सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
सूर्यग्रहणाधिकार ५२३ मेष १३४५ असु मीन वृष १५२५ " कुम्भ मिथुन १८२१ " मकर कर्क २०४१ " धनु सिंह २०६३ " वृश्चिक कन्या २००५ " तुला अमावास्यान्तकालिक स्पष्ट सूर्य = ९ रा ०° ३२'·८ = २२० ४१' ∵ अमावास्यान्तकालिक सायन सूर्य = ९ रा २३° १३'·८ = ९ रा २३ १४' मकर राशि के भोग्यांश = ६° ४६' = ४०६' काशी में मकर राशि के उदयासु = १८२१ १८०० : ४०६ :: १८२१ : मकर के भोग्यासु मकर के भोग्यासु = (४०६ X १८२१) / १८०० = ४११ सूर्योदय से अमावास्यान्त तक का समय = १४ घड़ी ४५·५ पल = ८८५·५ पल = ५३१३ असु मकर के भोग्यासु = ४११ कुम्भ के उदयासु १५२५ मीन " १३४५ मेष " १३४५ योग ४६२६ इस योग को ५३१३ असुओं से घटाने पर ६८७ असु शेष होते हैं। यही वृष लग्न के गतासु हैं परन्तु वृष के उदयासु १५२५ हैं। १५२५ : ६८७ :: १८०० : वृष के गतांश ∴ सायन वृष लग्न के गतांश = (६८७ X १८००) / १५२५ = ८११ कला = १३° ३१' ∴ सायन उदय लग्न ३०° + १३° ३१' = ४३° ३१' ∴ अमावास्यान्तकालिक सायन त्रिभोन लग्न = ४३° ३१' - ६०° = ३६०° + ४३° ३१' - ६० = ३१३° ३१'
५२४ सूर्य-सिद्धान्त अमावस्यान्तकालिक सूर्य सायन मकर राशि में है जिसके लङ्का में उदयासु १६३१ हैं (देखो पृष्ठ ३१४) । इसलिये सायन मकर राशि १६३१ असुओं में किसी स्थान के यामोत्तरवृत्त का उल्लंघन करता है (देखो त्रि० श्लो० ४८ और पृ० ३३०) । अमावस्यान्तकाल में सूर्य का पच्छिम नत १ घड़ी ३२.८ पल = ६२.८ पल = ५५७ असु । जब १६३१ असुओं में मकर राशि का ३० अंश या १८०० कला यामोत्तर वृत्त को उल्लंघन करता है तब ५५७ असुओं में ५५७ x १८०० / १६३१ कला = ५१६ कला = ८°३६' करेगा । इसलिये सूर्य से मध्य लग्न ८°३६' पूर्व है जिसे सूर्य के भोगांश में जोड़ने पर मध्य लग्न का ज्ञान होगा। परन्तु इतना जोड़ने पर कुंभराशि मध्य लग्न में हो जाती है इसलिए उत्तम यह है कि पहिले देखा जाय कि मकर राशि कितने समय में उल्लंघन करती है और जितना समय शेष रह जाय उतने में कुम्भ राशि कितना चलती है। अमावस्यान्तकालिक सायन सूर्य ६ रा २३° १४' है इसलिये मकर का ६°४६' भोग्यांश है जो ४०६' के समान है। १८०० : ४०६ : : १६३१ : मकर के भोग्यासु ∴ मकर के भोग्यासु = ४०६ x १६३१ / १८०० = ४३५.५ असु परन्तु नतकाल ५५७ असु है इसलिये कुम्भ के गतासु = १२१.५ असु । कुम्भ के लंका के उदयासु १७६४ हैं, इसलिये १७६४ : १२१.५ : : १८०० : कुम्भ के गतांश ∴ कुम्भ के गतांश = १२१.५ x १८०० / १७६४ = १२२ कला = २° २' ∴ अमावस्यान्त काल में कुम्भ राशि का २° २' मध्यलग्न है । अर्थात् मध्यलग्न का सायन भोगांश = १० रा २° २' उदयज्या = लग्नज्या x परम क्रान्तिज्या / लम्बज्या = ज्या ४३°३१' x ज्या २३° २७' / ज्या (६० - २५°२०'०") = .६८८६ x .३६७६ / .६०३८ = ३०३२ ∴ उदय लग्न की अग्रा = १७°३६'
सूर्यग्रहणाधिकार ५२५ मध्य लग्न का सायन भोगांश = १० रा २° २' = ३०२°२' ∴ मध्य लग्न की क्रान्ति ज्या = ज्या ३०२°२' X ज्या २३°२७' = - ज्या ५७°५८' X ज्या २३°२७' = - '८४७७ X '३९७६ = - '३३७३ ∴ दक्षिण क्रान्ति = १९°४३' काशी का उत्तर अक्षांश = २५° २०' ∴ मध्य लग्न का नतांश = ४५° ३' पृष्ठ ४१३ के प्रथम समीकरण के अनुसार, त्रिभोन लग्न की नतांश ज्या = कोज्या १७°३६' X ज्या ४५°३' = '९५२६ X ७०७७ अथवा दृक्क्षेप = '६७४४ ∴ त्रिभोन लग्न का नतांश = ४२°२४' दृग्गति = त्रिभोन लग्न की उन्नतज्या = ज्या (६०° - ४२°२४') = ज्या ४७°३६' = ज्या '७३८५ यहाँ ज्या और कोटिज्या की दशमलव सारणी के अनुसार जिसमें त्रिज्या १ मानी गयी है दृग्गति की गणना की गयी है । यदि यह सारणी न हो तो पृष्ठ ४१३ में जो रीति बतलायी गई है उसी से काम लेना चाहिये । दि लघु रिक्त सारिणी से काम लिया जाय तो और भी सुविधा होगी । त्रिभोन लग्न का नतांश जानने की भी सारणी बनायी जा सकती है जिससे सुगमतापूर्वक काम लिया जा सकता है । पृष्ठ ३२८ में तथा और स्थानों में बतलाया गया है कि किसी राशि के प्रत्येक अंश समान काल में उदय नहीं होते इसलिये यदि अनुपात से काम लिया जायगा