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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( २८७ ) रहित ) ब्रह्म की चर्चा ही समाप्त हो जायगी । तथा सभी शरीरों में एक ही जीव का साम्राज्य होगा ( जीव की भिन्नता भी समाप्त हो जायगी ) चौथी कल्पना में जब जीव को ब्रह्म से भिन्न माना गया है तब, जीव के भेद की औपाधिकता समाप्त हो जाती है ( अर्थात् उपाधि संबंध से संभाव्य भेद की चर्चा समाप्त हो जाती है ) अंतिम पांचवी कल्पना तो चार्वाक मत में ही हो सकती है । इसलिए अभेद शास्त्र की बलवत्ता से, सारे भेदों की अविद्यामूलकता ही स्वीकारनी होगी । प्रवृत्ति या निवृत्ति रूप प्रयोजन के प्रकाशक वेदांत वाक्यों की प्रामाणिकता, ब्रह्म के स्वरूपावबोध में, ध्यानविधिपरक होने से ही चरितार्थ होती है । तदप्ययुक्तम्—ध्यानविधिशेषत्वेऽपि वेदांतवाक्यानामर्थसत्यत्वे प्रामाण्यायोगात् । एतदुक्तं भवति-ब्रह्मस्वरूपगोचराणिवाक्यानि किं-ध्यानविधिनैकवाक्यतामापन्नानि ब्रह्मस्वरूपे प्रामाण्यं प्रत्य- पद्यन्ते, उत् स्वतंत्राण्येव ? एकवाक्यत्वे ध्यानविधिपरत्वेन ब्रह्म- स्वरूपे तात्पर्यं न संभवति । भिन्नवाक्यत्वे प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजन- विरहादनबोधकत्वमेव । न च वाच्यम्- ध्यान नाम स्मृतिसंतति- रूपम् । तच्च स्मर्त्तव्यैकनिरूपणमिति ध्यानविधेः स्मर्त्तव्यविशेषा- कांक्षायाम् “इदं सर्वं यदयमात्मा” ब्रह्म सर्वानुभूः” सत्यंज्ञानमनंतं- ब्रह्म” इत्यादीनि स्वरूप तद्विशेषादीनि समर्पयंन्ति । तेनैकवाक्या- तामापन्नान्यर्थ सद्भावेप्रमाणमिति । ध्यानविधेः स्मर्त्तव्यविशेषापेक्ष- त्वेऽपि “नामब्रह्म” इत्यादि दृष्टिविधिवदसत्येनाप्यर्थविशेषेण ध्यान- निर्वृत्युपपत्तेः ध्येय सत्यत्वानपेक्षणात् । अतोवेदांतवाक्यानां प्रवृत्ति- निवृत्ति प्रयोजन विधुरत्वात् ध्यानविधिशेषत्वेऽपि ध्येयविशेषस्वरूप समर्पणमात्रपर्यवसानात् स्वातंत्र्येऽपि बालातुराद्युपच्छन्दनवाक्यवत् ज्ञानमात्रेणैव पुरुषार्थपर्यन्तता सिद्धेश्च परिनिष्पन्नवस्तुसत्यता गोचरत्वाभावात् ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वं न संभवतीति प्राप्तम् । ankurnagpal108@gmail.com

( २८८ ) उक्त कथन भी युक्ति संगत नहीं है--वेदांत वाक्यों की ध्यानविधि शेषता होते हुए भी, पदार्थ सत्यता का कोई प्रमाण नहीं मिलता । कथन यह है कि--ब्रह्म स्वरूप बोधक वाक्य, ध्यानविधि के साथ, एकवाक्यता प्राप्त कर, ब्रह्म स्वरूप के प्रकाशन में प्रमाणित होते हैं, अथवा स्वतंत्र रूप से होते हैं ? ( यह विचारणीय विषय है ) एक वाक्यता में होने से, जब वह ध्यानविधि परक हैं, तो, ब्रह्म स्वरूप के ज्ञापन में उनका तात्पर्य नहीं हो सकता यदि वह स्वतंत्र रूप से होते हैं तो, प्रवृत्ति निवृत्ति रूप प्रयोजन रहित होने से, उनमें सत्यार्थ बोधकता का अभाव है ही । यह नही कह सकते कि-स्मृति प्रवाह ही ध्यान है और वह केवल स्मर्त्तव्य रूप से ही निरूप्य है । स्मर्त्तव्य विशेष उस ध्यानविधि के निरूपण की आकांक्षा होने पर “यह सारा दृश्य आत्मा ही है” यह आत्मा ही सर्वानु- भावक ब्रह्म है “ब्रह्म सत्य-ज्ञान-अनंतस्वरूप है” इत्यादि वेदांत वाक्य ब्रह्म स्वरूप और ब्रह्मगत विशेष भावों का प्रकाश करते हैं; क्या ये ध्यानविधि के साथ एकवाक्यता को प्राप्त कर प्रतिपाद्य अर्थ की सत्यता को प्रमाणित करने में प्रमाण हो सकते हैं ? ध्यानविधि की स्मर्त्तव्य सापेक्षता होते हुए भी—“मन की ब्रह्म रूप से उपासना करनी चाहिए” इत्यादि दृष्टि विधि की तरह, असत्यवाक्यार्थ द्वारा भी जब ध्यान क्रिया निष्पन्न हो सकती है तो, ध्यानकार्य में, ध्येय पदार्थ की, थोड़ी भी सत्यता अपेक्षित नहीं है । इसलिए वेदांत वाक्यों के, प्रवृत्ति निवृत्ति प्रयोजन रहित होने से, ध्यानविधिशेषता होते हुए भी, ध्येयविशेष के स्वरूप प्रकाशन में ही पर्यवसित होने से, स्वतंत्र होते हुए भी, अर्भक और रोगियों को फुसलाने वाले वाक्यों की तरह, वाक्यार्थमात्र से ही, पुरुष के वास्तविक प्रयोजन की सिद्धि हो पाती है, स्वतः सिद्ध वस्तु की सत्यता के बोधन में, शास्त्र की सामर्थ्य नहीं है । इसलिए ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणता संभव नहीं है । [L2

