संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१९३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इस प्रकार चौंसठ गोत्रोंके श्रेष्ठ ब्राह्मण महात्मा त्रिजातद्वारा वहाँ लाये गये। वे सब मिलकर लगभग पंद्रह सौ ब्राह्मण एकत्र हुए थे। सभी वहाँ समान भागके उपभोक्ता हुए। सबकी समान स्थिति मानी गयी। क्रमशः सबका वंश बढ़ने लगा और उनके सहस्रों पुत्र, पौत्र, नप्ता, दौहित्र तथा भागिनेयोंसे पुनः सारा नगर भर गया। जो मनुष्य सदा भक्तिभावसे इस चरित्रका पाठ करता है, इस पृथ्वीपर उसकी सन्तानका कभी नाश नहीं होता।
रैवत और क्षेमंकरीद्वारा रैवतेश्वर तथा कात्यायनीकी स्थापना
सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! पूर्वकालमें तक्षक नाग सौराष्ट्र देशके राजाके यहाँ पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ। वहाँ उसका नाम रैवत था। उन्हीं दिनों आनर्तदेशमें राजा प्रभंजन राज्य करते थे। उनका बहुत-से राजाओंके साथ वैर बँध गया था। इसलिये शत्रु उनका देश उजाड़ते और पशुओंको बलपूर्वक हर ले जाते थे। अतः उन शत्रुओंके साथ उनका सदैव युद्ध होता रहता था। उसी समय उनकी धर्मपत्नी प्रियंवदाने ऋतुस्नाता होकर गर्भधारण किया। समयानुसार कमलके समान नेत्रोंवाली एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जिसने रातके अन्धकारमें भी अपनी अंगकान्तिसे सूतिकागृहको प्रकाशित कर दिया था। राजा प्रभंजनने पुत्रकी ही भाँति उस कन्याके जन्मका उत्सव मनाया। सब ओर गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि छा रही थी। तेरहवें दिन भूपालने ब्राह्मणोंके आगे कन्याका नामकरण-संस्कार किया। उसका नाम क्षेमंकरी हुआ। वह 'यथा नाम तथा गुण' थी। धीरे-धीरे जब कन्या बड़ी हुई, तब वैवाहिक शुभ लग्नमें राजाने सौराष्ट्रनाथ रैवतके साथ उसका विवाह कर दिया। उन दोनों नवदम्पतिसे रेवती नामवाली एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका विवाह बलरामरूपमें अवतीर्ण हुए नागराज शेषके साथ हुआ था। राजा रैवत और क्षेमंकरीसे प्रौढ़ा अवस्था आ जानेपर भी कोई वंशप्रवर्तक पुत्र नहीं हुआ। इसके कारण उन दोनोंके मनमें बड़ा दुःख था। वे अपना सारा राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर पुत्रके लिये तप करनेके उद्देश्यसे तपोभूमिमें चले गये। वहाँ विन्ध्याचल पर्वतपर अपने लिये आश्रम बनाकर दोनों एकाग्रचित्तसे रहने लगे और कात्यायनी देवीकी स्थापना करके उनकी आराधनामें संलग्न हो गये। कात्यायनी देवी वही हैं, जिन्होंने कौमार-व्रत धारण करके महिषासुरका वध किया था। देवीने उन दोनोंकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर उन्हें एक वंशवर्द्धक पुत्र प्रदान किया, जो क्षेमजितके नामसे प्रसिद्ध हुआ। पुत्र पाकर सौराष्ट्रराज रैवत अपनी राजधानीको लौट आये और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका लालन-पालन किया। क्षेमजित जब युवावस्थाको प्राप्त हुआ, तब राजाने उसे अपने स्थानपर अभिषिक्त किया और स्वयं वे सब कुछ त्यागकर पत्नीके साथ हाटकेश्वरक्षेत्रमें चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान् शंकरका मनोहर मन्दिर बनवाया और एकाग्रचित्त होकर रैवतेश्वर नामवाले शिवलिंगकी स्थापना की, जो दर्शनमात्रसे समस्त देहधारियोंके पापोंको नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें राजा रैवतने जिन दुर्गादेवीका स्थापन किया था, उन्हींका
१४ समावर्तन, १५ विवाह, १६ उपाकर्म, १७ उत्सर्जन, १८ से २४ तक सात प्रकारके पाकयज्ञ—१ हुत, २ प्रहुत, ३ आहुत, ४ शूलगव, ५ बलिहरण, ६ प्रत्यवरोहण, ७ अष्टका होम, २५ से ३१ तक सात हविर्यज्ञसंस्था—१ अन्वाधान, २ अग्निहोत्र, ३ दर्शपौर्णमास, ४ चातुर्मास्य, ५ आग्रयणेष्टि, ६ निरूढ पशुबन्ध, ७ सौत्रामणि, ३२ से ३८ तक सात सोमयज्ञसंस्था—१ अग्निष्टोम, २ अत्यग्निष्टोम, ३ उक्थ्य, ४ षोडशी, ५ वाजपेय, ६ अतिरात्र, ७ आप्तोर्याम, ३९ वानप्रस्थ, ४० संन्यास, ४१ दया, ४२ अनसूया, ४३ शौच, ४४ अनायास, ४५ मंगल्य, ४६ अकार्पण्य, ४७ अस्पृहा, ४८ अन्त्येष्टि।
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हाटकेश्वरक्षेत्रमें उनकी धर्मपत्नी क्षेमंकरीने श्रद्धापूर्वक मन्दिर बनवाया और उसमें कात्यायनी देवीकी प्रतिष्ठा की। तबसे महिषासुरमर्दिनी कात्यायनी वहाँ क्षेमंकरीके नामसे पुकारी जाती हैं। जो मनुष्य चैत्र शुक्ला अष्टमीको उनका दर्शन करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है।
दुर्वासाके शापसे चित्रसम दैत्यका महिष होना, महिषकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा स्वर्ग-विजय, कात्यायनीके द्वारा महिषका वध
ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! कात्यायनीदेवीने महिषासुरका अन्त किस प्रकार किया था, यह बताइये।
सूतजी बोले—पूर्वकालमें हिरण्याक्षका पुत्र महिष नामक दैत्य हुआ था, जिसने भैंसेका रूप धारण करके ही समस्त त्रिलोकीका शासन किया था। पहले वह बड़ा ही सुन्दर तथा तेज और वीर्यसे सम्पन्न था। उस समय लोग उसे चित्रसम कहते थे। चित्रसमको बाल्यावस्थासे ही भैंसेकी सवारीका शौक हो गया था। वह घोड़े आदि सवारियोंको छोड़कर भैंसेपर ही चढ़कर चलता था। एक दिनकी बात है दानव चित्रसम भैंसेपर आरूढ़ होकर चला और गंगाजीके तटपर जाकर जल-पक्षियोंका शिकार करने लगा। वहाँ मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा उत्तम पद्मासन लगाकर गंगाके किनारे समाधि लगाये बैठे थे। दैत्यका चित्त जलपक्षियोंकी ओर लगा था। उसने मुनिको नहीं देखा और भैंसेको आगे बढ़ा दिया। मुनि उसके खुरोंके वेगसे कुचल गये, उनका सारा शरीर लहुलुहान हो गया। उन्होंने आँख खोलकर देखा, तो सामने एक दानव प्रणाम आदिसे रहित उद्धण्डभावसे खड़ा था। तब दुर्वासाने कुपित होकर कहा—'पापी! तुमने भैंसेके खुरोंसे मेरे शरीरको कुचल डाला और मेरी समाधि भंग कर दी, इसलिये तुम भी भैंसा हो जाओ और जबतक जिओ, प्रधानतः भैंसा बने रहो।' मुनिके इतना कहते ही वह बड़ा भारी भैंसा हो गया। तब उसने विनीत भावसे मुनिको प्रसन्न करते हुए कहा—'विप्रवर! मैं बालक हूँ, अनजानमें मुझसे आपका अपराध हो गया; उसे क्षमा करके मेरे शापका अन्त कर दीजिये।'
मुनिने कहा—मेरा वचन व्यर्थ नहीं हो सकता। दुर्मते! जबतक तुम्हारे प्राण रहेंगे, तबतक तो तुम इसी रूपमें रहोगे।
ऐसा कहकर दुर्वासा मुनि गंगाका किनारा छोड़कर अन्यत्र चल दिये। तब वह दैत्य भी शुक्राचार्यके पास जाकर बोला—'गुरुदेव! मुझे दुर्वासाने शाप देकर महिष बना दिया है। अब आप ही मुझे शरण दीजिये। मैं आपके प्रसादसे अपने पूर्वशरीरको पा जाऊँ और मेरी यह पशुयोनि नष्ट हो जाय। ऐसा उपाय कीजिये।'
शुक्राचार्यने कहा—एकमात्र भगवान् महेश्वरको छोड़कर दूसरा कोई भी ऐसा नहीं है, जो दुर्वासाके शापको पलट सके। इसलिये तुम शीघ्र ही हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाकर वहाँके परम उत्तम शिवलिंगकी आराधना करो।
शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर वह दानव शीघ्र ही हाटकेश्वरक्षेत्रमें गया। वहाँ उसने भक्तिभावसे महान् शिवलिंगकी स्थापना करके कैलासशिखरके समान ऊँचा मन्दिर बनवाया और कठिन तपस्यामें तत्पर हो महादेवजीकी आराधना करने लगा। इस प्रकार उसका दीर्घकाल व्यतीत हुआ। तब महादेवजीने सन्तुष्ट होकर उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'दानव! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।'
महिष बोला—मुझे दुर्वासाजीने शाप देकर भैंसा बना दिया है, आपके प्रसादसे मेरी यह पशुयोनि निवृत्त हो जाय। यही प्रार्थना है।
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भगवान् शिव बोले—दुर्वासाके वचनको अन्यथा नहीं किया जा सकता, परंतु तुम्हारे सुखका एक उपाय मैं कर दूँगा, वह यह कि जितने भी दैव, मानव तथा आसुर भोग हैं, वे सब तुम्हें इस शरीरमें प्राप्त होंगे। भोगके लिये ही देवता और असुर मानव-शरीरकी इच्छा करते हैं। तुम्हारा यही शरीर उन सब भोगोंको प्राप्त करेगा।
महिष बोला—देवदेवेश्वर! यदि इस प्रकार सब भोगोंकी प्राप्ति मुझे हो सकती है, तब तो मेरा यही शरीर अवध्य हो जाय। एक स्त्रीके सिवा अन्य कोई भी प्राणी मुझे मार न सके। जो कोई भी मनुष्य मेरे इस तीर्थमें स्नान करे, उसे आपका दर्शन प्राप्त हो तथा उसके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जायँ।
भगवान् शिवने कहा—अगहनके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथिको तुम्हारे इस तीर्थमें स्नान करके जो मेरे उत्तम अर्चा-विग्रहका दर्शन करेगा, उसके भूत, प्रेत और पिशाच आदिसे प्राप्त होनेवाले सब प्रकारके दोष नष्ट हो जायँगे और क्षय आदि रोगोंकी भी निवृत्ति हो जायगी।
इतना कहकर देवेश्वर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तब महिष भी अपने स्थानको लौट गया और सब दानवोंको बुलाकर उनकी सभामें अमर्षयुक्त होकर बोला—'दानवो! देवताओंने श्रीविष्णुको आगे रखकर मेरे पिता, पितृव्य तथा अन्य पूर्वजोंका वध किया है। अतः मैं महायुद्धमें उन देवताओंका नाश करूँगा और उनके हाथसे त्रिलोकीका राज्य छीन लूँगा।'
तब उन दानवोंने कहा—आपने ठीक कहा है, हम आज ही चलकर युद्धमें देवताओंको मार भगावेंगे और स्वर्गमें दिव्य भोगोंका उपभोग करते हुए सुखसे रहेंगे।
ऐसा निश्चय करके दैत्योंने सेवक, सेना और सवारियोंके साथ मेरुशिखरपर प्रस्थान किया। इन्द्र आदि देवताओंने देखा, दैत्योंकी सेना शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित होकर सहसा युद्धके लिये आ पहुँची है। तब वे भी उसका सामना करनेके लिये नगरद्वारके बाहर निकल आये। दोनों दलोंमें गर्जन-तर्जनके साथ तीन वर्षोंतक घोर युद्ध हुआ। अन्तमें अपनी पराजय होती देख देवताओंने आपसमें यह विचार किया कि 'इस समय हम अमरावतीपुरी छोड़कर ब्रह्मलोकमें चले चलें, जहाँ दैत्योंका कोई भय नहीं है।' ऐसा निश्चय करके देवतालोग इन्द्रपुरी खाली करके रातमें ही अन्यत्र चले गये। प्रातःकाल उस पुरीको जनशून्य देखकर दैत्योंने हर्षपूर्वक उसके भीतर प्रवेश किया। तदनन्तर उन्होंने इन्द्रके स्थानपर महिषासुरको बिठाया और उसे प्रणाम करके अपनी विजयका बड़ा भारी उत्सव मनाया। महिषासुर तीनों लोकोंका राज्य करने लगा। वह त्रिलोकीमें जो कोई भी अति उत्तम सारभूत वस्तु—हाथी, घोड़े, रथ, अस्त्र-शस्त्र आदि देखता, सब स्वयं ले लेता था। इस प्रकार स्वेच्छाचारपूर्ण बर्ताव करनेवाले उस दैत्यका वध करनेके लिये सब देवता आपसमें मिलकर विचार करने लगे। इसी समय मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने महिषासुरके द्वारा जो त्रिलोकीका उत्पीड़न हो रहा था, उसका तथा उस दैत्यके उग्र अनाचारपूर्ण कठोर बर्तावका देवताओंसे विस्तारपूर्वक वर्णन किया। यह सब सुनकर देवताओंका कोप बहुत बढ़ गया। उसी अवसरपर कार्तिकेयजी भी वहाँ आये और उन्होंने पूछा—'मुने! देवताओंके कोपका क्या कारण है?' इसके उत्तरमें नारदजीने महिषासुरके अत्याचारका भयंकर चित्र उपस्थित किया। इससे कार्तिकेयजीको बड़ा क्रोध हुआ। उस क्रोधकी अवस्थामें प्रत्येक देवताके मुखसे तेज प्रकट हुआ और सब मिलकर वह एक कुमारी कन्याके रूपमें परिणत हो गया। वह दिव्यतेजोमयी सर्वलक्षणसम्पन्ना कन्या देवताओंके क्रोधमें कार्तिकेयका कोप मिलनेसे प्रकट हुई थी, इसलिये उसका नाम 'कात्यायनी' हुआ। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने उस कन्याको वज्र प्रदान किया,
