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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

त्रिप्रश्नाधिकार २४१ अन्तर होता जाता है । उदाहरण के लिए ध्रुवतारे १ (polaris) के विषुवांश २ और क्रान्ति यही हैं :- १८५० ई० की पहली जनवरी को { विषुवांश १ घ० ५ मि० २३ से० { क्रान्ति + ८८° ३०' ४६" १९०० ई० की { विषुवांश १ घंटा २३ मिनट ० सेकंड पहली जनवरी को { क्रान्ति + ८८° ४६' ५३" यह कहा जा सकता है कि विषुवांश और क्रांति के परिवर्तन का कारण यह है कि तारा स्वयं चलता है । दूसरा अनुमान यह हो सकता है कि विषुवांश और क्रान्ति जिन भुजयुग्मों (axes of coordinates) से निश्चय किये जाते हैं उन्हीं में परिवर्तन होता होगा । ५० वर्ष में ध्रुवतारे की क्रांति १६' ४" अधिक हुई जिससे स्पष्ट होता है कि ध्रुवतारे से ध्रुव का अन्तर प्रायः १६" प्रतिवर्ष कम हो रहा है अर्थात् या तो ध्रुवतारा ध्रुव की ओर जा रहा है या ध्रुव ध्रुव-तारे की ओर जा रहा है। जब अन्य तारों से ध्रुवतारा के अन्तरों की तुलना की जाती है तो देख पड़ता है कि इनमें परस्पर इतनी भिन्नता नहीं हो रही है जितनी ध्रुव और ध्रुवतारे में हो रही है । ध्रुवतारे में जो स्वयं गति (proper motion) है वह इतनी सूक्ष्म है कि इससे १६" प्रति वर्ष का अंतर नहीं पड़ सकता । यह भी देखा गया है कि ५० वर्षों में ध्रुव से अन्य तारों का भी अन्तर बहुत कम पड़ गया है परन्तु उनका परस्पर अंतर प्रायः जैसे का तैसा ही है। इन सब बातों से यही परिणाम निकलता है कि ध्रुव ओर ध्रुवतारे के बीच का अन्तर ध्रुवतारे की गति के कारण नहीं कम हो रहा है वरन् आकाशीय ध्रुव की गति के कारण कम हो रहा है । यदि ध्रुव अपना स्थान सदैव बदलता रहता है तो यह भी आवश्यक है कि विषुवद्वृत्त भी जो ध्रुव से सदैव ९० अंश दूर रहता है अपना स्थान निरन्तर बदला करे । पर विषुवद्वृत्त के चलते रहने पर भी क्रान्तिवृत्त से उसका जो मध्यम झुकाव है वह सदैव प्रायः एक सा रहता है । यह झुकाव मध्यम मान से केवल कुछ कलाएँ इधर उधर आन्दोलन करता है । सूर्य की परम क्रान्ति १८५० ई० में जितनी थी प्रायः उतनी ही १९०० ई० में थी इसलिए विषुवद्वृत्त और क्रान्ति वृत्त के बीच १. Balls' Spherical Astronomy pp. 171. साधारणतः लोग समझते हैं कि ध्रुवतारा एक ही जगह देख पड़ता है और इसी की परिक्रमा अन्य तारे करते हैं परन्तु यह ठीक नहीं है । ध्रुवतारा भी आकाशीय ध्रुव की जो अदृश्य है परिक्रमा करता है और उसके बहुत पास है इसलिए कुछ भेद नहीं जान पड़ता । २. देखो चित्र ४० और इसका वर्णन । १६

२४२ सूर्य-सिद्धान्त का कोण प्रायः स्थिर रहता है। इससे यह सिद्ध होता है कि विषुवद्वृत्त इस प्रकार चलता है कि यह क्रान्तिवृत्त को सदैव समान कोण पर काटता है और विषुव सम्पात बिन्दु (वसंत या शरद सम्पात विन्दु) पृथ्वी की गति की विलोम दिशा में भ्रमण कर रहा है । इससे यह सिद्ध होता है कि कदम्ब (क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव) स्थिर है और आकाशीय ध्रुव (विषुवद्वृत्तीय ध्रुव) उसके चारों ओर सदैव समान दूरी पर रहता हुआ परिक्रमा कर रहा है। इसी गति को विषुव सम्पात विन्दु का चलन (Preces- sion of equinoxes) या अयन चलन कहते हैं। यह गति विशेषकर सूर्य और चन्द्रमा के आकर्षण के कारण होती है इसलिए इसको चांद्र-सौर अयन चलन (luni-solar precession) कहते हैं । चांद्र-सौर अयन चलन का कारण ऊपर सिद्ध हो चुका है कि जिस अक्ष पर पृथ्वी २४ घंटे में एक बार घूम जाती है उसकी दिशा में जो परिवर्तन होता है उसीसे विषुव सम्पात विन्दु चल रहा है। पृथ्वी की अक्ष की दिशा में जो विचलन हो रहा है उसका कारण यह है कि पृथ्वी पूर्ण गोल नहीं है वरन् ध्रुवों पर कुछ चपटी और विषुवत् रेखा पर कुछ उभड़ी हुई है इसलिए सूर्य और चन्द्रमा का लब्ध (resultant) आकर्षण इसके केन्द्र से होकर नहीं जाता है। चित्र ५२ में स को सूर्य, क को पृथ्वी का केन्द्र ध धा को पृथ्वी का अक्ष जो आकाश तक बढ़ा दिया गया है, व वा को विषुवत रेखा, अ को वह विन्दु जहां सूर्य का आकर्षण काम कर रहा है तथा अ आ को सूर्य के आकर्षण की दिशा समझो । यदि पृथ्वी पूर्ण गोल होती तो अ और क एक ही विन्दु पर होते जिससे व वा विषुवत् रेखा का तल सूर्य की ओर न झुकता । चित्र से यह भी प्रकट है कि निरक्षदेशीय मेखला का आधा भाग जो वा की ओर है सूर्य के निकट है और दूसरा आधा भाग जो व की ओर है सूर्य से दूर है। इसलिए सूर्य का आकर्षण व भाग की ओर कम होगा जिसका परिणाम यह होता है निरक्षदेशीय तल सूर्य की ओर कुछ झुक जाता है जिससे 'पृथ्वी का अक्ष ध धा कुछ डगमगा जाता है। इससे यह भी जान पड़ता है कि विषुवद्वृत्त का तल झुकते-झुकते क्रान्तिवृत्त के तल से जिस पर सूर्य रहता है अंत में मिल जायगा और पृथ्वी का अक्ष क्रान्तिवृत्त से समकोण बनाने लगेगा तथा ध्रुव और कदम्ब एक हो जायेंगे। परन्तु बात ऐसी नहीं है। क्योंकि पृथ्वी बहुत तीव्र गति से अपने अक्ष पर घूम रही है जिससे विषुवद्वृत्त और क्रान्तिवृत्त के तलों के बीच का कोण सदैव प्रायः एक सा बना रहेगा और ध्रुव कदम्ब के चारों ओर एक वृत्त पर परिक्रमा करता रहेगा। ठीक ऐसी ही बात लट्टू या फिरकी के घूमने में भी होती है। जिस समय