( २८६ ) परताविरहान्न प्रयोजनपर्यवसायीति ब्रुवाणो “राजकुलवासिनः पुरुषस्य कौलेयककुलाननुप्रवेशेन प्रयोजनशून्यता” ब्रूते । उक्त प्रस्तुत मत के उत्तर में “तत्तुसमन्वयात्” सूत्र कहा गया है। समन्वय का तात्पर्य है, सम्यक् रूप से अन्वय, अर्थात् यथोपयुक्त रूप से पुरुषार्थ के साथ संबद्ध निस्सीम, निरतिशय, ब्रह्म ही, परमपुरुषार्थ हैं, ऐसा समस्त वेदांत वाक्यों का वाच्यार्थ है, ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता, इसी से निश्चित होती है। निर्दोष, अत्यंत आनंदस्वरूप प्राप्य ब्रह्म के बोधक, वेदांत वाक्य, प्रवृत्ति-निवृत्ति परक न होने से, निष्प्रयोजन हैं, ऐसा कहना “राजकुलवासी व्यक्ति, म्लेच्छ के घर निष्प्रयोजन नहीं जाता” इस कथन के समान ही है। एतदुक्तं भवति-अनादिकर्मरूपाविद्यावेष्टनतिरोहितपरावर तत्त्वयाथात्म्यस्वस्वरूपावबोधानां देवासुरगंधर्वसिद्धविद्याधरकिन्नर किंपुरुषयक्ष राक्षसपिशाचमनुजपशुशकुनसरीसृपवृक्षगुल्मलतादूर्वादीनां स्त्रीपुंन्नपुंसकभेदभिन्नानां क्षेत्रज्ञानांव्यवस्थितधारकपोषकभोग्य विशेषाणां मुक्तानां स्वस्य चाविशेषाणामनुभवसंभवे स्वरूपगुणविभव चेष्टितैरनवधिकातिशयानन्दजननं परंब्रह्मास्तीति बोधयदेव वाक्यं प्रयोजनपर्यवसायि । प्रवृत्तिनिवृत्तिनिष्ठं तु यावत्पुरुषार्थान्वयबोधं न प्रयोजनपर्यवसायि । कथन यह है कि—अनादिकाल से प्रवृत्त कर्मरूप अविद्यामय आवरण से, परब्रह्म और अपरब्रह्म का यथार्थभाव, तथा अपना प्रत्यक्स्वरूपता का ज्ञान तिरोहित है, एवं जिनके देहधारण पोषणोप- योगी भोग्य विषय सुव्यवस्थित हैं, उन स्त्री, पुरुष, नपुंसकभेदों से विभिन्न, देवता-असुर-सिद्ध-विद्याधर-किन्नर - किंपुरुष-यक्ष - राक्षस-पिशाच-मनुष्य- पशु-पक्षी-सर्प-वृक्ष-गुल्म-लता-दूर्वा आदि रूपों वाले जीवों का, अनुभव भी जब, मुक्त जीवों और अपने में समानरूप से हो सकता है, तो स्वरूप- गुण-वैभव-चेष्टा आदि में बेजोड़, अतिशय आनंदजनक परब्रह्म के अस्तित्व के प्रतिपादक वेदांत वाक्य निश्चित ही प्रयोजनावसायी (सार्थक) ankurnagpal108@gmail.com

हैं। प्रवृत्ति निवृत्ति बोधक वाक्य, पुरुष के परिमित अभीष्ट प्रतिपादक होते हुए भी, वास्तविक प्रयोजन (आत्यंतिक दुःख निवृत्ति रूपी मुक्ति) के साधन में समर्थ नहीं हैं। एवंभूतं ब्रह्म कथं प्राप्यत इत्यपेक्षायां “ब्रह्मविदाप्नोतिपरम्” आत्मानमेवलोकमुपासीत “इति वेदनादिशब्दैरुपासनं ब्रह्मप्राप्त्युपाय- तया विधीयते। यथा “स्ववेश्मनि निधिरस्ति” इति वाक्येन निधि- सद्भावं ज्ञात्वा तृप्तःसन् पश्चादुपादाने च प्रवर्त्तते। यथा च— कश्चिद्राजकुमारो बालक्रीडासक्तो नरेन्द्रभवनान्निष्क्रान्तो मार्गाद्- भ्रष्टो नष्ट इति राज्ञा विज्ञातः स्वयं चाज्ञातपितृकः केनचिद्द्विज- वर्येण वर्धितोऽधिगतवेदशास्त्रः षोडशवर्षः सर्वकल्याणगुणाकरः तिष्ठन् “पिता ते सर्वलोकाधिपतिः गाम्भीर्यौदार्यवात्सल्यशौशौल्य वीर्यपराक्रमादिगुणसंपन्नः त्वामेवनष्टं पुत्रं दिदृक्षुः पुरवरेतिष्ठति” इति केनचिदभियुक्ततमेन प्रयुक्तं वाक्यं शृणोति चेत्, तदानीमेव— “अहं तावत् जीवतः पुत्रः मत्पिता च सर्वं संपत्समृद्धः” इति निरति- शयहर्षसमन्वितो भवति। राजा च स्वपुत्रं जीवन्तमरोगमति मनोहरदर्शनं विदितसकलवेद्यश्रुत्वाऽवाप्तसमस्तपुरुषार्थो भवति। पश्चात्तदुपादाने च प्रवर्त्तते। पश्चात्तावुभौ संगच्छेते च इति। ऐसा अद्भूत ब्रह्म कैसे प्राप्त हो सकता है? ऐसी आकांक्षा होने पर— “ब्रह्मवेत्ता परंतत्त्व को प्राप्त करता है “आत्मा की ही दृष्टव्य रूप से उपासना करनी चाहिए” इत्यादि वाक्य में “वेदन” आदि शब्द बोध्य उपासना ही, प्राप्तव्य ब्रह्म के उपाय रूप से विहित है। जैसे कि—कोई व्यक्ति—‘अपने घर में धनगड़ा है” इस बात को जानकर प्रसन्नता से उसे निकालने के लिए प्रयत्नशील होता है। तथा जैसे—कोई राजकुमार बालकों के साथ खेलता हुआ राजमहल से निकल कर खो जाता है, राजा उसे जानता है, पर वह अबोध होने के कारण पिता को नहीं जानता, वह कदाचित् किसी श्रेष्ठ विद्वान ब्राह्मण द्वारा पोषित और वेदशास्त्र का पारंगत होकर जब वयस्क होता है, तब किसी

