सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
( ७७ ) श्री केशवः स्फुटतरं कृतवान् हि सौरा— सन्नमेतदपि षष्टिमिते गतेऽब्दे— दृष्ट्वा श्लथं किमपितत्तनयो गणेश । स्पष्टं यथा ह्यकृत् दृग्गणितैक्यमत्र, कथमपि यदिदं भूरिकाले श्लथं स्यात् । मुहुरपि परिलक्षेन्दूग्ग्रहाद्युक्षयोग्यम्, सदमलगुरुतुल्यप्राप्तबुद्धिप्रकाशैः । कथितसदुपपत्त्या शुद्धि केन्द्रे प्रचाल्ये ॥ वाराहाचार्य ने अपनी पञ्चसिद्धान्तिका में १—पौलिश, २—रोमक, ३—वासिष्ठ, ४—सौर एवं ५—पैतामह इन पाँचों में सूर्य सिद्धान्त का गणित "स्पष्टतरः” सविता से सूक्ष्म कहा है। तदुपरि के आचार्यों ने सौर सिद्धान्त की अपेक्षा आर्यभट्ट का गणित अधिक सूक्ष्म माना । कालान्तर में आर्यभट्ट का ग्रहगणित स्थूल हो जाने से ब्रह्म- गुप्त का वेधसिद्ध ग्रहगणित सूक्ष्म हुआ । किन्तु बहुकालान्तर में ब्रह्मगुप्त की स्थूलता को समझ कर श्री केशवाचार्य ने सौर एवं आर्य-सिद्धान्त के समीप का वेधसिद्ध ग्रहगणित स्वीकार किया है। इस उत्तरोत्तर गणित-सूक्ष्मता प्राप्ति के लिए आचार्य गणेश ने स्पष्ट दृग्गणितैक्य सिद्ध ग्रहगणित साधन पद्धति से भारतीय ज्योतिष को समुज्ज्वल किया है । इस सन्दर्भ में आचार्य गणेश का मत स्पष्ट है—"इस प्रकार के गणित के स्थूल भय को दूर करने के लिये सूर्यचन्द्रग्रहणादि प्रत्यक्ष दृगयोग्यता सम्पादनार्थं समय-समय पर वेधादि विचार से उत्पन्न त्रुटियाँ दूर करते हुए प्रश्न का समाधान करते रहना चाहिए। अर्थात् सूक्ष्मता प्राप्ति हेतु ग्रहों में संस्कारान्तर स्वीकृत करने चाहिए" इत्यादि स्पष्ट भी कहा है। सम्प्रति यह आशा की जा सकती है कि वर्तमान दृश्य एवं अदृश्य पञ्चाङ्गों का भयंकर विवाद उक्त प्रमाणों से समाप्त हो जा सकेगा । श्री विष्णु दैवज्ञ — शक १४७८ (ई० सन् १५५६) में दिवाकर दैवज्ञ के पुत्र, कृष्ण दैवज्ञ के अनुज श्री विष्णु दैवज्ञ ने सौरपक्षीय करण ग्रन्थ की रचना शके १५३० में की है, जिस पर उन्हीं के भाई श्री विश्वनाथ दैवज्ञ ने शके १५४५ में उदाहरण द्वारा गणित किया है। श्री सूर्य—शके १४६३ (ई० सन् १५४१) में आचार्य भास्कर की लीलावती की टीका श्री सूर्य ने गणितामृत भूमिका नाम से की है। कृष्ण दैवज्ञ—कृष्ण दैवज्ञ यवन बादशाह जहाँगीर के प्रधान सभापण्डित थे । इनके पिता का नाम श्री वल्लभ तथा माता का नाम गोजि था । इन्होंने "नवाङ्कुर" नाम की श्रीमद्भास्कराचार्य की बीजगणित पर टीका रची है ।
( ७८ ) रघुनाथ शर्मा—ओमभटात्मज श्री रघुनाथ शर्मा ने शके १४८७ (ई० सन् १५६५) में भास्कराचार्य और सूर्यसिद्धान्त मत से 'मणिप्रदीप' नामक करण ग्रन्थ की रचना की है । श्री मल्लारि—शके १४९३ (ई० सन् १५७१) में श्री दिवाकर दैवज्ञ के पुत्रों में श्री कृष्ण एवं विष्णु दैवज्ञ से मल्लारि छोटे थे । अपने पिता दिवाकर दैवज्ञ से ज्योतिष- शास्त्र का सम्यक् अध्ययन किया था। श्री गणेश दैवज्ञ कृत 'ग्रहलाघव' करण ग्रन्थ की टीका श्री मल्लारि ने अत्यन्त शुद्ध एवं सूक्ष्म गणित साधिका उपपत्ति के साथ की है । श्री गणेण दैवज्ञ के समान ही गणित गोल वैदुष्य की असाधारण प्रतिभा के साथ श्री मल्लारि में भी काव्य-साहित्य का प्रौढ़ पाण्डित्य और गणित की सूक्ष्मता स्पष्ट परिलक्षित है । मल्लारि ने ग्रहलाघव की उपपत्ति में यत्र-तत्र-सर्वत्र अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों के उदा- हरण की अपेक्षा श्री भास्कराचार्य की सिद्धान्त शिरोमणि के उद्धरणों का विशेष रूप से उल्लेख किया है । श्री रङ्गनाथ—श्री रङ्गनाथ का शके १४९५ (ई० सन् १५७३) में श्री काशी में जन्म हुआ । इनके पिता का नाम श्री दैवज्ञ तथा माता का नाम गोजि था । कृष्ण दैवज्ञ के अनुज तथा सिद्धान्त शिरोमणि के मरीचि भाष्य रचयिता श्री मुनीश्वर के पिता श्री रङ्गनाथ हैं। इन्होंने शके १५२५ में सूर्यसिद्धान्त का सौरभाष्य 'गूढार्थप्रकाशिका' नाम से रचा है। रङ्गनाथ के समय यूरोपीय लोगों का भारत के साथ व्यापार वृद्धिगत हो चुका था। जैसा कि श्री रङ्गनाथ ने सूर्यसिद्धान्त के गोलाध्याय के यन्त्राधिकार के २२वें श्लोक की टीका में स्पष्ट लिखा है— “पारदाम्बुसूत्राणि शुल्बतैलजलानि च। बीजानि पांसवस्तेषु प्रयोगास्तेऽपि दुर्लभा ॥” एवं २२ श्लोक की टीका में—“इयं स्वयंवहविद्या समुद्रान्तरनिवासिजनैः फिरंगाख्यैः सम्यगभ्यस्तेति ॥” श्री रङ्गनाथ के उक्त स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है कि तत्कालीन समय यूरोपीय लोगों का भारत में गमनागमन बाहुल्य हो चुका था। सूर्यसिद्धान्त की रङ्गनाथकृत उप- पत्तियों में प्रायः श्री भास्कराचार्य की सिद्धान्त शिरोमणि के सिद्धान्त की बहुलता से उद्धृत हैं । शके १५२५ चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, बुधवार की रात्रि में श्री सूर्योदयादिष्ट घटिका ४२।३० में प्रसव दुःख की असह्य वेदना से पीड़ित पत्नी के दुःख की उद्विग्नता से श्री रङ्गनाथ दैवज्ञ ने "दुःख निवृत्त हो" सूर्य-सिद्धान्त की व्याख्या मैं ही लिखूँगा ।''''ऐसी प्रतिज्ञा की ही थी कि उसी क्षण ग्रहगणित गोलज्ञ, सिद्धान्त शिरोमणि के मरीचि भाष्य-
( ७९ ) कार श्री मुनीश्वर, अपर नाम “विश्वरूप” ने जन्म लिया था । अतएव श्री रङ्गनाथ दैवज्ञ ने अपने ग्रन्थ “गूढार्थप्रकाशिका” को मुनीश्वर का सहज (भाई) भी कहा है । रङ्गनाथकृत सौरभाष्य की टिप्पणी में उल्लिखित है— “यत्स्मृत्याभीष्टकार्यस्य निर्विघ्नां सिद्धिमेष्यति- नरस्तं बुद्धिदं वन्दे वक्रतुण्डं शिवोद्भवम् । पितरौ गोजिवल्लालौ जयतोऽम्बाशिवात्मकौ याभ्यां पञ्चसुता जाता ज्योतिःसंसार हेतवः । सार्वभौमजहाँगीरविश्वासस्पद भाषणम् यस्य त भ्रातरं कृष्णं बुधं वन्दे जगद्गुरुम् नाना ग्रन्थान् समालोक्य सूर्यसिद्धान्तटिप्पणम् करोमि रङ्गनाथोऽहम् तद्गूढार्थ प्रकाशकम् ।” और ग्रन्थ समाप्ति पर— “भागीरथी तीर संस्थे शम्भोवारणसी पुरे, बल्लालगणको रुद्रजपासक्तोऽभवद्बुधः । तस्यात्मजापञ्चगुणाभिरामा ज्येष्ठः स रामः सकलागमज्ञः । येनोपपत्तिः स्वधिया नितान्तं प्रकाशिताऽनन्त सुधारकस्य ॥ ततः स कृष्णो जहांगीरसार्वभौमस्य सर्वाधिगतप्रतिष्ठः । श्रीभास्करीयं विवृतं तु येन बीजं तथाश्रीपतिपद्धतिः सा ॥ गोविन्दसंज्ञस्ततस्तृतीयः तस्यानुजोऽहं गुरुलब्धविद्यः, विश्वेशतत्पदनिविष्टचेताः काशी निवासी सकलाभिमान्य- श्रीरङ्गनाथोऽर्कमुखोत्थ शाखे गूढ़प्रकाशाभिधटिप्पणं सः कृत्वा महादेवबुधाग्रजोऽथ विश्वेश्वरायार्पितवान् सुवृद्धये शके तत्त्वतित्थ्युन्मिते चैत्रमासे सिते शम्भुतिथ्यां बुधेऽर्कोदयान्मे दलाब्धद्विनाराद्वनाडीषु यातो मुनीश्वराक्र्कसिद्धान्तगूढ़प्रकाशौ गूढ़प्रकाशकं दृष्ट्वा रङ्गनाथभवं भुवि । मुनीश्वरस्य सहजं लभन्तां गणकाः मुखम् ॥” श्री विश्वनाथ-शके १५०० (ई० स० १५७८) दिवाकर पुत्र, विष्णु कृष्ण मल्लारि से सर्व कनिष्ठ हैं । सूर्य सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि, नीलकण्ठी, विष्णुकरण ग्रहलाघव मकरन्द और अनन्तसुधार आदिक ग्रन्थों के प्रसिद्ध टीकाकार ज्योतिर्विद् हुए हैं इन्होंने गणित क्रम- दर्शन पूर्वक उदाहरणों के द्वारा उक्त ग्रन्थों को समलंकृत किया है ।
( ८० ) सभी उदाहरणों से इनका प्रखर वैदुष्य स्पष्ट प्रतीत होता हैं। ग्रहलाघव ग्रन्थ के उदाहरणों से तो इनमें असाधारण गोल गणित का पाण्डित्य झलकता है । नृसिंह दैवज्ञ—शके १५०८ ( ईसवी १५८६ ) कृष्ण दैवज्ञ पुत्र दिवाकर दैवज्ञ का पिता, विष्णु दैवज्ञ और मल्लरि पिता के अनुजों से ज्योतिर्विद्या के अध्ययन के साथ २५ वर्ष आयु में सूर्य सिद्धान्त की सौरभाष्य नाम की और ३५ वर्ष में भास्करीय शिरोमणि टीका वासनावार्तिक नाम की सविशेष टीका रची है । ग्रह वेध करने में प्रवीण थे यन्त्रों में, मयूर यन्त्रब्रह्मचारियंत्र शंख यन्त्र, मेषाज युद्धयन्त्र, शंखवादन यन्त्र, घण्टापटहादिवादन यन्त्र, बानर यन्त्र घटी यन्त्र और अनेक यन्त्रों में हंसादि यन्त्र स्वयंवह गोल यन्त्र आदि बहुत यन्त्रों का उल्लेख किया है । नीलकण्ठ—आचार्य नीलकण्ठ ने शके १५०९ (ई० स० १५८७) में पारसीक एवं अरबीक शब्द मिश्रित ताजकमत के तीन तन्त्रों से 'तांजिक नीलकण्ठी' नामक ग्रन्थ की रचना की । इस ग्रन्थ का उपयोग वर्षफल बनाने मे होता है । उक्त ग्रन्थ के द्वारा आचार्य नीलकण्ठ का ग्रहगणित गोलविषयक पाण्डित्य भी सिद्ध होता है । सुधाकर द्विवेदी के अनुसार इन्होंने 'जातक पद्धति' नामक ग्रन्थ की भी रचना की थी। रामदैवज्ञ—ये आचार्य नीलकण्ठ के छोटे भाई थे । इन्होंने शक १५५८ में प्रसिद्ध 'मुहूर्त्त चिन्तामणि' ग्रन्थ की रचना की । एक करण ग्रन्थ 'रामविनोद' भी इन्होंने लिखा, इसमें २८० श्लोक हैं । श्रो मुनीश्वर—शके १५२५ (ई० स० १६०३) में सौरभाष्य रचयिता आचाय रंगनाथ दैवज्ञ पुत्र 'मुनीश्वर' जिनका अपरनाम 'विश्वरूप' भी है, उत्पन्न हुये । आचार्य मुनीश्वर के इतिवृत्त के सन्दर्भ में यहाँ विशेष वर्णन आवश्यक समझकर प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि प्रस्तुत ग्रन्थ 'सिद्धान्तशिरोमणि' का यह 'मरिचि' भाष्य इन्हीं की ज्योतिष जगत को अति महत्वपूर्ण देन है । 'मरीचितीकाकार' आचार्य मुनीश्वर परम्परा से ज्योतिर्विद्या में पूर्ण मर्मज्ञ थे । बाल्यजीवन से ही उनकी बुद्धि ज्योतिर्विद्या की ओर अग्रे प्रस्फुटित होती थी । इसका एक प्रबल हेतु यह भी है कि मुनीश्वर के पिता श्री रंगनाथ भी ऊँचे स्तर के ग्रहगणितज्ञ हो चुके थे । सूर्य सिद्धान्त पर सर्वप्रथम रंगनाथ कृत सौरभाष्य अपना विशिष्ट महत्व रखता है। अतएव वंश परम्परा में संस्कार से आचार्य मुनीश्वर की ग्रहगणितगोल में तो असाधारण प्रतिभा होनी ही चाहिये थी साथ ही न्याय, काव्य, व्याकरण, प्रभृति शास्त्रों में भी उनका अशेष पाण्डित्य था । आचार्य मुनीश्वर ने सूर्य सिद्धान्त के भगणों के आधार से शके १५६८ (ई० स० १६४६) में 'सिद्धान्त सार्वभौम' नामक ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थ की रचना की । स्वरचित
( ८१ )
ग्रन्थ की स्वाशय प्रकाशिनी नाम की टीका भी स्वयं मुनीश्वर ने लिखी। इसके अलावा आचार्य मुनीश्वर ने निष्ठार्थदूती नाम की लीलावती की टीका, पाटीसार नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ एवं भास्कराचार्य कृत सिद्धान्तशिरोमणि की 'मरीचि' नाम की टीका लिखी। मरीचि भाष्यकार, आचार्य मुनीश्वर भास्कराचार्य के परम भक्त थे, उन्होंने सिद्धान्त सार्वभौम में स्वयं कहा है— "गूढं स्थूलं स्व सिद्धान्तं मत्वा यस्तच्छिरोमणिम्। कृतवान्मनुजव्याजादसौ जयति भास्करः।" 'भास्कराचार्य मनुष्य रूप से अवतरित हैं।' ऐसा उक्त कथन से स्पष्ट है। भास्करा- चार्य के प्रति मुनीश्वर की यह अनुपम भक्ति, ग्रहगोल मर्मज्ञ सिद्धान्त तत्व विवेककार 'भट्ट कमलाकर' को रुचिकर नहीं हुई। जिसका परिणाम यह भी हुआ कि कमलाकर भट्ट के छोटे भाई श्री रंगनाथ ने मुनीश्वर कृत क्षेत्रभङ्गी का कमलाकर की आज्ञा से खण्डन कर दिया। इस खण्डन का भी खण्डन प्रकार मुनीश्वर का उपलब्ध है एवं किंवदन्ती जो सही है कि माघ मेला प्रयाग के कुम्भ के अवसर पर जहाँ भारत दिग्दिगन्त के महामनीषी शास्त्र पारंगतों में शंकराचार्य प्रभृत्ति सभी आचार्यों का समागम होता है, वहीं उसी अव- सर पर आचार्य मुनीश्वर एवं भट्ट कमलाकर में आचार्य भास्कर की 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ के विषय पर-परस्पर दीनों में शास्त्रार्थ खण्डन-मण्डन हुआ। भारतीय खगोल ग्रह गणितशास्त्र के लिए यह घड़ी उत्तम रही। क्योंकि इस शास्त्रार्थ के पश्चात् ही आचार्य मुनीश्वर ने 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ की अनुपम 'मरीचि' टीका लिखी एवं भट्ट कमला- कर ने खगोल ग्रहगणित के बृहद्-आकर ग्रन्थ 'सिद्धान्ततत्वविवेक' की रचना कर भारतीय ज्योतिष को आगे वर्द्धमान किया। सम्भवतः मुनीश्वर एवं कमलाकर भट्ट का उक्त शास्त्रार्थ भास्कराचार्य से आविष्कृत उदयान्तर ग्रह गणित कर्म में हुआ होगा। वस्तुतः भास्कराचार्य से आविष्कृत यह उदयान्तर गणित कर्म अकाट्य है, अखण्डनीय है एवं ग्रह गणित में आचार्य भास्कर की सुसूक्ष्म देन है। 'सिद्धान्तशिरोमणि' की आचार्य मुनीश्वर की 'मरीचि' नाम की तो टीका है, किन्तु प्राचीनों के बहुत मतों के साथ-साथ ग्रहगोल का निःशेष पाण्डित्य और अनेक सूक्ष्म कथनों के साथ अत्यन्त सुन्दर न्याय (तर्क) शास्त्र की सरिणी से 'सिद्धान्तशिरो- मणि' का ऐसा सुन्दर उत्तम भाष्य अभी तक यही 'मरीचि' सिद्ध हुई है। पण्डित परम्परा में 'मरीचि' ने टीका नाम से प्रसिद्धि नहीं पाई है अपि च इस मरीचि टीका ने भी ग्रहगणित गोल का एक ग्रन्थ रूप से अपना नाम सार्थक किया है। मेरे मत से, आचार्य मुनीश्वर कृत 'सिद्धान्तशिरोमणि' की 'मरीचि' टीका जो विशेष प्रसिद्धि पा चुकी है वह ग्रहगणित का अशेष पाण्डित्य सूचक एक सर्वोत्तम ग्रहगोल भाष्य कहा जाना चाहिये। ६