तो राशि के उदय-विन्दु का ज्ञान स्थूल रहेगा । ऐसी दशा में ऊपर बतलायी गयी रीति से जो त्रिभोन लग्न आवेगा उसमें भी स्थूलता रहेगी क्योंकि क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु से ६० अंश घटाने पर त्रिभोन लग्न आता है । इसलिये आवश्यक है कि सूर्यग्रहण की गणना के लिये क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु अथवा उदय लग्न का ज्ञान शुद्धतापूर्वक किया जाय । इसी विचार से नीचे की रीति लिखी जाती है । विषुवकाल—जिस क्षण वसन्त-सम्पात-विन्दु या सायन मेष किसी स्थान के पूर्वक्षितिज पर आता है उस क्षण से किसी इष्ट काल तक के समय को विषुवकाल कहते हैं । पृष्ठ ३१८ - १६ में बतलाया गया है कि प्रयाग में अयन भाग के
५२६ सूर्य-सिद्धान्त उदयासु कैसे जाने जाते हैं। वहाँ अयन भाग के उदयासु १००५ बतलाये गये हैं। इसको इस प्रकार भी कह सकते हैं कि प्रयाग में जिस समय निरयन मेष का आदि विन्दु क्षितिज वृत्त पर आता है उस समय विषुवकाल १००५ असु के समान होता है। इसी प्रकार जिस समय प्रयाग में निरयन वृष का आदि विन्दु पूर्व क्षितिज पर आता है उस समय विषुवकाल २४७० असु के समान होता है। इससे प्रकट है कि यदि जानना हो कि किसी स्थान में किस समय विषुवकाल क्या होता है तो पहले तो उस समय का उदयलग्न जानना चाहिये फिर उदय लग्न का विषुवांश और चरांश जानकर दोनों का अन्तर निकालना चाहिये। यही अन्तर उस समय का विषुवकाल होता है। इसी प्रकार यदि किसी समय का विषुवकाल ज्ञात हो तो उस समय का उदय लग्न भी जाना जा सकता है। परन्तु ऊपर की विलोम रीति से यह काम उतना सुगम नहीं है। इसलिये विषुवकाल से उदय लग्न और उदय लग्न से विषुव काल सीधे ही जानने की रीतियाँ यहाँ लिखी जाती हैं:— उदयकाल की अग्रा—नवीन रीति से : चित्र ६१ से स्पष्ट है कि गोलीय त्रिभुज का व पू में, ज्या पू का ज्या व का ------------------- = -------------------- ज्या ∠ का व पू ज्या ∠ व पू का यहाँ पू का उदय लग्न का की अग्रा है, ∠ का व पू परम क्रान्ति है, व का उदय लग्न का सायन भोगांश है और ∠ व पू का = १८०° - ∠ व पू द = १८०° - इष्ट स्थान का लंबांश ∵ ज्या ∠ व पू का = ज्या (१८०° - लंबांश) = ज्या लंबांश = कोटिज्या अक्षांश परम क्रान्ति ज्या × ज्या सायन भोगांश ∴ ज्या पू का = ------------------------------------ अक्षांश कोटिज्या यह भी उदयकालिक अग्रा जानने का एक सूत्र है जो पृष्ठ २६७ के सूत्र और पृष्ठ २७२ के सूत्र (३) के मेल से भी प्राप्त हो सकता है। इसी सूत्र से सूर्य की उदयकालिक अग्रा इस प्रकार जानी जा सकती है। माघी अमावस्या के सूर्योदय के सूर्य का सायन भोगांश = ८^{रा} २२°५६' = २६२°५६' काशी का अक्षांश = २५°२०'
सूर्यग्रहणाधिकार ५२७ ज्या पूका = ज्या २३° २७' × ज्या २६२°५६' / कोज्या २५°२०' परन्तु ज्या २६२°५६' = - ज्या (३६०° - २६२°५६') = - ज्या ६७°१' ऋणात्मक चिन्ह यह प्रकट करता है कि उदयकालिक अग्रा पू का पूर्व बिन्दु से दक्षिण है । इसलिए ज्या पू का = ज्या २३°२७' × ज्या ६७°१' / कोज्या २५°२०' लरिज्ज्या पूका = लरिज्ज्या २३°२७' + लरिज्ज्या ६७°१' - लरिकोज्या २५°२०' = ६.५६६६ + ६.६६४१ - ६.६५६१ = ६.६०७६ ∴ पूका = २३°५५' इसी की ज्या सूर्योदय काल की उदय ज्या या अग्रा ज्या भी कहलाती है । इसी की सहायता से सूर्योदय का विषुवकाल जानना चाहिये । सूर्योदय का विषुवकाल—यदि गोलीय त्रिभुजक कोणों आ, इ, उ, अक्षरों से और इनके सामने के भुजों को क्रमशः अ, ई, ऊ, अक्षरों से प्रकट किया जाय तो गोलीय त्रिकोणमिति से प्रकट है कि स्परे ऊ/२ = [ज्या ½ (अ + इ) / ज्या ½ (अ - इ)] × स्परे (आ - ई) सूर्य का सायन भोगांश २६२°५६' अथवा १८०° + ११२°५६ है जिसका यह अर्थ है कि शरद संपात बिन्दु से सूर्य ११२°५६ पूर्व है । विषुव संपात के उदय काल से शरद सम्पात के उदय काल तक ३० घड़ी होती है । इसलिए शरद संपात का विषुवकाल ३० घड़ी या १८०° होता है । इसलिये यदि यह मालूम हो जाय कि शरद सम्पात से ११२°५६' का उदय काशी में कितनी देर में होता है तो इस बिन्दु का भी विषुवकाल जाना जा सकता है । ऐसी दशा में चित्र ६२ के गोलीय त्रिभुज श का पू का भुज श का ११२°५६', पू का २३°५५' ∠ श पू का = काशी का लम्बांश = ६०° - २५°२०' = ६०°४०', श पू = श का का विषुवकाल इसलिये गोलीय त्रिकोणमिति के ऊपर दिये हुए सूत्र के अनुसार,
