श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२२ सितम्बर, १८८३
परिच्छेद ५३
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साक्षात् द्रोणाचार्य मानकर। इसी से वह धनुर्विद्या में सिद्ध हो गया!
“और तुम ब्राह्मण-पण्डितों को लेकर अधिक झमेला न किया करो। उन्हें चिन्ता है दो पैसे पाने की!”
“मैंने देखा है, ब्राह्मण स्वस्त्ययन करने आया है; चण्डीपाठ या और कुछ पाठ कर रहा है - पर आधे पन्ने वैसे ही उलटता जा रहा है। (सभी हँस पड़े।)
“अपनी हत्या एक छोटी नहरनी से भी हो सकती है। दूसरों को मारने के लिए ढाल-तलवार चाहिए। - शास्त्रग्रन्थादि का यही हेतु है।”
“बहुतसे शास्त्रों की भी कोई आवश्यकता नहीं है। यदि विवेक न हो तो केवल पाण्डित्य से कुछ नहीं होता, षट्शास्त्र पढ़कर भी कुछ नहीं होता। निर्जन में, एकान्त में, गुप्त रूप से रो-रोकर उन्हें पुकारो, वे ही सब कुछ कर देंगे।”
श्रीरामकृष्ण ने सुना है, ईशान भाटपाड़ा में पुरश्चरण करने के लिए गंगा के तट पर कुटिया बना रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (व्यग्र भाव से ईशान के प्रति) – क्यों जी, क्या कुटिया बन गयी? जानते हो, ये सब काम लोगों से जितने छिपे रहें, उतना ही अच्छा है। जो लोग सतोगुणी हैं, वे ध्यान करते हैं मन में, कोने में, वन में; कभी तो मच्छरदानी के भीतर ही बैठे ध्यान करते हैं।
हाजरा महाशय को ईशान बीच बीच में भाटपाड़ा ले जाते हैं। हाजरा महाशय छूतधर्मी की तरह आचरण करते हैं। श्रीरामकृष्ण ने उन्हें वैसा करने से मना किया था।
श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) – और देखो, अधिक छूतधर्म का आचरण मत करो। एक साधु को बड़ी प्यास लगी थी। भिश्ती जल लेकर जा रहा था; उसने साधु को जल देना चाहा। साधु ने कहा, 'क्या तुम्हारी मशक साफ है?' भिश्ती बोला, 'महाराज, मेरी मशक खूब साफ है! परन्तु आपकी मशक के भीतर मल-मूत्र आदि अनेक प्रकार के मैल हैं। इसलिए कहता हूँ, मेरी मशक से जल पीजिए, इससे दोष न लगेगा।' आपकी मशक अर्थात् आपकी देह, आपका पेट।
“और उनके नाम पर विश्वास रखो। तो फिर तीर्थ आदि की भी आवश्यकता न होगी।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण भाव में विभोर होकर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) – “यदि 'काली काली' कहते हुए मेरे शरीर का अन्त हो तो गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची आदि कौन चाहता है? जो तीनों समय काली का नाम लेता है, वह क्या पूजा-सन्ध्या चाहता है? सन्ध्या स्वयं उसकी खोज में रहकर भी पता नहीं पाती। कालीनाम के इतने गुण हैं कि कौन उसका पार पा सकता है। उन गुणों को देवाधिदेव महादेव पंचमुखों से गाते हैं। दया, व्रत, दान आदि और किसी में भी मन नहीं जाता, मदन
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का यज्ञ-याग ब्रह्ममयी के पादपद्म में है।”
ईशान सब सुनकर चुप होकर बैठे हैं।
बालक के समान विश्वास। जनक के समान, पहले साधन फिर संसार में ईश्वर लाभ।
श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) – और भी सन्देह हो तो पूछ लो।
ईशान – जी, आपने जो कहा है – विश्वास!
श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक विश्वास के द्वारा ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। और पूरा विश्वास करने पर और भी शीघ्र प्रगति होती है। गौ यदि चुन-चुनकर खाती है तो दूध कम देती है, सभी प्रकार के घास-पत्ते खाने पर वह अधिक दूध देती है।
“राजकृष्ण बनर्जी के लड़के ने एक कहानी सुनायी थी कि एक व्यक्ति को आदेश हुआ कि इस भेड़ में ही तू अपना इष्ट देखना। उसने इसी पर विश्वास किया। सर्वभूतों में वे ही विराजमान हैं।”
“गुरु ने भक्त से कह दिया कि राम ही घट घट में विराजमान हैं। भक्त का उसी समय विश्वास हो गया! जब देखा एक कुत्ता मुँह में रोटी लेकर भाग रहा है, तो भक्त घी का पात्र हाथ में लेकर पीछे पीछे दौड़ता है और कहता है, 'राम, थोड़ा ठहरो, रोटी में घी तो लगा दूँ!'
“अहा! कृष्णकिशोर का क्या ही विश्वास था! कहा करता था, ‘ॐ कृष्ण ॐ राम’ इस मन्त्र का उच्चारण करने पर करोड़ों सन्ध्या-वन्दन का फल होता है।”
“फिर मुझे कृष्णकिशोर कान में कहा करता था, 'कहना नहीं किसी से; मुझे सन्ध्या-पूजा अच्छी नहीं लगती।”
“मुझे भी वैसा ही होता है। माँ दिखा देती हैं कि वे ही सब कुछ बनी हुई हैं। शौच के बाद मैदान से आ रहा था पंचवटी की ओर, देखा साथ साथ एक कुत्ता आ रहा है; तब पंचवटी के पास आकर थोड़ी देर खड़ा रहा; सोचा, शायद माँ इसके द्वारा कुछ कहलाए!
“इसलिए जैसा तुमने कहा, विश्वास से ही सब कुछ मिलता है।”
ईशान – परन्तु हम तो गृहस्थाश्रम में हैं।
श्रीरामकृष्ण – क्या हानि है! उनकी कृपा होने पर असम्भव भी सम्भव हो जाता है। रामप्रसाद ने गाना गाया था, यह संसार धोखे की टट्टी है। उसका उत्तर किसी दूसरे ने एक दूसरे गाने में दिया था -
(भावार्थ) – “‘यह संसार आनन्द की कुटिया है। मैं खाता, पीता और आनन्द करता हूँ। जनक राजा बड़े तेजस्वी थे, उन्हें किस बात की कमी थी, वे तो दोनों ओर संभाले रखकर आनन्द से दूध पीते थे।’
“परन्तु पहले निर्जन में गुप्त रूप से साधन-भजन करके ईश्वर को प्राप्त करने के
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बाद संसार में रहने से मनुष्य 'जनक राजा' बन सकता है। नहीं तो कैसे होगा?
