श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६११
'लालटेन जला – जरा चलेंगे।'
श्रीरामकृष्ण लाटू के साथ अकेले जा रहे हैं। मास्टर भी साथ हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – तुम नारायण को लेते क्यों नहीं आये?
मास्टर कह रहे हैं – "क्या मैं भी साथ चलूँ?"
श्रीरामकृष्ण – चलोगे? अधर आदि सब हैं – अच्छा, चलो। दोनों मुखर्जी भाई रास्ते में खड़े थे। श्रीरामकृष्ण मास्टर से पूछ रहे हैं – "क्या ये लोग भी कोई जायेंगे? (मुखर्जियों से) अच्छा है चलो। तो हम जल्दी चले आ सकेंगे।"
श्रीरामकृष्ण यदु मल्लिक के बैठकखाने में आये। कमरा सजा हुआ था। कमरे में और बरामदे में दीवारगीरें जल रही हैं। श्रीयुत यदुलाल छोटे-छोटे लड़कों को लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक दो-एक मित्रों के साथ बैठे हैं। नौकरों में से कोई आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा है, कोई पंखा झल रहा है। यदु बाबू ने हँसकर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण से सम्भाषण किया, जैसे पुराने परिचितों का व्यवहार हो।
यदु बाबू गौरांग के भक्त हैं। उन्होंने स्टार थियेटर में चैतन्यलीला देखी थी। श्रीरामकृष्ण से उसी की बातचीत कर रहे हैं। कहा, चैतन्य-लीला का नया अभिनय बड़ा अच्छा हो रहा है।
श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक चैतन्यलीला की बातचीत सुन रहे हैं, रह-रहकर यदु बाबू के एक छोटे लड़के का हाथ लेकर खेल कर रहे हैं। मास्टर और दोनों मुखर्जी भाई उनके पास बैठे हुए हैं।
श्रीयुत अधर सेन ने कलकत्ता म्युनिसिपैल्टी के वाईस चेअरमन के पद के लिए बड़ी चेष्टा की थी। उस पद का वेतन हजार रुपया है। अधर डिप्टी मजिस्ट्रेट हैं। तीन सौ रुपया प्रति मास पाते हैं। उम्र तीस साल की होगी।
श्रीरामकृष्ण – (यदु बाबू से) – अधर का तो काम नहीं हुआ।
यदु और उनके मित्र – अधर की उम्र तो अभी ज्यादा नहीं हुई।
कुछ देर बाद यदु कह रहे हैं – 'तुम जरा उनके लिए नाम-जप करो।' श्रीरामकृष्ण गौरांग का भाव गाकर बतला रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण ने कीर्तन के कई गाने गाये।
(५)
राखाल के लिए चिन्ता
गीत के समाप्त हो जाने पर दोनों मुखर्जी भाई उठे। उनके साथ श्रीरामकृष्ण भी उठे। परन्तु भावावेश अब भी है। घर के बरामदे में आकर खड़े होते समाधिमग्न हो गये। बरामदे में कई बत्तियाँ जल रही थीं। बगीचे का दरवान भक्त था। वह श्रीरामकृष्ण को
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आमन्त्रित करके कभी कभी भोजन कराता था। दरवान श्रीरामकृष्ण को बड़े पंखे से हवा करने लगा।
बगीचे के कर्मचारी श्रीयुत रतन ने आकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण की प्राकृत अवस्था हो रही है।
उन लोगों से सम्भाषण करते हुए वे 'नारायण-नारायण' उच्चारण कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ ठाकुर-मन्दिर के सदर फाटक तक आये। यहाँ मुखर्जी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
अधर श्रीरामकृष्ण को खोज रहे थे।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – इनके (मास्टर के) साथ तुम लोग सदा मिलते रहना और बातचीत करना।
प्रिय मुखर्जी – (सहास्य) – हाँ, ये अब से हमारे मास्टर बने।
श्रीरामकृष्ण – गंजेड़ी का स्वभाव है कि दूसरे गंजेड़ी को देखकर उसे आनन्द होता है। अमीरों के आने पर तो वह बोलता भी नहीं। परन्तु अगर एक अभागा कहीं का गंजेड़ी आ जाय तो उसे गले लगाने लगता है। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण बगीचे के रास्ते से पश्चिम की ओर होकर अपने कमरे की ओर जा रहे हैं। रास्ते में कह रहे हैं – 'यदु बड़ा हिन्दू है – भागवत की बहुत सी बातें कहता है।'
मणि कालीमन्दिर में चरणामृत ले रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भी वहीं पहुँचे। माता के दर्शन करेंगे।
रात के नौ बजे मुखर्जियों ने प्रणाम करके बिदा ली। अधर और मास्टर जमीन पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण अधर से राखाल की बातें कर रहे हैं।
राखाल वृन्दावन में हैं, बलराम के साथ। पत्र द्वारा संवाद मिला था, वे बीमार हैं। दो-तीन दिन हुए श्रीरामकृष्ण राखाल की बीमारी का हाल पाकर इतने चिन्तित हो गये थे कि दोपहर की सेवा के समय हाजरा से, क्या होगा, कहकर बालक की तरह रोने लगे थे। अधर ने राखाल को रजिस्ट्री करके चिट्ठी लिखी है। परन्तु अब तक पत्र की स्वीकृति उन्हें नहीं मिली।
श्रीरामकृष्ण – नारायण को पत्र मिला और तुम्हें पत्र का जवाब भी नहीं मिला?
अधर – जी नहीं, अभी तक तो नहीं मिला।
श्रीरामकृष्ण – और मास्टर को भी लिखा है।
श्रीरामकृष्ण – चैतन्य-लीला देखने जायेंगे, इसी सम्बन्ध में बातचीत हो रही है।
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – यदु ने कहा था, एक रुपये वाली जगह से खूब दीख पड़ता है और सस्ता भी है!
