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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

२६६ सूर्य-सिद्धान्त विधि कही गयी है तथापि इसी रीति से नतकाल में कुछ अंतर आ जाता है इसी से भास्कराचार्य ने इसे सुधार दिया है (देखो सिद्धान्त शिरोमणि) ।''* परन्तु मेरी समझ में यह अंतर इसलिए नहीं पड़ता कि नियम अशुद्ध है वरन् इसका कारण छाया की नाप की स्थूलता है । यदि छाया दो तीन दशमलव स्थान तक ठीक-ठीक नापी जाय और गुणा भाग में भी स्थूलता न आने पावे तो इस रीति से नतकाल जानने में कोई अशुद्धि नहीं हो सकती । उदाहरण १—यदि प्रयाग में किसी समय छाया १४.३३ अंगुल हो और सूर्य की क्रान्ति १५° उत्तर हो तो पूर्व या पच्छिम नतकाल बताओ और यह भी बतलाओ कि घड़ी में क्या बजा है ? सिद्धान्तीय रीति— छाया = १४.३३ अंगुल ∵ छाया कर्ण = √१२² + (१४.३३)² = १८.६६ अंगुल ∵ दृग्ज्या = १४.३३ × ३४३८ / १८.६६ = २६३६ कला ∵ शंकु = √३४३८² - २६३६² = २२०७ कला ∵ छेद = २२०७ × ३४३८ / ३१०६ और उन्नतज्या = २२०७ × ३४३८ / ३१०६ × ३४३८ / ३३२१ = २५२६ कला अन्त्या = ३८७६ (पहिले की तरह) ∵ नतोत्क्रमज्या = ३८७६ - २५२६ = १३४७ कला ∵ नतकाल = १३४७ कला का (उत्क्रम ज्या के अनुसार) धनु = ५२° ३२′ [देखो पृष्ठ १२०-१२१] = ३ घंटा ३० मिनट ८ सेकंड यदि नतकाल पूर्व हो तो १२ घंटे में से घटाने पर और पच्छिम हो तो १२ घंटे में जोड़ने पर धूपघड़ी का समय ज्ञात होगा । ∵ यदि पूर्व नतकाल हो तो धूप-घड़ी में १२ घंटा - ३ घंटा ३० मि० ८ सेकंड = ८ घंटा २६ मि० ५२ सेकंड होगा । और यदि पच्छिम नतकाल हो तो धूप-घड़ी में मध्याह्न के उपरान्त ३ घंटा ३० मिनट ८ सेकंड बीता है अर्थात् ३ बजकर ३० मिनट और ८ सेकंड हुआ है ।

  • देखो हिन्दी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित सूर्य-सिद्धान्त पृष्ठ ६६ ।

त्रिप्रश्नाधिकार २६७ यह ध्यान रखना चाहिए कि घड़ी का यह समय शुद्ध स्थानीय काल है । इसको रेलवे के समय से मिलाने के लिए काल-समीकरण संस्कार तथा देशान्तर संस्कार करना पड़ेगा जिसकी चर्चा इसी अध्याय के अंत में की जायगी । नवीन रीति— छाया १४.३३ स्परे (नतांश) = ──── = ───── = १.१६४१ १२ १२ ∵ नतांश = ५२° ३' ∵ शंकु = नतांश कोटि ज्या = कोज्या ५०° ३' = .६४२१ समीकरण (ख) में सिद्ध किया गया है कि नतांश कोटिज्या = (नतकोटिज्या + चरज्या) × अक्ष कोटिज्या × क्रान्ति कोटिज्या ∵ .६४२१ = (नत कोटिज्या + .१२७३) × .९०३२ × .९६५६ = (नत कोटिज्या + .१२७३) × .८७२४ .६४२१ ∵ नत कोटिज्या + .१२७३ = ───── = .७३६० .८७२४ ∵ नत कोटिज्या = .७३६० - .१२७३ = .६०८७ ∵ नत काल = ५२° ३०' = ३ घंटा ३० मिनट इसलिए यदि पूर्व नत है तो समय होगा ८ बज कर ३० मिनट और पच्छिम नत है तो साढ़े तीन बजा रहेगा । नवीन रीति से नत काल निकालने में और सरलता होगी यदि समीकरण (१) से सीधे ही काम लिया जाय । इसका एक उदाहरण नीचे दिया जाता है :— उदाहरण २—छाया = १४.३३ अंगुल और क्रान्ति = १५° उत्तर तो प्रयाग में नत काल क्या है ? छाया १४.३३ स्परे (नतांश) = ──── = ───── = १.१६४१ १२ १२ ∵ नतांश = ५०° ३' ∵ कोज्या (नत काल) कोज्या ५०° ३' - ज्या २५° २५' × ज्या १५° = ────────────────────────────────────────── कोज्या २५° २५' × कोज्या १५°