- देखो Todhunter और Leathem की Spherical Trigonometry पृष्ठ ७५
५२८ सूर्य-सिद्धान्त $स्परे\frac{श पू}{२} = \frac{ज्या \frac{१}{२} (\angle श पू का + \angle पू श का}{ज्या \frac{१}{२} (\angle श पू का - \angle पू श का} \times$ $\hspace{16em}स्परे \frac{१}{२} (श का—पू का)$ $=\frac{ज्या \frac{१}{२}(६४^\circ४०'+२३^\circ२७')}{ज्या \frac{१}{२}(६०^\circ४०'-२३^\circ२७')}\times$ $\hspace{14em}स्परे \frac{१}{२} (११२^\circ ५६'-२३^\circ५५')$ $=\frac{ज्या ४४^\circ३'.५}{ज्या २०^\circ३६'.५} स्परे४४^\circ३२'$ $\therefore लरिस्परे\frac{श पू}{२}=लरिज्या ४४^\circ३'.५-लरिज्या २०^\circ३६'.५+$ $\hspace{20em}लरि स्परे ४४^\circ३२'$ $=६.८४२३-६.५४६५+६.६६२६$ $=१०.२८८७$ $\therefore\frac{श पू}{२}=६२^\circ४७'$ $\thereforeश पू=१२५^\circ३४'$ $=२० घड़ी ५५\cdot७ पल$ अमावास्यान्त का विषुवकाल:--जिस क्षण शरद-सम्पात बिंदु पूर्व क्षितिज पर आवेगा उससे २० घड़ी ५५.७ पल उपरान्त सूर्य क्षितिज पर आवेगा जब इसका सायन भोगांश शरद-सम्पात से ११२°५६' होगा१ । परन्तु वसंत-सम्पात से शरद- सम्पात का विषुव काल ३० घड़ी होता है इसलिए माघी अमावस्या के सूर्योदय के समय विषुवकाल ५० घड़ी ५५.७ पल है। यह नाक्षत्र मान में है। परन्तु सूर्योदय से अमावास्यान्त काल का समय १४ घड़ी ४५ पल है। यह सावन मान में है जो नाक्षत्र मान के १४ घड़ी ४७.५ पल के लगभग है। (देखो पृष्ठ ३२६)। इसलिए, सूर्योदय के समय विषुवकाल = ५० घड़ी ५५.७ पल सूर्योदय से अमावास्यान्त का नाक्षत्र काल = १४ " ४७.५ पल $\therefore$ अमावास्यान्त के समय विषुव काल = ६५ घड़ी ४३.२ पल = ५ घड़ी ४३.२ पल = ३४°१६' १. यह बात उस रीति से भी जानी जा सकती है जो पृष्ठ ३१४-१५ में बतलायी गयी हैं।
सूर्यग्रहणाधिकार ५२६ विषुवकाल से उदयलग्न और अग्रा जानना—अब यह जानना है कि जब विषुवकाल ३४°१६' है तब उदयलग्न का सायन भोगांश क्या है ? यह चित्र ६० की सहायता से सहज ही जाना जा सकता है जहाँ व पू = ३४°१६, ∠ का व पू = परमक्रान्ति = २३°२७' और ∠ व पू का = १८०° — ∠ व पू द = १८०° — लम्बांश = १८०° — ६४°४०' = ११५°२०'
यदि गोलीय त्रिभुज के तीन कोण अ, इ, उ अक्षरों से और इनके सामने के भुज क्रमशः आ, ई, ऊ अक्षरों से प्रकट किये जाँय तो गोलीय त्रिकोणमिति के दो सूत्र१ इस प्रकार प्रकट किये जा सकते हैं :— स्परे १/२ (आ + ई) = [कोज्या १/२ (आ - इ) / कोज्या १/२ (आ + इ)] × स्परे ऊ/२ स्परे १/२ (आ - ई) = [ज्या १/२ (अ - इ) / ज्या १/२ (अ + इ)] × स्परे ऊ/२
इन दोनों सूत्रों के सहारे से आ और ई दोनों के मान जाने जा सकते हैं। इस प्रकार चित्र ६० के गोलीय त्रिभुज व पू का से स्परे १/२ (व का + का पू) = [कोज्या १/२ (∠ व पू का - ∠ का व पू) / कोज्या १/२ (∠ व पू का + ∠ का व पू)] × स्परे (व पू)/२ = [कोज्या १/२ (११५°२०' - २३°२७') / कोज्या १/२ (११५°२०' + २३°२७')] × स्परे (३४°१६')/२ = [कोज्या ४५°५६'·५ / कोज्या ६९°२३'·५] × स्परे १७°८'·५
∵ लरिस्परे १/२ (व का + का पू) = लरि कोज्या ४५°५६'·५ + लरि स्परे १७°८'·५ — लरि कोज्या ६९°२३'·५ = ६·८४२२ + ६·४८८६ — ६·५४६४ = ६.७८५४ ∴ (व का + का पू) / २ = ३१°२३'
१. देखो Todhunter और Leathem की Spherical Trigonometry पृष्ठ ७४
