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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

सप्तम अध्याय
ग्रहयुत्यधिकार
श्लोक—१ ग्रहों का युद्ध, समागम और अस्त । श्लोक २ और ३ का पूर्वार्ध—
समागम हो चुका है या होने वाला है ? श्लोक ३ का उत्तरार्ध, ४, ५, ६—कब और
कहाँ समागम होगा। श्लोक ७-१०—दृक्कर्म की रीति । श्लोक ११—दृक्कर्म की
आवश्यकता कहाँ-कहाँ होती है। श्लोक १२—दृक्कर्म संस्कृत ग्रहों के समागम के
समय उनका परस्पर अन्तर क्या होता है । श्लोक १३-१४—पांच ताराग्रहों के
बिम्बों के मध्यम मान तथा स्पष्ट मान जानने के नियम । श्लोक १५-१७—युतिकाल
में ग्रहों की दिशा जानकर बेध करने की रीति । श्लोक १८ के उत्तरार्ध से श्लोक २२
तक—अनेक प्रकार के युद्धों की परिभाषा । श्लोक २३—शुभाशुभ फल जानने के
लिये युद्धों की कल्पना ।
इस अध्याय में यह जानने की रीति बतलायी गयी है कि ग्रह एक दूसरे के
बहुत निकट कब और कहां देख पड़ते हैं और इनका शुभाशुभ फल क्या होता है ।
ग्रहों का युद्ध, समागम और अस्त
ताराग्रहाणामन्योन्यं स्यातां युद्धसमागमौ ।
समागमः शशाङ्केन सूर्येणास्तमयस्सह ॥१॥
अनुवाद (१)—भौम, बुध, गुरु, शुक्र और शनि पांच ताराग्रहों का आपस
में युद्ध और समागम होता है। जब तारा ग्रह चन्द्रमा के साथ हो जाता है तब
चन्द्रमा के साथ उसका समागम होता है और जब ग्रह सूर्य के साथ हो जाता है तब
कहा जाता है कि वह ग्रह अस्त हो गया ।
यह जानना कि समागम हो चुका है या होनेवाला है—
शीघ्रे मन्दाधिकेऽतीतः संयोगो' भविताऽन्यथा ।
तयोः प्राग्गायिनोरेवं वक्रिणोस्तु विपर्ययात् ॥२॥
प्राग्गायिन्यधिकेऽतीतः वक्रिण्यैष्यत्समागमः ।
अनुवाद (२)—इष्ट काल में जिस ग्रह की गति मन्द हो उस के भोगांश से
यदि शीघ्र गति वाले ग्रह का भोगांश अधिक हो और दोनों ग्रह मार्गी हों अर्थात् पूर्व

ग्रहयुत्यधिकार ५७७
की ओर जा रहे हों तो समझना चाहिए कि दोनों का समागम इष्टकाल के पहले ही
हो चुका है। परन्तु यदि शीघ्र गति वाले ग्रह का भोगांश मन्दगति वाले ग्रह के
भोगांश से कम हो तो समझना चाहिए कि समागम अभी होनेवाला है। परन्तु यदि
दोनों ग्रह वक्री हों अर्थात् पच्छिम की ओर जा रहे हों तो ऊपर जो कुछ कहा गया
है उसके विपरीत समझना चाहिए अर्थात् शीघ्रगति वाले ग्रह का भोगांश अधिक हो
तो समझना चाहिए कि समागम होने वाला है और यदि कम हो तो समझना चाहिये
कि समागम हो चुका है। (३) यदि एक ग्रह मार्गी और दूसरा वक्री हो तो और
यदि मार्गी ग्रह का भोगांश वक्री ग्रह के भोगांश से अधिक हो तो इष्ट काल से पहले
ही समागम हो चुका है परन्तु यदि वक्री ग्रह का भोगांश अधिक हो तो समझना
चाहिए कि समागम होने वाला है।
विज्ञान भाष्य—मान लीजिए दिये हुए चित्र में मे मेष का आदि विन्दु है और
क, ख दो ग्रह हैं। यह स्पष्ट है कि उस का भोगांश क के भोगांश से अधिक है। यदि
ख कि गति क की गति से अधिक हो तो यह प्रकट है कि ख क से और दूर होता
जायगा और इन दोनों का समागम अतीत हो गया है। परन्तु यदि ख की गति मन्द

चित्र १०५

५७८ सूर्य-सिद्धान्त
हो तो स्पष्ट है कि क शीघ्र गति से चलता हुआ ख के पास पहुँच जायगा और दोनों
का समागम होगा । यह दोनों घटनाएँ उस दशा में घटेंगी जब दोनों ग्रह मार्गी हों
अर्थात् तीर की दिशा में जा रहे हों । यदि दोनों वक्री हों अर्थात् तीर के विरुद्ध
दिशा में जा रहे हों तो यदि ख की वक्री गति अधिक हो तो समागम होगा और
कम हो तो समागम हो चुका है। यदि ख मार्गी हो और क वक्री तो दोनों का समागम
हो चुका है परन्तु यदि ख वक्री हो और क मार्गी तो दोनों का समागम होने
वाला है ।
यह जानना कि किस समय और किस स्थान पर ग्रहों का समागम
होगा—
ग्रहान्तरकलास्स्वस्वभुक्तिलिप्तासमाहताः ॥३॥
भुक्त्यन्तरेण विभजेदनुलोमविलोमयोः ।
द्वयोर्वक्रिण्यथैकस्मिन्भुक्तियोगेन भाजयेत् ॥४॥
लब्धं लिप्तादिकं शोध्यं गते देयं भविष्यति ।
विपर्ययाद्वक्रगतावेकस्मिन् तद्दनक्षयौ ॥५॥
समलिप्तौ भवेतां तौ ग्रहौ भगणसंस्थितौ ।
विवरं तद्गतुद्धृत्य दिनादिकलमिष्यते ॥६॥।
अनुवाद—(३) इष्टकाल के दोनों ग्रहों के भोगांशों का अन्तर निकाल कर
कला बनाओ और इसको प्रत्येक ग्रह की दैनिक गति की कलाओं से अलग-अलग गुणा
करो । (४) प्रत्येक गुणनफल को दोनों ग्रहों की दैनिक गतियों की अन्तर-कलाओं से
भाग दे दो यदि दोनों ग्रह मार्गी या दोनों ग्रह वक्री हों । परन्तु यदि एक ग्रह वक्री
हो और दूसरा मार्गी हो तो उपर्युक्त गुणनफल को दोनों ग्रहों की दैनिक गतियों की
कलाओं को जोड़कर योगफल से भाग दे दो। (५) यदि दोनों ग्रहों का समागम हो
चुका हो और दोनों ग्रह मार्गी हों तो प्रत्येक लब्धि को उस ग्रह के भोगांश में घटा दो
जिसकी दैनिक गति से गुणा किया हो; परन्तु यदि समागम होने वाला हो तो लब्धि
को ग्रह के भोगांश में जोड़ दो । यदि दोनों ग्रह वक्री हों तो इसकी उलटी क्रिया
करनी चाहिये अर्थात् यदि समागम हो चुका हो तो लब्धि को ग्रह के भोगांश में जोड़
दो और होनेवाला हो तो घटा दो । यदि एक ग्रह वक्री हो और दूसरा मार्गी, तो
इन्हीं नियमों के अनुसार जहाँ जैसी आवश्यकता हो जोड़ना घटाना चाहिए (६) ऐसा
करने से राशिचक्र के उस स्थान के भोगांश का पता लग जाता है जहाँ दोनों ग्रहों
का समागम हो चुका है अथवा होगा । दोनों ग्रहों के भोगांशों के अंतर को इनकी