"देखो न, कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती सभी विद्यमान हैं, परन्तु शिव कभी समाधिस्थ, तो कभी 'राम राम' कहते हुए नृत्य कर रहे हैं।"
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दक्षिणेश्वर में राम आदि भक्तों के साथ
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ बैठे हैं। राखाल, मास्टर, राम, हाजरा आदि भक्तगण उपस्थित हैं। हाजरा महाशय बाहर के बरामदे में बैठे हैं। आज रविवार, २३ सितम्बर १८८३, भाद्रपदी कृष्ण सप्तमी है।
नित्यगोपाल, तारक आदि भक्तगण राम के घर पर रहते हैं। उन्होंने उन्हें आदर-सत्कार के साथ रखा है।
राखाल बीच बीच में अधर सेन के मकान पर जाया करते हैं। नित्यगोपाल सदा ही भाव में विभोर रहते हैं। तारक की भी स्थिति अन्तर्मुखी है। आजकल वे लोगों से विशेष वार्तालाप नहीं करते।
श्रीरामकृष्ण अब नरेन्द्र की बात कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (एक भक्त के प्रति) – आजकल नरेन्द्र तुम्हें भी 'लाईक' (like - पसन्द) नहीं करता। (मास्टर के प्रति) अधर के घर पर नरेन्द्र नहीं आया?
"एक साथ ही नरेन्द्र में कितने गुण हैं। गाने-बजाने में, लिखने-पढ़ने में, सभी में प्रवीण है। उस दिन यहाँ से कप्तान की गाड़ी से जा रहा था। गाड़ी में कप्तान भी बैठे थे। उन्होंने उससे अपने पास बैठने के लिए कितना कहा। पर नरेन्द्र अलग ही जाकर बैठा; कप्तान की ओर ताककर देखा तक नहीं।
"केवल पाण्डित्य से क्या होगा? साधन-भजन चाहिए, इन्देश का गौरी पण्डित विद्वान् था और साधक भी। शक्ति-साधक। माँ के भाव में कभी कभी पागल हो जाता था। बीच बीच में कह उठता था, 'हा रे रे रे, निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्!' उस समय सब पण्डित निष्प्रभ हो जाते थे। मैं भी भावाविष्ट हो जाता था। मेरा भोजन देखकर पूछता, 'तुमने भैरवी लेकर साधना की है?'
"एक कर्ताभजा सम्प्रदाय के पण्डित ने निराकार की व्याख्या करते हुए कहा, 'निराकार अर्थात् नीर का आकार!' यह व्याख्या सुनकर गौरी बहुत क्रुद्ध हुआ।
"पहले-पहल कट्टर शाक्त था; तुलसी का पत्ता दो लकड़ियों के सहारे उठाता था – छूता न था! (सभी हँसे।) इसके बाद घर गया। घर से लौट आने के पश्चात् फिर वैसा नहीं करता था।
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“मैंने कालीमन्दिर के सामने एक तुलसी का पौधा लगाया था। पर कुछ समय में वह सूख गया। कहते हैं, जहाँ पर बकरों की बलि होती है, वहाँ पर तुलसी नहीं रहती।”
“गौरी सभी बातों की सुन्दर व्याख्या करता था। रावण के दस सिरों के बारे में कहता था, दस इन्द्रियाँ! तमोगुण को कुम्भकर्ण, रजोगुण को रावण और सतोगुण को विभीषण कहता था। इसीलिए विभीषण ने राम को प्राप्त किया था।”
श्रीरामकृष्ण मध्याह्न के भोजन के बाद थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। कलकत्ते से राम, तारक (शिवानन्द) आदि भक्तगण आकर उपस्थित हुए। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर वे जमीन पर बैठ गए। मास्टर भी जमीन पर बैठे हैं। राम कह रहे हैं, “हम लोग मृदंग बजाना सीख रहे हैं।”
श्रीरामकृष्ण (राम के प्रति) – नित्यगोपाल ने भी कुछ सीखा है?
राम – जी नहीं, वह कुछ ऐसा ही मामूली बजा सकता है।
श्रीरामकृष्ण – और तारक?
राम – वह अच्छा बजा सकेगा।
श्रीरामकृष्ण – तो फिर वह मुँह उतना नीचा किए न रहेगा। किसी दूसरी ओर मन अधिक लगा देने पर फिर ईश्वर पर उतना नहीं रह जाता।
राम – मैं समझता हूँ, मैं जो सीख रहा हूँ, वह केवल संकीर्तन के लिए है।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – सुना है तुमने गाना सीखा है?
मास्टर (हँसकर) – जी नहीं, यों ही ऊँ आँ करता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – तुम वह गाना जानते हो? जानते हो? जानते हो तो गाओ न। ‘आर काज नाइ ज्ञानविचारे, दे माँ पागल करे।’*
देखो, यही मेरा असली भाव है।”
हाजरा को उपदेश – घृणा व निन्दा छोड़ दो
हाजरा महाशय कभी कभी किसी के सम्बन्ध में घृणा प्रकट करते थे।
श्रीरामकृष्ण (राम आदि भक्तों के प्रति) – कामारपुकुर में किसी मकान पर मैं अक्सर जाया करता था। उस घर के लड़के मेरी ही बराबरी के थे, वे लड़के उस दिन यहाँ आए थे और दो-तीन दिन रहे भी। हाजरा की तरह उनकी माँ सब से घृणा करती थी। अन्त में उसके पैर में न जाने क्या हो गया। पैर सड़ने लगा। कमरे में इतनी दुर्गन्ध हुई कि लोग अन्दर तक नहीं जा सकते थे।
“इसीलिए मैंने हाजरा से यह बात कही और उसे चेतावनी दे दी कि किसी की निन्दा न करो।”
* ‘अब मुझे ज्ञान-विचार से काम नहीं है, हे माँ, मुझे तू पागल बना दे।’
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दिन के चार बजे का समय हुआ। श्रीरामकृष्ण मुँह-हाथ धोने के लिए झाऊतल्ले की ओर गए। उनके कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में दरी बिछायी गयी। श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौटकर उस पर बैठे। राम आदि उपस्थित हैं। अधर सेन जाति के सुनार हैं। उनके घर राखाल ने अन्नग्रहण कर लिया, इसलिए रामबाबू ने कुछ कहा है। अधर परम भक्त हैं। यही बातें हो रही हैं।
एक भक्त हँसी हँसी में सुनारों में से किसी किसी के स्वभाव का वर्णन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं – स्वयं कोई राय प्रकट नहीं कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण की कर्मत्याग की स्थिति। जगन्माता के साथ वार्तालाप
सायंकाल हुआ। आँगन में उत्तर-पश्चिम के कोने में श्रीरामकृष्ण खड़े हैं, वे समाधिस्थ हैं।
काफी देर बाद उनका मन बाह्य जगत् में लौटा। श्रीरामकृष्ण की कैसी अद्भुत स्थिति है! आजकल प्रायः समाधिमग्न रहते हैं। थोड़े ही उद्दीपन से बाह्यज्ञानशून्य हो जाते हैं। जब भक्तगण आते हैं, तब थोड़ा वार्तालाप करते हैं; अन्यथा सदा ही अन्तर्मुख रहते हैं। अब पूजा, जप आदि नहीं कर सकते।
समाधि भंग होने के बाद खड़े खड़े ही जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ! पूजा गयी, जप गया। देखना माँ! कहीं जड़ न बना डालना। सेव्यसेवक-भाव में रखना माँ, जिससे बात कर सकू, तुम्हारा नाम-गुण – संकीर्तन और गान कर सकू। और शरीर में थोड़ा बल दो माँ! जिससे थोड़ा चलफिर सकूँ, जहाँ पर तुम्हारी कथा होती हो, जहाँ पर तुम्हारे भक्तगण हों, उन सब स्थानों में जा सकूँ।”
श्रीरामकृष्ण ने आज प्रातःकाल कालीमन्दिर में जाकर जगन्माता के श्रीचरणकमलों पर पुष्पांजलि अर्पण की है। वे फिर जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “माँ! आज सबेरे चरणों में दो फूल चढ़ाए। सोचा, अच्छा हुआ, फिर बाह्य पूजा की ओर मन जा रहा है! पर माँ, फिर ऐसा क्यों हुआ? फिर जड़ की तरह क्यों बना डाल रही हो?”
