संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
यहाँ प्राप्त हुआ है। इसकी स्थिति शालकंटकटसे पूर्व भागमें है। त्रिदण्डापुरीसे यहाँ आये हुए भगवान् ऊर्ध्वरेता कूष्माण्ड गणेशजीको आगे करके स्थित हैं। मण्डलेश्वर क्षेत्रसे प्राप्त हुआ श्रीकण्ठ नामक लिंग मण्डविनायकसे उत्तर दिशामें स्थित है। महातीर्थ छागलाण्डसे पधारे हुए कपर्दीश्वर नामक शिव यहाँके पिशाचमोचन तीर्थमें स्वयं प्रकट हुए हैं। सूक्ष्मेश्वर लिंगका शुभागमन आम्रातकेश्वर क्षेत्रसे हुआ है। विकटदन्त नामक गणेशके समीप उनकी स्थिति है। मधुकेश्वर क्षेत्रसे पधारे हुए भगवान् जयन्तेश्वर यहाँ लम्बोदर गणेशके पूर्वमें स्थित हैं। श्रीशैलसे आकर त्रिपुरान्तक नामवाले देवेश्वर यहाँ प्रकट हुए हैं। श्रीविश्वनाथजीके पश्चिम भागमें स्थित भगवान् कुक्कुटेश्वर सौम्यस्थानसे यहाँ आये हैं। वे वक्रतुण्ड गणेशके समीप स्थित हैं। जालेश्वर तीर्थसे त्रिशूलीश्वरने पदार्पण किया है। वे कूटदन्त गणेशके पूर्व भागमें स्थित हैं। महाक्षेत्र रामेश्वरसे जटाधारी देव पधारे हैं जो एकदन्त गणेशके उत्तर भागमें पूजित होते हैं। त्रिसन्ध्य क्षेत्रसे भगवान् त्र्यम्बकका शुभागमन हुआ है जो त्रिमुखसे पूर्व भागमें स्थित हैं। हरिश्चन्द्र क्षेत्रसे यहाँ भगवान् हरेश्वर पधारे हैं। ये हरिश्चन्द्रेश्वरके पूर्व भागमें पूजित होते हैं। मध्यमकेश्वर स्थानसे भगवान् शर्वका आगमन हुआ है। वे चतुर्वेदेश्वर लिंगको आगे करके स्थित हैं। स्थलेश्वर तीर्थसे यहाँ यज्ञेश्वर नामक महालिंग प्रकट हुआ है। सुवर्ण क्षेत्रसे सहस्राक्ष नामक शिवलिंगका शुभागमन हुआ है जो शैलेश्वरसे दक्षिणमें स्थित है। हर्षित क्षेत्रसे प्राप्त हुए हर्षितेश्वर शिव मन्त्रेश्वरके समीप हैं। रुद्रमहालय क्षेत्रसे यहाँ रुद्रका आगमन हुआ है। भगवान् रुद्रेश्वर त्रिपुरेश्वरके समीप स्थित हैं। वृषेश्वर नामक महादेवजी वृषभध्वजतीर्थसे आकर बाणेश्वर लिंगके समीप स्थित हैं। ईशानेश्वर महादेव केदार क्षेत्रसे यहाँ आये हैं। प्रह्लादकेशवसे पश्चिम भागमें उनका दर्शन करना चाहिये। उत्तरवाहिनी गंगाके जलमें स्नान करके ईशानेश्वरकी पूजा करनेवाला मनुष्य ईशानके ही समान कान्तिमान् होकर उनके धाममें निवास करता है। भैरव क्षेत्रसे यहाँ परम मनोहर भैरव-मूर्ति प्राप्त हुई है जो खर्वविनायकसे पूर्वमें स्थित है। सिद्धिदायक भगवान् उग्र कनखलतीर्थसे यहाँ प्रकट हुए हैं। अर्कविनायकसे पूर्वमें स्थित उग्र लिंगकी पूजा करनेसे अत्यन्त उग्र उपद्रव भी शान्त हो जाते हैं। वस्त्रापथ नामक महान् क्षेत्रसे भगवान् भव स्वयं यहाँ आकर भीमचण्डीके समीप प्रकट हुए हैं। पातकोंको दण्ड देनेवाले भगवान् दण्डी देवदारु वनसे काशीमें आकर लिंगरूपसे यहाँ निवास करते हैं। देहलीविनायकसे पूर्व-दिशामें दण्डीश्वरकी पूजा करनी चाहिये। उनकी पूजासे मनुष्योंका पुनर्जन्म नहीं देखा जाता है। भद्रकर्ण कुण्डसे साक्षात् भद्रकर्णेश्वर शिव यहाँ आये हैं, उद्दण्ड गणेशसे पूर्वदिशामें उनका उत्तम तीर्थ है। यमलिंग नामक महातीर्थसे आकर काललिंग यहाँ स्थित हुआ है। जो मनुष्य मंगलवार तथा चतुर्दशी तिथिके योगमें यहाँकी यात्रा करेगा वह अतिपातकयुक्त होनेपर भी यमलोकमें नहीं जायगा। नेपाल नामक महाक्षेत्रसे साक्षात् भगवान् पशुपति यहाँ पधारे हैं। यहाँ पिनाकपाणि भगवान् शिवने पाशुपत योगका उपदेश किया है। करवीरकतीर्थसे कपालीश्वरने यहाँ पदार्पण किया है। कपालमोचनतीर्थमें उनका प्रयत्नपूर्वक दर्शन करना चाहिये। महेश्वर क्षेत्रसे आकर दीप्तेश्वर नामक लिंग भगवान् उमापतिके समीप स्थित है। गंगासागरतीर्थसे अमरेशलिंगका शुभागमन हुआ है। सप्तगोदावरीतीर्थसे भगवान् भीमेश्वर पधारे हैं और लिंगरूपी होकर यहाँ निवास करते हैं। भूतेश्वर क्षेत्रसे आकर भस्मगात्र नामक लिंग यहाँ स्थित हुआ है जो भीमेश्वरसे दक्षिण भागमें है। नकुलीश्वरतीर्थसे भक्तभयहारी भगवान् स्वयम्भू नामक शिव पधारकर काशीमें स्वयं प्रकट हुए हैं। प्रयागतीर्थके समीप धरणीवराह नामक देवका मन्दिर है जो विन्ध्याचलसे यहाँ प्राप्त हुआ है। कर्णिकार क्षेत्रसे आये हुए कर्णिकार नामक
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गणेशजी पूज्य हैं। हिमकूट पर्वतसे विरूपाक्ष नामक शिवलिंग यहाँ आकर प्रकट हुआ है, जो कि महेश्वरसे दक्षिणमें स्थित हुआ है। हरिद्वारसे हिमके समान कान्तिमान् हिमस्थेश नामक लिंगका आगमन हुआ है जो ब्रह्मनालसे पश्चिममें दर्शन करनेयोग्य है। कैलाशसे गणेशजी तथा अन्य महाबली सात करोड़ पार्षद यहाँ पधारे हैं। उन सबने सात स्वर्गके समान दुर्ग बनाये हैं। फिर काशीके चारों ओर उन्होंने पर्वतके समान ऊँचा परकोटा तैयार किया है। साथ ही गहरी खाई भी तैयार की है जो मत्स्योदरीके जलसे भरी हुई है। बाहर और भीतरके भेदसे मत्स्योदरी दो भागोंमें विभक्त है। उसका जल गंगाके जलसे मिला हुआ है। अतः वह महातीर्थके रूपमें प्रसिद्ध है। जब संहारमार्गसे अर्थात् उलटा बहकर गंगाजीका जल इस मत्स्योदरीमें फैलता है तब मत्स्योदरीतीर्थका जल भारी पुण्यसे ही प्राप्त होता है। उस समय सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होनेपर पर्व शतकोटिगुना होकर प्राप्त होता है। मत्स्योदरीमें जहाँ-कहीं भी स्नान करके जो मनुष्य पितरोंको पिण्डदान करते हैं, वे फिर कभी माताके गर्भमें शयन नहीं करते। जब गंगाका जल चारों ओर फैल जाता है, तब यह अविमुक्त क्षेत्र मत्स्यके आकारका दिखायी देता है।
गन्धमादन पर्वतसे आकर भूर्भुवः नामक लिंग यहाँ स्वयं प्रकट हुआ है जो गणेशजीसे पूर्व भागमें स्थित है। पातालगंगासहित हाटकेश्वर महालिंग स्वयं सात पाताल-तलसे यहाँ आकर प्रकट हुआ है। वह लिंग ईशानेश्वरसे पूर्वमें है। आकाशके नक्षत्र-लोकसे यहाँ ज्योतिर्मय लिंग आकर प्रकट हुआ है। यह तारकेश्वर लिंग ज्ञानवापीसे पूर्व भागमें स्थित है। पूर्वकालमें महादेवजीने जहाँ किरातरूप धारण किया था, उस किराततीर्थसे किरातेश्वर लिंग यहाँ आकर प्रकट हुआ है। लंकापुरीसे मरुकेश्वर नामक लिंगका आगमन हुआ है, वह नैर्ऋत्य भागमें स्थित होनेके कारण नैर्ऋत्येश्वर नामसे भी प्रसिद्ध है और पौलस्त्यराघवसे पश्चिम-दिशामें पूजित होता है। स्थलतीर्थसे आया हुआ परम पुण्यमय जलप्रिय लिंग यहाँ गंगाजीके जलमें स्थित है। कोटीश्वरतीर्थसे आया हुआ श्रेष्ठ लिंग ज्येष्ठेश्वरके पश्चिम भागमें विराजमान है। बड़वानलके मुखसे प्रकट हुआ अनलेश्वर नामक लिंग यहाँ नलेश्वरके अग्रभागमें स्थित है। देवोंके देव त्रिलोचन महादेव वीरजतीर्थसे यहाँ आकर अनादिसिद्ध त्रिविष्टप लिंगमें स्थित हैं। अमर-कण्टकसे आकर ओंकारेश्वर महादेव यहाँके पुण्यमय पिलपिलातीर्थमें प्रकट हुए हैं। जब यहाँ गंगा नहीं आयी थी और जिस समय त्रिलोकीका उद्धार करनेके लिये यहाँ काशीपुरीका आविर्भाव हुआ था, तभीसे वह आदिलिंग प्रकट हुआ है। भगवन्! इस प्रकार मैं इन सब स्थानोंके श्रीविग्रहोंको काशीपुरीमें ले आया हूँ। अपने-अपने स्थानमें तो उन्हें अंश मात्रसे ही रख छोड़ा है। उन सब देवताओंके यहाँ गगनचुम्बी सुन्दर मन्दिर भी बन गये हैं। महेश्वर! अब इस समय मेरे लिये क्या आज्ञा है, जिसका पालन करूँ? यदि कोई कार्य हो तो उसे कृपापूर्वक बतावें।'
स्कन्दजी कहते हैं— नन्दीकी यह बात सुनकर
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देव-देवेश्वर शिवजीने कहा—'यह तुमने बहुत अच्छा किया। अब चण्डिकाओंको उपयुक्त कार्योंमें नियुक्त करो। यहाँ नौ करोड़ चामुण्डाएँ रहती हैं। उनके देवता, भूत, बेताल और भैरव भी उनके साथ ही हैं। उनको पुरीकी रक्षाके कार्यमें लगाओ और प्रत्येक दुर्गमें उनको बसाओ।' इस प्रकार आज्ञा देकर महादेवजी पार्वतीके साथ त्रैविष्टप क्षेत्रमें चले गये। नन्दीने परमेश्वर शिवकी आज्ञाको शिरोधार्य करके सब दुर्गाओंको बुलाया और उन्हें प्रत्येक दुर्गमें यथास्थानपर बसाया।
दैत्योंसहित दुर्गमासुरका देवी और उनकी शक्तियोंके साथ युद्ध
स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! पूर्वकालमें दुर्ग नामक एक महान् दैत्य हुआ था, जो तीव्र तपस्या करके पुरुषमात्रसे अवध्य होनेका वरदान प्राप्त कर चुका था। वह रुरु दैत्यका पुत्र था। उसने भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक आदि समस्त लोकोंको बाहुबलसे जीतकर अपने अधीन कर लिया था। उसके भयसे पीड़ित होकर ब्राह्मण वेदाध्ययन नहीं कर पाते थे। उसके दुर्धर्ष सैनिकोंने यज्ञशालाओंका विध्वंस कर दिया था।
संसारमें वे ही लोग धन्य हैं जो विपत्तिमें पड़ जानेपर भी दीनतासे प्रेरित होकर धनसे मलिन चित्तवाले पुरुषोंके आँगनमें कभी नहीं जाते। किसीके सामने छोटा न बनकर शानसे मर जाना भी अच्छा है, परंतु संसारमें लघुता (अपमान)-से युक्त अमरत्व भी प्राप्त हो तो वह अच्छा नहीं है। लोकमें उन्हींका जीवन सफल है और वे ही पुण्यात्मा हैं, जिनका चित्तरूपी समुद्र विपत्तिमें भी गम्भीरताका त्याग नहीं करता।१ जगत्में कभी सम्पत्ति प्राप्त होती है और कभी विपत्ति। भाग्यवश इन दोनोंको प्राप्त करके भी धीर पुरुष अपनी धीरता न छोड़े। जो आपत्तिमें पड़नेपर दीनताग्रस्त होकर मरता है, उसके इहलोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं। इसलिये दीनताको त्याग देना चाहिये। जो आपत्तिमें भी धैर्य नहीं छोड़ते उनकी धीरतासे तिरस्कृत होकर इहलोक या परलोकमें कहीं भी विपत्ति फिर उनके पास नहीं आती २। स्वर्गका राज्य छिन जानेपर देवतालोग भगवान् महेश्वरकी शरणमें गये। तब सर्वज्ञ शिवजीने उस असुरका नाश करनेके लिये देवीको आदेश दिया। भगवान् महेश्वरकी आज्ञा पाकर भवानीने देवसमूहको अभयदान देकर युद्धके लिये उद्योग किया। उन्होंने कमनीय कान्तिसे तीनों लोकोंमें सर्वाधिक सुन्दरी रुद्रशक्ति कालरात्रिको बुलाकर उस देवद्रोही दैत्यको युद्धके लिये ललकारनेके निमित्त भेजा। कालरात्रिने उस दैत्यके पास जाकर कहा—'दैत्यराज! तू त्रिभुवनकी सम्पत्तिका त्याग कर दे। त्रिलोकीका राज्य इन्द्रको प्राप्त हो और तू रसातलको चला जा, जिससे वेद-वादियोंकी सम्पूर्ण वैदिक क्रियाएँ बेरोक-टोक चलती रहें। यदि तुझे अपने बलका थोड़ा भी घमण्ड हो तो युद्धके लिये आ जा। अन्यथा, इन्द्रकी शरण ले। इन दोनोंमेंसे जो उचित जान पड़े, वही कर।'