त्रिप्रश्नाधिकार २४३ चित्र ५२ लट्टू तीव्र गति से घूमता रहता है उस समय उसका अक्ष उसके भार या गुरुत्व के प्रभाव से लम्ब-रेखा से कुछ झुका अवश्य रहता है परन्तु गति की तीव्रता के कारण वह पृथ्वी के धरातल से मिल नहीं जाता। हां, जिस समय गति बहुत मंद हो जाती है उसी समय लट्टू पृथ्वी पर लग जाता है। चित्र ५३ में अ लट्टू का गुरुत्व केन्द्र (Centre of gravity) है जिस पर लट्टू का गुरुत्व अथवा पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण अ गु रेखा की

२४४ सूर्य-सिद्धान्त चित्र ५३ सीध में काम कर रहा है, ध धा लट्टू के अक्ष की रेखा है जिसका एक सिरा ध भूतल पर लगा हुआ घूम रहा है और दूसरा सिरा धा ध क लम्ब रेखा से कुछ हटा हुआ इसी की परिक्रमा कर रहा है । जब तक लट्टू की गति तीव्र रहती है तब तक यह इसी भाँति भूतल की ओर प्रायः एक सा झुका हुआ क ध लम्ब की परिक्रमा करता रहता है । क ध रेखा के चारों ओर एक परिक्रमा जितने समय में होती है उतने समय में लट्टू ध धा अक्ष पर नहीं मालूम कितनी बार घूम जाता है । इसी प्रकार पृथ्वी अपने अक्ष पर २४ घंटे में एक बार घूमती हुई क्रान्तिवृत्तीय अक्ष की, जिसकी तुलना ध क लम्ब रेखा से हो सकती है, कोई २५००० वर्ष में एक परिक्रमा

त्रिप्रश्नाधिकार २४५ कर लेती है जिसके कारण वसंत-सम्पात प्रति सायन* वर्ष ५०.३ विकला के लगभग विलोम दिशा में खसकता जाता है । चित्र ५२ और ५३ में समानता दिखाने के लिए कई अक्षर एक से हैं । चित्र ५२ में पृथ्वी लट्टू की तरह है, अ इसका सौराकर्षण केन्द्र है, घ धा लट्टू का अक्ष है और यदि क से स अ के समानान्तर रेखा खींची जाय तो यह घ क के समान होगी । जो कुछ सूर्य के सम्बन्ध में कहा गया है वही चंद्रमा के लिए भी लागू होता है । चंद्रमा का प्रभाव सूर्य के प्रभाव के दूने से कुछ अधिक होता है क्योंकि चन्द्रमा पृथ्वी के बहुत पास है । सूर्य और चंद्रमा में से प्रत्येक का प्रभाव उस समय सबसे अधिक होता है जिस समय इनकी उत्तर या दक्षिण क्रांति सबसे अधिक होती है । जिस समय यह विषु- वद्वृत्त पर होते हैं उस समय इनका प्रभाव शून्य होता है। परन्तु ग्रहों का उलटा प्रभाव भी वसंत संपात की गति पर पड़ता है । ग्रह सम्बन्धी विचलन का परिमाण प्रति वर्ष ०.११ विकला पूर्व की ओर होता है । ग्रहों के कारण वसंत सम्पात में ही विचलन नहीं होता वरन् पृथ्वी की कक्षा भी विचलित होती है जिससे क्रान्तिवृत्त का तल डगमगा जाता है तथा क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच का कोण (परम अपक्रम) प्रतिवर्ष आधा विकला के लगभग कम होता जा रहा है। परन्तु यह कभी एक सीमा के भीतर ही, अर्थात् मध्यम स्थान से १ १/३ अंश कम या अधिक होती है । अभी तक बतलाया गया है कि सौर चान्द्र अयन चलन के कारण आकाशीय ध्रुव कदम्ब की परिक्रमा एक वृत्त पर कर रहा है। परन्तु यह कुछ स्थूल है। इसका कारण यह है कि चन्द्रमा सदैव क्रान्तिवृत्त पर नहीं रहता वरन् इससे ५ अंश के लगभग उत्तर या दक्खिन हो जाता है तथा इसका पात (राहु) प्रायः १८ वर्ष में एक *वसंत सम्पात विन्दु से चल कर जितने समय में सूर्य फिर वसंत सम्पात विन्दु पर आ जाता है उतने समय को सायन वर्ष (tropical year) कहते हैं । यह ३६५.२४२२१६ मध्यम सावन दिन के समान होता है । क्रान्तिवृत्त के एक विन्दु से चल कर जितने समय में सूर्य फिर उसी विन्दु पर आ जाता है उसे नाक्षत्र सौर वर्ष (Sidereal year) कहते हैं । यह ३६५.२५६३७४ मध्यम सावन दिन के समान होता है । यही रवि या पृथ्वी का शुद्ध भगणकाल भी कहलाता है । (देखो मध्यमाधिकार पृष्ठ २०) सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार रवि का जो भगणकाल है वही (३६५.२५८७५६ मध्यम सावन दिन) । सौर वर्ष हमारे यहाँ माना जाता है । (देखो मध्याधिकार पृष्ठ २०)

२४६ सूर्य-सिद्धान्त परिक्रमा कर लेता है। अयन चलन के कारण जिस प्रकार आकाशीय ध्रुव क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव की परिक्रमा २३°२७' व्यासार्द्ध के वृत्त पर करता है उसी प्रकार राहु की विलोम गति के कारण चन्द्रकक्षा का ध्रुव भी क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव की परिक्रमा ५° व्यासार्द्ध के वृत्त पर करता है और इस चन्द्रकक्षा के ध्रुव की परिक्रमा आकाशीय ध्रुव अयन चलन के उस भाग के कारण करता है जो चन्द्रमा के प्रभाव से होता है। इन दोनों कारणों से आकाशीय ध्रुव कभी मध्यम स्थान से कुछ आगे रहता है और कभी पीछे तथा कदम्ब से इसकी दूरी कभी कुछ कम हो जाती है और कभी कुछ अधिक । इसलिए आकाशीय ध्रुव का यथार्थ मार्ग तरंगाकार होता है। इस परिवर्तन का चक्र प्रायः १८ वर्ष का होता है जितने में राहु का एक चक्र होता है। चन्द्रमा के कारण आकाशीय ध्रुव के स्थान में जो यह तनिक सा परिवर्तन होता है उसे अक्षविचलन (nutation) कहते हैं । अक्षविचलन का परिणाम यह होता है कि वसंत सम्पात विन्दु अपने मध्य स्थान से जो सौर चान्द्र, और ग्रह संबंधी अयन चलन से निश्चय किया जाता है कभी आगे रहता है और कभी पीछे। इसके कारण क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच का झुकाव (परमापक्रम) भी अपने मध्यम मान से कभी कुछ कम और कभी कुछ अधिक होता है। अक्षविचलन का आविष्कार ब्रैडली नामक ज्योतिषी ने १७८४ विक्र- मीय से १७९८ विक्रमीय की (१७२७- १७४१ ईस्वी) अवधि में, अजगर के 'ग, तारे (γ.Draconis) के निरंतर वेध से किया था। अक्षविचलन का स्पष्ट ज्ञान चित्र ५४ से होता है।