५३० सूर्य-सिद्धान्त $\because$ व का $+$ का पू $= ६२^\circ ४६^\prime$ ................................(१) इसी तरह, दूसरे सूत्र से, स्परे $\frac{१}{२}$ (व का $-$ का पू) $= \frac{ज्या ४५^\circ ५६^\prime\cdot ५}{ज्या ६६^\circ २३\cdot ५^\prime} \times स्परे १७^\circ ६^\prime\cdot ५$ $\because$ लरि स्परे $\frac{व का-का पू}{२} =$ लरि ज्या $४५^\circ ५६^\prime ५$ $+ लरि स्परे १७^\circ ६^\prime\cdot ५ - लरि ज्या ६६^\circ २३^\prime\cdot ५$ $=\bar{\varepsilon}\cdot ८५६५ + \bar{\varepsilon}\cdot ४८८६ - \bar{\varepsilon}\cdot \varepsilon६७१३$ $=\bar{\varepsilon}\cdot ३७४८$ $\because \frac{व का-का पू}{२} = १३^\circ २०^\prime$ $\because$ व का $-$ का पू $= २६^\circ ४०^\prime$ ................................(२) समीकरण (१) और (२) को जोड़ने से, २ व का $= ८६^\circ २६^\prime$ $\therefore$ व का $= ४४^\circ ४३^\prime$ और समीकरण (२) को समीकरण (१) से घटाने पर, २ का पू $= ३६^\circ ६^\prime$ $\therefore$ का पू $= १८^\circ ३^\prime$ $\cdot$ इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि ऊपर के दो सूत्रों की सहायता से यदि विषुव- काल ज्ञात हो तो किसी समय का उदय लग्न और अग्रा दोनों सिद्ध हो सकते हैं। इसलिए, अमावस्यान्त काल का सायन उदय लग्न $= ४४^\circ ४३^\prime$ और उदयन लग्न की उत्तर अग्रा $= १८^\circ ३^\prime$ पृष्ठ ५२४ में सायन लग्न ४३° ३१' और पृष्ठ ५२४ में उदय लग्न की अग्रा १७° ३६' आयी है जो नवीन रीति से प्राप्त अंकों से बहुत भिन्न हैं। इसका कारण यही है कि वहाँ उदय लग्न अनुपात के द्वारा जाना गया है जो स्थूल है। जब सायन लग्न ४४° ४३' है तब त्रिभोन लग्न $= ४४^\circ ४३^\prime - ६०^\circ$ $= ३६०^\circ + ४४^\circ ४३^\prime - ६०^\circ$ $\because$ अमान्तकालिक त्रिभोन लग्न $= ३१४^\circ ४३^\prime$ अमान्त काल का मध्यलग्न जानना—अमान्तकाल में जो विषुवकाल आया है उससे १५ घड़ी अथवा ६०° कम उसी समय के मध्यलग्न का विषुवकाल
सूर्यग्रहणाधिकार ५३१ होगा क्योंकि विषुवद्वृत्त का जो बिंदु यामोत्तर-वृत्त पर होता है वही मध्य लग्न का विषुवकाल और विषुवद्वृत्त का जो विन्दु पूर्व क्षितिज पर होता है वही उदय लग्न का विषुवकाल होता है। परन्तु विषुवद्वृत्त के इन दोनों विन्दुओं का अन्तर १५ घड़ी या ६०° के समान होता है । चित्र ६३ में यदि व पू को ३४°१६,′ व का को ४४°४३′ तथा यामोत्तर वृत्त और विषुवद् वृत्त के सामान्य विन्दु को च मान लिया जाय तो च व म गोलीय त्रिभुज के व म का मान सहज ही जाना जा सकता है क्योंकि च व = च पू - व पू = ६०° - ३४°१६′ = ५५°४१′ ∠ च व म = २३°२७′ और ∠ व च म = ६०° । क्योंकि यह विषुवद्वृत्त और यामोत्तरवृत्त के बीच का कोण है, इसलिए नेपियर के पहले नियम के अनुसार ( देखो पृष्ठ १२५ ), कोज्या २३°२७′ = स्परे ५५°४१′ × को स्परे व म = स्परे ५५°४१′ / स्परे व म ∴ स्परे व म = स्परे ५५°४१′ / कोज्या २३°२७′ ∵ लरि स्परे व म = लरि स्परे ५५°४१′ - लरि कोज्या २३°२७′ = १०.१६५८ - ९.९६२५ = १०.२०३३ ∴ व म = ५७°५७′ ∴ सायन मध्यलग्न = ३६०° - ५७°५७′ = ३०२°३′ यह ५२४ पृष्ठ में आये हुए सायन मध्यलग्न से केवल १′ बड़ा है। इसका यह अर्थ हुआ कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार जो मध्यलग्न आया है वह बिलकुल ठीक है। इसका कारण यह है कि मध्यलग्न और सूर्य बहुत पास हैं यदि मध्यलग्न से सूर्य दूर होता तो इसमें भी अन्तर पड़ता । त्रिभोनलग्न का नतांश जानना- मध्य लग्न का नतांश सूर्य-सिद्धान्त की रीति से ४५°३′ आया है ( देखो पृष्ठ ५२५ ) । यह रीति बिलकुल शुद्ध है। इससे त्रिभोन लग्न की नतांशज्या या दृक्क्षेप जानने की जो विधि पृष्ठ ४१३ में बतलायी गयी है उसके अनुसार त्रिभोन लग्न का नतांश ४२°१८′ होता है यदि उदय लग्न की अग्रा नवीन रीति से १८°३′ मानी जाय । परन्तु यह बहुत स्थूल है। इसलिये गोलीय त्रिभुज म ख वि (चित्र ६३)
