भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

9/13-15 ] पुरी, ब्रह्मानन्द भारती, विष्णु पुरी, केशव पुरी, कृष्णानन्द पुरी, श्रीनृसिंहतीर्थ और सुखानन्द पुरी—ये नौ जड़ें वृक्षके मूलसे निकलीं, जिन्होंने वृक्षको स्थिर किया॥13-15॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पुरी' नामके ये सभी संन्यासी श्रीईश्वरपुरीके सम्बन्धसे और 'भारती' नामके ये संन्यासी श्रीचैतन्य महाप्रभुके संन्यास गुरु श्रीकेशव भारतीके सम्बन्धसे आत्मीयवर्ग हैं॥14॥ अनुभाष्य—श्रीपरमानन्दपुरी त्रिहुत नामक देशमें ब्राह्मण कुलमें आविर्भूत हुए और वे श्रीमाधवेन्द्र पुरीके शिष्य तथा श्रीचैतन्य महाप्रभुके परम प्रियपात्र थे। (चैःभाः अन्त्यखण्ड 10/46-49, 42) में— “संन्यासीर मध्ये ईश्वरेर प्रियपात्र। आर नाहि, एक पुरी गोसाञि से मात्र॥46॥ दामोदरस्वरूप, परमानन्द-पुरी। संन्यासीपार्षदे एइ दुइ अधिकारी॥47॥ निरवधि निकटे थाकेन दुईजन। प्रभुर संन्यासे करे दण्डेर ग्रहण॥48॥ पुरी ध्यानपर, दामोदरेर कीर्त्तन। न्यासी-रूपे न्यासी-देहे बाहु दुइ जन॥49॥ यत प्रीति ईश्वरेर पुरी-गोसाञिरे। दामोदर-स्वरूपेओ तत प्रीति करे॥42॥” “दामोदर-स्वरूप संन्यासियोंमें से महाप्रभुके प्रियपात्र थे। एक परमानन्दपुरीके अतिरिक्त उनके समान और कोई न था। संन्यासी पार्षदोंमें दामोदर-स्वरूप और परमानन्दपुरी—ये दोनों अधिकारी थे। दोनों निरन्तर महाप्रभुके पास ही रहते थे। महाप्रभुके संन्यासके पश्चात् इन्होंने दण्ड ग्रहण किया। परमानन्दपुरी विरक्त ध्यानपरायण भजनमें अनुरक्त रहते थे और दामोदर स्वरूप कीर्तनानन्दी थे। भगवान् श्रीगौरसुन्दरके संन्यासी शरीरमें ये दोनों भुजा सदृश थे। श्रीपरमानन्दपुरीके प्रति भगवान् श्रीगौरसुन्दरका जिस प्रकारका मर्यादाभाव था, दामोदर स्वरूपके प्रति भी वह भाव किसी भी प्रकारसे न्यून नहीं था।” श्रीपरमानन्दपुरीका दर्शनकर महाप्रभु कहने लगे— (चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा अध्याय संख्या 171-172, 175)— “आजि धन्य लोचन, सफल आजि जन्म। सफल आमार आजि हैल सर्वधर्म॥”171॥ प्रभु बोले,—“आजि मोर सफल संन्यास। आजि माधवेन्द्र मोरे हइल प्रकाश॥”172॥ कत क्षणे अन्योऽन्ये करेन प्रणाम। परमानन्दपुरी—चैतन्येर प्रेम-धाम॥” “हरि हरि! नेत्रोंसे परमानन्दपुरीके दर्शनकर आज मेरे नेत्र धन्य हो गये, आज जन्म सफल हो गया, धन्य हो गया। आज मेरे सभी धर्म सफल हो गये।” महाप्रभुने आगे कहा—“आज मेरा संन्यास सफल हुआ है। आज श्रीमाधवेन्द्रपुरीका प्रकाश मेरे सामने प्रकट हुआ है।” कुछ क्षणों पश्चात् दोनोंने एक दूसरेको प्रणाम किया। श्रीपरमानन्दपुरी चैतन्य-प्रेमके धाम हैं। श्रीपरमानन्दपुरी पुरुषोत्तम क्षेत्रमें श्रीमन्दिरके पश्चिम दिशाकी ओर एक मठका और एक कुँआ निर्माणकर रहते थे। कुँएका जल पवित्र न देख महाप्रभुने कहा— (चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा अध्याय)— “महाप्रभु जगन्नाथ मोरे देह एह वर। गङ्गा प्रवेशुक एई कूपेर भितर॥”242॥ प्रभु बोले,—“शुनह सब भक्तगण। ए कूपेर जले ये करिबे स्नान पान॥251॥ सत्य सत्य हबे तार गङ्गास्नान-फल। कृष्णे भक्ति हबे तार परम निर्मल॥”252॥ प्रभु बोले,—“आमि ये आछिये पृथिवीते। निश्चयइ जानिह पुरी-गोसाञिर प्रीते॥”255॥ श्रीचैतन्य महाप्रभु भुजाएँ उठाकर कहने लगे,—“जगन्नाथ महाप्रभु, मुझे यह वर दीजिये कि गङ्गा इस कुँएके भीतर प्रविष्ट हो जाय।” तब श्रीचैतन्य महाप्रभु कहने लगे,—“सभी भक्तों सुनो! इस कुँएके जलमें जो स्नान करेगा और जो इसका जल पान करेगा, उसे सत्य ही गङ्गा-स्नानका फल मिलेगा और परम निर्मल कृष्णभक्तिकी प्राप्ति होगी।” आगे श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा,—“केवल नवाँ अध्याय | 31

[ 9/14 पुरी गोसाईंकी प्रीतिके कारण ही मैं पृथ्वीपर आया हूँ, यह निश्चय ही जानना।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (118 श्लोक) में इस प्रकार वर्णन आता है— “पुरी श्रीपरमानन्दो य आसीदुद्धवः पुरा।” “पहले जो उद्धव थे, वे ही अब श्रीगौरलीलामें श्रीपरमानन्द पुरी हैं।” केशवभारती—श्रीशङ्कर-प्रवर्त्तित दशनामी दण्डिगर्णोंके अन्यतम 'भारती' सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त हैं। सरस्वती, पुरी और भारती—ये तीन सम्प्रदाय दक्षिणापथके शृंगेरी मठके अधीन हैं। श्रीकेशवभारती उस समय काटोयाके शाखा मठमें अधिष्ठित थे। किसी-किसीका यह कहना है कि ये ब्रह्म संन्यासी होनेपर भी श्रीमाध्व-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त श्रीमाधवेन्द्रपुरीके मन्त्र-शिष्य और वैष्णव संन्यासी थे। वर्द्धमान जिलाके कान्द्रा डाकघरके अन्तर्गत खाटुन्दि गाँवमें इनकी देवसेवा और मठ स्थापित हैं। मठाधिकारियोंके मतानुसार वे सब श्रीकेशवभारतीके वंशज हैं। श्रीकेशवके पुत्र (अन्य मतानुसार शिष्य)—निशापति और ऊषापति हैं। [श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके द्वारा यह टीका लिखे जानेके समय] निशापतिके वंशमें श्रीनकड़िचन्द्र विद्यारत्न सेवाधिकारीके रूपमें वर्त्तमान थे और ऊषापतिके वंशज हुगलीके वैँचिके निकट राखालदासपुरमें विद्यमान थे। किसी अन्यके मतानुसार ये (निशापति और ऊषापति) श्रीकेशव भारतीके पूर्वाश्रमके वंशज भी हो सकते हैं। किसी अन्यके मतानुसार, श्रीकेशवभारतीके भ्राता, मतान्तरसे उनके शिष्य माधव भारतीके शिष्य बलभद्र भी भारती थे। बलभद्रके पूर्वाश्रमके दो पुत्र मदन और गोपाल थे, मदन आउरियामें और गोपाल देन्दुड़में वास करते थे। मदनके वंशमें 'भारती' और गोपालके वंशमें 'ब्रह्मचारी' उपाधि हैं। इन दोनों वंशोंके अनेक उत्तराधिकारी विद्यमान हैं। श्रीगौरगणोद्देश दीपिकाके 52 श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “मथुरायां यज्ञसूत्रं पुरा कृष्णाय यो मुनिः। ददौ सान्दीपनिः सोऽभूत् अद्य केशवभारती॥” “पूर्वकालमें मथुरामें श्रीकृष्णका यज्ञोपवीत संस्कार करानेवाले श्रीसान्दीपनि मुनि अब श्रीगौरलीलामें श्रीकेशव भारती हैं।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाका 117 श्लोक— “इति केचित् प्रभाषन्तेऽक्रूरः केशवभारती॥” “कोई-कोई श्रीकेशव भारतीको अक्रूरका अवतार भी कहते हैं।” 1432 शकाब्दमें कटोयामें इन्होंने निमाइ पण्डितको संन्यास प्रदान किया। वैष्णवमञ्जुषा-द्वितीय संख्या द्रष्टव्य है। श्रीब्रह्मानन्दपुरी—श्रीमहाप्रभुकी नवद्वीपलीलामें ये कीर्त्तनके सङ्गी थे। संन्यास ग्रहण करनेसे पहले भी और संन्यासके बाद भी महाप्रभु उनपर विशेष विश्वास करते थे। नीलाचलमें भी ये महाप्रभुके सङ्गी होकर आये थे। श्रीब्रह्मानन्द भारती—जब वे नीलाचलमें महाप्रभुके दर्शनके लिये गये, तब उनका नीचेका वस्त्र मृगके चमड़ेसे निर्मित था। यद्यपि वे महाप्रभुके निकट थे, तो भी महाप्रभु छल करते हुए कहने लगे कि मैं ब्रह्मानन्द भारतीको देखना चाहता हूँ। यह सुनकर अर्थात् महाप्रभुके अभिप्रायको जानकर श्रीब्रह्मानन्दने चमड़ेके वस्त्र परित्यागकर काषाय-बहिर्वासको ग्रहण किया। इन्होंने महाप्रभुके निकट फिर कुछ दिनों तक नीलाचलमें वास किया॥13॥ केशवपुरी, कृष्णानन्दपुरी, नृसिंहतीर्थ और सुखानन्दपुरीके सम्बन्धमें श्रीगौरगणोद्देश दीपिकामें (97-101 श्लोक) इस प्रकार वर्णन आता है— “अनन्तश्च सुखानन्दो गोविन्दो रघुनाथकः। कृष्णानन्दः केशवश्च श्रीदामोदर-राघवौ। पुर्युपाधिक्रमात् ज्ञेया अणिमाद्यष्टसिद्धयः ॥97॥ जायन्तेयाः स्थिता ऊर्ध्वरेतसः समदर्शिनः। नव भागवताः पूर्वं श्रीभागवतसंहिताः॥98॥ प्रत्यूचुर्जनकं तेऽद्य भूत्वा संन्यासिनः सदा। प्रभुणा गौरहरिणा विहरन्ति स्म ते यथा॥99॥ 32 | श्रीचैतन्यचरितामृत

