संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मोक्षके कारण हैं। जैसे शिव हैं वैसे विष्णु हैं, जैसे विष्णु हैं वैसे शिव हैं। शिव और विष्णुमें तनिक भी अन्तर नहीं है*। भगवान् विष्णु शार्ङ्ग धनुष एवं कौमोदकी गदा धारण करके सम्पूर्ण त्रिलोकीका शासन करते हैं और साधुपुरुषोंकी रक्षाके लिये दानवोंका विनाश करते हैं। शिवशर्मन्! अब तुम भगवान् विष्णुके लोकमें निवास करो।
अगस्त्यजी कहते हैं—प्रिये लोपामुद्रे! इस प्रकार शिवशर्मा ब्राह्मण मोक्षपदको प्राप्त हुए। जो इस पुण्यमय उपाख्यानको सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो उत्तम ज्ञानको प्राप्त होता है।
अगस्त्यजीका श्रीशैलपर कार्तिकेयजीकी सेवामें जाना और उनके मुखसे काशीकी महिमा श्रवण करना
**व्यासजी कहते हैं—**सूत! इस प्रकार काशीकी महिमा सुनाते हुए अगस्त्यजीने अपनी पत्नीके साथ श्रीपर्वतकी परिक्रमा करनेके पश्चात् कार्तिकेयजीके सुन्दर एवं विशाल वनको देखा। वहाँ लोहित नामका पर्वत है। उस पर्वतके समीप मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने अपनी पत्नीके साथ छः मुखोंवाले साक्षात् कार्तिकेयजीका दर्शन किया और पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। तत्पश्चात् हाथ जोड़कर वैदिक सूक्तों तथा अपने बनाये हुए स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की। स्तुतिके पश्चात् 'नमो नमः' कहते हुए कार्तिकेयजीकी दो-तीन बार परिक्रमा करके उनके द्वारा बैठनेकी आज्ञा मिलनेपर वे उनके सामने बैठे।
**तब कार्तिकेयजीने कहा—**देवताओंके मुख्य सहायक मुनिवर अगस्त्यजी! कुशल तो है न? आप यहाँ आये हैं, यह मुझे मालूम हो गया था। विन्ध्याचल पर्वत ऊँचा उठ गया था, इसका भी मुझे पता है। वास्तवमें कुशल तो अविमुक्त नामक महाक्षेत्रमें ही है, जो भगवान् त्रिलोचनद्वारा सुरक्षित है और जहाँ साक्षात् भगवान् शिव मरे हुए प्राणियोंको मोक्षदान करते हैं। भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वर्लोकमें अथवा पातालमें या महर्लोक आदि ऊपरके लोकोंमें भी मैंने वैसा उत्तम क्षेत्र कहीं नहीं देखा है। मुने! यद्यपि मैं अकेला ही सर्वत्र विचरता रहता हूँ तथापि काशीक्षेत्रकी प्राप्तिके लिये यहाँ तपस्या करता हूँ। किंतु आजतक मेरा मनोरथ सफल नहीं हुआ। पुण्य, दान, जप, तप तथा नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा काशीक्षेत्र मिलनेवाला नहीं है। उसकी प्राप्ति तो केवल श्रीमहादेवजीके अनुग्रहसे होती है। अत्यन्त दुर्लभ काशीपुरीका निवास केवल ईश्वरके अनुग्रहसे ही सुलभ है। शरीर प्रतिदिन बूढ़ा होता जाता है, इन्द्रियाँ जराजर्जर हो रही हैं और आयुरूपी मृगको मृत्युरूपी शिकारी अपना निशाना बनाना ही चाहता है। ऐसी दशामें सम्पत्तिको विपत्ति जानकर और आयुको विद्युत्के समान चपल मानकर मनुष्य काशीपुरीका भलीभाँति सेवन करे। जबतक जीवनका अन्त न हो जाय, तबतक काशी न छोड़े। अहो! बुढ़ापा निकट आ गया है, रोग अत्यन्त पीड़ा दे रहे हैं तथापि नाना प्रकारकी चेष्टाओंमें लगा हुआ देहधारी जीव काशीका सेवन करना नहीं चाहता! अर्थोपार्जनका उपाय किये बिना भी धन प्राप्त हो सकता है, यह एक निश्चित बात है। अतः धनकी चिन्ता छोड़कर एकमात्र धर्मकी शरण ले। धर्मसे स्वर्ग भी सुलभ है, परंतु एक काशीपुरी अत्यन्त दुर्लभ है। पाशुपतयोग मोक्षका साधन है। प्रयागमें गंगा-यमुनाके संगमका सेवन भी मुक्तिप्रद है तथा उससे भी बढ़कर अविमुक्त क्षेत्र है, जो अनायास
* यथा शिवस्तथा विष्णुर्यथा विष्णुस्तथा शिवः। अन्तरं शिवविष्णोश्च मनागपि न विद्यते॥ (स्क० पु०, का० पू० २३।४१)
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७६५
मोक्ष देनेवाला है। प्रतिदिन अविच्छिन्नरूपसे वेदोंका पाठ, मन्त्रोंका जप, अग्निहोत्र, दान, अनेक प्रकारके यज्ञ, देवताओंकी उपासना, त्रिरात्र अथवा पंचरात्र आदि आगमोक्त विधिसे आराधना, सांख्य, योग और श्रीविष्णुकी आराधना—ये सभी श्रेष्ठ कर्म मोक्षके साधन बताये गये हैं। अयोध्या, मथुरा आदि पुरियाँ भी मरे हुए जीवोंको मोक्ष देनेवाली बतायी गयी हैं। ये सभी कैवल्य मोक्षके साधन हैं, इसमें सन्देह नहीं। अन्य तीर्थ काशीकी प्राप्ति कराते हैं और काशीको प्राप्त होकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। इसीलिये वह पवित्र क्षेत्र इस ब्रह्माण्डमण्डलमें भगवान् विश्वनाथको सदा प्रिय है। सुव्रत ! मैं तो काशीसे आनेवाली वायुका भी स्पर्श चाहता हूँ। तुम तो साक्षात् काशीमें रहकर आये हो। जो जितेन्द्रिय होकर तीन रात भी काशीमें निवास करते हैं, उनकी चरणधूलिका स्पर्श अवश्य ही पवित्र कर देता है। तुम तो वहाँके निवासी ही थे, अतः तुम्हारे लिये क्या कहना है।
यों कहकर कार्तिकेयजीने अगस्त्य मुनिके सब अंगोंका स्पर्श किया और ऐसा करके उन्होंने अमृतके सरोवरमें स्नान करनेका सुख पाया। तत्पश्चात् 'जय विश्वनाथ' ऐसा कहकर उन्होंने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये और एक क्षणतक भगवान् शिवके अनिर्वचनीय स्वरूपका ध्यान किया। ध्यानसे निवृत्त होनेपर उनसे अगस्त्यजीने पूछा—'स्वामिन् ! आप मुझसे काशीकी महिमा कहिये। वह क्षेत्र मुझे बहुत प्रिय है।'
स्कन्द बोले—अगस्त्यजी ! काशीक्षेत्र इस लोकमें अत्यन्त गोपनीय बताया गया है। वहाँ सब प्रकारकी सिद्धि सन्निकट है; क्योंकि उसमें साक्षात् परमेश्वर सदा निवास करते हैं। काशीक्षेत्र आकाशमें स्थित है। वह इस भूलोकसे संलग्न नहीं है, किंतु इस बातको केवल योगीजन देख पाते हैं, अयोगी नहीं। जो पलभर भी अविमुक्त क्षेत्रके प्रति अतिशय भक्ति-भाव धारण करता है, उसने मानो ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक बड़ी भारी तपस्या कर ली। उसके द्वारा शिवसम्बन्धी सम्पूर्ण दिव्य व्रतोंका पालन हो जाता है। जो एक वर्षतक काशीमें क्रोधको जीतकर इन्द्रियसंयमपूर्वक रहता है, दूसरेके धनसे अपने शरीरका पोषण न करके पराये अन्नका परित्याग करता है, परनिन्दासे बचता है और प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करता रहता है, उसने पूर्वजन्ममें सहस्रों वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की है, ऐसा मानना चाहिये। जो काशीक्षेत्रके माहात्म्यको जाननेवाला मनुष्य जीवनभर काशीवास करता है, वह जन्म-मृत्युका भय छोड़कर परम गतिको प्राप्त होता है। जो मृत्यूपर्यन्त काशीका परित्याग नहीं करता, उसकी केवल ब्रह्महत्या ही नहीं दूर होती, अविद्या भी दूर हो जाती है। जो अनन्यचित्त होकर काशीक्षेत्रको नहीं छोड़ता, वह जरा-मृत्यु तथा गर्भवासके अत्यन्त दुःसह दुःखको त्याग देता है। जो बुद्धिमान् मानव इस पृथ्वीपर फिर जन्म लेना नहीं चाहता, वह देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा सेवित काशीक्षेत्रका कभी त्याग न करे। अन्तकालमें वातसे पीड़ित हुए मनुष्यके मर्मस्थान जब विदीर्ण होने लगते हैं, उस समय वह अपनी सुध-बुध खो बैठता है। इसी समय साक्षात् भगवान् विश्वनाथ प्राणत्यागकालमें उपस्थित हो उस मुमूर्षु जीवको तारक मन्त्रका उपदेश देते हैं, जिससे वह शिवस्वरूप हो जाता है। अतः अतिशय पापोंसे भरे हुए इस मानव-शरीरको अनित्य जानकर मनुष्य संसारभयका नाश करनेवाले काशीक्षेत्रका सेवन करे। जो विघ्नोंसे आहत होनेपर भी काशीक्षेत्रका त्याग नहीं करता, वह मोक्ष-सम्पत्तिको पाकर ऐसी स्थितिमें पहुँच जाता है, जहाँ दुःखका सर्वथा अभाव है। अतः कौन ऐसा बुद्धिमान् पुरुष है, जो बड़े-बड़े पापपुंजका नाश तथा पुण्योंकी वृद्धि करनेवाली और अन्तमें भोग एवं मोक्ष देनेवाली काशीपुरीका सेवन न करेगा? अविमुक्त क्षेत्रके माहात्म्यका मैं केवल छः मुखोंसे किस प्रकार वर्णन कर सकता हूँ, जब कि शेषनाग सहस्र मुखोंसे भी उसका वर्णन करनेमें असमर्थ हैं।
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काशीकी उत्पत्ति-कथा, काशी और मणिकर्णिकाका माहात्म्य
अगस्त्यजीने पूछा—भगवन्! यह अविमुक्त क्षेत्र इस भूतलपर कबसे प्रसिद्ध हुआ और किस प्रकार यह मोक्ष देनेवाला हुआ?