भाद्रपद कृष्णा सप्तमी। अभी तक चन्द्रमा का उदय नहीं हुआ। रात्रि तमसाच्छन्न है। श्रीरामकृष्ण अभी भावाविष्ट हैं, इसी स्थिति में अपने कमरे के छोटे तख्त पर बैठे। फिर जगन्माता के साथ बात कर रहे हैं।
अब सम्भवतः भक्तों के सम्बन्ध में माँ से कुछ कह रहे हैं। ईशान मुखोपाध्याय की बात कह रहे हैं। ईशान ने कहा था, 'मैं भाटपाड़ा में जाकर गायत्री का पुरश्चरण करूँगा।' श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा था कि कलियुग में वेदमत नहीं चलता; जीव अन्नगतप्राण हैं, आयु कम है, देहबुद्धि, विषयबुद्धि सम्पूर्ण नष्ट नहीं होती। इसीलिए ईशान को मातृभाव
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से तन्त्रमत के अनुसार साधना करने का उपदेश दिया था, और ईशान से कहा था, 'जो ब्रह्म हैं, वही माँ, वही आद्याशक्ति हैं।'
श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर कह रहे हैं, “फिर गायत्री का पुरश्चरण! इस छत पर से उस छत पर कूदना! किसने उससे ऐसी बात कही है? अपने ही मन से कर रहा है। अच्छा, थोड़ा पुरश्चरण करेगा।”
(मास्टर के प्रति) – “अच्छा, मुझे यह सब क्या वायु के विकार से होता है अथवा भाव से?”
मास्टर विस्मित होकर देख रहे हैं कि श्रीरामकृष्ण जगन्माता के साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे हैं। वे विस्मित होकर देख रहे हैं, ईश्वर हमारे अति निकट, बाहर तथा भीतर हैं। अत्यन्त निकट हुए बिना श्रीरामकृष्ण धीरे धीरे उनके साथ बातचीत कैसे कर रहे हैं?
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मास्टर के प्रति उपदेश
(१)
पण्डित और साधु में अन्तर। कलियुग में नारदीय भक्ति
आज बुधवार है; भाद्रपद की कृष्णा दशमी, २६ सितम्बर, १८८३ ई.। बुधवार को भक्तों का समागम कम होता है, क्योंकि सब अपने काम में लगे रहते हैं। प्रायः रविवार को समय मिलने पर भक्तगण श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आते हैं। मास्टर को स्कूल से आज डेढ़ बजे छुट्टी मिल गयी है। तीन बजे वे दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में श्रीरामकृष्ण के पास पहुँचे। इस समय श्रीरामकृष्ण के पास प्रायः राखाल और लाटू रहते हैं। आज दो घण्टे पहले किशोरी आए हुए हैं। कमरे के भीतर श्रीरामकृष्ण छोटे तख्त पर बैठे हुए हैं। मास्टर ने आकर भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने कुशल-प्रश्न पूछकर नरेन्द्र की बात चलायी।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – क्यों जी, क्या नरेन्द्र से भेंट हुई थी? (सहास्य) नरेन्द्र ने कहा है, 'वे अब भी कालीमन्दिर जाया करते हैं; जब ठीक ज्ञान हो जाएगा तब फिर वे कालीमन्दिर में नहीं जाएँगे।'
“कभी कभी वह यहाँ आता है, इसलिए उसके घरवाले बहुत नाराज हैं। उस दिन यहाँ गाड़ी पर चढ़कर आया था। गाड़ी का किराया सुरेन्द्र ने दिया था। इस पर नरेन्द्र की बुआ सुरेन्द्र के यहाँ लड़ने गयी थी।”
श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र की बात कहते हुए उठे। बातचीत करते हुए उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में जाकर खड़े हुए। वहाँ हाजरा, किशोरी, राखाल आदि भक्तगण हैं। तीसरे पहर का समय है।
श्रीरामकृष्ण – वाह, तुम तो आज खूब आ गए! क्यों, स्कूल नहीं है क्या?
मास्टर – आज डेढ़ बजे छुट्टी हो गयी थी।
श्रीरामकृष्ण – इतनी जल्दी क्यों?
मास्टर – विद्यासागर स्कूल देखने गए थे। स्कूल विद्यासागर का है, इसीलिए उनके आने पर लड़कों को आनन्द मनाने के लिए छुट्टी दी जाती है।
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श्रीरामकृष्ण – विद्यासागर सच बात क्यों नहीं कहता?
“सत्य बोलता रहे और परायी स्त्री को माता जाने, इन दो बातों से अगर राम न मिलें, तो तुलसीदास कहते हैं, मेरी बातों को झूठ समझो। सत्यनिष्ठ रहने से ही ईश्वर मिलते हैं। विद्यासागर ने उस दिन कहा था यहाँ आऊँगा, परन्तु फिर न आया।”
“पण्डित और साधु में बड़ा अन्तर है। जो केवल पण्डित है, उसका मन कामिनी-कांचन पर है। साधु का मन श्रीभगवान् के पादपद्मों में रहता है। पण्डित कहता कुछ है और करता कुछ है। साधु की बात जाने दो। जिनका मन ईश्वर के चरणारविन्दों में लगा रहता, है, उनके कर्म और उनकी बातें और ही होती हैं। काशी में मैंने एक नानकपन्थी लड़का साधु देखा था। उसकी आयु तुम्हारे इतनी होगी। मुझे ‘प्रेमी साधु’ कहता था। काशी में उनका मठ है। एक दिन मुझे वहाँ न्यौता देकर ले गया। महन्त को देखा जैसे एक गृहिणी। उससे मैंने पूछा, ‘उपाय क्या है?’ उसने कहा, ‘कलियुग में नारदीय भक्ति चाहिए।’ पाठ कर रहा था, पाठ के समाप्त होने पर कहा – ‘जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके। सर्वं विष्णुमयं जगत्।’ सब के अन्त में कहा, ‘शान्तिः! शान्तिः! प्रशान्तिः!’”
कलियुग में वेदमत नहीं
“एक दिन उसने गीतापाठ किया। हठ और दृढ़ता भी ऐसी कि विषयी आदमियों की ओर होकर न पढ़ता था। मेरी ओर होकर उसने पढ़ा। मथुरबाबू भी थे। उनकी ओर पीठ फेरकर पढ़ने लगा। उसी नानकपन्थी साधु ने कहा था, ‘उपाय है नारदीय भक्ति’।”
मास्टर – वे साधु क्या वेदान्तवादी नहीं हैं?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वे लोग वेदान्तवादी हैं, परन्तु भक्तिमार्ग भी मानते हैं। बात यह है कि अब कलिकाल में वेदमत नहीं चलता। एक ने कहा था, ‘मैं गायत्री का पुरश्चरण करूँगा।’ मैंने कहा, ‘क्यों? – कलि के लिए तो तन्त्रोक्त मत है। क्या तन्त्रोक्त मत से पुरश्चरण नहीं होता?’
