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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 12/80-83

इनका वास्तविक नाम जगन्नाथ चक्रवर्ती है, ये नीलाम्बर चक्रवर्तीके भतीजे हैं। इनका निवास फरिदपुर जिलाके मगडोबा गाँवमें है। श्रीगदाधरके अप्रकट होनेके पश्चात् मामुठाकुर पुरीके ‘श्रीतोटा-गोपीनाथ’ के सेवाधिकारी बने थे। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वाँ और 205वाँ श्लोकके अनुसार ये व्रजकी ‘कलभाषिणी’ हैं। शाखानिर्णयामृत 17श्लोक— “यः प्रेम्णा गौरचन्द्रेण परिवारगणैः सह। उत्कले भाषितो मामुस्तं वन्दे मामुठाकुरम्॥” तोटा-गोपीनाथके सेवकगणोंकी गुरु-प्रणाली (1) श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी (श्रीमती राधिका, अन्य मतमें सौभाग्य-मञ्जरी), (2) उनके अनुगत श्रीजगन्नाथ चक्रवर्ती ‘मामु’ गोस्वामी (श्रीरूप-मञ्जरी?), (3) उनके अनुगत रघुनाथ गोस्वामी, (4) रामचन्द्र, (5) राधावल्लभ, (6) कृष्णजीवन, (7) श्यामसुन्दर, (8) शान्तामणि, (9) हरिनाथ, (10) नवीनचन्द्र, (11) मतिलाल, (12) दयामयी, (13) कुञ्जबिहारी। ‘कण्ठाभरण’—इनका नाम श्रीअनन्त चट्टराज है। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वाँ और 206ठा श्लोक— “श्रीकण्ठाभरणोपाधिरनन्तश्चट्टवंशजः। हस्तिगोपालनामा च रङ्गवासी च वल्लभः॥206॥” “व्रजकी गोपाली अब चट्टवंशमें जन्म लेनेवाले कण्ठाभरण उपाधिसे विभूषित श्रीअनन्त हैं।” शाखानिर्णयामृत 18 श्लोक— “लीलाकलापसंयुक्तं राधाकृष्णरसात्मकम्। श्रीकण्ठाभरणं वन्दे तयोः कण्ठावतारकम्॥”॥80॥

(11) भूगर्भ गोस्वामी, (12) भागवतदास :— भूगर्भ गोसाञि, आर भागवत दास। येइ दुइ आसि' कैल वृन्दावने वास ॥ 81 ॥

अनुवाद—अन्य प्रमुख शाखाएँ भूगर्भ गोस्वामी और भागवत दास हैं, जिन्होंने आकर वृन्दावनमें वास किया॥81॥

अनुभाष्य—'भूगर्भ गोस्वामी’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 187वाँ श्लोक— “भूगर्भठक्कुरस्यासीत् पूर्वाख्या प्रेममञ्जरी॥187(क)॥” “ये व्रजकी प्रेममञ्जरी' हैं।” ये श्रीलोकनाथ गोस्वामीके अभिन्न हृदय सुहृद हैं। शाखानिर्णयामृत 24 श्लोक— “गोस्वामिनञ्च भूगर्भं भूगर्भोत्थं सुविश्रुतम्। सदा महाशयं वन्दे कृष्णप्रेमप्रदं प्रभुम्॥ श्रील-गोविन्द-देवस्य सेवा सुखविलासिनम्। दयालुं प्रेमदं स्वच्छं नित्यमानन्दविग्रहम्॥” 'भागवत दास'—शाखानिर्णयामृत 31 श्लोक— “भूगर्भसङ्गिनं वन्दे श्रीभागवतदासकम्। सदा राधाकृष्ण-लीला-गानमण्डितमानसम्।” “भूगर्भ गोस्वामीके सङ्गी श्रीभागवतदासकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनका हृदय सदा श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंके गानसे मण्डित रहता है।”॥81॥

(13) वाणीनाथ ब्रह्मचारी, (14) वल्लभचैतन्य :— वाणीनाथ ब्रह्मचारी—बड़ महाशय। वल्लभचैतन्यदास—कृष्णप्रेममय ॥ 82 ॥

अनुवाद—वाणीनाथ ब्रह्मचारी बड़े महात्मा हैं और वल्लभचैतन्यदास सदा कृष्णप्रेममें डूबे रहते हैं॥82॥ अनुभाष्य—‘वाणीनाथ ब्रह्मचारी'—शाखानिर्णयामृत 32 श्लोक— “भक्त-सङ्घदृग्भक्ताख्यं भक्तवृन्देन राजितम्। ब्रह्मचारिणमीड़े तं वाणीनाथ-महाशयम्॥” चैःचः आदिलीला 10/114 संख्या द्रष्टव्य है। 'वल्लभचैतन्य'—शाखानिर्णयामृत 33 श्लोक— “कृष्णप्रेममयं स्वच्छं परमानन्ददायिनम्। वन्दे वल्लभचैतन्यं लीलागानयुतान्तरम्॥”॥82॥

(15) श्रीनाथ, (16) उद्धव, (17) जितामित्र, (18) जगन्नाथ :— श्रीनाथ चक्रवर्ती, आर श्रीउद्धवदास। जितामित्र, काष्ठकाटा-जगन्नाथदास ॥ 83 ॥

140 | श्रीचैतन्यचरितामृत

12/83-85 ] (19) हरि आचार्य, (20) पुरिया गोपाल, (21) कृष्णदास ब्रह्मचारी, (22) पुष्पगोपाल :- श्रीहरि आचार्य, दास-पुरियागोपाल। कृष्णदास ब्रह्मचारी, पुष्पगोपाल ॥ 84 ॥ (23) श्रीहर्ष, (24) रघुमिश्र, (25) लक्ष्मीनाथ, (26) चैतन्यदास, (27) रघुनाथ :- श्रीहर्ष, रघुमिश्र, पण्डित लक्ष्मीनाथ। बङ्गवाटी-चैतन्यदास, श्रीरघुनाथ ॥ 85 ॥ अनुवाद-श्रीनाथ चक्रवर्ती, श्रीउद्धव दास, जितामित्र, काष्ठकाटाके जगन्नाथदास, श्रीहरि आचार्य, सादीपुरवासी गोपाल दास, कृष्णदास ब्रह्मचारी, पुष्पगोपाल, श्रीहर्ष, रघुमिश्र, लक्ष्मीनाथ पण्डित, बङ्गवाटी-चैतन्यदास और श्रीरघुनाथ, श्रीगदाधर पण्डितकी अन्य शाखाएँ हैं॥ 83-85 ॥ अनुभाष्य-‘श्रीनाथ चक्रवर्ती’- शाखानिर्णयामृत 13 श्लोक- “वन्दे श्रीनाथनामानं पण्डितं सद्गुणाश्रयम्। कृष्णसेवापरिपाटी यत्नैर्येन सुसेविता ॥” ‘उद्धवदास’- शाखानिर्णयामृत 35 श्लोक- “अतिदीनजने पूर्ण-प्रेमवित्तप्रदायकम्। श्रीमदुद्धवदासाख्यं वन्देऽहं गुणशालिनम् ॥” ‘जितामित्र’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 202रा श्लोक- “रिपवः षट् काममुख्या जिता येन वशीकृताः। यथार्थनामा गौरेण जितामित्रः स निर्मितः ॥ 202 ॥” “श्याममञ्जरी वही जितामित्र हैं, जिन्होंने काम आदि प्रमुख छह शत्रुओंको जीतकर वशीभूत कर लिया था और जिन्हें श्रीमन्महाप्रभुने उनके गुणोंके अनुरूप यथार्थ नाम प्रदान किया था।” शाखानिर्णयामृत 36 श्लोक- “यस्य श्रीपुस्तकं कृष्ण-माधुर्य-प्रेमपोषकम्। जितामित्रमहं वन्दे सर्वाभीष्टप्रदायकम् ॥” ‘जगन्नाथदास’- इनका निवास ढाका-विक्रमपुरके अन्तर्गत काष्ठकाटा (काठादिया) नामक ग्राममें है। इनके वंशधर अब आड़ियल-ग्राममें, कामारपाड़ा और पाइकपाड़ा-ग्राममें वास करते हैं। इनके द्वारा प्रतिष्ठित ‘यशोमाधव’ विग्रहकी सेवा आड़ियलके ‘गोस्वामी’ गण करते हैं। ये श्रीरूप गोस्वामी पादके द्वारा रचित ‘कृष्णगणोद्देश’ में वर्णित समसमाजमें स्थित चौंसठ सखियोंमेंसे छब्बीसवीं सखी, चित्रादेवीकी उपसखी ‘तिलकिनी’ हैं। 142वाँ श्लोक- “रसालिका तिलकनी सौरसेनी सुगन्धिका ॥” इनकी वंशधारा इस प्रकार है-(2) रामनृसिंह, (3) रामगोपाल, (4) रामचन्द्र, (5) सनातन, (6) मुक्ताराम, (7) गोपीनाथ, (8) गोलोक, (9) हरिमोहन शिरोमणि, (10) राखालराज। उपरोक्त (7) गोपीनाथके कनिष्ठ पुत्र-(8) माधव, (9) लक्ष्मीकान्त। सूर्यदास सरखेलके द्वारा रचित ‘भोगनिर्णय-पद्धति’ में- “ततः सुचित्रायूथाश्च ये महान्तो भवन्ति तान्। जगन्नाथाह्वयदासश्च ठक्कुरो जगदीशकः ॥” शाखानिर्णयामृत 48 श्लोक- “वन्दे जगन्नाथदासं काष्ठकाटेति विश्रुतम्। दत्तं येन त्रैपुरे च श्रीहरिनाममङ्गलम् ॥” ‘श्रीहरि आचार्य’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196 एवं 207वाँ श्लोकके अनुसार पहले व्रजकी ‘कालाक्षी’ अब श्रीहरि आचार्य हैं। शाखानिर्णयामृत 37 श्लोक- “हरिदासाचार्यं बङ्गदेशनिवासिनम्। वन्दे तं परया भक्त्या सोज्ज्वलेनोज्ज्वलीकृतम् ॥” ‘पुरिया गोपालदास’- शाखानिर्णयामृत 38 श्लोक- “वन्दे गोपालदासाख्यं सादिपुर-निवासिनम्। राधाकृष्णप्रेमरसैः प्लावितं विक्रमं पुरम् ॥” “मैं सादीपुर निवासी गोपालदासकी वन्दना करता हूँ, जिन्होंने विक्रमपुरको श्रीराधाकृष्णके प्रेमरससे आप्लावित कर दिया।” अर्थात् ये विक्रमपुरमें हरिनाम प्रचारक थे। ‘कृष्णदास ब्रह्मचारी’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 164वाँ श्लोक- बारहवाँ अध्याय | 141

