भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

३३०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३६ ]

हृदयुर्न बाधते चात्र वायुः कोष्ठमथापि च । उत्तानस्याश्रुते मार्गे बस्तिर्नोन्तः प्रपद्यते ॥२५॥ नेत्रसंवेजनधान्तो वायुश्रान्तः प्रकुप्यति । देहे सङ्कुचिते दन्तः सकन्थनोरण्यभ्योत्था ॥२६॥ न सम्यगनिलाविष्टो बस्तिः प्रन्येति देहिनः । स्थितस्य बस्तिर्दन्तस्तु क्षिप्रमागगत्वाङ्मुखः ॥२७॥ न चाशयं तर्पयति तस्मान्तार्थं करो हि सः । नाप्नोति बस्तिर्दन्तस्तु कृत्स्नं पक्वाशयं पुनः ॥२८॥ दक्षिणाश्रितपाश्चर्यं वामपाश्चर्यं तुगो यतः । न्युवृजादीनां प्रदानं च वस्तेनैव प्रशस्यते ॥२९॥ पश्चादनिलकोपोऽत्र यथासंव तत्र कारयेत् ।

शिर को नीचा रखकर दी गई बस्ति अति पीड़न के समान दोषों को करती है । शिर को ऊँचा रखकर दी गई बस्ति मेहन को उलत (ऊँचा-स्तब्ध) कर देती है । इसमें भलीप्रकार स्वेदन करके (मेहन पर) उत्तर बस्ति देना उत्तम है । मुख को नीचा करके दी गई बस्ति पक्वाशय में नहीं पहुँचती । विमार्ग में गई हुई हृदय और गुदा पर दबाव देती है, वायु कोष्ठ को दबाती है । चित्त लेटाकर दी गई बस्ति मार्ग में रुक जाने से अन्दर नहीं जाती । नेत्र के कम्पन से चलित वायु अन्दर कुपित होती है । शरीर को या दोनों सांथलों को संकुचित करके दी गई बस्ति वायु से भरी होने के कारण मनुष्य में से बाहर नहीं आती । खड़ाकर दी गई बस्ति तुम्न ही वापिस लौट आती है । आशय का तर्पण नहीं करती, इसलिये व्यर्थ ही रहती है । दाहिने पाश्व से लेटे व्यक्ति को दी गई बस्ति पक्वाशय में नहीं पहुँचती । क्योंकि पक्वाशय वामपाश्व की ओर रहता है । इसलिये मुख को नीचा आदि रखकर बस्ति देना उत्तम नहीं । पीछे से वायु का कोप होने पर उनकी अपनी चिकित्सा करनी चाहिये ॥२३-२६॥

व्यापदः स्नेहवस्तेस्तु वद्यन्ते तच्चिकित्सिते ॥२०॥ स्नेह बस्ति की हानियाँ और चिकित्सा अ० ३७ में कही जायँगी ॥३०॥

अयोगाद्यास्तु वद्यामि व्यापदः सच्चिकित्सिताः । अनुष्णोऽर्यौषधो होनो बस्तिर्नैति प्रयोजितः ॥३१॥ विष्टम्भाधानश्लेष् तमयोगं प्रचक्षते । तत्र तीक्ष्णो हितो बस्तिर्तीक्ष्णं चापि विरेचनम् ॥३२॥ सञ्घोषान्तेऽथवा भुक्ते बहु नोपे च योजितः । अःयागितस्यातिबहुर्वस्तिर्मन्दोष्ण एव च ॥३३॥ अनुष्णलवणस्नेहो ह्यतिमात्रोऽथवा पुनः । तथा बहुपुरीषं च क्षिप्रमाध्माप्येन्नरम् ॥३४॥ हृत्कटीपाश्वं प्रेष्य शुल् तत्रातिदारुणम् । तत्र तीक्ष्णतरो बस्तिर्हितं चाप्यनुवासनम् ॥३५॥ अतितीक्ष्णोऽतिलवणो रूक्षो बस्तिः प्रयोजितः । सपित् कोपेयदायुं कुर्याच्च परिकर्तिकाम् ॥३६॥ नाभिबस्तिगुदं तत्र छिन्नचीवातिदेहिनः । पिच्छा बस्तिर्हितस्तस्य स्नेहश्च मधुरैः श्रुतः ॥३७॥

अत्यम्लठवणस्तीक्ष्णः परिस्रावाय कल्पते । दौर्बल्यमङ्गसादृश जायते तत्र देहिनः ॥३८॥ परिस्रवेत्तः पित्तं दाहं सञ्जनयेद्गुदे । पिच्छाबस्तिर्हितस्तत्र बस्तिः क्षीरघृतेन च ॥३९॥ प्रवाहि मा भवेत्तीक्ष्णं निरूहानं सानुवासनात् । सन्महणं कृच्छ्रेण कफामगुपवेक्ष्यते ॥४०॥ पिच्छाबस्तिर्हितस्तत्र पयसा चैव भोजनम् । सर्पिर्मधुरकैः सिद्धं तैलं चाप्यनुवासनम् ॥४१॥ अतितीक्ष्णो निरूहो वा सवाते चानुवासनः । हृदयस्योपसरणं कुरुते चाङ्गपीडनम् ॥४२॥ दोषैस्तत्र रजस्तास्ता मदो मूर्च्छाऽङ्गगौरवम् । सर्वदोषहरं बस्ति शोधनं तत्र दापयेत् ॥४३॥ रूक्षस्य बहुवातस्य तथा दुःभायितस्य च । बस्तिरङ्गग्रहं कुर्याद्गुदो मृदुलपभेषजः ॥४४॥ तत्राङ्गसादः प्रस्तम्भो जूम्भोऽष्टनवेपकाः । पर्वभेदश्च तत्रेष्टा स्वेदाभ्यञ्जनवस्तयः ॥४५॥ अत्युष्णतीक्ष्णोऽतिबहुर्वृत्तोऽतिस्वेदितस्य च । अल्पदोषस्य वा बस्तिरतियोगाय कल्पते ॥४६॥ विरेचनातियोगेन समानं तस्य लक्षणम् । पिच्छाबस्तिप्रयोगश्च तत्र शीतः सुखावहः ॥४७॥ अतियोगात् परं यत्र जीवादानं विरिक्तवत् । दैयस्तत्र हितश्चाप्यु पिच्छाबस्तिः सञ्जोगितः ॥४८॥ नवैता व्यापदो यास्तु निरूहं प्रत्युदाहृताः । स्नेहबस्तिष्वपि हि ता विज्ञेयाः कुगलैरिह ॥४९॥ इत्युक्ता व्यापदः सर्वाः सलक्षणचिकित्सिताः । भिषजा च तथा कार्यं यथैता न भवन्ति हि ॥५०॥

अयोगजन्य जो हानियाँ हैं, उनको चिकित्सा के साथ कईगा । जो बस्ति गरम नहीं (शीत), थोड़ी औषधियोंवाली होने से हीन गुण बस्ति देने पर वापिस नहीं आती, वह विष्टम्भ और आध्मान करती है, इसको अयोग कहते हैं । इसमें तीक्ष्ण बस्ति और तीक्ष्ण विरेचन हितकारी है । अन्मशेष अजीर्ण में, भोजन करने पर, बहुत दोष में, बहुत भोजन किये हुए में स्नेहबस्ति, अति मात्रा में भोजन किये हुए को बहुत, थोड़ी गरम दी गई स्नेहबस्ति अथवा लवण एवं स्नेह रहित बहुत मात्रा में दी गई बस्ति, एवं बहुत मलबाले पुरुष में जल्दी शीघ्रता से दी गई बस्ति—आध्मान उत्पन्न कर देती है । इससे हृदय, कटि, पाश्व, पीठ में अतिभयानक शूल होता है । इसमें पहले से अधिक तीक्ष्ण बस्ति और अनुवासन उत्तम है । अतितीक्ष्ण, अतिलवणवाली रूक्ष बस्ति देने पर पित्त युक्त वायु कुपित होती है और परिकर्तिका उत्पन्न होती है । इससे नाभि, बस्ति एवं गुद से—फटते हुए रोगी को प्रतीत होते हैं । इससे पिच्छा बस्ति तथा काकोल्यादि मधुराण से पकाया स्नेह उत्तम है । अति अम्ल लवण, तीक्ष्ण बस्ति परिस्राव उत्पन्न करती है । दुर्बलता और अङ्गों का टूटना रोगी को होता है । तब पित्त बहता है,

अ० ३७ ]

चिकित्सास्थानम्

६३१

जिससे गुदा में दाह होता है। इसमें पिच्छा बस्ति या दूध से बनाये घी की बस्ति दे। तीक्ष्ण निरुह या अनुवासन से प्रवाहिका होती है। दाह और शुल्क के साथ कठिनाई से कफ मिश्रित रक्त मल में आता है। इसमें पिच्छाबस्ति उत्तम है, दूध से भोजन देवे। काकोल्पादि से सिद्ध घृत एवं तैल का अनुवासन दे। अति तीक्ष्ण निरुह या अनुवासन देते हुए वायु के अन्दर चले जाने पर वायु हृदय में पहुँचकर अंगों में पीड़ा करती है, दोषों के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार की वेदनायें, मद, मूच्छा, अंगों में भारीपन होता है। इसमें सब दोषों को नाश करनेवाली शोधन बस्ति देवे। रूक्ष मनुष्य में बहुत वायुवाले, एवं ठीक प्रकार न लेटे हुए पुरुष में दी गई बस्ति अंगग्रह (अंगों का पकड़ना) कर देती है। मनु-अल्प औषधवाली बस्ति अंगों की शियिलता, जड़ता, जम्भाई, ऐंठन, कम्पन, पर्वमेद करती है। इसमें स्वेद, अभ्यंग और बस्ति देवे—अतिउष्ण, अतितीक्ष्ण, अतिशय अधिक, अतिशय स्वेद दिये हुए पुरुष को, अधिक औषधवाली, या अल्पदोषवाले को दी गई बस्ति अतियोग उत्पन्न करती है। इसके लक्षण विरेचन के अतियोग के समान हैं। इसमें पिच्छाबस्ति का प्रयोग क्षीतल वस्तु सुखदायक है। अतियोग से विरेचन के अतियोग की भाँति रक्त आने लगे तब पिच्छा बस्ति में रक्त मिलाकर देना चाहिये। ये नौ हानियाँ जो निरुह के लिये कही हैं, उनको कुशल वैद्य स्नेह बस्ति में भी समझे। सब हानियाँ लक्षण और चिकित्सा के साथ कह दी हैं। वैद्य को ऐसा यत्न करना चाहिये कि जिससे ये हानियाँ न हों ॥३६-५०॥

पश्चाद्विरेको वान्तस्य ततश्चापि निरुहणम् ।

सद्यो निरोहोऽनुवास्यः समरात्राद्विरेचितः ॥५१॥

भली प्रकार वमन होने के पन्द्रह दिन पीछे विरेचन देवे। विरेचन के सात दिन पीछे निरुहण देवे, निरुहण के तुरन्त पीछे अनुवासन दे ॥५२॥