२६८ सूर्य-सिद्धान्त ·६४२१ - ·४२६२ × ·२५८८ = ────────────────────────── ·६०३२ × ·६६५६ ·६४२१ - ·११११ = ────────────────── ·८७२४ ·५३१० = ──────── ·८७२४ = ·६०८७ ∴ नत काल = ५२° ३०' = ३ घंटा ३० मिनट उदाहरण ३—यदि छाया २५·६१३ अंगुल और सूर्य की दक्षिण क्रान्ति १५° हो तो नत काल बतलाओ । स्परे नतांश = छाया / १२ = २५·६१३ / १२ = २·१५६४ ∴ नतांश = ६५° ६' यहाँ क्रान्ति दक्षिण है इसलिए ध्रुवांतर ६०° से अधिक है और समीकरण (१) में कोज्या (ध्रुवांतर) अथवा ज्या (क्रान्ति) ऋणात्मक होगी । इसलिए कोज्या (नत काल) कोज्या नतांश + ज्या (अक्षांश) + ज्या (क्रान्ति) = ────────────────────────────────────────────────── कोज्या (अक्षांश) × कोज्या (क्रान्ति) कोज्या ६५° ६' + ज्या २५° २५' × ज्या १५° = ───────────────────────────────────────────────── कोज्या २५° २५' × कोज्या १५° ·४२०२ + ·४२६२ × ·२५८८ = ────────────────────────── ·६०३२ × ·६६५६ ·४२०२ + ·११११ ·५३१३ = ──────────────── = ──────── = ·६०६० ·८७२४ ·८७२४ ∴ नत काल = ५२° २६' = ३ घंटा २६ मिनट ५६ सेकंड किसी समय की कर्णाग्रा जानकर सूर्य का भोगांश निकालना— इष्टाग्राघ्ना स्वलम्बज्या स्वकर्णाङ्गुलभाजिता । क्रान्तिज्या सात्रिजीवाघ्नी परमापक्रमोद्धृता ॥४०॥ तच्चापं भादिकं क्षेत्रं पदे र्भध्याद्वित्तिको रविः । अनुवाद—(४०) इष्टकाल की अग्रा अर्थात् कर्णाग्रा को लम्बज्या से गुणा करके इष्टकाल के छाया-कर्ण से भाग दे दो तो भागफल सूर्य की क्रान्तिज्या होगी । इसको त्रिज्या से गुणा करके परमाप क्रम ज्या से भाग देकर भागफल का धनु

. त्रिप्रश्नाधिकार २६६ बनाओ । फिर सूर्य जिस राशि में हो उसका पद बनाकर सायन भोग का निश्चय (१७-१६) श्लोकों के अनुसार करो । विज्ञान भाष्य—इसका सारांश यह है :— कर्णाग्रा × लम्बज्या / छायाकर्ण = क्रान्ति ज्या क्रान्तिज्या × त्रिज्या / परमापक्रम ज्या = सूर्य का सायन भोगांश ज्या पहले नियम में इष्टकाल की अग्रा (कर्णाग्रा अथवा कर्णवृत्ताग्रा) से सूर्य की क्रान्ति जानने की रीति बतलायी गया है जो २७वें और २२वें श्लोकों का विलोम रूप है [देखो २७वें श्लोक का समीकरण (४)] दूसरा नियम जिससे क्रान्ति जानकर सूर्य का सायन भोगांश निकाला जाता है इसी अध्याय के १७-१६ श्लोकों में तथा स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोकों में आ गया है । इसलिए यहाँ दुहराने की आवश्यकता नहीं है । छाया की नोक जिस मार्ग पर चलता है वह खींचना— इष्टे हि मध्ये प्राक्पश्चाद् वृत्ते बाहुत्रयान्तरे ॥४१॥ मत्स्यद्वयान्तरयुते स्त्रिसृक्सूत्रेण भाभ्रमः । अनुवाद—जिस दिन शंकु की छाया की नोक का मार्ग खींचना हो उस दिन मध्याह्न के पहले और पीछे छाया की नोक के तीन बिन्दु निश्चित करो । पहले और दूसरे तथा दूसरे और तीसरे बिन्दुओं से तिमि बनाओ । प्रत्येक तिमि के सामान्य बिंदुओं पर जाती हुई रेखाओं को इतना बढ़ाओ कि वे मिल जायें । जिस बिन्दु पर मिलें उसको केन्द्र मानकर छाया की नोक के तीनों बिन्दुओं पर जाती हुई एक परिधि खींचो । बस यही परिधिखंड छाया की नोक का मार्ग भाभ्रम रेखा उस दिन होगा । विज्ञान भाष्य – यथार्थ में छाया की नोक का मार्ग वृत्ताकार नहीं होता वरन् अतिपरवलय (hyperbola) के आकार का होता है । इसलिए यह नियम अशुद्ध है जिसको भास्कराचार्य, रंगनाथ जी इत्यादि सभी ने स्वीकार किया है । इसलिए इस पर बहुत विचार करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । लंका और इष्ट स्थान में सायन मेषादि राशियों के उदयकाल जानने की रीति— त्रिभद्यकर्णार्धगुणाः स्वाहोरात्रार्धभाजिताः ॥४२॥ क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्चापानि पृथक् पृथक् ।