( २६१ ) व्यक्ति द्वारा "सर्वलोकाधिपति, गाभीर्य औदार्य-वात्सल्य-सौशील्य-शौर्य- वीर्य-पराक्रम आदि गुणों संपन्न तुम्हारे पिता खोये हुए तुम्हें देखने के लिए महल में आकुल हैं" ऐसा सुनते ही "तो मैं जीवित पिता का पुत्र हूं, मेरे पिता वैभव संपन्न हैं' हर्ष विभोर हो जाता है तथा वह राजा अपने पुत्र को निरोग, अतिसुन्दर-सर्वगुण संपन्न सुनकर कृतार्थ हो जाता है, उसे बुलवाने की चेष्टा करता है; प्रयास के बाद वे दोनों एक दूसरे से मिल जाते हैं [ब्रह्म प्राप्ति संबंधी उपदेश भी इसी प्रकार है] यत्पुनः—परिनिष्पन्नवस्तुगोचरस्य वाक्यस्य तत्ज्ञानमात्रे- णापि पुरुषार्थपर्यवसानात् बालातुराद्युपच्छन्दनवाक्यवन्नार्थं सद्भावे प्रामाण्यम्—इति । तदसत्—अर्थसद्भावाभावे निश्चिते ज्ञातोऽप्यर्थः पुरुषार्थाय न भवति । बालातुरादीनामप्यर्थसद्भाव भ्रान्त्या हर्षाद्युत्पत्तिः । तेषामेव तस्मिन्नेव ज्ञाने विद्यमाने यद्यर्थाभावनिश्चयो जायेत्, ततः तदानीमेव हर्षादयो निवर्तेरन् । श्रौपनिषदेष्वपि वाक्येषु ब्रह्मास्तित्वतात्पर्याभाव निश्चये ब्रह्मज्ञाने सत्यपि पुरुषार्थपर्यवसानं न स्यात् । अतः "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इत्यादिवाक्यं निखिलजगदेककारणं निरस्तनिखिलदोष गन्धं सार्वज्ञसत्यसंकल्पत्वाद्यनन्तकल्या णगुणाकरमनवधिकातिशया- नन्दं ब्रह्मास्तीति बोधयतीति सिद्धम् । जो यह कहा कि—स्वतः सिद्ध बोधक वाक्य की वाक्यार्थ प्रतीति केवल पुरुषार्थपर्यवसित होने से, बालक और व्यथित पुरुष के फुसलाने वाले वाक्य की तरह, पदार्थ के अस्तित्व में प्रामाणिक नहीं हो सकती । यह असंगत बात है—अर्थ की असत्यता प्रमाणित हो जाने पर, ज्ञात अर्थ भी पुरुषार्थ नहीं हो सकता । बालक और व्यथित पुरुष को जो हर्ष होता है वह उन्हें, अपने अनुकूल प्रतीत होने से भ्रांत होता है, उस वाक्यार्थ की जब उन्हें यथार्थता ज्ञात होती है, तो तत्काल ही उनका हर्ष समाप्त भी हो जाता है । उपनिषदों के वाक्यों में भी यदि, ब्रह्म के अस्तित्व विषयक तात्पर्य का अभाव होता, तो ब्रह्मविषयक ज्ञान होते हुए भी वह ज्ञान कभी पुरुषार्थ साधन में पर्यवसित न हो सकता । ankurnagpal108@gmail.com

( २६२ ) इसलिए—"यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य—समस्त जगत के एकमात्र कारण, निर्दोषता, सत्यसंकल्पता, सर्वज्ञता आदि अनेक कल्याणमयगुणों के आकर, अतिशय आनंद स्वरूप ब्रह्म के अस्तित्व का ही बोधक है। यह निश्चित मत है । ५. अधिकरण:— "यतो वा इमानि" इत्यादि जगत्कारणवादिवाक्यप्रतिपाद्यं सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमस्तहेयप्रत्यनीककल्याणगुणैकतानंब्रह्म जिज्ञास्य- मित्युकम् । इदानीं जगत्कारणवादिवाक्यानां आनुमानिकप्रधानादि प्रतिपादनानर्हतोच्यते– ईक्षतेर्नाशब्दमित्यादिना । जगत् कारणता बोधक "यतो वा इमानि" इत्यादि वाक्य प्रतिपाद्य सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, समस्त तुच्छगुणरहित, कल्याणमय गुणों के धाम, ब्रह्म ही जिज्ञास्य हैं, यह बतलाया गया। अब जगत्कारणवादी वाक्यों से अनु- मानिक प्रधान आदि का प्रतिपादन नहीं हो सकता यही ईक्षतेर्नाशब्दम् इत्यादि आठ सूत्रों से सिद्ध करेंगे । ईक्षतेर्नाशब्दम् ।१।१।५॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये—"सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवा- द्वितीयम्, तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत" इत्यादि— तत्र संदेहः किं सच्छब्दवाच्यं जगत्कारणं परोक्तमानुमानिकं प्रधानम् ? उतोक्त लक्षणं ब्रह्म इति । छांदोग्योपनिषद् में जो यह कहा गया कि—"हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एकमात्र यह सत् ही था, उसने इच्छा की अनेक होकर प्रकट हो जाऊँ, तब उसने तेज की सृष्टि की" इत्यादि इसमे संदेह होता है कि— उक्त वाक्य में जगत् कारण के लिए प्रयुक्त सत् शब्द वाच्य सांख्य दर्शन का आनुमानिक प्रधान (प्रकृति) है अथवा पूर्वोक्त लक्षण वाला ब्रह्म ही है ? ankurnagpal108@gmail.com

( २६३ ) किं प्राप्तम् ? प्रधानमिति । कुतः ? “सदेव सौम्येदमग्र- आसीदेकमेव” इत्यादि शब्दवाच्यस्य चेतनभोग्यभूतस्य सत्त्वरज- स्तमोमयस्य वियदादिनानारूपविकारावस्थस्य वस्तुनः कारणावस्थां वदति । अतो यद्द्रव्यं यत्स्वभावं च कार्यावस्थम्, तत्स्वभावं तदेव द्रव्यं, कारणावस्थम् सत्त्वादिमयं च कार्यमिति गुणसाम्यावस्थं प्रधानमेव हि कारणम् । तदेवोपसंहृतसकलाविशेषं सन्मात्रमिति “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” इत्यभिधीयते । तत एव च कार्यकारणयोरनन्यत्वम् । तथा सत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञान प्रतिज्ञोपपत्तिः, अन्यथा “यथा सोम्येकेन मृत्पिण्डेन इत्यादि मृत्पिण्ड तत्कार्यं दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोर्वैरूप्यं चेति जगत्कारणवादिवाक्येन महर्षिणा कपिलेनोक्तं प्रधानमेव प्रतिपाद्यते । प्रतिज्ञादृष्टान्तरूपेणा- नुमानवेषमेव चेदं वाक्यमिति सच्छब्दवाच्यमानुमानिकमेव । उक्त संदेह होने पर आनुमानिक प्रधान को ही सत् शब्द वाच्य मानने का पक्ष प्रस्तुत करते हैं-“सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्” इत्यादि-इस वाक्य का “इदं” शब्द, चेतन भोग्य भूत सत्वरजतमोमय, अनेक रूपों में विकृत आकाश आदि वस्तु की ही कारणावस्था बतलाता है [अर्थात् इदं शब्द प्रत्यक्ष ग्राह्य सन्निहित वस्तु का ही बोधक है] कारण वस्तु की अवस्था- न्तर प्राप्ति ही कार्यावस्था होती है [आकाश आदि महाभूत ही गुणमय होकर स्थूलाकार में जगत् रूप से प्रकट होते हैं यही प्रधान कारणवाद का सिद्धान्त है] जिस द्रव्य का जो स्वभाव कार्यावस्था में होता है वही कारणावस्था में भी होगा । सत्व रजतमोमय जगत ही कार्य है तथा साम्यावस्था वाला त्रिगुणात्मक प्रधान ही उसका करण है। अपनी संपूर्ण विशेषताओं को छिपाये हुए यह प्रधान ही “सत्’था, ऐसा “सोम्येदमग्र” आदि में कहा गया है । इस प्रकार कार्य कारण की अभिन्नता भी प्रमाणित हो जाती है । तथा ऐसा मानने से “एक के विज्ञान से सबका ज्ञान हो जाता है” यह सिद्धान्त भी सुसंगत हो जाता है [अर्थात् जैसे पकते हुए चावलों में से एक चावल के देखने से सारे चावलों की अवस्था का ज्ञान हो जाता है, वैसे ही त्रिगुणात्मक प्रधान को ankurnagpal108@gmail.com

