स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
परिचय एवं पृष्ठभूमि ३७ निजाशुद्धासमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः । यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात्परमं पदम् ॥ (९) ॥ जिस अशुद्धि के कारण क्षोभ उत्पन्न होता है वह भी 'स्व' के द्वारा 'स्व' पर आरोपित है अतः पारमार्थिक या नित्य नहीं है प्रत्युत् स्वकल्पना (स्वलीला, स्वक्रीडा कल्पित है) अतः उसका दूरीकरण भी 'स्व' के द्वारा (उन्मेष के माध्यम से) सहज संभाव्य है । इस विषय में भी कारिकाकार ने 'निज' शब्द का प्रयोग करके अशुद्धि (मल, अज्ञान एवं बंधन) की दुर्निवार्य भयंकरता परवशता, अशक्य संसारोत्तीर्णता पर विराम चिह्न लगाते हुए संकेतित किया है कि इसकी भयानकता कोई परकृत नहीं प्रत्युत् आत्मकृत मात्र है अतः न तो दुर्निवार्य है और न तो यथार्थतः भयानक ही है । सब कुछ 'स्व' की ('निज' की) आरोहण लीला का चमत्कार है । आत्मबल का स्पर्श होते ही यह 'स्व' (निज) (स्पन्द) (या आत्मा) में विलीन हो जाता है । सब कुछ 'स्व' की स्वकल्पित लीला है । 'स्व' का (निज का) या अपना अकृत्रिम धर्म तो—सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वतृप्ति, सर्वव्याप्ति आदि माहेश्वर धर्म हैं क्योंकि 'स्व' स्वयं महेश्वर है— 'तदाऽस्याऽकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः । यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥ १० ॥ सारा प्रापंचिक व्यापार दो अवस्थाओं के मध्य है—१. कार्य २. कारण १. भोग्य २. भोक्ता १. दृश्य २. द्रष्टा १. वेद्य २. वेदक या १. स्मर्त्तव्य २. स्मर्ता और ये सभी 'स्व' (आत्मा) के ही विभिन्न रूप हैं क्योंकि ये 'स्पन्द' (स्व, आत्मा, संवित्) की ही द्विविध अवस्थायें हैं— अवस्था युगलं चाऽत्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ १४ ॥ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत, शुभेच्छा, तनुमानसा, सत्त्वापत्ति, तुर्यगा आदि ज्ञान की सप्तावस्थायें तथा अन्य अनेकविध मानसिक-शारीरिक सभी अवस्थाओं के वैविध्य एवं भेदात्मकता में 'स्व' (स्पन्द, आत्मा, प्रत्यक् चैतन्य) सदैव 'एक' 'अभेद' अद्वैत रूप में स्वक्रीडा करता रहता है । सारी अवस्थायें भी उसीका रूप है किन्तु वह स्वयं अवस्थातीत है । उसकी 'उपलब्धि, (व्यापकता) सर्वत्र है, त्रिकालाबाधित है— 'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी' । (१७) 'स्पन्द' या परमाशक्ति विश्वस्वरूपा है अतः विश्व भी 'स्व' का ही विस्तार है— 'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी' उसकी 'स्फुरत्ता' ही विश्व एवं चक्र की उद्भाविका है—'स्फुरत्तात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ।।' 'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ।।' 'विमर्श' के ही 'दर्पण' में स्वयं 'महाबिन्दु' भी प्रतिबिम्बित होता है— परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे । प्रतिरुचिरुचिरे कुड्ये चित्तमये निविशते महाबिन्दुः ।। (कामकलाविलास)
३८ स्पन्दकारिका 'क्रीडावाद' 'लीलावाद' 'चित्रवाद'—जगत् 'स्व' आत्मा (शक्ति, संवित्, स्पन्द) की लीला मात्र है— हृदयस्थापि लोकानामदृश्या मोहनात्मिका । नामरूपविभागे च या करोति स्वलीलया (ललितोपाख्यान) ।१ लीलावाद—यदि 'स्व' शिव है तो 'स्पन्द' 'संवित्' भी उसी महेश्वर 'स्व' 'आत्मा' की 'लीला' है । 'लोकवत्तु लीला कैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र) भी इसी 'लीलावाद' का प्रतिपादक है । जगत् 'स्व' (शिव) की स्वेच्छा तूलिका से निर्मित (स्वभित्ति पर खींचा गया) एक 'स्व'—स्फार का चित्र है—जो कि 'स्व' की इच्छा से प्रणीत है— चित्रवाद—१) जगच्चित्रं समालिख्य स्वेच्छा तूलिकयात्मनि । स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति परमेश्वरः ॥ (चिद्रल्ली में उद्धृत) २) जगच्चित्रं समालिख्य स्वयमेवात्मविग्रहम् । स्वयमेव समालोक्य सन्तष्टां परमाद्भुतम् ॥ (परावासना) जगत् नित्य 'क्रीडारसोत्सुक महादेव' की विचित्र सृष्टि है— एष देवोऽनया देव्या नित्यं क्रीडारसोत्सुकः । विचित्रान् सृष्टिसंहारान्विधत्ते युगपत्प्रभुः ॥ (चिद्रल्ली)२ क्रीडावाद—इसीलिए तो 'स्पन्दकारिका' में जगत् को क्रीडा कहा गया और जगत् को 'स्व' अर्थात् क्रीडा मानने को ही मुक्ति कहा गया है— (१) इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ (स्पन्द का० ३०) (२) सोऽखिलं समग्रं जगत् क्रीडारामतया पश्यन् विभावयन् नित्ययुक्तत्वाच्च बंध- कारणस्याज्ञानस्य क्षयात् प्रबोधाप्तौ जीवन्नेवेश्वरवन्मुक्तो नाऽत्र संशयः ॥' (स्पन्द- प्रदीपिका) ।३ 'अखिलम् अशेषमनन्तवस्तुव्यक्तिविचित्रं 'जगत्' (३) विश्वं क्रीडात्वेन स्वनिर्मितचराचरभावक्रीडनकापरचितलीलामात्रतया पश्यन् विभावयन् (रामकण्ठाचार्यः स्पन्दकारिका विवृति) । (४) एव स्वभावं यस्य चित्तं 'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति । स सर्वं क्रीडात्वेन पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो न त्वस्य शरीरादि बंधकत्वेन वर्तते ॥ (भट्टकल्लटः स्पं० का० वृत्ति) ।४ अहंतावाद—'परमशिव' 'अहं' 'त्वं' दोनों से शून्य है । जब वह 'अहं' का १. ललितोपाख्यान । २. चिद्रल्ली में उद्धृत । ३. स्पन्द प्रदीपिका (उत्पलाचार्य) । ४. स्पन्दसर्वस्व ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ३९ साक्षात्कार करना चाहता है तब वह विमर्श शक्ति रूपी दर्पण में अपने अहं को देखता है—उसका यह अहंसाक्षात्कार ही जगत् है अतः वह विश्व को अहमाकार देखता है । उसका 'विमर्श' है 'अहमिदम्' अर्थात् 'इदम्' (जगत) 'अहं' ही है—अहं के अतिरिक्त जगत् है ही नहीं—'इदम्' (जगत) अहं का ही एक अंश है । 'अहं' के दो अंश है—१. 'अहं' (आत्मा) २. 'इदम्' (जगत) । 'लीलात्मक विनोदवाद'—जगत् शिव का 'विनोद' है—सकलभुवनोदयस्थिति- लयमयलीलाविनोदोद्युक्तः । अनन्तर्लीनविमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ।। (कामकलाविलास) । 