“वैदिक कर्म बड़ा कठिन है। तिस पर फिर दासत्व करना। ऐसा भी लिखा है कि बारह साल या इसी तरह कुछ दिन दासता करते रहने पर मनुष्य दास ही बन जाता है। इतने दिनों तक जिनकी दासता की, उन्हीं की सत्ता उसमें आ जाती है। उनका रज, तम, जीवहिंसा, विलास, ये सब आ जाते हैं – उनकी सेवा करते हुए। केवल दासता ही नहीं, ऊपर से पेन्शन भी खाता है!
“एक वेदान्ती साधु आया था। मेघ देखकर नाचता था। आँधी और पानी देखकर उसे बड़ा आनन्द मिलता था। उसके ध्यान के समय अगर कोई उसके पास जाता था तो वह बहुत नाराज होता था। एक दिन मैं गया। जाने पर वह बहुत ही उकताया। वह सदा
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| ३१६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २६ सितम्बर, १८८३ |
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विचार करता था, 'ब्रह्म सत्य हैं, संसार मिथ्या।' माया के कारण अनेक रूप दिखायी दे रहे हैं, इसी विचार से वह रोशनी के झाड़ की कलम लिए फिरता था। झाड़ की कलम से देखो तो कितने ही रंग दीख पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में रंग कोई भी नहीं है। उसी तरह ब्रह्म के सिवाय और कुछ भी नहीं हैं, परन्तु माया और अहंकार के कारण अनेक रूप दिखायी दे रहे हैं। किसी चीज को वह एक बार से अधिक न देखता था, जिससे कहीं माया न लग जाय आसक्ति न हो जाय। नहाते समय पक्षी को उड़ते हुए देखकर वह विचार करता था। हम दोनों एक साथ जंगल जाते थे। उसने जब यह सुना कि तालाब मुसलमानों का है तब उसमें से जल नहीं लिया। हलधारी ने उससे व्याकरण के प्रश्न किए; वह व्याकरण जानता था। व्यंजनवर्णों की बात हुई। तीन दिन यहाँ ठहरा था। एक दिन गंगाजी के किनारे पर शहनाई की आवाज सुनकर उसने कहा, जिसे ब्रह्मदर्शन होता है उसे इस तरह की आवाज सुनकर समाधि हो जाती है।”
(२)
दक्षिणेश्वर में गुरु श्रीरामकृष्ण। परमहंस-अवस्था
श्रीरामकृष्ण साधुओं की बात कहते हुए परमहंस की अवस्था बतलाने लगे। वही बालक की-सी चाल। मुँह पर हँसी जैसे एकदम फूट-फूटकर निकल रही है। कमर में कपड़ा नहीं, दिगम्बर; आँखें आनन्दसागर में तैरती हुई। श्रीरामकृष्ण फिर छोटे तख्त पर जा बैठे, फिर वही मन को मुग्ध कर देनेवाली बातें होने लगीं।
श्रीरामकृष्ण (मणि से) – मैंने न्यांगटा (तोतापुरी) से वेदान्त सुना था। 'ब्रह्म सत्य है, संसार मिथ्या है।' बाजीगर आकर कितने ही तमाशे दिखाता है, आम के पौधे में आम भी लग जाता है। परन्तु है यह सब तमाशा। तमाशा दिखानेवाला बाजीगर ही सत्य है।
मणि – जीवन जैसे एक लम्बी नींद है! इतना ही समझता हूँ कि सब ठीक ठीक नहीं देख रहा हूँ। जिस मन से मैं आकाश को नहीं समझता, उसी मन से संसार को देख रहा हूँ न? अतएव देखना किस तरह से ठीक होगा?
श्रीरामकृष्ण – एक तरह और है। आकाश को हम लोग ठीक नहीं देख रहे, जान पड़ता है वह जमीन से मिला हुआ है। अतएव आदमी सत्य कैसे देखे? भीतर विकार जो है।
श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से गाने लगे।
(भावार्थ) – “हे शंकरि यह कैसा विकार है? तुम्हारी कृपा-औषधि मिलने पर ही यह दूर होगा। ...”
“विकार तो है ही। देखो न, संसारी जीव आपस में लड़ते हैं, परन्तु जिस आधार पर लड़ते हैं वह बेजड़ है। लड़ाई भी कैसी! तेरा यह हो, तेरा वह हो। कितनी चिल्लाहट
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२६ सितम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५५ | ३१७
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और गालीगलौज!”
मणि – मैंने किशोरी से कहा था, छूछे सन्दूक में है कुछ भी नही, परन्तु आदमी खींचातानी कर रहे हैं, रुपये हैं, यह समझकर।
“अच्छा, यह देह ही तो कुल अनर्थों का कारण है। यही सब देखकर ज्ञानी सोचते हैं, इस गिलाफ को छोड़ें तो जी बचे।”
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर की ओर जा रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – क्यों? इस संसार को धोखे की टट्टी कहा है तो इसे आनन्द की कुटिया भी तो कहा है! देह रही भी तो क्या? संसार आनन्द की कुटिया भी तो हो सकता है।
मणि – निरवच्छिन्न आनन्द यहाँ कहाँ है?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है।
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के सामने आए। माता को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। मणि ने भी प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के सामने चबूतरे पर बिना किसी आसन के कालीमाता की ओर मुँह किए बैठे हुए हैं। केवल लाल धारीदार धोती पहने हैं। उसका कुछ हिस्सा पीठ पर पड़ा है और कुछ कन्धे पर। पीछे नाटमन्दिर का एक स्तम्भ है। पास ही मणि बैठे हैं।
मणि – यही अगर हुआ तो देहधारण की फिर क्या आवश्यकता है? देख तो यह रहा हूँ कि कुछ कर्मों का भोग करने के लिए ही देह धारण करना होता है। वह क्या कर रहा है वही जाने। बीच में हम लोग पिस रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – चना अगर विष्ठा पर पड़ जाए तो भी उससे चने का ही पौधा निकलता है।
मणि – फिर भी अष्ट-बन्धन तो हैं ही।
सच्चिदानन्दही गुरू उनकी कृपा से ही मुक्ति
श्रीरामकृष्ण – अष्ट बन्धन नहीं, अष्टपाश हैं तो इससे क्या? उनकी कृपा होने पर एक क्षण में अष्टपाश छूट सकते हैं, जिस तरह कि हजार साल के अँधेरे कमरे में दीपक ले जाने पर एक क्षण में अँधेरा दूर हो जाता है, थोड़ा थोड़ा करके नहीं जाता। बाजीगर का एक खेल तुमने देखा है? कितनी ही गाँठ लगी रस्सी का एक छोर वह एक जगह बाँध देता है और दूसरा छोर अपने हाथ से पकड़े रहता है। उसने रस्सी को हिलाया नहीं कि सब ग्रन्थियाँ एक साथ खुल गयीं। परन्तु दूसरा आदमी चाहे लाख उपाय करे, उसे खोल नहीं सकता। श्रीगुरु की कृपा से सब ग्रन्थियाँ एक क्षण में ही खुल जाती हैं।
“अच्छा, केशव सेन इतना बदल कैसे गया? – बताओ तो। परन्तु यहाँ खूब
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३१८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८३
आता था। यहीं से नमस्कार करना सीखा था। एक दिन मैंने कहा, साधुओं को इस तरह से नमस्कार नहीं करना चाहिए। एक दिन ईशान के साथ मैं गाड़ी पर कलकत्ता जा रहा था। उसने मुझसे केशव सेन की सब बातें सुनीं। हरीश अच्छा कहता है – यहाँ से सब चेक पास करा लेने होंगे, तब बैंक में रुपये मिलेंगे।” (सब हँसते हैं।)
मणि निर्वाक् रहकर सब बातें सुन रहे हैं। उन्होंने समझा, गुरु के रूप में सच्चिदानंद स्वयं चेक पास करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – विचार न करना। उन्हें कौन जान सकता है? न्यांगटा कहता था, मैंने सुन रखा है, उन्हीं के एक अंश से यह ब्रह्माण्ड बना है।
“हाजरा में बड़ी विचारबुद्धि है। वह हिसाब करता है, इतने में संसार हुआ और इतना बाकी रह गया! उसका हिसाब सुनकर मेरा माथा ठनकने लगता है। मैं जानता हूँ, मैं कुछ नहीं जानता। कभी तो उन्हें अच्छा सोचता हूँ और कभी उन्हें बुरा मानता हूँ। उनको मैं क्या समझूँगा?”