( २६४- ) जान लेने से संपूर्ण जगत उसी के समान है, ऐसा सिद्ध हो जाता है] यदि प्रधान को कारण न मानेंगे तो "हे सौम्य ! एक ही मिट्टी के ढेले से" इत्यादिवाक्य में कथित मिट्टी के ढेले और उसके निर्माण पृथिवी के दृष्टांत और दार्ष्टान्तिक में विषमता हो जावेगी। ऐसा जगत् कारण वादी वाक्यों के विश्लेषण के प्रसंग में "प्रधान ही जगत का कारण है" प्रतिपादन करते हुए, महर्षि कपिल ने कहा है। प्रतिज्ञा, दृष्टान्त आदि सभी से सिद्ध होता है कि "सदेव" इत्यादि वाक्य आनुमानिक प्रधान का ही बोधक है तथा वह प्रधान ही "सत्" शब्द वाच्य है। इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते "ईक्षतेर्नाशब्दम्" इति । यस्मिन् शब्द एव प्रमाणं न भवति, तदशब्दमानुमानिकं प्रधानं इत्यर्थः । न तज्जगतकारणवादिवाक्य प्रतिपाद्यम् कुतः: ? ईक्षतेः, सच्छब्दवाच्य संबंधव्यापार विशेषाभिधायिन ईक्षतेः धातोः श्रवणात् । "तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति" ईक्षतक्रियायोगाश्चाचेतने प्रधाने न संभवति । अतः ईदृशेक्षणक्षमश्चेतनः विशेषः सर्वज्ञः सर्वशक्तिः पुरुषोत्तमः सच्छब्दाभिधेयः । तथा च सर्वेष्वेव सृष्टिप्रकरणेष्वीक्षापूर्वकैव सृष्टिः प्रतीयते "स ईक्षत् लोकान्नुसृजा इति स इमांल्लोकानसृजत" "स ईक्षाञ्चक्रे-स प्राणानसृजत्" इत्यादिषु । उक्त मत के निराकरण के लिए "ईक्षतेर्नाशब्दम्" सूत्र प्रस्तुत करते हैं। प्रधान के लिए शब्द (आगम) प्रमाण का नितांत अभाव है, इसलिए आनुमानिक प्रधान जगत् कारण वाक्योक्त "सत्" शब्द का वाच्यार्थ नहीं हो सकता, यही इस सूत्र का तात्पर्य है। यह प्रधान जगतकारण- वादी वाक्य का प्रतिपाद्य तत्व नहीं है, क्योंकि-शास्त्र में जगतकर्त्ता के लिए ईक्षण क्रिया का प्रयोग किया गया है। "उसने संकल्प किया कि- अनेक होकर प्रकटूं" इस श्रुति में सत् शब्द बोध्य कारण का, संबंधी व्यापार विशेष "ईक्षण" क्रिया का प्रयोग किया गया है। ईक्षण क्रिया का योग अचेतन प्रधान में संभव नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि-ईक्षण की क्षमता वाले चेतन विशेष, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति संपन्न पुरुषोत्तम ही "सत्" शब्द वाच्य हैं। सारे सृष्टि प्रकरण में "ईक्षा" ही मुख्य कारण बतलाया

( २६५ ) गया है, अर्थात् सृष्टि संकल्पात्मिका है ऐसा बतलाया गया है। जैसा कि-“उन्होंने इच्छा की कि-लोकों की सृष्टि करूँ, तब इन लोकों की सृष्टि की “उन्होंने इच्छा की और प्राण की सृष्टि की” इत्यादि वाक्यों से सिद्ध होता है। ननु च कार्यगुणेनैव कारणेन भवितव्यम्, सत्यम् सर्वकार्यानु- गुण एव सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सत्यसंकल्पः पुरुषोत्तमः सूक्ष्मचिदचिद्- वस्तुशरीरकः। यथाऽह—“पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च” यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः “यस्या व्यक्तं शरीरम् यस्याक्षरंशरीरं यस्य मृत्युःशरीरम्, एष सर्वभूता- न्तरात्मा” इति। तदेतत् “न विलक्षणत्वात्” इत्यादिषु प्रतिपाद- यिष्यते। अत्र सृष्टि वाक्यानि न प्रधानप्रतिपादनयोग्यानीत्युच्यते। वस्तुविरोधस्तु तत्रैव परिहरिष्यते यतूक्तं–प्रतिज्ञादृष्टान्तयोगात् अनुमानरूपमेवेदंवाक्यं इति तदसत्–हेत्वनुपपादनात्। “येनाश्रुतं श्रुतं” इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञाने प्रतिपादयिषिते सर्वात्मना तदसंभवं मन्वमानस्य तत्संभवमात्रप्रदर्शनाय हि दृष्टान्तोपादानम्। ईक्षत्यादिश्रवणादेव हि अनुमानगंधाभावोऽवगतः। (शंका) कार्य के अनुकूल पदार्थ ही, कारण हो सकता है (जड़ जगत के अनुकूल जड़ प्रकृति ही कारण हो सकती है) ऐसी जो शंका की जाती है, वह ठीक है, सर्वकार्यानुगुण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिसंपन्न, सत्य- संकल्प पुरुषोत्तम् सूक्ष्मचिद् अचिद् सभी वस्तुओं के रूप में स्थित हैं— जैसा कि— “उस परमात्मा की ज्ञान बल-क्रिया आदि अनेक स्वाभाविक शक्तियाँ सुनी जाती हैं-वह सर्वज्ञ, सर्वविद् और ज्ञान रूपी तपवाला है" अव्यक्त और मृत्यु (प्रकृति और जगत) जिसके शरीर हैं, वही प्राणि- मात्र के अंतरात्मा पापरहित हैं” इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है। इसका विशेष प्रतिपादन “न विलक्षणत्वात्” इत्यादि सूत्र में करेंगे। यहाँ बतलावेंगे कि सृष्टि प्रतिपादक वाक्य प्रधान परक नहीं है। ankurnagpal108@gmail.com