३०० सूर्य-सिद्धान्त स्वाधोऽधः प्रविशोध्यथ मेषाल्लङ्कोदयासवः ॥४२॥ खागाष्टयोऽर्धगोऽनैकाशशरत्र्यङ्कहिमांशवः । स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः ॥४३॥ व्यस्ता व्यस्तैर्युतास्तैस्तैः कर्काद्यसवस्मृताः । व्युत्क्रमेण षडेवैते भवन्तीष्टास्तुलादय ॥४४॥ अनुवाद- (४१, ४२) एक, दो और तीन राशियों की ज्याओं को क्रम से तीन राशियों की द्युज्या से गुणा कर दो और गुणनफलों को क्रम से एक, दो और तीन राशियों के अहोरात्रार्धों (द्युज्याओं) से भाग दे दो, भजनफलों के धनु बनाकर अलग अलग रखो । पहला लंका में मेष राशि का उदयासु है, पहले को दूसरे से घटाने पर जो शेष आता है वह लंका में वृष राशि का उदयासु है और दूसरे को तीसरे से घटाने पर जो शेष होता है वह लंका में मिथुन राशि का उदयासु है । (४३) इनके मान क्रमानुसार १६७०, १७६५ और १८३५ असु अथवा प्राण हैं। इनसे इष्ट स्थान के अपने अपने चरखण्ड घटाने पर इष्ट स्थान के मेष, वृष और मिथुन राशियों के उदयासु जाने जाते हैं। (४४) यहीं उलटे क्रम से कर्कादि तीन राशियों के लंका में उदयासु हैं। इन्हीं में उलटे क्रम से अपने अपने चरखंडों को जोड़ने से इष्ट स्थान के कर्क, सिंह और कन्या के उदयासु होंगे । यही ६ उदयासु उलटे क्रम से तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन के उदयासु हैं । विज्ञान भाष्य—सायन मेष अर्थात् वसंत संपात विन्दु क्षितिज के पूर्व विन्दु पर जिस क्षण आता है उस समय से सायन मेष राशि का उदय होने लगता है और जिस क्षण तक वसंत सम्पात से क्रान्ति वृत्त का ३० अंश क्षितिज के ऊपर नहीं आ जाता उस समय तक सायन मेष राशि का उदय होता रहता है । जितने समय में वसंत सम्पात विन्दु से क्रान्ति वृत्त का ३० अंश उदय होता है उसको सायन मेष राशि का उदयकाल कहते हैं। यह सूक्ष्मता के लिए असुओं में प्रकट किया जाता है । इसीलिए इस समय को सायन मेषराशि का उदयासु कहते हैं । इसके पश्चात् क्रान्ति वृत्ति का अगला ३० अंश जितने समय में उदय होता है उसको सायन वृष राशि का उदय काल या उदयासु कहते हैं। इसी प्रकार अन्य सायन राशियों के उदयासुओं के बारे में समझना चाहिए । किसी स्थान में कौन राशि कितने समय में उदय होती है यह जानने के लिए पहले यह जानना सुगम होता है कि वह राशि विषुवत् रेखा (निरक्षदेश equator) पर कितने समय में उदय होती है। जब यह ज्ञात हो गया तब अपने स्थान का उदय काल जानने के लिए निरक्षदेश के उदय काल में कुछ संस्कार करना पड़ता है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३०१ हमारे ज्योतिष सिद्धान्त में विषुवत् रेखा और उज्जैन को जाती हुई देशान्तर रेखा के सामान्य बिन्दु पर लंका स्थित मानी गयी है। इसलिए निरक्षदेश के उदयासु को लंका के उदयासु कहा गया है। लंका में मेष, वृष और मिथुन राशियों के उदयासु जानने का नियम ४१ श्लोक के उत्तरार्द्ध और ४२वें श्लोक में दिया हुआ है जिसकी उपपत्ति चित्र ५६ से समझ में आवेगी । चित्र—५६ उ, प, द, पू—लंका के क्षितिज के क्रम से उत्तर, पच्छिम, दक्षिण और पूर्व बिन्दु । प व पू--विषुवद्वृत्त जो लंका में सममण्डल भी होता है । क व का--क्रान्ति वृत्त । व—बसन्त सम्पात अथवा सायन मेष राशि का आदि बिन्दु । उ—उत्तरी ध्रुव का भी स्थान है । पृथ्वी की दैनिक गति के कारण जितने समय में विषुद्यवृत्त का व पू भाग क्षितिज के ऊपर आता है उतने ही समय में क्रान्ति वृत्तको व का भाग भी क्षितिज के ऊपर आता है। इसलिए व का के उदय होने में उतना ही समय लगता है जितना ब

३०२ सूर्य-सिद्धान्त पू के उदय होने में लगता है । परन्तु पूरे विषुवद्वृत्त (३६०°) के उदय होने के समय को एक नाक्षत्र दिन* कहते हैं जो २१६०० असुओं के समान होता है (पृष्ठ ६); इसलिए विषुवद्वृत्त के ३६०° अथवा २१६०० कला के उदय होने में जब २१६०० असुओं का समय बीतता है तब १ कला के उदय होने में १ असु का समय लगेगा । इसलिए यदि व पू का मान कलाओं में ज्ञात हो जाय तो उतने ही असुओं में व का का उदय काल निकल आवेगा । अब देखना है कि व का और व पू का परस्पर क्या सम्बन्ध है । व पू का एक समकोण गोलीय त्रिभुज है जिसका व पू का कोण समकोण है और पू व का कोण विषुवद्वृत्त और क्रान्ति वृत्त के बीच का कोण अर्थात् सूर्य की परम क्रान्ति है । इस गोलीय त्रिभुज का भुज पू का क्रान्ति वृत्त के का विन्दु की क्रान्ति, भुज व का, का विन्दु का सायन भोगांश और भुज व पू, का विन्दु का विषुवांश है (देखो पृष्ठ २०१) इसलिए नेपियर के पहले नियम के आधार पर व का और व पू का सम्बन्ध जाना जा सकता है क्योंकि कोटि ज्या ∠ का व पू = स्पर्शरेखा (व पू) × कोटि स्पर्शरेखा (व का) अथवा, विषुवांश की स्पर्शरेखा = परम क्रान्ति कोटिज्या / सायन भोगांश की कोटि स्पर्शरेखा = कोज्या २३° २७' / कोस्परे (सायन भोगांश) परन्तु हमारे आचार्य स्पर्शरेखा या कोटि स्पर्शरेखा का व्यवहार नहीं करते थे इसलिए उन्होंने गोलीय त्रिभुज उ व का से इनका सम्बन्ध इस प्रकार निकाला था :— ज्या (उ का) / ज्या (उ व का) = ज्या (व का) / ज्या (व उ का)