'स्वेच्छावाद' एवं 'इच्छासृष्टिवाद'—ईश्वरस्य जगत्सृष्ट्यादिकं लीलामात्रम् न प्रयोजनमस्तिः स्वेच्छयास्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति । 'स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गि- रत्यपि' । 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।।' स्वभाववाद—जगत् 'स्वभाव' है अर्थात् 'स्व' का भाव है—जीव भी 'स्व' का भाव है । (१) स एव सर्वभूतानां स्वभावः परमेश्वरः । स एव भैरवो देवो जगद्भरणलक्षणः ।। (२) इस परमेश्वर की पराशक्ति भी 'स्वभावामर्शनोत्सुका' है— तस्यैवैषा परा देवी स्वभावामर्शनोत्सुका । पूर्णत्वं सर्वभावानां यस्या नाल्पं न वाधिकम् । 'स्वभाव'—का स्फार ही जीवन एवं जगत् दोनों है । जगत् एवं जीव दोनों 'स्व' के आनन्दात्मक उल्लास हैं—शक्ति के अवभास हैं—शिव के अवरोहण क्रीडा रूप स्वभाव के चमत्कार हैं । सर्वात्मवाद—इन समस्त भावों में आत्मा ही स्फुरित होती है इसीलिए सोमानन्द 'शिवदृष्टि' में कहते हैं— आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निवृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद् दृक्क्रियः शिव ।। अहन्तावाद का विकास—विश्व के समस्त धर्म और दर्शन उपदेश देते हैं कि अहन्ता को निर्मूल करो क्योंकि जब तक 'अहन्ता' (अहंभाव) रहेगा तब तक आध्यात्मिक साधना में उन्नति संभव नहीं हो सकती । साधक परिवार, परिजन, गृह, वसन, भोग, उच्चपद और परिग्रह आदि सभी का परित्याग कर देता है किन्तु अपनी अहन्ता (अहंभाव) का परित्याग नहीं कर पाता । जब तक 'अहं' रहेगा तब तक 'इदम्' रहेगा ही और जब तक अहं-इदं का द्वैत बना रहेगा तब तक पूर्णत्व, शिवत्व, मुक्ति, कैवल्य या मोक्ष की कोई संभावना नहीं है ।
४० स्पन्दकारिका काश्मीरीय 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' की दृष्टि—संपूर्ण त्रिक दर्शन 'अहन्तावाद' में आस्था रखता है। ये दर्शन यह मानते हैं कि अहन्ता का विकास ही मुक्ति का साधन है। जो साधक अपनी अहन्ता का जितना ही उच्च से उच्चतर विकास करेगा वह उतनी ही आध्यात्मिक उन्नति करेगा तथा उतना ही अधिक पूर्णत्व, शिवत्व एवं परमपद के निकट पहुँचेगा। 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' दर्शन की मान्यता है कि जिसने अहन्ता को उच्चतम शिखर तक पहुँचा दिया है वह साक्षात् शिव है—वह 'चक्रेश्वर' है—वह 'परमात्मा' है—वह 'शक्तिमान' है—वह अद्वैत पर ब्रह्म है। 'अहन्ता का सत्स्वरूप'—'विरूपाक्षपञ्चाशिका' (विश्वशरीर स्कंध) में तो यहाँ तक कहा गया है कि 'ईश्वरता' 'कर्तृत्व' 'चित्स्वरूपता' का भी स्वस्वरूप 'अहन्ता' है। 'ईश्वरता कर्तृत्व स्वतन्त्रता चित्स्वरूपता चेति। एतेऽहन्तायाः किल पर्यायाः सद्बिरुच्यते ।।' (१।८) इसीलिए इसमें कहा गया है कि सर्वत्र 'अहन्ता' धारण करे— 'बिन्दुं प्राणं शक्तिं मनइन्द्रियमण्डलं शरीरं च। आविश्य चेष्टयन्ती धारय सर्वत्र चाहन्ताम् ।।' (१।७) संपूर्ण विश्व में अहन्ता (अहंभाव) धारण करना विश्वात्मभाव—'विश्वोऽहं' का भाव एवं उसकी अखण्ड अनुभूति ही तो मोक्ष है। संपूर्ण विश्व में अपनी अहन्ता का विराट् प्रसार देखना विश्वात्मभाव है किन्तु विश्व के किसी एक अंश में अहंभाव धारण करना जीवन्मृतत्व है— 'उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठताहन्तः। कण्ठलुण्ठत्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ।।' 'ईश्वरता' 'सर्वज्ञता' सर्वकर्तृता, स्वतन्त्रता, चित्स्वरूपता 'शिवोऽहं' की भावना— 'पूर्णाहन्ता' के पर्याय हैं। ये बंधन नहीं महामुक्ति के पर्याय हैं। अहन्ता का शुद्ध परामर्श—'विश्वाहन्ता' या 'पूर्णाहन्ता' ही साधना के विकास का चरम सोपान है। जिस प्रकार शरीर में ही अहन्ता (अस्मिता) का प्रत्यय या अनुभूति प्रमाता को (मितात्मा को) जड़ हाथों से भी कार्य कराने की शक्ति प्रदान कर देता है उसी प्रकार यदि चेतनतत्त्व में अहन्ता का आधान किया जाय तो निश्चल पर्वतों को भी चलायमान एवं संचालित किया जा सकता है— देहेस्मिततया यद्रुज्जडडोरास्फालनं मिथोः बाह्वोः । इच्छामात्रेणेत्यं गिर्योरपि तद्द्शाज्जगति ।। (वि०प०६) यौगिक सिद्धियाँ अपूर्ण ख्याति हैं। शिवता का समावेश पूर्ण ख्याति है। विमर्श के द्वारा इदन्ता का अहन्ता में लय करके विश्वात्मभाव से सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व आदि स्वयं आविर्भूत विभूतियों से संवलित परमैश्वर्य की संप्राप्ति करना ही समस्त उपदेशों का सार है। इसके द्वारा 'यामलीसिद्धि' का वर्णन किया गया है—
परिचय एवं पृष्ठभूमि ४१ 'अहो संसारसुखकेलि अहो सुलभं मोक्षमार्गे सौभाग्यम् । त्रुटितान्तककलंका अहो शिवयोगिनां यामलीसिद्धिः ।। 'महार्थमंजरी' इदन्ता-अहन्ता के ऐक्य से समुत्पन्न पूर्णाहन्ता स्वरूप संवित् का साक्षात्कार (प्रत्यभिज्ञान) । भास्करराय 'प्रकाश' ('वरिवस्यारहस्यम्' की व्याख्या) में कहते हैं कि— 'इच्छामि' 'जानामि' इत्यादि उदाहरणों में प्रथम पुरुष की वर्तमानता एवं उसमें भासमान स्फुरणान्वयि अहं का ज्ञान ही प्रकाशाभिध ब्रह्म है । यह सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व, सर्व- कर्तृत्व, पूर्णत्व, एवं सर्वव्यापकत्व आदि से संवलित है । उसका आनन्दरूपांश ही 'स्फुरण' है, वही 'अहन्ता' है, वही 'विमर्श' है, वही परा ललिता भट्टारिका त्रिपुर- सुन्दरी है— 'अत्रेयं तांत्रिकप्रक्रिया—'इच्छामि' 'जानामि' इत्यादावुत्तम पुरुषान्तर्भासमानं स्फुरणान्वयि ज्ञानमेव प्रकाशाभिधं ब्रह्म । तच्च सर्वज्ञत्व-सर्वेश्वरत्वसर्वकर्तृत्व-व्यापकत्वादि शक्तिसंवलितम् । तस्य चानन्दरूपांश एव स्फुरणं परा अहंता, विमर्शः, परा ललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरीत्यादि पदैर्व्यवह्रियते ।' 'अहन्ता' साक्षात् भगवती महात्रिपुरसुन्दरी हैं । 'अहन्ता' शिव का 'आत्मविमर्श' है—स्फुरत्ता है—पराशक्ति है—शिव का आत्मधर्म है और सर्वेश्वर शिव की आधीन आत्मभूता 'शक्ति' है । 