सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| २८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तथा तदीयाः शब्दस्तु परोक्षज्ञानकृत् पुरा ॥
मननादियुतोऽध्यक्षं कुर्याद्विधुरचित्तवत् ॥ ७ ॥
विवरणानुयायियोंमें से कुछ लोग कहते हैं कि शब्द पहले परोक्ष ज्ञान उत्पन्न करता है तदनन्तर वही शब्द मनन, निदिध्यासनसे युक्त होकर विधुरके चित्तके समान ( अर्थात् जैसे विधुरका चित्त कामिनीपरिभावित होकर कामिनीका अपरोक्ष साक्षात्कार करता है, वैसे ही ) अपरोक्ष साक्षात्कार उत्पन्न करता है ॥ ७ ॥
कृतश्रवणस्य प्रथमं शब्दान्निर्विकित्सं परोक्षज्ञानमेवोत्पद्यते, शब्दस्य परोक्षज्ञानजननस्वभाव्येन क्लृप्तसामर्थ्यानतिलङ्घनात् । पश्चात्तु कृतमनननिदिध्यासनस्य सहकारिविशेषसम्पन्नात् तत एवाऽपरोक्षज्ञानं
[ 'श्रोतव्यः' इस वाक्यसे श्रवणका जो विधान किया जाता है, वह निश्चयात्मक शब्दजन्य परोक्षज्ञानके उद्देश्यसे ही किया जाता है, शब्दजन्य अपरोक्षज्ञानके लिये नहीं किया जाता, क्योंकि शब्द स्वभावसे ही परोक्षज्ञानका जनक होता है और जैसे संस्कारसे सहकृत चक्षु 'स एवायं देवदत्तः' इस प्रत्यभिज्ञाका जनक होता है अथवा भावनाधिक्यसे युक्त वियोगी पुरुषका मन कामिनीके साक्षात्कारका जनक होता है, वैसे ही मनन और निदिध्यासनसे युक्त शब्द अपरोक्षज्ञान जनक भी हो सकता है। इससे यह विधि परोक्षज्ञान अथवा अपरोक्षज्ञानके लिए अपूर्वविधि नहीं है किन्तु नियमविधि है, क्योंकि विधिके बिना भी पूर्वोक्त दो कार्यकारणभावोंके प्रभावसे विचारविशिष्ट वेदान्तात्मकश्रवण प्राप्त है, इसलिए पूर्वोक्त भाषाप्रबन्ध आदिकी व्यावृत्ति करनेके लिए यह नियमविधि ही है इस प्रकार विवरणानुसारियोंके एकदेशियोंके मतका प्रतिपादन करते हैं—'कृतश्रवणस्य' इत्यादि ग्रन्थसे ] वेदान्तश्रवणकर्त्ता पुरुषको प्रथम शब्दसे निश्चयात्मक परोक्ष ज्ञान ही उत्पन्न होता है, क्योंकि परोक्ष ज्ञानके उत्पादनमें ही शब्दकी सामर्थ्य है, इससे अपने निश्चित स्वभावका शब्द उल्लङ्घन नहीं कर सकता। तदनन्तर अर्थात् शब्दसे निश्चयात्मक परोक्ष ज्ञान होनेपर मनन और निदिध्यासन करनेवाले पुरुषको मनन आदि सहकारी कारणोंसे युक्त शब्दसे ही अपरोक्ष ज्ञान होता है। क्योंकि सहकारी कारणकी विचित्रतासे कार्यमें विचित्रता देखी जाती है, इसीसे जैसे 'सोऽयं
कि मन्त्रोंसे ही मन्त्रार्थका अनुस्मरण करना चाहिए। [द्रष्टव्य—अधिकरण न्या० पृ० २५ आनन्दाश्रम मु०] ।
विधिविचार ] भाषानुवादसहित २९
जायते। तत्तांशगोचरज्ञानजननासमर्थस्याऽपीन्द्रियस्य तत्समर्थसंस्कारसाहित्यात् प्रत्यभिज्ञानजनकत्ववत् स्वतोऽपरोक्षज्ञानजननासमर्थस्याऽपि शब्दस्य विधुरपरिभावितकामिनीसाक्षात्कारस्थले तत्समर्थत्वेन क्लृप्तभावनाप्रचयसाहित्यादपरोक्षज्ञानजनकत्वं युक्तम्। ततश्च शब्दस्य स्वतः स्वविषये परोक्षज्ञानजनकत्वस्य भावनाप्रचयसहकृतज्ञानकरणत्वावच्छेदेन विधुरान्तःकरणवदपरोक्षज्ञानजनकत्वस्य च प्राप्तत्वात् पूर्ववन्नियमविधिरिति तदेकदेशिनः।
देवदत्तः' (वही यह देवदत्त है) इत्यादि प्रत्यभिज्ञानात्मकज्ञानके 'तद्' अंशका ग्रहण करनेमें इन्द्रियके समर्थ न होनेपर भी तत्तांशके ज्ञानमें समर्थ संस्कारके सान्निध्यसे—सहभावसे इन्द्रिय—चक्षु—प्रत्यभिज्ञानात्मकज्ञानकी कारण होती है, वैसे ही इस स्थलमें यद्यपि शब्द स्वयं अपरोक्षज्ञानके उत्पादनमें असमर्थ है, तथापि विधुरपुरुष * द्वारा परिभावित कामिनीके साक्षात्कारके समान निश्चित भावनाप्रचयके सहभावसे शब्दमें अपरोक्ष ज्ञानकी जनकता युक्त है। ऐसा सिद्ध होनेपर जनकता स्वरूपतः शब्दमें स्वविषय—वाच्यके परोक्षज्ञानकी जनकता और भावनाधिक्यके सहभावसे ज्ञानकरणमात्रमें विधुरके अन्तःकरणके समान अपरोक्षज्ञानकी जनकता प्राप्त है, अतः पूर्वोक्त विवरणमतके समान यह नियमविधि है—अपूर्वविधि नहीं है। इस प्रकार विवरणके एकदेशियोंका मत है। †
* यह आशय है कि कामिनीकी भावनासे युक्त विधुर पुरुषका अन्तःकरण कामिनीके अपरोक्ष साक्षात्कारमें हेतु रूपसे देखा जाता है, इस स्थलमें बाहरके पदार्थके ग्रहणमें यद्यपि अन्तःकरण स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् चक्षु आदि बाह्य इन्द्रियोंकी अपेक्षा करता है, तो भी बाह्य वस्तुकी भावनासे युक्त होकर बाह्य वस्तुके साक्षात्कारमें हेतु होता है, इस प्रकार विशेष कार्य-कारणभावके ग्रहण करनेकी अपेक्षा लाघवसे और बाधकके न होनेसे भावनासहकृत यावत् ज्ञानके करण अपरोक्ष ज्ञानके साधन हैं, इस प्रकार सामान्य कार्य-कारण-भाव मानना उचित है। अतः शब्दके ज्ञान-करण होनेसे भावनाविशिष्ट शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानका जनक हो सकता है, इसलिए स्वभावतः शब्द परोक्षज्ञानका कारण है, तो भी भावनासे युक्त होकर वही शब्द अपने विषयका अपरोक्ष साक्षात्कार करेगा, और भावनाविशिष्ट शब्दमें अपरोक्ष साक्षात्कारकी जनकता अप्राप्त नहीं है, परन्तु ऊपरके कार्य-करणभावके बलसे प्राप्त ही है, अतः 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि ही है।
† यह एकदेशीका मत युक्त नहीं है, क्योंकि परोक्षज्ञान उत्पन्न करना ही शब्दका
| ३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेदे |
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अन्ये परोक्ष एवात्मज्ञाने नियममास्थिताः ।
मनसैवेदमाप्तव्यमित्यादिश्रुतिदर्शनात् ॥ ८ ॥
कुछ लोग परोक्ष ज्ञानके उत्पादनमें शब्दकी सामर्थ्य होनेसे 'श्रोतव्यः' को परोक्ष आत्मज्ञानमें ही नियमविधि मानते हैं, क्योंकि 'मनसैवेदमाप्तव्यम्' (यह आत्मतत्त्व मनसे ही प्राप्त करने योग्य है) इत्यादि श्रुति देखी जाती है ॥ ८ ॥
वेदान्तश्रवणेन न ब्रह्मसाक्षात्कारः, किन्तु मनसैव, 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इति श्रुतेः । 'शास्त्राचार्योपदेशशमदमादिसंस्कृतं मन आत्मदर्शने करणम्' इति गीताभाष्यवचनाच्च । श्रवणं तु निर्विचिकित्सपरोक्षज्ञानार्थमिति तादर्थ्येनैव नियमविधिरिति केचित् ।
वेदान्तके श्रवणसे ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं होता, किन्तु अन्तःकरणसे ही होता है, क्योंकि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही साक्षात्कार करना चाहिए) इस प्रकारकी श्रुति है, और 'शास्त्राचार्योपदेशशमदमादिसंस्कृतं०' ('तत्त्वमसि' आदि शास्त्र *, आचार्यका उपदेश, शम, दम, तितिक्षा आदिसे शुद्ध हुआ मन ही आत्माके अपरोक्षानुभवमें करण है) ऐसा श्रीमद्भगवद्गीताके भाष्यमें वचन भी है। श्रवणका फल तो निश्चयात्मक परोक्षज्ञान ही है, इसलिए निश्चयात्मक शब्दजन्य परोक्षज्ञानरूप प्रयोजनके लिए श्रवणकी नियमविधि है, इस प्रकार कोई लोग कहते हैं † ।
