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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति इस प्रकार है:

चौदहवाँ अध्याय 14/218-227 ]
सर्वत्र जल-याँहा अमृत-समान।
चिदानन्द ज्योतिः स्वाद्य-याँहा मूर्त्तिमान् ॥ 225 ॥
लक्ष्मी जिनि' गुण याँहा लक्ष्मीर समाज।
कृष्ण-वंशी करे याँहा प्रियसखी-काज ॥ 226 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,- "श्रीवासजी,
सावधानीपूर्वक सुनो। क्या वृन्दावनकी सम्पत्तिके विषयमें
भूल गये हो? वृन्दावनकी सहज सम्पत्ति महासागरकी
भाँति है और द्वारका-वैकुण्ठकी सम्पत्ति उसकी एक
बूँदके बराबर भी नहीं है। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण परम
पुरुषोत्तम हैं और उनका समस्त ऐश्वर्य केवल
वृन्दावन-धाममें ही प्रकाशित होता है। श्रीवृन्दावनकी
भूमि चिन्तामणिसे बनी है, वहाँके भवन रत्नोंसे बने हैं।
वृन्दावनकी दासियाँ भी चिन्तामणिसे बने नूपुर अपने
चरणोंमें धारण करती हैं। वृन्दावन कल्पवृक्षों और
लताओंसे

[ 14/227-233 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्लोक-भावानुवाद—उस अप्राकृत भूमि वृन्दावनमें
परमपुरुष श्रीकृष्ण ही कान्त (अद्वितीय भोक्ता) हैं,
कान्ताएँ—व्रजकी लक्ष्मियाँ गोपियाँ हैं, कदम्बादि वृक्ष—सभी
कल्पवृक्ष (कृष्णप्रेमफल देनेवाले) हैं, समस्त भूमि ही
चिन्मय (रत्नपूर्ण, समस्त चिन्मय इच्छाओंको पूर्ण
करनेवाली) है, जल—अमृत है, बोलना—सङ्गीत है,
चलना—नृत्य है और श्रीकृष्णकी वंशी—प्रियसखी है
तथा सर्वत्र चिदानन्दज्योति अनुभव होती है। इसलिये
श्रीवृन्दावन ही परम आस्वाद्य है (वह सर्वथा जड़भावरहित
अप्राकृत और एकमात्र कृष्णके द्वारा भोग्य है—यह
अर्थ है)।
मध्यलीला 8/137 संख्यामें वृन्दावन-शब्दका अनुभाष्य
देखें ॥ 227 ॥
वृन्दावनके ऐश्वर्यका वर्णन :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/173)-उद्धृत बिल्वमङ्गल-वचन—
चिन्तामणिश्चरणभूषणमङ्गनानां
शृङ्गारपुष्पतरवस्तरवः सुराणाम्।
वृन्दावने व्रजधनं ननु कामधेनु-
वृन्द्वानि चेति सुखसिन्धुरहो विभूतिः ॥” 228 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 228 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवृन्दावनकी व्रजाङ्गनाओंके
चरणोंके भूषण ही चिन्तामणि हैं, लीला-अनुकूल समस्त
पुष्पवृक्ष ही कल्पवृक्ष (सुरतरु) और कामधेनु ही
व्रजका परम-धन है। इन सबके द्वारा श्रीवृन्दावनकी
विभूति परमानन्द-स्वरूपमें प्रकाशित हो रही है ॥ 228 ॥
अनुभाष्य—
वृन्दावने अङ्गनानां (गोपीनां) चरणभूषणं चिन्तामणिः [एव]
शृङ्गारपुष्पतरवः (शृङ्गारार्थं वेशविन्यासाय कुसुमविटपिनः) सुराणां
तरवः (कल्पद्रुमाः एव), कामधेनुवृन्द्वानि [एव] व्रजधनं
(गोकुलवासिनां धनं); अहो [वृन्दावनस्य] विभूतिः
(अतुलनीय-माहेश्वर्यमपि) सुखसिन्धुः (आनन्दामृतसमुद्रः एव)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 228 ॥
श्रीवासका परमानन्द :—
शुनि' प्रेमोवेशे नृत्य करे श्रीनिवास।
कक्षतालि बाजाय, करे अट्ट-अट्ट हास ॥ 229 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरसे वृन्दावनकी महिमा
श्रवणकर श्रीनिवास प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य करने
लगे और बगल बजाते हुए जोरसे अट्टहास करने
लगे॥ 229 ॥
श्रीराधाके रस-श्रवणसे महाप्रभुको भी आनन्द :—
राधार शुद्धरस प्रभु आवेशे शुनिल।
सेइ रसावेशे प्रभु नृत्य आरम्भिल ॥ 230 ॥
महाप्रभुका नृत्य और स्वरूपका गीत :—
रसावेशे प्रभुर नृत्य, स्वरूपेर गान।
'बल', 'बल' बलि' प्रभु पाते निज-काण ॥ 231 ॥
महाप्रभुकी प्रेम रूपी बाढ़में पुरी-धाम प्लावित :—
व्रजरस-गीत शुनि' प्रेम उथलिल।
पुरुषोत्तम-ग्राम प्रभु प्रेमे भासाइल ॥ 232 ॥
अनुवाद—श्रीराधाके शुद्धप्रेमरसके विषयमें सुनकर
महाप्रभुने उसी रसमें आविष्ट होकर नृत्य आरम्भ
किया। महाप्रभुके रसावेशमें नृत्यके साथ श्रीस्वरूप
दामोदर गान करने लगे,। तब महाप्रभु 'गान करते रहो',
'गान करते रहो', कहकर अपने कानोंको (हाथोंसे
खींचकर) फैला रहे थे। व्रजरसके गीतोंको सुनकर
महाप्रभुमें प्रेम उमड़ आया। इस प्रेमके द्वारा उन्होंने
श्रीपुरुषोत्तम-ग्राम (श्रीजगन्नाथ पुरी) क्षेत्रको डुबो
दिया॥ 230-232 ॥
दूसरे प्रहर तक महाप्रभुका नृत्य :—
लक्ष्मीदेवी यथाकाले गेला निज-घर।
प्रभु नृत्य करे, हैल द्वितीय प्रहर ॥ 233 ॥
अनुवाद—श्रीलक्ष्मीदेवी भी यथासमय अपने घर
नीलाचलमें चली गयीं। महाप्रभुके नृत्य करते हुए
द्वितीय प्रहरका समय हो आया ॥ 233 ॥
558 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/234-241 ]
चारों सम्प्रदायोंको ही कीर्त्तन करते हुए थकान :-
चारि-सम्प्रदाय गान करि' बहु श्रान्त हैल।
महाप्रभुर प्रेमावेश द्विगुण बाड़िल ॥ 234 ॥
अनुवाद-इतनी देरसे गान करते हुए भक्तोंकी चारों मण्डलियाँ बहुत थक गयीं, परन्तु महाप्रभुका प्रेमावेश बढ़कर दो गुणा हो गया ॥ 234 ॥
श्रीराधा-प्रेमावेशमें महाप्रभु :-
राधा-प्रेमावेशे प्रभु हैला सेइ मूर्त्ति।
नित्यानन्द दूरे देखि' करिलेन स्तुति ॥ 235 ॥
रसविरोध-भयसे दूरसे ही श्रीनिताइका महाप्रभुका स्तव :-
नित्यानन्द देखिया प्रभुर भावावेश।
निकटे ना आइसे, रहे किछु दूरदेश ॥ 236 ॥
श्रीनिताइके न आनेसे महाप्रभुका आवेश
और कीर्तन भी किसी प्रकारसे नहीं रुका :-
नित्यानन्द बिना प्रभुके धरे कोन् जन।
प्रभुर आवेश ना याय, ना रहे कीर्त्तन ॥ 237 ॥
अनुवाद-श्रीराधा-प्रेमावेशमें महाप्रभु भी वैसी राधा-मूर्ति हो गये। दूरसे महाप्रभुके राधा-रूपको देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभु उनकी स्तुति करने लगे। महाप्रभुको श्रीराधाके भावमें आविष्ट देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभु निकट नहीं आये, कुछ दूरीपर ही रहे। श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त महाप्रभुको कोई पकड़ नहीं सकता था। महाप्रभुका आवेश दूर नहीं हो रहा था, इसलिये (भक्तोंके थके होनेपर भी) कीर्तन भी नहीं रुक रहा था ॥ 235-237 ॥
अनुभाष्य-'रहे'-रुके या विराम करे ॥ 237 ॥
श्रीस्वरूपके कौशलसे महाप्रभुकी बाह्यदशा :-
भङ्ग करि' स्वरूप सबार श्रम जानाइल।
भक्तगणेर श्रम देखि' प्रभुर बाह्य हैल ॥ 238 ॥
अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदरने इशारेसे महाप्रभुको बतलाया कि सब भक्त कीर्तन करते हुए थक गये हैं। भक्तोंके श्रमको देखकर महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये ॥ 238 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने राधाप्रेमावेशमें राधिका-मूर्ति प्रकाशित की है, ऐसा देखकर स्वयंको उस रसमें अनधिकारी जानकर श्रीनित्यानन्द प्रभु दूर ही रहे; श्रीस्वरूप गोस्वामीने इशारेसे महाप्रभुके भावावेशको भङ्ग कराया ॥ 235-238 ॥
उपवनमें जाकर सभीके द्वारा विश्राम करनेके बाद मध्याह्न-स्नान :-
सब भक्त लञा प्रभु गेला पुष्पोद्याने।
विश्राम करिया कैला मध्याह्न-स्नाने ॥ 239 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभु सभी भक्तोंको साथ लेकर पुष्पोद्यानमें चले गये। वहाँ कुछ देर विश्राम करके उन्होंने मध्याह्निक-स्नान किया ॥ 239 ॥
लक्ष्मी और जगन्नाथका बहुत प्रसाद-संग्रह :-
जगन्नाथेर प्रसाद आइल बहु उपहार।
लक्ष्मीरे प्रसाद आइल विविध प्रकार ॥ 240 ॥
भक्तोंके साथ प्रसाद सेवन; सन्ध्यामें स्नानके बाद श्रीजगन्नाथ-दर्शन :-
सबा लञा नाना-रङ्गे करिला भोजन।
सन्ध्या स्नान करि' कैल जगन्नाथ-दरशन ॥ 241 ॥
अनुवाद-तब श्रीजगन्नाथको अर्पित भोगका उच्छिष्ट बहुतसा प्रसाद और लक्ष्मीजीको अर्पित अनेक प्रकारके भोगका प्रसाद आ गया। महाप्रभुने सभी भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक भोजन किया। सन्ध्या स्नान करके महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये गये ॥ 240-241 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-कोई-कोई कपटी (धर्मध्वजी भण्ड) व्यक्ति लक्ष्मीदेवीका प्रसाद पानेपर वितर्क करते हैं। यहाँ देखिये,-श्रीमहाप्रभुने स्वयं भक्तोंको लेकर उसी प्रसादको पाया था। तात्पर्य यह है कि लक्ष्मी आदि
। 559

