श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 11/99-104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—कलिकालमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा जो श्रीकृष्णचैतन्यकी आराधना करते हैं, वे सुमेधा (बुद्धिमान) हैं। जो उस प्रकारसे भजन नहीं करते, वे सब व्यक्ति कलिहत अर्थात् कलिके द्वारा हत (मारी गयी) बुद्धिवाले हैं॥ 99॥ अनुभाष्य—लब्धचैतन्य अर्थात् श्रीकृष्णसेवोन्मुख जीवकी श्रीकृष्णकीर्त्तनरूप चेतनमयी वाणीके प्रभावसे अन्य जीव जाग्रत-चेतन होकर सेवोन्मुखी वृत्ति प्राप्त करके शुद्ध सेवक (भक्त) होते हैं। इस प्रकार शुद्धभक्तोंकी अपने गोत्र-वर्द्धनरूपी (अपने जैसे शुद्धभक्तोंकी संख्या वृद्धिरूपी) उपासनामें ही श्रीकृष्णचैतन्यको आनन्द होता है। इस उपासनामें ही जीवकी सर्वापेक्षा अधिक बुद्धिमताका परिचय है। तुच्छ, जड़-स्वार्थपरक जीवका ताण्डव नृत्य-कीर्तन आदि समस्त क्रियाएँ जड़ताकी ही परिचायक हैं। इसका कारण यह है कि 'वास्तव-वस्तु ही परम सेव्य हैं', इस बातमें उसका अविश्वास और संशय है। इसलिये उसका भगवद्-कीर्तन भी क्षणिक कृत्रिम भावुकता और उत्तेजना अथवा आन्दोलन मात्र है॥ 99॥ श्रीमद्भागवत (11/5/32)— कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 100॥ अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 100॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 100॥ पराविद्यापति चैतन्य ही श्रीकृष्ण, जड़विद्या या अपरा-विद्या उनसे विमुख :- राजा कहे,—“शास्त्र-प्रमाणे चैतन्य हन कृष्ण। तबे केने पण्डित सब ताँहाते वितृष्ण?”॥ 101॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“शास्त्र-प्रमाणके आधारपर जब महाप्रभु साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, तब पण्डित लोग उनके प्रति उदासीन क्यों रहते हैं?”॥ 101॥ सेवान्मुखतासे ही कृपा-प्राप्ति, कृपाके प्रभावसे ही भगवान्की उपलब्धि :- भट्ट कहे,—“ताँर कृपा-लेश हय याँरे। सेइ से ताँहारे ‘कृष्ण’ करि’ लइते पारे॥ 102॥ कृपाके बिना जड़विद्यासे नास्तिकताकी वृद्धि और मोहकी प्राप्ति :- ताँर कृपा नहे यारे, पण्डित नहे केने। देखिले शुनिलेह ताँरे ‘ईश्वर’ ना माने॥” 103॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“जिसपर महाप्रभुकी लेशमात्र भी कृपा होती है, वही उन्हें श्रीकृष्णके रूपमें स्वीकार कर पाता है। और जिसपर उनकी कृपा नहीं हो, तो भले कितना बड़ा पण्डित ही क्यों ना हो, सब कुछ देख-सुनकर भी उनको ‘ईश्वर’ नहीं मानता॥” 102-103॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके प्रति उनकी कृपा नहीं है, वह भले ही पण्डित क्यों न हो, उनका समस्त ऐश्वर्य देखने-सुननेपर भी वह उनकी कृपाके अभावके कारण श्रीकृष्णचैतन्यको ‘ईश्वर’ मान नहीं पाता॥ 102-103॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 6/82-87 संख्या देखें॥ 102-103॥ श्रीमद्भागवत (10/14/29)— तथापि ते देव पदाम्बुजद्वय- प्रसादलेशानुगृहीत एव हि। जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥ 104॥ अनुवाद—हे देव, आपके श्रीचरणकमलोंकी लेशमात्र कृपाको प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही केवल आपकी महिमाके तत्त्वको जान सकता है; किन्तु जो चिरकालसे भी अनुमानके द्वारा शास्त्रोंका विचार करते हुए 446 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/104-113 ] अन्वेषण करते हैं, उनमेंसे कोई भी उस तत्त्वको नहीं जान पाता॥ 104 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/84 संख्या देखें॥ 104॥ श्रीजगन्नाथ-दर्शनसे पहले महाप्रभुके दर्शनके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे,-“सबे जगन्नाथ ना देखिया। चैतन्येर वासा-गृहे चलिला धाञा॥” 105 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“सभी भक्त श्रीजगन्नाथका दर्शन न करके क्यों श्रीचैतन्य महाप्रभुके वासस्थानकी ओर दौड़े चले जा रहे हैं॥” 105 ॥ गौड़ीय भक्तोंकी गौर-प्रीति :- भट्ट कहे,-“एइ त' स्वाभाविक प्रेम-रीत। महाप्रभु मिलिबारे उत्कण्ठित चित ॥ 106 ॥ आगे ताँरे मिलि' सबे ताँरे सङ्गे लञा। ताँर सङ्गे जगन्नाथ देखिबेन गिया॥” 107 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा, -“यह तो स्वाभाविक प्रेमकी रीति है। इन सब भक्तोंका मन महाप्रभुसे मिलनेके लिये उत्कण्ठित हो रहा है। ये सब भक्त पहले महाप्रभुसे मिलकर उन्हें अपने साथ ले जाकर उनके साथ श्रीजगन्नाथका दर्शन करेंगे॥” 106-107 ॥ वाणीनाथको प्रचुर प्रसाद वहन करते देखकर उसके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे,-“भवानन्देर पुत्र वाणीनाथ। प्रसाद लञा सङ्गे चले पाँच-सात ॥ 108 ॥ महाप्रभुर आलये करिल गमन। एत महाप्रसाद चाहि'-कह कि कारण?” ॥ 109 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, — “श्रीभवानन्द रायके पुत्र वाणीनाथ पाँच-सात लोगोंको साथ श्रीजगन्नाथजीका प्रसाद लेकर महाप्रभुके घरकी ओर जा रहे हैं। महाप्रभुको इतना महाप्रसाद क्यों चाहिये?” ॥ 108-109 ॥ श्रीभट्टका उत्तर-महाप्रभुकी इच्छा ही कारण :- भट्ट कहे,-“भक्तगण आइल जानिञा। प्रभुर इङ्गिते प्रसाद याय ताँरा लञा॥” 110 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा, - “भक्त लोग पुरीमें आ चुके है, ऐसा जानकर महाप्रभुके इङ्गितसे वाणीनाथ इतना सब प्रसाद लेकर जा रहे हैं॥” 110 ॥ उपवास और मुण्डनादि क्रियाके बिना ही प्रसाद ग्रहणके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे,-“उपवास, क्षौर-तीर्थेर विधान। ताहा ना करिया केने खाइब अन्न-पान?” ॥ 111 ॥ श्रीभट्टके द्वारा रागमार्गमें आचरण बताना :- भट्ट कहे,-“तुमि येइ कह, सेइ विधि धर्म। एइ रागमार्गे आछे सूक्ष्मधर्म-मर्म ॥ 112 ॥ भगवान्के परोक्ष और साक्षात् आदेश :- ईश्वरेर परोक्ष आज्ञा-क्षौर, उपोषण। प्रभुर साक्षात् आज्ञा-प्रसाद-भोजन ॥ 113 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 111-113 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राजाने कहा,- 'तीर्थमें प्रवेश करनेपर उस दिन उपवास करना होता है और वहाँ मुण्डन कराना होता है-शास्त्रोंका इस प्रकार विधान है। ये सब वैष्णव वैसा न कर कैसे अन्न-जल आदि ग्रहण करेंगे?' श्रीभट्टाचार्यने कहा, - 'आपने जो कहा है, वही वैध-धर्म है, किन्तु रागमार्गीय धर्मका और एक सूक्ष्म मर्म है,-भगवान्ने ऋषियोंके द्वारा ही परोक्षरूपसे शास्त्रोंमें मुण्डन कराने आदिकी आज्ञा दी है, किन्तु उन्होंने स्वयं प्रसाद-सेवनकी आज्ञाका प्रचार किया है।' 111-113 ॥ अनुभाष्य-तीर्थमें जाकर पापोंका विनाश करनेके उद्देश्यसे पूर्व दिवसमें संयम करके अगले दिन उपवास करेंगे। सिरपर चढ़े पापोंको ध्वंस करनेके लिये सिर आदिका मुण्डन करेंगे। ये सब तैर्थिक कर्मविधान त्याग करके भोजनादि करनेका क्या उद्देश्य है? ॥ 111 ॥ ॥ 447
[ 11/114-121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ताँहा उपवास, याँहा नाहि महाप्रसाद। प्रभु-आज्ञा-प्रसाद-त्यागे हय अपराध ॥114॥ भक्तोंकी उपवासकी विधिको त्यागनेका अन्य कारण :- विशेषे महाप्रभु करे आपने परिवेशन। एत लाभ छाड़ि' केने करिबे उपोषण ॥115॥ अनुवाद-उपवास वहाँ होता है, जहाँ महाप्रसाद उपलब्ध नहीं है। किन्तु महाप्रभुकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके प्रसादका त्याग करनेसे अपराध होता है। विशेष रूपसे महाप्रभु जब स्वयं अपने हाथोंसे प्रसाद बाँट रहे हों, तब ऐसे सौभाग्यको छोड़कर कौन उपवासकी विधिका पालन करेगा? ॥114-115॥ अपने पूर्व-दृष्टान्तका वर्णन :- पूर्वे प्रभु मोरे प्रसाद-अन्न आनि' दिल। प्राते शय्याय बसि' आमि से अन्न खाइल ॥116॥ श्रीकृष्णकृपाके फलसे सेवान्मुखताके कारण फलभोग- काममूलक नित्य-नैमित्तिक और काम्य कर्मोंका त्याग :- याँरे कृपा करि' करेन हृदये प्रेरण। कृष्णाश्रय हय, छाड़े वेद-लोक-धर्म ॥"117॥ अनुवाद-एक बार महाप्रभुने मुझे अन्न प्रसाद लाकर दिया था। उस समय मैं प्रातः जागकर अपनी शय्यापर ही बैठा था और मैंने उसी अवस्थामें प्रसाद खा लिया था। कृपा करके भगवान् जिसके हृदयमें प्रेरणा करते हैं, वही श्रीकृष्णका आश्रय लेता है और सभी प्रकारके वेद-लोक धर्मका त्याग कर देता है॥"116-117॥ भागवतका प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (4/29/46)- यदा यस्यानुगृह्णाति भगवान् आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥118॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥118॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस किसी व्यक्तिके सम्बन्धमें जब आत्मभावित भगवान् हृदयमें प्रेरणाके द्वारा अनुग्रह करते हैं, तब वह लोक और वेदोंके प्रति जो परिनिष्ठित बुद्धि होती है, उसे त्याग देता है॥118॥ अनुभाष्य-ब्रह्मनिष्ठ श्रीनारद गोस्वामीने राजा प्राचीनबर्हिको पुरञ्जनके उपाख्यानके द्वारा भोगी अथवा कर्मी-जीवोंकी और कर्मकाण्डकी दुर्गतिका वर्णन करके बतलाया कि ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्षादि प्रजापति, नैष्ठिक चतुःसन, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ और मैं, हम सबमेंसे कोई भी भगवद्-कृपाके बिना भगवद्-ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। तब भगवद्-कृपाके फलका वर्णन करते हुए कह रहे हैं- भगवान् यदा आत्मभावितः (आत्मनि भावितः ध्यातः आराधितः प्रकटितः सन्) यस्य (यम् अनुगृह्णाति कृपायति), तदा सः लोके (लौकिकव्यवहारे) वेदे (वैदिककर्मानुष्ठाने) च परिनिष्ठिताम् (आसक्तां) मतिं जहाति (त्यजति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥118॥ नीचे उतरकर राजाकी काशीमिश्र और पड़िछा-पात्रको भक्तोंकी सेवाकी व्यवस्था करनेका आदेश :- तबे राजा अट्टालिका हैते तलेते आइला। काशीमिश्र, पड़िछा-पात्र, दुँहे आनाइला ॥119॥ प्रतापरुद्र आज्ञा दिल सेइ दुइ जने। “प्रभु-स्थाने आसियाछेन यत प्रभुर गणे ॥120॥ सबारे स्वच्छन्दे वासा, स्वच्छन्द प्रसाद। स्वच्छन्द दर्शन कराइह, नहे येन बाध ॥121॥ अनुवाद-तब राजा प्रतापरुद्र अट्टालिकासे उतरकर नीचे आये और काशीमिश्र और पड़िछा-पात्र-दोनोंको बुलाया। राजाने उन दोनोंको आज्ञा दी,-"महाप्रभुके पास जितने भी उनके भक्त आये हैं, उन सबको रहनेका अलग-अलग स्थान दो, उनकी इच्छानुसार उनके प्रसादकी व्यवस्था और मन्दिरमें दर्शन करनेकी व्यवस्था करो, जिससे उन्हें किसी भी प्रकारकी असुविधा न हो ॥119-121॥ 448 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/119-130 ] अमृतप्रवाह भाष्य—'पड़िछा'-'परीक्षा' शब्दसे 'पड़िछा' शब्द बना है; इसलिये तत्त्वकी आलोचना करना ही पड़िछाका कार्य है॥ 119 ॥ सेव्यके इङ्गितमात्रसे ही सेवा करना उत्तम :- प्रभुर आज्ञा पालिह दुँहे सावधान हञा। आज्ञा नहे, तबु करिह, इङ्गित जानिया ॥ 122 ॥ अनुवाद-आप दोनों महाप्रभुकी आज्ञाका सावधानीपूर्वक पालन करना। यदि वे स्पष्टरूपसे आज्ञा न भी दें, तो भी उनका सङ्केत समझकर ही सब सेवाओंको करना ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके पास जो सब भक्त गौड़ादि देशोंसे आये हैं, उनके लिये रहनेके लिये अच्छे स्थान, अच्छे प्रसादकी व्यवस्था एवं उत्तमरूपसे श्रीजगन्नाथ-दर्शन आदिमें किसी प्रकारकी असुविधा न हो, इन सबका ध्यान रखनेके लिये प्रतापरुद्र राजाने पड़िछा-पात्रको बोल दिया। और भक्तोंकी सुविधा आदिके उद्देश्यसे महाप्रभुका स्पष्ट आदेश प्राप्त न करनेपर भी, उनका सङ्केत समझकर, जब जो-जो कर्त्तव्य है, तत्क्षणात् उसका भी पालन करे, यह बतला दिया ॥ 121-122 ॥ श्रीसार्वभौम और श्रीगोपीनाथका थोड़ी दूर खड़े होकर भक्त और भगवान्के मिलनका दर्शन :- एत बलि' विदाय दिल सेइ दुइ-जने। सार्वभौम देखिते आइल वैष्णव-मिलने ॥ 123 ॥ गोपीनाथाचार्य, भट्टाचार्य सार्वभौम। दुँहे देखे दूरे प्रभु-वैष्णव-मिलन ॥ 124 ॥ सिंहद्वार दाहिने छाड़ि' सब वैष्णवगण। काशीमिश्र-गृह-पथे करिला गमन ॥ 125 ॥ भक्तोंसे मिलनेके लिये महाप्रभुका स्वयं आना :- हेनकाले महाप्रभु निजगण-सङ्गे। वैष्णवे मिलिला आसि' पथे बहुरङ्गे ॥ 126 ॥ अनुवाद-इतना कहकर राजा प्रतापरुद्रने उन दोनोंको विदा किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आये हुए वैष्णवोंका महाप्रभुके साथ मिलन देखनेके लिये गये। श्रीगोपीनाथाचार्य और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य-दोनों दूरसे महाप्रभु और वैष्णवोंका मिलन देखने लगे। इधर श्रीजगन्नाथ मन्दिरके सिंहद्वारको अपनी दाहिनी ओर छोड़ करके सभी वैष्णव काशीमिश्रके घरकी ओर जानेवाले मार्गकी ओर चले। और उधर महाप्रभु अपने परिकरोंके साथ मार्गमें ही सभी वैष्णवोंको बड़े आनन्दपूर्वक आकर मिले ॥ 123-126 ॥ श्रीअद्वैतके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :- अद्वैत करिल प्रभुर चरण वन्दन। आचार्ये कैल प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 127 ॥ दोनोंका प्रेमावेश, बादमें धैर्य :- प्रेमानन्दे हैला दुँहे परम अस्थिर। समय देखिया प्रभु हैला किछु धीर ॥ 128 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की और महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यका प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया। दोनों ही प्रेमानन्दमें परम अधीर हो गये, किन्तु समय और परिस्थिति देखकर महाप्रभु कुछ धीर हो गये ॥ 127-128 ॥ श्रीवासादिका महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :- श्रीवासादि करिल प्रभुर चरण वन्दन। प्रत्येके करिल प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 129 ॥ सभी भक्तोंके साथ यथायोग्य वार्त्तालाप :- एके एके सर्वभक्तेरे कैल सम्भाषण। सबा लञा अभ्यन्तरे करिला गमन ॥ 130 ॥ अनुवाद-इसके बाद श्रीवासादि भक्तोंने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुने भी प्रत्येक भक्तका प्रीतिपूर्वक आलिङ्गन किया और एक-एक करके सभी भक्तोंके साथ वार्त्तालाप किया। तब उन सबको अपने साथ लेकर वे घरके अन्दर चले गये ॥ 129-130 ॥ । 449
[ 11/131-140 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्थान कम होनेपर भी काशीमिश्रके भवनमें सभी भक्तोंका उसमें समाना :- मिश्रेर आवास सेइ हय अल्प स्थान। असंख्य वैष्णव ताँहा हैल परिमाण ॥ 131 ॥ सभी भक्तोंको स्वयं महाप्रभुके द्वारा माला-गन्ध प्रदान :- आपन-निकटे प्रभु सबा बसाइला। आपनि स्वहस्ते सबारे माल्य-गन्ध दिला ॥ 132 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रके घरमें स्थान अपर्याप्त था, परन्तु असंख्य वैष्णव वहाँ समा गये। महाप्रभुने सब भक्तोंको अपने पास बैठा लिया और अपने हस्तकमलसे सबको माला एवं चन्दन प्रदान किया ॥ 131-132 ॥ श्रीसार्वभौमके साथ सभी भक्तोंका मिलन :- भट्टाचार्य आइला तबे महाप्रभुर स्थाने। यथायोग्य मिलिला सबाकार सने ॥ 133 ॥ अनुवाद—तब श्रीभट्टाचार्य महाप्रभुके वासस्थानपर आये और वे सभी भक्तोंसे यथोचित रूपसे मिले ॥ 133 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतकी स्तुति :- अद्वैतेरे कहेन प्रभु मधुर वचने। “आजि आमि पूर्ण हइलाङ तोमार आगमने ॥” 134 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे मधुर वचन कहे,—“आपके आनेसे आज मैं पूर्ण हो गया॥” 134 ॥ श्रीअद्वैतके द्वारा ईश्वरके भक्तवात्सल्य-स्वभावका वर्णन :- अद्वैत कहे,—“ईश्वरेर एइ स्वभाव हय। यद्यपि आपने पूर्ण, सर्वैश्वर्यमय ॥ 135 ॥ तथापिह भक्तसङ्गे हय सुखोल्लास। भक्त-सङ्गे करे नित्य विविध विलास ॥” 136 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“ईश्वरका यह स्वभाव ही होता है। यद्यपि वे स्वयं ही पूर्ण और सर्वैश्वर्यमय हैं, तथापि भक्त-सङ्गमें उन्हें आनन्दोल्लास होता है। अपने भक्तोंके साथ वे नित्य अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते हैं॥” 135-136 ॥ महाप्रभुकी बचपनके साथी श्रीमुकुन्दकी अपेक्षा श्रीवासुदेव दत्तमें अधिक प्रीति :- वासुदेव देखि’ प्रभु आनन्दित हञा। ताँरे किछु कहे ताँर अङ्गे हस्त दिया ॥ 137 ॥ “यद्यपि मुकुन्द—आमा-सङ्गे शिशु हैते। ताँहा हैते अधिक सुख तोमारे देखिते ॥” 138 ॥ अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्तको देखकर महाप्रभु बहुत आनन्दित हुए और अपने हाथसे उन्हें स्पर्शकर उनसे कहा,—“यद्यपि मुकुन्द मेरे साथ बाल्यावस्थासे है, परन्तु उसकी अपेक्षा तुम्हें देखकर मुझे अधिक प्रसन्नता हो रही है॥” 137-138 ॥ अमानी और मानद वासुदेवदत्तका अपने कनिष्ठ मुकुन्दको महाप्रभुका प्रिय जानकर अपनेसे श्रेष्ठ मानना :- वासु कहे,—“मुकुन्द पाइल तोमार सङ्ग। तोमार चरण पाइल सेइ पुनर्जन्म ॥ 139 ॥ छोट हञा मुकुन्द एबे हैल आमार ज्येष्ठ। तोमार कृपाय ताते सर्वगुणे श्रेष्ठ ॥” 