( २६६ ) जो यह कहते हैं कि-प्रतिज्ञा और दृष्टांत के अनुसार, वेदांत वाक्य, प्रधान के अनुरूप ही घटित होते हैं, यह भी असंगत बात है, इसका कोई कारण उपलब्ध नहीं होता । "जिसके द्वारा अश्रुत विषय भी श्रुत होता है" एक के जानने से सबका ज्ञान होता है "ये वाक्य निम्नांकित शंका "सर्वात्मा ब्रह्म में ऐसा होना असंभव है" के निवारणार्थ ही प्रस्तुत किए गए हैं "ईक्षण" क्रिया श्रवण-से ही संबंधित है, आनुमानिक प्रधान में संकल्प-श्रवण आदि का नितांत अभाव है । अथ स्यात्—न चेतनगतं मुख्यमीक्षणमिहोच्यते, अपि प्रधानगत- गौणमीक्षणं "तत्तेज ऐक्षत वा आप ऐक्षन्त" इति गौणेक्षण साहचर्यात् । भवति चाचेतनेष्वपि चेतनधर्मोपचारः यथा—"वृष्टि प्रतीक्षाः शालयः" "वर्षेण बीजं प्रतिसंजहर्ष" इति अतो गौणमीक्षण- मितीमामाशंकामनुभाष्य परिहरति । जो यह कहते हैं कि—सृष्टि प्रकरण में जिस ईक्षण क्रिया का प्रयोग किया गया है, वह चेतन संबंधी मुख्य ईक्षण नहीं है, अपितु प्रधान संबंधी गौण ईक्षण है, जैसा कि—"तत्तेज ऐक्षत" इत्यादि में तेज और जल आदि जड पदार्थों की ईक्षण क्रिया के प्रयोग से निश्चित होता है । जड पदार्थों में भी चेतन पदार्थों का सा औपचारिक प्रयोग किया जाता है, जैसे कि— 'शालि (धान) के पौधे वृष्टि की प्रतीक्षा करते हैं वर्षा से बीजों को हर्ष होता है" इत्यादि से गौण ईक्षण ही सिद्ध होता है इस शंका का परिहार कर रहे हैं— गौणश्चेन्नात्म शब्दात् १।१।६॥ यदुक्तम्—गौणेक्षणसाहचर्यात् सतोऽपीक्षणव्यपदेशः सर्गनीयत- पूर्वावस्थाभिप्रायो गौण इति । तन्न "ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा" इति सच्छब्दप्रतिपादितस्य आत्मशब्देन व्यपदेशात् । एतदुक्तं भवति "ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् स आत्मा" इति चेतना- चेतनप्रपञ्चोद्देशेन सत् आत्मत्वोपदेशोऽयं नाचेतने प्रधाने संगच्छत ankurnagpal108@gmail.com

( २६७ ) इति; अतस्तेजोऽबन्नानामपि परमात्मैवात्मेति तेजःप्रभृतयोऽपि शब्दाः परमात्मन एव वाचकाः । तथा हि हन्ताऽहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इति परमात्मा- नुप्रवेशादेव तेजःप्रभृतीनां वस्तुत्वं तत्तन्नामभाक्त्वं चेति “तत्तेज ऐक्षत—ता आप ऐक्षन्त” इत्यपि मुख्य एवेक्षणव्यपदेशः, अतः साह- चर्द्यादपि “तदैक्षत” इत्यत्र गौणत्वाशङ्कादूरोत्सारितेति सूत्राभिप्रायः । जो यह कहते हैं कि—गौण ईक्षण के साहचर्य से सत् के ईक्षण का भी व्यपदेश हैं, जो कि, सृष्टि पूर्व की एक स्पन्दन क्रियामात्र के अभिप्राय से कहा गया है अतएव गौण ही है । यह कथन सुसंगत नहीं है क्योंकि— "यह सारा जगत आत्म स्वरूप हैं, यह आत्म स्वरूप है, यह आत्मा सत्य स्वरूप है" इत्यादि वाक्य में आत्मा शब्द से सत् तत्त्व का उल्लेख किया गया है । इसी अभिप्राय से यह भी कहा गया कि—"सारा जगत आत्म्य है वही आत्मा है" यहाँ चेतन अचेतनात्मक जगत प्रपंच के उद्देश्य से आत्मतत्त्व का उपदेश किया गया है अचेतन प्रधान का कोई प्रसंग नहीं है । परमात्मा ही तेज, जल आदि की आत्मा हैं, इसलिए तेज आदि भी परमात्म वाची हैं—जैसा कि—"मैं जीवरूप से प्रविष्ट होकर उन तीनों ( पृथ्‍वी-जल-तेज ) देवताओं को नाम रूप से व्यक्त करूँ" इस परमात्मा के संकल्प बोधक वाक्य से सिद्ध होता हैं कि—परमात्मा ही, आत्मारूप से प्रविष्ट होकर तेज आदि वस्तुओं के नाम रूप का विस्तार करते हैं । "तत्तेज ऐक्षत" आदि वाक्यों में मुख्य ईक्षण का ही वर्णन है । सत् के ईक्षण के साथ, तेज आदि के ईक्षण के उल्लेख में गौण ईक्षण की आशंका नहीं करनी चाहिए, यही इस सूत्र का अभिप्राय है । इतश्च न प्रधानं सच्छब्दप्रतिपाद्यम्— इसलिए भी सांख्य शास्त्रोक्त प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं हो सकता कि—

( २६८ ) तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् १।१।७॥ मुमुक्षोः श्वेतकेतोः ‘तत्त्वमसि’ इति सदात्मकत्वानुसन्धानमुप- दिश्य तन्निष्ठस्य “तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्प- त्स्ये” इति शरीरपातमात्रान्तरायो ब्रह्मसम्पत्तिलक्षणो मोक्ष इत्यु- पदिशति, यदि च प्रधानमचेतनं कारणमुपदिश्येत; तदा तदात्म- कत्वानुसन्धानस्य मोक्षसाधनत्वोपदेशो नोपपद्यते “यथा क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति” इति तन्निष्ठस्याचेतन- सम्पत्तिरेव स्यात् । न च मातापितृसहस्रेभ्योऽपि वत्सलतरं शास्त्र- मेवंविधतापत्रयाभिहतिहेतुभूतामचित्सम्पत्तिमुपदिशति । प्रधान- कारणवादिनोऽपि हि प्रधाननिष्ठस्य मोक्षं नाभ्युपगच्छन्ति । मुमुक्षु श्वेत केतु को “तत्त्वमसि” ऐसा तदात्मकता के अनुसंधान का उपदेश देकर “तभी तक मोक्ष का विलंब है जब तक शरीर से छूट नहीं जाता, उसके बाद वह सत् रूप हो जाता है” ऐसा शरीर पात मात्र के अन्तराय वाला ब्रह्म संपत्ति रूप मोक्ष का उपदेश दिया गया है । यदि अचेतन प्रधान को जगत के कारण रूप से बतलाया जाता तो, तदात्मक- त्वानुसंधान रूपी मोक्षसाधनत्वोपदेश का मेल नहीं बैठता ।' पुरुष इस लोक में जैसा संकल्प और अनुष्ठान करता है, वैसी ही मरणोत्तर उसकी गति होती है” इस वाक्य से कैसे मान लिया जाय कि— अचेतन की आराधना से भी गति प्राप्त हो सकती है। माता और पिता से हजारों गुना वात्सल्य भाव से जीवों की रक्षा करने वाले शास्त्र, कहीं तापत्रय की शांति के लिए, जड़ की आराधना का उपदेश दे सकते हैं ? प्रधान कारण वादी भी प्रधान की आराधना करके मोक्ष नहीं पा सकते । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान इसलिए भी जगत का कारण नहीं हो सकता कि-- हेयत्वावचनाच्च १।१।८॥ यदि प्रधानमेव कारणं सच्छब्दाभिहितं भवेत् तदा मुमुक्षोः श्वेतकेतोस्तदात्मकत्वं मोक्षविरोधित्वाद्धेयत्वेनैवोपदेश्यं स्यात् । न ankurnagpal108@gmail.com