[ 14/240-248 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
समस्त शक्तियाँ ही श्रीभगवान्‌की दासियाँ हैं। जब जो
भक्त उन्हें (शक्तियोंको) जो भी उत्तम वस्तु अर्पित
करता है, शक्तियाँ अपने प्रभु श्रीकृष्णको वह निवेदन
करके उन वस्तुओंका सेवन करती हैं। इसलिये
भगवान्‌के दास-दासियोंका प्रसादान्न 'भगवान्‌का प्रसादान्न'
ही है, ऐसा मानकर सर्वदा ही सेवनीय है। यहाँपर और
भी कुछ विचारणीय विषय रहता है;—मायावादी नास्तिकोंके
द्वारा निवेदित खाद्य द्रव्योंको भगवान्‌की शक्तियाँ ग्रहण
करती है या नहीं, यह घोर सन्देहका विषय है।
इसलिये भगवान्‌के दास-दासियोंके प्रति शुद्ध वैष्णवों
द्वारा अर्पित निवेदित अन्नका सेवन करना ही वैष्णवोंके
लिये उचित है॥ 240-241॥
आठ दिन तक श्रीजगन्नाथका दर्शन करते हुए
नृत्य-कीर्त्तनके बाद भक्तोंके साथ नरेन्द्र सरोवरमें
जलकेलि एवं उद्यानमें भोजन :—
जगन्नाथ देखि' करेन नर्त्तन-कीर्त्तन।
नरेन्द्र जलक्रीड़ा करे लञा भक्तगण ॥ 242 ॥
उद्याने आसिया कैल वन-भोजन।
एइमत क्रीड़ा कैल प्रभु अष्टदिन ॥ 243 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथका दर्शन करते ही महाप्रभुने
वहाँ नृत्य-कीर्तन आरम्भ किया। उसके बाद भक्तोंको
साथ लेकर महाप्रभुने नरेन्द्र सरोवरमें जल-क्रीड़ा की
और फिर उद्यानमें आकर वन-भोजन किया। इस
प्रकार महाप्रभु आठ दिनों तक ऐसी लीलाएँ करते
रहे॥ 242-243॥
श्रीजगन्नाथकी पुरीमें पुनर्यात्रा :—
आर दिने जगन्नाथेर भितर-विजय।
रथे चड़ि' जगन्नाथ चले निजालय ॥ 244 ॥
अनुवाद—अगले दिन गुण्डिचा मन्दिरमें श्रीजगन्नाथ
'भितर-विजय'के बाद रथपर चढ़कर अपने स्थान
नीलाचलकी ओर चले॥ 244॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भितर-विजय'—गुण्डिचा मन्दिरमें
रत्नवेदीसे जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा—इन तीनों
विग्रहोंको जगमोहनमें रखकर उन्हें एक ही समयमें
रथपर चढ़ाया जाता है। रत्नवेदीसे उतरकर वे
जगमोहनमें जितनी देर तक रहते हैं, उसीका नाम ही
'भितर-विजय' है॥ 244॥
अनुभाष्य—'भितर-विजय'—पुनर्यात्रामें श्रीमन्दिरके
(गुण्डिचा-मन्दिरके) अन्दर वापिस नीलाचल लौटनेके
लिये यात्रा। गुण्डिचा मन्दिरसे बाहरी विजय करके पुनः
जगन्नाथ मन्दिरकी ओर गमन॥ 244॥
पहलेकी भाँति नृत्य-गीत :—
पूर्ववत् कैल प्रभु लञा भक्तगण।
परम आनन्दे करेन नर्त्तन-कीर्त्तन ॥ 245 ॥
अनुवाद—पहलेकी भाँति ही महाप्रभुने अपने भक्तोंको
साथ लेकर रथके आगे परमानन्दसे नृत्य-कीर्त्तन
किया॥ 245॥
पाहाण्डिके समय रेशमी डोरी आंशिक रूपसे छिन्न :—
जगन्नाथेर पुनः पाण्डु-विजय हइल।
एक गुटि पट्टडोरी ताँहा टूटि गेल ॥ 246 ॥
पाण्डुविजयेर तुली फाटि-फुटि याय।
जगन्नाथेर भरे तुला उड़िया पलाय ॥ 247 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथकी फिरसे पाण्डु-विजय हुई,
परन्तु अब उनके कमरमें बँधी हुई रेशमी डोरियोंमेंसे
डोरियोंका एक गुच्छा टूट गया। श्रीजगन्नाथकी पाण्डु
विजयके समय उन्हें थोड़ी-थोड़ी दूरीपर गद्दोंपर रखा
जाता है। इस बार कुछ डोरी टूट जानेसे श्रीजगन्नाथका
भार उन गद्दोंपर पड़ रहा था जिससे वे फटते जा रहे
थे और उनकी रुई उड़ती जा रही थी॥ 246-247॥
सपुत्र सत्यराजको प्रतिवर्ष श्रीजगन्नाथके
लिये रेशमी डोरी लानेका आदेश :—
कुलीनग्रामी रामानन्द, सत्यराज खाँन।
ताँरे आज्ञा दिल प्रभु करिया सम्मान ॥ 248 ॥
560 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/248-257 ]
“एइ पट्टडोरीर तुमि हओ यजमान। अनुभाष्य-‘छिण्डा’ (उड़िया भाषा)'-टूटा हुआ
प्रतिवत्सर आनिबे 'डोरी' करिया निर्माण॥”249॥ टुकड़ा॥ 250 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कुलीनग्रामवासी श्रीरामानन्द वसु श्रीजगन्नाथके लिये रेशमी डोरी बनाकर
और श्रीसत्यराज खाँनको सम्मान देते हुए आज्ञा लानेकी सेवा प्राप्त करके दोनोंको आनन्द :-
दी,—“तुम रेशमी डोरीके यजमान बन जाओ और भाग्यवान् सेइ सत्यराज, रामानन्द।
प्रतिवर्ष नयी मजबूत रेशमी डोरियाँ बनाकर लाया सेवा-आज्ञा पाञा हैल परम-आनन्द ॥ 252 ॥
करना॥”248-249॥ तभीसे प्रतिवर्ष गुण्डिचामें उनके द्वारा
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन सब रेशमी डोरियोंके परमानन्दसे रेशमी डोरी लाना :-
द्वारा तीनों मूर्तियोंकी पाण्डुविजय होती है, वे सब प्रति वत्सर गुण्डिचाते भक्तगण-सङ्गे।
रस्सियाँ बहुत देशोंसे आती थीं और आती हैं। वर्द्धमान पट्टडोरी लञा आइसे अति बड़ रङ्गे ॥ 253 ॥
जिलेके अन्तर्गत कुलीनग्रामके निकटवर्ती अनेक ग्रामोंमें अनुवाद—श्रीसत्यराज खाँन और श्रीरामानन्द बड़े
रेशमी वस्त्र बनानेके स्थान हैं, इसलिये रेशमी डोरियाँ भाग्यवान् हैं जिन्होंने महाप्रभुसे सेवा-आज्ञा पायी। उस
लानेके लिये श्रीरामानन्द वसु और सत्यराज खाँनको आज्ञाको पाकर वे परम आनन्दित हुए। इसके बाद
महाप्रभुने यजमानके रूपमें नियुक्त किया॥ 249 ॥ प्रतिवर्ष गुण्डिचा-मन्दिर मार्जनके दिन वे बड़े उत्साहसे
भक्तोंके साथ रथके लिये मजबूत रेशमी डोरियाँ लेकर
मजबूत डोरी बनानेके लिये उदाहरण आते रहे॥ 252-253 ॥
स्वरूप टूटी हुई डोरी दिखाना :-
एत बलि' दिल ताँरे छिण्डा पट्टडोरी। श्रीजगन्नाथका रत्नबेदीपर आरोहण, महाप्रभुका
“इहा देखि' करिबे डोरी अति दृढ़ करि' ॥ 250 ॥ अपने भक्तोंके साथ घर जाना :-
श्रीजगन्नाथकी रेशमी डोरी-अनन्तरूपी तबे जगन्नाथ याइ' बसिला सिंहासने।
भगवान् विष्णुका ही अर्च्चा :- महाप्रभु घरे आइला लञा भक्तगणे ॥ 254 ॥
एइ पट्टडोरीते हय 'शेष'-अधिष्ठान।
दश-मूर्त्ति हञा येंहो सेवे भगवान्॥”251॥ अनुवाद—तब श्रीजगन्नाथ अपने सिंहासनपर जाकर
विराजमान हो गये और महाप्रभु भी अपने भक्तोंके साथ
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने उन्हें टूटी हुई अपने वासस्थानपर चले आये ॥ 254 ॥
रेशमी डोरियाँ पकड़ा दीं और कहा,-“इन्हें देखो। आप
इनसे बहुत अधिक मजबूत डोरियाँ बनाकर लाना। इन भक्तोंको हेरापञ्चमीका प्रदर्शन और ब्रजलीला :-
रेशमी डोरियोंमें 'शेष'का वास है जो दस-मूर्ति धारण एइमत भक्तगणे यात्रा देखाइल।
करके भगवान्की सेवा करते हैं॥”250-251॥ भक्तगण लञा वृन्दावन-केलि कैल ॥ 255 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'शेष'-अधिष्ठान'-अनन्तदेवका चैतन्य-गोसाञिर लीला-अनन्त, अपार।
अधिष्ठान; 'दशमूर्त्ति'-आदिलीला 5/123-124 संख्या 'सहस्र-वदन' यार नाहि पाय पार ॥ 256 ॥
देखें॥ 251 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चौदहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 257 ॥
। 561

[ 14/255-257 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे 'हेरापञ्चमी'- करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन
यात्रा-दर्शनं नाम चतुर्द्दश-परिच्छेदः। कर रहा है॥255-257॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने भक्तोंको श्रीजगन्नाथ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें 'हेरा-पञ्चमी'-यात्रा-दर्शन
रथ-यात्राका दर्शन करवाया और भक्तोंको लेकर नामक चौदहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
वृन्दावनकी लीलाएँ करके उनका आस्वादन किया। अनुभाष्य—आदिलीला 10/162-163 और 17/231
श्रीचैतन्य गोसाईंकी लीलाएँ अनन्त, अपार हैं, हजार संख्या देखें॥ 256॥
मुखवाले शेष भी उन लीलाओंका पार नहीं पा सकते। चौदहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा
मध्यलीलाका प्रथम भाग समाप्त।
562 ।

श्लोक सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण]

अ
अखिलरसामृतमूर्तिः प्रसृमर ८/१४१
अघानां लवित्री जगत्क्षेम ३/२८
अतो हेतोरहेतोश्च ८/११०, १४/१६३
अत्युद्दण्डं ताण्डवं गौरचन्द्रः ११/१
अदर्शनीयानपि नीच ११/४७
अद्वैतवीथीपथिकैरुपस्याः १०/१७८
अनयाराधितो नूनं भगवान् ८/९९
अनाथबन्धो करुणैक २/५८
अनादिरादिर्गोविन्दः ८/१३६
अन्तःस्मेरतयोज्ज्वला १४/१८०
अन्यो वेद न चान्यदुःखं २/१८
अपरिकलितपूर्वः ८/१४८
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं ६/१६५
अमून्यधन्यानि दिन २/५८
अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य ८/१४८
अयि दीनदयार्द्रनाथ ४/१९७
अर्चनं वन्दनं दास्यं ९/२५९
अविद्या कर्मसंज्ञान्या ६/१५४, ८/१५२
अहङ्कार इतीयं मे ६/१६४
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं ३/६
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो ८/६३, ९/२६५
अहेरिव गतिः ८/११०, १४/१६३
अहो बत श्वपचोऽतो ११/१९२
अहो भाग्यमहो भाग्यं ६/१४९

आ
आकारादपि भेतव्यं स्त्रीणां ११/११
आज्ञायैवं गुणान् ८/६२, ९/२६४
आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था ६/१८६
आदरः परिचर्यायां ११/२९
आनन्दचिन्मयरसप्रति ८/१६२
आराधनानां सर्वेषां ११/३१
आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे ६/२५५
आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि ९/१५०
आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य ६/१०१
आहुश्च ते नलिन १/८१, १३/१३६