9/14-25 ] श्रीनृसिंहानन्दतीर्थः श्रीसत्यानन्दभारती। श्रीनृसिंह-चिदानन्द-जगन्नाथा हि तीर्थकाः ॥ १०० ॥ तीर्थाभिधो वासुदेवः श्रीरामः पुरुषोत्तमः। गरुडाख्यावधूतश्च श्रीगोपेन्द्राख्य आश्रमः ॥ १०१ ॥ “पूर्वकालमें श्रीवृन्दावनमें जो अणिमा आदि अष्टसिद्धियाँ थीं, उन्होंने गौड़देशमें आठ भक्तोंके रूपमें जन्म ग्रहण किया है। क्रमसे उन आठोंके नाम इस प्रकार हैं—अनन्त, सुखानन्द, गोविन्द, रघुनाथ, कृष्णानन्द, केशव, दामोदर और राघव। ये आठों ‘पुरी’ उपाधिसे युक्त थे। पूर्वकालमें राजा जनकको श्रीभागवत संहिताका श्रवण करानेवाले जयन्तीके ऊर्ध्वरेताः अर्थात् ब्रह्मचर्यमें प्रतिष्ठित, समदर्शी एवं भगवद्भक्त नौ-के-नौ पुत्र ही अब संन्यासी होकर सदैव महाप्रभु श्रीगौरहरिके साथ विहार कर रहे हैं। अब उनके नाम श्रीनृसिंहानन्द तीर्थ, श्रीसत्यानन्द भारती, श्रीनृसिंह तीर्थ, श्रीचिदानन्द तीर्थ, श्रीजगन्नाथ तीर्थ, श्रीवासुदेव तीर्थ, श्रीराम तीर्थ, श्रीगरुड़ अवधूतके नामसे भी प्रसिद्ध श्रीपुरुषोत्तम तीर्थ तथा श्रीगोपेन्द्र आश्रम हैं॥ १४ ॥ परमानन्दपुरी मध्यमूल :- मध्यमूल परमानन्द पुरी महाधीर। एइ नव मूले वृक्ष करिल सुस्थिर ॥ १६ ॥ अनुवाद—जिन नौ जड़ोंने वृक्षको स्थिर किया है, महाधीर श्रीपरमानन्दपुरी उसकी मध्य जड़ हैं॥ १६ ॥ उनके द्वारा असंख्य शाखा और उपशाखा :- स्कन्धेर उपरे बहु शाखा निकसिल। उपरि उपरि शाखा असंख्य हइल ॥ १७ ॥ विश विश शाखा करि' एक एक मण्डल। महा-महा-शाखा छाइल ब्रह्माण्ड सकल ॥ १८ ॥ एकैक शाखाते उपशाखा शत शत। यत उपजिल शाखा के गणिबे कत ॥ १९ ॥ मुख्य मुख्य शाखागणेर नाम गणन। आगे ता' करिब, शुन वृक्षेर वर्णन ॥ २० ॥ अनुवाद—तनेसे ऊपर अनेक शाखाएँ निकलीं और उन शाखाओंके ऊपर असंख्य शाखाएँ और निकलीं। बीस-बीस शाखाओंको लेकर एक मण्डल बना। बड़ी-बड़ी शाखाएँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें छा गयीं। एक-एक शाखासे सौ-सौ उपशाखाएँ उपजीं। इन शाखाओंकी कौन कहाँ तक गिनती कर सकता है? मुख्य-मुख्य शाखाओंके नामोंकी गणना आगे करूँगा। अभी चैतन्यवृक्षका वर्णन सुनिये ॥ १७-२० ॥ मूल तनेके दोनों ओर दो तने— श्रीनिताइ और श्रीअद्वैत :- शाखार उपरे हैल वृक्ष-दुइ स्कन्ध। एक 'अद्वैत' नाम, आर 'नित्यानन्द' ॥ २१ ॥ अनुवाद—वृक्षके तनेके ऊपरवाले सिरेपर तनेके दो भाग हुए। एक तनेका नाम ‘श्रीअद्वैत’ और दूसरेका नाम ‘श्रीनित्यानन्द’ हुआ॥ २१ ॥ शिष्य-प्रशिष्यरूप शाखा-उपशाखा-परम्परासे विस्तार :- सेइ दुइस्कन्धे शाखा यत उपजिल। तार उपशाखागणे जगत छाइल ॥ २२ ॥ बड़ शाखा, उपशाखा, तार उपशाखा। जगत व्यापिल तार के करिबे लेखा ॥ २३ ॥ शिष्य, प्रशिष्य, आर उपशिष्यगण। जगत व्यापिल तार नहिक गणन ॥ २४ ॥ उडुम्बर-वृक्ष येन फले सर्व अङ्गे। एइ मत भक्तिवृक्षे सर्वत्र फल लागे ॥ २५ ॥ अनुवाद—इन दोनों तनोंसे जितनी भी शाखाएँ उत्पन्न हुईं, उनकी उपशाखाओंने सम्पूर्ण जगत्‌को आच्छादित कर दिया। बड़ी शाखाएँ, उपशाखाएँ और उनकी भी उपशाखाओंने जगत्‌को व्याप्त कर लिया, उनके बारेमें कौन लिख सकता है? इस प्रकार शिष्य, प्रशिष्य (शिष्यके शिष्य) और उनके भी उपशिष्य इतनी संख्यामें सम्पूर्ण जगत्‌में फैल गये कि उनकी गिनती नवाँ अध्याय | 33

[ 9/22-36 करना सम्भव नहीं है। जिस प्रकार गूलर वृक्षके सभी अङ्गोंमें फल लगता है, उसी प्रकार भक्ति-वृक्षके प्रत्येक अङ्गमें फल लग गये ॥ 22-25 ॥ उससे माली श्रीगौरकी श्रीकृष्ण-प्रेमामृत फल-वितरण-लीला :- मूलस्कन्धेर शाखा आर उपशाखागणे। लागिल ये प्रेमफल,-अमृतके जिने ॥ 26 ॥ अनुवाद-(चैतन्य महाप्रभुरूपी) मूल तनेकी शाखाओं- उपशाखाओंमें जो फल लगे, वे अमृतको भी पराभूत करनेवाले थे॥ 26 ॥ बिना मूल्य प्रेमफल-वितरण :- पाकिल ये प्रेमफल अमृत-मधुर। बिलाय चैतन्यमाली, नाहि लय मूल ॥ 27 ॥ त्रिजगते यत आछे धन-रत्नमणि। एकफलेर मूल्य करि' ताहा नाहि गणि ॥ 28 ॥ अनुवाद-जो प्रेमफल पक गये, उनका स्वाद अमृतसे भी मधुर था। माली श्रीचैतन्य महाप्रभु उन मधुर फलोंको बिना मोलके ही बाँटने लगे। तीनों लोकोंमें जितनी भी धन-रत्न-मणि आदि सम्पत्ति है, उसका मूल्य इस वृक्षके एक प्रेमफलके समान भी नहीं है ॥ 27-28 ॥ अनुभाष्य-'मूल'-मूल्य ॥ 27 ॥ पात्र-अपात्र विचार बिना वितरण :- मागे वा ना मागे केह, पात्र वा अपात्र। इहार विचार नाहि जाने, देय मात्र ॥ 29 ॥ अनुवाद-किसीने माँगा अथवा नहीं माँगा, कोई इसका अधिकारी था या नहीं था, इसपर बिना कोई विचार किये श्रीचैतन्य महाप्रभु सबको यह प्रेमफल देते गये ॥ 29 ॥ दीन-दुःखी जीवोंका उद्धार :- अञ्जलि अञ्जलि भरि' फेले चतुर्दिशे। दरिद्र कुड़ाञा खाय, मालाकार हासे ॥ 30 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अञ्जली भर-भरकर प्रेमफलको चारों ओर फेंकने लगे। दरिद्र (साधन-भजन अथवा प्रेम रूपी धनसे विहीन) लोग उन्हें उठा-उठाकर खाने लगे, तो श्रीचैतन्यमाली उनको देखकर हँसने लगे ॥ 30 ॥ मालाकार कहे,-शुन, वृक्ष-परिवार। मूलशाखा-उपशाखा यतेक प्रकार ॥ 31 ॥ चैतन्य-वृक्षके सभी अङ्ग ही चेतनमय और चेतनमय फलास्वादनसे अचेतन जीवोंका चैतन्य होना :- अलौकिक वृक्ष करे सर्वेन्द्रिय-कर्म। स्थावर हइया धरे जङ्गमेर धर्म ॥ 32 ॥ ए वृक्षेरे अङ्ग हय सब सचेतन। बाड़िया व्यापिल सबे सकल भुवन ॥ 33 ॥ अनुवाद-माली कहने लगे-"वृक्षके परिवारकी मूलशाखाओं! उपशाखाओं! सब सुनो। यह भक्तिवृक्ष अलौकिक है, यह सभी इन्द्रियोंसे दूसरी इन्द्रियोंके कार्य करनेमें सक्षम है और स्थावर होते हुए भी इसने जङ्गमके धर्मको अपनाया हुआ है। इस वृक्षके समस्त अङ्ग चेतन हैं, जो फैलकर समस्त जगत्में व्याप्त हो गये हैं ॥ 31-33 ॥ नामप्रचार अकेले असम्भव देखकर सबको बिना विचार किये वितरणका आदेश :- एकला मालाकार आमि काहाँ काहाँ याब। एकला वा कत फल पाड़िया विलाब ॥ 34 ॥ एकला उठाञा दिते हय परिश्रम। केह पाय, केह ना पाय, रहे मने भ्रम ॥ 35 ॥ अतएव आमि आज्ञा दिलुँ सबाकारे। याँहा ताँहा प्रेमफल देह' यारे तारे ॥ 36 ॥ 34 | श्रीचैतन्यचरितामृत

9/34-41 ]