  • पृष्ठ ७ पर बतलाया गया है कि किसी तारे के उदय होने के समय से उसके फिर उदय तक के समय को नाक्षत्र अहोरात्र या नाक्षत्र दिन कहते हैं । इसलिए वसन्त सम्पात विन्दु के उदय होने के समय से उसके फिर उदय होने तक के समय को भी नाक्षत्र दिन नहीं समझना चाहिए क्योंकि इतने समय में यह विन्दु अयन चलन के कारण लगभग ०.१४ विकला पच्छिम हो जाने के कारण ०.००२ असु पहले उदय होगा । परन्तु यह भेद इतना सूक्ष्म है कि व्यवहार में दोनों परिभाषाओं को एक ही समझ लेने में कोई हानि नहीं । आजकल पाश्चात्य ज्योतिषी नाक्षत्र दिन की परिभाषा वही करते हैं जो पीछे दी हुई है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३०३ परन्तु कोण व उ का = धनु व पू ∵ ज्या (उ का) / ज्या (उ व का) = ज्या (व का) / ज्या (व पू) ∴ ज्या (व पू) = ज्या (व का) × ज्या (उ व का) / ज्या (उ का) परन्तु व का = 'का' का सायन भोगांश ∠ उ व का = ∠ उ व पू - ∠ का व पू = ९०° - सूर्य की परम क्रान्ति ∴ ज्या (उ व का) = सूर्य की परम क्रान्ति कोटिज्या = २४° की कोटिज्या (सिद्धान्तीय मत से) = तीन राशि की द्युज्या (पृष्ठ २०८) ज्या (उ का) = ज्या (उ पू - का पू) = ज्या (९०° - 'का' की क्रान्ति) = 'का' की क्रान्ति कोटिज्या = 'का' की द्युज्या इसलिए, ज्या (व पू) = 'का' के भोगांश की ज्या × परम क्रान्ति कोटिज्या / 'का' की क्रान्ति कोटिज्या इससे व पू का जो मान कलाओं में आवेगा वही असुओं में 'का' के भोगांश का उदय काल होगा । इस साधारण समीकरण में 'का' के भोगांश की जगह जो धनु रखा जायगा उसी के लंका के उदयासु ज्ञात हो जायेंगे । यदि इसकी जगह ३०°, ६०° और ९०° रखे जायें तो ३०, ६० और ९० अंशों के भोगांशों के उदयासु अर्थात् सायन मेष राशि, सायन मेष और वृष राशि तथा सायन मेष, वृष और मिथुन राशियों के उदयासु क्रम से आ जायेंगे । सायन मेष और वृष राशियों के उदयासुओं में से सायन मेष राशि के उदयासु घटाये जायें तो सायन वृष राशि के उदयासु और सायन मेष वृष और मिथुन राशियों के उदयासुओं में से सायन मेष और वृष के उदयासु घटाये जायें तो सायन मिथुन के उदयासु प्राप्त होंगे । यदि समीकरण (१) में 'का' का भोगांश ९०° हो तो 'का' की क्रान्ति सूर्य की परम क्रान्ति होगी । ऐसी दशा में 'का' के भोगांश की ज्या का मान सिद्धान्तीय रीति से ३४३८ कला और आधुनिक रीति से १ होगा । इसलिये 'का' की क्रान्ति कोटिज्या परम-क्रान्ति-कोटिज्या के समान होने से समीकरण का दाहना पक्ष ३४३८ या १ के समान होगा जिससे व पू का मान भी ९०° के समान होगा । इसका अर्थ

३०४ सूर्य-सिद्धान्त यह हुआ कि जब व का ९०° होगा तब व पू भी ९०° होगा । इसलिये मेषादि तीन राशियों के उदयासु ९० × ६० = ५४०० होंगे, जो १५ नाक्षत्र घड़ी या ६ नाक्षत्र घंटों के समान हैं । ४२वें श्लोक के पूर्वार्ध में लंका में मेष, वृष और मिथुन राशियों के उदयासु क्रम से १६७०, १७६५ और १९३५ दिये गये हैं जो समीकरण (१) से उपर्युक्त नियम के अनुसार प्राप्त हुए हैं और नीचे लिखे उदाहरण से स्पष्ट होंगे । उदाहरण—लंका में वृष राशि के उदयासु क्या हैं ? पहले मेष राशि के उदयासु जानना चाहिए। इसके लिए समीकरण (१) में 'क' का भोगांश ३० रखना होगा। इस समय 'का' सायन मेष का अन्तिम विन्दु और सायन वृष का आदि विन्दु है जिसकी क्रान्ति स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोक से जानी जा सकती है । 'का' की क्रान्तिज्या = ज्या ३०° × १३९७ ────────────── ३४३८ = १७१६ × १३९७ ────────────── ३४३८ = ६६८ कला ∵ का की क्रान्ति = ७०३ कला = ११°४३′ ७०३ कला की उत्क्रमज्या = ७२ कला ∵ का की क्रान्ति कोटिज्या = ३४३८ - ७२ [देखो पृष्ठ २०८] = ३३६६ कला परम क्रान्ति कोटिज्या का मान जानने के लिए पहले परम क्रान्ति अर्थात् २४° की उत्क्रमज्या जानना चाहिए जो २६८ कला है । इसलिए परम क्रान्ति कोटिज्या = ३४३८ - २६८ = ३१४० कला ∵ समीकरण ( १ ) से ज्या ( व पू ) = ज्या ३०° × ३१४० ────────────── ३३६६ = १७१६ × ३१४० ────────────── ३३६६ = १६०४′ ∵ व पू = २७°५०′ = १६७०′ अर्थात् मेष राशि के उदयासु १६७० हैं । अब सायन मेष और वृष राशियों के सम्मिलित उदयासु जानना चाहिए ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३०५ इस समय 'का' का भोगांश ६०° और इसकी क्रान्ति सायन वृष के अंतिम बिन्दु की क्रान्ति होगी । सायन वृष के अन्त की क्रान्तिज्या = ज्या ६०° × १३६७