इ
इतस्ततस्तामनुसृत्य ८/१०६
इति द्वापर उर्वीश ६/१०२
इति पुंसार्पिता विष्णौ ९/२६०
इति रामपदेनासौ परं ९/२९
इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या ८/७५
इत्युद्धवादयोऽप्येतं ८/२१५
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं ९/१४३

ई
ईश्वरः परमः कृष्णः ८/१३६

उ
उग्रोऽप्यनुग्र एवायं स्व ८/६

ए
एकावृत्त्या तु कृष्णस्य ९/३३
एतां समास्थाय परात्म ३/६
एते चांशकलाः पुंसः ९/१४३
एवंव्रतः स्वप्रियनाम-कीर्त्या ९/२६२
एवं शशाङ्कांशुविराजिता १४/१५८

क
कंसारिरपि संसारवासना ८/१०५
कइअवरहिअं पेम्मं ण २/४२
कथा गानं नाट्यं गमन १४/२२७
कदाहमैकान्तिकनित्य १/२०६, ८/७३
कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपी १/५
कलावतीर्णावनेर्भरासुरान् ८/१४५
कलित-श्यामा-ललितो ८/१४१
कलौ नास्त्येव नास्त्येव ६/२४२
कस्यानुभावोऽस्य ८/१४६, ९/११४
का कृष्णस्य प्रणयजनिभूः ८/१८१
कालाग्नष्टं भक्तियोगं निजं ६/२५५
किन्तु प्रोद्यान्निखिल १३/८०
कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्म ६/१०८
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्ति ६/१८६
कृतानुतापः स कलिन्द ८/१०६
कृपारिणा विमुच्यैतान् ९/१
कृषिर्भूवाचकः शब्दो ९/३०
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! ७/९६
कृष्ण! केशव! ७/९६, ९/१३
कृष्णभक्तिरसभाविता ८/७०
कृष्णवर्णं त्विषाऽ ६/१०३, ११/१००
केशरीव स्वपोतानाम ८/६
क्रियते भगवत्यद्धा ९/२६०
क्वाहं दरिद्रः पापीयान् ७/१४३

ग
गतिस्थानासनादीनां १४/१८७

563

[ गर्वा–पाणि ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

गर्वाभिलाषरुदितस्मित 14/174
गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दन 9/150
गोलोक एव निवसत्य 8/162
गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ 1/2
गौरः पश्यन्नात्मवृन्दैः 14/1
गौरस्य कृष्णविच्छेदप्रलाप 2/1
गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णे 8/1

च
चलत्तारं स्फारं नयन 14/189
चित्राय स्वयमन्वयञ्जयदिह 8/194
चिदानन्दभानोः सदा 3/28
चिन्तामणिश्चरणभूषण 14/228

ज
जइ होइ कस्स विरहो 2/42
जगद्धिताय कृष्णाय 13/77
जन्माद्यस्य यतोऽन्वय 8/265
जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम 1/3
जयति जननिवासो देवकी 13/79
जयति जयति देवो 13/78
जयति जयति मेघश्यामलः 13/78
जानाति तत्त्वं 6/84, 11/104
जीवभूतां महाबाहो ययेदं 6/165
जैह्रयं केशे दृशि 8/181

ज्ञ
ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां 8/226, 9/132
ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त 8/67

त
तं वन्दे गौरजलदं 10/1
तत् किं करोमि विरलं 2/61
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो 6/261
तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं 8/70
तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् 8/94

तत्रास्माभिश्चटुलपशूपी 1/84
तथापि ते देव 6/84, 11/104
तथाप्यन्तः खेलन्मधुर 1/76
तद्वक्षोरुहचित्रकेलि 8/189
तमेवास्वादयत्यन्त 1/211
तया तिरोहितत्वाच्च 6/156
तयोरप्युभयोर्मध्ये 8/160
तयोरैक्यं परं ब्रह्म 9/30
तव कथामृतं तप्तजीवनं 14/13
तस्मात् परतरं देवि 11/31
तस्य तीर्थपदः किंवा 8/72
तां जहार दशग्रीवः 9/211
तात्कालिकं तु वैशिष्ट्यं 14/187
तावत् कर्माणि कुर्वीत 9/266
तासामाविरभूच्छौरिः 8/81,139
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि 10/12
तेजोवारिमृदां यथा 8/265
ते दुस्तरामतितरन्ति च 6/235
तेनाटवीमटसि तद् व्यथते 8/218
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः 11/192
त्वच्छैशवं त्रिभुवन 2/61
त्वयपि लब्धं 11/151

द
दिष्ट्या यदासी 8/89, 13/160
दीयमानं न गृह्णन्ति 6/270, 9/268
दीव्यद् वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः 1/4
दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा 11/32
देशं ययौ विप्रकृतेऽद्भूतेऽहं 5/1
द्विजात्मजा मे युवयोर्दि 8/145

ध
धन्यं तं नौमि चैतन्यं 7/1
धर्मान् संत्यज्य यः 8/62, 9/264

न
न देशनियमस्तत्र न 6/226
नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् 8/77
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां 8/92
न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि 2/45
न मृषा परमार्थमेव मे 1/203
नमो ब्रह्मण्यदेवाय 13/77
नष्टकुष्ठं रूपपुष्टं भक्ति 7/1
नानातन्त्रविधानेन कला 6/102
नानाभावालङ्कृताङ्गः 11/1
नानामतग्राहग्रस्तान 9/1
नानोपचार–कृतपूजनम 8/69
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त 8/80, 8/231, 9/121
नायं सुखापो 8/226, 9/132
नारायणपराः सर्वे न 9/270
नाहं विप्रो न च 13/80
निःश्रेयसाय भगवन्तान्यथा 8/40
निभृतरुन्मनो 8/223, 9/123
निमज्जतोऽनन्त भवा 11/151
निर्विचारं गुरोराज्ञा मया 10/146
निश्चिन्तो धीरललितः 8/187
निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनो 11/8
नेमं विरिञ्चो न भवो 8/78
नैच्छन्नृपस्तदुचितं महतां 9/269
नौमि तं गौरचन्द्रं यः 6/1
न्यासं विधायोत्प्रणयोऽथ 3/1

प
पद्भ्यां चलन् यः प्रतिमा 5/1
परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि 1/211
परिहारेऽपि लज्जा मे किं 1/190
परीक्षा–समये वह्निं 9/212
पाणिरोधमविरोधितवाञ्छं 14/200

564 |

श्लोक सूची पाषाण-वज्राद ]
पाषाणशुष्केन्धनभारकाण्यहो 2/28 | मद्भक्तपूजाभ्यधिका 11/29 | यशोदा वा महाभागा पपौ 8/77
पीडाभिर्नवकालकूट 2/52 | मद्भक्तानाञ्च ये भक्तास्ते 11/28 | यस्मै दातुं चोरयन् क्षीर 4/1
पीताम्बरधरः स्रग्वी 8/81, 8/139 | मध्ये मणीनां हेमानां 8/94 | यस्य प्रसादादज्ञोऽपि सद्यः 1/1
पुनर्यस्मिन्नेष क्षणमपि 2/36 | मयि भक्तिर्हि 8/89, 13/160 | या ते लीलारसपरिमल 1/84
पुरः कृष्णालोकात् स्थगित 14/189 | मयैव विहितं देवि कलौ 6/182 | या माभजन दुर्जय-गेह 8/92
प्रणतभारविटपा 8/275 | मय्यर्पणञ्च मनसः 11/30 | या या श्रुतिर्जल्पति 6/142
प्रत्यगृहीदग्रजशासनं 10/145 | महद्विचलनं नृणां गृहिणां 8/40 | यावत् क्षुदस्ति जठरे 8/69
प्रवहति रसपुष्टिं छिद्रिभूती 8/205 | महाभावस्वरूपेयं 8/160 | युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र 6/109
प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् 8/78 | माश्व गोपय येन स्यात् 6/181 | येनासीज्जगतां चित्रं 13/1
प्राप्तमन्त्रं द्रुतं शिष्टै 6/226 | माधवस्य कुरुते कर 14/200 | ये मे भक्तजनाः पार्थ 11/28
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं 6/225 | मायां मदीयमुद्गृह्य वदतां 6/109 | येषां स एष भगवान् 6/235
प्रियः सोऽयं कृष्णः 1/76 | मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं 6/182 | यो दुस्त्यजान् क्षितिसुत 9/269
प्रिय-प्रेमोल्लासोल्लसित 14/194 | मायाश्रितानां नरदारकेण 8/75 | र
प्रेमच्छेदरुजोऽवगच्छति 2/18 | मारः स्वयं नु मधुर 2/74 | रतिर्वासनया स्वाद्वी भासते 8/84
प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो 2/52 | य | रथारूढस्यारादधिपदवि 13/207
प्रेमैव गोपरामाणां काम 8/215 | यः कौमारहरः स 1/58, 13/121 | रमन्ते योगिनोऽनन्ते 9/29
ब | यच्छक्तयो वदतां वादिनां 6/108 | रसेनोत्कृष्यते कृष्ण 9/117, 9/146
बहिः क्रोधो व्यथितवत् 14/197 | यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायै 6/103, 11/100 | राढे भ्रमन् शान्तिपुरी 3/1
ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां 7/143 | यत् करोषि यदश्नासि 8/60 | राधामाधाय हृदये तत्याज 8/105
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न 8/65 | यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं 8/218 | राधायाः किलकिञ्चिता 14/181
| यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् 8/60 | राधाया भवतश्च चित्त 8/194
भ | यत्रोपगीयते नित्यं देव 11/32 | राम! राघव ! 7/96, 9/13
भवद्विधा भागवत 10/12 | यथा राधा प्रिया विष्णो 8/98 | राम रामेति रामेति 9/32
भवन्तमेवानुचर 1/206, 8/73 | यथाहेर्मनसः क्षोभस्तथा 11/11 | रासोत्सवोऽस्य भुजदण्ड 8/80,
भूतानि भगवत्यात्मन्येष 8/274 | यथोत्तरमसौ स्वाद 8/84 | 8/231, 9/121
भूमिरापोऽनलो वायुः खं 6/164 | यदा यस्यानुगृह्णाति 11/118 | रुद्धायाः पथि माधवेन 14/180
म | यदा यातो दैवान्मधुरिपुरसौ 2/36 | रूपभेदमवाप्नोति ध्यान 9/157
मणियंथा विभागेन 9/157 | यदि मे न दयिष्यसे तदा 1/203 | ल
मत्कथा श्रवणादौ वा 9/266 | यद्वाञ्छया श्री 8/146, 9/114 | लोकोत्तराणां चेतांसि को 7/73
मत्तुल्यो नास्ति पापात्मा 1/190 | यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् 8/72 | व
मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ 1/3 | यन्नो विहाय गोविन्दः 8/99 | वंशीविलास्याननलोकनं 2/45
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा 11/30 | यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं 6/149 | वज्रादपि कठोराणि मृदूनि 7/73
मदेकवर्जं कृपयिष्यतीति 11/47 | यया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा 6/155 |
। 565

