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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

मध्यमाधिकार २६ उतने ही चान्द्र मास एक महायुग में होते हैं। एक महायुग में जितने सौर मास होते हैं उनकी संख्या को महायुगीय चान्द्र मासों की संख्या से घटा देने पर शेष अधिमासों की संख्या होती है ॥३५॥ विज्ञान भाष्य—जिस समय सूर्य और चन्द्रमा की युति होती है उस समय को अमावस्या कहते हैं। इस समय चन्द्रमा और सूर्य बहुत पास होते हैं। एक अमा- वस्या से दूसरी अमावस्या तक के समय को चान्द्र-मास कहते हैं। इसलिए यदि यह जानना हो कि एक महायुग में कितने चान्द्र मास होते हैं तो पहले यह जानना चाहिये कि एक महायुग में सूर्य और चन्द्रमा की युति कितने बार होती है। इसके लिए सूर्य और चन्द्रमा के महायुगीय भगणों का अंतर निकाल लेना पर्याप्त है। क्योंकि यह बात सहज ही जानी जा सकती है कि यदि दो लड़के किसी गोल मैदान का चक्कर लगाने लगें और यदि एक लड़का घण्टे में ५ चक्कर लगाता हो और दूसरा ३ तो दोनों यदि एक ही स्थान से एक ही समय दौड़ना आरंभ करें तो घण्टे . भर में दोनों लड़के ५-३ = २ बार एक दूसरे से मिलेंगे। इसके लिए घड़ी की घण्टा और मिनट बतलाने वाली सुइयों की चाल का उदाहरण बहुत उपयुक्त है। बारह बजे दोनों सुइयां एक दूसरे से मिली रहती हैं अर्थात् दोनों की युति रहती है। इसके बाद दोनों चक्कर लगाना आरम्भ करती हैं और १ बज कर ५ ५/११ मिनट पर पहले पहल मिलती हैं। दूसरी बार वे २ बज कर १० १०/११ मिनट पर, तीसरी बार ३ बज कर १६ ४/११ मिनट पर, चौथी बार ४ बज कर २१ ९/११ मिनट पर, पांचवीं बार ५ बज कर २७ ३/११ मिनट पर, छठी बार ६ बज कर ३२ ८/११ मिनट पर, सतवीं बार ७ बज कर ३८ २/११ मिनट घर, आठवीं बार ८ बज कर ४३ ७/११ मिनट पर, ६ वीं बार ९ बज कर ४९ १/११ मिनट पर दसवीं बार १० बज कर ५४ ६/११ मिनट पर और ११ वीं बार ठीक बारह बजे मिलेंगी। इन ग्यारह युतियों के लिए मिनट वाली सुई को १२ चक्कर और घण्टे वाली सुई को १ चक्कर लगाना पड़ा। इसलिए युतियों की संख्या दोनों के चक्करों का अंतर (१२-१) हुई। इसी प्रकार महायुगीय चान्द्र-मासों को संख्या = महायुगीय चन्द्र-भगण—महायुगीय सूर्य-भगण = ५,७७,५३,३३६—४३,२०,००० = ५,३४,३३,३३६ अधिमास—मासों की गणना चान्द्र मास से और वर्षों की गणना सौर वर्ष से होती है। एक सौर वर्ष में १२ सौर मास तथा ३६५·२५८७५ मध्यम सावन दिन होते हैं परन्तु १२ चांद्रमास ३५४·३६७०५ मध्यम सावन दिन का होता है; इसलिए

३० सूर्य सिद्धान्त

१२ चान्द्रमासों का वर्ष सौर वर्ष से १०.८६१७० मध्यम सावन दिन छोटा होता है; इसलिए कोई तैंतीस महीने में यह अन्तर एक चान्द्रमास के समान हो जाता है। जिस सौर वर्ष में यह अंतर १ चांदमास के समान हो जाता है उस सौर वर्ष में १३ चांदमास होते हैं । तब एक चान्द्रमास अधिमास या मलमास के नाम से छोड़ दिया जाता है। यदि ऐसा न किया जाय तो चांद मास के अनुसार मनाये जानेवाले त्योहार, पर्व इत्यादि भिन्न-भिन्न ऋतुओं में मुसलमानी त्यौहारों की तरह पड़ने लगें । ऊपर के श्लोक में यह बतलाया गया है कि एक महायुग में जितने सौरमास होते हैं उनसे चांदमासों की संख्या जितनी अधिक हो उतने ही चांदमास अधिमास के नाम से छोड़ दिये जायँगे । इसलिए एक महायुग में अधिमासों की संख्या । = महायुगीय चांदमास—महायुगीय सौरमास = (५,३४,३३,३३६ — ४३,२०,०००) X १२ = १५,६३,३३६ सावनाहानि चान्द्रेभ्यो द्युभ्यः प्रोज्झ्य तिथिक्षयाः । उदयादुदयं भानोर्भूमिसावनवासराः ॥ ३६ ॥ अनुवाद—एक महायुग में जितनी चान्द्र तिथियाँ होती हैं उस संख्या में से महायुग के सावन दिनों की संख्या घटाने से उन तिथियों की संख्या निकल आती है जो क्षय होती है अर्थात् जिनकी गणना नहीं की जाती । सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय के बीच के समय को भूमिसावन दिन कहते हैं ॥३६॥ विज्ञान भाष्य—एक चांदमास में ३० तिथियाँ होती हैं इसलिए यदि महायुगीय चांदमासों की संख्या को ३० से गुणा कर दिया जाय तो एक महायुग में कितनी तिथियां होती हैं यह मालूम हो जाय । यह पहले ही बतलाया गया है कि एक महायुग में कितने सावन दिन होते हैं और एक सावन दिन में एक ही तिथि की गणना होती है, इसलिए सावन दिनों की संख्या से तिथियों की संख्या जितनी अधिक होती हैं उतनी तिथियों की गणना नहीं की जाती; इसलिए यह क्षय या अवम तिथियाँ कहलाती हैं । इस श्लोक के उत्तरार्द्ध की व्याख्या कई बार की जा चुकी है। यहाँ केवल यह अधिक बतलाया गया है कि सावन दिन को भूमिसावन दिन भी कहते हैं । वसुद्वयष्टशरिद्र्वङ्कसप्ताद्रितिथयो युगे । चान्द्राः खाष्टखव्योमवाग्निखर्तुनिशाकराः ॥३७॥ षड्वह्नित्रिहुताशाङ्कतिथयश्चाधिमासकाः । तिथिक्षया यमार्थश्विद्व्यष्टव्योमशराश्विनः ॥३८॥