एकला मालाकार आमि कत फल खाब। ना दिया वा एइ फल आर कि करिब ॥ 37 ॥ आत्म-इच्छामृते वृक्ष सिञ्चि निरन्तर। ताहाते असंख्य फल वृक्षर उपर ॥ 38 ॥ अनुवाद-मैं माली अकेला कहाँ-कहाँ जा सकता हूँ और कितने फलोंको तोड़कर बाँट सकता हूँ? मुझ अकेलेको फल उठानेमें बहुत परिश्रम हो रहा है। उसपर भी किसे मिला और किसे नहीं मिला, यह भ्रम मेरे मनमें रह जाता है। इसलिये मैं सबको आज्ञा देता हूँ कि जहाँ-तहाँ जिस-किसीको भी यह प्रेमफल प्रदान करो। मैं अकेला माली कितने फल खा सकता हूँ? यदि इन्हें नहीं बाँटूगा, तो इन फलोंका मैं क्या करूँगा? मैं अपनी इच्छारूपी अमृतके द्वारा इस वृक्षको निरन्तर सींचता हूँ, इसलिये इसके ऊपर असंख्य फल लगे हैं॥ 34-38 ॥ प्रेमास्वादनसे जीवोंको अमृतत्वकी प्राप्ति :- अतएव सब फल देह' यारे तारे। खाइया हउक् लोक अजर अमरे ॥ 39 ॥ अनुवाद-इसलिये इन सब प्रेमफलोंको जहाँ-तहाँ सभीको प्रदान करो, जिससे वे इसे खाकर अजर-अमर हो जाँय ॥ 39 ॥ अमृतानुकणिका-जीव स्वरूपतः अजर और अमर है। गीता (2/20)- “न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥” “यह जीवात्मा कभी न तो जन्म लेता है और न ही कभी मरता है अथवा पुनः पुनः इसकी उत्पत्ति या वृद्धि नहीं होती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और प्राचीन होनेपर भी नित्य नवीन है। शरीरके नष्ट होनेपर भी जीवात्माका विनाश नहीं होता।” श्रीकृष्णको भूल जानेके कारण ही जीव मायाके वशीभूत होकर नश्वर शरीरोंको धारण और फिर उनका त्याग करता है। महाप्रभु और उनके पार्षदोंकी कृपासे जब जीव प्रेमरूपी फल प्राप्त करता है, तब आनुषङ्गिक रूपसे उसका मायाका बन्धन कट जाता है और वह अपने स्वरूप जो अजर-अमर है, उसको प्राप्त करता है। इसलिये महाप्रभुने अपने सभी पार्षदोंको इस प्रेमरूपी फलको सर्वत्र बाँटनेके लिये आदेश एवं यथायोग्य शक्ति भी प्रदान की है ॥ 39 ॥ श्रीगौरकी दया देखकर श्रीगौरनाम-कीर्त्तनसे ही जीवोंका नित्य मङ्गल :- जगत व्यापिया मोर हवे पुण्य ख्याति। सुखी हइया लोक मोर गाहिबेक कीर्त्ति ॥ 40 ॥ अनुवाद-जगत्को प्रेम वितरण करनेसे सम्पूर्ण जगत्में मेरी ख्याति होगी और लोग सुखी होकर मेरी कीर्त्तिका गान करेंगे ॥ 40 ॥ अनुभाष्य-जिस प्रकार संसारमें पुण्यके प्रभावसे लोग सुखी होते हैं, पापोंके विस्तारसे मनुष्योंके दुःखोंकी वृद्धि होती है, पुण्यवानोंकी पवित्र चरित्र-गाथा गायी जाती है और पापियोंके दुष्कर्मोंकी बात लोग अपने मुखमें लानेकी इच्छा नहीं करते, उसी प्रकार कृष्णप्रेमको प्राप्तकर जगत्के लोग सुखी होंगे और इससे प्रेमप्रदाताके सुखकी वृद्धि होगी ॥ 40 ॥ भारतभूमिमें जन्म लेकर मानवमात्रकी मानवके प्रति नित्यदया या उनको श्रीकृष्णोन्मुखी करना आवश्यक कर्त्तव्य :- भारतभूमिते हैल मनुष्य-जन्म यार। जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार ॥ 41 ॥ अनुवाद-भारत भूमिपर जिसने मनुष्यका जन्म ग्रहण किया है, उसका आवश्यक कर्त्तव्य है कि वह परोपकार कर अपना जन्म सार्थक करे ॥ 41 ॥ अनुभाष्य-पवित्र भारतवर्षमें मनुष्य जन्म ग्रहणकर

नवाँ अध्याय | 35

[ 9/41-44 जगत्का वास्तव नित्य उपकार करना ही सबसे पवित्र देशमें और सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ मनुष्य शरीर धारण करनेकी सफलता है॥41॥ अमृताणुकणिका—साधारणतः लोक समाजमें अभावग्रस्त प्राणियोंके दुःखोंको अन्न-वस्त्र-धन-औषधि दानादिके द्वारा दूर करनेको ही परोपकार कहा जाता है, परन्तु यह उपाय तात्कालिक है, इसके द्वारा दुःखोंका समूल नाश नहीं होता, अपितु वे पुनः पुनः आते हैं। समस्त दुःखोंका मूल कारण तो जीवोंकी श्रीकृष्ण विस्मृति है, (चैःचः मध्यलीला 20/117)— कृष्ण भूलि सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख। अतएव माया तारे देय संसार-दुःख॥ भारत भूमि अति पवित्र भूमि है, यहींपर भगवान्के अनेकों अवतार हुए हैं, जीवोंके परम कल्याणका मार्गदर्शन करानेवाले वेद-पुराणादि शास्त्र भी यहीं प्रकट हुए हैं और यह अनेकों ऋषियों-मुनियोंकी भजन स्थली है। इसलिये सुकृति-सम्पन्न जीवोंको इस पवित्र भूमिमें जन्म प्राप्त होता है। ऐसी भारत भूमिमें जन्मका सुअवसर प्राप्त होनेको विशेष भगवद्-कृपा ही जानना चाहिये। इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभु भारतमें जन्में सभी मनुष्योंको यह स्मरण करा रहे हैं कि इस सुअवसरका पूर्ण लाभ उठाओ और श्रीकृष्ण भजन करके अपने जीवनको सार्थक बनाओ और साथ-ही-साथ सम्पूर्ण विश्वके मनुष्योंके जीवनको सार्थक करानेका दायित्व भी तुम्हारा है॥41॥ कायमनोवाक्यसे जीवको श्रीकृष्णभक्तिमें उन्मुखी कराना ही सर्वापेक्षा श्रेष्ठ दया या मङ्गलाचरण :— श्रीमद्भागवत (10/22/35)— एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय आचरणं सदा॥42॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥42॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्राण, धन, बुद्धि और वचनके द्वारा दूसरोंके प्रति निरन्तर श्रेय आचरण करना ही देहधारी जीवोंके जन्मकी सार्थकता है॥42॥ अनुभाष्य—वस्त्रहरण-लीलाके अन्तमें अपने सखा गोपबालकोंके साथ बहुत दूर जाकर वृक्षके नीचे विश्राम करते हुए वृक्षोंके परोपकार या दया-प्रवृत्ति और सहिष्णुताका दर्शनकर श्रीकृष्ण गोपबालकोंसे कहने लगे— सदा प्राणैः अर्थैः धिया वाचा (सर्वतोभावेन) देहिषु (जीवेषु) श्रेय आचरणं (नित्यं-मङ्गळानुष्ठानं भगवद्वैमुख्या- पनोदनपूर्वक-तदुन्मुखीकरणेन नित्य-दयायाः सुष्ठु प्रदर्शन- मित्यर्थः)—एतावत् एव इह (संसारे) देहिनां (जीवानां) जन्मसाफल्यं [भवतीती शेषः]। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥42॥ विष्णुपुराण (3/12/42)— प्राणिनामुपकाराय यदेवेह परत्र च। कर्मणा मनसा वाचा तदेव मतिमान् भजेत्॥43॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥43॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कर्म, मन और वचनके द्वारा इस जन्मके तथा अगले जन्मोंके लिये प्राणियोंके जो उपकार योग्य है, उसीका ही बुद्धिमान व्यक्ति आचरण करते हैं॥43॥ अनुभाष्य—मतिमान् (बुद्धिमान् जनः) यत् एव कर्म इह (जगति) परत्र (अमूत्र) च, प्राणिनाम् उपकाराय (नित्य मङ्गलाय) भवति, तदेव (भगवद्भक्त्युन्मुखि-सुकृतोत्पादनमेव) कर्मणा, मनसा, वाचा (कायमनोवाक्येन) भजेत्। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥43॥ माली मनुष्य आमार नाहि राज्य-धन। फल-फूल दिया करि' पुण्य उपार्जन॥44॥ अनुवाद—मैं एक माली हूँ, मेरे पास राज्य-धन आदि कुछ भी नहीं है। मैं तो केवल फल-फूल देकर पुण्य कमाता हूँ॥44॥ 36 | श्रीचैतन्यचरितामृत