"एक बार हम लोगों को पेनेटी ले जाने की बातचीत हुई थी, यदु ने हम लोगों के
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चढ़ने के लिए चलती नाव किराये पर लेने की बातचीत की थी! (सब हँसते हैं।)
"पहले ईश्वर की बातें कुछ-कुछ सुनता था। अब वह नहीं दीख पड़ता। कुछ खुशामदी लोग यदु के दाँये-बाँये हमेशा बने रहते हैं - उन लोगों ने और चकाचौंध लगा दिया है।
"बड़ा हिसाबी है। जाने के साथ ही उसने पूछा, कितना किराया है? मैंने कहा, 'तुम्हारा न सुनना ही अच्छा है। तुम ढाई रुपया देना।' इससे चुप हो गया और वही ढाई रुपये देता है!" (सब हँसते हैं)
रात हो गयी है। अधर जायेंगे, प्रणाम कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण - (मास्टर से) - नारायण को लेते आना।
परिच्छेद ९१
परिच्छेद ९१
अभ्यासयोग
(१)
दक्षिणेश्वर में महेन्द्र, राखाल आदि भक्तों के साथ
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। शरत् काल है। शुक्रवार, १९ सितम्बर, १८८४। दिन के दो बजे होंगे। आज भादों की अमावास्या है, महालया। श्रीयुत महेन्द्र मुखोपाध्याय और उनके भाई श्रीयुत प्रिय मुखोपाध्याय, मास्टर, बाबूराम, हरीश, किशोर और लाटू जमीन पर बैठे हैं। कुछ लोग खड़े भी हैं – कोई कमरे में आ-जा रहे हैं। श्रीयुत हाजरा बरामदे में बैठे हैं। राखाल बलराम के साथ वृन्दावन में हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महेन्द्रादि भक्तों से) – कलकत्ते में मैं कप्तान के घर गया था। लौटते हुए बड़ी रात हो गयी थी।
“कप्तान का कैसा स्वभाव है! कैसी भक्ति है! छोटी धोती पहनकर आरती करता है। पहले तीन बत्तीवाले प्रदीप से आरती करता है – इसके बाद एक बत्तीवाले प्रदीप से और फिर कपूर से।
“उस समय बोलता नहीं। मुझे इशारे से आसन पर बैठने के लिए कहा।
“पूजा करते समय आँखें लाल हो जाती हैं, मानो बर्र ने काट लिया हो।
“गाना तो नहीं गा सकता। परन्तु स्तवपाठ बहुत ही सुन्दर करता है।
“वह अपनी माँ के पास नीचे बैठता है। माँ ऊँचे आसन पर बैठती हैं।
“बाप अंग्रेज का हवलदार है। लड़ाई के मैदान में एक हाथ में बन्दूक रखता है और दूसरे हाथ से शिवजी की पूजा करता है। नौकर शिवमूर्ति बना दिया करता है। बिना पूजा किये जल ग्रहण भी नहीं करता। सालाना छः हजार रुपये पाता है।
“कभी कभी अपनी माँ को काशी भेजता है। वहाँ उसकी माँ की सेवा पर बारह-तेरह आदमी रहते हैं। बड़ा खर्च होता है। वेदान्त, गीता, भागवत, कप्तान को कण्ठाग्र हैं।
“वह कहता है, कलकत्ते के बाबुओं का आचार बहुत ही भ्रष्ट है।
“पहले उसने हठयोग किया था, इसलिए जब मुझे समाधि या भावावस्था होती है
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तब सिर पर हाथ फेरने लगता है।
“कप्तान की स्त्री के दूसरे इष्ट देवता हैं, गोपाल। अब की बार उसे उतनी कंजूसी करते नहीं देखा। वह भी गीता जानती है, कैसी भक्ति है उनकी! – मुझे जहाँ भोजन कराया, वहीं हाथ मुँह भी धुलाया। दाँत खोदने की सींक भी वहीं दी।
“मेरे खा चुकने पर कप्तान या उसकी पत्नी पंखा झलती है।
“उनमें बड़ी भक्ति है। साधुओं का बड़ा सम्मान करते हैं। पश्चिम के आदमियों में साधुओं के प्रति भक्ति ज्यादा है। जंग बहादुर के लड़के और उसके भतीजे कर्नल यहाँ आये थे। जब आये तब पतलून उतारकर मानो बहुत डरते हुए आये।
“कप्तान के साथ उसके देश की एक स्त्री भी आयी थी। बड़ी भक्त थी – विवाह अभी नहीं हुआ था। गीतगोविन्द के गाने कण्ठाग्र थे। द्वारका बाबू आदि उसका गाना सुनने के लिए बैठे थे। जब उसने गीतगोविन्द का गाना गाया तब द्वारका बाबू रूमाल से आँसू पोंछने लगे। विवाह क्यों नहीं किया, इस प्रश्न के पूछने पर उसने कहा – ‘ईश्वर की दास हूँ? और किसकी दासी होऊँगी।’ और सब लोग उसे देवी समझकर बहुत मानते हैं – जैसा पुस्तकों में लिखा हुआ मिलता है।
(महेन्द्रादि से) “आप लोग आते हैं, जब सुनता हूँ कि इससे कुछ उपकार होता है तब मन बहुत अच्छा रहता है। (मास्टर से) यहाँ आदमी क्यों आते हैं? – वैसा पढ़ा-लिखा भी तो नहीं हूँ।”
मास्टर – जी, कृष्ण जब स्वयं सब चरवाहे और गौएँ बन गये (ब्रह्मा के हर लेने पर) तब चरवाहों की माताएँ नये बच्चों को पाकर फिर यशोदा के पास नहीं गयीं।
श्रीरामकृष्ण – इससे क्या हुआ?
मास्टर – ईश्वर स्वयं ही चरवाहे बने थे कि नहीं, इसीलिए उनमें इतना आकर्षण था। ईश्वर की सत्ता रहने से ही मन खिंच जाता है।
श्रीरामकृष्ण – यह योगमाया का आकर्षण था – वह जादू डाल देती है। जटिला के डर से बछड़े को उठाये हुए सुबल का रूप धरकर राधिका जा रही थीं; जब उन्होंने योगमाया की शरण ली तब जटिला ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया।
“हरि की सब लीलाएँ योगमाया की सहायता से हुई थीं।
“गोपियों का प्यार क्या है, परकीया रति है। कृष्ण के लिए गोपियों को प्रेमोन्माद हुआ था। अपने स्वामी के लिए इतना नहीं होता। अगर कोई कहे, ‘अरी तेरा स्वामी आया है’, तो कहती है, ‘आया है तो आये – खुद भोजन कर लेगा।’ परन्तु अगर दूसरे पुरुष की बात सुनती है कि बड़ा रसिक है, बड़ा सुन्दर है और रसपण्डित है तो दौड़कर देखने के लिए जाती हैं – और ओट से झाँककर देखती है।
“अगर कहो कि उन्हें तो हमने देखा ही नहीं फिर गोपियों की तरह उन पर चित्त कैसे
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लग सकता है? – तो इसके लिए यह कहना है कि सुनने पर भी वह आकर्षण होता है।
“एक गाने में कहा है, बिना जाने ही, उनका नाममात्र सुनकर मन उनमें आकर लिप्त हो गया।”
एक भक्त – अच्छा जी, वस्त्रहरण का क्या अर्थ है?
श्रीरामकृष्ण – आठ पाश हैं। गोपियों के सब पाश छिन्न हो गये थे, केवल लज्जा बाकी थी। इसलिए उन्होंने उस पाश का भी मोचन कर दिया। ईश्वर-प्राप्ति होने पर सब पाश चले जाते हैं।
(महेन्द्र मुखर्जी आदि भक्तों से) “ईश्वर पर सब का मन नहीं लगता। आधारों की विशेषता होती है। संस्कार के रहने से होता है। नहीं तो बागबाजार में इतने आदमी थे, उनमें केवल तुम्हीं यहाँ कैसे आये?
“मलय-पर्वत की हवा के लगने पर सब पेड़ चन्दन के हो जाते हैं; सिर्फ पीपल, बट, सेमर, ऐसे ही कुछ पेड़ चन्दन नहीं बनते।
“तुम लोगों को रुपये-पैसे का कुछ अभाव थोड़े ही है। योगभ्रष्ट होने पर भाग्यवानों के यहाँ जन्म होता है, इसके पश्चात् फिर वह ईश्वर के लिए तपस्या करता है।”
महेन्द्र मुखर्जी – मनुष्य क्यों योगभ्रष्ट होता है?
श्रीरामकृष्ण – पूर्वजन्म में ईश्वर की चिन्ता करते हुए एकाएक भोग करने की लालसा हुई होगी। इस तरह होने पर योगभ्रष्ट हो जाता है। और दूसरे जन्म में फिर उसी के अनुसार जन्म होता है।
महेन्द्र – इसके बाद उपाय?
श्रीरामकृष्ण – कामना के रहते, भोग की लालसा के रहते, मुक्ति नहीं होती। इसलिए खाना-पहनना, रमण करना, यह सब कर लेना। (सहास्य) तुम क्या कहते हो? स्वकीया के साथ या परकीया के साथ?