चरक में—“संशुद्धभक्तं नवमेऽह्विसर्पिः तं पाययेताप्यनुदास-येदा । दद्यान्त्यहान्ना निबुभुक्षिताय तैलात्काग्राय ततो निरुहम् ॥ शय्या-वामाश्रये हि ग्रहणीगुदे च, तत्पार्वर्यस्यस्य सुलोपलब्धिः ॥ लीयन्त एवं वलयश्च तस्मात्सव्यं शयानोऽर्हति बस्तिदानम् ॥ उत्तानदेहश्च कृतोपधानः स्याद्वीर्यमाप्नोति तथास्य देहम् ॥ दत्वा स्फिचो पाणितलेन हन्यास्तेहस्य शीघ्रगमरक्षणार्थम् । ईषत्पदांगुष्ठयुगं च कर्वेदुत्तानदेहस्य तलौ प्रमुच्यात् ॥ स्नेहेन पाण्यगुलिपिण्डकाश्रये चास्य गात्रावयवाग्राताः ॥ तांश्चावमृज्यासमुखं ततश्च निद्रामुपसीत कृतोपधानः ॥ चरक० सि० अ० ३-२४ २९॥५१॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने नेत्रबस्तिध्यापत्ति-किसित्तं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥३६॥

सप्तविंशतमोऽध्यायः

अथातोऽनुवासनोत्तरबस्तिचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे अनुवासन उत्तर बस्ति चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में अनुवासन बस्ति का विधान बतलाया गया है ॥१,२॥

विरेचनात् समरात्रे गते जातबलाय वै ।

कृतान्नायानुवास्याय सम्यग्देयोऽनुवासनः ॥३॥

विरेचन के सात दिन पीछे रोगी में बल आ जाने पर अन्न का भोजन लेने पर अनुवासन के योग्य हो जाने पर अनुवासन भली प्रकार देना चाहिये।

वक्तव्य—“अथ ऊर्ध्वमन्तगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः सप्त-रात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् ॥ चरक० सू० अ० १५१०—सात दिन के पीछे रोगी स्वाभाविक भोजन पर आये ॥३॥

यथावयो निरुहणां या मात्राः परिकीर्तिताः ।

पादावकृष्टास्ताः कार्याः स्नेहबस्तिषु देहिनाम् ॥४॥

वय के अनुपात से निरुहों की जो मात्रा कही है, उसकी चौथाई मात्रा मनुष्यों के लिये स्नेह बस्ति में बरते।

वक्तव्य—षट्पली तु भवेच्छेष्टा त्रिपली मध्यमा भवेत् । कनीयस्यर्धपलिका विषा मात्राऽनुवासने ॥ (२) निरुह पादांघ्रसमेन तैलेनाम्बालिलन्धोपवसाधितेन ॥ (३) निरुहमात्राप्रसुतार्धमात्रे वर्षं ततोऽर्धप्रसुताभिबृद्धिः । आद्वादशाल्यात् प्रसुताभिबृद्धिद्वादशद्वादशतः परं स्युः ॥ आसप्ततेऽर्कमिदं प्रमाणमतः परं षोडशवद्विषेयम् ॥ चरक० सि० अ० ३१२-३२॥४॥

उत्सृष्टानिलविण्मूत्रे नरे बस्ति विधापयेत् ।

एतैर्हि विहतः स्नेहो नैवान्तः प्रतिपद्यते ॥५॥

स्नेहबस्तिविषेयस्तु नाविगुह्मस्य देहिनः ।

स्नेहवीर्यं तथा दत्ते देहं चानुविसर्पति ॥६॥

वायु, मल, मूत्र का त्याग किये हुए पुरुष में बस्ति देनी चाहिये। क्योंकि इनसे रक्ता स्नेह अन्तर प्रविष्ट नहीं होता। बिना शोधन किये हुए पुरुष में स्नेह बस्ति नहीं देनी चाहिये। शुद्ध शरीर में स्नेहबस्ति स्नेह के वीर्य को देती है और सारे शरीर में फैलती है ॥५,६॥

अत ऊर्ध्वं प्रवर्चयामि तैलानीह यथाक्रमम् ।

पानान्वासननस्येषु यानि हन्युर्गदान् बहुन् ॥७॥

इसके आगे उन तैलों को कहेंगे, जो उचित रूप में पान, नस्य, अनुवासन में बरतने से बहुत से रोगों को नष्ट करते हैं ॥७॥

अटीपुष्करकृष्णाहामदनामरदासुभिः ।

शताह्नाकुष्ठयष्ट्याह्वचचिब्रवहुतामनैः ॥८॥

५३९

सुिष्ेद्विगुणक्षीरं सैर तोयचतुशुणम्‌ । पक्त्वा बस्तो विधातव्यं मूढवातानुखोमनम्‌ ॥<॥

अजासि ग्रहणीदोषमानाहं विषमञ्वरम्‌ ।

कटयूर्रषठकोषठस्थान्‌ वातयोगांश्च नाशयेत्‌ ॥१०॥

शटी ( कचूर ), पुष्करमूढ, पिप्पली, मैनफल, देवदासः

सफ, कूट, सुरेहठी, वच, बिल्व, चित्रक इनको पीकर, तेल

से दुगना दुध, तेर से चौगुना पानी लेकर ते सिद्ध करे । यहं

ते बस्ति मेँदेने पर मूढवायुःका अनुखोमन करता है ।

अशं, अहणी रोग, आनाह-विषमञ्वर, कटि, ऊरू-पीठ ओर कोष्ठ

म॑स्थित वायु जन्य रोगों को नष्ट करता ह ॥८-१०॥

वचापुष्करकुष्ेखामदनामर सिन्धुजेः। काकोीद्रययश्रयाहमेदायुग्मनराधिपेः ॥११॥

षाठाजीवकजीवन्तीभागीं चन्द नकट्फठेः ।

सरलगुरुबिल्वाम्बुवाजिगन्धाग्निश्द्धिभिः ॥९२॥

विडङ्घारग्बधर्यामातिष्न्मागधिकधिभिः। पिष्टेस्तेखं पचेत्‌ क्षीरपच्चमूकरसान्वितम्‌ ॥१३॥

गुल्मानाहाग्निषङ्गाओेग्रदणीमूत्रस ङ्ग नाम्‌ ।

अन्वासनविधोौ युक्तं शस्यतेऽनिख्रोगिणाम्‌ ॥१४॥

बच, पुष्करमूल, कूट, इकायची, मेनफल, देवदार, सैन्धव,

काकोली, श्षीरकाकोी, मुटेहटी, मेदा, महा मेदा, अमलतास,

पाठा, जीवक; जीवन्ती, भार्गी, चन्दन, कट्फल, चीड़, अगस,

बिल्व, वाख्क, अश्वगन्धा, चित्रक वृद्धि, विडंग, अमलतास,

काटीनिशोथ, निशोय, पिप्पली, ऋद्धि, इनके कल्क से दुघ

ओर बद्ञ्चमूल के क्वाथ मे तेर सिद्ध करे | यह तेर वात

रोगियों मे अनुवासन सूप से बरतने प्र गुल्म, आनाह, अग्नि- माय, अशं, अहणी, मूत्र अवरोघ को न्ट करता ई ।

वक्तव्य--अमल्तास दो वार अने से दुगुनी लेनी

चाहिये ~ धृते तेलश्च योगे च यद्द्रव्यं पुनख््यते | तदातव्य मिहाचा्यैः मागतो द्विगुणं मतम्‌ ॥११-१४॥ `

चित्रकातिविषापाठादन्तीबिल्ववचामिषेः।

सरजयुमतीराल्नानीठिनीचवुर ङ्गः ॥१५॥ -चभ्याजमोद्‌काकोछोमेदायुग्मसुरदुमेः। जीवकषभवषामवस्तगन्धासताहयेः ॥१९६॥ ` रेण्वश्वगन्धामज्जिष्ठाशटीपुष्करतस्करेः ।

सक्षीरं विपवेत्तंरं मारुतामयनाडनम्‌ ॥१७]

गृधसीखज्ञङञ्जाव्यमूत्रोदावतेरोगिणान्‌ । शस्यतेऽल्पबलाग्नीना बस्तावाजु नियोजितम्‌ ॥१८॥ चित्रक, अतीख, पाठ], जमालगोटा, व्रिल्व, वच, सौफ- चीड़, शाल्पर्णा, रास्ना, नीर, अमट्तास, चथ्य, अजवायेन, काकोली, क्षीर काकरोली, मेदा, महामेदा, देवदार, जीवक, ५ । श्ुषमक) युननवा;) अजगन्बा सोया, रेणुका, अश्वगन्धा,

सुश्रतखं्िता >

[ अ० ३७.

। । । मजी, कचूर, पुष्करमूल, चोरक; इनसे दूध के साथ तैल षद

करे | यह वैर वायुनाशक गश्रसी, कुभ्ज, आब्यवात

मू, उदावत्तं रोगियों के लिये बस्ति मे देना उत्तम दै ॥ १५-१८॥ मतिकैरण्डवषौभुरास्ना्रबकरोदिषैः ।

दशमरसहाभागीविडञ्चन्थामरदारुभिः ॥१९॥

वलानागबलाम्‌बौवाजिगन्धामृतादरयेः ।

सहाचरबरीविश्वाकाकनासाविदारिमिः ॥२०॥ यवमाषातसीकोख्कररत्थेः क्वथितः शतम्‌ । जीवनीयप्रतीवापं तें क्षीर चतुगुणम्‌ ॥२१॥

जङ्धोरुत्रिकपार्वा सबाहुमन्यायिरःस्थितान्‌ ।

हन्याद्वातविकारास्तु बस्तियोगेनिषेवितम्‌ ॥२२॥

मूतिक ( कत्तण या अजवायन ); एरण्ड, पुननवा,

रास्ना, अद्धखा, रोहिषघास, द शमूर, माषपर्णी, मार्गी, वच,

देवदारु, वला, नागबला, मूबां, अश्वगन्धा, अमृतादय

( गिलोय ओर हरड़ ) श्चिण्टी, शतावरी, सोढ, कोटरी,

विदारी, जो, उड़द, अली, चेर, कुरत्थी इनके क्वायं

जीवनीयगण का कल्क प्रक्ञेप देकर, तेल से चार गुण दुधमे

सिद्ध किया तैल जंघा, ऊसुत्रिक; पाश्वे, अंश, बाहु, मन्या,

शिरमें स्थित वात रोगों को बस्ति में देने से नष्टकेरा

दै ॥१६-२२॥ | जीबन्त्यतिबलामेदाकाकोरीद्रयजौवकेः। ऋषभातिविषाकृष्णाकाकनासावचामरेः ॥२३॥ रोस्नामद नयष््याहसरलाभीरुचन्दनेः ।

स्वयङ्कपाश्रदीगश्रज्गोकर्सोसारिबाद्येः ॥२४॥ पिष्स्तेखघृतं पक्वं क्षीरेणाष्टगणेन तु । तच्चानुवासने देयं श्ुक्राग्निबङ्वधनम्‌ ॥२५॥ `

वर हणं बातपित्तष्नं गल्मानाददर परम्‌ । . नस्ये पाने च संयुक्तमृध्वंजतरुगदापहम्‌ ॥२६॥

जीवन्ती, अपिव्रखा, मेदा, काकोटी, क्षीरकाकोली) जीवकः

ऋषभक, अतीख, पिप्पली, कौआदूटी, वच; देवद्‌ाड, रा ,

| मेनफल, मुरहटी, चीड़, शतावरी, कोच, कनचूर, : काक्रदाश्गी,

पृरिनपर्णी, सारिवा, कष्णसारिवा इनके कल्क से धी

से आठ गुणे दूषय घी. ओर तैर ( मिलित ) सिद्ध करे ।

इखको अनुवाखन में देने से शुक्र ओर अग्निका बल बरद

है । यह बृंहण, वात पित्त नाशक, गुल्म आनाह नाक

नस्य ओर पीने मे बरतने से जत्रु के ऊपर के रोगोंकी न

करता हे ॥२३-२६॥

ओर तेढ

मधुकोशीरकाङ्मयंकटुकोत्पर्चन्दनेः। इयामापद्मकजीम्‌तशकराह्वातिविषाम्बुभिः ॥२५।

` तेख्पादं पचेत्‌ सर्पिः पयसाऽषटगणेन च । न्यरोधादिगणक्वाथयु्त बस्तिषु योजितम्‌ ॥२८ .

