सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
आवरणविभवस्वरूप-विचार] भाषानुवादसहित १७५
दूरस्थवृक्षे आप्तवाक्यात् परिमाणविशेषावगमेऽपि तद्विपरीतपरिमाणविक्षेप- दर्शनाच्च विषयगताज्ञानानिवृत्तावपि पुरुषगताज्ञाननिवृत्तिरस्त्येव। 'शास्त्रार्थं न जानामि' इत्यनुभूताज्ञानस्य तदुपदेशानन्तरं निवृत्त्यनुभवात्। अत एव 'अनुमेयादौ सुषुप्तिव्यावृत्तिः' इति विवरणस्य तद्विषयाज्ञाननिवृत्तिरर्थ इत्युक्तं तत्त्वदीपने इति।
अन्ये पौरुषमज्ञानमाहुः शक्तिद्वयाश्रयम्। परोक्षज्ञानतस्तत्राऽऽवरणांशपरिक्षयम् ॥ ८९ ॥
कोई लोग कहते हैं कि पुरुषवृत्ति एक ही अज्ञान आवरण और विक्षेप रूप दो शक्तियोंसे युक्त है, उनमें से परोक्षज्ञानसे आवरणांशका विनाश होता है ॥ ८९ ॥
अत्यन्त आवश्यक हैं। दो प्रकारके अज्ञान होनेपर और परोक्षस्थलमें वृत्तिका निर्गम न होनेसे दूर देशमें स्थित वृक्षमें शिष्टके * वाक्यसे परिमाणविशेषका अवगम होनेपर भी उस परिमाणसे विपरीत परिमाणरूप (अल्पपरिमाणरूप) विक्षेप देखा जाता है, अतः विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति न होनेपर भी पुरुषगत अज्ञानकी निवृत्ति होती ही है। क्योंकि 'मैं शास्त्रार्थको † (शास्त्रोक्त अर्थको) नहीं जानता हूँ' इस प्रकार अनुभूत शास्त्रार्थके अज्ञानकी शास्त्रके अर्थके उपदेशके अनन्तर निवृत्ति होती है, ऐसा अनुभव होता है। इसीसे 'अनुमेयादौ सुषुप्तिव्यावृत्तिः' इस विवरणका तत्त्वदीपनमें यह अर्थ कहा है कि अनुमेय आदि विषयमें अनुमिति आदि परोक्ष ज्ञानसे (पुरुषगत) अज्ञानकी निवृत्ति होती है।
* भाव यह है कि किसी शिष्ट पुरुषने कहा कि दूरस्थ वृक्ष छोटा नहीं है, किन्तु समीपके वृक्षके समान बड़ा है, इस वाक्यसे जो ज्ञान होगा, वह परोक्ष होगा। उससे यदि विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति मानी जाय, तो विपरीत परिमाणकी जो दूरस्थ वृक्षमें उपलब्धि होती है, वह नहीं होगी, अतः उससे पुरुषगत अज्ञान ही निवृत्त होता है।
† इसका यह भाव है—'मैं शास्त्रके अर्थको नहीं जानता हूँ' इस वाक्यसे अनुभूत अज्ञानकी शास्त्रार्थके उपदेशके अनन्तर 'शास्त्रार्थका अज्ञान अब निवृत्त हुआ' इस प्रकार अज्ञान निवृत्तिका अनुभव होता है। शास्त्रका अर्थ दो प्रकारका है—धर्मरूप और ब्रह्मरूप। धर्मरूप जो शास्त्रका अर्थ है उसमें उपदेशजन्य ज्ञान परोक्ष ही है, अपरोक्ष नहीं है, इसलिए धर्मरूप विषयमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग नहीं है। अतः वहां पुरुषगत अज्ञानकी निवृत्ति होती है, यह कहना होगा। उपदेशजन्य ब्रह्मरूप अर्थमें भी परोक्षज्ञान होता है अन्यथा मनन आदिके विधानकी असङ्गति होगी, वह भी पुरुषगत अज्ञानकी ही निवृत्ति करेगा। अतः परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तन नहीं करता है, यह कहना असङ्गत है।
| १७६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अन्ये तु—नयनपटलवत् पुरुषाश्रितमेवाऽज्ञानं विषयावरणम् । न तदतिरेकेण विषयगताज्ञाने प्रमाणमस्ति । न च पुरुषाश्रितस्य विषयगतविक्षेपपरिणामित्वं न सम्भवति । तत्संभवे वा दूरस्थवृक्षपरिमाणे परोक्षज्ञानादज्ञाननिवृत्तौ विपरीतपरिमाणविक्षेपो न सम्भवतीति वाच्यम्, वाचस्पतिमते सर्वस्य प्रपञ्चस्य जीवाश्रिताज्ञानविषयीकृतब्रह्मविवर्तत्वेन तद्वच्छुक्तिरजतादेः पुरुषाश्रिताज्ञानविषयीकृतब्रह्मविवर्तत्वोपपत्तेः । परोक्षवृत्त्या एकावस्थानिवृत्तावपि अवस्थान्तरेण विपरीतपरिमाणविक्षेपोपपत्तेश्चेत्याहुः ।
कुछ लोग कहते हैं कि जैसे नेत्रमें रहनेवाले पटल (काचादि दोष) विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषगत अज्ञान ही विषयको आवृत करता है, इससे भिन्न विषयगत अज्ञानमें प्रमाण नहीं है । परन्तु यदि 'एक ही पुरुषगत अज्ञान माना जाय, तो वह विषयगत विक्षेपका परिणामी—उपादान—नहीं होगा । यथा कथंचित् पुरुषगत अज्ञानके विषयगत विक्षेपके उपादान होनेपर भी दूर देशवर्ती वृक्षके परिमाणमें आप्त (सच्चे) पुरुषके उपदेशसे जन्य ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उत्पत्ति नहीं होगी' इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि * वाचस्पतिमिश्रके मतमें सम्पूर्ण प्रपञ्च जीवमें रहनेवाली अविद्याके विषय ब्रह्मका विवर्त है, अतः पुरुषगत अज्ञानके विषय ब्रह्मके शुक्ति-रजत आदि विवर्त हो सकते हैं । † परोक्ष वृत्तिसे एक अवस्था (आवरण) की निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अन्य अवस्थासे विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उपपत्ति हो सकती है ।
* तात्पर्य यह है कि यदि शुक्ति-रजत आदि अज्ञानके परिणाम माने जायँ, तो अज्ञानको अवश्य विषयचैतन्यगत मानना चाहिए । और वे अज्ञानके परिणाम न माने जायँ, तो अज्ञानको विषयचैतन्यगत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । दार्ष्टान्तिकमें अर्थात् 'पुरुषाश्रित' इत्यादिमें ब्रह्मपद शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप अर्थमें प्रयुक्त है, पूर्ण ब्रह्मरूप अर्थमें प्रयुक्त नहीं है । क्योंकि अवच्छिन्न चैतन्य ही शुक्तिरजत आदिका अधिष्ठान है ।
† जैसे परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति अनुभूत होती है, वैसे ही दूरस्थवृक्षस्थलमें परोक्षज्ञान होनेपर भी विपरीत परिमाणकी उत्पत्ति भी अनुभूत होती है, अतः दो अनुभवोंके आधारपर पुरुषवृत्ति अज्ञानका एक देश परोक्षज्ञानसे निवृत्त होता है और अन्य देश अनुवृत्त होता है, ऐसी कल्पनाकी जाती है, दो प्रकारका अज्ञान है, ऐसी कल्पना नहींकी जाती, क्योंकि ऐसा माननेमें गौरव है । वस्तुतस्तु परोक्षज्ञानको अज्ञानका
आरणाभिगव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १७७
विषयस्थं परे मोहं मूलाज्ञानांशरूपकम् ।
अंशांशिनोरभेदाच्च साक्षिणा तस्य सङ्गतिम् ॥ ९० ॥
विषयमें रहनेवाला अज्ञान मूलाज्ञानका अंशरूप है, और उसीका साक्षीके साथ सम्बन्ध होता है, क्योंकि अंश और अंशीका अभेद होता है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ९० ॥
अपरे तु—शुक्तिरजतादिपरिणामोपपत्त्याञ्जस्याद् विषयावगुण्ठनपटवत् विषयगतमेवाऽज्ञानं तदावरणम् । न च तथा सति अज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेण ततः प्रकाशानुपपत्तिः, परोक्षवृत्तिनिवर्त्यत्वासम्भवश्च दोष इति वाच्यम्, अवस्थारूपाज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेऽपि तत्संसृष्टमूलाज्ञानस्यैव 'शुक्तिमहं न
कुछ लोग कहते हैं कि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिका सामञ्जस्य हो, इसलिए विषयको आवृत्त करके रहनेवाले पटके समान विषयगत ही अज्ञान विषयका आवरण करता है ‡। विषयावरक अज्ञानके विषयगत होनेपर साक्षीके साथ अज्ञानका सम्बन्ध न होनेसे साक्षीसे अज्ञानका प्रकाश नहीं होगा और परोक्ष वृत्तिका विषयदेशमें गमन न होनेसे उससे उसकी निवृत्ति भी नहीं होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानका साक्षीके साथ सम्बन्ध भले ही न हो, परन्तु 'शुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ'