मध्यमाधिकार ३१ खचतुस्कसमुद्राष्टकुपञ्च रविमासकाः । भवन्ति भोदया भानुभगणैरूनिताः कहाः ॥३६॥ अनुवाद—( ३७) एक महायुग में १,५७,७६,१७,८२८ सावन दिन; १,६०,३०,००,०८० चान्द्र दिन अर्थात् तिथियाँ; (३८) १५,६३,३३६ अधिमास; २,५०,८२,२५२ क्षय तिथियाँ तथा (३६) ५,१८,४०,०४० सौर मास होते हैं । नक्षत्र के उदय में से सूर्य के भगण की संख्या घटाने से भूमिसामन दिन होते हैं ॥३७-३६॥ विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में जो संख्याएँ दी गयी हैं वह इनसे पहले के तीन श्लोकों के उदाहरण हैं । ऊपर जो महायुगीय अंक दिये गये हैं वह सब सिद्धान्तों में एक से नहीं हैं । थोड़ा बहुत अन्तर पाया जाता है । एक महायुग में सावन दिनों की संख्या भिन्न- भिन्न सिद्धान्तों में जैसी मिलती है वह नीचे की सारिणी से सहज ही जानी जा सकती है :— प्रचलित सूर्य सिद्धान्त के मत से १,५७,७६,१७,८२८ पंचसिद्धान्ति के सूर्य सिद्धान्तके मत से १,५७,७६,१७,८०० आर्यभटीय के मत से १,५७,७६,१७,५०० ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि के मत से १,५७,७६,१६,४५० महासिद्धान्त के मत से १,५७,७६,१७,५४२ अधिमासोनरात्र्यक्षंचान्द्रसावनवासराः । एते सहस्रगुणिताः कल्पे स्युर्भगणादयः ॥४०॥ अनुवाद—अधिमासों, अवम तिथियों, नाक्षत्र, चान्द्र और सावन दिनों तथा ग्रहों के भगणों की जो संख्याएँ (बतलायी गयी) हैं उनका एक हजार गुना कर देने से कल्प की संख्याएँ निकल आती हैं ॥ ४० ॥ विज्ञान भाष्य—१००० महायुगों का एक कल्प होता है इसलिए महायुगीय भगण इत्यादि की संख्याओं को १००० से गुणा कर देने पर कल्प की संख्याएँ जानी जा सकती हैं । प्राग्गतेःसूर्य मन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवह्नयः । कौजस्य वेदखयमा बुधस्याष्टर्तुवह्नयः ॥४१॥ खखरन्ध्राणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणासवः । गोऽनयश्शनिमंदस्य पातानामथ वामतः ॥४२॥

३२ सूर्य सिद्धान्त मनुदस्त्रास्तु भौजस्य बौधस्याष्टाऽष्टसागराः । कृताद्रिचन्द्रा जैवस्य त्रिलाङ्काश्व भृगोस्तथा ॥४३॥ शनिपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः । भगणाः पूर्वमेवाऽत्र प्रोक्ताः चन्द्रोच्चपातयोः ॥४४॥ अनुवाद—(४१) पूर्व की ओर चलते हुए एक कल्प में सूर्य का मन्दोच्च ३८७ भगण, मङ्गल का मन्दोच्च २०४ भगण, बुध का मन्दोच्च ३६८ भगण, (४२) वृहस्पति का मन्दोच्च ६०० भगण, शुक्र का मन्दोच्च ५३५ भगण और शनि का मन्दोच्च ३६ भगण करता है । पातों की गति पश्चिम की ओर को होती है । एक कल्प में मङ्गल का पात २१४ भगण, बुध का पात ४८८ भगण, वृहस्पति का पात १७४ भगण, शुक्र का पात ६०३ भगण और (४४) शनि का पात ६६२ भगण करता है । चन्द्रमा के उच्च और पात के भगणों की संख्या पहले (३३वें श्लोक में) बतलायी जा चुकी है । विज्ञान भाष्य—ग्रहों के मन्दोच्चों और पातों की गति बहुत सूक्ष्म होती है । इनमें से कोई भी १ महायुग में १ पूरा चक्कर नहीं कर पाते, इसलिए इनकी संख्या कल्प के अनुसार दी गयी है । मन्दोच्च और पात किसे कहते हैं इसका विवेचन चन्द्रमा के उच्च और पात के साथ किया गया है। यह संस्थाएँ कैसे जानी गयीं, इसका स्पष्ट प्रमाण कहीं नहीं मिलता; परंतु इसमें संदेह नहीं कि इसकी जानकारी बहुत काल के पर्यवेक्षण से की गयी होगी। कुछ पाश्चात्य विद्वान कहते हैं कि इसका ज्ञान भारतीय ज्योतिषियों को यूनानियों से हुआ होगा; परंतु यह उनका भ्रम है जैसा कि नीचे की सारिणी से जान पड़ेगा । यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि इन भगणों की संख्या आजकल के सूक्ष्मयंत्रों से जाने गये अंकों से बहुत भिन्न है । आधुनिक ग्रन्थों में इन मन्दोच्चों और पातों की वार्षिक गति दी हुई है; इसलिए सूर्य सिद्धान्त के कल्पीय भगणों से वार्षिक गति का मान निकाल कर तुलना की जा सकती है । वार्षिक गति इस प्रकार निकाली गयी :—कल्प में जितने भगण होते हैं उसको कल्प के सौर-वर्ष से भाग दे दिया गया तो भगण की एक भिन्न संख्या प्राप्त हुई । इसको ३६० से गुणा करने पर अंश, अंश को ६० से गुणा करने पर कला और कला को ६० से गुणा करने पर विकला में वार्षिक गति निकल आयी । जैसे सूर्य-मन्दोच्च एक कल्प में ३८७ भगण करता है तो एक वर्ष में वह ३८७ X ३६० X ६० X ६० / ४३२००००००० विकला अर्थात् ११६१ / १०००० विकला अर्थात् ॰११६१ विकला चलेगा ।

मध्यमाधिकार ३३ इसी प्रकार अन्य ग्रहों के मन्दोच्चों तथा पातों की वार्षिक गति विकला में जानी जा सकती है। इस सारिणी के जिन अंकों के पहले धन का चिह्न (+) है उससे यह प्रकट होता है कि गति पूर्व की ओर है और जिन अङ्कों के पहले ऋण का चिह्न (-) है उससे प्रकट होता है कि गति पश्चिम की ओर है। दूसरे स्तम्भ में जो अंक दिये गये हैं वह सायन-मेष के विचार से दिये गये हैं अर्थात् उनसे यह प्रकट होता है कि सायन-मेष से (वसंत सम्पात से) ग्रहों के मन्दोच्चों और पातों का अन्तर प्रति वर्ष कितना होता जाता है । परन्तु सायन-मेष चल है। यह प्रति वर्ष ५०·२६ विकला पच्छिम की ओर हटता जाता है; इसलिए यदि निरयन-मेष से जो स्थिर है मन्दोच्चों और पातों का वार्षिक अन्तर जानना हो तो दूसरे स्तम्भ के अंकों से ५०.२६ विकला घटा देना चाहिये । ऐसा करने से जो अन्तर आवेंगे वह निरयन-मेष से मन्दोच्चों और पातों के वार्षिक अन्तर होंगे। ऐसा करने से देखा जाता है कि शुक्र के मन्दोच्च की गति पश्चिम की ओर है अर्थात् शुक्र का मन्दोच्च तारों के मध्य पूर्व न जाकर पश्चिम की ओर खिसक रहा है। हमारे व्यावहारिक ज्योतिष ग्रन्थों में अयन चलन ६० विकला माना गया है। क्योंकि हमारा वर्षमान वास्तविक नाक्षत्र-वर्ष से ८॥ विकला अधिक है; इसलिए यदि वसंत सम्पात की वार्षिक गति ६० विकला मानी जाय और दूसरे स्तम्भ में जो अंक दिये गये हैं उनमें से ६० विकला घटायी जाय तो जो अन्तर आता है वही चौथे स्तम्भ में लिखा गया है। इस स्तम्भ में जो अंक आये हैं उनकी तुलना सूर्य सिद्धान्तीय अङ्कों से करनी चाहिये । मन्दोच्चों और पातों की वार्षिक गति ग्रह आधुनिक सूक्ष्म* बेधों के अनुसार सायन-मेष वास्तविक हमारे सिद्धा- सूर्य सिद्धान्त के या वसंत निरयन- न्तों के अनुसार संपात से मेष से निरयन-मेष से १ २ ३ ४ ५ मन्दोच्च विकला विकला विकला विकला रवि +६१.५ +११.२४ +१.५ +०.११६१ मंगल +६५.७ +१५.४६ +५.७ +०.०६१२ *Loomis की Practical Astronomy से लिया गया भारतीय ज्योतिः शास्त्र पृष्ठ २०७ ३