9/45-52 ] वृक्षोंकी निर्हेतुक दया-दर्शनसे, मूल कल्पवृक्ष होनेकी इच्छा :- माली हञा वृक्ष हइलाङ एइ त' इच्छाते। सर्वप्राणीर उपकार हय वृक्ष हैते॥ 45 ॥ अनुवाद-वृक्षसे समस्त प्राणियोंका उपकार होता है, इसी इच्छासे मैं माली होते हुये भी वृक्ष बना हुआ हूँ॥ 46 ॥ श्रीमद्भागवत (10/22/33)- अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीविनाम्। सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ 46 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्ण गोपबालकोंसे वृक्षों को लक्ष्य करके कह रहे हैं, - "अहो ! ये [वृक्ष] सब प्राणियोंके उपजीविका स्वरूप हैं अर्थात् समस्त प्राणियोंका उपकार करते हैं, इसलिये इनका जन्म सफल है। इनके निकट आकर कोई भी याचक विमुख होकर नहीं लौटता। ये सब सुजनगणकी भाँति व्यवहार करते हैं॥" 46॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये नवम परिच्छेद। नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य-वस्त्रहरण-लीलाके अन्तमें अपने सखा गोपबालकोंके साथ बहुत दूर जाकर वृक्षके नीचे बैठकर विश्राम करते हुए वृक्षोंकी सहिष्णुता और सदा परोपकार-प्रवृत्ति देखकर उनको लक्ष्य करके श्रीकृष्ण गोपबालकोंसे कहने लगे- अहो एषां (वृक्षाणां) सर्वप्राण्युपजीवनं (सर्वेषां प्राणिनाम् उपजीवनं) जन्म सुजनस्य इव वरं (श्रेष्ठं), - येषां (येभ्यः) अर्थिनः (प्रार्थिनः) विमुखाः (विफलाभीष्टाः सन्तः) न यान्ति (प्रत्यावर्त्तन्ते)। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 46 ॥ इति अनुभाष्ये नवम परिच्छेद। नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त हुआ। यह सुनकर वृक्षके अङ्गोंको आनन्द :- एइ आज्ञा कैल यदि चैतन्य-मालाकार। परम आनन्द पाइल वृक्ष-परिवार ॥ 47 ॥ अनुवाद-जब श्रीचैतन्य मालीने यह आज्ञा प्रदान की, तो वृक्ष-परिवार अर्थात् महाप्रभुके पार्षद परमानन्दित हुए॥ 47 ॥ अधिकारके विचार बिना प्रेमफल-वितरण :- येइ याँहा ताँहा दान करे प्रेमफल। फलास्वादे मत्त लोक हइल सकल ॥ 48 ॥ महामादक प्रेमफल पेट भरि' खाय। मातिल सकल लोक-हासे, नाचे, गाय ॥ 49 ॥ केह गड़ागड़ि याय, केह त' हुँकार। देखि' आनन्दित हञा हासे मालाकार ॥ 50 ॥ अनुवाद-फिर वे जहाँ-तहाँ प्रेमफल प्रदान करने लगे, जिसका आस्वादनकर सभी लोग प्रेमोन्मत्त हो उठे। महामत्त करनेवाले उस प्रेमफलको पेट भर खाकर सभी लोग मत्तवालोंकी भाँति हँसने, नाचने, गाने लगे। कोई भूमिपर लोट-पोट होने लगे, तो कोई हुँकार करने लगे। यह सब देखकर श्रीचैतन्य माली आनन्दित होकर हँसने लगे ॥ 48-50 ॥ जीवोंको अपने समान श्रीकृष्णप्रेमार्पणके द्वारा महाभागवत बनाना :- एइ मालाकार खाय एइ प्रेमफल। निरवधि मत्त रहे, विवश-विह्वल ॥ 51 ॥ सर्वलोके मत्त कैला आपन-समान। प्रेमे मत्त लोक बिना नाहि देखि आन ॥ 52 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य माली स्वयं भी इस प्रेमफलका आस्वादनकर निरन्तर उन्मत्त रहते और वे प्रेमके द्वारा विवश तथा विह्वल हो जाते। उन्होंने सभी लोगोंको अपने समान इतना प्रेमोन्मत्त कर दिया कि कोई भी ऐसा नहीं दीखता था, जो प्रेममें मत्त न हो ॥ 51-52 ॥ नवाँ अध्याय | 37

[ 9/53-55 अधम निन्दकादिका भी श्रीकृष्णप्रेम-प्राप्ति-फलसे उद्धार :- ये ये पूर्वे निन्दा कैल, बलि' मातोयाल। सेइ फल खाय, नाचे, बले-भाल, भाल ॥ 53 ॥ अनुवाद—जिन्होंने पहले श्रीचैतन्य महाप्रभुको मतवाला कहकर उनकी निन्दा की थी, वे भी फलको खाकर नाचते हुए कहने लगे कि 'बहुत अच्छा है', 'बहुत अच्छा है' ॥ 53 ॥ एइ त' कहिलुँ प्रेमफल-वितरण। एबे शुन, फलदाता ये ये शाखागण ॥ 54 ॥ अनुवाद—यहाँ तक प्रेमफलके वितरणके सम्बन्धमें मैंने वर्णन किया। अब फल प्रदान करनेवाली जो-जो शाखाएँ हुईं, उनको श्रवण करो ॥ 54 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 55 ॥ अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमल ही जिसके एकमात्र आश्रय हैं, वह कृष्णदास श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 55 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे भक्तिकल्पतरुवर्णनं नाम नवमः परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डमें भक्तिकल्पवृक्षका वर्णन नामक नौवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

दसवाँ अध्याय

चित्र ३

दसवाँ अध्याय दसवें अध्यायका सार-इस दसवें अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुकी निजशाखाका वर्णन हुआ है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौर-कल्पतरुकी मूलशाखाका वर्णन :- एइ मालीर-एइ वृक्षर अकथ्य कथन। एबे शुन मुख्य-शाखार नाम-विवरण॥ ३॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यमालीके इस भक्ति-कल्पवृक्षका वर्णन अनिर्वचनीय है। अब उनकी मुख्य शाखाओंके नाम और विवरण सुनिये॥ ३॥ श्रीगौरभक्त-वन्दना :- श्रीचैतन्यपदाम्भोज-मधुपेभ्यो नमो नमः। कथञ्चिदाश्रयाद् येषां श्वापि तद्गन्धभाग्भवेत्॥ १॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंके भ्रमररूपी भक्तोंको मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। उनका किसी प्रकारसे आश्रय लेनेसे (अभक्तरूपी) कुत्ता भी उनके चरणकमलोंकी गन्ध प्राप्त करनेका सौभाग्य प्राप्त करता है॥ १॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यपदाम्भोजमधुपेभ्यः (श्रीचैतन्यस्य पदाम्भोजयोः मधुः भक्तिरसं पिबन्ति ये मधुपाः भृङ्गाः तेभ्यः गौरभक्तेभ्यः) नमो नमः; - येषां कथञ्चित् (केनचित् अपि प्रकारेण) आश्रयात् श्वा (कुकुरः - भोगापरः भगवद्भक्तौ श्रद्धाहीनः) अपि तद्-गन्धभाक् (तयोः गौरपदकमलयोः गन्धं भजति प्राप्नोति इति गौरभक्तिमान्) भवेत्। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। श्रीगौरसुन्दरके चरणकमलोंकी गन्धको प्राप्त करते हैं अर्थात् उनके भक्त बन जाते हैं॥१॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ २॥ श्रीगौरभक्तोंमें बड़े-छोटेका भेद नहीं :- चैतन्य-गोसाञिर यत पारिषदचय। लघु-गुरु-भाव ताँर ना हय निश्चय॥ ४॥ यत यत महान्त कैला ताँ-सबार गणन। केह करिवारे नारे ज्येष्ठ-लघु-क्रम॥ ५॥ अतएव ताँ-सबारे करि' नमस्कार। नाम-मात्र करि, दोष ना लबे आमार॥ ६॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य गोस्वामीके पार्षदोंमें कौन बड़ा है? कौन छोटा है?- यह निर्णय करना सम्भव नहीं है। जिन-जिन महापुरुषोंने उन सबकी गणना की है, उनमेंसे किसीने भी बड़े-छोटेके क्रमानुसार उनका परिचय नहीं दिया। इसलिये मैं उन सबको प्रणामकर केवलमात्र उनके नामोंका उल्लेख कर रहा हूँ, वे मेरे इस दोषको ग्रहण न करें॥ ४-६॥ वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-प्रेमामरतरोः प्रियान्। शाखारूपान् भक्तगणान् कृष्णप्रेमफलप्रदान्॥ ७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णचैतन्यरूप प्रेम-कल्पवृक्षके श्रीकृष्णप्रेमफलदाता शाखारूप उनके प्रिय भक्तोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ७॥