दैनिक गतियों के अन्तर से भाग देने पर जो लब्धि आती है इष्टकाल से उतने ही
दिन के पहिले या पीछे समागम हो चुका रहता है अथवा होता है ।
विज्ञान भाष्य—३रे श्लोक के उत्तरार्ध से ६ठे श्लोक के अन्त तक जो दो
नियम बतलाये गये हैं वे अङ्कगणित के "समय और दूरी" वाले नियमों से बिलकुल
मिलते-जुलते हैं । इसका एक उदाहरण यह है—प्रयाग से पैसेंजर गाड़ी २५ मील
प्रति घण्टे के हिसाब से ६ बजे प्रातःकाल पटने की ओर चली और डाक गाड़ी ४०
मील प्रति घंटे के हिसाब से इसी ओर ८ बजे चली तो बतलाओ कि दोनों का मेल
कहाँ होगा और कब होगा ?
जिस युक्ति से यह प्रश्न किया जाता है उसी युक्ति से ग्रहों के समागम की भी
गणना की जाती है। ऐसे प्रश्नों में पहले यह जानना चाहिए कि जिस समय डाकगाड़ी
चली उस समय पैसेंजर गाड़ी उससे कितने अंतर पर थी, फिर यह जानना पड़ता
है कि डाकगाड़ी प्रति घंटे १५ मील अधिक चलकर इस अन्तर को कितनी देर में
पूरा करेगी । यहाँ १५ मील दोनों गाड़ियों की प्रति घंटे की गतियों का अंतर है
क्योंकि दोनों गाड़ियां एक ही दिशा में जा रही हैं ।
यदि पैसेंजर गाड़ी प्रयाग से पटने की ओर और डाकगाड़ी पटने से प्रयाग की
ओर ६ बजे चलें तो दोनों के समागम का स्थान और समय जानने के लिए दोनों की
गतियों का योग करके इस योगफल से प्रयाग और पटने के बीच की दूरी को भाग दे
देने से उस समय का ज्ञान होगा जितने समय में दोनों गाड़ियाँ एक दूसरे से मिलेंगी।
यहाँ गतियों का योग किया जाता है क्योंकि दोनों गाड़ियां एक दूसरे की ओर मिलने
के लिए चल रही हैं इसलिए इनके मिलने की चाल इन दोनों की गतियों के योग
के समान होती है ।
ठीक इसी प्रकार ग्रहों की युतिकाल और युतिस्थान की गणना की जाती है ।
मान लीजिए कि चित्र १०५ में किसी इष्टकाल में क ग्रह का भोगांश में क = भ
और ख ग्रह का भोगांश मेख = भा । यह भी मान लीजिए कि उसी इष्टकाल में
क और ख की दैनिक गतियां क्रमशः ग और गा हैं ।
दोनों ग्रहों का अन्तर क ख = भा - भ
दोनों ग्रहों की दैनिक गतियों का अन्तर = ग - गा
इसलिए इष्टकाल से जितने समय पहले या पीछे समागम हो चुका या होगा
उसको यदि स कहा जाय तो स = (भा - भ) / (ग - गा)

५८० सूर्य-सिद्धान्त
२रे श्लोक की उपपत्ति—यदि गा से ग अधिक हो तो हर धनात्मक होगा
जिससे स भी धनात्मक होगा, ऐसी दशा में दोनों का समागम इतने दिनों के बाद
होगा। परन्तु यदि गा से ग कम हो तो हर ऋणात्मक होने के कारण स भी
ऋणात्मक होगा जिसका अर्थ यह है कि इतने दिन पहले ही दोनों ग्रहों का समागम
हो चुका है। इस जगह दोनों ग्रहों की गतियाँ स्वयम् धनात्मक मानी गयी हैं। यहां
सरलता के लिए इसको स्मरण रखना चाहिए कि मार्गी गति धनात्मक और वक्री
गति ऋणात्मक समझी गयी है।
यदि ग और गा दोनों ऋणात्मक हों अर्थात् यदि दोनों ग्रह वक्री हों तो
उपर्युक्त दिनफल का हर (-ग)-(-गा)=गा-ग हो जायगा जो पहले का
बिलकुल उलटा है अर्थात् यदि गा से ग कम हो तो दिनफल धनात्मक होगा और
समागम होगा परन्तु यदि गा से ग अधिक हो तो दिनफल ऋणात्मक होगा और
समागम पहले ही हो चुका है। इस प्रकार २रे श्लोक की उपपत्ति सिद्ध हुई।
३रे श्लोक के पूर्वार्ध की उपपत्ति—यदि क मार्गी और ख वक्री हो तो ग
धनात्मक और गा ऋणात्मक होगा इसलिए समीकरण का हर ग-(-गा) के समान
होगा जो वास्तव में ग+गा अर्थात धनात्मक हो जायगा इसलिए स धनात्मक होने
से समागम उतने ही समय पश्चात् होगा।
परन्तु यदि ख मार्गी और क वक्री हो तो ग ऋणात्मक और गा, धनात्मक
होगा ऐसी दशा में समीकरण का हर ग-गा = -ग-(+गा) = -ग-गा =
-(ग+गा) जो ऋणात्मक है इसलिए समागम उतने समय पहले ही हो चुका है।
यहाँ यह भी सिद्ध हो जाता है कि युतिकाल का समय जानने के लिए दोनों
ग्रहों के भोगांशों के अंतर को दोनों ग्रह की गतियों के अन्तर से भाग देना चाहिये
यदि दोनों ग्रहों मार्गी या दोनों ग्रह वक्री हों; परन्तु यदि उनमें से एक मार्गी हो और
दूसरा वक्री हो तो दोनों की गतियों के योग से भाग देना पड़ता है।
३रे श्लोक के उत्तरार्ध से ६ठें श्लोक तक की उपपत्ति—इन श्लोकों
का सार यह है :—
भा—भ
इष्टकाल से युतिकाल तक का समय = ―――――
ग—गा
भा—भ
इष्टकाल से युतिकाल तक क ग्रह की चाल = ग × ―――――
ग—गा
भा—भ
,, ,, ख ,, = गा × ―――――
ग—गा