[ 12/83-86

“इन्दुलेखा व्रजे यासीच्छ कृष्णदासब्रह्मचारी कृतवृन्दावनस्थितिः ॥ 164 ॥ ” “पहले व्रजमें जो श्रीराधाकी सखी इन्दुलेखा थीं, वे अब श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारी हैं। इन्होंने श्रीवृन्दावनको अपना वासस्थान बनाया है।” शाखानिर्णयामृत 41 श्लोक— “कृष्णदास-ब्रह्मचारी-कृष्णप्रेम-प्रकाशकम्। वन्दे तमुज्ज्वलधियं वृन्दावननिवासिनम् ॥ ” ‘पुष्पगोपाल'–शाखानिर्णयामृत 39 श्लोक— “पुष्पगोपालनामानं वन्दे प्रेमविलासिनम्। स्वरसैः पुष्पितः स्वर्णग्रामको नामधेयतः ॥ ” ‘श्रीहर्ष' –(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194 एवं 201वाँ श्लोक)— “मालती चन्द्रलतिका मधुमेधा वराङ्गदा। रत्नावली च कमला गुणचूडा सुकेशिनी ॥ 194 ॥ सुबुद्धिमिश्रः श्रीहर्षो रघुमिश्रो द्विजोत्तमः ॥ 201 ॥ ” “पहले व्रजमें जो 'सुकेशिनी' थीं, वे ही अब श्रीहर्ष हैं।” शाखानिर्णयामृत 40 श्लोक— “वन्दे श्रीहर्षमिश्राख्यं कृष्णप्रेमविनोदिनम्। गौरप्रेम्णा मत्तचित्तं महानन्दरसाङ्कुरम् ॥ ” 'रघुमिश्र'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195वें एवं 201वें श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'कर्पूरमञ्जरी' थीं, वे ही अब श्रीरघुमिश्र हैं। 'लक्ष्मीनाथ पण्डित'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें एवं 205वें श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'रसोन्मादा' थीं, वे ही अब श्रीलक्ष्मीनाथ पण्डित हैं। शाखानिर्णयामृत 42 श्लोक— “ब्रजलक्ष्मीनाथदासं करुणालयविग्रहम्। महाभावान्वितं वन्दे व्रजसौभाग्यदायकम् ॥ ” ‘बङ्गवाटी-चैतन्यदास'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें एवं 206वें श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'काली' थीं, वे ही अब रङ्गवासी वल्लभ (श्रीबङ्गवाटी-चैतन्यदास) हैं। शाखानिर्णयामृत 43 श्लोक— “बङ्गवाट्याः श्रीचैतन्यदासं वन्दे महाशयम्। सदा प्रेमाश्रुरोमाञ्च-पुलकाञ्चितविग्रहम् ॥ ” इनकी शाखा-परम्परा—(2) मधुराप्रसाद, (3) रुक्मिणी-कान्त, (4) जीवनकृष्ण, (5) युगलकिशोर, (6) रतनकृष्ण, (7) राधामाधव, (8) ऊषामणि, (9) वैकुण्ठनाथ, (10) लालमोहन साहा शंखनिधि (ढाकावासी)। 'श्रीरघुनाथ'–शाखानिर्णयामृत 44 श्लोक— “वन्दे श्रीरघुनाथाख्यं प्रेमकन्दमहाशयम्। यन्नामश्रवणेनैव वृन्दावनरसं लभेत् ॥ ” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194वाँ एवं 200वाँ श्लोक— “रघुनाथो द्विजः कश्चिद्गौराङ्गानन्यसेवकः। कंसारिसेनेः सेनः श्रीजगन्नाथो महाशयः ॥ 200 ॥ ” “पहले व्रजमें जो 'वराङ्गदा' थीं, वे ही अब श्रीरघुनाथ हैं॥” 83-85 ॥ (28) अमोघ, (29) हस्तिगोपाल, (30) चैतन्यवल्लभ, (31) यदु, (32) मङ्गलवैष्णव :– अमोघ पण्डित, हस्तिगोपाल, चैतन्यवल्लभ। यदु गाङ्गुलि आर मङ्गल वैष्णव ॥ 86 ॥ अनुवाद—अमोघ पण्डित, हस्तिगोपाल, चैतन्यवल्लभ, यदु गाङ्गुलि और मङ्गल वैष्णव भी श्रीगदाधर पण्डितकी अन्य शाखाएँ हैं॥86॥ अनुभाष्य—'अमोघ पण्डित'–शाखानिर्णयामृत 59 श्लोक— “अमोघपण्डितं वन्दे श्रीगौरेणात्मसात्कृतम्। प्रेमगद्गदसान्द्राङ्गं पुलकाकुलविग्रहम् ॥ ” 'हस्तिगोपाल'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें एवं 206वें श्लोकके अनुसार ये व्रजकी हरिणी हैं। शाखानिर्णयामृत 61 श्लोक— “हस्तिगोपालदासाख्यं प्रेममत्तकलेवरम्। नमामि परया भक्त्या गौरप्रेममयं परम् ॥ ” ‘चैतन्यवल्लभ'–शाखानिर्णयामृत 60 श्लोक—

142 | श्रीचैतन्यचरितामृत

12/86-87 ] “चैतन्यवल्लभं नाम वन्दे प्रेमरसालयम्। गदाधरस्य गौरस्य गुणगानाभिलाषिणम्॥” 'यदु गाङ्गुलि'—शाखानिर्णयामृत 34 श्लोक— “यदुनाथ-चक्रवर्त्ती-लीलाभागवताभिधम्। प्रेमकन्दं महाभिज्ञं वन्दे भक्त्या महाशयम्॥” वर्धमान जिलामें शालिग्राम-चानक निवासी श्रीनलिनाक्ष ठाकुर इस शाखाके वंशधर हैं। 'मङ्गल वैष्णव'—शाखानिर्णयामृत 47 श्लोक— “मङ्गलं वैष्णवं वन्दे शुद्धचित्तकलेवरम्। वृन्दावनश्योर्लीलामृतस्निग्धकलेवरम्॥” इनका निवास मुर्शिदाबादके अन्तर्गत टिकरणा-ग्राममें था। इनके पितृकुल मुर्शिदाबादकी देवी किरीटेश्वरीके सेवायेत थे। कहा जाता है कि इन्होंने पहले वृहद्व्रत स्वीकार करके घरको त्याग दिया और बादमें मयनाडालमें अपने शिष्य प्राणनाथ अधिकारीकी कन्यासे विवाह किया। इनके वंशधर काँदड़ाके ठाकुरके रूपमें प्रसिद्ध हैं। काँदड़ा वर्द्धमान जिलाके काटोयाके पास गाँवका नाम है। मङ्गल ठाकुर महाशयके प्रसिद्ध शिष्योंमें मयनाडालके प्राणनाथ अधिकारी, काँकड़ा-निवासी पुरुषोत्तम चक्रवर्ती और मयनाडालके नृसिंहप्रसाद मित्र ठाकुरका नाम उल्लेख-योग्य है। मयनाडालके अधिकारी-वंशका लोप हो चुका है, परन्तु इनकी कन्याका वंश विद्यमान है। पुरुषोत्तम चक्रवर्तीके वंशज अब वीरभूमके अन्तर्गत साकुलेश्वरके अधीन आङ्गड़ा-ग्राममें वास करते हैं। ये श्रीचैतन्यमङ्गलका गान करते हैं। नृसिंहप्रसाद मित्रठाकुरके वंशज मृदङ्गविद्याके आचार्य हैं। मङ्गलठाकुर महाशयने गौड़देशके राजाके लिये गौड़देशसे क्षेत्र (नीलाचल) तक मार्ग-प्रस्तुतिकरण और बृहत् सरोवरके खननकार्यके समय 'श्रीराधावल्लभ' युगलविग्रहको प्राप्त किया था। तब वे काँदड़ाके पश्चिममें राणीपुर-नामक गाँवमें वास करते थे। मङ्गल ठाकुर महाशयके द्वारा पूजित श्रीनृसिंहशिला आज भी काँदड़ामें विराजमान है। विग्रहकी सेवाके लिये गौड़-राजाके द्वारा प्रदत्त सम्पदाके नष्ट हो जानेसे मङ्गलठाकुर भिक्षा करके सेवा करते थे। मङ्गलठाकुरके तीन पुत्र थे—(1) राधिकाप्रसाद, (2) गोपीरमण और (3) श्यामकिशोर। इन तीनों भाइयोंका वंश विद्यमान है। बादमें काँदड़ामें श्रीवृन्दावनचन्द्रकी सेवा स्थापित हुई॥ 86॥ (33) शिवानन्द चक्रवर्ती :— चक्रवर्ती शिवानन्द सदा व्रजवासी। महाशाखा-मध्ये तेंहो सुदृढ़ विश्वासी॥ 87॥ एइ त' संक्षेपे कहिलाङ पण्डितेर गण। ऐछे आर शाखा-उपशाखार गणन॥ 88॥ अनुवाद—शिवानन्द चक्रवर्ती श्रीगदाधरकी शाखाओंमें एक प्रमुख शाखा हैं, जिन्होंने सुदृढ़ विश्वाससे श्रीवृन्दावनको अपना निवास स्थान बनाया था। यहाँ तक मैंने श्रीगदाधर पण्डितके गणोंका संक्षेपमें वर्णन किया। इस प्रकार उनकी और भी अनेक शाखाएँ-उपशाखाएँ हैं, जिनका मैंने यहाँ वर्णन नहीं किया है॥ 87-88॥ अनुभाष्य—'शिवानन्द चक्रवर्ती'—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 183वाँ श्लोक— “श्रीमल्लवङ्गमञ्जर्य्याः प्रकाशत्वेन विश्रुतः। शिवानन्दश्चक्रवर्ती कृतवृन्दावनस्थितिः॥ 183॥” “वे श्रीशिवानन्द चक्रवर्ती, जिन्होंने श्रीवृन्दावनको अपना निवास स्थान बनाया है, लवङ्गमञ्जरीके प्रकाश रूपमें प्रसिद्ध हैं।” शाखानिर्णयामृत 10— “शिवानन्दमहं वन्दे कुमुदानन्द-नामकम्। रसोज्ज्वलयुतं स्वच्छं वृन्दाकाननवासिनम्॥” चैःचः आदिलीला 8/70 संख्या द्रष्टव्य है। इसके अतिरिक्त श्रीयदुनन्दनदासने 'शाखा-निर्णयामृत' में कुछ और भी श्रीगदाधर-शाखाके सम्बन्धमें उल्लेख किया है। जैसे, (1) माधवाचार्य, (2) गोपालदास, (3) हृदयानन्द, (4) वल्लभभट्ट, (इनके नामानुसारसे बारहवाँ अध्याय | 143