140 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीवासुदेव दत्तने कहा,— “मुकुन्दने आपका सङ्ग प्राप्त किया है। आपके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्तकर उसका पुनर्जन्म हुआ है। यद्यपि मुकुन्द आयुमें मुझसे छोटा है, तथापि अब वह मुझसे बड़ा हो गया है। आपकी कृपा प्राप्तकर वह सभी गुणोंमें मुझसे श्रेष्ठ है॥” 139-140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘वासु कहे मुकुन्द’—मकुन्द दत्त वासुदेव दत्तके छोटे भाई हैं। मुकुन्द (बचपनसे ही) महाप्रभुके साथ थे। वासुदेवने कहा,—मुकुन्दने मुझसे पहले ही आपके चरणोंका आश्रय किया है, मैंने तो बादमें किया। मुकुन्दका पारमार्थिक जन्म मुझसे पहले हुआ है, इसलिये मैं उससे छोटा हो गया हूँ॥ 139-140 ॥ 450 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/141–150 ] वासुदेवको स्वरूप दामोदरसे 'ब्रह्मसंहिता' और 'कर्णामृत' लेकर उनकी नकल करनेका आदेश :- पुनः प्रभु कहे, — "आमि तोमार निमित्ते। दुइ पुस्तक आनियाछि 'दक्षिण' हइते ॥ 141 ॥ स्वरूपेर काछे आछे, लह ता लिखिया।" वासुदेव आनन्दित पुस्तक पाञा ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पुनः कहा,—"मैं तुम्हारे लिये दक्षिण भारतसे दो पुस्तकें लाया हूँ। ये पुस्तकें स्वरूप दामोदरके पास हैं, तुम उनसे लेकर उनकी नकल कर लो।" श्रीवासुदेव दत्त उन पुस्तकोंको प्राप्त करके बहुत आनन्दित हुए ॥ 141-142 ॥ अनुभाष्य— 'दुइ पुस्तक'—श्रीब्रह्मसंहिता और श्रीकृष्णकर्णामृत ॥ 141 ॥ वासुदेवादि सभी गौड़ीयके द्वारा नकल करके ग्रन्थोंकी रक्षाके फलस्वरूप इन दोनों ग्रन्थोंका सर्वत्र प्रचार :- प्रत्येक वैष्णव सबे लिखिया लइल। क्रमे क्रमे दुइ ग्रन्थ सर्वत्र व्यापिल ॥ 143 ॥ अनुवाद—प्रत्येक वैष्णवने उन दोनों पुस्तकोंकी नकल करके रख ली। इस प्रकार क्रमशः उनकी प्रतियाँ बननेसे दोनों ग्रन्थ सर्वत्र व्याप्त हो गये ॥ 143 ॥ श्रीवासादिक प्रशंसा :- श्रीवासाद्ये कहे प्रभु करि' महाप्रीत। “तोमार चारि-भाइर आमि हइनु विक्रीत ॥" 144 ॥ श्रीवासका दैन्य :- श्रीवास कहेन, — "केने कह विपरीत। कृपा-मूल्ये चारि-भाइ हइ तोमार क्रीत ॥" 145 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीवासादि चार भाइयोंसे अति प्रीतिपूर्वक कहने लगे,—"आप चारों भाइयोंने मुझे खरीद लिया है।" यह सुनकर श्रीवास पण्डितने महाप्रभुसे कहा, — "आप विपरीत बात क्यों कह रहे हैं? अपितु हम चारों भाई तो आपकी कृपाके द्वारा खरीदे गये हैं॥" 144-145 ॥ महाप्रभुकी दामोदरके प्रति गौरवप्रीति, शङ्करके प्रति शुद्धप्रेम :- शङ्करे देखिया प्रभु कहे दामोदरे। "सगौरव-प्रीति आमार तोमार उपरे ॥ 146 ॥ शुद्ध केवल-प्रेम शङ्कर-उपरे। अतएव तोमार सङ्गे राखह शङ्करे ॥" 147 ॥ अमानी और मानद दामोदर-पण्डितका कनिष्ठ शङ्करको महाप्रभुका प्रिय जानकर अपनेसे श्रेष्ठ मानना :- दामोदर कहे, — "शङ्कर छोट आमा हैते। एबे आमार बड़ भाइ तोमार कृपाते ॥" 148 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डितको देखकर महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितसे कहा,—"तुम्हारे प्रति मेरी प्रीति गौरवयुक्त है, परन्तु शङ्करके प्रति मेरी शुद्ध प्रीति है। इसलिये शङ्करको तुम अपने साथ ही रखना।" श्रीदामोदरने कहा,—"शङ्कर आयुमें मुझसे छोटा है, परन्तु आपकी कृपाके कारण अब वह मेरा बड़ा भाई बन गया है ॥ 146-148 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दामोदर पण्डित'-बड़े भाई हैं और 'शङ्कर पण्डित'-छोटे भाई। महाप्रभुने कहा, — 'दामोदर ! तुम्हारे प्रति मेरी सगौरव-प्रीति अर्थात् सम्मानके साथ प्रीति है; किन्तु शङ्करके प्रति मेरा केवल शुद्धप्रेम है। तुम अब शङ्करको अपने साथ रखना।' दामोदरने कहा,—'प्रभो, आपके अधिक स्नेहको प्राप्त करनेके कारण शङ्कर मेरा छोटा भाई होनेपर भी बड़ा भाई हो गया है॥' 146-148 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीशिवानन्दकी प्रशंसा :- शिवानन्दे कहे प्रभु,— "तोमार आमाते। गाढ़ अनुराग हय, जानि आगे हैते ॥" 149 ॥ श्रीशिवानन्दका दैन्य :- शुनि' शिवानन्द-सेन प्रेमाविष्ट हञा। दण्डवत् हञा पड़े श्लोक पड़िया ॥ 150 ॥ । 451
[ 11/149-158 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-महाप्रभुने श्रीशिवानन्दसेनसे कहा, – “यह तो मैं पहलेसे ही जानता हूँ कि आपका मेरे प्रति गाढ़ अनुराग है।” महाप्रभुके वचन सुनकर श्रीशिवानन्द-सेन प्रेममें आविष्ट हो गये और महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करके उन्होंने एक श्लोक पढ़ा ॥ 149-150॥ भगवान्की दयाकी प्रार्थना :- यमुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (26) – निमज्जतोऽनन्त भवार्णवान्तश्चिराय मे कूलमिवासि लब्धः। त्वयापि लब्धं भगवन्निदानीम् अनुत्तमं पात्रमिदं दयायाः ॥ 151 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“हे अनन्त, भवसागरमें निमग्न रहकर बहुत दिनोंके बाद आपको तटके रूपमें प्राप्त किया है। हे भगवन्, आपने भी मुझे प्राप्त करके अपनी दयाके अति उत्तम पात्रको प्राप्त किया है।” यह श्लोक आलवन्दारु-यमुनाचार्य-कृत स्तोत्रके अन्तर्गत है ॥ 151॥ अनुभाष्य- हे अनन्त, चिराय भवार्णवान्तः (संसार-दुःख-जलधि-मध्ये) निमज्जतः (उत्थानशक्तिरहितस्य मग्नस्य) मे (मम) कूलं (तटम्) इव [त्वं भगवान् मया] लब्धः असि; हे भगवन्, इदानीं (सम्प्रति) त्वया अपि दयायाः इदम् अनुत्तमं (नास्ति उत्तमं परतमं श्रेष्ठं यस्मात् तत् सर्वश्रेष्ठं) पात्रं लब्धं (प्राप्तम्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 151 ॥ श्रीमुरारिगुप्तका दैन्यवशतः आत्मगोपन :- प्रथमे मुरारि-गुप्त प्रभुरे ना देखिया। बाहिरेते पड़ि' आछे दण्डवत् हञा ॥ 152 ॥ अनुवाद-श्रीमुरारि-गुप्तने पहले महाप्रभुके दर्शन नहीं किये, वे बाहर ही दण्डवत् प्रणाम करके भूमिपर पड़े हुए थे॥ 152 ॥ भगवान्के द्वारा भक्तको ढूँढ़ना :- मुरारि ना देखिया प्रभु करे अन्वेषण। मुरारि लइते धाञा आइला बहुजन ॥ 153॥ अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको न देखकर महाप्रभुने उनके बारेमें पूछा। तब बहुतसे वैष्णव श्रीमुरारि गुप्तको लानेके लिये दौड़ पड़े ॥ 153 ॥ श्रीमुरारिके द्वारा दीनतापूर्वक महाप्रभुका दर्शन :- तृण दुइगुच्छ मुरारि दशने धरिया। महाप्रभुर आगे गेला दैन्याधीन हञा ॥ 154 ॥ अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्त तिनकोंके दो गुच्छोंको अपने दाँतोंमे दबाकर अत्यन्त दीन होकर महाप्रभुके सामने गये ॥ 154 ॥ स्वयंको अस्पृश्य मानते हुए मुरारिको महाप्रभुके स्पर्शमें सङ्कोच :- मुरारि देखिया प्रभु आइला मिलिते। पाछे भागे मुरारि, लागिला कहिते ॥ 155॥ “मोरे ना धुँइह प्रभु, मुञि त' पामर। तोमार स्पर्शयोग नहे एइ कलेवर ॥” 156॥ अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको आते देखकर महाप्रभु उठकर जब उनसे मिलनेके लिये आये, तब श्रीमुरारि गुप्त पीछेकी ओर भागते हुए कहने लगे, – “हे प्रभो ! आप मुझे स्पर्श न करें, मैं तो अत्यन्त पतित हूँ। मेरा यह शरीर आपके स्पर्श करने योग्य नहीं है ॥” 155-156 ॥ भक्तकी दीनताको देखकर भगवान्का आर्द्रभाव :- प्रभु कहे, – “मुरारि, कर दैन्य सम्वरण। तोमार दैन्य देखि' मोर विदीर्ण हय मन ॥” 157॥ भक्तोंकी सेवामें रत भगवान् :- एत बलि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। निकटे बसाञा करे अङ्ग सम्मार्जन ॥ 158 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, – “हे मुरारि ! तुम इतनी 452 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/157–168 ] दीनता मत प्रकाश करो। तुम्हारी दीनता देखकर मेरा हृदय फट रहा है", इतना कहकर महाप्रभुने श्रीमुरारि गुप्तका आलिङ्गन किया और अपने पास बैठाकर अपने हाथोंसे उनके शरीरका मार्जन करने लगे॥ 157-158 ॥ श्रीचन्द्रशेखर, श्रीपुण्डरीक और श्रीगदाधरादिकी महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा एवं आलिङ्गन :- आचार्यरत्न, विद्यानिधि, पण्डित गदाधर। गङ्गादास, हरिभट्ट, आचार्य पुरन्दर ॥ 159 ॥ प्रत्येक्षे सबार प्रभु करि' गुणगान। पुनः पुनः आलिङ्गिया करिल सम्मान ॥ 160 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीआचार्यरत्न, श्रीविद्यानिधि, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीगङ्गादास, श्रीहरिभट्ट और श्रीपुरन्दर आचार्य,—सभी भक्तोंका गुणगान किया और बार-बार उनका आलिङ्गन करके उनका सम्मान किया ॥ 