'विश्वरूपो महेश्वरः' ('प्रत्यभिज्ञाकारिका') की महेश्वरता महेश्वर में देखना 'स्पन्द'—'प्रत्यभिज्ञा' का लक्ष्य नहीं है प्रत्युत् (१) महेश्वरता (२) विश्वरूपता इन दोनों की अपने में अनुभूति कर—'महेश्वरोऽहं' 'विश्वोऽहं' की अनुभूति करना ही 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' का लक्ष्य है । यदि चिदात्मा के साथ तादात्म्य प्राप्त करना ही पूर्णता है तो उसके 'विश्वोऽहं' के विमर्श के साथ ही तदात्मता प्राप्त करनी होगी क्योंकि वह केवल 'विश्वातीत' ही नहीं 'विश्वमय' भी है— 'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजात प्रकाशयेत् ॥ (प्र०का०१।३८) 'इच्छया भासयेद् बहिः ।' (प्र०का० ५९) समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा (महेश्वर) अवस्थित है अतः निखिल विश्व में अखण्ड अहं की अनुभूति, अखण्डित रूप में अहं का आमर्श शिव का (महेश्वर का) स्वभाव है, स्वरूप है— स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः । विश्वरूपोऽहमित्येवमखण्डामर्शबृंहितः ॥ (प्रत्यभिज्ञा का० ४।१) उस महेश्वर के साथ तादात्म्य प्राप्त करने हेतु साधक को भी 'विश्वोऽहं' का विमर्श करना आवश्यक है । साधक में दो भाव होने चाहिए—१. सोऽहं २. 'ममायं विभव' (सोऽहं ममायं विभव इत्येवं परिजानतः) (प्रत्य० का० ४।१२) विश्वात्मनो विकल्पानां
४२ स्पन्दकारिका प्रसरेऽपि महेशता' (प्रत्य०का० ४।१२) 'पूर्णााहन्ता' है क्या? 'संविदः स्वात्ममात्र- विश्रान्तिः स एव पूर्णााहन्ताविमर्शस्वभावोऽहंभावो' (उत्पल—अजडप्रमातृसिद्धि) । शैवशास्त्र में ७ प्रमाता माने गए हैं जो निम्न है— प्रमाता ┌──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┐ शिव मन्त्रमहेश्वर मन्त्रेश्वर मन्त्र विज्ञानाकल प्रलयाकल सकल (मायीयमल १ मल) (२ मल) (३ मल) पूर्णााहन्ता—'विज्ञानभैरव' में इन प्रमाताओं में से मात्र 'शिव' एवं 'परमशिव' में अहन्ता के आधान का उपदेश दिया गया है—'मित' प्रमाता को अमितप्रमाता बनने का, अपूर्ण को पूर्ण बनने का, पशु को पशुपति बनने का या जीव को शिव बनने का यही मार्ग है । यही 'पूर्णााहन्ता' (शिवोऽहं) स्वरूप है तथा विश्वोऽहं के साथ तादात्म्य है । 'अहं' एवं अहन्ता का यथार्थ स्वरूप—अकार और हकार विमर्श और प्रकाश हैं । इन दोनों के सामरस्य से 'अहं' निष्पन्न होता है । यही 'अहं' अकार से हकार पर्यन्त समस्त मातृकाओं एवं अकार शिव एवं हकार शक्ति का समन्वित रूप है । 'श्वेतबिन्दु' शिवात्मक है और 'रक्तबिन्दु' शक्त्यात्मक है । ये दोनों एक दूसरे में प्रविष्ट होते हैं । रक्त एवं श्वेत बिन्दु के समागम से तृतीय-'मिश्रबिन्दु' का आविर्भाव होता है । यही 'अहं पद' है । इसी अहं में अकार से हकार पर्यन्त समस्त वर्ण राशि समाहित है । 'चिद्वल्ली' में कहा गया है—'महामन्त्रमयीपूर्णााहन्तामयी प्रकाशानन्दसारा बिन्दुत्रयसमष्टि भूतदिव्या- रसरूपिणी कामकला नाम महात्रिपुरसुन्दरी' ।। 'त्रिपुरसुन्दरी पूर्णााहन्तामयी है । अद्वयसंपत्तिकार वामननाथ कहते हैं कि अहंभाव उपादेय है न कि हेय । तपस्वीराज कहते हैं कि अहंकार एक पिशाच है । मानव-रक्त को चूसने वाला है । मानव की सद्बुद्धि का आच्छादक है, किन्तु मानव के द्वारा भगवान् की शरण में जाने पर यही अहंकार यही उसका सेवक बन जाता है— 'अहमितिपिशाच एष त्वत्स्मृतिमात्रेण किंकरीभवति ।' जब व्यक्ति यह सोचता है कि 'मैं अकेला हूँ, मेरा कोई सहायक नहीं है' तब वह भयभीत रहता है किन्तु जब वह यह सोचता है कि 'मैं अकेला ही तो इस संसार में हूँ । यह सब कुछ मुझसे पृथक् थोड़े हैं'—तब वह निर्भय होकर घूमता है—'एकोऽहमिति संसृतौ जनस्त्रास साहसरसेन खिद्यते एकोऽहमिति कोऽपरोऽस्ति मे इत्यमस्मि गतभी- र्व्यवस्थितः ।।' 'विमर्शदीपिका' में कहा गया है कि विश्वात्मक होते हुए भी विश्वोत्तीर्ण, स्वतन्त्र, दिव्य, अक्षर तत्त्व ही 'अहं' नाम से कहा जाता है । इस प्रकार के 'अहं' तत्त्व में धारणा स्थिर हो जाने पर भय किसको स्पर्श कर पाता है? 'विश्वात्मा विश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् । अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेति कः ?'
परिचय एवं पृष्ठभूमि ४३ जो साधक विश्व को अपनी क्रीडा मानता है अर्थात् अपनी लीला मानता है और इस प्रकार 'विश्वोऽहं' के विमर्श से परिपूर्ण है उसे ही जीवन्मुक्त कहते हैं अर्थात् जगत् को अपनी क्रीड़ा समझने की 'संवित्ति' ही जीवन्मुक्ति' है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत्। स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ (द्वि० ३०) उत्पलाचार्य कहते हैं—'सोऽखिलं समग्रं जगत् क्रीडारामतया पश्यन् विभाव- यन्नित्युक्तत्वाच्च बन्धकारणस्याज्ञानस्य क्षयात् प्रबोधाप्तौ जीवन्नेवेश्वरवन्मुक्तो नाऽत्र संशयः ।।' ('स्पन्दप्रदीपिका' का० ३०) । रामकण्ठाचार्य ('स्पन्दकारिका वृत्ति' में) कहते हैं—कि ऐसी संवित्ति रखने वाला योगी समस्त माहेश्वर शक्तियों को प्राप्त कर लेता है—'सर्वव्यापक सर्वात्मक सर्वेश्वर- स्वतन्त्रस्वभावाहंकार प्रतिपत्तिदार्थेन जन्मादिविरोधात निष्क्रान्तः परमेश्वर एव संवृत्त इति ।। 'अशेषमनन्तवस्तुव्यतिरिक्तं विचित्रं जगत् विश्वं क्रीडात्वेन स्वनिर्मितचराचरभाव क्रीडनकोपरचितलीलामात्रतया पश्यन् विभावयन्'–'एवं सर्वं कीडात्वेनैव पश्यन् जीव- न्नेव मुक्तः ।।' 'कामकलाविलास' में कहा गया है कि— पूर्णाहन्तात्मभावेन कृत्रिमाहन्तया विना । आत्मानमात्मना साक्षाद्यः पश्यति स पश्यति ।। (काम० ५) अहंता की विभिन्न भूमिकायें— अहन्ता की मुख्यतः तीन भूमिकायें हैं—१. अहं के अभाव की भूमिका, २. मितप्रमाता के संकुचित अहं की भूमिका, ३. परमशिव के अहं की भूमिका । १. अहं के निषेध की भूमिका—तत्वमंजरीकार कहते हैं कि 'यदि मै कुछ होऊँ—तब मुझे इधर-उधर, जहाँ-तहाँ से भय हो सकता है किन्तु यदि मैं ही कुछ न हूँ तो फिर भय किसका?' । बौद्ध भी यही कहते हैं— सत्यात्मनि परसंज्ञा स्वपरविभागे च रागविद्वेषौ । अनयोः संप्रतिबद्धाः सर्वे दोषाः प्रजायन्ते ।। (प्र०वा० १।२२१-२२२) अर्थात् अपनी आत्मा के रहने पर दूसरी आत्मा की बात उठती है । 'यह अपना है यह पराया है? —ऐसी कल्पना हो जाने पर अपने से राग एवं दूसरे के प्रति विद्वेष उत्पन्न होने लगते हैं । इस राग-द्वेष से जुड़े छोटे-बड़े दोष उत्पन्न हो जाते हैं । इसीलिए बौद्ध कहते हैं कि—'आत्मा ध्वंसो हि मोक्षः' । (स०द०सं०) । बौद्धों का यह आत्माभाववाद उनकी दृष्टि में पूर्णत्व है—निर्वाण है किन्तु स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा इस दृष्टि को स्वीकार नहीं करते ॥ २. परिमित (संकुचित) अहं की भूमिका—सारे माया बद्ध प्राणी शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, विषय आदि संकुचित देश में अपने अहं को तदाकार रूप में अनुभव करते हैं । यही संकुचित अहं उन्हें पशुपति से पशु बना देता है । यही उनके