त्रिप्रश्नाधिकार २४७ मान लो धिधी एक छोटा वृत्त है जिसे मध्यम ध्रुव कदम्ब की परिक्रमा करता हुआ बना रहा है । धि को केन्द्र मानकर एक दीर्घवृत्त खींचो जिसका दीर्घ अक्ष कदम्ब की सीध में हो और १८''.५ बड़ा हो और लघु अक्ष उसी छोटे वृत्त पर १३''.७ बड़ा हो । ज्यों-ज्यों मध्यम ध्रुव धि छोटे वृत्त पर दीर्घ वृत्त को अपने साथ लेता हुआ समान गति से विलोम दिशा में चलता है त्यों-त्यों यथार्थ ध्रुव ध दीर्घ वृत्त की परिधि पर ६७६८ दिन में (राहु के भगण-काल में) एक परिक्रमा करता जाता है । धि क कदम्ब से ध्रुव का मध्यम अंतर और ध क स्पष्ट अंतर है। जिस समय ध दीर्घ अक्ष पर रहता है उस समय वसंत सम्पात विन्दु के मध्यम और स्पष्ट स्थान एक होते हैं अन्यथा वसंत सम्पात विन्दु का स्पष्ट स्थान मध्यम स्थान से कुछ आगे या पीछे होता है । इसी प्रकार जब ध लघु अक्ष पर रहता है तब कदम्ब से ध्रुव के मध्यम और स्पष्ट अन्तर अथवा मध्यम और स्पष्ट झुकाव (क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच का कोण) एक होता है अन्यथा कुछ कम या अधिक । अयन चलन और परमाप क्रम की वार्षिक गति स्थिर नहीं होती वरन् इनमें कुछ सूक्ष्म परिवर्तन होता रहता है । एक सायन वर्ष में इनके जो मान होते हैं वह नीचे लिखे सूत्रों से जो भौतिक ज्योतिर्विज्ञान तथा उच्च गणित के आधार पर स्थापित किये गये हैं प्रकट होते :— १८०० ईस्वी से 'व' वर्ष उपरान्त, सायन वार्षिक मध्यम अयन चलन (वसंत संपात चलन) = ५०''.२५६४ + ०''.०००२२२५ व* (१) तथा विषुवद्वृत्त और क्रान्तिवृत्त के बीच का कोण (यदि अन्य छोटे पदों को छोड़ दिया जाय) = २३°२७'८''.२६ - ०''.४६८ व* (२) अक्ष विचलन के कारण वसंत सम्पात विन्दु के मध्यम स्थान में जो संस्कार करना पड़ता है उसका सूत्र यह है --

  • १७''.२३५ ज्या (सायन राहु) - १''.२७ ज्या (२ सायन सूर्य)* (३) तथा क्रान्ति वृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच के कोण के मध्यम मान में जो संस्कार करना पड़ता है उसका सूत्र यह है-
  • ६''.२१ कोटिज्या (सायन राहु) + ०''.५५ कोटिज्या (२ सायन सूर्य)* (४)
  • R. S. Ball’s Spherical Astronomy pp. 177, 186-187 ।

२४८ सूर्य-सिद्धान्त इष्ट काल में राहु का जो सायन भोगांश होता है अर्थात् विषुव सम्पात बिन्दु से क्रान्तिवृत्त पर राहु जितना दूर होता है वही सायन राहु तथा सूर्य का जो सायन भोगांश होता है वह सायन सूर्य कहा गया है । इस अयन चलन के कारण वसंत संपात बिंदु से प्रत्येक तारे का अंतर सदैव बढ़ रहा है जिससे तारे का सायन भोगांश बढ़ता जाता है। यदि बर्ष के आरंभ का तारे का भोगांश दिया हुआ हो तो किसी अन्य समय का भोगांश इस सूत्र† से जाना जाता है--- ता=त+५०".२६व - १७".२३५ ज्या (सायन राहु) - १".२७ ज्या (२ सायन सूर्य) (५) जहाँ त = वर्ष के आरंभ में तारे का मध्यम सायन भोगांश, व = वर्ष के आरंभ से इष्ट काल का अन्तर ( वर्ष के दशमलव भिन्न में ) इस सूत्र के दाहिने पक्ष का दूसरा पद ५०".२६व मुख्य है क्योंकि व जितना ही बड़ा होता जायगा उतना ही अधिक तारे का भोगांश होगा । तीसरे पद में सायन राहु आया है जो यदि शून्य या १८०° हो तो ज्या सायन राहु शून्य होगा। इस समय तीसरा पद बिल्कुल लुप्त हो जायगा, अर्थात् जब सायन राहु का भोगांश शून्य या १८०° हो तो तीसरा पद उड़ जायगा । और जब सायन राहु ९०° होगा तो तीसरे पद का मान - १७".२३५ तथा जब सायन राहु २७०° होगा तब तीसरे पद का मान + १७".२३५ होगा। इसके कारण राहु के एक भ्रमण काल में वसंत सम्पात विन्दु का स्पष्ट स्थान ९ वर्ष के लगभग मध्यम स्थान से पूर्व और ९ वर्ष के लगभग मध्यम स्थान से पच्छिम रहता है। सूर्य के कारण भी जो तनिक सा अक्ष विचलन होता है वह चौथे पद से सूचित किया गया है। इसका चक्र ६ महीने में बदलता है क्योंकि जिस समय सूर्य का सायन भोगांश शून्य, ९०°, १८०°, २७०° और ३६०° होगा उस समय चौथे पद का मान शून्य होगा और जिस समय सूर्य का भोगांश ४५°, १३५°, २२५°, ३१५° होगा उस समय इसके मान क्रमानुसार-१".२७, +१".२७, -१".२७ और +१".२७ होंगे । इसी प्रकार परमाप क्रम में भी अक्ष विचलन के कारण परिवर्तन होता रहता है। अब इन सूत्रों से अयनांश जानने की रीति का उदाहरण दिया जाता है :- † इस सूत्र का निश्चय ज्योतिषियों के एक सम्मेलन में जो पेरिस में हुआ था सन् १८९६ ई० के मई मास में किया गया था (देखो R. S. Balls' Spherical Astronomy pp. 186.) ।