[ 10/7-13 अनुभाष्य-श्रीकृष्णचैतन्यप्रेमाम्रतरोः (गौरप्रेम-देववृक्षस्य) कृष्णप्रेमफलप्रदान् शाखारूपान् प्रियान् भक्तगणान् अहं वन्दे। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥7॥ (1-क, ख, ग, घ) श्रीवास-श्रीरामादि चार भ्राता-शाखा :- श्रीवास पण्डित आर श्रीराम पण्डित। दुइ भाइ-दुइ शाखा, जगते विदित॥8॥ श्रीपति, श्रीनिधि-ताँर दुइ सहोदर। चारि भाइर दास-दासी, गृह-परिकर॥9॥ उनकी ऐकान्तिकी गौरभक्ति :- दुइ शाखार उपशाखाय ताँ-सबार गणन। याँर गृहे महाप्रभुर सदा सङ्कीर्त्तन॥10॥ सवंशे करेन याँरा चैतन्येर सेवा। गौरचन्द्र बिना नाहि जाने देवी-देवा॥11॥ अनुवाद-श्रीवास पण्डित और श्रीराम पण्डित-ये दोनों भाई दो शाखाओंके रूपमें जगत्में जाने जाते हैं। इन दोनोंके भाई श्रीपति और श्रीनिधि एवं इन चारों भाइयोंके दास-दासियाँ तथा समस्त गृह-परिवारकी गणना उन दो शाखाओंकी उपशाखाके रूपमें होती है। इनके घरमें श्रीचैतन्य महाप्रभु सदा सङ्कीर्तन करते थे। ये चारों भाई अपने वंश सहित श्रीचैतन्यदेवकी सेवा करते थे और श्रीगौरचन्द्रके अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवताको नहीं जानते थे॥8-11॥ अनुभाष्य-श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 90वें श्लोकमें श्रीवास पण्डितके विषयमें इस प्रकार वर्णन आता है- “श्रीवासपण्डितो धीमान् यः पुरा नारदो मुनिः। पर्वताख्यो मुनिवरो य आसीन्नारदप्रियः। स रामपण्डितः श्रीमान् तत्कनिष्ठसहोदरः॥"90॥ “जो पूर्वकालमें श्रीनारद मुनि थे, वे ही अब श्रीवास पण्डितरूपमें विख्यात हैं। श्रीनारद-प्रिय श्रीपर्वतमुनि ही श्रीवासके कनिष्ठ भ्राता श्रीमान् राम पण्डित हैं।" और 42वें श्लोकमें यह वर्णित है- “नाम्नाम्बिका व्रजे धात्री स्तन्यदात्री स्थिता पुरा। सैवेडयं 'मालिनी' नाम्नी श्रीवासगृहिणीमता॥"42॥ “पूर्वकालमें जो व्रजमें श्रीकृष्णको स्तनपान करानेवाली धात्री-माता 'अम्बिका' थीं, वे ही अब श्रीवास पण्डितकी पत्नी मालिनीदेवी हैं।” श्रीवासके भाईकी पुत्री ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी जननी नारायणीदेवी हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुके संन्यास ग्रहणके पश्चात् श्रीवास पण्डित नवद्वीपके वास-स्थानको छोड़कर कुमारहट्टमें वास करने लगे-चैःभाः अन्त्यखण्डके पाँचवें अध्यायमें इसका वर्णन है॥8-11॥ (2) श्रीचन्द्रशेखर-शाखा :- 'आचार्यरत्न'-नाम धरे बड़ एक शाखा। ताँर परिकर, ताँर शाखा-उपशाखा॥12॥ आचार्यरत्नेर नाम 'श्रीचन्द्रशेखर'। याँर घरे देवी-भावे नाचिला ईश्वर॥13॥ अनुवाद-'आचार्यरत्न' नामकी एक बड़ी शाखा है और उनके परिकर उनकी शाखा और उपशाखा हैं। आचार्यरत्नका नाम श्रीचन्द्रशेखर है और उनके घरमें महाप्रभुने देवीके (रुक्मिणीके) भावमें नृत्य किया था॥12-13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचन्द्रशेखर आचार्यरत्न किसी- किसी ग्रन्थके अनुसार महाप्रभुके मौसा हैं। अनुभाष्य-'श्रीचन्द्रशेखर' - श्रीमान् नवनिधिमेंसे प्रमुख, अथवा चन्द्र (?) हैं। इनके घरमें ही महाप्रभुका देवीभावमें नृत्य-अभिनय हुआ था (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अः)। श्रीचन्द्रशेखरका घर अब 'व्रजपत्तन'-नामसे सुप्रसिद्ध है। श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके विषयमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन्हें अवगत कराया था (चैःभाः मध्यखण्ड, 28वाँ अः) और संन्यासके समय श्रीनित्यानन्द एवं मुकुन्द दत्तके साथ कटोआमें उपस्थित 42 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/13-14 ] होकर संन्यासके उपयुक्त कार्योंका सम्पादनकर इन्होंने नवद्वीप लौटकर सबको महाप्रभुके संन्यास-ग्रहणकी सूचना दी थी। इनके घरपर महाप्रभुके कीर्त्तनका विषय-चैःभाः मध्यखण्ड, ४वें अः, चाँद-काजीके दलनके समय ये नगरसङ्कीर्त्तनमें सम्मिलित थे और श्रीधरपर महाप्रभुकी कृपा करनेके समय भी ये वहाँ उपस्थित थे (चैःभाः मध्यखण्ड, २३वाँ अः)। ये भक्तोंके साथ श्रीचैतन्यदेवके दर्शनके लिये गौड़देशसे श्रीजगन्नाथपुरी आया करते थे॥13॥ (3) श्रीपुण्डरीक-शाखा :- पुण्डरीक विद्यानिधि-बड़शाखा जानि। याँर नाम लञा प्रभु कान्दिला आपनि॥14॥ अनुवाद-भक्ति-कल्पवृक्षकी एक और बड़ी शाखा श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि हैं, जिनका नाम लेकर महाप्रभु स्वयं क्रन्दन करते थे॥14॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि चट्टग्रामके निवासी थे॥14॥ अनुभाष्य-श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 54-57वें श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है- “वृषभानुस्तया ख्यातः पुरा यो व्रजमण्डले। अधुना पुण्डरीकाक्षो विद्यानिधि-महाशयः॥ 54॥ स्वकीयभावमास्वाद्य राधा-विरहकातरः। चैतन्यः पुण्डरीकाक्षमये तातावदत् स्वयम्॥ 55॥ 'प्रेमनिधि' तया ख्यातिं गौरो यस्मै ददौ सुधीः। माधवेन्द्रस्य शिष्यत्वात् गौरवञ्च सदाकरोत्॥ 56॥ तत्प्रकाशविशेषोऽपि मिश्रः श्रीमाधवो मतः। रत्नावती तु तत्पत्नी कीर्त्तिदा कीर्त्तिता बुधैः॥”57॥ “पूर्वकालमें जो व्रजमण्डलमें श्रीवृषभानुरूपमें विख्यात थे, वे ही अब पुण्डरीकाक्ष विद्यानिधि हैं। स्वकीयभावका अवलम्बन करते राधाभावमें विरहकातर श्रीचैतन्य महाप्रभु श्रीपुण्डरीकाक्षको स्वयं पिता कहकर सम्बोधन करते थे। श्रीगौरसुन्दरने उन्हें 'प्रेमनिधि' उपाधि दी थी और श्रीमाधवेन्द्रपुरीपादका शिष्य जानकर उनका सदा सम्मान करते थे। इनकी पत्नी 'रत्नावती' थीं, किन्तु पण्डितलोग उन्हें 'कीर्त्तिदा' कहते थे।” इनके पिताका नाम वाणेश्वर (अन्य मतके अनुसार 'शुक्लाम्बर' ब्रह्मचारी) और माताका नाम गङ्गादेवी था। अन्य मतके अनुसार, वाणेश्वर शिवराम गङ्गोपाध्यायके वंशमें जन्में थे। इनके पिता जिला ढाका जिलाके बाधिया ग्रामके वारेन्द्र-श्रेणीके ब्राह्मण थे, इसलिये वहाँके राढ़ीय ब्राह्मण समाजने उन्हें स्वीकार नहीं किया; इस कारणसे उनके शाक्त अधस्तनगण 'बहिष्कृत' होकर समाजके 'बहिष्कृत' लोगोंके ही पुरोहितका कार्य करते आ रहे हैं। इनमेंसे सरोजानन्द गोस्वामी नामक एक व्यक्ति वृन्दावनमें आकर रह रहे हैं। इनके वंशकी यह विशेषता यह है कि सभी भाइयोंमें केवल एकको ही पुत्रकी प्राप्ति होती थी और अन्य भाइयोंके घरोंमें कन्याका जन्म होता था या कोई सन्तान नहीं होती थी। इस कारणसे इनके वंशका विस्तार न हो सका। चट्टग्रामके उत्तर-पूर्वमें 'मेखलाग्राम'में इनका पूर्व निवास था। [टीका लिखनेके समय-] विद्यानिधिका भजन मन्दिर अत्यन्त जीर्ण और अस्वच्छ है, इसका संस्कार नहीं करनेपर शीघ्र ही लुप्त होनेकी सम्भावना है। मन्दिरकी दीवारपर ईंटके पटलपर दो श्लोक खुदे हैं; अक्षर विकृत होनेके कारण पढ़े नहीं जा सकते और उनके अर्थ भी समझे नहीं जा सकते। इस मन्दिरसे दक्षिण-पूर्व दिशामें 400-500 हाथ दूरीपर एक और मन्दिर देखा जाता है, उसकी दीवारपर ईंटके पटलपर लिखे अक्षर भी नहीं पढ़े जाते हैं। इसके ही सामने 15-20 हाथकी दूरीपर बाई ओर एक और मन्दिर होनेकी बात वहाँ गिरी हुई अनेक ईंटोंके टुकड़ोंको देखकर जानी जाती है। वहाँके लोगोंसे सुननेमें आता है कि यही मुकुन्द दत्तका भजन मन्दिर था। पुण्डरीक विद्यानिधिके वंशमें श्रीहरकुमार स्मृतितीर्थ और श्रीकृष्णकिङ्कर विद्यालङ्कार अभी भी वर्तमान हैं। (वैष्णव-मञ्जूषा-प्रथम संख्या द्रष्टव्य है)। दसवाँ अध्याय | 43

[ 10/14

महाप्रभु इनको 'बाप' कहकर बुलाते थे और इन्हें 'प्रेमनिधि' नाम दिया था। ये श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके गुरु और श्रीदामोदर स्वरूपके सुहृद थे। अबोध लोगोंको सतर्क करके मङ्गल शिक्षा देनेके उद्देश्यसे श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने श्रीविद्यानिधिको पहले विषयी समझकर भूल करनेका अभिनयकर फिर अन्तमें उन्हींसे दीक्षा-अभिनय लीला की। श्रीजगन्नाथदेवके द्वारा उन्हें थप्पड़ मारनेका वृत्तान्त—चैःभाः अन्त्यखण्ड, 10वें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥14॥

अमृतानुकणिका—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 10अः संख्या 90-151) ओड़न अथवा उड़न-षष्ठी नामक यात्रामें श्रीजगन्नाथदेव नये माँड़युक्त वस्त्र धारण करते हैं। माँड़युक्त वस्त्र धारण किये हुए श्रीजगन्नाथदेवको देखकर विद्यानिधिके मनमें सन्देह हुआ। विद्यानिधिने दामोदर स्वरूपसे पूछा,—"ईश्वरको माँड़युक्त वस्त्र क्यों प्रदान किये जाते हैं? इस देशमें तो श्रुति-स्मृतिका प्रचुर परिमाणमें प्रचार है, फिर क्यों बिना धोए माँड़युक्त वस्त्र पहनाये जाते हैं? माँड़युक्त वस्त्रोंको स्पर्श करनेसे हाथ धोकर शुद्ध होना पड़ता है।" दामोदर स्वरूपने कहा,—"यद्यपि श्रीजगन्नाथदेवके सेवक नियम जानते हैं, तो भी इस यात्रा-उत्सवपर सब समय ऐसा ही होता है। यह श्रीजगन्नाथदेवकी ही इच्छा है, इसलिये राजा भी इसके लिये निषेध नहीं करते।" विद्यानिधिने कहा,—"ठीक है, श्रीजगन्नाथदेव ईश्वर हैं, उनके लिये सब कुछ सम्भव है, परन्तु उनके सेवक ईश्वर जैसा आचरण क्यों कर रहे हैं? इन पूजा-पण्डा आदिने अपवित्र वस्त्र क्यों धारण किये हैं? राजाने भी माँड़युक्त वस्त्र सिरपर क्यों धारण किया है?" दामोदर स्वरूपने कहा,—"सुनो भाई! लगता है, ओड़न-यात्रामें दोष नहीं है। श्रीजगन्नाथदेव परमब्रह्म हैं। यहाँ वे विधि-निषेधका विचार नहीं करते हैं।" विद्यानिधिने कहा,—"भाई, एक बात सुनो! श्रीजगन्नाथदेव विग्रह परम ब्रह्मस्वरूप हैं। वे यदि विधि-निषेधोंका उल्लङ्घन करें, तो इसमें कोई दोष नहीं है। परन्तु ये सब लोग भी नीलाचलमें रहकर लोक व्यवहार छोड़ चुके हैं, क्या सभी ब्रह्मरूप-अवतार हो गये हैं?" इतना कहकर दोनों सम्पूर्ण मार्गमें हँसते-हँसते श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके प्रभावको न जानकर उनके आचरणपर दोषारोपण कर रहे थे। भिक्षाके उपरान्त दोनों गौराङ्ग महाप्रभुके पास चले आये। महाप्रभुके पास आकर वे सो गये। केवल श्रीकृष्ण ही जानते हैं कि किसमें कितना अनुराग है। श्रीकृष्ण अपने दासोंको भ्रममें डाल देते हैं, और बादमें दयावान होकर भ्रम दूर भी करते हैं। गौराङ्ग महाप्रभु सब कुछ जानते थे। श्रीजगन्नाथके रूपमें महाप्रभु स्वप्नमें उनके पास गये। विद्यानिधि महाशयने स्वप्नमें देखा कि श्रीजगन्नाथ-बलरामका शुभागमन हुआ है, परन्तु दोनों क्रोधित होकर उन्हें पकड़कर उनके दोनों गालोंपर थप्पड़ मार रहे हैं। थप्पड़ इतने ज़ोरसे मारे कि उनके गाल फूल गये और उनपर उँगलियोंके निशान बन गये। विद्यानिधि कहने लगे,—"हे कृष्ण! रक्षा करो, अपराध क्षमा करो, हे स्वामी! किस अपराधके कारण आप मुझे मार रहे हैं?" श्रीजगन्नाथने कहा,—"तेरे अपराधोंका अन्त नहीं है। मेरी और मेरे सेवकोंकी जाति नहीं है। मुझे परब्रह्मके रूपमें स्थापित करके भी तुमने माँड़युक्त वस्त्रके प्रति दोष-दृष्टि रखकर मेरे सेवकोंकी निन्दा की है।" स्वप्नमें विद्यानिधि मनसे महाभयभीत होकर श्रीचरणोंपर सिर पटकते हुए क्रन्दन करने लगे। विद्यानिधि कहने लगे,—"हे प्रभु! मुझ पापीके सभी अपराध क्षमा कीजिये। हे प्रभु, जिस मुखसे मैंने आपके सेवकोंकी हँसी उड़ाई है, आपने मेरे उस मुखको भलीभाँति दण्ड प्रदान किया है। आज मेरे सौभाग्यका दिन है। मेरे मुख और ललाटको आपके श्रीहस्तका स्पर्श मिला है।" श्रीजगन्नाथने कहा,—"सेवक समझकर तुमपर अनुग्रह करनेके लिये मैंने तुम्हें दण्ड प्रदान किया है।" स्वप्न देखनेके उपरान्त विद्यानिधि जाग उठे। फिर सूजे हुए गालोंपर थप्पड़ोंके निशान देखकर वे हँसने लगे। यह देखकर विद्यानिधिने कहा,—"बहुत अच्छा