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स्कन्दने अपनी तीखी एवं भयंकर शक्ति दी, भगवान् विष्णुने धनुष, महादेवजीने त्रिशूल, सूर्यने तीखे बाण, चन्द्रमाने उत्तम ढाल, निर्ऋतिने खड्ग, अग्निने उल्मुक, वायुने तीखी छुरी, कुबेरने परिघ तथा प्रेतराज यमने असुरोंके वधके लिये अपना भयंकर दण्ड प्रदान किया। इन सब अस्त्रोंको देखकर कात्यायनी देवीने अपने बारह हाथ बना लिये और उन हाथोंमें देवताओंके वे सभी उत्तम अस्त्र-शस्त्र ग्रहण कर लिये। तत्पश्चात् कात्यायनीने कहा—‘देववरो! तुमने मेरी सृष्टि किसलिये की है, शीघ्र बताओ। मैं तुम्हारे सब कार्य सिद्ध करूँगी।’
देवता बोले—इस संसारमें इस समय बड़ा भयंकर महिष नामक दानव उत्पन्न हुआ है, जो समस्त प्राणियों तथा विशेषतः मनुष्योंके लिये अवध्य है। एकमात्र स्त्रीको छोड़कर दूसरा कोई उसे मार नहीं सकता। इसीलिये हमने तुम्हें उत्पन्न किया है। अब तुम श्रेष्ठ पर्वत विन्ध्याचलपर जाओ और वहाँ उग्र तपस्या करो, जिससे तुम्हारे तेजकी वृद्धि हो। जब हम तुम्हें तेजसे सम्पन्न जान लेंगे, तब तुम्हींको आगे करके उस दुष्टात्माके साथ युद्ध करेंगे। तदनन्तर तुम्हारे बाणसे दग्ध होकर वह मृत्युको प्राप्त होगा।
देवताओंकी यह बात सुनकर परमेश्वरी कात्यायनीने कहा—देवताओ! आपलोग शीघ्र मुझे कोई वाहन प्रदान करें। तब भगवती पार्वतीने कात्यायनीकी सवारीके लिये सिंह दिया। देवी कात्यायनी उसी सिंहपर आरूढ़ हो विन्ध्याचल पर्वतकी ओर प्रस्थित हुईं और उसके मनोहर शिखरपर पहुँचकर व्रत-उपवासमें संलग्न हो महादेवजीका ध्यान करती हुई इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्यामें संलग्न हो गयीं। ज्यों-ज्यों उनके तपकी वृद्धि होती, त्यों-ही-त्यों शरीरमें रूप और कान्ति भी बढ़ती जाती थी। उस समय दैत्येश्वर महिषके सेवक वहाँ आये और अद्भुत रूप धारण करनेवाली उस व्रतपरायणा देवीको देखकर लौट गये। वहाँ उन्होंने दुष्टात्मा महिषासुरसे इस प्रकार कहा—‘देव! हमने पृथ्वीपर भ्रमण करके एक अपूर्व कुमारी कन्या देखी है, जो विन्ध्याचल पर्वतपर तपस्या करती है। उसके बारह हाथ हैं और उन हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे हैं, उसका सौन्दर्य अद्भुत है।’
सेवकोंका यह वचन सुनकर महिषासुर तत्काल कामदेवके वशमें हो गया और बड़ी भारी सेना साथ लेकर वह उस स्थानपर गया, जहाँ वह कन्या बैठी थी। उसे देखते ही वह दानव कामबाणसे आहत हो गया और अपनी सेनाको दूर रखकर अकेला ही देवीके सामने उपस्थित हुआ। निकट पहुँचकर वह इस प्रकार बोला—‘सुन्दरी! यह व्रत और तपस्या तो तुम्हारी युवावस्थाके विपरीत है। अतः यह सब छोड़कर तुम त्रिलोकके राज्यकी महारानी बनो। तुमने मेरा नाम सुना होगा—मैं दानवराज महिष हूँ, जिसने द्वन्द्वयुद्धमें इन्द्रको परास्त किया है। इस समय त्रिभुवनका राज्य मेरे अधीन है। अतः तुम मेरी प्राणवल्लभा पत्नी हो जाओ। मेरी सहस्रों भार्याएँ हैं। वे सब तुम्हारी दासियाँ हो जायँगी!’
उसकी यह बात सुनकर परमेश्वरी कात्यायनीकी आँखें कोपसे लाल हो गयीं। उन्होंने उस दानवसे फटकारकर कहा—पापाचारी! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है। तू मुझ कुमारव्रत धारण करनेवाली कन्यासे इस प्रकार काम-कलुषितचित्त होकर क्यों ऐसी बात कर रहा है? मैं तेरा नाश कर डालूँगी।
महिषासुर बोला—सुन्दरी! तुम गान्धर्वविवाहसे मुझे आत्मदान करो।
उसकी यह बात सुनकर देवीने उसके मुँहमें एक बाण मारा। वह बाण बाँबीमें घुसनेवाले सर्पकी भाँति उसके मुँहमें समा गया। महिषासुर चीख उठा, उसके मुँहसे खूनकी धारा बहने लगी। वह देवीके पाससे लौट गया और अपने सैनिकोंसे बोला—‘इस दुष्टा स्त्रीको जीती-
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जागती पकड़ लाओ, इसे मेरी पत्नी बनना ही होगा।' महिषासुरकी आज्ञा पाकर सब दानव बाणोंकी बौछार करते हुए देवीकी ओर दौड़े। उन्हें निकट आया देख देवीने खिलवाड़में ही महाबाणोंका प्रहार करके उन सबके मर्मस्थानोंको छेद डाला। कितने ही मृत्युको प्राप्त हो गये और बहुत-से दैत्य घायल होकर सब दिशाओंमें भाग गये। अपनी सेनाको तितर-बितर हुई देख महिषासुर क्रोधमें भरा हुआ स्वयं ही देवीकी ओर दौड़ा और उसने भयानक गर्जना की। उसे देखकर कात्यायनीने बड़े जोरसे अट्टहास किया। उस शब्दसे तीनों लोक गूँज उठे। देवीके अट्टहासयुक्त मुखसे सैकड़ों पुलिन्द, शबर, म्लेच्छ, शक और यवन आदि प्रकट हुए। तब देवीने उन्हें आज्ञा दी—'तुम सब लोग इस दुष्टात्मा महिषासुरकी सेनाके इन बलोन्मत्त दैत्योंका शीघ्र वध करो।' उनका यह आदेश सुनकर वे बलवान् और दुर्धर्ष वीर दैत्योंकी सेनाकी ओर दौड़े। फिर तो उनमें बड़ा भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया। उस समय किसीको अपने-परायेका भान न रहा। देवीके उत्पन्न किये हुए योद्धाओंने सब दानवोंका उत्साह भंग कर दिया। कितने ही दैत्य उनके द्वारा मौतके घाट उतार दिये गये तथा कितने ही उनके भीषण प्रहारोंसे जर्जर हो गये। अपनी सेनाका पाँव उखड़ता देख महिषासुर क्रोधसे उन्मत्त हो उठा और देवीसे कठोर वाणीमें बोला—'ओ पापिनि! अबतक तुझे स्त्री समझकर मैंने युद्धमें नहीं मारा, अब तू मेरा प्रभाव देख।'
ऐसा कहकर महिषासुरने सींगोंके प्रहारसे देवीके ऊपर शिलाखण्ड फेंके और उन्हें बार-बार फटकारा। उस दैत्यको अपने पास आया देख देवी क्रोधपूर्वक आगे बढ़ीं और बड़े वेगसे उसकी पीठपर चढ़ गयीं। चढ़कर उन्होंने लातसे इतना मारा कि वह लहूलुहान हो गया और आकाशमें उछलकर जोर-जोरसे चीत्कार करने लगा। इसी बीचमें देवीकी ही ज्योतिसे प्रकट हुए सिंहने आकर तीखी दाढ़ोंके अग्रभागसे क्रोधपूर्वक उस दैत्यके पिछले अंगोंको पकड़ लिया। फिर तो देवीके पैरोंसे दबा हुआ वह दानव स्थिर हो गया, एक पग भी हिल-डुल नहीं सका। उस विवशताकी दशामें वह केवल भयंकर चीत्कार करता रहा।
इसी समय इन्द्र आदि सब देवता वहाँ आ पहुँचे और आकाशमें स्थित होकर बोले—'देवेश्वरि! इस तीखी तलवारसे शीघ्र ही इसका मस्तक काट डालो।' देवताओंका यह वचन सुनकर देवीने महिषासुरकी मोटी ग्रीवापर खड्गका प्रहार किया। उस खड्गके आघातसे दैत्यकी ग्रीवाके दो टूक हो गये। इससे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उस समय वह महिषरूप त्यागकर ढाल और तलवारको लिये एक तेजस्वी पुरुषके रूपमें प्रकट हो गया और देवीपर खड्गका प्रहार करना ही चाहता था कि देवीने उसकी चोटी पकड़ ली और उसके शरीरका नाश करनेके लिये तलवार उठायी। यह देख वह दुर्गादेवीकी स्तुति करने लगा।
दानव बोला—देवि! आपकी जय हो। अचिन्त्यशक्ते! आपकी जय हो। सब देवताओंकी स्वामिनी! आपकी जय हो। सर्वव्यापिनी देवि! आपकी जय हो। सर्वजनप्रिये! आपकी जय हो। सबका मनोरथ पूर्ण करनेवाली देवि! आपकी जय हो। त्रिभुवनसुन्दरि! आपकी जय हो। भक्तजनोंको आनन्द देनेवाली देवि! आपकी जय हो। दैत्योंका विनाश करनेवाली! आपकी जय हो। देवि! आपको कहींसे भी भय नहीं है। आप तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उद्यत हैं, अतः मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये। प्राणोंकी रक्षा और दयाकी भिक्षा दीजिये। मैं आपके चरणोंकी शरणमें पड़ा हुआ अत्यन्त दीन और विनीत हूँ, मुझपर अनुग्रह कीजिये। देवि! मैं हिरण्याक्षका पुत्र चित्रसम हूँ। महर्षि दुर्वासाने शाप देकर मुझे महिष बना दिया था। आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। साथ ही मेरा वीर्यदर्प भी गल गया। सुरेश्वरि! अब मैं आपके चरणोंका किंकर होकर
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रहूँगा। सब दुष्टोंका विनाश करनेवाली सर्वव्यापिनी देवि! आपकी जय हो।
महिषासुरका यह दीन वचन सुनकर देवीको दया आ गयी। वे आकाशमें खड़े हुए देवताओंसे बोलीं—'देवगण! अब मैं क्या करूँ?' देवता बोले—'देवेश्वरि! यदि इस अधम दानवका वध नहीं करोगी, तब तो यह समस्त चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका विनाश कर डालेगा; फिर तो तुम्हारे प्रादुर्भावके निमित्त किया हुआ हमारा सारा परिश्रम व्यर्थ होगा और तुमने भी जो यह युद्ध करनेका सारा कष्ट सहन किया है, इसका भी कोई अच्छा परिणाम नहीं निकलेगा।'
देवीने कहा—देवताओ! न तो मैं इसे मारूँगी और न छोड़ूँगी। सदा इसकी चोटी पकड़कर इसे अपने हाथमें ही रखूँगी।
देवता बोले—महाभागे! तुम्हारा कथन ठीक है, इस समय ऐसा ही करना उचित होगा। जो मनुष्य इस रूपमें स्थित हुई तुम्हारी पूजा करेगा, उसे तुम्हारा दुर्लभ दर्शन प्राप्त होगा। आजसे 'विन्ध्यवासिनीदेवी' के नामसे तुम्हारी ख्याति होगी। आश्विनमासके शुक्ल पक्षमें अष्टमी-नवमी तिथिको जो मनुष्य तुम्हारी भक्तिपूर्वक पूजा करेगा, उसे एक वर्षतक कोई रोग, भय और तिरस्कार आदिकी प्राप्ति नहीं होगी। उसके लिये अकालमृत्यु तथा चोर आदिका उपद्रव भी नहीं रहेगा।
सूतजी कहते हैं—देवतालोग ऐसा कहकर अपने-अपने स्थानको चले गये। इन्द्रने दीर्घकालके बाद त्रिलोकीका अकण्टक राज्य प्राप्त किया। तदनन्तर सब लोग सुखी हो गये। देवता पुनः तीनों लोकोंमें यज्ञभागके भोक्ता हुए। आनर्तदेशमें सुरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उन्होंने उत्तम भक्तिपूर्वक हाटकेश्वरक्षेत्रमें देवीकी स्थापना की है। चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको जो पुरुष उत्तम भक्तिभावसे यहाँ देवीका दर्शन करता है, वह एक वर्षतक कृतार्थ (पूर्णमनोरथ) होता है।
# केदारक्षेत्रका प्रादुर्भाव तथा वहाँ भगवान् शिवकी आराधनाका माहात्म्य
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! हिमालय-प्रदेशवर्ती गंगाद्वारक्षेत्रमें 'केदार' भगवान्की स्थिति सुनी जाती है, सो वे वहाँ किस प्रकार प्राप्त हुए?