स्कन्द बोले—मुने! मेरे पिता महादेवजीने माता पार्वतीको इसी प्रश्नका उत्तर इस प्रकार दिया था—'महाप्रलयकालमें समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो गये थे। सर्वत्र अन्धकार छा रहा था। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, दिन, रात आदि कुछ भी नहीं था। केवल वह सत्स्वरूप ब्रह्म ही शेष था, जिसका श्रुति 'एकमेवाद्वितीयम्' कहकर वर्णन करती है। वह मन और वाणीका विषय नहीं है। उसका न कोई नाम है, न रूप। वह सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्दस्वरूप एवं परम प्रकाशमय है। वहाँ किसी भी प्रमाणकी पहुँच नहीं है। वह आधाररहित, निर्विकार एवं निराकार है। निर्गुण, योगिगम्य, सर्वव्यापी, एकमात्र कारण, निर्विकल्प, कर्मोंके आरम्भोंसे रहित, मायासे परे और उपद्रवशून्य है। जिस परमात्माके लिये इस प्रकार विशेषण दिये जाते हैं, वह कल्पान्तमें अकेला ही था। कल्पके आदिमें उसके मनमें यह संकल्प हुआ कि 'मैं एकसे दो हो जाऊँ।' अतः यद्यपि वह निराकार है तो भी उसने अपनी लीलाशक्तिसे साकाररूप धारण किया। परमेश्वरके संकल्पसे प्रकट हुई वह द्वितीय मूर्ति सम्पूर्ण ऐश्वर्य-गुणोंसे युक्त, सर्वज्ञानमयी, शुभ, सर्वव्यापक, सर्वस्वरूप, सबकी साक्षी, सबको उत्पन्न करनेवाली और सबके लिये एकमात्र वन्दनीय थी। प्रिये! उस निराकार परब्रह्मकी वह मूर्ति मैं ही हूँ। प्राचीन और अर्वाचीन विद्वान् मुझे ईश्वर कहते हैं। तदनन्तर साकाररूपमें प्रकट होकर भी मैं अकेला ही स्वेच्छानुसार विहार करता रहा। फिर अपने शरीरसे कभी अलग न होनेवाली तुम प्रकृतिको मैंने अपने ही विग्रहसे प्रकट किया। तुम्हीं प्रधान, प्रकृति और गुणवती माया हो। तुम्हें बुद्धितत्त्वकी जननी तथा निर्विकार बताया जाता है। फिर एक ही समय मुझ कालस्वरूप आदिपुरुषने तुम शक्तिके साथ उस काशीक्षेत्रको भी प्रकट किया।
स्कन्द कहते हैं—मुने! वह शक्ति प्रकृति कही गयी है और ईश्वरको परम पुरुष कहा गया है। वे दोनों परमानन्दस्वरूपसे उस परमानन्दमय काशीक्षेत्रमें रमण करने लगे। उस क्षेत्रका परिमाण पाँच कोसका बताया गया है। मुने! प्रलयकालमें भी उन दोनों (शिव-पार्वती)-ने उस क्षेत्रका कभी त्याग नहीं किया है, इसलिये उसे 'अविमुक्त' क्षेत्र कहते हैं। जब यह भूमण्डल नहीं रहता और जब जलकी भी सत्ता नहीं रह जाती, उस समय अपने विहारके लिये जगदीश्वर शिवने इस क्षेत्रका निर्माण किया है। कुम्भज! काशीक्षेत्रके इस रहस्यको कोई नहीं जानता। यह काशीक्षेत्र भगवान् शिवके आनन्दका हेतु है, इसलिये उन्होंने पहले इसका नाम 'आनन्दवन' रखा था। उस आनन्दकाननमें इधर-उधर जो सम्पूर्ण शिवलिंग हैं, उन्हें आनन्दकन्दके बीजोंके अंकुरकी भाँति जानना चाहिये। तदनन्तर भगवान् शिवने सच्चिदानन्दरूपिणी जगदम्बाके साथ अपने बायें अंगमें अमृतकी वर्षा करनेवाली दृष्टि डाली। तब उससे एक त्रिभुवनसुन्दर पुरुष प्रकट हुआ, जो परम शान्त, सत्त्वगुणसे पूर्ण, समुद्रसे भी अधिक गम्भीर और क्षमावान् था। उसके अंगोंकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम थी। नेत्र विकसित कमलदलके समान सुन्दर थे। उसने सुवर्णरंगके दो सुन्दर पीताम्बरोंसे अपने शरीरको आच्छादित कर रखा था। वह सुन्दर एवं प्रचण्ड युगल बाहुदण्डोंसे सुशोभित था। उसके नाभिकमलसे बड़ी उत्तम सुगन्ध फैल रही थी। वह अकेला ही सम्पूर्ण गुणोंका आश्रय और अकेला ही समस्त कलाओंकी निधि था। वह एक ही सब पुरुषोंसे उत्तम था, इसलिये 'पुरुषोत्तम' कहलाया। तत्पश्चात् महामहिमासे विभूषित उस महान् पुरुषको देखकर
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महादेवजीने कहा—'अच्युत ! तुम महाविष्णु हो, तुम्हारे निःश्वाससे वेद प्रकट होंगे और उनसे तुम सब कुछ जानोगे।' उनसे ऐसा कहकर भगवान् शिव शिवाके साथ पुनः आनन्दकाननमें प्रवेश कर गये।
तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने क्षणभर ध्यानमें तत्पर हो तपस्यामें ही मन लगाया। उन्होंने अपने चक्रसे एक सुन्दर पुष्करिणी खोदकर उसे अपने शरीरके पसीनेके जलसे भर दिया। फिर उसीके किनारे घोर तपस्या की। तब शिवजी पार्वतीजीके साथ वहाँ प्रकट हुए और बोले—'महाविष्णो ! वर माँगो।'
श्रीविष्णु बोले—देवदेव महेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं सदा भवानीसहित आपका दर्शन करना चाहता हूँ।
भगवान् शिव बोले—'एवमस्तु'। जनार्दन ! इस स्थानपर मेरी मणिजटित कर्णिका (मणिमय कुण्डल) गिर पड़ी है, इसलिये इस तीर्थका नाम मणिकर्णिका हो।
श्रीविष्णुने कहा—प्रभो ! यहाँ मुक्तामय कुण्डल गिरनेसे यह उत्तम तीर्थ मुक्तिका प्रधान क्षेत्र हो। यहाँ शिवस्वरूप अनिर्वचनीय ज्योति प्रकाशित होती है, इसलिये इसका दूसरा नाम 'काशी' प्रसिद्ध हो। चार प्रकारके जीवसमुदायमें ब्रह्मासे लेकर कीटकतक जितने भी जीव हैं, वे सब काशीमें मरनेपर मोक्षको प्राप्त हों तथा इस मणिकर्णिका नामक श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान, सन्ध्या, जप, होम, वेदाध्ययन, तर्पण, पिण्डदान, गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, अश्व, दीप, अन्न, वस्त्र, आभूषण और कन्या—इन सबका दान, अनेक यज्ञ, व्रतोद्यापन, वृषोत्सर्ग और शिवलिंग आदिकी स्थापना—इत्यादि शुभकर्मोंको जो बुद्धिमान् मनुष्य करे, उसके उस कर्मका फल मोक्ष हो। जो है, जो होगा और जो हो चुका है, उन सबसे यह क्षेत्र अधिक एवं शुभोदयकारी हो। काशीका नाम लेनेवाले लोगोंके भी पापका सदा ही क्षय हो।
श्रीमहादेवजी बोले—महाबाहु विष्णु ! तुम नाना प्रकारकी यथायोग्य सृष्टि करो और जो पापके मार्गपर चलनेवाले दुष्टात्मा हैं, उनका संहार करनेमें कारण बनो। यह पाँच-पाँच कोसका लम्बा-चौड़ा क्षेत्र काशीधाम मुझे बहुत प्रिय है। यहाँ केवल मेरी आज्ञा चल सकती है, यमराज आदि दूसरोंकी नहीं। अविमुक्त क्षेत्रमें निवास करनेवाले पापी जीवोंका भी मैं ही शासक हूँ, दूसरा नहीं। काशीसे सौ योजन दूर रहकर भी जो इस क्षेत्रका मन-ही-मन स्मरण करता है, वह पापोंसे पीड़ित नहीं होता। काशीमें पहुँचकर मनुष्य उसके पुण्यसे मोक्षपदका भागी होता है। जो मन-इन्द्रियोंको वशमें रखकर काशीमें बहुत समयतक निवास करके भी दैवयोगसे अन्यत्र मृत्युको प्राप्त होता है, वह भी स्वर्गीय सुख भोगकर अन्तमें काशीको प्राप्त हो मोक्षसम्पत्तिको पा लेता है। जो भगवान् विश्वनाथकी प्रसन्नताके लिये काशीमें न्यायपूर्वक धन देता है, अथवा निधन (मृत्यु)-को प्राप्त होता है, वह धन्य है और वही धर्मका ज्ञाता है। पाँच कोसका लम्बा-चौड़ा सम्पूर्ण अविमुक्त क्षेत्र विश्वनाथ नामसे प्रसिद्ध एक ज्योतिर्लिंगस्वरूप है, ऐसा जानना चाहिये। जैसे आकाशके एक देशमें स्थित होनेपर भी सर्वगत सूर्यमण्डल सबको दिखायी देता
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है, उसी प्रकार विश्वनाथ केवल काशीमें स्थित होकर भी सर्वव्यापी होनेके कारण सर्वत्र उपलब्ध होते हैं। जो क्षेत्रकी महिमाको नहीं जानता, जिसमें श्रद्धाका सर्वथा अभाव है, वह भी यदि समयानुसार काशीमें प्रवेश कर गया, तो निष्पाप हो जाता है और यदि वहाँ उसकी मृत्यु हो गयी तो वह भी मोक्ष प्राप्त कर लेता है। काशीमें पाप करके भी मनुष्य यदि काशीमें ही मर जाय तो पहले रुद्रपिशाच होकर वह पुनः मुक्तिको प्राप्त कर लेगा। इस शरीरको नाशवान् जानकर और गर्भवासके समय होनेवाली वेदनाको याद करके धन-धान्यसे सम्पन्न राज्यको भी त्यागकर निरन्तर काशीपुरीका सेवन करना चाहिये। अभी मैं नौजवान हूँ, अभी मेरी मृत्यु बहुत दूर है, ऐसी बात चित्तमें कभी नहीं लानी चाहिये। वृद्धावस्थाको प्राप्त होनेके पहले ही पुरानी झोंपड़ीकी तरह अपने तुच्छ गृहको त्यागकर शीघ्र शंकरजीकी पुरी काशीकी यात्रा करनी चाहिये।
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श्रीगंगाजीकी महिमा
श्रीमहादेवजी कहते हैं— विष्णो ! सूर्यवंशके महातेजस्वी परम धार्मिक राजा भगीरथ अपने पितामहोंका उद्धार करनेकी इच्छासे तपस्याके लिये पर्वतश्रेष्ठ हिमवान्को गये। हरे ! ब्राह्मणकी शापाग्निसे दग्ध होकर बड़ी भारी दुर्गतिमें पड़े हुए जीवोंको गंगाके सिवा दूसरा कौन स्वर्गलोकमें पहुँचा सकता है, क्योंकि वह शुद्ध, विद्यास्वरूपा, इच्छा, ज्ञान एवं क्रियारूप तीन शक्तियोंवाली, दयामयी, आनन्दामृतरूपा तथा शुद्ध धर्मस्वरूपिणी हैं। जगद्धात्री परब्रह्मस्वरूपिणी गंगाको मैं अखिल विश्वकी रक्षा करनेके लिये लीलापूर्वक अपने मस्तकपर धारण करता हूँ। विष्णो ! जो गंगाजीका सेवन करता है, उसने सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया, सब यज्ञोंकी दीक्षा ले ली और सम्पूर्ण व्रतोंका अनुष्ठान पूरा कर लिया। कलियुगमें कलुषित चित्तवाले, पराये धनका लोभ रखनेवाले तथा विधिहीन कर्म करनेवाले मनुष्योंके लिये गंगाजीके बिना दूसरी कोई गति नहीं है। जो दूर रहकर भी गंगाजीके माहात्म्यको जानता है और भगवान् गोविन्दमें भक्ति रखता है, वह अयोग्य हो तो भी गंगा उसपर प्रसन्न होती हैं। अज्ञान, राग और लोभ आदिसे मोहित चित्तवाले पुरुषोंकी धर्म और गंगामें विशेष श्रद्धा नहीं होती। गंगाके गर्भमें मेरा तेजस्वरूप अग्नि है, वह मेरे वीर्यसे सुरक्षित है। अतएव सब दोषोंको जलानेवाली तथा सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली है। जैसे वज्रका मारा हुआ पर्वत सैकड़ों टुकड़ोंमें बिखर जाता है, उसी प्रकार पापोंका समूह गंगाके स्मरणमात्रसे शतधा नष्ट हो जाता है। जो चलते, खड़े होते, जप और ध्यान करते, खाते-पीते, जागते-सोते तथा बात करते समय भी सदा गंगाजीका स्मरण करता रहता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता हैं^१। जो पितरोंके उद्देश्यसे भक्तिपूर्वक गुड़, घी और तिलके साथ मधुयुक्त खीर गंगामें डालते हैं, उसके पितर सौ वर्षतक तृप्त बने रहते हैं और वे सन्तुष्ट होकर अपनी सन्तानोंको नाना प्रकारकी मनोवांछित वस्तुएँ प्रदान करते हैं। जैसे बिना इच्छाके भी स्पर्श करनेपर आग जला ही देती है, उसी प्रकार अनिच्छासे भी अपने जलमें स्नान करनेपर गंगा मनुष्यके पापोंको भस्म कर देती हैं^२। जो गंगा-स्नानके लिये उद्यत होकर चलता है और मार्गमें ही मर जाता है, वह