५३२ सूर्य-सिद्धान्त से ख वि का मान सीधे ही निकालना उचित होगा। यहाँ ख वि वित्रिभ लग्न या त्रिभोन लग्न का नतांश है, म ख मध्य लग्न का नतांश है और म वि मध्य लग्न और त्रिभोन लग्न का अन्तर है जो ३१४°४३′ - ३०२°३′ अथवा १२°४०′ के समान है और $\angle$ म वि ख = ९०°, इसलिए नेपियर के दूसरे नियम के अनुसार, कोज्या म ख = कोज्या ख वि + कोज्या म वि $\because$ कोज्या ख वि = $\frac{कोज्या म ख}{कोज्या म वि}$ = $\frac{कोज्या ४५^\circ३′}{कोज्या १२^\circ४०′}$ $\therefore$ लरि कोज्या ख वि = लरि कोज्या ४५°३′ - लरि कोज्या १२°४०′ = ६̅.८४६१ - ६̅.६८६३ = ६̅.८५६८ $\therefore$ ख वि = ४३°३६′ $\therefore$ त्रिभोन लग्न का नतांश = ४३°३६′ यह जानने की दूसरी रीति भी है जो उसी गोलीय त्रिभुज के $\angle$ म वि ख और म ख की सहायता से नेपियर के दूसरे नियम पर आश्रित है। दोनों रीतियों से त्रिभोन लग्न का नतांश अभिन्न होता है। इसलिए सूर्य-सिद्धान्त के पृष्ठ ४१३ में बतलायी गयी रीति की अपेक्षा यही मान्य होनी चाहिए। दृक्क्षेप = त्रिभोन लग्न की नतांश ज्या = ज्या ४३°३६′ = .६८६६ दृग्गति = त्रिभोन लग्न की उन्नतांश ज्या = कोज्या ४३°३६′ = .७२४२ छेद = $\frac{१}{४ दृग्गति}$ = $\frac{१}{४ \times .७२४२}$ अमान्तकालिक त्रिभोन लग्न = ३१४°४३′ (पृष्ठ ५३०) अमान्तकालिक सायन सूर्य = २६३°१४′ (पृष्ठ ५२४) $\therefore$ अमान्त कालिक विश्लेषांश = २१°२६′ $\therefore$ सूर्य या चन्द्रमा का लंबन = $\frac{ज्या विश्लेषांश}{छेद}$ = ४ $\times$ .७२४२ $\times$ ज्या २१°२६′ = ४ $\times$ .७२४२ $\times$ .३६६२ = १.०६०८ घड़ी = १ घड़ी ३.६५ पल यह पच्छिम लम्बन है क्योंकि त्रिभोन लग्न से सूर्य पच्छिम है। इसलिए इसको अमावश्यान्त काल में जोड़ने पर भोगांश-लंबन-संस्कृत-अमावश्यान्त काल आवेगा। सूर्योदय से अमावश्यान्त का समय = १४ घड़ी ४५ पल पच्छिम भोगांश लंबन = १ घड़ी ३.६ पल
सूर्यग्रहणाधिकार ५३३ $\because$ सूर्योदय से लंबन-संस्कृत-अमावस्यान्त काल = १५ घड़ी ४८.६ पल अर्थात् लंबन के कारण चन्द्रमा सूर्य के सामने सूर्योदय से १५ घड़ी ४८.६ पल पर आवेगा। यह भी बिल्कुल शुद्ध नहीं है, इसलिए असकृत्कर्म करना आवश्यक है अर्थात् अब यह देखना चाहिए कि सूर्योदय से १५ घड़ी ४८.६ पल पर क्या लंबन होता है। इस काल के लिए इस समय का उदय लग्न, त्रिभोन लग्न, मध्य लग्न इत्यादि जानना चाहिए जिसके लिए वही क्रिया फिर दुहरानी पड़ेगी जो पृष्ठ ५२८ से अब तक दिखलाई गई है। १५ घड़ी ४८.६ प ल ( सावन ) = १५ घड़ी ५१.१ पल ( नाक्षत्र ) सूर्योदय का विषुव काल = ५० घड़ी ५५.७ पल ( पृष्ठ ५२८ ) $\because$ लंबन-संस्कृत-अमावस्यान्त के समय विषुव काल = ६ घड़ी ४६.८ पल = ४०°४१′ के लगभग पृष्ठ ५२६ के समीकरणों में ३४°१६ की जगह ४०°४१′ रख कर सरल करने से इस समय की उदय लग्न और अग्रा आ जायगी क्योंकि और गुणक सामान्य हैं। इसलिए लरि स्परे १/२ ( व का + का पू ) = लरि कोज्या ४५°५६′.५ + लरि स्परे २०°२०′.५ - लरि कोज्या ६६°२३′.५ = ६̄.८४२२ + ६̄.५६६१ - ६̄.५४६४ = ६̄.८६४६ $\because$ व का + का पू / २ = ३६°१४′ व का + का पू = ७२°२८′...................................(३) लरि स्परे १/२ ( व का - का पू ) = लरि ज्या ४५°५६′.५ + लरि स्परे २०°२०′.५ - लरि ज्या ६६°२३′.५ = ६̄.८५६५ - ६̄.५६६१ - ६̄.६७१३ = ६̄.४५४३ $\because$ व का - का पू / २ = १५°५३′ $\because$ व का - का पू = ३१°४६′...................................(४) समीकरण (३) और (४) से, व का = ५२°७′ का पू = २०°२१′
५३४ सूर्य-सिद्धान्त ⸫ सूर्योदय से १५ घड़ी ४८.६ पल पर उदय लग्न ५२°७' और अग्रा २०°२१' है । ⸫ इस समय त्रिभोन लग्न = ५२°७' - ९०° = ३२२°७' और विषुवकाल = ४०°४१' ⸫ पृष्ठ ५३० की तरह च व = ९०° - ४०°४१' = ४९°१९' स्परे ४९°१९' ⸫ स्परे व म = ──────────── कोज्या २३°२७' ∵ लरि स्परे व म = लरि स्परे ४९°१९' - लरि कोज्या २३°२२' = १०.०६५७ - ९.९६२५ = १०.१०३२ ⸫ व म = ५१°४५' ⸫ सायन मध्य लग्न = ३६०° - ५१°४५' = ३०८°१५' मध्य लग्न की क्रान्तिज्या = ३०८°१५' × ज्या २३°२७' = - ज्या ५१°४५' × ज्या २३°२७' ⸫ लरि क्रान्ति ज्या = ९.८९५० + ९.५९६६ = ९.४९१६ ⸫ मध्यलग्न की दक्षिण क्रान्ति = १८°१३' काशी का उत्तर अक्षांश = २५°२०' ⸫ मध्य लग्न का नतांश = ४३°३३' मध्य लग्न और त्रिभोन लग्न का अन्तर = ३२२°७' - ३०८°१५' = १३°५२' कोज्या ४३°३३' ⸫ त्रिभोन लग्न के नतांश की कोटिज्या = ───────────── कोज्या १३°५२' ⸫ लरि नतांश कोज्या = लरि कोज्या ४३°३३' - लरि कोज्या १३°५२' = ९.८६०२ - ९.९८७२ = ९.८७३० त्रिभोन लग्न का नतांश = ४१°४३' सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति = ६१'.३७ ∵ सूर्य की एक घड़ी की गति = १'.०२३ सूर्य की ३ पल की गति = ०'.५१ ⸫ सूर्य की एक घड़ी ३ पल की गति = १'.०७ अमान्तकालिक सायन सूर्य = २६३°१४' ⸫ लम्बन-संस्कृत-अमान्तकालिक-सूर्य = २६३°१५' त्रिभोन लग्न = ३२२°७' सायन सूर्य = २६३°१५'