सूतजीने कहा—महर्षियो! जबतक गरमी और वर्षा रहती है, तबतक तो भगवान् शिव वहीं (हिमालय-प्रदेशके केदारक्षेत्रमें) रहते हैं; किंतु शीतकालमें हाटकेश्वरक्षेत्रमें चले आते हैं। प्राचीन कालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रारम्भसमयकी बात है, हिरण्याक्ष नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी दैत्य था। महाबली होनेके साथ ही वह तप और पराक्रमसे भी सम्पन्न था। हिरण्याक्ष आदि दैत्योंने इन्द्रको स्वर्गसे निकाल दिया और स्वयं ही समस्त त्रिलोकीपर अधिकार जमा लिया। राज्यरहित इन्द्रने देवताओंसहित गंगाद्वारमें आकर तपस्या प्रारम्भ की। एक दिन भगवान् शिव महिषका रूप धारणकर तीव्र तपस्या करते हुए इन्द्रके सम्मुख पृथ्वीतलसे निकले और बोले—'सुरश्रेष्ठ! शीघ्र बोलो, मैं इस रूपमें सम्पूर्ण दैत्योंमेंसे किन-किनको जलमें विदीर्ण कर डालूँ (के दारयामि)?'
इन्द्र बोले—प्रभो! हिरण्याक्ष, सुबाहु, वक्त्र-कन्धर, त्रिश्रृंग तथा लोहिताक्ष—इन पाँचोंका वध कीजिये। इनके मरनेपर निश्चय ही सब दैत्य मरे हुएके ही तुल्य हो जायेंगे; अतः अन्यान्य दीन-हीन दैत्योंका नाश करनेसे क्या लाभ है?
इन्द्रके ऐसा कहनेपर भगवान् शिव तुरंत उस स्थानपर गये, जहाँ दानव हिरण्याक्ष विद्यमान था। उस भयानक भैंसेको देखकर सब दानव सब ओरसे उसपर पत्थरों और डंडोंकी बौछार करने लगे। दैत्यों और उनके प्रहारोंकी तनिक भी
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परवा न करके भगवान् शिवने चार मन्त्रियोंसहित हिरण्याक्षको खिलवाड़में ही एक गहरा धक्का दिया। तब दैत्य हथियार लेकर ज्यों ही उनके सामने दौड़ा, त्यों ही सींगसे उसको विदीर्ण करके महादेवजीने यमलोक भेज दिया। हिरण्याक्षको मारनेके बाद उन्होंने सुबाहु आदि सचिवोंको भी मृत्युके घाट उतार दिया। निशाना साधकर प्रहार करनेवाले उन दैत्योंद्वारा यत्नपूर्वक चलाया हुआ भी कोई अस्त्र-शस्त्र महादेवजीके शरीरपर नहीं लगता था। इस प्रकार उन पाँचों प्रधान दैत्योंका वध करके भगवान् शिव पुनः उसी स्थानपर लौट आये, जहाँ इन्द्र तपस्या करते थे। वहाँ आकर वे इन्द्रसे बोले—'देवराज ! तुमने जिन पाँच दानवोंके वधके लिये कहा था, उन सबको मैंने मार डाला है; अब तुम पुनः त्रिलोकीका राज्य करो। देवेश ! मुझसे दूसरा कोई भी मनोवांछित वर माँगना चाहो तो माँगो।'
इन्द्र बोले—भगवन् ! आप त्रिलोकीकी रक्षा, धर्मस्थापना तथा कल्याणके लिये इसी रूपसे यहाँ निवास कीजिये।
भगवान् शिवने कहा—शक्र ! यह रूप तो मैंने उस दैत्यका वध करनेके लिये ही धारण किया था। अब तुम्हारे अनुरोधपूर्ण वचनसे मैं त्रिभुवनकी रक्षा, धर्मकी स्थापना तथा लोक-कल्याणके लिये यहीं निवास करूँगा।
ऐसा कहकर भगवान् शिवने वहाँ एक सुन्दर कुण्ड प्रकट किया, जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान स्वच्छ तथा दूधके सदृश सुस्वादु जलसे भरा हुआ था। तत्पश्चात् इन्द्रसे कहा—'जो कोई भी मेरा दर्शन करके पवित्र हो इस कुण्डका दर्शन करेगा तथा दायें-बायें दोनों हाथोंकी अंजलिसे तीन बार इस कुण्डका जल पीयेगा, वह तीन कुलके पितरोंको तार देगा। बायें हाथसे जल पीकर मातृपक्षका, दायें हाथसे जल ग्रहण करनेपर पिता-पितामह आदिका तथा दोनों हाथोंसे जल पीकर अपने-आपका उद्धार करेगा।'
इन्द्र बोले—वृषभवाहन ! मैं प्रतिदिन स्वर्गसे आकर यहाँ आपकी पूजा करूँगा और इस कुण्डका जल भी पीऊँगा। आपने महिषरूपमें यहाँ आकर 'के दारयामि—जलमें किनको विदीर्ण करूँ' ऐसा कहा था, इसलिये आप 'केदार' नामसे प्रसिद्ध होंगे।
भगवान् शिवने कहा—इन्द्र ! यदि ऐसा करोगे तब तुम्हें दैत्योंसे भय नहीं प्राप्त होगा। तुम्हें अपने शरीरमें उत्कृष्ट तेज दिखायी देगा।
तदनन्तर इन्द्रने भगवान्के लिये सुन्दर मन्दिरका निर्माण किया, जो देखनेमें बड़ा ही सुन्दर और मनोरम था। तत्पश्चात् उन्हें प्रणाम करके उनकी अनुमति ले वे मेरुगिरिके शिखरपर विराजमान स्वर्गलोकमें चले गये। तबसे प्रतिदिन नियमपूर्वक आकर वे देवेश्वर शिवकी पूजा करते हैं और उस कुण्डका तीन बार जल पीकर स्वर्गलोकको लौट जाते हैं। एक दिनकी बात है। जब इन्द्र पूजाके लिये आये तब देखते हैं, सारा गिरिशिखर बर्फसे ढक गया है। साथ ही भगवान् केदारका अर्चा-विग्रह, उनका मन्दिर तथा वह कुण्ड—सभी हिमाच्छादित हो गये हैं। तब वे दुःखी हो भक्तिपूर्वक उस दिशाको प्रणाम करके इन्द्रलोक चले गये। इस प्रकार चार महीनेतक वे प्रतिदिन आते और शिवजीको न देखकर उस दिशाको प्रणाम करके लौट जाते रहे। फिर जब गरमीका समय आया, तब उन्हें भगवान् शिवके उस विग्रहका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। फिर तो उन्होंने बड़े समारोहसे चौमासेकी पूजा सम्पन्न की और उनके आगे गीत-वाद्य आदिका आयोजन किया। तब भगवान् शिवने इन्द्रको प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'देवेश ! मैं तुम्हारी अनन्य भक्तिसे सन्तुष्ट हूँ, इसलिये तुम्हारे हृदयमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुसार वर माँगो।'
इन्द्रने कहा—भगवन् ! आपके प्रसादसे मुझे उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त है, अतः अब वैसी कोई कामना नहीं है। सुरेश्वर ! यह पर्वत मीनगत सूर्य
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११३९
(चैत्रमास)-से लेकर आठ मासतक बड़ा मनोरम रहता है। फिर वृश्चिककी संक्रान्तिसे लेकर कुम्भकी संक्रान्तितक यह मेरे लिये भी अगम्य हो जाता है, तब मनुष्य आदि साधारण जीवोंकी तो बात ही क्या है। अतः इन चार महीनोंतक आप इसी रूपमें कहीं अन्यत्र मर्त्यलोक या पातालमें निवास करें, जिससे मेरे द्वारा नित्यपूजनकी प्रतिज्ञामें कोई बाधा न हो।
तब भगवान् शिव बोले—इन्द्र ! आनर्तदेशमें हमारा हाटकेश्वरक्षेत्र विद्यमान है। वहाँ मैं वृश्चिककी संक्रान्तिसे लेकर कुम्भराशिमें सूर्यके रहते समयतक सदा निवास किया करूँगा। अतः वहाँ मेरा मन्दिर बनाकर उसमें मेरे स्वरूपकी प्रतिष्ठा करके मेरी यथोचित पूजा करते रहो। तुम्हारे लिये मैं अपना तेज उस शिवलिंगमें स्थापित कर दूँगा।
सूतजी कहते हैं—देवाधिदेव शिवका यह वचन सुनकर इन्द्रने हाटकेश्वरक्षेत्रमें मन्दिर बनाया और उसमें शिवजीके केदारस्वरूपको स्थापित करके निर्मल जलसे भरे हुए एक कुण्डका भी निर्माण किया। फिर उस कुण्डमें स्नान करके तीन बार जल पीया। इस प्रकार इन्द्रसे आराधित होकर भगवान् केदार इस क्षेत्रमें पधारे हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन सर्दीके चार महीनोंमें उनकी वहाँ आराधना करता है, वह उनके कल्याणमय स्वरूपको प्राप्त होता है। अन्य समयोंमें भी जो भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंको धो डालता है। केदारक्षेत्रमें जल पीकर, गयातीर्थमें पितरोंको पिण्ड देकर तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके मनुष्यका फिर जन्म नहीं होता। ब्रह्मर्षियो ! जो भगवान् केदारका यह माहात्म्य पढ़ता या सुनता है, उसके समस्त पापोंका नाश तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि होती है।
शुक्लतीर्थकी महिमा
सूतजी कहते हैं—ब्रह्मर्षियो ! प्राचीन कालकी बात है। चमत्कारपुरमें कोई शुद्धक नामवाला धोबी रहता था। वह कपड़े धोने तथा रँगनेकी कलामें विशेष निपुण था। नगरके प्रधान-प्रधान जो ब्राह्मण थे, उनके कपड़े वही धोता था। एक समय भूलसे शुद्धकने ब्राह्मणोंके कपड़ोंको नीलके रंगसे भरे हुए पात्रमें डाल दिया। बहुत देरके बाद जब उसे इस बातका पता लगा, तब उसने अपनी स्त्री और पुत्रोंको एकान्तमें बुलाकर कहा—'मैंने महात्मा ब्राह्मणोंके बहुत-से बहुमूल्य वस्त्र अज्ञानवश नीलके रंगमें डाल दिये हैं, इस कारण वे ब्राह्मणलोग मुझे भीषण दण्ड देंगे अथवा मुझे बन्धन (कैद)-में डाल देंगे। इसलिये हम सब लोग अन्यत्र भाग चलें।'