159-160 ॥ श्रीहरिदासको ढूँढना :- सबारे सम्मानि' प्रभुर हइल उल्लास। हरिदासे ना देखिया कहे,—"काँहा हरिदास ॥" 161 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंका सम्मान करके महाप्रभु उल्लसित हुए, परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरको न देखकर महाप्रभु कहने लगे, —"हरिदास कहाँ हैं ॥" 161 ॥ ठाकुर हरिदासका दैन्यवशतः दूर रहना :- दूर हैते हरिदास गोसाञे देखिया। राजपथ-प्रान्ते पड़ि' आछे दण्डवत् हञा ॥ 162 ॥ मिलन-स्थाने आसि' प्रभुरे ना मिलिला। राजपथ-प्रान्ते दूरे पड़िया रहिला ॥ 163 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर दूर राजमार्गके किनारे भूमिपर पड़े दण्डवत् प्रणाम कर रहे थे। वे महाप्रभुसे भक्तोंके मिलन स्थानपर नहीं आये, बल्कि वहाँसे दूर राजपथके किनारे ही पड़े रहे ॥ 162-163 ॥ भक्तोंके द्वारा श्रीहरिदासको महाप्रभुकी आज्ञा बताना :- भक्त सब धाञा आइल हरिदासे निते। "प्रभु तोमाय मिलिते चाहे, चलह त्वरिते ॥" 164 ॥ अनुवाद—सब भक्त दौड़ते हुए श्रीहरिदासको ले जानेके लिये आये और कहा,—"शीघ्र चलो! महाप्रभु आपसे मिलना चाहते हैं ॥" 164 ॥ मर्यादा-विधिकी रक्षाके लिये श्रीहरिदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- हरिदास कहे,—"आमि नीच-जाति छार। मन्दिर-निकटे याइते मोर नाहि अधिकार ॥ 165 ॥ निभृते टोटा-मध्ये स्थान यदि पाङ। ताँहा पड़ि' रहो, एकले काल गोङाङ ॥ 166 ॥ जगन्नाथ-सेवकेर मोर स्पर्श नाहि हय। ताँहा पड़ि' रहौं,—मोर एइ वाञ्छा हय ॥" 167 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"मैं नीच जातिका अधम व्यक्ति हूँ। मन्दिरके निकट जानेका मेरा अधिकार नहीं है। यदि मुझे एकान्तमें किसी उद्यानमें कोई स्थान मिल जाय, तो वहीं रहकर मैं अकेले ही समय व्यतीत कर लूँगा। मेरी यही इच्छा है कि मैं वहीं पड़ा रहूँ, जिससे श्रीजगन्नाथके सेवकोंको मेरा स्पर्श न हो॥" 165-167 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'टोटा-मध्ये'—उद्यानमें ॥ 166 ॥ लोगोंके मुखसे श्रीहरिदासकी दैन्योक्ति सुनकर महाप्रभुको आनन्द :- एइ कथा लोक गिया प्रभुरे कहिल। शुनिया प्रभुर मने बड़ सुख हइल ॥ 168 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदासकी यह बात भक्तोंने जाकर महाप्रभुसे कही, जिसे सुनकर महाप्रभु मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ 168 ॥ । 453
[ 11/169-178 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना :- हेनकाले काशीमिश्र, पड़िछा, — दुइ जन। आसिया करिल प्रभुर चरण वन्दन ॥ 169 ॥ सर्ववैष्णव देखि' सुख बड़ पाइला। यथायोग्य सबा-सने आनन्दे मिलिला ॥ 170 ॥ अनुवाद—इतनेमें काशीमिश्र और पड़िछा-ये दोनों वहाँ आये और उन्होंने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की। सभी वैष्णवोंका दर्शन करके वे दोनों बहुत प्रसन्न हुए और यथायोग्य सभीसे आनन्दपूर्वक मिले॥ 169-170 ॥ वैष्णवोंकी सेवाके लिये काशीमिश्रकी महाप्रभुसे आज्ञाके लिये प्रार्थना :- प्रभुपदे दुइ जने कैल निवेदने। “आज्ञा देह', — वैष्णवेर करि समाधाने ॥ 171 ॥ सबार करियाछि वासा-गृह-स्थान। महाप्रसाद सबाकारे करि समाधान ॥” 172 ॥ अनुवाद-दोनोंने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन किया,—“यदि आपकी आज्ञा हो तो हम सभी वैष्णवोंके लिये यथोचित व्यवस्था कर दें। सभीके लिये रहनेके स्थानकी व्यवस्था हो चुकी है। अब हमें उन सबके लिये महाप्रसादके परिवेशनकी आज्ञा दीजिये ॥” 171-172 ॥ श्रीगोपीनाथाचार्यको भक्तोंके सभी कार्योंको सम्पादन करनेके लिये महाप्रभुका आदेश :- प्रभु कहे,—“गोपीनाथ, याह' वैष्णव लञा। याँहा याँहा कहे वासा, ताँहा देह' लञा ॥ 173 ॥ श्रीवाणीनाथके ऊपर प्रसादकी व्यवस्थाका भार :- महाप्रसादान्न देह वाणीनाथ-स्थाने । सर्व वैष्णव इँहो करिबे समाधाने ॥ 174 ॥ श्रीकाशीमिश्रसे महाप्रभुके द्वारा बगीचेमें स्थित निर्जन कमरेके लिये प्रार्थना :- आमार निकटे एइ पुष्पेर उद्याने। एकखानि घर आछे परम-निर्जने ॥ 175 ॥ सेइ घर आमाके देह'-आछे प्रयोजन। निभृते बसिया ताँहा करिब स्मरण ॥” 176 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे गोपीनाथाचार्य ! आप सभी वैष्णवोंको अपने साथ लेकर जाइये और जहाँ-जहाँ ये काशीमिश्र और पड़िछा बतलायें, वहाँ उन भक्तोंको रहनेके लिये स्थान दे दीजिये। और आप (श्रीकाशीमिश्र और पड़िछा) जितना भी महाप्रसाद लाये हैं, सब वाणीनाथको दे दीजिये। वे सभी वैष्णवोंकी देखभाल करेंगे और सभीको महाप्रसाद भी वितरित कर देंगे। मेरे स्थानके पास पुष्पोंके उद्यानमें एक निर्जन कमरा है। वह कमरा मुझे दे दो, मुझे उसकी आवश्यकता है। मैं वहाँ एकान्तमें बैठकर भगवान्का स्मरण करूँगा ॥” 173-176 ॥ अनुभाष्य - अब यह स्थान 'सिद्धबकुल-मठ'के नामसे प्रसिद्ध है ॥ 175 ॥ महाप्रभुसे सभी वस्तुओंको इच्छानुसार ग्रहण करनेके लिये काशीमिश्रका आवेदन :- मिश्र कहे, — “सब तोमार, चाह कि-कारणे ? आपन-इच्छाय लह, येइ तोमार मने ॥ 177 ॥ काशीमिश्रका स्वयंको महाप्रभुके आज्ञाकारी दासके रूपमें स्वीकार करने हेतु प्रार्थना :- आमि-दुइ हइ तोमार दास आज्ञाकारी। ये चाह, सेइ आज्ञा देह' कृपा करि' ॥” 178 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रने कहा, — “प्रभो ! सब कुछ तो आपका ही है, फिर आप माँग क्यों रहे हैं? अपनी इच्छासे आप जो चाहें ले सकते हैं। हम दोनों तो आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले दास हैं। आप जैसा जो भी चाहते हैं, कृपा करके हमें उसकी आज्ञा दीजिये ॥" 177-178 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - आपको जो चाहिये, कृपा करके उसकी आज्ञा दीजिये। हम दोनों आपके आज्ञा पालनकारी दास हैं ॥ 178 ॥ 454 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/179-189 विदायी लेकर श्रीगोपीनाथको गृह-निर्वाचन और श्रीवाणीनाथको प्रसादकी व्यवस्थाका भार-अर्पण :- एत कहि' दुइजने विदाय लइल। गोपीनाथ, वाणीनाथ-दुँहे सङ्गे निल॥ 179 ॥ गोपीनाथे देखाइल सब वासा-घर। वाणीनाथ-ठाञि दिल प्रसाद विस्तर॥ 180 ॥ वाणीनाथ आइला बहु प्रसाद पिठा लञा। गोपीनाथ आइला वासा संस्कार करिया॥ 181 ॥ अनुवाद-यह कहकर उन दोनोंने महाप्रभुसे विदायी ली। तब वे दोनों श्रीगोपीनाथाचार्य तथा श्रीवाणीनाथको अपने साथ ले गये। उन्होंने श्रीगोपीनाथाचार्यको सभी रहनेके स्थान दिखला दिये और श्रीवाणीनाथको बहुत सारा महाप्रसाद दिया। श्रीवाणीनाथ वह प्रसाद और पिठा-पाना लेकर आ गये। श्रीगोपीनाथाचार्य भी सभी रहनेके स्थानोंकी सफाई करके वहाँ आ गये॥ 179-181 ॥ महाप्रभुका सभी भक्तोंको स्नानके बाद चूड़ा दर्शन करके प्रसादका सम्मान करनेके लिये आमन्त्रण :- महाप्रभु कहे,—"शुन, सर्व वैष्णवगण। निज-निज-वासा सबे करह गमन॥ 182 ॥ समुद्रस्नान करि' कर चूड़ा दरशन। तबे आजि इँह आसि' करिबे भोजन॥" 183 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "सभी वैष्णव सुनो! आप सभी अपने-अपने रहनेके स्थानपर जाइये। फिर समुद्रस्नान करके श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चूड़ाका (शिखरका) दर्शन कीजिये। तब यहाँ आकर महाप्रसाद सेवन कीजिये॥" 182-183 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'चूड़ा'- श्रीजगन्नाथ मन्दिरका चूड़ा॥ 183 ॥ महाप्रभुको प्रणाम करके सभी भक्तोंका श्रीगोपीनाथके द्वारा बतलाये अपने अपने वासस्थानको ग्रहण करना :- प्रभु नमस्करि' सबे वासाते चलिला। गोपीनाथाचार्य सबे वासास्थान दिला॥ 184 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको प्रणाम करके सभी भक्त श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ गये और उन्होंने सभीको उनके रहनेका स्थान दिया॥ 184 ॥ महाप्रभुका श्रीहरिदास ठाकुरके पास आना :- महाप्रभु आइला तबे हरिदास-मिलने। हरिदास करे प्रेमे नाम-सङ्कीर्त्तने॥ 184 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलने आये। उस समय श्रीहरिदास प्रेमपूर्वक नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे॥ 184 ॥ श्रीहरिदासका प्रणाम और महाप्रभुका आलिङ्गन :- प्रभु देखि' पड़े पाय दण्डवत् हञा। प्रभु आलिङ्गन कैल ताँरे उठाञा॥ 186 ॥ परस्पर गुणोंके स्मरणसे भक्त और भगवान्, दोनोंकी प्रेम-विह्वलता :- दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दने। प्रभु-गुणे भृत्य विकल, प्रभु भृत्य-गुणे॥ 187 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको देखकर श्रीहरिदास ठाकुरने उनके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया। दोनों प्रेमके आवेशमें क्रन्दन करने लगे। प्रभुके गुणोंसे दास और दासके गुणोंसे प्रभु विह्वल हो रहे थे॥ 186-187 ॥ श्रीहरिदास ठाकुरका अपनेको अस्पृश्य मानना :- हरिदास कहे,—"प्रभु, ना छुँइओ मोरे। मुञि—नीच, अस्पृश्य, परम पामरे॥" 188 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - 'हे प्रभो! आप मुझे स्पर्श मत कीजिये। मैं नीच, अस्पृश्य (अछूत) और सबसे अधिक पतित हूँ॥" 188 ॥ साक्षात् ब्रह्मण्यदेव-प्रभुके द्वारा श्रीहरिदासके आर्य होनेकी घोषणा :- प्रभु कहे,—"तोमा स्पर्शि पवित्र हइते। तोमार पवित्र धर्म नाहिक आमाते॥ 189 ॥ । 455