निवर्तक माना जाय, तो भी प्रतिबन्धकरहित परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा ही स्वीकार करना चाहिए । प्रकृतमें भ्रमके अनुरोधसे दूरत्व आदि दोषोंसे प्रतिवद्ध होनेके कारण आप्तवाक्यजन्य भी ज्ञान पुरुषगत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, अतः विपरीत परिमाणकी उपपत्ति और अनुपपत्तिकी शङ्का नहीं है, यह भाव है।
‡ पूर्वमें अप्रतिबद्ध ज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमके अनुसार अव्यभिचारके लिए परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक है, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। अब 'अपरे तु' ग्रन्थसे 'अप्रतिबद्ध अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमका अङ्गीकार करके परोक्षज्ञानमें व्यभिचारशङ्काका निरास करते हैं। तात्पर्य यह है कि लोकमें घट आदि मृत्तिकाके परिणामी देखे जाते हैं, इसी प्रकार शुक्तिरजत आदि भी किसीके परिणाम हैं, ऐसा मानना चाहिए। उनका परमाण्वन्वय और व्यतिरेकसे अज्ञान ही सिद्ध होता है, क्योंकि प्रातिभासिक शुक्तिरजतके प्रति शुक्ति आदि उपादान नहीं हो सकते हैं, जैसे शुक्तिद्वारा विषयचैतन्यगत अज्ञान रजत आदि विक्षेपके प्रति उपादान सिद्ध हो सकता है, वैसे पुरुषवृत्ति अज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए विषयगत अज्ञान ही अवस्थारूप है। यद्यपि पुरुषगत अज्ञान प्रभान्यायसे रजत आदिके प्रति उपादान हो सकता है, तथापि यह युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे मूलाज्ञानमें क्रिया नहीं होती है, वैसे ही अवस्थारूप अज्ञानमें भी क्रिया नहीं होती, अतः प्रभान्यायका प्रसङ्ग नहीं हो सकता है।
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१७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
जानामि' इति प्रकाशोपपत्तेः । शुक्त्यादेरपि मूलाज्ञानविषयचैतन्याभि- न्नतया तद्विषयत्वानुभवाविरोधात् ।
विवरणादिषु मूलाज्ञानसाधनप्रसङ्गे एव 'इदमहं न जानामि' इति प्रत्यक्षप्रमाणोपदर्शनाच्च । 'अहमज्ञः' इति सामान्यतोऽज्ञानानुभव एव मूला- ज्ञानविषयः । 'शुक्तिमहं न जानामि' इत्यादिविषयविशेषालिङ्गिताज्ञानानु- भवस्त्ववस्थाऽज्ञानविषय इति विशेषाभ्युपगमेऽप्यवस्थाऽवस्थावतोर्भेदेन मूलाज्ञानस्य साक्षिसंसर्गाद्वा साक्षिविषयचैतन्ययोः वास्तवैक्याद्वा विषयगत- स्याऽप्यवस्थाऽज्ञानस्य साक्षिविषयत्वोपपत्तेः । परोक्षज्ञानस्याऽज्ञानानिवर्त-
इत्यादि अनुभवसे साक्षिसंसृष्टमूलाज्ञानका ही प्रकाश होता है । शुक्ति आदिका भी मूलाज्ञानके विषयीभूत चैतन्यके साथ अभेद होनेसे शुक्त्यादिविषयत्वके अनुभवमें विरोध नहीं है ।
और विवरण आदि ग्रन्थोंमें मूलाज्ञानके साधनके प्रसङ्गमें ही 'इदमहं न जानामि' ( इसे मैं नहीं जानता हूँ ) इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाणका उपन्यास भी किया है । * 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार सामान्यतः अज्ञानका अनुभव ही मूलाज्ञानका अवगाहन करता है । 'शुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ' इत्यादि जो किसी विषयविशेषसे युक्त अज्ञानका अनुभव होता है, वह तो अवस्थारूप अज्ञानका अवगाहन करता है, इस प्रकार विशेषका यदि स्वीकार किया जाय, तो भी अवस्था और अवस्थावान्का तादात्म्य होनेके कारण मूलाज्ञानका साक्षीके साथ साक्षात् सम्बन्ध होनेसे अथवा साक्षिचैतन्य और विषयचैतन्यका वस्तुतः ऐक्य होनेसे विषयगत अज्ञानमें भी साक्षात् साक्षीके विषयत्वकी उपपत्ति हो सकती है । यद्यपि परोक्ष-
* 'अहमज्ञः' यही अनुभव सामान्य मूलाज्ञानका साधक है और 'शुक्तिं न जानामि' (मैं शुक्ति नहीं जानता हूँ ) इत्यादि अनुभव अवस्थारूप अज्ञानका ही साधक है, विवरणकारने 'शुक्तिं न जानामि' इत्यादि प्रतीति मूलाज्ञानके साधक प्रकरणमें कही है, अतः वह मूलाज्ञानका साधन करती है अवस्थारूप अज्ञानका साधन नहीं करती, यह नहीं कह सकते, क्योंकि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिका लिए अवस्थारूप अज्ञानकी सिद्धिकी अपेक्षा होनेसे मूलाज्ञानके साधनप्रकरणमें भी उसका प्रसङ्ग है । इससे 'शुक्तिं न जानामि' इत्यादि अनुभवोंके मूलाज्ञानविषयत्वमें प्रमाण न होनेसे विषयगत अवस्थारूप अज्ञानकी सिद्धि होगी, इस परिस्थितिमें उसका साक्षीके साथ सम्बन्ध न होनेसे उसका अनुभव नहीं हो सकता, इस आशयवाली शङ्काका अनुवाद करते हैं; 'अहमज्ञः' इत्यादि ग्रन्थसे ।
आवरणाभिभव-स्वरूपविचारं] भाषानुवादसहितं १७९
कत्वेऽपि ततस्तन्निवृत्त्यनुभवस्य सत्तानिश्चयरूपपरोक्षवृत्तिप्रतिबन्धकप्रयुक्ता-
ननुभवनिबन्धनभ्रान्तित्वोपपत्तेः अपरोक्षज्ञानस्यैवाऽज्ञाननिवर्तकत्वनियमा-
भ्युपगमादित्याहुः ।
सुखादिगोचरा वृत्तिर्ननु नाऽज्ञानघातिनी ।
मैवम्, मोहसुखादीनां साक्षिवेद्यत्वनिर्णयात् ॥९१॥
मुख आदिको विषय करनेवाली वृत्ति अज्ञानकी निवृत्ति नहीं करती इस प्रकार
शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि अज्ञान, सुख आदिमें केवल साक्षीवेद्यत्वका ही
निर्णय किया गया है, अतः वृत्तिरूप अपरोक्ष ज्ञान अवश्य अज्ञानका निवारण
करता है ॥ ९१ ॥
ननु नाऽयमपि नियमः, अविद्याऽहङ्कारसुखदुःखादितद्धर्मप्रत्यक्षस्याऽ-
ज्ञाननिवर्तकत्वानभ्युपगमादिति चेत्, न; अविद्यादिप्रत्यक्षस्य साक्षि-
रूपत्वेन वृत्तिरूपापरोक्षज्ञानस्याऽऽवरणनिवर्तकत्वनियमानपायात् ॥१३॥
कः साक्षी ? तत्र कूटस्थदीपे कूटस्थचित् स्वयम् ।
स्वाध्यस्तदेहयुग्मादेः साक्षीति प्रतिपादितः ॥९२॥
साक्षी कौन है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कूटस्थदीपमें प्रतिपादन किया गया है कि
स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अधिष्ठानभूत कूटस्थचैतन्य ही स्वयं साक्षी है ॥ ९२ ॥
ज्ञान अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्तिका जो
अनुभव होता है, वह, सत्तानिश्चयरूप परोक्ष वृत्ति जो प्रतिबन्धक है उससे
प्रयुक्त अज्ञानका अनुभव न होनेसे, भ्रान्तिमात्र है, अतः अपरोक्ष ज्ञान ही
अज्ञानका निवर्तक है, ऐसा नियम ही स्वीकार किया गया है ।
कोई लोग शङ्का करते हैं कि अविद्या, अहङ्कार, सुख, दुःख आदि
अहङ्कारके धर्मोंका प्रत्यक्ष अज्ञानका निवर्तक नहीं माना गया है, अतः अप्रति-
बद्ध अपरोक्षज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, यह नियम भी नहीं बन सकता है,
परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिरूप अपरोक्षज्ञान अज्ञानावरणका निवर्तक
है, ऐसा नियम है और अविद्या आदिका प्रत्यक्ष साक्षिरूप है, अतः उक्त
नियममें कोई व्याघात नहीं है ॥ १३ ॥
| १८० | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ प्रथम परिच्छेदं |
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अथ कोऽयं साक्षी जीवातिरेकेण व्यवह्रियते ?