३४ सूर्य सिद्धान्त १ २ ३ ४ ५ बुध +५६.१ +५.२१ -३.६ : +•११०४ गुरु +५६.६ +६.६५ -३.१ +•२७ शुक्र +४७.० -३.२४ -१३.० +•१६०५ शनि +६६.६ +१६.३१ +६.६ +•०११७ मंगल का पात +२५.० -२५.२२ -३५.० -०.०६४२ बुध ,, +४०.२ -१०.०७ -१६.८ -•१४६४ गुरु ,, +३४.३ -१५.६० -२५.७ -•०५२२ शुक्र ,, +२६.७ -२०.५० -३०.३ -•२७०६ शनि ,, +३०.७ -१६.५४ -२६.३ -•१८६६ इस सारिणी के ४थे और ५वें स्तम्भों में बहुत अन्तर है । परन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि ५वें स्तम्भ में जो कुछ लिखा गया है वह कोरी आंख से और स्थूल यंत्रों से जाना गया है । यदि इन सिद्धान्तों के मानों की तुलना यूनानियों के मानों से की जाय तो जान पड़ेगा कि हमारे सिद्धान्तकार कितनी सूक्ष्म परीक्षा करते थे (देखिए ३५वें पृष्ठ की सारिणी) । ४थे और ७वें स्तम्भों के अंकों को मिलाने से जान पड़ेगा कि हमारे सिद्धान्त- कार वास्तविक स्थिति से कितना निकट थे और टालमी कितनी दूर । केरोपन्त ने जो गणना की है वह आधुनिक मानों के अनुसार है, इसलिए इनकी गणना से मन्दोच्चों और पातों की वास्तविक स्थिति का पता लगता है । इस तुलना से यह भी प्रकट है कि हमारे सिद्धान्तकारों ने स्वतंत्र अनुभव से इन सब भगण-मानों को जाना था न कि यूनानियों या अन्य देशवालों से लिया था जैसा कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों का मत है । षण्मनूनां च संपिण्ड्य कालं तत्सन्धिभिस्सह । कल्पादिसन्धिन सार्धं वैवस्वतमनोस्तथा ॥४५॥ युगानां त्रिघनं यातं तथा कृतयुगं त्विदम् । प्रोज्झ्य सृष्टेस्ततः कालं पूर्वोक्तं दिव्यसंख्यया ॥४६॥ सूर्याब्दसंख्यया ज्ञेयाः कृतस्याऽन्ते गता अमी । खचतुष्टयसप्ताद्रयग्निशरनन्दनिशाकराः ॥४७॥ अनुवाद—(४५) छः मनुओं, उनकी छः सन्धियों और कल्प की आदि संधि के काल को जोड़कर योगफल में वैवस्वत मनु के (४६) २७ युगों को तथा इस (अट्ठाईसवें) सत्ययुग को जोड़ दो और उसमें से सृष्टि के रचने में (२४वें श्लोक में) पहले कहे के अनुसार जितना समय लगा है उसको घटा दो । (४७) जो शेष बचे

मध्यमाधिकार ३५ | मन्दोच्चों और पातों के स्थान | | | | सम्वत् २०५ वि० में मन्दोच्चों और पातों के स्थान (सायन) | | | | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | | | केरोपंत की गणना के अनुसार | सूर्य सिद्धान्त के अनुसार | अन्तर | केरोपंत की गणना से | तालमी की गणना से | अन्तर | | | राशि अंश कला | रा० अं० क० | अं० क० | रा० अं० कला | रा० अं० क० | अं० क० | | रवि का उच्च | २ १७ ७ | २ १७ १५ + | ० ८ | २ ११ ५ | २ ५ ३० | — ५ ३५ | | मंगल " | ४ ८ ११ | ४ १० १ + | १ ५० | ४ १ ३६ | ३ २५ ३० | — ६ ६ | | बुध " | ७ २४ १ | ७ १० २६ — | १३ ३५ | ७ १८ ३२ | ६ १० ० | — ३८ ३२ | | गुरु " | ५ २० ३८ | ५ २१ १६ + | ० ३८ | ५ १५ ७ | ५ ११ ० | — ४ ७ | | शुक्र " | ६ २१ ३ | २ १६ ४६ — | २११ १४ | ६ १६ १८ | १ २५ ० | — २३१ १८ | | शनि " | ८ ५ १२ | ७ २६ ३७ — | ८ ३५ | ७ २८ ४५ | ७ २३ ० | — ५ ४५ | | मंगल का पात | १ ८ ६ | १ १० ५ + | १ ५६ | १ ५ २६ | ० २५ ३० | — ६ ५६ | | बुध " | १ ० १८ | ० २० ५४ — | ९ ३४ | ० २६ ५ | ० १० ० | — १६ ५ | | गुरु " | २ २५ ३० | २ १६ ४१ — | ५ ४६ | २ २२ १ | १ २१ ० | — ३१ १ | | शुक्र " | २ ३ ४० | १ २६ ४६ — | ३ ५४ | २ ० ३६ | १ २५ ० | — ५ ३६ | | शनि " | ३ १० १३ | ३ १० २५ + | ० १२ | ३ ७ २८ | ६ ३ ० | + ८५ ३२ | भारतीय ज्योतिषःशास्त्र पृ० २०५, २०६