नि.

७. ३७ ]

चिकित्सास्थानम्

६३३

दाहाम्बुद्धरवीसर्पवातशोणितविद्रधीन् । पित्तरक्तवराद्यांश्च हन्यात् पित्तकृतान् गदान् ॥२६॥

मुलेहटी, खस, गाम्भारी, कुटकी, कमल, चन्दन, निशोथ, पद्माल, देवदाली, इन्द्रजी, अतीस, वालक, इनका कल्प, तैल का चतुर्थांश घी और तैल से आठ गुणा दूध मिलाकर तैल को न्यमोक्षण के क्राथ के साथ सिद्ध करे । इस तैल का वस्ति में उपयोग करने पर दाह, रक्तप्रदर, वीसर्प, वातरक्त, विद्रधि, रक्तपित्त, खर आदि एवं पित्तजन्यरोग नष्ट होते हैं । (जोमूत, मुस्तक, श्यामा, प्रियंगु, डल्हन ) ॥२६॥

मुणालोत्पलजालूकसारिवाद्ध्यकेशरैः । चन्दनद्वयभूनिम्बपदमबीजकसेरुकेः ॥३०॥ पटोलकटुकारक्तागुन्द्रापपटवासकैः ।

पिष्टैस्तैलघृतं पक्वं तृणमूलरसेन च ॥३१॥ क्षीरद्विगुणसंयुक्तं बस्तिकर्मेणि योजितम् ।

नस्येऽभ्यञ्जनपाने वा हन्यात् पित्तगदान् बहून् ॥३२॥ कमलनाल, कमल, कमलमूल ( कन्द ), सारिवा, कुण्ण- सारिवा, केसर, चन्दन, लालचन्दन, चिरायता, कमलमट्टा, कसेरु, पटोल, कुटकी, मजीठ, गुन्द्रा ( पटेरन ), पित्तपापड़ा, अडूषा, इनके कल्क से पञ्चतृण मूल के क्वाथ में दुगुना दूध मिलाकर सिद्ध किये तैल घृत वस्ति कर्म में बरते । नस्य अर्भ्यग और पान में बरते । पित्तजन्य बहुत से रोगों को नष्ट करता है ।

त्रिफलातिविषामूर्वात्रिषुच्चित्रकवासकैः । निम्बारग्वधवृन्धप्रथासप्तपर्णनिशाद्ध्यैः ॥३३॥

गुड्डीचीन्द्रसुराकृष्णाकुष्ठसर्पपनागरेः । तैलमेभिः समैः पक्वं सुरसादिरसाप्लुतम् ॥३४॥

पानाभ्यञ्जनगण्डुषनस्यबस्तिषु योजितम् । स्थूलतालस्यकण्डुवादीन् जयेत्कफकृतान् गदान् ॥३५॥

पाठाजमोदाशाङ्गुष्ठापिपल्लीद्वयनागरेः । सरलागुरुकालीयभागीर्घन्यामरद्रुमैः ॥३६॥

मरिचैलाभयाकटवीगटीप्रन्थिककटफलैः । तैलमेरण्डतैलं वा पक्वमेभिः समायुतम् ॥३७॥

बल्लीकण्टकमूलभ्यां क्वाथेन द्विगुणेन च । हन्यादन्वासनेर्वतं सर्वान् कफकृतान् गदान् ॥३८॥

विडंगोदीच्यसिन्धूथशटीपुष्करचित्रकैः । कटफलतिविषाभागीर्घवाकुष्ठसुराद्ध्यैः ॥३९॥

मेदामदन्यष्टयाद्ध्यमांनिचुलनागरेः । शताह्वानीलिनीरास्ताकलसीवृषरेणुभिः ॥४०॥

बिम्बाजमोदकृष्णाद्वादीन्तीचन्यनराधिपैः । तैलमेरण्डतैलं वा मुष्ककादिरसाप्लुतम् ॥४१॥

प्लौहोदाधर्तवातासृग्गुल्मानाहकफामयान् । प्रमेहशकशाशी सि हन्यादाश्वनुवासनेः ॥४२॥

त्रिफला, अतीस, मूर्वा, त्रिबुत्त, चित्रक, अडूषा, नीम, अमलतास, वन्च, सतवन, हल्दी, दाहहल्दी, गिलोय, इन्द्रायण, पिप्ली कूट, सरसो, सौठ इनको समान भाग लेकर इनके कल्क से सुरसादिगण के क्वाथ में पकाया तैल पान, अर्भ्यग, गण्डुष, नस्य और वस्ति में बरतने से स्थूलता, आलस्य, कण्डु आदि कफजन्य रोगों को नष्ट करता है । पाठा, अजवायन, शाङ्गुष्ठा ( मजीठ ), पिप्ली, गजपिप्ली, सौठ, चीड़, अगर, कालीयक, भागीर, चन्य, देवदारु, मरिच, इलायची, हरक, कटुकी, कचूर, वच, कटफल इनके कल्क से, बल्लीपञ्चमूल ( विदार्थादि पञ्चमूल ) और कण्टक पञ्चमूल इनके क्वाथ में सिद्ध किया एरण्ड तैल या तिल तैल अनुवासन में देने से कफजन्य रोगों को नष्ट करता है । विडंग, खस, सैन्धव, कचूर, पुष्करमूल, चित्रक, कटफल, अतीस, भागीर, वन्च, कूट, देवदारु, मेदा, मेनफल, मुलेहटी, निशाथ, जलवैतस, सौठ, सौफ, नील, रास्ता, पुश्तिपर्णी, अडूषा, रेणु ( पपटक ), बिरुव, अजवायन, पिप्ली, दन्ती, चन्य, अमलतास, इनके कल्क से, मुष्कक आदि के क्वाथ में सिद्ध किया तिल तैल या एरण्ड तैल प्लौहा, उदावर्त्त, वातरक्त, गुल्म, आनाह, कफरोग, प्रमेह, अर्श, शर्करा को अनुवासन में बरतने से शीघ्र नष्ट करता है ।

वक्तव्य—शट्यादि, वचादि, चित्रकादि, भूतौकादि तैल प्रायः वातरोगों में, जीवन्त्यादि, मधुकादि, मूणालादि तैल प्रायः पित्त-रक्त रोगों में, त्रिफलादि, पाठादि तैल कफ रोगों में, विडंगदि तैल कफप्रधान वायु में, संसर्गसन्निपात में इनको यथायोग्य रूपमें मिलाकर बरते । बल्लीपञ्चमूल और कण्टकपंच-मूल स्वस्थान अध्याय अङ्गीतम् हैं ॥३३-४२॥

अशुद्धमपि वातेन केवलेनातिपीडितम् । अहोरात्रस्य कालेषु सर्गोच्चैवानुवासयेत् ॥४३॥ यदि रोगी शुद्ध वायु से ही पीड़ित हो तो उसका शोषन ( विरेचन आदि ) न भी हुआ हो तो उसे पूर्वहि में या दिन रात में सब समय अनुवासन देना चाहिये । ( केवलेन-धातुखण्ड-हेतुना, डल्हन ) ॥४३॥

रूक्षस्य बहुवातस्य द्रो नीनप्यनुवासनान् । दस्त्वा स्निग्धतत्त्वं ज्ञात्वा ततः पश्चात्निरुहयेत् ॥४४॥

रूक्ष एवं बहुत वायु पुरुष को पहले दो या तीन अनुवासन

देकर, जब शरीर स्निग्ध बन जाये, तब पीछे से निरुह देवे ॥

अस्निग्धमपि वातेन केवलेनातिपीडितम् । स्नेहप्रगाढैर्मतिमात्रिरुहैः समुपाचरेत् ॥४५॥

शुद्ध वायु से ( किसी दूसरे दोष का संसर्ग न होने पर )

अतिशय पीड़ित होने पर स्नेहन दिये रोगी को भी बुद्धिमान् वैद्य स्नेह प्रचुर निरुहो से चिकित्सा करे ॥४५॥

अथ सम्यङ्निरुहं तु वातादिष्वनुवासयेत् । बिरुवयष्ट्याह्मदनफलतैलैर्यथाक्रमम् ॥४६॥

५३४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

भली प्रकार निरुहण हो जाने पर वातादि दोषों में क्रमशः बिल्वतैल, मुलेहटी के तैल, और मैनफल इनसे सिद्ध किये तैल से अनुवासन दे ॥

वक्तव्य—बिल्वतैल—बिल्वकल्क या कवच से सिद्धतैल अथवा—शाताद्वा फल विल्वाल्यैः तैलं सिद्धसमीरणे । यद्य्याह-तैल—भूतीकादि द्रव्य—जीवनीयगण से कहा हुआ । मैनफल—फलबिल्वत्रिहृक्कृष्णा रास्ता, भूनिम्बदार्चमिः—इनसे सिद्ध किया तैल बरते ॥४६॥

रात्रौ बस्ति न दद्यात्तु दोषोऽक्लेशो हि रात्रिजः ।

स्नेहवीर्ययुतः कुर्याद्वाधमानं गौरवं उवरम् ॥४७॥

रात्रि में बस्ति का प्रयोग न करे । क्योंकि आहार के विदाह से या समय की शीतलता के कारण रात्रि में दोषों का उत्कलेश होता है । वह उत्कलेश स्नेह की शक्ति से युक्त होकर आधमान, भारीपन और उवर उत्पन्न कर देता है ।