मास्टर, मुखर्जी, ये लोग हँस रहे हैं।
(२)
श्रीमुख द्वारा कथित आत्मचरित
श्रीरामकृष्ण – भोग-लालसा का रहना अच्छा नहीं। इसीलिए मेरे मन में जो कुछ उठता था, मैं कर डालता था।
“बड़ा बाजार के रंगे सन्देश खाने की इच्छा हुई। इन लोगों ने मँगा दिया। मैंने खूब खाया, फिर बीमार पड़ गया!
“लड़कपन में गंगा नहाते समय, एक लड़के की कमर में सोने की करधनी देखी थी। इस अवस्था के बाद उस करधनी के पहनने की इच्छा हुई। परन्तु अधिक देर रख
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सकता ही न था, करधनी पहनी तो भीतर से सरसराकर हवा ऊपर की ओर चढ़ने लगी – देह में सोना छू गया न? जरा देर रखकर उसे खोल डाला। नहीं तो उसे तोड़ डालना पड़ता।
“धनियाखाली का कोईचूर (एक तरह की मिठाई), खानाकुल कृष्णनगर का सरभाजा (एक तरह की मिठाई) खाने की भी इच्छा हुई थी। (सब हँसते हैं।)
“शम्भू के चण्डी-गीत सुनने की इच्छा हुई थी। उसके सुन लेने के बाद फिर राजनारायण के चण्डी-गीतों के सुनने की इच्छा हुई। उसके गीतों को भी मैंने सुना।
“उस समय बहुत से साधु आते थे। इच्छा हुई कि उनकी सेवा के लिए एक अलग भण्डार किया जाय। सेजो बाबू ने वैसा ही किया। उसी भण्डार से साधुओं को सीधा, लकड़ी आदि सब दिया जाता था।
“एक बार जी में आया कि खूब अच्छा जरी का साज पहनूँ और चाँदी की गुड़गुड़ी में तम्बाकू पीऊँ। सेजो बाबू ने नया साज, गुड़गुड़ी सब भेज दिया। साज पहना, गुड़गुड़ी कितनी ही तरह से पीने लगा। एक बार इस ओर से, एक बार उस ओर से – खड़ा होकर और बैठकर। तब मैंने कहा, मन, देख ले, इसी का नाम है चाँदी की गुड़गुड़ी में तम्बाकू पीना। बस इतने से ही गुड़गुड़ी का त्याग हो गया। साज थोड़ी देर में खोल डाला – पैरों से उसे रौंदने लगा – कहा, इसी का नाम है साज! इसी पोशाक के कारण रजोगुण बढ़ता है।”
बलराम के साथ राखाल वृन्दावन में हैं। पहले-पहल वे वृन्दावन की बड़ी तारीफ करके चिट्ठी लिखते थे। मास्टर को चिट्ठी लिखी थी – ‘यह बड़ी अच्छी जगह है – मोर नाचते रहते हैं – और नृत्य गीत, सदा ही आनन्द होता है!’ इसके पश्चात् उन्हें बुखार आया, वृन्दावन का बुखार! श्रीरामकृष्ण को बड़ी चिन्ता रहती है। उनके लिए चण्डी के नाम पर उन्होंने मन्नत की है। श्रीरामकृष्ण राखाल की बातें कर रहे हैं – “यहाँ बैठकर पैर दबाते समय राखाल को पहले-पहल भाव हुआ था। एक भागवती पण्डित इस कमरे में बैठा हुआ भागवत की बातें कह रहा था। उन्हीं बातों को सुन-सुनकर राखाल सिहर-सिहर उठता था। इसके बाद वह बिलकुल स्थिर हो गया।
“दूसरी बार बलराम के घर में भाव हुआ था। भावावेश में लेट गया था।
“राखाल साकार की श्रेणी का है, निराकार की बात सुनकर उठ जायगा।
“उसके लिए मैंने चण्डी की मन्नत की। उसने घर-द्वार सब छोड़कर मेरा सहारा लिया था न? उसकी स्त्री के पास उसे मैं ही भेज दिया करता था, भोग कुछ बाकी रह गया था।
“वृन्दावन से इन्हें लिख रहा है, यह बड़ा अच्छा स्थान है – मोरों का नृत्य हुआ करता है। अब मोरों ने विपत्ति में डाल दिया।
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"वहाँ बलराम के साथ है। अहा, बलराम का क्या स्वभाव है! मेरे लिए उस देश में नहीं जाता। उसके भाई ने उसे मासिक व्यय देना बन्द कर दिया था और लिखा था - 'तुम यहाँ आकर रहो, वाहियात क्यों इतना रुपया खर्च करते हो!' परन्तु उसने उसकी बात नहीं सुनी, मुझे देखने के लिए।
"कैसा स्वभाव है! दिन-रात केवल देवताओं को लेकर रहता है। माली फूलों की माला बनाते ही रहते हैं। रुपये बचेंगे, इस विचार से दो महीने वृन्दावन में रहेगा। दो सौ का मुसहरा पाता है।
"लड़कों को क्यों प्यार करता हूँ? - उनके भीतर कामिनी और कांचन का प्रवेश अब तक नहीं हो पाया। मैं उन्हें नित्यसिद्ध देखता हूँ!
"नरेन्द्र जब पहले-पहल आया, एक मैली चादर ओढ़े हुए था, परन्तु उसका मुँह और उसकी आँखें देखकर जान पड़ता था कि उसके भीतर कुछ है। तब ज्यादा गाने न जानता था। दो एक गाने।
"जब आता था तब घर भर आदमी रहते थे, परन्तु मैं उसी की ओर नजर करके बातचीत करता था। जब वह कहता था - 'इससे भी बातचीत कीजिये' - तब दूसरे लोगों से बातचीत करता था।
"यदु मल्लिक के बगीचे में रोया करता था - उसे देखने के लिए मैं पागल हो गया था। यहाँ भोलानाथ का हाथ पकड़कर मैं रोने लगा! भोलानाथ ने कहा, एक कायस्थ के लड़के के लिए आपको इस तरह का रोना शोभा नहीं देता। मोटे ब्राह्मण ने एक दिन हाथ जोड़कर कहा - 'वह बहुत कम पढ़ा-लिखा है, उसके लिए भी आप इतना रोते हैं?'
"भवनाथ नरेन्द्र की जोड़ी है - दोनों जैसे पति-पत्नी। इसीलिए भवनाथ से मैंने नरेन्द्र के पास ही मकान भाड़े पर लेने को कहा। वे दोनों ही अरूप के दर्जे के हैं।
संन्यासियों का कठिन नियम। लोकशिक्षार्थ त्याग
"मैं लड़कों को मना कर देता हूँ जिससे वे औरतों के पास आया-जाया न करें।
"हरिपद एक घोषाल-औरत के फेर में पड़ा है। वह वात्सल्यभाव करती है। हरिपद बच्चा है, कुछ समझता तो है नहीं, मैंने सुना, हरिपद उसकी गोद में सोता है। और वह अपने हाथ से उसे भोजन कराती है। मैं उससे कह दूँगा, यह सब अच्छा नहीं। इसी वात्सल्यभाव से फिर हीन भाव पैदा हो जाते हैं।
"उन लोगों की वर्तमान साधना आदमी को लेकर की जाती है। आदमी को वे लोग श्रीकृष्ण समझती हैं। वे उसे 'रागकृष्ण' कहती हैं। गुरु पूछता है, 'रागकृष्ण' तुझे मिले? वे कहती हैं हाँ, मिले।
"उसी दिन वह औरत आयी थी। उसकी चितवन का ढंग मैंने देखा, अच्छा नहीं
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हैं। उसी के भावों में उससे कहा, हरिपद के साथ जैसा चाहो करो; परन्तु बुरा भाव न लाना।
“लड़कों की यह साधना की अवस्था है। इस समय केवल त्याग करना चाहिए। संन्यासियों को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। मैं उनसे कहता हूँ, स्त्री अगर भक्त भी हो तो भी उसके पास बैठकर बातचीत न करनी चाहिए। खड़े होकर चाहे कुछ कह लिया जाय। सिद्ध होने पर भी इसी तरह चलना पड़ता है – अपनी सावधानी के लिए भी और लोकशिक्षा के लिए भी। औरतों के आने पर मैं थोड़ी ही देर में कहता हूँ, तुम लोग जाकर देवताओं के दर्शन करो। इससे भी अगर वे न उठीं तो मैं खुद उठ जाता हूँ। मुझे देखकर दूसरे शिक्षा ग्रहण करेंगे।
“अच्छा, ये जो सब लड़के आ रहे हैं, इसका क्या अर्थ है? और तुम लोग जो आ रहे हो, इसका भी क्या अर्थ है? इसके (अपने को दिखाकर) भीतर कुछ है जरूर, नहीं तो आकर्षण फिर कैसे होता?
