यक् प्रकारसे लीन होता है और फिर विविधरूप हो जाता है उस सर्व- नियन्ता, वरदायक, स्तवनीय देवका साक्षात्कार करके साधक इस परम शान्तिको प्राप्त होता है ॥११॥
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
[संस्कृत-शारीरकभाष्यम्]
यो योनिमिति । यो माया- विनिर्मुक्तआनन्दैकघनः परमेश्वरो योनिं योनिमिति वीप्सया मूल- प्रकृतिर्मायावान्तरप्रकृतयो विय- दादयश्च सूचितास्ताः प्रकृतीः सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेनाधिष्ठाय तिष्ठ- त्यन्तर्यामिरूपेण । “य आकाशे तिष्ठन्” ( बृ० उ० ३ । ७ । १२ ) इत्यादि श्रुतेः । एको- ऽद्वितीयः । यस्मिन्मायाद्यधिष्ठात- रीश्वर इदं सर्वं जगदुपसंहारकाले समेति संगच्छते लयं प्राप्नोति । पुनः सृष्टिकाले विविधमेत्या- काशादिरूपेण नाना भवति । तं प्रकृतमधिष्ठातारमीशानं नियन्तारं वरदं मोक्षप्रदं देवं द्योतनात्मक- मीड्यं वेदादिभिः स्तुत्यं निचाय्य निश्चयेन ब्रह्माहमस्मीत्यपरोक्षी- कृत्य सुषुप्त्यादौ प्रत्यक्षीकृता या सर्वोपरमलक्षणा सर्वजनीना शान्तिः सेदमा दर्शिता तां प्रसिद्धामिमां शान्तिं सर्वदुःख- विनिर्मुक्तसुखैकतानस्वरूपां मुक्ति-
[हिन्दी-भाष्यार्थ]
‘यो योनिम्’ इत्यादि । जो मायातीत विशुद्धानन्दघन परमेश्वर योनि-योनिको—‘योनिं योनिम्’ इस द्विरुक्तिसे मूलप्रकृतिरूपा माया और अवान्तर प्रकृतिरूप आकाशादि—ये दोनों प्रकृतियाँ ( योनियाँ ) सूचित होती हैं उन दोनों प्रकारकी प्रकृतियोंको सत्ता-स्फूर्तिप्रदरूपसे अधिष्ठित करके अन्तर्यामीरूपसे स्थित है जैसा कि “जो आकाशमें स्थित है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है । जो एक—अद्वितीय है । जिस मायादिके अधिष्ठाता ईश्वरमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रलयकालमें संगत— लयको प्राप्त होता है और फिर सृष्टि- कालमें विविधताको प्राप्त होता अर्थात् आकाशादिरूपसे नानाकार हो जाता है उस प्रस्तुत अधिष्ठाता, ईशान— नियन्ता, वरद—मोक्षप्रद, देव— प्रकाशस्वरूप और ईड्य—वेदादि- द्वारा स्तुत्यको अनुभव कर ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार निश्चयरूपसे प्रत्यक्ष कर सुषुप्ति आदिमें अनुभव की हुई जो सर्वोपरतिरूपा सर्वजनहितकारिणी शान्ति है वह यहाँ ‘इदम्’ शब्दसे— ‘इमाम्’ इस संकेतसे दिखायी गयी है, उस इस प्रसिद्ध शान्तिको अर्थात् सर्व- दुःखशून्यसुखैकतानतारूपा मुक्तिको
१८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
मिति यावत् । गुरूपदिष्ट- | प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि तत्त्वमादिवाक्यजन्यसुतत्त्वज्ञानेना- | गुरुके उपदेश किये हुए 'तत्त्वमसि' आदि वाक्योंसे उत्पन्न होनेवाले विद्यातत्कार्यादिविश्वमायान्निवृत्त्या- | सम्यक्तत्त्वज्ञानसे अविद्या और उसके कार्यादिरूप सम्पूर्ण मायाके निवृत्त हो त्यन्तं पुनरावृत्तिरहितं यथा | जानेसे वह आत्यन्तिकी-जिससे कि वह पुनरावृत्तिशून्य हो जाता है ऐसी भवति तथैत्येकरसो भवती- | मुक्तिको प्राप्त हो जाता है; अर्थात् एकरस ( ब्रह्मस्वरूप ) हो जाता त्येतत् ॥११॥ | है ॥ ११ ॥