[ 12/87–95 'वल्लभ' या 'पुष्टिमार्गीय' सम्प्रदाय प्रसिद्ध है), (5) मधुपण्डित (खड़दहसे दो मील पूर्वकी ओर 'साँइवोना' ग्राममें इनका श्रीपाट है। ये ही वृन्दावनके प्रसिद्ध श्रीगोपीनाथदेवके प्रतिष्ठाता और सेवक हैं।) (6) अच्युतानन्द, (7) चन्द्रशेखर, (8) वक्रेश्वर पण्डित (?) (9) दामोदर, (10) भगवान् आचार्य (अन्य), (11) अनन्ताचार्यवर्य (अन्य), (12) कृष्णदास, (13) परमानन्द भट्टाचार्य, (14) भवानन्द गोस्वामी, (15) चैतन्यदास, (16) लोकनाथ भट्ट (श्रीनरोत्तम ठाकुरके गुरु, यशोहर जिलाके तालखड़ि-निवासी, वृन्दावनके 'श्रीराधाविनोद' के प्रतिष्ठाता एवं भूगर्भ ठाकुरके प्रगाढ़ बन्धु) (?) (17) गोविन्दाचार्य, (18) अक्रूर ठाकुर, (19) सङ्केताचार्य, (20) प्रतापादित्य, (21) कमलाकान्त आचार्य (22) यादवाचार्य, (23) नारायण पड़िहारी (क्षेत्रवासी) ॥ 87 ॥ इति अनुभाष्य द्वादश परिच्छेद। बारहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। गदाधर-गणोंकी ऐकान्तिकी गौरभक्ति :- पण्डितेर गण सब,—भागवत धन्य। प्राणवल्लभ—सबार श्रीकृष्णचैतन्य ॥ 89 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितके गण सब परम भागवत हैं और श्रीकृष्णचैतन्य इन सभीके प्राणवल्लभ हैं॥ 89 ॥ श्रीनिताइ-अद्वैत-गदाधरके गणोंका स्मरण-माहात्म्य :- एइ तिन स्कन्धेर कैलुँ शाखार गणन। याँ-सबा-स्मरणे भवबन्ध-विमोचन ॥ 90 ॥ याँ-सबा-स्मरणे पाइ चैतन्य-चरण। याँ-सबा-स्मरणे हय वाञ्छित पूरण ॥ 91 ॥ अतएव ताँ-सबार वन्दिये चरण। चैतन्यमालीर कहि लीला-अनुक्रम ॥ 92 ॥ अनुवाद—इन तीन (श्रीनित्यानन्द, श्रीअद्वैताचार्य और श्रीगदाधर पण्डित) स्कन्धोंकी शाखाओंकी मैंने गणना की। इन समस्त भक्तोंका स्मरण करनेसे भवबन्धन-विमोचन अर्थात् श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है और सभी अभीष्ट पूर्ण होते हैं। इसलिये उन सबके चरणोंमें वन्दन करके अब मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु मालीकी लीला क्रमानुसार कहूँगा॥ 90-92 ॥ ग्रन्थकारकी दैन्योक्ति :- गौरलीलामृत-सिन्धु-अपार अगाध। के करिते पारे ताँहा अवगाह-साध ॥ 93 ॥ ताहार माधुरी-गन्धे लुब्ध हय मन। अतएव तटे रहि' चाकि एक कण ॥ 94 ॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरके लीलामृतका समुद्र अगाध-अपार है। इस असाध्य समुद्रके पार जानेके लिये कौन साहस कर सकता है? उसकी माधुरीकी सुगन्धसे मेरा मनमें लोभ उत्पन्न हुआ है, इसलिये मैं उसके तटपर रहकर उसके एक कणके आस्वादनमें प्रवृत्त हुआ हूँ॥ 93-94 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ पदे याँर आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 95 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे अद्वैतस्कन्ध-शाखावर्णनं नाम द्वादश-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 95 ॥ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डका श्रीअद्वैत-स्कन्धकी शाखाओंका वर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

तेरहवाँ अध्याय

चित्र 6

तेरहवाँ अध्याय तेरहवें अध्यायका कथासार—इस तेरहवें अध्यायमें महाप्रभुकी जन्मलीलाका वर्णन हुआ है। उनकी गृहस्थलीलाको आदिलीला और उनकी संन्यासलीलाको अन्त्यलीला कहा गया है। उनकी (अन्त्यलीला) के प्रथम छह वर्षकी लीलाका नाम 'मध्यलीला' है, जिसमें महाप्रभुने दक्षिणदेश, वृन्दावनदि तीर्थोंमें गमनागमन और नामका प्रचार किया। श्रीहट्टनिवासी उपेन्द्रमिश्रके पुत्र जगन्नाथ मिश्र हैं। वे नवद्वीपमें वास करने लगे और उन्होंने नीलाम्बर चक्रवर्त्तीकी पुत्री शचीदेवीसे विवाह किया। उनकी पहले आठ कन्याएँ हुईं। वे कन्याएँ जन्म लेनेके बाद ही परलोक सिधार गयीं और नवें गर्भसे विश्वरूपका जन्म हुआ। 1407 शकमें फाल्गुनी-पूर्णिमामें सन्ध्याकालमें सिंह-लग्न, सिंह-राशिमें चन्द्र-ग्रहणके समय श्रीकृष्णनाम-कीर्तनके साथ श्रीगौरचन्द्र अवतीर्ण हुए। शिशुका जन्म सुनकर सम्भ्रान्त महिलायें अनेक उपहारोंके साथ शिशुके दर्शनके लिये आयीं। नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने उनकी जन्मपत्री और हस्तरेखायें देखकर उनमें महापुरुषोंके चिह्न देखे। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकृपासे अधम व्यक्तिकी भी उनकी लीलावर्णनमें योग्यता :- स प्रसीदतु चैतन्यदेवो यस्य प्रसादतः। तल्लीलावर्णने योग्यः सद्यः स्यादधमोऽप्ययम् ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके प्रसन्न होनेपर मेरे जैसा अधम व्यक्ति भी उनकी लीला-वर्णनमें तुरन्त योग्यता लाभ करता है, वे श्रीचैतन्यदेव मेरे प्रति प्रसन्न हों॥१॥ अनुभाष्य—यस्य (श्रीकृष्णचैतन्यदेवस्य) प्रसादतः (अनुकम्पया) अयं (मादृशः) अधमः अपि तल्लीलावर्णने सद्यः योग्यः स्यात्, स चैतन्यदेवः प्रसीदतु। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र। जयाद्वैतचन्द्र जय जय नित्यानन्द ॥२॥ जय जय गदाधर जय श्रीनिवास। जय मुकुन्द वासुदेव जय हरिदास ॥३॥ जय दामोदर-स्वरूप जय मुरारि गुप्त। एइ सब चन्द्रोदये तमः कैल लुप्त ॥४॥ भक्त-चन्द्रकी हरिभजन-किरणोंसे जीवोंका अज्ञान-तमो-विनाश :- जय श्रीचैतन्येर भक्त पूर्णचन्द्रगण। सबार प्रेम-ज्योत्स्नाय उज्ज्वल त्रिभुवन ॥५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्र और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीगदाधर पण्डितकी जय हो, जय हो, श्रीनिवास पण्डितकी जय हो। श्रीमुकुन्द और श्रीवासुदेवकी जय हो, श्रीहरिदास ठाकुरकी जय हो। श्रीस्वरूप दामोदरकी जय हो, श्रीमुरारि गुप्तकी जय हो। श्रीचैतन्य महाप्रभुके पूर्णचन्द्ररूपी भक्तोंकी जय हो। इन सब चन्द्रमाओंने उदित होकर (अज्ञानरूप) अन्धकारको दूर किया है। इन सबके प्रेमकी ज्योत्स्नासे तीनों लोक प्रकाशित हो गये हैं॥२-५॥ श्रीगौरलीलाका वर्णन आरम्भ :- एइ त' कहिल ग्रन्थानारम्भे मुखबन्ध। एबे कहि चैतन्य-लीलाक्रम-अनुबन्ध ॥६॥ पहले सूत्ररूपमें और बादमें सविस्तार वर्णन-प्रतिज्ञा :- प्रथमे त' सूत्ररूपे करिये गणन। पाछे विस्तार करिब तार विवरण ॥७॥ अनुवाद—अभी तक मैंने ग्रन्थकी भूमिका कही है।

[ 13/6-17 अब मैं चैतन्यलीलाको क्रमानुसार कहूँगा। मैं पहले इन लीलाओंको सूत्ररूपमें कहूँगा और बादमें उनका विस्तृत विवरण दूँगा॥ 6-7॥ महाप्रभुकी अड़तालीस वर्षकी प्रकटलीला :- श्रीकृष्णचैतन्य नवद्वीपे अवतरि। आटचल्लिश वत्सर प्रकट विहरि ॥ 8 ॥ चौद्दशत सात शके जन्मेरे प्रमाण। चौद्दशत पञ्चान्ने हइल अन्तर्धान ॥ 9 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य नवद्वीपमें अवतरित हुए और उन्होंने अड़तालीस वर्ष तक इस जगत्में प्रकट विहार किया। चौदह सौ सात शकाब्दमें उनके जन्म लेनेका प्रमाण है और चौदह सौ पचपन शकाब्दमें वे अन्तर्धान हुए॥ 8-9॥ प्रथम चौबीस वर्ष नवद्वीपमें गृहस्थ लीला, शेष चौबीस वर्ष नीलाचलमें संन्यास-लीला-अभिनय :- चब्बिश वत्सर प्रभु कैल गृहवास। निरन्तर कैल ताहे कीर्त्तन-विलास ॥ 10 ॥ चब्बिश वत्सर शेषे करिया संन्यास। आर चब्बिश वत्सर कैल नीलाचले वास ॥ 11 ॥ अनुवाद-चौबीस वर्ष महाप्रभुने गृहवास करते हुए निरन्तर श्रीकृष्ण-कीर्तनका प्रचार किया। चौबीस वर्ष पूर्ण होनेपर उन्होंने संन्यास लिया और शेष चौबीस वर्ष वे नीलाचलमें रहे॥ 10-11॥ शेष चौबीस वर्षोंमें छह वर्ष उत्तर और दक्षिण भारतमें श्रीकृष्णका अन्वेषण और प्रचार :- तार मध्ये छय वत्सर-गमनागमन। कभु दक्षिण, कभु गौड़, कभु वृन्दावन ॥ 12 ॥ अष्टादश वत्सर रहिला नीलाचले। कृष्णप्रेम-लीलामृते भासां'ल सकले ॥ 13 ॥ अनुवाद-शेष चौबीस वर्षोंमें प्रथम छह वर्ष वे कभी दक्षिण भारत, कभी गौड़देश और कभी वृन्दावन आते-जाते रहे। शेष अठारह वर्ष सभीको श्रीकृष्णप्रेममें निमग्न करते हुए नीलाचलमें ही रहे॥ 11-13॥ गृहस्थ-लीला ही आदिलीला और संन्यास-लीला ही मध्य एवं अन्त्यलीला :- गार्हस्थ्ये प्रभुर लीला- 'आदि'-लीलाख्यान। 'मध्य'-'अन्त्य'-नामे-शेषलीलार दुइ नाम ॥ 14 ॥ अनुवाद-गृहवास करते हुए महाप्रभुने जो लीलाएँ कीं, उन्हें 'आदिलीला' कहा जाता है और शेषलीलाके दो नाम हैं-(प्रथम छह वर्षकी लीलाओंका नाम) 'मध्यलीला' और (शेष अठारह वर्षकी लीलाओंका नाम) 'अन्त्यलीला' है॥ 14॥ 'चैतन्यचरित्रमें' मुरारिगुप्तके द्वारा आदिलीलाका तथा 'कड़चामें' स्वरूप दामोदरके द्वारा शेष-लीलाका ग्रन्थन :- आदिलीला-मध्ये प्रभुर यतेक चरित। सूत्ररूपे मुरारिगुप्त करिल ग्रथित ॥ 15 ॥ प्रभुर मध्य-शेष-लीला स्वरूप-दामोदर। सूत्र करि' ग्रन्थिलेन ग्रन्थेर भितर ॥ 16 ॥ अनुवाद-आदिलीलामें महाप्रभुके जो भी चरित हैं, उनका मुरारि गुप्तने सूत्ररूपमें गुन्थन किया है। महाप्रभुकी मध्यलीला और शेषलीलाको स्वरूप दामोदरने सूत्ररूपमें अपने ग्रन्थ (कड़चा) में सङ्कलित किया है॥ 15-16॥ इन दोनोंके सूत्र ही महाप्रभुकी लीला-वर्णनके मूल :- एइ दुइजनेर सूत्र देखिया शुनिया। वर्णना करेन वैष्णव क्रम ये करिया ॥ 17 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 17॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमुरारिगुप्तके आदिलीलाके सूत्र अभी तक विद्यमान हैं, उसे देखकर और श्रीस्वरूप गोस्वामीके कड़चा-सूत्र श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके मुखसे सुनकर सभी वैष्णव वर्णन करते हैं॥ 17॥ 148 | श्रीचैतन्यचरितामृत