“उस देश में जब मैं हृदय के घर में था, मुझे वे लोग श्यामबाजार ले गये थे। मैं समझा, गौरांग के भक्त हैं यहाँ। गाँव में घुसने से पहले ही मुझे माँ ने दिखा दिया – साक्षात् गौरांग! फिर वहाँ इतना आकर्षण हुआ कि सात दिन और सात रात लोगों की भीड़ लगी रही। सदा ही कीर्तन और आनन्द मचा हुआ था। इतने आदमी आये कि चार-दीवार और पेड़ों पर भी आदमी चढ़कर बैठे थे।
“मैं नटवर गोस्वामी के यहाँ गया था। वहाँ रातदिन भीड़ लगी रहती। मैं वहाँ से भागकर एक ताँती (जुलाहे) के यहाँ सुबह को बैठा करता था। फिर देखा, थोड़ी ही देर में सब लोग वहाँ भी पहुँच गये थे। सब खोल-करताल ले गये। – फिर ‘तिरकिट्-तिरकिट्’ कर रहे थे। भोजन आदि तीन बजे होता था।
“चारों ओर अफवाह फैल गयी थी कि एक ऐसा आदमी आया है जो सात बार मरकर सातों बार जी उठता है। मुझे सर्दी-गर्मी न हो जाय इस डर से हृदय मुझे बाहर मैदान में घसीट ले जाता था। वहाँ फिर चींटियों की पाँत की तरह आदमी उमड़ चलते थे – फिर वही खोल-करताल और ‘तिरकिट’। हृदय ने खूब फटकारा, कहा – ‘क्या हम लोगों ने कभी कीर्तन सुना नहीं?’
“वहाँ के गोस्वामी झगड़ा करने के लिए आये थे। उन्होंने सोचा था कि ये लोग हमारा चढ़ाव हड़पने के लिए आये हैं। उन्होंने देखा, मैंने एक जोड़ा धोती तो क्या एक ताग सूत भी नहीं लिया। किसी ने कहा ब्रह्मज्ञानी है। इस पर गोस्वामी सब थाह लेने के लिए आये। एक ने पूछा, इनके माला, तिलक क्यों नहीं हैं? उन्हीं में से किसी ने कहा, नारियल का पत्ता आप ही निकलकर गिर गया है। नारियल के पत्तेवाली बात मैंने वहीं सीखी थी। ज्ञान के होने पर उपाधियाँ आप छूट जाती हैं।
“दूर के गाँवों से लोग आकर इकट्ठे होते थे। वे लोग रात को वहीं रहते थे। जिस
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घर में हम लोग थे, उसके आंगन में रात को औरतें सोई हुई थीं। लघुशंका करने के लिए बाहर जा रहा था, उन लोगों ने कहा, पेशाब यहीं (आंगन में ही) करो।
"आकर्षण किसे कहते हैं, यह मैं वहीं समझा था। ईश्वर की लीला में योगमाया की सहायता से आकर्षण होता है, एक तरह का जादू-सा चल जाता है।"
(३)
श्रीरामकृष्ण और श्री राधिका गोस्वामी
दोनों मुखर्जी भाइयों से बातचीत करते हुए दिन के तीन बज गये। श्रीयुत राधिका गोस्वामी ने आकर प्रणाम किया। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को पहली ही बार देखा है। उम्र तीस के भीतर होंगी। गोस्वामी ने आसन ग्रहण किया।
श्रीरामकृष्ण – क्या आप लोग अद्वैत-वंश के हैं? – खानदान का गुण तो होता ही है।
"अच्छे आम के पेड़ में अच्छे ही आम लगते हैं। (सब हँसे।) खराब आम नहीं होते। केवल मिट्टी के गुण से कुछ छोटे-बड़े हो जाते हैं। आपकी क्या राय है?"
गोस्वामी – (विनयपूर्वक) – जी, मैं क्या जानूँ?
श्रीरामकृष्ण – तुम कुछ भी कहो, दूसरे आदमी क्यों छोड़ने लगे?
"ब्राह्मण में चाहे लाख दोष हों परन्तु उसे भरद्वाज गोत्र और शाण्डिल्य गोत्र का समझकर लोग उसकी पूजा करते हैं। (मास्टर से) शंखचीलवाली बात जरा सुना तो दो।"
मास्टर चुपचाप बैठे हुए हैं। यह देखकर श्रीरामकृष्ण स्वयं कह रहे हैं –
"वंश में अगर महापुरुष का जन्म हुआ हो तो वे खींच लेंगे, चाहे लाख दोष भी हों। जब गंधर्वों ने कौरवों को बाँध लिया तब युधिष्ठिर ने उन्हें मुक्त कर दिया। जिस दुर्योधन ने इतनी शत्रुता की थी, जिसके लिए युधिष्ठिर को वनवास भी सहना पड़ा, उसी को उन्होंने मुक्त कर दिया।
"इसके सिवा भेष का भी आदर किया जाता है। भेष देखकर सत्य वस्तु की उद्दीपना होती है। चैतन्य देव ने गधे को भेष पहनाकर साष्टांग प्रणाम किया था।
"शंखचील (सफेद परवाली चील) को देखकर लोग प्रणाम क्यों करते हैं? कंस जब मारने के लिए चला था तब भगवती शंखचील का रूप धारण कर उड़ गयी थीं। इसलिए अब भी जब लोग शंखचील देखते हैं, तो उसे प्रणाम करते हैं।
"चानक के पलटन के भीतर अंग्रेज को आते हुए देखकर सिपाहियों ने सलाम किया। कुँवर सिंह ने मुझे समझाया कि अंग्रेजों का राज्य है, इसीलिए अंग्रेजों को सलामी दी जाती है।
"शाक्तों का तन्त्र मत है। वैष्णवों का पुराण मत। वैष्णव जो साधना करते हैं उसके
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कहने में दोष नहीं है। तान्त्रिक को सब कुछ गुप्त रखना पड़ता है। इसीलिए तान्त्रिक को अच्छी तरह कोई समझ नहीं सकता।
(गोस्वामी से) “आप लोग अच्छे हैं। कितना जप करते हैं? और हरिनाम की संख्या क्या है?”
गोस्वामी - (विनय भाव से) - जी, मैं क्या करता हूँ। मैं अत्यन्त अधम - नीच हूँ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - दीनता, यह अच्छा तो है। एक भाव और है - 'मैं उनका नाम ले रहा हूँ, मुझे फिर पाप कैसा!' जो लोग, दिन रात 'मैं पापी हूँ, मैं अधम हूँ' ऐसा किया करते हैं, वे वैसे ही हो जाते हैं। कितना अविश्वास है! उनका इतना नाम ले करके भी पाप-पाप कहता है!