वक्तव्य—“अविशुद्धे तु हृदये निधि किलन्नेषु वातुषु । विदग्धेऽन्तरसे खोतः स्रण्डित्पेतु देहिनाम् ॥ व्यापारेभ्यो निह-चानां दोषोऽक्लेशो भवेदिति ॥४७॥

अहि स्थानस्थिते दोषे बह्वी चान्नरसान्विते ।

स्फुटस्त्रोतमुले देहे स्नेहौजः परिसर्पति ॥४८॥

दिन में दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, अग्नि के रस से युक्त होने पर, शरीर के खोतों के मुख खुले होने से स्नेह का ओज सारे शरीर में फैल जाता है ॥४८॥

पित्तोऽधिके कफे क्षीणे रुक्ते वातस्रगदिते ।

नरे रात्रौ तु दातव्यं काले चोष्णोऽनुवासनम् ॥४९॥

चण्णे पित्ताधिके वाऽपि दिवा दाहादयो गदाः ।

संभवन्ति यतस्तस्मात् प्रदोषे योजयेद्भिषक् ॥५०॥

अपवाद—वात रोग से पीड़ित, रूक्ष शरीर मनुष्य में कफ के क्षीण होने पर और पित्त की अधिकता में प्रीष्म श्रुतु होने पर रात्रि में भी अनुवासन देना चाहिये । प्रीष्म काल में या पित्त की अधिकता में दिन के समय अनुवासन देने पर दाह आदि रोग होते हैं । इसलिये—प्रदोष में रात्रि के प्रथम प्रहर में अनुवासन देवे ॥४९,५०॥

शीते वसन्ते च दिवा प्रीष्मप्रावृद्धघनास्थये ।

स्नेहो दिनान्ते पानोक्तान् दोषान् परिजिहीर्षता ॥५१॥

स्नेह पान में कहे हुए दोषों से बचने की इच्छावाला व्यक्ति शीतकाल और वसन्त में दिन के समय और प्रीष्म, प्रावृद्ध एवं शरद श्रुतु में दिन के अन्त में स्नेहन लेवे । ( अनुवासन बस्ति ले ) ।

वक्तव्य—“शीते वसन्ते च दिवाऽनुवस्यो रात्रौ शरद प्रीष्मघनागमेषु । तानेव दोषान्परिखता ये, स्नेहस्य पाने परि-कीर्तिताः प्राक् ॥ चरक० सि० अ० १।२२ । देखिये—चरक० सूत्र० अ० ११।१६,२१ ॥५१॥

अहोरात्रस्य कालेषु सवज्जेवानिलाधिकम् । तीज्रायां रुजि जीर्णान् भोजयित्वाऽनुवासयेत् ॥५२॥ दिन रात के सब समयों में वायु की अधिकता होने पर तीव्र वेदना होने से, अन्न पच गया हो तो—भोजन कराके अनुवासन देवे ॥५२॥

न चाभुक्तवतः स्नेहः प्रणिधेयः कथञ्चन । शुद्धत्वाच्छून्यकोष्टस्य स्नेह ऊर्ध्वं समुत्पतेत् ॥५३॥ बिना भोजन दिये ( खाली पेट ) स्नेह कभी नहीं देना चाहिये । क्योंकि कोष्ठ के शुद्ध एवं खाली होने से स्नेह ऊपर की ओर जा सकता है ॥५३॥

सदाऽनुवासयेद्यापि भोजयित्वाऽऽर्द्रपाणिनम् । उवरं विदग्धमुक्तस्य कुर्यात् स्नेहः प्रयोजितः ॥५४॥ न चातिस्निग्धमशनं भोजयित्वाऽनुवासयेत् । मर्दं मूर्च्छां च जनयेद् द्विधा स्नेहः प्रयोजितः ॥५५॥ रूक्षं भुक्तवतो ह्यन्नं बलं वर्णं च हापयेत् । युक्तस्नेहमतो जन्तुं भोजयित्वाऽनुवासयेत् ॥५६॥ यूषक्षीररसैस्तस्माद्यथाव्याधि समीद्वय वा । यथोचितान् पादहीनं भोजयित्वाऽनुवासयेत् ॥५७॥

भोजन कराके हाथ घुलाते ही, रोगी को अनुवासन सदा देवे । अन्न की विदग्धवास्था में दिया गया स्नेह उवर कर देता है । अतिस्निग्ध भोजन खिलाकर अनुवासन न देवे । दो प्रकार से दिया हुआ स्नेह मर्द और मूर्च्छा को उत्पन्न करता है । रूक्ष अन्न खाने पर बल और वर्ण घटता है । इसलिये थोड़े परिमाण में ( मात्रा में ) स्नेहभोजन में देकर अनुवासन देवे । मूंग आदि का यूष, दूध या मांसरस—जो रोग के अनुकूल हों, जो सत्यम्य हों, उनको प्रतिदिन की भोजन की मात्रा से चतुर्थीय कम मात्रा में खिलाकर अनुवासन दे ।

वक्तव्य—“पादहीनमुत्तममध्यममन्दगनिविशेषेण पादेन, पादाभ्यां पादेर्वादीनम् इति ज्ञेयम् । अर्धहीनं त्रिभागं वा भोजयित्वाऽनुवासयेत् । इत्थङ्ग—दो तरह के दिये स्नेह की हानि—“स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रति भुञ्जान एव च । स्नेह-मिथ्योपचारादि जायन्ते दाक्षणा गदाः ॥५४-५७॥

अथानुवास्यं स्वभ्यक्तमुष्णाम्बुभेदितं शनैः । भोजयित्वा यथाशास्त्रं कृतचक्रकर्मणं ततः ॥५८॥ त्रिसृज्य च शकुन्मूर्त्रं योजयेत् स्नेहबस्तिना । प्रणिधानविधानं तु निरुह्ने संप्रवद्वयेत् ॥५९॥

जिसको अनुवासन देना हो—उस रोगी को भली प्रकार स्नेह से अर्थग्य देकर, धीरे-धीरे गरम पानी से स्वेदन देवे । फिर शास्त्र विधि से भोजन कराके कुछ घुमाये । मल मूत्र का त्याग कर चुकने पर स्नेहबस्ति देवे । बस्ति की प्रणिधानविधि निरुह्ने में कहेंगे ।

अ. ३७ ]

चिकित्सास्थानम्

४३५

वि० मन्तव्य—हाथ-पाँव के तलुओं तथा स्फिन्चों पर थपथाने तथा शय्या को थोड़ा उठाकर पटकने से अनुवासन का स्नेह तत्काल नहीं निकलता यह स्वभाव है क्योंकि ऐसा करने पर पुरीष का वेग भी कुछ समय के लिये रुक जाता है। बात बहुत छोटी है परन्तु है बड़े महत्त्व की। पाठक इस पर गम्भीर विचार करें और अग्रिम श्लोक ६५ को देखकर समझें ॥५६॥

ततः प्रणिहितेनेह-उत्तानो वाकशतं भवेत् । प्रसारितैः सर्वगात्रैस्तथा वीर्यं विसर्पति ॥६८॥

ताडयेत्तल्योरैन त्रीखीन् वाराच्छनैः शनैः । स्फिन्चोश्चैन ततः शय्यां त्रीन् वारातुक्षिपेततः ॥६९॥ एवं प्रणिहिते बस्ती मन्दायासोऽथ मन्दवाक् ।

स्वास्तीर्णं जयने काममासीताचारिके रतः ॥६९॥

स्नेहवस्ति ले चुकने पर एक सौ मात्रा तक चित्त-पीठ के भार और हाथ-पैर-सब अङ्गों को पसारकर रोगी लेटा रहे। इस प्रकार स्नेह का वीर्य सारे शरीर में फैल जाता है। हाथ-पैर के तलुओं पर धीरे-धीरे तीन-तीन बार थपथपाये। नितम्बों पर भी थपथपाये। शय्या की पांयत को तीन बार ऊँचा उठाकर इस प्रकार से बस्ति के देने पर रोगी थोड़ा परिश्रम करे और थोड़ा बोले। अपने विस्तर पर आराम से पड़ा रहे और नियम पालन में दत्तचित्त रहे ॥६०-६२॥

स तु सैन्यवचूर्णनं शताह्विन च योजितः ।

देयः सुखोष्णश्च तथा निरेति सहसा सुखम् ॥६३॥

यस्यानुवासनो दत्तः सकृदन्वक्षमात्रजेत् ।

अत्यौष्ण्यादतिरैदृण्याद्वा वायुना वा प्रपीडितः ॥६४॥

सवातोऽधिकमात्रो वा गुरुत्वाद्वा सभेषजः ।

तस्यान्योऽल्पतरो देयो न हि स्निह्यत्यतिष्ठति ॥६५॥

विष्टब्धानिलविषमूत्रः स्नेहहीनेऽनुवासने ।

दाहकलमप्रवाहात्तिकरश्चात्यनुवासनः ॥६६॥

स्नेह को सैन्यव नमक और सौफ के साथ मिलाकर सुहाता हुआ गरम देना चाहिये, इससे सहसा सुखपूर्वक बाहर आता है। अति उष्णिमा के कारण, अतितीक्ष्ण होने से, वायु के दबाव के कारण, वायु के साथ जाने से, मात्रा में अधिक होने से, अथवा भारी होने से, औषध का साथ होने से जिस रोगी में दिया हुआ स्नेह एकदम तुरन्त बाहर आ जाता है, उसमें दूसरा स्नेह पहले से थोड़ी मात्रा में देवे, क्योंकि स्नेह यदि नहीं ठहरता तो रोगी स्निग्ध नहीं होता। स्नेह हीन दिया हुआ अनुवासन विष्टब्धता (वायु-मल मूत्र का अवरोध), दाह, कलम, प्रवाहिका, परिकर्त्तिका, उत्पन्न करता है।

वक्तव्य—“चूर्णमात्रः पले स्नेहे सिन्धुजन्मशताह्वयोः ॥”

वि० मन्तव्य—स्नेह का मलाशय में कुछ समय (४-६

घण्टा) रुकना आवश्यक है जिससे उसका वीर्य शरीर में जा सके और उसके पश्चात् बच्चा-लुचा स्नेह निकल जाना भी आवश्यक है, यदि न निकले और कोई हानि भी न करे तो उसकी उपेक्षा कर देवे अर्थात् निकालने का कोई प्रयत्न न करे देखिये श्लोक ६८। परन्तु यथासाध्य अनुवासन के स्नेह में सैन्यव लवण तथा सोया का थोड़ा (२४ मात्रा) चूर्ण अवश्य मिला देना चाहिये और स्नेह को कुछ उष्ण करके प्रयुक्त करना चाहिये। ऐसा करने से वह सुखपूर्वक-किरी उपद्रव के बिना उचित समय पर लौट आता है। जैसे—आहार में लवण मिलाने से समय पर पुरीषोत्सर्ग हो जाता है और लवण एवं सोया से स्नेह का पाचन भी अधिक हो जाता है जैसे आहार का। और यदि स्नेह उक्त कारणों से तत्काल-वस्ति देते ही तुरन्त लौट आवे तो दुबारा थोड़ी मात्रा में स्नेहवस्ति देना चाहिये जो कुछ समय के लिये रुके, क्योंकि यदि स्नेह मलाशय में नहीं रुकता तो स्नेहन भी नहीं होता—अनुवासन का कोई लाभ नहीं होता। स्नेहहीनेऽनुवासने—हीन-न्यून मात्रा में स्नेह की वस्ति देने पर—वायु, पुरीष एवं मूत्र का अवरोध होता है और अत्यनुवासनः—अधिक मात्रा में स्नेह की वस्ति (देने पर)—दाह, कलम, प्रवाहिका एवं अरति को उत्पन्न करती है ॥६३-६६॥