[ वन-ह्लादिनी श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
वनलतास्तरव आत्मनि 8/275 | श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी 6/254 | सा चैवास्मि तथापि 1/58, 13/121
वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य 1/2 | श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं 2/28 | सार्वभौमं सर्वभूमा भक्ति 6/1
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण 8/58 | श्रीगुण्डिचा-मन्दिरमात्मवृन्दैः 12/1 | सालोक्य-सार्ष्टि 6/270, 9/268
विचारयोगे सति हन्त 6/142 | श्रीगोपालः प्रादुरासीद्वशः 4/1 | सिक्तायां कृष्णलीलामृतरस 8/210
वह्निः सीतां समानीय 9/212 | श्रीमान्रासरसारम्भी वंशी 1/5 | सिद्धान्तस्त्वभेदेऽपि 9/117, 146
वाचा सूचितशर्वरीरतिकला 8/189 | श्रीश्रीराधाश्रीलगोविन्ददेवौ 1/4 | सिषेव आत्मन्यवरुद्ध 14/158
वाष्पव्याकुलितारुण 14/181 | श्रुत्वा गोपीरसोल्लासं हृष्टः 14/1 | सीतयाराधितो वह्निशछाया 9/211
विचारयोगे सति हन्त 6/142 | श्रेयो ह्येवं भवत्याश्च 10/146 | सुकुमारा भवेद्यत्र ललितं 14/192
विच्छेदावग्रहम्लान 10/1 | स | सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो 6/104, 10/170
विच्छेदेऽस्मिन् प्रभोरन्त्य 2/1 | संसारकूपपतितो 1/81, 13/136 | स्तनाधरादिग्रहणे हृत्प्रीत 14/197
विदग्धो नवतारुण्यः 8/187 | संसारतापानखिलान् 6/155 | स्त्रिय उरगेन्द्रभोग 8/223, 9/123
विन्यासभङ्गिरङ्गानां 14/192 | सख्यः श्रीराधिकाया 8/210 | स्थानस्थिताः श्रुतिगतां 8/67
विभुरपि सुखरूपः 8/205 | सङ्गीकरणं हर्षादुच्यते 14/174 | स्थिरचरवृजिनघ्नः सुस्मित 13/79
विश्लेषामनुरञ्नेन जन 8/143 | सञ्चार्य रामाभिध-भक्त 8/1 | स्वचित्तवच्छीतलममुज्ज्वल 12/1
विष्णुराराध्यते पन्था 8/58 | स जहाति मतिं लोके 11/118 | स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरी 8/143
विष्णुशक्तिः परा 6/154, 8/152 | स जीयात् कृष्णचैतन्यः 13/1 | स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि 9/270
वृन्दावने व्रजधनं ननु 14/228 | सन्दर्शनं विषयाणामथ 11/8 | स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च 6/181
वेणीमृजो नु मम 2/74 | संन्यासकृच्छ्रमः 6/104, 10/170 | ह
वैराग्यविद्या-निजभक्तियोग 6/254 | समः सर्वेषु भूतेषु 8/65 | हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव 6/242
श | सर्वगोपीषु सैवैका 8/98 | हसत्यथो रोदिति रौति 9/262
शठेन केनापि वयं हठेन 10/178 | सर्वधर्मान् परित्यज्य 8/63, 9/265 | हृदयं त्वदलोककातरं 4/197
शश्वद्भक्तिविनोदया समदया 10/119 | सर्वभूतेषु भूपाल 6/156 | हृद्वाग्वपुभिर्विदधन्नमस्ते 6/261
शुक्लो रक्तस्तथा पीत 6/101 | सर्वभूतेषु यः पश्येद्ध 8/274 | हे देव, हे दयित 2/65
शुष्कं पर्युषितं वापि 6/225 | स शुश्रूवान्मातरि भार्गवेण 10/145 | हे नाथ, हे रमण 2/65
श्र | स श्रीचैतन्यदेवो मे 1/1 | हेलोद्बूलित-खेदया 10/119
श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः 9/259 | सहर्षं गायद्भिः परिवृत 13/207 | हिया तिर्यग्-ग्रीवा 14/194
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं 14/13 | सहस्रनामभिस्तुल्यं राम 9/32 | ह्लादतापकरी मिश्रा 6/157, 8/155
श्रियः कान्ताः कान्तः 14/227 | सहस्रनाम्नां पुण्यानां 9/33 | ह्लादिनी सन्धिनी 6/157, 8/155
566 ।

प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]
अ
अकैतव कृष्णप्रेम, येन 2/43 | अतएव हङ तोमार आमि 6/56 | 'अपादान', 'करण' 6/144
अखिल ब्रह्माण्ड देखुक 1/202 | अतिस्तुति' हय एइ 10/182 | अपूर्वामृत-नदी बहे 8/100
अगाध ईश्वर-लीला 9/159 | अद्यावधि सेवा करे तत्त्व 9/248 | अप्राकृत वस्तु नहे 9/195
अग्नि-परीक्षा दिते यबे 9/206 | अद्वैत कहे, -अवधूतेर 12/189 | अवश्य करिब आमि 7/44
अग्नि यैछे निज-धाम 2/26 | अद्वैत-सिद्धान्ते' बाधे 12/193 | अभागिया ज्ञानी आस्वादये 8/258
अङ्ग हैते येइ कीड़ा 7/137 | अद्वैतादि भक्तगण निमन्त्रण 14/66 | 'अभिधा'-वृत्ति छाड़ि' 6/134
अङ्गुलिते क्षत हबे जानि' 13/166 | अधिक लाभ पाइये, आर 9/118 | अरसज्ञ काक चुषे ज्ञान 8/257
अङिङ्घ्रपद्मसुधाय कहे 8/225 | अधिकारी हयेन तँहो 7/62 | अर्जुनेर रथे कृष्ण हय 9/99
अचिन्त्यशक्ति ईश्वर 6/170 | अनन्त ब्रह्माण्ड इँहा 8/134 | अर्जुनेरे कहिलेन हित 9/100
अचिराते कृष्ण तोमा 7/148 | अनन्त वैकुण्ठ, आर 8/134 | अर्धरात्रे दुइ भाइ आइला 1/183
अज्ञ-स्थाने किछु नहे 6/79 | अनुमान प्रमाण नहे ईश्वर 6/82 | अलौकिक वाक्य चेष्टा 7/66
अतएव अप्राकृत' ब्रह्मेर 6/146 | अन्तरङ्ग-भक्त जाने, याँर 13/54 | अलौकिक-लीलाय यार 7/111
अतएव आत्मपर्यन्त-सर्व 8/142 | अन्तरङ्गा-चिच्छक्ति 6/160 | अल्प अन्न नाहि आइसे 11/200
अतएव ईश्वरतत्त्व ना पार 6/86 | 'अन्तरङ्गा', 'बहिरङ्गा' 8/151 | अल्पाक्षरे कहे सिद्धान्त 9/240
अतएव ऋणी' हय 8/91 | अन्तरङ्गा स्वरूप शक्ति' 8/151 | अष्टादश अर्थ कैल 6/195
अतएव कल्पना करि' 6/180 | अन्तरे सकल जानेन 14/20 | अष्टादशवर्ष केवल 1/22
अतएव कृष्णेर करे परम 14/157 | अन्तर्यामी ईश्वरेर एइ 8/264 | असम्भव कह केने, येइ 5/21
अतएव गोपीभाव करि' 8/227 | अन्न-दोषे संन्यासीर दोष 12/190 | अस्पृश्य, अदृश्य सेइ 6/167
अतएव जगन्नाथेर कृपार 13/17 | अन्य ग्राम निस्तारये 9/8 |
अतएव तोमाय-आमाय 8/290 | अन्य देहे ना पाइये 9/137 | आ
अतएव 'त्रियुग' करि' 6/95, 99 | अन्यापेक्षा हैले प्रेमेर 8/101 | आकाशादिर गुण येन 8/87
अतएव नाम हैल क्षीरचोरा 4/20 | अन्येरे कि कथा, आमि 8/45 | आकृत्ये-प्रकृत्ये तोमार 8/43
अतएव लक्ष्मी-आद्येर हरे 9/142 | अन्येरे ये दुःख मने 2/23 | आगे मन नाहि चले 1/160
अतएव लक्ष्मीर कृष्णे 9/144 | अन्येरे हृदय-मन, मोर 13/137 | आगे यदि कृष्ण देन 10/180
अतएव श्रुति कहे, ब्रह्म 6/151 | अन्येरे अन्य कह, नाहि 10/157 | आचार्य कहे,-अनुमाने 6/81
अतएव स्वरूप गोसाञि 10/114 | अन्योन्ये दुँहार दुँहा 1/50 | आचार्य कहे,-वर्णाश्रम 9/256
अतएव स्वरूप-शक्ति हय 8/153 | अपवित्र अन्न एक 9/53 | आचार्य कहे, -विज्ञमत 6/80
| अपाणि-पाद'-श्रुति वर्जे 6/150 | आचार्य कहे,-तुमि याँहा 3/33
| | आचार्य-गोसाञिर पुत्र 12/143
। 567

[ आचार्येर-एइ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
आचार्येर दोष नाहि 6/180
आचार्येर श्रद्धा-भक्ति 3/203
आछे दुइ-चारि जन 13/156
आजन्म करिनु मुञि 10/175
आजि कृष्णप्राप्ति-योग्य 6/234
आजि तुमि निष्कपटे 6/232
आजि मुञि अनायासे 6/230
आजि मोर श्लाघ्य 7/125
आजि से खण्डिल 6/233
आजि हैते दुँहार नाम 1/208
आज्ञा নহে, तबु करिह 11/122
आत्मनिन्दा करि' लैल 6/201
आत्मसुख-सङ्ग हैते 8/212
“आत्मा वै जायते पुत्रः” 12/56
आत्मारामश्च-श्लोके 6/194
आत्माराम' पर्यन्त करे 6/185
आत्मीय-ज्ञाने मोरे 10/57
आनन्दचिन्मयरूप रसेर 8/158
आनन्दांशे 'ह्लादिनी' 6/159, 8/154
आनुषङ्गे प्रेममय कैले 8/279
आपन-इच्छाय चले करिते 13/13
आपन-इच्छाय बुलुन, याहाँ 1/170
आपन वासार चाले 1/61
आपन-हृदय येन धरिल 12/106
आपणार दुःख-सुख ताँहा 3/185
आपनि आचरि' जीवे 1/22
आपने अयोग्य देखि' 1/204
आपने वैराग्य-दुःख 7/30
आमा उद्धारिते बली 1/199
आमा उद्धारिया यदि 1/200
आमा उद्धारिले तुमि 6/213
आमा द्रवाइले तुमि 6/214
आमा निस्तारिते तोमार 8/38
आमार आज्ञाय गुरु 7/128
आमार ठाकुर कृष्ण 9/112
आमार वचने ताँरे 7/63
आमार ब्राह्मण तुमि 9/229
आमार भाग्ये नाहि, तुमि 13/97
आमा लञा पुनः 13/131
आमि अकुलीन आर 5/22
आमि-एक वातुल 8/290
आमि कभु लोकापेक्षा 7/27
आमि कि करिब, मन 11/38
आमि कोन् क्षुद्रजीव 12/27
आमि जीव,-क्षुद्रबुद्धि 9/125
आमि त' गृहस्थ-ब्राह्मण 12/191
आमि बालक-संन्यासी 6/59
आमि वृद्ध जरातुर 2/90
आमिह तोमार स्पर्शे 8/45
आमिह संन्यासी देख 9/230
आर विप्र-युवा, ताँर 5/16
आर्य सरल विप्रेर 9/227
आलालनाथे गेला प्रभु 11/63
इ
इतस्ततः भ्रमि' काँहा 8/114
इष्ट ना पाइले निज 12/31
इहलोक, परलोक तार 7/111
इँहाके चन्दन दिले 4/160
इहा आस्वादिते आर 4/195
इँहार मध्ये राधार 8/97
इँहा लोकारण्य, हाती 13/128
इँहा-सबार वश प्रभु 7/29
इहाँ हैते चल, प्रभु 1/222
इँहो केने दण्ड भाङ्गे 5/157
इँहो त' साक्षात् कृष्ण 6/200
इँहो दामोदर-स्वरूप 14/217
ई
ईश्वर-इच्छाय चले, ना 13/28
ईश्वर-तत्त्वे भेद मानिले 9/155
ईश्वरपुरीर भृत्य, — 'गोविन्द' 10/132
ईश्वर-प्रेयसी सीता 9/192
ईश्वर-मन्दिरे मोर पद 12/126
ईश्वरेर कृपा जाति-कुल 10/138
ईश्वरेर कृपा নহে वेद 10/137
ईश्वरेर कृपा-लेश हयत' 6/83
ईश्वरेर कृपा-लेश नाहिक 6/86
ईश्वरेर परोक्ष आज्ञा-क्षौर 11/113
ईश्वरेर लीला-कोटिसमुद्र 9/125
ईश्वरेर श्रीविग्रह सच्चिदानन्द 6/166
उ
उच्छलित करे यबे तार 14/85
उठह गोपाल' बलि' उच्चैः 12/148
उठह पूजारी, कर द्वार 4/127
उठाञा सेइ कीड़ा राखे 7/137
उठि' महाप्रभु ताँरे चापड़ 1/68
उत्तम हञा राजा करे 13/17
उद्घूर्णा-प्रलाप तैछे प्रभुर 1/87
उदय करये यदि, तबे 1/82
उन्मादे करिल तँह संन्यास 10/107
उपनिषद्-शब्दे येइ मुख्य 6/133
उपास्येर मध्ये कोन् 8/255
उलटिया आमा ना करिह 5/98
ऊ
ऊषर-भूमिते येन बीजेर 6/105
ए
एइ इच्छाय लज्जा पाञा 4/121
एइ कलिकाले विष्णुर् 6/94
एइ कलिकाले आर 9/362
568 ।

