श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ "न कर्मणा न प्रजया धनेन | नहीं, किन्हीं-किन्हींने त्यागसे ही त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः" (कैव० | अमरत्व प्राप्त किया है", "जिनपर ३)। "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञ- | ज्ञानकी अपेक्षा निकृष्ट श्रेणीका कर्म रूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। | अवलम्बित कहा गया है वे [सोलह एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा | ऋत्विक्, यजमान और यजमानपत्नी-] जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति" | ये यज्ञके अठारह रूप अस्थिर एवं (मु० उ० १ । २ । ७)। "ना- | नाशवान् हैं; जो मूढ 'यही श्रेय है' स्तकृतः कृतेन” (मु० उ० १ । | ऐसा मानकर प्रसन्न होते हैं वे फिर भी २ । १२)। | जरा-मरणको प्राप्त होते हैं।" "इस "कर्मणा बध्यते जन्तु- | संसारमें कोई नित्य पदार्थ नहीं है, र्विद्यया च विमुच्यते। | अतः [अनित्य फलके साधक] तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति | कर्मसे हमें क्या प्रयोजन है?" यतयः पारदर्शिनः ॥" | [अब स्मृतिका विरोध दिखलाते “अज्ञानमलपूर्णत्वात् | हैं-] "जीव कर्मसे बँधता है और पुराणो मलिनः स्मृतः । | ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; इसीसे तत्क्षयाद्वै भवेन्मुक्ति- | पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते", र्नान्यथा कर्मकोटिभिः ॥" | "अज्ञानरूपी मलसे पूर्ण होनेके “प्रजया कर्मणा मुक्ति- | कारण यह पुरातन जीव मलिन र्धनेन च सतां न हि। | माना जाता है, उस मलका क्षय त्यागेनैकेन मुक्तिः स्या- | होनेसे ही इसकी मुक्ति होती है, त्तदभावे भ्रमन्त्यहो ॥" | अन्यथा करोड़ों कर्मोंसे भी इसका “कर्मोदये कर्मफलानुरागा- | छुटकारा नहीं हो सकता", स्तथानुयन्ति न तरन्ति मृत्युम् ।" | "सत्पुरुषोंकी मुक्ति प्रजा, कर्म अथवा धनसे नहीं होती, एकमात्र त्यागसे ही होती है; त्याग न होनेपर तो वे भटकते ही रहते हैं", "कर्मका उदय होनेपर उसके फलमें अनुराग होता है, अतः उसीका अनुगमन करते हैं, मृत्युको पार नहीं कर पाते,"
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११ “ज्ञानेन विद्वांस्तेज अभ्येति नित्यं | “ज्ञानके द्वारा विद्वान् नित्य न विद्यत ह्यन्यथा तस्य पन्थाः॥” | प्रकाशको प्राप्त होता है, इसके “एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना | सिवा उसका कोई और मार्ग नहीं गतागतं कामकामा लभन्ते।” | है।” “इस प्रकार केवल त्रयीधर्म (गीता ९।२१) | (वैदिक कर्म) में लगे रहनेवाले “श्रमार्थमाश्रमाश्चापि | सकाम पुरुष आवागमनको प्राप्त होते वर्णानां परमार्थतः॥” | हैं”, “वस्तुतः तो ब्राह्मणादि वर्णोंके “आश्रमैर्न च वेदैश्च | ब्रह्मचर्यादि आश्रम भी केवल श्रमके यज्ञैः सांख्यैर्व्रतैस्तथा। | ही लिये हैं”, “आश्रमोंसे, वेदोंसे, उग्रैस्तपोभिर्विविधै- | यज्ञोंसे, सांख्यसे, व्रतोंसे, नाना र्दानैर्नानाविधैरपि। | प्रकारकी भीषण तपस्याओंसे और न लभन्ते तमात्मानं | अनेकों प्रकारके दानोंसे लोग उस लभन्ते ज्ञानिनः स्वयम् ॥” | आत्माको प्राप्त नहीं कर सकते; “त्रयीधर्ममधर्मार्थं | किन्तु ज्ञानी उसे स्वतः प्राप्त कर किंपाकफलसंनिभम् । | लेते हैं”, “त्रयीधर्म अधर्मका ही नास्ति तात सुखं किञ्चि- | हेतु होता है, यह किंपाक (सेमर) दत्र दुःखशताकुले ॥ | फलके समान है। हे तात ! सैकड़ों तस्मान्मोक्षाय यतता | दुःखोंसे पूर्ण इस कर्मकाण्डमें कुछ कथं सेव्या मया त्रयी ।” | भी सुख नहीं है, अतः मोक्षके “अज्ञानपाशबद्धत्वा- | लिये प्रयत्न करनेवाला मैं त्रयीधर्मका दमुक्तः पुरुषः स्मृतः ॥ | किस प्रकार सेवन कर सकता हूँ”, ज्ञानात्तस्य निवृत्तिः स्या- | “अज्ञानरूपी बन्धनसे बँधा होनेके | कारण जीव अमुक्त माना गया है; | उस बन्धनकी निवृत्ति ज्ञानसे हो | सकती है, जिस प्रकार कि प्रकाशसे १. यह फल देखनेमें बहुत सुन्दर होता है, परन्तु इसमें कोई सार नहीं होता ।
१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ त्प्रकाशात्तमसो यथा । | अन्धकारकी । अतः अज्ञानका तस्माज्ज्ञानेन मुक्तिः स्या- | पूर्णतया क्षय होनेपर ज्ञानसे ही दज्ञानस्य परिक्षयात् ॥” | मुक्ति होती है,” “व्रत, दान, तप, “व्रतानि दानानि तपांसि यज्ञाः | यज्ञ, सत्य, तीर्थ, आश्रम और सत्यं च तीर्थाश्रमकर्मयोगाः। | कर्मयोग—ये सब स्वर्गके ही हेतु हैं, स्वर्गार्थमेवाशुभमश्रुवं च | अतः अशुभ ( अकल्याणकर ) ज्ञानं ध्रुवं शान्तिकरं महार्थम् ॥” | और अनित्य हैं । किन्तु ज्ञान नित्य, “यज्ञैर्देवत्वमाप्नोति | शान्तिकारक और परमार्थस्वरूप है”, तपोभिर्ब्रह्मणः पदम् । | “मनुष्य यज्ञोंके द्वारा देवत्व प्राप्त दानेन विविधान्भोगा- | करता है, तपस्यासे ब्रह्मलोक पाता ज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥” | है, दानसे तरह-तरहके भोग प्राप्त “धर्मरज्ज्वा व्रजेदूर्ध्वं | करता है और ज्ञानसे मोक्षपद पाता पापरज्ज्वा व्रजेदधः। | है”, “धर्मकी रस्सीसे पुरुष ऊपरकी द्वयं ज्ञानासिना छित्त्वा | ओर जाता है और पापरज्जुसे अधो- विदेहः शान्तिमृच्छति ॥” | गतिको प्राप्त होता है, परन्तु जो इन “त्यज धर्ममधर्मं च | दोनोंको ज्ञानरूप खड्गसे काट देता उभे सत्यानृते त्यज। | है वह देहाभिमानसे रहित होकर उभे सत्यानृते त्यक्त्वा | शान्ति प्राप्त करता है”, “धर्म-अधर्म येन त्यजसि तच्च्यज ॥” | दोनोंका त्याग करो तथा सत्-असत् | दोनोंहीसे मुख मोड़ लो, इस प्रकार | सत्-असत् दोनोंकी आस्था छोड़कर | जिस ( त्यागाभिमान ) के द्वारा उनका | त्याग करते हो उसे भी त्याग दो ।” एवं श्रुतिस्मृतिविरोधान्न कर्म- | इस प्रकार श्रुति और स्मृतियोंसे | विरोध होनेके कारण तथा युक्तिसे साधनममृतत्वं न्यायविरोधाच्च । | भी विरुद्ध होनेसे अमृतत्व कर्मसाध्य | नहीं है । यदि उसे कर्मसाध्य माना कर्मसाधनत्वे मोक्षस्य चतुर्विध- | जायगा तो मोक्ष भी चार प्रकारकी