ग्रहयुत्यधिकार ५८१
इसलिये यदि क के इष्टकाल के भोगांश में ग × (भा—भ)/(ग—गा) जोड़ दिया जाय
तो इसका युतिकाल का भोगांश और ख के इष्टकाल के भोगांश में गा × (भा—भ)/(ग—गा)
जोड़ा जाय तो ख का युतिकाल का भोगांश ज्ञात होगा जो दोनों एक ही होंगे क्योंकि
युतिकाल में दोनों ग्रहों के भोगांश एक होते हैं। यहाँ ग—गा का मान ग्रहों की
मार्गी और वक्री गतियों के अनुसार बदलेगा जैसा कि पहले कहा गया है क्योंकि जब
दोनों ग्रह मार्गी होंगे तो ग और गा दोनों धनात्मक होंगे और जब दोनों ग्रह वक्री
होंगे तब ग और गा दोनों ऋणात्मक होंगे। इन दोनों दशाओं में ग—गा का मान
वही होगा जो दोनों का अन्तर है। परन्तु यदि एक वक्री हुआ और दूसरा मार्गी तो
ग—गा का मान वह होगा जो दोनों का योगफल है परन्तु यह योगफल ऋणात्मक
होगा यदि ग ऋणात्मक है और धनात्मक होगा यदि गा ऋणात्मक हो। इस प्रकार
चौथे श्लोक की उपपत्ति सिद्ध हुई।
यह पहले ही मान लिया गया है कि इष्ट काल में क, ख ग्रहों के भोगांश
क्रमशः भ और भा हैं और इष्टकाल से युतिकाल तक इनकी चालें क्रमशः
ग × (भा—भ)/(ग—गा) और गा × (भा—भ)/(ग—गा) हैं, इसलिए युतिकाल में इनके भोगांश
क्रमशः भ + ग × (भा—भ)/(ग—गा) और भ + गा × (भा—भ)/(ग—गा) हैं। इन दोनों मानों का धन
चिह्न प्रत्येक मान के दूसरे पद के चिह्न के अनुसार धन या ऋण होगा जैसा कि
पहले कहा गया है। इस प्रकार ५वें और छठें श्लोक के पूर्वार्ध की उपपत्ति सिद्ध
होती है। छठें श्लोक के उत्तरार्ध की उपपत्ति पहले ही सिद्ध की गयी है।
यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि इस रीति से युक्तिस्थान का जो भोगांश ज्ञात
होगा वह स्थूल होगा क्योंकि किसी इष्टकाल में किसी ग्रह की जो दैनिक गति होती
है वह प्रत्येक दिन एकसी नहीं रहती, कुछ घटती-बढ़ती रहती है। इसलिए इष्टकाल
की दैनिक गतियों के अनुसार गणना करने से कुछ स्थूलता रह जाती है। इस कारण
यह आवश्यक है कि उपर्युक्त गणना से जो समय आवे उस समय के ग्रह के भोगांश
और दैनिक गतियाँ स्वतन्त्र गणना से फिर निकाले और इनके ही आधार पर ऊपर
के चार श्लोकों में दिये हुये नियमों से फिर युतिस्थान जाने।
दृक्कर्म की रीति—
कृत्वा दिनक्षपामानं ततो विक्षेपलिप्तिकाः ।
नतोन्नतं साधयित्वा स्वकाल्लग्नवशात्तयोः ॥७॥

५८२ सूर्य-सिद्धान्त
विषुवच्छायाऽभ्यस्ताद्विक्षेपाद्द्वादशोद्धृतात् ।
फलं स्वनतनाडीघ्नं स्वदिनार्धविभाजितम् ॥८॥
लब्धं प्राच्यामृणं सौम्याद्विक्षेपात्पश्चिमे धनम् ।
दक्षिणे प्राक्कपाले स्वं पश्चिमे तु तथा क्षयः ॥६॥
सत्रिभगृहक्रान्तिभागघ्नाः क्षेपलिप्तिकाः ।
विकलास्स्वमृणंक्रान्तिक्षेपयोभिन्नतुल्ययोः ॥१०॥
नक्षत्र ग्रहयोगेषु ग्रहास्तोद्य साधने ।
शृङ्गोन्नतौ तु चन्द्रस्य दृक्कर्मोदाविदं स्मृतम् ॥११॥
तात्कालिकौ पुनः कार्यों विक्षेपौ तु तयोरथ ।
दिक्तुल्यत्वेऽन्तरं भेदे योगश्शेषं ग्रहान्तरम् ॥१२॥
अनुवाद—(७) युक्तिकाल के ग्रहों के दिनमान और रात्रिमान तथा उनके
विक्षेपों का मान जानना चाहिए फिर उस काल में जो राशि पूर्व में लग्न हो उससे
प्रत्येक ग्रह का नतकाल और उन्नतकाल जानना चाहिये । (८) विक्षेप को उस स्थान
की पलभा से गुणा करके १२ से भाग देना चाहिये । जो लब्धि आवे उसको प्रत्येक
ग्रह की नत घड़ी से गुणा करके उसके दिनमान के आधे से और यदि रात्रि हो तो
रात्रिमान के आधे से भाग दे देना चाहिये । (६) अब जो लब्धि आवे उसको यदि
विक्षेप उत्तर हो तो पूर्व कपाल में ग्रह के भोगांश में घटा दो और पच्छिम कपाल में
जोड़ दो । परन्तु यदि विक्षेप दक्षिण हो तो पूर्व कपाल में उस लब्धि को ग्रह के भोगांश
में जोड़ दो और पच्छिम कपाल में घटा दो । (१०) ग्रह के भोगांश में तीन राशि
जोड़कर उसकी क्रान्ति निकालो और इस क्रान्ति के अंश को विक्षेप की कला से गुणा
कर दो, गुणनफल को विकला समझकर ग्रह के भोगांश में जोड़ दो । यदि क्रान्ति और
विक्षेप की दिशाएँ भिन्न हों और यदि इनकी दिशाएँ एक ही हों तो घटा दो । (११)
नक्षत्र और ग्रह के योग में ग्रह का उदय और अस्त साधन करने में, चन्द्रमा का
शृङ्गोन्नत जानने के पहले इस दृक्कर्म का संस्कार करना चाहिये । (१२) दृक्कर्म
संस्कृत ग्रहों का युक्तिकाल और इस समय के इनके विक्षेप फिर निकालकर यदि
विक्षेपों की दिशा एक ही हो तो अन्तर करे और भिन्न हो तो योग करे । ऐसा करने
से जो आवे वही युक्तिकाल में दोनों ग्रहों का परस्पर अंतर होगा ।
विज्ञान भाष्य—युक्तिकाल में ग्रहों के स्थान जानने की जो रीति ३-६
श्लोकों में बतलायी गयी है। उससे यह ज्ञात होता है कि उस समय ग्रह कदम्बप्रोतवृत्त
पर कहां है परन्तु स्पष्ट युक्तिकाल उस समय को कहते हैं जिस समय दोनों ग्रह