मणि – जी हाँ, क्या कोई उन्हें समझ सकता है? जिसकी जैसी बुद्धि है, उतनी ही से वह सोचता है, मैं सब कुछ समझ गया। आप जैसा कहते हैं, एक चींटी चीनी के पहाड़ के पास गयी थी, उसका जब एक ही दाने से पेट भर गया तब उसने कहा, अब की बार आऊँगी तो पहाड़ का पहाड़ उठा ले जाऊँगी!
क्या ईश्वर को जाना जा सकता है? उपाय – शरणागति
श्रीरामकृष्ण – उन्हें कौन जान सकता है? मैं जानने की चेष्टा भी नहीं करता। मैं केवल माँ कहकर पुकारता हूँ। माँ चाहे जो करें। उनकी इच्छा होगी तो वे समझाएँगी और न इच्छा होगी तो न समझाएँगी। इससे क्या है? मेरा स्वभाव बिल्ली के बच्चे की तरह है। बिल्ली का बच्चा केवल ‘मिऊँ मिऊँ’ करके पुकारता है। इसके बाद उसकी माँ जहाँ रखती है वहीं रहता है। कभी कण्डौरे में रखती है और कभी बाबूसाहब के बिस्तरे पर। छोटा बच्चा बस माँ को ही चाहता है। माता का कितना ऐश्वर्य है, वह नहीं जानता। जानना भी नहीं चाहता। वह जानता है, मेरे माँ है, मुझे क्या चिन्ता है? नौकरानी का लड़का भी जानता है, मेरे माँ है। बाबू के लड़के के साथ अगर लड़ाई हो जाती है तो वह कहता है, ‘मैं अपनी माँ से कह दूँगा। मेरे माँ है कि नहीं?’ मेरा भी सन्तान-भाव है।
श्रीरामकृष्ण अकस्मात् अपने को दिखाकर, अपनी छाती में हाथ लगाकर, मणि से कहते हैं – “अच्छा, इसमें कुछ है – तुम क्या कहते हो?”
मणि निर्वाक् भाव से श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। शायद सोच रहे हैं – श्रीरामकृष्ण के हृदय में साक्षात् जगन्माता हैं। क्या जीवों के कल्याण के लिए माँ स्वयं देह धारण कर आयी हुई हैं?
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
२६ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५५ ३१९
(३)
साकार-निराकार। कर्तव्यबुद्धि
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में कालीमन्दर के सामने चबूतरे पर बैठे हैं। कालीप्रतिमा में जगन्माता के दर्शन कर रहे हैं। पास ही मास्टर आदि भक्तगण बैठे हैं।
थोड़ी देर पहले श्रीरामकृष्ण ने कहा है, “ईश्वर के सम्बन्ध में अनुमान आदि लगाना व्यर्थ है। उनका ऐश्वर्य अनन्त है। बेचारा मनुष्य मुँह से क्या प्रकट कर सकेगा! एक चींटी ने चीनी के पहाड़ के पास जाकर चीनी का एक कण खाया। उसका पेट भर गया। तब वह सोचने लगी, ‘अब की बार आऊँगी तो पूरे पहाड़ को अपने बिल में उठा ले जाऊँगी!’
“उन्हें क्या समझा जा सकता है? इसीलिए मेरा बिल्ली के बच्चे का-सा भाव है। माँ जहाँ भी रख दे, मैं कुछ नहीं जानता। छोटे बच्चे नहीं जानते, माँ का कितना ऐश्वर्य है!”
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के चबूतरे पर बैठे स्तुति कर रहे हैं, - “ओ माँ! ओ माँ ओंकाररूपिणि! माँ! ये लोग कितना सब वर्णन करते हैं, माँ! - कुछ समझ नहीं सकता! कुछ नहीं जानता हूँ, माँ! शरणागत! शरणागत! केवल यही करो माँ! जिससे तुम्हारे श्रीचरणकमलों में शुद्धा भक्ति हो! अब और अपनी भुवनमोहिनी माया में मोहित न करो माँ! शरणागत! शरणागत!”
मन्दिर में आरती हो गयी। श्रीरामकृष्ण कमरे में छोटे तख्त पर बैठे हैं। महेन्द्र जमीन पर बैठे हैं।
महेन्द्र पहले-पहल श्री केशव सेन के ब्राह्मसमाज में हमेशा जाया करते थे। श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के बाद फिर वहाँ नहीं जाते हैं। श्रीरामकृष्ण सदा जगन्माता के साथ वार्तालाप करते हैं यह देखकर वे बड़े विस्मित हुए हैं और उनकी सर्वधर्मसमन्वय की बात सुनकर तथा ईश्वर के लिए उनकी व्याकुलता को देखकर वे मुग्ध हो गए हैं।
महेन्द्र लगभग दो वर्ष से श्रीरामकृष्ण के पास आया-जाया करते हैं और उनका दर्शन तथा कृपा प्राप्त कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें तथा अन्य भक्तों से सदा ही कहते हैं, “ईश्वर निराकार और फिर साकार भी हैं। भक्त के लिए वे देह धारण करते हैं।” जो लोग निराकारवादी हैं उनसे वे कहते हैं, “तुम्हारा जो विश्वास है उसे ही रखो। परन्तु यह जान लेना कि उनके लिए सभी कुछ सम्भव है। साकार और निराकार ही क्या, वे और भी बहुत कुछ बन सकते हैं।”
श्रीरामकृष्ण (महेन्द्र के प्रति) - तुमने तो एक को पकड़ लिया है - निराकार!