[ 11/189-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कृष्णभक्तमें प्रतिक्षण सभी तीर्थोंका स्नान और सभी (दैक्ष्य-विप्राभिधानात्) सः श्वपचः (शौक्रान्त्यजादि-नीचकुलोद्भूतः) प्रकारके तप-यज्ञ-दानादि विद्यमान :- अपि गरीयान् (श्रेष्ठः) अहो बत (इत्याश्चर्यम्)। ये ते (तव) क्षणे क्षणे कर तुमि सर्वतीर्थे स्नान। नाम गृणन्ति (उच्चारयन्ति), ते तपः तेपुः क्षणे क्षणे कर तुमि यज्ञ-तपो-दान ॥ 190 ॥ (अनुष्ठितवन्तः—तपस्विनोऽधिका इत्यर्थः) जुहुवुः (होमं कृतवन्तः), कृष्णभक्त ही अङ्गसहित वेद-वेदान्तका अध्ययन करनेवाले सस्नुः (सर्वेष्वेव तीर्थेषु स्नाताः), आर्याः (सदाचाराः), ब्रह्म और समस्त ब्राह्मणों तथा संन्यासियोंके गुरु :- (साङ्गं वेदम्) अनूचुः (अधीतवन्तः)। निरन्तर कर तुमि वेद-अध्ययन। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। द्विज-न्यासी हैते तुमि परम-पावन ॥ "191 ॥ इस श्लोकका तथ्य और पूर्ववर्ती श्लोककी विवृत्ति श्रीगौड़ीय भाष्य (श्रीमद्भागवतमें) देखें ॥ 192 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैं स्वयं पवित्र होनेके अमृताणुकणिका-(गरुड़पुराण)- लिये आपको स्पर्श कर रहा हूँ। आपके जैसा पवित्र ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते। करनेका गुण मुझमें नहीं है। आप तो क्षण-क्षणमें सभी सत्रयाजि-सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः॥ तीर्थोंमें स्नान करते हैं और क्षण-क्षणमें आप यज्ञ, तप सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते। और दान करते हैं। आप निरन्तर वेदोंका अध्ययन वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते॥ करते हैं। आप तो ब्राह्मण और संन्यासीसे भी परम अर्थात् "हजारों ब्राह्मणोंसे एक सावित्र्य ब्राह्मण पवित्र हैं॥"189-191 ॥ श्रेष्ठ है, सहस्र सावित्र्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक श्रीमद्भागवत (3/33/7)- वेदान्तविद् ब्राह्मण श्रेष्ठ है, कोटि-कोटि वेदान्तविद् अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक विष्णु भक्त श्रेष्ठ है, सैंकड़ों यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। विष्णु भक्तोंसे एक ऐकान्तिक वैष्णव श्रेष्ठ है।" तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्याः न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्द्वक्तः श्वपचः प्रियः। ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ 192 ॥ तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथाह्यहम् ॥ अर्थात् “चतुर्वेदपाठी अर्थात् चारों वेदोंको जाननेवाला अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 192 ॥ ब्राह्मण होनेपर भी वह भक्त हो, ऐसा नहीं है। मेरा अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन् ! जिनके मुखमें भक्त चाण्डाल कुलमें उत्पन्न होनेपर भी मेरा प्रिय है आपका नाम वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस और भक्त ही यथार्थ दानपात्र एवं ग्रहणपात्र है। खानेवाले) होनेपर भी श्रेष्ठ हैं। जो आपका नाम चाण्डालकुलमें उत्पन्न होनेपर भी मेरा भक्त मेरी भाँति कीर्तन करते हैं, उन्होंने सब प्रकारकी तपस्या कर ली ब्राह्मणादि सभीका पूज्य है।” है, समस्त यज्ञ कर लिये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर गीता 9/32 श्लोक देखें। और भी (अन्त्यलीला, लिया हैं एवं अङ्गसहित समस्त वेदोंका पाठ कर लिया 4/66-68)- है, इसलिये उनकी आर्योंमें गणना होती है ॥ 192 ॥ "नीच जाति नहे कृष्णभजने अयोग्य। अनुभाष्य-देवहूतिके द्वारा भगवान् कपिलकी सत्कुल विप्र नहे भजनेर योग्य॥ स्तुति-वर्णनके प्रसङ्गमें समस्त गुणोंसे सम्पन्न उनके येइ भजे, सेइ बड़, अभक्त-हीन, छार। भक्तोंके माहात्म्यका वर्णन- कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि विचार॥ दीनेरे अधिक दया करे भगवान्। यत् (यस्य) जिह्वाग्रे तुभ्यं (तव) नाम वर्त्तते, अतः कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ अभिमान॥" 456 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/192-193 ] “नीच-जातिमें उत्पन्न व्यक्ति श्रीकृष्णभजनके अयोग्य नहीं होता, दूसरी ओर, केवलमात्र सत्कुलमें उत्पन्न ब्राह्मण होनेसे ही कोई श्रीकृष्णभजनके योग्य नहीं बन जाता। वास्तवमें जो श्रीकृष्णका भजन करता है, वही बड़ा है। अभक्त तो हीन है, घृणित है। श्रीकृष्णभजनमें जाति और कुल आदिका कोई विचार ही नहीं है। भगवान् दीन व्यक्तिपर अधिक कृपा करते हैं। क्योंकि श्रेष्ठ कुलमें जन्म लेनेवाले कुलीन, विद्वान तथा धनी व्यक्तियोंमें बहुत अभिमान होता है।” (मध्यलीला, 19/147-148)- “धर्माचारी-मध्ये बहुत 'कर्मनिष्ठ'। कोटि-कर्मनिष्ठ-मध्ये एक 'ज्ञानी' श्रेष्ठ॥ कोटिज्ञानी-मध्ये हय एकजण 'मुक्त'। कोटिमुक्त-मध्ये 'दुर्लभ' एक कृष्णभक्त॥” “धर्मका आचरण करनेवालोंमें भी बहुत कर्मनिष्ठ हैं। करोड़ों कर्मनिष्ठ व्यक्तियोंसे एक ज्ञानी श्रेष्ठ है। करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे एक व्यक्ति ही मुक्त होता है। करोड़ों मुक्तोंमें भी एक कृष्णभक्त 'दुर्लभ' होता है।” कर्म करते हुए पापाचरणके फलसे रज-तमः स्वभावसम्पन्न होकर बद्धजीव सवनयज्ञके अधिकारसे च्युत होता है। ईशसेवासे विमुखता ही जीवको कर्मकाण्डमें प्रवृत्त कराती है। कर्म करते समय बद्धजीव ऊँचे-नीचेका विचार करते हुए प्रवृत्तिके क्रमसे सत्त्वगुणसे रजो-तमोगुणमें अवस्थितिकी अभिलाषा करता है। पापरहित सत्त्वगुणवाले व्यक्तियोंकी भगवान् विष्णुकी सेवामें स्वभावतः रुचि होती है। वे अधोपतित होकर सत्त्व-रजोके मिश्रित गुणसे क्षत्रिय, सत्त्व-तमोके मिश्रित गुणसे वैश्य, रजो-तमोके मिश्रित गुणसे शूद्र और तमोगुणमें अवस्थित होकर अन्त्यज आदि श्रेणीमें गिने जाते हैं। ब्राह्मण अधिकारसे च्युत होनेपर वे ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य कुलमें जन्म ग्रहण करते हैं। और पापरहित जीवकी भी ब्राह्मणकुलमें बीजगर्भसे उत्पन्न देह प्राप्त करके सत्त्वगुणसे च्युत होनेकी रुचि हो जाती है। उस रुचिसे जिन सब पापोंका उदय होता है, उसके प्रतिबन्धक स्वरूप गर्भाधान आदिसे लेकर उपनयन तक सभी संस्कार हैं। संस्कार-वर्जित ब्राह्मणकुलमें भी जन्में ब्राह्मण अपने रुचि-क्रमसे सत्त्वके अतिरिक्त मिश्र और दूसरे गुणोंमें अग्रसर होकर पतित होते हैं। ब्राह्मण कुलमें जन्म कर्मफलजनित निष्पाप होनेका सूचकमात्र है। उपरोक्त संस्कार ही निष्पाप जीवको पुनः पापमें प्रवृत्त होनेसे बचाते हैं। शूद्र आदिके लिये इन संस्कारोंकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शूद्रने पूर्वजन्मके पापोंके प्रभावसे उस प्रकार कल्मष-प्रधान वंशमें जन्म ग्रहण किया है। अच्छेसे वर्णधर्मका पालन करनेवाले सत्कर्मोंके बलसे जन्म-जन्मान्तरमें उन्नति लाभ करते हैं। यह उन्नति गुण और कर्मजात है। जो श्वपच (कुत्तेका माँस खानेवाले) अन्त्यज कुलमें जन्म ग्रहण करके सारा जीवन संसारमें लिप्त रहते हैं, उनकी उन्नतिकी बात शास्त्रमें नहीं लिखी है। किन्तु ऐसे कुलमें जन्में जिन वैष्णवोंकी उस प्रकारके कुलमें आचारमें रुचि न होकर भगवद्-सेवामें लगनेकी योग्यता दिखायी दे, तो यह निश्चित है कि पूर्व जन्ममें उनका ब्राह्मणकुलके सत्त्वाधिकारमें अवस्थान था। “भगवद्भक्तिहीनस्य जातिः शास्त्रं जपस्तपः। अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम्॥ शुचिः सद्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्Defaultजातिकल्मषः। श्वपाकोऽपि-बुधैः श्लाघ्यो न वेदज्ञोऽपि नास्तिकः॥” अर्थात् “सच्चरित्र, सद्भक्तिरूपी दीप्ताग्नि द्वारा जिनके दुर्जातिके पाप क्षय हो चुके हैं, इस प्रकारका चाण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा सम्मानित है, किन्तु नास्तिक व्यक्ति वेदज्ञ होनेपर भी सम्मानके योग्य नहीं है। भगवद्भक्तिहीन व्यक्तिकी सद्जाति, शास्त्रज्ञान, जप और तप मृतदेहके अलङ्कारके जैसे किसी कामके नहीं होते, वह तो केवल लोकरञ्जनमात्र है॥” 192॥ श्रीहरिदास ठाकुरको 'सिद्धबकुल' स्थान देना :- एत बलि ताँरे लञा गेला पुष्पोद्याने। अति निभृते ताँरे दिला वासा-स्थाने॥193॥ । 457