( ८२ ) भास्कराचार्य कृत 'सिद्धांतशिरोमणि' ग्रन्थ की आचार्य मुनीश्वर द्वारा 'मरीचि' टीका अद्वितीय रही है। इसके अतिरिक्त भी अन्य टीकायें हुई परन्तु मुनीश्वर कृत 'मरीचि' भाष्य ग्रहगोल गणित का एक अद्वितीय भाष्य है जो अभी तक इकाई स्थानीय है। गुरूणां गुरु महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी ने आचार्य मुनीश्वर के 'मरीचि' भाष्य के सन्दर्भ में अपना निम्न मत दिया है—" 'सिद्धान्तशिरोमणि की पदार्थ प्रकाशिका 'मरीचि' टीका के सदृश्य और टीकायें नहीं देखी गई हैं। मरीचि में बहुत से प्राचीनों की उक्तियां देखने योग्य हैं। इसलिए सभी ज्योतिर्विेताओं ने इसका आदर किया है।" मुनीश्वर कृत 'मीरचि' भाष्य के देखने और मनन करने से यह स्पष्ट होता है कि निसंशय आचार्य मुनीश्वर में सर्वशास्त्रों की असाधारण प्रतिभा थी। उन्होंने संस्कृत वाङ्मय के गहन सागर में सानन्द गोता लगाकर अनेक रत्न समूहों की प्राप्तिकर ली थी तथा वे अपार गणितार्णव के उभय पार्श्वदर्शी हो चुके थे उनकी गणित क्रिया ग्रन्थ देखने से स्वतः पाठकों को होगी। 'मरीचि' भाष्यकार मुनीश्वर की अभूतपूर्व खगोल ज्ञान और ग्रहगणितगोल की गवेषणा अभी तक अनुपम है। एक उदाहरण पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है— 'मरीचि' भाष्य में ऊध्वंलोक और अधोलोक की व्याख्या उदय से अस्त तक ऊर्ध्वलोक से तथा अस्त से उदय तक अधोलोक जैसी युक्ति युक्त व्याख्या आज तक कहीं भी मुझे देखने को न मिली जो मुनीश्वर ने 'मरीचि' भाष्य में
( ८३ ) नहीं देते थे, उन्हें अच्छी तरह विदित होता था कि बिना ग्रहगणित गोल के मर्म को समझे ही धर्मशास्त्रोक्त तिथि व्रत उपवास का सुदृढ़ निर्णय दे सकने में वे अपने को पूर्ण सफल समझने में संकोच करते थे । अतएव उन्हें ज्योतिषशास्त्र के मुख्य अंग ग्रह- गणितगोल ज्ञान के लिए सफल गणित स्कन्ध का अध्ययनाध्यापन अत्यावश्यक ही नहीं अपितु मुख्य होता था । आचार्य मुनीश्वर ने अपने मरीचि भाष्य में ग्रन्थ के समग्र आशय न्याय और मीमांसा शास्त्रों की सारणि वर्णित किये हैं । मुनीश्वर ने अपने भाष्य में मूल ग्रन्थ के सन्देह शब्दों में पाणिनीय व्याकरण में उन्हें उसी प्रकार ठीक कहा है जैसे—स्पष्टाधिकार में कोटिफलघ्नी मृदुकेन्द्र भुक्ति······स्पष्टाधिक······की व्याख्या के प्रसंग में, दीर्घ ईकारान्तः कोटि शब्द······कृदिकारादक्तिनः······अर्थादित्ये केन्द्रेति वार्तिक वचनात्······से कोटि शब्द को सम्यक् कहा है । मुनीश्वर के मरीचि भाष्य में साहित्य शास्त्र के रस की पदे पदे आनन्दानुभूति होती है । मरीचि भाष्यकार मुनीश्वर ने सिद्धान्तशिरोमणि के 'मरीचि' भाष्य की रचना में संस्कृत वाङ्मय के अनेक ग्रन्थ रत्नों का गम्भीर अध्ययन किया था तथा उन ग्रन्थों के समन्वय के सिद्धान्तों का इस भाष्य में जहाँ आवश्यकता हुई वहाँ उनके स्थल विशेष पर समन्वय अर्थ में यहाँ मरीचि में उद्धरण भी दिये हुये हैं जैसे— नार्मदसिद्धान्त, तोडरानन्द, वशिष्ठसिद्धान्त, सूर्यसिद्धान्त, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, आर्य- सिद्धान्त, ब्रह्मसिद्धान्त, सिद्धान्तसुन्दर, श्रीपति भट्ट सिद्धान्त, सिद्धान्तशेखर, धीवृद्धिदन्त्र, गुरुत्तम विष्णुदैवज्ञ, लघुवशिष्ठसिद्धान्त, चतुर्वेदाचार्य, गुरुतरबीजटीका, लक्ष्मीदासमिश्र, नवीनगणक, न्यायवार्तिक, पाणिनीय, कैय्यट, जातक पद्धति, पराशर, नीलकण्ठ, यन्त्रकिरणावलि, बृहत्सूर्यसिद्धान्त, सूर्यसिद्धान्त की भास्कर टीका (चन्द्रग्रहणाधिकार श्लोक २६ की "मरीचि" में जो उपलब्ध नहीं है), वशिष्ट सूर्यसिद्धान्त, कर्णकुतूहल, सिद्धान्तशेखर, पृथूदक, सिद्धान्तरहस्य और श्रीगणेश दैवज्ञ प्रभृति अनेकों ग्रन्थों और अनेकों आचार्यों की उक्तियों के प्रमाण इस मरीचि भाष्य में यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध होते हैं । 'मरीचि' भाष्य में श्रुति स्मृति, पुराणोपपुराण, सभी शास्त्रवाक्यों का उल्लेख तो बाहुल्येन ही मिलेगा । अपने समय में मुनीश्वर प्रख्यात काव्य कोष व्याकरणाभिज्ञ तथा ज्योतिष शास्त्र के गोल क्षेत्र विचारों में अत्यन्त प्रौढ़ थे । इसमें इनकी कृतियाँ ही प्रमाण हैं । मरीचि के आदि में— श्री रङ्गनाथाभिध तात पादाः कृष्णानुजाः श्रीकमलाधिपास्ते । त्रिस्कन्ध पारङ्गमरण्डमल्लां बल्लालजा भूमितले जयन्ति ॥
( ८४ ) नारायणो गणितशास्त्रकलाकलापः । श्री सेवितः सकलशास्त्रसरोजभृङ्गः ॥ दैवज्ञकृष्णगुरुपादरतो गुरुर्मे क्ष्मायाँ जयत्यखिल पण्डितवन्द्यपादः मुनीश्वरापराख्येन विश्वरूपेण धृष्यते बुद्धिशाणे मरीच्यर्थं तत्सिद्धान्त शिरोमणिः ॥ तात्पर्य यह है कि मुनीश्वर ने बुद्धिशाण में शिरोमणि को घर्षण करके उससे किरणें उत्पादित की हैं। ततः प्रभृति इस सिद्धान्तशिरोमणि का यह ‘मरीचि’ भाष्य वस्तुतः ‘मरीचि’ (किरण) का कार्य अनवरत कर रही है। यहीं पर मरीचि भाष्य के प्रकाशन न करने में मुझे जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा उसका विवरण भी प्रसंगत यहीं प्रस्तुत कर रहा हूँ— “मरीचि” प्रकाशन की विषम कठिनाइयाँ “मरीचि” भाष्य का सर्वप्रथम प्रकाशन सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगणिताध्याय के मेरे द्वारा लिखित सोपपत्तिक हिन्दी ‘शिखा’ और संस्कृत ‘दीपिका’ के साथ में सर्वप्रथम प्रकाश में आई है। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के वृहत् ग्रन्थागार सरस्वती भवन में उक्त मरीचि की पाण्डुलिपियाँ मेरे दृष्टिपथ में आईं जिसकी प्रतिलिपि प्राप्ति के लिए अनेक कठिनाइयों एवं गहन परिश्रम से उसकी प्रतिलिपि की जा सकी । मरीचि की पाण्डुलिपि को पढ़ना समझना संगति बैठाना और प्राचीन हस्तलिपियों का आधुनिक वर्णलिपियों से समन्वय करना एक पहाड़ सा कठिन कार्य कैसे सफल हो सका, आज मुझे भी स्वयं आश्चर्य सा हो रहा है । लेखक, अध्यापक, अध्यापन, अध्येतृ सम्बन्ध आदि से उस पाण्डुलिपि में अनेक त्रुटियाँ विद्यमान हैं जिनके संशोधन में मैं अपनी कठिनाइयों को किन शब्दों में लिखूँ भविष्य के शोधकर्त्ता उन कठिनाइयों से अवश्य परिचित होंगे । प्रस्तुत गोलाध्याय की मरीचि भाष्य में पूना से प्रकाशित गोलाध्याय के मात्र मूल और मरीचि के सहयोग से यथोचित सुविधा हो सकी जबकि उसमें भी स्थल विशेष पर संशय मुक्ति नहीं है । श्री कमलाकर भट्ट—शके १५३८ ( ई० स० १६१६ ) नृसिंह दैवज्ञात्मज श्री दिवाकर दैवज्ञ के अनुज और शिष्य कमलाकर १५८० (ई० स० १६५८) ने श्री काशी में प्रचलित वर्तमान सूर्य सिद्धान्त के आधार पर ग्रहगोल गणित के बृहद आकर ग्रन्थ
( ८५ ) “सिद्धान्त तत्व विवेक” की रचना की। सिद्धान्त विभाग में उक्त ग्रन्थ का बड़ा महत्व आज तक स्थापित है। मुनीश्वर व कमलाकर के पारस्परिक मतभेदों से, भास्कर, भक्त मुनीश्वर से शास्त्रार्थ में भास्कराचार्य की 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ के पदे-पदे वैदुष्य प्रदर्शन से असन्तुष्ट श्री कमलाकर भट्ट ने अपने 'सिद्धान्त तत्त्व विवेक' ग्रन्थ में श्री भास्कराचार्य से आविष्कृत गूढ़ गहन उदयान्तर जैसे गणित का (जिसका खण्डन सम्भव नहीं है,) खण्डन किया जिससे आज तक पराकाष्ठा की ग्रहगोल वैदुष्य सूचक कमलाकर भट्ट पर दैवज्ञ समाज की आस्था कम मानी जाती है। फिर भी सही मायने में भट्ट कमलाकर के 'सिद्धान्ततत्वविवेक' में अपूर्व कल्पना, अपूर्व खोज और अपूर्व नूतन युक्तियों का यत्र तत्र सर्वत्र समावेश हुआ है। जगन्नाथ सम्राट—(शके १५७४, ई० स० १६५२) ये दाक्षिणात्य तैलङ्ग ब्राह्मण थे। जयपुर महाराज श्री जयसिंह की पण्डित सभा के प्रधान सभापण्डित थे। अरबी भाषा के “मिजास्ती” नामक ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद इन्होंने किया था, जिसका नाम “सिद्धान्त सम्राट्” है। अरबी भाषा के “युक्लेद” ग्रन्थ का संस्कृत अनुवाद भी इन्होंने शके १६४० (ई० स० १७१८) में किया था, जिसका प्रसिद्ध नाम “रेखागणित” है। “सिद्धान्त सम्राट्” ग्रन्थ में अरबदेशीय गणितज्ञों में “मिर्जा उल्कू वेग” आदि यवनों की ज्योत्पत्ति और वेधादि विषय पर प्रकारान्तर से इन्होंने उपपत्तियाँ लिखी हैं। जयपुर के राजा जयसिंह ने नक्षत्र ग्रह वेध के लिए श्री काशी, अवन्ति (उज्जैन) और जयपुर में जो वेधालय स्थापित किये हैं उनकी रचना का आधार जग- न्नाथ सम्राट के “सिद्धान्त साम्राज्य” नामक ग्रन्थ का स्थान विशेष रहा। निसन्देह ग्रह वेध परम्परा की इस देन का श्रेय जगन्नाथ सम्राट को है। महामहोपाध्याय पं० बापूदेव शास्त्री— शताब्दियों से प्रायः विशेष कर कमलाकर भट्ट के समय से (सन् १६५८ ई० से) क्षीणता की ओर जाते हुए गणित सिद्धान्त ज्योतिष की जो स्थिति थी वह अत्यन्त शोच- नीय थी। यत्र-तत्र ज्योतिष फलित मात्र के साधारण जानकारों का बोलबाला था। ज्योतिष की मूलभूत भित्ति इस गणित ज्योतिष की नींव हिल चुकी थी, किन्तु इन शताब्दियों में गणित खगोल का गौरव बढ़ रहा था और अपने तीव्र वेग से वर्धमान पश्चिम गणित सागर की लहरें ब्रिटिश शासन के सम्बन्ध से भारत में भी पहुँच चुकी थीं। लगभग सन् १८३१ से सन् १८३५ तक के बीच नागपुर पाठशाला में यूरोप देशीय बीजगणित के साथ-साथ कान्यकुब्ज ढुंढिराज मिश्र से भास्करीय लीलावती और बीजगणित पढ़ाते हुए—ज्योतिष के गणित धरातल में पूनानगर के महाराष्ट्र ब्राह्मण श्री सीताराम देव के पुत्र पं० नृसिंहदेव शास्त्री या पं० बापूदेव शास्त्री का प्रादुर्भाव हुआ। सन् १८३८ में एजेण्ट लान्सटिन विल्किन्सन् (Mr. Wilkinson) साहब ने इन्हें गणित में निपुण
देखकर, सिहोर नगर के सेवाराम ज्योतिषी के पास अध्ययन के लिए भेजा। वहाँ दो वर्ष तक रेखागणित आदि पढ़कर एजेण्ट विल्किन्सन साहब की अनुकम्पा से ता० १५ फरवरी, सन् १८४२ में गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज बनारस में इनकी नियुक्ति ज्योतिषा- ध्यापक पद पर हो गई। श्री पं० लज्जाशंकर के निधन के बाद ये प्रधान ज्योतिषशास्त्रा- ध्यापक नियुक्त किये गये। इन्होंने [मुद्रित] (१) रेखा गणित प्रथम अध्याय, (२) त्रिभुज गणित, (३) त्रिकोणमिति, (४) सायनवाद, (५) प्राचीन ज्योतिषशास्त्राचार्यों का आशय वर्णन, (६) १८ प्रकार के विचित्र प्रश्नों का सोत्तरसंग्रह, (७) तत्त्वविवेक परीक्षा [अमुद्रित], (८) काशी के मान मन्दिर यन्त्र का वर्णन, (९) दशमलवादि गणित, (१०) चलन कलन के सिद्धान्त मात्र ज्ञान के २० सिद्धान्त, चापीय त्रिकोण के कुछ सिद्धान्त, (१) ग्रन्थोपयोगी कुछ क्रोड पत्र, (१०) यन्त्र राजोपयोगी परिलेखादि, (१३) हिन्दी भाषा में पाठशालीय छात्रोपकार के लिए, बीजगणित, (१
( ८७ ) किया था । शक सम्बत ८८८ सन् ईसवी ९६६ चैत्र शुक्ल पञ्चमी गुरुवार के दिन इन्होंने (सृष्टि से सन् ९६५ तक के दिनों की संख्या) अहर्गण बनाया । इसी अहर्गण पर डा० श्री कर्न महाशय ने इन्हें 'भारतभूषण' की पदवी दिला दी थी । इन कारणों से इस बीच गणितज्योतिष पर विद्वानों की आस्था स्थिर एवं सुदृढ़ हो रही थी । महामहोपाध्याय पं० श्री सुधाकर द्विवेदी— गुरुणां गुरु महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी का जन्म सन् १८५५ ई० में वरुणा नदी के तट पर श्री काशी (खजुरी) में हुआ था । बाल्यावस्था में दुर्गादत्त जी से पाणि- नीय व्याकरण के अध्ययन के बाद त्रिस्कन्ध ज्योतिर्वित्ता श्री देवकृष्ण जी से लीलावती (ज्योतिष) पढ़ने लगे तथा महामहोपाध्याय श्री बापूदेव शास्त्री जी से गणित ज्योतिष का अध्ययन किया । इस प्रकार सन् १८५५ से १९१० ई० तक निरन्तर अध्ययन अध्यापन और गणित गोल के अनेक ग्रन्थों पर शोधपूर्ण व्याख्या, उपपत्ति के साथ-साथ संहिता होरा स्कन्धों पर भी सविशेष शोधात्मक सुव्याख्यान के साथ स्वरचित स्वतन्त्र ग्रन्थों से स्कन्ध त्रयात्मक ज्योतिष धरातल में तब से आजतक सुधाकर द्विवेदी का स्थान इकाई पर ही