सानिलः सपुरीषश्च स्नेहः प्रत्येति यश्च तु ।

ओषचोषौ बिना ग्रीव स सम्भयगनुवासितः ॥६७॥

जीर्णोन्मथ सायाहे स्नेहे प्रत्यागते पुनः ।

लब्धवन्नं भोजयेत् कामं दीपगनिस्तु नरो यदि ॥६८॥

प्रातरुष्णोदकं देयं धान्यनागरसाधितम् ।

तेनास्य दीप्यते बहिर्भक्ताकाङ्क्षा च जायते ॥६९॥

जिस पुरुष में ओष एवं चोष (जलन और दाह) के बिना, वायु और मल के साथ स्नेह शीघ्र वापिस आ जाता है, उसे भलीप्रकार अनुवासन हुआ जाने। यदि रोगी की अग्नि प्रदीप्त हो ता, स्नेह के वापिस आने पर, पहला भोजन पच जाने पर, सार्यकाल में लघु भोजन यथेच्छ देवे। प्रातःकाल धनिया और सौंठ से सिद्ध गरम पानी देना चाहिये। इससे अग्नि प्रदीप्त होती है, और भोजन में रुचि होती है ॥६७-६९॥

स्नेहवस्तिक्रमेष्वेवं विधिमाहुर्मनीषिणः ।

बुद्धिमानो न स्नेह वस्ति क्रम में यह विधि कही है।

अनेन विधिना पङ्क वा सम वाऽष्टौ नत्रैव वा ॥७०॥

त्रिषेधा वस्तयस्तेषामन्तरा तु निरुद्धणम् ।

इस विधि से छै, सात, आठ या नौ वस्तियाँ (स्नेहवस्तियाँ) देवे, इनके बीच बीच में निरुद्ध वस्ति देवे।

वक्तव्य—“त्रीन् पंचवाऽऽद्विषुनुरोऽथपङ्कवा वातादिकाना- मनुवासनीयान्। स्नेहान् प्रदायाऽथु भिषग्विदध्यात् खोतो-

१३६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३७ ]

विशुद्धयर्मतो निरूहान् ॥ च० सि० अ० १-४६ ॥७०॥

दत्तस्तु प्रथमो बस्तिः स्नेहयेद्वस्तिवृद्धक्षणी ॥७१॥

सम्यग्दत्तो द्वितीयस्तु मूर्धस्थमनिलं जयेत् ।

जनयेद्वलवर्णो च तृतीयस्तु प्रयोजितः ॥७२॥

रसं चतुर्थो रक्तं तु पञ्चमः स्नेहयेत्तथा ।

षष्ठस्तु स्नेहेनर्मांसं मेदः सप्तम एव च ॥७३॥

अष्टमो नवमश्चास्थि मज्जानं च यथाक्रमम् ।

एवं शुक्रगतान् दोषान् द्विगुणः साधु साधयेत् ॥७४॥

भली प्रकार दी हुई प्रथम बस्ति वंक्षण और बस्ति का स्नेहन करती है। द्वितीयबस्ति ऊपर के शरीर की (पक्वाशय से ऊपर की) वायु को शान्त करती है। तृतीय बस्ति बल और वर्ण को उत्पन्न करती है। चौथी बस्ति रस का और पाँचवी रक्त का स्नेहन करती है। छठी बस्ति मांस का और सातवी मेद का स्नेहन करती है। आठवीं अस्थि का नवीं मज्जा का स्नेहन करती है। इस प्रकार अठारह बस्तियाँ शुक्रगत रोगों को भली प्रकार से अच्छा करती हैं ॥

वक्तव्य—नौ स्नेहबस्ति, नौ निरूह बस्ति इस प्रकार अठारह। "एक त्रीन् वा बलासे स्नेहवस्तीन् प्रकल्पयेत्। पंच वा सप्त वा पित्तै नैकादश वाडनिले ॥ वारभटः ॥ विश्रमताः कर्मसु वस्तयो हि, कालस्ततोऽर्धेन ततश्च योगः। सान्वासना द्वादश वै निरूहाः प्राक्स्नेह एकः परतश्च पंच ॥ काले त्रयोऽन्ते पुरतस्तथैकः स्नेहा निरूहान्तरितश्च षट् स्युः। योगे निरूहाश्चय एव देशः स्नेहाश्च पञ्चैव परादिमध्याः ॥

च० सि० अ० १ ४८ ॥७१-७४॥

अष्टादशाष्टदशकान् वस्तीनां यो निषेधते ।

यथोक्तं विधानेन परिहारक्रमेण च ॥७५॥

स कुञ्जरवल्लोऽश्वस्य जवैस्तुल्योऽमरप्रभः ।

वीतपाप्मा श्रुतधरः सहस्रायुर्नरो भवेत् ॥७६॥

जो मनुष्य यथोक्त विधि से और परहेजी को पालते हुए अठारह निरूह और अठारह स्नेहबस्तियों को (परिवर्तन से) सेवन करता है, वह बल में हाथी के समान, वेग में घोड़े के समान, कान्ति में देवताओं के समान, पाप रहित, सुनते ही धारण करनेवाला, हजार वर्ष की आयुवाला होता है ॥७५ ७६॥

स्नेहबस्ति निरूहं वा नैकमेवातिशीलयेत् ।

स्नेहादग्निनवधोत्कलेशौ निरूहात् पवनाद्भयम् ॥७७॥

तस्मान्निरूहोऽनुवास्यो निरूहश्चानुवासितः ।

नैवं पित्तकफोत्कलेशौ स्यातां न पवनाद्भयम् ॥७८॥

स्नेहबस्ति और निरूहबस्ति अकेली ही का सेवन न करे ।

स्नेह से अग्नि का नाश और उत्कलेश (मिचली) और निरूह से वायु के कुपित होने का भय है। इसलिये निरूह देने के पीछे अनुवासन और अनुवासन के पीछे निरूह देवे (दो निरूह

या दो अनुवासन एक साथ न दे) इस प्रकार करने से न तो पित्त या कफ का उत्कलेश होने का डर रहता है, और न वातकोप की आशंका रहती है।

चरक—“स्नेहवस्ति निरूहं वा नैकमेवातिशीलयेत्। उत्कलेशाग्निनवधौ स्नेहात् निरूहात्पवनाद्भयम् ॥ तस्मात् निरूहः स्नेहाः स्याद् निरूहश्चानुवासितः। स्नेहशोधनयुक्त्यैवं बस्तिकर्मदोषन्तु ।

वि० मन्तव्य—यद्यपि अकेली स्नेहबस्ति अथवा अकेली निरूहण बस्ति का ही सेवन करना निषिद्ध-हानिकारक है, परन्तु रुक्ष के लिये अल्पमात्रा में स्नेहबस्ति तथा स्निग्ध के लिये अल्पमात्रा में निरूहणबस्ति हानिकारक नहीं होती। देखिये श्लो० ८०। सत्र यह है, कि—जैसे स्नेहयुक्त आहार के साथ २ रुक्ष आहार स्वास्थ्य के आवश्यक है, वैसे ही बस्ति कर्म में भी स्नेह के लिये साथ २ रुक्षण करना आवश्यक है ॥७७,७८॥

रूक्षाय बहुवाताय स्नेहबस्ति दिने दिने ।

दद्याद्वैद्यस्ततोऽन्येषामन्यावाभयान्त्रयहान् ॥७९॥

रूक्ष एवं बहुत वायुवाले व्यक्ति को वैद्य प्रतिदिन स्नेहबस्ति देवे। अन्य पुरुषों में अग्निमान्ध के भय से तीन दिन के अन्तर से देवे ॥७९॥

स्नेहोऽल्पमात्रो रूक्षाणां दीर्घकालमन्तययः ।

तथा निरूहः स्निग्धानामल्पमात्रः प्रशस्यते ॥८०॥

रूक्ष पुरुषों में दीर्घकाल तक दिया अल्प स्नेह किसी प्रकार की हानि नहीं करता। इसी प्रकार स्निग्ध पुरुषों में थोड़ी मात्रा से दिया निरूह कोई हानि नहीं करता ॥८०॥

अत ऊर्ध्वं प्रवृद्ध्यामि व्यापदः स्नेहबस्तिजाः ।

बल्वन्तो यदा दोषाः कोष्ठे स्युरतिछादयः ॥८१॥

अल्पवोयं तदा स्नेहमभिभूय पृथग्विधान् ।

कुर्वन्त्युपद्रवान् स्नेहः, स चापि न निवर्तते ॥८२॥

तत्र वाताभिभूते तु स्नेहे मुखकषायता ।

जूर्भा वातरुजस्तास्ता वेपथुर्विषमञ्जरः ॥८३॥

पित्ताभिभूते स्नेहे तु मुखस्य कटुता भवेत् ।

दाहस्तृष्णा ज्वरः स्वेदो नेत्रमूत्राङ्गपीतता ॥८४॥

श्लेष्माभिभूते स्नेहे तु प्रसेको मधुरास्यता ।

गौरवं छर्दिरुच्छवासः कुरुच्छाच्छीतज्वरोऽरुचिः ॥८५॥

स्नेहबस्तिजन्म हानियों को इसके आगे कईगा। जब कोई में वायु आदि दोष बलवान् रहते हैं, तब अल्पवीर्यस्नेह को पराजित करके पृथग् २ उपद्रवों को स्नेह उत्पन्न करते हैं और वह स्नेह वापिस भी नहीं आता। इनमें वायु से स्नेह के पराजित होने पर मुख में कषाय रस, जम्भाई, वायु जनित मिश्र-मिश्र प्रकार की वेदनायें, कम्पन, विषमज्वर हो जाता है। स्नेहके

अ० ३७ ] ६८

चिकित्सास्थानम्

५३७

पित्त से अभिभूत होने पर मुख में कटुता होती है, दाह, प्यास, ज्वर, पसीना, नेत्र-मूत्र एवं अंगों में पीलापन होता है। स्नेह का कफ से पराजय होने पर मुख से खाला खाव, मुख में मधुरता, भारीपन, वमन, कठिनाई से श्वास लेना, शीतपूर्वक ज्वर और अर्चि होती है।

वि० मन्तव्य—जैसे वमन, विरेचन तथा निरुह्ण बस्ति में वैद्य, रोगी, परिचारक एवं औषध के दोष से व्यापद खड़ी हो जाती हैं वैसे ही स्नेह बस्ति (अनुवासन बस्ति) में भी व्यापद हो जाती हैं ॥८१-८५॥