त्रिप्रश्नाधिकार २४६ समीकरण (१) में वसंत सम्पात की वार्षिक गति का सूत्र दिया हुआ है। परन्तु यह वर्ष सायन है और हमारा वर्ष जो सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार माना जाता है इससे बड़ा है। इसलिये पहले वैराशिक से यह जानना चाहिये कि हमारे एक वर्ष में अयन की गति क्या होती है अर्थात् जब ३६५.२४२२१६ दिन में अयन गति ५०".२५६४+०".०००२२२५ व होती है तब ३६५.२५८७५६५ दिन में क्या होगी। सरल करने पर १६०० ई० की जनवरी के आरम्भ काल में सूत्र का रूप यह होता है। ५०".२५८६७६+.०००२२२५१ व* (६) और १६२२ ई० की जनवरी के आरम्भ काल में वार्षिक अयन गति का सूत्र उपर्युक्त सूत्र में 'व' की जगह २२ रखकर सरल करने से यह आता है— ५०".२६३५७१+.०००२२२५१ वां (७) जनवरी के आरम्भ से मेष संक्रान्ति काल तक प्रायः १०२ दिन या .२७६३ वर्ष होते हैं इसलिए यदि सूत्र (७) में व की जगह .२७६३ रख कर सरल किया जाय तो १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में अयन की वार्षिक गति ५०."२६३६३३+.००० २२५१ व (८) होगी जब कि व का मान हमारे सिद्धान्तीय वर्ष के अनुसार लिया जाय । इस सूत्र से यह बात जानी जाती है कि वसंत सम्पात बिन्दु प्रति वर्ष (हमारे सिद्धान्त के अनुसार) क्रान्तिवृत्त के किसी बिन्दु से कितना पीछे हट जाता है। परन्तु हमारा सिद्धान्तीय वर्ष शुद्ध नाक्षत्र सौर वर्ष से .००२३८२०६७ दिन बड़ा है।†† इसलिये इतने समय में हमारे मेष संक्रान्ति का बिन्दु प्रति वर्ष कुछ आगे बढ़ जाता है। इसका परिमाण जानने के लिए मेष संक्रान्ति काल में सूर्य की जो स्पष्ट दैनिक गति होती है उससे उपर्युक्त अन्तर को गुणा करना चाहिये ।

  • यदि शुद्ध नाक्षत्र वर्ष लिया जाय जो ३६५.२५६३७४४ दिन का होता है तो एक शुद्ध नाक्षत्र सौर वर्ष में अयन गति ५०."२५८३५१+.०००२२२५१ व होती है। † शुद्ध नाक्षत्र सौर वर्ष के अनुसार १६२२ की जनवरी के आरम्भ में वार्षिक अयन गति ५०".२६३२४६+०".०००२२२५१ व और १६२२ की मेष संक्रान्ति जो १६७६ विक्रमी की मेष संक्रान्ति है इसका रूप ५०".२६३३०८+०".०००२२२५१ व होगा । †† ३६५.२५८७५६४८४ में से ३६५.२५६३७४४१७ घटाने पर यह आता है।

२५० सूर्य-सिद्धान्त १८२२ ई० के 'नाटिकल अलमनक' से मेष संक्रान्ति काल के आगे और पीछे के सूर्य के भोगांशों का अन्तर ५८'४६''.२ होता है। इसलिए इस दिन सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति ५८'४६''.२ होती है। इसको उपर्युक्त अन्तर से गुणा करने पर ८''.३६६६ सूर्य की गति होती है। इसलिए यह समझना चाहिये कि हमारे वर्ष के कुछ बड़ा होने के कारण अयनांश में प्रति वर्ष ८''.३६६६ की वृद्धि होती है। इसको सूत्र (८) में सम्मिलित करने से संक्रान्ति काल में वार्षिक अयन गति का सूत्र यह होगा— ५०''.२६३६३३ + .०००२२२५१ व + ८''.३६६६ अथवा ५८''.६६३२३३ + .०००२२२५१ व (६) यदि यह जानना हो कि 'व' वर्ष में अयनांश की वृद्धि क्या होगी तो यह सूत्र काम में लाना होगा— ५८''.६६३२३३ व + .०००२२२५१ { व (व + १) / २ } † अथवा ५८''.६६३२३३ व + .०००१११२५५ व + .०००१११२५५ व² या ५८.६६३३४४२५५ व + .०००१११२५५ व² या संक्षेप में ५८.६६३२४४ व + .०००१११२५५ व² (१०) इससे अयनांश की जो वृद्धि आवे उसमें अक्ष विचलन का संस्कार सूत्र (३) के अनुसार करना चाहिए। अब यह देखना है कि १८७६ वि० कि मेष संक्रान्ति काल में अयनांश कितना था। इसके लिए केवल यह जानना पर्याप्त है कि मेष संक्रान्ति काल में सूर्य का वेध- सिद्ध सायन भोगांश क्या है जिसके जानने का आदेश अगले ११वें तथा १७-१८ श्लोकों में है। इसी अध्याय में आगे यह बतलाया जायगा कि शंकु की छाया नापकर सूर्य का सायन भोग कैसे जाना जा सकता है और उससे अयनांश कैसे जाना जा सकता है। आजकल यह काम दूरदर्शक यंत्रों से बहुत सूक्ष्मतापूर्वक हो सकता ———————————————————————————————————————————— † सूत्र (६) के दूसरे पद में जो व है उसकी जगह क्रमानुसार १, २, ३,···व तक उत्थापन करके सब को जोड़ने से .०००२२२५१ × { व (व + १) / २ } आता है। यह श्रेढी व्यवहार (Arithmetical progression) की संख्याओं के जोड़ने की तरह है।