अत्रोक्तं कूटस्थदीपे—देहद्वयाधिष्ठानभूतं कूटस्थचैतन्यं स्वावच्छेदकस्य देहद्वयस्य साक्षादीक्षणान्निर्विकारत्वाच्च साक्षीत्युच्यते । लोकेऽपि ह्यौदासीन्यबोधाभ्यामेव साक्षित्वं प्रसिद्धम् । यद्यपि जीवस्य वृत्तयः सन्ति देहद्वयभासिकाः, तथाऽपि सर्वतः प्रसृतेन स्वावच्छिन्नेन कूटस्थ-
अब शङ्का करते हैं कि जीवभिन्न जो साक्षीका व्यवहार किया जाता है, वह कौन है ? [ तात्पर्य यह है कि सुख आदिके धर्मी अहङ्कार साक्षि-प्रत्यक्षका विषय कहा गया है, इससे यह प्रतीत होता है कि जीवभिन्न कोई साक्षी है, क्योंकि सुख आदिके धर्मी अहङ्कारमें जीवत्वकी ही प्रसिद्धि है । इसलिए जीवभिन्न साक्षीमें कोई प्रमाण न होनेसे उसका स्वीकार अयुक्त है ] ।
इस शङ्काके समाधानमें कूटस्थदीपमें कहा गया है कि स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अधिष्ठानभूत कूटस्थ चैतन्य अपने अवच्छेदक उक्त दो शरीरोंका साक्षात् द्रष्टा है और कर्तृत्व आदि विकारोंसे शून्य है, अतः वह* साक्षी कहा जाता है, लोकमें भी औदासीन्य और ज्ञानसे ही साक्षित्व प्रसिद्ध है अर्थात् लोकमें वही साक्षी होता है, जो उदासीन और ज्ञाता होता है । [ इसी प्रकार प्रकृतमें भी साक्षी उदासीन और द्रष्टा ही सिद्ध होता है, यह भाव है ] । यद्यपि दोनों शरीरोंका अवभास करनेवाली जीवकी—अन्तःकरणकी—वृत्तियां हैं, अतः उन्हींसे काम चलेगा, * तथापि सर्वत्र व्यापक देहद्वयावच्छिन्न
* 'साक्षात् द्रष्टरि संज्ञायाम्' इस सूत्रसे द्रष्टा अर्थमें साक्षात्शब्दसे इनि प्रत्यय करके साक्षी शब्द बना है । साक्षीका लक्षण भी बोद्धा होकर जो उदासीन हो अर्थात् 'द्रष्टृत्वे सति उदासीनत्वं साक्षित्वम्' यही होता है । लोकमें दो आदमियोंमें जहाँ झगड़ा होता है, वहाँ साक्षी वही बन सकता है, जो उनके विवादका द्रष्टा हो और स्वयं उदासीन हो । केवल उदासीनत्व भी साक्षीका लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि समीपवर्ती स्तम्भ आदि अनेक उदासीन हैं, अतः उनमें साक्षीका उक्त लक्षण चला जायगा, यदि केवल द्रष्टृत्व साक्षीका लक्षण कहा जाय तो झगड़ा करनेवाला भी द्रष्टा है, लेकिन वह साक्षी नहीं होता है, अतः कथित लक्षण ही युक्त है ।
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि जीवसे अतिरिक्त स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अवभासक नित्यसाक्षिचैतन्य क्यों माना जाता है ? क्योंकि उक्त देहद्वयका अवभास तो प्रकाशरूप अन्तःकरणकी वृत्तियोंसे भी हो सकता है, इसी भावसे 'यद्यपि' इत्यादिसे शङ्का की गई है, जीव शब्दका अर्थ अन्तःकरण है । इसपर कहते हैं कि साक्षीके विना स्थूल सूक्ष्म शरीरका
साक्षि-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १८१
चैतन्येन ईषत् सदा भास्यमेव देहद्वयं जीवचैतन्यस्वरूपप्रतिबिम्बगर्भादन्तः-करणाद् विच्छिद्य विच्छिद्योद्गच्छद्भिर्वृत्तिज्ञानैर्भास्यते। अन्तरालकाले तु सह वृत्त्यभावैः कूटस्थचैतन्येनैव भास्यते। अत एवाहंकारादीनां सर्वदा प्रकाशसंसर्गात् संशयाद्यगोचरत्वम्। अन्यज्ञानधाराकालीनाऽहंकारस्य 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवाऽऽसम्' इत्यनुसन्धानं च। न च कूटस्थप्रकाशिते
कूटस्थ चैतन्य द्वारा साधारणरूपसे सदा भासमान ही उभय—स्थूल और सूक्ष्म—शरीर जीवचैतन्य-रूप प्रतिबिम्बसे युक्त अन्तःकरणसे—विच्छिन्न विच्छिन्न होकर कुछ कालके अनन्तर—निकलनेवाली वृत्तियोंसे स्पष्ट भासते हैं। अन्तरालकालमें अर्थात् कुछ-कुछ समयके व्यवधानसे होनेवाली वृत्तियोंके मध्य कालमें तो वृत्तिध्वंसोंके साथ कूटस्थ चैतन्यसे ही दोनों देह भासते हैं। इसीलिए अहंकार आदिका प्रकाशके साथ सर्वदा सम्बन्ध होनेसे संशय † आदिकी विषयता उनमें नहीं आती है। और अन्य धारावाहिक ज्ञानकालिक ✠ 'अहम्' अर्थका—'इतने समय तक मैं इसे देखता ही रहा' इस प्रकार—स्मरण भी उपपन्न होता है। यदि अहमर्थ और
अवगत नहीं होगा, क्योंकि दीप आदिके समान वृत्तियोंके प्रकाशात्मक होनेपर भी वे स्वतः जड़ हैं, अतः वे स्थूल और सूक्ष्म देहको प्रकाशित करनेमें असमर्थ हैं। अतः साक्षिचैतन्य मानना चाहिए। दूसरी बात यह है कि वृत्तियोंके मध्यकालमें शरीरद्वयका अस्पष्ट भान होता है, और वृत्तियोंके अनन्तर 'मैं स्थूल हूँ' और 'मैं कर्ता हूँ' इत्यादिरूपसे स्पष्ट भान होता है। इसलिए अस्पष्ट भानकी उपपत्तिके लिए वृत्तिज्ञानसे अतिरिक्त साक्षी अवश्य मानना चाहिए। किंच, यदि साक्षी न माना जाय, तो वृत्तिकी उत्पत्ति और वृत्तिका विनाश जो प्रत्यक्षरूपसे भासते हैं, उनका भान नहीं होगा, क्योंकि अपनेसे अपना विनाश और उत्पत्ति नहीं देखी जाती है। इससे भी साक्षिचैतन्य अपेक्षित है।
† तात्पर्य यह है कि जैसे घट आदिमें क्षणिक प्रकाश आदिके सम्बन्धसे संशय आदि नहीं होते, वैसे ही 'मैं हूँ या नहीं' 'मैं जीता हूँ या नहीं' इस प्रकार अहंकार आदिका अस्तित्व-संशय किसीको नहीं होता है और सदा अपरोक्ष भान होता है, इसलिए नित्य प्रकाशके साथ उसका सम्बन्ध है, ऐसा मानना चाहिए, वह प्रकाश साक्षी ही है, यह भाव है।
- जब भगवान् रामचन्द्रकी मूर्त्तिका दीर्घकाल तक ध्यान करते हैं, उस समयमें मूर्ति-विषयक वृत्तियोंकी धारा चलती है, इस धाराके समयमें अहमर्थका और तद्गोचर वृत्तियोंका तत्कालजन्मानुभव न होनेसे तद्विषयक संस्कार नहीं होंगे। इससे उत्तरकालमें अहमर्थका स्मरण नहीं होगा, इसलिए अन्य धाराकालीन अहंकारका साक्षीरूपसे अनुसन्धान होता है, अतः साक्षी मानना चाहिए। यदि धाराकालमें अन्यानुभव माना जाय, तो धाराके विच्छेदका प्रसङ्ग आवेगा, यह भाव है।
| १८२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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कथं जीवस्य व्यवहारस्मृत्यादिकमिति शङ्क्यम्, अन्योऽन्याध्यासेन जीवैकत्वापत्त्या कूटस्थस्य जीवान्तरङ्गत्वत् । न च जीवचैतन्यमेव साक्षी भवतु, किं कूटस्थेनेति वाच्यम्, लौकिकवैदिकव्यवहारकर्तुस्तस्योदासीन-द्रष्टृत्वासम्भवेन 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' इति श्रुत्युक्तसाक्षित्वा-योगात् । 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' इति कर्मफलभोक्तुर्जीवादुदासीनप्रकाशरूपस्य साक्षिणः पृथगाम्नानाच्चेति ।
उक्तो नाटकदीपेऽसौ नृत्यशालास्थदीपवत् ।
नेशो जीवोऽप्यसौ तत्त्वदीपे ब्रह्मेति वर्णनात् ॥९३॥
नृत्यशालामें विद्यमान दीपके समान साक्षी जीव और ईश्वरसे विलक्षण है, ऐसा नाटकदीपमें कहा गया है और तत्त्वदीपमें भी शुद्ध ब्रह्म ही साक्षी कहा गया है ॥ ९३ ॥
नाटकदीपेऽपि नृत्यशालास्थदीपदृष्टान्तेन साक्षी जीवाद्विविच्य दर्शितः। तथा हि—