44 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/14-19 ] हुआ, बहुत अच्छा हुआ। अपराधानुसार मुझे सजा मिली है। अच्छा ही किया प्रभुने, मुझे तो कम सजा मिली है।" विद्यानिधिकी इस महिमाको देखिये। सेवकके प्रति प्रभु-दयाकी यही सीमा है। अपने पुत्र प्रद्युम्नको भी शिक्षा हेतु प्रभु इस प्रकार (स्वप्नमें) थप्पड़ नहीं मारते। जानकी, रुक्मिणी, सत्यभामा आदि कितने ही ईश्वर-ईश्वरी हैं, उनको भी स्वप्नमें भी दण्ड नहीं देते। अपराधीको प्रभु साक्षात् ही मारते हैं। स्वप्नमें प्रदान की गई कृपा अथवा दण्ड बाहरसे कभी दिखायी नहीं देते। स्वप्नमें भले ही कोई दण्डित होता है अथवा किसीको अर्थकी प्राप्ति होती है, परन्तु पुरुषके जग जानेपर उन सबका कुछ भी अस्तित्व नहीं रहता है। प्रभु स्वप्नमें जिन्हें दण्ड अथवा कृपा प्रदान करते हैं, जागनेपर जब वे उसके साक्षात् दर्शन करते हैं, तब उन्हें इस बातकी प्रतीति होती है कि उनसे बढ़कर भाग्यवान् संसारमें दूसरा नहीं है। प्रभु अभक्तजनोंको स्वप्नमें भी कुछ नहीं कहते। स्वप्नमें प्रभुने साक्षात् भावसे स्वयं विद्यानिधिको थप्पड़ मारे थे। इस प्रकारकी कृपा केवल विद्यानिधिको ही मिली॥14॥ (4) श्रीगदाधर-शाखा :- बड़ शाखा—गदाधर पण्डित-गोसाञि। तेंहो लक्ष्मीरूपा, ताँर सम केह नाइ॥15॥ ताँर शिष्य-उपशिष्य,—ताँर उपशाखा। एइमत सब शाखा-उपशाखार लेखा॥16॥ अनुवाद—एक और बड़ी शाखा श्रीगदाधर पण्डित हैं। वे लक्ष्मीस्वरूपा (श्रीराधिका) हैं, जिनके समान और कोई नहीं है। इनके शिष्य और उपशिष्य इनकी उपशाखाएँ हैं। इस प्रकार समस्त शाखाओं और उपशाखाओंका उल्लेख किया गया है॥15-16॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 147-150 श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है— “श्रीराधाप्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी। सा श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डिताख्यकः॥147॥ निर्णीतः श्रीस्वरूपैर्यो व्रजलक्ष्मीतया यथा॥148॥ पुरा वृन्दावने लक्ष्मीः श्यामसुन्दर-वल्लभा। साद्य गौरप्रेम-लक्ष्मीः श्रीगदाधरपण्डितः॥149 ॥ राधामनुगता यत्तल्ललिताप्यनुराधिका। अतः प्राविशदेषा तं गौरचन्द्रोदये यथा॥”150॥ “पहले जो वृन्दावनेश्वरी प्रेमरूपा श्रीमती राधिका थीं, वे ही अब श्रीगौरप्रिय श्रीगदाधर पण्डित हैं। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने श्रीगदाधर पण्डितको व्रजलक्ष्मीके रूपमें निर्धारित किया है। पूर्वकालमें श्रीश्यामसुन्दर-वल्लभा वृन्दावन-लक्ष्मी ही इस लीलामें गौरप्रेम-लक्ष्मी श्रीगदाधर पण्डित हैं। ‘श्रीचैतन्यचन्द्रोदय’ ग्रन्थके अनुसार श्रीराधाकी अनुगता होनेके कारण ‘अनुराधा’-रूपसे विख्यात श्रीललितादेवीने श्रीगदाधर पण्डितमें प्रवेश किया है॥”15-16॥ (5) श्रीवक्रेश्वर-महिमा और शाखा :- वक्रेश्वर पण्डित—प्रभुर बड़ प्रिय भृत्य। एक-भावे चब्बिश प्रहर याँर नृत्य॥17॥ आपने महाप्रभु गाय याँर नृत्यकाले। प्रभुर चरण धरि' वक्रेश्वर बले॥18॥ “दशसहस्र गन्धर्व मोरे देह' चन्द्रमुख। तारा गाय, मुञि नाचि—तबे मोर सुख॥”19॥ अनुवाद—श्रीवक्रेश्वर पण्डित श्रीचैतन्य महाप्रभुके अत्यन्त प्रिय सेवक हैं, जिन्होंने एक ही भावमें चौबीस प्रहर (तीन दिन) तक नृत्य किया था। जब महाप्रभुने स्वयं इनके नृत्यपर गान किया, तब इन्होंने महाप्रभुके चरण पकड़कर निवेदन किया,—‘हे चन्द्रमुख! मुझे दस-हजार गन्धर्व (गायक) दे दीजिये, जिससे वे सब गान करते रहें और मैं नृत्य करता रहूँ। तब ही मुझे सुख प्राप्त होगा॥”17-19॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 71-73वें श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है— दसवाँ अध्याय | 45

[ 10/17–20

“व्यूहस्तुर्योऽनिरुद्धो यः स वक्रेश्वरपण्डितः। कृष्णावेशज नृत्येन प्रभोः सुखमजीजनत्॥ 71 ॥ सहस्रगायकन्मह्यं देहि त्वं करुणामय। इति चैतन्यपादे य उवाच मधुरं वचः॥ 72 ॥ स्वप्रकाशविभेदेन शशिरेखा तमाविशत्॥” 73(क)॥ “चतुर्व्यूहमें जो श्रीअनिरुद्ध हैं, वे ही श्रीवक्रेश्वर पण्डित हैं। श्रीकृष्णवेश-जनित नृत्यके द्वारा इन्होंने महाप्रभुका सुख विधान किया। इन्होंने मधुर वाणीसे महाप्रभुको कहा—‘हे करुणामय! आप मुझे हजार गायक प्रदान करें।' अपने प्रकाश भेदसे (श्रीराधिकाकी प्रिय सखी) श्रीशशिरेखाने इनमें प्रवेश किया है।” श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामी प्रभुने लिखा है— “राधाकृष्णरसप्रकाशनपरं गानावलीभूषितं, वृन्दारण्यसुखप्रचारजनितं स्तम्भादिभावान्वितम्। श्रीगौराङ्गमहाप्रभो रसमिलन्नृत्यावताराङ्कुरं श्रीवक्रेश्वरपण्डितं द्विजवरं चैतन्यभक्तं भजे॥ नित्यं तिष्ठति तत्रैव तुङ्गविद्या समुत्सुका। विप्रलब्धात्वामापन्ना श्रीकृष्णो रतियुक् सदा॥ अस्या वयः प्रमाणं स्यात् असौ गौररसे पुनः। वक्रेश्वर इति ख्यातमापन्ना हि कलौ युगे॥” श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामीके वर्णनानुसार—“श्रीराधाकृष्ण रसको प्रकाश करनेवाली गानावली जिनका भूषण है, वृन्दावन-रसतत्त्व प्रचारके समय स्तम्भादि भावोंसे जो शोभित हैं, श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके रसात्मक-नृत्य प्रकाशमें जो अङ्कुर-स्वरूप हैं, उन श्रीचैतन्यभक्त द्विजवर श्रीवक्रेश्वर पण्डितका मैं भजन करता हूँ। उनमें ही सदा-उत्सुका श्रीमती तुङ्गविद्या नित्य विराजित हैं। सदा श्रीकृष्णमें रतियुक्ता और विप्रलम्भ-भावान्विता श्रीतुङ्गविद्या पुनः कलियुगमें गौररसमें 'वक्रेश्वर' नामसे विख्यात हैं।” इन्होंने श्रीवास-आङ्गनमें और श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें महाप्रभुके कीर्तनमें नृत्य किया था। महाप्रभुने देवानन्दसे वक्रेश्वरकी जो महिमा कही थी, उसके लिये चैःभाः अन्त्यखण्ड, तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है। श्रीवक्रेश्वर पण्डितके सम्बन्धमें उत्कल-कवि श्रीगोविन्दके रचित श्रीगौरकृष्णोदयमें— “प्रभोः प्रथमशिष्य इत्यर्थं विमृश्य वक्रेश्वरं निवेश्य च तदाश्रमे निजनिजं निवासं ययो।” इनके शिष्य श्रीगोपालगुरु हैं और उनके शिष्य श्रीध्यानचन्द्र हैं। उत्कल-प्रदेशमें श्रीवक्रेश्वरके शिष्य-सम्प्रदायमें अधिकांश भक्त ही अपना परिचय गौड़ीय-वैष्णवके रूपमें देते हैं॥ 17॥ अमृतानुकणिका—देवानन्द पण्डित स्मार्त्त धर्ममें प्रविष्ट होनेपर भी महाज्ञानी और संयमी थे, परन्तु महाप्रभुके प्रति उनकी श्रद्धा जाग्रत नहीं हुई थी। वे श्रीमद्भागवतम्‌को छोड़कर अन्य किसी ग्रन्थका पाठ नहीं करते थे। इसी कारण एक बार वक्रेश्वर पण्डित उनके आश्रममें ठहर गये और देवानन्द पण्डितने उनकी सेवा की। वक्रेश्वर पण्डितके सङ्गके प्रभावसे देवानन्द पण्डितमें महाप्रभुके प्रति श्रद्धाका उदय हुआ था और वे वक्रेश्वर पण्डितके साथ महाप्रभुके दर्शनके लिये गये। महाप्रभु चन्द्र आसनपर विराजमान थे। देवानन्द पण्डित उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके सङ्कोचके साथ एक तरफ खड़े हो गये। महाप्रभु भी उन्हें देखकर सन्तुष्ट हुए और एकान्तमें उन्हें साथ लेकर बैठे। उनके जो कुछ भी पूर्व अपराध थे, उन सभी अपराधोंको क्षमा करके महाप्रभुने उनपर कृपा की। महाप्रभुने कहा,—“तुमने जो वक्रेश्वर पण्डितकी सेवा की है, इसी कारण तुम्हें मेरे दर्शन हुए हैं। वक्रेश्वर पण्डित प्रभुकी पूर्णशक्ति हैं। जो उनकी सेवा करते हैं, उन्हें कृष्णकी प्राप्ति होती है। वक्रेश्वरका हृदय कृष्णका अपना घर है। वक्रेश्वर जब नृत्य करते हैं, तब कृष्णका नृत्य होता है। जिस किसी भी स्थानपर वक्रेश्वरका सङ्ग क्यों न हो, वह स्थान श्रीवैकुण्ठमय सर्वतीर्थस्वरूप हो जाता है॥” 19॥