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ क्रियान्तर्भावादनित्यत्वं स्यात् । | क्रियाओंके अन्तर्गत होनेसे अनित्य | हो जायगा; क्योंकि 'जो क्रियासाध्य यत्कृतकं तदनित्यमिति कर्म- | होता है वह अनित्य होता है' इस | नियमके अनुसार क्रियासाध्य वस्तुकी साध्यस्य नित्यत्वादर्शनात् । | नित्यता नहीं देखी जाती । किन्तु | मोक्षको तो सभी सिद्धान्तवालोंने नित्यश्च मोक्षः सर्ववादिभिरभ्युप- | नित्य माना है । चातुर्मास्ययागके गम्यते । तथा च श्रुतिश्चातुर्मा- | प्रकरणमें ऐसी श्रुति भी है कि "हे | मर्त्य ! तू पुनः पुत्ररूपसे उत्पन्न स्यप्रकरणे—प्रजामनु प्रजायसे | होता है, यही तेरा अमरत्व है ।" तदु ते मर्त्यामृतमिति । किंच, | तथा "सुकृतम्" ( अक्षय्यं ह वै | चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति ) इस सुकृतमिति सुकृतस्याक्षयत्व- | श्रुतिमें सुकृतका अक्षयत्व बतलाया | गया है और 'सुकृत' शब्द कर्मके मुच्यते । सुकृतशब्दश्च कर्मणि । | अर्थमें प्रयुक्त होता है । नन्वेवं तर्हि कर्मणां देवादि- | शंका—तब इस प्रकार तो | देवत्वादिकी प्राप्तिके हेतु होनेसे कर्म प्राप्तिहेतुत्वेन बन्धहेतुत्वमेव । | बन्धनके ही कारण सिद्ध होते हैं ? सत्यम्, स्वतो बन्धहेतुत्व- | समाधान—सचमुच, स्वयं तो वे | बन्धनके ही कारण हैं । ऐसा ही मेव । तथा च श्रुतिः—"कर्मणा | श्रुति भी कहती है—"कर्मसे
१. उत्पाद्य, विकार्य, संस्कार्य और प्राप्य-ये चार प्रकारके क्रियाफल हैं । जब कोई अविद्यमान वस्तु क्रियाद्वारा उत्पन्न की जाती है तो उसे उत्पाद्य कहते हैं, जैसे घट, पट आदि । एक वस्तुको दूसरे रूपमें परिणत करनेपर जो फल प्राप्त होता है उसे विकार्य कहते हैं जैसे हारको गलाकर उसका कङ्कण बना दिया जाय । दोषको हटाना और गुणको प्रकट कर देना संस्कार्य है जैसे किसी दर्पणको घिसकर उसका मैल हटा दिया जाय और उसमें चमक पैदा कर दी जाय । किसी अप्राप्य वस्तुको क्रियाद्वारा प्राप्त करना यह प्राप्य क्रियाफल है; जैसे गमनक्रियाके द्वारा किसी ग्रामविशेषमें पहुँचना ।
१४ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १
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वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत):
पितृलोकः” (बृ० उ० १ । ५ । १६) । “सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति” (छा० उ० २ । २३ । १) । “इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति” (मु० उ० १ । २ । १०) । “एवं कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्पारदर्शिनः ।” “विद्यामयोऽयं पुरुषो न तु कर्ममयः स्मृतः ॥” “एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते” (गीता ९ । २१) इति । यदा पुनः फलनिरपेक्षमीश्व- रार्थं कर्मानुतिष्ठन्ति तदा मोक्ष- साधनज्ञानसाधनान्तःकरणशुद्धि- साधनपारम्पर्येण मोक्षसाधनं भवति । तथाह भगवान्— “ब्रह्मण्याधाय कर्माणि
दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद):
पितृलोक प्राप्त होता है”, “ये सब पुण्यलोकोंके ही भागी होते हैं”, “इष्ट और पूर्तकर्मोंको ही सर्वश्रेष्ठ समझनेवाले मूढ़ पुरुष किसी अन्य श्रेयःसाधनको नहीं जानते; वे लोग स्वर्गलोकके उच्च स्थानमें अपने पुण्य- कर्मके उपभोगके लिये प्राप्त दिव्य देहमें पुण्यफल भोगकर इस मनुष्य- लोकमें या इससे भी निकृष्ट लोक (पशु-पक्षी आदि योनि अथवा नरक) में प्रवेश करते हैं”, “इस प्रकार जो कोई कर्मोंमें अनासक्त होते हैं वे ही पारदर्शी होते हैं”, “यह पुरुष ज्ञानस्वरूप है, यह कर्मप्रधान नहीं माना जाता”, “इस प्रकार त्रयीधर्म (केवल वैदिक कर्म) में तत्पर रहनेवाले सकाम पुरुष आवागमनको प्राप्त होते रहते हैं” इत्यादि । किन्तु जब कोई पुरुष फलकी इच्छा न रखकर केवल भगवान्के लिये ही कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं तो वे मोक्षके साधन ज्ञानकी साधन- भूता अन्तःकरण-शुद्धिके साधन होकर परम्परासे मोक्षके साधन होते हैं। ऐसा ही भगवान्ने कहा है— “जो पुरुष [ कर्मफलकी ] आसक्ति छोड़कर भगवान्के समर्पण-