अखण्डज्ञानकी सिद्धिके लिये परमात्माकी प्रार्थना सूत्रात्मानं प्रत्यविरतमभि- | अब अखण्ड तत्त्वज्ञानकी सिद्धिके मुखतया वीक्षन्तं परमेश्वरं प्रत्य- | लिये श्रुति सूत्रात्माके प्रति निरन्तर खण्डिततत्त्वज्ञानसिद्धये प्रार्थना- | अभिमुख रहकर दृष्टिपात करनेवाले माह- | परमात्माकी प्रार्थना करती है-- यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥१२॥ जो रुद्र देवताओंकी उत्पत्ति और ऐश्वर्यप्राप्तिका हेतु, जगत्का स्वामी और सर्वज्ञ है तथा जिसने सबसे पहले हिरण्यगर्भको अपनेसे उत्पन्न देखा था वह हमें शुद्ध बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १२ ॥ यो देवानामिति । पूर्वमेवास्य | 'यो देवानाम्' इत्यादि । इसका अर्थ पहले (अध्याय ३ मन्त्र ४ में) प्रतिपादितोऽर्थः ॥१२॥ | ही कह दिया गया है ॥ १२ ॥
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८९
ब्रह्मप्रमुखाणां देवानां स्वामि- | अब, ब्रह्मादि देवताओंके स्वामित्व, तामाकाशादिलोकाश्रयत्वं प्रमा- | आकाशादि लोकोंके आश्रयत्व, त्रादीनां नियन्तृत्वं बुद्धिशुद्धि- | प्रमातादिके नियन्तृत्व और बुद्धिकी द्वारा सम्यग्ज्ञानसिद्धयर्थं मुमु- | शुद्धिके द्वारा सम्यग्ज्ञानकी सिद्धिके क्षुभिः प्रार्थ्यमानत्वं च परमेश्वर- | लिये मुमुक्षुओं द्वारा प्रार्थनीयत्व आदि स्याह— | परमात्माके गुणोंका वर्णन करती है— यो देवानामधियो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१३॥ जो देवताओंका स्वामी है, जिसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं और जो इस द्विपद एवं चतुष्पद प्राणिवर्गका शासन करता है उस आनन्दस्वरूप देवकी हम हविके द्वारा परिचर्या (पूजा) करें ॥१३॥ यो देवानामधिय इति । यः | ‘यो देवानामधियः' इत्यादि । प्रकृतः परमेश्वरो देवानां ब्रह्मा- | जिसका यहाँ प्रसंग है ऐसा जो दीनामधिपः स्वामी यस्मिन् | परमेश्वर ब्रह्मादि देवताओंका अधि- परमेश्वरे सर्वकारणे भूरादयो | पति—स्वामी है, सबके कारणभूत लोका अधिश्रिता अध्युपरि श्रिता | जिस परमेश्वरमें भूर्लोकादि सम्पूर्ण अध्यस्ता इति यावत् । यः प्रकृतः | लोक अधिश्रित—अधि—ऊपर श्रित परमेश्वरोऽस्य द्विपदो मनुष्यादे- | अर्थात् अध्यस्त है तथा जो प्रकृत श्चतुष्पदः पश्वादेश्चेश ईष्टे । तका- | परमेश्वर इस मनुष्यादि द्विपद् ( दो रलोपश्चान्दसः । कस्मै काया- | पैरवाले ) और पशु आदि चतुष्पाद् नन्दरूपाय । स्मैभावोऽपि च्छा- | जीवसमुदायका शासन करता है । न्दसः । देवाय द्योतनात्मने | ‘ईशे’ इस क्रियापदमें तकारका लोप | वैदिक है। * उस क—आनन्दरूप— | मूलमें [ ‘क’ शब्दकी चतुर्थकि एक | वचनको] ‘स्मै’ आदेश वैदिक† है— | देव यानी द्योतनात्मक (प्रकाशस्वरूप)
- वास्तवमें यह पद ईश्+ते=ईष्टे है । † क्योंकि सर्वनाम शब्दोंसे परे ‘ङे’ विभक्तिको ही ‘स्मै' आदेश होता है ।
१९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ तस्मै हविषा चरुपुरोडाशादि- | को हवि--चरु-पुरोडाशादि द्रव्यसे द्रव्येण विधेम परिचरेम । विधेः | विधेम-पूजें । परिचर्या (पूजा) ही | जिसका कर्म है ऐसे 'विध' धातुका परिचरणकर्मण एतद्रूपम् ॥१३॥ | यह रूप है* ॥१३॥ परमात्मज्ञानसे शान्ति-प्राप्ति एवं बन्धननाशका पुनः उपदेश परस्यातिसूक्ष्मत्वं जगच्चक्रे | यद्यपि परमात्माके अत्यन्त सूक्ष्मत्व, साक्षित्वेनावस्थितत्वं निखिल- | जगच्चक्रमें साक्षीरूपसे स्थित होने, जगत्स्रष्टृत्वं सर्वात्मकत्वं तत्ता- | सम्पूर्ण जगत्को रचने, सर्वरूप होने दात्म्याज्ञानां मुक्तिश्चेत्येत- | एवं उसके तादात्म्य-ज्ञानसे जीवोंकी द्बहुशोऽधस्तात्प्रतिपादितं यद्यपि | मुक्ति होनेका ऊपर अनेक प्रकारसे तथापि बुद्धिसौकर्यार्थं पुनरप्याह- | प्रतिपादन किया जा चुका है, तथापि | यह सब समझनेमें सुगमता हो जाय | -इसलिये श्रुति फिर भी कहती है- सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥१४॥ सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्गम स्थानमें स्थित,† जगत्के रचयिता, अनेकरूप और संसारको एकमात्र भोग प्रदान करनेवाले शिवको जानकर जीव परम शान्ति प्राप्त करता है ॥१४॥
- यद्यपि 'विध विधाने' (तुदा० पर० सेट् ) धातुसे विधि लिङ्के उत्तम पुरुषके बहुवचनमें 'विधेम' रूप बनता है। तथापि विधानका तात्पर्य परिचर्या (पूजा) में ही है—ऐसा मान लेनेसे अर्थ ठीक हो जाता है। अथवा 'धातु' के अनेक अर्थ होते हैं इस न्यायसे भी परिचर्या अर्थ ठीक ही है। † 'कलिल' शब्दके अर्थमें टीकाकारोंका मतभेद है। प्रस्तुत अर्थ शाङ्कर- भाष्यके अनुसार है। विज्ञानभगवान्ने भी यही अर्थ किया है। नारायणतीर्थ 'कलिलस्य मध्ये' का अर्थ 'तमसो मध्ये'—'अज्ञानके मध्यमें' करते हैं तथा शङ्करा- नन्दजी इस शब्दकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं— 'नारीवीर्येण संगतं पौरुषं
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१
[संस्कृत-भाष्यम्] सूक्ष्मेति । पृथिव्याद्यव्याकृ- तान्तमुत्तरोत्तरं सूक्ष्मसूक्ष्मतरमपे- क्ष्येश्वरस्य तदपेक्षया सूक्ष्मतमत्व- माह—सूक्ष्मातिसूक्ष्ममिति । कलिलस्याविद्यातत्कार्यात्मकदुर्ग- स्य गहनस्य मध्ये । शेषं व्या- ख्यातम् ॥१४॥
[भाषार्थ] 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इत्यादि । 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इस पदसे श्रुति पृथिवीसे लेकर अव्याकृतपर्यन्त जो उत्तरोत्तर सूक्ष्म और सूक्ष्मतर हैं उनकी अपेक्षा भी ईश्वरकी सूक्ष्मतमता बतलाती है । कलिलके मध्यमें अर्थात् अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्ग-- गहन [ स्थान ] के मध्यमें । शेष अंशकी पहले व्याख्या हो चुकी है ॥१४॥
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[अवतरणिका] [संस्कृत] परस्य साक्षिरूपेणावस्थितत्वं सनकादिभिर्ब्रह्मादिदेवैश्चाधिकारिपुरुषैरप्यात्मतया प्राप्यत्वं साधनचतुष्टयादियुतास्मदादीनां मोक्षसिद्धिं चाह— [हिन्दी] अब परमात्माके साक्षिरूपसे स्थित होने, सनकादि और ब्रह्मादि देवताओं एवं अधिकारी पुरुषोंद्वारा आत्मस्वरूपसे प्राप्तव्य होने तथा साधनचतुष्टयादिसे सम्पन्न होनेपर हम लोगोंको भी मोक्ष प्राप्त होनेका प्रतिपादन किया जाता है--
[मूल मन्त्र] स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥१५॥
[मन्त्रार्थ] वही अतीत कल्पोंमें विश्वका रक्षक था, वही विश्वका स्वामी और सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित है । [ ऐसे ] जिस परमात्मामें ब्रह्मर्षि और देवगण
[पाद-टिप्पणी] वीर्यमल्पकालस्थं कलिलमित्युच्यते । 'अथवा जगदारम्भकाणामपां बुद्बुदस्य पूर्वा- वस्था कलिलमित्युच्यते । फेनिलान्युदकानीत्यर्थः' अर्थात् स्त्रीके रजसे मिला हुआ पुरुषका वीर्य कुछ काल स्थित रहनेपर 'कलिल' कहा जाता है । अथवा जगत्की रचना करनेवाले जलके बुलबुलेकी पूर्वावस्था 'कलिल' कही जाती है अर्थात् फेनयुक्त जल ।