सूर्यग्रहणाधिकार ५३५ ∵ विश्लेषांश = २८°५२′ दृग्गति = त्रिभोन लग्न की नतांश कोटिज्या = कोज्या ४१°४३′ ∴ छेद = १ / ४ दृग्गति = १ / ४ कोज्या ४१°४३′ ∵ सूर्य का लंबन = ज्या विश्लेषांश / छेद = ४ कोज्या ४१°४३′ ज्या २८°५२′ = ४ × .७४६४ × .४८२८ घड़ी = १.४४२ घड़ी = १ घड़ी २६.५ पल सूर्योदय से अमावस्यान्त का समय = १४ घड़ी ४५ पल सूर्य का लंबन = १ घड़ी २६.५ पल ∵ द्वितीय लंबन-संस्कृत-अमावस्यान्त-काल = १६ घड़ी ११.५ पल इस समय का त्रिभोन लग्न जानकर फिर लंबन जानना चाहिये:— १६ घड़ी ११.५ पल (सावन) = १६ घड़ी १४.२ पल (नाक्षत्र) सूर्योदय का विषुवकाल = ५० घड़ी ५५.७ पल ∴ द्वितीय लंबन-संस्कृत-अमान्त-काल का विषुवकाल = ७ घड़ी ६.६ पल = ४३° के लगभग ∴ लरिस्परे १/२ (व का +का पू) = लरिकोज्या ४५°५६′.५ + लरिस्परे २१°३०′ − लरिकोज्या ६६°२३′.५ = ६.८४२२ + ६.५६५४ − ६.५४६४ = ६.८६१२ ∴ (व का +का पू) / २ = ३७°५४′ ∴ व का +का पू = ७५°४८′ लरि स्परे १/२ ( व का − का पू ) = लरि ज्या ४५°५६′.५ + लरि स्परे २१°३०′ − लरि ज्या ६६°२३′.५ = ६.८५६५ + ६.५६५४ − ६.६७१३ = ६.७५०६
५३६ सूर्य-सिद्धान्त व का - का पू ∴ ---------------- = १६°४६'·५ २ ∴ व का - का पू = ३३°३६' ∴ व का = ५४°४३'·५ और का पू = २१°४'·५ ∴ सूर्योदय से १६ घड़ी ११·५ पल पर उदय लग्न ५४°४३'·५ और अग्रा २१°४'·५ ∴ इस समय त्रिभोन लग्न = ५४°४३'·५ - ६०° = ३२४°४३'·५ और इस समय विषुवकाल = ४३° ∴ च व = ६०° - ४३° = ४७° स्परे ४७° ∴ स्परे व म = --------------- कोज्या २३°२७' ∴ लरि स्परे व म = लरि स्परे ४७° - लरि कोज्या २३°२७' = १०.०३०३ - ९.९६२५ = १०.०६७८ ∴ व म = ४६°२७' ∴ सायन मध्यलग्न = ३६०° - ४६°२७' = ३१०°३३' ∴ मध्यलग्न की क्रान्ति ज्या = ज्या ३१०°३३' × ज्या २३°२७' = - ज्या ४६°२७' × ज्या २३°२७' लरि क्रान्तिज्या = ९.८५०७ + ९.५६६६ = ९.४२०६ ∴ क्रान्ति = १७°३६' दक्षिण काशी का अक्षांश = २५°२०' मध्यलग्न का नतांश = ४२°५६' मध्य लग्न और त्रिभोन लग्न का अन्तर = ३२४°४३'·५ - ३१०°३३' = १४°१०'·५ कोज्या ४२°५६' ∴ त्रिभोन लग्न की नतांश कोटि ज्या = ----------------- कोज्या १४°१०'·५ ∴ लरि नतांश कोटिज्या = लरि कोज्या ४२°५६' - लरि कोज्या १४°१०'·५ = ९.८६४६ - ९.९८६५ = ९.८७८१ ∴ त्रिभोन लग्न का नतांश = ४०°५७' सूर्य की १ घड़ी की गति = १'·०२३ सूर्य की २० पल की गति = ·३४१
सूर्यग्रहणाधिकार ५३७ ५ ,, = ˙०८५ १ ,, = ˙०१७ ˙५ ,, = ˙००६ ∴ १ घड़ी २६˙५ पल की गति = १′˙५ अमान्तकालिक सायन सूर्य = २६३° १४′ १ घड़ी २६˙५ पल की गति = १′˙५ द्वितीय-लंबन-संस्कृत-अमान्तकाल का सूर्य = २६३° १५′˙५ त्रिभोन लग्न = ३२४° ४३′˙५ ∵ विश्लेषांश = ३१° २८′ दृग्गति = त्रिभोन लग्न की नतांश कोटि ज्या = कोज्या ४०° ५७′ ∴ छेद = १ / ४ दृग्गति = १ / ४ कोज्या ४०° ५७′ ∴ लंबन = ज्या विश्लेषांश / छेद = ४ कोज्या ४०° ५७′ × ज्या ३१° २८′ = ४ × ˙७५५३ × ˙५२२० = १ घड़ी ३४˙६ पल सूर्योदय से अमान्तकाल तक का समय = १४ घड़ी ४५ पल तीसरी बार का लंबन = १ घड़ी ३४˙६ पल ∴ तृतीय-लंबन-संस्कृत-अमान्तकाल = १६ घड़ी १६˙६ पल इस प्रकार पहले लंबन से अमावस्यान्त काल १५ घड़ी ४८˙६ पल पर, दूसरे लंबन के १६ घड़ी ११˙५ पल पर और तीसरे लंबन से १६ घड़ी १६˙६ पल पर होता है। इससे प्रकट है कि पिछले अमावस्यान्त कालों में केवल ८ पल का अन्तर है। यदि दो तीन बार और संस्कार किया जाय तो अन्तर शून्य हो जायगा। उस दशा में जो अमावस्यान्त काल आवेगा वही शुद्ध अमावस्यान्त होगा। अनुमान से जान पड़ता है कि जो अमावस्यान्त काल तीसरी बार आया है उससे शुद्ध अमावस्यान्त केवल दो या तीन पल अधिक होगा। इसलिए दो तीन पल के लिए दो तीन बार और संस्कार करने में झंझट के सिवा विशेष लाभ नहीं है। इसलिए मान लिया जाता है कि लंबन-संस्कृत- शुद्ध-अमावस्यान्त काल सूर्योदय से १६ घड़ी २० पल पर है। यही सूर्यग्रहण का मध्यकाल समझना चाहिए। यहाँ तक ६वें श्लोक की क्रिया समाप्त हुई। नति— १० वें श्लोक में बतलाया गया है कि सूर्य और चन्द्रमा की मध्य गतियों के