पद्य सूची एइ-किवा ]
एइ गुणे कृष्ण ११/२७ । एक रामानन्द राय बहु ९/३५७ । कहिबार कथा नय, कहिले २/८३
एइ तिने हरे सिद्ध ६/१९७ । एकसेर अन्न रान्धि' करिह ५/१०० । कहेन यदि, पुनरपि योग ६/७६
एइ तीर्थे शङ्करारण्येर ९/३०० । एकाकी याइब, केहो सङ्गे ७/११ । काकेरे गरुड़ करे, —ऐछे १२/१८२
एइ दुइ श्लोक-भक्त ६/२५६ । एतदिन नाहि जानि ८/९६ । काङ्गालेर भोजन-रङ्ग १४/४५
एइ देख, चैतन्येर कृपा १४/१६ । एथा नित्यानन्दप्रभु कैल ५/१४२ । काणाकड़ि-छिद्र सम २/३१
एइ देख तोमार गौड़ीया'र १२/१२५ । एथाय रहिब आमि, ना ५/१०७ । काणे मुद्रा लइ' मुञि १२/२०
एइ धुया-गाने नाचेन १/५६ । एबार ना याबेन प्रभु १/१६१ । कान्दिया बलेन प्रभु, —शुन ३/१४५
एइ पट्टडोरीते हय शेष' १४/२५१ । एबे अहङ्कार मोर जन्मिबे ७/१४६ । कानाइर नाटशाला' पर्यन्त १/१५९
एइ प्रेमार वश कृष्ण ८/८८ । एबे आमार बड़ भाइ ११/१४८ । कानाञिर नाटशाला' हैते १/१६२
एइ प्रेमे'र अनुरूप ना ८/९१ । एबे आमि इँहा आनि' १०/६५ । कानुप्रेमविषे मोर तनु ३/१२४
एइ भिक्षा मागौं, —मोरे ३/१८९ । एबे कपट कर, —तोमार ८/२८० । कान्त-वक्षःस्थिता ९/१११
एइ राजवेश, सङ्गे सब १३/१२९ । एबे जानिलुँ साध्य-साधन ८/११७ । कामक्रीड़ा-साम्ये तार ८/२१४
एइमत गौर-श्यामे, दों'हे १३/११९ । एबे तोमा देखि मुञि ८/२६७ । कामगायत्री, कामबीजे ८/१३७
एइमत दुँहे स्तुति करे ८/४७ । ए-सब वैष्णव-एइ क्षेत्रेर १०/४७ । कायमनोवाक्ये व्यवहारे १२/५०
एइमत परम्पराय देश ७/११८ । एसब सिद्धान्त तबे तुमिह ६/१०६ । कारुण्यामृत-धाराय स्नान ८/१६६
एइमत 'वैष्णव' कैल ७/१०१ । ऐ । काठनारी-स्पर्शे यैछे ११/१०
एइमत 'वैष्णव' हैल ७/१०४ । ऐछे अचिन्त्य भगवानेर ६/१८५ । काँहा करौं, काँहा पाङ २/१५
एइमत लोके चैतन्य १/३० । ऐछे बात पुनरपि मुखे ११/१२ । काँहा तुमि-साक्षात् ईश्वर ८/३५
एइमते कल्पित भाष्ये ६/१७६ । ऐछे शक्ति कार हय ९/३१५ । काँहा तुमि सेइ कृष्ण ९/१५८
एइ-महाभागवत, याँहार १२/६१ । ऐश्वर्यज्ञाने नाहि कोन ९/१३० । काँहा बहिर्मुख तार्किक १२/१८४
एइ मोर मनेर कथा १/२१३ । ऐश्वर्य ना जाने इँहो १४/२१७ । काँहा मोर प्राणनाथ २/१५
एइ रागमार्गे आछे सूक्ष्म ११/११२ । क । काँहार स्मरण जीव करिबे ८/२५१
एइरूपे नृत्य आगे हबे ७/८२ । कपोतेश्वर देखिते गेला ५/१४२ । काहारे कहिब, केबा जाने २/१६
एइ लागि' गीता-पाठ ९/१०१ । कभु एक मूर्ति, कभु १३/६४ । कि कहिब रे सखि ३/११४
एइ लागि' सुखभोग छाड़ि' ९/११३ । कभु ना बाधिबे तोमार ७/२९ । कि कहिये भाल ८/१२२, १९७
एइ श्लोकेर अर्थ जाने १/५९ । कर्मनिन्दा, कर्मत्याग ९/२६३ । किन्तु अनुरागी लोकेर १२/३१
एइ हय कृष्णभक्तेर श्रेष्ठ ९/२५६ । कर्म हैते प्रेमभक्ति कृष्णे ९/२६३ । किन्तु आछिलाङ भाल ७/१४६
एकइ विग्रहे करे ९/१५४, १५६ । कलिकाले धर्म—कृष्णनाम ११/९८ । किन्तु तुमि अर्थ कैले ६/१९२
एक ईश्वर-भक्तेर ध्यान ९/१५६ । कलिकाले लीला‌वतार ना ६/९९ । किन्तु याँर येइ रस ८/८३
एक-दुइ गणने पञ्च ८/८५ । कलियुगे अवतार नाहि ६/९५ । किवा आमि आगे याइ ५/१५४
एक वस्तु बिना सेइ १२/१९४ । कल्पनाथें तुमि ताहा ६/१३२ । किवा गौरचन्द्र इहा करे ४/१९५
एक बहिर्वास यदि देह' १२/३४ । कल्पवृक्ष-लतार-याँहा १४/२२२ । किवा विप्र, किबा न्यासी ८/१२७
एक महाधनी क्षत्रिय ४/१०१ । कह यदि, तबे आमाय ११/१२ । किवा मार' ब्रजवासी १३/१४५
। 569

[ किम्वा-गुण श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
किम्वा नवम पदार्थ 6/272 कृष्णप्राप्तिर उपाय बहुविध 8/82 कृष्णेर विलासमूर्त्ति 9/142
कीर्त्तनीयार परिश्रम जानि' 14/38 कृष्णप्रीत्ये करि तोमार 5/23 कृष्णेर विशुद्धप्रेम-रत्नेर 8/180
कीर्त्तिगण-मध्ये जीवेर 8/245 कृष्णप्रेम याँर, सेइ मुक्त 8/248 कृष्णेर मधुर वाणी 2/31
कु-विषय-विष्ठा-गर्त्ते 1/198 कृष्णप्रेमसेवा-फलेर परम 9/258 कृष्णेर-स्वरूप' कह राधार 8/118
कुलिया नगर हैते पथ 1/156 कृष्ण-प्रेमामृत पान करे 8/258 केमने संन्यास-धर्म हबेक 6/74
कृतघ्नता हय, तोमाय ना 5/20 कृष्णप्रेमा सुनिर्मल, येन 2/48 केशे धरि' विप्रे लञा 9/233
कृतमालाय स्नान करि' 9/181 कृष्ण-प्रेमे प्रतिष्ठा चले 4/147 केह ज्ञानी, केह कर्मी 9/9
कृपा करि' कह, यदि 8/95 कृष्ण-वंशी करे याँहा 14/226 केह हय तत्त्ववादी', केह 9/11
कृपा करि' कह, राय 8/196 कृष्णभक्ति बलिया याँहार 8/245 केह ताँरे पुत्र-ज्ञाने 9/129
कृपा-पाश गलाय बान्धि' 10/125 कृष्णभक्त-विरह बिना 8/247 केह सखा-ज्ञाने जिनि' 9/129
कृपा बिना ईश्वरेरे কেহ 6/82 कृष्णभक्त-सङ्ग बिना श्रेयः 8/250 कैशोर-वयस सफल कैल 8/188
कृपा बिना ब्रह्मादिक 13/59 कृष्णमूर्ति देखि' प्रभु 9/249 कोटि जन्मे तोमार ऋण 3/146
कृष्ण आजि निष्कपटे 6/232 कृष्ण याँहा धनी, ताँहा 14/220 कोन् अर्थ जानि' तोमार 9/97
कृष्ण उपदेशि' कर जीवेरे 7/148 कृष्णरस-तत्त्ववेत्ता, देह 10/111 कोन-जन्मे मोरे अवश्य 11/24
कृष्ण-कर-पदतल 2/34 कृष्ण लञा व्रजे याइ 1/56 कौतुके पुरी ताँरे पुछिल 9/294
कृष्ण कहे, - प्रतिमा चले 5/95 कृष्ण लागि' पति-आगे 12/32 कौतुके लक्ष्मी चाहेन 9/116
कृष्ण' कृष्ण' कहि करे 12/112 कृष्णलीला-मनोवृत्ति-सखी 8/176 क्रोध करि' रास छाड़ि' 8/111
कृष्णके आह्लादे, तांते 8/156 कृष्णलीलामृत यदि लताके 8/209 क्ष
कृष्णके कराय श्यामरस 8/179 कृष्णसङ्गे पतिव्रता-धर्म 9/118 क्षणे क्षणे कर तुमि 11/190
कृष्णचैतन्य-निकटे याइ' 10/133 कृष्ण-सह निजलीलाय 8/206 क्षीर एक राखियाछि 4/127
कृष्णोते अधिक लीला 9/115 कृष्णसह राधिकार लीला 8/207 क्षीर लह एइ, यार 4/133
कृष्णदास'-नामे एइ सरल 7/39 कृष्णसुख-तात्पर्य गोपीभाव 8/216 ख
कृष्णनाम, कृष्णकथा, कृष्ण 3/190 कृष्णस्फूर्त्त्ये ताँर मन 9/105 खण्ड खण्ड हैल भट्टारि 9/232
कृष्ण-नाम-गुण छाड़ि 1/270 कृष्णाश्रय हय, छाड़े वेद 11/117 ग
कृष्ण-नाम-गुण-लीला 8/251 कृष्णे मति रहु' बलि' 6/48 गङ्गातीरे लञा गेला 'यमुना' 1/93
कृष्णनाम लोकमुखे शुनि' 7/117 कृष्णे सुख दिते करे 8/217 गङ्गाय यमुना बहे हञा 3/36
कृष्णनाम स्फुरे मुखे 10/176 कृष्णेर अधरामृत, कृष्ण 2/32 गन्ध बाड़े, तैछे एइ 4/192
कृष्णनाम स्फुरे, रामनाम 9/27 कृष्णेर अनन्त-शक्ति, ताते 8/150 गरुड़ेर पाशे राहि' दर्शन 6/63
कृष्णनाम हइल सङ्केत 12/113 कृष्णेर-उज्ज्वल रस 8/170 गान-मध्ये कोन् गान 8/249
कृष्णनामामृत-वन्याय देश 7/118 कृष्णेर दर्शन पाञा 13/124 गिरिधातु-शिखिपिच्छ-गुञ्जा 14/204
कृष्ण-नारायण, यैछे 9/153 कृष्णेर प्रतिज्ञा दृढ़ सर्व 8/90 गीताशास्त्रे जीवरूप शक्ति' 6/163
कृष्णनिषेवण करि निभृते 3/9 कृष्णेर विग्रह येइ सत्य 6/264 गुण-दोषोद्गार-छले सबा 7/32
कृष्णप्राप्ति-तारतम्य 8/82 कृष्णेर विरहलीला प्रभुर 1/51
570 ।