४४ स्पन्दकारिका बंधन एवं संसरण का कारण है। मित प्रमातृत्व, मित अहंता जीव से उसके शिवत्व (भैरवभाव) को छीन लेती है। यह अहंता हेय है। यह शुद्ध परामर्श की नहीं अशुद्ध परामर्श की क्षुद्र (संकुचित) अहन्ता है। श्लाघ्य अहन्ता का स्वरूप ‘विज्ञानभैरव’ (८४) में इस प्रकार दिया गया है— ‘सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः । स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो भवेत् ॥ (प्रथम प्रत्यभिज्ञा की धारणा-८४) ३. शिव के अहं की भूमिका—‘पूर्णाहन्ता’ ‘विश्वाहन्ता’ प्रत्यभिज्ञा दर्शन में ‘प्रत्यभिज्ञा’ के निम्न दो प्रकारों का विवेचन किया गया है— १. प्रथम प्रत्यभिज्ञा—मैं शुद्धबोधस्वरूप शिव हूँ । २. द्वितीय प्रत्यभिज्ञा—समस्त जगत् मेरा ही अपना विस्तार है। अहन्ता एवं प्रत्यभिज्ञा—इन दोनों प्रकार की प्रत्यभिज्ञाओं के उदित होने पर साधक ‘विश्वमय’ हो जाता है। इस स्थिति में उसके चित्त में विकल्पों का प्रादुर्भाव होने पर भी वह अपनी शिवावस्था में ही प्रतिष्ठित रहता है— प्रथम प्रत्यभिज्ञा— ‘सोऽहं ममायं विभव इति प्रत्यभिजानतः । विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥ (४।१।१२) शिवोपाध्याय—१. ‘मैं शुद्धस्वरूप हूँ’—प्रत्यभिज्ञा के इस अंश पर धारणा के स्थिरीकरण की विधि यह है कि साधक यह भावना करे कि स्वातंत्र्यादिक शिव धर्मों से युक्त सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, व्यापक परमेश्वर मुझसे पृथक् नहीं है—ये सभी मेरे ही धर्म हैं।’—इस प्रकार के दृढ़ निश्चय से साधक शिव बन जाता है। प्रथम प्रकार की प्रत्यभिज्ञा उदित हो उठती है और समस्त अवस्थाओं में उसका शिवस्वरूप निरन्तर अनुस्यूत रहता है। द्वितीय प्रत्यभिज्ञा— २. ‘यह जगत् मेरा ही विस्तार है’—प्रत्यभिज्ञा के इस द्वितीय अंश पर धारणा के स्थिरीकरण हेतु यह भावना करनी चाहिए— ‘जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभंग्यः प्रभा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभंग्यो विभेदिताः’ ॥ १०८ ॥ अर्थात् जैसे जल की लहरें जल से ही उठती हैं, अग्नि की ज्वालाएं अग्नि से ही निकलती हैं या जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य से ही उत्पन्न होता है उसी प्रकार स्वात्मस्वरूप भैरव से ही चलना-फिरना, भोजन, हवन, दान, प्रसारण, निर्गमन प्रभृति इस विश्व की समस्त विचित्रताएँ प्रकट होती हैं। इस धारणा में दृढ़ता आने पर योगी इस समस्त विश्व में अपने ही शिवस्वरूप का साक्षात्कार करता है।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ४५ १. नादसृष्टिवाद—१. चिणि, २. चिणिचिणी, ३. घण्टानाद, ४. शंखनाद, ५. तन्त्रीनाद, ६. भेरीनाद, ७. तालनाद, ८. वेणुनाद, ९. मृदंगनाद ('कामकलाविलास') 'स्वच्छन्दतन्त्र' के अनुसार—१. घोष, २. राव, ३. स्वन, ४. शब्द, ५. स्फोट, ६. ध्वनि, ७. झांकार, ८. ध्वंकृति = ८ नाद। पद्मपादाचार्य के अनुसार वाणी के ५ और ७ पद हैं— सप्तपदीवाणी—१. शून्य, २. संवित्, ३. सूक्ष्मा, ४. परा, ५. पश्यन्ती, ६. मध्यमा, ७. बैखरी (स्पन्दकारिका दे० 'स्वरूपावरणे... प्रत्ययोद्भवः') पञ्चपदीवाणी—१. सूक्ष्मा, २. परा, ३. पश्यन्ती, ४. मध्यमा, ५. बैखरी । 'शून्य' = स्पन्दहीन, अनुत्पन्न वाक् । 'संवित्' = उत्पन्न होने की इच्छा वाली वाक् । 'सूक्ष्मा'—उत्पत्यवस्था । 'परा' = मूलाधार में प्रथमोदित ।। (प्र०सा०टीका) २. सर्वशिववाद—आचार्य सोमानन्दपाद कहते हैं कि 'विश्व' शिव का ही एक रूप है— 'तस्मादनेकभावाभिः शक्तिभिस्तदभेदतः । एक एव स्थितः शक्तः शिव एव तथा तथा ।।' (शिवदृष्टि) ठीक भी है क्योंकि—'न सावस्था न यः शिवः ।।' (स्पन्दसूत्र) तथा— 'यत्तसत्तपरमार्थो हि परमार्थस्ततः शिवः । सर्वभावेषु चिद्व्यक्तेः स्थितैव परमार्थता ।।' (शिवदृष्टि) 'तद्वत्सर्वपदार्थानां जगत्त्यैक्ये स्थितः शिवः । तस्मात्सर्वं शिवात्मकम्' (शिवदृष्टि) ।। 'विश्व' परमात्मा के चिदाकाश रूप स्वांग में एक आलेख्य है— 'चिदाकाशमये स्वांगे विश्वालेख्यविधायिने' (शिवदृष्टिवृत्ति) 'स्तवचिन्तामणि' (श्लोक ५) में भी जगत् को पारमेश्वर चित्र कहा गया है— 'निरुपादानसंभारमभित्तावेन तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने ।।' अर्थात्— शिव महान् कलाकार है और उसकी तूलिका का ही चमत्कार है यह 'जगत' ।। ३. अद्वैतवादी काश्मीरीय शैवदर्शन का उद्देश्य—विश्वशिवैक्यवाद की अनुभूति है— (i) The title of the work (शिवदृष्टि = शैवदर्शन) is significant enough to express clearly what he wants to bring home to his readers. i.e.—realisation of the whole universe as the manifestation of one absolute Reality called Siva the all blissful.' (मधुसूदन कौल शास्त्री) ।