ऐसा निश्चय करके वह घरकी सारभूत वस्तुएँ लेकर पत्नीसहित किसी अज्ञात दिशामें जानेको उद्यत हुआ। इसी समय उसकी पुत्री अपनी एक सहेली दासकन्यासे मिलने गयी और वहाँ जाकर बोली—'भद्रे ! मेरे द्वारा जाने-अनजाने जो तुम्हारा अपराध हुआ हो, तुम्हारे साथ खेलकूद करते समय प्रेमसे, बचपनसे, क्रोध अथवा ईर्ष्यासे मैंने जो कभी कुछ प्रतिकूल बर्ताव किया हो, वह सब क्षमा करना।'
यह सुनकर सहसा उसके नेत्र भर आये और वह आकुल होकर पूछने लगी—'सखी ! आज तुम मुझसे ऐसी बात क्यों कर रही हो ?' धोबीकी कन्याने कहा—'सुनयनी ! मेरे पिताने ब्राह्मणोंके बहुमूल्य वस्त्र नीलकी नादमें डाल दिये हैं, प्रातःकाल इस बातका जब उन ब्राह्मणोंको पता लगेगा, तब वे उन्हें बड़ा कठोर दण्ड देंगे। मनमें यही भय लेकर पिताजी अब यहाँसे अन्यत्र जा रहे हैं, अतः मैं तुमसे अन्तिम बार मिलने चली आयी हूँ। तुमसे आज्ञा लेकर जाऊँगी।'
दास-कन्या बोली—सरोजाक्षी ! यदि ऐसी बात है तो तुम कहीं न जाओ। यहाँसे शीघ्र जाकर अपने पिताको रोक दो। यहाँसे पूर्व-
११४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उत्तरके कोनेमें एक जलाशय है, उसमें किसी समय मेरे पिताने जाल डाला था। वह जाल काले केशोंका बना हुआ था, जलाशयमें डालते ही सफेद हो गया। तब कौतूहलवश मेरे पिता भी जलमें खड़े हुए। उनका शरीर काले रंगका था, जो उसी समय सफेद हो गया। केवल शरीर ही नहीं, उनके काले बाल भी सफेद हो गये। तबसे वहाँ कोई नहीं जाता है, अतः उसीमें तुम अपने कपड़े धुलवाओ। इससे सब काले कपड़े सफेद हो जायँगे। उन वस्त्रोंकी अच्छी तरह शुद्धि हो जायगी।
तदनन्तर वह रजक-कन्या शीघ्र अपने पिताके समीप गयी और इस प्रकार बोली—'पिताजी! मेरी सखीने बताया है, इधर समीप ही कोई जलाशय है, उसमें डाली हुई प्रत्येक काली वस्तु सफेद हो जाती है। अतः प्रातःकाल जलाशयमें जाकर अपने कपड़े धोइये, वे सब निश्चय ही सफेद हो जायँगे।'
धोबीने कहा—बेटी! प्राचीन पुरुषोंने कहा है कि वज्रके लेप, मूर्ख, स्त्री, केंकड़ा, मछली, नीलके रंग तथा मदिरा पीनेवाले मनुष्यका एक ही ग्रह (पकड़ या आग्रह) होता है। अतः नीलका रंग मिट नहीं सकता।
कन्या बोली—एक बार सब वस्त्रोंको लेकर चलिये तो सही, जब ये शुद्ध होंगे—कालेसे सफेद हो जायँगे, तभी हम घरको लौटेंगे, अन्यथा दूसरी दिशाको चल देंगे।
कन्याका यह वचन सुनकर उसके भाई-बन्धुओं तथा सेवकोंने एक स्वरसे कहा—'ठीक है, ठीक है।' फिर सब लोग रातमें ही जलाशयके पास गये। दास-कन्या सबके आगे होकर राह दिखाती जा रही थी। वह जलाशय नाना प्रकारकी फैली हुई लताओंसे छिपा हुआ था। मल्लाहकी पुत्रीने उसे दिखाया। तब धोबीने जलमें घुसकर उन वस्त्रोंको धोया। धोते ही वे सभी काले वस्त्र तत्क्षण स्फटिकमणिके समान स्वच्छ एवं श्वेत हो गये। इससे प्रसन्न होकर धोबीने अपनी कन्या तथा मल्लाहकी पुत्रीको साधुवाद देते हुए आदरपूर्वक कहा—'अब हम ये सभी वस्त्र उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको समर्पित कर सकते हैं।' तदनन्तर घर जाकर धोबीने बड़े हर्षके साथ वे वस्त्र ब्राह्मणोंको दिये। ब्राह्मणोंने वस्त्रके साथ ही धोबीके शरीर और केशोंको भी श्वेत हुआ देखकर पूछा—'यह क्या अद्भुत बात दिखायी देती है?'
तब धोबीने सब हाल कह सुनाया। सुनकर ब्राह्मणलोग भी उत्सुकतापूर्वक वहाँ गये। उन्होंने परीक्षाके लिये बहुत-सी काली वस्तुएँ डालीं, पर वे सभी श्वेतरूपमें परिणत हो गयीं। तब तरुण धर्मात्मा पुरुषोंने भी उस जलाशयमें स्नान किया। स्नान करते ही वे सब श्वेतवर्णके तथा तेज और वीर्यसे सम्पन्न हो गये। हाँ, उनके केश भी सफेद हुए बिना न रह सके। वहाँ स्नान करनेके प्रभावसे सब लोग परम गतिको प्राप्त होने लगे। तब इन्द्रने उस मोक्षदायक शुक्लतीर्थको देखकर उसे धूलसे पटवा दिया। आज भी वहाँ जो तृण आदि उत्पन्न होते हैं, वे शुक्लतीर्थके प्रभावसे श्वेत होते हैं। जो मनुष्य वहाँ उत्पन्न हुए कुशोंसे श्राद्ध करता है, वह समस्त पितरोंको तार देता है। जो मानव शुक्लतीर्थकी मृत्तिकाको अपने शरीरमें लगाकर स्नान करता है, वह सब तीर्थोंका फल पाता है।
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* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * । ११४१
कर्णोत्पलातीर्थकी उत्पत्ति, राजा सत्यसन्ध और कर्णोत्पलाकी अद्भुत कथा
सूतजी कहते हैं—प्राचीन कालमें इक्ष्वाकुकुलमें सत्यसन्ध नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनके एक कन्या उत्पन्न हुई। बारहवें दिन राजाने मन्त्रियों और ब्राह्मणोंसे परामर्श करके उसका नामकरण किया—'मेरी इस कन्याके कान उत्पल (कमलदल)-के समान हैं, इसलिये इसका नाम 'कर्णोत्पला' रहे।' नामकरण हो जानेपर वह कन्या दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। धीरे-धीरे वह तरुणावस्थाको प्राप्त हुई। उसे देखकर राजा यह विचार करने लगे कि 'मैं अपनी इस कन्याका विवाह किसके साथ करूँ? इसके योग्य वर तो इस पृथ्वीपर कोई है ही नहीं। इस समय मुझे क्या करना चाहिये?' इस प्रकार सोचते-विचारते हुए अन्तमें वे इस निश्चयपर पहुँचे कि 'चलकर ब्रह्माजीसे ही पूछ लेना चाहिये। वे जिसको कहेंगे, उसीके साथ कन्याका विवाह कर दूँगा।' ऐसा विचार करके कन्याको साथ ले राजा ब्रह्मलोकमें गये। जिस समय वे वहाँ पहुँचे, उस समय ब्रह्माजीके लिये सन्ध्याकाल आ पहुँचा था; अतः ब्रह्माजी सन्ध्योपासनाके लिये उत्सुक हो समाधि लगाकर बैठ गये और अपने अन्तःकरणमें अष्टदलकमलकी कर्णिकापर स्थित ज्योतिःस्वरूप ब्रह्मका साक्षात्कार करने लगे। उस समय उनके नयनोंसे अश्रु झर रहे थे और अंगोंमें रोमांच हो आया था।
सन्ध्योपासना पूर्ण करके ब्रह्माजीने आचमन किया और हाथ-पैर धोकर सब दिशाओंकी ओर दृष्टिपात किया। इसी समय राजा सत्यसन्धने पुत्रीके साथ चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! मैं मर्त्यलोकमें स्थित आनर्तदेशका राजा सत्यसन्ध हूँ और यह मेरी सुन्दरी कन्या कर्णोत्पला है। मुझे भूतलपर इसके योग्य पति कहीं नहीं मिला, अतः आपकी सेवामें आया हूँ। आप ही इसके योग्य पति बताइये, जिसके साथ मैं इसका ब्याह कर दूँ।'
राजाकी यह बात सुनकर ब्रह्माजी मुसकराये और इस प्रकार बोले—राजन्! तुम्हें यहाँ आये तीन युग बीत गये। तुमने पहले पृथ्वीपर जिन-जिन लोगोंको देखा था, वे सब कालके गालमें चले गये। अब पृथ्वीपर दूसरी ही सृष्टि है। अब तो तुम अपनी कन्याके साथ यहीं रहो। भूलोकमें तुम्हारे जो पुत्र, पौत्र, भाई, बन्धु, सेवक आदि थे, उन सबकी मृत्यु हो चुकी है।
'जो आज्ञा' कहकर राजा वहीं ठहर गये। यह देख उनकी पुत्रीने रोते हुए कहा—'पिताजी! मैं तो वहीं जाऊँगी, जहाँ मेरी माता हैं, सखियाँ हैं, अतः शीघ्र वहीं चलिये।' पुत्रीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ सत्यसन्ध स्नेहार्द्रचित्त हो उसे साथ लेकर अपने देशको लौटे। वहाँ देखते हैं तो जहाँ पहले स्थल था, वहीं अब जलाशय लहराते हैं और जहाँ जल था, उस स्थानमें दुर्गम स्थल प्रदेश दिखायी देते हैं। उस देशमें और ही लोग थे तथा और ही प्रकारके धर्म प्रचलित हो गये थे। वे पूछनेपर भी किसीके साथ सम्बन्धका अनुभव नहीं कर पाते थे। मर्त्यलोककी वायुका स्पर्श होते ही वे दोनों वृद्धावस्थासे ग्रस्त हो गये। उस समय भूपालने पूछा—'यहाँका राजा कौन है, यह देश कौन है और यह नगर कौन-सा है?' तब वहाँके लोगोंने बताया—'इस देशका नाम तो 'आनर्त' है। धर्मज्ञ बृहद्वल इस देशके राजा हैं, यह प्राप्तिपुर नगर है तथा यह साभ्रमती (साबरमती) नदी बहती है। इसीका यह 'गर्ता' नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ शान्त, दान्त (जितेन्द्रिय), श्रेष्ठ गुणोंमें तत्पर, तपस्यामें संलग्न, महान् सौभाग्यशाली तथा स्नान एवं जपमें लगे हुए ये मुनिलोग निवास करते हैं।'
यह सुनकर राजा सत्यसन्ध अपनी कन्याके साथ दुःख-शोकसे आतुर हो फूट-फूटकर रोने लगे। उन दोनों वृद्धोंको रोते देख दयावश वहाँ आसपासके सभी लोग एकत्र हो गये और पूछने
१९४२
- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लगे—'बूढ़े बाबा! तुम इस वृद्धाके साथ क्यों दुःखसे पीड़ित होकर रोते हो? क्या तुम्हारी कोई प्रिय वस्तु नष्ट हो गयी है?'