१. गच्छंस्तिष्ठन् जपन् ध्यायन् भुञ्जन् जाग्रत् स्वपन् वदन्। यः स्मरेत् सततं गङ्गां स हि मुच्येत बन्धनात्॥
(स्क० पु०, का० पू० २७ । ३७)
२. अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहनो हि यथा दहेत्। अनिच्छयापि संस्नाता गङ्गा पापं तथा दहेत्॥
(स्क० पु०, का० पू० २७ । ४९)
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७६९
भी निःसन्देह गंगा-स्नानका फल पाता है। जो लोग खोटी बुद्धिवाले, दुराचारी, कोरा तर्क करनेवाले और अधिक सन्देह रखनेवाले मोहित मनुष्य हैं, वे गंगाको अन्य साधारण नदियोंके समान ही देखते हैं। जैसे क्रोधसे तपका, कामसे बुद्धिका, अन्यायसे लक्ष्मीका, अभिमानसे विद्याका तथा पाखण्ड, कुटिलता और छल-कपटसे धर्मका नाश होता है, उसी प्रकार गंगाजीके दर्शनमात्रसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं। जैसे मन्त्रोंमें ॐकार, धर्मोंमें अहिंसा और कमनीय वस्तुओंमें लक्ष्मी श्रेष्ठ हैं तथा जिस प्रकार विद्याओंमें आत्मविद्या और स्त्रियोंमें गौरीदेवी उत्तम हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण तीर्थोंमें गंगातीर्थ विशेष माना गया है। हरे! जो परम बुद्धिमान् मनुष्य तुममें और मुझमें भेद-भाव नहीं करता, वही शिवभक्त जानने योग्य है। अनेक रूपवाले पितर सदा यह गाथा गाते हैं कि 'क्या हमारे कुलमें भी कोई गंगा नहानेवाला होगा, जो विधि और श्रद्धाके साथ गंगा-स्नान कर देवताओं तथा ऋषियोंका भलीभाँति तर्पण करके दीनों, अनाथों और दुःखियोंको तृप्त करते हुए हमारे निमित्त जलांजलि देगा? हमारे कुलमें कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न हो, जो भगवान् शिव और विष्णुमें समान दृष्टि रखते हुए उनके लिये मन्दिर बनवावे और भक्तिपूर्वक उस मन्दिरमें झाडू देने आदिका कार्य करे।' जो गंगाका सेवन करता है, वही मुनि है और वही पण्डित है। वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि करके कृतार्थ जानने योग्य है। गंगास्नान करनेके लिये तिथि, नक्षत्र और पूर्व आदि दिशाका विचार नहीं करना चाहिये; क्योंकि गंगामें स्नान करनेमात्रसे समस्त संचित पापका नाश हो जाता है। जो प्रतिदिन आदरसे गंगाजीका माहात्म्य सुनते हैं, उन्हें गंगा-स्नानका फल होता है। जो पितरोंके उद्देश्यसे गंगाजलके द्वारा शिवलिंगको स्नान कराते हैं, उनके पितर यदि बड़े भारी नरकमें पड़े हों तो भी तृप्त हो जाते हैं। जो एक बार भी ताँबेके पात्रमें रखे हुए अष्टद्रव्ययुक्त गंगाजलसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य देते हैं, वे अपने पितरोंके साथ सूर्यलोकमें जाकर प्रतिष्ठित होते हैं। जल, दूध, कुशका अग्रभाग, घी, मधु, गायका दही, लाल कनेर तथा लाल चन्दन—इन आठ अंगोंसे युक्त अष्टांग अर्घ्य बताया गया है, जो सूर्यदेवको अधिक सन्तुष्ट करनेवाला है १। चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणमें, व्यतीपात योगमें, विषुवयोगमें २ तथा दोनों अयनोंमें (मकर और कर्ककी संक्रान्तिके दिन) किया हुआ गंगा-स्नान लाखगुना पुण्य देनेवाला होता है। यदि सोमवारको चन्द्रग्रहण तथा रविवारको सूर्यग्रहण हो तो वह चूड़ामणि नामक पर्व कहलाता है। उसमें किया हुआ गंगा-स्नान असंख्य पुण्यदायक है। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें हस्त नक्षत्रयुक्त दशमी तिथिको स्त्री हो या पुरुष भक्तिभावसे गंगाजीके तटपर रात्रिमें जागरण करे और दस प्रकारके दस-दस सुगन्धित पुष्प, फल, नैवेद्य, दस दीप और दशांग धूपके द्वारा बुद्धिमान् पुरुष श्रद्धा और विधिके साथ दस बार गंगाजीकी पूजा करे। गंगाजीके जलमें घृतसहित तिलोंकी दस अंजलि डाले। फिर गुड़ और सत्तूके दस पिण्ड बनाकर उन्हें भी गंगाजीमें डाले। यह सब कार्य मन्त्रद्वारा होना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै स्वाहा।' यह बीस अक्षरका मन्त्र है। गंगाजीके लिये पूजा, दान, जप, होम सब इसी मन्त्रसे करने योग्य है। इस प्रकार मन्त्रोच्चारणके साथ धूप, दीप आदि समर्पण करते हुए पूजा करके मुझ शिवका, तुम
१- आपः क्षीरं कुशाग्राणि घृतं मधु गवां दधि । रक्तानि करवीराणि रक्तचन्दनमित्यपि ॥
अष्टाङ्गोऽयमुद्दिष्टस्तवतीव रवितोषणः ॥
(स्क० पु०, का० पू० २७। ९८-९९)
२- ज्योतिषके अनुसार वह समय जब कि सूर्य विषुवरेखापर पहुँचता है और दिन-रात दोनों बराबर होते हैं, विषुवयोग कहलाता है। ऐसा समय वर्षमें दो बार आता है। एक तो सौर चैत्रमासकी नवमी तिथिको और दूसरा सौर आश्विनकी नवमी तिथिको।
७७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * विष्णुका, ब्रह्माका, सूर्यका, हिमवान् पर्वतका और राजा भगीरथका भलीभाँति पूजन करे। दस ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक दस सेर तिल दे। इस प्रकार विधानसे पूजा सम्पन्न करके दिनभर उपवास करनेवाला पुरुष निम्नांकित दस पापोंसे मुक्त हो जाता है। बिना दी हुई वस्तुको लेना, निषिद्ध हिंसा, परस्त्री-संगम - यह तीन प्रकारका दैहिक पाप माना गया है। कठोर वचन मुँहसे निकालना, झूठ बोलना, सब ओर चुगली करना और अंट-संट बातें बकना - ये वाणीसे होनेवाले चार प्रकारके पाप हैं। दूसरेके धनको लेनेका विचार करना, मनसे दूसरोंका बुरा सोचना और असत्य वस्तुओंमें आग्रह रखना - ये तीन प्रकारके मानसिक पाप कहे गये हैं*। पूर्वोक्त प्रकारसे दान-पूजा और व्रत करनेवाला पुरुष दस जन्मोंमें उपार्जित इन दस प्रकारके पापोंसे निःसन्देह छूट जाता है। तदनन्तर गंगाजीके सम्मुख श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्रको पढ़े - 'ॐ' शिवस्वरूपा श्रीगंगाजीको नमस्कार है। कल्याणदायिनी गंगाको नमस्कार है। देवि गंगे! आप विष्णुरूपिणी हैं, आपको नमस्कार है। ब्रह्मस्वरूपा ! आपको नमस्कार है, रुद्ररूपिणी ! आपको नमस्कार है। शंकरप्रिया ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। देवस्वरूपिणी ! आपको नमस्कार है। ओषधिरूपा ! आपको नमस्कार है। आप सबके सम्पूर्ण रोगोंकी श्रेष्ठ वैद्या हैं, आपको नमस्कार है। स्थावर और जंगम प्राणियोंसे प्रकट होनेवाले विषका आप नाश करनेवाली हैं। आपको नमस्कार है। संसाररूपी विषका नाश करनेवाली जीवनरूपा आपको नमस्कार है। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक - तीनों प्रकारके क्लेशोंका संहार करनेवाली आपको नमस्कार है। प्राणोंकी स्वामिनी आपको नमस्कार है, नमस्कार है। शान्तिका विस्तार करनेवाली शुद्धस्वरूपा आपको नमस्कार है। सबको शुद्ध करनेवाली तथा पापोंकी शत्रुस्वरूपा आपको नमस्कार है। भोग, मोक्ष तथा कल्याण प्रदान करनेवाली आपको बार-बार नमस्कार है। भोग और उपभोग देनेवाली भोगवती नामसे प्रसिद्ध आप पातालगंगाको नमस्कार है। मन्दाकिनी नामसे प्रसिद्ध तथा स्वर्ग प्रदान करनेवाली आप आकाशगंगाको बार-बार नमस्कार है। आप भूतल, आकाश और पाताल - तीन मार्गोंसे जानेवाली और तीनों लोकोंकी आभूषणस्वरूपा हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। गंगाद्वार, प्रयाग और गंगासागर-संगम - इन तीन विशुद्ध तीर्थस्थानोंमें विराजमान आपको नमस्कार है। क्षमावती आपको नमस्कार है। गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्निरूप त्रिविध अग्नियोंमें स्थित रहनेवाली तेजोमयी आपको बार-बार नमस्कार है। आप ही अलकनन्दा हैं, आपको नमस्कार है। शिवलिंग धारण करनेवाली आपको नमस्कार है। सुधारामयी आपको नमस्कार है। जगत्में मुख्य सरितारूप आपको नमस्कार है। रेवती-नक्षत्ररूपा आपको नमस्कार है। बृहती नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार है। लोकोंको धारण करनेवाली आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वके लिये मित्ररूपा आपको नमस्कार है। सबको समृद्धि देकर आनन्दित करनेवाली आपको बारंबार नमस्कार है। आप पृथ्वीरूपा हैं, आपको नमस्कार है। आपका जल कल्याणमय है और आप उत्तम धर्मस्वरूपा हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। बड़े-छोटे सैकड़ों प्राणियोंसे सेवित आपको नमस्कार है। सबको तारनेवाली आपको नमस्कार है, नमस्कार है। संसार-बन्धनका उच्छेद करनेवाली अद्वैतरूपा आपको नमस्कार है। आप परम शान्त, सर्वश्रेष्ठ
- अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः । परदारोपसेवा च कायिकं त्रिविधं स्मृतम् ॥ पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चैव सर्वशः । असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥ परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् । वितथाभिनिवेशश्च मानसं त्रिविधं स्मृतम् ॥ (स्क० पु०, का० पू० २७ । १५२-१५४) In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७७१ तथा मनोवांछित वर देनेवाली हैं, आपको बारंबार | कल्याणमयी गंगे! आदि, मध्य और अन्तमें नमस्कार है। आप प्रलयकालमें उग्ररूपा हैं, अन्य | सर्वत्र आप हैं। गंगे! आप ही मूल-प्रकृति हैं, समयमें सदा सुखका भोग करानेवाली हैं तथा | आप ही परम पुरुष हैं तथा आप ही परमात्मा उत्तम जीवन प्रदान करनेवाली हैं, आपको | शिव हैं; शिवे! आपको नमस्कार है*। जो नमस्कार है। आप ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मज्ञान देनेवाली | श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्रको पढ़ता और सुनता है, तथा पापोंका नाश करनेवाली हैं, आपको बार- | वह मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले पूर्वोक्त बार नमस्कार है। प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश | दस प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है। यह करनेवाली जगन्माता आपको नमस्कार है। आप | स्तोत्र जिसके घरमें लिखकर रखा हुआ हो, समस्त विपत्तियोंकी शत्रुभूता तथा सबके लिये | उसे कभी अग्नि, चोर और सर्प आदिका भय मंगलस्वरूपा हैं, आपके लिये बार-बार नमस्कार | नहीं होता। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें हस्त है। शरणागतों, दीनों तथा पीड़ितोंकी रक्षामें | नक्षत्रसहित दशमी तिथिका यदि बुधवारसे योग संलग्न रहनेवाली और सबकी पीड़ा दूर करनेवाली | हो, तो उस दिन गंगाजीके जलमें खड़ा होकर देवि नारायणि ! आपको नमस्कार है। आप पाप- | जो दस बार इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ताप अथवा अविद्यारूपी मलसे निर्लिप्त, दुर्गम | दरिद्र हो या असमर्थ, वह भी उसी फलको दुःखका नाश करनेवाली तथा दक्ष हैं, आपको | प्राप्त होता है, जो पूर्वोक्त विधिसे यत्नपूर्वक बारंबार नमस्कार है। आप पर और अपर सबसे | गंगाजीकी पूजा करनेपर उपलब्ध होनेवाला परे हैं। मोक्षदायिनी गंगे! आपको नमस्कार है। | बताया गया है। विष्णो ! जैसे मैं हूँ, वैसे तुम गंगे ! आप मेरे आगे हों, गंगे! आप मेरे पीछे | हो, जैसे तुम हो, वैसी उमादेवी हैं और जैसी रहें, गंगे! आप मेरे उभयपार्श्वमें स्थित हों तथा | उमादेवी हैं, वैसी गंगा हैं। इन चारों रूपोंमें गंगे! मेरी आपमें ही स्थिति हो । आकाशगामिनी | भेद नहीं है।
* ॐ नमः शिवायै गङ्गायै शिवदायै नमो नमः । नमस्ते विष्णुरूपिण्यै ब्रह्ममूर्त्यै नमोऽस्तु ते ॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै शाङ्कर्यै ते नमो नमः । सर्वदेवस्वरूपिण्यै नमो भेषजमूर्तये ॥
सर्वस्य सर्वव्याधीनां भिषक्रेष्ठ्यै नमोऽस्तु ते । स्थास्नुजङ्गमसम्भूतविषहन्त्र्यै नमोऽस्तु ते ॥
संसारविषनाशिन्यै जीवनायै नमोऽस्तु ते । तापत्रितयसंहन्त्र्यै प्राणेश्यै ते नमो नमः ॥
शान्तिसन्तानकारिण्यै नमस्ते शुद्धमूर्तये । सर्वसंशुद्धिकारिण्यै नमः पापारिमूर्तये ॥
भुक्तिमुक्तिप्रदायिन्यै भद्रदायै नमो नमः । भोगोपभोगदायिन्यै भोगवत्यै नमोऽस्तु ते ॥
मन्दाकिन्यै नमस्तेऽस्तु स्वर्गदायै नमो नमः । नमस्त्रैलोक्यभूषायै त्रिपथायै नमो नमः ॥
नमस्त्रिशुक्लसंस्थायै क्षमावत्यै नमो नमः । त्रिहुताशनसंस्थायै तेजोवत्यै नमो नमः ॥
नन्दायै लिङ्गधारिण्यै सुधाधारात्मने नमः । नमस्ते विश्वमुख्यायै रेवत्यै ते नमो नमः ॥
बृहत्यै ते नमस्तेऽस्तु लोकधात्र्यै नमोऽस्तु ते । नमस्ते विश्वमित्रायै नन्दिन्यै ते नमो नमः ॥
पृथ्व्यै शिवामृतायै च सुवृषायै नमो नमः । परापरशताढ्यायै तारायै ते नमो नमः ॥
पाशजालनिकृन्तिन्यै अभिन्नायै नमोऽस्तु ते । शान्तायै च वरिष्ठायै वरदायै नमो नमः ॥
उग्रायै सुखजग्ध्व्यै च सञ्जीवन्यै नमोऽस्तु ते । ब्रह्मिष्ठायै ब्रह्मदायै दुरितघ्न्यै नमो नमः ॥
प्रणतार्तिप्रभञ्जिन्यै जगन्मात्रे नमोऽस्तु ते । सर्वापत्तिप्रशमयै मङ्गलायै नमो नमः ॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
निर्लेपायै दुर्गहन्त्र्यै दक्षायै ते नमो नमः । परापरपरायै च गङ्गे निर्वाणदायिनि ॥
गङ्गे ममाग्रतो भूया गङ्गे मे तिष्ठ पृष्ठतः । गङ्गे मे पार्श्वयोरेधि गङ्गे त्वय्यस्तु मे स्थितिः ॥
आदौ त्वमन्ते मध्ये च सर्वं त्वं गाङ्गते शिवे ।
त्वमेव मूलप्रकृतिस्त्वं पुमान् पर एव हि । गङ्गे त्वं परमात्मा च शिवस्तुभ्यं नमः शिवे ॥
(स्क० पु०, का० पू० २७ । १५७-१७४)
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| ७७२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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गंगाजीकी महिमा
भगवान् शिव कहते हैं—जो तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगाजीके तटपर जाकर एक बार भी पिण्डदान करता है, वह तिलमिश्रित जलके द्वारा अपने पितरोंका भवसागरसे उद्धार कर देता है। सम्पूर्ण देवता और पितर गंगाजीमें सदा वर्तमान रहते हैं इसलिये वहाँ उनका आवाहन और विसर्जन नहीं होता। पिताके कुलमें अथवा माताके कुलमें तथा गुरु, श्वशुर और भाई-बन्धुओंके कुलमें जो अपने सम्बन्धी मरे हों; अथवा जो अन्य बन्धु-बान्धव मृत्युको प्राप्त हुए हों; जो दाँत निकलनेके पहले अथवा गर्भमें ही पीड़ित होकर मरे हों; जो अग्नि, बिजली और चोरके द्वारा मरे हों; जो व्याघ्र अथवा अन्य दाढ़ोंवाले हिंसक जीवोंसे मारे गये हों; जो फाँसी लगाकर या ऊपरसे नीचे गिरकर मरे हों; जिन्होंने आत्मघात किया हो अथवा जो अपना शरीर बेचनेवाले, चोर, यज्ञके अनधिकारियोंसे यज्ञ करानेवाले, रस-विक्रयी, पापरोगी, घरोंमें आग लगानेवाले, जहर देनेवाले अथवा गोहत्यारे रहे हों और अपने कुलमें ही उनका जन्म हुआ रहा हो; उनको भी यदि एक बार मनुष्य विधिपूर्वक गंगाजलसे तर्पण करे तो वे भी स्वर्गलोकमें पहुँच जाते हैं और यदि पहलेसे स्वर्गमें हों तो मोक्षको प्राप्त होते हैं। तीनों लोकोंमें जो कोई भी मनोवांछित फल देनेवाले हैं, वे सब काशीमें उत्तरवाहिनी गंगाका सेवन करते हैं। केवल गंगा भी मुक्ति देनेमें समर्थ हैं, ऐसा निर्णय हो चुका है। किंतु अविमुक्त क्षेत्रमें मेरे निवासस्थानके गौरवसे वे विशेषरूपसे मुक्तिदायिनी होती हैं। पापोंसे चंचल चित्तवाले तथा संसाररूपी रोगसे ग्रस्त रहनेवाले मन्दबुद्धि मनुष्योंके लिये गंगाजी ही सर्वश्रेष्ठ हैं। जो गंगाजीके तटपर टूटे-फूटे घाटोंका संस्कार करते हैं अथवा वहाँके गिरे-पड़े देवमन्दिरोंका जीर्णोद्धार करते हैं, वे मेरे लोकमें चिरकालतक अक्षय सुख भोगते हैं। मनुष्योंकी हड्डी जबतक गंगाजीके जलमें स्थित रहती है, उतने हजार वर्षोंतक वे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं।
स्कन्दजी कहते हैं—मुनिवर अगस्त्य! वस्तुशक्तिका यह विचार अद्भुत एवं अनिर्वचनीय है। गंगाजी द्रवके रूपमें भगवान् सदाशिवकी कोई परा शक्ति हैं। करुणारूपी अमृतरससे भरे हुए देवाधिदेव भगवान् शंकरने समस्त संसारका उद्धार करनेके लिये ही गंगाजीको प्रवृत्त किया है। मुने! गंगाधर शिवने दयावश श्रुतियोंके अक्षरोंको निचोड़कर उस ब्रह्मद्रवसे ही गंगाका निर्माण किया है। जो गंगाजीके तटकी मिट्टीको अपने मस्तकपर लगाता है उसका अज्ञानान्धकार नष्ट हो जाता है। गंगा अपने नामका कीर्तन करनेसे पुण्यकी वृद्धि और पापका नाश करती है। दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा उसमें स्नान करनेसे क्रमशः दसगुना फल होता है, ऐसा जानना चाहिये। ऋषियोंद्वारा सेवित, भगवान् विष्णुके चरणोंसे उत्पन्न, अति प्राचीन तथा परम पुण्यमयी धारासे युक्त भगवती गंगाकी जो लोग मनसे शरण लेते हैं वे ब्रह्मधामको प्राप्त होते हैं। जो माताकी भाँति इस संसारके जीवोंको पुत्र मानकर सदा उन्हें स्वर्गलोकको पहुँचाती है और सम्पूर्ण उत्तम गुणोंसे सम्पन्न है, उत्तम ब्रह्मलोककी इच्छा रखनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषोंको सदा ही उस गंगाकी उपासना करनी चाहिये। जैसे ब्रह्मलोक सब लोकोंमें उत्तम है, उसी प्रकार गंगा समस्त सरिताओं और सरोवरोंसे श्रेष्ठ है। गंगाके जलमें स्नान करनेवाले पुरुषका समस्त पातक तत्काल नष्ट हो जाता है और उसे उसी क्षण महान् श्रेयकी प्राप्ति हो जाती है। गंगामें पुत्र-पौत्र आदि यदि अपने पितरोंके लिये श्रद्धापूर्वक जल देते हैं तो उस जलसे वे पितर तीन वर्षोंतक पूर्णतया तृप्त रहते हैं।
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- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * | ७७३ ---|---
गंगासहस्रनामस्तोत्र^१
अगस्त्यजी बोले—गंगामें स्नान किये बिना मनुष्योंका जन्म व्यर्थ ही बीतता है। क्या कोई दूसरा उपाय भी है, जिससे गंगास्नानका फल प्राप्त हो सके ?
स्कन्दने कहा—अगस्त्यजी ! जान पड़ता है, यही सोचकर देवाधिदेव भगवान् शंकरने अपने मस्तकपर गंगाजीको धारण कर रखा है। एक परम गोपनीय उपाय है, जिससे देवनदी गंगामें स्नान करनेका पूरा फल प्राप्त होता है। वह उपाय उसीको बतलाना चाहिये, जो भगवान् शिव और विष्णुका भक्त, शान्त, श्रद्धालु, आस्तिक तथा गर्भवाससे छूटनेकी इच्छा रखनेवाला हो। दूसरे किसीके सामने कहीं भी उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। वह परम रहस्यमय साधन महापातकोंका नाश करनेवाला है। वह उपाय है— भगवती गंगाका सहस्रनामस्तोत्र। वह सम्पूर्ण उत्तम स्तोत्रोंमें श्रेष्ठ है, जपनेयोग्य मन्त्रोंमें सर्वोत्तम है और वेदोंके उपनिषद्-भागके समान मनन करनेयोग्य है। साधकको मौन होकर प्रयत्नपूर्वक इसका जप करना चाहिये। यदि पवित्र स्थान हो तो वहाँ स्वयं भी पवित्रभावसे बैठकर सुस्पष्ट अक्षरोंमें इसका पाठ करना चाहिये।
स्कन्दजी कहते हैं— ॐ नमो गङ्गादेव्यै।
१ ॐकाररूपिणी—प्रणवरूपा, सच्चिदानन्दस्वरूपा अथवा ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपिणी, २ अजरा—वृद्धावस्थासे रहित, ३ अतुला—तुलनारहित, ४ अनन्ता—जिसका कभी कहीं भी अन्त न हो, ऐसी, ५ अमृतस्रवा—अमृतमय जलका स्रोत बहानेवाली, ६ अत्युदारा—अतिशय उदार, किसीको भी शरणमें लेने अथवा सद्गति देनेमें संकोच न करनेवाली, ७ अभया—भयरहित, जिसका आश्रय लेनेसे संसार-भयका निवारण हो जाता है, ऐसी, ८ अशोका—शोकसे रहित अथवा जिससे शोकका निवारण होता है, ऐसी, ९ अलकनन्दा—अलकावासियोंको आनन्द देनेवाली अथवा केशोंमें जिसके जलका स्पर्श होनेसे आनन्द प्राप्त होता है, ऐसी, १० अमृता—सुधारूपिणी अथवा मुक्ति देनेके कारण अमृतस्वरूपा, ११ अमला—निर्मल जलवाली अथवा संसाररूपी मलका निवारण करनेवाली।^२