महाकालीका यह वचन सुनकर दैत्यराज दुर्ग क्रोधसे जल उठा और सेवकोंसे बोला—पकड़ो,
१- विपद्यपि हि ते धन्या न ये दैन्यप्रणोदिताः। धनैर्मलिनचित्तानामालभन्तेऽङ्गनं क्वचित्॥
पञ्चत्वमेव हि वरं लोके लाघववर्जितम्। नामरत्वमपि श्रेयो लाघवेन समन्वितम्॥
त एव लोके जीवन्ति पुण्यभाजस्तु एव वै। विपद्यपि न गाम्भीर्यं यच्चेतोऽब्धिः परित्यजेत्॥
(स्क० पु०, का० उ० ७९।१६-१८)
२- आपद्यपि हि ये धीरा इहलोके परत्र च। न तान् पुनः स्पृशेदापत्तद्धैर्येणावधीरिता॥
(स्क० पु०, का० उ० ७९।२२)
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पकड़ लो इसे। इसीको प्राप्त करनेके लिये मैंने देवर्षियों तथा राजाओंको बन्दी बनाया है। आज मेरे सौभाग्यका उदय होनेसे यह अनायास ही प्राप्त हो गयी। अन्तःपुरके रक्षको! इसे मेरे अन्तःपुरमें ले जाओ।
दैत्यराजके ऐसा कहनेपर जब रनिवासके रक्षक उस देवीको लेनेके लिये आये, तब उसने दैत्यराजसे कहा—दैत्यराज! हमलोग तो दूतियाँ हैं। दूतियाँ सदैव परवश होती हैं। कोई क्षुद्र पुरुष भी दूतको कभी पीड़ा नहीं देते, फिर जो तुझ-जैसे महाबली हैं, राजा हैं, वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? हमलोगोंकी जो स्वामिनी हैं उनको संग्राममें जीतकर तू हम-जैसी सहस्रों स्त्रियोंका यथेष्ट उपभोग कर सकता है।
कालरात्रिका यह वचन सुनकर काम और क्रोधसे मोहित हुए असुरने मृत्युकी दूतीके तुल्य उस एक ही दूतीको अपने लिये बहुत माना और अन्तःपुरके रक्षकोंको आदेश दिया कि 'इसे शीघ्र रनिवासमें पहुँचाओ।' दैत्यकी यह आज्ञा पाकर अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले सब खोजे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे, किंतु देवीने उन्हें पास आते ही हुंकारजनित अग्निसे शीघ्र भस्म कर दिया। यह देख दैत्यराज दुर्गने तीस हजार दैत्योंको भेजा और कहा—'दानवो! इस दुष्टाको पाशोंसे बाँधकर शीघ्र ले आओ।' दैत्यराजका यह आदेश पाकर बड़े-बड़े दैत्योंने उसे पकड़नेका प्रयास किया, परंतु देवीके निःश्वासवायुसे आहत होकर सब दूर चले गये। तदनन्तर देवी कालरात्रि वहाँसे उड़कर आकाशमार्गसे गमन करने लगीं। तब सहस्रों महादैत्य उनके पीछे लग गये। दैत्यराज दुर्गने भी दैत्योंकी असंख्य सेनाके साथ प्रस्थान किया। उस समय महादेवी विन्ध्याचलमें निवास करती थीं। कालरात्रिने वहाँ आकर देवीका दर्शन किया और दुर्गके अपराध भी कह सुनाये। दैत्यराज दुर्गने भी महादेवीको देखकर अपने सेनापतियोंको आदेश दिया—'वीरो! तुममेंसे जो कोई भी धैर्य, बुद्धि, बल अथवा छलसे भी इस विन्ध्यवासिनीको मेरे समीप ले आयेगा, उसे मैं अवश्य इन्द्रका पद दे दूँगा।'
दानवराजका यह वचन सुनकर दैत्य दोनों हाथ जोड़े हुए उच्चस्वरसे बोले—महाराज! यह कौन-सा कठिन कार्य है। एक तो वह अनाथ, दूसरे अबला। भला, उसको पकड़ लानेमें महान् प्रयत्नकी क्या आवश्यकता है। राजन्! आप हमारा पुरुषार्थ तो देखिये। हम केवल अपने बल-पराक्रमसे ही उस स्त्रीको आपके पास पकड़ लाते हैं।
ऐसा कहकर वे सब दैत्य एक ही साथ चल पड़े, सब ओरसे रणभेरियाँ बज उठीं। दैत्योंका यह आक्रमण देखकर देवता भी भयसे त्रस्त हो उठे, धरती काँपने लगी। तब महादेवीने अपने श्रीअंगोंसे सहस्रों शक्तियोंको प्रकट किया। उन शक्तियोंने इन महाबली दैत्योंकी सेनाके प्रत्येक सैनिकको आगे बढ़नेसे रोक दिया। मानो सीमाका उल्लंघन करके उमड़ता हुआ समुद्र ही रोक दिया गया हो। महादैत्योंने उस युद्धमें जिन-जिन भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार किया, उन सबको शक्तियोंने तृणके समान समझकर हाथमें ले-लेकर फेंक दिया। तब दैत्योंने मेघोंके समान अनेक प्रकारके अस्त्रों, वृक्षों तथा पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा की। यह देख विन्ध्यपर्वतपर निवास करनेवाली महामायाने प्रचण्ड धनुष लेकर उसपर वायव्यास्त्रका अनुसन्धान किया और उसके द्वारा शस्त्रास्त्रसमूहोंको लीलापूर्वक दूर फेंक दिया। तब महासुर दुर्गने अपनी सेनाको शस्त्रहीन देख एक जलती हुई शक्ति हाथमें ली और उसे देवीके ऊपर दे मारा, परंतु देवीने अपनी ओर आती हुई उस महावेगवती शक्तिको अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा चूर्ण कर डाला। शक्तिको टूटी हुई देख उस महादैत्यने चक्र चलाया, किंतु देवीके सैकड़ों बाणोंसे वह बीचमें ही कटकर टूक-टूक हो गया। तब दैत्यने सींगका बना हुआ धनुष लेकर देवीकी छातीमें ताककर बाण मारा, परन्तु देवीने कालदण्डके समान उस बाणको अपने
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शीघ्रगामी बाणसे मारकर रोक दिया। यह देख दुर्गमासुरने प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित शूल लेकर बड़े वेगसे देवीके ऊपर चलाया, किंतु चण्डिकाने अपने शूलद्वारा उसे बीचमें ही काट दिया। शूलके असफल होनेपर दैत्यराज दुर्ग गदा हाथमें लेकर सहसा कूद पड़ा और देवीकी भुजामें आघात किया। देवीकी भुजासे टकराते ही उस गदाके टूट-फूटकर सहस्रों टुकड़े हो गये। तदनन्तर देवीने अपने बायें पैरसे दैत्यराजकी छातीमें मारा। इससे दैत्यराज घायल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और उसके हृदयमें बड़ी पीड़ा हुई। गिरनेके बाद पुन: उसी क्षण वह उठकर खड़ा हुआ और सहसा अदृश्य हो गया। उस समय जगदम्बाकी प्रेरणासे उनकी शक्तियाँ दैत्योंकी सेनामें इस प्रकार विचरण करने लगीं, जैसे प्रलयकालमें मृत्युकी सेना संसारमें विचरण करती है।
दुर्गदैत्यका वध, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति और दुर्गा नामकी प्रसिद्धि
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! देवीकी शक्तियोंने दैत्योंकी विशाल सेनाको उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे प्रलयाग्निकी लपटें समस्त संसारको दग्ध कर देती हैं। इतनेमें ही दैत्यराज दुर्ग बादलोंकी आड़में खड़ा हो प्रचण्ड आँधी और बवण्डरके साथ कंकड़-पत्थरोंकी वर्षा करने लगा। तब महादेवीने शोषणास्त्रका प्रयोग करके पानी और पत्थरोंकी वर्षाको क्षणभरमें रोक दिया। यह देख दैत्यराजने क्रोधमें पर्वतके शिखरको उखाड़कर आकाशसे ही देवीके ऊपर गिराया। अपने ऊपर गिरते हुए उस पर्वतशिखरको देखकर महादेवीने वज्रके प्रहारसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। तब वह दैत्य हाथीका स्वरूप धारण करके अपने कुण्डलमण्डित मस्तकको डुलाता हुआ शीघ्रतापूर्वक देवीके सम्मुख दौड़ा। उस पर्वताकार हाथीको आते देख भगवतीने शीघ्रतापूर्वक पाशसे बाँधकर उसकी सूँड़को तलवारसे काट डाला। तदनन्तर उसने भैंसेका स्वरूप धारण किया और अपने सींगोंसे पर्वतोंको उखाड़कर देवीके ऊपर फेंका। उसके उपद्रवसे समस्त ब्रह्माण्डको व्याकुल देखकर भगवतीने दानवपर त्रिशूलसे आघात किया। तब वह भैंसेका रूप छोड़कर सहस्र भुजाधारी पुरुष बन गया और देवीका हाथ पकड़कर उन्हें आकाशमें खींच ले गया। वहाँ ऊँचेसे उसने जगदम्बिकाको छोड़ दिया और क्षणभरमें बाणोंके जालसे उन्हें आच्छादित कर दिया। तब महादेवीने अपने बाणोंसे शरसमूहको काटकर एक महाबाणके द्वारा उस दैत्यको बींध डाला। देवीका वह बाण दैत्यकी छातीमें घुस गया, उसकी आँखें नाचने लगीं और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। महापराक्रमी दुर्गके गिरते ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं। समस्त संसारमें उल्लास छा गया। सूर्य, चन्द्रमा और अग्निदेवको अपने खोये हुए तेजकी प्राप्ति हुई। तदनन्तर सब देवता फूलोंकी वर्षा करते हुए महर्षियोंके साथ वहाँ आये और महादेवीकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले—सम्पूर्ण जगत्का धारण-पोषण करनेवाली महादेवि! तुम्हें नमस्कार है। तीनों लोकोंकी उत्पत्तिकी आधारभूता महामहेश्वरकी शक्ति! तुम दैत्यरूपी वृक्षोंको काटनेके लिये कुठार हो, तुम्हें नमस्कार है। त्रैलोक्यव्यापिनी कल्याणमयी शिवे! तुम्हें नमस्कार है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाली तथा अपने व्यग्र हाथोंमें शार्ङ्ग-धनुषको उठानेवाली विष्णुस्वरूपे देवि! तुम्हें नमस्कार है। सबकी सृष्टि करनेवाली, प्राचीनोंकी भाषा, संस्कृतिकी जन्मभूमि तथा हंसकी सवारीसे यात्रा करनेवाली चतुराननस्वरूपे देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं इन्द्र, कुबेर, वायु, वरुण, यम, निर्ऋति, ईशान और अग्निकी शक्ति हो, तुम्हीं चन्द्रमाकी चाँदनी और सूर्यकी शक्ति प्रभा हो। तुम्हीं सर्वदेवमयी