स्वभाव है, यह बात नहीं है। इसीलिए ज्ञानमें रहनेवाला परोक्षत्वधर्म किसी कारणविशेषसे प्राप्त होता है, इसका खण्डन किया जायगा, अतः शाब्दजन्य अपरोक्षज्ञानके प्रति मनन आदिके समान श्रवणकी विधि भी अयुक्त नहीं है, इसलिए एकदेशी, ऐसा कहा गया है।
* आचार्यका उपदेश—आचार्य द्वारा किया गया वाक्यार्थोंका विवरण अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि अद्वैतपरक वाक्योंके अर्थोंका स्पष्ट रीतिसे प्रतिपादन।
† इस मतमें पूर्व मतसे इतना विशेष है कि यहाँ ब्रह्मसाक्षात्कार मानस—मनसे होनेवाला कहा गया है, अतः मनकी सहकारितारूपसे मनन और निदिध्यासनमें विधि है और पूर्व मतमें ब्रह्मसाक्षात्कार शाब्द—शब्दसे होनेवाला कहा गया है, इसलिए शाब्दज्ञानके कारण शब्दकी सहकारितारूपसे मनन और निदिध्यासनमें विधि है।
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३१
गान्धर्वशास्त्रवत् चित्तसहकारितयेष्यते ॥
आत्माऽपरोक्षे श्रवणं, तत्रैव नियमम्परे ॥ ९ ॥
जैसे षड्ज आदिका अपरोक्षज्ञान अन्तःकरणकी सहकारिता द्वारा गान्धर्वशास्त्रसे उत्पन्न होता है, वैसे ही अन्तःकरणकी सहकारितासे श्रवण आत्माका अपरोक्षज्ञान उत्पन्न कर सकता है, अतः अपरोक्षज्ञानके लिए ही श्रवणको नियमविधि मानते हैं, इस प्रकार भी कुछ लोगोंका मत है ॥ ९ ॥
अपरोक्षज्ञानार्थत्वेनैव श्रवणे नियमविधिः; 'द्रष्टव्यः' इति फलकीर्तनात् । तादर्थ्यं च तस्य करणभूतमनःसहकारितयैव, न साक्षात् । शब्दादपरोक्षज्ञानानङ्गीकरणात् ।
न च तस्य तेन रूपेण तादर्थ्यं न प्राप्तमित्यपूर्वविधित्वप्रसङ्गः । श्रावणेपु षड्जादिषु समारोपितपरस्पराविवेकनिवृत्त्यर्थं गान्धर्वशास्त्रश्रवण-
अपरोक्ष ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए ही श्रवणमें नियमविधि है, क्योंकि 'द्रष्टव्यः' इस प्रकार श्रवणके फलका कथन है [भाव यह है 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि वाक्यसे विहित श्रवण आदिका 'द्रष्टव्य' शब्दसे दर्शन ही फल कहा गया है और दर्शनशब्दका प्रयोग साक्षात्कार ज्ञानमें ही होता है ।] और श्रवणमें अपरोक्षज्ञानार्थता करणभूत मनकी सहकारितासे ही हो सकती है साक्षात् नहीं हो सकती, क्योंकि शब्दसे अपरोक्ष—साक्षात्कार नहीं होता और उसका अङ्गीकार भी नहीं किया गया है ।
परन्तु यह तुम्हारा कथन तभी युक्त हो सकता है, जब वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कारके करणभूत मनकी सहकारिता रूपसे अपरोक्षानुभवार्थता कहीं प्राप्त देखी गई हो, परन्तु वह किसी प्रमाणसे प्राप्त ही नहीं है, इसलिए यह नियमविधि नहीं है, प्रत्युत अपूर्वविधि ही है, यदि इस प्रकार कोई शङ्का करे तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रोत्रेन्द्रियजन्य प्रत्यक्षकेविषयीभूत अर्थात् कानसे प्रत्यक्ष किये जानेवाले षड्ज* आदि ध्वनिविशेषोंमें
* षड्ज आदि स्वरोंका पूर्वमें निरूपण किया जा चुका है, जिसने सङ्गीतशास्त्रका अभ्यास न किया हो, ऐसे पुरुषको स्वरोंका विशदरूपसे भान नहीं होता, परन्तु सभी स्वर एकसे प्रतीत होते हैं—उन स्वरोंका परस्पर भेद प्रतीत नहीं होता है और गन्धर्व-शास्त्रका अभ्यास करनेपर उन स्वरोंका ठीक ठीक भेद प्रतीत होता है, इसी प्रकार मनसे, जो भीतर की इन्द्रिय है, अनुभव किये जानेवाले शरीर, प्राण और चिदात्मा आदिमें परस्पर
३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह प्रथम परिच्छेद
सहकृतश्रोत्रेण परस्परासङ्कीर्णतयाथार्थ्यापरोक्ष्यदर्शनेन प्रकाशमाने वस्तुन्यारोपिताविवेकनिवृत्त्यर्थशास्त्रसद्भावे तच्छ्रवणं तत्साक्षात्कारजनकेन्द्रियसहकारिभावेनोपयुज्यते इत्यस्य कॢप्तत्वादित्यपरे ।
ऊहापोहात्मिका चित्तक्रियैव श्रवणं विधेः ।
अपरोक्षं परोक्षं वा नाऽमानस्यास्य तत्फलम् ॥ १० ॥
तस्मात् पुन्दोषतात्पर्यभ्रान्तिसंस्कारशान्तये ।
नियमोऽस्येति सङ्क्षेपशारीरककृतो विदुः ॥ ११ ॥
ऊहापोहात्मक मानसिक क्रिया ही श्रवण है, अतः अप्रमाणरूप इस श्रवणकी विधिसे आत्माका अपरोक्ष या परोक्षज्ञानलक्षण फल नहीं हो सकता है, इससे पुरुषगत तात्पर्यभ्रम या उसके संस्कार आदि दोषोंकी शान्तिके लिए यह श्रवण नियम विधि है, ऐसा संक्षेपशारीरककार—सर्वज्ञात्ममुनि मानते हैं ॥ १० ॥ ११ ॥
वेदान्तवाक्यानामद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यनिर्णयानुकूलन्यायविचारा-
अज्ञानसे—गन्धर्वशास्त्रके अनभ्यासप्रयुक्त अज्ञानसे आरोपित जो परस्पर एकरूपता है, उसकी निवृत्तिके लिए गान्धर्वशास्त्रीय विचारसहकृत श्रोत्रसे उन षड्जादि स्वरोंकी परस्पर असंकीर्णता और यथार्थ अपरोक्षताका दर्शन होनेसे प्रकाशमान वस्तुमें आरोपित अविवेकनिवृत्तिरूप प्रयोजनवाले शास्त्रके सद्भावमें उस शास्त्रका श्रवण प्रकाशमान वस्तु साक्षात्कारकी कारण इन्द्रियके सहभावसे साक्षात्कारका हेतु हो सकता है, इस प्रकार वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कार करणभूत इन्द्रियकी सहकारिता निश्चित है, अतः विधिके बिना भी प्राप्त होनेसे यह अपूर्वविधि नहीं है, प्रत्युत नियमविधि है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं।
वेदान्तवाक्योंका अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य * निश्चय करानेवाला न्याय-विचारात्मक जो अन्तःकरणका परिणामरूप श्रवण है, उसका ब्रह्ममें परोक्ष
भेद प्रतीत नहीं होता—एकरूपता प्रतीत होती है, यह सभीके अनुभवसिद्ध है, इसलिए यहाँ भी विचारवान् पुरुष षड्जादि स्वरोंके साक्षात्कारके दृष्टान्तसे कल्पना करता है कि यदि आरोपनिवर्तक शास्त्र है, तो उस आरोपनिवर्तक शास्त्रके सहकारसे आन्तर इन्द्रिय ही बुद्धि आदिसे विविक्त आत्माका, जो ब्रह्मरूपसे वेदान्तोंसे प्रतीत होता है, साक्षात्कार करावेगा । इसी भावको 'प्रकाशमान' इत्यादिसे व्यक्त करते हैं ।
* प्रमेयकी असम्भावनाका निवर्तक जो मनन है उसमें अतिव्याप्ति वारण करनेके लिए
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३३
त्मकचेतोवृत्तिविशेषरूपस्य श्रवणस्य न ब्रह्मणि परोक्षमपरोक्षं वा ज्ञानं फलम्, तस्य शब्दादिप्रमाणफलत्वात् । न चोक्तरूपविचारावधारिततात्पर्य-विशिष्टशाब्दज्ञानमेव श्रवणमस्तु तस्य ब्रह्मज्ञानं फलं युज्यत इति वाच्यम्, ज्ञाने विध्यनुपपत्तेः । श्रवणविधेर्विचारकर्तव्यताविधायकजिज्ञासासूत्रमूलत्वो-