13/18-25 ]

आदिलाके चार भाग :- बाल्य, पौगण्ड, कैशोर, यौवन,–चारिभेद। अतएव आदिखण्डे लीला चारि भेद॥18॥ अनुवाद—अवस्थाके अनुसार बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और यौवन-ये चार भेद हैं। इसलिये आदिखण्डमें लीलाके चार भेद हैं॥18॥ शुभ फाल्गुनी-पूर्णिमाकी वन्दना :- सर्वसद्गुणपूर्णां तां वन्दे फाल्गुनपूर्णिमम्। यस्यां श्रीकृष्णचैतन्योऽवतीर्णः कृष्णनामभिः॥19॥ अनुवाद-अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य- “वैवस्वतमनोरष्टाविंशतियुगसम्भवे। चतुर्दश-शताब्दे वै सप्तवर्षसमन्विते॥ भागीरथीपटे रम्ये शचीगर्भमहार्णवे। राहुग्रस्ते पूर्णिमायां गौराङ्गः प्रकटोऽभवत्॥” “अर्थात् वैवस्वत मन्वन्तरके अठाइसवें चतुर्युगमें कलियुगमें चौदह सौ सात (शक) वर्षमें भागीरथीके तटपर शचीमाताके गर्भरूप महासिन्धुसे राहुग्रस्त पूर्णिमा (चन्द्रग्रहणके समय) में श्रीगौराङ्गदेव प्रकट हुए।” उस सर्वसद्गुणोंसे पूर्ण फाल्गुन-पूर्णिमाकी मैं वन्दना करता हूँ, जिस पूर्णिमामें श्रीकृष्णनामके साथ श्रीकृष्णचैतन्य अवतीर्ण हुए थे॥19॥ अनुभाष्य-यस्यां (फाल्गुन-पौर्णमास्यां) कृष्णनामभिः [सह] श्रीकृष्णचैतन्यः (राधाकृष्णाभिन्नविग्रहः मूलावतारो गोलोकनाथः) [निजलोकतः गौरप्रकोष्ठात् प्रपञ्चे भौमनवद्वीपे] अवतीर्णः, तां सर्वसद्गुणपूर्णां फाल्गुन-पूर्णिमां (प्रापञ्चिक-कालावतीर्णाम् अप्राकृतां सेवापरां तिथिरूपां देवीम्) (अहं) वन्दे। श्लोक भावानुवाद-जिस फाल्गुनकी पूर्णिमामें श्रीकृष्णनामके साथ श्रीराधाकृष्णाभिन्न-विग्रह मूलावतारो गोलोकनाथ श्रीकृष्णचैतन्य अपने लोकके गौरप्रकोष्ठसे इस प्रपञ्चमें भौम नवद्वीपमें अवतरित हुए, उस सर्व-सद्गुणशाली (इस प्रपञ्चमें कालके रूपमें अवतीर्ण, अप्राकृत जगत्में सेवा-परायण तिथिरूपा देवी) फाल्गुन-पूर्णिमाकी मैं वन्दना करता हूँ॥19॥ चन्द्रग्रहण-छलसे जीवोंको हरिनामें प्रेरित करना :- फाल्गुनपूर्णिमा-सन्ध्याय प्रभुर जन्मॊदय। सेइ काले दैवयोगे चन्द्रेर ग्रहण हय॥20॥ 'हरि' 'हरि' बले लोक हरषित हञा। जन्मिला चैतन्यप्रभु 'नाम' जन्माइया॥21॥ अनुवाद—फाल्गुन पूर्णिमाकी सन्ध्यामें महाप्रभुका जन्म हुआ और दैववश उस समय चन्द्रग्रहण लगा हुआ था। सभी लोग हर्षसे 'हरि' 'हरि' बोल रहे थे। इस प्रकार हरिनामको जन्म देते हुए श्रीचैतन्य महाप्रभुने जन्म लिया॥20-21॥ आदिलीलामें सर्वत्र हरिनाम-प्रवर्तन :- जन्म-बाल्य-पौगण्ड-कैशोर-युवाकाले। हरिनाम लओयाइला प्रभु नाना छले॥22॥ अनुवाद-उन्होंने जन्मके समय, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और युवाकालमें अनेक प्रकार युक्तियोंसे लोगोंसे हरिनाम करवाया॥21-22॥ नाम उच्चारण करानेके छलसे क्रन्दन और नाम लेनेपर ही शान्त होना :- बाल्यभाव-छले प्रभु करेन क्रन्दन। 'कृष्ण' 'हरि' नाम शुनि' रहये रोदन॥23॥ दर्शनके लिये आने वाले सभी व्यक्तियोंके द्वारा नाम-उच्चारण :- अतएव 'हरि' 'हरि' बले नारीगण। देखिते आइसे येवा सर्व बन्धुजन॥24॥ 'गौरहरि' नामकी आदि सूचना :- 'गौरहरि' बलि' तारे हासे सर्वनाी। अतएव हैल ताँर नाम 'गौरहरि'॥25॥ अनुवाद-महाप्रभु बाल्यभावके छलसे रोते थे और जब तक 'कृष्ण' या 'हरि' नाम नहीं सुनते थे, तब तक

तेरहवाँ अध्याय | 149

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[ 13/23-30 रोते रहते। इसलिये जब महाप्रभु रोने लगते, तब उनको देखने आनेवाली महिलाएँ और सभी बन्धु-बान्धव 'हरि' 'हरि' बोलते। महिलाएँ आनन्दसे 'गौरहरि' बोलकर उन्हें हँसाती, इसलिये महाप्रभुका एक नाम 'गौरहरि' हो गया॥ 23-25 ॥ आयु वृद्धिके साथ सब समय जीवोंको नाममें प्रवर्तन :- बाल्य वयस—यावत् हाते खड़ि दिल। पौगण्ड वयस—यावत् विवाह ना कैल॥ 26 ॥ विवाह करिले हैल नवीन यौवन। सर्वत्र लओयाइल प्रभु नाम-सङ्कीर्त्तन॥ 27 ॥ अनुवाद—जन्मसे विद्या आरम्भ करने तक उनकी बाल्यावस्था है, इसके बाद उनके विवाह तक पौगण्ड अवस्था है। विवाह करनेके समयसे उनका नवयौवन आरम्भ होता है। इस अवस्थामें महाप्रभुने सर्वत्र नाम-सङ्कीर्त्तनका प्रचार किया॥ 26-27 ॥ पौगण्डमें अध्ययन-अध्यापना करते समय प्रत्येक विषयमें श्रीकृष्णनाम-व्याख्या और प्रेरणा :- पौगण्ड-वयसे पड़ेन, पड़ान शिष्यगणे। सर्वत्र करेन कृष्णनामेर व्याख्याने॥ 28 ॥ सूत्र-वृत्ति-टीकाय कृष्णनामेर तात्पर्य। शिष्येर प्रतीत हय, —सबार आश्चर्य॥ 29 ॥ अनुवाद—पौगण्ड अवस्थामें उन्होंने स्वयं विद्याध्ययन किया और बादमें शिष्योंको पढ़ानेका कार्य आरम्भ किया तथा वे सर्वत्र ही श्रीकृष्णनामकी व्याख्या करते। वे सूत्रों, वृत्तियों और टीकाओंकी ऐसी व्याख्या करते कि सबका तात्पर्य श्रीकृष्णनाम ही है तथा उसे श्रवणकर उनके शिष्योंको उसकी अनुभूति भी होती—ऐसा देखकर सभीको आश्चर्य होता॥ 28-29 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्याकरण-सूत्र, उसकी वृत्ति और टीका शिष्योंको पढ़ाते समय महाप्रभु श्रीकृष्णनाम तात्पर्यके द्वारा शिष्योंको शिक्षा देते। उस शिक्षाका अवलम्बन करके श्रीजीव गोस्वामीने बादमें 'लघु' और 'बृहत्', इन दो 'हरिनामामृत-व्याकरण' की रचना की। इन दोनों व्याकरणोंका पाठ करनेसे जीवोंमें शब्द-ज्ञान और श्रीकृष्णभक्तिका उदय होता है॥ 29 ॥ अनुभाष्य—(चैःभाः मध्यखण्ड, पहला अध्याय)— “आविष्ट हइया प्रभु करये व्याख्यान। सूत्रवृत्ति-टीकाय सकले हरिनाम्॥ 147 ॥ प्रभु बले,—सर्वकाल सत्य कृष्णनाम। सर्वशास्त्रे कृष्ण बइ ना बलये आन॥ 148 ॥ कृष्णेर चरण छोड़ि’ ये आर बाखाने। व्यर्थ जन्म याय तार अकथ्य कथने॥ 150 ॥ कृष्णेर भजन छोड़ि’ ये शास्त्र बाखाने। से अधम कभु शास्त्रमर्म नाहि जाने॥ 157 ॥ शास्त्रेर ना जाने मर्म, अध्यापना करे। गर्दभेर प्राय मात्र शास्त्र बहि’ मरे॥ 158 ॥” “महाप्रभु आविष्ट होकर सूत्र, वृत्ति और टीका सभीकी हरिनाामसे व्याख्या करते थे। महाप्रभुने कहा,—'श्रीकृष्णनाम सब कालमें सत्य है। सभी शास्त्र श्रीकृष्णके विषयमें ही कहते हैं और उन्हें छोड़कर अन्य कुछ नहीं कहते। श्रीकृष्णके चरणोंको छोड़कर जो शास्त्रोंकी व्याख्या करता है, वह अकथ्य है अर्थात् जो कहने योग्य नहीं है, ऐसा व्याख्यान करनेसे उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। जो श्रीकृष्णके भजनके अतिरिक्त अन्य-अन्य रूपोंमें शास्त्रका व्याख्यान करता है, वह अधम व्यक्ति शास्त्रके वास्तविक अर्थको नहीं जानता। जो शास्त्रके मर्मको नहीं जानता और उसका अध्यापन करता है, उसका बोलना गधेके रेंकनेके समान ही व्यर्थ है और वह शास्त्रको जाने बिना ही मर जाता है।'” 28-29 ॥ सभीको श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनमें प्रवर्तन :- यारे देखे, तारे कहे, —कह कृष्णनाम। कृष्णनामे भासाइल नवद्वीप-ग्राम॥ 30 ॥ 150 | श्रीचैतन्यचरितामृत