प्रभु बलेन—तुमि मोर पक्ष एक शाखा। आकाशे उड़िया याङ, पाङ आर पाखा॥ 20॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,— “वक्रेश्वर! तुम मेरे एक पंख हो, एक और तुम्हारे जैसा पंख मुझे मिलता, तो मैं आकाशमें उड़ जाता॥” 20॥

46 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/21-25 ] (6) श्रीजगदानन्दका माहात्म्य :- पण्डित जगदानन्द प्रभुर प्राणरूप। लोके ख्याते यँहो सत्भाभार स्वरूप॥21॥ प्रीत्ये करिते चाहे प्रभुरे लालन-पालन। वैराग्य-लोक-भये प्रभु ना माने कखन॥22॥ दुइजने खट्मटि लागाय कोन्दल। ताँर प्रीत्येर कथा आगे कहिब सकल॥23॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके प्राण स्वरूप थे। लोगोंमें वे सत्यभामाके रूपमें विख्यात हैं। वे प्रेमसे महाप्रभुका लालन-पालन करना चाहते थे, किन्तु उससे वैराग्य (संन्यास धर्म) नष्ट होगा और लोगोंमें निन्दा होगी—इस भयसे अर्थात् मर्यादा रक्षाके लिये महाप्रभु उनकी बात नहीं मानते थे। इसलिये इन दोनोंमें परस्पर प्रेम कलह हो जाती थी। इनकी प्रीतिका वर्णन आगे विस्तारपूर्वक किया जायेगा॥21-23॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चैःचः अन्त्यलीलाके चौथे, सातवें, बारहवें और तेरहवें अध्याय द्रष्टव्य हैं॥23॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 51वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “केनावान्तरभेदेन भेदं कुर्वन्ति सात्वताः। सत्यभामाप्रकाशोऽपि जगदानन्दपण्डितः॥”51॥ “भगवद्भक्त जन किसी अवान्तर भेदसे अर्थात् (सत्यभामा विष्णुप्रिया हैं—इस) विचारसे भेद करते हुए कहते हैं कि श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीसत्यभामाके प्रकाश हैं।” ये श्रीवास-आङ्गनमें और श्रीचन्द्रशेखर भवनमें महाप्रभुके कीर्त्तनके सङ्गी थे। महाप्रभुके संन्यासके पश्चात् उड़ीसा जाते समय श्रीजगदानन्द पण्डितने उनका दण्ड वहन किया और भिक्षा की॥21॥ (7) श्रीराघव पण्डित-शाखा :- राघव-पण्डित-प्रभुर आद्य अनुचर। ताँर शाखा मुख्य एक,—मकरध्वज कर॥24॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डित श्रीचैतन्यदेवके नित्य सेवक हैं। इनकी एक मुख्य शाखा श्रीमकरध्वज-कर हैं॥24॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 166वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “धनिष्ठा भक्ष्यसामग्रीं कृष्णायादात् व्रजेऽमिताम्। सैव सम्प्रति गौराङ्गप्रियो राघवपण्डितः॥”166॥ “व्रजकी धनिष्ठा नामक जो सखी श्रीकृष्णके लिये अपरिमित स्वादिष्ट खाद्य सामग्री प्रस्तुत करती थीं, वे अब गौराङ्गप्रिय श्रीराघव पण्डित हैं।” पाणिहाटी ग्राममें राघवभवन है। [टीका लिखनेके समय] राघव पण्डितकी समाधिके ऊपर लताकुञ्ज-आवृत एक ऊँची वेदी स्थापित है। जिस स्थानपर समाधि है, उसकी उत्तर दिशामें एक खण्डहर-प्राय जीर्ण-शीर्ण घरमें बिना किसी विशेष यत्नसे सेवित श्रीमदनमोहनका विग्रह विराजमान है। पाणिहाटीके वर्तमान जमीन्दार श्रीशिवचन्द्र राय चौधुरीके तत्त्वावधानमें इस सेवाकी व्यवस्था चल रही है। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 141वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “नटश्चन्द्रमुखः प्राग् यः स करो मकरध्वजः॥”141॥ “पूर्वकालके नट अर्थात् नाटकमें अभिनय करनेवाले चन्द्रमुख अब मकरध्वज-कर हुए हैं।” ये पाणिहाटी ग्राममें रहते थे॥24॥ उनकी बहन दमयन्ती गुणोंकी राशि :- ताँहार भगिनी दमयन्ती प्रभुर प्रिय दासी। प्रभुर भोगसामग्री ये करे बारमासी॥25॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितकी बहन श्रीदमयन्ती देवी महाप्रभुकी प्रिय दासी हैं, जो बारह मासोंके लिये एक बारमें ही प्रभुके लिये समस्त भोगसामग्री प्रस्तुत करती थीं॥25॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 167वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— दसवाँ अध्याय | 47