है। पं० बापूदेव शास्त्री जैसे विख्यात गणितज्ञ के सान्निध्य से तथा सरस्वती भवन के पुस्तकालय के कर्मचारी होने से भी, अनेक ग्रन्थों के अवलोकन मनन पठन आदि की गणित शास्त्र की विलक्षण प्रतिभा से विद्वानों को आकृष्ट करने वाली सुधाकर की असा- धारण प्रतिभा भी उन्हीं दिनों शास्त्रीय विवादों के गहन शास्त्रार्थों में यत्र तत्र सुनाई दे रही थी, एक अध्यापक के रूप में और दूसरे छात्र के रूप में शास्त्रीय संघर्ष उत्तरोत्तर वृद्धिगत था । श्री सुधाकर जी ने संस्कृत वाङ्मय के ज्योतिषशास्त्र का संस्कृत भाषा के माध्यम के साथ ही साथ हिन्दी भाषा की भी सराहनीय पाण्डित्यपूर्ण योग्यता प्राप्त करते हुए आँग्ल भाषा पर भी अपना पर्याप्त अधिकार कर लिया था । गणित ज्योतिष के सिद्धान्त ग्रन्थों के एक से एक नवीन परिष्कारों से इनके मस्तिष्क में एक अभेद्य गढ़-सा बन गया था । गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज के अध्यापक ज्योतिषियों से पढ़ने के बाद सभी छात्र इनके पास आने लग गए थे और इन्होंने सबको निःशुल्क पढ़ाने का कार्य आरम्भ कर दिया था । सुदूर, बंगाल, मिथिला, गुजरात, काश्मीर, नैपाल, कूर्माचल, प्रभृति देश देशान्तर के शिष्यों में सुधाकर जी कि शास्त्रीय गुरुगरिमा व्याप्त हो गयी थी । ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्त ग्रन्थों के अध्ययनाध्यापन के साथ उनका प्रकाशन भी प्रारम्भ हुआ । इस समय गवर्नमेण्ट क्वीन्स कालेज बनारस के गणित तथा अंग्रेजी के योग्य विद्वान् डा० जी थीबी महोदयजी थे । श्री सुधाकर ने अपने अदम्य उत्साह एवं
( ८८ ) अथक परिश्रम के परिणाम स्वरूप इंगलिश भाषा का भी अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त कर लिया था और तत्कालीन प्रौढ़ इंगलिश गणितज्ञों में श्री सुधाकर जी का परस्पर पौर्वात्य और पाश्चात्य गणितों की विवेचना भी हो जाया करती थी । इसी बीच ई० सन् १८८३ के राजकीय संस्कृत कालेज बनारस में ऐशिया की हस्त लिखित पुस्तकों की सबसे बड़ी लाइबरेरी (पुस्तकालय) ‘सरस्वती भवन’ में पं० सुधाकर जी की नियुक्ति पुस्तकालयाध्यक्ष पद पर हुई थी । ता० १६-२-१८८७ को महारानी विक्टोरिया जुबुली महोत्सव के अवसर पर इस महान् खगोल शास्त्री को महामहोपाध्याय पदवी से विभूषित किया गया था । सन् १८८९ में पं० बापूदेव शास्त्री के अवकाश ग्रहण के पश्चात् इनकी उत्तम वैदुष्य पूर्ण शास्त्र सेवा पुरस्कार में इन्हें उनके स्थान पर गणित का प्राध्यापक नियुक्त किया गया । बनारस क्वीन्स कालेज के गणित प्राध्यापक मिस्टर एम० एन० दत्त की नियुक्ति स्कूल इन्स्पेक्टर पद पर हो जाने से मैथमेटिक और इन्डियन ऐस्ट्रोनामी (Indian Astronomcy) के कक्षाओं को शिक्षण देने का गुरुतम कार्य (ऊँची कक्षाओं को गणित पढ़ाना) पं० सुधाकर जी को सौंपा गया था । पहिले इनके वेष भूषा से छात्रों को कुछ अश्रद्धा सी हुई, किन्तु पहिले ही दिन के पढ़ाने से सर्व साधारण आश्चर्य चकित हो गये, और तदनुसार छात्र समुदाय बड़ी सावधानी से दत्त चित्त होकर बड़ी श्रद्धा से इनकी कक्षाओं में जाकर गणित पढ़ने लगे । बगलबन्दी, धोती और पगड़ी के वेश में गणित की ऊँची कक्षाओं में ऊँचे स्तर के परिष्कारों के साथ पाठ पढ़ाने वाला यही एक भारतीय था, जो ग्रहगोल गणित का विद्वान् ज्योतिषी और काशी का एक प्रसिद्ध पण्डित था । इनसे गणित पढ़ कर छात्रों का गणित में परिश्रम करने में मन लगता था और प्रायः सभी छात्र अच्छी श्रेणियों में उत्तीर्ण होते थे । सम्भवतः इस समय ये सब परी- क्षाएँ कलकत्ता यूनीवर्सिटी से सम्बद्ध थीं । संस्कृत तथा हिन्दी वाङ्मय में सुधाकर द्विवेदी रचित ग्रन्थ (गणित ज्योतिष) सर्व प्रथम श्री सुधाकर जी के रचित व शोधित ग्रन्थों की एक सूची का पाठकों के समक्ष उपस्थित करना उचित होगा । (१) वास्तव विचित्र प्रश्नानि । (२) वास्तव चन्द्र शृङ्गोन्नतिः । (३) दीर्घवृत्त- लक्षणम् । (४) भाभ्रमरेखा निरूपणम् । (५) ग्रहणे छादकनिर्णयः । (६) यन्त्रराजः । (७) प्रतिभाबोधकः । (८) धराभ्रमे प्राचीन नवीनयोर्विचारः । (९) पिण्ड प्रभाकरः । (१०) सशल्यवाणनिर्णयः । (११) वृत्तान्तर्गत सप्तदश भुज रचना । (१२) गणक तर-
( ८९ ) ङ्किणी । (१३) दिङ्मीमांसा । (१४) द्युचरचारः । (१५) फ्रेंच भाषा से संस्कृत में बनाई हुई चन्द्रसारिणी तथा भौमादि ग्रहों की सारणी ७ खण्डों में (१६) १.१००००० लघुरिक्थ की सारिणी तथा एक एक कला की ज्यादिसारिणी । (१७) समीकरण मीमांसा (Theorey of Equetinos) दो भागों । (१८) गणित कौमुदी । प्राचीन आचार्यों के— सुधाकर द्विवेदी कृत भाष्य, टीका, उपपत्ति और अनेक मतो की मीमांसा के साथ परिष्कृत तथा तथ्य मत प्रदर्शन पूर्वक मुद्रित ग्रन्थ । (गणित ज्योतिष) (१७) वराहमिहिरकृत पञ्चसिद्धान्तिका । (१८) कमलाकर भट्ट विरचितः सिद्धान्त तत्वविवेकः । (१९) लल्लाचार्यकृतशिष्यधीवृद्धिदतन्त्रम् । (२०) करणकुतूहलः वासना विभूषण सहितः । (२१) भास्करीय लीलावती टिप्पणी सहिता । (२२) भास्करीय बीज- गणितं टिप्पणी सहितम् । (२३) वृहत्संहिता भट्टोत्पल टीका सहिता । (२४) ब्राह्मस्फुट- सिद्धान्तः स्वकृततिलक (भाष्य) सहितः । (२५) ग्रहलाघवः, स्वकृतटीका सहितः । (२६) याजुष ज्योतिषं सोमाकर भाष्य सहितम् । (२७) श्रीधराचार्यकृत स्वकृतटीका सहिता च त्रिशतिका । (२८) करण प्रकाशः सुधाकर कृत-उपपत्ति सहितः । (२९) सूर्य- सिद्धान्तः सुधाकरकृत सुधावर्षिणीसहितः । (३०) सूर्यसिद्धान्तस्य-एका बृहत्सारिणी तिथिनक्षत्रयोगकरणानां घटीज्ञापिका । उक्त ये ग्रन्थ सर्वत्र सुलभ होते हुये भी अब आज कठिनता से उपलब्ध हैं । इनका पुनर्मुद्रण आवश्यक है । हिन्दी भाषा में मुद्रित (गणित ज्योतिष) ग्रन्थ (३१) चलन कलन । (Defininition Calculus) (३२) चलराशिकलन । (Integral Calculus) (३३) ग्रहण । (३४) गणित का इतिहास । (३५) पञ्चाङ्ग विचार (३६) पञ्चाङ्ग प्रपञ्च तथा काशी की समय समय पर की अनेक शास्त्रीय व्यवस्था । आज भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी हो गई है । भारतेन्दु कविवर्य्य बाबू हरिश्चन्द्र के साथ-साथ म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी ने अपने समय में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की उच्च शब्दों में उद्घोषणा कर दी थी । तदनुसार द्विवेदी जी ने अपनी लेखनी को हृदय से हिन्दी की दिशा में भी घुमा कर निम्न लिखित कुछ ग्रन्थों को (अपने विशेष विचारों के साथ) मुद्रित किया था और अपनी मौलिक रचना से भी हिन्दी में ग्रन्थों को लिखा था । जैसे—(३७) भाषा बोधक प्रथम । (३८) भाषा बोधक द्वितीय भाग । (३९) हिन्दी भाषा का व्याकरण (पूर्वाद्धं) (४०) तुलसी सुधाकर (तुलसी सतसई पर कुण्डलियाँ) (४१) महाराज “माण्डाधीश” श्री रुद्रसिंह कृत रामायण का मुद्रण ।