त्रिप्रश्नाधिकार २५१ है। जिस समय मेष संक्रान्ति होती है उसी समय का सूर्य का सायन भोग जान लिया जाय तो यही अयनांश होता है। परन्तु दूरदर्शक यंत्रों के अभाव में यही बात नाविक पंचांग (Nautical almanac) से भी जानी जा सकती है। इसलिए इसी से १९७९ विक्रमीय अथवा १९२२ ई० की मेष संक्रान्ति काल का सूर्य का सायन भोग निकाला जाता है। १९७९ विक्रमीय की मेष संक्रान्ति सूर्य सिद्धान्त के अनुसार १३ अप्रैल गुरुवार को उज्जैन के मध्यम ६ बजे प्रातःकाल के उपरांत १८ घड़ी ४७ पल १२ विपल पर हुई। काशी उज्जैन से ७२ पल ५० विपल† पूर्व है। इसलिए काशी में मेष संक्रान्ति मध्यम ६ बजे के उपरांत २० घड़ी ० पल और २ विपल पर होगी। परन्तु काशी ग्रीनविच से ८३°३′४″ अथवा १३ घड़ी ५० पल ३१ विपल पूर्व है। इसलिए जिस समय काशी में मेष संक्रान्ति हुई उस समय ग्रीनविच में मध्यम ६ बजे के उपरांत ६ घड़ी ६ पल ३१ विपल रहा होगा। इस वर्ष १२ अप्रैल के मध्यम मध्याह्न काल में सूर्य का भोगांश* २१°४७′३१″.५ और १३ ,, ,, ,, ,, २२°४६′१७″.७ अंतर ५८′४६″.२ इसलिए ६० घड़ी में सूर्य की स्पष्ट गति ५८′४६″.२ हुई। १३ अप्रैल को ग्रीनविच का मध्याह्न काल मध्यम ६ बजे से ६ घंटे अथवा १५ घड़ी उपरांत हुआ और मेष संक्रान्ति मध्यम ६ बजे से ६ घड़ी ६ पल ३१ विपल पर ही हो गयी इसलिए संक्रान्ति काल से १५ घड़ी—६ घड़ी ६ पल ३१ विपल= ८ घड़ी ५० पल २६ विपल पश्चात् १३ अप्रैल का मध्याह्न हुआ जिस समय सूर्य का भोगांश २२°४६′१७″.७ था। इससे प्रकट है कि संक्रान्ति काल में सूर्य का भोगांश इससे कम होगा। परन्तु सूर्य की स्पष्ट गति ५८′४६″.२ है इसलिए ८ घड़ी ५० पल २६ विपल में सूर्य ५८′४६″.२ x ८ घड़ी ५० पल २६ विपल ─────────────────────────── ६० घड़ी अथवा ८′३६″.६०६ चला होगा।


† काशी का देशान्तर (ग्रीनविच से) ८३°३′४″ पूर्व और उज्जैन का ७५°४६′६″ पूर्व है। इन दोनों का अंतर ७°१६′५८″ हुआ जो ७२ पल ५० विपल के समान होता है। इसलिए यही उज्जैन से काशी का देशान्तर हुआ।

  • Nautical almanac for 1922 pp. 40.

२५२ | सूर्य-सिद्धान्त

इसलिए १९७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में सूर्य का अयनांश = २२° ६′ १७″.७ - ८′ ३६″.६ = २२° ३७′ ३८″.१ बस इसी में सूत्र (१०) के अनुसार जो कुछ वृद्धि आवे उसको जोड़ देने से किसी अन्य मेष संक्रान्ति काल का मध्यम अयनांश प्राप्त होगा । यदि अक्ष विचलन का संस्कार सूत्र (३) की सहायता से कर दिया जाय तो संक्रान्ति काल का स्पष्ट अयनांश प्राप्त हो जायगा । यदि संक्रान्ति काल के सिवा किसी अन्य समय का अयनांश जानना हो तो संक्रान्ति से जितने दिन बीते हों उतने दिन की अयन गति (जब कि एक वर्ष में ५८″.६६* के लगभग अयन की गति होती है) मेष संक्रान्ति के मध्यम अयनांश में जोड़कर अक्षविचलन का संस्कार कर दे तो उस समय का स्पष्ट अयनांश ज्ञात हो जायगा । उदाहरण—काशी में १९८२ वि० की कार्तिक शुक्ल ८ रविवार का अयनांश क्या होगा ? १९७६ से १९८२ तक तीन वर्ष होते हैं इसलिए तीन वर्ष में अयनांश की वृद्धि जानने के लिए सूत्र (१०) में ‘व’ की जगह ३ लिखकर सरल करो, ५८″.६६३३४४ x ३ + .०००१११२५५ x ३² = १७५″.६६००३२ + ०″.००१००१२६५ = १७५″.६६१ = २′ ५५″.६६ इसको २२° ३७′ ३८″.१ में जोड़ा तो २२° ४०′ ३४″.०६ मेष संक्रान्ति काल का मध्यम अयनांश हुआ । १९८२ वि० की मेष संक्रान्ति वैशाख कृष्ण ५ सोमवार को काशी के मध्यम ६ बजे के उपरांत ६ घड़ी ३४ पल ३६ विपल पर लगी । वैशाख कृष्ण ५ से कार्तिक शुक्ल ८ तक १६५ सावन दिन होते हैं जो .५३३६ सौर वर्ष के समान हुआ । इतने समय में ५८″.६६ प्रति वर्ष के हिसाब से मध्यम अयनांश ५८″.६६ x .५३३६ = ३१″.३२ और बढ़ेगा । इसलिए कार्तिक शुक्ल ८ को मध्यम अयनांश २२° ४१′ ५″.४१ होगा । अक्ष विचलन संस्कार के लिए कार्तिक शुक्ल ८ के दिन सायन राहु और सायन सूर्य का भोगांश जानना आवश्यक है । इस दिन प्रातः काल राहु का निरयन