महेन्द्र - जी हाँ, परन्तु जैसा कि आप कहते हैं, सभी सम्भव है। साकार भी सम्भव है।
३२० श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८३
श्रीरामकृष्ण – बहुत अच्छा, और यह भी जानो कि वे चैतन्य रूप में चराचर विश्व में व्याप्त हैं।
महेन्द्र – मैं समझता हूँ कि वे चेतन के भी चेतयिता हैं।
श्रीरामकृष्ण – अब उसी भाव में रहो। खींचतान करके भाव बदलने की आवश्यकता नहीं है। धीरे धीरे जान सकोगे कि वह चेतनता उन्हीं की चेतनता है। वे ही चैतन्यस्वरूप हैं।
“अच्छा, तुम्हारा धन-दौलत पर मोह है?”
महेन्द्र – जी नहीं! परन्तु हाँ, इतना अवश्य सोचता हूँ कि निश्चिन्त होने के लिए – निश्चिन्त होकर भगवान् का चिन्तन करने के लिए धन की आवश्यकता होती है।
श्रीरामकृष्ण – वह तो होगी ही!
महेन्द्र – क्या यह लोभ है? मैं तो ऐसा नहीं समझता।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक है। नहीं तो तुम्हारे बच्चों को कौन देखेगा?
“यदि तुम्हें 'मैं अकर्ता हूँ' यह ज्ञान हो जाए तो फिर तुम्हारे लड़कों का क्या होगा?”
महेन्द्र – सुना है, कर्तव्य का बोध रहते ज्ञान नहीं होता। कर्तव्य मानो प्रखर सूर्य है।
श्रीरामकृष्ण – अब उसी भाव में रहो। इसके बाद जब यह कर्तव्यबुद्धि स्वयं ही चली जाएगी तब फिर दूसरी बात है।
सभी थोड़ी देर चुप रहे।
महेन्द्र – केवल थोड़ा ही ज्ञानलाभ होने से तो संसार और भी कष्टप्रद है। यह तो ऐसा होता है मानो होशसहित मृत्यु। जैसे – हैजा!
श्रीरामकृष्ण – राम! राम!
सम्भवतः इस कथन से महेन्द्र का तात्पर्य यह है कि मृत्यु के समय होश रहने पर अत्यधिक यन्त्रणा का अनुभव होता है, जैसे हैजे में होता है। थोड़े ज्ञानवाले का सांसारिक जीवन बड़ा दुःखमय होता है; क्योंकि वह यह समझ गया है कि संसार भ्रमात्मक है। अविद्या का संसार मानो दावाग्नि के सदृश है। सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण 'राम! राम!' कह रहे हैं!
महेन्द्र – और दूसरी श्रेणी के लोग, जो पूर्ण अज्ञानी हैं, वे मानो मियादी बुखार से पीड़ित हैं। वे मृत्यु के समय बेहोश हो जाते हैं और इससे उन्हें मृत्यु की यन्त्रणा का अनुभव नहीं होता।
श्रीरामकृष्ण – देखो न, धन रहने से भी क्या! जयगोपाल सेन कितने धनी हैं, परन्तु हैं दुःखी, लड़के उन्हें उतना नहीं मानते।
२६ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५५ ३२१
२६ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५५ ३२१
महेन्द्र – संसार में क्या केवल निर्धनता ही दुःख है? इसके अतिरिक्त छः रिपु भी हैं और फिर उनके ऊपर रोग-शोक।
श्रीरामकृष्ण – फिर मान-मर्यादा, लोकमान्य बनने की इच्छा।
“अच्छा, मेरा क्या भाव है?”
महेन्द्र – नींद खुल जाने पर मनुष्य का जो भाव होता है वही। उसे स्वयं का होश आ जाता है। ईश्वर के साथ सदा योग है।
श्रीरामकृष्ण – तुम मुझे स्वप्न में देखते हो?
महेन्द्र – हाँ, कई बार!
श्रीरामकृष्ण – कैसा? कुछ उपदेश देते देखते हो?
महेन्द्र चुप रह गए।
श्रीरामकृष्ण – जब जब मैं तुम्हें शिक्षा देता दिखायी दूँ तो यही समझो कि स्वयं सच्चिदानन्द ही यह कार्य कर रहे हैं।
इसके बाद महेन्द्र ने स्वप्न में जो कुछ देखा था सभी कह सुनाया। श्रीरामकृष्ण ने मन लगाकर सभी सुना।
श्रीरामकृष्ण (महेन्द्र के प्रति) – यह सब बहुत अच्छा है। तुम और तर्क-विचार न लाओ! तुम लोग शाक्त हो!
□ □ □
परिच्छेद ५६
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अधर के मकान पर दुर्गापूजा-महोत्सव में
(१)
जगन्माता के साथ वार्तालाप
श्री अधर के मकान पर नवमी-पूजा के दिन दालान में श्रीरामकृष्ण खड़े हैं। सन्ध्या के बाद श्रीदुर्गामाई की आरती देख रहे हैं। अधर के घर पर दुर्गापूजा का महोत्सव है। इसलिए वे श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रित करके लाए हैं।
आज बुधवार है। १० अक्टूबर १८८३ ई.। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ पधारे हैं। उनमें बलराम के पिता तथा अधर के मित्र स्कूल-इन्स्पेक्टर सारदाबाबू भी आए हैं। अधर ने पूजा के उपलक्ष्य में पड़ोसी तथा आत्मीयजनों को भी निमन्त्रण दिया है। वे भी आए हैं।
श्रीरामकृष्ण संध्या की आरती देखकर भावविभोर होकर पूजा के दालान में खड़े हैं। भावाविष्ट होकर माँ को गाना सुना रहे हैं।
अधर गृही भक्त हैं। और भी अनेक गृही भक्त उपस्थित हैं। वे सब त्रितापों से तापित हैं। सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण सभी के मंगल के लिए जगन्माता की स्तुति कर रहे हैं।
(संगीत का भावार्थ) – “हे तारिणि! मुझे तारो। अब की बार शीघ्र तारो। हे माँ, जीवगण यम से भयभीत हो गए हैं। हे जगज्जननि! संसार को पालनेवाली! लोगों को मोहनेवाली जगज्जननि! तुमने यशोदा की कोख में जन्म लेकर हरि की लीला में सहायता की थी; तुमने वृन्दावन में राधा बन ब्रजवल्लभ के साथ विहार किया। रास रचकर रसमयी तुमने रासलीला का प्रकाश किया। हे माँ, तुम गिरिजा हो, गोपतनया हो, गोविन्द की मनमोहिनी हो, तुम सद्गति देनेवाली गंगा हो। हे गौरि, सारा विश्व तुम्हारा गुणगान गाता है। हे शिवे! हे सनातनि! सदानन्दमयी सर्वस्वरूपिणि! हे निर्गुणे, हे सगुणे! हे सदाशिव की प्रिये! तुम्हारी महिमा को कौन जानता है!”