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ ൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠ सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। | पूर्वक कर्म करता है वह जलसे लिप्यते न स पापेन | कमलके पत्तेके समान [ उस कर्मके पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ | शुभाशुभ फलरूप ] पापसे लिप्त कायेन मनसा बुद्ध्या | नहीं होता", "योगीलोग फलविषयक केवलैरिन्द्रियैरपि । | आसक्ति छोड़कर केवल शरीर, मन, योगिनः कर्म कुर्वन्ति | बुद्धि और इन्द्रियोंसे अन्तःकरणकी सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥" | शुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं", "हे ( गीता ५।१०-११ ) | कुन्तीनन्दन ! तुम जो कुछ भी कर्म करते "यत्करोषि यदश्नासि | हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ [ श्रौत यज्जुहोषि ददासि यत् । | या स्मार्तयज्ञरूप ] हवन करते हो, जो यत्तपस्यसि कौन्तेय | कुछ तप करते हो और जो कुछ तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ | दान देते हो वह सब मुझे अर्पण शुभाशुभफलैरेवं | कर दो । ऐसा करनेसे तुम शुभाशुभ मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । | फलरूप कर्मके बन्धनसे छूट जाओगे संन्यासयोगयुक्तात्मा | और संन्यासयोगसे युक्त हो जीते-जी विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥" | ही कर्म-बन्धनसे मुक्त होकर देह- ( गीता ९।२७-२८ ) | पात होनेके बाद मुझे ही प्राप्त इति । | होगे", इत्यादि । तथा च मोक्षे क्रमं शुद्धयभावे | इसी प्रकार विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें मोक्षाभावं कर्मभिश्च तच्छुद्धिं | भी मोक्षमें क्रम, चित्तशुद्धिके अभावमें दर्शयति श्रीविष्णुधर्मे— | मोक्ष न होना और कर्मोंके द्वारा चित्तकी "अनूचानस्ततो यज्वा | शुद्धि होना—ये सब दिखाये गये कर्मन्यासी ततः परम् । | हैं—"योगी पहले वेदाध्यायी, फिर ततो ज्ञानित्वमभ्येति | यज्ञकर्ता, तत्पश्चात् कर्मसंन्यासी और योगी मुक्तिं क्रमाल्लभेत ॥" | फिर ज्ञानित्व प्राप्त करता है इस प्रकार | वह क्रमशः मुक्तिलाभ करता है",
१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ “अनेकजन्मंसंसार- “जबतक अनेकों जन्मके चिते पापसमुच्चये । सांसारिक संसर्गसे सञ्चित हुआ नाक्षीणे जायते पुंसां पापपुञ्ज क्षीण नहीं होता तबतक गोविन्दाभिमुखी मतिः॥” लोगोंकी बुद्धि भगवान्की ओर प्रवृत्त “जन्मान्तरसहस्रेषु नहीं होती ।” “हजारों जन्मोंके तपोज्ञानसमाधिभिः । पीछे तपस्या, ज्ञान और समाधिके नराणां क्षीणपापानां द्वारा जिनके पाप क्षीण हो गये हैं कृष्णे भक्तिः प्रजायते ॥” उन्हीं लोगोंकी भगवान् कृष्णमें भक्ति “पापकर्मशयो ह्यत्र होती है ।” “इस लोकमें पापकर्मोंका महामुक्तिविरोधकृत् । संस्कार ही आत्यन्तिकी मुक्तिका तस्यैव शमने यत्नः विरोधी है; अतः संसारसे डरनेवाले कार्यः संसारभीरुणा ॥” पुरुषको उसीके नाशका प्रयत्न “सुवर्णादिमहादान- करना चाहिये ।” “सुवर्णदानादि पुण्यतीर्थावगाहनैः । बड़े-बड़े दानोंसे, पवित्र तीर्थोंमें शारीरैश्च महाक्लेशैः स्नान करनेसे और शास्त्रानुकूल शास्त्रोक्तैस्तच्छमो भवेत् ॥” शारीरिक महान् कष्टोंके सहनसे “देवताश्रुतिसच्छास्त्र- उसका नाश हो सकता है ।” श्रवणैः पुण्यदर्शनैः । “देवाराधन, श्रुति और सच्छास्त्रोंके गुरुशुश्रूषणैश्चैव श्रवण, पवित्र तीर्थस्थानोंके दर्शन पापबन्धः प्रशाम्यति ॥” और गुरुकी सेवा करनेसे भी पापका याज्ञवल्क्योऽपि शुद्धयपेक्षां बन्धन निवृत्त हो जाता है ।” तत्साधनं च दर्शयति— याज्ञवल्क्यजी भी ज्ञानमें चित्त- “कर्त्तव्याशयशुद्धिस्तु शुद्धिकी अपेक्षा और उसके साधन भिक्षुकेण विशेषतः । प्रदर्शित करते हैं— “ज्ञानोत्पत्तिका ज्ञानोत्पत्तिनिमित्तत्वा- हेतु होनेसे भिक्षुको स्वतन्त्रता (मुक्ति) त्स्वतन्त्रीकरणाय च ॥ प्राप्त करनेके लिये विशेषरूपसे ( याज्ञ० यतिधर्म० ६२) चित्तकी शुद्धि ही करनी चाहिये । मलिनो हि यथादर्शो जिस प्रकार मलिन दर्पणमें अपना रूपालोकस्य न क्षमः । रूप नहीं देखा जा सकता उसी
अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ १७
अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ १७
तथाविपक्वकरण | प्रकार जिसका अन्तःकरण परिपक्व आत्मज्ञानस्य न क्षमः ॥” | (वासनारहित) नहीं है वह आत्म- (याज्ञ० यतिधर्म० १४१) | ज्ञान प्राप्त करनेकी योग्यता नहीं “आचार्योपासनं वेद- | रखता।” [अब चित्तशुद्धिके साधन शास्त्रार्थस्य विवेकिता । | बतलाते हैं-] “गुरुसेवा, वेद और सत्कर्मणामनुष्ठानं | शास्त्रके तात्पर्य का विवेचन, शुभकर्मों- सङ्गः सद्भिर्गिरः शुभाः ॥ | का आचरण, सत्पुरुषोंका संग, अच्छी स्त्र्यालोकालम्भविगमः | वाणी बोलना, स्त्रीमात्रके दर्शन और सर्वभूतात्मदर्शनम् । | स्पर्शका त्याग, समस्त प्राणियोंमें त्यागः परिग्रहाणां च | आत्मदृष्टि करना, परिग्रहका त्याग, जीर्णकाषायधारणम् ॥ | पुराने काषाय वस्त्र धारण करना, विषयेन्द्रियसंरोध- | विषयोंकी ओरसे इन्द्रियोंको रोकना, स्तन्द्रालस्यविवर्जनम्। | तन्द्रा और आलस्यको त्यागना, शरीरपरिसंख्यानं | देहतत्त्वका विचार, प्रवृत्तिमें दोष- प्रवृत्तिष्वघदर्शनम् ॥ | दर्शन, रजोगुण और तमोगुणके नीरजस्तमसा सत्त्व- | त्यागद्वारा सत्त्वगुणको बढ़ाना, किसी शुद्धिर्निःस्पृहता शमः । | प्रकारकी इच्छा न करना और एतैरुपायैः संशुद्ध- | मनोनिग्रह-इन उपायोंके द्वारा सत्त्वयोग्यमृती भवेत् ॥” | जिसका अन्तःकरण पवित्र हो गया (याज्ञ० यतिधर्म० १५६-१५९) | है वह योगी अमृतत्व (मोक्ष) को “यतो वेदाः पुराणानि | प्राप्त हो जाता है” “वेद, विद्योपनिषदस्तथा । | पुराण, ज्ञानमय उपनिषद्, श्लोक, श्लोकाः सूत्राणि भाष्याणि | सूत्र, भाष्य तथा और भी जहाँ-कहीं