४६ स्पन्दकारिका (ii) The purpose of the body of his book : “What constitutes the essential identity of every being and what therefore is self- evident is Siva as an ever-running stream of desire, as a spontaneous flow of cognition and activity, as happiness and intelligence and as all pervasive” (मधुसूदन कौल शास्त्री) । (iii) यह दर्शन पूर्णतया अद्वैतवादी है क्योंकि प्रारंभ में ही सोमानन्दपाद ने ‘अस्मद्रूप समाविष्टः’ कहकर अपने को शिव के साथ अभिन्न घोषित करते हुए कहा है— “Let Siva who is one in substance with us often his obeisant to Siva, who has materialized his own nature in the form of universe by his own native power for success in overcoming the obstacle with the help of the triple agency of Mind, Tongue and body.” ‘अस्मद्रूपसमाविष्टः स्वात्मनात्मनिवारणे । शिवः करोतु निजया नमः शक्त्या ततात्मने ॥’ (शिवदृष्टि) ४. सर्वात्मवाद—प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द दोनों दर्शन सर्वात्मवादी हैं— आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद् दृक्क्रियः शिवः ॥ (शिवदृष्टि) ‘सर्वभावेषु स्वात्मैव शिव व्यवहर्तव्यमिति प्रतिज्ञा । निवृत्तचिदित्यादिविशेषण- कलापो हेतुः । स्फुरन्नपि धर्मिणो हेतोश्च स्वसंवेदनप्रत्यक्षप्रमाणम् ।।’ (शिवदृष्टिवृत्ति— उत्पलदेवाचार्य) ।। ५. इच्छाज्ञानक्रियाभेदवाद— ‘तदिच्छातावत्ती तावज्ज्ञानं तावत्क्रिया हि सा ॥’ (शिवदृष्टि) सोमानन्दं एवं स्पन्द दार्शनिक—दोनों इसे मानते हैं । ६. शब्दसृष्टिवाद— अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥¹ उत्पलदेव कहते हैं— ‘पश्यन्तीरूप शब्दतत्त्वमक्षरमनाद्यन्तं ब्रह्मविश्वार्थभावेन विवर्तते ।।’² बिना वाणी के तो ब्रह्म का प्रकाश भी प्रकाशित होना संभव नहीं है— ‘वाग्रूपतां बिना न ब्रह्मतत्त्व प्रकाशोऽपि प्रकाशेत् ।’ (शिवदृष्टिवृत्ति) यद्यपि ‘ईश्वराद्वयवादी’ ‘शब्दपरब्रह्माद्वयवाद’ को स्वीकार न करके ‘ईश्वराद्वय- वाद’ की स्थापना करते हैं फिर भी शब्दसृष्टिवाद मानते हैं— १. शिवदृष्टि में उद्धृत । २. शिवदृष्टिवृत्ति (उत्पलदेव) ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ४७ 'ईश्वराद्वयवाद' एव युक्तियुक्तो न तु 'शब्दब्रह्माद्वयवाद' इति वक्तुं वैयाकरणोपेत शब्दाद्वैतं तावन्निराकर्तुमुपक्रममाण आह— अथास्माकं ज्ञानशक्त्या सदा शिवरूपता । वैयाकरणसाधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः । (२।१)¹ 'वाक्यदीय' में भर्तृहरि—कहते हैं कि जगत् एक 'अर्थ' है अर्थ 'वाच्य' है और 'शब्द' वाचक है । जगत् एवं शब्द में वाच्यवाचक संबंध तो है किन्तु यथार्थ सत्ता की दृष्टि से तो जगत् शब्द का 'विवर्त' (असत् में सत् का भ्रम, अतत्वतो प्रथा') है अर्थात् जगत् मूलतः शब्द है न कि स्वतन्त्र पदार्थ । 'पराशक्ति' 'परावाक्' के रूप में एवं परावाक् 'पश्यन्ती' के रूप में, पश्यन्ती 'मध्यमा' के रूप में एवं मध्यमा 'बैखरी' के रूप में विकसित होती है और यही बैखरी विश्वविग्रहा है—'बैखरी विश्वविग्रहा' । 'अहं' (अ से ह = शिव + शक्ति) में ही सारी वर्णसमष्टि एवं निखिल जगत् अवस्थित है । जगत् अहमाकार है । 'कामकला' अहमाकार है । 'स्पन्द' में शक्ति-प्राधान्य—'स्पन्दशास्त्र' में 'स्पन्द' (आत्मशक्ति, चित् शक्ति, इच्छाशक्ति, स्वातंत्र्यशक्ति, संवित्शक्ति) का प्राधान्य है इसीलिए इस शास्त्र का नाम भी स्पन्दशास्त्र भी है । इसका शक्ति-प्राधान्य प्रतिपाद संगत भी है क्योंकि—'तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति' (वरिवस्यारहस्यम्) शिव-शक्ति-अभेदवाद—'शिव शक्तिरिति ह्येकं तत्त्वमाहुर्मनीषिणः ।' 'शिवाभिन्ना पराशक्तिः' 'न शिवेन विनादेवी न देव्या च बिना शिवः' इन दोनों में चन्द्रमा एवं चन्द्रिका के सम्बन्ध की भाँति ऐक्य है—'नानयोरन्तरं किंचिच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव' । महेश्वर एवं जीवात्मा का ऐक्य—निखिल जगदात्मा, सर्वोत्तीर्ण, सर्वमय, विकल्पों से असंकुचित, संवित्प्रकाशरूप, अनवच्छिन्नचिदानन्दविश्रान्त, अविरल प्रसरण- शील, विचित्र पञ्चवाहवाहवाहिनीमहोदधि, निरतिशयस्वातंत्र्य से प्रगल्भमान, सर्वशक्ति- खचित एकात्मक, अद्वैत समस्त शक्तियों से उपहित संविदात्मा महेश्वर ही अपनी स्वातंत्र्यशक्ति की महिमा से अपने को संकुचित की भाँति आभासित करते हुए अणु (जीव) कहलाते हैं—'स च भगवान् स्वातंत्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्मानं संकुचितमिव आभासयन् अणुः उच्यते । यथोक्तम्— 'व्योपको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्तसंकोचमुद्रणात् । विचित्रफलकर्मौघवशात्तत्तच्छरीरभाक् ॥ 'अतिदुर्धटकारित्वात्स्वाच्छन्द्यान्निर्मलादसौ । स्वात्मप्रच्छादनक्रीडा पण्डितः परमेश्वरः ॥ (जन्ममरणविचार—भट्टवामदेव) १. शिवदृष्टि ।
४८ स्पन्दकारिका 'चिदानन्दलाभ' एवं 'समापत्ति' : 'स्पन्दकारिका' में 'आत्मग्रह' 'आत्मोदय' 'परामृतस्य' एवं 'समापत्ति' प्राप्त करने का प्रतिपादन किया गया है। 'स्पन्दशास्त्र' प्रतिपादित चरमोपलब्धि 'जीवन्मुक्ति'— यह 'समापत्ति' क्या है? आचार्य क्षेमराज 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं— 'मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः स एव च परमयोगिनः समावेश समापत्त्यादि पर्यायः समाधिः तस्य नित्यो-दितत्वे युक्तिमाह—समाधिसंस्कारवति व्युत्थाने भूयो भूयश्चिदैक्या- मर्शात्रित्योदित समाधि लाभः (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्) ॥ इसी चिदानन्द की प्राप्ति के पश्चात् देहादिक की अनुभूति होने पर भी चित् शक्ति के साथ एकात्मता-प्रतिपत्ति की दृढ़ता से 'जीवन्मुक्ति' की प्राप्ति होती है— चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्तिदार्ढ्या जीवन्मुक्तिः ॥ (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्ः 'शक्तिसूत्र' : १६) 'स्पन्दप्रदीपिका' में भी इसी जीवन्मुक्ति को चरम उपलब्धि स्वीकार करते हुए कहा गया है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥' जब ऐश्वर्यशक्ति 'मध्यधाम (सुषुम्नापथ) के उल्लास रूप उदान शक्ति एवं विश्व- व्याप्तिसारभूत व्यानशक्ति को जिसे क्रमशः आनन्दघनरूप 'तुर्यदशा' एवं चिद्घनरूप तुर्यातीतदशा कहा जाता है—उन्मीलित करती है तब देहादि अवस्था में भी पति- दशात्मक 'जीवन्मुक्ति' उपलब्ध होती है। 'तुर्यदशारूपां तुर्यातीतदशारूपां च चिदानन्दघनाम् उन्मीलयति तदा देहाद्यवस्थाया- मपि पतिदशात्मा जीवन्मुक्तिर्भवति ।।' (प्र०हृ०)। त्रिकदर्शन 'सालोक्य' 'सामीप्य' 'सायुज्य' आदि मुक्तियों को स्थान न देकर 'जीवन्मुक्ति' को महनीय स्थान देते हुए उसे ही यथार्थ मुक्ति मानता है— १. पशुमात्रस्य सालोक्यं सामीप्यं दीक्षितस्य तु । तत्परस्य तु सायुज्यमित्याज्ञा पारमेश्वरी ॥ २. यस्तूर्ध्वशास्त्रगस्तत्र व्यक्तास्थः संशयेन सः । व्रजेदायतनं नैव स फलं किंचिदश्नुते ॥ दीक्षायतन विज्ञानद्वेषिणो ये तु चेतसा । आचरन्ति च तत्ते वै सर्वे निरयगामिनः ॥ (नरकगामी होते हैं) ये च स्वभ्यस्तविज्ञानमयाः शिवमया हि ते । जीवन्मुक्तो न तेषां स्यान्मृतौ कापि विचारणा ॥ ('जन्ममरणविचार' में उद्धृत) माया एवं शक्ति में अभिन्नता—'माया' शिव की शक्ति है न कि अनिर्वचनीय भ्रान्ति तत्त्व है—आचार्य शंकर ने 'माया' को मिथ्या भी कहा है किन्तु इसे सत्-असत्-