वृत्ति आदिका अनुभव साक्षीको ही होता है, तो जीवके व्यवहार और स्मरण क्यों होते हैं, क्योंकि अन्यसे अनुभूत वस्तुका अन्यको स्मरण नहीं हो सकता है ? यह शङ्का यद्यपि हो सकती है, तथापि अयुक्त है, क्योंकि अन्योऽन्य तादात्म्यके अध्याससे कूटस्थके साथ ऐक्य होनेके कारण कूटस्थ जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग है। यदि शङ्का की जाय कि जीवचैतन्य ही साक्षी हो, कूटस्थ चैतन्य-रूप अतिरिक्त साक्षीको माननेकी क्या आवश्यकतां है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि लौकिकव्यवहार और वैदिकव्यवहारको अविरतरूपसे करनेवाले जीवा-त्मामें औदासीन्य और द्रष्टृत्वके न रहनेसे 'साक्षी०' (बोद्धा, उदासीन और गुणरहित चैतन्य साक्षी है) इस श्रुति द्वारा प्रतिपादित साक्षित्वकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती है और 'तयोरन्यः०' (जीव और कूटस्थ चैतन्योंमें से कूटस्थ-भिन्न जीव कर्मफलका भोग करता है और अन्य—कूटस्थ नहीं खाता हुआ बुद्धि आदिके साक्षीरूपसे अपरोक्षतया प्रकाशित होता है।) इस श्रुतिसे कर्म-फलभोक्ता जीवसे पृथक् उदासीन प्रकाशरूप साक्षीका प्रतिपादन भी है।
नाटकदीपमें भी नृत्यशालामें स्थित प्रदीपके दृष्टान्तसे जीवसे अतिरिक्त साक्षी-की सिद्धि की है, जैसे—'नृत्यशालास्थितो दीपः०' (जैसे एकरूपसे स्थित नृत्यशालास्थ दीप स्वामी, सभ्य और नर्तकी आदिको समानरूपसे ही प्रकाशित करता है, प्रभुके (नृत्य करानेवाले अर्थात् नृत्यके अभिमानीके)
साक्षि-स्वरूपविचार ] भाषाऽनुवादसहित १८३
नृत्यशालास्थितो दीपः प्रभुं सभ्यांश्च नर्तकीम् ।
दीपयेदविशेषेण तदभावेऽपि दीप्यते ॥११॥
तथा चिदाभासविशिष्टाऽहंकाररूपं जीवं विषयभोगसाकल्यवैकल्याभिमानप्रयुक्तहर्षविषादवत्त्वात् नृत्याऽभिमानिप्रभुतुल्यम्, तत्परिसरवर्तित्वेऽपि तद्राहित्यात् सभ्यपुरुषतुल्यान् विषयान्, नानाविधविकारवत्त्वान्नर्तकीतुल्यां धियं च दीपयन् सुषुप्त्यादावहंकाराद्यभावेऽपि दीप्यमानः चिदाभासविशिष्टाहंकाररूपजीवभ्रमाधिष्ठानकूटस्थचैतन्यात्मा साक्षीति । एवं जीवाद्विवेचितोऽयं साक्षी न ब्रह्मकोटिरपि, किन्तु अस्पृष्टजीवेश्वरविभागं चैतन्यमित्युक्तं कूटस्थदीपे ।
प्रकाशमें बड़ा रूप, सभ्योंके प्रकाशमें मध्यम स्वरूप और नर्तकी आदिके प्रकाशमें निकृष्ट स्वरूपको धारण नहीं करता और स्वामी आदिके अभावमें भी स्वयं प्रकाशित रहता है, वैसे अहङ्कार प्रभु है, विषय सभ्य हैं और बुद्धि नर्तकी है—इनका साक्षी प्रकाश करता है और इनके अभावमें भी स्वयं प्रकाशित रहता है ) ।
इसी दृष्टान्तके अनुसार चैतन्यके आभाससे युक्त अहङ्काररूप जीव विषयभोगकी समग्रता और असमग्रताके अभिमानसे हर्ष या विषादयुक्त होता है, इसलिए जीव नृत्याभिमानी स्वामीके समान है, यद्यपि जीवके परिसरवर्ती विषय हैं, तथापि स्वामीकी समानताके साधक हर्ष, विषाद आदिके नहीं रहनेसे वे सभ्यपुरुषके समान ही हैं। अनेक प्रकारके विकारोंसे युक्त होनेसे बुद्धि नर्तकीके समान ही है। और जैसे ताल आदि देनेवाले पुरुष नर्तकीका अनुसरण करते हैं, वैसे ही इन्द्रियाँ भी बुद्धिका ही अनुसरण करती हैं, अतः ये ताल आदिधारी पुरुषके तुल्य हैं—इन सभीको प्रकाशित करता हुआ सुषुप्ति आदिमें अहङ्कार आदिके न रहनेपर भी स्वयं प्रकाशित होनेवाला चिदाभासविशिष्ट अहङ्काररूप जीवके भ्रमका अधिष्ठानभूत कूटस्थ चैतन्यरूप आत्मा साक्षी है। इसी प्रकार जीवसे पृथक्रूपसे प्रतिपादित यह साक्षी ब्रह्मकोटिमें भी प्रविष्ट नहीं होता है, किन्तु जीव और ईश्वरके विभागका आश्रय न करता हुआ चैतन्य ही है, ऐसा कूटस्थदीपमें कहा गया है।
| १८४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तत्त्वप्रदीपिकायामपि मायाशबलिते सगुणे परमेश्वरे 'केवलो निर्गुणः' इति विशेषणानुपपत्तेः सर्वप्रत्यग्भूतं विशुद्धं ब्रह्म जीवाभेदेन साक्षीति प्रतिपद्यते इत्युदितम् ।
ईशस्य रूपभेदोऽसौ कारणत्वादिवर्जितः ।
जीवान्तरङ्गः कौमुद्यां प्राज्ञाख्यः परिकीर्तितः ॥९४॥
कारणत्व आदि धर्मोंसे रहित ईश्वरका स्वरूपविशेष, जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग, प्राज्ञ नामका साक्षी है, ऐसा कौमुदीमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ९४ ॥
कौमुद्यान्तु—
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च । इति
तत्त्वप्रदीपिकामें कहा गया है कि सम्पूर्ण अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्यात्मक जीवोंके अधिष्ठानरूपसे अत्यन्त अन्तरङ्ग स्वरूपभूत, जीवत्व, ईश्वरत्व आदि धर्मोंसे रहित और तत्-तत् जीवोंका अधिष्ठान होनेसे उन-उन जीवोंके साथ (ब्रह्मका) तादात्म्य होनेके कारण प्रत्येक शरीरमें भेदको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही साक्षी है, ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि मायोपहित सगुण परमेश्वरमें 'केवलो निर्गुणश्च' (शुद्ध और गुणरहित) इत्यादि विशेषणकी उपपत्ति नहीं हो सकती है। [तात्पर्य यह है कि पूर्वके ग्रन्थमें जीव और ईश्वरसे विलक्षण साक्षी है, ऐसा कहा गया है, क्योंकि यद्यपि उसका जीवकोटिमें अन्तर्भाव किया जाय, तो वह उदासीन नहीं होगा और ईश्वरमें अन्तर्भाव किया जाय तो भी उदासीन नहीं होगा, क्योंकि ईश्वर जगत् आदिके करनेमें व्यापृत है, अतः वह उदासीन नहीं हो सकता, इससे इन दोनोंसे उसे पृथक् मानना चाहिए, इसमें तत्त्वप्रदीपिकाकार चित्सुखाचार्यकी भी सम्मति है, क्योंकि उन्होंने भी जीव और ईश्वरसे रहित शुद्ध चिदात्माको ही साक्षी माना है]।
कौमुदीमें तो कहा है कि—
'एको देवः०' (परमात्मा एक है, सब भूतोंमें गूढ है, आकाशके समान व्यापी है, ब्रह्मसे लेकर स्तम्बपर्यन्त सब भूतोंका अन्तरात्मा है, जीवकृत-कर्मोंका साक्षी है, सब भूतोंका अधिष्ठान है, जीवोंका भी साक्षी है, बोद्धा, शुद्ध और निर्गुण है) इस देवत्व आदिकी प्रतिपादक श्रुतिसे परमेश्वरका ही
साक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषानुवादसहित १८५
देवत्वादिश्रुतेः परमेश्वरस्यैव रूपभेदः कश्चिज्जीवप्रवृत्तिनिवृत्त्योरनुमन्ता स्वयमुदासीनः साक्षी नाम। स च कारणत्वादिधर्मानास्पदत्वाद् अपरोक्षो जीवगतमज्ञानाद्यवभासयंश्च जीवस्याऽन्तरङ्गः। सुषुप्त्यादौ च कार्यकारणो-परमे जीवगताज्ञानमात्रस्य व्यञ्जकः प्राज्ञशब्दितः।
'तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेव-मेवाऽयं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम्' 'प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन्याति' इति श्रुतिवाक्याभ्यां सुषुप्त्युत्क्रा-न्त्यवस्थयोर्जीवभेदेन प्रतिपादितः परमेश्वर इति सुषुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरण—