[ 11/193–202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके द्वारा स्वयं ही भक्तके साथ मिलन स्वीकार :— “एइस्थाने रहि' कर नाम-सङ्कीर्त्तन। प्रतिदिन आसि' आमि करिब मिलन॥ 194॥ मन्दिरके सुदर्शनचक्रको प्रणाम करनेकी आज्ञा-दान :— मन्दिरेर चक्र देखि' करिह प्रणाम। एइ ठाञि तोमार आसिबे प्रसादान्न॥” 195॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरको पुष्प उद्यानमें ले गये और उन्हें अति निर्जनमें एक रहनेका स्थान दिया। महाप्रभुने उनसे कहा,—“आप इसी स्थानपर रहकर नाम-सङ्कीर्तन कीजिये। मैं प्रतिदिन यहाँ आकर आपसे मिलूँगा। यहींसे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चक्रको देखकर प्रणाम कीजियेगा और यहींपर आपके लिये अन्न-प्रसाद आ जायेगा॥” 193-195॥ अनुभाष्य—श्रीहरिदास ठाकुरने लौकिक-स्मृति-विधानके मतानुसार श्रीमन्दिरमें प्रवेश करके श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये स्वयंको अयोग्य जाना है, ऐसा जानकर महाप्रभुने उन्हें दूरसे श्रीमन्दिरके चूड़ाके अग्रभागमें सुदर्शनचक्रको देखकर प्रणाम करनेकी व्यवस्था कर दी और कहा,—इस सिद्धबकुलमें तुम्हारे लिये महाप्रसाद आयेगा॥ 195॥ श्रीनित्यानन्द आदिको श्रीहरिदासके दर्शनसे आनन्द :— नित्यानन्द, जगदानन्द, दामोदर, मुकुन्द। हरिदासे मिलि' सबे पाइल आनन्द॥ 196॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर और श्रीमुकुन्द—सभीको श्रीहरिदाससे मिलकर बहुत आनन्द हुआ॥ 196॥ महाप्रभुके समुद्रस्नानके बाद श्रीअद्वैतादिका समुद्रस्नान :— समुद्रस्नान करि' प्रभु आइला निज-स्थाने। अद्वैतादि गेला सिन्धु करिबारे स्नाने॥ 197॥ मन्दिर-चूड़ा दर्शनके बाद सभीके द्वारा प्रसाद-सम्मान :— आसि' जगन्नाथेर कैल चूड़ा दरशन। प्रभुर आवासे आइला करिते भोजन॥ 198॥ अनुवाद—जब महाप्रभु समुद्रस्नान करके अपने स्थानपर आ गये, तब श्रीअद्वैतादि भक्तगण समुद्रमें स्नान करने गये। समुद्रस्नान करके सभी भक्तों ने श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चूड़ाका दर्शन किया और महाप्रभुके आवासपर प्रसाद पानेके लिये पहुँचे॥ 197-198॥ सभी भक्तोंका बैठना और महाप्रभुके द्वारा परिवेशन :— सबारे बसाइला प्रभु योग्य क्रम करि'। श्रीहस्ते परिवेशण कैल गौरहरि॥ 199॥ श्रीहस्तके द्वारा प्रचुर परिवेशन :— अल्प अन्न नाहि आइसे दिते प्रभुर हाते। दुइ-तिनेर अन्न देन एक-एक पाते॥ 200॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको योग्यक्रमसे बैठा दिया और स्वयं श्रीगौरहरिने अपने श्रीहाथोंसे प्रसादका परिवेशण (वितरण) आरम्भ किया। प्रसाद बाँटनेके लिये महाप्रभुके हाथोंमें थोड़ा अन्न नहीं आता था, इसलिये एक-एक पत्तलपर दो-तीन व्यक्तियोंके भोजन करने जितना अन्न दे रहे थे॥ 199-200॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘योग्यक्रम करि’—जिसके बाद जिसका बैठना उचित है, उस प्रकारसे करके॥ 199॥ महाप्रभुके भोजन किये बिना सभी भक्तोंका भी प्रसाद ग्रहण न करना :— प्रभु ना खाइले केह ना करे भोजन। ऊर्द्ध-हस्ते बसि' रहे सर्व भक्तगण॥ 201॥ अनुवाद—महाप्रभु नहीं खा रहे थे, इसलिये कोई भी भोजन नहीं कर रहा था। सभी भक्त हाथ उठाकर ही बैठे रहे॥ 201॥ श्रीदामोदर-स्वरूपकी महाप्रभुको श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ भोजन करनेकी प्रार्थना एवं स्वयं भक्तोंको परिवेशन करना स्वीकार :— स्वरूप-गोसाञि प्रभुके कैल निवेदन। “तुमि ना बसिले केह ना करे भोजन॥ 202॥ 458 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/202-212 ] तोमा-सङ्गे रहे यत संन्यासीर गण। गोपीनाथाचार्य ताँरे करियाछे निमन्त्रण ॥ 203 ॥ आचार्य आसियाछेन भिक्षार प्रसादान्न लञा। पुरी, भारती आछेन तोमार अपेक्षा करिया ॥ 204 ॥ नित्यानन्द लञा भिक्षा करिते कैसे तुमि। वैष्णवेर परिवेश्न करितेछि आमि ॥” 205 ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुको निवेदन किया,-“जब तक आप बैठकर भोजन नहीं करेंगे, तब तक कोई भी भोजन नहीं करेगा। आपके साथ जो सब संन्यासी रहते हैं, श्रीगोपीनाथाचार्य ने उन्हें भी निमन्त्रण दिया है। श्रीगोपीनाथाचार्य बहुतसा भिक्षाका प्रसाद-अन्न लेकर आ गये हैं। श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती भी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ भोजन करनेके लिये बैठिये और मैं सभी वैष्णवोंको परिवेश्न करता हूँ॥” 202-205 ॥ महाप्रभुके द्वारा परिवेश्न छोड़ देना और श्रीगोविन्दके हाथों श्रीहरिदास ठाकुरके लिये प्रसाद भेजना :- तबे प्रभु प्रसादान्न गोविन्द-हाते दिला। यत्न करि' हरिदास-ठाकुरे पाठाइला ॥ 206 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने सावधानीपूर्वक कुछ प्रसाद श्रीहरिदास ठाकुरको देनेके लिये श्रीगोविन्दके हाथोंमें दिया ॥ 206 ॥ संन्यासियोंके साथ महाप्रभुका प्रसाद-सम्मान और आचार्यके द्वारा परिवेश्न :- आपने बसिला सब संन्यासीरे लञा। परिवेशन करे आचार्य हरषित हञा ॥ 207 ॥ अनुवाद-फिर महाप्रभु सभी संन्यासियोंके साथ बैठ गये और श्रीगोपीनाथाचार्य आनन्दपूर्वक परिवेश्न करने लगे ॥ 207 ॥ अनुभाष्य-‘आचार्य’-श्रीगोपीनाथ आचार्य ॥ 204-207 ॥ श्रीगोपीनाथाचार्य-श्रीस्वरूप-श्रीजगदानन्दके द्वारा परिवेश्न :- स्वरूप दामोदर आर जगदानन्द। वैष्णवेरे परिवेशे तिन जने-आनन्द ॥ 208 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्य, श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीजगदानन्द पण्डित-ये तीनों आनन्दपूर्वक सभी वैष्णवोंको परिवेश्न करने लगे ॥ 208 ॥ प्रसाद ग्रहण करते समय हरिध्वनि :- नाना पिठापाना खाय आनन्द करिया। मध्ये मध्ये ‘हरि’ कहे आनन्दित हञा ॥ 209 ॥ अनुवाद-सभी वैष्णव आनन्दपूर्वक अनेक प्रकारका पिठा-पाना खा रहे थे और आनन्दित होकर बीच-बीचमें 'हरि' 'हरि' कह रहे थे ॥ 209 ॥ अनुभाष्य-उस समयमें प्रसादके सम्मान करते समय शुद्धसम्प्रदायमें हरिध्वनि देनेकी रीति थी ॥ 209 ॥ ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। सभी भक्तोंका आचमन :- भोजन समाप्त हैल, कैल आचमन। सबारे पराइल प्रभु, माल्य-चन्दन ॥ 210 ॥ अनुवाद-भोजन समाप्त होनेपर सभीने आचमन किया। तब महाप्रभुने सबको माला पहनायी और चन्दन लगाया ॥ 210 ॥ सभीका अपने स्थानपर जाना और सन्ध्यामें महाप्रभुके साथ फिरसे मिलन :- विश्राम करिते सबे निज-वासा गेला। सन्ध्याकाले आसि' पुन: प्रभुके मिलिला ॥ 211 ॥ अनुवाद-तब विश्राम करनेके लिये सभी अपने-अपने वासस्थानपर चले गये और सन्ध्यामें वे आकर पुनः महाप्रभुसे मिले ॥ 211 ॥ श्रीरामानन्दका आगमन और वैष्णवोंके साथ मिलन :- हेनकाले रामानन्द आइला प्रभुस्थाने। प्रभु मिलाइल ताँरे सब वैष्णवगणे ॥ 212 ॥ । 459