तत्र दोषाभिभूते तु स्नेहे बस्ति निधापयेत्।

यथास्वं दोषशमनान्युपयोव्यानि यानि च ॥८६॥

दोष से अभिभूत स्नेह में दोषों के अनुसार निरुह्ण बस्ति देवे और दोष शामक जो चिकित्सा हो, उसे दोषों के अनुसार बस्ति। (आम के सम्बन्ध से लंघन आदि) ॥८६॥

अत्याशितेऽन्नाभिभवात् स्नेहो नैति यदा तदा।

गुरुरामाशयः शूलं वायोश्चाप्रतिसंघरः ॥८७॥

हृत्पीडा मुखवैरस्यं श्वासो मूच्छो भ्रमोऽरुचिः।

तत्रापतर्पणस्यान्ते दीपनो विधिरिष्यते ॥८८॥

अशुद्धस्य मलोनमिश्रः स्नेहो नैति यदा पुनः।

तदाऽङ्गसदनाध्माने श्वासः शूलं च जायते ॥८९॥

पक्वाशयगुरुत्वं च तत्र दधान्निरुहणम्।

तीक्ष्णं तीक्ष्णोषधैरेव सिद्धं चाप्यनुवासनम् ॥९०॥

शुद्धस्य दूरानुस्मृते स्नेहे स्नेहस्य दर्शनम्।

गात्रेषु सर्वेन्द्रियाणामुपलेपोऽवसादानम् ॥९१॥

स्नेहगन्धि मुखं चापि कांसश्चासवरोचकः।

अतिपीडितवत्तत्र सिद्धिरास्थापनं तथा ॥९२॥

बहुत अधिक भोजन करने के कारण अन्न से तिरस्कृत स्नेह जब बाहर नहीं आता, तब आमाशय में भारीपन, शूल, वायु का रुकना, हृदय पीडा, मुख में विरसता, श्वास, मूच्छा, भ्रम, अर्चि होती है। इसमें अपतर्पण कराके पीछे से अपिन-दीपन चिकित्सा करे। विरेचन-निरुह्ण दिये बिना दिया गया स्नेह जब वापिस नहीं आता तब अंगों में शिथिलता, आध्मान, श्वास और शूल होता है। और पक्वाशय में भारीपन रहता है। इसमें निरुह्ण देवे। अथवा तीक्ष्ण औषधियों से बनाया तीक्ष्ण अनुवासन भी दे। विरेचन आदि से शुद्ध हुए व्यक्ति में स्नेह के दूर तक पहुँच जाने पर मल में स्नेह का आना, शरीर में, सब इन्द्रियों में मलवृद्धि, ग्लानि, मुख में स्नेह की गन्ध, काय, श्वास, अरोचक होता है। इसमें अतिपीडन की भाँति (गला दबाना, क्षकोरना आदि) चिकित्सा करे और आस्थापन बस्ति देवे ॥८७-९२॥

अस्विन्नस्याविशुद्धस्य स्नेहोऽल्पः संप्रयोजितः।

गीतो मृदुरुच नाभ्येति ततो मन्दं प्रवाहते ॥९३॥

विवन्धगौरवाध्मानशुलाः पक्वाशयं प्रति।

तत्रास्थापनमेवाशु प्रयोज्यं सानुवासनम् ॥९४॥

स्वेदन एवं वमन विरेचन न दिये पुरुष में थोड़ा, शीतल और मृदु दिया गया स्नेह वापिस न आकर धीरे-धीरे, थोड़ा वापिस आता है। पक्वाशय में वायु का अवरोध, भारीपन, आध्मान, शूल होता है। इसमें अनुवासन के साथ आस्थापन शीघ्र देवे ॥९३,९४॥

अल्पं मुक्तवतोऽल्पो हि स्नेहो मन्दगुणस्तथा।

दत्तो नैति कलमोक्कलेगौ भृशं चारतिमावहेत् ॥९५॥

तत्राप्यास्थापनं कार्यं शोधनीयेन बस्तिना।

(अनुवासनं च स्नेहेन शोधनीयेन शस्यते) ॥९६॥

थोड़ा खाने पर दिया हुआ थोड़ा स्नेह मन्द गुण होने से वापिस नहीं आता, कलम, उक्कलेश और अतिशय बेचैनी उत्पन्न करता है। इसमें शोधनीय बस्ति से आस्थापन करना चाहिए। (शोधनीय स्नेहन से अनुवासन देवे) ॥९५,९६॥

अहोरात्रादपि स्नेहः प्रत्यागच्छन्न दुष्टयति।

कुर्याद्भित्तुगुणैश्चापि जोर्णस्वरूपगुणो भवेत् ॥९७॥

दिन-रात-चौबीस घण्टे में भी वापिस नहीं हुआ स्नेह किसी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं करता। अपितु बस्ति के गुणों को करता है, परन्तु पच जाने पर थोड़ा गुण करता है ॥९७॥

यस्य नोपद्रवं कुर्यात् स्नेहबस्तिरनिःसृतः।

सर्वोऽल्पो वाऽऽद्युतो रौदयादुपेक्ष्यः स विज्ञानता ॥९८॥

बाहर न आई स्नेह बस्ति जिस पुरुष में किसी प्रकार का उपद्रव न करे, सम्पूर्णरूप में या थोड़े रूप में बाहर न आये, उसे रुक्षता के कारण रुका हुआ जानकर बुद्धिमान् वैद्य उसकी उपेक्षा कर दे ॥९८॥

अनानयान्तं स्वहोरात्रात् स्नेहं संशोधनैर्हरेत्।

चौबीस घण्टे के पीछे भी स्नेह वापिस न आये, तो संशोधनों से उसे निकाले।

स्नेहबस्त्वावनायाते तान्यः स्नेहो विधीयते ॥९९॥

स्नेह बस्ति के वापिस न आने पर दूसरी स्नेह बस्ति नहीं देनी चाहिए ॥९९॥

इत्युक्ता व्यापदः सर्वां सलक्षणचिकित्सिताः।

इस प्रकार से सब हानियाँ लक्षण और चिकित्सा के साथ कह दी हैं।

बस्तेरुत्तरसंज्ञस्य विधिं वद्याम्यतः परम् ॥१००॥

चतुर्दशाङ्गुलं नेत्रमातुराङ्गुलसंमितम्।

मालतीपुष्पवृत्तार्थं छिद्रं सर्वपतिर्गमम् ॥१०१॥

इसके आगे उत्तरबस्ति की विधि का व्याख्यान करेंगे। रोगी की अपनी अँगुलियों के माप से नेत्र का माप चौदह

५३८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

अंगुल, अप्रभाग चमेळी के फूल के वृन्त के समान, छेद सरसों के जाने योग्य होना चाहिये।

वक्तव्य—अंगुल्यान्वय चत्वारि पंच षट् सप्त वा तथा। सप्तगुलं परं नेत्रं प्रणिषेयं भिषग्विदा ॥ हिंस्याद् बस्ति नरं चेह प्रमाणादधिकं ततः ॥

वि० मन्तव्य—उत्तर बस्ति वह है, जो मूत्रमार्ग तथा भग में दी जाती है ॥१००,१०१॥

स्नेहप्रमाणं परमं प्रकुञ्चश्चात्र कीर्तितः।

पञ्चविंशादधो मात्रां विदध्यादुदुद्धिकल्पिताम् ॥१०२॥

उत्तरबस्ति में स्नेह की अधिक से अधिक मात्रा एक प्रकुंच (पल) भर है। यह मात्रा पच्चीस साल के लिये है। इससे छोटी आयु के लिये बुद्धि के अनुसार बना ले। ( एक साल के लिये एक पल का पच्चीसवाँ भाग है ) ॥१०२॥

निविष्टकर्णिकं मध्ये, नारोणां चतुरङ्गुले।

• मूत्रस्रोतः परीणाह् मुदगवाहि दशाङ्गुलम् ॥१०३॥

मेढायामसमं केचिद्विच्छन्ति खलु तद्विदः।

पुरुषों के नेत्र में कर्णिका मध्य भाग में रखनी चाहिये। स्त्रियों में नेत्र कर्णिका चार अंगुल की दूरी पर हो। मूत्र स्रोत के अनुसार मोटा, मूंग के जाने योग्य छिद्रवाला, और दस अंगुल लम्बा होना चाहिए। कई आचार्य मेहन के समान लम्बा नेत्र (कुछ अधिक बड़े छेद का) पसन्द करते हैं ॥१०३॥

तासामपत्यमार्गे तु निदध्याद्यतुरङ्गुलम् ॥१०४॥

द्वयङ्गुलं मूत्रमार्गे तु कन्यानां त्वेकमङ्गुलम्।

विषेयं चाङ्गुलं तासां विधिवद्व्यते यथा ॥१०५॥

स्त्रियों के योनिमार्ग में नेत्र को चार अंगुल प्रविष्ट करे। मूत्र मार्ग में दो अंगुल। कन्याओं के मूत्र मार्ग में एक अंगुल प्रविष्ट करे। यह माप उनकी अपनी अँगुलियों से लेना चाहिये। ( कन्या-अप्राप्त द्वादशवर्षा ) ॥१०४,१०५॥

स्नेहस्य प्रसृतं चित्रं स्वाङ्गुलीमूलसंमितम्।

देयं प्रमाणं परममर्वाणं बुद्धिविकल्पितम् ॥१०६॥

उत्तर बस्ति में स्नेह का प्रसृत अपनी अँगुली मूल से माप कर लेवे। यह स्नेह की उत्तम मात्रा है। ( स्त्रियों की उत्तर बस्ति में )। इससे कम मात्रा अपनी बुद्धि के अनुसार बना ले ॥१०६॥

औरभ्रः शौक्रो वापि बस्तिराजश्व पूजितः।

तदलाभे प्रयुञ्ज्यते गलचर्मं तु पक्षिणाम् ॥१०७॥

मेढा, सुअर या बकरे की बस्ति ( मूत्राशय ) इसमें उत्तम है। इसके अभाव में पक्षियों का गलचर्म बरते। ( इसके अप्राप्य होने पर मशक का पैर, अथवा कोमल चर्म बरते ॥१०७॥ )