३४३८ = २६७८ × १३६७

३४३८ = १२१० कला ∴ सायन वृष के अन्त की क्रान्ति = २०°३८' परन्तु २०°३८' की उत्क्रमज्या = २२२' ∴ २०°३८' की कोटिज्या = ३४३८ - २२२ = ३२१६' ∴ समीकरण ( १ ) से, ज्या ( व पू ) = ज्या ६०° × ३१४०

३२१६ = २६७८ × ३१४०

३२१६ = २६०८ कला ∴ व पू = ५७°४८' = ३४६८' ∴ मेष और वृष राशियों के सम्मिलित उदयासु = ३४६८ परन्तु मेष राशि के उदयासु = १६७० ∴ वृष राशि के उदयासु = १७९८ श्लोक में इसकी जगह १७६५ असु लिखे हैं । यह ऊपर बतलाया ही जा चुका है कि सायन मेष, वृष और मिथुन के सम्मिलित उदयासु ५४०० हैं और यह सिद्ध हुआ है कि सायन मेष और वृष के सम्मिलित उदयासु ३४६८ हैं, इसलिए मिथुन के उदयासु इन दोनों के अंतर अर्थात् १६३२ के समान हैं। श्लोक में १६३५ दिया है। यह अंतर गणना की स्थूलता के कारण है । अब यह सिद्ध हो गया है कि सूर्य की परम क्रान्ति २४° नहीं है वरन् सं० १६८० वि० में २३°२६'५७''.३५ है और प्रतिवर्ष ०''.४६८ के लगभग घटती जाती है [देखो पृष्ठ २६८] । इस प्रकार परम क्रान्ति में १ कला की कमी प्रायः सवा सौ वर्षों में होती है। इसलिए विक्रम की २१वीं शताब्दी के पहले ५० वर्षों २०

३०६ सूर्य-सिद्धान्त तक परम क्रान्ति को २३°२७' मान कर सायन मेष इत्यादि के उदयासु जानने में पर्याप्त सूक्ष्मता होगी । नवीन रीति से २३°२७' की ज्या = ०.३९७६ जिसे नवीन रीति से सूर्य की परम क्रान्तिज्या समझना चाहिए । स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोक के अनुसार सायन मेष के अन्तिम विन्दु की क्रान्तिज्या = ज्या ३०° × .३९७६ / १ [ नवीन रीति से त्रिज्या = १ ] = .५ × .३९७६ = .१९८० ∵ सायन मेष के अन्तिम विन्दु की क्रान्ति = ११°२६' इसी प्रकार सायन वृष के अन्तिम विन्दु की क्रान्तिज्या = ज्या ६०° × .३९७६ / १ = .८६६ × .३९७६ = .३४४६ ∵ सायन वृष के अन्तिम विन्दु की क्रान्ति = २०°६'.७ क्रान्तियों के इन मानों से उदयासु जानने के लिए समीकरण (१) में उचित संशोधन करने पर, सायन मेष के लिए ज्या ( व पू ) = ज्या ३०° × कोज्या २३°२७' / कोज्या ११°२६' = .५ × .९१७५ / .९७९८ = .४६८२ ∵ व पू = २७°५५' ∵ सायनमेष के उदयासु = १६७५ सायन मेष और वृष के सम्मिलित उदयासु के लिए ज्या ( व पू ) = ज्या ६०° × कोज्या २३°२७' / कोज्या २०°६.७ = .८६६ × .९१७५ / .९३८७ = .८४६४ ∵ व पू = ५७°४६' ∵ सायन मेष और वृष के उदयासु = ३४६६