गोस्वामी यह बात आश्चर्यचकित हो सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण - मैंने भी वृन्दावन में भेष (वैष्णवों का) धारण किया था। पन्द्रह दिन तक रखा था। (भक्तों से) सब भावों की उपासना कुछ-कुछ दिनों तक करता था। तब शान्ति होती थी।
(सहास्य) “मैंने सब तरह किया है - सब शास्त्रों को मानता हूँ। शाक्तों को भी मानता हूँ और वैष्णवों को भी। उधर वेदान्तवादियों को भी मानता हूँ। यहाँ इसीलिए सब मतों के आदमी आया करते हैं। और सब यही सोचते हैं कि ये हमारे मत के आदमी हैं। आजकल के ब्राह्म-समाजवालों को भी मानता हूँ।
“एक आदमी के पास एक रंग का गमला था। उस गमले में एक बड़े आश्चर्य का गुण यह था कि जिस किसी रंग में वह कपड़े रँगना चाहता था, उसी रंग में कपड़े रंग जाते थे।
“परन्तु किसी होशियार आदमी ने कहा, तुमने इसमें जो रंग घोला है वही रंग मुझे दो। (श्रीरामकृष्ण और सब हँसते हैं।)
“एक ही ढर्रे का मैं क्यों हो जाऊँ? 'अमुक मत के आदमी फिर न आयेंगे' मुझे इसका भय नहीं है। कोई आये चाहे न आये, मुझे इसकी जरा भी परवाह नहीं है। लोग मेरी मुट्ठी में रहेंगे, ऐसी कोई बात मेरे मन में है ही नहीं। अधर सेन ने बड़ी नौकरी के लिए माँ से कहने के लिए कहा था - उसको वह काम नहीं मिला। वह अगर इसके लिए कुछ सोचे तो मुझे इसकी जरा भी परवाह नहीं है।
“केशव सेन के घर जाने पर एक और भाव हुआ। वे लोग निराकार-निराकार किया करते हैं। इस पर, जब भावावेश हुआ तो मैंने कहा - माँ, यहाँ न आना, ये लोग तेरे रूप को नहीं मानते।”
साम्प्रदायिकता के विरोध की बात सुनकर गोस्वामीजी चुपचाप बैठे हुए हैं।
६२२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ सितम्बर, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – विजय इस समय बहुत अच्छा हो गया है।
“हरिनाम करते हुए जमीन पर गिर जाता है।
“प्रातः चार बजे तक कीर्तन और ध्यान, यह सब लेकर रहता है। इस समय गेरुआ पहने हुए है। देव-विग्रह देखता है तो एकदम साष्टांग प्रणाम करता है।
“जहाँ गदाधर* की पाठशाला थी वहाँ विजय को ले गया था और कहा, यहीं वे ध्यान करते थे। बस कहने के साथ ही उसने साष्टांग प्रणाम किया।
“चैतन्यदेव के चित्र के सामने फिर साष्टांग प्रणाम किया।”
गोस्वामी – राधाकृष्ण की मूर्ति के सामने ?
श्रीरामकृष्ण – साष्टांग प्रणाम! और बड़ा आचारी है।
गोस्वामी – अब समाज में लिया जा सकता है।
श्रीरामकृष्ण – लोग क्या कहेंगे, इसकी उसे कोई चिन्ता नहीं है।
गोस्वामी – ऐसे आदमी को प्राप्त कर समाज भी कृतार्थ हो सकता है।
श्रीरामकृष्ण – मुझे बहुत मानता है।
“उसे पाना ही मुश्किल हो रहा है। आज ढाके से बुलावा आता है तो कल किसी दूसरी जगह से; इस तरह सदा ही काम में उलझा रहता है।
“उसके समाजवालों में बड़ी गडबड़ी मची हुई है।”
गोस्वामी – क्यों?
श्रीरामकृष्ण – उसे लोग कह रहे हैं, तुम साकारवादियों के साथ मिल रहे हो, तुम पौत्तलिक हो।
“और बड़ा उदार और सरल है। सरल हुए बिना ईश्वर की कृपा नहीं होती।”
'गृहस्थ, आगे बढ़ो।' अभ्यासयोग
अब श्रीरामकृष्ण मुखर्जियों से बातचीत कर रहे हैं। महेन्द्र उनमें बड़े हैं, व्यवसाय करते हैं, किसी की नौकरी नहीं करते। छोटे प्रियनाथ इंजीनियर थे, अब उन्होंने कुछ धनोपार्जन कर लिया है, अब नौकरी नहीं करते। बड़े भाई की उम्र ३५-३६ के लगभग होगी। उनका मकान केडेटी मौजे में है। कलकत्ते के बागबाजार में भी उनका अपना मकान है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कुछ उद्दीपना हो रही है, यह देखकर चुप्पी न साध जाना। बढ़ जाओ! चन्दन की लकड़ी के बाद और भी चीजें हैं – चाँदी की खान – सोने की खान!
प्रिय – (सहास्य) – जी, पैरों में जो बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं, उनके कारण बढ़ा नहीं
* एक प्रसिद्ध वैष्णव साधु
१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६२३
१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६२३
जाता।
श्रीरामकृष्ण – पैरों के बन्धन से क्या होता है? बात असल मन की है।
“मन के द्वारा ही आदमी बँधा हुआ है और उसी के द्वारा छूटता भी है। दो मित्र थे। एक वेश्या के घर गया। दूसरा भागवत सुन रहा था। पहला सोच रहा था, मुझे धिक्कार है, मेरा मित्र भागवत सुन रहा है और मैं वेश्या के यहाँ पड़ा हुआ हूँ। उधर दूसरा सोच रहा था, मैं बड़ा बेवकूफ हूँ, मेरा मित्र तो मजा लूट रहा है और मैं यहाँ आकर फँस गया। पर देखो, वेश्या के यहाँ जानेवाले को तो विष्णुदूत आकर वैकुण्ठ में ले गये और दूसरे को यमदूतों ने नरक में घसीटकर डाल दिया।
प्रिय – मन मेरे बस में भी तो नहीं है।
श्रीरामकृष्ण – यह क्या! अभ्यासयोग – अभ्यास करो, फिर देखोगे मन को जिस ओर ले जाओगे, उसी ओर जायगा।
“मन धोबी के यहाँ का कपड़ा है। वहाँ से लाकर उसे लाल रंग से रँगो तो लाल हो जायगा और आसमानी से रँगो तो आसमानी। जिस रंग से रँगोगे वही रंग उस पर चढ़ जायगा।
(गोस्वामी से) “आपको कुछ पूछना तो नहीं है?”