सत्यसन्धने कहा—मैं ही पहले इस आनर्त देशका राजा था। मेरा नाम सत्यसन्ध है। यह मेरी पुत्री कर्णोत्पला है। मैं इसके विवाहके निमित्त वरका निश्चय करनेके लिये ब्रह्माजीसे पूछनेके उद्देश्यसे यहाँसे ब्रह्मलोकको गया था। वहाँ दो घड़ी मुझे ठहर जाना पड़ा था; उसके बाद लौटकर आया हूँ तो इस पृथ्वीपर सब कुछ बदला हुआ देखता हूँ।
यह सुनकर वहाँके लोगोंने राजा बृहद्बलके पास जाकर सब वृत्तान्त कहा। सुनकर राजा बृहद्बल वहाँ पैदल ही आये और उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए बोले—'महाराज! आपका स्वागत है। मुझ सेवकके साथ अपना यह राज्य पुनः सादर ग्रहण कीजिये।'
तब राजा सत्यसन्धने भूपाल बृहद्बलको हृदयसे लगाया और उनका मस्तक सूँघकर कहा—वत्स! मैंने बहुत समयतक राज्य किया, नाना प्रकारके दान दिये तथा पूर्ण दक्षिणावाले अश्वमेध आदि यज्ञोंसे यज्ञपुरुषकी आराधना भी की है। अब इस पुत्रीके साथ तपस्या करूँगा, जिससे इसको पुनः पूर्ववत् तरुणावस्था प्राप्त हो जाय।
बृहद्बल बोले—प्रभो! मैंने परम्परासे ये सारी बातें इस प्रकार सुनी हैं—राजा सत्यसन्ध अपनी कन्याको साथ लेकर कहीं चले गये और फिर लौटकर नहीं आये। उनके मन्त्रियोंने बहुत दिनोंतक उस राज्यका पालन किया, उसके बाद उन्हींके पुत्र सुह्यका उन्होंने राज्याभिषेक कर दिया। उसी महाराज सुह्यकी वंशपरम्परामें मेरा जन्म हुआ है। मैं उनसे सतहत्तरवीं पीढ़ीमें हूँ। आप इसी गर्ता तीर्थमें रहकर तपस्या करें, जिससे मैं तीनों समय आपकी चरण-वन्दना करके कल्याणका भागी हो सकूँ।
सत्यसन्धने कहा—वत्स! पहले हाटकेश्वर-क्षेत्रमें मैंने वृषभेश्वर भगवान् शिवकी प्रतिष्ठा की थी। वह स्थान आज भी है ही। वहीं चलकर दिन-रात भगवान् शंकरकी आराधना करूँगा। तुम इस कन्याके साथ मुझे वहीं भेज दो।
तदनन्तर पुत्रीके साथ हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाकर राजा सत्यसन्ध बहुत प्रसन्न हुए और वहाँ अद्भुत तपस्यामें संलग्न हो गये। कर्णोत्पला भी किसी पवित्र जलाशयके तटपर श्रद्धापूर्वक पार्वतीजीकी स्थापना करके वहीं तपस्या करने लगी। उसकी तपस्यासे सन्तुष्ट हो पार्वतीदेवीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'बेटी! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। मनोवांछित वर माँगो।'
कर्णोत्पला बोली—देवि! मेरे पिताजी मेरा विवाह करनेके लिये बहुत दुःखी हैं। वे इसीके लिये राज्य, सुख और कुटुम्ब सबसे वंचित हुए और अब वैराग्यको प्राप्त हो तप करते हैं। मैं कुमारीसे सहसा वृद्ध हो गयी। अतः अब यही प्रार्थना है कि मेरा वह तारुण्य और सौन्दर्य पुनः लौट आवे तथा मुझे कोई श्रेष्ठ पति प्राप्त हो।
देवीने कहा—शुभे! माघमासकी तृतीयाको जब शनैश्चर दिन और धनिष्ठा नक्षत्रका योग हो, तब तुम यौवन तथा रूपका चिन्तन करती हुई इस पुण्य जलाशयमें स्नान कर लेना। इससे तुम्हारा शरीर युवावस्थासे सम्पन्न और दिव्य रूपसे सुशोभित हो जायगा। दूसरी कोई स्त्री भी, जो उस दिन इसी उद्देश्यसे यहाँ स्नान करेगी, ऐसे ही दिव्य रूपसे सुशोभित होगी।
ऐसा कहकर पार्वती देवी अन्तर्धान हो गयीं। वह योग आनेपर कर्णोत्पलाने रूप, सौभाग्य, यौवन तथा अन्य मनोरथोंका चिन्तन करके आधी रातको जलमें प्रवेश किया। स्नान करके वह दिव्य रूप और यौवनसे सम्पन्न हो जलाशयसे बाहर निकली। इसी समय उसके समीप साक्षात् कामदेव आये और बोले—'महाभागे! मैं पार्वतीजीकी आज्ञासे तुम्हारे पास आया हुआ कामदेव हूँ। तुम मेरी पत्नी बनो।'
* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११४३
कर्णोत्पलाने कहा—यदि ऐसी बात है तो आप मेरे पिताजीके पास जाकर स्वयं मेरे लिये प्रार्थना कीजिये, क्योंकि कन्याको कभी स्वच्छन्द नहीं होना चाहिये।
कामदेवने ‘तथास्तु’ कहकर उसकी बात मान ली। तब वह अपने पिताके पास जा उन्हें प्रणाम करके बोली—‘पिताजी! मैंने पार्वतीजीकी आराधना करके सुन्दर रूप और युवावस्था प्राप्त की है, अतः अब आप मेरा विवाह करके अन्तःसुख लाभ कीजिये। देवी पार्वती ने कामदेवको मेरा पति नियत करके भेजा है।’ कन्याको पूर्ववत् युवावस्थासे युक्त देख राजाने कहा—‘बेटी! आज मेरी तपस्या सफल हो गयी। मैंने जीवनका फल पा लिया।’ इतनेमें ही कामदेवने आकर प्रार्थना की—‘राजन्! आप अपनी कन्या मुझे प्रदान करें, इसके लिये पार्वतीदेवीने स्वयं मुझे भेजा है।’
तब राजाने ब्राह्मणोंके वचनसे अग्निको साक्षी बनाकर अपनी कन्याका विवाह कामदेवके साथ कर दिया। वह रतिके बाद कामदेवकी प्रीतिका पात्र हुई, इसलिये प्रीति नामसे विख्यात हुई। जिस जलाशयपर उसने तपस्या की, वह कर्णोत्पलातीर्थके रूपमें प्रसिद्ध हुआ। जो स्त्री और पुरुष माघभर उसमें स्नान करते हैं, उन्हें प्रयागस्नानका फल मिलता है और कभी बन्धुओंके वियोगका कष्ट नहीं भोगना पड़ता।
शाण्डिलीके उपदेशसे कात्यायनीके द्वारा पंचपिण्डा गौरीकी उपासना और पति-प्रेमकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—याज्ञवल्क्यजीके दो स्त्रियाँ थीं, दोनों ही सब प्रकारके सद्गुणोंसे सम्पन्न थीं। उनमेंसे जो बड़ी स्त्री थी, उसका नाम मैत्रेयी था और छोटीका नाम कात्यायनी था। उन दोनोंके द्वारा निर्मित दो सुन्दर कुण्ड हाटकेश्वरक्षेत्रमें विद्यमान हैं। वहाँ स्नान करनेवाले मनुष्य महान् अभ्युदयकारी उत्तम लोकोंको जाते हैं। कात्यायनी और पतिव्रता शाण्डिलीके दो उत्तम तीर्थ और हैं, जहाँ परम वैराग्यको प्राप्त होकर आयी हुई कात्यायनीको शाण्डिली देवीने बोध कराया था। जो नारी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्षकी तृतीयाको वहाँ एकाग्रचित्त हो स्नान करती है, वह अखण्ड सौभाग्यवती होती है। जो स्त्री दुर्भाग्ययुक्त, कानी, बूढ़ी और नाटी है, वह भी उस तीर्थमें स्नान करनेके प्रभावसे अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त कर लेती है।
एक दिन कात्यायनी फल लेनेके लिये अपने आश्रमसे बाहर निकली, उस समय उसने शाण्डिलीको देखा। वह पतिके पास हाथ जोड़कर विनीत भावसे झुकी हुई-सी खड़ी थी और उसके पति भी अनुरागयुक्त हृदय तथा प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे उसीका मुँह निहारते हुए गुण-दोषका विवेचन कर रहे थे। उन दोनों पति-पत्नीको एक-दूसरेसे अत्यन्त प्रसन्न देखकर कात्यायनी अपने चित्तमें यह विचार करने लगी कि ‘यह तपस्विनी धन्य है, जिसका पति इसके मुखकी ओर प्रेमसे देखते हुए गुण-दोषोंका विवेचन कर रहा है। पत्नीके प्रति इसके हृदयमें अत्यन्त अनुराग और स्नेह है।’ यही सब सोचती हुई पतिव्रता कात्यायनी अपने आश्रममें चली गयी।
तदनन्तर एक समय जब शाण्डिलीके पति किसी कार्यसे बाहर चले गये, तब एकान्तमें बैठी हुई शाण्डिलीके पास कात्यायनी गयी और आदरपूर्वक बोली—‘कल्याणी! मुझे कोई ऐसा उपदेश दो, जिससे पति स्त्रीके प्रति विशेष प्रेम रखनेवाला हो। कभी कटुवचनोंद्वारा पत्नीका अपमान न करे।’
शाण्डिली बोली—साध्वी! सुनो, मैं तुमसे एक रहस्यकी बात बताती हूँ। मेरे पिता मुनिवर शाण्डिल्य जब नयी अवस्थाके थे, तब कुरुक्षेत्रमें
९१४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आश्रम बनाकर रहते थे। वहीं मैं उनकी इकलौती कन्या उत्पन्न हुई। उस तपोवनमें ही मैं क्रमशः बड़ी हुई और होमके समय पिताजीकी यथायोग्य सेवा करती रही। प्रतिदिन उनके लिये नीवार आदि धान्य लाया करती थी। एक समय मेरे पिताके आश्रममें मुनिश्रेष्ठ नारदजी आये। मैंने पिताजीकी आज्ञासे उनके पैर धोकर स्नान आदि कराया और उनकी थकावट दूर की। भोजनके अन्तमें जब मुनि सुखसे विराजमान हुए, तब मेरी माताने उनसे विनयपूर्वक पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! यह हमें एक कन्या पैदा हुई है, जो प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है। अतः इसके लिये कोई सुखदायक पति प्राप्त हो, ऐसा उपाय बताइये। कोई व्रत, नियम, होम, मन्त्र आदि ऐसा बताइये, जिसके करनेसे इसको कोमल स्वभाववाला सद्गुणी पति प्राप्त हो, जो प्रिय बोलनेवाला तथा परस्त्रीसे विमुख रहनेवाला हो।'
मेरी माताका यह वचन सुनकर नारदजीने कहा—हाटकेश्वरक्षेत्रमें पंचपिण्डा गौरी हैं, जिनकी स्थापना स्वयं पार्वतीदेवीने की है। उन्हीं पंचपिण्डा गौरीकी यह एक वर्षतक प्रत्येक तृतीयाको अत्यन्त श्रद्धाके साथ पूजा-आराधना करे। इस प्रकार वर्ष समाप्त होनेपर यह यथायोग्य पति प्राप्त करेगी। ऐसा कहकर मातासे विदा ले मुनिश्रेष्ठ नारदजी प्रसन्नतापूर्वक तीर्थयात्राको चले गये। कात्यायनी! कुमारी होते हुए भी मैंने नारदजीकी आज्ञासे उत्तम पतिकी इच्छा रखकर मार्गशीर्षमाससे आरम्भ करके एक वर्षतक प्रत्येक तृतीयाको भक्तिपूर्वक पंचपिण्डा गौरीकी आराधना की और गन्ध, माल्य, अनुलेपन, भाँति-भाँतिके दान और नैवेद्य आदिके द्वारा उनका पूजन किया। उसीके प्रभावसे मुझे ये जैमिनि नामवाले श्रेष्ठ द्विज पतिरूपमें प्राप्त हुए हैं। अतः कल्याणी! तुम भी इन पंचपिण्डा गौरीकी पूजा करो। इससे तुम्हें उत्तम सौभाग्यकी प्राप्ति होगी।
शाण्डिलीका कथन सुनकर कात्यायनीने उसे प्रणाम किया और प्रसन्नतापूर्वक अपने घर लौट आयी। मार्गशीर्षमास आनेपर तृतीया तिथिको शुभ दिनमें कात्यायनीने गौरीदेवीका पूजन किया और एक वर्षतक वह इस नियमका पालन करती रही। उसने मिष्टान्न आदि सरस भोजनोंसे गौरी देवीको तृप्त किया। तदनन्तर वर्ष पूरा होनेपर उसके पति याज्ञवल्क्य स्वयं उसके पास आये और प्रेमपूर्वक बोले—'शुभे! चलो, चलो, अपने घर चलें।' ऐसा कहकर वे कात्यायनीका दाहिना हाथ पकड़कर उसे अपने घर लिवा ले गये और मैत्रेयीके साथ जैसा उनका बर्ताव था, वैसा ही बर्ताव वे कात्यायनीके साथ भी करने लगे। तत्पश्चात् कात्यायनीसे उन्होंने एक गुणवान् पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम कात्यायन था। वह यज्ञविद्यामें परम निपुण था। उस कात्यायनके पुत्र वररुचि हुए, जो समस्त गुणोंके समुद्र, सर्वज्ञ एवं वेदोंके पारंगत विद्वान् हुए। उन्होंने हाटकेश्वरक्षेत्रमें विद्यार्थियोंके लाभके लिये गणेशजीकी स्थापना की है। चतुर्थी और शुक्रवारके योगमें उन गणेशजीकी विशेषरूपसे आराधना करके द्विज वेद-वेदांगोंका पारंगत विद्वान् होता है।