  • अधिक शुद्ध जानना हो तो सूत्र (६) से उस वर्ष की अयन गति निश्चय करना चाहिए ।

त्रिप्रश्नाधिकार २५३ भोगांश ३ रा ७°१३'८" है । सायन भोगांश जानने के लिए २२°४१'५" जोड़ दो तो हुआ ३ रा २६°५४' १३" अथवा स्थूल रूप से ३ रा २६°५४' या ११६°५४' । यही राहु का सायन भोगांश हुआ । इसी तरह सूर्य का सायन भोगांश जानना चाहिए । कार्तिक शुक्ल ८ की मध्यरात्रि को सूर्य का निरयन भोगांश १८६°८'१०" होगा इसलिए प्रातः काल ६ बजे इसका निरयन भोगांश १८८°२३' स्थूल रूप से होगा । इसमें २२°४१'५" जोड़ देने पर इसका सायन भोगांश २११°४' स्थूल रूप से हुआ । इसलिए इस दिन सूत्र (३) के अनुसार अक्षविचलन संस्कार = - १७".२३५ ज्या ११६°५४' - १'.२७ ज्या २ x २११°४' = - १७".२३५ ज्या ६०°६' - १".२७ ज्या (३६०° + ६२°८') = - १७".२३५ x .८६६६ - १".२७ x .८८४१ = - १४".६४ - १".१२ = - १६".०६ इसको मध्यम अयनांश २२°४१'५".४१ में जोड़ा तो कार्तिक शुक्ल ८ के प्रातःकाल स्पष्ट अयनांश हुआ २२°४०'४६".३५ । केतकर जी ने अपने ज्योतिर्गणित में अयनांश जानने की जो सारिणी दी है उससे उपर्युक्त अयनांश ६' या ७' कम आता है। इसका पहला कारण यह है कि केतकर जी ने मेष संक्रान्ति का आरम्भ उस समय माना है जिस समय चित्रा नामक तारा सूर्य से १८०° पर रहता है जब कि आजकल सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार मेष संक्रमण कोई ७ घड़ी पहले ही हो जाता है। दूसरा कारण यह है कि केतकर जी ने शुद्ध नाक्षत्र वर्ष का प्रयोग किया है और इस भाष्य में सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार वर्ष मानकर गणना की गयी है । वेध करके अयनांश की परीक्षा करना स्फुटदृक्तुल्यतां गच्छेदयने विषुवद्वये । प्राक्चक्रं चलितं हीने छायार्कात्करणागते ॥११॥ अन्तरांशैरथोंद्धृत्य पश्चाच्छ्लेषेस्तथाऽधिके । अनुवाद—(११) उत्तरायण और दक्षिणायन के दिन अथवा विषुव संक्रान्ति के दिन यह बात सहज ही देखी जा सकती है कि नक्षत्र किधर चला है। यदि छाया- सिद्ध सूर्य के भोगांश से (जिसकी रीति आगे १७-१८ श्लोकों में बतलायी गयी है) गणित सिद्ध सूर्य का भोगांश कम हो तो समझना चाहिए कि जितना इन दोनों का अन्तर है उतना ही नक्षत्र चक्र अथवा अश्विनी का आदि विन्दु पूर्व को चला है

२५४ सूर्य-सिद्धान्त अर्थात् वसंत सम्पात विन्दु से पूर्व है। परन्तु यदि अधिक हो तो उतना ही नक्षत्र- चक्र पच्छिम चला हुआ समझना चाहिए। विज्ञान भाष्य—छाया से सूर्य का जो भोगांश आता है वह वसंत सम्पात विन्दु से सूर्य का भोगांश (सायन भोगांश) है और गणित से जो भोगांश आता है जिसकी रीति स्पष्टाधिकार में बतलायी गयी है वह अश्विनी के आदि विन्दु से होता है। इसलिए इन दोनों का अन्तर यथार्थ अयनांश हुआ। इससे सिद्ध होता है कि अयनांश की परीक्षा वेध से भी करनी चाहिए। सूर्य-सिद्धान्तकार का मत है कि अश्विनी का आदि विन्दु जो क्रान्तिवृत्त का भी आदि विन्दु समझा जाता है वसंत सम्पात विन्दु से २७° पूर्व या २७° पच्छिम तक जा सकता है। इससे अधिक नहीं। ऐसा ही मत और भी कई प्राचीन आचार्यों का है। परन्तु कुछ आचार्य इससे भिन्न मत भी रखते हैं जिसकी चर्चा पहले की गयी है। प्राचीन वाक्यों से* भी यह सिद्ध होता है कि वसंत सम्पात विन्दु आजकल के अश्विनी के आदि विन्दु से २७° से भी अधिक पूर्व रहा है। भौतिक ज्योतिर्विज्ञान से जो कुछ सिद्ध होता है वह ऊपर बतलाया ही जा चुका है। परन्तु इसकी सत्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण तो तब मिलेगा जब वसंत संपात विन्दु वास्तव में अश्विनी के आदि विन्दु से २७° से भी अधिक पच्छिम हो जायगा। सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार कलियुग संवत ५४०० में अथवा विक्रम संवत २३५६ में आज से ३७४ वर्ष उपरांत २७° का अयनांश पूरा होगा। परन्तु वेध से इसका प्रमाण इससे पहले ही मिल जायगा क्योंकि वि० १६८२ की मेष संक्रांति काल में मध्यम अयनांश २२°४०' ३४''.०६ होगा जो २७° से केवल ४°१६'२६'' के लगभग कम है। सूत्र (१०) को इसके समान करके समीकरण बनाकर 'व' का मान निकाल लेने से उतने वर्ष की संख्या निकल आवेगी जितने वर्ष में अयनांश की इतनी वृद्धि होगी। अब ४°१६'२६" = ५८".६६३३४४व × ०".०००१११२५५व² या १५५६६" = ५८".६६३३४४व × ०".०००१११२५५व² या .०००१११२५५व² + ५८.६६३३४४व - १५५६६ = ० ∴ व = - ५८.६६३३४४ ± √(५८.६६३३४४)² + ४ × ───────────────────────────── २ × .०००१११२५५ .०००१११२५५ × १५५६६ = २६६ वर्ष के लगभग *देखो पिछले श्लोक के विज्ञान भाष्य में शतपथ ब्राह्मण का उद्धरण तथा तत्संबंधी गणना।

त्रिप्रश्नाधिकार २५५ इसलिए प्रकट है कि १६८२+२६६=२२४८ विक्रमीय के दो चार वर्ष उपरांत ही यह सिद्ध हो जायगा कि वसंत संपात का पूर्ण भगण होता है अथवा आंदोलन । यदि यह बात प्रत्यक्ष हो गयी कि वसंत सम्पात विन्दु पूर्ण भगण के कारण पीछे खसकता ही जायगा तो भारतीय पंचांग-निर्माण की रीति तथा तिथियों और पर्वों के निश्चय करने के लिए संशोधन की अत्यन्त आवश्यकता पड़ेगी । फलित ज्योतिष के लिए योगों और मुहूर्तों के निश्चय करने के जितने नियम हैं उनमें भी महान् परिवर्तन करना होगा । पलभा जानने की १ली रीति एवं विषुवति छाया स्वदेशे या दिनार्धजा । दक्षिणोत्तरयोरेव सा तत्र विषुवत्प्रभा ॥१२॥ अनुवाद--(१२) इस प्रकार सूर्य जिस दिन विषुवद् वृत्त पर हो उस दिन मध्याह्न काल में जिस स्थान की उत्तर दक्षिण रेखा पर १२ अंगुल शंकु की जितनी लम्बी छाया पड़े वही उस स्थान की विषुवत्प्रभा या पलभा होती है । विज्ञान भाष्य—पलभा के सम्बन्ध में २०४-२०५ पृष्ठों पर तथा इसी अध्याय के सातवें श्लोक के भाष्य में बहुत कुछ लिखा जा चुका है । २०५वें पृष्ठ में यह बतलाया गया है कि किसी स्थान के अक्षांश की स्पर्शरेखा उस स्थान की पलभा को शंकु से भाग देने पर आती है । इसलिए यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि इस श्लोक के अनुसार पलभा का जो मान जाना जाता है वह स्थूल है । क्योंकि सायन मेष या सायन तुला संक्रान्ति (विषुव संक्रान्ति) के दिन, जिस दिन मध्याह्न काल में शंकु की छाया नाप कर पलभा जानी जाती है मध्याह्न काल में सूर्य ठीक विषुवद् वृत्त पर नहीं होता वरन् कुछ आगे या पीछे होता है । मध्याह्न काल में ठीक विषुवद् वृत्त पर सूर्य के आने का संयोग कई वर्ष के बाद आता है । इस दिन सूर्य की क्रान्ति प्रत्येक घंटे में प्रायः एक कला के हिसाब से बदलती है । इसलिए सायन मेष या तुला संक्रान्ति शुद्ध काल गणना से जानकर सूर्य की मध्याह्न काल की क्रान्ति जान लेनी चाहिये और इसका संस्कार कर लेने के बाद शुद्ध पलभा जाननी चाहिये । संस्कार करने की रीति अगले १४-१५ श्लोकों में बतलायी जायगी । अक्षांश जानने की १ली रीति शंकुश्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते । लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा ॥१३॥