( ९० ) (४२) "पद्मावत" १-३ खण्ड । (४४) माधव पञ्चक । (४४) राधाकृष्ण रामलीला (४५) तुलसीदास जी की विनय पत्रिका का संस्कृत में अनुवाद । (४६) श्री "भारतेन्दु" हरिश्चन्द्र की जन्म पत्री (नागरी प्रचारिणी में है । मुद्रित है ।) क्वीन्स कालेज बनारस में इस समय गणित की स्पेशल कक्षायें चलती थीं । मैथेमेटिक्स और इण्डियन ऐष्ट्रानामी (Indian Astronomey) की कक्षाओं की शिक्षण देने का गुरुतम कार्य श्री सुधाकर जी को ही सौंपा गया । वैदुष्य के गाम्भीर्य एवं उच्च- स्तर के लेक्चरों से प्रभावित होकर बड़े बड़े अंग्रेज भी द्विवेदी जी की गुण गरिमा पर भक्ति प्रदर्शित करने लगे थे । १६वीं शताब्दी से आज तक के ग्रहगणितज्ञों में सुधाकर द्विवेदी के ही शोधपूर्ण देन- अध्ययन अध्यापन ग्रन्थ लेखन, प्राचीन महत्त्व के अप्रकाशित ग्रन्थों का प्रकाशन, उनपर उनके अप्रतिम व्याख्यान जो विश्वविश्रुत हैं और प्रत्यक्ष भी हैं जिनका मुक्त कण्ठ से सभी भारतीय विद्वानों का हार्दिक से समादर आज भी होता आ रहा है । तदुपरि सुधाकर द्विवेदी की शिष्य परम्परा के प्रातः स्मरणीय मेरे पूज्य १०८ श्री गुरुचरण पं० बलदेव पाठकजी, गणित खगोल विद्या के अप्रतिम प्रभावशाली श्री पं० गेंदालाल चौधरी, गुरुजी के ज्येष्ठ सुपुत्र स्वर्गीय मेरे गुरुभाई श्री पं० गणेशदत्त पाठक, श्री पं० मुरलीधर झा, श्री पं० बलदेव मिश्र, पं० अच्युतानन्द झा प्रभृति प्रसिद्ध खगोल ग्रहगणितज्ञ जो इस संसार में भौतिक रूप से नहीं रह गये किन्तु यथोचित उन लोगों के शोधपूर्ण कतिपय ग्रन्थ भी प्रकाशित एवं उपलब्ध भी हैं । काश ! यह बीसवीं शताब्दी इस दिशाक्रम से क्यों विमुख हो गई यह शोचनीय है । ऐसे ग्रहखगोलज्ञ विश्वविख्यात उक्त सुधाकर जी की फलित ज्योतिष पर कितनी आस्था थी (नहीं थी) विज्ञ पाठक इनसे विरचित "गणकतरङ्गिणी" ग्रन्थ का अन्तिम भाग उपसंहार "आधुनिकाः ज्योतिर्विदः फलमात्रैकवेदिनः" देखकर समझ सकेंगे कि गणित स्कन्ध ज्ञानपूर्वक ही फलित का सदुपयोग होना चाहिए । (महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी के जीवन और कृतित्व के पूर्ण विवरण के सन्दर्भ में "म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी का जीवन एवं कृतियाँ" लेखक—केदारदत्त जोशी देखें ।) शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित— ज्योतिष विषय के आमूल चूड वेद, पुराण, श्रुति, स्मृति के आधार से सिद्धान्त, संहिता और होरा तीनों स्कन्धों का सुन्दर विवेचन श्री शङ्कर बालकृष्ण दीक्षितजी ने अपने 'भारतीय ज्योतिष' नामक रचित ग्रन्थ में किया है जो हिन्दी प्रकाशन ब्यूरो लखनऊ से प्रकाशित है और जिसमें प्रारम्भ से श्री पं० सुधाकर द्विवेदी तक के खगोल
( ११ ) विद्वान् गणितज्ञों एवं फलित ज्योतिषियों का भी इतिवृत्त वर्णित है। निःसन्देह में ज्योतिष के इतिहास आदि दृष्टि से पाठकों के लिए यह ग्रन्थ लाभाय है, साथ ही दीक्षित जी के अत्यन्त गहन अध्ययन और श्रम का परिचायक भी है । इस प्रकार से श्री भास्कराचार्य के पूर्व और परवर्ती ग्रह गणितज्ञों एवं फलित ज्योतिर्विदों के संक्षिप्त परिचय से विज्ञ पाठक अवश्य लाभान्वित होंगे । चिरप्रतीक्षित सिद्धान्तशिरोमणि 'ग्रहगोलाध्याय' भाग की सोपपत्तिक 'केदारदत्तः' व्याख्यान का हेतु इत्यादि भास्कराचार्य कृत समग्र “सिद्धान्त शिरोमणि” तथा इसका आचार्यकृत स्वयं का “वासना” भाष्य एवं साथ में आचार्य मुनीश्वर की “मरीचि” टीका जिसको मैं “खगोल ग्रह गणित का मरीचिभाष्य” कह रहा हूँ, यह सभी विषय संस्कृत भाषा के माध्यम से लिखे गये हैं। मेरी समझ से “मरीचिभाष्य” में समस्त ग्रन्थ का निशेष ग्रहगोल पाण्डित्य की उपलब्धि के अनन्तर किसी भी अन्य व्याख्यान की संस्कृत वाङ्मय में आवश्यकता नहीं है। फिर भी एक अनिवार्य अत्यन्त आवश्यकता थी भारत राष्ट्र की राष्ट्रभाषा “हिन्दी” माध्यम के एक बृहत्सोपपत्तिक व्याख्यान की । राष्ट्रभाषा “हिन्दी” अति जाग्रत हो चुकी है, सर्वतो वर्द्धमान है एवं सारे राष्ट्र में व्यापक होती हुई विश्व के अन्य देश-देशान्तरों में प्रसिद्धि पा रही है, इसमें सन्देह का स्थान नहीं है। अतएव संस्कृत वाङ्मय के ज्ञान भण्डार को राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से यत्र-तत्र सर्वत्र प्रचारित एवं प्रसारित करना अत्यन्त आवश्यक है, इसी सत्प्रेरणा से प्रेरित होकर उक्त ग्रन्थ के “मरीचि” संस्कृत भाष्य के बाद श्री भास्कराचार्य के खगोल ग्रहगणित के कौशलपूर्ण गूढ़ आशयों को हिन्दी माध्यम से “राष्ट्र को समर्पण किया जाय” इस प्रकार की ऐसी मेरी चिरप्रतीक्षित इच्छा थी, जो वार्धक्य के कठिन से कठिनतम समय से गुजरते हुये भी सफल हो रही है जिसे मैं श्रद्धारूपिणी माता अन्नपूर्णा और विश्वास का एकमात्र स्थल पिता रूप बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद समझता हूँ । “सौधाकरीय” गुरु परम्परा से अधीत इस ग्रन्थ की अति महत्त्व की गणित की उपपत्तियाँ इस युग के अध्ययनाध्यापन में लुप्त प्रायः हो चुकी हैं उन्हें आज राष्ट्रभाषा हिन्दी माध्यम से प्रकाश में लाकर उक्त ग्रन्थ का सोपपत्तिक हिन्दी “केदारदत्तः” व्याख्यान जो मननशील विज्ञ पाठकों के लिए सन्तोषप्रद और रुचिकर भी अवश्य होगा । ऐसी मेरी शुभ आशा से यह प्रकाशन सफल हो पा रहा है । ध्यान देने की बात है कि “सोपपत्तिक केदारदत्तः” व्याख्यान गुरुमुख से शिष्य- मुख तक का एक स्वतन्त्र व्याख्यान है जिसमें किसी भी व्याख्यान, व्याख्या और भाष्य