कोई स्वरूपविशेष साक्षी है, जो जीवकी प्रवृत्ति और निवृत्तिका सर्वदा जानने-वाला और स्वतः उदासीन है। ईश्वरका स्वरूपविशेष होनेपर भी वह कारणत्व आदि धर्मोंके न रहनेसे अपरोक्ष है और जीवगत अज्ञान आदिका अवभासक होनेसे जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग भी है। सुषुप्ति आदिमें अन्तःकरण और अन्तःकरणकी वृत्तिका उपशम होनेसे जीवगत अज्ञान मात्रका ही व्यञ्जक है, अतः प्राज्ञशब्दसे भी साक्षी कहा जाता है। [ तात्पर्य यह है कि यदि ईश्वरका स्वरूप साक्षी है, तो उसका प्रत्यक्ष जीवको नहीं होना चाहिये, क्योंकि ईश्वरके सर्वज्ञत्व आदि धर्म जीवके प्रति प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं। साक्षीका अपरोक्षावभास नहीं होता है, यह भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि साक्षी अन्तःकरण, अज्ञान आदिका अनुभवरूप है, इसपर कौमुदीकारने कहा कि यद्यपि साक्षी ईश्वरका ही स्वरूपविशेष है, तथापि उसमें जीवके प्रत्यक्षके अयोग्य सर्वज्ञत्व, कारणत्व आदि धर्मोंके न रहनेसे उसके अपरोक्ष अवभासमें कोई विरोध नहीं है; ]।
'तद्यथा०' (जैसे प्रिय अङ्गनासे आलिङ्गित पुरुष बाह्य-मार्ग आदिके वृत्तान्तको और आन्तर—गृहकृत्यको नहीं जानता है, वैसे ही सुषुप्तिमें उपाधिके विलयसे परमात्माके साथ एकीभावको प्राप्त हुआ जीव बाह्य जगत्रूप प्रपञ्चको और आन्तर स्वप्न-प्रपञ्चको नहीं जानता है), 'प्राज्ञेन०' (प्राज्ञ आत्मासे अधिष्ठित जीव वेदनासे शब्द करता हुआ शरीरसे बाहर निकलता है) इन दो श्रुतिवाक्योंसे 'सुषुप्ति और उत्क्रान्ति (अन्यत्र गमन) में जीवसे पृथक् परमेश्वरका प्रतिपादन किया है, इस प्रकारका जो * सुषुप्त्युत्क्रान्तिके अधिकरणमें
* इस अधिकरणका सूत्र है—'सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन'। सुषुप्ति और उत्क्रान्तिमें जीवसे भिन्न
२४
| १८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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( उ० मी० अ० १ पा० ३ अधि० १४ सू० ४२ ) निर्णयोऽपि साक्षिपर इत्युपवर्णितम् ।
शुक्तीदमंशवदसौ तत्त्वशुद्धौ च वर्णितः ।
जैसे शुक्तिका 'इदम्' अंश प्रातिभासिकरूपसे रजतकोटिमें प्रविष्ट भासता है, वैसे ही ब्रह्मकोटिमें प्रविष्ट भी साक्षी प्रातिभासिकरूपसे जीवकोटिमें प्रविष्ट भासता है, ऐसा तत्त्वशुद्धिकारका मत है ।
तत्त्वशुद्धावपि यथा 'इदं रजतम्' इति भ्रमस्थले वस्तुतः शुक्तिको-
प्रतिपादित निर्णय है वह भी साक्षिपरक ही है, ऐसा वर्णन ( कौमुदीमें ) किया गया है ।
तत्त्वशुद्धिमें भी—जैसे 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इस प्रकारके भ्रम-स्थलमें वस्तुतः 'इदम्' अंश शुक्तिकोटिमें यद्यपि अन्तर्भूत है, तो भी प्रतिभास
ईश्वरका प्रतिपादन होनेसे परमेश्वरका ही ग्रहण करना चाहिए, संसारी जीवका नहीं, यह उक्त सूत्रका अक्षरार्थ है । तात्पर्य यह है कि 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः' (आत्मा कौन है ? जो विज्ञानमय है, वह आत्मा है ) इत्यादि अनेक वाक्य बृहदारण्यकके षष्ठ अध्यायमें उपलब्ध होते हैं, वे क्या जीवके कथनमें पर्य्यवसित हैं या ईश्वरके बोधनमें पर्य्यवसन्न हैं ? इस प्रकारके संशयमें पूर्वपक्ष प्राप्त होता है कि वे जीवके अनुवादमें अपना तात्पर्य रखते हैं, क्योंकि 'योऽयं विज्ञानमयः' इत्यादि उपक्रम, उपसंहार आदि संसारी जीवके प्रतिपादनमें ही कटिवद्ध हैं । इसपर सिद्धान्तीका कहना है कि बृहदारण्यकका षष्ठ प्रपाठक जीवका अनुवाद नहीं करता है, परन्तु परमेश्वरका ही बोध करता है, कारण कि 'तद्यथा प्रियया' इत्यादि वाक्य सुषुप्ति और उत्क्रान्तिमें जीवसे भिन्न परमेश्वरका तृतीयाविभक्त्यन्त प्राज्ञशब्दसे प्रतिपादन करते हैं, और ऐसा इसलिए प्रतिपादन किया जाता है कि लोकसिद्ध जीवका ईश्वरके साथ अभेदप्रतिपादन हो । 'स वा एष महानज आत्मा' ( वह व्यापक, नित्य, आत्मा है ) इस प्रकारके वाक्यशेषमें साक्षात् ईश्वरका ही स्वरूप बतलाया गया है, अतः उपक्रम, और उपसंहारके आधारपर बृहदारण्यकीय षष्ठ प्रपाठकस्थ आत्मपरक यावत् श्रुतिवाक्योंमें जीवातिरिक्त ईश्वरका ही जीवानुवादसे तदभिन्नताके लिए प्रतिपादन किया गया है, यह उक्त सुषुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरणका निर्णय है । परन्तु इससे उदासीन, ईश्वरस्वरूप साक्षीकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि इस प्रकरणमें 'एष भूताधिपतिः, एष सर्वेश्वरः' इत्यादि ग्रन्थसे सर्वेश्वरत्व इत्यादि गुणोंका कथन है । इस प्रश्नका उत्तर यह है कि ज्ञेय ब्रह्मके प्रकरणमें सर्वेश्वरत्व आदि गुणोंके प्रतिपादक वाक्य स्तुतिपरक हैं, अतः सर्वेश्वरत्व आदिके प्रतिपादनमें उनका तात्पर्य न होनेसे उदासीन साक्षीकी सिद्धि होती है ।
साक्षीका स्वरूप-विचारं ] भाषानुवादसहित १८७
य्यन्तर्गतोऽपीदमंशः प्रतिभासतो रजतकोटिः, तथा ब्रह्मकोटिरेव साक्षी प्रतिभासतो जीवकोटिरिति जीवस्य सुखादिव्यवहारे तस्योपयोग इत्युक्तत्वाऽयमेव पक्षः समर्थितः ।
अज्ञानोपहितः कैश्चित्—
कोई लोग कहते हैं कि अविद्यारूप उपाधिसे उपहित जीव ही साक्षी है ।
केचित्तु—अविद्योपाधिको जीव एव साक्षाद् द्रष्टृत्वात् साक्षी । लोकेऽपि ह्यकर्तृत्त्वे सति द्रष्टृत्वं साक्षित्वं प्रसिद्धम् । तच्चाऽसङ्गोदासीन-
रूपसे रजतकोटिमें प्रविष्ट है, वैसे ही यद्यपि वस्तुतः ब्रह्मकोटिमें ही साक्षीका अन्तर्भाव है, तथापि प्रतिभाससे जीवकोटिमें प्रविष्ट है, अतः जीवके सुख आदि व्यवहारमें उपयोग है, ऐसा कहकर—इसी कौमुदीकारके मतका समर्थन किया गया है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि यद्यपि 'इदं रजतम्' इस भ्रममें रजतके अभेदरूपसे इदमंशका प्रतिभास होता है, तथापि उसका रजतकोटिमें अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि 'नेदं रजतम्' इस बाधक ज्ञानसे रजतका केवल बाध होता है, इदमंशका नहीं । और शुक्ति-अंशमें भी उसका अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे, जैसे शुक्ति अज्ञात है, वैसे ही 'इदम्' अंशमें भी अज्ञातत्व प्रसक्त हो जायगा, इसलिए यह मानना आवश्यक है कि वस्तुस्थितिमें इदमंश शुक्तिरूप है और प्रातिभासिक-रूपसे रजतसे अभिन्न है । बस, इसी युक्तिके अनुसार साक्षीस्थलमें भी वस्तुतः साक्षी ईश्वरस्वरूप है और 'अहं सुखमनुभवामि' ( मैं सुखका अनुभव करता हूँ ) इत्यादि प्रतिभास होनेसे कल्पित तत्-तत् जीवोंके अधिष्ठानरूप सुख आदि-का अनुभवकर्ता साक्षी जीवसे अभिन्नरूपसा ज्ञात होता है । अतः जीवके सुख-आदिके व्यवहारमें सुख आदिके अनुभवकर्ता साक्षीका उपयोग है, इस प्रकार तत्त्वशुद्धिमें कहकर इसी कौमुदीके पक्षका समर्थन किया गया है ] ।
कुछ लोग कहते हैं कि अविद्यासे उपहित-अविद्याप्रतिबिम्बित-चैतन्यरूप जीव-ही साक्षात् द्रष्टा होनेसे साक्षी है, क्योंकि लोकमें भी यही प्रसिद्धि है—कर्ता न होकर जो द्रष्टा होता है, वही साक्षी कहलाता है, इस प्रकार साक्षीका लक्षण
१८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