३६ सूर्य सिद्धान्त वही (वर्तमान) सत्ययुग के अन्त तक सौर वर्षों में संख्या हुई जो १,६५,३७,२०,००० है ॥४५-४७॥ विज्ञान भाष्य—पिछले २२वें और २३वें श्लोकों में जो कुछ कहा गया है यही यहाँ फिर दुहराया गया है। इन श्लोकों के विज्ञान-भाष्य में कल्प के आरम्भ से वर्तमान महायुग के सत्ययुग के अन्त तक के सौर वर्षों की संख्या जानने की रीति बतलायी गयी है जो १,६७,०७,८४,००० होती है। इसमें से सृष्टि के रचने के १,७०,६४,००० सौर वर्ष घटा दिये जाँय तो शेष १,६५,३७,२०,००० होता है। इतने ही सौर वर्ष सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अन्त तक बीते हैं। अत ऊर्ध्वममी .युक्तै। गतकालाब्दसङ्ख्यया । मासीकृता युता मासैःमधु शुक्लादिभिर्गतैः ॥४८॥ पृथक्स्थास्तेऽधिमासघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः । लब्धाधिमासकैर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विताः ॥४६॥ द्विष्ठास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चान्द्रवासरभाजिताः । लब्धोनरात्रिरहिता लङ्कायामर्धरात्रिकः ॥५०॥ अनुवाद—(४८) ऊपर बतलाये गये (सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अंत तक के) सौर वर्षों में सत्ययुग के उपरान्त जितने सौर वर्ष बीते हों उनको जोड़ लो । योगफल इष्टकाल तक के सौर वर्षों की संख्या होगी । इसके मास बना लो अर्थात् १२ से गुणा कर दो । मासों की संख्या में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इष्टकाल तक जितने मास बीते हों उनको भी जोड़ दो । (४६) इस संख्या को दो स्थानों पर रखो, एक को महायुग के अधिमासों की संख्या से गुणा कर महायुग के सौर मासों की संख्या से भाग दे दो, जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक के अधिमासों की संख्या होगी । इस लब्धि को दूसरे स्थान में रखे हुए मासों में जोड़ दो । योगफल सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक के चांद्र-मासों की संख्या है। इसको ३० से गुणा कर (चान्द्र) दिन अर्थात् तिथियाँ बना लो और इष्टकाल तक वर्तमान मास की जितनी तिथियाँ बीती हों उनको जोड़ लो तो सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक जितनी तिथियाँ बीती हैं वह मालूम हो जायँगी । (५०) इन तिथियों की संख्या को भी दो स्थानों पर रखो । एक को महायुगीय क्षय-तिथियों की संख्या से गुण दो और गुणनफल को महायुगीय तिथियों की संख्या से भाग दे दो, जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक की क्षय-तिथियों की संख्या हुई । इसको दूसरे स्थान में रखी हुई तिथियों की संख्या में से घटा दो, जो शेष हो उससे एक कम लङ्का की अर्द्ध-रात्रि तक सावन-दिनों की संख्या हुई ॥४८-५०॥

मध्यमाधिकार ३७ विज्ञान भाष्य-जब यह जानना होता है कि किसी इष्ट समय ग्रहों के स्थान क्या हैं तब सबसे पहिले यह जानना चाहिये कि सृष्टि के आदि से उस इष्ट समय तक कितने सावन दिन बीते । जब सावन दिनों की संख्या मालूम हो गयी तब त्रैराशिक के द्वारा ग्रहों का स्थान जान लेना सुगम होता है। क्योंकि सृष्टि के आदि में सब ग्रह एक साथ थे और एक महायुग में वह कितने भगण करते हैं तथा कितने सावन दिन होते हैं, यह भी बतला दिया गया है; इसलिए जब महायुगीय सावन दिनों में अमुक भगण होते हैं तब इष्टकाल तक के सावन दिनों में कितने भगण होंगे, यह जान लेने से ही ग्रह का स्थान निकल आता है। इष्टकाल तक के सावन दिनों की संख्या जिसे अहर्गण कहते हैं जानने की रीति ऊपर के तीन श्लोकों में बतलायी गई है। उदाहरण—१६७६ विक्रमीय की वसंत पंचमी (माघ सुदी ५) तक सृष्टि से कितने दिन बीते ? सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अंत तक = १,६५,३७,२०,००० सौर वर्ष त्रेता ,, ,, = १२,६६,००० सौर वर्ष द्वापर ,, ,, = ८,६४,००० ,, १६७६ वि० की चैत्र शुक्ल १ के आरम्भ तक = ५,०२३* ,, इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ वि० के चैत्र शुक्ल १ के आरम्भ तक = १,६५,५८,८५,०२३ वर्ष = २३,४७,०६,२०,२७६ सौरमास* चै० शु० १ से माघ शु० १ के आरंभ तक = १० चांद्रमास इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ के मा० शु० १ तक = २३,४७,०६,२०,२८६ मध्यम मास जब एक महायुग में ५,१८,४०,००० सौर मास होते हैं तब १५,६३,३३६ अधिमास होते हैं; इसलिए २३,४७,०६,२०,२८६ मध्यम मासों में अधिमासों की संख्या हुई $\frac{२३,४७,०६,२०,२८६\times१५,६३,३३६}{५,१८,४०,०००} = ७२,१३,८४,७२६ अधिमास$ इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ वि० की माघ शु० १ तक हुए २४,१९,२०,०५,०१२ चांद्रमास = ७,२५,७६,०१,५०,३६० तिथियाँ ∵ माघ सुदी ५ तक हुईं ७,२५,७६,०१,५०,३६५ तिथियाँ

  • १६७६ वि० में जिस समय मेष-संक्रान्ति लगेगी उस समय पूरे होंगे । इसलिए इन्हें मध्यम सौर वर्ष या मास कहना चाहिये ।

३८ सूर्य सिद्धान्त परन्तु एक महायुग में ५३४३३३३६ चान्द्रमास तथा २,५०,८२,२५२ क्षय तिथियाँ होती हैं, इसलिए २४,१६,२०,०५,०१२ चान्द्र*मासों में क्षय तिथियों की संख्या = (२४,१६,२०,०५,०१२ × २,५०,८२,२५२) / ५३४३३३३६ = ११,३५,६०,१८,७६१ ∵. माघ सुदी ५, तक सृष्टि के आदि से सावन दिनों की संख्या = ७,१४,४०,४१,३१,६०४ माघ सुदी ५ के पहले की अर्द्धरात्रि तक के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,६०३ किसी समय तक के सावन दिनों की संख्या जानने का यह नियम बहुत कष्टप्रद है और तनिक सी भी भूल हो जाने से घंटों का परिश्रम व्यर्थ जाता है। इसलिए व्यवहार में इतने बड़े समय की गणना नहीं की जाती वरन् करण ग्रन्थ और सारणियाँ बनी हुई हैं जिनके द्वारा यह गणना सहज ही हो जाती है। आगे चलकर इस पुस्तक में भी सत्ययुग के अन्त से अहर्गण बनाने का उपदेश दिया गया है। यदि स्वतन्त्र गणना सुगम रीति से करना हो तो नीचे लिखी रीति काम दे सकती है :— यह बतलाया जा चुका है कि एक महायुग में ४३,२०,००० सौर वर्ष तथा, १,५७,७६,१७,८२८ सावन दिन होते हैं। इसलिए एक सौर वर्ष में १,५७,७६,१७,८२८ / ४३,२०,००० सावन-दिन अर्थात् ३६५.२५८७५६४८१५ सावन-दिन होते हैं। जिस समय तक के अहर्गण की संख्या जाननी हो वह जिस सम्वत् में हो उसकी मेष संक्रान्ति के दिन का अहर्गण निकाल लो। ऐसा करने के लिए एक वर्ष के सावन दिनों की संख्या को सृष्टि के आदि से इष्ट सम्वत् तक के सौर वर्षों से गुणा कर दो। उपर्युक्त उदाहरण में १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के दिन सृष्टि के आदि से १,६५,५८,८५,०२३ सौर वर्ष बीते हैं; इसलिए इस सम्वत् के मध्यम मेष-संक्रान्ति के समय तक ३६५.२५८७५६४८१५ × १,६५,५८,८५,०२३ सावन दिन अर्थात् ७,१४,४०,४१,३१,३२१. ७७००२६०७४५ सावन दिन बीते। परन्तु स्पष्ट मेष- संक्रान्ति मध्यम संक्रान्ति से २.१७०६६४४ सावन दिन पहले ही हो जाती है। इसलिए यदि मध्यम मेष संक्रान्ति तक के अहर्गण में से २.१७०६६४४ सावन दिन घटा दिये जांय तो स्पष्ट मेष-संक्रान्ति के समय तक ७,१४,४०,४१,३१,३१६.५६६३- *पुस्तक में चन्द्र मासों की जगह तिथियां कही गयी हैं जिससे गणना शुद्ध होती है; परन्तु गुणा भाग अधिक करना होता है इसलिए चान्द्र मास लिये गये हैं। इससे सम्भव है कि एक दिन की भूल पड़े, जो वार निकालने से शुद्ध हो सकती है।