( ९२ ) का सहयोग नहीं लिया गया है, सहयोग है गुरु परम्परा के उन गुरुवर्यों का (गुरुणां गुरु म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी के शिष्य प्राच्य एवं धर्म संकाय, का० हि० वि० वि० के प्रातः स्मरणीय श्री १०८ पूज्य गुरुचरण पं० बलदेव पाठक एवं १०८ गुरु श्री राम- यत्न ओझा) जिनका भौतिक शरीर आज तो नहीं है किन्तु जो मेरे मानस मन्दिर में उनका भौतिक रूप और उनका अशेष खगोल पाण्डित्य आज तक पूर्णरूपेण मेरी बुद्धि में विद्यमान है, जैसा उन्होंने पढ़ाया था तदनुसार इस स्मृति के साथ ही अपने बौद्धिक ज्ञान, उपपत्तियों, तर्कों के साथ केदारदत्त की यह लेखनी सोपत्तिक "केदारदत्तः" व्याख्यान लिखने में सफल हुई है । भास्कराचार्य के सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ प्रकाशन का बीज मेरी बुद्धि में अध्ययन काल से ही अङ्कुरित हो गया था । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या संकाय में ज्योतिष गणित सिद्धान्त के अध्ययन के उपरान्त ब्रह्मर्षि महामना पं० मदनमोहन मालवीय (कुलपति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) ने गुरुवर्य पू० पं० बलदेव पाठक प्राध्यापक ज्योतिष विभाग के सुझाव पर अनेक साम्प्रदायिक राजनीतिर्यों का सामना करते हुए भी मेरी नियुक्ति प्राच्य विद्या संकाय के ज्योतिष विभाग में १३ सितम्बर १९३८ में की । तत्पश्चात् अनेक असोढ्य संकटों का सामना करते हुए तथा गणित ज्योतिष में शोध आदि भूरिश्रम के कार्यों को करते हुए सिद्धान्तशिरोमणि (ग्रहगणिता- ध्याय) की सोपपत्तिक "दीपिका" (संस्कृत) एवं "शिखा" (हिन्दी) व्याख्यान मैंने लिखी, जिसका प्रकाशन व्यय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं केन्द्रीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हुआ । समग्र यह ग्रहगणिताध्याय का प्रकाशन तीन भागों में हो सका है । प्रथम भाग में मध्यमाधिकार, द्वितीय भाग में स्पष्टाधिकार से त्रिप्रश्नाधिकार तथा तृतीय भाग में पर्व सम्भव से पाताधिकार तक के विषयों का वर्णन है । प्रथम भाग का प्रकाशन सन् १९६१ एवं द्वितीय, तृतीय भाग का प्रकाशन सन् १९६४ में हुआ है । ज्योतिष विभाग, का० हि० वि० वि० में गणित ज्योतिष सिद्धान्त के आचार्य तक के छात्रों को सपरिष्कार ग्रन्थों के अध्यापन के साथ "सिद्धान्तशिरोमणि" के "ग्रह- गणिताध्याय" भाग का प्रकाशन हो सका था । इस प्रकाशन से राष्ट्र में ज्योतिष गणित शास्त्रानुरागी समाज को सन्तोष हुआ और मेरे प्रति गणित ज्योतिष के शिष्य एवं विज्ञ पाठक वर्ग ने हार्दिक श्रद्धा प्रकट करते हुये यत्र तत्र सर्वत्र से श्री भास्कराचार्य के "सिद्धान्तशिरोमणि" के "ग्रहगोलाध्याय" का भी वैज्ञानिक पद्धति की भाँति से व्याख्यान लिखने का अनुरोध किया । किन्तु जन्मजात शारीरिक रोग से पीड़ित एवं अनेक अन्य कठिनाइयों के कारण "ग्रहगोलाध्याय" की सोपपत्तिक व्याख्यान न लिख सका था । जबकि इस बीच फलित ज्योतिष के अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का सोपपत्तिक
( ९३ ) व्याख्यान मैंने किया एवं ज्योतिष जगत में उसे सराहा भी गया और उनके दूसरे, तीसरे संस्करण भी प्रकाशित हुये और हो रहे हैं। फिर भी “ग्रहगोलाध्याय” के सोप- पत्तिक व्याख्यान न हो पाने से भीतर ही भीतर मानसिक वेदना से दुःखी तो था हो और ऐसी वार्धक्य की स्थिति में इस अधूरे कार्य को कैसे पूरा किया जाय, सोचकर ही रह जाता था। विकट की ऐसी स्थिति में मेरे तृतीय पुत्र दिनेश जोशी (एम० ए०) ने बारम्बार मुझसे कहा और अनुरोध किया कि इस कार्यं को अवश्य पूरा कर दें। चि० दिनेश के बार-बार कहने एवं अनुरोध करने पर एकाएक इस ओर प्रवृत्त हो गया एवं चि० दिनेश जिसे मैं पूर्ण शुभाशीर्वाद देता हूँ क्योंकि उसी के पूर्ण सहयोग से ५-६ मास में पाण्डुलिपि तैयार हो गई। तत्पश्चात् मोतीलाल बनारसी दास (दिल्ली, पटना, मद्रास, वाराणसी) के सहयोग से यह प्रकाशन प्रकाशित हो सका। यह माता अन्नपूर्णा एवं बाबा विश्वनाथ तथा गुरुवर्यों और पूज्य पूर्वजों का ही शुभाशीर्वाद कहा जावेगा। अशीति (८०) वर्ष के जर्जर शरीर के इस वार्धक्य में पदे-पदे स्मृति क्षीणता, इन्द्रियों की अतिशिथिल गति के बावजूद यह प्रकाशन हो जाने से अवश्य मेरी मनस्तुष्टि हो गई है। निश्चय ही इस प्रकार के इस प्रकाशन में मेरी कुलपरम्परा के महान् ज्योतिर्विद पूर्वजों का और स्थान, ग्राम, वास्तु एवं कुलदेवी और कुलदेवों की (विशेषतः मेरे जन्मस्थान कूर्माचल 'जुनायल' ग्राम, अल्मोड़ा, उ० प्र०) जो आध्यात्मिक देन आज तक मुझे मिल रही हैं वह एक रहस्य है, जिसका व्याख्यान मनोऽन्तर्गत ही हैं, यह सफल आशीर्वाद जीवन के अन्तिम क्षणों तक मुझे मिलेगा ही। अतः पुनरपि उक्त परम्परा को बारम्बार कोटिशः प्रणाम करते हुये, अनेक ग्रन्थों के लेखक अपने द्वितीय अग्रज एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सुयोग्य विद्वान् छात्र स्वर्गीय श्री पं० हरिशङ्कर जोशी साहित्याचार्य, एम० ए० जिन्हें उनके प्रसिद्ध “वैदिकविश्वदर्शन” ग्रन्थ पर प्रसिद्ध “मङ्गलाप्रसाद पुरस्कार” भी प्राप्त हुआ था, उनके चरणों में यह कृति सादर समर्पण करते हुये उन्हें अपनी श्रद्धा भक्ति से स्मरण कर रहा हूँ। उन्हीं की प्रेरणा से सुदूर अल्मोड़ा जनपद के ज्योतिर्विदों से संसेवित प्रसिद्ध 'जुनायल' ग्राम से स्वर्गीय पूज्य मेरे पिता ज्योतिर्विद पूज्य श्री १०८ श्री पं० हरिदत्त जोशी ने मुझे काशी में गणित ज्योतिर्विद्या के अध्ययन के लिये उन्हीं के चरणों में भेजा था। वैदुष्य कुल परम्परा की इस अनुपम देन को बारम्बार स्मरण करते हुये आशा करता हूँ कि यह ज्ञानलता अन- वरत वर्द्धमान होती रहेगी। राष्ट्र के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर श्री “जयन्त नार्लीकर” (खगोल भौतिकी विभाग, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, बम्बई) ने प्रस्तुत ग्रन्थ के महत्व को समझकर अपने निष्पक्ष विचारों से ग्रन्थ को सुशोभित किया है, अतएव उन्हें हार्दिक शुभाशीर्वाद के साथ धन्यवाद देता हूँ। साथ ही मैं अपने ज्येष्ठ अभिन्न मित्र श्री पण्डित