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शक्ति और तुम्हीं परमेश्वरी हो। तुम्हीं गौरी हो, तुम्हीं सावित्री हो और तुम्हीं गायत्री एवं सरस्वती हो। तुम्हीं प्रकृति, तुम्हीं मति और तुम्हीं अहंकारस्वरूपा हो। तुम्हीं चित्त और समस्त इन्द्रियरूप हो, पंचतन्मात्राएँ भी तुम्हारा ही स्वरूप हैं। पंचमहाभूत-स्वरूपा जगदम्बिके! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं शब्दादि विषयरूपिणी हो, तुम्हीं इन्द्रियोंकी अधिष्ठातृ देवता हो, देवि! तुम्हीं ब्रह्माण्डकी सृष्टि करनेवाली हो तथा इस ब्रह्माण्डके भीतर भी तुम्हीं व्याप्त हो। महादेवि! तुम्हीं पराशक्ति और तुम्हीं परापर (कार्य-कारण)-स्वरूपा तथा तुम्हीं पर और अपरसे भी परे रहनेवाली परमात्मस्वरूपिणी हो। ईशानि! तुम्हीं सर्वरूपा हो और तुम्हीं सर्वव्यापिनी निराकारस्वरूपा हो। महामाये! तुम्हीं चित्-शक्ति, तुम्हीं स्वाहा और तुम्हीं स्वधा हो। अकृतस्वरूपे! वषट् और वौषट् भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं प्रणव हो तथा अन्य सब मन्त्र भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। ब्रह्मा आदि सब देवता तुमसे ही उत्पन्न हुए हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों वर्ग तुम्हारे ही स्वरूप हैं। चारों पुरुषार्थरूपी फलका उदय तुम्हींसे होता है। यह सम्पूर्ण विश्व तुम्हींसे उत्पन्न हुआ है, तुम्हींमें स्थित है और तुम्हींमें इसका लय होता है। तुम्हीं जगत्की आधारशक्ति हो। दृश्य, अदृश्य, स्थूल और सूक्ष्मरूपसे जो कुछ उपलब्ध होता है, सबमें तुम्हीं शक्तिरूपसे विद्यमान हो। तुम्हारे बिना कहीं किसी भी वस्तुकी स्थिति नहीं है। प्रणतजनोंको सदा शरण देनेवाली देवि! मातः! आज तुमने महादैत्यपति दुर्गको, जो स्वभावसे ही देवताओंके विरुद्ध दैत्यसेनाको प्रेरित करता रहता था, मारकर हमारी रक्षा की है। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन है, जिसकी शरणमें हम जायँ? तुम्हीं हमें शरण देनेवाली हो। अहो! इस युद्धमें वह दुर्ग नामक दैत्य तुम्हारे अमृतमय दृष्टिपातको पाकर जो मृत्युके अधीन हुआ है, यह बड़ी ही अद्भुत बात है। भवानी! आज हमलोगोंने यह जान लिया कि तुम्हारी दृष्टिमें पड़कर कोई दुष्ट भी दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता। देवि! आपकी शस्त्राग्निमें पतंगोंकी भाँति जलकर भी दैत्यलोग सूर्यकी-सी कान्ति प्राप्त करके दिव्य धामको जा रहे हैं। सच है, संतपुरुष दुष्टोंके प्रति भी दुष्टबुद्धि नहीं करते, अपितु साधुओंके प्रति जैसा स्नेह रखते हैं वैसा ही स्नेह उन दुष्टोंके प्रति भी रखकर उन्हें अपना मार्ग प्रदान करते हैं। मृडानी! हम तुम्हारे चरणोंमें नतमस्तक हैं, तुम सदा अब ओरसे हमारी रक्षा करो। भवानी! तुम प्रतिक्षण पग-पगपर विपत्तियोंसे हम सबकी रक्षा करो।
इस प्रकार जगदम्बाकी स्तुति करके ऋषि, गन्धर्व और चारणोंसहित इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंने जगदम्बाके चरणोंमें बारंबार प्रणाम किया। तब सन्तुष्ट हुई जगन्माता महादेवीने उन श्रेष्ठ देवताओंसे कहा—'आजसे सब देवता पहलेकी भाँति अपने-अपने अधिकारोंका पालन करें। तुमलोगोंने जो यह मेरी यथार्थ स्तुति की है, इससे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ, अतः तुम्हें दूसरा वरदान देती हूँ। जो मनुष्य पवित्रभावसे भक्तिपूर्वक इस स्तुतिद्वारा मेरा स्तवन करेगा उसकी विपत्तिका मैं पग-पगपर नाश करूँगी। संग्राममें अत्यन्त दुर्गम दुर्ग नामक दैत्यको मार गिरानेके कारण आजसे मेरा 'दुर्गा' नाम प्रसिद्ध होगा*। जो मुझ दुर्गाकी शरणमें आयेंगे, उनकी कभी दुर्गति नहीं होगी। यह वज्रपिंजर नामवाली दुर्गास्तुति पुण्यकी वृद्धि करनेवाली है।'
देवताओंको इस प्रकार वरदान देकर महादेवी उसी समय अन्तर्धान हो गयीं और स्वर्गवासी देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। कुम्भज! इस प्रकार महादेवीका नाम दुर्गा हुआ। काशीमें अष्टमी, चतुर्दशी एवं विशेषतः मंगलवारको दुर्गतिनाशिनी दुर्गादेवीका सदैव पूजन करना चाहिये। नवरात्रमें प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन पूजित हुई दुर्गादेवी
* अद्यप्रभृति मे नाम दुर्गेति ख्यातिमेष्यति। दुर्गदैत्यस्य समरे पातनाद्दतिदुर्गमात्॥ (स्क० पु०, का० उ० ७२। ७१)
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समस्त विघ्नसमूहोंका नाश और सद्बुद्धि प्रदान करेंगी। काशीमें दुर्गाकुण्डके भीतर स्नान करके समस्त दुर्गम पीड़ाओंका नाश करनेवाली दुर्गादेवीकी विधिवत् पूजा करनेवाला मनुष्य नौ जन्मोंके पापको त्याग देता है। दुर्गादेवी अपनी शक्तियोंके साथ सब ओरसे काशीकी रक्षा करती हैं। महादेवीकी उन कालरात्रि आदि शक्तियोंका प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। जो मनुष्य नाना शक्तियोंसे युक्त इस दुर्गविजय नामक पुण्यमय अध्यायको श्रवण करता है वह दुर्गम संकटसे शीघ्र ही पार हो जायगा।
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काशीके अट्ठाईस प्रमुख लिंगोंका संक्षिप्त वर्णन तथा ॐकारेश्वरके प्राकट्यकी कथा, ब्रह्माजीके द्वारा ॐकारेश्वरका स्तवन और उनकी महिमा
अगस्त्यजीने पूछा— षडानन! जगदम्बा पार्वतीजीके साथ त्रिलोचन महादेवके समीप जाकर भगवान् शिवने क्या किया?
स्कन्दजी बोले— अगस्त्यजी! त्रिलोचन (या त्रिविष्टप) लिंगके समीप जानेपर माता पार्वतीदेवीने भगवान् शिवसे कहा—‘देवदेव! विश्वनाथ! आप सर्वव्यापी तथा सब कुछ देनेवाले हैं। आप ही सबके साक्षी तथा जनक हैं। आपका परम प्रिय यह क्षेत्र कर्मजनित रोगकी ओषधि है, मोक्षलक्ष्मीका लीला निकेतन है। मुझे भी यह क्षेत्र अत्यन्त प्रिय है। इस क्षेत्रके एक-एक धूलि-कणके समक्ष सम्पूर्ण त्रिलोकी भी तिनकेके समान है। फिर इस सम्पूर्ण तीर्थकी महिमाको कौन जान सकता है? प्रभो! मैं यह जानना चाहती हूँ कि इस काशीधाममें कौन-कौनसे शिवलिंग अनादिसिद्ध हैं, जिनका जन्मभरमें एक बार भी पूजन करनेसे काशीमें स्थित सम्पूर्ण लिंग पूजित हो जाते हैं? मुझे उन सबका परिचय दीजिये।'
देवीका यह वचन सुनकर महेश्वरने कहा—प्रिये! जिनके नामोंका उच्चारण करनेमात्रसे समस्त पाप क्षीण हो जाते हैं और पुण्यराशिकी प्राप्ति होती है, ऐसे स्थूल, सूक्ष्म एवं रत्ननिर्मित शिवलिंग काशीमें असंख्य हैं। अनेकों धातुमय लिंग हैं और बहुतसे प्रस्तरमय लिंग भी हैं। इनमें बहुतेरे तो स्वयम्भू हैं—स्वतः प्रकट हुए हैं और बहुतसे देवताओं एवं ऋषियोंद्वारा स्थापित किये हुए हैं। सुन्दरि! तुमने जिन शिवलिंगोंका परिचय पूछा है, उनका वर्णन करता हूँ। वे लिंग कलियुगमें अत्यन्त गोप्य होंगे, परंतु उनका प्रभाव अपने-अपने स्थानका परित्याग नहीं करेगा। जो कलियुगके पापसे पुष्ट हो रहे हैं तथा जो दुष्ट, नास्तिक और शठ हैं, वे इन सिद्ध लिंगोंके नाम भी नहीं जान सकेंगे। उनमेंसे प्रथम ॐकार लिंग है, दूसरा त्रिलोचन, तीसरा महादेव, चौथा कृत्तिवासा, पाँचवाँ रत्नेश्वर, छठा चन्द्रेश्वर, सातवाँ केदारेश्वर, आठवाँ धर्मेश्वर, नवाँ वीरेश्वर, दसवाँ कामेश्वर, ग्यारहवाँ विश्वकर्मेश्वर, बारहवाँ मणिकर्णीश्वर, तेरहवाँ अविमुक्तेश्वर और चौदहवाँ विश्वेश्वर महालिंग है। प्रिये! ये चौदहों लिंग कल्याणके हेतु हैं, इनका समुदाय ही मुक्तिक्षेत्र कहा गया है। ये सब इस क्षेत्रके अधिष्ठाता देवता हैं और आराधना करनेपर मोक्षलक्ष्मी प्रदान करते हैं। प्रिये! इस आनन्दकाननमें देहधारियोंकी मुक्तिके लिये ये ही चौदह महालिंग परम पूजनीय माने गये हैं। प्रत्येक मासकी मंगलमयी प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीतक इन प्रधान-प्रधान लिंगोंकी यत्नपूर्वक यात्रा करनी चाहिये। जो इन चौदह महालिंगोंकी आराधना करता है, उसकी इस संसारमार्गमें कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। यह काशीतीर्थका अनुपम कोष है, इसको जहाँ-तहाँ सब ओर प्रकाशित नहीं करना चाहिये। देवि! बहुत बड़ी विपत्तिमें भी इन लिंगोंके नामोंका उच्चारण किया जाय तो ये सब दुःख हर लेते हैं। यह इस क्षेत्रका परम गोपनीय रहस्य है। गिरिराजकुमारी! ये चौदह लिंग मेरे सामीप्यकी
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प्राप्ति करानेवाले तथा अविमुक्त धामके हृदय हैं। प्रिये! इस क्षेत्रमें निश्चय ही सबकी मुक्ति होती है, ऐसी जो प्रसिद्धि है, उसमें ये मेरे चौदह महालिंग ही कारण हैं। जिन भक्तों ने आनन्द-वनमें इन लिंगोंका चिन्तन किया है, वे ही व्रतधारी और तपस्वी हैं। जिन्होंने दूरसे भी इन लिंगोंका दर्शन कर लिया है, वे ही उत्तम योगाभ्यासी और महादानी हैं।
तदनन्तर भगवान् शंकरने अपने भक्तोंके हितके लिये पार्वतीदेवीसे अन्य लिंगोंका भी इस प्रकार परिचय दिया—शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लीनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भेश्वर, ईशानेश्वर, गोप्रेक्षेश्वर, वृषभध्वजेश्वर, उपशान्तेश्वर, ज्येष्ठेश्वर, निवासेश्वर, शुक्रेश्वर, व्याघ्रेश्वर और जम्बुकेश्वर—ये चौदह लिंग भी काशीके महत्त्वपूर्ण आयतन हैं। इनकी सेवासे भी मनुष्य मोक्षको प्राप्त होता है। वैशाख कृष्ण प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीतक श्रेष्ठ पुरुषोंको इन लिंगोंकी पूजा करनी चाहिये। देवि! इनमेंसे एक-एक लिंगकी महिमाका भी कहीं आदि-अन्त नहीं है।
पार्वतीजी बोलीं—समस्त कारणोंके ईश्वर महादेव! आपने जो यह कहा है कि पूर्वोक्त लिंगोंमेंसे एक-एक लिंग भी काशीमें परम मोक्षका कारण है, इससे मेरी उत्सुकता बहुत बढ़ गयी है। जिनके नामश्रवणसे भी समस्त पापोंका अपहरण हो जाता है, उन चौदह लिंगोंमेंसे प्रत्येककी महिमाका वर्णन कीजिये। ॐकारेश्वर लिंगका स्वरूप क्या है, उनकी क्या महिमा है, पूर्वकालमें किसने इनकी आराधना की थी और आराधित होनेपर इन्होंने उसे कौन-सा फल प्रदान किया था?