५३८ सूर्य-सिद्धान्त अंतर को दृक्क्षेप से गुणा करना चाहिए । परन्तु मेरी समझ में यदि स्पष्ट गतियों के अंतर से गुणा किया जाय तो अधिक शुद्धता होगी । सूर्य और चंद्रमा की दैनिक गतियों का अंतर = ७६२'·३४३ दृक्क्षेप अथवा त्रिभोनलग्न की नतांशज्या = ज्या ४०° ५७' ∴ नति = (७६२'·३४३ ✕ ज्या ४०° ५७') / १५ = (७६२'·४३ ✕ ·६५५४) / १५ = ३४'·६२ यहाँ त्रिज्या से भाग देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ज्या का मान दशमलव भिन्न लिया गया है । यह दक्षिण है क्योंकि मध्यलग्न का नतांश दक्षिण है । चंद्रमा की ६० घड़ी की गति = १४° १३"·७ चन्द्रमा की १ घड़ी की गति = १४' १३"·७ ,, ३० पल ,, = ७' ६"·६ ,, ५ ,, = १' ११"·१ ∴ चन्द्रमा की १ घड़ी ३५ पल की गति = २२' ३१"·७ = २२'·५ गणित-सिद्ध अमावस्यान्तकालिक चंद्रमा = ६रा ०° ३२'·८ ∴ लंबन-संस्कृत-अमावस्यान्तकालिक चंद्रमा = ६रा ०° ५५'·३ ,, ,, राहु = ३रा ६° २८'·० राहु से चंद्रमा का अन्तर = ५रा २४° २७'·३ = १७४° २७'·३ ∵ चन्द्रशर की ज्या = (ज्या १७४° २७'·३ ✕ ज्या ४° ३०') / ३४३८ = (ज्या ५° ३२'·७ ✕ ज्या ४° ३०') / ३४३८ = (३३२·७ ✕ २७०) / ३४३८ = २६'·१३ यह उत्तर शर है क्योंकि राहु से चंद्रमा आगे हैं परन्तु ६ राशि से कम दूर है । ∴ नति संस्कृत चंद्रशर = - ३४'·६२ + २६'·१३ = - ८'·४६ अर्थात् नति संस्कृत दक्षिण चंद्रशर = ८'·४६ चंद्रकक्षा में सूर्य बिम्ब का स्फुट व्यास = ३३'·६३४ चंद्रमा का स्फुट व्यास = ३४'·५५५
सूर्यग्रहणाधिकार ५३६ छाद्य अथवा सूर्य का व्यासार्ध = १६'·८१७ छादक अथवा चन्द्रमा का व्यासार्ध = १७'·२७८ ∵ मानैक्य खंड = ३४'·१० और मानान्तर खंड = ०'·४६ ग्रास का परिमाण = मानैक्यखंड - नति संस्कृत चंद्रशर = ३४'·१ - ८'·४६ = २५'·६१ यह चन्द्रबिम्ब के व्यास से छोटा है इसलिए सर्वग्रास ग्रहण न लगेगा वरन् खंड ग्रहण लगेगा । (देखो पृष्ठ ४६० और श्लोक ११ चं० ग्र०) पृष्ठ ४६६ के अनुसार स्थित्यर्ध = ६० घड़ी × √{(३४·१ + ८·४६)(३४·१ - ८·४६)} / ७६२·३४३ = ६० × √{४२·५६ × २५·६१} / ७६२·३४३ = ६० × √१०६०·७३ / ७६२·३४३ = ६० × ३३·०२६ / ७६२·३४३ = १९८१५६० / ७६२३४ घड़ी = २ घड़ी ३०·०६ पल == २ घड़ी ३० पल ∵ स्पर्शकाल = १६ घड़ी २० पल - २ घड़ी ३० पल = १३ घड़ी ५० पल अर्थात् काशी में सूर्योदय से १३ घड़ी ५० पल पर ग्रहण का स्पर्श होगा । परन्तु यह स्थूल है । सूक्ष्म गणना करने के लिए इस समय का भी लंबन और नति फिर निकाल कर स्थित्यर्ध इत्यादि जानना चाहिए जैसा कि श्लोक १४-१७ में बतलाया गया है । १३ घड़ी ५० पल (सावन) = १३ घड़ी ५२.३ पल (नाक्षत्र) सूर्योदय का विषुवकाल = ५० घड़ी ५५·७ पल ∴ स्पर्शकाल के समय विषुवकाल = ४ घड़ी ४८ पल = २८°४८'
५४० \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad सूर्य-सिद्धान्त $\because$ लरि स्परे $\frac{१}{२}$ ( व का $+$ का पू) $=$ लरि कोज्या ४५°५६′·५ $+$ लरि स्परे १४°२४′ $-$ लरि कोज्या ६६°२३′·५ $=\bar{६}\cdot८४२२+\bar{६}\cdot४०६५-\bar{६}\cdot५४६४$ $=\bar{६}\cdot७०५३$ $\because$ स्परे $\frac{१}{२}$ (व का $+$ का पू) $= २६^\circ ५४'$ $\therefore$ व का $+$ का पू) $= ५३^\circ ४८'$ लरि स्परे $\frac{१}{२}$ (व का $-$ का पू) $=\bar{६}\cdot८५६५+\bar{६}\cdot४०६५-\bar{६}\cdot६७१३$ $=\bar{६}\cdot२६४७$ $\because \frac{१}{२}$ (व का $-$ का पू) $= ११^\circ ६'$ $\therefore$ व का $-$ का पू $= २२^\circ १२'$ $\therefore$ व का $= ३८^\circ ३'$ और का पू $= १५^\circ ४५'$ $\therefore$ सूर्योदय से १३ घड़ी ५० पल पर उदय लग्न ३८°३′ और अग्रा १५°४५′ है। $\therefore$ इस समय त्रिभोन लग्न $= ३८^\circ ३' - ६०^\circ = ३०८^\circ ३'$ और " विषुवकाल $= २८^\circ ४८'$ पृष्ठ ५३२ की तरह च व $= ६०^\circ - २८^\circ ४८' = ६१^\circ १२'$ $\therefore$ स्परे व म $= \frac{स्परे ६१^\circ १२'}{कोज्या २३^\circ २७'}$ $\therefore$ लरि स्परे व म $=$ लरि स्परे ६१°१२′ $-$ लरि कोज्या २३°२७′ $= १०\cdot२५६८ - \bar{६}\cdot६६२५ = १०\cdot२६७३$ $\therefore$ व म $= ६३^\circ १४'$ $\therefore$ सायन मध्य लग्न $= ३६०^\circ - ६३^\circ १४' = २६६^\circ ५६'$ मध्य लग्न की क्रान्ति ज्या $= ज्या २६६^\circ ४६' \times ज्या २३^\circ २७'$ $= - ज्या ६३^\circ १४' \times ज्या २३^\circ २७'$ $\therefore$ लरि क्रान्तिज्या $=\bar{६}\cdot६५०८+\bar{६}\cdot५६६६=\bar{६}\cdot५५०७$ $\therefore$ मध्यलग्न की दक्षिणी क्रान्ति $= २०^\circ ४६'$ काशी का उत्तर अक्षांश $= २५^\circ २०'$ $\therefore$ मध्य लग्न का नतांश $= ४६^\circ ६'$ मध्यलग्न और त्रिभोन लग्न का अन्तर $= ३०८^\circ ३' - २६६^\circ ४६'$ $= ९१^\circ १७'$ $\therefore$ त्रिभोन लग्न के नतांश की कोटिज्या $= \frac{कोज्या ४६^\circ ६'}{कोज्या ९१^\circ १७'}$
सूर्यग्रहणाधिकार ५४१ ∴ लरि नतांश कोटिज्या = लरि कोज्या ४६°६' - लरि कोज्या ११°१७' = ६.८४०६ - ६.६६१५ = ६.८४८१ ∵ त्रिभोन लग्न का नतांश = ४५°३' दृग्गति = त्रिभोन लग्न की नतांश कोटि ज्या = कोज्या ४५°३ ∵ छेद = १ / (४ कोज्या ४५°३') सूर्योदय से १४ घड़ी ४५.५ पल पर स्पष्ट सायन सूर्य = ६^रा २३°१४' ५५ पल की सूर्य की गति = १' ∴ १३ घड़ी ५० पल पर अथवा स्पर्शकालिक सूर्य = ६^रा २३°१३' = २६३°१३' त्रिभोन लग्न = ३०८°३' —————————————— विश्लेषांश = १४°५०' लंबन = ज्या विश्लेषांश / छेद = ज्या १४°५०' × ४ × कोज्या ४५°३' = ४ × .२५६० × .७०६५ = .७२३५ घड़ी = ४३.४ पल = ४३ पल मध्य ग्रहणकाल का लंबन = १ घड़ी ३५ पल ∴ दोनों का अन्तर = ५२ पल इसलिए १६वें श्लोक के पूर्वार्ध के अनुसार स्पष्ट स्पर्श स्थित्यर्थ = प्रथम स्थित्यर्थ + ५२ पल = २ घड़ी ३० पल + ५२ पल = ३ घड़ी २२ पल इसलिए सूर्योदय से स्पर्शकाल तक का समय = सूर्योदय से मध्यग्रहण का समय - ३ घड़ी २२ पल = १६ घड़ी २० पल - ३ घड़ी २२ पल = १२ घड़ी ५८ पल ∵ काशी में सूर्योदय से १२ घड़ी ५८ पल पर ग्रहण का स्पर्श होगा । इसी प्रकार स्पष्ट मोक्ष स्थित्यर्थ भी जान लेना चाहिये ।
५४२ सूर्य-सिद्धान्त इस गणना से स्पष्ट है कि काशी में सूर्यग्रहण का स्पर्श और मोक्ष दोनों देख पड़ेगा। परन्तु यह बात काशी में एकत्र हुए किसी मनुष्य को नहीं देख पड़ी जैसा कि लोगों का अनुभव है । इसका कारण यह है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार जो मूलाङ्क आये हैं वे बहुत स्थूल हैं। इसी कारण यद्यपि लग्न के नतांश इत्यादि के जानने की रीति बिल्कुल बदल दी गयी है तो भी सूक्ष्मता नहीं आ सकी । इन मूलाङ्कों में सबसे बड़ी अशुद्धि राहु के मूलाङ्क में है जैसा कि चन्द्रग्रहणाधिकार में बतलाया गया है । राहु का मूलाङ्क लेने पर क्या दशा होती है ? १६२६ ई० के नाविक पंचांग के अनुसार ११ जनवरी सोमवार को ग्रीनविच के मध्यम मध्याह्नकाल में सायन राहु का स्थान ११५°·७५०५ था । इस समय काशी में मध्याह्नोपरान्त १३ घड़ी ५० पल ३१ विपल हुआ था (देखो पृष्ठ २५१), जो मध्यम प्रातःकाल से २८ घड़ी ५०·५ पल होता है। इस समय से माघी अमावस्या के अन्त तक अर्थात् गुरुवार के मध्यम प्रातःकाल के १६ घड़ी ५४ पल तक २ दिन ४८ घड़ी ३·५ पल होता है । इतने समय में राहु की गति इस प्रकार निकली:-- १ दिन की गति = ०°·०५२६५ २ ;; = ०°·१०५६२ ३० घड़ी की गति = ०°·०२६४८ १५ ,, = ०.०१३२४ ३ ,, = ०.००२६५ ३ पल की गति = ०.००००४ योग = ०.१४८३ यह घटाने पर सायन राहु का स्थान हुआ, ११५·६०२२ = ११५° ३६'·१ परन्तु अयनांश = २२°४१' ∴ राहु का निरयन भोगांश (अमावस्यान्त काल में) = ९२° ५५' चन्द्रमा का निरयन ,, = २७०° ३३' ∴ राहु से चन्द्रमा का अन्तर = १७७° ३८' यदि चन्द्रमा का परमशर ४°३०' की जगह ५°८'४२" माना जाय (देखो पृ० ७५) तो