13/30-39 ] कैशोरमें स्वयं कीर्तन करके सभीको नाममें प्रवर्तन :- किशोर-वयसे आरम्भिला सङ्कीर्त्तन। रात्र-दिने प्रेमे नृत्य, सङ्गे भक्तगण॥ 31 ॥ नगरे नगरे भ्रमे कीर्त्तन करिया। भासाइल त्रिभुवन प्रेमभक्ति दिया॥ 32 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जिसे भी देखते, उसे ही श्रीकृष्णनाम उच्चारण करनेके लिये कहते। इस प्रकार महाप्रभुने नवद्वीपको श्रीकृष्णनाममें निमग्न करवाया। कैशोर अवस्थामें महाप्रभुने सङ्कीर्तन आरम्भ किया और वे रात-दिन भक्तोंके साथ प्रेममें विभोर होकर नृत्य करते। वे नगर-नगरमें भ्रमणकर कीर्तन करते। इस प्रकार उन्होंने तीनों लोकोंको प्रेमभक्ति प्रदानकर उसमें निमग्न कर दिया॥ 30-32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘श्रीनवद्वीपधाम’-जाह्नवी (गङ्गा) नदीसे वेष्टित (घिरे हुए) सोलह कोसकी परिधिके भीतर श्रीनवद्वीपधाम है। उसमें नवधा भक्तिके पीठस्वरूप ‘अन्तः’, ‘सीमन्त’, ‘गोद्रुम’, ‘मध्य’, ‘कोल’, ‘ऋतु’, ‘जह्नु’, ‘मोद्रुम’ और ‘रुद्र’-ये नौ द्वीप विराजमान हैं। उनमेंसे अन्तर्द्दीपके मध्यभागमें श्रीमायापुर-ग्राममें श्रीजगन्नाथ मिश्रका निवास-स्थान है। इन सब नगर-नगरमें कीर्तन करके महाप्रभुने प्रेमभक्तिके द्वारा तीनों लोकोंको आप्लावित किया॥ 32 ॥ नवद्वीपमें पूर्ण चौबीस वर्ष ही जीवोंको नाममें प्रवर्तनः- चब्बिश वत्सर ऐछे नवद्वीप-ग्रामे। लओयाइल सर्वलोके कृष्णप्रेम-नामे॥ 33 ॥ अनुवाद-चौबीस वर्षकी अवस्था तक महाप्रभुने नवद्वीप-ग्राममें सबसे श्रीकृष्णनाम बुलवाकर श्रीकृष्णप्रेम प्रदान किया॥ 33 ॥ नीलाचलमें शेष चौबीस वर्षोंमेंसे छह वर्ष समुद्रसे हिमाचलतक नाम प्रेम-प्रचार :- चब्बिश वत्सर छिला करिया संन्यास। भक्तगण लञा कैला नीलाचले वास॥ 34 ॥ तार मध्ये नीलाचले छय वत्सर। नृत्य, गीत, प्रेमभक्ति-दान निरन्तर॥ 35 ॥ सेतुबन्ध, आर गौड़-व्यापि वृन्दावन। प्रेम-नाम प्रचारिया करिल भ्रमण॥ 36 ॥ ये छह वर्ष ही-मध्यलीला और केवल नामप्रचारमय :- एइ ‘मध्यलीला’-नाम लीला-मुख्यधाम। शेष अष्टादश वर्ष-‘अन्त्यलीला’ नाम॥ 37 ॥ अनुवाद-चौबीस वर्षकी आयुमें उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करने लगे। प्रथम छह वर्षोंमें नीलाचलमें नृत्य और गान करते हुए उन्होंने निरन्तर प्रेमभक्तिका दान किया। इसी समय कन्याकुमारीसे लेकर सम्पूर्ण गौड़देश और वृन्दावन तक सम्पूर्ण भारतका भ्रमण करके उन्होंने नाम-कीर्तन करते हुए सर्वत्र प्रेमका दान किया। यही छह वर्षोंकी ‘मध्यलीला’ की मुख्य लीलाएँ हैं। शेष अठारह वर्षोंकी लीलाका नाम ‘अन्त्यलीला’ है॥ 34-37 ॥ अवशिष्ट अठारह वर्षोंमें छह वर्ष केवल कीर्तन-नृत्य द्वारा प्रेम-प्रचार :- तार मध्ये छय वत्सर भक्तगण-सङ्गे। प्रेमभक्ति लओयाइल नृत्य-गीत-रङ्गे॥ 38 ॥ शेष बारह वर्ष केवल स्वयं श्रीकृष्णविरहमें अनुक्षण श्रीकृष्णप्रेमका आस्वादन और प्रेमावस्था-प्रदर्शन :- द्वादश वत्सर शेष रहिला नीलाचले। प्रेमावस्था शिखाइला आस्वादन-छले॥ 39 ॥ अनुवाद-उन अठारह वर्षोंमेंसे प्रथम छह वर्ष भक्तोंके सङ्गमें आनन्दके साथ नृत्य-गीत करते हुए सबको प्रेमभक्ति प्रदान की। शेष बारह वर्ष वे नीलाचलमें ही रहे। स्वयं प्रेमास्वादन करते हुए उन्होंने प्रेमकी विभिन्न अवस्थाओंको जगत्को भी सिखलाया॥ 38-39 ॥ अनुभाष्य-जातप्रेम-व्यक्ति सम्भोगके पुष्टिकारक तेरहवाँ अध्याय | 151

[ 13/39-42

अप्राकृत विप्रलम्भरसमें अवस्थित होते हैं। श्रीगौरसुन्दरने उसी प्रेमावस्थाको स्वयं आस्वादन करनेकी इच्छाके द्वारा जगत्के जीवोंको सिखलाया कि विप्रलम्भके बिना सम्भोगकी पुष्टि नहीं होती॥39॥ रात्रि-दिवसे कृष्णविरह-स्फुरण। उन्मादेर चेष्टा करे प्रलाप-वचन॥40॥ उद्धवके द्वारा दृष्ट श्रीराधाके समान महाप्रभुका महाभाव :- श्रीराधार प्रलाप यैछे उद्धव-दर्शने। सेइमत उन्माद-प्रलाप करे रात्रिदिने॥41॥ अनुवाद—रात-दिन उन्हें श्रीकृष्णके विरहकी अनुभूति होती थी, इसके फलस्वरूप वे उन्माद-ग्रस्त जैसा आचरण करते और प्रलाप करने लगते। श्रीमती राधिकाके जैसे प्रलापका उद्धवजीने दर्शन किया था, वैसे ही महाप्रभु रात-दिन उन्माद अवस्थामें प्रलाप करते थे॥41॥ अनुभाष्य—उद्धवजीने वृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधिकाका जिस 'चित्रजल्प' भावमय अवस्थाका दर्शन किया था, वैसे ही भावमय श्रीगौरसुन्दर सुदीर्घ विप्रलम्भरसके मूर्तिमान आदर्श हैं। असूया, ईर्ष्या और मदयुक्त अवज्ञामुद्राके द्वारा श्रीमती राधिकाने भ्रमरको उपलक्ष्य करके श्रीकृष्णकी अपटुता प्रकाश करते हुए जो प्रजल्प किया था, उन सब भावोंमें श्रीगौरसुन्दर निमग्न रहते थे। चैःचः आदिलीला, 4/107-108 संख्या द्रष्टव्य है॥41॥ स्वरूप और रायके साथ चण्डीदास, विद्यापति और गीतगोविन्दकी आलोचना :- विद्यापति, जयदेव, चण्डीदासेर गीत। आस्वादेन रामानन्द-स्वरूप-सहित॥42॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीराय रामानन्द और श्रीस्वरूप दामोदरके साथ विद्यापति, जयदेव और चण्डीदासके गीतोंका आस्वादन करते थे॥42॥ अनुभाष्य—'विद्यापति'—ये ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न मिथिलामें रहनेवाले एक वैष्णव कवि थे। राजा शिवसिंह और रानी लछिमादेवीके राज्यकालमें श्रीमन्महाप्रभुके प्रकटकालसे प्रायः एक सौ वर्ष पूर्व इनका जन्म हुआ था। चौदह सौ शक शताब्दीके प्रथम भागमें इन्होंने गीतोंकी रचना की। इनके द्वारा रचित श्रीकृष्ण गीतोंमें प्रचुर अप्राकृत विप्रलम्भ-रसका आदर्श प्राप्त होता है। इनके ऐसे भाव श्रीमन्महाप्रभुके आस्वादनीय थे। 'जयदेव'—बङ्गालके राजा 'लक्ष्मणसेन' के राज्यकालमें ये भोजदेवके द्वारा वामादेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। किसी-किसीके मतसे इनका जन्मकाल ग्यारहवीं अथवा बारहवीं शक शताब्दी है। बङ्गालकी राजधानी नवद्वीप-नगरमें इन्होंने बहुत समय तक वास किया। किसीके मतके अनुसार वीरभूम जिलाके 'केन्दुबिल्व' ग्राममें अथवा अन्य किसीके मतानुसार उत्कलदेशमें अथवा अन्य किसीके मतमें दक्षिणदेशमें इनका जन्म हुआ। इन्होंने नवद्वीपमें बहुत समय रहनेके बाद जीवनका शेष समय श्रीजगन्नाथक्षेत्रमें व्यतीत किया। इनके कविता-ग्रन्थका नाम 'गीत-गोविन्द' अथवा 'अष्टपदी' है। इस ग्रन्थमें प्रचुर अप्राकृत विप्रलम्भ-रसका समावेश देखा जाता है। श्रीभागवतमें वर्णित रासस्थलीसे व्रजराजकुमारके गोपियोंको छोड़कर जानेसे सम्भोगरसके पुष्टिकारक विप्रलम्भ-रसकी अवतारणा इस ग्रन्थमें वर्णित है। अष्टपदीकी टीका और टीकाकारोंके नाम 'वैष्णव-मञ्जूषा' (प्रथम संख्या) में द्रष्टव्य हैं। 'चण्डीदास'—इन्होंने वीरभूम जिलाके अन्तर्गत 'नान्नुर' ग्राममें ब्राह्मण कुलमें चौदह सौ शक शताब्दीके प्रथम भागके अन्त होनेके बाद जन्म ग्रहण किया। सम्भवतः विद्यापति ठाकुरके साथ इनका बन्धुत्व था। इनकी लेखनीमें अप्राकृत विप्रलम्भरसकी प्रचुरता है। चण्डीदासादि भक्तोंकी प्रस्फुटित भावावली श्रीमन्महाप्रभुकी परमप्रिय आस्वादनीय वस्तु थी। श्रीराधाभावमें ही विभावित होकर, श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीरामानन्दराय—इन दो

152 | श्रीचैतन्यचरितामृत

अन्तरङ्ग भक्तोंके साथ विप्रलम्भ-रसास्वादनके द्वारा श्रीकृष्णचन्द्रने श्रीगौरसुन्दररूपमें अपनी वाञ्छा पूर्ण की थी। परमहंसकुल-शिरोमणि श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीराय रामानन्द जैसे अद्वितीय चिन्मय श्रीकृष्णरस-तत्त्ववेत्ताओंके साथ स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने इन तीन भक्तों (विद्यापति, चण्डीदास और जयदेव) के द्वारा रचित जिन अप्राकृत गीतोंका आस्वादन किया, वही अद्वितीय भोक्ता सच्चिदानन्दविग्रह श्रीनन्दनन्दनके प्रति 'कृष्णमयी' श्रीराधिकाके महाभाव-वैचित्र्यसमूहका विकास है। यह इस नश्वर स्थूल-सूक्ष्म जगत्के भोग और त्याग-इन दोनोंसे उदासीन, परममुक्त और निष्किञ्चन, राधादास्यके नित्य अभिलाषी, महासौभाग्यवान् व्यक्तियोंके ही नित्य अनुसरणका विषय है। प्राकृत काव्यरसके आमोदी, निरीश्वर साहित्य-प्रिय, इन्द्रिय विषय-भोगी व्यक्तियोंके द्वारा इन अप्राकृत गीतोंकी गवेषणाके कारण तथा प्राकृत सहजिया सम्प्रदायके लोगोंने अपनी जड़ेन्द्रियोंके भोगके लिये स्वयंमें 'रागानुगा' होनेका अभिमान करके चण्डीदास, विद्यापति और जयदेवके गीतोंकी जो आलोचना करनेकी धृष्टता दिखलायी है, उसके फलस्वरूप वह जगत्में नास्तिकता और व्यभिचारकी वृद्धि कराकर उनको नरकगामी बना रही है। उनकी इस आलोचना और व्याख्याको स्वीकारकर देहात्मबुद्धिवाले असत्-तृष्णामय, अनर्थयुक्त अनधिकारी लोग परममुक्त भक्तोंके आराध्य श्रीराधाकृष्णकी अलौकिक लीलाविलासको प्राकृत नायक-नायिकाके वैरस्यमय घृणित काम-क्रीड़ा-विलास अथवा उसके समान मानकर स्वयंकी इन्द्रियोंकी तृप्तिमें लग जाते हैं। वे श्रीराधाकृष्णकी अप्राकृत लीलाके वर्णनके अधिकारी नहीं हैं॥42॥ श्रीराधाकी कृष्णविरह-चेष्टासे उत्पन्न कृष्णप्रेमास्वादनके द्वारा अपनी तीन वाञ्छाओंकी पूर्ति :- कृष्णेर वियोगे यत प्रेम-चेष्टित। आस्वादिया पूर्ण कैल आपन वाञ्छित॥43॥