२५६ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—(१३) शंकु और उसकी छाया (यहाँ पलभा) को अलग-अलग त्रिज्या अर्थात् ३४३८ से गुणा करके प्रत्येक गुणनफल को विषुवत्कर्ण से भाग दे देने पर क्रम से लम्बज्या और अक्षज्या आ जायेंगी जिनके धनु क्रम से लम्बांश और अक्षांश होंगे । (उत्तर गोल में) ये सदा दक्षिण होते हैं । विज्ञान भाष्य—इस श्लोक का सार यह है :— शंकु × त्रिज्या लम्बज्या = ─────────── विषुवत्कर्ण पलभा × त्रिज्या अक्षज्या = ─────────── विषुवत्कर्ण सायन मेष या तुला संक्रान्ति के दिन मध्यान्ह काल में १२ अंगुल शंकु का जो छायाकर्ण होता है वही विषुवत्कर्ण, पलकर्ण या अक्षकर्ण कहलाता है । पृष्ठ २०४ के चित्र ४१ में क ग विषुवत्कर्ण है । इसलिए विषुवत्कर्ण = √(पलभा² + शंकु²) पृष्ठ ५५ के चित्र ७ और पृष्ठ ५६ के चित्र १० में यह बतलाया गया है कि किसी स्थान के अक्षांश और लम्बांश क्या हैं । इन चित्रों से यह भी प्रकट होता है कि किसी स्थान के अक्षांश और लम्बांश दोनों मिलकर ९०° के समान होते हैं । पृष्ठ २०४ में चित्र ४१ के सम्बन्ध में यह भी कहा गया है कि विषुवत्कर्ण और शंकु के बीच का कोण ख क ग अक्षांश है । इसलिए यह सिद्ध है कि विषुवत्कर्ण और पलभा के बीच का कोण क ग ख लम्बांश हुआ, क्योंकि < ख क ग और < क ग ख दोनों पूरक कोण हैं । इसलिए लम्बज्या या लम्बांश की ज्या क ख शंकु = ─── = ────────── आजकल की प्रथानुसार (दशमलव भिन्न में) क ग विषुवत्कर्ण शंकु × त्रिज्या = ─────────── हमारे सिद्धान्तों के अनुसार (कलाओं में) विषुवत्कर्ण लम्बांश की ज्या को अक्षांश की कोटिज्या भी कहते हैं क्योंकि लम्बांश और अक्षांश का योग ९०° होता है । इसी तरह अक्षज्या या अक्षांश की ज्या ख ग पलभा = ─── = ────────── (दशमलव भिन्न में) क ग विषुवत्कर्ण अथवा पलभा × त्रिज्या ──────────── (कलाओं में) विषुवत्कर्ण

त्रिप्रश्नाधिकार २५७ ४२-४३ चित्रों के सम्बन्ध में भी बतलाया गया है कि क्षितिज के उत्तर- बिन्दु से ध्रुव की ऊँचाई अक्षांश के समान होती है। इससे पाठकों को शायद शंका हो कि अक्षांश की कौन परिभाषा ठीक है। इसलिए यहां इस बात का निश्चय कर देना चाहिये कि अक्षांश की यह तीनों परिभाषाएँ एक ही हैं। चित्र ७ और १० से स्पष्ट है कि विषुवत् रेखा से किसी स्थान का जो कोणात्मक अंतर उत्तर-दक्खिन रेखा पर होता है वही उस स्थान का अक्षांश है और ध्रुव से उत्तर-दक्खिन रेखा पर स्थान का कोणात्मक अंतर उसका लम्बांश है। विषुवत् रेखा के तल को यदि आकाश की ओर बढ़ा दिया जाय तो यही विषुवन्मण्डल कहलाता है और उत्तर-दक्खिन रेखा के तल को आकाश में बढ़ा दिया जाय तो वह यामोत्तर वृत्त कहलाता है। इसी तरह पृथ्वी के केन्द्र से किसी स्थान को मिलाने वाली रेखा (चित्र ७ की रेखा स भ) ऊपर बढ़ाने पर आकाश के जिस बिन्दु पर पहुँचती है वह उस स्थान का खस्वस्तिक कहलाता है। इसलिए यह सिद्ध है कि किसी स्थान के खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल का जो अंतर यामोत्तर वृत्त पर होता है वह भी अक्षांश है तथा खस्वस्ति से आकाशीय ध्रुव का जो अन्तर यामोत्तरवृत्त पर होता है वह लम्बांश है। इसलिए चित्र ४२, ४३ के ख वि धनु श स्थान के अक्षांश तथा ख ध धनु श स्थान के लम्बांश हुए। परन्तु ध वि धनु या उ ख धनु ६० अंश के समान है। इसलिए प्रत्येक से सामान्य धनु ध ख निकाल दिया जाय तो शेष ख वि और उ ध समान होंगे, अर्थात् खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल का जो अंतर होता है वही क्षितिज के उत्तर बिन्दु से उत्तरी आकाशीय ध्रुव का अन्तर होता है। इसी तरह यह भी सिद्ध हो सकता है कि ध ख धनु द वि धनु के समान है, अर्थात् क्षितिज के दक्षिण बिन्दु से विषुवन्मण्डल की जो ऊंचाई होती है वह भी लम्बांश के समान है। यह भी स्पष्ट है कि उत्तर गोल में किसी स्थान के खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल सदैव दक्षिण रहता है इसलिए ख वि अक्षांश और वि द लम्बांश उत्तर गोल में सदा दक्षिण ही रहेंगे। अब यह सिद्ध करना रह गया कि शंकु और विषुवतकर्ण के बीच का अन्तर अक्षांश के समान क्यों है। यह ध्यान रखना चाहिए कि चित्र ५५ में पृथ्वी की तुलना में शंकु बहुत बड़ा दिखलाया गया है। रेखागणित से यह स्पष्ट है कि < स श छ = < र श ख = < श र भ + < र भ श