१. भाष्यका लक्षण इस प्रकार बताया गया है— सूत्रस्थं पदमादाय पदैः सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥ जिसमें कि सूत्रके पदोंको लेकर तदनुकूल अन्य पद
१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ यच्चान्यद्वाङ्मयं क्वचित् ॥ वेदानुवचनं यज्ञो ब्रह्मचर्यं तपो दमः । श्रद्धोपवासः स्वातन्त्र्य- मात्मनो ज्ञानहेतवः ॥" (याज्ञ० यति० १८९-१९०) तथा चाथर्वणे विशुद्धद्यपेक्ष- मात्मज्ञानं दर्शयति- "जन्मान्तरसहस्रेषु यदा क्षीणास्तु किल्बिषाः ॥ तदा पश्यन्ति योगेन संसारोच्छेदनं महत् ॥” (योगशिख० १ । ७८-७९) “यस्मिन्विशुद्धे विरजे च चित्ते य आत्मवत्पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ।” "तमेतं वेदानु- वचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन" (बृ० उ० ४ । ४ । २२) इति बृहदारण्यके विविदिषाहेतुत्वं यज्ञादीनां दर्शयति । जो कुछ शास्त्र हैं वे सब एवं वेदपाठ, यज्ञानुष्ठान, ब्रह्मचर्य, तप, इन्द्रियदमन, श्रद्धा, उपवास और स्वतन्त्रता (दूसरे किसीकी आशा न रखना) ये सब आत्मज्ञानके साधन हैं।" इसी प्रकार अथर्ववेदीय उपनिषद्में भी 'आत्मज्ञान चित्तशुद्धिकी अपेक्षा रखनेवाला है' यह दिखलाते हैं- "जिस समय सहस्रों जन्मोंके अनन्तर पाप क्षीण हो जाते हैं उसी समय पुरुष योगके द्वारा संसारका उच्छेद करनेवाला [ज्ञानरूप] महान् साधन देख पाते हैं।" "जिस चित्तके शुद्ध और निर्मल हो जानेपर जिनके दोष क्षीण हो गये हैं वे यतिजन सम्पूर्ण भूतोंको आत्मस्वरूप ही देखते हैं।" बृहदारण्यकमें भी “उस इस आत्माको ब्राह्मणगण वेद- पाठ, यज्ञ, दान, तप और उपवासके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं” इस वाक्यद्वारा श्रुति यज्ञादिको जिज्ञासाका हेतु प्रदर्शित करती है । वाचक शब्द] और कुछ स्वाभिमत पद रहते हैं उसे भाष्यका लक्षण जाननेवाले 'भाष्य' मानते हैं ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
ननु "विद्यां चाविद्यां च | पूर्व०-किन्तु "जो विद्या (ज्ञान) कर्मणामप्य- यस्तद्वेदोभय सह" | और अविद्या (कर्म) इन दोनोंको मृतत्वहेतुत्वम् (ईशा० उ० ११)। | साथ-साथ जानता है", "तप और "तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेय- | ज्ञान ये ब्राह्मणके निःश्रेयसके उत्कृष्ट सकरं परम्।" इत्यादिना कर्मणाम- | साधन हैं" इत्यादि वाक्योंसे तो प्यमृतत्वप्राप्तिहेतुत्वमवगम्यते । | कर्मोंका भी अमृतत्वकी प्राप्तिमें हेतु होना जान पड़ता है ? सत्यम्, अवगम्यत एव तद- | सिद्धान्ती-ठीक है, जान तो तच्च तदपे-पेक्षितशुद्धिद्वारेण न | पड़ता ही है; परन्तु ज्ञानके लिये क्षितशुद्धिद्वारेण च साक्षात् । तथा | अपेक्षित चित्तशुद्धिके द्वारा ही कर्मका न साक्षात् हि-"विद्यां चाविद्यां | अमृतत्वमें हेतुत्व है, साक्षात् नहीं। च" (ईशा० उ० ११) । "तपो | इसीसे "विद्यां चाविद्यां च" तथा विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं | "तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्।" इत्यादिना ज्ञानकर्मणोर्निः- | परम्" इत्यादि वाक्योंसे ज्ञान और श्रेयसहेतुत्वमभिधाय कथमनयो- | कर्मका निःश्रेयसमें हेतुत्व बतलाकर स्तद्धेतुत्वमित्याकाङ्क्षायां "तपसा | ऐसी जिज्ञासा होनेपर कि ये किस कल्मषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते।" | प्रकार उसके हेतु हैं- "तपसा कल्मषं "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया- | हन्ति विद्ययामृतमश्नुते"* और मृतमश्नुते" (ईशा० उ० ११) | "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृत- इतिवाक्यशेषेण कर्मणः कल्मष- | मश्नुते"† इन वाक्यशेषोंसे कर्मका क्षयहेतुत्वं विद्याया अमृतप्राप्ति- | पापक्षयमें कारणत्व और ज्ञानका हेतुत्वं प्रदर्शितम् । यत्र तु | अमृतत्वप्राप्तिमें हेतुत्व प्रदर्शित किया शुद्ध्याद्यवान्तरकार्यानुपदेशस्त- | है । और भी जहाँ कहीं शुद्धि आदि त्रापि शाखान्तरोपसंहारन्यायेनो- | अन्य कर्मोंका उपदेश दिखायी न दे वहाँ भी शाखान्तरोपसंहारन्यायसे‡
- तपसे पाप नष्ट करता है और ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है । † कर्मसे [ संसाररूप ] मृत्युको पार करके ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है । ‡ जहाँ एक ही जातिके कर्म या उपासनाका वेदकी विभिन्न शाखाओंमें वर्णन
२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[Header] २० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