( २६६ ) च तत्क्रियते, प्रत्युत उपादेयत्वेनैव "तत्त्वमसि" "तस्य तावदेव चिरम्" इत्युपदिश्यते । सांख्योक्त प्रधान ही यदि, जगत का कारण, सत् शब्द से वेदों को अभिप्रेत होता तो, मोक्षविरोधी, आत्मवादी सिद्धान्त को मानने वाले श्वेतकेतु को, उसे हेय बतलाकर उसे त्यागने का उपदेश दिया जाता, परंतु ऐसा न करके "तुम वही हो" तुम्हें उसे प्राप्त करने में तभी तक का विलम्ब है, जब तक कि शरीर का बंधन है" इत्यादि उपदेश दिया गया । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान को इसलिए भी कारण नहीं मान सकते कि— प्रतिज्ञाविरोधात् १।१।१६॥ प्रधानकारणत्वे प्रतिज्ञाविरोधश्च भवति । वाक्योपक्रमे ह्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञातम् । तच्च कार्यकारणयोरन- न्यत्वेन कारणभूतसद्विज्ञानात्तत्कार्यभूतचेतनाचेतनप्रपञ्चस्य ज्ञात- तयैवोपपादनीयम् । तत्तु प्रधानकारणत्वे चेतनवर्गस्य प्रधानकार्य- त्वाभावात् प्रधानविज्ञानेन चेतनवर्गविज्ञानासिद्धे विरुद्ध्यते । प्रधान को कारण मानने से प्रतिज्ञा से भी विरुद्धता होती है । वेदांत वाक्यों के उपक्रम (प्रारंभ) में ही, नियम बतलाया गया कि— "एक के ज्ञान से समस्त का ज्ञान होता है ।' उस नियम के अनुसार, कार्य और कारण दोनों में अनन्यता होनी चाहिए अतः कार्यरूप चेतन अचेतन समस्त प्रपंचरूप जगत कारण रूप उस ब्रह्म के स्वरूपानुसार ही प्रतीत होता है । यदि प्रधान को कारण मान ले तो, चेतन वर्ग में, जड प्रधान की कार्यता कहाँ से आवेगी । प्रधान के ज्ञान से, चेतन वर्ग के ज्ञान को सिद्ध करना, सर्वथा विरुद्ध है । इतश्च न प्रधानम्— प्रधान इसलिए भी कारण नहीं है कि— ankurnagpal108@gmail.com

( ३०० )

स्वाप्ययात् १।१।१०॥ तदेव सच्छब्दवाच्यं प्रकृत्याह- "स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति तत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वम- पीतो भवति तस्मादेन स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति" इति सुषुप्तं जीवं सता सम्पन्नं, स्वमपीतः-स्वस्मिन् प्रलीन इति व्यप- दिशति । प्रलयश्च-स्वकारणे लयः न चाचेतनं प्रधानं चेतनस्य जीवस्य कारणं भवितुमर्हति । स्वमपीतो भवति आत्मानमेव जीवोऽ- पीतो भवतीत्यर्थः । चिद्वस्तुशरीरकं तदात्मभूतं ब्रह्मैव जीवशब्देनाऽ- भिधीयत इति नामरूपव्याकरणश्रुत्योक्तम् । तज्जीवशब्दाभिधेयं ब्रह्म सुषुप्तिकालेऽपि प्रलयकाल इव नामरूपपरिष्वङ्गाभावात् केवलसच्छब्दाभिधेयमिति 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वम- पीतो भवति' इत्युच्यते । तथा समानप्रकरणे नामरूपपरिष्वङ्गा- भावात् प्राज्ञेनैव परिष्वङ्गात् "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्" इत्युच्यते । आमोक्षाज्जीवस्य नामरूपपरिष्व- ङ्गादेव हि स्वव्यतिरिक्तविषयज्ञानोदयः । सुषुप्तिकाले हि नामरूपे विहाय सता सम्परिष्वक्तः पुनरपि जागरदशायां नामरूपे परिष्वज्य तन्नामरूपो भवतीति श्रुत्यन्तरे स्पष्टमभिधीयते "यदा सुप्तः स्वप्नं न कथञ्चन पश्यति अथ हास्मिन् प्राण एवैकधा भवति" "तस्माद्वा आत्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते" तथा "त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तथा भवन्ति" इति । तथा सुषुप्तं जीवं 'प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः' इति च वदति । तस्मात्सच्छब्दवाच्यः परंब्रह्म सर्वज्ञः परमेश्वरः पुरुषो- त्तम एव । तदाह वृत्तिकारः "सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवतीति, सम्पत्त्यसम्पत्तिभ्यामेतदध्यवसीयते 'प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्त' इति चाहेति ।

( ३०१ ) ब्रह्म ही सत् शब्द का स्वाभाविक वाच्यार्थ हैं, जैसा कि--‘‘हे सोम्य ! मेरे निकट स्वप्नांत ( सुषुप्ति कालीन जीव की अवस्था ) को जानो, जिस समय वह पुरुष ( जीव ) सोता है, तब सत् संपन्न (ब्रह्मलीन) हो जाता है, स्वस्वरूप को प्राप्त हो जाता है, इसीलिए उसे ‘‘स्वपिति’’ कहते हैं, उस समय वह स्वरूप में अपीत ( लीन ) हो जाता है’’ इस वाक्य में सुषुप्त जीव को सत् से संपन्न अर्थात् ‘‘स्वमपीत अपने में प्रलीन’’ कहा गया है। प्रलय का अर्थ होता है अपने कारण में लीन होना। इससे स्पष्ट होता है कि--अचेतन प्रधान, चेतन जीव का कारण नहीं है। ‘‘स्वंम पीतो भवति’’ कहने का तात्पर्य है कि--जीव स्वीय (परमात्मा) को प्राप्त होता है। चिन्मय वस्तु अर्थात् चेतन ही जिसका शरीर है और जो जीवात्मा में, अन्तर्गत व्याप्त है, उसे ही उक्त प्रसंग में जीव शब्द से बतलाया गया है ( अर्थात् जो जीव का भी जीव है ) ‘‘मैं इसमें प्रवेश कर जीवात्मा के रूप से, वस्तुओं के नाम रूप को अभिव्यक्ति करूँगा’’ ऐसे नाम रूप के व्यक्तीकरण के उपदेश से भी उक्त तथ्य की पुष्टि होती है। प्रलयकाल की तरह, सुषुप्ति काल में भी, नाम और रूप का संबंध नहीं रहता, इसलिए जीव शब्द से उल्लेख्य वह ब्रह्म ही, सुषुप्ति काल में ‘‘सत्’’ शब्द से कहा गया है। जैसा कि--‘‘हे सोम्य। उस समय जीव सत् संपन्न होता है, स्वरूप प्राप्त करता है।’’ इसी प्रकार के अन्य प्रकरण में भी नाम रूप का संबंध न दिखला- कर, प्राज्ञ ( परमात्मा ) से ही संबंध दिखलाया गया है। जैसे कि-- ‘‘जीव प्राज्ञ आत्मा के साथ सम्मिलित होकर वाह्य और आभ्यन्तर किसी भी विषय को नहीं जानता (आत्म विभोर हो जाता है)’’ मोक्ष न होने तक केवल नाम रूप के साथ संबंध होने से जीवात्मा को स्व ( परमात्मा ) से भिन्न विषयक ज्ञान ( इस जगत में ) हुआ करता है। जो जीव सुषुप्ति काल में नाम रूप को छोड़कर सत् ( ब्रह्म ) से संसक्त हो जाता है, वही जाग्रत अवस्था में नामरूप से संसक्त होकर पुनः पूर्व रूप में हो जाता है, ऐसा अन्य श्रुति में स्पष्ट उल्लेख है--‘जिस समय यह स्वप्न रहित सुषुप्तावस्था में रहता है उस समय प्राण ( परमात्मा ) से एकाकार हो जाता है। जागने पर ankurnagpal108@gmail.com