[ 11/212-223 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—उस समय श्रीरामानन्द राय महाप्रभुके वासस्थानपर आये और महाप्रभुने उन्हें सभी वैष्णवोंसे मिलवाया॥ 212 ॥ सन्ध्यामें मन्दिरके आङ्गनमें भक्तोंके साथ कीर्त्तनारम्भ :- सबा लञा गेला प्रभु जगन्नाथालय। कीर्त्तन-आरम्भ तथा कैल महाशय॥ 213 ॥ सभीको पड़िछाके द्वारा माल्यचन्दन प्रदान, चारों ओरसे चार मण्डलियोंमें भक्तोंके द्वारा महाकीर्त्तन आरम्भ :- सन्ध्या-धूप देखि' आरम्भिला सङ्कीर्त्तन। पड़िछा आसिं सबारे दिल माल्य-चन्दन॥ 214 ॥ चारिदिके चारि-सम्प्रदाय करेन कीर्त्तन। मध्ये नृत्य करे प्रभु शचीर नन्दन॥ 215 ॥ अष्ट मृदङ्ग बाजे, बत्रिश करताल। हरिध्वनि करे सबे, बोले,-भाल, भाल॥ 216 ॥ कीर्त्तनेर ध्वनि महामङ्गल उठिल। चतुर्दश लोक भेदि' ब्रह्माण्ड भेदिल॥ 217 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सभी भक्तोंको साथ लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें गये और वहाँ उन्होंने कीर्त्तन आरम्भ किया। फिर सबने सन्ध्याकी धूप-आरतीके दर्शन किये और उसके बाद उन्होंने सङ्कीर्त्तन आरम्भ किया। पड़िछाने आकर सबको माला और चन्दन प्रदान किया। चार दिशाओंमें भक्त चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्त्तन करने लगे और बीचमें श्रीशचीनन्दन नृत्य करने लगे। चार मण्डलियोंमें आठ मृदङ्ग और बत्तीस करताल बजने लगीं और सभी हरिध्वनि करते हुए 'अति सुन्दर', 'अति सुन्दर' कहने लगे। कीर्त्तनकी ध्वनिसे महामङ्गल होने लगा। वह ध्वनि चौदह लोकोंको भेदती हुई ब्रह्माण्डको भी भेदकर उसके बाहर गयी॥ 213-217 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पाठान्तरमें— “सन्ध्या-धूप देखि' आरम्भिला सङ्कीर्त्तन। पड़िछा आनिया दिल माल्य-चन्दन॥ चारिदिके चारिसम्प्रदाय करे सङ्कीर्त्तन। मध्ये नृत्य करे प्रभु शचीर नन्दन॥” अर्थात् “सन्ध्याकी धूप-आरतीके दर्शन करके उन्होंने सङ्कीर्त्तन आरम्भ किया। तभी पड़िछाने आकर सबको माला और चन्दन प्रदान किया। चार दिशाओंमें भक्त चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्त्तन करने लगे और बीचमें श्रीशचीनन्दन नृत्य करने लगे॥” 214 ॥ कीर्त्तन श्रवण करके बहुत पुरीवासियोंका आना और उनको आश्चर्य :- कीर्त्तन-आरम्भे प्रेम उथलि' चलिल। नीलाचलवासी लोक धाञा आइल॥ 218 ॥ कीर्त्तन देखि' सबार मने हैल चमत्कार। कभु नाहि देखि ऐछे प्रेमेर विकार॥ 219 ॥ अनुवाद—जब कीर्त्तन आरम्भ हुआ, तब महाप्रभु और भक्तोंके हृदयसे निकलकर श्रीकृष्णप्रेम सब ओर फैलने लगा और नीलाचलवासी लोग दौड़कर आये। कीर्त्तनको देखकर सभीके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे कि उन्होंने कभी भी प्रेमके ऐसे विकार नहीं देखे॥ 218-219 ॥ 'बेड़ा-नृत्य'-कीर्त्तन या मन्दिरकी परिक्रमा करते हुए कीर्त्तन :- तबे प्रभु जगनाथेर मन्दिर बेड़िया। प्रदक्षिण करि' बुलेन नर्त्तन करिया॥ 220 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु नृत्य करते-करते श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चारों ओर परिक्रमा करने लगे॥ 220 ॥ महाप्रभुके अष्ट-सात्त्विक विकार :- आगे-पाछे गान करे चारि-सम्प्रदाय। आछाड़ेर काले धरे नित्यानन्द-राय॥ 221 ॥ अश्रु, पुलक, कम्प, स्वेद, गम्भीर, हुँकार। प्रेमेर विकार देखि' लोके चमत्कार॥ 222 ॥ पिच्कारि-धारा जिनि' अश्रु नयने। चारिदिकेर लोक सब करये सिने॥ 223 ॥ 460 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/221-233 ] 'बेड़ानृत्य' महाप्रभु करि' कतक्षण। मन्दिरेर पाछे रहि' करये कीर्त्तन ॥ 224 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके आगे-पीछे चार मण्डलियाँ गान कर रही थी। महाप्रभु जब पछाड़ खाकर गिरने लगते, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु उन्हें सम्भाल लेते। महाप्रभुमें अश्रु, पुलक, कम्प, स्वेद, गम्भीर हुँकार आदि प्रेमके अष्ट-सात्त्विक विकारोंको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे थे। महाप्रभुके नेत्रोंसे पिचकारीकी भाँति अश्रुधारा निकल रही थी, जो चारों ओर खड़े लोगोंको भिगो रही थी। महाप्रभु श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी परिक्रमा करके कुछ समयके लिये मन्दिरके पीछे खड़े होकर कीर्त्तन करते रहे ॥ 221-224 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लोक सब करये सिनाने'—चारों ओर सब लोगोंने अश्रुजलसे स्नान किया ॥ 222 ॥ चारों सम्प्रदायके बीचमें महाप्रभुका नृत्य :- चारिदिके नाचे, सम्प्रदाय उच्चैःस्वरे गाय। मध्ये ताण्डव-नृत्य करे गौरराय ॥ 225 ॥ बहुक्षण नृत्य करि' प्रभु स्थिर हैला। चारि महान्तेरे तबे नाचिते आज्ञा दिला ॥ 226 ॥ अनुवाद—चारों ओर चार मण्डलियोंमें भक्त उच्च स्वरसे गा रहे थे तथा उनके बीचमें श्रीगौरराय ताण्डव नृत्य कर रहे थे। बहुत समय तक नृत्य करनेके बाद जब महाप्रभु कुछ स्थिर हुए, तो उन्होंने चार महान्तोंको नृत्य करनेका आदेश दिया ॥ 225-226 ॥ अकेले पुरुषके नृत्यको ताण्डव नृत्य कहते हैं। चार महान्त-(1) श्रीनित्यानन्द, (2) श्रीअद्वैत :- एक सम्प्रदाये नाचे नित्यानन्द-राये। अद्वैत-आचार्य नाचे आर सम्प्रदाये ॥ 227 ॥ अनुवाद—एक मण्डलीमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने नृत्य आरम्भ किया और दूसरी मण्डलीमें श्रीअद्वैताचार्य प्रभु नृत्य करने लगे ॥ 227 ॥ (3) श्रीवक्रेश्वर, (4) श्रीवास :- आर सम्प्रदाये नाचे पण्डित-वक्रेश्वर। श्रीवास नाचे आर सम्प्रदाय-भितर ॥ 228 ॥ अनुवाद—तीसरी मण्डलीमें श्रीवक्रेश्वर पण्डित नृत्य करने लगे और चौथी मण्डलीमें श्रीवास पण्डित नृत्य कर रहे थे ॥ 228 ॥ कीर्त्तनके बीचमें महाप्रभुका अवस्थान और चारों जनोंके नृत्य-दर्शनके लिये ऐश्वर्यका प्रकाश :- मध्ये रहि' महाप्रभु करेन दरशन। ताँहा एक ऐश्वर्य हइल प्रकटन ॥ 229 ॥ चारिदिके नृत्यगीत करे यत जन। सबे कहे,―प्रभु करे आमारे दरशन ॥ 230 ॥ चारिजनेर नृत्य देखिते प्रभुर अभिलाष। सेइ अभिलाषे करे ऐश्वर्य प्रकाश ॥ 231 ॥ दर्शने आवेश ताँर देखि' मात्र जाने। केमने चौदिके देखे,—इहा नाहि जाने ॥ 232 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बीचमें रहकर इन सबको नृत्य करते देख रहे थे और वहाँ महाप्रभुका एक ऐश्वर्य प्रकट हो गया। चारों ओर जितने भक्त नृत्य-गीत कर रहे थे, वे सभी कह रहे थे,―महाप्रभु मेरी ओर ही देख रहे हैं। महाप्रभुकी इच्छा चारों महान्तोंके नृत्यका दर्शन करनेकी थी, इसी अभिलाषाके कारण उन्होंने अपना ऐश्वर्य प्रकाशित किया। दर्शनके आवेशमें चारों ओर भक्त महाप्रभुको अपने सामने देख रहे थे, किन्तु महाप्रभु कैसे एक साथ चारों ओर देख रहे हैं―इसे वे नहीं जानते थे ॥ 229-232 ॥ ब्रजलीलामें सखाओंके मध्यमें बैठे श्रीकृष्णके पुलिन भोजनके साथ उपमा :- पुलिन-भोजने येन कृष्ण मध्य-स्थाने। चौदिकेर सखा कहे,―आमारे नेहाने ॥ 233 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण यमुनाके तटपर भोजन करते । 461
[ 11/233-242 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला समय सभी सखाओंके बीचमें बैठते थे। उनके चारों ओर बैठे हुए सभी सखा यही अनुभव करते थे कि श्रीकृष्ण उन्हें देख रहे हैं॥ 233 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजमें श्रीकृष्ण जब यमुना-तटपर भोजन करते थे, तब उनके चारों ओर बैठकर प्रत्येक गोपबालक देखते थे कि श्रीकृष्ण उसकी ओर मुख करके ही भोजन कर रहे हैं। उसी प्रकार महाप्रभु भी जब नृत्य कर रहे थे, तब उनके चारों ओर स्थित भक्तोंने उनके सामने रहकर उनके मुखका दर्शन किया था। यह भी महाप्रभुका एक ऐश्वर्य प्रकाश है। 'नेहाने'-देखे ॥ 233 ॥ निकट नृत्यकारी भक्तको महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- नृत्य करिते येइ आइसे सन्निधाने। महाप्रभु करे तारे दृढ़ आलिङ्गने ॥ 234 ॥ महासङ्कीर्त्तन-नृत्य :- महानृत्य, महाप्रेम, महासङ्कीर्त्तन। देखि' प्रेमावेशे भासे नीलाचल-जन ॥ 235 ॥ अनुवाद-नृत्य करते हुए जो भी महाप्रभुके निकट आता, महाप्रभु उसे दृढ़तापूर्वक आलिङ्गन करते। इस प्रकार महानृत्य, महाप्रेम और महासङ्कीर्त्तनको देखकर नीलाचलवासी प्रेमावेशमें डूब गये ॥ 234-235 ॥ प्रतापरुद्रके द्वारा अट्टालिकापर चढ़कर कीर्त्तन-दर्शन :- गजपति राजा शुनि' कीर्त्तन-महत्त्व। अट्टालिका चड़ि' देखे स्वगण-सहित ॥ 236 ॥ राजाका आश्चर्य एवं महाप्रभु-चरण-दर्शनकी उत्कण्ठा :- कीर्त्तन देखिया राजार हैल चमत्कार। प्रभुके मिलिते उत्कण्ठा बाड़िल अपार ॥ 237 ॥ अनुवाद-गजपति राजाने भी जब कीर्त्तनकी महिमा सुनी, तो वे अपने लोगोंके साथ अट्टालिकापर चढ़कर उसे देखने लगे। कीर्त्तनको देखकर राजाको बहुत आश्चर्य हुआ और उनकी महाप्रभुसे मिलनेकी उत्कण्ठा और अधिक बढ़ गयी ॥ 236-237 ॥ कीर्त्तनके अन्तमें पुष्पाञ्जलि दर्शन करके भक्तोंके साथ महाप्रभुका अपने घरपर जाना :- कीर्त्तन-समाप्त्ये प्रभु देखि' पुष्पाञ्जलि। सर्व वैष्णव लञा प्रभु आइला वासा चलि' ॥ 238 ॥ अनुवाद-कीर्त्तन समाप्त होनेपर महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलीका दर्शन किया। तब महाप्रभु सभी वैष्णवोंको लेकर अपने वासस्थानपर चले आये॥ 238 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुष्पाञ्जलि'-जगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलि ॥ 238 ॥ ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। सभीका महाप्रभुके हाथोंसे वितरित प्रसादका सम्मान :- पड़िछा आनिया दिल प्रसाद विस्तर। सबारे बाँटिया ताहा दिलेन ईश्वर ॥ 239 ॥ सभी भक्तोंको विश्राम करनेकी अनुमति देना :- सबारे विदाय दिल करिते शयन। एइमत लीला करे शचीर नन्दन ॥ 240 ॥ अनुवाद-पड़िछाने आकर महाप्रभुको बहुत-सा महाप्रसाद दिया और महाप्रभुने उसे सभी वैष्णवोंमें बाँट दिया। तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको शयन करनेके लिये विदायी दी। इस प्रकार श्रीशचीनन्दन ऐसी अद्भुत लीलाएँ करते हैं ॥ 239-240 ॥ महाप्रभुके साथ रहते हुए सभीको इस प्रकार कीर्त्तनके आनन्दकी प्राप्ति :- यावत् आछिला सबे महाप्रभु-सङ्गे। प्रतिदिन एइमत करे कीर्त्तन-रङ्गे ॥ 241 ॥ अनुवाद-जब तक सब भक्त महाप्रभुके साथ जगन्नाथपुरीमें रहे, प्रतिदिन महाप्रभु इसी प्रकार बड़े आनन्दसे कीर्त्तन करते थे ॥ 241 ॥ बेड़ा-नृत्य-कीर्त्तनके श्रवणसे चिद्वृत्तिकी स्फूर्त्ति :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर कीर्त्तन-विलास। येबा इहा शुने, हय चैतन्येर दास ॥ 242 ॥ 462 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/242-243 ] श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 243 ॥ करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 242-243 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे 'बेड़ा-कीर्त्तन'-विलास-वर्णनं नाम एकादश परिच्छेदः। अनुवाद-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके कीर्त्तन-विलासका वर्णन किया। (ग्रन्थकार आशीर्वाद कर रहे हैं) जो श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें 'बेड़ा-कीर्त्तन'-विलास-वर्णन इसका श्रवण करेगा, वह महाप्रभुका दास बन जायेगा। नामक ग्यारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 463
बारहवाँ अध्याय
**कथासार—**श्रीमहाप्रभुका दर्शन करनेके लिये राजाने बहुत चेष्टा की। सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको राजाके चित्तके भाव बतलाये। महाप्रभुके तब भी (राजासे मिलना) अस्वीकार करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुसे उनका एक बहिर्वास (वस्त्र) लेकर राजाके पास भिजवा दिया। किसी और दिन जब श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको राजापर कृपा करनेके लिये कहा, तो महाप्रभु उनसे सम्मत नहीं हुए, किन्तु उन्होंने राजाके पुत्रको लानेकी आज्ञा दे दी; राजपुत्रके कृष्णोद्दीपक वेशको देखकर महाप्रभुने उसपर कृपा की। रथयात्रासे पहले ही अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुने गुण्डिचा मन्दिरकी धुलायी और सफाई की। उसके बाद इन्द्रद्युम्न सरोवरमें स्नान करके उपवनमें समस्त वैष्णवोंको लेकर महाप्रभुने प्रसाद सेवा की। मन्दिर-मार्जनके समय जब किसी गौड़ीयने महाप्रभुके चरणोंमें जल देकर उस जलको पान किया, तब एक प्रेम-रहस्य उदित हुआ। दूसरी ओर, श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगोपालके मूर्च्छित होनेपर उसकी मूर्च्छाको भङ्ग होते न देखकर महाप्रभुने उसे चेतन किया। प्रसाद सेवनके समय श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुमें थोड़ा प्रेमकलह हुआ था। श्रीअद्वैत प्रभुने कहा,–'अज्ञात कुल-शील नित्यानन्दके साथ एक पंक्तिमें भोजन करना गृहस्थ-ब्राह्मणका कर्तव्य नहीं है'; उसके उत्तरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,–“अद्वैताचार्य 'अद्वैत-सिद्धान्त'में निपुण हैं, इसके साथ भोजन करनेसे सज्जन लोगोंका चित्त ना जाने किस प्रकारका हो जाता है?” इन दोनों प्रभुओंकी बातमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य है, उसे सद्भक्त ही अनायास समझ सकते हैं। वैष्णवोंकी सेवा होनेके बाद श्रीस्वरूप आदि सज्जनोंने घरके भीतर प्रसाद सेवा की। श्रीनवयौवन-दर्शनके दिन भक्तोंको लेकर महाप्रभुने जगद्बन्धु (जगन्नाथ)के दर्शनमें विशेष प्रसन्नता प्राप्त की।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गुण्डिचा मार्जन करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :— श्रीगुण्डिचा-मन्दिरमात्मवृन्दैः सम्मार्जयन् क्षालनतः स गौरः। स्वचित्तवच्छीतलमुज्ज्वलञ्च कृष्णोपवेशौपयिकं चकार ॥1॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रीगौरचन्द्रने अपने आत्मीय भक्तों सहित श्रीगुण्डिचा मन्दिरको पोंछ और धो करके उसे अपने शीतल और उज्ज्वल चित्तकी भाँति स्वच्छ करके श्रीकृष्णके बैठने योग्य किया था॥1॥
अनुभाष्य— सः गौरः आत्मवृन्दैः (निजभक्तगणैः सह) श्रीगुण्डिचा-मन्दिरं सम्मार्जयन् (मलादि-विरहितं कुर्वन्) क्षालनतः (प्रक्षालनादिना) स्वचित्तवत् (आत्महृदयवत्) शीतलं (भोगवासनानलजनित-त्रितापविहीनम्) उज्ज्वलं (दीप्तिविशिष्टं) च कृष्णोपवेशौपयिकं (कृष्णस्य वासयोग्यं स्थानं) चकार।
**श्लोक-भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥
**अनुवाद—**श्रीगौरचन्द्रकी जय हो जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो एवं समस्त श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥2॥
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[ 12/3-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गौरभक्तोंसे ग्रन्थकारकी श्रीकृष्णचैतन्यके गुण-लीला-वर्णन करनेकी शक्तिकी प्रार्थना :- जय जय श्रीवासादि गौरभक्तगण। शक्ति देह,—करि येन चैतन्य-वर्णन॥३॥ अनुवाद—श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो जय हो। आप सभी मुझे शक्ति प्रदान करें, जिससे मैं महाप्रभुकी लीलाओंका वर्णन कर सकूँ॥३॥ दक्षिण देशसे आनेके बाद राजा प्रतापरुद्रकी महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा— पूर्वे दक्षिण हैते प्रभु यबे आइला। ताँरे मिलिते गजपति उत्कण्ठित हैला॥४॥ दर्शन करनेके लिये श्रीभट्टाचार्यको महाप्रभुकी अनुमतिके लिये पत्र भेजना :- कटक हैते पत्री दिल सार्वभौम-ठाञि। प्रभुर आज्ञा हय यदि, देखिवारे याइ॥५॥ अनुवाद—दक्षिण भारतसे जब महाप्रभु लौट आये, तब गजपति (राजा प्रतापरुद्र) उनसे मिलनेके लिये बड़े उत्कण्ठित हो गये। कटकसे राजाने श्रीसार्वभौमको पत्र लिखा कि यदि महाप्रभुकी आज्ञा हो, तो मैं उनके दर्शनके लिये आ जाऊँ॥४-५॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी निषेध आज्ञाका बताना और राजाके द्वारा पुनः लोभरूपी पत्र भेजना :- भट्टाचार्य लिखिल,—प्रभुर आज्ञा ना हैल। पुनरपि राजा ताँरे पत्री पाठाइल॥६॥ भक्तोंके पास अभीष्ट सिद्धि हेतु प्रार्थना :- 'प्रभुर निकटे आछे यत भक्तगण। मोर लागि' ताँ-सबारे करिह निवेदन॥७॥ सेइ सब दयालु मोरे हञा सदय। मोर लागि' प्रभुपदे करिबे विनय॥८॥ ताँ-सबार प्रसादे मिले श्रीप्रभुर पाय। प्रभुकृपा बिना मोर राज्य नाहि भाय॥९॥ महाप्रभुकी कृपाके अभावमें राजाका निर्वेद और राज्य त्याग करनेकी प्रतिज्ञा :- यदि मोरे कृपा ना करिबे गौरहरि। राज्य छाड़ि' योगी हइ' हइब भिखारी॥'१०॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने उत्तरमें लिखा,—अभी महाप्रभुकी ऐसी आज्ञा नहीं हुई है। यह सुनकर राजाने फिरसे उन्हें एक पत्र लिखकर भेजा,—'महाप्रभुके पास जितने भक्त रहते हैं, उन सबसे मेरे ओरसे निवेदन करना कि वे सब दयालु भक्त मुझपर कृपा करके मेरे लिये महाप्रभुके श्रीचरणोंमें प्रार्थना करें। उन सबकी कृपासे ही मुझे महाप्रभुके श्रीचरणोंकी प्राप्ति हो सकती है। महाप्रभुकी कृपाके बिना अब मेरा राजपाटमें मन नहीं लगता। यदि श्रीगौरहरि मुझपर कृपा नहीं करेंगे, तो मैं राजपाट छोड़कर योगी बनकर घर-घर भिक्षा करूँगा॥'६-१०॥ अनुभाष्य—'कल्याणकल्पतरु' ग्रन्थमें श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुरने लिखा है— “काँदिया, काँदिया जानाइब दुःखग्राम। संसार-अनल ह'ते मागिब विश्राम॥ शुनिया आमार दुःख वैष्णव-ठाकुर। आमा लागि' कृष्णे आवेदिबेन प्रचुर॥ वैष्णवेर आवेदने कृष्ण दयामय। मो-हेन पामर-प्रति ह'बेन सदय॥” अर्थात् “मैं रोते-रोते अपने दुःखकी गाथा सुना रहा हूँ। अब मैं इस संसार-अग्निसे छुटकारा चाहता हूँ। हे वैष्णव-ठाकुर ! मेरे दुःखकी गाथाको सुनकर श्रीकृष्णसे मेरे लिये ज़ोर देकर प्रार्थना करना। वैष्णवकी प्रार्थना सुनकर दयामय श्रीकृष्ण मेरे जैसे पापीके प्रति भी दयाशील होंगे॥”७-९॥ सभी भक्तोंको राजाका पत्र दिखाना :- भट्टाचार्य पत्री देखि' चिन्तित हञा। भक्तगण-पाश गेला सेइ पत्री लञा॥११॥ 466 ।