महादेवजीने कहा—महादेवी! पूर्वकालकी बात है। जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने आनन्दवनमें समाधि लगाकर बड़ी भारी तपस्या की। तपस्या करते-करते जब एक सहस्र युग बीत गया तब सातों पातालोंका भेदन करके उनके आगे एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। उसके प्रकाशसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थीं। उनकी निर्व्याज समाधिसे जो परम ज्योति अन्तःकरणमें प्रकट हुई थी, वही बाहर व्यक्त हो गयी। ब्रह्माजीने समाधि त्याग करके जब आँखें खोलीं तब सामने आदि अक्षर ॐकारको प्रकट देखा। उसीमें अकारका दर्शन हुआ जो सत्त्वगुणसम्पन्न, ऋग्वेदका अधिष्ठान, सृष्टिपालक, साक्षात् नारायणस्वरूप तथा अज्ञानमय अन्धकारसे परे प्रतिष्ठित है। उसके बाद उकार दृष्टिगोचर हुआ जो रजोगुणस्वरूप, यजुर्वेदकी उत्पत्तिका स्थान तथा उन्हींके प्रतिबिम्बित स्वरूपकी भाँति ब्रह्ममय प्रतीत होता था। उसके बाद ब्रह्माजीने मकारको प्रत्यक्ष किया जो किसी प्रकारकी ध्वनिसे रहित, अन्धकारके संकेतस्थानके सदृश तथा तमोगुणस्वरूप ज्ञात हुआ। वह साक्षात् रुद्रस्वरूप मकार भी सामवेदकी उत्पत्तिका स्थान है। उसके बाद ब्रह्माजीने परमानन्दस्वरूप परा वाणीके आश्रयभूत नादतत्त्वका साक्षात्कार किया, जिसकी आकृति विश्वरूपमय है तथा जो सगुण और निर्गुणस्वरूप है। उसीको शब्दब्रह्म कहते हैं तथा वही समस्त वाङ्मयका कारण है। तत्पश्चात् विधाताने तपस्यासे प्रत्यक्ष हुए विन्दुतत्त्वका अवलोकन किया, जो समस्त कारणोंका भी कारण, समस्त जगत्की उत्पत्तिका स्थान तथा परम शिवरूप है। अपने प्रभावसे सबका अवन- (रक्षण) करनेके कारण प्रणवको ॐ कहते हैं अथवा भक्तमुन्नयति—भक्तको ऊर्ध्वलोकमें ले जाता है, इसलिये जिसे ॐ कहते हैं वह प्रणव निराकार होकर भी साकाररूपसे ब्रह्माजीको दृष्टिगोचर हुआ। जो अपने जपमें मन लगानेवाले भक्तको भवसागरसे तार देता है, इसीलिये जिसे 'तार' कहते हैं, उसी प्रणवका ब्रह्माजीने साक्षात्कार किया। समस्त मोक्षकामी पुरुषोंद्वारा यह प्रणुत्त (स्तुत अथवा प्रशंसित) होता है, इसलिये इसका नाम प्रणव है अथवा यह अपनी उपासना करनेवाले पुरुषोंको परम पदमें पहुँचाता है, इस कारण इसे प्रणव कहते हैं। वेदत्रयी जिसका स्वरूप है, जो तुरीय, तुरीयातीत और सर्वात्मक है उसी नादविन्दुस्वरूप
८७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ॐकारका ब्रह्माजीको प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। जिससे अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद प्रकट होते हैं, जो वृषभरूप यज्ञमय परमेश्वर मन्त्र, ब्राह्मण और कल्प—तीनोंसे सम्बद्ध होकर बार-बार शब्द करता है अर्थात् वैदिक मन्त्रोंसे ध्वनित होता है, जो तेजोमय तथा सबसे श्रेष्ठ है। जिसमें ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्का लय होता है, इसीलिये जो साधुपुरुषोंद्वारा लिंग-नामसे पूजित होता है उसी ॐकार लिंगका ब्रह्माजीने प्रत्यक्ष दर्शन किया। तदनन्तर अ, उ, म, नाद, विन्दु—इन पाँच अक्षरोंसे युक्त प्रपंचसे भिन्न लिंगरूपधारी ॐकारेश्वरका ब्रह्माजीने इस प्रकार स्तवन किया।
ब्रह्माजी बोले—सदाशिव! अक्षरस्वरूप धारण करनेवाले आप ॐकाररूप परमेश्वरको नमस्कार है। आप ही अकार आदि अक्षरोंके उत्पत्तिस्थान हैं, आपको नमस्कार है। निराकार परमात्मन्! आप अकार, उकार और मकार हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद आपके ही स्वरूप हैं, आप रूपातीत परमेश्वरको नमस्कार है। आप ही नाद, विन्दु और कलास्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। लिंगरहित होते हुए भी लिंगरूपसे प्रकट होनेवाले आप सर्वस्वरूप महेश्वरको नमस्कार है। आप आदि-अन्तसे रहित एवं तेजकी निधि हैं, आपको नमस्कार है। आप भव (जगत्को उत्पन्न करनेवाले), रुद्र (दुःख दूर करनेवाले) और शर्व (संहारकारी) हैं, आपको नमस्कार है। आप पापियोंके लिये उग्र और भीमरूप हैं, आपको नमस्कार है। पशुओं (अज्ञानी जीवों)-का पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप तारक प्रणवरूप हैं, आपसे ही सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति होती है, आपको नमस्कार है। आप मायासे परे परम कल्याणस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ—ये सब स्वर आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। 'क'से लेकर 'ह'तक सम्पूर्ण व्यंजन भी आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। उदात्त, अनुदात्त और स्वरितरूप आपको बार-बार नमस्कार है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतके नियन्ता तथा विसर्गसहित वर्णस्वरूप आपको नमस्कार है। अनुस्वाररूप आपको नमस्कार है। अनुनासिकमय आपको नमस्कार है। निरनुनासिक अक्षर तथा दन्त और तालुसे उच्चारित होनेवाले वर्ण आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। ओष्ठ और हृदयसे निकलनेवाले अक्षर भी आपसे भिन्न नहीं हैं, ऊष्मा और अन्तःस्थवर्ण आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्येक वर्गके पंचम वर्ण हैं, आपको नमस्कार है। आप पिनाक धारण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही निषाद (किरात) और निषादोंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। वीणा, वेणु और मृदंग आदि वाद्य भी आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। उच्च और गम्भीर ध्वनि-स्वरूप आपको नमस्कार है। आप पापियोंके लिये घोर (भयंकर) और भक्तोंके लिये अघोर (सौम्य)-रूप धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप ही तानस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप ही इक्कीस मूर्छनाओंके पति हैं, आपको नमस्कार है। स्थायी और संचारीके भेदसे द्विविध भावरूप आपको नमस्कार है। आप तालप्रिय, तालस्वरूप तथा लास्य और ताण्डव नृत्यको प्रकट करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। तौर्यत्रिक (नृत्य, गान और वाद्य) आपका स्वरूप है। आप नृत्य, गान और वाद्यके बड़े प्रेमी हैं तथा भक्तिपूर्वक नृत्य, गान एवं वाद्यके द्वारा आपकी आराधना करनेवाले भक्तोंको आप मोक्षलक्ष्मी प्रदान करते हैं, आपको नमस्कार है। स्थूल और सूक्ष्म आपके ही स्वरूप हैं। दृश्य और अदृश्य रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। अर्वाचीन (नवीन) और प्राचीन सब आपके ही स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। वाणीका विस्तार भी आपका ही रूप है। आप समस्त वाङ्मय-प्रपंचसे परे हैं, आपको नमस्कार है। एक, अनेक रूप तथा सत्-असत्के स्वामी आपको नमस्कार है। शब्दब्रह्म (प्रणवरूप) आपको नमस्कार है। परब्रह्म! आपको नमस्कार है। वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य आपको नमस्कार है। वेदोंका पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप वेदस्वरूप हैं, आपका रूप
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८७७
वेदगम्य है, आपको नमस्कार है। पार्वतीपते! आपको नमस्कार है। जगदीश्वर! आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! दिव्य पद प्रदान करनेवाले देव! आपको नमस्कार है। महेश्वर! परम कल्याणकारी आपको बारंबार नमस्कार है। जगदानन्द! चन्द्रशेखर! मृत्युंजय! आप त्रिनेत्रधारी शिवको नमस्कार है। पिनाक एवं त्रिशूल धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आप भक्तोंका विषाद दूर करते हैं। आप ही ज्ञान हैं, ज्ञान ही आपका स्वरूप है, आप सर्वज्ञ शिवको नमस्कार है। योगसत्तम! आप ही योगियोंको योगसिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। तपोधन! आप ही तपस्वी लोगोंको तपस्याका फल देते हैं। आप ही मन्त्ररूप हैं और आप ही मन्त्रोंके फलदाता हैं। आप ही महादान देनेवाले और आप ही महादानके फल हैं। आप ही महायज्ञ और उसके फलदाता हैं। आप ही सर्व, सर्वगत, सब कुछ देनेवाले और सबके साक्षी हैं। सर्वभोक्ता, सर्वकर्ता और सर्व-संहारकारी भी आप ही हैं। योगियोंके हृदयाकाशमें निवास करनेवाले शिव! आपको नमस्कार है। आप ही विष्णुरूपसे शंख, चक्र और गदा धारण करके तीनों लोकोंका पालन करते हैं। जगत्पालक! सत्त्वस्वरूप! आपको नमस्कार है। आप ही सृष्टिरचनाके ज्ञाता ब्रह्मा होकर इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। रजोगुणप्रधान रूप धारण करके भी आप रजोहीन मोक्षपद प्रदान करनेवाले हैं। आप ही कल्पके अन्तमें कालाग्निरुद्र होकर महाप्रलय आरम्भ करते हैं। कल्पके आदिमें आप ही अपने दृष्टिपातमात्रसे पुरुष और प्रकृतिरूपसे महत्तत्त्व आदि सम्पूर्ण जगत्को पुनः प्रकट कर देते हैं। आपकी पलकोंका खुलना और बंद होना—ये ही दोनों सृष्टि और संहारके कारण हैं। स्वेच्छानुसार विचरण करनेवाले आप परमेश्वरका यह सब खेल है। शम्भो! आपसे ही यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है और आपमें ही सम्पूर्ण चराचर जगत् स्थित है। आप वेदवाणीके भी अगोचर हैं। आपकी यथावत् स्तुति कौन जानता है? आप ही स्तुति करनेवाले हैं, आप ही स्तुति हैं और आप ही स्तवनीय देवता हैं। मैं तो 'ॐ नमः शिवाय' (प्रणवस्वरूप कल्याणमय शिवको नमस्कार है) इतना ही जानता हूँ, इसके सिवा और कुछ भी नहीं जानता। आप ही मुझे शरण देनेवाले हैं और आप ही परम गति हैं। ईश! मैं आपको ही प्रणाम करता हूँ, आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।
इस प्रकार बार-बार कहकर ब्रह्माजीने ॐकारनामक महालिंगरूपधारी महेश्वरको पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर साष्टांग प्रणाम किया।
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! ब्रह्माजीद्वारा की हुई उस उत्तम एवं अद्भुत स्तुतिको सुनकर मैं बहुत सन्तुष्ट हुआ और मैंने ब्रह्माजीसे कहा—'चतुरानन! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, वर माँगो।'
ब्रह्माजी बोले—देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वरदानका अधिकारी मानते हैं तो इस महालिंगमें आपका सदैव निवास बना रहे और यह ॐकारेश्वर नामक शिवलिंग भक्तोंको एकमात्र मोक्ष प्रदान करनेवाला हो।
स्कन्दजी कहते हैं—ब्रह्मर्षे! ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर भगवान् शिवने कहा—'तथास्तु' ऐसा ही होगा। सुरश्रेष्ठ! तुम तपस्याके कारण सर्वश्रेष्ठ हो और सम्पूर्ण वेदोंकी निधि हो। जब गंगा ॐकारेश्वरके समीपमें आवेगी तब देवताओं, ऋषियों और पितरोंको प्रिय लगनेवाला पुण्यकाल उपस्थित होगा। उस समय ॐकारेश्वरके समीप मत्स्योदरीके जलमें किया हुआ स्नान, जप, दान, होम और देवपूजन सब अक्षय होता है। ॐकारेश्वरके दर्शनसे ही मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। अतः काशीमें प्रयत्नपूर्वक ॐकारेश्वरका दर्शन करना चाहिये। इस प्रकार कमलोद्भव ब्रह्माजीको वर देकर भगवान् शंकर पुनः उसी महालिंगमें लीन हो गये। अगस्त्य! ब्रह्माजी द्वारा की हुई स्तुतिका जप करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। महान् पुण्योंसे परिपूर्ण होता है और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