गोस्वामी – (बड़े ही विनय भाव से) – जी नहीं, दर्शन हो गये, और सब बातें तो सुनता ही था।
श्रीरामकृष्ण – देवताओं के दर्शन करो।
गोस्वामी – (विनयपूर्वक) – कुछ महाप्रभु के गुणकीर्तन सुनना चाहता हूँ।
श्रीरामकृष्ण कीर्तन गाने लगे। कीर्तन के समाप्त हो जाने पर श्रीरामकृष्ण गोस्वामीजी से कह रहे हैं – यह तो आप लोगों के ढंग का हुआ। लेकिन अगर कोई शाक्त या घोषपाड़ा के मत का आदमी आ जाय तो मैं दूसरे ढंग के गाने गाऊँगा।
“यहाँ सब तरह के आदमी आते हैं – वैष्णव, शाक्त, कर्ताभजा, वेदान्तवादी और आजकल के ब्राह्म-समाजवाले आदि भी। इसलिए यहाँ सब तरह के भाव हैं।
“उन्हीं की इच्छा से अनेक धर्मों और मतों का चलन हुआ है।
“जिसे जो सह्य है उसे उन्होंने वही दिया है।
“जिसकी जैसी प्रकृति, जिसका जैसा भाव, वह उसे ही लेकर रहता है।
“किसी धार्मिक मेले में अनेक तरह की मूर्तियाँ पायी जाती हैं, और वहाँ अनेक मतों के आदमी जाते हैं। राधा-कृष्ण, हर-पार्वती, सीता-राम, जगह जगह पर भिन्न भिन्न मूर्तियाँ रखी रहती हैं। और हरएक मूर्ति के पास लोगों की भीड़ होती है। जो लोग वैष्णव हैं उनकी अधिक संख्या राधा-कृष्ण के पास खड़ी हुई है, जो शाक्त हैं, उनकी भीड़ हर-पार्वती के पास लगी है। जो रामभक्त हैं, वे सीताराम की मूर्ति के पास खड़े हुए हैं।
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“परन्तु जिनका मन किसी देवता की ओर नहीं है, उनकी और बात है। वेश्या अपने आशिक की झाडू से खबर ले रही है, ऐसी मूर्ति भी वहाँ बनायी जाती है। उस तरह के आदमी मुँह फैलाये हुए वही मूर्ति देखते और अपने मित्रों को चिल्लाते हुए उधर ही बुलाते भी हैं, कहते हैं – 'अरे वह सब क्या खाक देखते हो? इधर आओ जरा, यहाँ तो देखो!'”
सब हँस रहे हैं। गोस्वामी प्रणाम करके बिदा हुए।
(४)
संस्कार तथा तपस्या का प्रयोजन। साधु-सेवा
दिन के पाँच बजे हैं। श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले बरामदे में हैं। बाबूराम, लाटू, दोनों मुखर्जी भाई, मास्टर आदि भक्त उनके साथ हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर आदि से) – मैं क्यों एक ढर्रे का होऊँ? वे लोग वैष्णव हैं, बड़े कट्टर हैं, सोचते हैं, हमारा ही धर्म ठीक है, और सब वाहियात है। मैंने जो बातें सुनायी हैं, उनसे उसे चोट पहुँची होगी। (हँसते हुए) हाथी के सिर पर अंकुश मारा जाता है। कहते हैं, वहीं उसके सिर पर कोष (कोमलअंग) रहता है। (सब हँसे।)
श्रीरामकृष्ण लड़कों के साथ हँसी करने लगे।
दोनों मुखर्जी बरामदे से चले गये। बगीचे में कुछ देर टहलेंगे।
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – कहीं मुखर्जियों ने हमारी हँसी को बुरा तो नहीं मान लिया?
मास्टर – क्यों? कप्तान ने तो कहा था, आपकी अवस्था बालक की है। ईश्वर-दर्शन करने पर बालक की अवस्था हो जाती है।
श्रीरामकृष्ण – और बाल्य, कैशोर और युवा। कैशोर अवस्था में दिल्लगी-मजाक सूझता है। कभी कुछ मुँह से निकल जाता है। पर युवावस्था में सिंह की तरह लोकशिक्षा देता है।
“तुम उन्हें मेरी मानसिक अवस्था समझा देना।”
मास्टर – जी, मुझे समझाना न होगा। क्या वे जानते नहीं?
श्रीरामकृष्ण लड़कों के साथ आमोद-प्रमोद करते हुए एक भक्त से कह रहे हैं – “आज अमावास्या है, माँ के मन्दिर में जाना।”
सन्ध्या के बाद आरती का शब्द सुनायी दे रहा है। श्रीरामकृष्ण बाबूराम से कह रहे हैं – “चल रे, चल काली-मन्दिर में।” श्रीरामकृष्ण बाबूराम के साथ जा रहे हैं। साथ मास्टर भी हैं। हरीश बरामदे में बैठे हुए हैं, श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, जान पड़ता है, इसे भावावेश हो गया।
१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६२५
१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६२५
आँगन से जाते हुए श्रीरामकृष्ण ने जरा श्रीराधाकान्त की आरती देखी। फिर काली-मन्दिर की ओर जाने लगे। जाते ही जाते हाथ उठाकर जगन्माता को पुकारने लगे – “माँ – ओ – माँ – ब्रह्ममयी!” मन्दिर के चबूतरे पर मूर्ति के सामने पहुँचकर भूमिष्ठ हो माता को प्रणाम करने लगे। माता की आरती हो रही है। श्रीरामकृष्ण मन्दिर में प्रवेश कर चामर लेकर व्यजन करने लगे।
आरती समाप्त हो गयी। जो लोग आरती देख रहे हैं, सब ने एक ही साथ भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने मन्दिर के बाहर आकर प्रणाम किया। महेन्द्र मुखर्जी आदि भक्तों ने भी प्रणाम किया।
आज अमावस्या है। श्रीरामकृष्ण को पूर्ण मात्रा में भावावेश हो गया। बाबूराम का हाथ पकड़कर मतवाले की तरह झूमते हुए अपने कमरे में जा रहे हैं।
कमरे के पश्चिमवाले गोल बरामदे में एक बत्ती जला दी गयी है।
श्रीरामकृष्ण उसी बरामदे में जाकर जरा बैठे। ‘हरि ॐ’ ‘हरि ॐ’ ‘हरि ॐ’ कहते हुए अनेक प्रकार के तन्त्रोक्त बीज-मन्त्रों का भी उच्चारण कर रहे हैं।
कुछ देर पश्चात् कमरे में अपने आसन पर पूर्वांस्य होकर बैठे। भाव अभी भी पूर्ण मात्रा में हैं।
दोनों मुखर्जी भाई, बाबूराम आदि भक्त जमीन पर आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण भावावेश में माता से बातचीत कर रहे हैं। कहते हैं – ‘माँ, मैं कहूँ तब तू करे, यह भी कोई बात हैं? बातचीत करना क्या है – इशारा ही तो है। – कोई कहता है ‘मैं खाऊँगा’ – कोई कहता है, ‘जा, मैं न सुनूँगा।’
“अच्छा माँ, मान लो मैंने भले ही प्रकट रूप में यह न कहा हो कि मुझे भूख लगी है, तो क्या मुझे असल में भूख नहीं लगी है? क्या यह सम्भव है कि तुम केवल उसी की प्रार्थना सुनो जो जोर जोर से पुकारता है और उसकी न सुनो जो भीतर ही भीतर व्याकुलतापूर्वक प्रार्थना करता रहता है?
“तुम जो हो सो हो, फिर मैं क्यों बोलता हूँ, क्यों प्रार्थना करता हूँ?
“हाँ! जैसा कराती हो, वैसा करता हूँ।
“लो! सब गोलमाल हो गया! – क्यों विचार कराती हो?”
श्रीरामकृष्ण जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं। – भक्तगण आश्चर्यचकित हो सुन रहे हैं।
अब भक्तों पर श्रीरामकृष्ण की दृष्टि पड़ी।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – उन्हें प्राप्त करने के लिए संस्कार चाहिए। कुछ किये रहना चाहिए। तपस्या – वह इस जन्म में ही हो या उस जन्म में।
“द्रौपदी का जब वस्त्रहरण किया गया था तब उसका विकल होकर रोना
६२६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४
श्रीठाकुरजी ने सुना था, तभी उन्होंने दर्शन दिये। और कहा, तुमने अगर किसी को कभी वस्त्र दिया हो तो याद करो, उससे लज्जा का निवारण होगा। द्रौपदी ने कहा एक ऋषि नहा रहे थे, उनका कौपीन बह गया था, मैंने अपने कपड़े से आधा फाड़कर उन्हें दिया था। श्रीठाकुरजी ने कहा, तो अब तुम कोई चिन्ता न करो।”
मास्टर श्रीरामकृष्ण के आसन के पूर्व की तरफ पाँवपोश पर बैठे हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – तुम यह समझे?