( ३०२ ) इसकी इन्द्रियां अपने आश्रय स्थान में यथावत स्थित हो जाती हैं।" और जागने पर—“व्याघ्र-सिंह-वराह-मशक-दंश-जो कुछ भी हैं वे जैसे सुषुप्ति के प्रथम प्रतीत होते थे वैसे ही प्रतीत होते हैं।" सुषुप्त जीव को “प्राज्ञ परमात्मा से संसक्त रहता है" ऐसा बतलाया गया है। इन सबसे निश्चित होता है कि—“सत्" शब्द वाच्य परंब्रह्म सर्वज्ञ परमेश्वर पुरुषोत्तम ही हैं। उक्त श्रुति वाक्यों का समर्थन वृत्तिकार भी करते हैं—“उस अवस्था में जीव सत् से सम्पन्न हो जाता है।" ऊपर जो जीव की सत् के साथ सम्पत्ति और असम्पत्ति दिखलाई गई है उससे निश्चित होता है कि जीव 'प्राज्ञ परमात्मा से ही संलग्न होता है।" इतश्च न प्रधानम्— प्रधान को इसलिए भी जगत का कारण नहीं कह सकते कि— गति सामान्यात् ।१।१।११॥ ‘आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति स इमाँल्लोकानसृजत’” “तस्माद्वा एतस्मा- दात्मन आकाशस्सम्भूतः । आकाशाद्वायुः वायोरग्निः अग्नेरापः अद्भ्यः पृथिवी” तस्य ह वा एतस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेत- द्यदृग्वेदः' इत्यादिसृष्टिवाक्यानां या गतिः-प्रवृत्तिः, तत्सामान्यात् तत्समानार्थत्वादस्य तेषु च सर्वेषु सर्वेश्वरः कारणमवगम्यते । तस्मादत्रापि सर्वेश्वर एव कारणमिति निश्चीयते । “सृष्टि से पूर्व यह जगत, एक आत्म स्वरूप ही था,उसके अतिरिक्त कोई स्पन्दित पदार्थ नहीं था, उसने संकल्प किया कि लोगों की सृष्टि करूँ तब उसने सृष्टि की'-उस आत्मा से आकाश हुआ और फिर क्रमशः आकाश से वायु,वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी हुई "ऋग्वेद परमात्मा निश्वास मात्र है"-इत्यादि सृष्टि सूचक वक्यों की गति प्रवृत्ति (प्रकाशनशक्ति, तत्सामान्य हेतु अर्थात् उस सर्वज्ञ सर्वेश्वर परमात्मा के अनुरूप ही है। इसलिए यहाँ भी सर्वेश्वर ही जगत् के कारण निश्चित होते हैं। ankurnagpal108@gmail.com

( ३०३ ) इतश्च न प्रधान प्रधान को कारण मानना इसलिए भी कठिन है कि- श्रुतत्वाच्च १।१।१२॥ श्रुतमेव हि अस्यामुपनिषदि अस्य सच्छब्दवाच्यस्य आत्मत्वेन, नामरूपयोर्व्याकर्त्तृत्वं,सर्वज्ञत्वं,सर्वशक्तित्वं,सर्वाधारत्वं अपहतपाप्म- त्वादिकं, सत्यकामत्वं, सत्यसंकल्पत्वं च-“अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”-सन्मूलाःसौम्येमाःसर्वाःप्रजाःसदायतनाःसत्प्र- तिष्ठाः-“ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा”यच्चास्येहास्ति- यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितम् तस्मिन् कामान्त्समाहिताः- “एष आत्मा अपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः” इति । इस उपनिषद् में,इस सत् शब्द वाच्य की,आत्मारूप से नाम और रूप की व्याकृति, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिसंपन्नता, सर्वाधारकता, निर्दोषता, निष्पापता, सत्यकामता सत्यसंकल्पता आदि स्पष्टतः बतलाई गई है-जैसे- “इसमें जीवात्मारूप से प्रविष्ट होकर नामरूप का विस्तार करूँगा”- “सत् ही इस प्रजा का मूल आश्रय और प्रतिष्ठा है”-“सारी वस्तुएं सदात्मक ही है,वही सत्य और आत्मा है”-“इस जगत में जो कुछ भी विद्यमान है,या जो कुछ नहीं( अतीत)है,वह सब परमात्मा में ही समाहित (लीन)है,संपूर्ण कामनायें और अभिलाषायें भी उन्हीं में प्रविष्ट हैं”- “यह आत्मा निष्पाप,जरा मृत्यु शोक तथा भूख प्यास रहित,सत्य काम और सत्यसंकल्प है” तथा च श्रुत्यंतराणि-“ न तस्यकश्चित् पतिरस्य लोके न चेशिता नैव च तस्य लिंगम्, स कारणंकरणाधिपाधिपो न चास्य कश्चित् जनिता न चाधिपः”-“सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानिकृत्वाऽभिवदन्यदास्ते”-“अन्तःप्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वा