अस्यालाभे द्धतः पादो मृदुचर्मं ततोऽपि वा।

अथातुरमुपस्तिग्धं स्वित्मं प्रशिथिळाशयम् ॥१०८॥

यवागं सघृतक्षीरां पीतवन्तं यथाबलम्।

निषण्णमाजानुसमे पीठे सोपाश्रये समम् ॥१०९॥

स्वभ्यक्तवस्तिमूर्धानं तैलेनोष्णेन मानवम्।

ततः समं स्थापयित्वा नालमस्थं प्रहर्षितम् ॥११०॥

पूर्वं शलाकयाऽन्विष्य ततो नेत्रमनन्तरम्।

शनेः शनेर्धृताभ्यरुं विदध्यादङ्गुलानि षट् ॥१११॥

मेढयामसमं केचिद्विच्छन्ति प्रणिधानकम्।

ततोऽपवीडयेद्वस्ति शनैर्नत्रं च निर्हरेत् ॥११२॥

ततः प्रत्यागतस्नेहमपराह्ने विचक्षणः।

भोजयेत् पयसा मात्रां यूषेणथ रसेन वा ॥११३॥

अनेन विधिना दद्याद्वास्तींश्रीश्चतुरोऽपि वा।

विधि—रोग को स्नेहन और स्वेदन देकर—वायु-मूत्र-मल

के त्याग करने से आशय के टीला होने पर, घृत और दूध मिलित यवाग को यथाशक्ति पिलाकर; घुटनों के बराबर ऊँची चौकी पर, सहारा ( तकिया ) लगाकर बिठाये। गरम तेल से बस्ति शिर को भली प्रकार मलकर, इसके मूत्र नाल को प्रहर्षित ( उत्तेजित ) करके समान रूप में रखकर—प्रथम शलाका से मार्ग की परीक्षा करके, पीछे से घी से स्निग्ध किये नेत्र को धीरे-धीरे छे अंगुल प्रविष्ट करे। कई आचार्य मेहन के बराबर प्रविष्ट करने के लिये कहते हैं। फिर बस्ति को दबाये और धीरे से नेत्र को निकाल ले। फिर रनेह के वापिस आने पर सार्यकाल में बुद्धिमान् वैद्य दूध से, यूष से या मांस रस से मात्रा में भोजन देवे। इस विधि से तीन या चार बस्ति देवे।

वि० मन्तव्य—प्रहर्षितम्—( सुश्रुत ), हृष्टे मेढू ( चरक ) हृष्टे इति स्तन्धे ( चक्रपाणि ) तथा हृष्टे मेढू स्थिते च ऋजौ ( वाग्भट सू० अ० १६ ) इन तीनों आचार्यों के कथनानुसार प्रहर्षित अर्थात् हृष्टमृजु संधे स्थित—खड़े मेढू—शिरन में शलाका तथा उत्तर बस्ति का नेत्र देने का विधान किया गया है परन्तु हमारा विचार है कि इन प्रहर्षित आदि शब्दों के साथ “नृज” होना चाहिये अर्थात् शिथिल मेढू में शलाका देवें क्योंकि प्रहर्षित मेढू की दण्डिका फूल जाने के कारण शलाका प्रवेश नहीं हो सकता। यहाँ तक कि इस दशा में मूत्र भी नहीं उतरता और क्रियात्मक रूप में भी देखा जाता है कि शिथिल शिरन में ही शलाका प्रवेश आदि क्रिया की जाती है। पाठक गम्भीर विचार करें ॥

चरक-पुष्पनेत्रं तु हैमं स्याच्छूलरूपमोत्तरबस्तिकम्। जालीपुष्पस्य वृन्तेन समं गोपुच्छसंस्थितम् ॥ रौप्यं वा सर्पः चिह्नं द्विकर्णं द्वादशांगुलम्। तेनाजबस्तिमुक्तेन स्नेहस्यार्धपलं नयेत् ॥ यथावयोविशेषेण स्नेहमात्रां विकल्प्य वा। स्नातस्य मुक्तभक्तस्य रसेन पयसाऽपि वा ॥ सृष्टविष्णुमूत्रवेगस्य पीठे जातु समे मृदौ। ऋजोः सुखोपविष्टस्य हृष्टे मेढू धृतान्विते ॥

अ० ३७ ]

चिकित्सास्थानम्

५३९

शलाक्यान्विष्य गतिं यथेप्रतिहता ब्रजेत् । ततः शेषः प्रमाणेन पुष्पनेत्रं प्रवेशयेत् ॥ गुदवन्मूत्रमार्गेषु प्रणयेदनुसेवनीम् । हिंस्याद् बस्तिगतं बस्तिमूने स्नेहो न गच्छति ॥ सुखं प्रपीड्य निष्कर्म्य निष्कर्म्यन्नेत्रमेव च । प्रत्यागते द्वितीयं च तृतीयं च प्रदापयेत् । अनागच्छन्नुपेक्ष्यस्तु रजनीव्युषितस्य च ॥

चरक० सि० अ० ६ । ५०-५७ ॥ १०८-११३ ॥

ऊर्ध्वजान्वै क्षियै दद्यादुत्तानायै विचक्षणः ॥ ११४ ॥

सम्यक् प्रपीडयेद्यो न दद्यात् सुभृदुपीडितम् ।

त्रिकर्णिकेन नेत्रेण दद्याद्योनिमुखं प्रति ॥ ११५ ॥

स्त्री में उत्तर बस्ति देने के लिये उसे पीठ के भार उत्तान लेटाकर घुटनों को मोड़कर ऊँचा कराये । धीरे से बस्ति को दबाकर उत्तर बस्ति देते समय योनि को भली प्रकार दबाये । इसमें तीन कर्णिकावाले नेत्र को योनिमुख की ओर रखकर बस्ति देवे ।

वि० मन्तव्य—विचक्षणः—“विचक्षणः” इत्यत्र केचित्

‘समाहितः’ इति पठन्ति कामसंकल्लरहितेन अचलितचित्तप्रकृतिना इत्यर्थः—अर्थात् वैद्य विचक्षण-समाहित अर्थात् सावधान होकर बस्ति देवे, योनि दर्शन से कामातुर—विचलित चित्त न हो जाय । यह श्री डल्हण ने अर्थ किया है परन्तु हमारा विचार है कि स्त्रियों में बस्तिकर्म स्त्री-चिकित्सिका ही करे पुरुष नहीं । प्रतीत होता है कि डल्हण जी के समय में कोई नारी चिकित्सिका नहीं होती थी । सुश्रुत एवं पुनर्वसु के समय में प्रसव के लिये जब कि नारियों का अधिकार माना है तब बस्तिकर्म के लिये भी नारियों का अधिकार मानना उचित है । ११४, ११५।

गर्भाशयविशुद्धयर्थं स्नेहेन द्विगुणेन तु ।

गर्भाशय के शोधन के लिये स्नेह की मात्रा दो गुनी (दो प्रसृत) लेनी चाहिये ।

क्वाथप्रमाणं प्रसृतं, क्षिया द्विप्रसृतं भवेत् ॥ ११६ ॥

कन्येतरस्याः, कन्यायास्तद्वद्वस्तिप्रमाणकम् ।

पुरुषों में क्वाथ की मात्र एक प्रसृत, प्रसूता या प्रसवरहित बड़ी आयु की स्त्री में दो प्रसृत मात्रा, अप्रसूता या गर्भग्रहण के अयोग्य एवं कन्या में (बारह वर्ष से कम) पुरुष के समान स्नेह की मात्रा अपने हाथ के माप से एक प्रसृत, बस्ति के शोधन के लिये लेनी चाहिये ॥ ११६ ॥

अप्रत्यागच्छति भिषगं बस्तावुत्तरसंज्ञिते ॥ ११७ ॥

भूयो बस्तिं निदध्यात् संयुक्तं शोधनेर्गुणेः ।

गुदे वर्ति निदध्याद्वा शोधनद्वयसंभूताम् ॥ ११८ ॥

प्रवेशयेद्वा मतिमान् बस्तिद्वारमर्थेषणीम् ।

पीडयेद्वाऽप्यधो नामर्बलेनोत्तरमुष्टिना ॥ ११९ ॥

आरुणवधस्य पत्रेस्तु निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ।

कुर्याद्गोमूत्रपिष्टेषु वर्तौर्षोपि ससैन्यवाः ॥ १२० ॥

सुदुर्गौलासर्वपसमाः प्रविभज्य वर्यासि तु ।

बस्तेरागमनार्थाय ता निदध्याच्छलाकया ॥ १२१ ॥

आगारभूमबृहतीपिप्पलीफळसैन्यवैः ।

कृता वा शुक्तगोमूत्रसुरापिष्टैः सनतारैः ॥ १२२ ॥

अनुवासनसिद्धिं च बोध्यं कर्म प्रयोजयेत् ।

उत्तर बस्ति के बापिस न आने पर वैद्य त्रिवृत्त आदि संशोधनीय द्रव्यों से मिली बस्ति को देवे । अथवा शोधन द्रव्यों से बनी गुद में बस्ति बरते । अथवा बस्तिद्वार (मूत्र मार्ग में) ऐषणी प्रविष्ट करे । अँगूठे को अन्दर रखकर बाँधी मुड़ी से नामि के नीचे जोर से दबाये । अमलतास के पत्ते, सम्भाळु का स्वरस, गोमूत्र और सैन्य इनको पीसकर-वय के अनुसार मूंग, इलायची का दाना, सरसों के बराबर बस्ति बनाकर शलाका की सहायता से मूत्र मार्ग में रखे, जिससे बस्ति आ जाये । घर का धुंवासा, कटेरी, पिप्पली, मेनफल, सैन्य, इनसे शुक्त, गोमूत्र और सुरा में पीसकर बनाई बस्ति बरते । अनु-वासन चिकित्सा में जो बस्ति लौटाने के विधान आदि कहा है, वह भी करे ।

वक्तव्य—बस्तिमार्गशतादूर्ध्वं प्रत्यागच्छति । अनागच्छति वर्ति पायो नाले निदध्यात् ॥ मूत्रमार्ग में बस्ति या मूत्र को लाने के लिये कर्पूर का कण भी रखते हैं । बस्ति को छाया में सुखाकर घी से चिकना करके मूत्रमार्ग में रखना चाहिये ॥

शर्करामधुमिश्रेण शीतेन मधुकाश्चुनूना ॥ १२३ ॥

दह्यमाने तदा बस्ती दद्याद्वस्ति विचक्षणः ।

क्षीरवृक्षकषायेण पयसा शीतलेन च ॥ १२४ ॥

बस्ति में यदि जलन होती हो तो, मुलेहटी के शीतल कषाय में शर्करा और मधु मिलाकर बस्ति देवे । अथवा त्र्यघ्रोषादि-गण के शीतल कषाय में दूध मिलाकर बस्ति देवे ।

वि० मन्तव्य—यह बस्ति—मूत्रकच्छ, मूत्राघात (सुजाक-गनोरिया में भी बहुत लाभ करती है बहुशोऽनुभूत है । २ तोला मुलेहटी को ४० तोला जल में अधोविशिष्ट क्वाथ करे और स्वच्छ खण्ड या मिशरी २ तोला, मधु २ तोला मिलाकर उत्तर बस्ति देवे । प्रदर रोग में इसी को बस्ति भग में देवे ॥