<div align="center">~~~~</div>८७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
त्रिलोचन लिंगकी महिमा
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! महादेवजीने त्रिविष्टप लिंगकी उत्पत्तिके विषयमें जो श्रमहारिणी कथा कही है, उसे सुनाता हूँ, सुनो।
महादेवजी बोले—पार्वती! पृथ्वीपर यह आनन्दवन सबसे श्रेष्ठ है। इसमें भी सब तीर्थ श्रेष्ठ हैं। तीर्थोंमें भी ॐकारेश्वरकी भूमि श्रेष्ठ है। मुक्तिका मार्ग प्रकाशित करनेवाले ॐकारेश्वर लिंगसे भी अत्यन्त श्रेष्ठ कल्याणस्वरूप त्रिलोचन लिंग है। जैसे तेजस्वियोंमें सूर्य और दर्शनीय वस्तुओंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार समस्त लिंगोंमें त्रिलोचन लिंग श्रेष्ठ है। जो महाबुद्धिमान् मनुष्य काशीमें त्रिलोचन लिंगकी पूजा करते हैं वे मेरी प्रीति चाहनेवाले त्रिलोकनिवासियोंके द्वारा पूजनीय हैं। गिरिराजनन्दिनी! यद्यपि ॐकार आदि सभी मुख्य लिंग समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं, परन्तु भगवान् त्रिलोचनकी शक्ति कुछ और ही है। प्रिये! पूर्वकालमें जब मैं योगयुक्त होकर बैठा था, उस समय यह महान् लिंग सात पातालोंका भेदन करके भूतलसे मेरे सामने प्रकट हुआ था। यह त्रिलोचन लिंग ज्ञानदृष्टि देनेवाला बताया गया है। जो भगवान् त्रिलोचनके भक्त हैं वे सभी त्रिलोचनस्वरूप हैं, मेरे पार्षद हैं और जीवन्मुक्त हैं। वैशाख शुक्ला तृतीयाको पिलपिला कुण्डमें स्नान करके जो भक्तिपूर्वक उपवास करके रात्रिमें जागरण और त्रिलोचनकी पूजा करते हैं, फिर प्रातःकाल वहीं स्नान करके त्रिलोचन लिंगकी पूजा करके पितरोंके उद्देश्यसे अन्न और दक्षिणासहित धर्मघट दान करते हैं, तत्पश्चात् शिवभक्तोंके साथ बैठकर पारणा करते हैं वे इस पार्थिव शरीरका त्याग करके पुण्यसे प्रेरित हो निश्चय ही मेरे आगे चलनेवाले पार्षद होते हैं।
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! प्राचीन रथन्तर कल्पकी बात है। भगवान् त्रिलोचनके मणि-माणिक्यनिर्मित मन्दिरमें कभी कबूतरोंका एक जोड़ा निवास करता था। वे दोनों कबूतर प्रतिदिन प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें मन्दिरकी परिक्रमा करते हुए सब ओर उड़ते और अपने पंखोंकी हवासे मन्दिरमें लगी हुई धूलको दूर किया करते थे। भक्तलोग जो सदा त्रिलोचन और त्रिविष्टप आदि नामोंका उच्चारण करते वह सब उनके कानोंमें पड़ा करता था। उन दोनों पक्षियोंके नेत्रोंमें मंगल आरतीकी दिव्य ज्योति पड़कर उन्हें भक्तजनोंकी चेष्टाएँ दिखाती थी। कभी-कभी तो वे युगल पक्षी वहाँका कौतुक देखते हुए चारा चुगनेकी भी चिन्ता छोड़ देते और स्थिर चित्तसे वहीं ठहरकर दर्शन करते थे, वहाँसे उड़कर किसी अभीष्ट स्थानको नहीं जा पाते थे। भक्तजनोंसे भरे हुए उस मन्दिरके चारों ओर बिखरे चावलके दानोंको चुगते-चुगते वे परिक्रमा किया करते थे। भगवान् त्रिलोचनके दक्षिण भागमें चतुःस्रोतस्विनीका सुन्दर जल था। तृषासे आतुर होनेपर वे उसीका जल पीते और कभी-कभी उसमें स्नान भी कर लेते थे। इस प्रकार त्रिलोचनके समीप उत्तम चेष्टाके साथ विचरते हुए उन पक्षियोंके बहुत वर्ष बीत गये।
तदनन्तर देवमन्दिरके स्कन्धभागमें गवाक्षके भीतर सुखपूर्वक बैठे हुए उन दोनों पक्षियोंको एक बाजने बड़ी क्रूर दृष्टिसे देखा। एक दिन वह बाज फिर आया। तब डरी हुई कबूतरीने कहा—'प्रियतम! यह स्थान दुष्टकी दृष्टिसे दूषित हो गया है। अतः इसको त्याग देना चाहिये।' यह सुनकर कबूतरने अवहेलनापूर्वक कहा—'प्रिये! वह मेरा क्या कर लेगा।'
कबूतरी बोली—जो उपद्रव आनेपर भी अपने स्थानको छोड़कर अन्यत्र नहीं चला जाता वह पंगु नदीके किनारेके वृक्षकी भाँति नाशको प्राप्त होता है। नाथ! जबतक यह कालरूपी बाज हमलोगोंसे बहुत दूर है, तभीतक तुम मुझे त्यागकर
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८७९
भी दूर चले जाओ, क्योंकि तुम्हारे जीवित रहनेपर इस भूतलमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। तुम्हें पुनः स्त्री, मित्र, धन और गृह प्राप्त हो जायगा। यदि पुरुषने स्त्री और धनके द्वारा भी अपने आपकी रक्षा कर ली तो राजा हरिश्चन्द्रकी भाँति उसे इस लोकमें सब कुछ मिल जाता है। यह आत्मा ही प्रिय बन्धु है और यह आत्मा ही महान् धन है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका उपार्जन करनेवाला भी यह आत्मा ही है। जबतक आत्मामें क्षेम है, तभीतक त्रिलोकीमें क्षेम है किंतु उत्तम बुद्धिसे युक्त पुरुष उस क्षेमको भी यशके साथ प्राप्त करना चाहते हैं। जिस क्षेममें सुयशका अभाव है उससे तो मृत्यु ही अच्छी है। पुरुष जब नीतिके मार्गपर चलता है तभी उसे यशकी प्राप्ति होती है। अतः नाथ! इस नीतिके मार्गका श्रवण करके इस स्थानसे अन्यत्र चले जाइये।
उत्तम बुद्धिवाली अपनी स्त्री कपोतीके ऐसा कहनेपर भी कबूतर उस स्थानसे नहीं निकला। तब प्रातःकाल आकर उस बलवान् बाजने कपोतके निकलनेके मार्गको रोक लिया और उससे कहा—'कपोत! तुझे धिक्कार है, तुझमें तो जरा भी पौरुष नहीं है। अरे! दुर्बुद्धि! या तो युद्ध कर या मेरी बात मानकर यहाँसे निकल भाग। यदि भूखसे क्षीण होकर तू यहाँ प्राण देगा तो तुझे पीछे निश्चय ही नरकमें जाना पड़ेगा। उत्तम बुद्धिवाले मनुष्य पुरुषार्थका आश्रय लेकर संकटसे मुक्त होनेके लिये प्रयत्न करते हैं।' इस प्रकार बाजके फटकारने और पत्नीके उत्साह दिलानेपर कबूतर अपने दुर्गके द्वारपर आकर उस बाजसे युद्ध करने लगा। बेचारा भूख-प्याससे पीड़ित था, अतः बलवान् बाजने उसे पंजोंसे पकड़ लिया और कबूतरीको भी चोंचमें दबा लिया। इस प्रकार उन दोनोंको पकड़कर बाज शीघ्र ही आकाशमें उड़ गया। तब कबूतरीने कहा—'नाथ! यह स्त्री है, ऐसा समझकर तुमने मेरी बातोंकी उपेक्षा की। इसीसे आज इस अवस्थाको प्राप्त हुए हो। क्या करूँ, मैं अबला हूँ, परंतु अब भी मैं तुम्हारे हितकी बात कहती हूँ। तुम बिना विचारे ही उसका पालन करो। जबतक मैं इसकी चोंचमें पड़ी हूँ और जबतक यह पृथ्वीपर पहुँचकर स्वस्थ नहीं हो जाता है तबतक ही तुम अपनेको इसके चंगुलसे छुड़ानेके लिये इस शत्रुके पंजेमें चोंच मारो।' पत्नीकी यह बात सुनकर कबूतरने वैसा ही किया। फिर तो पैरमें पीड़ा होनेसे बाज बहुत देरतक चीं-चीं करता रहा। इतनेमें ही कपोती उसके मुखसे छूटकर उड़ गयी। इधर पाँवकी अंगुलियोंके शिथिल होनेसे कबूतर भी छूटकर गिर पड़ा। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको विपत्तिमें भी कभी उद्योग नहीं छोड़ना चाहिये, क्योंकि उद्यमी पुरुष दुर्बल हों तो भी सफलताके भागी होते हैं। अतः मनीषी पुरुष विपत्तिकालमें भी उद्यमकी प्रशंसा करते हैं। तदनन्तर वे दोनों पक्षी कालयोगसे मुक्तिपुरी अयोध्यामें सरयूके किनारे मृत्युको प्राप्त हुए। उनमेंसे एक कबूतर तो विद्याधर हुआ। वह मन्दारदामाका पुत्र था और उसका नाम परिमलालय रखा गया था। वह कुमारावस्थासे ही शिवजीकी भक्तिमें तत्पर हुआ। उसने अपने मन और इन्द्रियोंको पूर्णतः जीत लिया था। भगवान् त्रिलोचनकी शरण लेनेसे पूर्वजन्मके अभ्यासवश उसने यह नियम कर लिया कि 'जबतक शरीर स्वस्थ है, जबतक इन्द्रियोंमें शिथिलता नहीं आ जाती तबतक काशीमें भगवान् त्रिलोचनकी पूजा किये बिना मैं थोड़ा भी भोजन नहीं करूँगा।' ऐसी प्रतिज्ञा लेकर वह परिमलालय प्रतिदिन काशीमें त्रिलोचनका दर्शन करनेके लिये आता था।
उधर वह कपोती भी पातालमें नागराज रत्नद्वीपके घरमें कन्यारूपसे उत्पन्न हुई। उसका नाम रत्नावली रखा गया। उसकी दो सखियाँ थीं, जिनमेंसे एकका नाम प्रभावती और दूसरीका नाम कलावती था। ये दोनों सदा रत्नावलीके साथ रहती थीं। उस कन्याने अपने पिताको शिवभक्तिमें तत्पर देख यह नियम लिया—'मैं प्रतिदिन अपनी दोनों सखियोंके साथ काशीमें त्रिलोचनकी पूजा करके ही मौन व्रतका त्याग करूँगी, अन्यथा नहीं।' इस
८८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्रकार वह नागकन्या अपनी दोनों सखियोंके साथ प्रतिदिन काशीमें आती और त्रिलोचनकी पूजा करके लौट जाती थी।
एक समय वैशाख मासकी तृतीयाको उपवासपूर्वक रात्रिमें नृत्य, गीत और कथा आदिके द्वारा जागरण करके रत्नावलीने प्रातःकाल चतुर्थीको शुभ 'पिलपिला' तीर्थमें स्नान किया और त्रिलोचनदेवकी पूजा करके उन्हींके रंगमण्डपमें सो गयी। उस समय शुद्ध कर्पूरके समान गोरे अंगोंवाले जटा-मुकुटमण्डित शशिभूषण भगवान् त्रिलोचन उस लिंगसे निकलकर बोले—'कन्याओ! तुम सब लोग उठो।' तब उन्होंने उठकर, जिनके आगमनकी कोई सम्भावना नहीं थी उन, भगवान् त्रिलोचनको प्रत्यक्ष देखा और उन्हें लक्षणोंसे ईश्वर जानकर उनके चरणोंमें वन्दना की। भगवद्दर्शनसे उन कुमारियोंके मुखपर प्रसन्नता छा गयी और वे गद्गद कण्ठसे भगवान् शिवकी स्तुति करने लगीं—'शम्भो! आपकी जय हो, ईशान! आपकी जय हो, सर्वव्यापी और सब कुछ देनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। त्रिभुवनको उत्पन्न करनेवाले तथा भक्तजनोंके अधीन रहनेवाले प्रमथनायक! आपकी जय हो। प्रणतजनोंको सब कुछ देनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। सब विधियोंके ज्ञाता, विधाता भी आपकी स्तुति करनेमें कुशल नहीं हैं। नाथ! आपकी स्तुति करनेमें बृहस्पतिकी भी वाणी कुण्ठित हो जाती है। सर्वज्ञ! स्वामिन्! वेद भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते, आप अनादि और अनन्त हैं, मन आपको मनन नहीं कर सकता। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। त्रिलोचन! आपको नमस्कार है। त्रिविष्टिप! आपको नमस्कार है।'
यों कहकर उन कुमारियोंने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर प्रणाम किया। तब उन्हें उठाकर भगवान् चन्द्रभूषणने कहा—'मन्दारदामाका पुत्र परिमलालय समस्त विद्याधरोंमें श्रेष्ठ है, वही तुमलोगोंका पति होगा। तुम तीनों मेरी भक्त हो और वह तरुण विद्याधर भी मुझमें भक्ति रखता है। तुम चारों इस जीवनका अन्त होनेपर मोक्ष प्राप्त करोगे। जन्मान्तरमें तुम सबने मेरी सेवा की है, इससे तुमलोगोंको भक्तिभावित निर्मल जन्म प्राप्त हुआ है।'
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर उन कन्याओंने प्रसन्नचित्त होकर हाथ जोड़ प्रणाम करके पूछा— नाथ! हम चारोंने पूर्वजन्ममें किस प्रकारसे आपकी सेवा की है?