या अपरोक्ष फल नहीं है, क्योंकि परोक्ष या अपरोक्ष ज्ञानरूप फल शब्द आदि प्रमाणोंसे ही उत्पन्न होता है। परन्तु यहाँ यह 'श्रवणशब्दका अर्थ नहीं है, प्रत्युत अद्वैत ब्रह्ममें वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य करानेवाले न्याय-विचारोंसे निश्चित तात्पर्यसे युक्त जो शाब्दज्ञान—शब्दजनित ज्ञान—है, वही प्रकृतमें श्रवण पदार्थ है, और उससे ब्रह्मज्ञानरूप फल हो सकता है, इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए। क्योंकि ज्ञानमें विधिकी उपपत्ति नहीं हो सकती अर्थात् श्रवणके ज्ञानरूप होनेसे ज्ञानात्मक श्रवणकी विधि नहीं होगी—ज्ञान विषयतन्त्र है विधेय नहीं है। और श्रवणविधि विचार-कर्तव्यताके † विधायक जिज्ञासासूत्रकी मूल है, ऐसा स्वीकार भी किया
तात्पर्यनिर्णयानुकूल कहा। तात्पर्यका निश्चय करनेमें उपक्रम और उपसंहारका ऐक्य, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन छःकी आवश्यकता होती है, इसी अर्थमें प्रामाणभूत एक श्लोक भी है—
उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् ।
अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये ॥
छान्दोग्यके षष्ठ अध्यायमें 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इस प्रकार अद्वितीय ब्रह्मका उपक्रम करके 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' इस प्रकार उपसंहार किया गया है, इसलिए वहाँके सम्पूर्ण सन्दर्भका तात्पर्य उपक्रम और उपसंहारके ऐक्यसे अद्वितीय ब्रह्ममें ही है। 'तत्त्वमसि' इस वाक्यका नौ वार पाठ है, इसलिए अभ्यासरूप तात्पर्यलिङ्गसे इसका अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य माना गया है। 'यं वै सोम्य' इत्यादिसे अन्य प्रमाणोंके अयोग्यत्वकथनसे अपूर्वरूप लिङ्गसे अद्वितीय ब्रह्मका निश्चय होता है। 'तस्य तावदेव' इत्यादिका तात्पर्य भी अद्वितीय ब्रह्ममें है, क्योंकि विदेहकैवल्य-रूप फलका कथन है। 'अनेन जीवेन' इसका अर्थवादरूप प्रमाणसे अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य निश्चित होता है, 'एकेन मृत्पिण्डेन' इत्यादिका उपपत्तिसे अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य निर्णीत होता है।
अन्तःकरणके वृत्तिविशेषके कथनसे यत्नसाध्य क्रियावृत्तिकी विवक्षा है। तदसाध्य ज्ञानरूप वृत्तिकी विवक्षा नहीं है, क्योंकि ज्ञान विधिके अयोग्य है। मूलमें 'ब्रह्मणि' यह सप्तमी विषयार्थक है, इसलिये ब्रह्मविषयक परोक्ष या अपरोक्ष फल श्रवणका नहीं हो सकता, यह पूर्वपक्षका भाव है।
† ब्रह्मजिज्ञासासूत्र है—'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' । इसका अर्थ है कि वैराग्य आदि साधन-
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पगमाच्च । ऊहापोहात्मकमानसिकक्रियारूपविचारस्यैव श्रवणत्वौचित्यात् । न च विचारस्यैव तात्पर्यनिर्णयद्वारा, तज्जन्यतात्पर्यभ्रमादिपुरुषापराध- रूपप्रतिबन्धकविगमद्वारा वा ब्रह्मज्ञानं फलमस्त्विति वाच्यम्, तात्पर्यज्ञानस्य
गया है । इसलिए ऊहापोहात्मक ‡ मानसिक क्रियारूप विचारको ही श्रवण मानना उचित है ।
अब यह शङ्का होती है कि परम्परया—तात्पर्यके निश्चय द्वारा अथवा विचारजन्य तात्पर्यभ्रम आदि पुरुषके दोषोंके निरसन द्वारा विचारका भी ब्रह्मज्ञान फल हो सकता है, फिर श्रवणसे ब्रह्मविषयक परोक्ष ज्ञान या अपरोक्ष ज्ञान नहीं हो सकता यह कहना असङ्गत है [शङ्काका भावार्थ यह है कि 'सदेव सोम्य' 'तत् सत्यम् स आत्मा' (हे सोम्य ! पहले यह सद्रूप था, वह सत्यस्वरूप है वह आत्मा है) इस प्रकार 'सदेव' से लेकर 'स आत्मा तत्त्वमसि' तक वाक्यसमूह अद्वैत आत्मपरक है, अद्वैतप्रतिपादक उपक्रम और उपसंहारका ऐक्य होनेसे, इस रीतिके विचारका अनुमितिरूप अद्वैत तात्पर्यका निश्चय साक्षात्—अव्यवहित फल है—इसके द्वारा और जो प्रतिबन्धक दोष हैं, उनका निवर्तन भी विचारका फल है । इनके द्वारा विचार भी ब्रह्मज्ञानका हेतु बन सकता है, इसलिए जैसे ज्ञान शब्द आदि प्रमाणोंका फल है, वैसे ही विचारका भी तात्पर्यनिर्णय द्वारा अथवा तज्जन्य प्रतिबन्धकोंके निरास द्वारा फल हैं इससे 'श्रवणस्य न ब्रह्मणि परोक्षमपरोक्षं वा ज्ञानं फलम्' इत्यादि उक्ति असङ्गत है, इसपर उत्तर देते हैं—उक्त शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि] तात्पर्यज्ञान शाब्दबोधमें कारण है, इस प्रकारके कार्यकारण-भावका स्वीकार नहीं किया गया है और प्रतिबन्धकके अभावका कहींपर भी
सम्पत्तिके अनन्तर मनुष्यको ब्रह्मके अपरोक्ष ज्ञानके लिए वेदान्तविचार करना चाहिए, क्योंकि सूत्रमें कहे गये जिज्ञासाशब्दकी विचारमें लक्षणा है और इस जिज्ञासासूत्रका मूल है 'श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्य । इससे श्रवणका अर्थ यदि ज्ञान मान लिया जाय, तो 'श्रोतव्यः' इसका 'श्रवणरूप ज्ञान करना चाहिए'—यह अर्थ होगा। इस परिस्थितिमें जिज्ञासासूत्र और श्रोतव्यवाक्यका परस्पर मूलमूलिभाव अर्थात् प्रयोज्यप्रयोजकभाव नहीं होगा, क्योंकि दोनोंकी एकार्थता नहीं है, इसलिए यदि 'श्रोतव्यः' यह श्रुति जिज्ञासासूत्रका मूल है, तो श्रवणका अर्थ हम ज्ञान नहीं कर सकते, यह भाव है ।
‡ ऊह—न्यायाभासोंको—दुष्ट न्यायोंको—हटाकर निर्दुष्ट न्यायोंका प्रदर्शन ।
अपोह—न्यायाभासका निराकरण ।
विधिविचार ] भाषानुवादसहिते ३५
शाब्दज्ञाने कारणत्वानुपगमात्, कार्ये क्वचिदपि प्रतिबन्धकाभावस्य कारण-
कारणरूपसे स्वीकार नहीं किया गया, अतः तात्पर्यज्ञानमें और विचारसे होनेवाले प्रतिबन्धकाभावमें द्वारत्वकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती है—भाव यह है कि वेदान्तसिद्धान्तमें शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान और प्रतिबन्धकका (प्रतिबन्धक उसे कहते हैं जो कार्यकी उत्पत्ति न होने दे ) अभाव कार्यमात्रके प्रति कारण नहीं माने गये हैं, इसलिए उनके द्वारा विचार ब्रह्मज्ञानका, जो शब्द प्रमाणका फल है, कारण नहीं हो सकता, क्योंकि द्वार शब्दका अर्थ है—'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वम्' अर्थात् जो स्वयं कारणसे उत्पन्न होकर कारणसे उत्पन्न होनेवाले कार्यके प्रति कारण हो, जैसे घटके प्रति दण्ड कारण होता है, इसमें द्वार है—भ्रमि, भ्रमि दण्डसे उत्पन्न होती है और दण्डसे उत्पन्न होनेवाले घटके प्रति कारण है, इसलिए भ्रमिमें द्वारता है । प्रकृतमें जब शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान * और कार्यके प्रति प्रतिबन्धकाभाव † कारण ही नहीं हैं, तब