प्रकाशरूपे जीवे एव साक्षात् सम्भवति, जीवस्याऽन्तःकरणतादात्म्यापत्त्या कर्तृत्वाद्यारोपभाक्त्वेऽपि स्वयमुदासीनत्वात् । 'एको देवः' इति मन्त्रस्तु ब्रह्मणो जीवभावाभिप्रायेण साक्षित्वप्रतिपादकः । 'द्वा सुपर्णा' इति मन्त्रः गुहाधिकरणन्यायेन ( उ० मी० अ० १ पा० २ अधि ३ सू० ११)
असङ्ग, उदासीन और प्रकाशरूप जीवमें ही साक्षात् * घट सकता है, कारण कि अन्तःकरणके तादात्म्यसे जीवमें कर्तृत्व आदि धर्मोंका आरोप होता है, तो भी स्वयं उदासीन है । 'एको देवः' यह मन्त्र ब्रह्ममें जीवभावके अभिप्रायसे ही साक्षित्वका प्रतिपादन † करता है । गुहाधिकरणके न्यायसे ‡
* भाव यह है कि जब अविद्याप्रतिविम्बित चैतन्यरूप जीवमें ही साक्षित्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो फिर उससे अतिरिक्त साक्षी माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । यदि इसपर भी अतिरिक्त साक्षी माननेकी जबरदस्ती की जाय, तो केवल गौरवके सिवा और कुछ हाथ न लगेगा । और जीव वास्तविकमें उदासीन ही है, परन्तु बुद्धितादात्म्यापन्न होनेसे उसमें औपचारिक कर्तृत्व आदि है, वस्तुतः नहीं, अतः उसे साक्षी स्वीकार करनेमें आपत्ति नहीं है ।
† तात्पर्य यह है कि यदि जीव ही पूर्वोक्त रीतिसे साक्षी माना जाय, तो 'एको देवः' इत्यादि मन्त्रके साथ, जो कि जीवातिरिक्त उदासीन साक्षीका प्रतिपादन करता है, अवश्य विरोध होगा । इसपर जीवमें साक्षित्वका प्रतिपादन करनेवाले कहते हैं कि नहीं, विरोध नहीं होगा, क्योंकि यह भी मन्त्र जीवमें ही साक्षित्वका प्रतिपादन करता है, उससे भिन्नमें नहीं । भाव यह है—यह बार बार कहा गया है कि जो साक्षी है वह जीवका अपरोक्ष है, यदि ईश्वरको साक्षी माना जाय, तो वह जीवका अपरोक्ष नहीं होगा, क्योंकि प्रतिबिम्ब और बिम्बरूपसे जीव और ईश्वरका औपाधिक भेद होनेके कारण जीवके प्रति जीवान्तरके समान (अर्थात् जैसे यज्ञदत्तजीव विष्णुमित्रजीवका अपरोक्ष नहीं कर सकता है, वैसे ) ईश्वरका भी अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं हो सकेगा, इससे जीवभावापन्न ब्रह्म ही अपरोक्ष होनेसे साक्षी है, यह 'एको देवः' इत्यादि मन्त्रके साक्षीको प्रतिपादन करनेवाले अंशका भाव है ।
‡ यहाँ शङ्का करनेवालेका तात्पर्य यह है कि जैसे 'गुहां प्रविष्टौ' यह मन्त्र जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिपादन करता है, वैसे ही 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र भी जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिपादन करता है, यह (ब्रह्मसूत्रके) भाष्यमें कहा गया है । इस अवस्थामें 'द्वा सुपर्णा' इस मन्त्रमें 'तयोरन्यः पिप्पलं' यह वाक्य भी जीवपरक ही होगा 'अनश्नन्'--- इत्यादि वाक्य ईश्वरपरक होगा, यह ज्ञात होता है, ऐसी परिस्थितिमें 'जीव साक्षी है' इस पक्षमें 'अनश्नन्नन्यः' इस मन्त्रभागके साथ, जो जीवातिरिक्त साक्षीका प्रतिपादन करता है, विरोध होगा, इस शङ्काके समाधानमें कहते हैं कि 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र जिस पक्षमें ईश्वर परक और जीवपरक है उस पक्षमें भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि 'एको देवः' इस मन्त्रकी नाईं 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र भी जीवभावापन्न परमात्माका बोध करता है, ऐसा
साक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषानुवादसहित १८९
जीवेश्वरोभयपरः, गुहाधिकरणभाष्योदाहृतपैङ्गिरहस्यब्राह्मणव्याख्यातेन प्रकारेण जीवान्तःकरणोभयपरो वेति न कश्चिद्विरोध इत्याहुः ।
लिङ्गैरुपहितः परैः ॥ ९५ ॥
और कोई लोग कहते हैं कि अन्तःकरणसे उपहित जीवचैतन्य ही साक्षी है ॥९५॥
'द्वा सुपर्णा' यह मन्त्र जीव और ईश्वर उभयपरक है अथवा गुहाधिकरणके भाष्यमें उदाहरणरूपसे दिये गये पैङ्गीरहस्यब्राह्मणके व्याख्यानप्रकारसे जीव और अन्तःकरणपरक है, इसलिए कोई विरोध नहीं ‡ है ।
स्वीकार करेंगे । 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्रको जीवेश्वरपरक माननेमें गुहाधिकरण न्याय ही हेतु है । गुहाधिकरणमें प्रथम सूत्र है—'गुहां प्रविष्टावात्मानौ न तद्दर्शनात्' । सूत्रार्थ यह है कि 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे' ( अपने किये हुए कर्मोंके अवश्य भावी फलोंका उपभोग करते हुए और अपने शरीरस्थ हृदयकी आकाशरूप गुहामें प्रविष्ट हुए ) इस मन्त्रमें जीव और ईश्वरका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि 'गुहाहितं गहरेष्ठम्' इत्यादिमें वैसा ही देखा जाता है । इसी न्यायके अनुसार 'द्वा सुपर्णा' इत्यादिमें भी जीव और ईश्वरका ही ग्रहण है ।
‡ इसका तात्पर्य यह है कि गुहाधिकरणमें पैङ्गिरहस्यब्राह्मणका उदाहरण दिया गया है । वह इस प्रकार है—'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति सत्त्वम्, अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति इत्यनश्नन्न्योऽभिपश्यति ज्ञः, तावेताँ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' । ( उन दोनोंमें एक जो कर्मफलका उपभोग करता है, वह सत्त्व—अन्तःकरण है और अन्य जो उपभोग नहीं करता हुआ देखता है, वह ज्ञ—क्षेत्रज्ञ है, इस प्रकार ये सत्त्व और क्षेत्रज्ञ हैं ) इस ब्राह्मणसे अदनवाक्य अन्तःकरणपरक और अनशनवाक्य क्षेत्रज्ञपरक है, ऐसा व्याख्यान प्रतिपादित है, यह ज्ञान होता है । इस अवस्थामें भाष्यकारने कैसे उक्त वाक्यको जीवेश्वरपरक माना ? यह शङ्का हो सकती है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अभ्युपगमवादमात्रसे कथन होनेके कारण ब्राह्मणव्याख्यान और भाष्यका परस्पर विरोध नहीं है । इस अवस्थामें यदि अन्तःकरणप्रतिबिम्बित चैतन्य ही पैङ्गिरहस्यका अभिमत क्षेत्रज्ञ हो, तो वही 'अनश्नन्' इत्यादि वाक्योक्त साक्षी होगा, अविद्याप्रतिबिम्बित चैतन्य नहीं होगा, ऐसी परिस्थितिमें अविद्याप्रतिबिम्बित ब्रह्मस्वभाव जीवचैतन्य साक्षी है, यह पक्ष पैङ्गिब्राह्मणनिर्णीतार्थक 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्रभागसे विरुद्ध होगा, इस विरोधका 'गुहाधिकरणभाष्योदाहृत' इत्यादिसे परिहार किया गया है, परिहारका अभिप्राय यह है कि पैङ्गिब्राह्मणमें कहा गया क्षेत्रज्ञ अन्तःकरणगत चैतन्यप्रतिबिम्बरूप जीव नहीं है, क्योंकि उसके कर्तृत्वादि-स्वभाव होनेसे 'अनश्नन्' इत्यादि वाक्यसे कहे गये साक्षित्वका उसमें सम्भव नहीं है, किन्तु असङ्ग, उदासीन और प्रकाशरूप अविद्याप्रतिबिम्बरूप जीव ही अभिप्रेत है, और वह अनश्नन् वाक्योक्त साक्षिरूप हो सकता है, इसका पूर्वमें कथन हुआ है । अतः अविद्या-प्रतिबिम्ब जीवके साक्षित्वपक्षमें पैङ्गिब्राह्मणके साथ विरोध नहीं है ।