सदसदनुभय से परे भी मानकर ‘अनिर्वचनीय’ भी कहा है। इसे ब्रह्म से असमवेत एवं जड़ माना है। यह सांख्य की प्रकृति की जड़ता से ग्रस्त है और मात्र अज्ञान भी उद्भाविका है यह सृष्टि-व्यापार की संचालिका आदि भी है किन्तु पारमार्थिक सत्य नहीं है। ‘स्पन्द’ एवं प्रत्यभिज्ञा दर्शन में ‘माया’ भी चिद्रूपा स्वातंत्र्य शक्ति का अवरोहणात्मक रूप है। चितिशक्ति ही—‘ज्ञान, क्रिया’ एवं ‘माया’ बन जाती है। ज्ञान, क्रिया एवं माया ही सत्व, रज एवं तम बन जाते हैं। भगवान् की ‘क्रियाशक्ति’ (सर्वकर्तृत्व) अल्पकर्तृत्व बन जाती है और ‘कार्ममल’ का प्रसव करती है। ‘सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व एवं व्यापकत्व ‘कला’ ‘विद्या’ ‘राग’ ‘काल’ एवं ‘नियति’ (पञ्चकञ्चुक) बन जाते हैं। संवित् ही प्राण बन जाता है—‘प्राक् संवित् प्राणे परिणता’ ‘न सावस्थान यः शिवः’ (स्पन्दकारिका) ऐसी कोई अवस्था ही नहीं है जो शिव न हो। वाक् तत्त्व, अहन्ता और विश्व में तादात्म्य—‘अहन्ता’ समस्त मन्त्रों के उदय. और विश्रान्ति के स्थान भी हैं यह महती वीर्यभूमि है। (प्र०हृ०) परमात्मा और स्वात्मा तथा जगत् एक ही सत्ता के विभिन्न रूप हैं। आचार्य क्षेमराज कहते हैं—‘श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं’ (सूत्र ४ की व्याख्या) ‘अहं’ में ‘इदम्’ के अवस्थान की विभिन्न स्थितियाँ— १. ‘सदाशिवतत्त्व’ में—अहन्ताच्छादित और अस्फुट इदन्तात्मक ‘परापर विश्व’ ग्राह्य है। (सदाशिव भट्टारकाधिष्ठित ‘मन्त्रमहेश्वर वर्ग प्रमाता परमेश्वरेच्छा’ कल्पित है)। २. ‘ईश्वरतत्त्व में—स्फुट इदन्ता और अहन्ता का सामानाधिकरण्य जैसा विश्व ग्राह्य है (ईश्वरभट्टारक से अधिष्ठित ‘मन्त्रेश्वर वर्ग’ ग्राहक है)। ३. ‘विद्यापद’ में—श्रीमदनन्तभट्टारक से अधिष्ठित मन्त्ररूप ग्राहक है और भेदात्मक विश्व ग्राह्य है। शुद्ध विद्याः सामानाधिकरण्यं च सद्विद्यामिदं धियोः। (ईश्वर- प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (३।१) सामनाधिकरण्य रूप है)। स्वतन्त्र चिद्घनसंवित्स्वरूप, अनुत्तरविग्रह, परमेश्वर जब अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति द्वारा, अखिल जगत् की रचना के लिए किंचित् चलानात्मक दशा का अनुभव करते हैं तो उस प्रथम ‘स्पन्द’ को ही तत्त्वज्ञ ‘शिवतत्त्व’ कहते हैं— ‘यदद्यमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम्। मन्त्रवर्णात्मकाः सर्वे सर्वे वर्णाः शिवात्मकाः ॥’ ‘नादसिद्धान्त’— चित्प्रकाश से अभिन्न, नित्योदित, महामन्त्ररूप, पूर्ण ‘अहं’ विमर्शात्मक जो यह ‘परावाक् शक्ति’ है जिसके गर्भ में ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक वर्णात्मक समग्र शक्ति चक्र विद्यमान है वही ‘पश्यन्ती’ एवं ‘मध्यमा’ के क्रम से ग्राहक भूमिका को आभासित करता है। पूर्ण होने से इसे ‘परा’ एवं प्रत्यवमर्श द्वारा विश्व का अभिलाप करने से इसे ‘वाक्’ कहा गया है— स्पं.भू. ३
५० स्पन्दकारिका 'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता । स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मतः ॥ (ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका अ० १। आ० ५) 'पूर्णत्वात् परा, वक्ति विश्वं अभिलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक् ॥ (ई० प्र० वि०) 'पश्यन्ती' परावाक् की उत्तरवर्ती वाच्यवाचकात्मकविश्व विकास की द्वितीय कोटि है । १. 'पश्यति सर्वं स्वात्मनि कारणानां सरणिमपि यदुत्तीर्णा । तेनेयं पश्यन्तीत्युत्तीर्णेत्यप्युदीर्यते माता ॥ (सौभाग्य सुधोदय) २. पश्यन्तीव न केवलमुत्तीर्णा नापि बैखरीव बहिः । स्फुटतर निखिलावयवा वाग्रूपा मध्यमा तयोरस्मात् ॥ वर्णों के अष्ट वर्ग की अधिष्ठात्री देवियाँ— | 'ब्राह्मी'-क वर्ग | 'माहेश्वरी'-च वर्ग | 'कौमारी'-ट वर्ग | 'वैष्णवी'-त वर्ग | | 'वाराही'-प वर्ग | 'ऐन्द्री'-य वर्ग | 'चामुण्डा'-श वर्ग | 'महालक्ष्मी'-अ वर्ग | इसी शब्द राशि से समुत्थित शक्ति वर्ग के भोग हैं जीव और इसी भोग्यता के कारण वे पशु बन जाते हैं— शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ (स्पन्द० ४५) अद्वैतवादी दृष्टि का वैलक्षण्य— स्वरूपावरण में भी शब्द एवं शाब्दी शक्तियाँ ही कारण हैं— 'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः । यतः शब्दानुरोधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥ (स्पन्दकारिका० ४७) शांकर अद्वैत भी अद्वैत है और माहायानिकों का शून्याद्वैत एवं विज्ञानवादियों का विज्ञानाद्वैत भी अद्वैत है किन्तु स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का अद्वैत उनसे भिन्न है उसमें दो का अभिन्न सामरस्य है और इसका ब्रह्माद्वैत से मतवैषम्य है—क्षेमराज कहते हैं 'इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्यः अयमेव विशेषः ।' [४] शिव और शक्ति तत्त्व एवं शिव तथा शक्ति— प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द दर्शन में मुख्यतः दो तत्त्व स्वीकृत हैं और वे हैं—१. शिव, २. शक्ति । तात्त्विक दृष्टि से तो दो नहीं एक तत्त्व है और वह है 'परमशिव' क्योंकि 'शक्ति' उसका स्वभाव है, धर्म है उसका मुख है—'शैवी मुख मिहोच्यते ।' यह वह तत्त्व है जो कि शिव में समवेत दृष्टि से अन्तर्लीन है । इसीलिए 'कामकलाविलास' में कहा गया है—