मध्यमाधिकार ३६ ३१६७४५ सावन दिन बीते। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सृष्टि के आदि से इतने मध्यम सावन दिन बीतने पर १८७६ वि० की मेष संक्रान्ति लंका में हुई। इसलिए जिस दिन मेष संक्रान्ति थी उस दिन की आधी रात तक के अहर्गण हुए ७,१४,४०,४१,३१,३२० । अब देखना चाहिये कि मेष की संक्रान्ति से कितने दिन पर बसंत पंचमी पड़ी । इसके लिए पहले यह जानना चाहिये कि मेष संक्रान्ति के दिन कौन तिथि थी । १ चान्द्रमास २९.५३०५८७६४६०७ सावन दिनों का होता है । इसलिए यदि मेष संक्रान्ति के अहर्गण को इतने सावन दिनों से भाग दे दिया जाय तो जो लब्धि आवेगी वह सृष्टि के आदि से मेष संक्रान्ति तक के बीते हुए चान्द्रमासों की संख्या होगी और जो शेष बचा है वह चालू चान्द्रमास के सावन दिन होंगे । इस शेष को यदि ३० से गुणा करके गुणनफल को चान्द्रमास के सावन दिनों से फिर भाग दिया जाय तो जो लब्धि आवेगी वह तिथियों की संख्या होगी । ऐसा करने से मेष संक्रान्ति के समय तिथि की संख्या १६५२५७६ आती है, जो पूर्णिमान्त गणना से वैशाख बदी २ और अमान्त गणना से चैत बदी २ होती है । अब यह जानना चाहिये कि वैशाख बदी २ से माघ सुदी ५ तक कितने सावन दिन बीते । इसलिए पहले यह देखना चाहिये कि इस समय में कितनी तिथियाँ बीतीं । वैशाख बदी ३ से माघ बदी २ तक ९ चान्द्रमास होते हैं, क्योंकि इस वर्ष कोई मलमास नहीं पड़ा, तथा माघ बदी ३ से माघ सुदी ५ के आरम्भ तक अर्थात् चौथ के अन्त तक १७ तिथियाँ होती हैं । इसलिए मेष संक्रान्ति से माघ सुदी ४ के अन्त तक ९ x ३० + १७ तिथियाँ अर्थात् २८७ तिथियाँ बीतीं । परन्तु ३० तिथियाँ = २९.५३०५८७६४६०७ मध्यम सावन दिन; इसलिए २८७ तिथियाँ = २८७ x २९.५३०५८७६४६०७ x १/३० = २८२.५०६२६१३५०७३६ = २८२.५१ सावन दिन स्थूल रूप से परन्तु मेष संक्रान्ति की अर्द्धरात्रि के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,३२० इसलिए सृष्टि से माघ सुदी ५ तक के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,६०२.५१ अर्थात् माघ सुदी ५ की पहली अर्द्ध-रात्रि तक ७,१४,४०,४१,३१,६०३ सावन दिन बीते; जो पहली रीति से निकाले गये अहर्गण से मिलता है। इस गणना के लिए दशमलव के ग्यारहवें स्थान तक के अंकों को लेना पड़ता है क्योंकि गुणक (सृष्टि से

४० सूर्य सिद्धान्त अब तक के सौर वर्षों की संख्या) अरबों में है। यदि त्रेता या कलियुग के आदि से अहर्गण निकालना हो जिसके लिए आगे आदेश है, तो चान्द्रमास और सौर वर्ष के सावन दिनों की संख्या सात दशमलव स्थानों तक लेना पर्याप्त होगा । अब यह परीक्षा करना रह गया कि यह संख्या शुद्ध है या नहीं । इसके लिए केवल यह जाँचना पर्याप्त होगा कि सृष्टि से इतने दिनों के बाद कौन वार आरम्भ होगा । यदि वार ठीक निकल आवे या १ दिन का अन्तर पड़े तो समझना चाहिए कि अहर्गण ठीक है, नहीं तो अशुद्ध है । इसकी रीति आगे के श्लोक में दी हुई है ! सावनो द्युगणस्सूर्याद्दिनमासाब्दपास्ततः । सप्तभिः क्षयितश्शेषः सूर्याद्यो वास्रेश्वरः ॥५१॥ मासाब्ददिनसंख्याप्तौ द्वित्रिघ्नौ रूपसंयुतौ । सप्तोद्धृतावशेषौ तु विज्ञेयौ मासवर्षपौ ॥५२॥ अनुवाद-(५१) सावन दिनों की जो संख्या हो उससे दिनपति, मास- पति और वर्षपति सूर्य से गिनकर जानना चाहिये । इस संख्या को ७ से भाग दे दे जो शेष बचे वही सूर्य से वारों के क्रम से आरंभ होकर दिनपति है । (५२) यदि इस (सावन दिनों की) संख्या को क्रम से मास और वर्ष के दिनों की संख्याओं से भाग दे दें और भागफलों को क्रम से दो और तीन से गुणा करके, प्रत्येक गुणनफल में एक जोड़ दे और योगफलों को ७ से भाग दे दें तो जो शेष बचे वही सूर्य से वारों के क्रम से आरंभ हो कर क्रमानुसार मासपति और वर्षपति है ॥५१-५२॥ विज्ञान-भाष्य-वार ( दिन ) का नाम उस ग्रह के नाम पर रखा गया है जो वार के आरंभ में पहले घंटे ( होरा ) का स्वामी समझा गया है। जो ग्रह पहले घंटे का स्वामी होता है वही उस वार का भी स्वामी समझा जाता है। इसी तरह सावन* मास के आरंभ में जो वार पड़ता है उसी का स्वामी उस सावन मास का स्वामी समझा जाता है और सावन वर्ष के आरम्भ में जो वार पड़ता है उसी का स्वामी उस सावन वर्ष का स्वामी समझा जाता है। जैसे रविवार के पहले घंटे का स्वामी रवि, उस दिन का स्वामी रवि, जो सावन मास रविवार से आरंभ होता है उस मास का स्वामी रवि और जो सावन वर्ष रविवार से आरंभ होता है उस वर्ष का स्वामी भी रवि ही है । *सावन को श्रावण न समझना चाहिये । ३० सावन दिनों का जो मास होता है वह सावन मास और १२ सावन महीनों का जो वर्ष होता है वह सावन वर्ष कहलाता है ।