१९० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अन्ये तु—सत्यं जीव एव साक्षी, न तु सर्वगतेनाऽविद्योपहितेन रूपेण । पुरुषान्तरान्तःकरणादीनामपि पुरुषान्तरं प्रति स्वान्तःकरणभासकसाक्षिसंसर्गाविशेषेण प्रत्यक्षत्वापत्तेः । न चाऽन्तःकरणभेदेन प्रमातृभेदात् तदनापत्तिः । साक्षिभास्येऽन्तःकरणादौ सर्वत्र साक्ष्यभेदे सति प्रमातृभेदस्याऽप्रयोजकत्वात् । तस्मादन्तःकरणोपधानेन जीवः साक्षी । तथा च प्रतिपुरुषं साक्षिभेदात् पुरुषान्तरान्तःकरणादेः पुरुषान्तरसाक्ष्यसंसर्गाद्वा तदयोग्य-
इतर लोग कहते हैं कि जीव ही साक्षी है, यह ठीक है परन्तु सर्वगत अविद्यासे उपहितरूपसे जीव साक्षी नहीं है। यदि अविद्योपहितरूपसे साक्षी माने, तो अन्य पुरुषको अन्य पुरुषोंके अन्तःकरण आदिका प्रत्यक्ष हो जायगा, क्योंकि उसके अन्तःकरणके अवभासक साक्षीके साथ * सामान्यरूपसे पुरुषान्तरके अन्तःकरणादिका संसर्ग है । परन्तु साक्षीके एक होनेपर भी अन्तःकरणप्रयुक्त प्रमाताओंके भिन्न-भिन्न होनेसे पूर्वोक्त आपत्ति नहीं आ सकती है ? नहीं, यह समाधान युक्त नहीं हो सकता, क्योंकि साक्षिभास्य सम्पूर्ण अन्तःकरण आदिमें साक्षीके एक होनेपर प्रमाताका भेद अकिञ्चित्कर † है । इससे अन्तःकरणोपहित चैतन्यरूपसे ही जीव साक्षी है । तब साक्षीके भेदमें प्रयोजकीभूत उपाधिका भेद होनेपर प्रतिपुरुष साक्षीका भेद सिद्ध होता है, इससे अन्य पुरुषोंके अन्तःकरण आदिका अन्य पुरुषके साक्षीके साथ सम्बन्ध न होनेसे
* तात्पर्य यह है कि देवदत्तके अन्तःकरणका अवभासक जो साक्षी है, उस साक्षीके साथ देवदत्तीय अन्तःकरणके समान यज्ञदत्तके अन्तःकरण आदिका भी सम्बन्ध होनेसे जैसे देवदत्तको अपने अन्तःकरणका भान होता है, वैसे ही यज्ञदत्तके अन्तःकरणका भी भान हो जायगा, इसी प्रकार यज्ञदत्तके अन्तःकरणकी वृत्तियोंका भी प्रत्यक्ष हो जायगा, इसलिए व्यापकीभूत अविद्यामें प्रतिबिम्बितचिद्रूप ईश्वरको साक्षी नहीं मानना चाहिए, किन्तु वक्ष्यमाण अन्तःकरणोपहित जीवको ही साक्षी मानना चाहिए ।
† तात्पर्य यह है कि देवदत्तके प्रति देवदत्तके अन्तःकरणके प्रत्यक्षमें देवदत्तके साक्षीका संसर्ग प्रयोजक है, इसलिए देवदत्तके साक्षीका संसर्ग अविशेषसे यज्ञदत्तके अन्तःकरणके साथ भी होनेसे यज्ञदत्तके अन्तःकरण आदिका प्रत्यक्ष देवदत्तको अवश्य प्रसक्त होगा, इसलिए इसका परिहार साक्षीके संसर्गभेदसे ही हो सकता है, अप्रयोजक प्रमाताके भेदसे नहीं, अतः प्रमाताके भेदसे यह व्यवस्था नहीं हो सकती है कि देवदत्तका अन्तःकरण देवदत्तके प्रति प्रत्यक्ष है, अन्य यज्ञदत्तका अन्तःकरण प्रत्यक्ष नहीं है । इसलिए भी अपरिच्छिन्न अविद्याबिम्बित चैतन्य साक्षी नहीं है ।
साक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषाअनुवादसहित १९१
त्वाद्वा अप्रकाश उपपद्यते। सुषुप्तावपि सूक्ष्मरूपेणान्तःकरणसद्भावात् तदुपहितः साक्षी तदाऽप्यस्त्येव। न चान्तःकरणोपहितस्य प्रमातृत्वेन न तस्य साक्षित्वम्, सुषुप्तौ प्रमात्राभावेऽपि साक्षिसत्त्वेन तयोर्भेदश्चाऽवश्यं वक्तव्य इति वाच्यम्।
विशेषणोपाध्योर्भेदस्य सिद्धान्तसम्मतत्वेनाऽन्तःकरणविशिष्टः प्रमाता, तदुपहितः साक्षीति भेदोपपत्तेरित्याहुः ॥ १४ ॥
अविद्ययाऽऽवृतः साक्षी तेनाऽन्यस्य प्रथा कथम् ? ।
साक्षी अविद्यासे आवृत रहता है, अतः उससे अविद्या, अहंकार आदिका प्रकाश कैसे होगा ?।
अथवा पुरुषान्तरके प्रति अयोग्यत्वकी कल्पनासे अप्रकाश - प्रत्यक्षत्वका अभाव- उपपन्न होता है। सुषुप्तिमें भी सूक्ष्मरूपसे अन्तःकरणका अस्तित्व होनेसे उस अन्तःकरणसे उपहित साक्षी सुषुप्तिकालमें भी रहता ही है। यदि कोई शङ्का करे कि जो अन्तःकरणसे उपहित चैतन्य है, वह प्रमाता है, साक्षी नहीं हैं, क्योंकि सुषुप्तिमें प्रमाताके न रहनेपर भी ‡ साक्षीके रहनेसे उन दोनोंका भेद अवश्य मानना होगा, तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि विशेषण और उपाधिके भेदका सिद्धान्तमें स्वीकार होनेसे अन्तःकरणरूप विशेषणसे विशिष्ट चैतन्य प्रमाता है और अन्तःकरणसे उपहित चैतन्य साक्षी है, इस प्रकार प्रमाता और साक्षीका भेद उपपन्न $\times$ होता है ॥ १४ ॥
‡ सुषुप्तिकालमें साक्षीकी अवश्य सत्ता है, यह मानना चाहिए, क्योंकि 'त्रिषु धामसु' (तीनों अवस्थाओंमें [साक्षीकी सत्ता है]) इत्यादि श्रुतियाँ साक्षीके अस्तित्वका जाग्रत्, सुषुप्ति और स्वप्नावस्था में प्रतिपादन करती हैं। और सुषुप्तिकालमें साक्षी द्वारा अनुभूत अज्ञानका 'मैंने कुछ नहीं जाना' इत्यादि रूपसे स्मरण भी होता है। अनेक प्रमाताके प्रलयका प्रतिपादन करनेवाली अनेक श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे 'अहमस्वाप्सम्' (मैं सोया था) इत्यादि स्मरणको अहमर्थ प्रमाताके अंशमें अनुभव ही मानना चाहिए, सुषुप्तिमें प्रमाताकी सत्ता नहीं माननी चाहिए। इसलिए सुषुप्तिमें सत्त्व और असत्त्वरूपसे साक्षी और प्रमाताका अवश्य भेद है, अतः प्रमातासे साक्षीका अवश्य भेद मानना ही चाहिए, तथा प्रमाता और साक्षीको एकरूप माना जाय, तो साक्षीमें उदासीनत्व आदिका प्रतिपादन भी विरुद्ध होगा, यह भाव है।
अविद्योपाधिक जीवमें अन्तःकरण प्रमातृत्वका विशेषणत्वरूपसे प्रयोजक है और उपाधित्वरूपसे साक्षित्वका प्रयोजक है। इसीलिए विशिष्ट और उपहित प्रमाता एवं
१९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
[ टिप्पणी ]
साक्षीका भी भेद है। यद्यपि अन्तःकरणसे विशिष्ट चैतन्यमें कर्तृत्व आदि स्वभाव हैं, तथापि उपहित चैतन्यमें स्वतः उदासीन होनेसे साक्षित्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है। अब प्रसङ्गतः विशेषण और उपाधिका निर्वचन करते हैं, जो प्रकृतमें अत्यन्त उपादेय है। विशेषणका लक्षण है—कार्यान्वयित्वे सति व्यावर्तकत्वम् अर्थात् विधेयके साथ अन्वयी हो कर जो लक्ष्यकी अन्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति करे। जैसे 'नीलोत्पलमानय' (नील कमल लाओ) इत्यादिमें नील है—विशेषण, विधेय—आनयनमें नीलका उत्पल द्वारा अन्वय भी होता है और रक्त उत्पलसे व्यावृत्ति भी करता है। इसलिए उत्पलका नैल्य विशेषण है। उपलक्षणीभूत पदार्थमें अतिव्याप्तिका निवारण करनेके लिए 'कार्यान्वयित्वे सति' यह विशेषण दिया गया है, जैसे 'यत् काकवत्, तत् देवदत्तगृहम्' (जो कौआवाला है, वह देवदत्तका घर है) इसमें विधेय है देवदत्तगृहत्व, उसका काकके साथ किसी प्रकारसे अन्वय है नहीं, परन्तु अन्य गृहकी व्यावृत्ति तो काक करता है, इसलिए उपलक्षण काकमें दोषनिवारण करनेके लिए सत्यन्त है। यदि केवल यही विशेषणका लक्षण किया जाय कि जो कार्यान्वयी हो वह विशेषण है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विधेयके साथ विशेष्यका भी अन्वय होता है, अतः विशेष्यमें विशेषणत्वका प्रसङ्ग हटानेके लिए विशेष्यदल—व्यावर्तकत्वदल—अवश्य देना चाहिए। उसके देनेसे विशेष्यमें अतिप्रसङ्ग नहीं है। 