* शाब्दबोधके प्रति यदि तात्पर्यज्ञान कारण माना जाय, तो शुक (सुग्गा) से कहे गये शब्दसे शाब्दबोध न होगा, क्योंकि वहाँ वक्ताके तात्पर्यका अभाव है और लोकमें व्यवहार भी होता है—'शुक आदिके शब्दसे अर्थका बोध होता है, लेकिन वहाँ तात्पर्य नहीं है' इससे शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान हेतु नहीं है, यह स्पष्टतः ज्ञात होता है । 'वहाँ भी ईश्वरका तात्पर्य है' इस प्रकारकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि ईश्वरके तात्पर्यकी शाब्दबोधरूप फलके बाद कल्पना होगी, पहले तो ईश्वरतात्पर्य दुर्बोध ही है, शब्दके सान्निध्यसे भी तात्पर्यका निर्णय नहीं कर सकते, क्योंकि 'अहो ! विमलं जलं नद्याः कच्छे महिषाश्चरन्ति' इत्यादिमें 'नद्याः' का सन्निधान जल और कच्छके साथ एकसा है और 'पय लाओ' ऐसा कहनेपर 'जल' या 'दूध' इस प्रकार प्रश्न होनेसे यह कल्पना अवश्य होती है—वक्ताके तात्पर्यका परिज्ञान न रहनेपर भी शाब्दबोध होता है, इसलिए शाब्दज्ञानमें तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है ।
† प्रतिबन्धकाभाव कार्यमें कारण नहीं है, इसमें युक्ति यह है कि प्रतिबन्धकाभावको कार्यकी सामग्रीमें अन्तर्भाव नहीं कर सकते, क्योंकि 'सामग्रीके रहनेपर भी प्रतिबन्धकके रहनेसे कार्य उत्पन्न नहीं हुआ' इस प्रकार व्यवहार देखा जाता है, यदि सामग्रीके अन्दर प्रतिबन्धकाभावका समावेश होता, तो प्रतिबन्धकसे कार्यकी उत्पत्ति नहीं हुई, इस प्रकार न बोलते । इससे यह ज्ञात होता है कि अप्रतिबद्ध सामग्री कार्यके प्रति कारण है। इस अवस्थामें अप्रतिबद्ध-प्रतिबन्धकाभावयुक्त, यह सामग्रीका विशेषण हुआ अर्थात् सामग्रीकी कारणताका अवच्छेदक—विशेषण हुआ। जो कारणताका अवच्छेदक होता है, वह कार्यका कारण नहीं होता, क्योंकि वह अन्यथासिद्ध होता है। इसीलिए घट के प्रति दण्डत्व कारण नहीं है, परन्तु दण्ड कारण है, प्रकृतमें भी प्रतिबन्धकाभावके
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त्वानुपगमाच्च तयोर्द्वारत्वानुपपत्तेः। ब्रह्मज्ञानस्य विचाररूपातिरिक्तकारणजन्यत्वे तत्प्रामाण्यस्य परतस्त्वापत्तेश्च। तस्मात्तात्पर्यनिर्णयद्वारा पुरुषापराधनिरासार्थत्वेनैव विचाररूपे श्रवणे नियमविधिः। 'द्रष्टव्यः' इति तु दर्शनार्हत्वेन स्तुतिमात्रम्, न श्रवणफलसङ्कीर्तनमिति सङ्क्षेपशारीरकानुसारिणः॥
कारणघटित द्वारत्वकी उपपत्ति ही उनमें नहीं हो सकती है। और यदि यह मानें कि ब्रह्मज्ञान शब्दप्रमाणसे अतिरिक्त विचाररूप कारणसे उत्पन्न होता है, तो ब्रह्मज्ञानके प्रामाण्यको परतस्त्व प्राप्त होगा। परन्तु इसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि वेदान्तसिद्धान्तमें ज्ञान स्वतः प्रमाण माना गया है अर्थात् ज्ञानमें रहनेवाला प्रामाण्य ज्ञान-ग्राहक सामग्रीसे ही ग्राह्य होता है, इतरसे नहीं, यही प्रामाण्यका स्वतस्त्व है। और यदि ज्ञानग्राहक शब्द आदि सामग्रीसे अन्य विचारको ज्ञानके प्रति कारण मानें, तो ज्ञानके प्रामाण्यमें परतस्त्वकी आपत्ति स्पष्टरूपसे प्राप्त होगी और सिद्धान्तकी हानि होगी, इसलिए ब्रह्म-ज्ञानके प्रति विचारको परम्परया या साक्षात् कारण नहीं मान सकते। इससे—ब्रह्मज्ञानके विचारफल न होनेसे—तात्पर्यके निर्णय द्वारा (वेदान्तोंका अद्वितीय ब्रह्मके प्रतिपादनमें तात्पर्य है, अन्यत्र नहीं है इस प्रकारके निश्चय द्वारा) पुरुषके तात्पर्यभ्रम आदि अपराधोंके निरास द्वारा ही विचाररूप श्रवणमें नियमविधि है, अर्थात् तात्पर्यनिर्णय द्वारा पुरुषोंके दोषोंका निरास ही विचारका फल है, और श्रवणसे ही इस फलका सम्पादन करना चाहिए, अन्य साधनोंसे नहीं, यह भाव है। परन्तु 'द्रष्टव्यः' (अपरोक्ष साक्षात्कार करना चाहिए) इस प्रकार श्रवणके फलका कथन है, इसलिए श्रवणसे-विचारसे अपरोक्ष साक्षात्कार हो सकता है? यदि इस प्रकार कोई शङ्का करे तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मा द्रष्टव्य है—दर्शनके योग्य है, इस प्रकार यह दर्शन केवल स्तुतिमात्र है, वस्तुतः श्रवणसे अपरोक्ष ज्ञान होता है, इस प्रकार श्रवणके फलका कथन नहीं है, यह संक्षेपशारीरकानुयायियोंका मत है ❊।
अवच्छेदक होनेसे अन्यथासिद्धिशून्यत्वके न रहनेसे प्रतिबन्धकाभाव कारण नहीं हो सकता है, इसलिए प्रतिबन्धकाभावमें भी द्वारता नहीं है, अतः तद्द्वारा विचार ब्रह्मज्ञानका कारण नहीं हो सकता है, यह भाव है।
* इस अभिप्रायके सूचक संक्षेपशारीरकके निम्नलिखित श्लोक हैं—
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३७
चिकित्साशास्त्रवत् प्राप्तव्यापारान्तरवारिणी ।
श्रवणे परिसङ्ख्येयमिति वार्तिकवेदिनः ॥ १२ ॥
जैसे ओषधियोंके ज्ञानके लिए आयुर्वेदके अध्ययनमें प्रवृत्त पुरुषको मध्यमें अन्य व्यापार प्राप्त होता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानार्थ प्रवृत्त पुरुषको मध्यमें अन्य व्यापार प्राप्त हो सकता है, अतः प्राप्त अन्य-व्यापारका निवारण करनेवाली परिसंख्या-विधि ही श्रवणमें है, ऐसा वार्तिकके अभिज्ञोंका मत है ॥ १२ ॥
पुरुषोपराधमलिना धिषणा निरवद्यचक्षुरुदयापि यथा ।
न फलाय भर्तृमथिया भवति श्रुतिसम्भवापि तु तथात्मनि धीः ॥१४॥
पुरुषोपराधविगमे तु पुनः प्रतिबन्धकव्युदसनातू सफला ।
मणिमन्त्रयोरपगमे तु यथा सति पावकाद् भवति धूमलता ॥१५॥
पुरुषोपराधविनिवृत्तिफलः सकलो विचार इति वेदविदः ।
अनपेक्षतामनुरुध्य गिरः फलवद् भवत् प्रकरणं तदतः ॥१६॥
पुरुषोपराधशतसङ्कुलता विनिवर्त्तते प्रकरणेन गिरः ।
स्वयमेव वेदशिरसो वचनाद् अथ बुद्धिरुद्भवति मुक्तिफला ॥१७॥
इत्यादि (सं० शा० पृ० २३ पुनः मुद्रित) । पहले श्लोकका भाव है—
भर्तृनामक कोई राजाका प्रीतिपात्र सेवक था । उससे द्वेष करनेवाले राजाके अन्य नौकर छलसे उसे अन्यत्र कहीं ले गये, और उस स्थलपर उसको छोड़कर राजाके पास आकर बोले कि आपका वह नौकर मर गया है । इसके अनन्तर कभी उस राजाने उसे अपने उपवनमें देखा । राजा उसे देखकर पिशाचकी भ्रान्तिसे डर गया और भाग गया। इस अवस्थामें निर्दोष चक्षुसे होनेवाला सेवक-विषयक राजाका ज्ञान—'यह मेरा नौकर ही है पिशाच नहीं है' इस प्रकार निश्चयात्मक ज्ञान—उत्पन्न नहीं कर सका, क्योंकि 'मर गया' इस विपरीत संस्कारसे उसका प्रतिबन्ध हो गया था । इसी प्रकार निर्दोष श्रुतिसे उत्पन्न 'मैं ब्रह्म हूँ' इस तरहका ज्ञान भी प्रमाताके पूर्वकालीन विपरीत भावनासे प्रतिबद्ध होनेके कारण ब्रह्मविषयक निश्चयात्मक ज्ञानको उत्पन्न नहीं कर सकता, इसलिए पहले प्रतिबन्धकका निरास करना अत्यन्त अपेक्षित है ।