१२ अनाथवत्सला—अनाथोंपर दया करनेवाली, १३ अमोघा—जिनकी सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती, ऐसी, १४ अपांयोनिः—जलकी उत्पत्तिका स्थान, १५ अमृतप्रदा—मोक्ष प्रदान करनेवाली, १६ अव्यक्तलक्षणा—अव्यक्तब्रह्मस्वरूपा अथवा अव्याकृत प्रकृतिरूपा, १७ अक्षोभ्या—किसीके द्वारा भी क्षुब्ध न की जा सकनेवाली, १८ अनवच्छिन्ना—अपने दिव्य एवं व्यापक स्वरूपके कारण त्रिविध परिच्छेदसे शून्य, १९ अपरा—जिसके लिये कोई भी पराया नहीं है अथवा जिससे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है, ऐसी, २० अजिता—किसीसे भी परास्त न होनेवाली।^३
२१ अनाथनाथा—अनाथोंको भी शरण देनेवाली, २२ अभीष्टार्थसिद्धिदा—भक्तजनोंके अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करनेवाली, २३ अनङ्गवर्द्धिनी—कामनाकी पूर्ति या मनोवांछित भोगोंकी वृद्धि करनेवाली अथवा कामभावका नाश या निराकार ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाली, २४ अणिमादि-गुणा—अणिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करना जिसका स्वाभाविक गुण है, ऐसी, २५ आधारा—'अ' अर्थात् विष्णु आधार हैं जिसके, ऐसी, २६ अग्रगण्या—श्रेष्ठता और पवित्रतामें सबसे प्रथम गणना करने योग्य, २७ अलीकहारिणी—अलीक अर्थात् अज्ञानका हरण करनेवाली।^४
२८ अचिन्त्यशक्तिः—जिनकी शक्ति चिन्तनका
१. स्कन्दपुराण, काशीखण्ड पूर्वार्ध, अध्याय २९, श्लोक १७ से ६८ तक।
२. ॐकाररूपिण्यजरातुलानन्तामृतस्रवा । अत्युदाराभयाशोकालकनन्दामृतामला ॥
३. अनाथवत्सलामोघापांयोनिरमृतप्रदा । अव्यक्तलक्षणाक्षोभ्यानवच्छिन्नापराजिता ॥
४. अनाथनाथाभीष्टार्थसिद्धिदानङ्गवर्द्धिनी । अणिमादिगुणाऽऽधाराग्रगण्यालीकहारिणी ॥
| ७७४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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विषय नहीं है, ऐसी, २९ अनघा—निष्पाप, ३० अद्भुतरूपा—आश्चर्यमय स्वरूपवाली, ३१ अघहारिणी—अपने कीर्तन, दर्शन, स्पर्श और जलस्नानसे सबके पापोंको हर लेनेवाली, ३२ अद्रिराजसुता—गिरिराज हिमालयकी पुत्री, ३३ अष्टाङ्गयोगसिद्धिप्रदा—अष्टांगयोगसे प्राप्त होनेवाली सिद्धि (मुक्ति)-को देनेवाली, ३४ अच्युता—अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाली अथवा विष्णुरूपा।^१
३५ अक्षुण्णशक्तिः—जिसकी शक्ति कभी खण्डित या कुण्ठित नहीं होती, वह, ३६ असुदा—अपने जीवनरूपी जलसे प्राणदान करनेवाली, ३७ अनन्ततीर्था—सर्वतीर्थमयी होनेके कारण असंख्य तीर्थोंसे युक्त, ३८ अमृतोदका—अमृतके समान मधुर अथवा मोक्षदायक जलवाली, ३९ अनन्त-महिमा—जिसकी महिमाका कहीं अन्त नहीं है, ऐसी, ४० अपारा—सीमारहित, ४१ अनन्तसौख्य-प्रदा—मोक्ष या भगवत्प्राप्तिका अक्षय सुख प्रदान करनेवाली, ४२ अन्नदा—भोग प्रदान करनेवाली।^२
४३ अशेषदेवतामूर्तिः—सम्पूर्ण देवस्वरूपा, ४४ अघोरा—शान्तस्वरूपा, ४५ अमृतरूपिणी—मोक्षस्वरूपा, ४६ अविद्याजालशमनी—अविद्यारूपी आवरणका नाश करनेवाली, ४७ अप्रतर्क्यगति-प्रदा—जहाँ मन और वाणीकी पहुँच नहीं है, ऐसी मोक्षरूप गति प्रदान करनेवाली।^३
४८ अशेषविघ्नसंहर्त्री—समस्त विघ्नोंका संहार करनेवाली, ४९ अशेषगुणगुम्फिता—सम्पूर्ण सद्गुणोंसे ग्रथित, ५० अज्ञानतिमिरज्योतिः—अज्ञानमय अन्धकारका नाश करनेवाली ज्योतिः-स्वरूपा, ५१ अनुग्रहपरायणा—भक्तोंपर अनुग्रह करनेमें तत्पर।^४
५२ अभिरामा—सब ओरसे मनोरम, ५३ अनवद्याङ्गी—निर्दोष स्वरूपवाली, ५४ अनन्त-सारा—जिसके सार अर्थात् शक्तिका अन्त नहीं है, ऐसी, ५५ अकलङ्किनी—कलंकसे रहित, ५६ आरोग्यदा—अपने अमृतमय जलसे आरोग्य प्रदान करनेवाली, ५७ आनन्दवल्ली—दिव्य आनन्दकी प्राप्ति करानेवाली कल्पलताके समान, ५८ आपन्नार्तिविनाशिनी—शरणमें आये हुए जीवोंकी पीड़ा (संसार-बन्धन)-का नाश करनेवाली।^५
५९ आश्चर्यमूर्तिः—आश्चर्यमय स्वरूपवाली, ६० आयुुष्या—आयु प्रदान करनेवाली, ६१ आढ्या—दिव्य वैभवसे सम्पन्न, ६२ आद्या—सबकी कारणभूता आदिशक्ति, ६३ आप्रा—सब ओरसे परिपूर्ण, ६४ आर्यसेविता—श्रेष्ठ पुरुषों (देवता और ऋषि आदि)-के द्वारा सेवित, ६५ आप्यायिनी—सबको तृप्त करनेवाली, ६६ आप्तविद्या—ब्रह्मविद्यास्वरूपा अथवा सम्पूर्ण विद्याओंको जाननेवाली, ६७ आख्या—सदा और सर्वत्र प्रसिद्ध, ६८ आनन्दा—सुखस्वरूपा, ६९ आश्वासनदायिनी—नरक आदिके भयसे डरे हुए प्राणियोंको सान्त्वना प्रदान करनेवाली।^६
७० आलस्यघ्नी—आलस्यका नाश करनेवाली, ७१ आपदां हन्त्री—आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक आपत्तियोंका नाश करनेवाली, ७२ आनन्दामृतवर्षिणी—ब्रह्मानन्दमय अमृतकी वर्षा करनेवाली, ७३ इरावती—इरावती नामवाली नदी अथवा इरा अर्थात् लक्ष्मीसे युक्त, ७४ इष्टदात्री—भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाली, ७५ इष्टा—आराध्यदेवी अथवा सबके द्वारा पूजित, ७६ इष्टापूर्तफलप्रदा—इष्ट—यज्ञ, होम आदि और आपूर्त—कूप, तड़ाग, वापीनिर्माण आदि, इन सबके पुण्यफलको देनेवाली।^७
७७ इतिहासश्रुतीड्यार्था—इतिहास और वेद दोनोंके द्वारा जिसके पुरुषार्थकी स्तुति की जाती
१. अचिन्त्यशक्तिरनघाद्भुतरूपाघहारिणी । अद्रिराजसुताष्टाङ्गयोगसिद्धिप्रदाच्युता ॥
२. अक्षुण्णशक्तिरसुदानन्ततीर्थामृतोदका । अनन्तमहिमापारानन्तसौख्यप्रदानदा ॥
३. अशेषदेवतामूर्तिरघोराऽमृतरूपिणी । अविद्याजालशमनी ह्यप्रतर्क्यगतिप्रदा ॥
४. अशेषविघ्नसंहर्त्री त्वशेषगुणगुम्फिता । अज्ञानतिमिरज्योतिस्त्वनुग्रहपरायणा ॥
५. अभिरामानवद्याङ्ग्यनन्तसाराकलङ्किनी । आरोग्यदाऽऽनन्दवल्ली त्वापन्नार्तिविनाशिनी ॥
६. आश्चर्यमूर्तिरायुष्या ह्याढ्याऽऽद्याऽऽप्राऽऽर्यसेविता । आप्यायिन्याप्तविद्याऽऽख्या त्वानन्दाऽऽश्वासदायिनी ॥
७. आलस्यघ्न्यापदां हन्त्री ह्यानन्दामृतवर्षिणी । इरावतीष्टदात्रीष्टा त्विष्टापूर्तफलप्रदा ॥
* काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७७५
है, ऐसी, ७८ इहामुत्र शुभप्रदा—इहलोक और परलोकमें कल्याण प्रदान करनेवाली, ७९ इज्याशीलसमिज्येष्ठा—यज्ञ आदि करनेवाले कर्मनिष्ठ तथा समस्वरूप ब्रह्मका विचार करनेवाले ज्ञानी, दोनोंमें श्रेष्ठ अथवा इन दोनोंके लिये श्रेष्ठ मानकर पूजनीय, ८० इन्द्रादिपरिवन्दिता—इन्द्र आदि देवताओंद्वारा वन्दित।^१
८१ इलालङ्कारमाला—पृथ्वीको विभूषित करनेवाली पुष्पमालाके सदृश, ८२ इद्धा—दीप्तिमती अथवा प्रकाशस्वरूपा, ८३ इन्दिरा—लक्ष्मीस्वरूपा, ८४ रम्यमन्दिरा—भगवच्चरणारविन्द, ब्रह्मकमण्डलु तथा भगवान् शंकरका मस्तक—ये सब रमणीय आश्रय हैं जिसके, ऐसी, ८५ इन्दिरादिसंसेव्या—निरन्तर लक्ष्मी आदि देवियोंके सेवन करने योग्य, ८६ ईश्वरी—ऐश्वर्यसम्पन्न, ८७ ईश्वरवल्लभा—शंकरप्रिया।^२
८८ ईतिभीतिहरा—अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी पड़ना, चूहे लगना, तोते आदि पक्षियोंकी अधिकता और दूसरे राजाकी चढ़ाई—इन छः प्रकारके उपद्रवोंका भय दूर करनेवाली, ८९ ईड्या—स्तवन करने योग्य, ९० ईडनीयचरित्रभृत्—स्तुत्य चरित्र धारण करनेवाली, ९१ उत्कृष्टशक्तिः—उत्तम शक्तिसे युक्त, ९२ उत्कृष्टा—श्रेष्ठ, ९३ उडुपमण्डलचारिणी—चन्द्रमण्डलमें विचरनेवाली।^३
९४ उदिताम्बरमार्गा—जिसके द्वारा आकाशमें मार्गका उदय होता है अथवा जो ऊर्ध्वलोकमें जानेके लिये प्रकाशित मार्गके समान है, ऐसी, ९५ उस्रा—उज्ज्वल किरणके समान प्रकाशमान, ९६ उरगलोकविहारिणी—पाताललोकमें प्रवाहित होनेवाली, ९७ उक्षा—भूतलको सींचनेवाली, ९८ उर्वरा—भूमिको उर्वरा (उपजाऊ) बनानेमें हेतु, ९९ उत्पला—कमलस्वरूपा, १०० उत्कुम्भा—जिसमें भरे जानेवाले कलश उत्कृष्ट हो जाते हैं, वह, १०१ उपेन्द्रचरणद्रवा—भगवान् वामनके चरण पखारनेसे प्रकट चरणोदकस्वरूपा।^४
१०२ उदन्वत्पूर्तिहेतुः—समुद्रको पूर्ण करनेमें कारणभूत, १०३ उदारा—उत्तम गति प्रदान करनेमें उदार, १०४ उत्साहप्रवर्द्धिनी—अपने आश्रितोंका उत्साह बढ़ानेवाली, १०५ उद्वेगघ्नी—घबराहट अथवा भयको मिटानेवाली, १०६ उष्णशमनी—गर्मीको शान्त करनेवाली, १०७ उष्णारश्मिसुताप्रिया—सूर्यकन्या यमुनाकी प्रिय सखी।^५
१०८ उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणी—ब्रह्मशक्ति, विष्णुशक्ति तथा रुद्रशक्तिके रूपमें उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली, १०९ उपरिचारिणी—पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकके ऊपर विचरनेवाली, ११० ऊर्जवहन्ती—बलवर्द्धक जलको प्रवाहित करनेवाली, १११ ऊर्जधरा—बल अथवा प्राणशक्तिको धारण करनेवाली, ११२ ऊर्जावती—बल अथवा प्राणशक्तिका आश्रय, ११३ ऊर्मिमालिनी—तरंग-मालाओंसे युक्त।^६
११४ ऊर्ध्वरेतःप्रिया—ऊर्ध्वरेता महात्माओंको प्रिय लगनेवाली, ११५ ऊर्ध्वाध्वा—जिसका मार्ग ऊपर विष्णुलोककी ओर गया है, ऐसी, ११६ ऊर्मिला—लहरोंको धारण करनेवाली अथवा भक्तोंके शोक, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा, पिपासा—इन छः ऊर्मियोंको ग्रहण करनेवाली, ११७ ऊर्ध्वगतिप्रदा—अपने सम्पर्कमें आये हुए मुमूर्षुओंको ऊर्ध्वगति (स्वर्ग एवं मोक्ष) प्रदान करनेवाली, ११८ ऋषिवृन्दस्तुता—महर्षियोंके समुदायसे प्रशंसित, ११९ ऋद्धिः—समृद्धिस्वरूपा, १२० ऋणत्रयविनाशिनी—देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋणका नाश करनेवाली।^७
१२१ ऋतम्भरा—ऋत अर्थात् सत्य एवं ब्रह्मका
१. इतिहासश्रुतीड्यार्था त्विहामुत्रशुभप्रदा । इज्याशीलसमिज्येष्ठा त्विन्द्रादिपरिवन्दिता ॥
२. इलालङ्कारमालेद्धा त्विन्दिरा रम्यमन्दिरा । इन्दिरादिसंसेव्या त्वीश्वरीश्वरवल्लभा ॥
३. ईतिभीतिहरेड्या च त्वीडनीयचरित्रभृत् । उत्कृष्टशक्तिरुत्कृष्टोडुपमण्डलचारिणी ॥
४. उदिताम्बरमार्गोंस्रोरगलोकविहारिणी । उक्षोर्वरोत्पलोत्कुम्भा उपेन्द्रचरणद्रवा ॥
५. उदन्वत्पूर्तिहेतुश्चोदारोत्साहप्रवर्द्धिनी । उद्वेगघ्न्युष्णशमनी ह्युष्णारश्मिसुताप्रिया ॥
६. उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिण्युपरिचारिणी । ऊर्जवहन्त्यूर्जधरोजांवती चोर्मिमालिनी ॥
७. ऊर्ध्वरेतःप्रियोर्ध्वाध्वा ह्यूर्मिलोर्ध्वगतिप्रदा । ऋषिवृन्दस्तुतर्द्धिश्च ऋणत्रयविनाशिनी ॥