पद्य सूची गुण–जय ]
गुणाधिक्ये स्वादाधिक्य ८/८६
गुरु–आज्ञा दियाछेन, कि १०/१४३
गुरु–आज्ञा ना लङ्घिये १०/१४४
गुरुकर्णे कह कृष्णनाम ९/५९
गुरु–कर्णे कहे सबे ९/६१
गुरुबुद्धये छोटविप्र बहु ५/३४
गुरुर किङ्कर हय मान्य १०/१४२
गृह–सहित आत्मा ताँरे १०/३२
गृहे रहि' कृष्णनाम ७/१२७
गोपजाति कृष्ण, गोपी ९/१३५
गोप–बालक सब प्रभुरे ३/१३
गोपालचम्पू–नामे ग्रन्थ १/४४
गोपाल–चरणे मागे,—चल ५/१२२
गोपाल यदि साक्षी देन ५/७७
गोपालेर आगे कह ए ५/३१
गोपालेर आगे पड़े ५/१११
गोपालेर सहजे प्रीति ४/९५
गोपिकार प्रेमे नाहि १४/१५७
गोपिकार मन हरिते ९/१४७
गोपी–आनुगत्य बिना ८/२२९
गोपीगण बिना कृष्णेरे १४/१२३
गोपीगणेर रास–नृत्य ८/१०४
गोपीचन्दन–तले आछिल ९/२४७
गोपीद्वारे लक्ष्मी करे ९/१५५
गोपीनाथ आमार से ४/१६०
गोपीभावे विरहे प्रभु ११/६३
गोपी–रागाणुगा हञा ९/१३६
गोपी–लक्ष्मी–भेद ९/१५३,१५४
गोपेन्द्रसुत बिना तेंहो ८/२८६
गोविन्द–विरुदावली, ताहार १/४०
गो–ब्राह्मण–द्रोहि–सङ्गे १/१९७
गोसाञिर सङ्गे रहे ९/२२६
गौड़–निकट आसिते नाहि १/२१२
गौड़ हइते आइला दुइ ४/१०३
गौर अङ्ग नहे मोर ८/२८६
गौर आगे चले, श्याम १३/११८
गौर यदि पाछे चले १३/११८
ग्राम्यवार्त्ता–भये द्वितीय ४/१७९
घ
घरे आनि' प्रभुर कैल ७/१२२
घरे कृष्ण भजि' मोरे ७/६९
घरे याञा कर सदा ३/१९०
घषिते घषिते यैछे मलयज ४/१९२
च
चण्डीदास, विद्यापति, रायेर २/७७
चतुर्भुज–मूर्ति' देखाय ९/१४९
चतुर्भुज–रूप प्रभु हइला ६/२०२
चन्दनेश्वर' निजपुत्र दिल ६/३३
चब्बिश বৎসর शेष १/१६, ३/३
चर्म्माम्बर–परिधाने संसार १०/१५९
चातुर्मास्य महाप्रभु १/११०
चापड़ खाञा कृ
चापड़ मारिया तारे कैल १३/९५
चाले गोंजा तालपत्रे १/६६
'चिच्छक्ति', 'मायाशक्ति' ८/१५०
चित्त काढ़ि तोमा हैते १३/१४०
चिदंशे 'सम्वित्' ६/१५९, ८/१५४
चिन्तामणिगण–दासी १४/२२१
चिन्तामणिमय भूमि रत्नेर १४/२२१
चिरदिने माधव मन्दिरे ३/११४
चुरि करि' राधाके निल ८/१०१
चैतन्य–गोसाञि याँरे बले १/२७
चैतन्यचन्द्रेर लीला–अगाध ९/३६३
चैतन्य–चरण बिना नाहि ६/२३७
चैतन्यचरित शुन श्रद्धा ९/३६१
चैतन्यचरित श्रद्धाय शुने ९/३६४
चैतन्य–प्रसादे मनेर ६/२२४
चैतन्यलीला–रत्न–सार २/८४
चैतन्यलीलार व्यास–दास १/१३
चैतन्य' सेव, चैतन्य' गाओ १/२९
चैतन्यें' ये भक्ति करे १/२९
चैतन्येर प्रिय येहाँ १/२६
चैतन्येर भक्तवात्सल्य ७/३०
चैतन्येर सृष्टि–एइ प्रेम ११/९७
चौद्दभुवने वैसे यत जीव १/२६७
छ
छि, छि, विषयीर स्पर्श १३/१८२
छोटविप्र बले,—ठाकुर ५/३३
छोट हञा मुकुन्द एबे ११/१४०
ज
जगत् निस्तारिले तुमि ६/२१३
जगत् ये मिथ्या नहे ६/१७३
जगतेर माता सीता ९/२०२
जगदानन्द चाहे आमा ७/२१
जगद्रूप हय ईश्वर ६/१७१
जगन्नाथ–अचल, तुमि १०/१६३
जगन्नाथ–दर्शने विचार ११/३८
जगन्नाथ'–नाम, पदवी ६/५१
जगन्नाथ–मग्न प्रभुर १३/११७
जगन्नाथ–मन्दिरे ना १/६३
जगन्नाथ मिश्र–पूर्वाश्रमे ९/३०१
जगन्नाथेर ब्राह्मणी, तँह ९/२९७
जगन्माता महालक्ष्मी ९/१८९
जगाइ माधाइ करियाछेन ११/४५
जगाइ–माधाइ हैते कोटी १/१९६
'जज गग' 'जज गग' १३/१०४
जन्मकुलशीलाचार ना १२/१९२
जन्मे जन्मे तुमि दुइ १/२१५
जय जय महाप्रभु १/२७३
। 571

[ जल-ताहाते श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
जलपात्र-वस्त्र बहि' ७/४० | तबे जानि,-राधाय कृष्णे ८/१०२ | ताँरे प्रश्न कैल प्रभु ९/२५४
जानि' वा ना जानि' ३/१४७ | तबे प्रभु ब्रजे पाठाइल १/३१ | ताँ-सबार प्रसादे मिले १२/९
जीव-व्याप्य, ब्रह्म १०/१६८ | तबे महाप्रभु ताँर बुके १२/१४८ | ताँहा उपवास, याँहा नाहि ११/११४
जीवे ना सम्भवे एइ ८/४३ | तबे मायासीता अग्न्ये ९/२०७ | ताँहा गोपवेश, सङ्गे मुरली १३/१२९
जीवेर अस्थि-विष्ठा दुइ ६/१३६ | तबे सेइ कृष्णदासे गौड़े १०/७४ | ताँहा पुष्पारण्य, भृङ्ग १३/१२८
जीवेर जीवन चञ्चल २/२४ | तबे हासि' ताँरे प्रभु ८/२८१ | ताँहा बिना रासलीला ८/११३
जीवेर देहे आत्मबुद्धि ६/१७३ | तर्कनिष्ठ हृदय तोमार ६/१०० | ताँहार सन्तोषे भक्ति ५/२४
जीवेर निस्तार लागि' ६/१६९ | तर्क-प्रधान बौद्धशास्त्र ९/४९ | ताँहारे मलिन कैल एक १२/५४
जीयाओ आमार गुरु ९/५८ | तर्क-शास्त्रे जड़ आमि ६/२१४ | ता'ते सुगन्धि देह ८/१६५
ज्ञ | तर्केइ खण्डिल प्रभु, ना ९/४९ | तावत् तोमार सङ्ग ८/२३९
ज्ञान-कर्मपाश हैते हय ६/२८४ | तर्जनीते भूमे लिखे १३/१६५ | तावत् स्पर्शमणि केह ६/२७९
ठ | ताँर आज्ञाय करौं ताँर १/१३ | तामा, काँसा, रूपा, सोना ८/२९३
ठाकुरेर नासाते यदि ५/१२७ | ताँर एक योग्य पुत्र ९/२९९ | तार अनुसन्धान बिना १४/१६
ठेलितेइ चलिल रथ १३/१९० | ताँर ऐछे वाक्य स्फुरे ६/२७८ | तार अस्त्र तार अङ्गे ९/२३२
त | भट्ट कहे,-ताँर कृपालेश ११/१०२ | तार एक प्रेम-लेश ११/२५
तटस्थ हञा विचारिले ८/८३ | ताँर गुण गणिबे केमने ८/१८४ | तार पाछे पाछे गोपाल ५/१०१
तत्तत्पद-प्राधान्ये 'आत्माराम' ६/१९५ | ताँर गौरकान्त्ये तोमार ८/२६८ | तार प्रतिफल मोरे देह ३/१६५
तत्त्ववादिगण प्रभुके ९/२५० | ताँर ठाञि गोपालेर लुकान ४/७८ | तार मध्ये एक-मूर्त्तये ८/१०८
तत्त्ववादी-आचार्य-सब ९/२५४ | ताँर नव अर्थ-मध्ये ६/१९३ | तार मध्ये छय वत्सर १/१९, २३
तत्त्वमसि'-जीव-हेतु ६/१७५ | ताँ'र निन्दा हय यदि ३/१८१ | तार मुक्ति फल नह ६/२६५
तथापि आपन-गणे १३/१८५ | ताँर प्रतिज्ञा-मोरे ना ११/४८ | तार शुक्लपक्षे प्रभु करिला १/१६
तथापि आमार मन १३/१२७ | ताँर भक्तिवशे गोपाल ५/१२३ | तार शेष येइ रहे १/५१
तथापि चैतन्येर करे १/२८ | ताँर भ्रातृपुत्र नाम-श्रीजीव १/४२ | ताँरा दुइजन जानाइला १/१८४
तथापि तोमार गुणे १/२०४ | ताँर मन कृष्णमाया नारे ८/१२९ | तारुण्यामृत-धाराय स्नान ८/१६६
तथापि ना पाइल ब्रजे ८/२३० | ताँर येइ सुख, ताहा ३/१८५ | तारे ध्यान शिक्षा कराह १३/१४०
तथापि बाहिरे कहे निष्ठुर १२/२२ | ताँर सङ्गे बहु आइला ८/१५ | तार्किक-मीमांसक, यत ९/४२
तथापि यवन जाति, ना १/२२३ | ताँर स्पर्श नाहि याय ९/११६ | तार्किक-शृगाल-सङ्गे १२/१८३
तथापि राधिका यत्ने ८/२११ | ताँर हस्त-स्पर्शं पुनः ४/७७ | ताहा खाञा तोमार सङ्गे ५/१००
तथापि लौकिकलीला, लोक १/२२५ | ताँरे ईश्वर करि' नाहि ९/१२८ | ताहातेइ अनुमानि ८/११५
तप करि' कैछे कृष्ण ९/१२२ | ताँरे देखि' महाप्रभुर कृष्ण १२/६० | ताहाते दृष्टान्त-उपनिषद् ८/२२२
तबे आमार मनोवाञ्छा १३/१३१ | ताँरे देखि' हय मोर ९/१०० | ताहाते दृष्टान्त-लक्ष्मी ८/२३०
तबे केने पण्डित सब ११/१०१ | ताँरे ना देखिया व्याकुल ८/१११ | ताहाते प्रकट देखि स-वंशी ८/२६९
| ताँरे निराकार करि' करह ६/१४० | ताहाते विख्यात इँहो परम ६/७९
572 |