पसंहारः कर्त्तव्यः । | उसका उपसंहार (संग्रह) कर लेना चाहिये । ननु "कुर्वन्नेवेह कर्माणि | पूर्व०-किन्तु "कर्म करते हुए [विद्याया मोक्षसाधनत्व-माक्षिपति] जिजीविषेच्छतं | ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी समाः” (ईशा० उ० | इच्छा करे” ऐसा जीवनपर्यन्त २) इति यावज्जीवकर्मानुष्ठाननियमे | कर्मानुष्ठानका नियम रहते हुए ज्ञान सति कथं विद्याया मोक्षसाधनत्वम् ? | मोक्षका साधन कैसे माना जा सकता है ? उच्यते—कर्मण्यधिकृतस्यायं | सिद्धान्ती-बतलाते हैं, यह [आक्षेपं परिहरति] नियमो नानधिकृत- | नियम कर्माधिकारीके ही लिये है, जो कर्मके अधिकार और शास्त्राज्ञासे स्यानियोज्यस्य ब्रह्मवादिनः । तथा | बाहर है उस ब्रह्मवेत्ताके लिये नहीं च विदुषः कर्मानधिकारं दर्शयति | है ! इसी प्रकार श्रुति भी ब्रह्मवेत्ताको कर्मके अधिकारसे बाहर दिखाती है- श्रुतिः—"नैतद्विद्वानृषिणा विधेयो | "यह ब्रह्मवेत्ता ऋषियोंकी आज्ञाके न रुध्यते विधिना शब्दचारः ।” | अधीन नहीं है और न यह शास्त्रका "एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसो- | अनुयायी होकर उसकी आज्ञासे रुक ऽग्निहोत्रं न जुहवाञ्चक्रिरे ।” “एतं | ही सकता है," "इसीलिये पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते थे,” वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः | “इस आत्मतत्त्वको जान लेनेपर पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकै- | ब्राह्मणलोग पुत्रैषणा, वित्तैषणा और षणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं | लोकैषणाको छोड़कर भिक्षाचर्या
[Footnote] हो, किन्तु शास्त्रभेदसे उनके फल या अनुष्ठानकी शैलीमें भेद दिखायी दे वहाँ अन्य शाखामें आये हुए अधिक अंशको सम्मिलित करके न्यूनताकी पूर्ति कर लेनी चाहिये । इसे शाखान्तरोपसंहारन्याय कहते हैं। इसका विशद वर्णन ब्रह्मसूत्रभाष्यके तृतीय अध्यायके तृतीय पादमें देखना चाहिये ।
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
चरन्ति” (बृ० उ० ३।५।१) | करते थे,” “ब्रह्मवेत्ता कावषेय “एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहु- | ऋषियोंने भी यही कहा है—हम ऋषयः कावषेयाः किमर्था वय- | किस प्रयोजनके लिये अध्ययन करें मध्येण्यामहे किमर्था वयं यक्ष्यामहे | और किस उद्देश्यकी पूर्तिके लिये यज्ञ स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्ते- | करें ? वह किस प्रकार ब्रह्मनिष्ठ हो नेदृश एवेति।”यथाह भगवान्— | सकता है, जिस प्रकार भी हो ऐसा “यस्त्वात्मरतिरेव स्या- | (सर्वत्यागी) ही होगा।” जैसा दात्मतृप्तश्च मानवः । | कि श्रीभगवान् भी कहते हैं— आत्मन्येव च संतुष्ट- | “जो पुरुष आत्मामें ही प्रेम स्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ | करनेवाला, आत्मामें ही तृप्त नैव तस्य कृतेनार्थो | और आत्मामें ही सन्तुष्ट है, उसके नाकृतेनेह कश्चन । | लिये कुछ भी कर्त्तव्य नहीं है। उस न चास्य सर्वभूतेषु | पुरुषका इस लोकमें कर्म करनेसे कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥” | कोई प्रयोजन नहीं है और कर्म न (गीता ३। १७-१८) | करनेसे यहाँ उसे प्रत्यवाय आदि तथा चाह भगवान्परमेश्वरो | अनर्थकी भी प्राप्ति नहीं होती लैङ्गे कालकूटोपाख्याने— | तथा सम्पूर्ण भूतोंमें उसका कोई अर्थ- “ज्ञानेनैतेन विप्रस्य | व्यपाश्रय (अर्थसिद्धिका सहारा) त्यक्तसङ्गस्य देहिनः । | भी नहीं है।” कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा | लिङ्गपुराणमें कालकूटोपाख्यानमें अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च ॥ | ऐसा ही भगवान् महेश्वर भी कहते इह लोके परे चैव | हैं—“हे द्विजेन्द्रगण ! इस ज्ञानकें कर्तव्यं नास्ति तस्य वै । | द्वारा निःसंग हुए जीवको कोई जीवन्मुक्तो यतस्तु स्या- | कर्त्तव्य नहीं रहता, यदि रहता है द्ब्रह्मवित्परमार्थतः ॥ | तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है। उसे इस | लोक और परलोकमें भी कोई कर्त्तव्य | नहीं है, क्योंकि वास्तवमें ब्रह्मवेत्ता | तो जीते हुए ही मुक्त हो जाता है।
श्वेता० २—
२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं | परमार्थतत्त्वको जाननेवाला ज्ञाना- विरक्तो ह्यर्थवित्स्वयम् । | भ्यासमें तत्पर विरक्त पुरुष कर्तव्यकी कर्तव्यभावमुत्सृज्य | चिन्ता छोड़कर केवल ज्ञानहीको ज्ञानमेवाधिगच्छति ॥ | प्राप्त करता है। हे द्विजश्रेष्ठ ! जो वर्णाश्रमाभिमानी य- | वर्णाश्रमाभिमानी पुरुष ज्ञानदृष्टिको स्त्यक्त्वा ज्ञानं द्विजोत्तमाः। | त्यागकर मोहवश कहीं अन्यत्र सुख अन्यत्र रमते मूढः | मानता है वह अज्ञानी है, इसमें सोऽज्ञानी नात्र संशयः ॥ | सन्देह नहीं। क्रोध, भय, लोभ, क्रोधो भयं तथा लोभो | मोह, भेददृष्टि, मद, अज्ञान और मोहो भेदो मदस्तमः। | धर्माधर्म—ये सब ऐसे लोगोंको ही धर्माधर्मौ च तेषां हि | प्राप्त होते हैं और इनके अधीन तद्वशाच्च तनुग्रहः॥ | होनेपर देह धारण करना पड़ता शरीरे सति वै क्लेशः | है। तथा शरीरके रहते हुए क्लेश सोऽविद्यां संत्यजेत्ततः। | अवश्यम्भावी है। अतः जीवको अविद्यां विद्यया हित्वा | अविद्याका त्याग करना चाहिये। स्थितस्यैवेह योगिनः॥ | जो योगी विद्याद्वारा अविद्याका त्याग क्रोधाद्या नाशमायान्ति | करके स्थित है उसके क्रोधादि दोष धर्माधर्मौ च नश्यतः। | तथा धर्म और अधर्म इस लोकमें तत्क्षयाच्च शरीरेण | रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं। न पुनः संप्रयुज्यते ॥ | उनका क्षय होनेपर उसका फिर स एव मुक्तः संसारा- | शरीरसे संयोग नहीं होता, तथा दुःखत्रयविवर्जितः।।" | वही त्रिविध तापसे छूटकर संसारसे तथा शिवधर्मोत्तरे— | मुक्त हो जाता है।" "ज्ञानामृतेन तृप्तस्य | तथा शिवधर्मोत्तरमें कहा है— कृतकृत्यस्य योगिनः। | "जो योगी ज्ञानामृतसे तृप्त होकर नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्य- | कृतकृत्य हो गया है उसके लिये मस्ति चेन्न स तत्त्ववित् । | कोई कर्तव्य नहीं रहता, और यदि | रहता है तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३