मध्यमाधिकार ४१ किस घंटे ( होरा ) का स्वामी कौन ग्रह है यह जानने के लिए वह क्रम समझ लेना चाहिये जिस क्रम से घंटे के स्वामी बदलते हैं। शनि ग्रह पृथ्वी से सब ग्रहों से अधिक दूर है, उससे निकट बृहस्पति है, बृहस्पति से निकट मंगल, मंगल से निकट सूर्य, सूर्य से निकट शुक्र, शुक्र से निकट बुध १ और बुध से निकट चन्द्रमा है। इसी क्रम से होरा के स्वामी बदलते हैं। यदि पहले घंटे का स्वामी शनि है तो दूसरे घंटे का स्वामी वृहस्पति, तीसरे का स्वामी मंगल, चौथे का सूर्य, पांचवें का शुक्र, छठें का बुध, सातवें का चन्द्रमा, आठवें का फिर शनि, इत्यादि क्रमानुसार हैं। परन्तु जिस दिन पहले घंटे का स्वामी शनि होता है उस दिन का नाम शनिवार होना चाहिये । इसलिए शनिवार के दूसरे घंटे का स्वामी बृहस्पति, तीसरे घंटे का स्वामी मंगल इत्यादि हैं। इस प्रकार सात-सात घंटे के बाद स्वामियों का वही क्रम फिर आरंभ होता है। इसलिए शनिवार के २२वें घण्टे का स्वामी शनि, २३वें का वृहस्पति, २४वें का मंगल, और २४वें के बाद वाले घंटे का स्वामी सूर्य होना चाहिये । परन्तु यह २५वां घंटा अगले दिन का पहला घंटा है जिसका स्वामी सूर्य है इसलिए शनिवार के बाद रविवार होता है। रविवार के दूसरे घंटे का स्वामी शुक्र, तीसरे का बुध, चौथे का चन्द्रमा, इत्यादि क्रमानुसार चलते हुए ११वें, १८वें २५वें घंटों का स्वामी भी चन्द्रमा होता है। परन्तु २५वां घंटा अगले दिन का पहला घंटा है इसलिए इसी घंटे के स्वामी के नाम से अगला दिन चन्द्रवार पड़ा। इसी प्रकार और वारों का नामकरण २ हुआ है। अब यह स्पष्ट हो गया कि शनिवार के बाद रविवार और रविवार के बाद सोमवार और सोमवार के बाद मंगलवार क्यों होता है। ग्रहों के क्रम में शनि से रवि चौथा ग्रह है, रवि से चंद्रमा चौथा ग्रह है, चन्द्रमा से मंगल चौथा ग्रह है। इसलिए यह नियम हो गया है कि ग्रहों के क्रम को शनि से गिनते हुए प्रत्येक चौथा ग्रह अगले वार का स्वामी होता है। १. पृथ्वी से बुध शुक्र की अपेक्षा अधिक दूर है परन्तु हमारे ज्योतिष ग्रन्थों में शुक्र ही अधिक दूर माना गया है। कारण इसका यह है कि जो ग्रह जितनी ही दूर है उतनी ही देर में वह भगण पूरा करता है। ऐसा विश्वास हमारे ज्योतिषियों का भी है परन्तु इन्होंने पृथ्वी से यह दूरी ली है और आधुनिक ज्योतिषियों ने सूर्य से । २. वारों का यह क्रम प्रायः सभी देशों में पाया जाता है। परन्तु इनके नामकरण की उपपत्ति जैसी यहाँ की गयी है वैसी कहीं और भी है या नहीं यह खोजने के योग्य है ।

४२ सूर्य सिद्धान्त मासपति—यदि किसी सावन मास का पहला दिन रविवार हो तो अगले सावन मास का पहला दिन रविवार से ३१वाँ दिन होगा क्योंकि सावन मास ३० दिन का होता है । परन्तु रविवार से ३१वां दिन पांचवें सप्ताह का तीसरा दिन मंगलवार होता है । इसलिए दूसरे सावन मास का स्वामी मंगल ग्रह हुआ । तीसरे सावन मास का पहला दिन मंगलवार से ३१वां हुआ अर्थात् मंगलवार से आरम्भ करके पांचवें सप्ताह का तीसरा दिन, वृहस्पतिवार हुआ । इसलिए तीसरे सावन मास का स्वामी वृहस्पति हुआ । इसी प्रकार चौथे सावन मास का स्वामी, वृहस्पति- वार से तीसरे दिन शनिवार का स्वामी शनि और पांचवें सावन मास का स्वामी शनिवार से तीसरे दिन सोमवार का स्वामी सोम तथा छठें सावन मास का स्वामी बुध और सातवें सावन मास का स्वामी शुक्र हुआ । आठवें सावन मास से फिर यह क्रम चलेगा । इसलिए वारों के क्रम से तीसरा वार आने वाले सावन मास का पहला दिन तथा उसका स्वामी उस सावन मास का स्वामी होता है । अब यदि ध्यान से देखा जाय तो जान पड़ेगा कि मासपतियों का क्रम ग्रहों के क्रम के अनुसार इस प्रकार है— रवि, मंगल, वृहस्पति, शनि, सोम, बुध और शुक्र; फिर रवि, मंगल, वृहस्पति शनि इत्यादि । यदि चन्द्रमा से यह चक्र आरंभ हो तो इनका क्रम वही रहेगा जिस क्रम से ये पृथ्वी से क्रमानुसार दूर समझे गये हैं । वर्षपति—सावन वर्ष का आरम्भ जिस दिन से होता है उसी दिन का स्वामी उस वर्ष का स्वामी समझा जाता है । यदि पहले सावन वर्ष का आरम्भ रविवार को हो तो दूसरे सावन वर्ष का आरम्भ रविवार से ३६१वें दिन होगा जो ५१ सप्ताह के बाद वाले सप्ताह का चौथा दिन अर्थात् बुधवार है इसलिए दूसरे सावन वर्ष का स्वामी बुध होगा । तीसरे सावन वर्ष का आरम्भ दूसरे सावन वर्ष से ३६१वें दिन होगा इसलिए यह बुधवार से चौथा दिन शनिवार होगा जिसका स्वामी शनि है इसलिए तीसरे सावन वर्ष का स्वामी शनि होगा । इसी प्रकार चौथे सावन वर्ष का स्वामी शनिवार से चौथे दिन मंगलवार का स्वामी मंगल है । पाँचवें सावन वर्ष का स्वामी, मंगलवार से चौथे दिन शुक्रवार का स्वामी शुक्र है । छठें सावन वर्ष का स्वामी शुक्रवार से चौथे दिन सोमवार का स्वामी सोम, सातवें सावन वर्ष का स्वामी सोमवार से चौथे दिन वृहस्पतिवार का स्वामी वृहस्पति तथा आठवें सावन वर्ष का स्वामी वृहस्पतिवार से चौथे दिन रविवार का स्वामी रवि फिर होगा । इस तरह आठवें सावन वर्ष से फिर वही क्रम आरम्भ होगा । इन स्वामियों का क्रम इस प्रकार हुआ रवि, बुध, शनि, मंगल, शुक्र, सोम, वृहस्पति; फिर रवि, बुध, शनि इत्यादि । इसलिए यदि वारों के अनुसार क्रम मिलाया जाय तो आने वाले सावन वर्ष का