असम्भावना और विपरीतभावना आदि पुरुषके दोषोंका निराकरण होनेपर असम्भावना आदि प्रतिबन्धकोंके विनाशतः उक्त ज्ञान सफल है, जैसे—मणि और मन्त्रोंके अपगमसे वह्निसे धूमलता उत्पन्न होती है ॥१५॥
चूँकि सम्पूर्ण धर्म और ब्रह्मविचार पुरुषके अपराधकी निवृत्तिके लिए हैं, ऐसा वेदविद् कहते हैं, इसीलिए 'अर्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात्' (जै० १।१।५) इस सूत्रमें वेदवाक्यकी नितांत अनपेक्षताका बाध न करके शास्त्र और प्रकरण सफल होते हैं, ऐसा कहा गया है ॥ १६ ॥
प्रकरण या शास्त्रसे पुरुषके दोषोंका विनाश होनेपर मुक्तिरूप फलका उत्पादन करनेवाली 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंसे स्वयं ही बुद्धि उत्पन्न होती है ॥१७॥
इस प्रकार ऊपरके सभी श्लोकोंका भाव है, इनके देखनेसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि विचारका फल-प्रतिबन्धकका विनाश ही संक्षेपशारीरककार मानते हैं ।
३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेदे
ब्रह्मज्ञानार्थं वेदान्तश्रवणे प्रवृत्तस्य चिकित्साज्ञानार्थं चरकसुश्रुतादि- श्रवणे प्रवृत्तस्येव मध्ये व्यापारान्तरेऽपि प्रवृत्तिः प्रसज्यत इति तन्निवृत्ति- फलकः 'श्रोतव्यः' इति परिसङ्ख्याविधिः । 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' (छा० २ । २३ । १) इति छान्दोग्ये अनन्यव्यापारत्वस्य मुक्त्युपायत्वावधारणात् सम्पूर्वस्य तिष्ठतेः समाप्तिवा- चितया ब्रह्मसंस्थाशब्दशब्दिताया ब्रह्मणि समाप्तेरनन्यव्यापाररूपत्वात् । 'तमेवैकं जानथ अन्या वाचो विमुञ्चथ' इत्याथर्वणे कण्ठत एव व्यापारा-
औषधोंके परिज्ञानके लिए चरक, सुश्रुत आदि आयुर्वेदके ग्रन्थोंके विचार- में प्रवृत्त हुए पुरुषके समान ब्रह्मज्ञानके लिए वेदान्तविचारमें प्रवृत्त हुए पुरुषकी बीच-बीचमें विचारके उपराम कालमें अन्य व्यापारोंमें भी प्रवृत्ति हो सकती है, अतः उनकी निवृत्तिके लिए 'श्रोतव्यः' यह परिसंख्याविधि है। भाव यह है कि औषधोंके परिज्ञानके लिए वैद्यकके ग्रन्थोंके श्रवणमें पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, क्योंकि औषधका ज्ञान केवल वैद्यकग्रन्थोंसे ही होता है, अन्य ग्रन्थोंसे नहीं होता। इस परिस्थितिमें यद्यपि दवाके ज्ञानके लिए वैद्यकग्रन्थोंके श्रवणके बिना अन्य व्यापारकी प्रसक्ति नहीं है, तो भी विषयवासनाओंके बलसे मध्यमें इतर व्यापारोंमें पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वके यथार्थज्ञानके लिए वेदान्तश्रवणमें प्रवृत्त पुरुष जन्म-जन्मान्तरकी भेदवासनाओंसे आकृष्ट होकर कदाचित् मध्य-मध्यमें अन्य लौकिक और वैदिक व्यापारोंमें भी प्रवृत्त हो सकता है, अतः मध्यमें प्राप्त अन्य व्यापारोंकी निवृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह परिसंख्याविधि है।
[ परन्तु जैसे सुश्रुत, चरक आदिके श्रवणमें प्रवृत्त पुरुषको अन्य व्यापार— अन्य शास्त्र श्रवण आदि करनेपर भी चिकित्साका ज्ञान होता है, वैसे ही वेदान्तके श्रवणमें प्रवृत्त पुरुषको बीच-बीचमें अन्य व्यापार करनेपर भी ब्रह्मज्ञान हो सकता है, इसलिए परिसंख्याविधिका स्वीकार निष्फल है ? नहीं, निष्फल नहीं है ] क्योंकि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' ( ब्रह्मनिष्ठ पुरुष अमृतत्व प्राप्त करता है ) इस श्रुतिसे छान्दोग्यमें अनन्यव्यापारत्वका ही मुक्तिके प्रति उपायंरूपसे अवधारण किया गया है, कारण कि सम्पूर्वक 'स्था' धातुके समाप्तिवाची होनेसे ब्रह्मसंस्थाशब्दसे बोधित—ब्रह्ममें समाप्ति अनन्यव्यापाररूप है। और 'तमेवैकं जानथ अन्या
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३९
न्तरप्रतिषेधाच्च । 'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया' इत्यादि-स्मृतेश्च । न च ब्रह्मज्ञानानुपयोगिनो व्यापारान्तरस्य एकस्मिन् साध्ये श्रवणेन सह समुच्चित्य प्राप्त्यभावान्न तन्निवृत्त्यर्थः परिसङ्ख्याविधिर्युज्यते इति वाच्यम् , 'सहकार्यन्तरविधिः' ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ अधि० १४ सू० ४७ ) इत्यादिसूत्रे 'यस्मात् पक्षे भेददर्शनप्राबल्यान्न प्राप्नोति, तस्मान्नियमविधिः' इति तद्भाष्ये च कृतश्रवणस्य शाब्दज्ञानमात्रात्
वाचो विमुञ्चथ' ( हे मुमुक्षु लोगो ! जिस आधारमें आकाश आदि समस्त जगत् अध्यस्त है, उसी आधारभूत एकरूप आत्माको जानो और अनात्मप्रतिपादक शब्दोंका त्याग करो ) इस श्रुतिसे आथर्वणमें कण्ठसे ही अर्थात् अभिधावृत्तिसे ही शास्त्रान्तरश्रवणका प्रतिषेध किया है, और 'आसुप्तेरामृतेः कालम्०' ( सुप्ति और मृति पर्यन्त कालको वेदान्तके चिन्तनसे वितावे ) इस प्रकारकी स्मृति भी है अर्थात् यह स्मृति भी अन्य व्यापारका प्रतिषेध करती है । परन्तु* ब्रह्मज्ञानरूप एक साध्यमें श्रवणके साथ साथ अनुपयुक्त अन्य व्यापारकी प्राप्ति नहीं होनेसे उसकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि युक्त नहीं है ? नहीं, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यादि सूत्रमें और 'यस्मात् पक्षे भेददर्शनप्राबल्यात् न प्राप्नोति, तस्मान्नियमविधिः' इस प्रकारके उस सूत्रके भाष्यमें—जिसने श्रवण किया
* शङ्का और उत्तर करनेवालोंका अभिप्राय यह है कि परिसंख्याविधि वहीं होती है, जहाँ एक वस्तुके उत्पादनमें एक साथ दो साधनोंकी प्राप्ति हो । परन्तु प्रकृतमें ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञानका उत्पादन करना है, इसके उत्पादनमें श्रवण कारण है, न कि अन्य व्यावहारिक व्यापार, इसलिए एक साथ दो साधनोंकी प्राप्ति न होनेसे अन्य व्यापारकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि कैसे होगी ? इसका उत्तर प्रतिबन्दी है अर्थात् भाष्यकारने निदिध्यासनमें नियमविधि मानी है, इसमें कारण केवल यही बतलाया है—श्रवणके बाद शाब्दज्ञानसे अपनेको धन्य समझनेवाला निदिध्यासनमें, जो साक्षात्कारका उपयोगी है, कदाचित् प्रवृत्त न होकर अन्य अनुपयुक्त लौकिक व्यापारमें प्रवृत्त हो जाय, इसलिए निदिध्यासनमें नियमविधिका अङ्गीकार है। उत्तरवादीका भाव यह है—साक्षात्कारके जननमें पक्षमें असाधनकी प्राप्तिकी सम्भावनामात्रसे निदिध्यासनके अप्राप्तांशकी परिपूर्तिसे जैसे नियमविधि मानी गई है, वैसे ही प्रकृतमें श्रवणके साथ समुच्चयसे सम्भावनामात्रसे असाधन की प्राप्ति है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए अवश्य श्रवणको परिसंख्याविधि मानना चाहिए ।
४० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
कृतकृत्यतां मन्वानस्याऽविद्यानिवर्तकसाक्षात्कारोपयोगिनि निदिध्यासने प्रवृत्तिर्न स्यादिति अतत्साधनपक्षप्राप्तिमात्रेण निदिध्यासने नियमविधेरभ्युपगततया तन्न्यायेनाऽसाधनस्य समुच्चित्य प्राप्तावपि तन्निवृत्तिफलकस्य परिसङ्ख्याविधेः सम्भवादिति ।
नियमः परिसङ्ख्या वा विध्यर्थोऽत्र भवेद्यतः ॥
अनात्मादर्शनेनैव परात्मानमुपास्महे ॥ १ ॥
इति वार्तिकवचनानुसारिणः केचिदाहुः ॥
श्रवणं ह्यागमाचार्यवाक्यजं ज्ञानमिष्यते ॥
अयोग्येऽत्र विधिर्नैति वाचस्पतिमत्तानुगाः ॥१३॥
शास्त्र और आचार्यके वचनोंसे उत्पन्न होनेवाला आत्मज्ञान ही श्रवण है, अतः उक्त तीनों विधियोंके अविषय श्रवणमें ( कोई भी ) विधि नहीं है, यह वाचस्पतिके अनुयायियोंका मत है ॥ १३ ॥
'आत्मा श्रोतव्यः' इति मननादिवत् आत्मविषयकत्वेन निवध्य-
है और जो शब्दके श्रवणसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानमात्रसे अपनेको कृतकृत्य मानता है तथा अन्य व्यापारोंमें भी जिसकी प्रवृत्ति है, ऐसे पुरुषकी अविद्याकी निवृत्ति करनेवाले साक्षात्कारके उपयोगी निदिध्यासनमें कदाचित् प्रवृत्ति न हो, इसलिए पक्षमें ज्ञानके असाधनकी प्राप्तिमात्रसे निदिध्यासनकी—नियमविधि मानी गई है, इसी न्यायसे समुच्चयसे असाधनकी प्राप्ति होनेपर उसकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि हो सकती है, इस प्रकार 'नियमः परिसंख्या वा०' (इस 'आत्मावा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्यमें नियम विधिप्रत्ययका अर्थ होगा । अथवा श्रवणके नित्य प्राप्त होनेसे नियम यदि विधिका अर्थ न हो सके, तो परिसंख्या ही विधिप्रत्ययका अर्थ हो, क्योंकि हम उपासक लोग अनात्मादर्शनसे ही—अनन्यव्यापारसे ही परमात्माकी उपासनामें प्रवृत्त हैं) इस वार्तिकवचनका अनुसरण करनेवाले कुछ लोग कहते हैं ।
मनन आदिके समान 'आत्मा श्रोतव्यः' ( आत्माका श्रवण करना चाहिए ) इस प्रकार आत्मविषयकत्वरूपसे कहा गया श्रवण भी आगम—शास्त्र और
विधिविचार ] भाषानुवादसहितं ४१
मानं श्रवणमागमाचार्योपदेशजन्यमात्मज्ञानमेव, न तु तात्पर्यविचाररूपमिति न तत्र कोऽपि विधिः ।
आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न होनेवाला आत्मज्ञान ही है, तात्पर्यविचाररूप नहीं है, अतः श्रवणमें कोई विधि नहीं है। भाव यह है कि जैसे मनन और निदिध्यासन, जो आत्माको विषय करते हैं, ज्ञानरूप हैं, वैसे ही श्रवण भी, जो आत्माको विषय करता है, ज्ञानरूप ही है, क्योंकि 'आत्मा श्रोतव्यः' इस श्रुतिमें आत्मा और श्रवणका परस्पर विषय-विषयिभाव सम्बन्ध प्रतीत होता है, अतः श्रवण आत्मविषयक है। यदि श्रवण विचाररूप माना जाय, तो वह आत्मविषयक न होगा और श्रवणक्रियाका कर्म आत्मा न होगा, किन्तु वेदान्तवाक्य होंगे। इससे मनन आदिमें क्लृप्त आत्मरूप कर्मका परित्याग होनेसे प्रक्रमका भङ्ग होगा। [ परन्तु मनन आदिका जो दृष्टान्त दिया गया है, उसपर कुछ आलोचना करनी चाहिए, क्योंकि आपाततः मननशब्दका अर्थ—ज्ञान नहीं होता है। मननका अर्थ है—युक्तियोंसे किसी वस्तुकी आलोचना करना अर्थात् एक वस्तुको युक्ति-प्रयुक्तियोंसे टटोलना, इससे हम मननको ज्ञानरूप नहीं मान सकते, व्यापारात्मक ही मान सकते हैं। इसी प्रकार निदिध्यासन भी ज्ञानरूप नहीं हो सकता, क्योंकि निदिध्यासन शब्दकी निष्पत्ति चिन्तार्थक 'ध्यै' धातुसे हुई है, इसलिए 'मनन आदिके समान' यह दृष्टान्त युक्त नहीं है। इसपर यह कहा जाता है कि मनन व्यापाररूप नहीं है, किन्तु अनुमितिज्ञानरूप है। और वह अनुमिति—आत्मा ब्रह्मस्वभाव है, चिद्रूप होनेसे, ब्रह्मके समान। बुद्धि आदि कल्पित हैं, दृश्य होनेसे, शुक्तिरजतके समान—इस प्रकार है। इसमें मैत्रेयीब्राह्मणका वार्तिक प्रमाण है—
आगमार्थविनिश्चित्यै मन्तव्य इति भण्यते ।
वेदशब्दानुरोध्यत्र तर्कोऽपि विनियुज्यते ॥
पदार्थविषयस्तर्कः तथैवाऽनुमितिर्भवेत् ।
श्रुतिके अर्थको दृढ करनेके लिए तर्करूप मननका विधान किया जाता है, वह तर्क वेदाविरोधी होता है तथा तत्त्वंपदार्थविषयक और अनुमित्यात्मक होता है, यह इसका भाव है। जब अनुमितिरूप मनन है, तो उसे ज्ञानरूप मानने-
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४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
अत एव समन्वयसूत्रे ( उ० मी० अ० १ पा० १ सू० ४ ) आत्मज्ञानविधिनिराकरणानन्तरं भाष्यम्—'किमर्थानि तर्हि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादीनि वचनानि विधिच्छायानि ? स्वाभाविकप्रवृत्तिविषयविमुखीकरणार्थानीति ब्रूमः' इत्यादि ।
में क्या हानि है ? इसी प्रकार निदिध्यासन भी ज्ञानरूप है, क्योंकि बृहदारण्यके ४र्थ और ६ष्ठ अध्यायगत मैत्रेयीब्राह्मणमें भगवती श्रुति कहती है—'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः' । अनन्तर छठे अध्यायमें 'मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते' और चौथे अध्यायमें 'मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेन' इस प्रकार निदिध्यासनके अनुवादके लिए विज्ञानशब्दका प्रयोग किया गया है, इससे वार्तिककार ज्ञानरूपसे निदिध्यासनका भी अङ्गीकार करते हैं, अतः 'अपरायत्तबोधोऽत्र निदिध्यासनमुच्यते' इस प्रकार वार्तिककारकी उक्ति भी उपलब्ध होती है। इसलिए मनन आदिका ज्ञानरूपसे अङ्गीकार होनेसे दृष्टान्तासिद्धि नहीं है—अब प्रसङ्गसे यहाँ एक शङ्का यह भी होती है—निदिध्यासन और दर्शनके अर्थात् 'निदिध्यासितव्यः' और 'द्रष्टव्यः' इन दो पदोंके एकार्थक होनेसे पुनरुक्ति होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'द्रष्टव्यः' इस शब्दसे विचारप्रयोजक—विचारमें प्रवृत्तिके उपयुक्त आपाततः दर्शनका अनुवाद है और 'निदिध्यासितव्यः' इस शब्दसे विचारका फलभूत जो साक्षात्कार है, उसका अनुवाद है, अतः पुनरुक्ति नहीं है ]।
[ श्रवणमें विधि नहीं है, इसमें भाष्यकी सम्मति भी है ] इसीसे—श्रवण और मनन आदिके ज्ञानरूप होनेके कारण विधिके अयोग्य होनेसे—'तत्तु समन्वयात्' इस समन्वयसूत्रमें आत्मज्ञानकी विधिके निराकरणके पश्चात् भाष्य है—'किमर्थानि तर्हि 'आत्मावा अरे....ब्रूमः' इत्यादि। (यदि आत्मज्ञानकी विधि नहीं है, तो 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि 'अध्येतव्यः' इत्यादि विधिके समान वचन किसलिए हैं ? स्वाभाविक प्रवृत्तिके विषयसे विमुख करनेके लिए ऐसे वचन हैं, ऐसा हम कहते हैं)