अनन्त चैतनलीला क्षुद्र जीव हञा। के वर्णिते पारे, ताहा विस्तार करिया॥44॥ स्वयं अनन्तदेव भी गौरलीलाका अन्त पानेमें असमर्थ :- सूत्र करि' गणे यदि आपने अनन्त। सहस्र-वदने तेँहो नाहि पाय अन्त॥45॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके वियोगमें श्रीमती राधिकाकी जो प्रेम-चेष्टाएँ थीं, उस प्रेम-वैचित्रीका आस्वादनकर महाप्रभुने अपनी इच्छाओंकी पूर्ति की। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी अनन्त लीलाएँ हैं, मैं एक क्षुद्र जीव होकर उनका विस्तारसे कैसे वर्णन कर सकता हूँ? यदि स्वयं अनन्त शेष भी सूत्र रूपसे उनका वर्णन करना चाहें, तो भी वे अपने हजारों मुखोंसे उनका वर्णन नहीं कर सकते॥43-45॥ मुरारिगुप्त और श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा रचित सूत्रमें आदि और शेषलीलाका लेखन :- दामोदर-स्वरूप, आर गुप्त मुरारि। मुख्यमुख्यलीला सूत्रे लिखियाछे विचारि'॥46॥ उन्हीं सूत्रोंके अनुसार वृन्दावनदासके द्वारा गौरलीला-वर्णन :- सेइ अनुसारे लिखि लीला-सूत्रगण। विस्तारि' वर्णियाछेन ताहा दास-वृन्दावन॥47॥ श्रीवृन्दावनदासकी रचना-माधुर्य-वर्णन :- चैतन्य-लीलार व्यास,-दास वृन्दावन। मधुर करिया लीला करिला रचन॥48॥ ग्रन्थकारके द्वारा उनके द्वारा छोड़े गये अंशोंके वर्णनकी प्रतिज्ञा :- ग्रन्थ-विस्तार-भये छाड़िला ये ये स्थाने। सेइ सेइ स्थाने किछु करिब व्याख्याने॥49॥ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको ग्रन्थकारके द्वारा मर्यादा-प्रदान :- प्रभुर लीलामृत तेँहो करिल स्वादन। ताँर भुक्त-शेष किछु करिये चर्वण॥50॥

तेरहवाँ अध्याय | 153

[ 13/46-58 अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीमुरारिगुप्तने भी केवल मुख्य-मुख्य लीलाएँ ही सूत्ररूपमें विचारपूर्वक लिखी हैं। उन्हींके अनुसार मैं उन लीलाओंको सूत्ररूपमें लिख रहा हूँ, जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे वर्णन किया है। श्रीचैतन्यलीलाके व्यास श्रीवृन्दावनदास हैं। उन्होंने लीलाओंका इस प्रकारसे वर्णन किया है कि वे और भी सरस और मधुर हो गयी हैं। ग्रन्थके विस्तारके भयसे उन्होंने जिस-जिस स्थानपर कुछ लीलाओंको छोड़ा है, मैं उन-उन स्थानोंपर उन लीलाओंका कुछ विस्तारसे वर्णन करनेका प्रयास करूँगा। महाप्रभुके लीलामृतका उन्होंने आस्वादन किया है, मैं तो केवल उनके उच्छिष्टका कुछ चर्वण करूँगा ॥ 46-50 ॥

आदिलीला-सूत्रारम्भ :- आदिलीला-सूत्र लिखि, शुन, भक्तगण। संक्षेपे लिखिये सम्यक् ना याय लिखन ॥ 51 ॥

अनुवाद—हे भक्तगण! सुनिये, मैं आदिलीलाको सूत्ररूपमें लिख रहा हूँ। मैं लीलाओंको संक्षेपमें लिख रहा हूँ, क्योंकि समस्त लीलाओंको लिखना सम्भव नहीं है ॥ 51 ॥

तीन इच्छाओंकी पूर्तिके लिये श्रीकृष्णका गौररूपमें अवतार :- कोन वाञ्छा पूरण लागि' व्रजेन्द्रकुमार। अवतीर्ण हैते मने करिला विचार ॥ 52 ॥

अनुवाद—किसी इच्छाकी पूर्तिके लिये मनमें विचार करके व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेका निश्चय किया ॥ 52 ॥

श्रीकृष्णके गुरुजनोंका अवतार :- आगे अवतारिल ये गुरु-परिवार। संक्षेपे कहिये, कहा ना याय विस्तार ॥ 53 ॥

अनुवाद—पहले उन्होंने अपने जिन गुरुवर्ग और परिवारको अवतीर्ण करवाया, उनका मैं संक्षेपमें वर्णन करूँगा, क्योंकि विस्तारसे वर्णन करना सम्भव नहीं है ॥ 53 ॥

गुरुवर्गके नाम :- श्रीशची-जगन्नाथ, श्रीमाधवपुरी। केशव भारती, आर श्रीईश्वरपुरी ॥ 54 ॥ अद्वैत आचार्य, आर पण्डित श्रीवास। आचार्यरत्न, विद्यानिधि, ठाकुर हरिदास ॥ 55 ॥

अनुवाद—श्रीकृष्णने श्रीशचीदेवी, श्रीजगन्नाथ मिश्र, श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीकेशव भारती, श्रीईश्वरपुरी, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीवास पण्डित, आचार्यरत्न, विद्यानिधि और श्रीहरिदास ठाकुरको पहले अवतीर्ण करवाया ॥ 54-55 ॥

श्रीहट्ट-निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र-नाम। वैष्णव, पण्डित, धनी, सद्गुण-प्रधान ॥ 56 ॥

अनुवाद—श्रीहट्टके निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र भी पहले अवतरित हुए। वे परम वैष्णव, विद्वान, धनी और सद्गुण सम्पन्न थे ॥ 56 ॥

अनुभाष्य— 'श्रीउपेन्द्रमिश्र'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 35वाँ श्लोक)— “पर्जन्यो नाम गोपाल आसीत् कृष्णपितामहः। उपेन्द्रमिश्रः सञ्जातः श्रीहट्टे सप्त पुत्रवान्॥ 35॥” “व्रजमें जो पर्जन्य नामक गोप श्रीकृष्णके पितामह (दादा) थे, उन्होंने ही श्रीहट्टमें श्रीउपेन्द्र मिश्रके रूपमें जन्म ग्रहण किया है।” श्रीहट्ट जिलाके अन्तर्गत 'ढाका-दक्षिण' ग्राम इनका वासस्थान था ॥ 56 ॥

उपेन्द्र मिश्रके सात पुत्र :- सप्त मिश्र ताँर पुत्र-सप्त ऋषीश्वर। कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर ॥ 57 ॥ जगन्नाथ, जनार्द्दन, त्रैलोक्यनाथ। नदीयाते गङ्गावास कैल जगन्नाथ ॥ 58 ॥

154 | श्रीचैतन्यचरितामृत

13/57-62 ]

अनुवाद—श्रीउपेन्द्र मिश्रके सात पुत्र थे—कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर, जगन्नाथ, जनार्दन और त्रैलोक्यनाथ—ये सातों ऋषियोंके समान बड़े प्रभावशाली थे। इनमेंसे श्रीजगन्नाथ मिश्रने गङ्गाके तटपर वास करनेके उद्देश्यसे नदियामें अपना निवास स्थान बनाया॥ 57-58 ॥

श्रीकृष्णावतारमें जगन्नाथका परिचय :— जगन्नाथ मिश्रवर—पदवी 'पुरन्दर'। नन्द-वसुदेव पूर्वे सद्गुण-सागर ॥ 59 ॥

अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रजीकी 'पुरन्दर' पदवी (उपाधि) थी। वे पूर्वमें नन्द महाराज और श्रीवसुदेव थे और सद्गुणोंके सागर थे॥ 59 ॥

शची और नीलाम्बर चक्रवर्ती :— ताँर पत्नी 'शची'-नाम, पतिव्रता सती। याँर पिता 'नीलाम्बर' नाम चक्रवर्त्ती ॥ 60 ॥

अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रकी पत्नीका नाम शचीदेवी था और वे पतिव्रता सती नारी थीं; शचीदेवीके पिता नीलाम्बर चक्रवर्त्ती थे॥ 60 ॥

अनुभाष्य—'नीलाम्बर चक्रवर्त्ती'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका श्लोक 104-105)— “नीलाम्बरश्चक्रवर्त्ती गौरस्य भावि जन्म यत्। सभायां कथयामास तेनासौ गर्ग उच्यते ॥ 104 ॥ श्रीशच्या जनकत्वेन सुमुखो वल्लवो मतः ॥ 105(क) ॥" “सभामें श्रीगौरहरिके भावी जन्मका अर्थात् श्रीगौरहरिके जन्म होनेके उपरान्त उनके भविष्यका वर्णन करनेवाले श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीको गर्गाचार्य कहा जाता है। श्रीशचीदेवीके पिता होनेके कारण श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीको (श्रीयशोदाके पिता) सुमुख गोप माना जाता है।” इनके वंशधर फरिदपुर जिलामें मग्डोबा ग्राममें हैं। इनके भतीजे जगन्नाथ चक्रवर्ती अथवा 'मामुठाकुर' श्रीगदाधर पण्डितके शिष्यरूपमें श्रीक्षेत्रमें टोटा-गोपीनाथके सेवक थे। 'प्रेम-विलास' ग्रन्थके अनुसार नीलाम्बर चक्रवर्तीका नवद्वीपमें वासस्थान 'बेलपुकुरिया' में था। और काजीपाड़ामें इनका वासस्थान होनेसे ग्राम-सम्बन्धसे काजीने स्वयंको महाप्रभुका मामा कहा था (चैःचः आदिलीला, 17/148-149 संख्या द्रष्टव्य है)। काजीके घर और समाधिके तितर-बितर (पृथक्-पृथक्) होनेकी सम्भावना नहीं होनेके कारण पूर्वकथित 'बेलपुकुरिया' मुहल्ला ही वर्तमानमें 'वामनपुकुर'-नामक मुहल्ला है—ऐसा जाना जाता है, क्योंकि काजीकी समाधि अभी भी 'वामनपुकुर'में है॥ 60 ॥