त्रिप्रश्नाधिकार ३०७ $\because$ सायन वृष के उदयासु $= ३४६६ - १६७५$ $= १७६४$ और मिथुन के उदयासु $= ५४०० - ३४६६$ $= १६३१$ नेपियर के पहले नियम के आधार पर सायन मेष के उदयासु इस समीकरण से भी ज्ञात हो सकते हैं। विषुवांश की स्पर्शरेखा $= \frac{कोज्या २३^\circ २७'}{कोस्परे ३०^\circ}$ $= \frac{.६१७५}{१.७३२१}$ $= .५२६७$ $\because$ विषुवांश $= २७^\circ १४'.५ = १६७४.५$ $\because$ सायन मेष के उदयासु $= १६७४.५$ सायनमेष और वृष के विषुवांश की स्पर्शरेखा $= \frac{कोज्या २३^\circ २७'}{कोस्परे ६०^\circ}$ $= \frac{.६१७५}{.५७७४} = १.५८६०$ $\because$ विषुवांश $= ५७^\circ ४६'$ $\because$ सायनवृष के उदयासु $= ३४४६ - १६७४.५$ $= १७६४.५$ परन्तु उन कोणों या धनुओं की स्पर्शरेखाओं के मान सूक्ष्मतापूर्वक नहीं निकल सकते जो ६०° से अधिक हैं इसलिए यह रीति व्यापक नहीं है। इस प्रकार लंका में मेषादि तीन सायन राशियों के उदयकाल यह हुए :-

सायन राशियांप्राचीन रीति से: असुओं मेंप्राचीन रीति से: पलों मेंप्राचीन रीति से: मिनटों मेंनवीन बेधों के अनुसार: असुओं मेंनवीन बेधों के अनुसार: पलों मेंनवीन बेधों के अनुसार: मिनटों में
मेष१६७०२७८११११६७५२७६१११.७
वृष१७६५२६६१२०१७६४२६६११६.६
मिथुन१६३५३२३१२६१६३१३२२१२८.७

३०८ सूर्य-सिद्धान्त अब वह देखना है कि विषुवत् रेखा के सिवा किसी अन्य स्थान में जिसका उत्तरी अक्षांश अ है सायन मेषादि तीन राशियों के उदयासु क्या हैं ।

चित्र ६०

उ पू द प—उस स्थान का क्षितिज वृत्त जिसका उत्तरी अक्षांश अ है ध—उत्तरी आकाशीय ध्रुव व—वसन्त सम्पात प व पू—विषुवद्वृत्त क व का—क्रान्तिवृत्त पू च—का विन्दु का चर जो क्षितिज के नीचे है । जिस समय वसन्त सम्पात विन्दु उदय होता रहता है उस समय वह ठीक पूर्व विन्दु पर होता है । इसलिए इस समय क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त दोनों पूर्व विन्दु पर रहते हैं । जितने समय में क्रान्तिवृत्त का व का भाग क्षितिज के ऊपर आता है उतने ही समय में विषुवद्वृत्त का व पू भाग क्षितिज के ऊपर आता है इसलिए व का में उदयासु व पू के उदयासु के समान है । क्रान्तिवृत्त के का विन्दु से जो ठीक क्षितिज पर है ध का च ध्रुवप्रोतवृत्त खींचा गया है जो विषुवद्वृत्त से क्षितिज के नीचे च

त्रिप्रश्नाधिकार ३०६ विन्दु पर मिलता है । इसलिए विषुवद्वृत्त का व पू च भाग का विन्दु का विषुवांश है । लंका में क्रान्तिवृत्त का का विन्दु और विषुवद्वृत्त का च विन्दु एक साथ क्षितिज पर आते हैं जैसा कि अभी बतलाया गया है । परन्तु अ अक्षांश पर पू च भाग क्षितिज के नीचे ही रहता है जब का विन्दु अ अक्षांश में क्षितिज पर आ जाता है । इसलिए अ अक्षांश के स्थान में व का के उदयासु व पू के उदयासुओं के समान हैं जो व पू च से पू च घटाने पर आता है। पृष्ठ २०६—२१० में बतलाया गया है कि यही पू च का विन्दु का चर-काल है। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि लंका के उदयासुओं में से चर- काल घटाने पर इष्ट स्थान के उदयासु निकलेंगे । पृष्ठ २१० में बतलाया गया है कि चर ज्या = क्रान्ति स्पर्शरेखा X अक्षांश स्पर्शरेखा । (१) जब व का = ३०° तब का की क्रान्ति = ११°२६′ इसलिए प्रयाग में जिसका अक्षांश २५°२५′ है, का विन्दु की चर ज्या = स्परे ११°२६′ X स्परे २५°२५′ = •२०३२ X •४७५२ = •०९६६ ∴ चरांश = ५°३३′ ∴ का विन्दु के चरासु = ३३३ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = १६७५ - ३३३ = १३४२ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष के उदयासु = १३४२ (२) जब व का = ६०° तब का की क्रान्ति = २०°६′·७ = २०°१०′ इसलिए तब प्रयाग में का की चरज्या = स्परे २०°१०′ X स्परे २५°२५′ = •३६७१ X •४७५२ = •१७४५ ∴ का का चरांश = १०°३′ ∴ का के चरासु = ६०३ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = ३४६६ - ६०३ = २८६६ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष और वृष राशियां २८६६ असुओं में उदय होंगी । परन्तु सायन मेष राशि १३४२ असुओं में उदय होती है । इसलिए सायन वृष राशि २८६६ - १३४२ = १४२४ असुओं में उदय होगी ।