श्रीरामकृष्ण अधर के मकान के दुमँजले पर बैठकघर में बैठे हैं। कमरे में अनेक आमन्त्रित व्यक्ति आए हैं।
बलराम के पिता और सारदाबाबू आदि पास बैठे हैं।
१० अक्टूबर, १८८३
परिच्छेद ५६
३२३
श्रीरामकृष्ण अभी भी भावविभोर हैं। आमन्त्रित व्यक्तियों को सम्बोधित कर कह रहे हैं, “मैंने भोजन कर लिया है; अब तुम लोग भी भोजन करो।”
अधर की पूजा और नैवेद्य को माँ ने ग्रहण किया है; क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण जगन्माता के आवेश में आकर कह रहे हैं, ‘मैंने खा लिया है; अब तुम लोग भी प्रसाद पाओ’?
श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर जगन्माता से कह रहे हैं, “माँ! मैं खाऊँ? या तुम खाओगी? माँ, कारणानन्दरूपिणी।”
क्या श्रीरामकृष्ण जगन्माता को और अपने को एक ही देख रहे हैं! जो माँ हैं, क्या वही स्वयं लोकशिक्षा के लिए पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुई हैं? क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण भाव के आवेश में कह रहे हैं, मैंने भोजन कर लिया है?
इसी प्रकार भाव के आवेश में देह के बीच षट्चक्र और उसमें माँ को देख रहे हैं। इसलिए फिर भावविभोर होकर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “हे माँ हरमोहिनी, तूने संसार को भुलावे में डाल रखा है। मूलाधार महाकमल में तू वीणावादन करती हुई चित्तविनोदन करती है। महामन्त्र का अवलम्बन कर तू शरीररूपी यन्त्र के सुषुम्नादि तीन तारों में तीन गुणों के अनुसार तीन ग्रामों में संचरण करती है। मूलाधारचक्र में तू भैरव राग के रूप में अवस्थित है; स्वाधिष्ठानचक्र के षड्दल कमल में तू श्री राग तथा मणिपूरचक्र में मल्हार राग है। तू वसन्त राग के रूप में हृदयस्थ अनाहतचक्र में प्रकाशित होती है। तू विशुद्धचक्र में हिण्डोल तथा आज्ञाचक्र में कर्णाटक राग है। तान-मान-लय-सुर के सहित तू मन्द्र-मध्य-तार इन तीन सप्तकों का भेदन करती है। हे महामाया, तूने मोहपाश के द्वारा सब को अनायास बाँध लिया है। तत्त्वाकाश में तू मानो स्थिर सौदामिनी की तरह विराजमान है। 'नन्दकुमार' कहता है कि तेरे तत्त्व का निश्चय नहीं किया जा सकता। तीन गुणों के द्वारा तूने जीव की दृष्टि को आच्छादित कर रखा है।”
(भावार्थ) - “माँ के गूढ़ तत्त्वों को सोचते सोचते प्राणों पर आ बीती। जिसके नाम से कालभय नष्ट होता है, जिसके चरणों के नीचे महाकाल है, उसका काला रूप क्यों हुआ? काले रूप अनेक हैं, पर यह बड़ा आश्चर्यजनक काला रूप है, जिसे हृदय के बीच में रखने पर हृदयरूपी पद्म आलोकित हो जाता है। रूप में काली है, नाम में काली है, काले से भी अधिक काली है। जिसने इस रूप को देखा है, वह मोहित हो गया है, उसे दूसरा रूप अच्छा नहीं लगता। 'प्रसाद' आश्चर्य के साथ कहता है कि ऐसी लड़की कहाँ थी, जिसे बिना देखे, केवल कान से जिसका नाम सुनकर ही मन जाकर उससे लिप्त हो गया!”
अभया की शरण में जाने से सभी भय दूर हो जाते हैं, सम्भव है इसीलिए वे भक्तों को अभयदान दे रहे हैं और गाना गा रहे हैं -
| ३२४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १० अक्टूबर, १८८३ |
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(भावार्थ) - “मैंने अभय पद में प्राणों को सौंप दिया है” इत्यादि।
श्री सारदाबाबू पुत्रशोक से अत्यन्त व्यथित हैं। इसलिए उनके मित्र अधर उन्हें श्रीरामकृष्ण के पास लाये हैं। वे गौरांग के भक्त हैं। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण में श्रीगौरांग का उद्दीपन हुआ है। श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “मेरा अंग क्यों गौर हुआ?” इत्यादि।
अब श्रीगौरांग के भाव में आविष्ट हो गाना गा रहे हैं। कह रहे हैं, सारदाबाबू यह गाना बहुत चाहते हैं।
(भावार्थ) - “भावनिधि गौरांग का भाव होगा नहीं तो क्या? भाव में हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं। वन देखकर वृन्दावन समझते हैं। गंगा देख उसे यमुना मान लेते हैं। गौरांग सिसक-सिसककर रो रहे हैं। यद्यपि वे बाहर ‘गोर’ हैं तथापि भीतर वे ‘कृष्ण’ हैं।
(भावार्थ) - “माँ! पड़ोसी लोग हल्ला मचाते हैं। मुझे गौरकलंकिनी कहते हैं? क्या यह कहने की बात है? कहाँ कहूँगी? ओ प्यारी सखि, लज्जा से मरी जाती हूँ। एक दिन श्रीवास के मकान में कीर्तन की धूम मची हुई थी; गौररूपी चन्द्रमा श्रीवास के आँगन पर लोटपोट हो रहा था। मैं एक कोने में खड़ी थी। एक ओर छिपी हुई थी। मैं बेहोश हो गयी। श्रीवास की धर्मपत्नी मुझे होश में लायी। एक दिन गौर नगरकीर्तन कर रहे थे; चाण्डाल, यवन आदि भी गौर के साथ थे। वे ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहते हुए नदिया के बाजारों में से चले जा रहे थे। मैंने उनके साथ जाकर दो रक्तिम चरणों के दर्शन किए थे। एक दिन गंगातट पर घाट पर गौरांग प्रभु खड़े थे। मानो चन्द्र और सूर्य दोनों ही गौर के अंग में प्रकट हुए थे। गौर के रूप को देखकर शाक्त और शैव भूल गए। एकाएक मेरा घड़ा गिर पड़ा! दुष्ट ननदिया ने देख लिया था।”
बलराम के पिता वैष्णव हैं; सम्भव है इसीलिए अब श्रीरामकृष्ण गोपियों के दिव्य प्रेम का गाना गा रहे हैं।
(भावार्थ) - “सखि! श्याम को पा न सकी, तो फिर किस सुख से घर पर रहूँ? यदि श्याम मेरे सिर के केश होते तो हे सखि, मैं उसमें बकुल फूल पिरोकर यत्न के साथ वेणी बाँध लेती। श्याम यदि मेरे हाथ के कंगन होते, तो सदा बाँहों में लगे रहते। सखि, मैं कंगन हिलाकर, बाँह हिलाकर चली जाती। हे सखि! मैं श्यामरूपी कंगन को हाथ में पहनकर सड़कों पर से चली जाती। जिस समय श्याम अपनी बाँसुरी बजाता है, तो मैं यमुना में जल लेने आती हूँ। मैं भटकी हुई हरिणी की तरह इधर-उधर ताकती रहती हूँ।”
(२)
सर्वधर्म-समन्वय और श्रीरामकृष्ण
बलराम के पिता की उड़ीसा प्रान्त में भद्रक आदि कई स्थानों में जमींदारी है और