श्रीनित्यानन्द, गङ्गादास, मुरारि, मुकुन्द :— राढ़देशे जन्मिला ठाकुर नित्यानन्द। गङ्गादास पण्डित, गुप्त मुरारि, मुकुन्द ॥ 61 ॥

सबके बादमें स्वयं अवतीर्ण :— असंख्य भक्तेर कराइला अवतार। शेषे अवतीर्ण हैला व्रजेन्द्रकुमार ॥ 62 ॥

अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु राढ़देशमें अवतीर्ण हुए। गङ्गादास पण्डित, मुरारि गुप्त और मुकुन्दादि असंख्य भक्तोंको अवतीर्ण करवाकर तब स्वयं श्रीकृष्ण अवतरित हुए॥ 61-62 ॥

अनुभाष्य—'राढ़देशमें'—वीरभूम जिलाके अन्तर्गत एकचक्रा-ग्राममें। एकचक्रा ग्राम उत्तर-दक्षिण दिशामें चार कोस लम्बा है। 'वीरचन्द्रपुर' अथवा 'वीरभद्रपुर' एकचक्रा-ग्रामकी सीमामें ही स्थित है। वीरभद्र प्रभुके नामपर ही इस स्थानका नाम वीरचन्द्रपुर अथवा वीरभद्रपुर हुआ है। 1331 बङ्गाब्दके आषाढ़ मासमें बिजली गिरनेसे मन्दिरका चूड़ा टूट गया था और मन्दिरको भी बहुत क्षति पहुँची थी। इसके पूर्व कभी भी श्रीमन्दिरके ऊपर इस प्रकारका दैविक प्रकोप नहीं हुआ था। मन्दिरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीकृष्ण-विग्रह हैं,—जिनका नाम श्रीबङ्किमराय अथवा 'बाँका-राय' है। श्रीबङ्किमरायके दाहिने ओर श्रीजाह्नवा और बायीं ओर श्रीमती राधिका हैं। सेवायेत लोगोंका

तेरहवाँ अध्याय | 155

[ 13/61-62 कहना है कि श्रीबङ्किमरायमें श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रवेश कर गये थे और उस समयके बाद श्रीबङ्किमरायके दायेंमें जाह्नवा-माताका विग्रह स्थापित हुआ था। बादमें और भी अन्यान्य श्रीविग्रह स्थापित हुए। श्रीमन्दिरमें एक और सिंहासनपर 'मुरलीधर' और 'राधामाधव' श्रीविग्रह विराजमान हैं। एक अन्य पृथक् सिंहासनपर मुर्शिदाबाद जिलाकी विप्रघाटी-गद्दीके श्रीमनोमोहन, श्रीवृन्दावनचन्द्र और श्रीनिताइ-गौरविग्रह लाये गये हैं। एकमात्र श्रीबङ्किमराय ही प्राचीन और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रतिष्ठित विग्रह हैं। लोकमान्यता है कि श्रीमन्दिरकी पूर्व दिशामें कदम्बखण्डीके घाटपर यमुनाजलमें श्रीबङ्किमराय-विग्रह तैर रहे थे; श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस विग्रहको जलसे उठाकर सेवाके लिये प्रतिष्ठित किया। और वीरचन्द्रपुरसे आधा मील पश्चिममें 'भड़ापुर' नामक स्थानमें नीमके वृक्षके नीचे श्रीमती राधिका प्रकाशित हुईं थीं। इसलिये बहुत पहले श्रीबङ्किमरायकी श्रीमतीको 'भड़ापुरकी ठाकुराणी' के नामसे बुलाते थे। श्रीमन्दिरमें अन्य एक सिंहासनपर श्रीबाँकारायके दाहिनी ओर 'योगमाया' विराजमान हैं। श्रीमन्दिर और जगमोहन ऊँचे पक्के चबूतरेके ऊपर स्थित हैं। सामने ही छोटा नाट्य मन्दिर है। सुना जाता है कि श्रीबाँकारायके मन्दिरकी उत्तरी दिशाकी ओर 'भाण्डीश्वर' शिव अधिष्ठित थे और हाड़ाइ पण्डित उन वैष्णवराज शिवकी आराधना करते थे। अभी वह शिवलिङ्ग अन्तर्धान हो चुका है और उस स्थानपर श्रीजगन्नाथ विग्रह प्रतिष्ठित हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुने किसी मन्दिरादिका निर्माण नहीं किया था। वीरभद्र प्रभुके समयका मन्दिर 1298 (बङ्गाब्द) में टूट जानेपर 'शिवानन्द स्वामी' नामक एक ब्रह्मचारीने उस मन्दिरका संस्कार किया। यहाँपर सेवायेत 'गोस्वामी' लोग श्रीनित्यानन्दकी शाखा श्रीगोपीजन-वल्लभानन्दकी शाखाके वंशज हैं। मन्दिरसे कुछ दूर 'विश्रामतला' नामक स्थान है। कहा जाता है कि इसी स्थानपर श्रीनित्यानन्द प्रभु बाल्यकालमें सखाओंके साथ नाना प्रकारकी व्रजलीला और रासलीलाका अभिनय किया करते थे। 'आमलीतला' नामक स्थानपर एक बड़ा इमलीका वृक्ष विराजित है। नेड़ादि सम्प्रदायके लोगोंने इस स्थानके सम्बन्धमें अनेक प्रकारकी मन-गड़न्त कहानियाँ बनायी हैं। वे कहते हैं कि 'श्वेतगङ्गा' नामक एक सरोवरकी खुदाई वीरभद्र प्रभुके अनुगत 1200 नेड़ाओंने की थी। कुछ ही दूर गोस्वामियोंका समाधि-स्तम्भ है; मौड़ेश्वरसे द्वारकेश्वर नद तक उत्तरकी ओर बहनेवाली यमुनाको पार करके आधे मीलके भीतर श्रीनित्यानन्द प्रभुका सूतिका-मन्दिर (जन्मस्थान) है। सूतिका-मन्दिरके सामने एक प्राचीन नाट-मन्दिर था, अब वह टूटकर एक बड़े वटवृक्षके द्वारा आच्छादित हो चुका है। बादमें उस प्राङ्गणमें एक भव्य मन्दिरका निर्माण हुआ था—इसमें श्रीगौरनित्यानन्द-विग्रह विराजमान हैं। जगमोहनके पत्थरके पटलपर स्वर्गीय प्रसन्नकुमार कारफरमाकी स्मृतिकी रक्षाके लिये 1323 वर्ष, वैशाख मासमें इस मन्दिरके संस्कारका उल्लेख है। जिस स्थानपर सूतिका-मन्दिर अवस्थित है, उस स्थानको 'गर्भवास' नामसे कहा जाता है। गर्भवासके निकट हाड़ाइ पण्डितकी संस्कृत व्याकरणकी पाठशाला थी। उस स्थानके सेवायेतोंके नाम—(1) श्रीराघव-चन्द्र गोस्वामी (गौरगणोद्देश-दीपिका 162 श्लोक—व्रजमें जो श्रीराधाकी प्राणस्वरूपा श्रीचम्पकलता सखी थीं, वे ही अब श्रीराघव गोस्वामी हैं। ये वही राघव गोस्वामी हैं, जिन्होंने श्रीगोवर्धनको अपना निवास स्थान बनाया तथा 'भक्तिरत्न-प्रकाश' नामक ग्रन्थकी रचना की (?) तिरोभाव-तिथि—ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी), (2) जगदानन्ददास (तिरोभाव-तिथि—श्रीराधाष्टमी), (3) कृष्णदास (चिड़िया-कुञ्जके, तिरोभाव-तिथि—श्रीकृष्णजन्माष्टमी, (4) नित्यानन्ददास, (5) रामदास, (6) ब्रजमोहनदास, (7) कानाइ दास, (8) गौरदास, (9) शिवानन्द दास, (10) हरिदास। गर्भवास अथवा सूतिका-मन्दिरसे कुछ ही दूरीपर बकुलतला है। इस स्थानपर श्रीनित्यानन्द प्रभु सखाओंके 156 | श्रीचैतन्यचरितामृत

13/61-68 ] साथ 'झाल-झपेटा' खेल खेलते थे। यह बकुलवृक्ष अति आश्चर्यजनक है, इस वृक्षकी शाखाएँ-प्रशाखाएँ ठीक सर्पकी भाँति मुख-फणादियुक्त हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अनन्तदेव श्रीनित्यानन्द प्रभुकी इच्छासे ही इस रूपमें प्रकाशित हैं। वृक्ष भी बहुत प्राचीन है। सुना जाता है कि इस वृक्षके दो डाल पहले अलग-अलग थे, खेलते समय सखाओंको एक डालसे दूसरे डालपर आने-जानेमें कष्ट होता देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने दोनों शाखाओंको एक साथ मिला दिया। 'हाँटुगाड़ा'-लोकमान्यता है कि श्रीनित्यानन्द प्रभुने समस्त तीर्थोंको इस स्थानपर लाकर उनका समावेश किया था। आज भी इस धामके वासी गङ्गादि तीर्थोंमें न जाकर इस तीर्थमें ही स्नान करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुने इस स्थानपर दधि-चिड़ा-महोत्सव किया था। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने इस स्थानपर घुटनोंपर बैठकर दधि-चिड़ाका भोजन किया था और उनके इस प्रकार बैठनेके कारण यहाँ एक गढ्ढा बन गया था। इसलिये इस स्थानका नाम 'हाँटुगाड़ा' हो गया। वर्षमें बारह महीनों इस कुण्डमें जल रहता है। कार्तिक-मासमें गोष्ठके समय इस स्थानपर बड़ा मेला होता है। माघी शुक्ला त्रयोदशीमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके जन्मोत्सवके समय भी वीरचन्द्रपुरमें विराट मेलेका आयोजन होता है। गौरगणोद्देशदीपिका 11 श्लोक- “भक्तस्वरूपो नित्यानन्दो व्रजे यः श्रीहलायुधः॥11(क)॥ बलदेवो विश्वरूपो व्यूहः सङ्कर्षणो मतः॥58(ख)॥ नित्यानन्दावधूतश्च प्रकाशेन स उच्यते॥59(क)॥" “जो व्रजमें श्रीहलधर (श्रीबलदेव) प्रभु हैं, वे ही भक्तस्वरूपमें श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। श्रीबलदेवके सङ्कर्षण व्यूहको विश्वरूप (श्रीचैतन्य महाप्रभुके बड़े भाई) माना जाता है। वे सङ्कर्षण ही प्रकाशभेदसे अवधूत श्रीनित्यानन्द कहे जाते हैं।” यही व्रजके श्रीबलराम हैं। चैःचः आदिलीला, 3/93 संख्या द्रष्टव्य है॥61-62॥ महाप्रभुके पहले श्रीअद्वैताचार्य ही सभीके पूज्य और प्रधान :- प्रभुर आविर्भाव-पूर्वे यत वैष्णवगण। अद्वैत-आचार्येर स्थाने करेन गमन॥63॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी भक्ति-व्याख्या :- गीता-भागवत कहे आचार्य-गोसाञि। ज्ञान-कर्म निन्दि' करे भक्तिर बड़ाइ॥64॥ एकमात्र श्रीकृष्णभक्तिकी ही अभिधेयके रूपमें व्याख्या :- सर्वशास्त्रे कहे कृष्णभक्तिर व्याख्यान। ज्ञान, योग, तपो-धर्म नाहि माने आन॥65॥ उनको प्रधान-मानकर सभी वैष्णवोंके द्वारा श्रीकृष्णभजन :- ताँर सङ्गे ताते करे वैष्णवेर गण। कृष्णकथा, कृष्णपूजा, नामसङ्कीर्त्तन॥66॥ अनुवाद-महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे पहले सभी वैष्णव श्रीअद्वैताचार्यके घर एकत्रित हुआ करते थे। श्रीअद्वैताचार्य गीता और भागवतादिकी व्याख्या करते हुए कर्म-ज्ञान मार्गको तुच्छ बतलाकर भक्तिकी श्रेष्ठता स्थापित करते थे। वे शास्त्रोंकी आलोचना करके यही बतलाते थे कि सभी शास्त्र मुख्यरूपसे श्रीकृष्णभक्तिकी महिमाका ही गान करते हैं। ज्ञान, योग और तप मुख्य धर्म नहीं हैं। उनके साथ वैष्णव लोग श्रीकृष्णकथा, श्रीकृष्णपूजा और कृष्णनामका सङ्कीर्तन करते हुए आनन्दित होते थे॥63-66॥ प्रकट होकर आचार्यको जीवोंकी इन्द्रियसुखमें तत्परताको देखकर दुःखकी प्राप्ति :- किन्तु सर्वलोक देखि' कृष्णबहिर्मुख। विषये निमग्न लोक, देखि' पाइल दुःख॥67॥ लोगोंके उद्धारके लिये आचार्यकी गम्भीर चिन्ता :- लोकेर निस्तार-हेतु करेन चिन्तन। केमने ए सर्वलोकेर हइबे तारण॥68॥ तेरहवाँ अध्याय | 157