( ३०४ ) त्मा''-''विश्वात्मानं परायणम्''-''पतिं विश्वस्यात्मेश्वरम्''-यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा, अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः-“एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एकोनारायणः” इत्यादीनि । तस्माज्जगत्कारणवादिवाक्यं न प्रधानादिप्रतिपादनयोग्यम् । अतः सर्वज्ञः सर्वेश्वरो निरस्ता- निखिलदोषगन्धोऽनवधिकातिशय असंख्येयकल्याणगुणगणौघम- हार्णवः पुरुषोत्तमो नारायण एव निखिल जगदेककारण जिज्ञास्य ब्रह्मेति स्थितम् । तथा अन्य श्रुतियाँ भी-“इस जगत में उनका कोई स्वामी और शासक नहीं है न उनका ज्ञापक कोई चिन्ह ही है वही एकमात्र कारणा- धिपतियों के अधिपति हैं उनका कोई अधिपति जनक या प्रतिपालक नही है। वह धीर (अविकृतात्मा) ईश्वर ही समस्त रूप संपन्न वस्तुओं का विस्तार करके,उन वस्तुओं का नाम तथा नामों का व्यवहार करके, उनमें स्थित है। वही प्राणिमात्र के अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर, शासन करते हैं, इसलिए सर्वात्मा हैं। विश्वात्मा, परमाश्रय, जगत्पति, आत्मा के स्वामी को जानो । इस जगत में जो कुछ भी पदार्थ दीखते या सुनाई पड़ते हैं, नारायण उन सब में बाहर और भीतर विद्यमान हैं। ये नारायण ही प्राणिमात्र के अन्तरात्मा, निष्पाप, अलौकिक, प्रकाशमय और एक है।” इस प्रकार सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, सर्वेश्वर, निर्दोष, असंख्य अपरिमित अपार कल्याणकर गुणों के महासागर पुरुषोत्तम नारायण को ही समस्त जगत का एकमात्र कारण बतलाती हैं, वही जिज्ञास्य ब्रह्म हैं। उक्त जगत् कारणादि के बोधक वाक्य, प्रधानादि के प्रतिपादन के योग्य कदापि नहीं हैं। अतएव निर्विशेषचिन्मात्रब्रह्मवादोऽपि सूत्रकारेण आभिः श्रुतिभिः निरस्तो वेदितव्यः, पारमार्थिकमुख्येक्षणादिगुणयोगि जिज्ञा- स्यं ब्रह्मेति स्थापनात् । निर्विशेषवादे हि साक्षित्वमप्यपारमार्थिकं वेदांतवेद्यंब्रह्म जिज्ञास्यतयाऽप्रतिज्ञातम् । तच्च चेतनमिति ईक्षते- ankurnagpal108@gmail.com

( ३०५ ) न॑ाशब्दम्-इत्यादिभिः सूत्रैः प्रतिपाद्यते । चेतनत्वं नाम चैतन्यगुणयोगः। अत ईक्षणगुणविरहिणः प्रधानतुल्यत्वमेव ऐसे ही, निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म का पोषक शांकरमत भी सूत्रकार द्वारा प्रस्तुत इन श्रुतियों से निरस्त जानना चाहिए, क्यों कि-सूत्रकार ने वास्तविक ईक्षण आदि गुण संपन्न ब्रह्म को ही जिज्ञास्य ब्रह्म रूप से सिद्ध किया है। निर्विशेषवाद में, अवास्तविक साक्षीवाले ब्रह्म को वेदांतवेद्य जिज्ञास्य, सिद्ध किया गया है। और उसे ही चेतन रूप से “ईक्षतेर्नाशब्दम्" इत्यादि सूत्रों से समर्थन किया गया है। जब कि- चैतन्यगुणयोग ही चैतन्यता है, तब यदि ये लोग ईक्षण को गुण नहीं मानते तो इनका मत भी प्रधानकारणवादी सांख्य के समान ही अप्रामाणिक है। किंच-निर्विशेषप्रकाशमात्रब्रह्मवादे तस्य प्रकाशत्वं अपि दुरुपपादम् । प्रकाशो हि नाम स्वस्य परस्य च व्यवहारयोग्यता- मापायन् वस्तुविशेषः । निर्विशेषस्य वस्तुनस्तदुभयरूपत्वाभावात् घटादिवाचित्वमेव । तदुभयरूपत्वाभावेऽपि तत्क्षमत्वमस्तीति चेत्, तन्न, तत्क्षमत्वं हि तत् सामर्थ्यमेव । सामर्थ्यगुणयोगे हि निर्विशेष- वाद : परित्यक्तःस्यात् । एक बात और है कि-ब्रह्म को निर्विशेष प्रकाशमात्र कहने से उसके प्रकाशत्व का उपपादन नहीं होता क्यो कि- स्वतःऔर दूसरे की व्यवहारयोग्यता संपादक वस्तु विशेष को प्रकाश कहते हैं। इस प्रकार प्रकाशत्व एक गुण हो जाता है जो कि-निर्विशेष वस्तु की भी जडता ही सिद्ध होती है। यदि कहा जाय कि- स्व-परव्यवहार्यता रूप अवस्थाओं के विना भी निर्विशेष में प्रकाशन क्षमता है,तो ऐसा कथन भी उक्त मत के विरुद्ध होगा, क्यों कि- क्षमता भी एक गुण ही तो है। इसलिए निर्विशेषमत भी त्याज्य है । अथ श्रुतिप्रामाण्यादयमेको विशेषोऽभ्युपगम्यत, इति चेत्,हन्त तर्हि तत एव सर्वज्ञता, सर्वशक्तित्वं' सर्वेश्वरत्वं, सर्वकल्याणगुणा-

( ३०६ ) करत्वं सकलहेयप्रत्यनी`त्यादयः सर्वेऽभ्युपगन्तव्याः । शक्तिमत्व च कार्यविशेषानुगुणत्वं, तच्चकार्यविशेषनिरूपणीयम्, कार्यविशेषस्य निष्प्रमाणकत्वे तदेकनिरूपणीय शक्तिमत्वमपि निष्प्रमाणकं स्यात् । यदि यह कहो कि-श्रुतिप्रामाण्य के आधार पर हम उनके क्षमता- गुण को स्वीकार करते हैं, तब तो प्रसन्नता का विषय है तब तो सर्व- ज्ञता, सर्वेश्वरता, शक्तिमत्ता, सर्वकल्याणगुणाकरता निर्दोषता आदि गुण विशेषणों, को भी श्रुतिप्रामाण्य के आधार पर स्वीकारोगे ही; शक्तिमत्ता का अर्थ होता है, कार्य विशेष की अनुगुणता, जो कि-कार्य विशेष में ही निरूपित होती है। कार्य विशेष के अप्रामाणिक हो जाने पर वह भी अप्रामाणिक हो जाती है। किंच-निर्विशेषवस्तुवादिनो वस्तुत्वमपिनिष्प्रमाणम् प्रत्यक्षानु- मानागमस्वानुभवाः सविशेषगोचरा इति पूर्वमेवोक्तम् । तस्मात् विचित्रचेतनाचेतनात्मकजगद्रूपेण “बहुस्याम्” इतीक्षणक्षमः पुरुषोत्तम एव जिज्ञास्य इति सिद्धम् । अधिक क्या-निर्विशेषवस्तुवादियों की वस्तु भी अप्रामाणिक है। प्रत्यक्ष, अनुमान, शास्त्र और अनुभव सभी प्रमाणों से सगुण ब्रह्म ही दृष्टिगोचर होता है, ऐसा पहिले भी कह चुके है। विचित्र जडचेतन जगत रूप से “अनेकहोने” का संकल्प करने वाला पुरुषोत्तम ही जिज्ञास्य ब्रह्म है, ऐसा सिद्ध होता है। ६ अधिकरण— एवं जिज्ञासितस्य ब्रह्मणश्चेतनभोग्यभूतजडरूपसत्त्वरजस्त- मोमयप्रधानाद् व्यावृत्तिरुक्ता, इदानीं कर्मवश्यात् त्रिगुणात्मक प्रकृतिसंसर्गनिमित्तनानाविधानन्तदुःखसागरनिमज्जनेनाशुद्धाच्छुद्धाच्च प्रत्यगात्मनोऽप्यखिलहेयप्रत्यनीकनिरतिशयानन्दं ब्रह्मेति प्रतिपाद्यते । ankurnagpal108@gmail.com