७७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आश्रय लेनेवाली बुद्धिसस्वरूपा, १२२ ऋद्धि-दात्री—समृद्धि देनेवाली, १२३ ऋक्स्वरूपा—ऋग्वेदस्वरूपिणी, १२४ ऋजुप्रिया—सरल स्वभाववाले साधु महात्माओंको प्रिय लगनेवाली, १२५ ऋक्ष-मार्गवहा—नक्षत्रलोकके मार्गसे बहनेवाली, १२६ ऋक्षाचि:—ताराओंके सदृश उज्ज्वल कान्तिवाली, १२७ ऋजुमार्गप्रदर्शिनी—धर्म एवं मोक्षका सरल मार्ग दिखानेवाली।^१
१२८ एधिताखिलधर्मार्था—सम्पूर्ण धर्म और अर्थको बढ़ानेवाली, १२९ एका—अपने ढंगकी अकेली, १३० एकामृतदायिनी—एकमात्र अमृत-स्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाली, १३१ एधनीय-स्वभावा—जिसके दया, उदारता आदि स्वाभाविक गुण निरन्तर बढ़ने योग्य हों, ऐसी १३२ एज्या—पूजनीया, १३३ एजिताशेषपातका—सम्पूर्ण पातकोंको कम्पित करनेवाली।^२
१३४ ऐश्वर्यदा—अणिमा, महिमा आदि ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली, १३५ ऐश्वर्यरूपा—भगवद्विभूतिस्वरूपा, १३६ ऐतिह्यम्—इतिहास-स्वरूपा, १३७ ऐन्दवीद्युति:—चन्द्रमाकी कान्तिरूपा, १३८ ओजस्विनी—शक्तिमती, १३९ ओषधी-क्षेत्रम्—अन्न पैदा करनेका क्षेत्र, १४० ओजोदा—बल एवं तेज प्रदान करनेवाली, १४१ ओदन-दायिनी—धानकी पैदावार बढ़ाकर भात देनेवाली, अथवा अन्नदायिनी अन्नपूर्णारूपा।^३
१४२ ओष्ठामृता—जिसका जल ओष्ठके भीतर आनेपर अमृतके समान प्रतीत होता है अथवा जिसके ओष्ठमें अमृत हो, वह, १४३ औन्नत्यदात्री—आध्यात्मिक, लौकिक एवं पारलौकिक उन्नति प्रदान करनेवाली, १४४ भवरोगिणाम् औषधम्—संसार-रोगसे ग्रस्त प्राणियोंके लिये ओषधिरूपा, १४५ औदार्यचञ्चुरा—उदारतामें कुशल, १४६ औपेन्द्री—उपेन्द्र अर्थात् वामनरूपधारी विष्णुकी पत्नी लक्ष्मीस्वरूपा अथवा विष्णुकी चरणोदकस्वरूपा, १४७ औग्री—रुद्रकी शक्ति, १४८ औमेयरूपिणी—उमाके सदृश रूपवाली।^४
१४९ अम्बराध्ववहा—आकाशमार्गपर बहने-वाली, १५० अम्बष्ठा—अ अर्थात् विष्णुकी शरण लेनेवाले वैष्णवोंको अम्ब कहते हैं; उनमें स्थित होनेवाली, १५१ अम्बरमाला—आकाशमें पुष्पहारके समान शोभा पानेवाली, १५२ अम्बुजे-क्षणा—कमलरूप अथवा कमल-सदृश नेत्रोंवाली, १५३ अम्बिका—जगदम्बास्वरूपा, १५४ अम्बु-महायोनि:—जलकी उत्पत्तिका मूल कारण, १५५ अन्धोदा—अन्न देनेवाली, १५६ अन्धकहारिणी—अन्धकासुरका नाश करनेवाले शिवकी शक्ति अथवा अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाली।^५
१५७ अंशुमाला—तेजका समुदाय, १५८ अंशु-मती—तेजोमयी, १५९ अङ्गीकृतषडानना—छः मुखोंवाले स्कन्दको पुत्ररूपमें स्वीकार करनेवाली, १६० अन्धतामिस्रहन्त्री—अन्धतामिस्र आदि नरकोंका निवारण करनेवाली, १६१ अन्धु:—कूपमात्रमें स्वयं प्रकट होनेवाली, १६२ अञ्जना—आध्यात्मिक दृष्टिको शुद्ध करनेके लिये दिव्य अंजनरूपा अथवा हनुमान्जीको जन्म देनेवाली अंजनास्वरूपा, १६३ अञ्जनावती—ईशानकोणकी रक्षा करनेवाली हस्तिनी, अंजनावतीसे अभिन्न।^६
१६४ कल्याणकारिणी—सबका कल्याण करनेवाली, १६५ काम्या—कमनीया, १६६ कमलो-त्पलगन्धिनी—कमल और उत्पलकी सुगन्धसे सुवासित, १६७ कुमुद्वती—कुमुद पुष्पोंसे युक्त, १६८ कमलिनी—कमल पुष्पोंसे अलंकृत, १६९ कान्ति:—दीप्तिमयी, १७० कल्पित-दायिनी—मनोवांछित वस्तु देनेवाली।^७
१. ऋतम्भरर्द्धिदात्री च ऋक्स्वरूपा ऋजुप्रिया । ऋक्षमार्गवहर्क्षाचिर्ऋजुमार्गप्रदर्शिनी ॥
२. एधिताखिलधर्मार्था त्वैकेकामृतदायिनी । एधनीयस्वभावैज्या त्वेजिताशेषपातका ॥
३. ऐश्वर्यदैश्वर्यरूपा हौतिह्यं ह्रैन्दवीद्युतिः । ओजस्विन्तोषधीक्षेत्रमोजोदौदनदायिनी ॥
४. ओष्ठामृतौन्नत्यदात्री त्वौषधं भवरोगिणाम् । औदार्यचञ्चुरौपेन्द्री त्वौग्री ह्यौमेयरूपिणी ॥
५. अम्बराध्ववहाम्बष्ठाम्बरमालाम्बुजेक्षणा । अम्बिकाम्बुमहायोनिरन्धोदान्धकहारिणी ॥
६. अंशुमाला ह्यंशुमती त्वङ्गीकृतषडानना । अन्धतामिस्रहन्त्र्यन्धुरञ्जना ह्यञ्जनावती ॥
७. कल्याणकारिणी काम्या कमलोत्पलगन्धिनी । कुमुद्वती कमलिनी कान्तिः कल्पितदायिनी ॥
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७७७
| १७१ काञ्चनाक्षी—सुवर्णके समान उद्दीप्त नेत्रोंवाली, १७२ कामधेनुः—भक्तोंकी मनोवांछा पूर्ण करनेमें कामधेनुके समान अथवा कामधेनुस्वरूपा, १७३ कीर्तिकृत्—अपने सुयशका विस्तार करनेवाली, १७४ क्लेशनाशिनी—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशरूप पाँच क्लेशोंका नाश करनेवाली, १७५ क्रतुश्रेष्ठा—यज्ञोंसे श्रेष्ठ—अश्वमेध आदि यज्ञोंसे अधिक फल देनेवाली, १७६ क्रतुफला—जिसमें स्नान करनेसे यज्ञोंका फल प्राप्त होता है, ऐसी, १७७ कर्मबन्धविभेदिनी—शुभाशुभकर्मजनित बन्धनका नाश करनेवाली। १ | १९६ कमनीयजला—कमनीय अर्थात् स्वच्छ जलवाली, १९७ कम्रा—मनोहर स्वरूपवाली, १९८ कपर्दिसुकपर्दगा—भगवान् शंकरके सुन्दर जटाजूटमें वास करनेवाली। ४<br>१९९ कालकूटप्रशमनी—भगवान् शंकरके पीये हुए कालकूट नामक विषकी ज्वालाको शान्त करनेवाली, २०० कदम्बकुसुमप्रिया—कदम्बके पुष्पोंमें रुचि रखनेवाली, २०१ कालिन्दी—कलिन्दकन्या यमुनास्वरूपा, २०२ केलिललिता—क्रीडासे मनोहर प्रतीत होनेवाली, २०३ कलकल्लोलमालिका—मनोहर लहरोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित। ५ |
| १७८ कमलाक्षी—कमलके समान या कमलरूप नेत्रोंवाली, १७९ क्लमहरा—सांसारिक क्लेशको हर लेनेवाली, १८० कृशानुSpanद्युतिः—आधिदैविक स्वरूपमें अग्नि और सूर्यके समान कान्तिवाली, १८१ करुणार्द्रा—करुणारससे भीगी हुई, १८२ कल्याणी—मंगलस्वरूपा, १८३ कलिकल्मषनाशिनी—कलिकालमें होनेवाले पापोंका नाश करनेवाली। २ | २०४ क्रान्तलोकत्रया—स्वर्ग, भूतल और पाताल तीनों लोकोंको अपनी धारासे आक्रान्त करनेवाली, २०५ कण्डूः—अविद्या और उसके कार्यको खण्डित करनेवाली, २०६ कण्डूतनयवत्सला—कण्डू शब्द मृकण्डुका वाचक है, उनके पुत्र मार्कण्डेयजीपर वात्सल्य स्नेह रखनेवाली, २०७ खड्गिनी—देवी-रूपसे खड्ग धारण करनेवाली, २०८ खड्गधाराभा—तलवारकी धारके समान उज्ज्वल कान्तिवाली, २०९ खगा—आकाशमें प्रवाहित होनेवाली, २१० खण्डेन्दुधारिणी—अर्धचन्द्र धारण करनेवाली। ६ |
| १८४ कामरूपा—इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली, १८५ क्रियाशक्तिः—क्रियाशक्ति, १८६ कमलोत्पलमालिनी—कमल और उत्पलोंकी माला धारण करनेवाली, १८७ कूटस्था—ब्रह्मस्वरूपा, १८८ करुणारूप—दयामयी, १८९ कान्ता—कान्तिमती, १९० कूर्मयाना—कच्छपरूप वाहनवाली, १९१ कलावती—चौंसठ कलाओंको जाननेवाली। ३ | २११ खेखेलगामिनी—आकाशमें लीलापूर्वक चलनेवाली, २१२ खस्था—आकाश अथवा ब्रह्ममें स्थित, २१३ खण्डेन्दutilकप्रिया—चन्द्रभाल शिवकी प्रिया अथवा अर्धचन्द्राकार तिलकसे प्रसन्न होनेवाली, २१४ खेचरी—आकाशमें विचरण करनेवाली, २१५ खेचरीवन्द्या—आकाशमें विहार करनेवाली सिद्धांगनाओंकी वन्दनीया, २१६ ख्यातिः—प्रतिष्ठास्वरूपा, २१७ ख्यातिप्रदायिनी—प्रतिष्ठा देनेवाली। ७ |
| १९२ कमला—लक्ष्मीस्वरूपा, १९३ कल्पलतिका—कल्पलताके समान सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, १९४ काली—कालिकास्वरूपा, १९५ कलुषवैरिणी—पापोंका नाश करनेवाली, |
१. काञ्चनाक्षी कामधेनुः कीर्तिकृत्क्लेशनाशिनी। क्रतुश्रेष्ठा क्रतुफला कर्मबन्धविभेदिनी॥
२. कमलाक्षी क्लमहरा कृशानुSpanद्युतिः। करुणार्द्रा च कल्याणी कलिकल्मषनाशिनी॥
३. कामरूपा क्रियाशक्तिः कमलोत्पलमालिनी। कूटस्था करुणा कान्ता कूर्मयाना कलावती॥
४. कमला कल्पलतिका काली कलुषवैरिणी। कमनीयजला कम्रा कपर्दिसुकपर्दगा॥
५. कालकूटप्रशमनी कदम्बकुसुमप्रिया। कालिन्दी केलिललिता कलकल्लोलमालिका॥
६. क्रान्तलोकत्रया कण्डूः कण्डूतनयवत्सला। खड्गिनी खड्गधाराभा खगा खण्डेन्दुधारिणी॥
७. खेखेलगामिनी खस्था खण्डेन्दutilकप्रिया। खेचरी खेचरीवन्द्या ख्यातिः ख्यातिप्रदायिनी॥
७७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
२१८ खण्डितप्रणताघौघा—शरणागतोंकी पापराशिका खण्डन करनेवाली, २१९ खलबुद्धि-विनाशिनी—खलोंकी बुद्धि अथवा खलतापूर्ण बुद्धिका विनाश करनेवाली, २२० खातैनःकन्द-सन्दोहा—पापरूपी कन्दसमुदायको उखाड़ फेंकनेवाली, २२१ खड्गखट्वाङ्गखेटिनी—खड्ग (तलवार), खट्वांग (खाटके पायेके आकारवाले शस्त्र) और खेट धारण करनेवाली।^१
२२२ खरसन्तापशमनी—तीखे तापको शान्त करनेवाली, २२३ पीयूषपाथासां खनिः—अमृतके समान मधुर जलकी खान, २२४ गङ्गा—‘स्वर्गाद् गां गतवतीति गंगा’—स्वर्गसे भूतलपर गमन करनेके कारण गंगा नामसे प्रसिद्ध, अथवा कलकल गान करनेवाली या ब्रह्मद्रवरूपा सच्चिदानन्दमयी देवी, २२५ गन्धवती—पृथ्वीस्वरूपा अथवा उत्तम गन्धसे युक्त, २२६ गौरी—गौर वर्णवाली अथवा पार्वतीस्वरूपा, २२७ गन्धर्वनगरप्रिया—गन्धर्व-नगरके निवासियोंको प्रिय लगनेवाली।^२
२२८ गम्भीराङ्गी—गहराईसे युक्त अथवा गहनस्वरूपवाली, २२९ गुणमयी—त्रिगुणात्मिका प्रकृतिरूपा अथवा सर्वज्ञता आदि गुणोंसे युक्त, २३० गतातङ्का—भयरहित अथवा अपने पास आनेवालोंके संसार-भयको निवृत्त करनेवाली, २३१ गतिप्रिया—निरन्तर गमन जिसे प्रिय है अथवा जो गति अर्थात् ज्ञानको प्रिय मानती है, ऐसी, २३२ गणनाथाम्बिका—गणेशजीकी माता, २३३ गीता—भगवद्गीतास्वरूपा, २३४ गद्यपद्य-परिष्कृता—गद्य-पद्यमय स्तोत्रोंसे जिसकी स्तुति की जाती है, वह।^३
२३५ गान्धारी—पृथ्वीको धारण करनेवाली वाराहशक्तिस्वरूपा, अथवा धृतराष्ट्रपत्नीस्वरूपा, २३६ गर्भशमनी—मुक्ति प्रदान करके गर्भवासके कष्टको दूर करनेवाली, २३७ गतिभ्रष्टगतिप्रदा—गतिभ्रष्टों—पतितोंको भी सद्गति प्रदान करनेवाली, २३८ गोमती—द्वारका अथवा नैमिषारण्यमें स्थित गोमतीनदीस्वरूपा, २३९ गुह्यविद्या—ब्रह्मविद्या, २४० गौः—पृथ्वीस्वरूपा अथवा कामधेनुरूपिणी, २४१ गोप्त्री—सद्गति प्रदान करके सबकी रक्षा करनेवाली, २४२ गगनगामिनी—आकाशगामिनी।^४