[ 13/67-74 स्वयं श्रीकृष्णके अवतार द्वारा ही लोगोंका उद्धार सम्भवपर :- कृष्ण अवतरि' करेन भक्तिर विस्तार। तबे त' सकल लोकेर हइबे निस्तार॥ 69॥ अनुवाद-किन्तु सभी लोगोंको कृष्णबहिर्मुख और केवल विषयोंमें ही निमग्न देखकर श्रीअद्वैताचार्यके मनमें बहुत दुःख होता। वे लोगोंके कल्याणके लिये विचार करने लगे। वे चिन्तन करने लगे कि इन सब लोगोंका उद्धार कैसे होगा? तब उन्होंने सोचा कि यदि स्वयं श्रीकृष्ण अवतरित होकर अपनी भक्तिका प्रचार करेंगे, तभी सब लोगोंका उद्धार होगा॥ 67-69॥ स्वयं श्रीकृष्णको अवतरित करानेके लिये श्रीकृष्णपूजा :- कृष्ण अवतारिते आचार्य प्रतिज्ञा करिया। कृष्णपूजा करे तुलसी-गङ्गाजल दिया॥ 70॥ श्रीकृष्णका आह्वान और श्रीकृष्णका आकर्षण :- कृष्णेर आह्वान करे सघन हुङ्कार। हुङ्कारे आकृष्ट हैला व्रजेन्द्रकुमार॥ 71॥ अनुवाद-इसलिये उन्होंने श्रीकृष्णको अवतीर्ण करानेकी प्रतिज्ञा की और तुलसीदल और गङ्गाजलसे श्रीकृष्णकी पूजा करने लगे। वे सघन हुङ्कार करके श्रीकृष्णका आह्वान करने लगे, जिसे सुनकर श्रीव्रजेन्द्रकुमार उनकी ओर आकृष्ट हुए॥ 70-71॥ अनुभाष्य-चैःचः आदिलीला, 3/95-109 संख्या और चैःभाः आदिखण्ड, द्वितीय अध्याय द्रष्टव्य हैं॥ 67-71॥ गौरावतारसे पहले मिश्र और शचीकी आठ कन्याओंकी मृत्यु :- जगन्नाथमिश्र-पत्नी शचीर उदरे। अष्ट कन्या क्रमे हैल, जन्मि' जन्मि' मरे॥ 72॥ मिश्रका दुःख और पुत्र प्राप्तिके लिये विष्णुकी आराधना :- अपत्य-विरहे मिश्रेर दुःखी हैल मन। पुत्र लागि' आराधिल विष्णुर चरण॥ 73॥ उनकी नवम सन्तान-विश्वरूप :- तबे पुत्र जनमिल 'विश्वरूप' नाम। महा-गुणवान् तेँह-'बलदेव'-धाम॥ 74॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मिश्रकी पत्नी शचीदेवीके गर्भसे एक-एक करके आठ कन्याएँ उत्पन्न हुईं, परन्तु वे जन्मके बाद ही मर गयीं। सन्तानके विरहमें श्रीजगन्नाथमिश्र और शचीदेवीका मन बड़ा दुःखी हो गया और वे पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे भगवान् विष्णुकी आराधना करने लगे। तब उनके घर एक पुत्रका जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने 'विश्वरूप' रखा। विश्वरूपमें महान् गुण थे, क्योंकि वे श्रीबलदेव प्रभुके अवतार थे॥ 72-74॥ अनुभाष्य-'विश्वरूप'—श्रीगौरहरिके बड़े भाई थे। विवाहसे पहले ही इन्होंने गृह त्यागकर संन्यास ग्रहण किया और इनका नाम 'शङ्करारण्य' हुआ। विश्वरूप 1431 शाकाब्दमें महाराष्ट्र 'पाण्डेरपुर' में अप्रकट हुए। वे विश्वके 'उपादान' और 'निमित्त'-दोनों कारणस्वरूप हैं। गौरगणोद्देशदीपिका 58-62 श्लोक- “अंश-अंशिनोरभेदेन व्यूह आद्यः शचीसुतः। बलदेवो विश्वरूपो व्यूहः सङ्कर्षणो मतः॥ 58॥ नित्यानन्दावधूतश्च प्रकाशेन स उच्यते। गौरचन्द्रोदये धर्मं प्रति वाक्यं कलेर्यथा-॥ 59॥ 'अस्याग्रजस्त्वकृतदारपरिग्रहः सन् सङ्कर्षणः स भगवान् भुवि विश्वरूपः। स्वीयं महः किल पुरीश्वरमापयित्वा पूर्वं परिव्रजित एव तिरोबभूव॥' इति॥ 60॥ 'नित्यानन्दावधूतो मह इति महितम् हन्त सङ्कर्षणं यः।' इति च॥ 61॥ यदा विश्वरूपोऽयं तिरोभूतः सनातनः। नित्यानन्दावधूतेन मिलित्वापि तदा स्थितः॥ 62॥" “अंश और अंशीमें अभेद होनेके कारण आद्यव्यूह 158 | श्रीचैतन्यचरितामृत

13/74-79 ] श्रीवासुदेवको श्रीशचीनन्दन माना जाता है। श्रीबलदेवके सङ्कर्षण व्यूहको ही विश्वरूप (श्रीचैतन्य महाप्रभुके बड़े भाई) माना जाता है। वे सङ्कर्षण ही प्रकाशभेदसे अवधूत श्रीनित्यानन्द कहे जाते हैं। श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके प्रथम अङ्कके अड़तीसवें तथा इकत्तीसवें श्लोकमें धर्मके प्रति कलिने इस प्रकार कहा है—‘जगत्में श्रीविश्वरूपके नामसे विख्यात श्रीगौरहरिके अग्रज (बड़े भाई) साक्षात् सङ्कर्षण हैं। इन्होंने विवाहसे पूर्व ही संन्यास ग्रहण किया था तथा तीर्थ भ्रमण करते समय अपने तेजको श्रीपरमानन्द पुरीमें (धरोहरकी भाँति) स्थापित करके अन्तर्द्धान हो गये।' और "ब्रह्मादिके द्वारा पूजित महातेजोमय श्रीसङ्कर्षण ही अवधूत श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं।' इसलिये अपने अन्तर्धानके समय सनातन श्रीविश्वरूप श्रीनित्यानन्द अवधूतसे मिलकर उनके शरीरमें विराजमान हो गये॥" 74॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 77॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अनन्त भगवान् जगदीश्वरमें यह कुछ भी आश्चर्यका विषय नहीं है, क्योंकि उनमें यह विश्व वस्त्रके सूतकी भाँति ओत-प्रोतरूपमें प्रतीत होता है॥ 77॥ अनुभाष्य—श्रीबलदेवके द्वारा धेनुकासुर-वध-लीलाको लक्षित करके शुकदेव गोस्वामीने राजा परीक्षितसे कहा— हे अङ्ग (राजन्), यस्मिन् इदं विश्वं तन्तुषु पटः (वसनं) यथा ओतं प्रोतं (मिथः सम्मिलितं) [तथा] अनन्ते (अपरिविच्छित्रे) जगदीश्वरे [तस्मिन्] भगवति (विष्णौ) एतत् (असुर-निधनादिकं) चित्रम् (आश्चर्यं) न हि भवति। श्लोक भावानुवाद—हे राजन्! जिनके द्वारा यह जगत् वस्त्रमें धागेके समान ओत-प्रोत है, उन अनन्त जगदीश्वर भगवान् विष्णुके द्वारा इस असुरका मारा जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है॥ 77॥ विश्वरूप ही वैकुण्ठके महासङ्कर्षण :— बलदेव-प्रकाश—परव्योमे 'सङ्कर्षण'। तेंह—विश्वेर उपादान-निमित्त-कारण॥ 75॥ महाप्रभुका विश्वरूपको 'बड़ा भाई' कहना :— अतएव प्रभु ताँरे बले, 'बड़ भाई'। कृष्ण-बलराम दुइ—चैतन्य-निताइ॥ 78॥ अनुवाद—महासङ्कर्षण वैकुण्ठमें श्रीबलदेव प्रभुके प्रकाश हैं और वे जगत्की सृष्टिके उपादान और निमित्त कारण हैं॥ 75॥ अनुवाद—(श्रीबलरामजी ही विश्वरूप हुए हैं) इसलिये महाप्रभु उन्हें अपना बड़ा भाई कहते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण और श्रीबलरामजी अब श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु हुए हैं॥ 78॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विश्वरूप'—परव्योममें स्थित महासङ्कर्षणके अवतार हैं॥ 75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्योंकि महासङ्कर्षण 'उपादान' और 'निमित्त' कारणरूपमें विश्वमें ओत-प्रोत होकर विराजमान हैं, इसलिये उनको महाप्रभुके 'बड़े भाई' कहकर कहा जाता है। परन्तु श्रीकृष्णलोकमें जो श्रीकृष्ण और श्रीबलराम हैं, वे ही श्रीचैतन्य-निताइ हैं। इसलिये श्रीनित्यानन्द प्रभु—मूल सङ्कर्षण अर्थात् श्रीबलदेव प्रभु हैं॥ 78॥ ताँहा बइ विश्वे किछु नाहि देखि आर। अतएव 'विश्वरूप' नाम ये ताँहार॥ 76॥ अनुवाद—यह समस्त विश्व उनका ही रूप है और उनके अतिरिक्त जगत्में कुछ भी नहीं दिखायी देता है, इसलिये उनका नाम 'विश्वरूप' है॥ 76॥ श्रीमद्भागवत (10/15/35)— नैतच्चित्रं भगवति ह्यनन्ते जगदीश्वरे। ओतं प्रोतमिदं यस्मिन् तन्तुष्वङ्ग यथा पटः॥ 77॥ पुत्र-प्राप्तिसे मिश्र-शचीको आनन्द :— पुत्र पाञा दम्पति हैला आनन्दित मन। विशेषे सेवन करे गोविन्दचरण॥ 79॥ तेरहवाँ अध्याय | 159