लोकद्वयेऽपि कर्तव्यं | उसे दोनों लोकोंमें कोई कर्त्तव्य नहीं किञ्चिदस्य न विद्यते । | रहता वह सर्वथा पूर्ण और समदर्शी इहैव स विमुक्तः स्या- | होनेके कारण इस लोकमें ही मुक्त त्सम्पूर्णः समदर्शनः ॥” | हो जाता है ।” तस्माद्विदुषः कर्तव्याभावाद- | अतः विद्वान्के लिये कोई | कर्त्तव्य न होनेके कारण ‘कर्म विद्यावद्विषय एवायं कुर्वन्नेवे- | करता हुआ ही सौ वर्ष जीनेकी | इच्छा करे’ इत्यादि रूपसे कर्म त्यादिकर्मनियमः । कुर्वन्नेवेति | करनेका नियम केवल अज्ञानियोंके | ही लिये है । अथवा यह समझना च नायं कर्मनियमः किन्तु विद्या- | चाहिये कि ‘कुर्वन्नेव’ इत्यादि वाक्य | कर्मका नियामक नहीं है, माहात्म्यं दर्शयितुं यथाकामं | अपि तु ज्ञानकी महिमा दिखानेके | उद्देश्यसे [ज्ञानीके लिये] स्वेच्छानुसार कर्मानुष्ठानमेव द्रष्टव्यम् । एतदुक्तं | कर्मानुष्ठान प्रदर्शित करनेके लिये | ही है । इसके द्वारा यह बतलाया भवति-यावज्जीवं यथाकामं | गया है कि विद्वान् स्वेच्छासे जीवन- | पर्यन्त पुण्य-पापादिरूप कर्म करता पुण्यपापादिकं कुर्वत्यपि विदुषि | भी रहे तो भी ज्ञानके सामर्थ्यसे उसे | उन कर्मोंका लेप नहीं होगा । न कर्मलेपो भवति विद्यासामर्थ्या- | तात्पर्य यह है कि ‘ईशावास्यमिद | सर्वम्’ यहाँसे लेकर ‘तेन त्यक्तेन दिति । तथा हि-“ईशावास्य- | भुञ्जीथाः’ इस प्रथम मन्त्रसे सर्वकर्म- | परित्यागपूर्वक आत्मरक्षाका प्रतिपादन मिद सर्वम्” (ईशा० उ० १) | करनेपर वेद यह देखकर कि जिसके | लिये कोई भी विधि नहीं की जा इत्यारभ्य “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः” | सकती उस ब्रह्मवेत्ताके लिये | सर्वकर्मपरित्यागका विधान करना भी ( ईशा० उ० १) इति विदुषः | सर्वकर्मत्यागेनात्मपालनमुक्त्वा- | नियोज्ये ब्रह्मविदि त्यागकर्तव्य- |
२४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[Page Header] २४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[Left Column - संस्कृत पाठ] तोक्तिरप्ययुक्तैवोक्तेति मत्वा चकितः सन्वेदो विदुषस्त्याग- कर्तव्यतामपि नोक्तवान् । कुर्व- न्नेवेह लोके विद्यमानं पुण्य- पापादिकं कर्म यावज्जीवं जिजी- विषेत् । न पुण्यादिबन्धभयात्पु- ण्यादिकं त्यक्त्वा तूष्णीमवतिष्ठेत । एवं तावत्कर्माणि कुर्वत्यपि विदुषि त्वयीतो यावज्जीवानुष्ठाना- दन्यथाभावः स्वरूपात्प्रच्युतिः पुण्यादिनिमित्तसंसारान्वयो ना- स्ति । अथवेतः कर्मानुष्ठानोत्तर- कालभाव्यन्यथाभावः संसारान्वयो नास्ति । यस्मात्त्वयि विन्यस्तं न कर्म लिप्यते । तथा च श्रुत्य- न्तरम्—“न लिप्यते कर्मणा पापकेन” (बृ० उ० ४।४।२३)।
[Right Column - हिन्दी अनुवाद] अनुचित ही है, चकित हुआ; अतः यह दिखानेके लिये कि मैंने विद्वान्के लिये कर्मत्यागकी भी विधि नहीं की है, यह कहा है कि ज्ञानी इस लोकमें आजीवन यथाप्राप्त पुण्य- पापादि रूप कर्म करता हुआ जीनेकी इच्छा करे; उसे पुण्यादि फलके बन्धनके भयसे पुण्यादिको त्यागकर चुपचाप बैठनेकी आवश्य- कता नहीं है । * क्योंकि इस प्रकार यावज्जीवन कर्म करते रहनेपर भी तुझ ब्रह्मवेत्ताका अन्यथाभाव— स्वरूपच्युति अर्थात् पुण्यादिके कारण होनेवाला संसारका संसर्ग नहीं हो सकता । अथवा ‘इतः’ यानी कर्मानुष्ठानके पीछे होनेवाला अन्यथा- भाव—संसारका संसर्ग नहीं हो सकता । क्योंकि तुझ ब्रह्मवेत्तामें स्थापित कर्म लिप्त (संपृक्त) नहीं होता । ऐसी ही अन्य श्रुतियाँ भी हैं—'ज्ञानी पापकर्मोंसे लिप्त नहीं
[Footnote / पादटिप्पणी]
- ज्ञानीमें कर्तृत्वाभिमान नहीं होता और न उसकी भोगदृष्टि ही होती है। इसलिये किसी भी प्रकारकी वासना न रहनेके कारण वह न तो पुण्यफलकी प्राप्तिके लिये पुण्यकर्मोंमें ही प्रवृत्त होता है और न आसक्तिवश पापकर्म ही करता है। उसके प्रारब्धानुसार उससे जो कर्म होते हैं उनसे अन्य पुरुषोंका जो इष्ट या अनिष्ट होता है उसके कारण वे उनमें पुण्य या पापका आरोप कर लेते हैं। इसलिये उन्हींकी दृष्टिसे यहाँ ज्ञानीके कर्मोंको पुण्य-पाप विशेषणोंसे विशेषित किया है ! यदि अपने द्वारा होते हुए कर्मोंमें ज्ञानीकी पुण्य-पापदृष्टि रहेगी तो यह असम्भव है कि उसे उनका फल न भोगना पड़े । पुण्य-पापदृष्टि तो जीवकी होती है और ज्ञानीमें जीवत्वका अत्यन्ताभाव होता है ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५ “एवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते” | होता” “इस प्रकार जाननेवालेको ( छा० उ० ४ । १४ । ३ ) । | पापकर्मका संसर्ग नहीं होता”, “उसे “नैनं कृताकृते तपतः” ( बृ० | पुण्य-पाप सन्ताप नहीं दे सकते”, उ० ४ । ४ । २२) । “एवं | “इसी प्रकार इसके समस्त पाप नष्ट हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते” | हो जाते हैं ।” ( छा०उ०५ । २४ । ३ ) । | लैङ्गे— | लिङ्गपुराणमें कहा है— “इसी “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि | प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कर्मोंको भस्म भस्मसात्कुरुते तथा ॥ | कर देता है । इसमें सन्देह नहीं कि ज्ञानिनः सर्वकर्माणि | ज्ञानीके समस्त कर्म जीर्ण हो जाते जीर्यन्ते नात्र संशयः । | हैं, वह नाना प्रकारके पाप-पुण्योंसे क्रीडन्नपि न लिप्येत | क्रीडा करता हुआ भी उनसे लिप्त पापैर्नानाविधैरपि ॥” | नहीं होता ।” शिवधर्मोत्तरेऽपि— | शिवधर्मोत्तरमें भी कहा है— “तस्माज्ज्ञानासिना तूर्ण- | “अतः वह तुरन्त ही सकाम या मशेषं कर्मबन्धनम् । | निष्कामभावसे किये हुए सम्पूर्ण कामाकामकृतं छित्त्वा | कर्मबन्धनको ज्ञानरूप खड्गसे | काटकर शुद्ध हो अपने आत्मामें शुद्धश्चात्मनि तिष्ठति ॥ | स्थित हो जाता है । जिस प्रकार यथा वह्निर्महान्दीप्तः | अत्यन्त प्रज्वलित हुआ अग्नि सूखे शुष्कमाद्रं च निर्दहेत् । | और गीले सब प्रकारके इन्धनको | जला डालता है उसी प्रकार ज्ञानाग्नि तथा शुभाशुभं कर्म | एक क्षणमें ही समस्त शुभाशुभ ज्ञानाग्निर्दहते क्षणात् ॥ | कर्मोंको भस्म कर देता है । जिस पद्मपत्रं यथा तोयैः | प्रकार कमलका पत्ता अपने ऊपर | पड़े हुए जलसे भी लिप्त नहीं होता, स्वस्थैरपि न लिप्यते । | उसी प्रकार ज्ञानी प्रारब्धवश अपनेको शब्दादिविषयाम्भोभि- | प्राप्त हुए शब्दादि विषयरूप जलसे
२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
स्तद्वज्ज्ञानी न लिप्यते ॥ लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार यद्वन्मन्त्रबलोपेतः मन्त्रबलसे सम्पन्न हुआ पुरुष सर्पोंके क्रीडन्सर्पेर्न दश्यते । साथ खेलते रहनेपर भी उनके द्वारा क्रीडन्नपि न लिप्येत नहीं डसा जाता उसी प्रकार ज्ञानी तद्वदिन्द्रियपन्नगैः ॥ इन्द्रियरूप सर्पोंके साथ क्रीडा करते रहनेपर भी उनसे लिप्त नहीं होता । मन्त्रौषधिवलैैर्यद्व- जिस प्रकार खाया हुआ विष भी ज्जीर्यते भक्षितं विषम् । मन्त्र और ओषधिके सामर्थ्यसे पच तद्वत्सर्वाणि पापानि जाता है उसी प्रकार ज्ञानीके सारे जीर्यन्ते ज्ञानिनः क्षणात् ॥” पाप एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ।” तथा च सूत्रकारः—“पुरुषा- तथा सूत्रकार भगवान् व्यासजीने [स्वाभिमतसूत्र-] र्थोऽतः शब्दादिति भी “पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति [कृन्मतोपन्यासः] बादरायणः” ( ब्र० बादरायणः” इस सूत्रसे ज्ञानको ही सू० ३ । ४ । १) इति परमपुरुषार्थका हेतु बतलाकर फिर ज्ञानस्यैव परमपुरुषार्थहेतुत्वमभि- धाय “शेषत्वात्पुरुषार्थवादो ‘शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति
१. स्वतन्त्र साधनभूत इस ( औपनिषद आत्मज्ञान ) से मोक्षरूप पुरुषार्थ सिद्ध होता है, क्योंकि इसमें [ ‘तरति शोकमात्मवित्’ इत्यादि ] श्रुति प्रमाण है— ऐसा बादरायणाचार्यका मत है। २. इस सूत्रका विशद अर्थ इस प्रकार है—जैसे ‘व्रीहिभिर्यजेत’ इस व्रीहियागमें करणभूत व्रीहिके साथ ही उसका प्रोक्षण आदि भी यज्ञका अङ्ग माना जाता है उसी प्रकार आत्मा कर्तृरूपसे यज्ञ आदि कर्मका अंग होनेके कारण उसका ज्ञान भी उस कर्मका अङ्ग ही है। अतः आत्मज्ञानके महान् फलको बतानेवाली ‘तरति शोकमात्मवित्’ इत्यादि श्रुति शेषत्वात्--यज्ञादि कर्मोंका अङ्ग होनेके कारण पुरुषार्थवाद है अर्थात् पुरुष [ आत्मा ] की प्रशंसाके लिये अर्थवाद- मात्र है; जिस प्रकार कि अन्यान्य द्रव्यसंस्कारसम्बन्धी कर्मोंमें फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है। उदाहरणके लिये निम्नाङ्कित श्रुति है—‘यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति’ ( जिसकी पलाशकी ‘जुहू’ होती है वह कभी पापमय यशका श्रवण नहीं करता) यह फलश्रुति यज्ञसम्बन्धिनी जुहूसे सम्बन्ध रखनेवाले पलाशकी प्रशंसा करनेसे यज्ञकी ही अङ्गभूत है; अतः यज्ञशेष होनेसे अर्थवाद मानी
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७ यथा···" (ब्र० सू० ३।४।२) इत्यादिना कर्मापेक्षितकर्तृप्रति- पादकत्वेन विद्यायाः कर्मशेषत्व- माशङ्क्य "अधिकोपदेशात्तु बा- दरायणस्य···" (ब्र० सू० ३। ४।८) इत्यादिना कर्तृत्वादि- संसारधर्मरहितापहतपाप्मादिरूप- ब्रह्मोपदेशात्तद्विज्ञानपूर्विकां तु कर्माधिकारसिद्धिं त्वाशासानस्य कर्माधिकारहेतोः क्रियाकारकफल- लक्षणस्य समस्तस्य प्रपञ्चस्या- विद्याकृतस्य विद्यासामर्थ्यात्स्व- रूपोपमर्ददर्शनात्कर्माधिकारोच्छि- त्तिप्रसङ्गाद्भिन्नप्रकरणत्वाद्विन्न- कार्यत्वाच्च परस्परविकल्पः समु- जैमिनिः" इस सूत्रसे जैमिनिके मतानुसार कर्ममें अपेक्षित कर्ताका प्रतिपादन करनेवाली होनेसे विद्याके कर्मशेषत्वकी आशङ्का कर "अधिको- पदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात्" इस सूत्रसे यह बतलाया है कि विद्या कर्तृत्वादि सांसारिक धर्मोंसे रहित निष्पापादिरूप ब्रह्मका प्रतिपादन करती है, इसलिये जो पुरुष उसके ज्ञानपूर्वक कर्माधिकारकी सिद्धिकी आशा रखता है उसके कर्माधिकारके हेतुभूत अविद्याजनित क्रिया, कारक एवं फलरूप समस्त संसारके स्वरूपका विद्याके प्रभावसे विनाश देखा जानेके कारण कर्माधिकारके उच्छेदका प्रसंग उपस्थित होनेसे तथा कर्म और ज्ञानके भिन्न-भिन्न प्रकरण और भिन्न-भिन्न कार्य देखे जानेके कारण उनका आपसमें विकल्प, गयी है। ऐसा जैमिनिका मत है। अभिप्राय यह कि यज्ञादिका कर्ता और भोक्ता संसारी जीव ही शरीर छूटनेपर आत्मा या परात्मा शब्दसे कहा गया है। जो संसारी जीव है उसीके ज्ञानका महत्त्व वेदान्तमें बताया गया है। इस मतमें ईश्वरका अस्तित्व नहीं स्वीकार किया गया है। १. जैमिनिके पूर्वोक्त मतका खण्डन करते हुए कहते हैं—'अधिकोपदेशात्तु' इत्यादि। यदि कर्ता भोक्ता संसारी जीवका ही उपनिषद्की श्रुतियोंमें उपदेश किया गया होता तो उक्तरूपसे की हुई फलश्रुति अवश्य ही अर्थवाद हो सकती थी किन्तु वहाँ तो संसारी जीवकी अपेक्षा बहुत ही उत्कृष्ट असंसारी परमेश्वरका वेद्यरूपसे उपदेश किया गया है, इसलिये मुझ बादरायणका [ आत्मज्ञानसे मोक्षरूप पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, इत्यादि ] पूर्वोक्त मत ज्यों-का-त्यों ठीक ही है; क्योंकि 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतियोंमें उस उत्कृष्ट परमात्माके स्वरूपका उपदेश देखा जाता है।