भगवान् शिव बोले—नागकन्याओ! सुनो, यह रत्नावली पूर्वजन्ममें कपोती थी और श्रेष्ठ विद्याधर इसका पति कपोत था। यहीं मेरे मन्दिरमें इन दोनोंने दीर्घकालतक सुखपूर्वक निवास किया है। इन्होंने अपने पंखोंकी हवासे मेरे मन्दिरमें लगी हुई धूलको उड़ाकर साफ किया है। ऊपरसे लेकर नीचेतक प्रतिदिन अनेक बार मेरी परिक्रमाएँ की हैं। आकाशमें उड़ते और मेरे आँगनमें विचरते समय भी इन्होंने मेरी प्रदक्षिणा की है। यहाँके चतुर्नदतीर्थमें स्नान किया और बार-बार उसीका जल पीया है। मेरे भक्तोंके यहाँ जो-जो उत्सव और कौतुक किये हैं, उन सबको इन्होंने देखा है। अनेकों बार मेरी मंगल आरतीका दर्शन किया है और कानोंसे मेरे नामामृतका पान (श्रवण) किया है। यद्यपि इनकी मृत्यु मेरे समीप नहीं हुई तो भी इन्होंने काशीकी प्राप्ति करानेवाली अयोध्यामें प्राणत्याग किया है। अयोध्यामें मरनेसे ही यह रत्नद्वीप नागकी कन्या हुई है और इसका पति कबूतर विद्याधरका पुत्र हुआ है। तुमलोगोंमें जो ये प्रभावती और कलावती हैं, ये इससे तीसरे जन्म पहले महर्षि चारण्यकी पुत्रियाँ थीं। दोनोंमें परस्पर बड़ा अनुराग था और दोनों ही शील एवं सदाचारसे सम्पन्न थीं। इनके पिता चारण्यने आमुष्यायणके पुत्र नारायणसे इनका विवाह कर दिया। नारायण अभी किशोरावस्थाके थे। एक
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८८१
दिन वे वनमें समिधा लानेके लिये गये, इतनेहीमें भाग्यवश किसी सर्पने उनको काट लिया। चारण्यकी दोनों कन्याएँ भवानी और गौतमी वैधव्य दुःखसे अत्यन्त दुःखी हो बड़ी दीनताको प्राप्त हो गयीं। इसीलिये ब्याह करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह देवता और नदी नामवाली कन्यासे विवाह न करे। तदनन्तर किसी ऋषिके अद्भुत आश्रममें जाकर इन कन्याओंने मोहवश ऋषिके दिये बिना ही कुछ केलेके फल तोड़ लिये। फलकी चोरीका परिणाम यह हुआ कि ये दोनों दूसरे जन्ममें वानरी हो गयीं, परंतु इन्होंने शील और सदाचारकी रक्षा की थी, अतः उस धर्मके प्रभावसे इनका जन्म काशीमें हुआ। वे नारायण ब्राह्मण सर्पसे डसे जानेपर भी अपने पिताकी सेवारूप व्रतके प्रभावसे काशीमें कबूतर हुए। इस प्रकार यह विद्याधर युवक जन्मान्तरमें इन दोनोंका भी पति रह चुका है और इस समय भी तुम तीनोंका पति होगा। इस मन्दिरके पार्श्वभागमें जो बहुत बड़ा बरगदका वृक्ष है, उसीपर वे दोनों वानरियाँ रहती थीं। वे चतुःस्रोतस्विनीतीर्थमें जलक्रीड़ापूर्वक स्नान करतीं और प्यास लगनेपर उसीका जल पीती थीं। वानरजातिके स्वभावसे इनमें चपलता तो थी ही, सब ओर क्रीड़ा करती हुई मन्दिरकी परिक्रमा करतीं और अनेक बार बहुतसे शिवलिंगोंका दर्शन करती थीं। एक दिन इस वटवृक्षके समीप स्वेच्छापूर्वक विचरती हुई दोनों वानरियोंको किसीने फँसाकर रस्सीमें बाँध लिया। तदनन्तर किसी समय कालवश उनकी मृत्यु हो गयी। काशीनिवासजनित पुण्य और भगवान् त्रिलोचनकी सेवा एवं प्रदक्षिणा आदिके पुण्यसे वे दोनों नागकुमारियाँ हुई हैं। अब तुम तीनों ही विद्याधरकुमार परिमलालयको पतिरूपमें प्राप्त करके स्वर्गीय भोगोंका उपभोग करोगी और अन्तमें काशीमें आकर यहीं मृत्युको प्राप्त हो मुक्तिको प्राप्त होओगी। काशीमें आकर यदि थोड़ा भी शुभ कर्म किया गया हो तो मेरे अनुग्रहसे उसका फल निश्चय ही मोक्ष होता है। तीनों लोकोंमें काशीपुरी सबसे श्रेष्ठ है, काशीमें भी ॐकारेश्वर लिंग सबसे श्रेष्ठ है, ॐकारेश्वरसे भी श्रेष्ठ त्रिलोचन लिंग है। इसमें सदा ही स्थित होकर मैं अपने भक्तोंको मोक्ष प्रदान करता हूँ। अतः काशीमें सर्वथा प्रयत्न करके भगवान् त्रिलोचनकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा कहकर देवदेवेश्वर भगवान् शिव मन्दिरके भीतर चले गये। वे कन्याएँ भी अपने-अपने घर गयीं और वहाँ माताके आगे सब बातें बताकर कृतकृत्य-सी हो गयीं।
तदनन्तर एक दिन वैशाख मासमें महायात्राका समय आया। उसमें विद्याधर और नाग त्रिलोचन महादेवके समीप विरज महाक्षेत्रमें एकत्र हुए। फिर भगवान्के वरदानसे परस्पर कुलका परिचय पूछकर उन नागोंने अपनी तीनों कन्याओंको विद्याधरकुमार परिमलालयके साथ ब्याह दिया। इस विवाहसे तीनों पुत्रवधुओंको पाकर विद्याधरराज मन्दारदामा बहुत प्रसन्न हुए। इधर नागराज रत्नद्वीप, भुजंगराज पद्मी और फणीन्द्र त्रिशिख भी परिमलालयको जामाताके रूपमें पाकर परम सन्तुष्ट हुए। इस विवाहोत्सवको सम्पन्न करके सभी स्वजन भगवान् त्रिलोचन लिंगके गौरवका वर्णन करते हुए अपने-अपने लोकको चले गये। श्रीमान् विद्याधर परिमलालय उन नागकन्याओंके साथ पर्याप्त सुख भोगनेके पश्चात् काशीमें आकर भगवान् त्रिलोचनकी सेवामें संलग्न हुए और वहाँ मधुर गीत गाते हुए पत्नियोंसहित त्रिलोचन लिंगमें लयको प्राप्त हो गये।
स्कन्दजी कहते हैं—कलियुगमें भगवान् त्रिलोचनकी महिमा महादेवजीने गुप्त रखी है। इसलिये जिनमें सात्त्विक भावकी कमी है, ऐसे मनुष्य उस शिवलिंगकी उपासना नहीं करते हैं।
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८८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
केदारेश्वर लिंगकी माहात्म्य-कथा
पार्वतीजी बोलीं—करुणानिधान ! अब अपने भक्तोंपर कृपा करके केदारका माहात्म्य कहिये।
श्रीमहादेवजीने कहा—पार्वती ! प्राचीन कालकी बात है। उज्जयिनीपुरीसे एक ब्राह्मण यहाँ आया था। पिताने उसका उपनयन-संस्कार कर दिया था और वह ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करता था। काशीपुरीका सब ओरसे अवलोकन करके उसके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने हिरण्यगर्भ नामक आचार्यसे पाशुपत नामक उत्तम व्रतकी दीक्षा ली। उसका नाम वशिष्ठ था। हिरण्यगर्भका वह शिष्य सब पाशुपतोंमें श्रेष्ठ हुआ। प्रतिदिन हरपाप नामक कुण्डमें प्रातःकाल स्नान करके तीनों कालमें वह शिवलिंगकी पूजा करता और नित्यप्रति विभूतिसे स्नान करता (सर्वांगमें विभूति लगाता) था। वह शिवलिंग तथा गुरुमें भेद नहीं मानता था। वशिष्ठकी अवस्था बारह वर्षकी थी, उसी समय वह अपने गुरुके साथ केदारतीर्थकी यात्रा करनेके लिये हिमालय पर्वतको गया। असिधार पर्वतपर पहुँचकर तपस्वी वशिष्ठके गुरु हिरण्यगर्भकी मृत्यु हो गयी। उस समय भगवान् शंकरके पार्षद आये और अन्य तपस्वियोंके देखते-देखते हिरण्यगर्भको विमानपर बिठाकर प्रसन्नतापूर्वक कैलासधामको ले गये। यह देखकर तपस्वी वशिष्ठने सब लिंगोंमें केदारलिंगको ही श्रेष्ठ माना। तदनन्तर केदार क्षेत्रकी यात्रा पूरी करके वह काशीपुरीमें लौट आया। यहाँ आकर उसने यह प्रतिज्ञा की कि 'मैं जबतक जीवित रहूँगा, तबतक काशीपुरीमें निवास करता हुआ प्रत्येक चैत्र मासकी पूर्णिमाको भगवान् केदारका अवश्य दर्शन करूँगा।' इस निश्चयके अनुसार उसने बड़े आनन्दके साथ सदा ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक काशीमें निवास करते हुए हिमालयवर्ती केदार क्षेत्रकी इकसठ यात्राएँ पूरी कीं। तदनन्तर चैत्रमास निकट आनेपर उसने पुनः बड़े उत्साहके साथ यात्रा प्रारम्भ की। यद्यपि उसके सिरके बाल सफेद हो गये थे और शरीरपर वृद्धावस्थाका पूरा प्रभाव पड़ चुका था तथा उसके संगी-साथी तपस्वी जनोंने उसे करुणापूर्ण हृदयसे रोका भी, तो भी स्थिर चित्तवाले वशिष्ठका उत्साह भंग नहीं हुआ। उसने सोच लिया था कि 'यदि बीच रास्तेमें मृत्यु हो गयी तो गुरुजीकी तरह मेरी भी गति होगी।' देवि ! तपस्वी वशिष्ठके चित्तकी यह दृढ़ता देख मैं उसपर बहुत सन्तुष्ट हुआ और स्वप्नमें उसे दर्शन देकर कहा—'दृढ़व्रत ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, मुझको ही केदार समझो और मुझसे मनोवांछित वर माँगो। किसी प्रकारका अन्यथा विचार मनमें न लाओ।'
मेरे इस प्रकार कहनेपर वशिष्ठने कहा—देवेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं तो यहाँ मेरे साथ रहनेवाले जितने लोग हैं इन सबपर अनुग्रह करें। उस परोपकारीका यह वचन सुनकर मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ गयी और मैंने कहा 'तथास्तु' ऐसा ही होगा। फिर उसके परोपकारजनित पुण्यसे उसकी तपस्याको मैंने द्विगुणित कर दिया और पुनः उससे वर माँगनेके लिये कहा। तब वशिष्ठने यह प्रार्थना की कि 'आप हिमालयसे यहीं आकर रहें।' उसकी तपस्यासे आकृष्ट होकर मैं कलामात्रसे हिमालयपर रहकर सर्वतोभावेन यहाँ काशीमें आकर बस गया। वशिष्ठको उसके साथियोंसहित आगे करके मैं यहाँ आया और उसपर अनुग्रह करके हरपापकुण्ड-तीर्थके समीप स्थित हुआ। मेरे निवाससे सब लोग हरपापकुण्डमें स्नान, सन्ध्या, तर्पण आदि करके इसी शरीरसे सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। तभीसे मैं साधकोंकी सिद्धिके लिये परम उत्तम अविमुक्त क्षेत्रमें इस केदार लिंगमें स्थित हुआ हूँ। हिमालयपर चढ़कर केदार-शिवका दर्शन करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही काशीमें केदारका दर्शन करनेपर सातगुना होकर मिलता है। हरपापतीर्थ सात जन्मोंके पापोंका नाश करनेवाला
* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८८३