* स्वभावसे—अविद्यासे होनेवाली प्रवृत्तिका नाम स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
† इसमें आदिशब्दसे 'यो हि बहिर्मुखः पुरुषः प्रवर्तते' 'इष्टञ्च मे भूयादनिष्टञ्च मा भूत्' इत्यादि भाष्यका संग्रह करना चाहिए, इस भाष्यका अभिप्राय है कि जो पुरुष बहिर्मुख है, वह मुझे इष्ट वस्तु प्राप्त हो और अनिष्ट प्राप्त न हो, इस बुद्धिसे बाहरके विषयोंमें ही प्रवृत्त होता
विधिविचार ] भाषानुवादसहितं ४३
यदि च वेदान्ततात्पर्यविचाररूपं श्रवणम्, तदा तस्य तात्पर्यनिर्णयद्वारा वेदान्ततात्पर्यभ्रमसंशयरूपप्रतिबन्धकनिरास एव फलम्; न प्रतिबन्धकान्तरनिरासो ब्रह्मावगमो वा। तत्फलकत्वं च तस्य लोकत एव प्राप्तम्। साधनान्तरं च किञ्चिद्विकल्प्य समुच्चित्य वा न प्राप्तमिति न तत्र विधित्रयस्याऽप्यवकाशः।
इत्यादि। [ तात्पर्य यह है यदि 'श्रोतव्यः' इत्यादि वेदान्तवाक्य विधायक नहीं हैं, तो 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि विधायक-वाक्योंमें तव्यप्रत्यय निरर्थक होंगे ? इस प्रश्नपर भगवान् भाष्यकारका कहना है कि निरर्थक नहीं हैं, क्योंकि उन तव्य आदि प्रत्ययोंसे श्रवण आदिकी स्तुति होती है। जो मुमुक्षु श्रवण आदिमें मोक्षकी साधनताका अनुभव करके भी संन्यास, ब्रह्मचर्य आदिके अनुष्ठानके क्लेशोंसे उनमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्त नहीं होता और साधारणतया प्राप्त वर्णाश्रमके अनुकूल कर्म और उपासनाओंका अनुष्ठान करता हुआ भी उनसे निवृत्ति नहीं पाता है, उन वर्णाश्रम कर्मोंमें आत्यन्तिक मोक्ष-साधनताके अभावका अनुसन्धान कराते हुए ये 'तव्य' आदि प्रत्यय उसके प्रति श्रवण आदिकी प्रशंसा करते हैं अर्थात् 'मुमुक्षु पुरुष सम्पूर्ण उत्साहसे श्रवण आदिमें ही प्रवृत्त हो, क्योंकि वे ही मुक्तिके साधन हैं' इस प्रकार प्रशंसा द्वारा 'तव्य' आदि प्रत्यय पुरुषके प्रवर्तक हैं, अतः विधायक न होनेपर भी 'तव्य' आदि प्रत्यय निरर्थक नहीं हैं ]।
यदि श्रवणको ज्ञानरूप न मानकर वेदान्ततात्पर्यविचाररूप ही मानें, तो भी तात्पर्यनिश्चय द्वारा वेदान्तोंके तात्पर्यभ्रम या तात्पर्यसंशयरूप प्रतिबन्धकका निराकरण ही श्रवणका फल है; अन्य प्रतिबन्धकका—पापका निरास या ब्रह्मज्ञान उसका फल नहीं है। भ्रमादिरूप जो प्रतिबन्धक है, उसका निराकरणरूप श्रवणका फल तो लोकसे ही प्राप्त है और अन्य साधन—अर्थात् ब्रह्मज्ञानमें श्रवण आदिसे अन्य कोई कारण विकल्पसे या समुच्चयसे प्राप्त भी नहीं है, इसलिए तीन विधियोंमें से किसी भी विधिका अवकाश नहीं है।
है, 'आत्मा वा अरे' इत्यादि श्रुतिस्थ तव्य प्रत्यय उस पुरुषकी स्वाभाविक बाह्य प्रवृत्तिको हटाकर प्रशंसा द्वारा आभ्यन्तर प्रवृत्ति कराते हैं।
| ४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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विचारविध्यभावेऽपि विज्ञानार्थतया विधीयमानं गुरूपसदनं दृष्टद्वारसम्भवे अदृष्टकल्पनायोगात् गुरुमुखाधीनवेदान्तविचारद्वारैव विज्ञानार्थं पर्यवस्यतीति । अत एव स्वप्रयत्नसाध्यविचारव्यावृत्तिः । अध्ययनविध्यभावे तूपगमनं विधीयमानमक्षरावाप्त्यर्थत्वेनाऽविधीयमानत्वान्न तदर्थं गुरुमुखोच्चारणानूच्चारणमध्ययनं द्वारीकरोतीति लिखितपाठादिन्यावृत्त्यसिद्धेः सफलोऽध्ययननियमविधिः ।
वेदान्तविचारकी विधि न होनेपर भी गुरूपसदनका—गुरुके पास विज्ञानार्थ गमनका, जिसका कि विज्ञानरूप प्रयोजनके लिए विधान है, गुरुमुखके अधीन वेदान्तविचारके द्वारा ही विज्ञानमें पर्यवसान होता है अर्थात् 'गुरुमेवोपगच्छेत्' इत्यादिसे गुरुके समीपमें विहित जो गमन है, वह गुरुमुखसे सम्पादित वेदान्तविचाररूप दृष्ट द्वारा विज्ञानकी—आत्मज्ञानकी उत्पत्ति करेगा अदृष्ट द्वारा नहीं । क्योंकि जब तक दृष्ट द्वारकी सम्भावना हो, तब तक अदृष्ट द्वारका अङ्गीकार करना उचित नहीं है । इसीसे—'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' ( उसके ज्ञानके लिए गुरुके पास ही जावे ) इस उपगमनविधिसे ही अपने आप—गुरुके बिना स्वतः प्रयत्नसे किये गये वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति हो सकती है, तो पुनः 'श्रोतव्यः' को स्वप्रयत्नसाध्य विचारके निरासके लिए विधि माननेकी आवश्यकता नहीं है । [ परन्तु पहले कहा जा चुका है कि उपगमनविधि विचारविधिकी अङ्ग है, अतः विचारविधि यदि न मानी जाय तो उपगमनविधिका स्वरूप ही न बनेगा, इसलिए विचारविधिका स्वीकार अवश्य करना चाहिए ? नहीं—इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके प्रति गुरूपसदन जब द्वारकी ( मध्यवर्ती व्यापारकी ) अपेक्षा करेगा, तब लोकसिद्ध गुरुके अधीन विचार ही द्वाररूपसे प्राप्त हो सकता है, अतः श्रोतव्यविधिकी अपेक्षा ही नहीं है, तो उपगमनविधि विचारविधिकी अङ्ग नहीं है और विचारके समान उपगमन भी विद्याका अङ्ग हो सकता है, इससे पूर्वोक्त शङ्काका अवसर नहीं है । ] यदि अध्ययनविधि न मानी जाय, तो विधीयमान जो उपगमन है, वह अक्षरग्रहणके लिए नहीं है, इससे वह अक्षरग्रहणके लिए गुरुमुख-उच्चारणके अनन्तर उच्चारणकी अर्थात् अध्ययनकी ( वेदाध्ययनमें पहले वेदमन्त्रको गुरु कहते हैं अनन्तर शिष्य उसीका उच्चारण
[विधिविचार ] भाषानुवादसहित ४५
न च तात्पर्यादिभ्रमनिरसाय वेदान्तविचारार्थिनः कदाचित् द्वैत- शास्त्रेऽपि प्रवृत्तिः स्यात्। तत्राऽपि तदभिमतयोजनया वेदान्तविचार- सत्त्वात् इत्यद्वैतात्मपरवेदान्तविचारनियमविधिरर्थवानिति वाच्यम् , स्वय- मेव तात्पर्यभ्रमहेतोस्तस्य तन्निरासकत्वाभावेन साधनान्तरप्राप्त्यभावात्।
करता है) द्वाररूपसे अपेक्षा नहीं करेगा, अतः लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति- रूप फलकी असिद्धि होनेसे अध्ययनविधि सार्थक है। [ तात्पर्य यह है कि पहले अतिप्रसङ्ग दिया है—'श्रवणविधिको, जो गुरूपसदनके प्रति प्रधानविधि है, न मानकर अङ्गमूत उपगमनविधि मानी जाय, तो अध्ययनाङ्ग उपगमन- विधिसे ही लिखित पाठकी व्यावृत्ति हो जायगी, अतः अध्ययनकी नियमविधि व्यर्थ होगी', इस अतिप्रसङ्गका परिहार करनेके लिए उपर्युक्त ग्रन्थ है अर्थात् अध्ययनविधिका अङ्गीकार न किया जायगा, तो उपगमनविधिसे लिखित- पाठकी व्यावृत्ति नहीं होगी, क्योंकि 'गुरुमुखसे अक्षरोंका ग्रहण करना इस अर्थका विधायक न उपगमनविधिवाक्य है और न इतरविधिवाक्य है, इसलिए अध्ययनविधि उक्त व्यावृत्तिके लिए अपेक्षित है, अतः श्रवणविधिके न माननेपर भी कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है ] ।