'कार्यानन्वयित्वे सति व्यावर्तकत्वे सति कार्यान्वयकाले विद्यमानत्वम् उपाधिलक्षणम्' अर्थात् विधेयके साथ अन्वयी न होकर, विशेष्यका व्यावर्तक होकर कार्यान्वयकालमें विद्यमान हो, वह उपाधि—है। जैसे—लोहितं स्फटिकमानय' (रक्त स्फटिक लाओ) इसमें स्फटिकसन्निहित जपाकुसुम स्फटिकका विशेषण नहीं है, उपाधि है, क्योंकि आनयनरूप विधेयमें जपाकुसुमका किसी प्रकारसे अन्वय नहीं होता है और अन्य स्फटिकसे व्यावृत्ति अवश्य करता है। इसमें 'कार्यानन्वयित्वे सति' यह सत्यन्त विशेषणमें अतिप्रसक्तिके निरासके लिए दिया गया है, और द्वितीय सत्यन्त देनेका प्रयोजन इस प्रकार है, कहींपर यह कहा जाय कि 'काकवद् गृहं प्रविश' (काकवत् गृहमें प्रवेश करो) इसमें प्रवेशरूपकार्यके अन्वयकालमें कदाचित् दैवयोगसे उपलक्षणीभूत काक अन्यत्र चला गया और दूसरा कौआ उस स्थलमें आ गया उस समयमें आये हुए नवीन काकमें कार्यानन्वयित्वे सति अन्वयकालविद्यमानत्वरूप उपाधिका लक्षण होनेसे अतिव्याप्ति हो जायगी, अतः इसके भङ्गके लिए द्वितीय सत्यन्त दिया, इसके देनेसे आगत नवीन काकमें दोष नहीं है, क्योंकि वह व्यावर्तक नहीं है, इसी स्थलमें उपलक्षण काकमें अतिव्याप्तिके वारण करनेके लिए कार्यान्वयकालमें विद्यमानत्वरूप विशेष्य दल दिया। कार्यके अन्वयकालमें दैव योगसे उपलक्षण काककी स्थिति हो सकती है। इससे उपलक्षणमें अतिव्याप्तिके वारणके लिए विद्यमानत्वमें 'नियमेन' यह विशेषण भी देना चाहिये, इसलिए कार्यान्वयकालमें नियमतः जो रहे, यह विशेष्य भागका अर्थ है। कार्यान्वयकालमें नियमतः काक रहता नहीं है, अतः दोष नहीं है, यह भाव है। इसका अधिक विचार अन्यत्र कृष्णालङ्कार व्याख्यामें पृ० १९५ चौ० मु० काशीमें देखना चाहिए।
साक्षीकी अनावृतताका विचार ] भाषानुवादसहित १९३
नन्नूक्तरूपस्य साक्षिणः चैतन्यमात्रावरकेणाऽज्ञानेनाऽऽवरणमवर्जनीय-मिति कथमावृतेनाऽविद्याहङ्कारादिभानमिति चेत् ।
अत्राहू राहुवत् केचित् तस्य स्वावृतभास्यताम् ॥ ९६ ॥
**इस विषयमें—**राहुके समान अर्थात् जैसे राहुका प्रकाश राहुसे आवृत चन्द्रमण्डलसे ही होता है, वैसे ही अविद्याका प्रकाश अविद्यासे आवृत साक्षीसे ही होता है, ऐसा भी—कुछ लोग कहते हैं ॥९६॥
राहुवदविद्या स्वावृतप्रकाशप्रकाशयेति केचित् ।
अब यह शङ्का होती है कि पूर्वोक्त लक्षणसे लक्षित साक्षी अवश्य चैतन्यमात्रको आवृतकरनेवाले अज्ञानसे आवृत होगा, अतः अज्ञानावरणसे आवृत साक्षीसे अहङ्कार आदिका भान कैसे होगा ? * अर्थात् किसी प्रकारसे भी नहीं हो सकेगा, परन्तु यह शङ्का युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि—
राहुके समान अविद्या स्वावृत प्रकाशसे प्रकाशित होती है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं । [ तात्पर्य यह है कि ग्रहणके समयमें चन्द्रमण्डल राहुसे आच्छादित होता है, परन्तु उस समयमें राहुका प्रकाश चन्द्रसे ही होता है, जो कि चन्द्र राहुसे आवृत है । इसी प्रकार यद्यपि अविद्यासे साक्षी आवृत है, तथापि उस अविद्याका प्रकाश स्वावृत साक्षीसे ही होता है ] ।
* साक्षिगोचर अपरोक्ष वृत्तिसे साक्षीके आवरणका भङ्ग होनेपर आवरणसे रहित साक्षीसे अविद्या आदिका भान हो सकता है, यह नहीं कहना चाहिए, क्योंकि 'अविद्या आदिका भान केवल साक्षीसे ही होता है' इस सिद्धान्तके साथ विरोध होगा, कारण कि उनके भानमें इस प्रकार वृत्तिका अवलम्बन करनेसे साक्षीसे अतिरिक्त वृत्तिकी भी अपेक्षा हुई । दूसरी बात यह भी है कि मनमें करणत्वका भी आगे चलकर निरास किया जायगा, इससे करणके अभावसे साक्षीको अवलम्बन करनेवाली तदाकार वृत्ति भी नहीं हो सकती है । और अहङ्कार आदिकी सत्ताके कालों उनके संशय आदि नहीं होते हैं, इसलिए सदा उनका प्रकाशस्वरूप साक्षीके साथ सम्बन्ध है, यह कहना चाहिए, यदि कादाचित्क वृत्तिसे उनका भान माना जाय, तो उनके सदा भासमानत्वके साथ भी विरोध होगा, इसलिए केवल साक्षिभास्यत्व ही अहङ्कार आदिमें स्वीकार करना चाहिए, परन्तु यह नहीं हो सकता है, क्योंकि वह साक्षिचैतन्य तो अज्ञानसे आवृत है । और साक्षिरूप चैतन्यसे अन्य चैतन्यका ही अज्ञान आवरण करता है, यह भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि अज्ञानका सम्पूर्ण चैतन्यको आवृत करना स्वभाव है, यदि हठात् इसे नहीं माना जाय, तो साक्षि-चैतन्यसे अन्य चैतन्यमें भी आवरणका अभाव प्रसक्त होगा, यह प्रश्नका आशय है ।
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| १९४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अविद्यावृत्तितद्धर्माभासकांशेतरावृतिः ।
कल्प्यते वस्तुतस्तेषु संशयादेरदर्शनात् ॥ ९७ ॥
वस्तुतः अविद्या, अन्तःकरण और अन्तःकरणके धर्मोंके अवभासक साक्षिरूप चैतन्यको छोड़कर अन्य चैतन्यको अविद्या आवृत करती है, इस प्रकार—अविद्या आदिमें संशय आदिके न देखनेसे—कल्पना की जाती है ॥९७॥
वस्तुतोऽविद्याऽन्तःकरणतद्धर्मावभासकं साक्षिचैतन्यं विहायैवाऽज्ञानं चैतन्यमावृणोतीत्यनुभवानुसारेण कल्पनान्न कश्चिद्दोषः । अत एव सर्वदा तेषामनावृतप्रकाशसंसर्गात् अज्ञानविपरीतज्ञानसंशयागोचरत्वम् ।
स्याच्चेदनावृतः साक्षी भासेताऽस्य सुखात्मता ।
प्रेमास्पदत्वाद् भात्येव परिच्छेदात्तृप्तता ॥ ९८ ॥
यदि साक्षी चैतन्य आवृत नहीं है, तो सर्वदा तदभिन्न आनन्दका प्रकाश होना चाहिए ? ( कहते हैं ) होता ही है, क्योंकि आत्मा परम प्रेमका विषय है, उपाधिसे आनन्दके परिच्छिन्न होनेसे तृप्ति नहीं होती है ॥९८॥
साक्षिचैतन्यस्याऽनावृतत्वे तत्स्वरूपभूतस्याऽऽनन्दस्याऽपि प्रकाशापत्तिरिति चेत्, न; इष्टापत्तेः । आनन्दरूपप्रकाशप्रयुक्तस्याऽऽत्मनि निरूपा-
वस्तुस्थितिमें साक्षिचैतन्यको, जो अविद्या, अन्तःकरण और अन्तः-करणके धर्म सुख आदिका प्रकाशक है, छोड़ कर अन्य चैतन्यको ही अज्ञान आवृत करता है, ऐसी अनुभवके अनुसार कल्पना करनी चाहिए, इसलिए किसी दोषकी प्रसक्ति नहीं है । अतएव—साक्षी चैतन्यसे अतिरिक्त चैतन्यका ही अज्ञान आवरण करता है, इसीसे—वे अन्तःकरण और तद्धर्म आदि सदा अनावृत प्रकाशके साथ सम्बद्ध होनेके कारण अज्ञान, विपरीत ज्ञान और संशय आदिके विषय नहीं † होते हैं ।
यदि साक्षी चैतन्य सदा अनावृत है, तो उसके स्वरूपभूत आनन्दका भी साथ-साथ प्रकाश होना चाहिए ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह .
† अविद्याके भावरूपत्वमें, अहङ्कारके अनात्मत्वमें, सुख, दुःख आदि वृत्तियोंके अनात्मधर्मत्वमें अज्ञान, विपरीतज्ञान आदिके होनेसे यह कैसे कह सकते हैं कि अविद्या आदि संशय आदिके गोचर नहीं है ? इस शङ्कापर यह उत्तर है कि अविद्या आदिके सत्त्वकालमें अविद्यादिसत्त्वप्रकारक अज्ञान, संशय आदि नहीं होते हैं, इसलिए पूर्वोक्त आशङ्का नहीं हो सकती है, यह भाव है !