है। और पीछेसे गंगामें मिल जानेसे तो वह करोड़ों जन्मोंकी अघराशिका नाश करनेवाला बन गया है। यहाँ जडताका नाश करनेवाली अमृतस्रवा गंगा है। आगे चलकर मानसरोवरने यहाँ तपस्या की थी। इसलिये यह हरपापतीर्थ मनुष्योंमें मानसतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। जो केदारतीर्थमें स्नान करके बिना उतावलीके पितरोंके लिये पिण्डदान करता है, उसकी अनेक पीढ़ियाँ भवसागरसे पार हो जाती हैं। जब मंगलवारको अमावास्या तिथि हो, उस समय केदारतीर्थमें आकर जो श्राद्ध करता है, उसे गयामें श्राद्ध करनेकी क्या आवश्यकता। एक बार भी केदारेश्वरका दर्शन करके मनुष्य मेरा पार्षद हो सकता है। अतः काशीमें प्रयत्नपूर्वक केदारेश्वरका दर्शन करे। केदारसे उत्तरमें चित्रांगदेश्वर लिंग है। उसकी नित्य पूजा करनेसे मनुष्य स्वर्गीय भोग प्राप्त करता है। केदारके दक्षिण भागमें नीलकण्ठका दर्शन करनेपर मनुष्यको संसाररूपी सर्पके डँस लेनेपर भी उसके विषसे भय नहीं होता। केदारसे वायव्य कोणमें अम्बरीषेश्वर लिंग है। उसका दर्शन करनेसे मनुष्य दुःखसे भरे हुए इस संसारमें गर्भवासका कष्ट नहीं भोगता। उसीके समीप इन्द्रद्युम्नेश्वर लिंग है, जिसकी भलीभाँति पूजा करके भक्त पुरुष तेजोमय विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोककी भूमिमें आनन्दका अनुभव करता है। उसके दक्षिण भागमें कालंजरेश्वर लिंग है, उसका दर्शन करके मनुष्य वृद्धावस्था और कालपर विजय पाकर चिरकालतक मेरे लोकमें निवास करता है। चित्रांगदेश्वरसे उत्तर क्षेमेश्वर लिंगका दर्शन करनेपर इहलोक और परलोकमें सर्वत्र कल्याणकी प्राप्ति होती है।
स्कन्दजी कहते हैं—अगस्त्य! केदारेश्वर लिंगके प्रकट होनेकी यह कथा सुनकर पुण्यात्मा पुरुष क्षणभरमें निष्पाप हो जाता है और अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है।
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श्रीधर्मेश्वर लिंगका माहात्म्य, धर्मपीठका गौरव तथा मनोरथतृतीया व्रतकी विधि और महिमा
**श्रीमहादेवजी बोले—**देवि! जहाँ 'विश्वभुजा' नामसे तुम स्वयं स्थित रहती हो, जहाँ क्षेत्रके विघ्नका नाश करनेवाला तुम्हारा प्रिय पुत्र गणेश 'आशा-विनायक' नामसे प्रसिद्ध होकर रहता है, जिसका दर्शन करके राजा दुर्दम क्षणभरमें धर्मबुद्धि हो गया था उस लिंगका माहात्म्य और उसके आविर्भावका वृत्तान्त मैं तुमसे कहूँगा। पूर्वकालमें विवस्वान्के पुत्र परम संयमी यमने तुम्हारे आगे बड़ी भारी तपस्या की थी। मेरे दर्शनकी तीव्र इच्छासे उन्होंने तपस्या करते हुए एक दिव्य चतुर्युगी व्यतीत कर दी। उनके तपसे सन्तुष्ट होकर मैं उन्हें वरदान देनेके लिये गया और मैंने कहा—'सूर्यनन्दन! वर माँगो।' तब यमराज मुझे प्रणाम करके मेरी स्तुति करने लगे।
**यमराज बोले—**कारणोंके भी कारण शिव! आपको नमस्कार है। आपका रूप कारणसे रहित और कार्यसे भिन्न है, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप निराकार है, तो भी समस्त रूप आपके ही हैं। आप परमाणुस्वरूप तथा पर (कारण) और अपर (कार्य) हैं, कोई भी आपका पार नहीं पा सकता। संसाररूपी महासागरसे आप ही सबको पार उतारनेवाले हैं, आप भगवान् चन्द्रशेखरको नमस्कार है। आपका दूसरा कोई ईश्वर नहीं है, आप ही सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं। आप गुणोंसे रहित हैं, तो भी समस्त गुण आपके ही स्वरूप हैं। आप काल और प्रकृतिसे परे हैं, तो भी आप ही काल और प्रकृतिरूप हैं, आपको नमस्कार है। अनन्तशक्ते! आप ही मोक्षपद प्रदान करनेवाले
८८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
तथा आप ही मोक्षरूप हैं। आप ही आत्मा, परमात्मा और चराचर जगत्के अन्तरात्मा हैं। आपसे ही जगत्की उत्पत्ति हुई है। आप साक्षात् जगत्स्वरूप ही हैं। यह जगत् आपका ही है। आप ही इसके एकमात्र बन्धु हैं। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप होकर इस विश्वकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। वैदिक मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंके लिये आप ही मृड (सुख)-रूप हैं और वेदविरुद्ध पथपर चलनेवाले लोगोंके लिये आप भीम (अत्यन्त भयंकर) हैं। साम्बशिव! आप भक्तोंके लिये कल्याणकारी शंकर हैं। जिनके मन और वचनमें नम्रता है, ऐसे पुरुषोंके लिये आप शिवस्वरूप हैं। जो आपके चरणारविन्दोंकी शरण लेते हैं, ऐसे भक्तोंके लिये आप श्रीकण्ठ हैं—उनपर आयी हुई विपत्तिरूपी हालाहल विषको पी जानेवाले हैं। शान्त! शम्भो! शंकर! चन्द्रकलाविभूषण! पिनाकपाणे! सर्पोंको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, आपको नमस्कार है। प्रभो! वही धन्य है जो आपमें भक्ति रखता है। वही पुण्यात्मा है जो आपकी पूजा करनेवाला है। अनन्तशक्ते! मेरे-जैसा अल्प बुद्धि-वैभवसे युक्त कौन मनुष्य यहाँ आपकी स्तुति कर सकता है। प्राचीन वेदवाणीके लिये भी जो अगम्य हैं, ऐसे आपकी स्तुति केवल नमस्कारमात्र ही है।
स्कन्दजी कहते हैं—ऐसा कहकर यमराजने 'ॐ नमः शिवाय' इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए भगवान् शंकरको सहस्रों बार प्रणाम किया। तदनन्तर परमेश्वर शिवने यमराजको नमस्कारसे रोककर इस प्रकार वरदान दिया—'सूर्यनन्दन! तुम (कर्म और स्वरूपसे तो धर्म हो ही,) नामसे भी 'धर्मराज' हो जाओ। आजसे तुम समस्त चराचर प्राणियोंके धर्माधर्मके निर्णयमें मेरे द्वारा नियुक्त होकर मेरी आज्ञासे सबका शासन करो। तुम दक्षिण दिशाके अधिपति और समस्त जीवोंके कर्मके साक्षी होओ। उत्तम और अधम मनुष्य तुम्हारे दिखाये हुए मार्गसे ही कर्मानुसार गति प्राप्त करें। धर्म! मुझमें भक्ति रखते हुए तुमने जो यहाँ मेरे लिंगविग्रहकी आराधना की है उसके दर्शन, स्पर्श और पूजनसे मनुष्योंको शीघ्र सिद्धि प्राप्त होगी। जो विशुद्ध बुद्धिवाला पुरुष तुम्हारे आगे इस धर्म-तीर्थमें स्नान करके एक बार भी धर्मेश्वरका दर्शन करेगा उसके समस्त पुरुषार्थोंकी सिद्धि उससे दूर नहीं है। जो मनुष्य कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवासपूर्वक धर्मेश्वर तीर्थकी यात्रा करेंगे तथा रात्रिकालमें महान् उत्सवके साथ जागरण करेंगे, वे फिर इस पृथ्वीपर जन्म नहीं लेंगे।'
ऐसा कहकर परम सुखदायक भगवान् शिवने अपने हाथोंसे धर्मराजका स्पर्श किया। उनके करस्पर्शजनित सुखसे आनन्दमग्न हो धर्मराजने महादेवजीसे कहा—'सर्वज्ञ! करुणानिधान! ईश्वर! जब आपका प्रत्यक्ष दर्शन मिल गया तब मुझे दूसरे किसी वरकी क्या आवश्यकता है? नाथ! जिनको वेद भी भलीभाँति नहीं जानते तथा वेद-पुरुष ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं जानते, उनसे भी यदि मैं वर पानेयोग्य हूँ, तो यही प्रार्थना करता हूँ कि ये जो पक्षियोंके मधुर बोली बोलनेवाले बच्चे हैं, जिनका कि मेरे सामने जन्म हुआ है, इनकी उत्पत्तिके समय रोगसे पीड़ित हो इनकी माता शुकी मृत्युको प्राप्त हुई और इनके पिता शुकको बाजने खा डाला है। अनाथनाथ! मेरे द्वारा रक्षित इन असहाय बच्चोंको आप वरदान दीजिये।' अगस्त्य! इस प्रकार धर्मराजका परोपकारयुक्त निर्मल वचन सुनकर शंकरजीने उन पक्षियोंको बुलाया और कहा—'पक्षियो! तुम बोलो, तुम्हारे लिये कौन-सा वरदान देना चाहिये।'
पक्षी बोले—संसारबन्धनका नाश करनेवाले परमेश्वर! आपको नमस्कार है। अनाथनाथ! सर्वज्ञ! त्रिनेत्र! हम पक्षीकी योनिमें जन्म लेकर भी जो आपका प्रत्यक्ष दर्शन कर सके हैं तथा आपकी कृपादृष्टिके भाजन हो सके हैं, इससे बढ़कर मनोवांछित वर और क्या हो सकता
- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८८५
है? गिरीश! लोकमें उद्यम करनेवाले लोगोंको सदा सैकड़ों लाभ मिला करें, परंतु सबसे महान् लाभ यही है कि आपका प्रत्यक्ष दर्शन हो। नाथ! यह जो कुछ दिखायी देता है, सब क्षणभंगुर है। एकमात्र आप ही अविनाशी हैं और आपकी आराधना भी अक्षय है। इन तपस्वीद्वारा की हुई आपके श्रीलिंगकी पूजा देखनेसे इस समय हमें अपने विचित्र-विचित्र करोड़ों जन्मोंका स्मरण हो आया है। महेश्वर! हमने दीर्घकालतक देवयोनिका सुख भी प्राप्त किया है। लीलापूर्वक सहस्रों दिव्यांगनाओंका उपभोग किया है। असुर, दानव, नाग, राक्षस, किन्नर, विद्याधर और गन्धर्वोंकी योनि भी हमने प्राप्त की है। मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर राज्यका भी उपभोग किया है। जलमें जलचर और स्थलमें स्थलचर भी हमें होना पड़ा है। परंतु शम्भो ! इस योनिसे उस योनिमें और उस योनिसे किसी तीसरी योनिमें भटकते हुए हमने कहीं भी किंचिन्मात्र भी सुख नहीं पाया है। इस समय धर्मेश्वरके दर्शनसे और सूर्यनन्दन यमकी तपस्यारूपी अग्निकी ज्वालासे हमारे सारे पाप जल गये हैं और हम आपका प्रत्यक्ष दर्शन करके कृतकृत्य हो गये हैं। भगवन्! अब आप हमें वह ज्ञान प्रदान करें जिससे मायामय बन्धनमें बँधे हुए हम सब लोग उससे मुक्त हो जायँ। हमें इन्द्र, चन्द्र तथा अन्य किसी देवताका लोक नहीं चाहिये। आपका सामीप्य प्राप्त होनेसे हम सब लोकोंकी स्थितिको अच्छी तरह जान गये हैं। समयानुसार आपके आनन्दवन-काशीमें शरीरका त्याग करना संसारबन्धनके विनाशका कारण तथा परम उत्तम ज्ञान है। प्रभो ! तिर्यग्योनिमें पड़े हुए हम पक्षी भी धर्मराजकी तपस्यासे विकल्पहीन ज्ञानके पात्र हो गये हैं।