वास्तुपदतीर्थ तथा अजागृहा देवीकी महिमा और एक ब्राह्मणका रोगोंसे उद्धार
सूतजी कहते हैं—कात्यायनने हाटकेश्वरक्षेत्रमें वास्तुपद नामक उत्तम तीर्थका निर्माण किया, जो मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको देनेवाला है। वहाँपर अड़तालीस देवताओंकी पूजा होती है, जो पूजित होनेपर तत्क्षण सिद्धि प्रदान करते हैं। याज्ञवल्क्यके पुत्र कात्यायन तथा विश्वकर्माने वहाँ संसारके हितके लिये शालाकर्म आदि करके वास्तुपूजा की थी; इसीलिये उस क्षेत्रमें
| * नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १९४५ |
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वास्तुपद नामक तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। उसके दर्शन करनेपर मनुष्य पापसे तथा कर्मनाशके दोषसे छूट जाता है। घरमें जो शिला, कुत्सित पद और कुवास्तुजनित दोष होते हैं, वे उस तीर्थके दर्शनसे मिट जाते हैं। वैशाख शुक्ल तृतीयाको रोहिणी नक्षत्रमें महात्मा कात्यायनने उस वास्तुपदकी प्रतिष्ठा की थी; अतः वैसा समय आनेपर जो मनुष्य उसी विधिसे वास्तुपदकी पूजा करता है, वह राजा होता है। शिल्प आदिकी दृष्टिसे दोषयुक्त और उपद्रवपूर्ण घरको पाकर भी मनुष्य यदि उस तीर्थका संयोग प्राप्त कर ले, तो उसी दिनसे उसके घरमें अभ्युदय होने लगता है।
ब्रह्मर्षियो! जिस समय सर्वलोकहितकारी राजा अजापाल राज्य करते थे, उस समय सम्पूर्ण व्याधियाँ उनके यहाँ अजा (बकरी)-के रूपमें रहती थीं। उनको अपने अधीन सुरक्षित रखनेके कारण ही वे अजापाल कहलाते थे। वे उन सब बकरियोंको रातमें ले आकर एक स्थानपर रख देते थे। अतः उन अजाओंका आश्रयस्थान अजागृहके नामसे प्रसिद्ध हुआ। हाटकेश्वरक्षेत्रमें अजागृह नामक जो तीर्थ है, वह दर्शन करनेपर भूतलके समस्त मनुष्योंके पापोंका नाश करनेवाला है। विप्रवरो! उस क्षेत्रमें एक समय कोई तपस्वी-रूपधारी ब्राह्मण आया और तीर्थयात्राके प्रसंगसे रातमें वहाँ ठहरा। उसने उस अजावृन्दको निर्भय बैठा देख यह अनुमान किया 'यहाँ निश्चय ही कोई मनुष्य रहता होगा। अन्यथा रातको इस वनमें रक्षकसे रहित पशु कैसे टिक सकते हैं। वह रक्षक कहींसे आता ही होगा, अतः मैं निर्भय होकर यहीं रहूँगा।' इस प्रकार विचारते हुए तपस्वी ब्राह्मण वहीं सो गया। सोते हुए ही उसकी सारी रात बीत गयी। सोकर उठनेपर वह बहुत थका हुआ-सा हो गया। सबेरा होनेपर जब उसने अपने शरीरकी ओर दृष्टिपात किया तो अपनेको कोढ़ आदि रोगोंसे घिरा पाया। उस स्थानसे एक पग भी कहीं अन्यत्र जानेकी शक्ति उसमें नहीं रह गयी थी। उन भयंकर रोगोंसे युक्त होकर वह सोचने लगा—
'क्या कारण है कि मेरा शरीर अकस्मात् ऐसा हो गया?' इतनेमें ही वहाँ एक तेजस्वी पुरुष आये, उन्होंने उस अजायूथको भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारा और बायें हाथमें डंडा लेकर सबको चरानेके लिये ले चला। इसी समय उनकी दृष्टि भय और रोगोंसे घिरे हुए उस ब्राह्मणपर पड़ी, जो कहीं भी जानेमें असमर्थ था। तब राजाने आदरपूर्वक पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम कौन हो, जो इस दशामें इस स्थानपर आये हो। मेरे राज्यमें तो कहीं किसीके भी कोई रोग नहीं है? तुमने भी मेरा नाम सुना होगा। मैं ही राजा अज हूँ। लोगोंके हितके लिये मैं समस्त रोगोंको अजाके रूपमें एकत्र करके उनकी रखवाली करता हूँ। तुम्हारे शरीरमें जो रोग है, उसे बताओ। जिससे मैं उस रोगको भी बाँध लूँ।
ब्राह्मणने कहा— राजन्! मैं तीर्थयात्रामें तत्पर होकर समस्त भूमण्डलका भ्रमण करता हूँ। क्रमशः घूमता हुआ इस हाटकेश्वरक्षेत्रमें आया हूँ। इन पशुओंको देखकर यहाँ किसी मनुष्यके भी स्थित होनेकी सम्भावना करके रातमें यहीं इनके समीप सो गया था। सबेरा होनेपर जब अपने शरीरकी ओर देखता हूँ, तब यह कोढ़ आदि रोगोंसे घिरा हुआ है। नृपश्रेष्ठ! ऐसा होनेका क्या कारण है? इसे मैं ठीक-ठीक नहीं समझ सका। अब जिस प्रकार मेरा शरीर नीरोग हो, वह उपाय करो।
तब राजा अजापालने उन रोगोंसे कहा— किसने मेरी आज्ञा भंग की है?
रोग बोले— राजन्! इस कार्यमें आप हमलोगोंपर कोप न करें। इस ब्राह्मणके शरीरमें राजयक्ष्मा, कोढ़ और खुजली—इन तीन रोगोंका आवेश हुआ है। ये तीनों ही संसर्गज रोग हैं, इनमेंसे प्रथम दो रोग तो अमिट हैं। इन दोनोंके लिये ब्रह्माजीका शाप है, जिससे इनकी निवृत्ति नहीं होती। अतः इस विषयमें जो आपको उचित प्रतीत हो सो करो। इस ब्राह्मणने स्वयं ही इन तीनों अजाओं (रोगों)-का स्पर्श कर लिया था। अतः जबतक इसका शरीर रहेगा, वे दो रोग तो अवश्य बने रहेंगे।
यह सुनकर राजा अजापाल भी वहीं ठहर
११४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गये और उस ब्राह्मणसे बोले—विप्रवर! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। इस भयंकर रोगसे तुम्हारी रक्षा मैं करूँगा। ऐसा कहकर राजाने बड़ी भारी तपस्या की। वे भक्तिपूर्वक दिन-रात उस क्षेत्रकी देवीकी आराधना करने लगे। मुण्ड, अथर्वशीर्ष, क्षेत्रपाल-सूक्त तथा वास्तुसूक्तके मन्त्रोंद्वारा देवीकी स्तुति करते हुए सरसों, लाल फूल, गुग्गुल और धूपकी आहुति देते थे। तत्पश्चात् नीलरुद्रका विशेषरूपसे जप करते थे। एक समय जब रात्रि व्यतीत हो रही थी, उनके होमकुण्डसे मन्त्रोंद्वारा आकृष्ट हुई उस क्षेत्रकी देवी धरती फोड़कर प्रकट हुई और बोली—'राजन्! मैं इस क्षेत्रकी अधिष्ठात्री देवी हूँ। इस होमके प्रभावसे तुमपर प्रसन्न हो पृथ्वीसे निकली हूँ। महाभाग! तुम्हारा जो कार्य हो उसे बताओ, मैं पूर्ण करूँगी।'
राजाने कहा—देवि! तुम सदा इसी स्थानपर निवास करो, जिससे रोगोंके संसर्गजनित दोष इस भूमिसे विदा हो जायँ तथा ये ब्राह्मणदेवता जैसे भी रोगमुक्त हों, वैसा उपाय करो।
क्षेत्रदेवी बोली—राजन्! इस स्थानको मैंने सब व्याधियोंके दोषोंसे रहित कर दिया। आजसे मैं सदा यहीं निवास करूँगी। इस समयसे जो भी व्याधिग्रस्त पुरुष इस स्थानपर आवेगा और भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, वह पूर्णतः नीरोग हो जायगा। अतः आज ये द्विजश्रेष्ठ आदर और भक्तिके साथ पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर मेरी पूजा करें। इस क्षेत्रमें एक दूसरा प्रसिद्ध तीर्थ है—चन्द्रकूपिका। उसमें ये ब्राह्मणदेवता प्रतिदिन स्नान करें। पूर्वकालमें दक्षके शापसे क्षयरोगसे ग्रस्त हुए महात्मा चन्द्रदेवने अपने स्नानके लिये उस कूपका निर्माण किया था। इसके सिवा यहाँ 'खण्डशिला' नामसे प्रसिद्ध एक देवी रहती हैं, वहीं सौभाग्यकूपिका नामक तीर्थ है। उस कूपमें स्नान करके ये खण्डशिला देवीका दर्शन करें। पूर्वकालमें कुष्ठरोगसे पीड़ित कामदेवने अपने स्नान तथा कुष्ठरोगके निवारणके लिये उस सौभाग्यकूपिकाका निर्माण किया था। इसी प्रकार यहाँ आप्सरसकुण्ड है, जिसमें रविवारके दिन स्नान करनेसे खुजली मिट जाती है।
तदनन्तर ब्राह्मणदेवताने परम पवित्र चन्द्रकूपिकामें स्नान करके भक्तिभावसे देवीका पूजन किया। एक मासतक पूजा करनेके बाद वे राजयक्ष्मासे मुक्त हो गये। तत्पश्चात् कामदेवनिर्मित सौभाग्यकूपिकाका दर्शन और उसमें स्नान करके वे खण्डशिला देवीका दर्शन प्रतिदिन करने लगे। एक मासतक ऐसा करनेसे उन्हें कुष्ठरोगसे भी छुटकारा मिल गया। उसके बाद रविवारको अप्सराओंके कुण्डमें स्नान करनेसे उनकी खुजली भी जाती रही। रोगमुक्त होकर ब्राह्मण अत्यन्त तेजस्वी दिखायी देने लगे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर राजाको आशीर्वाद दिया और उनसे विदा लेकर वे अभीष्ट स्थानको चले गये। इसके बाद राजा अज पुनः अपनी स्त्रीके साथ पाताललोकमें हाटकेश्वरजीके समीप चले गये। अजागृहमें स्थित होनेके कारण उस क्षेत्रकी देवी सब ओर अजागृहाके नामसे विख्यात हुई। आज भी राजयक्ष्मासे ग्रस्त हुआ जो मनुष्य उसी विधिसे देवीका पूजन करता है, वह शीघ्र ही नीरोग हो जाता है।
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पतिव्रताकी शक्तिसे उसके मरे हुए पतिको पुनः नवजीवनकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें श्रेष्ठ नगर वर्धमानपुरमें वीरशान्त नामसे विख्यात एक ब्राह्मण रहते थे, वे वेद-विद्यामें प्रवीण थे। उनके एक कन्या उत्पन्न हुई, जो प्रमाणसे बहुत बड़ी थी। वह कुमारी धीरे-धीरे युवावस्थाको प्राप्त हुई; परंतु किसी भी पुरुषने उसका वरण नहीं किया, क्योंकि जो काममोहित पुरुष अत्यन्त थोड़े केशवाली, अत्यन्त बड़ी तथा अधिक नाटी कन्याओंसे विवाह करता है, वह छः महीनेके भीतर मृत्युको प्राप्त होता है। इसी कारण सब लोग उस कुमारीको बहुत बड़ी बताकर त्याग देते थे। इससे वैराग्यको प्राप्त होकर उस
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११४७
कुमारीने घोर तपस्या की। इस प्रकार तपमें लगी हुई उस कन्याके समीप राजसम्पदा उपस्थित हुई। उस समय इन्द्रने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'शुभे! तुम कन्यावस्थामें ऋतुकालको प्राप्त हुई हो, इस कारण सदोष हो गयी हो। अतः किसी पतिका वरण करो, जिससे पवित्रताको प्राप्त होओगी।' यह सुनकर उस कन्याको बड़ी लज्जा हुई। उसने वर्धमानपुरमें जाकर हाथ उठाकर कहा—'यदि कोई कुलीन ब्राह्मण मेरा पाणिग्रहण करे, तो मेरी आधी तपस्या उसकी हो जायगी और मैं उसका कल्याण करूँगी।'
यह सुनकर किसी कोढ़ी ब्राह्मणने उसे बुलाकर कहा—यदि तू सदा मेरे कहे अनुसार चले, तो मैं तेरा पाणिग्रहण करके तेरे साथ विवाह करूँगा।
कुमारी बोली—द्विजश्रेष्ठ ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे मेरा पाणिग्रहण करो, मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगी। तदनन्तर ब्राह्मणने गृह्यसूत्रोक्त विधानसे देवता, अग्नि तथा गुरुके समीप उस कुमारीका पाणिग्रहण किया। विवाहके पश्चात् दीर्घिका ब्राह्मणी पतिसे बोली—'नाथ! आज्ञा दीजिये मैं इस समय आपकी क्या सेवा करूँ?'