३१० सूर्य-सिद्धान्त (३) जब व का = ९०° तब का की क्रान्ति = २३°२७' ∴ प्रयाग में का की चरज्या = स्परे २३°२७' x स्परे २५°२५' = ४३३७ x ४७५२ = २०६१ ∴ का का चरांश = ११°५४' ∴ का के चरासु = ७१४ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = ५४०० - ७१४ = ४६८६ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष, वृष और मिथुन राशियाँ ४६८६ असुओं में उदय होंगी । परन्तु सायन मेष और वृष राशियाँ २८६६ असुओं में उदय होती हैं, इसलिए सायन मिथुन राशि ४६८६ - २८६६ = १८२० असुओं में उदय होंगी । इस तरह यह प्रकट है कि सायन मेष के अन्तिम विन्दु के चरासु ३३३, सायन वृष के अन्तिम विन्दु के चरासु ६०३ और सायन मिथुन के अन्तिम विन्दु के चरासु ७१४ हैं। पहले और दूसरे का अन्तर २७०, तथा दूसरे और तीसरे का अन्तर १११ है । इन्हीं को वृष और मिथुन के चरखंड ४३वें श्लोक के उत्तरार्ध में कहा गया है जिसका तात्पर्य नीचे के कोष्ठक से स्पष्ट हो जायगा :—

सायन राशियाँलंका में उदयासुचरखंड असुओं मेंप्रयाग में उदयासु
मेष१६७५- ३३३१३४२
वृष१७९४- २७०१५२४
मिथुन१९३१- ११११८२०

४४वें श्लोक के पूर्वार्ध में यह बतलाया गया है कि सायन कर्क, सिंह और कन्या राशियों के उदयासु किस प्रकार ज्ञात होंगे। लंका में कर्क के उदयासु वही होंगे जो मिथुन के हैं, सिंह के वह होंगे जो वृष के हैं और कन्या के वह होंगे जो मेष के हैं। इनमें अपने-अपने चरखंड जोड़ने पर इष्ट स्थान के उदयासु निकल आवेंगे जो आगे के कोष्ठक से स्पष्ट होगा :—

त्रिप्रश्नाधिकार ३११

सायन राशियांलंका में उदयासुचरखंड असुओं मेंप्रयाग में उदयासु
कर्क१६३१+१११२०४२
सिंह१७६४+२७०२०६४
कन्या१६७५+३३३२००८
इसकी उपपत्ति यों है :—
क्रान्तिवृत्त के किसी बिन्दु का का विषुवांश जानने के लिए समीकरण (१) का प्रयोग किया जाता है जो यह है
ज्या (व पू) = (का के भोगांश की ज्या x परमक्रान्ति कोटिज्या) / (का की क्रान्ति कोटिज्या)
प्राचीन तथा अर्वाचीन दोनों रीतियों से यह सिद्ध है कि किसी कोण की ज्या उसके परिपूरक (Supplementary) कोण की ज्या के समान होती है [देखो पृष्ठ १२६-१२८] अर्थात् ज्या (क) = ज्या (१८०° - क) जहाँ क किसी कोण का मान है। इसलिए यह सिद्ध है कि
ज्या (व पू) = ज्या (१८०° - व पू)
और ज्या (काका भोगांश) = ज्या (१८०° - का का भोगांश)
इसलिए ज्या (१८०° - व पू)
= ज्या (१८०° - का का भोगांश) परम क्रान्ति कोटिज्या / का की क्रान्ति कोटिज्या (२)
ऊपर बतलाया गया है कि जब का का भोगांश अर्थात् व का ६०° होता है तब का का विषुवांश अर्थात् व पू ५७°४६' होता है, इसलिए समीकरण (२) के अनुसार जब का का भोगांश १८०° - ६०° = १२०° होगा तब इसका विषुवांश १८०° - ५७°४६' = १२२°११' होगा । इसका अर्थ यह हुआ कि जितने समय में वसंत संपात से क्रान्तिवृत्त का १२० अंश लंका में उदय होता है उतने समय में विषुवद्वृत्त का १२२°११' उदय होता है । परन्तु क्रान्तिवृत्त की पहिली तीन राशियां जितनी देर में उदय होती हैं उतनी देर में विषुवद्वृत्त का भी ६०° उदय होता है । इसलिए चौथी राशि जितने समय में उदय होती है उतने समय में विषुवद्-वृत्त का १२२°११' - ६०° = ३२°११' उदय होता है । परन्तु विषुवद्वृत्त का

३१२ सूर्य-सिद्धान्त ३२°११' = १६३१', इसलिए इसके ३२°११' के उदय होने का समय = १६३१ असु । इसलिए सायन कर्क राशि के उदयासु १६३१ हैं जो सायन मिथुन के भी उदयासु हैं। इसी प्रकार यह सिद्ध हो सकता है कि सायन सिंह राशि के उदयासु सायन वृष राशि के उदयासुओं के और सायन कन्या राशि के उदयासु सायन मेष राशि के उदयासुओं के समान हैं। अब यह जानना है कि सायन कर्क राशि के उदयासु किसी अन्य स्थान में, मान लो प्रयाग में, क्या होंगे । चित्र ६१ यह चित्र ६०वें चित्र के ही समान है अन्तर केवल यह है कि उसमें व का ६०° से कम है और यहाँ व का १२०° के समान है । चित्र से यह प्रकट है कि व का जो १२०° के समान है प्रयाग में उतने ही समय में उदय होगा जितने समय में व पू उदय होता है। परन्तु व का का विषुवांश व पू च के समान है जिसमें पू च चरांश क्षितिज के नीचे है। इसलिए