परिचय एवं पृष्ठभूमि ५१ 'सकल भुवनोदय स्थिति लयमय लीला विनोदुक्तः । अन्तर्लीन विमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्र तनुः ॥ (१)' भेदात्मक दृष्टि से देखने पर प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द में ३६ या ३७ तत्त्व स्वीकृत हैं किन्तु ये सभी शिव-शक्ति के स्फार हैं । 'शान्तब्रह्मवाद' एवं 'शिवाद्वयवाद'—शाङ्कर वेदान्त का निर्गुण, निराकार सृष्टि- स्थिति-संहार आदि व्यापारों से रहित शान्त ब्रह्म स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा को स्वीकार्य नहीं है । वे 'शिवाद्वयवाद'—प्रतिपादक हैं । 'शिव' और 'शक्ति'—प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द का शिव पञ्चकृत्यकारी है—'स्पन्द- कारिका' की प्रथम कारिका में इसी पक्ष की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा गया है— 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ । तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥ इसके पाँच कार्य निम्नांकित हैं—१. सृष्टि, २. स्थिति, ३. संहार, ४. तिरोधान एवं ५. अनुग्रह । (१) 'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्य विधायिने । चिदानन्दघनस्वात्म परमार्थविभासिने ।।' (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्) (२) 'सृष्टि संहार कर्तारं विलयस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।। (स्वच्छन्दतन्त्र, प्र०पटल) इसके अतिरिक्त १. आभासन, २. रक्ति, ३. विमर्शन, ४. बीजावस्थापन एवं ५. विलापन भी उसके कार्य हैं— (क) 'तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति' (प्र०हृ० १०) । (ख) 'आभासनरक्तिविमर्शनबीजावस्थापनविलापनतस्तानि ।।' प्रमाताओं की दृष्टि से सर्वोच्च प्रमाता 'शिव' है—(प्र०हृ० ११) और उसके स्फारस्वरूप ७ प्रमाता हैं— १. सत्य प्रमाता 'शिव' 'परप्रमाता' २. सदाशिवतत्त्वाश्रित प्रमाता = 'मन्त्र- महेश्वर' ३. ईश्वरतत्त्वावस्थित प्रमाता 'मन्त्रेश्वर' ४. शुद्धविद्यातत्त्वावस्थित प्रमाता 'मन्त्र' ५. शुद्धविद्या तत्त्व से नीचे एवं मायोपरि स्थित प्रमाता = 'विज्ञानाकल' ६. माया- तत्त्वावस्थित प्रमाता—प्रलयाकल, प्रलय केवली ७. माया प्रमाता, परिमित प्रमाता, संकुचित प्रमाता—'सकल' (जीव) ॥ शिव का अपर पर्याय है 'प्रकाश' एवं शक्ति का 'विमर्श', 'विमर्श' शिव का अहमाकार विमर्शन है और जगत् उसी का विराट् 'अवभासन' है । शिव की शक्तियाँ—शिव में अनन्त शक्तियाँ हैं किन्तु उन्हें पाँच वर्गों में वर्गीकृत किया गया है जो निम्न हैं—१. 'चितिशक्ति' २. 'आनन्दशक्ति' ३. 'इच्छाशक्ति' ४. 'ज्ञानशक्ति' एवं ५. 'क्रियाशक्ति' । 'शक्ति' अपने भीतर समस्त चराचर का बीज स्थित
५२ स्पन्दकारिका रखकर सृष्टि का अवभासन करती है और यही शिव का दर्पण है— ‘सा जयति शक्तिराद्यानिजसुखमयनित्यनियमाकारा । भाविचराचरबीजं शिवरूप विमर्श निर्मलादर्शः ॥’ (का०) स्वातंत्र्यवाद—‘स्वातंत्र्य’ शिव की पराशक्ति है। ‘आनन्द’ इसका अपर पर्याय है। परमात्मा की इच्छा का अनभिहत प्रसार ही स्वातंत्र्य है—‘स्वातंत्र्यं च नाम यथेच्छं तथेच्छाप्रसरस्य अविघातः (ई० प्रत्यभिज्ञा वि०)। यह दुर्घटकारित्व है—‘एतदेव स्वातंत्र्यं दुर्घटकारित्वम् ॥ परमात्मा का यही दुर्घटकारित्व ‘नित्योदित परावाक्’ है। अविभक्त या अन्तर्लीन विमर्शात्मक शिव ही ‘परमशिव’ है ‘स्वातंत्र्य’ का प्रसार ही जड़चेतन जगत् है। [५] जीव तत्त्व जीव परमार्थतः शिव है। शिव एवं जीव में निम्न भेद है— ‘स्वांगरूपेषु भावेषु प्रमातो कथ्यते पतिः । मायातो नेदिषु क्लेश कर्मादिक्लुषः पशुः ॥’—उत्पलदेव विकल्प-ज्ञान ‘परामृतरस’ एवं ‘स्वातंत्र्य’ दोनों जीव से छीन लेता है। (स्पन्दका० ४६)॥ भगवान् स्वस्वातंत्र्य शक्ति की महिमा से अपने को संकुचित की भाँति आभासित करते हुए ‘अणु’ या जीव कहलाता है—अर्थात् पशुत्व भी शिव की एक लीला या आत्मप्रच्छादन क्रीडा है—एक आभासन है— ‘इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरुपचर्यते, स च भगवान् स्वातंत्र्य- शक्तिमहिम्ना स्वात्मान संकुचितमिव आभासयन् अणुः’ इति उच्यते। ‘व्यापको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्तसंकोचमुद्रणात् । विचित्रकलकर्मोदिवशात्तत्त- च्छरीरभाक्’ शिव की स्वात्मप्रच्छादन-क्रीडा ही उसे जीव बना देती है। शिव एवं जीव में परमार्थतः कोई भेद नहीं है।¹ वह भगवान् अपनी मायाशक्ति के द्वारा (अपनी स्वातंत्र्यशक्ति से अभिन्न रहकर भी) अपने द्वारा अपने को संकुचित जैसा अवभासित करता हुआ। १. ‘विज्ञानाकल’ २. ‘प्रलयाकल’ ३. एवं ‘सकल’ बन जाता है। (क) ‘विज्ञानाकल’ : एकमलोपेत । (ख) ‘प्रलयाकल’ : मलद्वयोपेत ॥ (ग) ‘सकल’ : मलत्रयोपेत ॥² ‘पञ्चकंचुक’ शिव को मलावृत करके एवं उसके स्वातंत्र्य को संकुचित करके मलावृत संसारी बना देता है। शाब्दी शक्ति भी उसे ‘पशु’ बनाने में योग देती है। इसलिए ‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है— १-२. जन्ममरणविचारः (वामदेव)।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ५३ १. शब्दराशि समुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् सपशुः स्मृतः ॥१ २. स्वरूपावरण के लिए शाब्दीशक्तियाँ उत्तरदायी हैं— 'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिता' ३. 'क्रियाशक्ति' ही अज्ञात होने की दशा में बंधन का कारण है किन्तु ज्ञात होने पर सिद्धियाँ प्रदान करती हैं— 'सेयं क्रियात्मिकाशक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी । बंधयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका ॥२ आत्मा पर चढ़े हुए पञ्चावरण एवं वाग्योग— अन्नमयकोश । 'स्पन्दकारिका' प्राणमय कोश । में 'शब्दराशि मनोमय कोश । समुत्थस्य...पशुः विज्ञानमय कोश । स्मृतः' (४५. वि०स्पन्द) आनन्दमय कोश । कहकर शब्द को मल एवं पशुत्व का कारण माना गया है । आत्मा (५ चहर-दीवारो की कारा में बन्द बद्धात्मा) । (१) अ० कोश की शुद्धि—आसन । तप । प्राणायाम । तत्त्वशुद्धि । (२) प्रा० कोश की शुद्धि—बंध । मुद्रा । प्राणायाम । (३) मनो० कोश की शुद्धि—जप । त्राटक । तन्मात्रा साधना । ध्यान । (४) वि० कोश की शुद्धि—सोऽहं की साधना, स्वर संयम, ग्रंथिभेद आत्मानुभूति । (५) आ० कोश की शुद्धि—नाद-साधना, बिन्दु-साधना, कला । प्रकाशांशरूपरौद्री + विमर्शांशरूप क्रिया का योग—'बैखरीवाक्' = 'रौद्रीशक्ति' ।। 'परावाक्' = चित्शक्ति ।—(पदार्थदर्श) । बैखरी वाक्-विखर (शरीर)— अर्थात् शरीरोद्भवा, शरीरेन्द्रियपर्यन्त चेष्टासंवादिका वाणी बैखरी है—'विखरः शरीरं तत्र भवा तत्पर्यन्तचेष्टासंपादिका इत्यर्थः ।। (ई०प्र०वि०वि० १।५) १.-२. स्पन्दकारिका ।