पति बोले—सुन्दरि ! मैं तुम्हारी सहायतासे अड़सठ तीर्थोंमें स्नान करना चाहता हूँ। यदि यह कार्य कर सको तो करो।
तब उस पतिव्रताने 'बहुत अच्छा' कहकर पतिकी आज्ञा शिरोधार्य की और पतिके बराबर बाँसकी एक मजबूत खाट बनाकर उसपर कोमल रूई भरा हुआ बिछावन डाल दिया और हाथ जोड़कर कहा—'प्राणनाथ ! इसपर बैठिये; जिससे आपको मस्तकपर लेकर समस्त शुभ तीर्थोंकी यात्रा करा सकूँ।' तब कोढ़ी ब्राह्मण प्रसन्न हो पृथ्वीसे शनैः-शनैः उठकर बाँसके उस खटोलेपर बैठा और वह उसे माथेपर लेकर सब तीर्थोंमें घूम-घूमकर अपने पतिको तीर्थस्नान कराने लगी। क्रमशः समूची पृथ्वीपर घूमती हुई एक दिन सन्ध्या होते-होते वह हाटकेश्वरक्षेत्रमें पहुँची। उस समय वह थक गयी थी, पैर लड़खड़ा रहे थे। उसी प्रदेशमें उस दिन मुनिवर माण्डव्यको शूलीपर चढ़ाया गया था। वे अत्यन्त दुःख सहन करते हुए शूलीपर बैठे हुए थे। पतिव्रता दीर्घिका माथेपर भार लेकर उसी मार्गसे निकली। उसके धक्केसे वह शूल हिल गया और मुनिवर माण्डव्यका शरीर भी विचलित हो गया। इससे उन्हें बड़ी भारी पीड़ा हुई और वे दुःखी होकर बोले—'किस पापीने मेरे इस शूलको हिला दिया, जिससे मुझ दुःखीका दुःख और भी बढ़ गया।'
दीर्घिका बोली—महाभाग! मैंने आपको देखा नहीं, भूलसे आपका स्पर्श हो गया।
माण्डव्य बोले—निष्ठुरे! तुमने मुझे प्राणान्तकारिणी पीड़ा दी है, इसलिये तुम्हारा अभीष्ट पति सूर्यकी किरणोंका स्पर्श होते ही मेरे शापसे निश्चय ही अपने प्राणोंको त्याग देगा।
दीर्घिका बोली—यदि प्रातःकाल मेरे पतिकी मृत्यु होगी तो अब प्रातःकाल या सूर्योदय होगा ही नहीं।
ऐसा कहकर दीर्घिका धरतीपर बैठ गयी और बाँसके खटोलेमें बैठे पतिको उसने माथेपरसे उतार दिया। उस समय कोढ़ीने कहा—'प्रिये ! मुझे प्यास लग रही है; अतः पीनेके योग्य शीतल जल ले आओ।' इतना सुनते ही वह पतिकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उत्सुक हो पानी लानेके लिये इधर-उधर घूमने लगी, किंतु अन्धकारमें उसे कहीं भी जल नहीं दिखायी दिया। तब उसने पृथ्वीपर आघात किया और माण्डव्य मुनिके देखते-देखते निर्मल एवं स्वादिष्ट जल निकल आया। फिर परिश्रमसे कष्ट पाते हुए अपने पतिको उस जलसे स्नान कराया और उन्हें जल पिलाकर स्वयं भी पीया। उस समय पतिव्रताके भयसे सूर्यदेव उदित नहीं हुए। इससे प्रातःकाल आनेमें बहुत विलम्ब हुआ। रात्रिको बहुत बड़ी होती देख यज्ञकर्म करनेवाले शान्तचित्त ब्राह्मण बहुत दुःखी हो गये। देवता यज्ञभागसे वंचित होकर बड़े कष्टमें पड़ गये और सूर्यनारायणके
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निकट जाकर बोले—'दिवाकर! आपका उदय क्यों नहीं होता? देखिये आपके बिना सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो रहा है।'
सूर्यदेवने कहा—देवताओ! मैंने पतिव्रताके आदेशसे अपना उदय रोक रखा है। अतः आप सब लोग उसके पास जाकर मेरे उदयके लिये अनुरोध करें। उसकी आज्ञा होनेपर मैं सुख-पूर्वक उदय हो जाऊँगा। एक लक्ष अश्वमेध यज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त होता है, उसीको स्त्री केवल पातिव्रत्यधर्मके पालनसे प्राप्त कर लेती है।
यह सुनकर सब देवता उस उत्तम क्षेत्रको गये और दीर्घिकाके सम्मुख खड़े हो कोमल वचनोंमें बोले—पतिव्रते! तुमने जो सूर्यका उदय रोक दिया, सो अच्छा नहीं किया। क्योंकि इससे पृथ्वीपर शुभ कर्मोंका अनुष्ठान रुक गया है। अतः शुभे! तुम आज्ञा दे दो, जिससे सूर्यदेव उदित हों।
दीर्घिका बोली—माण्डव्य मुनिने अकारण मेरे पतिको शाप दिया है। जब मेरे पति ही नहीं रहेंगे, तब मुझे सूर्योदयसे, यज्ञसे, श्राद्धसे और दान आदिसे क्या प्रयोजन है।
तब सब देवता एक-दूसरेकी ओर देखकर दीर्घिकासे बोले—'भद्रे! सूर्यका उदय होने दो, तुम्हारे प्रिय पतिकी भी मृत्यु हो जाय और ये मुनीश्वर माण्डव्य भी सत्यवादी हो जायें। इसके बाद हम शीघ्र ही मृत्युके मार्गमें गये हुए तुम्हारे पतिको पुनः जीवित कर देंगे। उस समय तुम्हारे पतिकी अवस्था पच्चीस वर्षकी-सी हो जायगी और तुम बड़े सुन्दररूपमें अपने पतिका दर्शन करोगी तथा तुम भी पंद्रह वर्षकी-सी अवस्थासे युक्त एवं कमलके समान नेत्रोंवाली होकर स्वेच्छानुसार मर्त्यलोकमें सुखका उपभोग करोगी और ये पापरहित मुनिवर माण्डव्य भी शूलभेदकी पीड़ासे मुक्त होकर सुखके भागी होंगे।'
तब दीर्घिकाने 'बहुत अच्छा' कहकर देवताओंकी बात मान ली। उसके 'हाँ' कहते ही भगवान् सूर्य बड़े वेगसे उदित हुए। सूर्यकी किरणोंका स्पर्श होते ही कोढ़ी ब्राह्मणकी मृत्यु हो गयी; किंतु देवताओंके हाथोंका स्पर्श पाकर पुनः वह उठ खड़ा हुआ। उसकी अवस्था पच्चीस वर्षकी-सी दिखायी दे रही थी। जान पड़ता था, दूसरे कामदेव ही आ गये हैं। उसे अपने पूर्वजन्मकी सब बातोंका स्मरण था, अतः इस नूतन जन्मसे उसे बड़ा हर्ष हो रहा था। दीर्घिका भी भगवान् शंकरका स्पर्श पाकर दिव्य लक्षणोंसे लक्षित युवती हो गयी। उसके नेत्र कमलदलके समान शोभा पा रहे थे और मुख चन्द्रमाके समान मनोहर प्रतीत होता था। तदनन्तर देवताओंने माण्डव्य मुनिको शूलीसे उतारकर कहा—'मुने! आपने जो शाप दिया था, वह आपका वचन सत्य किया गया। सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे वह कोढ़ी ब्राह्मण मर गया। तत्पश्चात् पुनः हमने इस स्त्रीके साथ उसे तरुण जीवन प्रदान किया है; अतः अब आप अपने आश्रमको पधारें और हमसे वर माँगें।'
## शूलीतीर्थ और दीर्घिकातीर्थका प्राकट्य, माण्डव्य मुनिका धर्मराजको शाप देना और उनके शूलीपर चढ़नेका कारण
माण्डव्यजीने कहा—सुरश्रेष्ठगण! मैं आपलोगोंसे वर ग्रहण करूँगा; परंतु ये धर्मराज मेरे एक प्रश्नका निर्णय करें। संसारमें समस्त प्राणियोंके लिये सुख और दुःखके रूपमें उनके पूर्वजन्मका शुभाशुभ कर्म ही उपस्थित होता है। यह सर्वथा सत्य सिद्धान्त है। मैंने इस लोक या परलोकमें कौन-सा पातक किया है, जिससे मुझे ऐसी वेदना प्राप्त हुई और किसी प्रकार भी मृत्यु नहीं हुई।
धर्मराजने कहा—विप्रवर! तुमने दूसरे शरीरमें
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११४९
बचपनके समय तीखे शूलके अग्रभागसे पृथ्वीके एक जीवको बींधा था। यही एक पाप तुमसे हुआ है, इसके सिवा दूसरा कोई थोड़ा-सा भी पाप नहीं दिखायी देता। इसीलिये तुम्हें इस दशामें डाला गया है।
सूतजी कहते हैं—धर्मराजकी यह बात सुनकर माण्डव्य मुनिको बड़ा रोष हुआ। तब माण्डव्यने अपने सामने खड़े हुए धर्मराजसे कहा—'धर्म! तुमने मेरे थोड़ेसे अपराधके लिये महान् दण्ड दिया है। अतः मेरा शाप ग्रहण करो। तुम मानव-शरीर पाकर शूद्रयोनिमें स्थित हो जाति-संहारजनित महान् दुःखका उपभोग करोगे तथा आजसे मैंने समस्त देहधारियोंके लिये व्यवस्था कर दी कि आठ वर्षसे ऊपरका मनुष्य ही अपने निन्दित कर्मके कारण दण्डका भागी होगा।' ऐसा कहकर माण्डव्य मुनि शूलीकी पीड़ासे मुक्त हो अभीष्ट दिशाकी ओर चल दिये। उन्हें जाते देख सब देवताओंने कहा—'भगवन्! धर्मराज तो केवल न्याय करते हैं, अतः आप उन्हें शापके द्वारा शूद्र न बनावें। आप इनके ऊपर कृपा-प्रसाद करें।'
माण्डव्यने कहा—मैंने जो बात कह दी, वह मिथ्या नहीं हो सकती। निश्चय ही ये धर्मराज शूद्रयोनिमें पड़ेंगे तथापि शूद्रयोनिमें रहते हुए भी इन्हें उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होगी और ये पुनः परम उत्तम धर्मराज-पदको प्राप्त कर लेंगे। इन्हें इसी क्षेत्रमें रहकर शान्तभावसे भगवान् शंकरकी आराधना करनी चाहिये। महादेवजीके प्रसादसे इन्हें शीघ्र मोक्ष प्राप्त होगा और यदि आपलोग मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यह शूली आज मेरे स्पर्शसे धर्मदायक तीर्थ बन जाय।
देवता बोले—जो प्रातःकाल उठकर इस शूलीका स्पर्श करेगा, वह इस लोकमें पातकसे मुक्त हो जायगा।
माण्डव्य मुनिसे ऐसा कहकर इन्द्र आदि देवता पतिसहित उस पतिव्रतासे आदरपूर्वक बोले—पतिव्रते! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।
पतिव्रता बोली—देवेश्वरो! इस स्थानमें मेरे द्वारा जो गड्डा बनाया गया है, वह तीनों लोकोंमें दीर्घिकातीर्थके नामसे विख्यात हो।
देवताओंने कहा—आजसे लेकर तुम्हारे कथनानुसार यह गड्डा तीनों लोकोंमें दीर्घिकातीर्थके नामसे विख्यात होगा। जो मनुष्य इसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करेंगे, वे यदि अपुत्र होंगे तो पुत्रवान् हो जायेंगे और अपने वंशकी वृद्धि करेंगे।
पतिव्रतासे ऐसा कहकर सब देवता स्वर्गलोकको चले गये। सुन्दरी पतिव्रता भी अपने उसी प्रियतम पतिके साथ रहकर सुख भोगने लगी। अन्तिम अवस्था आनेपर उसने हाटकेश्वरक्षेत्रमें अपने दीर्घिकातीर्थका सेवन किया। तदनन्तर कालवश अपने पतिकी मृत्यु हुई देख उसने भी शरीर त्याग दिया और पतिके साथ वह भी ब्रह्मलोकको चली गयी। इस प्रकार मैंने यह दीर्घिकातीर्थका वर्णन किया है।
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! परमतपस्वी मुनिश्रेष्ठ माण्डव्यको किसने और किस कारणसे शूलीपर चढ़ाया था?