२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ च्चयोऽङ्गाङ्गिभावो वा नास्तीति प्रतिपाद्य “अत एव चाग्नीन्धना- द्यनपेक्षा” ( ब्र० सू० ३।४। २५) इति विद्याया एव परम- पुरुषार्थहेतुत्वादग्नीन्धनाद्याश्रम- कर्माणि विद्यायाः स्वार्थसिद्धौ नापेक्षितव्यानीति पूर्वोक्तस्याधि- करणस्य फलमुपसंहृत्यात्यन्तमे- वानपेक्षायां प्राप्तायां “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” ( ब्र० सू० ३।४। २६ ) इति नात्य- न्तमनपेक्षा । उत्पन्ना हि विद्या फलसिद्धिं प्रति न किञ्चिदन्यद्- पेक्षते । उत्पत्तिं प्रत्यपेक्षत एव । समुच्चय अथवा अङ्गाङ्गिभाव कुछ भी नहीं हो सकता *-ऐसा प्रतिपादन करके “अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा” इस सूत्रसे 'विद्या ही परमपुरुषार्थकी हेतु होनेके कारण वह अपने प्रयोजनकी पूर्तिमें अग्नि-इन्धनादिसे निष्पन्न होने- वाले आश्रम-कर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखती' इस प्रकार पूर्वोक्त अधिकरणके फलका उपसंहार कर ज्ञानप्राप्तिमें कर्मकी अत्यन्त अनपेक्षा प्राप्त होनेपर “सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” इस सूत्रसे यह बतलाया है कि कर्मकी बिल्कुल ही अपेक्षा न हो- ऐसी बात नहीं है, अपि तु विद्या उत्पन्न हो जानेपर ही अपने फलकी सिद्धिमें किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं रखती, अपनी उत्पत्तिमें तो उसे कर्मकी अपेक्षा है ही, क्योंकि
- वेदमें कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड ये दोनों अलग-अलग हैं तथा ज्ञानसे मोक्ष और कर्मोंसे स्वर्गादिकी प्राप्ति होती है; इसलिये इनके फल भी अलग-अलग हैं । अतः इन दोनोंका परस्पर न तो विकल्प ( एक ही प्रयोजनके लिये दोनोंमेंसे किसी एकका अनुष्ठान ), न समुच्चय ( दोनोंका एक साथ अनुष्ठान ) और न अङ्गाङ्गिभाव ( एकका दूसरेके अन्तर्गत होना ) ही हो सकता है । १. [ क्योंकि ब्रह्मविद्या स्वतन्त्र पुरुषार्थरूप है ] इसीलिये उसमें अग्नि- इन्धन आदि [ आश्रमविहित कर्मों ] की अपेक्षा नहीं है । २. विद्या अपनी उत्पत्तिमें योग्यतावश सभी आश्रम-कर्मोंकी अपेक्षा रखती है। जैसे योग्यतानुसार अश्वका उपयोग होता है। इस विषयमें 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति प्रमाण है, [ अर्थात् जैसे घोड़ा रथमें ही जोता जाता है हलमें नहीं उसी प्रकार ] विद्या अपनी उत्पत्तिमें कर्मोंकी अपेक्षा रखती है;
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
"विविदिषन्ति यज्ञेन" इति | "यज्ञके द्वारा आत्माको जानना श्रुतेरिति विविदिषासाधनत्वेन | चाहते हैं" इस श्रुतिसे वेदने कर्मणामुपयोगं दर्शितवान् । तथा | जिज्ञासाके साधनरूपसे कर्मोंका च "नाविशेषात्" (ब्र० सू० ३। | उपयोग दिखलाया है। तथा इसके आगे ४।१३) "स्तुतयेऽनुमतिर्वा" | "नाविशेषात्" और "स्तुतयेऽनु- (ब्र० सू० ३।४।१४) इति- | मतिर्वा" इन दो सूत्रोंद्वारा "कुर्वन्नेवेह सूत्रद्वयेन कुर्वन्नेवेतिमन्त्रस्यावि- | कर्माणि" इस श्रुतिके दो प्रकारसे द्वद्विषयत्वेन विद्यास्तुतित्वेन | अर्थ दिखलाये हैं—पहला यह कि चार्थद्वयं दर्शितवान् । अत उक्तेन | 'यह 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि मन्त्र अज्ञानी- प्रकारेण ज्ञानस्यैव मोक्षसाधन- | के लिये है।' तथा दूसरा अर्थ यह है त्वायुुक्तः परोपनिषदारम्भः । | कि यह मन्त्र विद्या (ज्ञान) की स्तुतिके लिये है। इसलिये उक्त प्रकारे ज्ञान ही मोक्षका साधन होनेके कारण आगेकी उपनिषद्को आरम्भ करना उचित ही है। ननु बन्धस्य मिथ्यात्वे सति | पूर्व०—यदि जीवका बन्धन ज्ञानादमृत- ज्ञाननिवर्त्यत्वेन | मिथ्या होता तो वह ज्ञानसे निवृत्त त्वेऽनुपपत्ति- | होनेयोग्य हो सकता था और दर्शनम् ज्ञानादमृतत्वं | ऐसी अवस्था में ज्ञानसे अमृतत्वकी स्यात् । न त्वेतदस्ति; प्रति- | प्राप्ति हो सकती थी; किन्तु ऐसी पन्नत्वाद्वाधाभावाद्युष्मदादिस्वरू- | बात है नहीं; क्योंकि बन्धन प्रत्यक्षसिद्ध है, इसका बाध नहीं होता और युष्मदस्मदादि (तू-मैं आदि) रूपसे प्रतीत
मोक्षरूप फलकी सिद्धिमें नहीं। १. [ 'विद्वान्' ऐसा ] विशेषण न होनेके कारण 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि वाक्य तत्त्वज्ञविषयक नहीं है। २. अथवा तत्त्वज्ञके लिये जो कर्मानुज्ञा है वह ज्ञानकी स्तुतिके लिये है। अर्थात् तत्त्वज्ञ होनेपर जीवनपर्यन्त कर्म करनेपर भी कर्मका लेप नहीं होता—ऐसा कहकर तत्त्वज्ञानकी स्तुति की गयी है।