मध्यमाधिकार ४३ पहला दिन गत सावन वर्ष के पहले दिन से चौथा होगा । और यदि ग्रहों का क्रम मिलाया जाय तो शनि से आरम्भ करके प्रति तीसरा ग्रह वर्ष का स्वामी होता है । इन बातों को सूत्र रूप में भूगोलाध्याय के ७८वें और ७९वें श्लोकों में यों लिखा गया है :— मन्दादधःक्रमेण स्युश्चतुर्था दिवसाधिपाः । वर्षाधिपतयस्तद्वत्तृतीयाश्च प्रकीर्तिताः ।। ७८ ।। ऊर्ध्वक्रमेण शशिनो मासानामिधिपाः स्मृताः । होरेशाः सूर्यतनयादधोऽधः क्रमशस्तथा ।। ७९ ।। सूर्य सिद्धान्त, भूगोलाध्याय वर्षपति, मासपति, दिनपति और होरापति जानने की दोनों रीतियाँ दो चित्रों (चित्र ५ तथा ६) के द्वारा दिखलायी जाती हैं । वारों के अनुसार क्रम चित्र ५

४४ सूर्य सिद्धान्त

वारों के नामों तथा वर्षपतियों और मासपतियों के सम्बन्ध का यह नियम जान लेने पर अब ५१वें और ५२वें श्लोकों की उपपत्ति सहज ही समझी जा सकती है । इष्टकाल तक जो अहर्गण ( सावन दिन ) आया हो उसको सात से भाग देने पर जो शेष बचे उतने ही दिन सप्ताह के बीत चुके हैं । सृष्टि का आरम्भ रविवार से हुआ इसलिए रविवार सप्ताह का पहला दिन है और शनिवार पिछला दिन अर्थात् सातवाँ दिन । इसलिए यदि शेष ५ बचे तो समझना चाहिए कि वृहस्पति का दिन है जिसकी मध्य रात्रि को वह अहर्गण पूरा होता है क्योंकि वृहस्पति सप्ताह का पाँचवाँ दिन है । जैसे पिछले उदाहरण में अहर्गण की जो संख्या ७,१४,४०,४१,३१,६०३ आयी है उसको सात से भाग देने पर शेष १ बचता है । इसलिए जिस दिन का अहर्गण निकाला गया है वह सप्ताह का पहला दिन रविवार है । परन्तु यह अहर्गण बसंत-पंचमी से पहले की अर्द्धरात्रि तक का है इसलिए बसंत-पंचमी को सोमवार होगा । मासपति जानने के लिए इष्ट अहर्गण को ३० से भाग देना चाहिए जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से सावन मासों की संख्या हुई । इन सावन मासों को दो से गुणा करके १ जोड़ दो और सात से भाग दे दो, क्योंकि मासपतियों का क्रम वार के अनुसार तीसरे दिन बदलता है और सात मास बीतने पर फिर वही क्रम आरम्भ होता है । जो शेष बचे, सप्ताह के उसी दिन का स्वामी उस मास का स्वामी होता है जो चल रहा है । जैसे ऊपर के अहर्गण को ३० से भाग देने पर २३, ८१,३४,७१,०५३ सावन मास और १३ सावन दिन होते हैं । इन सावन मासों की संख्या को २ से गुणा करके १ जोड़ने पर ४७,६२,६६,४२,१०७ होता है । इसको ७ से भाग देने पर शेष ३ बचता है । इसलिए चलते सावन मास का पहला दिन मंगलवार था । इसलिए इस मास का स्वामी मंगल है । वर्षपति जानने के लिए इष्ट अहर्गण को ३६० से अथवा ऊपर निकाले हुए सावन मासों को १२ से भाग दे दो, जो लब्धि आवे उतने ही सावन वर्ष बीते हैं । इनको तीन से गुणा करके १ जोड़ दो और सात से भाग दे दो क्योंकि वर्षपतियों का क्रम वार के अनुसार चौथे दिन बदलता है और सात वर्ष के बाद फिर वही क्रम आरम्भ होता है । जो शेष बचे (सप्ताह के) उसी दिन का स्वामी चलते सावन वर्ष का स्वामी होता है क्योंकि सप्ताह का आरम्भ रविवार से होता है । जैसे ऊपर के उदाहरण में अहर्गण को ३६० से भाग देने पर अथवा सावन मासों को १२ से भाग देने पर गत सावन वर्षों की संख्या १,६८,४४,५५,६२१ हुई ।

मध्यमाधिकार ४५ इसको तीन से गुणा कर १ जोड़ने से ५,६५,३३,६७,७३४ हुआ । इसको ७ से भाग देने पर शेष १ बचता है । इसलिए चलते सावन वर्ष का आरंभ रविवार को हुआ और इस वर्ष का स्वामी रवि हुआ । चित्र ६- पृथ्वी से ग्रहों की दूरी के अनुसार क्रम यह तो हुई सूर्य सिद्धान्त के अनुसार वर्षपति निकालने की रीति । आज- कल के सभी पंचांगों में वर्षपति (वर्षेश) उस दिन का स्वामी माना जाता है जिस दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा होती है और वर्ष का मंत्री उस दिन का स्वामी समझा जाता है जिस दिन मेष संक्रान्ति होती है। मेघेश उस दिन का स्वामी होता है जिस दिन आर्द्रा नक्षत्र लगता है, इत्यादि इसी विचार से वर्ष भर का फल निकाला जाता है । मकरंद सारिणी में सूर्य सिद्धान्त से भिन्न नियम यह है:-- चैत्र शुक्ल प्रतिपद्दिवसे यो वारः स राजा । मेष संक्रान्ति दिवसे यो वारः स मंत्री । कर्क संक्रान्ति दिवसे यो वारः स सत्याधिपः । तुला संक्रान्ति दिवसे (यो) वारः स रसाधिपः । मृग संक्रान्ति दिवसे यो वारो (स) नीरसाधिपः । आर्द्राप्रवेश

४६ सूर्य सिद्धान्त दिवसे यो वारः स मेघाधिपः । धनुः संक्रान्ति दिवसे यो वारः स पश्चिमधान्याधिपः* ॥ सावन वर्ष तथा सावन मास का व्यवहार आजकल कहीं नहीं है । इसलिए वर्षाधिप और मासाधिप निकालने का जो नियम सूर्य सिद्धान्त में दिया गया है वह किस काम आता है यह मैं नहीं जानता । यदि कोई सज्जन जानते हों तो कृपया सूचित करें । तेरहवें श्लोक से, जैसा कि मैंने उसकी टिप्पणी में लिखा है, यह ध्वनि निकलती है कि यथार्थ वर्ष सौर वर्ष ही है । फिर सावन वर्ष और सावन मास के अनुसार वर्षपति और मासपति निकालने की क्या आवश्यकता है ? यथा स्वभगणाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासरैः । विभाजितो मध्यगतो भगणादिग्रहो भवेत् ॥५३॥ एवं स्वशीघ्रमन्दोच्चा ये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः । विलोमगतयः पातास्तद्वच्चक्राद्विशोधिताः ॥५४॥ अनुवाद—(५३) जितने अहर्गण आवें उनसे किसी ग्रह के महायुगीय भगण को गुणा कर दो और गुणनफल को महायुगीय सावन दिनों से भाग दे दो। जो लब्धि आवेगी उतने ही भगण उस ग्रह के (सृष्टि के आदि से) मध्यम गति के अनुसार पूरे हुए हैं । जो शेष बचे उसको १२ से गुणा करके फिर (महायुगीय सावन दिनों से) भाग देने से उस राशि की संख्या आवेगी जितनी राशियां वह ग्रह वर्तमान भगण में पूरा कर चुका है । अब जो शेष बचे उसको ३० से गुणा करके महायुगीय सावन दिनों की संख्या से भाग देने पर उन अंशों की संख्या निकल आवेगी जितने अंश वह ग्रह वर्त्तमान राशि में पूरा कर चुका है इत्यादि । (५४) इसी प्रकार पहले कहे हुए पूर्व की ओर चलने वाले शीघ्रों और मन्दोच्चों के स्थान भी जाने जा सकते हैं। पातों की गति उलटी (पच्छिम की ओर) होती है, इसलिए पातों की जो राशि अंश कला विकला आवें उनको पूरे चक्र में से अर्थात् १२ राशि में से घटा देने पर, जो शेष बचे वही पातों के स्थान हैं ॥ ५३-५४ ।। विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में वह रीति बतलायी गयी है जिससे किसी इष्ट समय में ग्रहों के मध्यम स्थान जाने जाते हैं । इसका संक्षेप में अर्थ यह है कि जब एक महायुग में (महायुगीय सावन दिनों में) ग्रह ऊपर कहे हुए भगण करता है तब इष्ट समय तक के सावन दिनों में कितने भगण करेगा । इसलिए त्रैराशिक की रीति से इस नियम को यों प्रकट कर सकते हैं :— महायुगीय सावन दिन : इष्ट अहर्गण :: महायुगीय भगणः इच्छित भगण