मास्टर – जी, संस्कार की बात।
श्रीरामकृष्ण – एक बार कह तो जाओ, मैंने क्या कहा।
मास्टर – द्रौपदी नहाने गयी थी – आदि।
(हाजरा आये।)
(५)
क्या ईश्वर प्रार्थना सुनते हैं? साधना
हाजरा महाशय यहाँ दो साल से हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण की जन्म-भूमि कामारपुकुर के पास सिऊड़ ग्राम में पहले-पहल उनके दर्शन किये थे, सन् १८८० ई. में। इस मौजे में श्रीरामकृष्ण के भांजे श्रीयुत हृदय मुखोपाध्याय रहते हैं। उस समय श्रीरामकृष्ण हृदय के यहाँ रहते थे।
सिऊड़ के पास मरागोड़ मौजे में हाजरा महाशय रहते हैं। उनके कुछ जमीन-जायदाद भी हैं। स्त्री-परिवार और लड़के-बच्चे भी हैं। घरगृहस्थी का काम किसी तरह चल जाता है। कुछ ऋण भी है, लगभग हजार रुपया होगा।
यौवनकाल से ही उनमें वैराग्य का भाव है। साधु कहाँ है, भक्त कहाँ है, यही सब खोजते फिरते थे। जब पहले-पहल दक्षिणेश्वर काली-मन्दिर में आये और वहाँ रहना चाहा तब श्रीरामकृष्ण ने उनके भक्तिभाव को देखकर, और उन्हें अपने देश का परिचित मनुष्य जानकर, यत्नपूर्वक अपने पास रख लिया।
हाजरा का ज्ञानियों जैसा भाव है। श्रीरामकृष्ण का भक्तिभाव और लड़कों के लिए उनकी व्याकुलता उन्हें पसन्द नहीं। कभी कभी वे श्रीरामकृष्ण को महापुरुष सोचते हैं और कभी कभी साधारण आदमी।
वे श्रीरामकृष्ण के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में आसन लगाकर बैठे हैं। वहीं माला लेकर बड़ी देर तक जप किया करते हैं। राखाल आदि भक्त अधिक जप नहीं करते, इसलिए लोगों से वे उनकी निन्दा किया करते हैं।
वे आचार का पक्ष बहुत लेते हैं। ‘आचार-आचार’ करके उन्हें एक तरह शुचिता का रोग हो गया है। उनकी उम्र ३८ साल की होगी।
१९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६२७
१९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६२७
हाजरा महाशय कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण को फिर कुछ भावावेश हो गया है और उसी अवस्था में वे बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से) – तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक है। परन्तु पटरी ठीक नहीं बैठती।
“किसी की निन्दा न किया करो – एक कीड़े की भी नहीं। तुम खुद भी तो लोमस मुनि की बात कहते हो। जब भक्ति की प्रार्थना करोगे तब साथ ही यह भी कहा करो कि कभी मुझसे दूसरे की निन्दा न हो।”
हाजरा – (भक्ति की) – प्रार्थना करने पर वे सुनेंगे?
श्रीरामकृष्ण – एक सौ बार! – अगर प्रार्थना ठीक हो – आन्तरिक हो। विषयी आदमी जिस तरह बच्चे या स्त्री के लिए रोता है, उसी तरह ईश्वर के लिए कहाँ रोता है?
“उस देश में एक आदमी की स्त्री बीमार हो गयी। वह अच्छी न होगी, यह सोचकर वह आदमी थर थर काँपने लगा – बेहोश होने को आ गया था।
“इस तरह ईश्वर के लिए किसकी अवस्था होती है?”
हाजरा श्रीरामकृष्ण की पद-रेणु ले रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (संकुचित होकर) – यह सब क्या है?
हाजरा – जिनके पास मैं हूँ उनके श्रीचरणों की धूलि न लूँ?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर को तुष्ट करो, सब तुष्ट हो जायेंगे। ‘तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्।’ ठाकुरजी ने जब द्रौपदी का शाक खाकर कहा, मैं तृप्त हो गया हूँ, तब संसार भर के जीव तृप्त हो गये थे – गले तक भर गये थे – डकार लेने लगे थे। मुनियों के खाने से क्या संसार तुष्ट हुआ था – डकारें ली थीं?
“ज्ञानलाभ के बाद भी लोक-शिक्षा के लिए पूजा आदि कर्मों को लोग किया करते हैं।
“मैं काली-मन्दिर जाता हूँ, और इस कमरे के सब चित्रों को भी प्रणाम करता हूँ – इस तरह दूसरे भी प्रणाम करते हैं। फिर तो अभ्यास हो जाने पर मनुष्य से वैसा किये बिना रहा ही नहीं जाता।
“बटतल्ले के संन्यासी को मैंने देखा; उसने जिस आसन पर गुरु की पादुका रखी थी उसी पर शालग्राम भी रखा था और पूजा कर रहा था! मैंने पूछा, ‘अगर इतना ज्ञान हो गया है, तो इस तरह क्यों करते हो?’ उसने कहा, ‘सब कुछ किया जाता है, यह भी एक किया। कभी एक फूल इस पैर पर (गुरु के) चढ़ाया और कभी एक फूल उस पैर (शालग्राम) पर।’
“देह के रहते कोई कर्म छोड़ नहीं सकता – पंक रहते उससे बुलबुले उठेंगे ही।
(हाजरा से) “एक ज्ञान है तो अनेक का भी ज्ञान है।
६२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४
“केवल शास्त्र पढ़ने से क्या होगा? शास्त्रों में बालू और चीनी का-सा मेल है। उससे चीनी का अंश निकालना बड़ा मुश्किल है। इसीलिए शास्त्रों का मर्म गुरु के श्रीमुख से, साधु के श्रीमुख से सुन लेना चाहिए। तब फिर ग्रन्थों की क्या जरूरत है?