५४ स्पन्दकारिका [चित्र: परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी वृत्त-चित्र] १. अनाहत वाक् परावाक् । (परा) ↓ (चिन्मय वाक्) । २. अनाहत वाक् पश्यन्तीवाक् । (पश्यन्ती) ↓ (चिन्मय वाक्) । ३. अनाहत वाक् मध्यमावाक् । (मध्यमा) ↓ (चिन्मयवाक्) । ४. आहत वाक् वैखरीवाक् । (वैखरी) (जड़ वाक्) । (१) विवक्षात्मक अनुसंधान = सूक्ष्म बैखरी (२) स्फुटवर्णों की उत्पादिका = स्थूल बैखरी (३) अनुपाधिमान चिदात्मक = पररूप बैखरी [सोपान-चित्र:] परावाक् / पश्यन्तीवाक् / मध्यमावाक् / वैखरीवाक् बैखरी: स्थूल, सूक्ष्म, पर —तन्त्रालोक (तृ०आ०२४६) पञ्चशक्तियाँ एवं वाक्चतुष्टय 'योगिनीहृदय' (चक्रसंकेत)— १. आत्मनःस्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला । अम्बिका रूपमापन्ना परावाक समुदीरिता ॥ (१।३६ यो०हृ०) । २. बीजभावस्थितं विश्वं स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी । वामाविश्वस्य वमनादंकुशाकारतां गता ॥ (यो०हृ० १।३७) ३. इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुषा स्थिता । ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमा वागुदीरिता ॥ (१।३८) ४. ऋजुरेखामयी विश्वस्थितौ प्रथितविग्रहा । तत्संहतिदशायां तु बैन्दवं रूपमास्थिता ॥ (१।३९) प्रत्यावृत्तिक्रमेणैवं शृंगाटवपुरुज्ज्वला । क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं बैखरी विश्वविग्रहा ॥ (योगिनीहृदय १।४०) १. इच्छाशक्तिर्वामाशक्ति-सामरस्यमापन्ना पश्यन्तीरूपेण स्थिता । २. ऋजुरेखामयी अत्र शृंगाटाग्ररेखाकारा मध्यमा वागुदीरिता मध्यमामातृका- त्वमापन्ना ॥ ३. बैखरीविश्वविग्रहा वाग्रूपप्रपञ्चमयबैखरीरूपा जाता ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ५५ सृष्टि = एक क्रीड़ा है—'हर्षानुसारी स्पन्द' है—सोमानन्दः 'शिवदृष्टि' 'यथा नृपः सार्वभौमः प्रभावामोदभावितः । क्रीडन्करोति पादातधर्मांस्तद्धर्मधर्मतः । तथा प्रभुः प्रमोदात्मा क्रीडत्येवं तथा तथा ।। (शिवदृष्टि) । हर्षानुसारी स्पन्दः क्रीडा ।। (सोमानन्द) ।। परोपादाननिरपेक्ष इच्छासृष्टिवाद— योगिनामिच्छया यद्वन्नानारूपोपपत्तित । न चास्ति साधनं किंचिन्मृदादीच्छां विना प्रभोः । तथा भगविदच्छैव तथात्वेन प्रजायते ।। (शिवदृष्टि) सर्वशिववाद— 'एवं सर्वेषु भावेषु यथा सा शिवरूपता ।। 'सर्वस्य शिवरूपत्वस्' (शिवदृष्टि) एवं सर्व पदार्थानां समैव शिवता स्थिता ।।' (सोमानन्द) (अण्ड चतुष्टयात्मक) विश्व— [चित्र: अण्ड-मण्डल — शाक्ताण्ड, मायाण्ड, प्रकृत्यण्ड, ब्रह्माण्ड, पिण्ड] [वृत्त १: शिव तत्त्व / शान्त्यातीत / कला] — अण्ड-हीन [वृत्त २: शाक्ताण्ड / शान्ति / कला] — शुद्धाध्वा में स्थित । मायोपरि । ज्योतिर्मय शुद्ध सत्त्वात्मक । शुद्ध विद्या । सदाशिव एवं ईश्वर = उपादान तत्त्व । [वृत्त ३: मायाण्ड / शान्ति / कला] — एक मायाण्ड में असंख्य प्रकृत्यण्ड स्थित है । [वृत्त ४: प्रकृत्यण्ड / प्रतिष्ठा / कला] — १. असंख्य । २. जल तत्त्व से प्रकृति पर्यन्त । ३. प्र० में असंख्य ब्रह्माण्ड है । ४. उपादान—जल से प्रकृति तत्त्व समूह । [वृत्त ५: ब्रह्माण्ड / निवृत्ति / कला] — १. असंख्य । २. $\rightarrow$ १४ लोक (पुराण) (७ ऊर्ध्व + ७ अधोलोक) [वृत्त ६: रिक्त] — जगत—'कदाचिदात्म प्रच्छादनात्मकाभेदाख्यातिमयीं संसार रूपां भ्रान्तिं क्रीडामेव कथंचन तथा स्वभावत्वात् कुर्वतो'—सोमानन्द । (१) मायोपरिस्तर पर संक्षुब्ध 'बिन्दु' $\rightarrow$ नाद-ज्योति (वाच्य वाचक अध्वा) (२) वाचकाध्वा में—वर्ण, पद, मन्त्र । (३) वाच्याध्वा में— (क) कला, (तत्त्व, भुवन) $\downarrow$ शान्त्यातीत शान्ति विद्या प्रतिष्ठा निवृत्ति (ख, ग) तत्त्व भुवन । । ३६ असंख्य
५६ स्पन्दकारिका वैष्णव, शैव एवं बौद्ध— १. वै० शैव = शुद्ध जगत् होता है । २. बौद्ध = अनाश्रव धातु शुद्ध जगत् है । (माहायानिक बौद्ध) विश्व = भूमित्रय ┌───────────────┬───────────────┐ अभेदभूमि भेदाभेदभूमि भेदभूमि │ │ │ अहं प्रत्यय (अहमिदम्) (इदमहम्) (अहमस्मि) (‘व्यपदेष्टुमशक्यासौ अकथ्या परमार्थतः ।’—वि०भै०) (न यहाँ शिव, न शक्ति न विश्वामयता और न विश्वोत्तीर्णता—किसी का भी पता नहीं है) यहाँ ‘इदम्’ का सर्वथा अभाव है । परतत्त्व और जगत— ‘यत् पर तत्त्वं तस्मिन् विभाति का षट्त्रिंशदात्म जगत् ।।—(‘परमार्थसार’) औन्मुख्य → इच्छाशक्ति → (परमेश्वर का विश्वचिकीर्षा रूप परामर्श या इच्छात्मक विमर्श)—(शिवदृष्टिवृत्ति) । ‘इच्छाशक्ति’—परमेश्वर की बहिरुल्लिलासयिषा = परमेश्वर के ऐश्वर्य (आनन्द) का चमत्कार या उसका विश्वात्मक भाव से उल्लसित होने की अभिलाषा! इच्छाशक्ति । इच्छाशक्ति का विकसित होकर विश्व रूपी कार्य के प्रकाशन की शक्ति बनने पर उसकी अभिख्या = ‘ज्ञानशक्ति’ ।। ज्ञान प्रक्रिया के दो रूप—१. ‘ज्ञानशक्ति’ ।। ज्ञान प्रक्रिया के दो रूप—१. ज्ञातृरूप । २. ज्ञेयरूप ।। (चिदात्मा ज्ञाता + ज्ञेय रूप । (चिदात्मा ज्ञाता
- ज्ञेय रूपों में अपना अवभासन करता है ।) ज्ञातृ + ज्ञेय दोनों रूपों का अव-भासन करके जो शक्ति ज्ञान कराती है वही ‘ज्ञानशक्ति’ है ।। शिव की इच्छा का अन्तर्मुख स्पन्द = ‘ज्ञानशक्ति’ और शिव का बहिर्मुख स्पन्द = ‘क्रियाशक्ति’ । शिव जिस शक्ति के द्वारा विश्वात्मकभाव से नाना पदार्थों का भेदावभासन करता है उस ‘भासना’ को ही ‘क्रियाशक्ति’ कहते हैं । समस्त विश्वस्फार = क्रियाशक्ति का स्वरूप है । इच्छा—शिव के विमर्श (स्वातंत्र्य) का प्रकाश (स्वरूप परामर्श) ही उसकी चिकीर्षारूपा इच्छा है । परमशिव का शक्ति पचक ┬ ┬ ┬ ┬ ┬ चित् आनन्द इच्छा ज्ञान क्रिया शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति (प्रकाश = (आनंद अंश चिदंश + प्रकाशांश (प्रकाश+ विमर्श) का चित् अंश) = विमर्श) सामरस्य = परमभाव (शिवभाव) (शक्तिभाव)