उन पक्षियोंकी यह बात सुनकर महादेवजीने धर्मपीठके गौरवका वर्णन करते हुए कहा— इस त्रिलोकनगरमें काशी ही मेरा राजभवन है और उसमें भी मोक्षलक्ष्मीविलास नामक मन्दिर (धर्मेश्वरका स्थान) मेरे लिये अत्यन्त सुखप्रद स्थान है। इस शिवालयके व्याजसे आनन्दकन्दका कोई अंकुर ही भूमि फोड़कर प्रकट हुआ है। उपनिषद्की वाणीद्वारा जिस निराकार परब्रह्मका वर्णन किया गया है, वही मैं हूँ। अपने भक्तोंपर कृपा करके साकाररूपसे प्रकट हो गया हूँ। उससे दक्षिण दिशामें मोक्षलक्ष्मीका धामस्वरूप मेरा मण्डप है, उसमें मैं सदा स्थित रहता हूँ। वह मेरा सभामण्डप (दरबार) है। पृथ्वीपर वह स्थान निर्वाणमण्डपके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ एक ऋचाका भी भलीभाँति जप करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण वेदोंके पाठका फल पाता है। जो मुक्तिमण्डपमें षडक्षर मन्त्रका एक बार भी उच्चारण कर लेता है, वह रुद्राध्यायके कोटि बार जप करनेका फल पा लेता है। जो वहाँ निष्कामभावसे मेरे मन्दिरमें धर्मशास्त्र, पुराण और इतिहासका पाठ करता है, वह मेरे लोकमें निवास करता है। मेरे मन्दिरसे पूर्वभागमें जो ज्ञानमण्डप है वहाँ सदा मेरा ध्यान करनेवाले सत्पुरुषोंको मैं ज्ञानका उपदेश देता हूँ। यहाँ काशीमें पग-पगपर अनेक सिद्धपीठ हैं, परंतु धर्मेशपीठकी कोई और ही शक्ति है, जो सबसे श्रेष्ठ है। जहाँ ये छोटे शुकशावक त्रात, त्रात (रक्षा करो, रक्षा करो)—का उच्चारण करते हुए मेरे सदुपदेशसे निर्मल ज्ञानके भाजन हो गये। सूर्यनन्दन धर्म! आजसे मैं तुम्हारे इस उत्तम तपोवन—धर्मेश्वरपीठका कभी त्याग नहीं करूँगा। देखो, मेरी कृपासे ये शुकपक्षी दिव्य विमानपर बैठकर मेरे परम धामको जा रहे हैं।
देवेश्वर भगवान् शंकरके ऐसा कहते ही कैलासशिखरके समान एक विशाल दिव्य विमान आ पहुँचा। वे निर्मल पक्षी दिव्य रूप धारण करके उसी विमानपर बैठे और धर्मराजसे पूछकर कैलासपर्वतपर चले गये।
अगस्त्य! उस आश्चर्यजनक वृत्तान्तको देखकर
८८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जगदम्बा पार्वती ने कहा— महादेव! महेश्वर! इस धर्मपीठका यह माहात्म्य जानकर मैं आजसे धर्मेश्वरके समीपमें ही निवास करूँगी। जो स्त्री अथवा पुरुष इस धर्मेश्वर लिंगमें भक्ति रखनेवाले होंगे, उन सबकी मनोवांछित कामनाओंको मैं सदा सिद्ध करूँगी।
महादेवजी बोले— देवि यह तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। यहाँ तुम विश्वभुजाके नामसे विख्यात होओगी। जो यहाँ तुम्हारी पूजा करेंगे वे समस्त भोगोंसे सम्पन्न एवं सर्वमान्य होंगे। मनोरथतृतीयाको (चैत्र शुक्ला तृतीयाको) जो तुम्हारी भक्तिपूर्वक आराधना करेगा, मेरे अनुग्रहसे उसके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होगी। पूर्वकालमें पुलोमकन्या इन्द्राणीने किसी मनोरथकी प्राप्तिके लिये बड़ी भारी तपस्या की, किंतु उन्हें तपस्याका फल नहीं मिला। तब उन्होंने बड़ी भक्ति और प्रसन्नताके साथ कोकिलाके समान मधुरस्वरसे रहस्ययुक्त गीत गाकर मेरी आराधना की। मृदु, मधुर, ताल-स्वरयुक्त तान, मात्रा और कलासे विशिष्ट उस गानके द्वारा मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैंने उसके पास जाकर कहा—'पुलोमनन्दिनि! मैं तुम्हारे इस सुमधुर गीत और मेरे श्रीविग्रहके पूजनसे प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।'
शची बोली— देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो जो सब देवताओंमें माननीय, सुन्दर और यज्ञकर्ताओंमें श्रेष्ठ हों, वे ही मेरे पति हों। आप मुझे मेरी इच्छाके अनुसार रूप, सुख और आयु प्रदान करें। आपके अर्चाविग्रहकी पूजामें मेरी उत्तम भक्ति सदा बनी रहे और मेरा पातिव्रत्य कभी नष्ट न हो।
पुलोमपुत्री शचीके मनोरथको सुनकर महादेवजीने कहा— तुम व्रतका अनुष्ठान करनेसे पूर्वोक्त मनोरथोंको प्राप्त करोगी। मनोरथतृतीया नामका जो व्रत है, उसके पालनसे मनोरथकी सिद्धि होगी। बीस भुजाओंसे सुशोभित विश्वभुजा नामक गौरीदेवी उस व्रतकी अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हींकी पूजा करनी चाहिये। देवीके आगे वरदायक आशा-विनायकका भी पूजन करना चाहिये। चैत्र शुक्ला द्वितीयाको दन्त-धावन आदि करके सायंकालिक नियमोंका पालन करनेके पश्चात् अधिक तृप्तिपूर्वक भोजन न करके थोड़ा-सा आहार करे। तदनन्तर इस प्रकार नियम ग्रहण करे—'माता विश्वभुजा देवी! तुम्हारी प्रसन्नताके लिये कल प्रातःकाल मैं क्रोधको जीतकर, इन्द्रियोंको संयममें रखकर, अस्पृश्य वस्तुओंके स्पर्शसे दूर रहकर, व्रतमें ही मन लगाये हुए पवित्रतापूर्वक 'मनोरथतृतीया' नामक व्रतका अनुष्ठान करूँगा, इसमें मेरे मनोरथकी सिद्धिके लिये तुम सदा मेरे समीप रहो।'
बुद्धिमान् पुरुष प्रातःकाल उठकर आवश्यक कर्म करके शौच एवं आचमनसे निवृत्त हो अशोक वृक्षका उत्तम दन्तधावन ग्रहण करे। फिर नित्यकी स्नान आदि क्रिया पूरी करके दिनभर उपवास करे। तत्पश्चात् सायंकालमें स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारणकर गौरीजीकी पूजा प्रारम्भ करे। सबसे पहले गणेशजीकी पूजा करके उन्हें घृतपक्व (पूरी, पूआ, घेवर आदि)-का भोग लगावे। तदनन्तर अशोकके सुन्दर फूलोंसे विश्वभुजा देवीकी पूजा करे। पहले कुंकुमसे अनुलेपन करके अशोकवर्ति, नैवेद्य, धूप, अगर आदिसे देवीकी पूजा करनेके पश्चात् एक बार देवीका प्रसाद भोजन करे। इस प्रकार चैत्रकी तृतीया बीत जानेपर वैशाखसे फाल्गुनातक प्रत्येक मासकी शुक्ला तृतीयाको इस उत्तम व्रतका पालन करे। जम्बू, अपामार्ग, खदिर, जाती, आम्र, कदम्ब, प्लक्ष, उदुम्बर, खर्जूर, बीजपूर और दाड़िम (अनार)—इन ग्यारह प्रकारके काष्ठोंका क्रमशः वैशाखसे लेकर फाल्गुनातक व्रतके दिन दातन करे। सिन्दूर, अगर, कस्तूरी, चन्दन, रक्तचन्दन, गोरोचन, देवदारु, पद्माक्ष और दो प्रकारकी हल्दी
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(हल्दी और दारुहल्दी) तथा यक्षकर्दम—इनके द्वारा क्रमशः वैशाख आदि मासोंके व्रतमें देवीको अनुलेपन लगाना चाहिये। यदि पूर्वोक्त सब वस्तुओंकी प्राप्ति न हो तो प्रत्येक मासमें यक्षकर्दम ही उत्तम है। दो भाग कस्तूरी, दो भाग कुंकुम, तीन भाग चन्दन और एक भाग कपूर—इन सबको मिलाकर जो अनुलेपन तैयार किया जाता है उसका नाम यक्षकर्दम है। यह समस्त देवताओंको प्रिय है। गुलाब, बेला, कमल, केतकी, कनेर, उत्पल, राजचम्पा, तगर, चमेली, कुमारी और कर्णिकार—इन पुष्पोंद्वारा वैशाख आदि मासोंमें पूजन करना उचित है। फूल न मिले तो उनके पत्तोंसे ही पूजा करे। फूल और पत्ते दोनों न मिलें तो किन्हीं भी सुगन्धित पुष्पोंसे पूजा की जा सकती है। करम्भ (दधिमिश्रित सत्तू), दही-भात, आमके रससे युक्त मण्डक (मैदेकी एक प्रकारकी रोटी), फेणिक (पानीमें पकाया हुआ चावलका चूर्ण), बटक (बड़ा), शक्कर मिलाया हुआ पायस (खीर), इनका क्रमशः वैशाखसे आश्विनतक भोग लगावे। कार्तिकमें मूँग और घीके साथ भात निवेदन करे। अगहनमें इण्डेरिका (ईंड़हर), पौषमें लड्डू, माघमें लम्पसिका (लपसी) और फाल्गुनमें चीनी भरकर घीमें पकायी हुई पूरियाँ श्रीगणेशजी तथा विश्वभुजा देवीको निवेदन करे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासकी शुक्ला तृतीयाको विश्वभुजा देवीकी आराधना करके व्रतकी पूर्तिके लिये वेदीपर अग्निकी स्थापना करे। तत्पश्चात् अग्निदेवतासम्बन्धी मन्त्रद्वारा तिल और घी आदि द्रव्यसे एक सौ आठ बार होम करे। इस व्रतके लिये सदा रातमें ही पूजा बतायी गयी है। रातमें ही भोजनका नियम है, रातमें ही यह होम होता है तथा रातमें ही देवीसे क्षमा-प्रार्थना की जाती है। प्रार्थनाके लिये मन्त्र इस प्रकार हैं—
गृहाण पूजां मे भक्त्या मातर्विघ्नजिता सह।
नमोऽस्तु ते विश्वभुजे पूरयाशु मनोरथम्॥
नमो विघ्नकृते तुभ्यं नम आशाविनायक।
त्वं विश्वभुजया सार्धं मम देहि मनोरथम्॥
'मातः! आप विघ्नविजयी गणेशजीके साथ मेरी भक्तिपूर्वक की हुई यह पूजा स्वीकार करें। विश्वभुजे! आपको नमस्कार है। आप मेरे मनोरथको शीघ्र पूर्ण करें। आशाविनायक! आप विघ्नोंके स्रष्टा हैं (अथवा विघ्नोंको उच्छेद करनेवाले हैं), आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप विश्वभुजा देवीके साथ कृपा करके मेरा मनोरथ पूर्ण करें।'
इन दोनों मन्त्रोंका उच्चारण करके गौरी-गणेशकी पूजा करनी चाहिये। व्रतके लिये क्षमा-प्रार्थना करते समय पलंग, गद्दा, तकिया, दीवट, दीप और दर्पण देना चाहिये। आचार्यसे प्रार्थना करे—'भगवन्! मैंने मनोरथतृतीयाका व्रत किया है, इसमें जो न्यूनता या अधिकताका दोष आ गया हो वह दूर होकर आपके वचनसे मेरा यह व्रत पूर्ण हो जाय।' इस प्रकार आचार्यसे आज्ञा और आशीर्वाद लेकर गाँवकी सीमातक उन्हें पहुँचा आवे। यथाशक्ति दूसरोंको भी दान दे। फिर अपने परिवारके साथ रात्रिमें प्रसन्नतापूर्वक भोजन करे। प्रातःकाल चतुर्थीको चार कुमारों और बारह कुमारियोंको भोजन कराकर गन्ध, पुष्प, माला आदिसे उनकी पूजा करे। इस प्रकार यह निर्मल व्रत पूर्णताको प्राप्त होता है। मनोरथतृतीयाका यह व्रत करनेसे जिसका जो मनोरथ हो वह पूर्ण होता है।
इस उत्तम व्रतको सुनकर पुलोमकुमारी शचीने उसका पालन किया। इससे उनकी मनोवांछित कामना सिद्ध हुई। जो बुद्धिमान् पुरुष मन लगाकर इस पुण्यमयी कथाको सुनता है, वह शुभ बुद्धिको प्राप्त होता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
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