  • वेंकटेश्वर प्रेस की १६६० वि० की छपी मकरंद सारिणी पृष्ठ ४७६

मध्यमाधिकार ४७ यदि 'स' को महायुगीय सावन दिन, 'अ' को इष्ट अहर्गण, 'भ' को महायुगीय भगण तथा 'भा' को अभीष्ट भगण माना जाय तो संक्षेप में इसको यों लिखेंगे :- भा = (अ × भ) / स यह एक भिन्न है, जिसको सरल किया जाय तो जो पूर्णाङ्क आवेगा वह ग्रह के उन भगणों की संख्या है जो उस समय तक पूरे हो चुके हैं और शेष भिन्न को १२ से गुणा करके सरल करने पर जो पूर्णाङ्क आवेगा वह गत राशि तथा फिर जो भिन्न होगी उसको ३० से गुणा करके सरल करने पर वर्तमान राशि के अंश निकलेंगे । यदि कला विकला भी जानना हो तो ६० से गुणा करके सरल करते जाना होगा । यह नियम सभी पूर्व चलने वाले ग्रहों, शीघ्रोच्चों और मन्दोच्चों के लिए लागू है। यदि किसी ग्रह के पातों का स्थान जानना हो तो ऊपर लिखी रीति से जो राशि, अंश, कला, विकला आवे उसे १२ राशियों में से घटा देना चाहिये क्योंकि पात की चाल उलटी होती है इसलिए वह उलटे क्रम से राशि चक्र पर चलेगा । यदि गणित से निकले कि अमुक पात 'भा' भगण पूरे करके २ राशि ३ अंश ५ कला पर है, तो इसे मेष के आदि बिन्दु से उलटा गिनना चाहिये अर्थात् मीन, कुंभ, और मकर के अंतिम बिंदु से ३ अंश ५ कला अर्थात् मकर के २६ अंश ५५ कला पर । इसलिए यदि १२ राशियों में २ राशि ३ अंश ५ कला घटाया जाय तो ९ राशि २६ अंश ५५ कला आवेगा जिसका अर्थ यह हुआ कि वह पात राशि चक्र की ९ राशियों के उपरान्त दसवीं राशि के २६ अंश ५५ कला पर है। द्वादशघ्ना गुरोर्याता भगणा वर्तमानकैः । राशिभिस्सहिताश्शुद्धाष्षष्ट्या स्युर्विजयादयः ॥५५॥ अनुवाद—बृहस्पति के गत भगणों को १२ से गुणा करके गुणनफल में वर्तमान भगण की जिस राशि में बृहस्पति हो उसकी क्रम संख्या को जोड़ दे, योगफल को ६० से भाग देने पर जो शेष बचे उसी क्रम संख्या का सम्वत्सर विजय से आरंभ होकर चल रहा है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ५५ ॥ विज्ञान भाष्य—बृहस्पति मध्यम गति से जितने समय में एक राशि चलता है उसको सम्वत्सर कहते हैं। इसलिए वृहस्पति के एक भगण काल में (४३३२·३२०६ सावन दिनों में) बारह सम्वत्सर होते हैं और एक सम्वत्सर में ३६१·०२६७२ सावन दिन होते हैं। इसलिए यह स्पष्ट है कि सौर वर्ष की अपेक्षा संवत्सर ४·२३२०३ सावन दिन छोटा और सावन वर्ष से १·०२६७२ सावन दिन बड़ा होता है।

४८ सूर्य्य सिद्धान्त एक चक्र में ६० सम्वत्सर होते हैं जिनके नाम क्रम से यह हैं :— १ विजय २१ प्रमादी ४१ श्रीमुख २ जय २२ आनन्द ४२ भाव ३ मन्मथ २३ राक्षस ४३ युवा ४ दुर्मुख २४ अनल (नल) ४४ धाता ५ हेमलम्ब २५ पिंगल ४५ ईश्वर ६ विलम्ब २६ कालयुक्त ४६ बहुधान्य ७ विकारी २७ सिद्धार्थी ४७ प्रमाथी ८ शार्वरी २८ रौद्र ४८ विक्रम ९ प्लव २९ दुर्मति ४९ वृष १० शुभकृत ३० दुंदुभी ५० चित्रभानु ११ शोभन ३१ रुधिरोद्गारी ५१ सुभानु १२ क्रोधी ३२ रक्ताक्ष ५२ तारण १३ विश्वावसु ३३ क्रोधन ५३ पार्थिव १४ पराभव ३४ क्षय ५४ व्यय १५ प्लवंग ३५ प्रभव ५५ सर्वजित १६ कीलक ३६ विभव ५६ सर्वधारी १७ सौम्य ३७ शुक्ल ५७ विरोधी १८ साधारण ३८ प्रमोद ५८ विकृति १९ विरोधकृत ३९ प्रजापति ५९ खर २० परिधावी ४० अंगिरा ६० नन्दन वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में¹ संवत्सर चक्र का आरंभ विजय से न मानकर ३५वें सम्वत्सर प्रभव से माना है। यही प्रथा आजकल भी प्रचलित है। यह प्रथा कब से आरंभ हुई इसकी खोज करना आवश्यक है। ६० संवत्सरों के चक्र में कई छोटे-छोटे विभाग हैं जिनका आरंभ भी प्रभव से ही होता है। इनकी चर्चा मानाध्याय नामक अंतिम अध्याय में की जायगी । १. नवलकिशोर प्रेस से १८८४ ई० में प्रकाशित और पं० दुर्गाप्रसाद जी द्वारा अनुवादित पृष्ठ ६०— आद्यं धनिष्ठांशमभिप्रपन्नो माघे यदायात्युदयं सुरेज्यः । षष्ठ्यब्द पूर्वंः प्रभवः सनाम्ना प्रवर्तते भूतहितास्तदाब्दः ॥