( ९४ ) शिवनन्दन लाल जी दर (पूर्व कुल सचिव, का० हि० वि० वि०) का आभारी हूँ, क्योंकि उनसे मुझे निरन्तर ज्योतिष गणित आदि के शोधपूर्ण कार्यों को करने की प्रेरणा मिलती रही है। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रूफ शोधन का कार्य साहित्याचार्य श्री पण्डित जनार्दन पाण्डेय जी ने बड़े श्रम से किया है, अतएव उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर मनस्तोष करता हूँ। ग्रन्थ के सोपपत्तिक व्याख्यान लिखने में अपने चतुर्थपुत्र श्री तारकेशचन्द्र जोशी (आचार्य ज्योतिष) के लगन से अध्ययनाध्यापन में उत्पन्न शंका समाधान में ग्रहगणित खगोल विषय के समन्वयात्मक रुचिकर शास्त्रार्थ से जो सहयोग प्राप्त हुआ, उसके लिए हृदय से आशीर्वाद देकर आशा करता हूँ वह वंशपरम्परागत इस विद्या के शोधपूर्ण विवर्धन में अग्रसरित होते रहेगा। साथ ही श्लोकानुक्रमणिका बनाने में मेरे दौहित्र चि० आशीष पंत ने सहयोग दिया, अतः उसे शुभाशीर्वाद देता हूँ कि वह सुयोग्य विद्यार्थी बनेगा। दीर्घकाल से बुद्धिगत प्रस्तुत ग्रन्थ प्रकाशन की मेरी प्रबल इच्छा रही है जो आज इस अतिकठिन वार्धक्य में सफल हो रही है, इसे मैं अपना अहोभाग्य मानता हूँ। वार्धक्य अवस्था की विस्मृतियों के बाहुल्य के बावजूद यह प्रकाशन सत्पात्र शिष्य वर्ग एवं विज्ञ पाठकों के लाभाय होगा, शुभाशावादी होकर मुझे परम सन्तोष की अनुभूति हो रही हैं। पाठकवृन्द विस्मृतियों और त्रुटियों पर अवश्य ध्यान देंगे एवं सूचित करेंगे जिससे भविष्य के संस्करणों में विशेष स्वच्छता आती रहेगी। इस ग्रन्थ प्रकाशन के स्रोत श्री विश्वेश्वर राजधानी श्री काशी के बाबा विश्वनाथ एवं माता अन्नपूर्णा का बारम्बार स्मरण करता हूँ क्योंकि 'देव' शब्द की सार्थकता का यही एक मूर्त्तरूप है, कहा भी गया है— "महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरास्तुतिः । अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥" गुरु तत्त्व के विचार में जीवन की इति श्री हो रही है, मात्र एक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु ही नहीं अपि वे ब्रह्माण्ड गुरु और ब्रह्माण्ड नायक हैं, इसलिये "ग" कार को ज्ञानसम्पत्ति, "र" कार को प्रकाशपुञ्ज "उ" कार को शिव तादात्म्य भी कहा गया है— "ग" कारो ज्ञान सम्पत्तौ "रे" फस्तत्र प्रकाशकः । "उ" कारः शिवतादात्म्यम् गुरुरित्यभिधीयते ॥ गुरु के साथ शिष्य का समवाय सम्बन्ध है— "शरीरमर्थप्राणांश्च सद्गुरुभ्यो निवेद्य यः । गुरुभ्यः शिक्षते योगं शिष्य इत्यभिधीयते ॥"
( ९५ ) इस प्रकार गुरु शिष्य की यह शाश्वत की एकत्व की चिरस्थायिनी यह भावना “महेश” शब्द में ही निहित है— “मनोदोषादि दूरत्वाद्धेतुवादादि वर्जनात् । श्वादिप्राणिषु सादृश्यात् रम्यत्वाच्च महेश्वरः ॥” इस प्रकार जीवमात्र की एकत्व रूप ज्ञान की यह सद्भावना इसी श्री काशी क्षेत्र में जीव मात्र को प्राप्त होकर जीवन्मुक्ति इसी काशी क्षेत्र हुई है और होती रहती हैं और होती भी रहेगी । अत एव यह काशी नगरी धन्य है । इस श्री काशी नगरी में यह लेखनी सार्थक हो रही है और सार्थकता का एकमात्र उपाय यही है कि— “स्नातव्यं जाह्नवीतोये द्रष्टव्यः पार्वतीपतिः । स्मर्तव्यः कमलाकान्तो वस्तव्यं काशिकास्थले” ॥ एवं— पेयं पेयं श्रवणपुटकैः रामनामाभिरामम् । ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् ॥ जल्पन् जल्पन् प्रकृति विकृतौ प्राणिनां कर्णमूले । वीथ्यां वीथ्यामटति जटिलः कोऽपि काशी निवासी ॥ यहाँ पर “कोऽपि” शब्द की व्याख्या असीमित है । मन, वाणी, बुद्धि से इस शब्द का व्याख्यान असम्भव है । ऐसे अनिर्वचनीय मात्र महान तत्व को “शिव शिवेति शिवेति च” से उच्चारित किया जाता है । धन्य है ऐसा ‘अनिर्वचनीय’, ‘समदर्शी’, ‘अघोर’, ‘कीनाराम’, ‘शिव’ तत्व । उक्त आशय को प्रतिक्षण स्मरण करते हुए शेष जीवन की सार्थकता का एकमात्र भरोसा अघोर रूप बाबा विश्वनाथ को समझ कर यह लेखनी और यह लेखक दोनों विश्राम की कामना कर रहे हैं । इति-शम् हरि-हर्ष निकेतन केदारदत्त जोशी १/२८, नगवा (नलगाँव) ज्योतिषशास्त्राचार्य श्रीकाशी, वाराणसी उ० प्र० ( गणित + फलित ) संवत् २०४५ गुरुवार अवकाश प्राप्त प्राध्यापक अधिक ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ता० २-६-१९८८ वाराणसी
॥ श्रीः ॥ ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः । श्रीभास्कराचार्यविरचिते सिद्धान्तशिरोमणौ गोलाध्यायः वासनाभाष्यमरीचिसंस्कृतटीकासमलङ्कृतः तथा च केदारदत्ताख्यहिन्दीव्याख्योपपत्तिसहितः गोलाध्याये निजे या या अपूर्वा विषमोक्तयः । तास्ता बालावबोधाय संक्षेपाद्विवृणोम्यहम् ॥ वासनाभाष्यम्—गोलग्रन्थो हि सविस्तरतया प्राञ्जलः । किन्त्वत्र या या अपूर्वा नान्यैरुक्ता उक्तयो विषमास्तास्ताः संक्षेपाद्विवृणोमि । अत्र या या इति प्रथमान्तं पदं तास्ता इति द्वितीयान्तं पदं बुद्धिमता व्याख्येयम् । केदारदत्तः—सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के ग्रहगणिताध्याय में जिन कठिन विषयों में स्पष्ट रूप के बावजूद जो अन्य विशेष परिष्कार हो सकते हैं उन विषयों की विशेष कठिन उक्तियों का संक्षेप से यहाँ बालबोधाय विवरण किया जा रहा है । यहाँ पर बाल शब्द से अवस्था का बालक न समझ कर अनधीत गणित गोलशास्त्र वञ्चित बुद्धि के युवा या वृद्ध पुरुष के लिये बाल शब्द का प्रयोग हुआ है । तत्राऽऽदौ तावदभीष्टदेवतानमस्कारपूर्वकं गोलं ब्रवीमीत्याह— सिद्धिं साध्यमुपैति यत्स्मरणातः क्षिप्रं प्रसादात्तथा यस्याश्चित्रपदा स्वलंकृतिरलं लालित्यलोलावती । नृत्यन्ती मुखरङ्गगेव कृतिनां स्याद्भारती भारती तं तां च प्रणिपत्य गोलममलं बालावबोधं ब्रुवे ॥१॥ वा० भा०—ब्रुवे वच्मि । कः । कर्ताऽहं भास्करः । किम् । गोलं गोलाध्या- यम् । किविशिष्टम् । अमलं निर्दूषणम् । पुनः किंभूतम् । बालावबोधम् । अविष- ममित्यर्थः । किं कृत्वा । प्रणिपत्य । प्रणिपातपूर्वकं नमस्कृत्य । कम् । तम् । न केवलं तम् । तां च । स कः । सा च का । तदाह । यस्य देवस्य स्मरणात् पुंसां साध्यमभीष्टं क्षिप्रं शीघ्रं सिध्यति सोऽर्थाद्विघ्नराजः । तथा यस्या देव्याः प्रसा-