२५८ सूर्य-सिद्धान्त

चित्र ५५ उ स व द = भूतल की उत्तर-दक्षिण रेखा उ = उत्तरी ध्रुव द = दक्षिणी ध्रुव स = वह स्थान जहाँ श स शंकु गड़ा है व = विषुवत्‌रेखा का बिन्दु ख = स स्थान का खस्वस्तिक र = विषुवद्वृत्त पर रवि का स्थान स छ = पलभा श छ = विषुवत्कर्ण भ = पृथ्वी का केन्द्र

त्रिप्रश्नाधिकार २५६ परंतु भूकेन्द्र से सूर्य का अन्तर भर प्रायः ६ करोड़ २६ लाख मील है और पृथ्वी का अर्द्धव्यास भ स अथवा भ श (क्योंकि स श = १२ अंगुल) ४००० मील है। इसलिए ∠श र भ इतना छोटा कोण है कि यह शून्य माना जा सकता है (यथार्थ में यह कोण ६ विकला के लगभग होता है) । इसलिए < स श छ = < र भ श = < व भ स = अक्षांश अर्थात् शंकु और विषुवत्कर्ण के बीच का कोण अक्षांश के समान होता है। इसलिए पलभा और विषुवत्कर्ण के बीच का कोण जो पहले का पूरक कोण होता है लम्बांश के समान हुआ। उदाहरण—प्रयाग की पलभा ५ अंगुल ४१ व्यंगुल अथवा ५.६८ अंगुल है तो प्रयाग का अक्षांश बतलाओ । प्रयाग का विषुवत्कर्ण = √शंकु² + पलभा² = √१२² + (५.६८)² = √१४४ + ३२.२६ = √१७६.२६ = १३.२८ अंगुल ∵ प्रयाग की अक्षज्या पलभा × त्रिज्या = ———————— विषुवत्कर्ण ५.६८ × ३४३८ = ———————— १३.२८ = १४७०.५ कला इसलिए ज्याओं की सारिणी (पृष्ठ १२०-१२१) तथा स्पष्टाधिकार के श्लोक ३३ (पृष्ठ १३०) के अनुसार अक्षांश = २५°२१′ अक्षांश जानने की दूसरी रीति— मध्यच्छाया भुजस्तेन गुणिता त्रिभमौर्विका । तत्कर्णाप्तधनुर्लिप्ता नतास्ता दक्षिणे भुजे ॥१४॥ उत्तराश्चोत्तरे याम्यास्तत्सूर्यक्रान्तिलिप्तिका । दिग्भेदे मिश्रितास्साम्ये विश्लिष्टाश्चाक्षलिप्तिकाः ॥१५॥

२६० सूर्य-सिद्धान्त

अनुवाद—(१४) किसी दिन के मध्याह्न की छाया को जिसे भुज भी कहते हैं त्रिज्या से गुणा करके मध्याह्न के छाया कर्ण से भाग दे दो और भागफल का धनु बनाओ तो सूर्य का मध्याह्नकालिक नतांश ज्ञात हो जायगा । यदि छाया दक्षिण की ओर हो तो (१५) उत्तर नतांश होगा और यदि छाया उत्तर हो तो दक्षिण नतांश होगा । यदि नतांश और सूर्य की क्रान्ति की दिशाएं भिन्न हों तो इन दोनों का योग- फल और एक ही हों तो अन्तर अक्षांश होगा । विज्ञान भाष्य—खस्वस्तिक से आकाश के किसी विन्दु (तारा, सूर्य का केन्द्र इत्यादि) पर जाता हुआ जो वृत्त क्षितिज से समकोण पर खींचा जाता है उसे ऊर्ध्ववृत्त (Vertical Circle) कहते हैं । इस वृत्त पर उस विन्दु का खस्वस्तिक से जो अंतर होता है उसे उस विन्दु का नतांश (zenith distance) कहते हैं और क्षितिज से जो अन्तर होता है उसे उस विन्दु का उन्नतांश (altitude) कहते हैं । सममण्डल भी एक ऊर्ध्ववृत्त है । पर इसमें विशेषता यह है कि यह क्षितिज के पूर्व पश्चिम विन्दुओं पर होता है । यामोत्तर वृत्त भी उत्तर दक्षिण बिन्दुओं पर ऊर्ध्ववृत्त है । इसलिए मध्याह्न काल में जब कि सूर्य यामोत्तर वृत्त पर रहता है, इससे खस्वस्तिक का जो अंतर होता है वह इसका मध्याह्नकालिक नतांश हुआ । यदि सूर्य विषुवद्वृत्त पर भी हो तो यही अक्षांश के समान होगा । यदि सूर्य विषुवद्वृत्त पर न हो तो यह या तो विषुवद्वृत्त से उत्तर रहेगा या दक्षिण । मध्याह्न काल में सूर्य का विषुवद्वृत्त से जो अंतर होता है वही सूर्य की क्रान्ति है जो सूर्य के विषुवद्वृत्त से उत्तर या दक्षिण रहने के अनुसार उत्तर या दक्षिण क्रान्ति कहलाती है । इसी प्रकार सूर्य खस्वस्तिक से भी उत्तर या दक्षिण हो सकता है। यदि सूर्य खस्वस्तिक से उत्तर हो तो छाया दखिन की ओर होगी और खस्वस्तिक से सूर्य का अंतर उत्तर नतांश कहलायेगा । परन्तु यदि सूर्य खस्व- स्तिक से दखिन हो तो छाया उत्तर की ओर होगी और सूर्य का नतांश दक्षिण होगा । चित्र ५६ से यह स्पष्ट है कि सूर्य के मध्याह्नकालिक नतांश और क्रान्ति से अक्षांश कैसे जाना जा सकता है :— उ ध ख व द यामोत्तर वृत्त, ध उत्तरी आकाशीय ध्रुव, ख खस्वस्तिक, व विषुवद्वृत्त ओर यामोत्तर वृत्त का सामान्य विन्दु, और र, रा, री सूर्य के तीन भिन्न-भिन्न स्थान हैं । र पर सूर्य विषुवद्वृत्त के दखिन है इसलिए इस समय सूर्य की दक्षिण क्रान्ति व र है परन्तु व रा या व री सूर्य की उत्तर क्रान्तियां हैं। इसी प्रकार ख र और ख रा सूर्य के दक्षिण नतांश और ख री उत्तर नतांश हैं। ख व स स्थान का अक्षांश है । चित्र से प्रकट है कि