“चिट्ठी में खबर आई है, 'पाँच सेर सन्देश भेजियेगा – और एक धारीदार धोती।' चिट्ठी खो गयी, तब तुरन्त चारों ओर ढूँढ-तलाश होने लगी। बहुत कुछ खोजने के बाद कहीं चिट्ठी मिली। पढ़कर देखा, लिखा हैं – 'पाँच सेर सन्देश भेजियेगा और एक धारीदार धोती।' तब फिर उसने चिट्ठी फेंक दी। अब उसकी क्या जरूरत है? – अब तो सन्देश और धोती संग्रह करने से ही काम है।
(मुखर्जी, बाबूराम, आदि भक्तों से) “भलीभाँति खोज लेकर तब डूबो। तालाब में अमुक स्थान पर लोटा गिर गया है, जगह की ठीक जाँच करके डुबकी लगानी चाहिए।
“शास्त्रों का मर्म गुरु के श्रीमुख से सुनकर तब साधना की जाती है। यह साधना ठीक ठीक करने पर तब कहीं प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।
“डुबकी लगाओगे तब ठीक ठीक साधना होगी। बैठे बैठे शास्त्रों की बात पर केवल विचार करते रहने से क्या होगा? साधक को डुबकी लगानी चाहिए।
“अगर कहो कि डुबकी लगाने से भी तो मगर और घड़ियाल का डर हैं, – काम क्रोधादि का भय है, तो हल्दी लगाकर डुबकी लगाओ तो फिर वे पास न आ सकेंगे। विवेक और वैराग्य हल्दी हैं।”
(६)
पूर्व कथा। श्रीरामकृष्ण की पुराण, तन्त्र तथा वेद मत की साधना
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – उन्होंने मुझसे अनेक प्रकार की साधनाएँ करायीं। पहली पुराण मत की थी, फिर तन्त्र मत की थी, इसके बादवाली वेद मत की थी। पहले मैं पंचवटी में साधना करता था। वहाँ तुलसी-वन लगाया गया, मैं उसके भीतर बैठकर ध्यान करता था। कभी विकल होकर 'माँ-माँ' कहकर पुकारता था, कभी 'राम-राम' कहता था।
“जब 'राम-राम' कहता था, तब हनुमान के भाव में आकर एक पूँछ लगाकर बैठा रहता था – उन्माद की अवस्था थी। उस समय पूजा करते हुए मैं पीताम्बर पहनता था तो बड़ा आनन्द आता था। वह पूजा का ही आनन्द था।
“तन्त्र मत की साधना बेल के नीचे की थी। तब तुलसी का पेड़ और सहजन की फल्ली ये एक जैसे जान पड़ते थे।
“उस अवस्था में शिवानी की जूठन तमाम रात पड़ी रहती थी, साँप खाता था या कौन खाता था इसका कुछ ख्याल न था, वही जूठन मैं खाता था।
१९ सितम्बर, १८८४
परिच्छेद ११
६२९
“कभी कभी मैं कुत्ते पर चढ़कर उसे पूड़ियाँ खिलाता और उसकी जूठी पूड़ियाँ खुद खाता था। सर्वं विष्णुमयं जगत्।
“अविद्या का नाश बिना किये न होगा। इसलिए मैं बाघ बन जाता था और अविद्या को खा जाता था।
“वेदमत से साधना करते समय संन्यास लिया। उस समय चाँदनी में पड़ा रहता था। हृदय से कहता था, मैंने संन्यास लिया है, मेरे लिए चाँदनी में खाने को दे जाया करो।
(भक्तों से) “धरना दिया था। पड़ा हुआ मैं माँ से कहता था – मैं मूर्ख हूँ, तुम मुझे बतला दो, वेदों, पुराणों, तन्त्रों और शास्त्रों में क्या हैं।
“माँ ने कहा, 'वेदान्त का सार है ब्रह्म, उसी को सत्य और संसार को मिथ्या माना है। जिस सच्चिदानन्द ब्रह्म की बात वेदों में है, उन्हें तन्त्रों में ‘सच्चिदानन्दः शिवः’ कहते हैं। और पुराणों में उन्हें ही ‘सच्चिदानन्दः कृष्णः’ कहते हैं।
“दस बार गीता का उच्चारण करने पर जो कुछ होता है, वही गीता का सार है। अर्थात् त्यागी – त्यागी।
“उन्हें जब कोई प्राप्त कर लेता है, तब वेद, वेदान्त, पुराण, तन्त्र सब इतने नीचे पड़े रहते हैं कि कुछ कहना ही नहीं। (हाजरा से) ॐ का भी उच्चारण नहीं किया जा सकता; समाधि से जब मैं बहुत नीचे उतर आता हूँ, तब कहीं जरूर ॐ का उच्चारण कर सकता हूँ।
“प्रत्यक्ष दर्शन के पश्चात् जो-जो अवस्थाएँ शास्त्रों में लिखी हैं, वे सब मुझे हुई थीं। बालवत्, उन्मत्तवत्, पिशाचवत्, जड़वत्।
“और शास्त्रों में जैसा लिखा है, वैसा दर्शन भी होता था।
“कभी देखता था, तमाम संसार जलता हुआ अंगार है।
“कभी देखता था, चारों ओर पारे जैसा सरोवर – झिलमिल झिलमिल कर रहा है। और कभी गली हुई चाँदी की तरह देखता था।
“कभी देखता था मानो मसालेवाली सलाई का चारों ओर उजाला हो रहा है।
“इनसे शास्त्रों की बातें मिल जाती हैं।
“फिर दिखलाया, वे ही जीव हैं, वे ही जगत् हैं और चौबीसों तत्त्व भी वे ही हुए हैं। छत पर चढ़कर फिर सीढ़ियों से उतरना। अनुलोम और विलोम!
“उः! किस अवस्था में उसने रखा है! – एक अवस्था जाती है तो दूसरी आती है! जैसे ढेकी के वार। एक ओर नीचा होता है तो दूसरी ओर ऊँचा हो जाता है।
“जब अन्तर्मुख होकर समाधिलीन हो जाता हूँ, तब भी देखता हूँ, वे ही हैं और जब बाहरी संसार में मन आता है, तब भी देखता हूँ, वे ही हैं।
“जब आईने के इस ओर देखता हूँ, तब भी वे ही हैं और जब उस ओर देखता हूँ,
६३० श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४
तब भी वे ही हैं।”
दोनों मुखर्जी भाई और बाबूराम आदि आश्चर्यचकित हो श्रीरामकृष्ण की बातें सुन रहे हैं।
(७)
शम्भू मल्लिक की अनासक्ति। महापुरुष का आश्रय
श्रीरामकृष्ण – (मुखर्जी आदि से) – कप्तान की भी यथार्थ साधक जैसी अवस्था है।
“केवल ऐश्वर्य के रहने से ही मनुष्य की उसमें बिलकुल आसक्ति हो जाती है सो बात नहीं। शम्भू कहता था, 'हृदू! मैं बोरिया-बधना समेटकर चलने के लिए बैठा हुआ हूँ।' मैंने कहा, यह क्या अशुभ बातें बक रहे हो?
“तब शम्भू ने कहा, 'नहीं, कहो, यह सब फेंककर जैसे उनके पास पहुँच सकूँ।'
“उनके भक्त को किसी बात का भय नहीं है। भक्त उनका आत्मीय है। वे उसे खींच लेंगे। गन्धर्वों के हाथों दुर्योधन आदि के बँध जाने पर युधिष्ठिर ने ही उनका उद्धार किया था। कहा था, आत्मीयों की ऐसी अवस्था होने पर हमारे ही सर पर कलंक का टीका लगता है।”
रात के नौ बज चुके हैं। दोनों मुखर्जी भाई कलकत्ता लौटने के लिए तैयार हो रहे हैं। कमरे में और बरामदे में टहलते हुए श्रीरामकृष्ण ने सुना, विष्णु-मन्दिर में उच्च स्वर से संकीर्तन हो रहा है। उनके पूछने पर एक भक्त ने कहा, उनके साथ लाटू और हरीश भी गा रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, इतना (शोर) इसीलिए हो रहा है!
श्रीरामकृष्ण विष्णु-मन्दिर गये। साथ साथ भक्तगण भी गये। श्रीरामकृष्ण ने राधाकान्त को भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण ने देखा, ठाकुर-मन्दिर के ब्राह्मण जो पाककर्म करते हैं, नैवेद्य सजाते हैं, अतिथियों को प्रसाद परोसते हैं, वे तथा अन्य सब सेवक-टहलुए एकत्र होकर नामसंकीर्तन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने जरा देर खड़े रहकर उनका उत्साह बढ़ाया।
आँगन के बीच से लौटते समय उन्होंने भक्तों से कहा – “देखो, इनमें से कोई वेश्या के यहाँ जाता है और कोई बर्तन धोया करता है!”
कमरे में आकर श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। जो लोग संकीर्तन कर रहे थे, उन लोगों ने श्रीरामकृष्ण को आकर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “रुपये के लिए जिस तरह देह का पसीना बहाते हो उसी तरह उनका नाम लेकर नाच-कूद कर बहाना चाहिए।