२४३ गोत्रप्रवर्द्धिनी—पर्वतोंसे निर्झर आदिका जल पाकर बढ़नेवाली अथवा अपने भक्तोंका गोत्र (वंश) बढ़ानेवाली, २४४ गुण्या—उत्तम गुणोंसे युक्त, २४५ गुणातीता—तीनों गुणोंसे परे, २४६ गुणाग्रणीः—सद्गुणोंके कारण अग्रगण्य, २४७ गुहाम्बिका—स्कन्दकी माता, २४८ गिरि-सुता—हिमवान्की पुत्री, २४९ गोविन्दाङ्घ्रि-समुद्भवा—श्रीविष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई।^५
२५० गुणनीयचरित्रा—गुणन—प्रशंसा या गणना करनेयोग्य उत्तम चरित्रवाली, २५१ गायत्री—अपना गुणगान करनेवालेकी रक्षा करनेवाली अथवा गायत्रीदेवीस्वरूपा, २५२ गिरिशप्रिया—भगवान् शिवकी वल्लभा, २५३ गूढरूपा—छिपे हुए दिव्य स्वरूपवाली, २५४ गुणवती—शान्ति आदि उत्तम गुणोंसे युक्त, २५५ गुर्वी—गौरवमयी, २५६ गौरववर्द्धिनी—महत्त्व बढ़ानेवाली अथवा स्वयं ही गौरवसे बढ़नेवाली।^६
२५७ ग्रहपीडाहरा—अनिष्ट स्थानोंमें स्थित ग्रहोंकी पीड़ा दूर करनेवाली, २५८ गुन्द्रा—'गु' अर्थात् अविद्याका द्रावण—नाश करनेवाली, २५९ गरघ्नी—विषका प्रभाव दूर करनेवाली,
१. खण्डितप्रणताघौघा खलबुद्धिविनाशिनी। खातैःकन्दसन्दोहा खड्गखट्वाङ्गखेटिनी ॥
२. खरसन्तापशमनी खनिः पीयूषपाथसाम्। गंगा गन्धवती गौरी गन्धर्वनगरप्रिया ॥
३. गम्भीराङ्गी गुणमयी गतातङ्का गतिप्रिया। गणनाथाम्बिका गीता गद्यपद्यपरिष्कृता ॥
४. गान्धारी गर्भशमनी गतिभ्रष्टगतिप्रदा। गोमती गुह्यविद्या गौर्गोप्त्री गगनगामिनी ॥
५. गोत्रप्रवर्द्धिनी गुण्या गुणातीता गुणाग्रणीः। गुहाम्बिका गिरिसुता गोविन्दाङ्घ्रिसमुद्भवा ॥
६. गुणनीयचरित्रा च गायत्री गिरिशप्रिया। गूढरूपा गुणवती गुर्वी गौरववर्द्धिनी ॥
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७७९
| २६० गानवत्सला—संगीतप्रिया, २६१ घर्महन्त्री—घामका कष्ट निवारण करनेवाली, २६२ घृतवती—घीके समान गुणकारक जलवाली, २६३ घृततुष्टिप्रदायिनी—अपने जलसे ही घीके समान सन्तोष देनेवाली।^१ | चन्द्रकान्तमणिके समान निर्मल जलवाली, २८४ चञ्चदापा—चंचल जलवाली, २८५ चलद्युतिः—विद्युत्स्वरूपा, २८६ चिन्मयी—ज्ञानस्वरूपा, २८७ चितिरूपा—चैतन्यस्वभावा, २८८ चन्द्रायुतशतानना—दस सहस्र चन्द्रमाओंके समान मनोरम मुखवाली।^५ |
| २६४ घण्टारवप्रिया—घण्टानादसे प्रसन्न होनेवाली, २६५ घोराघौघविध्वंसकारिणी—भयंकर पापराशिका विनाश करनेवाली, २६६ घ्राणतुष्टिकरी—घ्राणेन्द्रियको सन्तुष्ट करनेवाली, २६७ घोषा—अपने प्रवाह और तरंगोंसे कल-कल शब्द करनेवाली, २६८ घनानन्दा—घनीभूत आनन्दकी राशि अथवा आकाशगंगामें स्थित जलसे मेघोंको आनन्द देनेवाली, २६९ घनप्रिया—आकाशगंगारूपसे मेघोंको प्रिय लगनेवाली।^२ | २८९ चाम्पेयलोचना—चम्पाके फूलोंके समान सुन्दर नेत्रोंवाली, २९० चारुः—मनोहारिणी, २९१ चार्वङ्गी—परम सुन्दर अंगोंवाली, २९२ चारुगामिनी—मनोहर चालसे चलनेवाली, २९३ चार्या—शरण लेनेयोग्य, २९४ चारित्रनिलया—सदाचारका आश्रय, २९५ चित्रकृत्—अद्भुत कार्य करनेवाली, २९६ चित्ररूपिणी—विचित्र रूपवाली।^६ |
| २७० घातुका—पाप एवं अज्ञानका नाश करनेवाली, २७१ घूर्णितजला—भँवरयुक्त जलवाली, २७२ घृष्टपातक सन्ततिः—पातक-परम्पराको नष्ट कर देनेवाली, २७३ घटकोटिप्रपीतापा—जिसके करोड़ों घड़े जल नित्य पीये जाते हैं, वह, २७४ घटिताशेषमङ्गला—पूर्ण मंगलकारिणी।^३ | २९७ चम्पूः—गद्य-पद्यमय काव्यस्वरूपा अथवा चम्पापुष्पके समान रंगवाली, २९८ चन्दनशुच्यम्बुः—चन्दनके समान पवित्र एवं सुगन्धित जलवाली, २९९ चर्चनीया—पूजन अथवा कीर्तन करने योग्य, ३०० चिरस्थिरा—चिरन्तन कालतक स्थिर रहनेवाली, ३०१ चारुचम्पकमालाढ्या—मनोहर चम्पा पुष्पोंकी मालासे सुशोभित, ३०२ चमिताशेषदुष्कृता—समस्त पापोंको पी जानेवाली।^७ |
| २७५ घृणावती—दयालु, २७६ घृणनिधिः—दयासागर, २७७ घस्मरा—सब कुछ भक्षण करनेवाली, २७८ घूकनादिनी—तटपर उलूक और वक आदि पक्षियोंके शब्दसे युक्त, २७९ घुसृणापिज्जरतनुः—कुंकुम, केशर आदिसे चर्चित होनेके कारण किंचित् पीले अंगोंवाली, २८० घर्घरा—घाघरानदीस्वरूपा, २८१ घर्घरस्वना—घर्घर ध्वनिसे युक्त।^४ | ३०३ चिदाकाशवहा—चिदाकाशरूप ब्रह्मको प्राप्त होनेवाली, ३०४ चिन्त्या—चिन्तन करने योग्य, ३०५ चञ्चत्—देदीप्यमान, ३०६ चामरवीजिता—डुलाये जाते हुए चँवरसे सेवित, ३०७ चोरिताशेषवृजिना—समस्त पापोंको हर लेनेवाली चरिताशेषमण्डला—ब्रह्मलोक आदि सब मण्डलों (स्थानों)-में विचरनेवाली।^८ |
| २८२ चन्द्रिका—चन्द्रप्रभास्वरूपा, २८३ चन्द्रकान्ताम्बुः—चन्द्रमाके समान श्वेत जलवाली अथवा |
१. ग्रहपीडाहरा गुन्द्रा गरघ्नी गानवत्सला। घर्महन्त्री घृतवती घृततुष्टिप्रदायिनी ॥
२. घण्टारवप्रिया घोराघौघविध्वंसकारिणी। घ्राणतुष्टिकरी घोषा घनानन्दा घनप्रिया ॥
३. घातुका घूर्णितजला घृष्टपातकसन्ततिः। घटकोटिप्रपीतापा घटिताशेषमङ्गला ॥
४. घृणावती घृणनिधिर्घस्मरा घूकनादिनी। घुसृणापिज्जरतनुर्घर्घरा घर्घरस्वना ॥
५. चन्द्रिका चन्द्रकान्ताम्बुश्चञ्चदापा चलद्युतिः। चिन्मयी चितिरूपा च चन्द्रायुतशतानना ॥
६. चाम्पेयलोचना चारुश्चार्वङ्गी चारुगामिनी। चार्या चारित्रनिलया चित्रकृच्चित्ररूपिणी ॥
७. चम्पूश्चन्दनशुच्यम्बुश्चर्चनीया चिरस्थिरा। चारुचम्पकमालाढ्या चमिताशेषदुष्कृता ॥
८. चिदाकाशवहा चिन्त्या चञ्चच्चामरवीजिता। चोरिताशेषवृजिना चरिताशेषमण्डला ॥
७८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
३०९ छेदिताखिलपापौघा—समस्त पापराशिका उच्छेद करनेवाली, ३१० छद्मघ्नी—कपट, अज्ञान अथवा छद्म नामक विशेष रोगका नाश करनेवाली, ३११ छलहारिणी—छलको हर लेनेवाली, ३१२ छन्नत्रिविष्टपतला—स्वर्गलोकको व्याप्त करनेवाली, ३१३ छोटिताशेषबन्धना—समस्त बन्धनोंको दूर करनेवाली।^१
३१४ छुरितामृतधारौघा—अमृतमय जलकी धारा बहानेवाली, ३१५ छिन्नैनाः—पापोंका उच्छेद करनेवाली, ३१६ छन्दगामिनी—स्वच्छन्द चलनेवाली, ३१७ छत्रीकृतमरालौघा—हंसोंके समूहको श्वेतछत्रके समान धारण करनेवाली, ३१८ छटीकृतनिजामृता—अपने स्वरूपभूत जलको विशेष शोभाके रूपमें धारण करनेवाली।^२
३१९ जाह्नवी—जह्नुकी पुत्री, ३२० ज्या—पापरूपी मृगको भयभीत करनेके लिये धनुषकी प्रत्यंचाके समान, ३२१ जगन्माता—विश्वजननी, ३२२ जप्य—जप करने योग्य नामवाली, ३२३ जङ्गालवीचिका—उत्ताल तरंगोंवाली, ३२४ जया—विजयिनी अथवा पार्वतीकी सखी जया, ३२५ जनार्दनप्रीता—भगवान् विष्णुसे प्रीति करनेवाली, ३२६ जुष्णीया—देवता, ऋषि और मनुष्योंके द्वारा सेवन करनेयोग्य, ३२७ जगद्धिता—जगत्का कल्याण करनेवाली।^३
३२८ जीवनम्—जीवनहेतु, ३२९ जीवनप्राणा—जीवनरूप जलसे जगत्को प्राणशक्तिसे युक्त करनेवाली अथवा जीवनप्राणस्वरूपा, ३३० जगत्—विश्वरूपा अथवा सर्वत्र व्यापक, ३३१ ज्येष्ठा—आद्याशक्ति, ३३२ जगन्मयी—जगत्स्वरूपा, ३३३ जीवजीवातुलतिका—प्राणियोंके लिये संजीवन औषधरूपा, ३३४ जन्मजन्मनिबर्हिणी—जन्मधारी प्राणियोंके जन्म-मरणका क्लेश दूर करनेवाली।^४
३३५ जाड्यविध्वंसनकरी—जड़ता—अज्ञानका विनाश करनेवाली, ३३६ जगद्योनिः—जगत्की कारणभूता प्रकृतिस्वरूपा, ३३७ जलाविला—वर्षाके जलसे कुछ मलिन-सी, ३३८ जगदानन्दजननी—जगत्के लिये आनन्ददायिनी। ३३९ जलजा—कमलका उत्पत्ति-स्थान, ३४० जलजेक्षणा—कमलसदृश अथवा कमलस्वरूप नेत्रोंवाली।^५
३४१ जनलोचनपीयूषा—जीवमात्रके नेत्रोंमें अमृतके समान सुखद प्रतीत होनेवाली, ३४२ जटातटविहारिणी—भगवान् शंकरके जटा-प्रदेशमें विहार करनेवाली, ३४३ जयन्ती—विजयशीला, ३४४ जञ्जपूकघ्नी—पापोंका नाश करनेवाली, ३४५ जनितज्ञानविग्रहा—जिसने अपने ज्ञानमय शरीरको प्रकट किया है, वह।^६
३४६ झल्लरीवाद्यकुशला—अपने जलप्रवाहके द्वारा झल्लरीनामक वाद्यविशेषकी ध्वनि प्रकट करनेमें कुशल अथवा झल्लरी बजानेमें निपुण, ३४७ झलञ्झालजलावृता—झल-झल ध्वनि करनेवाले जलसे आच्छादित, ३४८ झिण्टीशवन्द्या—भगवान् शिवके द्वारा वन्दनीया, ३४९ झाङ्कारकारिणी—झंकार शब्द करनेवाली, ३५० झर्झरावती—झर-झर शब्दसे युक्त।^७
३५१ टीकिताशेषपाताला—भोगावती गंगाके रूपमें समस्त पाताललोकमें प्रवाहित होनेवाली, ३५२ टङ्किकैनोऽद्रिपाटने—पापरूपी पर्वतको विदीर्ण करनेमें टंक (शस्त्रविशेष)-के समान, ३५३ टङ्कारनृत्यत्कल्लोला—जिसकी चंचल लहरें टंकार शब्दके
१. छेदिताखिलपापौघा छद्मघ्नी छलहारिणी। छन्नत्रिविष्टपतला छोटिताशेषबन्धना ॥
२. छुरितामृतधारौघा छिन्नैनाश्छन्दगामिनी। छत्रीकृतमरालौघा छटीकृतनिजामृता ॥
३. जाह्नवी ज्या जगन्माता जप्य जङ्गालवीचिका। जया जनार्दनप्रीता जुष्णीया जगद्धिता ॥
४. जीवनं जीवनप्राणा जगज्ज्येष्ठा जगन्मयी। जीवजीवातुलतिका जन्मजन्मनिबर्हिणी ॥
५. जाड्यविध्वंसनकरी जगद्योनिर्जलाविला। जगदानन्दजननी जलजा जलजेक्षणा ॥
६. जनलोचनपीयूषा जटातटविहारिणी। जयन्ती जञ्जपूकघ्नी जनितज्ञानविग्रहा ॥
७. झल्लरीवाद्यकुशला झलञ्झालजलावृता। झिण्टीशवन्द्या झाङ्कारकारिणी झर्झरावती ॥
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साथ नृत्य-सी करती हैं, वह, ३५४ टीकनीयमहातटा—जिसका विशाल तटप्रान्त सबके सेवन करने योग्य है, वह।^१
३५५ डम्बरप्रवहा—बड़े वेगसे बहनेवाली, ३५६ डीनराजहंसकुलाकुला—उड़ते हुए राजहंसोंके समुदायसे व्याप्त, ३५७ डमड्डमरुहस्ता—हाथमें डिमडिम शब्द करनेवाला डमरू लिये रहनेवाली, ३५८ डामरोक्तमहाण्डका—डामरकल्पमें प्रतिपादित विराट् स्वरूपवाली।^२
३५९ ढौकिताशेषनिर्वाणा—अपने भक्तोंको सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि तथा सायुज्यरूप सभी प्रकारके मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली, ३६० ढक्कानादचलज्जला—डंकेकी आवाजके समान ध्वनि-सी करनेवाले प्रवाहशील चंचल जलवाली, ३६१ ढुण्ढिविघ्नेशजननी—ढुण्ढिराज गणेशकी माता, ३६२ ढणड्ढुणितपातका—ढन्-ढन् शब्दके साथ पातकोंको धक्के देकर ढकेलनेवाली।^३
३६३ तर्पणी—सबको तृप्त करनेवाली अथवा जिसके जलसे सभी तर्पण करते हैं, वह, ३६४ तीर्थतीर्था—तीर्थोंके लिये भी तीर्थरूपा, ३६५ त्रिपथा—स्वर्ग, भूतल और पाताल—तीन मार्गोंसे बहनेवाली, ३६६ त्रिदशेश्वरी—देवताओंकी स्वामिनी, ३६७ त्रिलोकगोप्त्री—तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली, ३६८ तोयेशी—जल अथवा उसकी अधिष्ठात्री देवियोंकी भी स्वामिनी, ३६९ त्रैलोक्यपरिवन्दिता—त्रिभुवनविशेषवन्दिता।^४