ग्रहयुत्यधिकार ५८३
समप्रोतवृत्त पर होते हैं अर्थात् उस वृत्त पर होते हैं जो दोनों ग्रहों से होता हुआ
क्षितिज के उत्तर बिन्दु पर जाता है । इसलिए स्पष्ट युक्तिकाल जानने के लिए पहले
दी हुई रीति से ग्रहों के जो भोगांश आते हैं उसमें दो संस्कार किये जाते हैं जिनके
नाम आक्षदृक्कर्म और आयनदृक्कर्म हैं । यह संस्कार आक्षवलन और आयनवलन के
सदृश हैं । भास्कराचार्यजी ने तो ब्रह्मगुप्तजी के अनुसार आक्षवलन और आयनवलन
से ही आक्षदृक्कर्म और आयनदृक्कर्म निकालने की रीति बतलायी है जो आजकल
अधिकतर प्रचलित है परन्तु सूर्यसिद्धान्त में इस कार्य के लिए दूसरी ही रीति दी है ।
यहाँ पहले सूर्यसिद्धान्त की रीति समझाकर संक्षेप में यह भी बतलाया जायगा कि
भास्कराचार्य की रीति कैसी है ।
चित्र १०६ से प्रकट होता है कि इस अध्याय के छठें श्लोक तक युक्तिकाल
के ग्रहों के भोगांश जानने की जो रीति दी हुई है उसके अनुसार ग और घ ग्रहों का
जो भोगांश होगा वह क्रान्तिवृत्त के य विन्दु के भोगांश के समान होगा । परन्तु इस
समय इन ग्रहों के समप्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त को ज और प विन्दुओं पर काटते हैं इसलिए
उपर्युक्त युक्तिकाल में इन ग्रहों के समप्रोत वृत्तों का अंतर क्रान्तिवृत्त पर प ज के
समान होगा । सिद्धान्तानुसार जिस समय यह अन्तर शून्य के समान हो उस समय
को युतिकाल कहते हैं अर्थात् दो ग्रहों की युति उस समय होती है जिस समय दोनों
ग्रह एक ही समप्रोतवृत्त पर हों । यह जानने के लिए पहले यह क्रिया करनी पड़ती है
कि दोनों ग्रहों के भोगांश एक कब होंगे जो ४-६ श्लोकों के अनुसार जाना जाता है ।
इसके बाद यह जानना पड़ता है कि उस समय य प और य ज क्या हैं । इनको मैं
सुविधा के लिए क्रमशः ग और घ के आक्ष-आयन-दृक्कर्म-संस्कृत-फल कहूँगा । यह
प्रकट है कि—
प्रत्येक समीकरण के दाहिने पक्ष में जो दो पद हैं उनका मान सहज ही जाना
जा सकता है और इस प्रकार य प और य ज के मान भी जाने जा सकते हैं । पहले
पद के जानने की रीति ७-६ श्लोकों में बतलायी गयी है और इसका नाम
आचार्यों ने आक्षदृक्कर्म रखा है । दूसरे पद के जानने की रीति १०वें श्लोक में
बतलायी गयी है और इसका नाम आचार्यों ने आयनदृक्कर्म रखा है । पहले को
आक्षदृक्कर्म कहा गया है क्योंकि इसका परिमाण द्रष्टा के अक्षांश के अनुसार
बदलता है और दूसरे को आयनदृक्कर्म कहा गया है क्योंकि इसका परिमाण
अयनान्तवृत्तों (देखो पृष्ठ २३०) के अनुसार बदलता है जैसा कि आगे सिद्ध
किया जायगा ।
आक्षदृक्कर्म—यह प्रकट है कि निरक्ष देश पर क्षितिज का उत्तर बिन्दु उ
और ध्रुव घ एक हो जाते हैं इसलिये यहां किसी ग्रह के समप्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोत-

५८४ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र १०६
चित्र १०६ का वर्णन
उ पू द = क्षितिज वृत्त का पूर्वार्ध
उ, पू, द = क्रमशः उत्तर, पूर्व और दक्षिण बिन्दु
उ ध ख म रा द = यामोत्तरवृत्त

परिलेखाधिकार ५८५
क = कदम्ब
घ = धृ व
ख = खस्वस्तिक
म = मध्यलग्न
ग, घ = दो ग्रहों के स्थान (चित्र में घ की जगह ध बन गया है)
क ग य घ = कदम्बवृत्त
ल ज फ य च प म = क्रान्तिवृत्त
ख = क्रान्तिवृत्त का वह बिन्दु जो पूर्व क्षितिज में लग्न हैं।
अ य छ रा = य बिन्दु का अहोरात्रवृत्त
ध च छ घ = घ ग्रह पर जाता हुआ ध्रुवप्रोतवृत्त
ध ग फ = ग ग्रह पर जाता हुआ ध्रुवप्रोतवृत्त
उ ज घ = घ ग्रह पर जाता हुआ समप्रोतवृत्त
उ ग प = ग ग्रह पर जाता हुआ समप्रोतवृत्त
ज = घ ग्रह के समप्रोत वृत्त और क्रान्तिवृत्त का सम्पात बिन्दु
प = ग ग्रह के समप्रोतवृत्त और क्रान्तिवृत्त का सम्पात बिन्दु
प ज = दोनों ग्रह के समप्रोत वृत्तों का अन्तर (क्रान्ति वृत्त पर)
च ज = घ ग्रह का आक्षदृक्कर्म (घ ग्रह के समप्रोत और ध्रुवप्रोत वृत्तों का
क्रान्तिवृत्त पर अंतर)
च य = घ ग्रह का आयन दृक्कर्म (घ ग्रह के कदम्बप्रोत और ध्रुवप्रोत वृत्तों
का क्रान्तिवृत्त पर अंतर)
य ज = घ ग्रह का आक्ष-आयन-दृक्कर्म-संस्कृत फल, अर्थात् घ ग्रह के समप्रोत
और कदम्बप्रोत वृत्तों का क्रान्ति वृत्त पर अंतर
प फ = ग ग्रह का आक्षदृक्कर्म (ग ग्रह के समप्रोत और ध्रुवप्रोत वृत्तों का
क्रान्तिवृत्त पर अंतर)
प फ = ग ग्रह का आयनदृक्कर्म (ग ग्रह के कदम्बप्रोत और ध्रुवप्रोत वृत्तों
का क्रान्तिवृत्त पर अंतर)
प य = ग ग्रह का आक्ष-आयन-दृक्कर्म-संस्कृत फल अर्थात् ग ग्रह के समप्रोत और
कदम्बप्रोत वृत्तों का क्रान्तिवृत्त पर अन्तर
य प = प फ - य फ
और य ज = च ज - च य
वृत्त एक में मिले रहते हैं। इस कारण वहां प फ या च ज का मान शून्य होता है
अर्थात् वहां आक्षदृक्कर्म शून्य होता है। जैसे-जैसे अक्षांश बढ़ता है अर्थात् जैसे-जैसे
१०