सूतजीने कहा—महर्षियो! पूर्वकालमें माण्डव्य मुनि बड़ी श्रद्धाके साथ तीर्थयात्रा करते हुए इस क्षेत्रमें आये थे। यहाँ विश्वामित्रसम्बन्धी पावन तीर्थमें जाकर उन्होंने पितरोंका तर्पण किया और सूर्योपस्थान करते हुए विभ्रादित्यादि सूर्यदेवतासम्बन्धी सूक्तका पाठ करने लगे। इसी समय कोई चोर किसीका धन चुराकर भागा और उसी ओर आ निकला। उस चोरका पीछा करते हुए कोई दूसरा मनुष्य भी उसके पीछे ही लगा हुआ वहाँ आया। तब चोरने मुनीश्वरको मौन देखकर वह धन उनके आगे रख दिया और स्वयं किसी गुफाके भीतर जा छिपा। इतनेमें ही उस धनको वापस लेनेके लिये बहुत-से मनुष्य वहाँ एकत्र हो गये। उन्होंने मुनिके आगे धनका वह गट्ठर देखकर पूछा—'महाभाग! इस मार्गसे कोई चोर यह धन लेकर आया है, बताइये वह किस मार्गसे निकला है?' माण्डव्यजी यह जानते हुए भी कि चोर
१९५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गुफामें छिपा है, कुछ भी नहीं बोले। मौनव्रतमें ही तत्पर रहे। बार-बार पूछे जानेपर भी जब मुनि कुछ नहीं बोले, तब सबने आपसमें सलाह करके यह निश्चय किया कि अवश्य यही चोर है। हमलोगोंको अपने पीछे लगा देखकर अब साधु बनकर बैठ गया है। वे सब-के-सब दुरात्मा आभीर थे, उन्होंने पूर्वोक्त निश्चय करनेके बाद फिर कुछ विचार नहीं किया। मुनिको तत्काल ले जाकर वनके भीतर शूलीपर चढ़ा दिया। इस प्रकार माण्डव्य मुनिको निर्दोष होते हुए भी अपने पूर्वकर्मके परिणामसे शूली प्राप्त हुई।
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अन्न और जलके दानकी महत्ता, अन्नदानके बिना वसुषेणको स्वर्गमें भी कष्ट होना तथा सत्यसेनद्वारा स्थापित मिष्टान्नद देवकी महिमा
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! प्राचीन कालमें आनर्तदेशमें वसुषेण नामवाले एक राजा राज्य करते थे। वे दीर्घकालतक राज्य कर पुत्र-पौत्रका सुख देख करके समय आनेपर मृत्युको प्राप्त हुए। तदनन्तर मन्त्रियोंने उनके पुत्र सत्यसेनको राजपदर अभिषिक्त किया। सत्यसेन शौर्य तथा उदारतासे सम्पन्न थे। राजा वसुषेणने जीवनकालमें बहुत-से दान किये थे। उस दानके ही प्रभावसे वे दिव्य वस्त्रधारी एवं दिव्यरत्नोंसे विभूषित हो श्रेष्ठ विमानपर बैठकर स्वर्गलोकमें गये। पर वहाँ जानेपर भी वे भूखकी पीड़ासे घिरे रहे। उनका चित्त प्यासके दुःखसे व्याकुल रहता था, मुँह सूखा जाता था। उन्होंने इन्द्रके निकट जाकर कहा—'सुरश्रेष्ठ! मुझे भूख-प्यास कष्ट दे रही है, इसका क्या कारण है? बताइये। शचीपते! भूखसे अत्यन्त पीड़ित रहनेवाले पुरुषको इन दिव्य आभूषणों, वस्त्रों और विमान आदिसे क्या सुख मिलता है।'
इन्द्र बोले—राजन्! तुमने असंख्य दान दिये हैं, परंतु कभी किसीको अन्न अथवा जल नहीं दिया है। इस कारण तुम स्वर्गमें भूखे-प्यासे रहते हो। जो इस लोक और परलोकमें सनातन तृप्तिकी इच्छा रखता हो, उसे सदा दक्षिणासहित अन्न और जलका दान करना चाहिये। अन्न और जलका दान न करनेके कारण ही तुम स्वर्गमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर भी भूखसे पीड़ित हो।
राजाने कहा—देवराज! क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे ये मेरी तीव्रतम क्षुधा-पिपासा शान्त हो?
इन्द्र बोले—उपाय तो है, यदि तुम्हारा कोई पुत्र सदा ब्राह्मणोंके लिये अन्न और जल दे, तो तुम्हें तृप्ति प्राप्त हो सकती है; परंतु तुम्हारा पुत्र भी तुम्हारे लिये संकल्प करके ब्राह्मणोंको अन्न और जल नहीं देता है।
इन्द्र और वसुषेणमें यह बात हो ही रही थी कि वहाँ ब्रह्मलोकसे नारद मुनि आ पहुँचे। तब इन्द्रने नारदजीको विधिपूर्वक अर्घ्य प्रदान करके आदरके साथ पूछा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और कहाँ जानेके लिये प्रस्थित हुए हैं।'
नारदजीने कहा—मैं ब्रह्मलोकसे आया हूँ और तीर्थयात्राके लिये भूतलपर जा रहा हूँ।
तब राजा बोले—मुनिश्रेष्ठ! मुझ दीनपर कृपा कीजिये। पृथ्वीपर मेरा पुत्र सत्यसेन आनर्त देशका स्वामी है। उससे कहियेगा, 'मैंने तुम्हारे पिताको इन्द्रके लोकमें देखा है, उनका शरीर भूख-प्याससे पीड़ित है और देवताओंमें रहकर भी उनका चित्त अत्यन्त दीन एवं दुःखी है। इसलिये यदि तुम मेरे पुत्र हो और सत्यकी रक्षा करते हो, तो प्रतिदिन ब्राह्मणोंको मिष्टान्न, धान और जलदान करते रहो।'
'तथास्तु' कहकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने राजाका सन्देश सुनानेकी प्रतिज्ञा की और इन्द्रसे विदा लेकर वे भूलोककी ओर चल पड़े। वहाँ क्रमशः अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए आनर्तदेशमें गये
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११५१ ---|---
और सत्यसेनसे मिले। राजा सत्यसेनने नारदजीका पूजन किया। तत्पश्चात् मुनिने एकान्तमें आदरपूर्वक उनको पिताका सन्देश सुनाया। यह बात सुनकर सत्यसेनने विधिपूर्वक नारदजीकी पूजा करके उन्हें विदा किया और पिताके उद्देश्यसे प्रतिदिन सहस्रों ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक मिष्टान्न भोजन कराया। धर्मसम्बन्धी अन्य समस्त कार्योंको छोड़कर ग्रीष्मकालमें विशेषरूपसे पौंसला (प्याऊ) चलानेकी व्यवस्था की। इस प्रकार अन्न और जलके दानमें लगे हुए राजा सत्यसेनके राज्यमें भयंकर अनावृष्टि हुई, जो समस्त अन्न एवं खेती आदिको नष्ट कर देनेवाली थी। इन्द्रने बारह वर्षोंतक पृथ्वीपर जल नहीं बरसाया। इससे सब लोग क्षुधाके कष्टसे व्याकुल हो गये। उस समय राजा सत्यसेन पहलेकी भाँति ब्राह्मणोंको अन्नदान न कर सके। तब उनके पिता स्वप्नमें दर्शन देकर बोले—‘तुम पुत्रके रहते हुए मैं स्वर्गमें स्थित होकर भी भूख-प्याससे व्याकुल हूँ, अतः तुम अन्न दो, मिष्टान्न और जलका दान करो।’
यह स्वप्न देखनेसे राजाको बड़ा शोक हुआ। अन्नके अभावके सम्बन्धमें उन्होंने मन्त्रियोंके साथ बैठकर सलाह की और कहा—‘मैं अनाजके लिये भगवान् शंकरकी आराधना करूँगा। आपलोग सदा राज्यकी रक्षा करते रहें।' तब उन्होंने हाटकेश्वरक्षेत्रमें आकर भगवान् शंकरकी स्थापना की और यम-नियमसे रहते हुए वे उनकी भलीभाँति आराधना करने लगे। एक वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् शिव सन्तुष्ट हुए और राजासे इस प्रकार बोले—‘तुम इच्छानुसार वर माँगो।’
राजाने कहा—देवदेवेश्वर! मैंने अन्नकी प्राप्तिके लिये आपकी आराधना की है, अतः आप मुझे शीघ्र ही असंख्य अन्न प्रदान करें। पृथ्वीपर वर्षा हो, जिससे अनाज उत्पन्न हो और जल भी प्रचुर मात्रामें मिल सके। स्वर्गमें रहनेवाले मेरे महात्मा पिताको भी आपके प्रसादसे तृप्ति प्राप्त हो।
श्रीभगवान् बोले—राजेन्द्र! समस्त पृथ्वीपर शीघ्र ही वृष्टि होगी और पृथ्वीपर सब प्रकारके अन्न होंगे। इस समय तुम अपने घर जाओ। राजन्! तुमने यहाँ जो मेरे लिंगकी प्रतिष्ठा की है, इसका जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर दर्शन करेगा, उसे मनोवांछित वस्तुकी प्राप्ति होगी।
ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् राजा सत्यसेन बड़े हर्षसे अपने निवासस्थानपर आये और पृथ्वीका अकण्टक राज्य करने लगे।
सूतजी कहते हैं—आज भी भयंकर कलिकाल प्राप्त होनेपर जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक मिष्टान्नद शिवका दर्शन करता है, वह यदि चाहे तो उसे मिष्टान्नकी प्राप्ति होती है और जो निष्कामभावसे उनका दर्शन करता है, वह देवाधिदेव शूलपाणि महादेवजीके लोकको प्राप्त होता है।
## अदितिदेवीद्वारा आराधित अमरेश्वर लिंगकी महिमा
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! अमरत्व प्रदान करनेवाले जो अमरेश्वर महादेव बताये गये हैं, उनकी स्थापना किसने की है और उनका प्रभाव क्या है?
सूतजी बोले—पूर्वकालमें प्रजापति दक्षकी दो कन्याएँ दिति और अदिति महात्मा कश्यपजीके साथ ब्याही गयी थीं। अदितिसे देवताओंकी उत्पत्ति हुई और दितिसे दैत्योंकी। उनमें बड़ा भारी वैर उपस्थित हुआ। दैत्योंने देवताओंको पदभ्रष्ट कर दिया और वे सब सम्पूर्ण दिशाओंमें इधर-उधर भाग गये। तब देवमाता अदिति भगवान् शंकरके ध्यानमें तत्पर हो दिन-रात तपस्या करने लगीं। इस प्रकार व्रतमें स्थित हुई अदिति देवीके आगे धरती फोड़कर एक शिवलिंग प्रकट हुआ। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उसकी स्तुति करके