१० अक्टूबर, १८८३ | परिच्छेद ५६ | ३२५
| १० अक्टूबर, १८८३ | परिच्छेद ५६ | ३२५ |
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वृन्दावन, पुरी, भद्रक आदि अनेक स्थानों में उनकी देवसेवा और अतिथिशालाएँ भी हैं। वे वृद्धावस्था में श्रीवृन्दावन में भगवान् श्यामसुन्दर के कुंज में उनकी सेवा में लगे रहते थे।
बलराम के पिताजी पुराने मत के वैष्णव हैं। अनेक वैष्णव भक्त, शाक्त, शैव और वेदान्तवादियों के साथ सहानुभूति नहीं रखते हैं; कोई कोई उनसे द्वेष भी करते हैं। परन्तु श्रीरामकृष्ण इस प्रकार की संकीर्णता पसन्द नहीं करते। उनका कहना है कि व्याकुलता रहने पर सभी पथों तथा सभी मतों से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। अनेक वैष्णव भक्त बाहर से तो जप-जाप, पूजा-पाठ आदि करते हैं, परन्तु भगवान् को प्राप्त करने के लिए उनमें व्याकुलता नही है। सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण बलराम के पिताजी को उपदेश दे रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – सोचा, क्यों एकांगी बनूँ? मैंने भी वृन्दावन में वैष्णव वैरागी का भेष ग्रहण किया था। उस भाव में तीन दिन रहा। फिर दक्षिणेश्वर में राम-मन्त्र लिया था। लम्बा तिलक, गले में कण्ठी; फिर थोड़े दिनों के बाद सब कुछ हटा दिया।
"एक आदमी के पास एक बर्तन था। लोग उसके पास कपड़ा रँगवाने के लिए जाते थे। बर्तन में एक रंग तैयार रहता। परन्तु जिसे जिस रंग की आवश्यकता होती, उस बर्तन में कपड़ा डुबाने से वह उसी रंग का हो जाता। यह देखकर एक व्यक्ति विस्मित होकर रंगवाले से कहता है कि तुम स्वयं जिस रंग से रंगे हो वही रंग मुझे दो!”
क्या इस उदाहरण द्वारा श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं कि सभी धर्मों के लोग उनके पास आएँगे और आत्मज्ञान प्राप्त करेंगे?
श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, "एक वृक्ष पर एक गिरगिट था! एक व्यक्ति ने देखा हरा, दूसरे ने देखा काला और तीसरे ने पीला, इस प्रकार अलग अलग व्यक्ति अलग अलग रंग देख गए। बाद में वे आपस में विवाद कर रहे हैं। एक कहता है, वह जन्तु हरे रंग का है। दूसरा कहता है, नहीं लाल रंग का, कोई कहता है पीला, और इस प्रकार आपस में सब झगड़ रहे हैं। उस समय वृक्ष के नीचे एक व्यक्ति बैठा था, सब मिलकर उसके पास गए। उसने कहा, 'मैं इस वृक्ष के नीचे रातदिन रहता हूँ, मैं जानता हूँ, यह बहुरुपिया है। क्षण क्षण में रंग बदलता है, और फिर कभी कभी इसके कोई रंग नहीं रहता।' "
क्या श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं कि ईश्वर सगुण है, भिन्न भिन्न रूप धारण करता है और फिर निर्गुण है, कोई रूप नहीं, वाक्य मन से परे है? और वे स्वयं भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि सभी पथों से ईश्वर के माधुर्य का रस पीते हैं?
श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता के प्रति) – और अधिक पुस्तकें न पढ़ो, परन्तु भक्तिशास्त्र का अध्ययन करो, जैसे श्रीचैतन्यचरितामृत।
| ३२६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १० अक्टूबर, १८८३ |
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राधाकृष्णलीला का अर्थ। रस और रसिक
“असल बात यह है कि उनसे प्रेम करना चाहिए, उनके माधुर्य का आस्वादन करना चाहिए। वे रस हैं और भक्त रसिक; भक्त उस रस का पान करते हैं। वे पद्म हैं और भक्त भौंरा, भक्त पद्म का मधु पीता है।
“भक्त जिस प्रकार भगवान् के बिना नहीं रह सकता, भगवान् भी भक्त के बिना नहीं रह सकते! उस समय भक्त रस बन जाता है और भगवान् बनते हैं रसिक; भक्त बनता है पद्म और भगवान् बनते हैं भौंरा! वे अपने माधुर्य का आस्वादन करने के लिए दो बने हैं, इसीलिए राधाकृष्ण-लीला हुई।
“तीर्थ, गले में माला, नियम, ये सब पहले-पहल करने पड़ते हैं। वस्तु की प्राप्ति हो जाने पर, भगवान् का दर्शन हो जाने पर बाहर का आडम्बर धीरे धीरे कम होता जाता है। उस समय उनका नाम लेकर रहना और स्मरण-मनन करना।
“सोलह रुपयों के पैसे अनेक होते हैं, परन्तु जब सोलह रुपये इकट्ठे किए जाते हैं, तो उतने अधिक नहीं दीखते। फिर उनके बदले में जब गिन्नी * बनायी तो कितना कम हो गया! फिर उसे बदलकर यदि छोटासा हीरा लाओ तो लोगों को पता तक नहीं लगता।
गले में माला, नियम आदि न रहने से वैष्णवगण आक्षेप करते हैं, क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं कि ईश्वरदर्शन के बाद माला, दीक्षा आदि का बन्धन उतना नहीं रह जाता? वस्तु प्राप्त होने पर बाहर का काम कम हो जाता है।
श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता के प्रति) – “कर्तभजा सम्प्रदायवाले कहते हैं कि भक्त चार प्रकार के होते हैं। प्रवर्तक, साधक, सिद्ध और सिद्ध का सिद्ध। प्रवर्तक तिलक लगाते हैं, गले में माला धारण करते हैं और नियम पालन करते हैं। साधक – इनका उतना बाहरका आडम्बर नहीं रहता; उदाहरणार्थ, बाउल। सिद्ध – जिसका स्थिर विश्वास है कि ईश्वर हैं। सिद्ध के सिद्ध जैसे चैतन्यदेव, उन्होने ईश्वर का दर्शन किया है और सदा उनसे वार्तालाप करते हैं। सिद्ध के सिद्ध को ही वे लोग साईं कहते हैं। साईं के बाद और कुछ नहीं रह जाता।
“साधक भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं। सात्त्विक साधना गुप्त रूप से होती है। इस प्रकार का साधक साधन-भजन को छिपाता है। देखने से वह साधारण लोगों की तरह जान पड़ता है। मच्छरदानी के भीतर बैठा ध्यान करता है।
“राजसिक साधक बाहर का आडम्बर रखता है, गले में जपमाला, भेष, गेरुआ वस्त्र, रेशमी वस्त्र, सोने के दानेवाली जपमाला, मानो साइनबोर्ड लगाकर बैठना!”
वैष्णव भक्तों की वेदान्तमत पर अथवा शाक्तमत पर उतनी श्रद्धा नहीं है।
* उस समय एक गिन्नी का मूल्य सोलह रुपये था।