५८६ सूर्य-सिद्धान्त
क्षितिजवृत्त के उत्तर विन्दु उ से ध्रुव ध ऊपर होता जाता है तैसे प फ या च अ
अर्थात् आक्षदृक्कर्म बढ़ता है। जिस समय ग्रह यामोत्तर वृत्त पर होता है उस समय
भी उसके समप्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोतवृत्त एक में मिले रहते हैं क्योंकि यामोत्तरवृत्त
उ और ध दोनों विन्दुओं पर होता है। इसलिए यह सिद्ध है कि किसी स्थान के
यामोत्तर वृत्त पर भी ग्रह का आक्षदृक्कर्म शून्य रहता है। अब केवल यह जानना
रह गया है कि आकाश के अन्य विन्दुओं पर ग्रह का आक्षदृक्कर्म क्या होता है।
पहले यह देखना चाहिये कि यदि ग्रह क्षितिजवृत्त पर हो तो आक्षदृक्कर्म का
परिमाण क्या होता है। यह तो स्पष्ट ही है कि यदि ग्रह क्षितिजवृत्त पर हो तो
क्षितिजवृत्त ही इसका समप्रोतवृत्त भी होता है। चित्र १०७ से प्रकट है कि जब
घ ग्रह पूर्व क्षितिज में लग्न होता है तब क्रान्तिवृत्त पर इसका स्थान य होता है।
चित्र १०७
उ अ ल ध = पूर्व क्षितिज वृत्त
उ = उत्तर विन्दु
घ = उदय होते हुए ग्रह का स्थान
ल = उदय लग्न
क = कदम्ब
य = क्रान्तिवृत्त पर घ ग्रह का स्थान
च = घ के ध्रुवप्रोतवृत्त और क्रान्तिवृत्त का सम्पात विन्दु
अ य छ = य का अहोरात्र वृत्त
च ल = घ का आक्षदृक्कर्म

ग्रहयुत्यधिकार ५८७
य का अहोरात्रवृत्त अयछ घ के ध्रुवप्रोतवृत्त को छ बिन्दु पर काटता है। अ छ घ
गोलीय समकोण त्रिभुज है क्योंकि अहोरात्र वृत्त अ य छ ध्रुवप्रोतवृत्त से ६० अंश
का कोण बनाता है। अहोरात्रवृत्त विषुवद्वृत्त के समानान्तर होता है तथा विषुवद्
वृत्त और पूर्वक्षितिज वृत्त के बीच का कोण लम्बांश के समान होता है इसलिए
कोण छ अ घ लम्बांश के समान है। यदि अ छ घ को सरल समकोण त्रिभुज
मान लिया जाय तो कोण अ छ घ = ६० अंश और कोण छ अ घ = लम्बांश ।
इसलिए कोण छ घ अ = अक्षांश क्योंकि अक्षांश + लम्बांश = ६० अंश । इस-
लिए सरल त्रिभुज अ छ घ में
छ अ ज्या ∠ छ घ अ ज्या अक्षांश पलभा
—— = ————— = ————— = ——— (देखो पृष्ठ ५६ और २६३)
छ घ ज्या ∠ छ अ घ ज्या लम्बांश १२
यदि छ घ को घ य के समान और छ अ को च ल के समान मान लिया
जाय तो
च ल छ अ प ल भा
—— = —— = ————
घ य छ घ १२
घ य × प ल भा
∴ च ल = ———————
१२
ग्रह का शर × प ल भा
= ———————————
१२
परन्तु च ल घ = ग्रह का आक्षदृक्कर्म । इसलिये सिद्ध होता है कि जिस समय
ग्रह क्षितिज पर होता है उस समय उसका आक्षदृक्कर्म उसके शर को प ल भा से गुणा
करके १२ से भाग देने पर आता है। यही ८वें श्लोक के पूर्वार्ध का तात्पर्य है। इस
प्रकार जब यह सिद्ध हो गया कि क्षितिजस्थ ग्रह का आक्षदृक्कर्म क्या होता है और
यामोत्तरवृत्त पर उसका मान शून्य होता ही है तब अन्य समय के लिये उसकी गणना
त्रैराशिक से इस प्रकार की जाती है कि जब ग्रह के आधे दिन में आक्षदृक्कर्म का
मान कम से कम शून्य और अधिक से अधिक क्षितिजस्थ आक्षदृक्कर्म के समान होता
है तब इष्ट नतकाल में इसका मान क्या होता है। अर्थात् दिनार्द्ध : इष्टनत काल ::
क्षितिजस्थ आक्षदृक्कर्म : इष्ट आक्षदृक्कर्म । यही ८वें श्लोक का अर्थ है ।
चित्र १०६ और १०७ में ग्रह पूर्वकपाल में दिखलाये गये हैं। यहाँ घ का शर
दक्षिण है तो घ का समप्रोतवृत्त कान्तिवृत्त को ज बिन्दु पर काटता है जो य से पूर्व
है। इसलिये दक्षिण शर में य के भोगांश में घ का आक्षदृक्कर्म जोड़ने से ज का
भोगांश आवेगा। परन्तु जब ग का शर उत्तर है तो ग का समप्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त

५८८ सूर्य-सिद्धान्त
को प स्थान पर काटता है जो य से पच्छिम है इसलिये उत्तर शर में य के भोगांश में
ग का आक्षदृक्कर्म घटाने से प का भोगांश आवेगा। पच्छिम कपाल में इसके विपरीत
होता है अर्थात् दक्षिण शरवाले ग्रह का आक्षदृक्कर्म ग्रह के भोगांश में घटाना
पड़ता है और उत्तर शर वाले ग्रह का आक्षदृक्कर्म ग्रह के भोगांश में जोड़ना पड़ता
है। यह बात चित्र १०६ से ही स्पष्ट हो जाती है क्योंकि यदि वह चित्र पच्छिम
कपाल का समझ लिया जाय तो ज विन्दु य से पच्छिम समझा जायगा और प विन्दु
थ से पूरब समझा जायगा क्योंकि पच्छिम कपाल में किसी विन्दु से उसके नीचे का
विन्दु पच्छिम होता है और ऊपर का विन्दु पूर्व होता है परन्तु पूर्व कपाल में किसी
विन्दु से उसके नीचे का विन्दु पूर्व होता है और ऊपर का विन्दु पच्छिम होता है।
इस प्रकार ६वें श्लोक में बतलायी गयी जोड़ने घटाने की क्रिया की उपपत्ति भी
सिद्ध हो गयी।
यह स्मरण रखना चाहिए कि ८वें श्लोक में बतलायी गयी रीति स्थूल है
क्योंकि जिन कल्पनाओं से यह सिद्ध हुई है वह स्वयम् स्थूल है।
आयन दृक्कर्म—
चित्र १०६ से प्रकट है कि घ ग्रह का आयन दृक्कर्म च य है। अब देखना
है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार च य का मान जानने की क्या रीति है।
त्रिभुज च य छ इतना छोटा है कि च य को छ य के समान समझ लेने से
कोई हानि नहीं हो सकती। त्रिभुज छ य घ को सरल समकोण त्रिभुज समझ लेने से
भी विशेष हानि नहीं है क्योंकि घ ग्रह का शर घ य बहुत छोटा होता है और कोण
घ छ य समकोण है क्योंकि अ छ रा य विन्दु का अहोरात्रवृत्त है और ध छ घ ध
का ध्रुवप्रोतवृत्त है। इसलिए समकोण त्रिभुज छ य घ में
छ य / घ य = ज्या ∠ छ ध य / ज्या ∠ घ छ य = ज्या ∠ छ ध य / ज्या ९०° = ज्या ∠ छ ध य / त्रिज्या
चूंकि ग्रह का शर बहुत छोटा होता है इसलिए कोण छ ध य या कोण
ध घ क को कोण ध य क के समान समझ लेने में कोई हानि नहीं है। इसलिए यह
कहा जा सकता है कि
छ य / घ य = ज्या ∠ ध य क / त्रिज्या ∴ छ य = (घ य × ज्या ∠ ध य क) / त्रिज्या
परन्तु कोण ध य क य विन्दु का अयन वलन है क्योंकि यह य के ध्रुवप्रोत-
वृत्त और कदम्बप्रोतवृत्त के बीच में है (देखो चित्र १०१) और य के ९० अंश के
आगे के भोगांश की क्रान्ति के समान होता है (देखो पृष्ठ ४८०) इसलिए ज्या