३७० तापत्रितयसंहर्त्री—आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंका संहार करनेवाली, ३७१ तेजोबलविवर्धिनी—तेज और बल बढ़ानेवाली, ३७२ त्रिलक्ष्या—जिसका स्वरूप तीनों लोकोंमें लक्षित होता है, वह, ३७३ तारणी—सबको तारनेवाली, ३७४ तारा—तारनेवाली, प्रणवरूपा अथवा नक्षत्ररूपा, ३७५ तारापतिकरार्चिता—चन्द्रमाकी किरणोंद्वारा पूजित अथवा चन्द्रमाद्वारा अपने हाथों पूजित।^५
३७६ त्रैलोक्यपावनी पुण्या—तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली नदियोंमें सबसे अधिक पुण्यमयी, ३७७ तुष्टिदा—सुख एवं सन्तोष देनेवाली, ३७८ तुष्टिरूपिणी—सन्तोषवृत्तिरूपा, ३७९ तृष्णाच्छेत्री—तृष्णाका उच्छेद करनेवाली, ३८० तीर्थमाता—तीर्थोंकी माता, ३८१ त्रिविक्रमपदोद्गवा—भगवान् वामनके चरण पखारनेसे प्रकट हुई।^६
३८२ तपोमयी—इन्द्रिय और मनकी एकाग्रतारूपा, ३८३ तपोरूपा—कृच्छ्र-चान्द्रायणादि व्रत एवं तपस्यास्वरूपा, ३८४ तपःस्तोमफलप्रदा—तपःसमुदायका फल देनेवाली, ३८५ त्रैलोक्यव्यापिनी—तीनों लोकोंमें व्यापक, ३८६ तृप्तिः—तृप्तिस्वरूपा, ३८७ तृप्तिकृत्—सन्तुष्ट करनेवाली, ३८८ तत्त्वरूपिणी—चौबीस तत्त्वरूपा अथवा परमार्थरूपिणी।^७
३८९ त्रैलोक्यसुन्दरी—तीनों लोकोंमें सर्वाधिक सौन्दर्यवाली, ३९० तुर्या—जाग्रत् आदि तीन अवस्थाओंसे परे, ३९१ तुर्यातीतफलप्रदा—तुरीयातीत ब्रह्मपदको देनेवाली, ३९२ त्रैलोक्यलक्ष्मीः—त्रिभुवनकी सम्पत्ति, ३९३ त्रिपदी—तीनों लोकोंमें जिसका स्थान है, वह, ३९४ तथ्या—तीनों कालोंसे अबाधित, परमार्थरूपा, ३९५ तिमिरचन्द्रिका—अज्ञानरूपी अन्धकारको चाँदनीकी भाँति दूर करनेवाली।^८
१. टीकिताशेषपाताला टङ्कितैकनोऽङ्घ्रिपाटने। टङ्कारनृत्यत्कल्लोला टीकनीयमहातटा॥
२. डम्बरप्रवहा डीनराजहंसकुलाकुला। डमड्डमरुहस्ता च डामरोक्तमहाण्डका॥
३. ढौकिताशेषनिर्वाणा ढक्कानादचलज्जला। ढुण्ढिविघ्नेशजननी ढणड्ढुणितपातका॥
४. तर्पणी तीर्थतीर्था च त्रिपथा त्रिदशेश्वरी। त्रिलोकगोप्त्री तोयेशी त्रैलोक्यपरिवन्दिता॥
५. तापत्रितयसंहर्त्री तेजोबलविवर्धिनी। त्रिलक्ष्या तारणी तारा तारापतिकरार्चिता॥
६. त्रैलोक्यपावनी पुण्या तुष्टिदा तुष्टिरूपिणी। तृष्णाच्छेत्री तीर्थमाता त्रिविक्रमपदोद्गवा॥
७. तपोमयी तपोरूपा तपःस्तोमफलप्रदा। त्रैलोक्यव्यापिनी तृप्तिस्तृप्तिकृत्तत्त्वरूपिणी॥
८. त्रैलोक्यसुन्दरी तुर्या तुर्यातीतफलप्रदा। त्रैलोक्यलक्ष्मीस्त्रिपदी तथ्या तिमिरचन्द्रिका॥
७८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
३९६ तेजोगर्भा—भगवान् शंकरका तेजोमय वीर्य जिसके गर्भमें स्थित था, वह, ३९७ तपःसारा—तपस्याकी सारभूता, ३९८ त्रिपुरारिशिरोगृहा—भगवान् शंकरके मस्तकरूपी गृहमें निवास करनेवाली, ३९९ त्रयीस्वरूपिणी—तीनों वेद जिसके स्वरूप हैं, वह, ४०० तन्वी—प्रपंचका विस्तार करनेवाली अथवा सुन्दरी, कृशांगी, ४०१ तपनाङ्गजभीतिनुत्—सूर्यपुत्र यमका भय दूर करनेवाली। १
४०२ तरिः—संसार-सागरसे पार होनेके लिये नौका, ४०३ तरणिजामित्रम्—सूर्यपुत्र यमके अधिकारमें बाधा डालनेके कारण उनके लिये अमित्ररूपा अथवा सूर्यकन्या यमुनाकी सखी, ४०४ तर्पिताशेषपूर्वजा—राजा भगीरथके अथवा समस्त जनसमुदायके सम्पूर्ण पूर्वजोंको तृप्त करनेवाली, ४०५ तुलाविरहिता—तुलनारहित, ४०६ तीव्रपापतूलतूनपात्—भयंकर पापरूपी रूईके ढेरको जलानेके लिये अग्निके समान। २
४०७ दारिद्र्यदमनी—दुर्गति एवं दरिद्रताका दमन करनेवाली, ४०८ दक्षा—जगत्का उद्धार करनेमें कुशल, ४०९ दुष्प्रेक्षा—भक्तिभावके बिना जिसका दर्शन पाना अत्यन्त कठिन है, वह ४१० दिव्यमण्डना—अलौकिक आभूषणोंसे विभूषित, ४११ दीक्षावती—लोकहित एवं जीवोंके उद्धारकी दीक्षासे युक्त, ४१२ दुरावाप्या—दुर्लभा, ४१३ द्राक्षामधुरवारिभृत्—मुनक्काके समान मधुर जल धारण करनेवाली। ३
४१४ दर्शितानेककुतुका—अपने जल-कल्लोलोंके द्वारा अनेक प्रकारके कौतुक दिखानेवाली, ४१५ दुष्टदुर्जयदुःखहृत्—दोषयुक्त दुर्जय दुःखोंको हर लेनेवाली, ४१६ दैन्यहृत्—दीनताको दूर करनेवाली, ४१७ दुरितघ्नी—पापोंका नाश करनेवाली, ४१८ दानवारिपदाब्जजा—श्रीविष्णुके चरणारविन्दोंसे प्रकट हुई। ४
४१९ दन्दशूकविषघ्नी—सर्पोंके विषका नाश करनेवाली, ४२० दारिताघौघसन्ततिः—पापराशिकी परम्पराको विदीर्ण करनेवाली, ४२१ द्रुता—वेगसे बहनेवाली, ४२२ देवद्रुमच्छन्ना—सन्तान, कल्पवृक्ष, मन्दार, पारिजात तथा हरिचन्दन—इन पाँच देववृक्षोंसे आच्छादित, ४२३ दुर्वाराघविघातिनी—जिन्हें दूर करना कठिन है, ऐसे पातकोंका भी नाश करनेवाली। ५
४२४ दमग्राह्या—मन और इन्द्रियोंके संयमसे प्राप्त होनेवाली, ४२५ देवमाता—अदितिस्वरूपा, ४२६ देवलोकप्रदर्शिनी—अपने उपासकोंको ब्रह्मलोक आदि दिव्यलोकोंकी प्राप्ति करानेवाली, ४२७ देवदेवप्रिया—देवाधिदेव शिवकी प्रिया, ४२८ देवी—द्युतिमती, प्रकाशस्वरूपा, ४२९ दिक्पालपददायिनी—इन्द्र आदि दिक्पालोंके पदकी प्राप्ति करानेवाली। ६
४३० दीर्घायुःकारिणी—आयु बड़ी करनेवाली, ४३१ दीर्घा—विशाल, अनन्त, ४३२ दोग्ध्री—धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाली, ४३३ दूषणवर्जिता—दोषरहित, ४३४ दुग्धाम्बुवाहिनी—दूधके समान स्वच्छ, स्वादिष्ट एवं गुणकारी जल बहानेवाली, ४३५ दोग्धा—इच्छानुसार दोहन करनेयोग्य—कामधेनुरूपा, ४३६ दिव्या—अलौकिक स्वरूपवाली, ४३७ दिव्यगतिप्रदा—दिव्य गति प्रदान करनेवाली। ७
४३८ द्युनदी—स्वर्गलोककी गंगा, ४३९ दीन-
१. तेजोगर्भा तपःसारा त्रिपुरारिशिरोगृहा। त्रयीस्वरूपिणी तन्वी तपनाङ्गजभीतिनुत्॥
२. तरिस्तरणिजामित्रं तर्पिताशेषपूर्वजा। तुलाविरहिता तीव्रपापतूलतूनपात्॥
३. दारिद्र्यदमनी दक्षा दुष्प्रेक्षा दिव्यमण्डना। दीक्षावती दुरावाप्या द्राक्षामधुरवारिभृत्॥
४. दर्शितानेककुतुका दुष्टदुर्जयदुःखहृत्। दैन्यहृद् दुरितघ्नी च दानवारिपदाब्जजा॥
५. दन्दशूकविषघ्नी च दारिताघौघसन्ततिः। द्रुता देवद्रुमच्छन्ना दुर्वाराघविघातिनी॥
६. दमग्राह्या देवमाता देवलोकप्रदर्शिनी। देवदेवप्रिया देवी दिक्पालपददायिनी॥
७. दीर्घायुःकारिणी दीर्घा दोग्ध्री दूषणवर्जिता। दुग्धाम्बुवाहिनी दोग्धा दिव्या दिव्यगतिप्रदा॥
- काशीखण्ड-पूर्वार्ध * ७८३
शरणम्—दीनों-महापातकियोंको भी शरण देकर उनका उद्धार करनेवाली, ४४० देहिदेहनिवारिणी—देहधारियोंके देहका निवारण करनेवाली (उन्हें मुक्ति देकर जन्म-मृत्युसे रहित करनेवाली), ४४१ द्राघीयसी—अतिशय विशाल, ४४२ दाघहन्त्री—दाहकी शान्ति करनेवाली, ४४३ दितपातकसन्ततिः—पाप-परम्पराका खण्डन करनेवाली। १
४४४ दूरदेशान्तरचरी—दूर देशमें विचरनेवाली, ४४५ दुर्गमा—दुर्लभा, ४४६ देववल्लभा—देवताओंकी इष्टदेवी अथवा देव अर्थात् विष्णु एवं शिवकी प्रिया, ४४७ दुर्वृत्तघ्नी—दुष्टों अथवा पापोंका नाश करनेवाली, ४४८ दुर्विगाह्या—जिसमें स्नान करनेका अवसर बहुत दुर्लभ है, ऐसी, ४४९ दयाधारा—करुणाकी भण्डार, ४५० दयावती—दयालु-स्वभावा। २
४५१ दुरासदा—दुर्लभ अथवा दुर्बोध, ४५२ दानशीला—स्वभावतः चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली, ४५३ द्राविणी—बड़े वेगसे प्रवाहित होनेवाली अथवा पाप-पुंजको भगानेवाली, ४५४ द्रुहिणस्तुता—ब्रह्माजीके द्वारा प्रशंसित, ४५५ दैत्यदानवसंशुद्धिकर्त्री—दैत्यों और दानवोंको भी भलीभाँति शुद्ध करनेवाली, ४५६ दुर्बुद्धिहारिणी—खोटी बुद्धिका निवारण करनेवाली। ३
४५७ दानसारा—दान जिसका सार तत्त्व है, वह, ४५८ दयासारा—जिसमें स्वभावतः दया भरी है, वह, ४५९ द्यावाभूमिविगाहिनी—आकाश और भूमिमें समान रूपसे विचरण करनेवाली, ४६० दृष्टादृष्टफलप्राप्तिः—लौकिक और पारलौकिक फलकी प्राप्तिमें हेतु, ४६१ देवतावृन्दवन्दिता—देवसमुदायके द्वारा नमस्कृत। ४
४६२ दीर्घव्रता—लोकोपकारका महान् व्रत धारण करनेवाली, ४६३ दीर्घदृष्टिः—जिसकी दृष्टि अर्थात् बुद्धि दीर्घ—दूरतककी बात सोच लेनेवाली हो, वह अथवा अपरिच्छिन्न ज्ञानस्वरूपा, ४६४ दीप्ततोया—प्रकाशमान जलवाली, ४६५ दुरालभा—दुर्लभा, ४६६ दण्डयित्री—पापोंको दण्ड देनेवाली, ४६७ दण्डनीतिः—दण्डनीति नामवाली विद्यास्वरूपा, ४६८ दुष्टदण्डधरार्चिता—दुष्टोंको दण्ड देनेवाले यमराजके द्वारा पूजित। ५
४६९ दुरोदरघ्नी—जूआ आदि बुरे आचरणोंको नाश करनेवाली, ४७० दावार्चिः—पापरूपी वनके लिये दावानलकी ज्वालाके समान, ४७१ द्रवत्—सर्वव्यापक तत्त्व, ४७२ द्रव्यैकशेवधिः—सम्पूर्ण द्रव्योंकी एकमात्र निधि, ४७३ दीनसन्तापशमनी—दीनों-संसारदुःखसे दुःखी जीवोंके आध्यात्मिक आदि तापोंका निवारण करनेवाली, ४७४ दात्री—चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली, ४७५ दवथुवैरिणी—संसार-भयसे होनेवाले सन्तापको दूर करनेवाली। ६
४७६ दरीविदारणपरा—पर्वतोंकी गुफाओंको विदीर्ण करनेवाली, ४७७ दान्ता—इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाली, ४७८ दान्तजनप्रिया—जितेन्द्रिय पुरुष जिसे प्रिय हों, ऐसी, ४७९ दारिताद्रितटा—पर्वतोंके पार्श्वभागको विदीर्ण करके बहनेवाली, ४८० दुर्गा—दुर्ग दैत्यका वध करनेवाली देवी, ४८१ दुर्गारण्यप्रचारिणी—दुर्गम वनमें विचरनेवाली। ७
४८२ धर्मद्रवा—धर्मस्वरूप है द्रव (जल)
१. द्युन्दी दीनशरणं देहिदेहनिवारिणी। द्राघीयसी दाघहन्त्री दितपातकसन्ततिः॥ २. दूरदेशान्तरचरी दुर्गमा देववल्लभा। दुर्वृत्तघ्नी दुर्विगाह्या दयाधारा दयावती॥ ३. दुरासदा दानशीला द्राविणी द्रुहिणस्तुता। दैत्यदानवसंशुद्धिकर्त्री दुर्बुद्धिहारिणी॥ ४. दानसारा दयासारा द्यावाभूमिविगाहिनी। दृष्टादृष्टफलप्राप्तिर्देवतावृन्दवन्दिता ॥ ५. दीर्घव्रता दीर्घदृष्टिर्दीप्ततोया दुरालभा। दण्डयित्री दण्डनीतिर्दुष्टदण्डधरार्चिता॥ ६. दुरोदरघ्नी दावार्चिर्द्रवद्द्रव्यैकशेवधिः। दीनसन्तापशमनी दात्री दवथुवैरिणी॥ ७. दरीविदारणपरा दान्ता दान्तजनप्रिया। दारिताद्रितटा दुर्गा दुर्गारण्यप्रचारिणी॥