त्रिप्रश्नाधिकार ३१३ व पू = व पू च — पू च परन्तु का बिन्दु की क्रान्ति सायन वृष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान अर्थात् २०°१०' है क्योंकि वसंत संपात बिन्दु से ६०° के भोगांश तक क्रान्ति जिस क्रम से बढ़ती है उसी क्रम से ६०° से १८०° तक के भोगांश तक वह घटती भी है अर्थात् सायन वृष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति सायन कर्क के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान होती है और सायन मेष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति सायन सिंह के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान होती है, इत्यादि । इसलिए पू च = १०°३' परन्तु व पू च = १२२°११' क्योंकि यह १२०° के भोगांश का विषुवांश है । इसलिए व पू = १२२°११' - १०°३' = ११२°८' = ६७२८' ∴ १२० भोगांश के उदयासु = ६७२८ परन्तु प्रथम तीन राशियों के उदयासु = ४६८६ ∴ कर्क राशि के उदयासु = ६७२८ - ४६८६ = २०४२ जो लंका में कर्क के उदयासुओं में १११ जोड़ने से आता है । इसी प्रकार यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि १५० भोगांश अर्थात् मेष से सिंह ५ राशियों तक के उदयासु प्रयाग मे क्या होंगे । फिर प्रथम चार राशियों के उदयासु घटाने पर सिंह राशि के उदयासु निकल आवेंगे जो लंका में सिंह के उदयासुओं में २७० जोड़ने से भी प्राप्त सो सकते हैं । सायन कन्या राशि का अन्तिम बिन्दु जिसका भोगांश १८० है विषुवद्वृत्त से फिर मिल जाता है अर्थात् यही शरद संपात का स्थान है इसलिए यह वसंत संपात की तरह ठीक पूर्व में उदय होता है और इसका विषुवांश भी १८०° होता है । इसी प्रकार सायन मेष से सायन कन्या तक की प्रत्येक राशि के उदयासु लंका में तथा उत्तरी गोलार्द्ध के अन्य स्थानों में क्या होते हैं जाना जा सकता है । अब यह दिखलाना है कि सायन तुला से लेकर सायन मीन तक की प्रत्येक राशि के उदयासु क्या हैं । ४४वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में इसके लिए बहुत ही सरल नियम यह दिया हुआ है कि मेष से कन्या तक के जो उदयासु हैं वही उलटे क्रम से तुला से मीन तक के उदयासु हैं अर्थात् कन्या के उदयासु तुला के उदयासु के समान हैं, सिंह के उदयासु वृश्चिक के समान हैं, इत्यादि ।

३१४ सूर्य-सिद्धान्त नीचे के कोष्ठक से यह और भी स्पष्ट होगा —

सायन राशियांलंका में उदयासुचरखंड असुओं मेंप्रयाग में उदयासुसायन राशियां
१ मेष१६७५- ३३३१३४२१२ मीन
२ वृष१७६४- २७०१५२४११ कुंभ
३ मिथुन१९३१- ११११८२०१० मकर
४ कर्क१९३१+ १११२०४२६ धनु
५ सिंह१७६४+ २७०२०६४८ वृश्चिक
६ कन्या१६७५+ ३३३२००८७ तुला

इसकी उपपत्ति बतलाने के लिये केवल यह बतलाना पर्याप्त होगा कि तुला के उदयासु क्या हैं । चित्र ६२ से प्रकट है कि जितनी देर में शरद-संपात से क्रान्तिवृत्त का श का भाग प्रयाग के क्षितिज पर आवेगा उतनी ही देर में विषुवद्वृत्त का श पू भाग भी क्षितिज पर आवैगा । परन्तु श पू = श च + च पू यदि का विन्दु सायन तुला का अन्तिम विन्दु माना जाय तो श का ३० अंश के समान होगा । श च का समकोण गोलीय त्रिभुज है क्योंकि का च ध, का विन्दु का ध्रुवप्रोत वृत्त है जो विषुवद्वृत्त से समकोण पर होता है । इसलिए इस समकोण गोलीय त्रिभुज में नेपियर के नियमों के अनुसार कोज्या (च श का) = स्परे (च श) × कोस्परे (श का) अर्थात् स्परे (च श) = कोज्या २३°२७' / कोस्परे ३०° = .५२६७ [देखो पृष्ठ ३०७] ∵ च श = २७°५४'.५ = १६७४.५ जो लंका में कन्या के उदयासु हैं ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३१५ चित्र ६२ यह चित्र ५६, ६० चित्रों के समान है अन्तर केवल इतना है कि यहाँ श शरद का सम्पात का स्थान है जहाँ से क्रान्तिवृत्त विषुवद्वृत्त के दखिन हो जाता है। का च ध क्रान्तिवृत्त के का विन्दु का ध्रुवप्रोतवृत्त । चरांश च पू का मान जानने के लिए समकोण गोलीय त्रिभुज पू च का से काम लेना चाहिए जिसमें च का का विन्दु की दक्षिण क्रान्ति है। यह ११°२६′ के समान होती है जब शका ३०° के समान होता है। च पू का कोण विषुवद्वृत्त और क्षितिजवृत्त के बीच का कोण है जो प्रयाग के लम्बांश के समान होता है (देखो पृ० २५७) इसलिये नेपियर के नियम के अनुसार ज्या (च पू) = स्परे (च का) x कोस्परे (च पू का) = स्परे ११°२६′ x कोस्परे (६०° - २५°२५′) = स्परे ११°२६ x स्परे २५°२५′ = .०६६६ ∴ च पू = ५°३३′ = ३३३′ [देखो पृष्ठ ३०६] इसलिए श पू = १६७४.५ + ३३३ = २००८ कला