ग्रहयुत्यधिकार ५८३
∠ध य क की जगह पर य + ६०° की क्रान्तिज्या जो पृष्ठ ४८० के समीकरण (२)
के अनुसार ज्ञात होती है रखना चाहिए । यदि यह क्रान्ति ज्या क्रा के समान मान
ली जाय तो छ य = (ध य x क्रा) / त्रिज्या । इस समीकरण में सब परिमाणों को कलाओं
में समझना चाहिए ।
यह बतलाया गया है (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ १२२) कि परमक्रान्तिज्या
का मान १३६७ कला है और परमक्रान्ति २४° के समान मानी गयी है । २४ का
५८ गुना १३६२ होता है जो १३६७ के बहुत निकट है इसलिए यदि यह मान लिया
जाय कि २४ का ५८ गुना १३६७ के प्रायः समान है तो कोई हर्ज नहीं । इसलिए
जब २४ अंश की ज्या २४ x ५८ कला के समान होती है तब यह समझने में बहुत
हानि नहीं है कि किसी अंश की ज्या उसकी ५८ गुनी कला के समान होती है ।
इसलिए क्रा = क्रान्त्यंश x ५८ त्रिज्या = ६० x ५८ । इस प्रकार उपर्युक्त
समीकरण का रूप यह होगा :-
छय = (ध य x क्रान्त्यंश x ५८) / (५८ x ६०) = (ध य x क्रान्त्यंश) / ६० कला
कला की ६० गुनी विकला होती है इसलिए यदि ऊपर के समीकरण के
दाहने पक्ष को ६० से गुणा किया जाय तो उसका मान विकलाओं में बदल जायगा ।
परन्तु ६० से गुणा करने पर नीचे वाला ६० कट जायगा और समीकरण का रूप
यह होगा :-
छ य = ध य x क्रान्त्यंश विकला
यहां छ य = च य = आयन दृक्कर्म, ध य ग्रह ध का शर या विक्षेप कलाओं
में है और क्रान्ति अंशों में है । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि य के आगे के ६०
अंश की क्रान्ति को अंशों में लिख कर इसको विक्षेप की कलाओं से गुणा कर देने
पर जो आता है वह विकलाओं में ध ग्रह का आयन दृक्कर्म है जैसा कि श्लोक १०
में बतलाया गया है । इस नियम का दूसरा सरल रूप यह भी हो सकता है कि ग्रह
के आयन वलन को अंशों में लिखकर इसको ग्रह की विक्षेप कला से गुणा कर देने
से जो आता है वह विकलाओं में ग्रह का आयनदृक्कर्म है ।
अब यह देखना है कि यह आयनदृक्कर्म किस समय धनात्मक और किस समय
ऋणात्मक होता है अर्थात् इस आयनदृक्कर्म को ग्रह के भोगांश में किस समय जोड़ना
चाहिये और किस समय घटाना चाहिये । स्पष्टाधिकार के पृष्ठ २०० के चित्र ३६
को ध्यानपूर्वक देखने से पता चल सकता है कि जब तक ग्रह उत्तरायण रहता है,

५६० सूर्य-सिद्धान्त
अर्थात् सायन मकर राशि के आदि विन्दु उ से सायन कर्कराशि के आदि विन्दु द
तक कहीं रहता है तब तक उसका कदम्बप्रोतवृत्त ध्रुवप्रोतवृत्त से बायें रहता है
अर्थात् कदम्ब प्रोतवृत्त का तल ध्रुवप्रोतवृत्त के तल से ऊपर रहता है जैसा कि चित्र
३६ में दिखलाया गया है । परन्तु जब तक ग्रह दक्षिणायन रहता है अर्थात् सायन
कर्क राशि के आदि विन्दु द से सायन मकर राशि के आदि विन्दु उ तक कहीं रहता
है तब तक उसका कदम्ब प्रोतवृत्त ध्रुवप्रोतवृत्त से दाहने रहता है अर्थात् उसका
कदम्बप्रोतवृत्त का तल ध्रुवप्रोतवृत्त के तल से नीचे रहता है जैसा कि चित्र १०६
में दिखलाया गया है ।
चित्र ३६ से प्रकट है कि जब ग ग्रह उत्तरायण और इसका शर उत्तर है तब
इसका ध्रुवप्रोतवृत्त प विन्दु से पच्छिम है जहाँ इसका कदम्बप्रोतवृत्त, क्रान्तिवृत्त
को काटता है । परन्तु यदि उत्तरायण ग्रह का शर दक्षिण, मानलो च पर हो तो स्पष्ट
है कि इसका ध्रुवप्रोतवृत्त वही रहेगा जो ग का है परन्तु कदम्बप्रोत वृत्त च क ( जो
चित्र में नहीं दिखलाया गया ) क्रान्तिवृत्त को उससे पच्छिम काटेगा अर्थात् च
ग्रह का क्रान्तिवृत्त पर जो स्थान होगा उससे आगे पूर्व में ध्रुवप्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त को
काटेगा । अर्थात् पहली दशा में ग्रह के भोगांश से घटाने पर और दूसरी दशा में
जोड़ने पर ध्रुवप्रोतवृत्त और क्रान्तिवृत्त के सम्पात का स्थान ज्ञात होगा ।
इसी प्रकार चित्र १०६ से प्रकट है कि जब ग और घ ग्रह दक्षिणायन हैं इनके
कदम्बप्रोतवृत्त से दाहिने हैं । ऐसी दशा में उत्तर शर वाले ग ग्रह का ध्रुवप्रोतवृत्त
क्रान्तिवृत्त को फ स्थान पर काटता है जो य से आगे पूर्व में है इसलिए ब के भोगांश
में य फ जोड़ने से फ का स्थान ज्ञात होगा । परन्तु दक्षिण शर वाले घ का ध्रुवप्रोत-
वृत्त क्रान्तिवृत्त के च स्थान पर काटता है जो य से पीछे पच्छिम में है इसलिए ब
के भोगांश में च य ग घटाने पर च का स्थान ज्ञात होगा ।
यह प्रकट ही है कि जब ग्रह उत्तरायण रहता है तब इसके भोगांश में ६० अंश
जोड़ने से जो भोगांश आता है उसकी क्रान्ति सदैव उत्तर रहती है क्योंकि जब ग्रह
सायन मकर से आगे सायन कर्क तक कहीं रहता है तब इससे ६० अंश आगे का
भोगांश सायन मेष से आगे और सायन तुला के पहले रहता है जिसकी क्रान्ति उत्तर
होती है । इसी प्रकार जब ग्रह दणिणायन रहता है तब इसके भोगांश में ६० अंश
जोड़ने से जो भोगांश आता है उसकी क्रान्ति सदैव दक्षिण होती है । इसलिए जो
बात ऊपर उत्तरायण और दक्षिणायन के सम्बन्ध में कही गयी है वही उत्तर क्रान्ति
और दक्षिण क्रान्ति के सम्बन्ध में भी लागू होती है जैसा कि १० वें श्लोक के
उत्तरार्ध में बतलाया गया है ।