पद्य सूची
ताहा-दुइ ]

ताहा देखि' महाप्रभुर मने 12/123 | तोमाके तद्रूप देखि' 10/176 | तोमार मने येइ उठे 8/132
ताहा ना करिया केने 11/111 | तोमाके ये प्रीति करे 11/26 | तोमार ये अन्यवेश, अन्य 13/146
ताहा पाञा प्राण राखे 12/34 | तोमाते ईश्वर-कृपा इथे 6/88 | तोमार ये शिष्य कहे 6/107
ताहा बिना अन्यत्र नाहि 9/289 | तोमाते ये एत प्रीति 11/27 | तोमार लागि' जगन्नाथे 3/197
ताहार महिमा तबे हृदय 9/36 | तोमा छाड़ि' अन्यत्र गेनु 10/123 | तोमार शरीर एइ, मोर 3/145
ताहा सहि, तोमार विच्छेद 7/48 | तोमा-दुँहा देखिते मोर 1/212 | तोमार शिक्षाय पड़ि येन 8/121
तेंहो जीव नहेन, हन 10/13 | तोमा देखि' कृष्णनाम 9/26 | तोमार सङ्ग लागि' मोर 6/60
तेंह-प्रेमाधीन, तोमार 11/52 | तोमा देखि' कृष्ण' हैल 10/175 | तोमार सङ्गेर योग्य 7/64
तेंहो कहे, –हङ मुञि 8/21 | तोमा बिना अन्य नाहि 8/236 | तोमार सम्प्रदाये देखि 9/276
तेंहो कहे, मोर प्रभु 1/27 | तोमा-बिना केह ইহা 8/119 | तोमार सन्मुखे देखि 8/268
तेंहो गौड़देश भासाइल 1/24 | तोमा-सङ्गे आमा-सबार 12/185 | तोमार स्पर्शयोग नहे 11/156
तेंहो यदि इँहा रहे 3/181 | तोमा-सबा जानि 7/8 | तोमा लागि' गोपीनाथ 4/133
तिन अंश चिच्छक्ति हय 6/158 | तोमा-सह तेरछे 5/149 | तोमा-सब ना छाड़िब 3/176
तिन खण्ड करि' दण्ड 5/143 | तोमार अग्रेते प्रभु कहिते 1/189 | तोमा-सबार आज्ञा बिना 3/174
तीरे वन देखि' स्मृति 8/11 | तोमार आगे एत कथार 6/105 | तोमा-सम वैष्णव ना 9/356
तीर्थ पवित्र करिते करे 10/11 | तोमार आज्ञाते शुभे 7/45 | त्र
तीर्थयात्राय एत संघट्ट 1/223 | तोमार आश्रय निलुँ, गुरु 6/59 | त्रिजगते राधा-प्रेमेर 8/103
तुमि कह, –कलिते नाहि 6/98 | तोमार उपरे ताँर कृपा 6/106 | त्रिभुवन-मध्ये ऐछे 8/198
तुमि-गौरवर्ण, तेंह 10/164 | तोमार 'गौड़ीया' करे 12/127 | त्रिमल्ल भट्टेर घरे कैल 1/108
तुमि त' ईश्वर साक्षात् 9/58 | तोमार चरण पाइल सेइ 11/139 | द
तुमि नराधिप हओ, विष्णु 1/178 | तोमार चरण मोर व्रज 1/82 | दण्डभङ्ग-लीला एइ 5/158
तुमि भाल करियाछ 12/117 | तोमार चरणे मोर नाहि 10/124 | दर्शन-लोभेते करि' 12/210
तुमि याँहा कह, आमि 3/148 | तोमार ठाञि आमार किछु 8/288 | दर्शने वैष्णव' हैल, बले 7/116
तुमि येइ अर्थ कर 6/127 | तोमार दर्शन-बिने, अधन्य 2/59 | दशम-टिप्पणी, आर 1/35
तुमि येइ कह, सेइ 9/159 | तोमार दर्शने यबे कृष्ण 9/36 | दश दिनेर का-कथा 8/239
तुमि येइ कहाओ, सेइ 8/120 | तोमार देशे, तोमार भाग्ये 1/176 | दानकेलिकौमुदी, आर 1/39
तुमि शुनि' शुनि' रह 6/129 | तोमार दैन्य देखि' मोर 11/157 | दामोदर-सम आर नाहि 10/116
तुमि-सब आगे याह 5/154 | तोमार नाम लञा तोमार 1/195 | दार्शनिक पण्डित सबाइ 9/51
तुमि-सब लोक-मोर 3/189 | तोमार पवित्र धर्म नाहिक 11/189 | दास्य-वात्सल्यादि-भावे 8/200
तुमि साक्षात् सेइ कृष्ण 9/126 | तोमार पालित देह, जन्म 3/146 | दुइ-एक सङ्गे चलुक 7/16
तुमि से जानह एइ 9/102 | तोमार प्रसादे मोर ए 12/181 | दुइजनार भरे दण्ड खण्ड 5/150
तृषित चातक यैछे करे 10/40 | तोमार व्याख्या शुनि' 6/130 | दुइ-तिन-गणने बाड़े 8/87
तेरछे पड़िल थालि 9/56 | तोमार मङ्गल वाञ्छे 1/177 |

। 573

[ दुइ-नूपुरेरे श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

दुइ पुस्तक आनियाछि 11/141 | नवद्वीप येइ शक्ति ना 7/109 | निज-लज्जा-श्याम 8/167
दुइ पुस्तक लञा आइला 1/120 | नवविध अर्थ कैल शास्त्र 6/190 | निज-सुख हैते ताते 8/207
दुइविप्र-मध्ये एक विप्र 5/16 | 'नमो नारायणाय' बलि' 6/48 | निज-सुख हैते पलवाघेर 8/209
दुइ ब्रह्म कैल सब 10/164 | 'नरक' वाञ्छये, तबु 6/268 | निजेन्द्रिय-सुखवाञ्छा नाहि 8/217
दुइ मास राहि' ताँरे 1/244 | नर्त्तक गोपाल देखे परम 9/246 | निजेन्द्रिय-सुखहेतु कामेर 8/216
दुँहे दुँहार दर्शने आनन्दित 8/47 | नहे गोपी योगेश्वर 13/141 | नित्यलीला स्थापन याहे 1/44
दुःख-मध्ये कोन् दुःख 8/247 | ना कहिला तेजि साध्य 9/272 | नित्यानन्द-गोसाञिरे 1/24
दुग्ध आउण्टि दधि मथे 14/214 | ना जानि, तोमार सङ्गे 12/195 | नित्यानन्द दूरे देखि' 14/235
दुग्धमात्र देन, केह ना 14/223 | नाना-छले कृष्णे प्रेरि' 8/212 | नित्यानन्द देखिया प्रभुर 14/236
देख, जगन्नाथ कैछे 12/174 | नाना-भक्तेर रसामृत 8/140 | नित्यानन्द प्रभु महाप्रभु 1/93
देखाइल ताँरे आगे 6/203 | नाना-भावे चञ्चल ताहे 8/269 | नित्यानन्द-सङ्गे युक्ति 1/262
देखिब से मुखचन्द्र नयन 12/21 | नाना शास्त्र आनि' कैला 1/33 | नित्यानन्दे कहे प्रभु 5/148
देखिया त' छद्म कैल 10/155 | "नात्रदोषेण मस्करी"-एइ 12/191 | निन्दा-स्तुति-हास्ये शिक्षा 6/112
देखिले ना देखे तारे 6/92 | नाम-प्रेमदान-आदि वर्णन 6/205 | निवृन्त पुष्पशय्या उपरे 1/156
देवी वा अन्य स्त्री 9/135 | नामेर महिमा-शास्त्र करिये 9/28 | निरन्तर इँहाके वेदान्त 6/75
देह-स्मृति नाहि यार 13/142 | नारद-प्रकृति श्रीवास करे 14/215 | निरन्तर कर तुमि 6/121, 11/191
दैवे आसि' प्रभु यबे 1/66 | नारायण हैते कृष्णेर 9/144 | निरन्तर कह तुमि 'कृष्ण' 7/147
दैवे सार्वभौम ताँहाके करे 6/5 | नारायणेरका कथा, श्रीकृष्ण 9/148 | निरन्तर कामक्रीड़ा-याँहार 8/186
दैवे से বৎসর ताँहा 1/59 | नारीर यौवन-धन, यारे 2/25 | निरन्तर पूर्ण करे कृष्णेर 8/179
दोषरूप-छले करे गुण 7/29 | ना सो रमण, ना 8/193 | निरन्तर रात्रि-दिन विरह 1/52
द्वादश-वन देखि' शेषे 5/12 | नाहि काँहा सविरोध, नाहि 2/86 | निर्विरोध' ताँरे कहे येइ 6/141
द्वारका-वैकुण्ठ-सम्पत् 14/219 | निःशक्तिक' करि' ताँरे 6/153 | निश्चय करिया कहे,-शुन 1/161
द्विज-न्यासी हैते तुम 11/191 | निकटे ना आइसे, रहे 14/236 | निश्चिन्त हञा भज चैतन्येर 11/22
ध | निज कार्य नाहि तबु 8/39 | निश्चिन्ते कृष्ण भजिब' 10/107
धरिब से पादपद्म हृदये 12/21 | निज-गूढ़कार्य तोमार 8/279 | नीच-जाति, नीच-सङ्गी 1/189
धर्मसंस्थापन लागि' बाहिरे 12/124 | निज-गृह-वित्त-भृत्य 10/55 | नीचे कन्या दिले कुल 5/39
धीराधीरात्मक' गुण-अङ्गे 8/171 | निज जन्मस्थाने रहे 3/177 | नीलाचल आसिते, पथे 7/20
धोयापाखला' नाम कैल 12/203 | निज-दुःख-विघ्नादिर ना 4/186 | नीलाचल-गौड़-सेतुबन्ध 1/19
ध्येय-मध्ये जीवेर कर्तव्य 8/252 | निज-धन दिते निषेधिबे 5/29 | नीलाचले तुमि-आमि 8/240
न | निज-निज-मत छाड़ि' 9/10 | नीलाचले-नवद्वीपे येन 3/183
नदीया-निवासी, विशारदेर 6/18 | निज-निज-शास्त्रोद्ग्राहे 9/43 | नीलाम्बर चक्रवर्त्तीर हयेन 6/52
नदीया-सम्बन्धे सार्वभौम 6/55 | निजरस आस्वादिते 8/278 | नूतन एकशत घट, शत 12/78
नवद्वीपे छिला तँह प्रभुर 10/103 | निज-रूप प्रभु ताँरे 6/202 | नूपुरेरे ध्वनिमात्र आमार 5/99