[ अब श्रवणको विधि माननेवाले यह शङ्का करते हैं कि यद्यपि तुम्हारे कथनके अनुसार श्रवणविधिका स्वप्रयत्नसाध्य विचार व्यावत्र्य नहीं है, तथापि अन्य व्यावत्र्य है, क्योंकि ] वेदान्तके विचारको चाहनेवाले पुरुषकी तात्पर्य आदिके भ्रमके निराकरण करनेके लिए कदाचित् द्वैतशास्त्रमें ( उस शास्त्रमें, जिसमें ईश्वर और जीवका भेदप्रतिपादन किया गया है ) प्रवृत्ति हो सकती है, कारण कि द्वैतप्रतिपादक शास्त्रमें भी अपने मतके अनुकूल वेदान्तका विचार किया गया है, इसलिए अद्वैत आत्मपरक वेदान्तविचार श्रवणकी नियमविधि सार्थक है—श्रवणविधिका खण्डन करना अकाण्डताण्डव है ? नहीं, यह शङ्का व्यर्थ है, क्योंकि जो स्वयं तात्पर्यभ्रमका कारण है, वह तात्पर्यभ्रमका निराकरणकर्ता कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता, इसलिए अन्य साधनकी प्राप्ति ही नहीं है [ भाव यह है कि जो द्वैतशास्त्र हैं, वे सब-के सब तात्पर्यभ्रमको उत्पन्न करनेवाले हैं, हटानेवाले नहीं हैं, इससे तात्पर्यभ्रमके दूरीकरणके लिए अद्वैत-शास्त्रको छोड़कर द्वैत-
| ४६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेदे |
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तन्निरासकत्वभ्रमेण तत्रापि कस्यचित्प्रवृत्तिः स्यादित्येतावता 'श्रोतव्यः' इति नियमविधेरभ्युपगम इत्यपि न । ईश्वरानुग्रहफलाद्वैतश्रद्धारहितस्य श्रोतव्यवाक्येऽपि पराभिमतयोजनया सद्वितीयात्मविचारविधिपरत्वभ्रमसम्भवेन भ्रमप्रयुक्ताया अन्यत्र प्रवृत्तेर्विधिशतेनाऽप्यपरिहार्यत्वात् ।
शास्त्रकी प्राप्ति ही नहीं है, अतः द्वैत-शास्त्रीय विचारकी व्यावृत्ति करनेके लिए श्रवणकी नियमविधि मानना केवल दुराग्रह है । इस विषयमें और भी शङ्का करते हैं कि ] यद्यपि द्वैत-शास्त्रीय विचार तात्पर्यभ्रमका निवर्तक नहीं है, तथापि निरासकत्वभ्रमसे—'भिन्नात्मज्ञानं मुक्तिसाधनम्' (द्वैतात्मज्ञान मुक्तिका हेतु है) इस प्रकारके भ्रमसे द्वैतशास्त्रमें भी किसी पुरुषकी प्रवृत्ति हो सकती है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए 'श्रोतव्यः' इस नियमविधिका अङ्गीकार है, परन्तु यह भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि अद्वैत-श्रद्धासे, जो ईश्वरकी अनुकम्पाका फल है, शून्य पुरुषकी 'श्रोतव्यः' वाक्यमें भी अन्यमतानुसारी योजनासे सद्वितीयात्मविचारविधिपरत्वका भ्रम हो सकता है इससे भ्रमप्रयुक्त द्वैतवस्तुपरक शास्त्रमें प्रवृत्तिका सैकड़ों विधियोंसे भी परिहार नहीं हो सकता । इसका विशद भाव यह है—इस बातका शास्त्रोंमें निर्विवादरूपसे प्रतिपादन किया गया है कि श्रवणविधिमें वही पुरुष अधिकारी है, जिसको जन्म-जन्मान्तरमें यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे बलवती ब्रह्मज्ञानकी इच्छा है और साधन-चतुष्टयसम्पत्ति भी—अर्थात् नित्य और अनित्य वस्तुका विवेचनात्मक ज्ञान, इस लोकके और परलोकके फलभोगमें वैराग्य, मुमुक्षुता, और शम-दमादि—जिसको प्राप्त है। क्योंकि यज्ञ आदिसे सम्पादित जो अदृष्ट है, वह निष्प्रपञ्च अद्वितीय ब्रह्मसाक्षात्कारमें साङ्गवेदान्तके अध्ययनसे लब्ध वेदान्तोंसे मुक्तिकी साधनताके निश्चयका सम्पादन करके अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारमें विविदिषाकार अद्वैत ब्रह्मज्ञानकी इच्छाका उत्पादन करता है और उसके द्वारा अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारके साधन अद्वितीयआत्माके श्रवण आदिमें मुमुक्षु पुरुषको प्रवृत्त करता है, नकि जीवभिन्न आत्मज्ञानमें मुक्तिकी साधनताका भ्रमात्मक ज्ञान उत्पन्न कर उसके द्वारा भिन्नात्मज्ञान और इसके कारणविचार आदिमें इच्छा, प्रवृत्ति आदिका उत्पादन करता है, क्योंकि द्वैतात्मज्ञानकी इच्छामें भिन्नात्मविचार द्वारा यज्ञ आदिके फलभूत निष्प्रपञ्च ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ४७
न च व्यापारान्तरनिवृत्त्यर्था परिसङ्ख्येति वाच्यम्, असंन्यासिनो व्यापारान्तरनिवृत्तेरशक्यत्वात् । संन्यासिनस्तन्निवृत्तेः ब्रह्मसंस्थया सह संन्यासविधायकेन 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इति श्रुत्यन्तरेण
नहीं है; ऐसी स्मृति भी है— 'ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना'
यज्ञ आदिसे सम्पादित ईश्वरानुग्रहसे ही पुरुषोंको अद्वैत ब्रह्मज्ञानकी इच्छा होती है, यह भाव है । इससे जिस पुरुषको भिन्न आत्मज्ञानमें मुक्तिसाधनत्वका भ्रम है उसमें अद्वैत साक्षात्कारकी इच्छा आदिके न रहनेसे श्रवणविधिमें उसका अधिकार ही नहीं है और उसके प्रति नियमविधि सार्थक भी नहीं है, इसलिए भ्रमी पुरुषकी अन्यत्र प्रवृत्तिका किसी प्रकारसे भी निराकरण नहीं कर सकते हैं, और ईश्वरके अनुग्रहसे अद्वैतमें जिसकी श्रद्धा ही नहीं हुई है, ऐसे पुरुषकी पराभिमतयोजनासे—'आत्मा श्रोतव्यः' इस श्रुतिमें आत्माका अर्थ जीव है, परमात्मा नहीं, क्योंकि 'आत्मनस्तु कामाय' इत्यादि पूर्व वाक्यमें जीव ही प्रकृत है, और 'इदं सर्वं यदयमात्मा' इस प्रकारके वाक्यशेषमें परमात्माका प्रतिपादन किया गया है, इससे 'श्रोतव्यः' वाक्यमें आत्मा—परमात्मा ही है यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वाक्यशेषमें भी परमात्माका प्रतिपादन नहीं कर सकते, कारण कि 'जो यह सब है, वह परमात्मा है' इस प्रकार प्रपञ्च और परमात्माका, जो जड़ और चेतन हैं, परस्पर तादात्म्य नहीं बन सकता । अतः उक्त श्रुति अभेदध्यानपरक है, अद्वैतपरक नहीं—इस प्रकारकी श्रवणवाक्यकी योजनासे भी द्वैतविचारमें भ्रमप्रयुक्त प्रवृत्ति हो सकती है, उसका निराकरण सैकड़ों विधियोंसे भी नहीं हो सकता । ]
श्रवणमें परिसंख्याविधि माननेवाले शङ्का करते हैं कि अन्य व्यापारकी निवृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' वाक्यमें परिसंख्याविधि माननी चाहिए; परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि [ श्रवणविधिसे गृहस्थ आदिके व्यापारकी निवृत्ति होती है या संन्यासीके व्यापार की निवृत्ति होती है ? इन दो विकल्पोंमें पहला पक्ष युक्त नहीं है ] असंन्यासीके-गृहस्थ आदिके व्यापारकी निवृत्ति नहीं कर सकते, कारण कि ऐसा करनेपर अन्य श्रुतियोंसे, जो ब्रह्मसंस्थासे अतिरिक्त व्यापारोंका गृहस्थके प्रति विधान करती हैं, विरोध होगा, [ द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ] संन्यासीके