ग्रहयुत्यधिकार ५६१
१२ वें श्लोक की उपपत्ति—आक्ष और आयन दृक्कर्म संस्कार करने पर
ग्रहों के जो भोगांश आते हैं इनका अंतर जानकर यह देखना चाहिए कि दोनों ग्रहों
का यह अंतर कब शून्य होता है । जिस समय यह अंतर शून्य होता है उसी समय
दोनों ग्रहों की युति समप्रोतवृत्त पर होती है । इस समय यदि दोनों ग्रहों के शर एक
ही दिशा में हों अर्थात् दोनों उत्तर या दोनों दक्षिण हों तो दोनों का अन्तर निकालने
पर और यदि दोनों ग्रहों के शरों की दिशाएँ भिन्न हों अर्थात् एक का उत्तर और
दूसरे का दक्षिण हो तो दोनों शरों का योग करने पर जो आता है उतने ही अन्दर
पर दोनों ग्रह समप्रोतवृत्त पर देख पड़ते हैं ।
इस प्रकार सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार आक्ष और आयन दृक्कर्म का संस्कार
करने की रीति की उपपत्ति सिद्ध होती है जिससे यह पता तो चलता ही है कि यह
रीति स्थूल है क्योंकि कई कल्पनाओं से यह सिद्ध की गयी है ।
भास्कराचार्य जी के अनुसार दृक्कर्म—
भास्कराचार्यजी कहते हैं कि जिस समय ग्रह के क्रान्तिवृत्त का स्थान क्षितिज
में लग्न होता है उस समय ग्रह अपने शर के कारण क्षितिज के ऊपर रहता है या
नीचे रहता है। जिस समय ग्रह क्षितिज के ऊपर रहता है उस समय वह अपने
क्रान्तिवृत्त के स्थान से पहले ही उदय हो जाता है और जिस समय नीचे रहता
है उस समय वह पीछे उदय होता है । कितना पहले या पीछे उदय होता है यह
दृक्कर्म से जाना जाता है। इस दृक्कर्म के २ खंड होते हैं। एक खंड ग्रह के आयन-
वलन पर आश्रित और दूसरा आक्षवलन पर आश्रित रहता है । जो आयनवलन
पर आश्रित होता है उसको आयन दृक्कर्म और जो आक्षवलन पर आश्रित रहता
है उसको आक्षदृक्कर्म कहते हैं ।
चित्र १०८ में ग ग्रह का शर उत्तर है। ग का अहोरात्रवृत्त अ ग च छ रा
क्षितिज को छ विन्दु पर काटता है इसलिए जिस समय ग के क्रान्तिवृत्त का
स्थान गा क्षितिज पर है उस समय ग के अहोरात्रवृत्त का छ विन्दु क्षितिज पर
है इसलिए ग का उदय गा से उतना पहले हुआ है जितनी देर में ग के अहोरात्र-
वृत्त का ग छ खंड क्षितिज के ऊपर आया है। परन्तु ग छ=ग च+च छ जिनमें
से प्रत्येक का मान इस प्रकार जाना जाता है :
ग च की गणना—
गोलीय समकोण त्रिभुज ग गा च में ग च गा कोण समकोण है क्योंकि गा
का ध्रुवप्रोतवृत्त ग के अहोरात्रवृत्त को च स्थान पर काटता है इसलिए

५६२ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र १०८
उ छ गा द = पूर्व क्षितिजवृत्त
उ = उत्तर बिन्दु
ध = उत्तर ध्रुव
क = कदम्ब
उ ध अ वि ह = याम्योत्तरवृत्त
ग = ग्रह
गा = क्रान्तिवृत्त पर ग ग्रह का स्थान, इस समय यह पूर्व क्षितिज पर लग्न
भी है। क्रान्तिवृत्त इसलिए नहीं दिखलाया गया कि चित्र सरल रहे ।
अ ग च छ र = ग का अहोरात्र वृत्त
वि स प फ वी = विषुवद् वृत्त; क ग गा = ग का कदम्बप्रोतवृत्त
ध च गा प = गा का ध्रुवप्रोतवृत्त
ध छ फ = छ का ध्रुवप्रोतवृत्त।
ग च = आयनदृक्कर्म; च छ = आक्षदृक्कर्म; ग गा = ग ग्रह का शर या विक्षेप
गा च = ग ग्रह का स्पष्ट शर (देखो गणिताध्याय ग्रहच्छायाधिकार श्लोक)
∠ ग गा च = गा का आयनवलन
∠ उ गा ध = गा का आक्षवलन

ग्रहयुत्यधिकार ५६३
ज्या ग च ज्या ∠ ग गा च आयनवलन ज्या
――――― = ―――――――― = ―――――――――
ज्या ग गा ज्या ९०° त्रिज्या
ज्या ग गा × आयनवलन ज्या
∴ ज्या ग च = ―――――――――――――――― (१)
त्रिज्या
परन्तु ग च अहोरात्रवृत्त का खंड है और इसके सामने का कोण ध्रुव पर
ग ध च के समान है जो विषुवद्वृत्त के स प खंड के समान है। इसलिए यह
जानने के लिए कि ग च खंड कितनी देर में उदय होता है हमें स प खंड का जानना
आवश्यक है जो इस अनुपात से जाना जाता है—
ज्या ग च ज्या ग ध ज्या ग ध
――――― = ――――― = ――――― (२)
ज्या स प ज्या ध स त्रिज्या
परन्तु ग ध = ध स — ग स = ९०° — ग की क्रान्ति
∴ ज्या ग ध = ग की क्रान्ति कोटिज्या
त्रिज्या × ज्या ग च
∴ ज्या स प = ――――――――――
ज्या ग ध
त्रिज्या ज्या ग गा × आयनवलनज्या
= ―――――――――――― × ―――――――――――――――――
ग की क्रान्ति कोटिज्या त्रिज्या
ज्या ग गा × आयनवलनज्या
= ―――――――――――――――――
ग की क्रान्ति कोटिज्या
शर ज्या × आयनवलनज्या
∴ आयनदृक्कर्म = ――――――――――――――
क्रान्ति कोटिज्या
इस क्रिया से स प का जो मान आवेगा वह कलाओं में होगा यदि ज्याओं
और कोटिज्याओं की गणना भारतीय रीति से की जायगी। इसका अर्थ यह हुआ
कि केवल आयनवलन के कारण ग का उदयकाल गा के उदयकाल से स प असुओं
के समान आगे होगा। यदि यह जानना हो कि इतनी देर में क्रान्तिवृत्त का कौन
सा खंड उदय होगा तो इसको १८०० से गुणा करके जिस राशि में ग्रह हो उसके
लंकोदयासुओं से भाग देना चाहिए क्योंकि यह तो स्पष्ट ही है कि जब राशि के
लंकोदयासुओं में राशि का ३० अंश या १८०० कला उदय होता है तब जितने
समय में स प का उदय होता है उतने समय में राशि का कितना खंड उदय होगा।
यही ग्रहच्छायाधिकार के श्लोक ४ का सार है।
च छ की गणना
समकोण गोलीय त्रिभुज च गा छ में गा च छ कोण समकोण है क्योंकि गा