574 ।

पद्य सूची पञ्च-प्रभु ]
प
पञ्चपाण्डव तोमार पञ्चपुत्र 10/53
पञ्चविध मुक्ति त्याग 9/267
पञ्चविध मुक्ति' पाञा 9/257
पट्टडोरी लञा आइसे 14/253
पड़िछा मारिते तैं हो 6/5
पतिव्रता-शिरोमणि जनक 9/202
पथबान्धा ना याय 1/160
पथ साजाइल मने करिया 1/155
परम ईश्वर कृष्ण-स्वयं 8/133
परम पुरुषोत्तम स्वयं 14/220
परम-विरक्त, मौनी, सर्वत्र 4/179
परमार्थ थाकुक्, लोके 12/24
पराइल मुक्ता नासाय 5/132
परात्मनिष्ठा-मात्र वेष 3/8
परिणाम-वाद'-व्याससूत्रे 6/170
परिपूर्ण-कृष्णप्राप्ति एइ 8/88
परिहास करियाछि ताँरे 7/66
परीक्षा करिया शेषे हैल 4/189
पहिले देखिलुँ तोमार 8/267
“पहिलेहि राग नयनभङ्गे 8/193
पाछे आमि करिब अर्थ 6/188
पाछे श्याम-वंशीमुख 6/203
पाण्डित्य आर भक्तिरस 7/65
पाण्डित्याद्ये ईश्वरतत्त्व-ज्ञान 6/87
पापराशि दहे नामाभासेइ 1/194
पापी-नीच उद्धारिते ताँर 11/45
पिठा-पाना, अमृत-गुटिका 12/167
पुँथि पाञा प्रभुर हैल 9/238
पुत्रसम स्नेह करेन 9/298
पुनः कहे, - शीघ्र चल 6/150
पुनरपि एइ ठाञि पाबे 7/129
पुराण-वाक्ये सेइ अर्थ 6/148
पुरी-गोसाञिर आज्ञाय 10/132
पुरीर वात्सल्य मुख्य 2/78
पुरुष, योषित्, किबा 8/138
पुरुषोत्तम आचार्य ताँर 10/103
पुष्प-सम कोमल, कठिन 7/72
पूर्व-पूर्व-रसेर गुण 8/85
पूर्वे आसियाछिला तैं हो 9/295
पूर्वे उद्धव-द्वारे, एबे 13/139
पूर्वे प्रभु मोरे प्रसाद 11/116
पूर्वे विद्यानगररे दुइ त' 5/10
पूर्वे माधव-पुरीर लागि' 4/20
पूर्वे यैछे कुरुक्षेत्रे सब 13/124
पृथिवीते रसिक भक्त नाहि 7/64
प्रगाढ़-प्रेमेर एइ स्वभाव 4/186
प्रणव' ये महावाक्य 6/174
प्रणव हैते सर्ववेद 6/174
प्रणय-मान-कञ्चुलिकाय 8/168
प्रतापरुद्र छाड़ि' करिबे 11/46
प्रतिवर्षे आइसे, सङ्गे रहे 1/256
प्रतिमा चलिञा आइला 5/110
प्रतिमा नह तुमि 5/96
प्रतियुगे करेन कृष्ण 6/100
प्रतिष्ठार भये पुरी रहे 4/147
प्रतिष्ठार स्वभाव एइ 4/146
प्रथम वत्सरे अद्वैतादि 1/46
प्रथमे मिलिला नित्यानन्द 1/183
प्रवेश करिते नारि,-स्पर्शि 9/363
प्रभावे वैष्णव' कैल सब 9/68
प्रभु-आज्ञा-प्रसाद-त्यागे 11/114
प्रभु-आज्ञाय कैल याहाँ 1/25
प्रभु-अज्ञाय भक्तगण 1/49
प्रभु कहे, - आमि मनुष्य 12/50
प्रभु कहे, - “एत तीर्थ 9/356
प्रभु कहे, - एथा मोर 9/332
प्रभु कहे, - एहो उत्तम 8/76
प्रभु कहे, - एहो बाह्य 8/59
प्रभु कहे, - एहो हय 8/71
प्रभु कहे, - कभु तोमार 7/147
प्रभु कहे, - कर्मी, ज्ञानी 9/276
प्रभु कहे, - कृष्णे तोमार 10/179
प्रभु कहे, - कृष्णेर एक 9/127
प्रभु कहे, - कोन् विद्या 8/244
प्रभु कहे, - गीता-पाठे 9/102
प्रभु कहे, - “तथापि राजा 11/10
प्रभु कहे, - तुमि कि 6/188
प्रभु कहे, - तुमि कृष्णभक्त 11/26
प्रभु कहे, - तुमि महाभागवत 8/44
प्रभु कहे, - तोमा स्पर्शि 11/189
प्रभु कहे, - पूर्ण यैछे 12/53
प्रभु कहे, - पूर्वाश्रमे तैं हो 9/301
प्रभु कहे, - भट्ट, तोमार 9/111
प्रभु कहे, - भट्टाचार्य, ना 6/184
प्रभु कहे, - मायावादी आमि 8/123
प्रभु कहे, - 'मुक्तिपदे'-इहा 6/262
प्रभु कहे, - मूर्ख आमि 6/126
प्रभु कहे, - मोरे देह' 12/167
प्रभु कहे, - विष्णु' विष्णु' 10/182
प्रभु कहे, - शास्त्रे कहे 9/258
प्रभु कहे, - साधु एइ 3/7
प्रभु कहे, - सूत्रेर अर्थ 6/130
प्रभुकृपा बिना मोर 12/9
प्रभुके कृष्ण जानि' कर 6/199
प्रभुके जानिल, - साक्षात् 6/280
प्रभुके ये भजे, तारे 7/110
प्रभु चतुर्भुज-मूर्त्ति ताँरे 10/33
। 575

[ प्रभु-भारती श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
प्रभु ताँरे देखि' जानिल ८/१६
प्रभु ना खाइले, কেহ १४/४०
प्रभुभक्तगण-मध्ये हैला १२/६८
प्रभु भिक्षा कैल दिनेर ९/१८६
प्रभुर अत्यन्त मर्ममी, रसेर १०/१०२
प्रभुर कृपाय ताँर स्फुरिल ६/२०५
प्रभुर कृपाय हय ७/१०७
प्रभुर चरण-युगे दिल १२/१२२
प्रभुर निकटे आछे यत १२/७
प्रभुर भावानुरूप स्वरूपेर १३/१६७
प्रभुर साक्षात् आज्ञा ११/११३
प्रभुर सिद्धान्त কেহ ना ९/४४
प्रभुर संन्यास देखि' उन्मत्त १०/१०४
प्रभुरूप करि' करे वस्त्रेर १२/३८
प्रभुरे आसन दिया आपने ६/११९
प्रमाणेर मध्ये श्रुति-प्रमाण ६/१३५
प्रह्लादेश जय पद्मामुख ८/५
प्राकृत-इन्द्रियेर ताँरे देखिते ९/१९२
'प्राकृत' निषेधि करे ६/१४१
प्राकृत-शक्तितो तखन ६/१४५
प्राण छाड़ा याय, तोमा ७/८
प्राणनाथ, शून मोर निवेदन १३/१३८
प्राते शय्याय बसि' आमि ११/११६
प्रेमा-प्रयोजन', वेदे तिन ६/१७८
प्रेम बिना कभु নহে १०/१८१
प्रेमभक्ति प्रवर्त्ताइला नृत्य १/२३
प्रेममय-वपु कृष्ण-भक्त १४/१५६
प्रेमावेशे तिन दिन आछे ३/३८
प्रेमावेशे पड़िला तुमि ५/१४९
प्रेमावेशे पथे तुमि हवे ७/३८
प्रेमे मत्त, -नाहि ताँर ४/२२
प्रेमेर परम-सार 'महाभाव' ८/१५९
प्रेमेर 'स्वरूप'-'देह' ८/१६१
फ
फल्गु करि' मुक्ति' देखे ९/२६७
फाल्गुने आसिया कैल ७/४
फाल्गुनेर शेषे दोलयात्रा ७/५
ब
बलगण्डि 'भोगे'र प्रसाद १४/२५
बसियाछेन ताते-येन ९/९९
बहिरङ्गा-माया, -तिने ६/१६०
बहुजन्मेर पुण्यफले पाइ ७/४७
बाल्यकाल हैते तोमार ३/१६५
बाल्यकाल हैते मोर ९/२८
बाल्यकाले माता मोर ५/१२९
बाल्यावधि रामनाम-ग्रहण ९/२६
बाहिरे ना कहे, वस्तु ८/२६४
बाहिरे नागरराज, भितरे २/१९
बाहिरे वामता-क्रोध १४/१९६
बाहिरे विषज्वाला हय २/५०
बाह्यान्तरे गोपीदेह व्रजे ९/१३४
बिना दाने एत लोक १/१६९
बिल्वमङ्गल कैल यैछे १०/१७७
बुझ, कि ना बुझ ६/१२५
बौद्धगणेर उपरे अन्न ९/५५
बौद्धाचार्य नव प्रश्न' सब ९/५०
बौद्धाचार्येर माथाय थालि ९/५५
ब्रह्मण्यदेव! तुमि-बड़ ५/८८
ब्रह्म-शब्दे कहे पूर्ण ६/१४७
ब्रह्मसंहिता, कर्णामृत, दुइ १/१२०
ब्रह्म-सायुज्य हैते ईश्वर ६/२६९
ब्रह्म हैते जन्मे विश्व ६/१४३
ब्रह्माके वेद येन पड़ाइल ८/२६३
ब्रह्माण्ड-भितरे हय १/२६७
ब्रह्मे, ईश्वरे सायुज्य दुइ ६/२६९
ब्राह्मण-समाज सब ९/३०५
ब्राह्मण-सेवा कृष्णरे ५/२४
ब्राह्मणेरे कहे, - तुमि ५/१०७
भ
भक्तगण 'कृष्ण' कहे १२/८५
भक्तगणे सुख दिते 'ह्लादिनी' ८/१५७
भक्त ठाञि हार' तुमि १०/१७४
भक्ति बिना शास्त्रेर अन्य ६/२३७
भक्ति-शब्द कहिते मने ६/२७६
भक्तिसिद्धान्त ताते लिखियाछेन १/४३
भक्तिसिद्धान्त-विरुद्ध, आर १०/११३
भगवत्ता-लक्षणेर इँहातेइ ६/७८
भगवद्भक्तिविमुखेर हय दण्ड ६/२६३
भगवान् अनेक हैते यबे ६/१४५
भगवान्-'सम्बन्ध', भक्ति ६/१७८
भगवानेर सविशेषे एइ तिन ६/१४४
भजिलेह नाहि पाय ८/२२९
भट्ट कहे,-गुरुर आज्ञा १०/१४४
भट्ट कहे, -तुमि येइ ११/११२
भट्ट कहे,-महान्तेर एइ १०/१०
भट्टथारि हैते इँहारे १०/६४
भट्टसङ्गे गोड़ाइल सुखे ९/८६
भट्टाचार्य कहे,-तेँहो १०/१५
भट्टाचार्य कहे,- 'भक्ति' ६/२६३
भट्टाचार्य, तुमि इँहार ६/७८
भट्टाचार्य प्रेमावेशे हैल ६/२०७
भट्टाचार्येर प्रार्थनाते प्रभु ६/१९३
भट्टाचार्येर वैष्णवता देखि' ६/२८०
भागवत-भारत, दुइ ६/९७
भाग्यवान् तुमि-इँहार १३/९७
भावयोग्य देह पाञा ८/२२१
भारती-गोसाञि केनेन १०/१५७
भारती-सम्प्रदाय एइ ६/७२
576 ।