[ 10/25-32 “गुणमाला व्रजे यासीद्दमयन्ती तु तत्स्वसा॥”167॥ “व्रजकी गुणमाला सखी अब श्रीराघव पण्डितकी बहन दमयन्ती हैं॥” 25॥ से-सब सामग्री यत झालिते भरिया। राघव लइया यांन गुप्त करिया॥ 26 ॥ बारमास ताहा प्रभु करेन अङ्गीकार। 'राघवेर झालि' बलि' प्रसिद्धि याहार ॥ 27 ॥ से-सब सामग्री आगे करिब विस्तार। याहार श्रवणे भक्तेर बहे अश्रुधार ॥ 28 ॥ अनुवाद—वह सब सामग्रीको यत्नसे एक टोकरीमें भरकर रख देती, जिसे राघव पण्डित छिपाकर महाप्रभुके लिये श्रीपुरुषोत्तम धाम ले जाते। महाप्रभु बारह मास तक उस सामग्रीका आस्वादन करते, इसलिये यह 'राघवकी डलिया'के नामसे प्रसिद्ध है। उस सब सामग्रीका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर भक्तोंके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है॥26-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे'—चैःचः अन्त्यलीलाके दसवें अध्यायमें यह द्रष्टव्य है॥ 28 ॥ अनुभाष्य—चैःचः अन्त्यलीलाके दसवें अध्यायमें 'झाली' का वर्णन द्रष्टव्य है॥ 27 ॥ (8) श्रीगङ्गादास :- प्रभुर अत्यन्त प्रिय—पण्डित गङ्गादास। याँहार स्मरणे हय सर्वबन्ध-नाश॥ 29 ॥ अनुवाद—श्रीगङ्गादास पण्डित श्रीचैतन्यदेवके अत्यन्त प्रिय हैं, जिनके केवल स्मरणमात्रसे समस्त बन्धनोंका नाश हो जाता है॥ 29 ॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 53 और 111 श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है— “पुरासीत् रघुनाथस्य यो वशिष्ठमुनिर्गुरुः। स प्रकाशविशेषेण गङ्गादास-सुदर्शनौ ॥ 53 ॥ गङ्गादासः प्रभुप्रियः। आसीत्त्रिभुवने प्राग् यो दुर्वासा गोपिका-प्रियः॥”111॥ “पूर्वकालमें जो श्रीरघुनाथके गुरु श्रीवशिष्ठ मुनि थे, वे ही अब प्रकाश भेदसे श्रीगङ्गादास और श्रीसुदर्शन हैं। पूर्वकालमें जो निधुवनमें गोपिकाप्रिय श्रीदुर्वासा थे, वे ही महाप्रभुके प्रिय श्रीगङ्गादास हैं॥ 29 ॥ (9) श्रीपुरन्दर आचार्य :- चैतन्य-पार्षद—श्रीआचार्य पुरन्दर। पिता करि' याँरे बोले गौराङ्गसुन्दर ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीपुरन्दर आचार्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके पार्षद थे, जिन्हें श्रीगौराङ्गसुन्दर 'पिता' कहकर सम्बोधित करते थे॥ 30 ॥ अनुभाष्य—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवें अध्यायमें)— “प्रभु आइलेन मात्र पण्डितेर घर। वार्त्ता पाइ' आइला आचार्य पुरन्दर ॥ 15 ॥ ताहाने देखिया प्रभु पिता करि' बोले। प्रेमावेशे मत्त ताने करिलेन कोले॥ 16 ॥ परम-सुकृति से आचार्य पुरन्दर। प्रभु देखि' कान्दे अति हइ असम्बर॥”17॥ “कुमारहट्टमें स्थित श्रीवास पण्डितके घर श्रीचैतन्य महाप्रभुके आनेका समाचार पाते ही श्रीपुरन्दर आचार्य वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर महाप्रभुने उन्हें 'पिता' कहकर सम्बोधित किया और प्रेमके आवेशमें मत्त होकर उन्हें अपनी गोदमें ले लिया। परम सुकृतिवान् श्रीपुरन्दर आचार्य महाप्रभुको देखकर अधीर होकर बहुत क्रन्दन करने लगे॥” 30 ॥ (10) श्रीदामोदर पण्डित-शाखा :- दामोदर पण्डित-शाखा प्रेमेते प्रचण्ड। प्रभुर उपरे यँहो कैल वाक्यदण्ड ॥ 31 ॥ दण्ड-कथा कहिब आगे विस्तार करिया। दण्डे तुष्ट प्रभु ताँरे पाठाइला नदीया ॥ 32 ॥ 48 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/31-33 ] अनुवाद—एक अन्य शाखा श्रीदामोदर पण्डित हैं, जिनकी महाप्रभुमें प्रचण्ड प्रीति है। इन्होंने वाक्यके द्वारा महाप्रभुको भी शासन किया था, जिसका आगे विस्तारसे वर्णन करूँगा। इनके इस वाक्य-दण्डसे प्रसन्न होकर महाप्रभुने इन्हें नवद्वीपमें भेजा था॥31-32॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे' अर्थात् चैःचः अन्त्यलीलाका तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है॥32॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 159वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “शैव्या यासीत् व्रजे चण्डी सा दामोदरपण्डितः। कुतश्चित् कार्यतो देवी प्राविशत्तं सरस्वती॥”159॥ “व्रजमें जो प्रखरा शैव्या थीं, वे ही श्रीदामोदर पण्डित हैं। किसी कार्यवशतः श्रीसरस्वतीदेवी भी इनमें प्रविष्ट हुई हैं।” महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीदामोदर शचीमाताके दर्शनके लिये गौड़देश आते और रथयात्रासे पहले भक्तोंके साथ पुरुषोत्तम धाम जाते थे। महाप्रभुके द्वारा शचीदेवीकी श्रीकृष्णभक्तिके विषयमें जिज्ञासा सुनकर श्रीदामोदरने जो कहा—वह चैःभाः अन्त्यखण्ड, नौवें अध्यायमें वर्णित है। चैःचः अन्त्यलीला, तीसरे अध्यायमें महाप्रभुके प्रति दामोदर पण्डितके वाक्य-दण्डका वृत्तान्त द्रष्टव्य है॥31-32॥ अमृतानुकणिका—दामोदर पण्डित आइ (शचीमाता) को देखनेके लिये नवद्वीप गये थे, वे आइको देखकर शीघ्र चले आये। दामोदरको देखकर महाप्रभुने उन्हें एकान्तमें बुलाया और आइका वृत्तान्त पूछने लगे। महाप्रभुने कहा,–“तुम तो उनके (आइके) पास थे। सत्य कहना, क्या आइकी विष्णुमें भक्ति है?” यह सुनकर परम तपस्वी निरपेक्ष दामोदर क्रोधित होकर कहने लगे,–“क्या कहा गोसाईं, आइकी विष्णुमें भक्ति है? आप किस प्रयोजनसे यह पूछ रहे हैं? आइकी कृपासे ही आपमें विष्णुभक्ति है। आपका जो कुछ भी है, वह सब उन्हींकी शक्ति है। आपमें जितनी विष्णुभक्ति उदित हुई है, निश्चय ही जान लीजिये, यह सब आइकी कृपासे ही है। अश्रु, कम्प, स्वेद, मूर्च्छा, पुलक, हुँकार आदि विष्णुभक्तिके जितने भी विकार समूह हैं, आइके श्रीअङ्गोंमें उन सबका एक क्षणके लिये भी विराम नहीं है। आइके श्रीमुखमें निरन्तर कृष्णनाम स्फुरित होता रहता है। आप आइकी भक्तिकी कथा पूछ रहे हैं! आइको देखनेसे ही पता चलता है कि 'विष्णुभक्ति' किसे कहते हैं। मैं आपसे कह रहा हूँ कि आइ मूर्तिमती भक्तिस्वरूपा हैं। आप यह जानकर भी माया विस्तारपूर्वक मुझसे पूछ रहे हैं। प्राकृत-शब्दके रूपमें भी जो ‘आइ' कहेगा, आइ-शब्दके प्रभावसे उसे कोई दुःख नहीं रहेगा।” पुत्र-सङ्गसे वञ्चित होकर आइकी भक्ति कैसी है, इसलिये महाप्रभुने यह प्रश्न किया था और दामोदरके मुखसे आइकी महिमा सुनकर महाप्रभुको असीम आनन्द हुआ॥32॥ (11) श्रीशङ्कर पण्डित-माहात्म्य और शाखा :- ताँहार अनुज शाखा—शङ्कर पण्डित। 'प्रभु-पादोपाधान' याँर नाम विदित॥33॥ अनुवाद—श्रीदामोदर पण्डितके छोटे भाई श्रीशङ्कर पण्डित एक अन्य शाखा हैं। ये महाप्रभुके 'चरणोंके तकिया'के नामसे प्रसिद्ध थे॥33॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 157वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “यस्या वक्षसि सुष्वाप कृष्णो वृन्दावने पुरा। सा श्रीभद्राद्य गौराङ्गप्रियः शङ्करपण्डितः॥”157॥ “वृन्दावनमें श्रीकृष्ण जिनके वक्षःस्थलपर शयन करते थे, वे श्रीभद्रा सखी ही अब श्रीशङ्कर पण्डित हैं।” (चैःचः अन्त्यलीला 19/67-74 संख्या द्रष्टव्य है)। महाप्रभु श्रीदामोदर पण्डितके प्रति गौरव बुद्धिके साथ प्रीति रखते थे और उनके छोटे भाई श्रीशङ्कर पण्डितसे उनका केवल शुद्ध प्रेम था (चैःचः मध्यलीला 11/146-148 संख्या द्रष्टव्य है)॥33॥ दसवाँ अध्याय | 49

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पूर्ण देवनागरी लिप्यन्तरण (लाइन-दर-लाइन) दिया गया है:

[ 10/34-37 (12) श्रीसदाशिव पण्डित :- सदाशिव-पण्डित याँर प्रभु strip: सदाशिव-पण्डित याँर प्रभुदे आश। प्रथमेइ नित्यानन्देर याँर घरे वास ॥ 34 ॥ अनुवाद-श्रीसदाशिव पण्डित सदा श्रीमन्महाप्रभुके चरणोंकी सेवाकी अभिलाषा करते थे। नवद्वीपमें आकर श्रीनित्यानन्द प्रभु सबसे पहले इनके घरमें रहे थे॥34॥ अनुभाष्य-(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 8/19-श्रीरथयात्राके समय)- “सदाशिव पण्डित चलिला शुद्धमति। याँर घरे पूर्वे नित्यानन्देर वसति॥” “पहले श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके घरमें रहे थे, वे शुद्धमति श्रीसदाशिव पण्डित रथयात्राके लिये नीलाचलकी ओर अग्रसर हुए।” ये नवद्वीपमें महाप्रभुके कीर्त्तनके सङ्गी थे। गयासे लौटनेके पश्चात् महाप्रभुने इन्हें और अन्य भक्तोंको शुक्लाम्बरके घरमें अपने श्रीकृष्ण-भजनके विषयमें बतलाया था। श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें लक्ष्मीके वेषमें नृत्य करनेके समय महाप्रभुने इनको वेषभूषादि तैयार करनेके लिये कहा था (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अध्याय द्रष्टव्य है)॥ 34॥ (13) श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी :- श्रीनृसिंह-उपासक-प्रद्युम्न ब्रह्मचारी। प्रभु ताँर नाम कैला 'नृसिंहानन्द' करि' ॥ 35 ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी श्रीनृसिंह भगवान्‌के उपासक थे, इसलिये महाप्रभुने इनका नाम 'श्रीनृसिंहानन्द' रखा था॥ 35 ॥ अनुभाष्य-(चैःचः अन्त्यलीला 2/53)- “प्रद्युम्न ब्रह्मचारी ताँर निजनाम। 'नृसिंहानन्द' नाम ताँर कैल गौरधाम॥” “प्रद्युम्न ब्रह्मचारी उनका अपना नाम था, [नृसिंह भगवान्‌के प्रति उनकी निष्ठा देखकर] महाप्रभुने उनको 'नृसिंहानन्द' नाम दिया।” पाणिहाटीमें श्रीराघव पण्डितके घरसे लौटकर कुमारहट्टमें श्रीशिवानन्दसेनके घरमें महाप्रभुने श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीके हृदयमें आविर्भूत होकर श्रीजगन्नाथ, श्रीनृसिंह और अपना-तीनोंका भोग ग्रहण किया था (चैःचः अन्त्यलीला 2/48-78 संख्या द्रष्टव्य है)। कुलियासे महाप्रभुका वृन्दावन जानेका समाचार सुनकर ये ध्यानमग्न चित्तमें कुलियासे वृन्दावन तकके मार्गको रत्नादिके द्वारा सजाने लगे, किन्तु बीचमें ही ध्यान भङ्ग होनेके कारण वे भक्तोंसे बोले-“महाप्रभु इस बार कानाई-नाटशाला तक ही जायेंगे, वृन्दावन नहीं जायेंगे।”-(चैःचः मध्यलीला संख्या 1/55-62)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 74वाँ श्लोक)- “आवेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्नसञ्ज्ञके ॥”74(क)॥ “श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीमें श्रीगौरहरिका आवेश जानना चाहिये।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 3/186 संख्यामें)- “याँहार शरीरे नृसिंहेर परकाश।” “जिनके शरीरमें श्रीनृसिंहदेवका प्रकाश था।” और (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वें अध्यायमें)- “साक्षात् नृसिंह याँर सने कथा कय।” “साक्षात् श्रीनृसिंहदेव इनके साथ बात करते थे॥”35॥ (14) श्रीनारायण पण्डित :- नारायण-पण्डित एक बड़इ उदार। चैतन्यचरण बिनु नाहि जाने आर ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीनारायण पण्डित बड़े ही उदार थे। वे श्रीचैतन्य-चरणोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते थे॥ 36 ॥ अनुभाष्य-(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9/93 संख्यामें)- श्रीवास पण्डितके भ्राता श्रीराम पण्डितके साथ श्रीनारायण पण्डित महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचल गये थे॥36॥ (15) श्रीमान् पण्डित-शाखा :- श्रीमान्‌पण्डित शाखा-प्रभुर निज भृत्य। देउटि धरेन, यबे प्रभु करेन नृत्य ॥ 37 ॥ 50 | श्रीचैतन्यचरितामृत