५६४ सूर्य-सिद्धान्त
च ध्रुवप्रोतवृत्त का खंड है, च छ अहोरात्रवृत्त का खंड है जो ध्रुवप्रोतवृत्त से समकोण
पर होता है। गा च को भास्कराचार्यजी ने ग का स्पष्ट शर माना है और भेद
दिखलाने के लिए ग गा को मध्यम शर माना है। कोण च गा छ = कोण ध गा उ =
आक्षवलन । यदि गा विषवद्वृत्त के पास हो तो कोण ध गा उ अक्षांश के समान
माना जा सकता है। ऐसी दशा में और यदि च गा छ त्रिभुज समतल-त्रिभुज मान
लिया जाय क्योंकि ग्रह का स्पष्ट शर गा च साधारणतः बहुत छोटा होता है तब
च छ गा कोण लम्बांश के समान माना जा सकता है क्योंकि ६०° - अक्षांश =
लम्बांश । ऐसी दशा में चूंकि गोलीय त्रिभुज च गा छ में
ज्या च छ ज्या च गा
─────────── = ───────────
ज्या ∠ च गा छ ज्या च छ गा
ज्या स्पष्ट शर X ज्या आक्षवलन
अथवा ज्या च छ = ───────────────────────
लम्ब ज्या
परन्तु च छ का मान विषवद्वृत्त के प फ खंड के समान है जो सजातीय
त्रिभुज ध च छ और ध प फ से इस प्रकार जाना जाता है :—
ज्या प फ ज्या ध प त्रिज्या
─────── = ─────── = ─────────────
ज्या च छ ज्या ध च ज्या (६०° - च प)
त्रिज्या त्रिज्या
= ─────────────────── = ─────────────
ज्या (६०° - ग्रह की क्रान्ति) क्रान्ति कोटिज्या
⸪ ज्या प फ = ज्या च छ X त्रिज्या
──────────────
क्रान्ति कोटिज्या
ज्या स्पष्ट शर X ज्या आक्षवलन X त्रिज्या
= ──────────────────────────────
क्रान्ति कोटिज्या X लम्ब ज्या
यही ग्रहच्छायाधिकार के ७वें श्लोक का अर्थ है। इस प्रकार प फ का जो
मान कलाओं में आवेगा वही आक्षदृक्कर्म है ।
आक्ष और आयन दृक्कर्म किस समय जोड़ना और किस समय घटाना चाहिए
इसके लिए वही नियम हैं जो पहले सूर्य सिद्धान्त के सम्बन्ध में बतलाया गया है ।
स्पष्ट शर को जानने की एक रीति जो कुछ स्थूल है भास्कराचार्यजी ने
ग्रहच्छायाधिकार के तीसरे श्लोक में यों बतलायी है :—
ग्रह के भोगांश में तीन राशि जोड़ने से जो भोगांश आवे उसकी क्रान्ति की
कोटिज्या को अर्थात् द्युज्या को मध्यम शर से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या से

ग्रहयुत्यधिकार ५६५
भाग दे देना चाहिए। यह नियम चित्र १०८ के गोलीय समकोण त्रिभुज ग गा च
से स्पष्ट है। क्योंकि ग्रह के भोगांश में ६०° जोड़ने से जो आता है उसकी क्रान्ति
अयनवलन के समान होती है (देखो चन्द्रग्रहणाधिकार श्लोक २५) जो यहाँ ग गा च
कोण के समान है इसलिए उसकी क्रान्ति-कोटिज्या अयनबलन-कोटिज्या के समान
होगी। यदि गा ग च त्रिभुज समतल समकोण त्रिभुज मान लिया जाय तो
∠ गा ग च = ६०° - ∠ ग गा च = ६०° - आयनवलन
ज्या ग गा ज्या गा च ज्या गा च
∵ ————————————— = ———————————————— = ——————————————————
ज्या ∠ ग च गा ज्या ∠ गा ग च ज्या ६०°—आयनवलन
ज्या ग गा × ज्या (६०° - आयनवलन)
∴ ज्या गा च = ————————————————————————————————
ज्या ६०°
ज्या मध्यम शर × ज्या (६०° - आयनवलन)
= ————————————————————————————————————
त्रिज्या
मध्यम शर ज्या × अयनवलन कोटिज्या
= —————————————————————————————————
त्रिज्या
ग्रहों के विम्बमान—
कुजार्किज्ञामरेज्यानां त्रिंशत्सार्धार्धवर्धिता ।
विष्कम्भश्चन्द्रकक्ष्यायां भृगोष्षष्टिरुदाहृतः ॥१३॥
चित्रतुःकर्णयोगाप्तास्ते द्विघ्नास्त्रिज्यया हताः ।
स्फुटाः स्वकर्णास्तिथ्याप्ता भवेयुर्मानलिप्तिकाः ॥१४॥
अनुवाद—(१३) मंगल, शनि, बुध, गुरु और शुक्र के बिम्बों के व्यास
चन्द्रकक्षा में क्रमानुसार ३०, ३७।।, ४५, ५२।। और ६० योजन हैं । (१४) किसी
ग्रह के बिम्ब का स्पष्ट व्यास जानने के लिए उस ग्रह के ऊपर लिखे हुए व्यास के
दुगुने को त्रिज्या (३४३८) से गुणा करके गुणनफल को त्रिज्या और उस ग्रह के
चतुर्थ शीघ्रकर्ण के योग से भाग देने से जो लब्धि आती है वही बिम्ब का स्पष्ट
व्यास होता है। यदि इसको १५ से भाग दे दिया जाय तो कलाओं में बिम्ब का
परिमाण मालूम हो जाता है।
विज्ञान भाष्य—१३वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि ग्रहों के बिम्बों
के व्यास चन्द्रकक्षा में क्या हैं। इसके आधार पर चन्द्रग्रहणाधिकार के श्लोक १-३
के अनुसार यह विलोम रीति से जाना जा सकता है कि अपनी कक्षा में ग्रह के बिम्ब
का व्यास क्या है। परन्तु युति के सम्बन्ध में यह जानने की कोई आवश्यकता नहीं
होती। यहाँ तो केवल यह जानना चाहिए कि युतिकाल में ग्रहबिम्ब का कलात्मक