शुक्तं दुष्टं शोणितं चाङ्गानानां

पुष्पोद्भेकं तस्य नाशं च कष्टम् ।

मूत्राघातान्मूत्रदोषान् प्रवृद्धान्

योन्तव्याधि संस्थितिं चापरायाः ॥ १२५ ॥

शुक्रोत्सेकं शक्रारामरमरीं च

शूलं वस्तीं वृद्धिं मेहेने च ।

घोरानन्थान् बस्तिजर्त्राधि रोगान्

हिंत्वा मेहानुत्तरो हन्ति बस्तिः ॥ १२६ ॥

दूषित शुक्र को, स्त्रियों के दूषित आर्त्तव को, रज की अधिकता को, रजोताश को, रजः कष्ट को, मूत्रघात को, बड़े हुए मूत्र दोषों को, योनिव्याधि को, अपरा की रक्तावट को, शुक्र के उत्सेक को, शर्करा को, अश्रमी को बस्ति-वंक्षण, मेहन

५४०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३८ ]

के शूल को, बस्ति जन्म अन्य भयानक रोगों को प्रमेहों को छोड़कर उत्तरबस्ति नष्ट करती है।

वि० मन्तव्य—जो बस्ति कषाय, क्षार एवं स्नेह मिलाकर दी जाती है वह निरुहण और जो केवल स्नेह (एरण्ड तैल आदि) से दी जाती है वह अनुवासन कहलाती है और उत्तर बस्ति निरुहण भी होती है और अनुवासन भी। उत्तरबस्ति प्रमेह रोग में नहीं दी जाती शेष-शुक्रदोष एवं रजोविकार आदि, मूत्राशय एवं गर्भाशय के सभी विकारों में दी जाती है ॥

सम्यग्दत्तस्य लिङ्गानि व्यापदः क्रम एव च ।

बस्तेरुत्तरसंज्ञस्य समानं स्नेहवस्तिना ॥१२०॥

उत्तरबस्ति के सम्यग् योग के लक्षण, हानियाँ और उनकी चिकित्सा सब स्नेहबस्ति के समान है ॥१२०॥

इति श्री सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थानेऽनुवासनोत्तरबस्ति-चिकित्सितं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥१३॥

अष्टत्रिंशतमोऽध्यायः

अथातो निरुहक्रमचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे निरुह क्रम चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—निरुहण बस्तियों द्वारा मलाशय का शोधन किया जाता है परन्तु उसके जो योग इस अध्याय में लिखे गये हैं उनके द्वारा वे सब कार्य होते हैं जो मुखमार्ग से औषध देने पर होते हैं। सच यह है कि शरीर में सर्वत्र वात, पित्त एवं कफ अपना २ कार्य सर्वदा करते हैं इसलिये मलाशय में भी पहुँचाई गई औषधियों का पाचन हो जाता है। यही नहीं, त्वचा पर लेपन, अम्लक आदि के रूप में लगाई गई औषधियों का भी पाचन होता है इसलिये बस्तियों तथा लेप आदि में वे ही द्रव्य प्रयुक्त होते हैं जो खाने की औषधों—आहारों में प्रयुक्त होते हैं ॥१,२॥

अथानुवासितमास्थापयेत् ; स्वभ्यं कश्चिन्नशरीरमुत्सृष्टवहिर्वेगमवाते शुचौ वेदमनि मध्याह्ने प्रततायां शय्यां-यामधःसुपरिग्रहायां श्रोणिप्रदेशप्रतिन्युहायामनुपधानायां वामपार्श्वशायिनमाकुञ्जोतदक्षिणसकथितरप्रसारितस-कियं सुमनसं जीर्णोन्नं वायव्यं सुनिषण्णदेहं विदित्वा, ततो वामपादस्योपरि नेत्रं कृत्वेतरपादाकुष्ठाकुलिभ्यां कर्णिकासुपरि निष्पीड्य, सज्यपाणि कनिष्ठिकानामिकाभ्यां बस्तेर्मुखार्धं सङ्कोच्य, मध्यमाप्रदेशिन्यकुष्ठैरधं तु विवृता-स्यं कृत्वा, बस्तावौषधं प्रक्षिप्य, दक्षिणहस्ताङ्गुष्ठेन प्रदे-जिनीमध्यमाभ्यां चानुसिक्तमनायतमबुद्धुदुदमसंकुचित-मवातमौषधासन्नमुपसंगृह्य, पुनरुपरि तदितरेण गृहीत्वा

दक्षिणेनावसिञ्चेत्, ततः सूर्येणैवौषधान्ते द्विखिर्वाससे-ष्ट्य बन्धीयात्, अथ दक्षिणेनोत्तानेन पाणिना बस्ति गृहीत्वा वामहस्तमध्यमांगुलिप्रदेशिनीभ्यां नेत्रमुपसंगृ-ह्णाङ्गुष्ठेन नेत्रद्वारं पिधाय, घृताभ्यक्तामनेत्रं घृताक्तगुदाय प्रयच्छेदनुपुष्टवृंशं सममुन्मुखमाकर्णिकं नेत्रं प्रणिधत्स्वेति ब्रूयात् ॥२॥

बस्ति सन्धे करे कृत्वा दक्षिणेनावषोडयेत्।

एकेनैवावषोडेन न दुतं न विलम्बितम् ॥४॥

ततो नेत्रमपनीय त्रिगन्मात्राः पीडनकालादुपेक्ष्योत्ति-ष्टेत्यातुरं ब्रूयात्। अथातुरमुपवेशयेदुत्कुरुकं बस्त्यागम-नार्थाम्। निरुहप्रत्यागमनकालस्तु मुहूर्तां भवति ॥५॥

अनेन विधिना बस्तिं दद्याद् बस्तिविशारदः।

द्वितीयं वा तृतीयं वा चतुर्थं वा यथार्थतः ॥६॥

अनुवासन दिये हुए व्यक्ति को आस्थापना (निरुह) बस्ति देनी चाहिये। इसके लिये रोगी को भली प्रकार स्नेहन और स्वेदन कराके, मलमूत्र का त्याग कराके, वायुरहित, पवित्र घर में मध्याह्न समय में-विस्तृत चौड़ी बिछाई नीचे (पैरों की ओर) भली प्रकार पकड़ने योग्य, कटि प्रदेश की ओर ऊँची बिना सिरहाने की शय्या पर रोगी को वामपार्श्व से लेटायें। रोगी की दक्षिण टांग सिकोड़कर वाम टांग फैलाकर—प्रबल मन, अब्र जीर्ण होने पर, मौन रखकर, शिथिल शरीर हुआ जान-कर, बायें पैर के ऊपर बस्तिनेत्र को करके, दूसरे दक्षिण पैर के अँगूठे और अँगुली से बस्ति को कर्णिका के ऊपर दबाकर बायें हाथ को कनिष्ठका और अनामिका से बस्ति के मुख के आधे भाग को दबाकर, मध्यमा, प्रदेशिनी और अङ्गुठे से आधेमुख को खुला रखकर, बस्ति में औषध डालें। दक्षिण हाथ के अँगूठे से, प्रदेशिनी और मध्यमांगुली से, ठीक प्रकार से (ऊपर से न बहे ऐसा करे) रखते हुए, बहुत फैलाकर नहीं, बुलबुले रहित, बिना सिकोड़े, वायु के बिना (औषध डालकर वायु निकाले), औषधि के पास पकड़े। फिर वाम हाथ से इस को पकड़कर, दक्षिण हाथ से इसमें से थोड़ी औषधि निकालें। फिर औषध की समाप्ति पर धागे से दो तीन लपेटे देकर नेत्र पर बांध दें। फिर दक्षिण हाथ को चित्त-सीधा करके बस्ति को पकड़कर बायें हाथ की मध्यमांगुली और प्रदेशिनी से नेत्र को थामकर, अङ्गुठे से नेत्र का मुख बन्द रखकर, नेत्र के अप्रभाग पर घी लगाकर, घी से गुदा को स्निग्ध करके पुष्टवृंश के साथ साथ, समान, मुख को ऊपर रखकर, कर्णिका पर्यन्त नेत्र को रोगी अन्दर प्रविष्ट करे। बस्ति को बायें हाथ में थामकर दक्षिण हाथ से एक ही दबाव में दबायें। न तो जोर से दबायें और न धीरे दबायें, फिर नेत्र को निकालकर बस्ति देने से लेकर तीस मात्रा कालतक प्रतीक्षा

अ० ३८ ]

चिकित्सास्थानम्

४४१

करै । फिर रोगी को खड़ा होने के लिये कहे । रोगी को ऊकड़ विठाये, जिससे बस्ति बाहर आ जाये । निरुद्ध के वापिस आने का समय सुहूर्त (दो बटिका) होता है । बस्ति को जाननेवाला वैद्य इस प्रकार से बस्ति को देवे । प्रयोजन की अपेक्षा से दो, तीन या चार बस्ति देवे ।

वक्तव्य—मात्रा, “यावत्सर्पति हस्ताग्रं दक्षिणं जानुमण्डलं । निमेषोन्मेषकालो वा सा मात्रा परिकीर्त्तिता ॥

(२) जानुमण्डलमावेष्य दत्ते दक्षिणपाणिना । कृष्टनेत्रछ-टाशब्दं शर्तं तिष्ठते वेगवान् ॥ यह समय बस्ति की प्रतीक्षा का कहा है । यह क्रूर कोष्ठ की अपेक्षा से है ॥३-६॥

सम्यङ्निरुद्धलिङ्गे तु प्राप्ते बस्ति निवारयेत् ।

भली प्रकार बस्ति देने के लक्षण उत्पन्न हो जाने पर निरुद्ध बस्ति देना बन्द कर देवे ।

विशेषात् सुकुमारणां हीन एव क्रमो हितः ॥७॥

अपि हीनक्रमं कुर्यान्न तु कुर्यादतिक्रमम् ।

कोमल प्रकृति पुरुषों में निरुद्ध बस्ति कम मात्रा में देवे । भले ही कम बस्ति देवे, परन्तु अधिक मात्रा में कभी भी बस्ति न दे ॥७॥

यस्य स्याद्द्विस्तिरल्पोऽल्पवेगो हीनमठानिलः ॥८॥

दुर्निरुद्धः स विज्ञेयो मूत्रार्थरुचिजाड्यवान् ।

जिसमें बस्ति कम हो, वेग अल्प हो, मल और वायु कम हो, उसे भली प्रकार निरुद्ध नहीं हुआ जानना चाहिये । इसको मूत्र की पीड़ा, अरुचि, जड़ता रहती है ॥८॥

यान्येव प्राङ्मयोत्कानि लिङ्गान्यतिविरेचिते ॥९॥

तान्येवातिनिरुद्धेऽपि विज्ञेयानि विपश्चित्ता ।

अतिविरेचन के जो लक्षण मैंने पहले कहे हैं, वे ही लक्षण बुद्धिमान् को अतिनिरुद्ध में समझने चाहिये ॥९॥

यस्य क्रमेण गच्छन्ति विट्पित्तकफवायवः ॥१०॥

छाघर्ष चोपजायेत सुनिरुद्धं तमादिशेत् ।

जिस रोगी में क्रमशः मल, पित्त, कफ और वायु निकलते हैं, शरीर में हल्कापन आता है उसे भली प्रकार से निरुद्ध हुआ जानें ।

प्रसूष्टविण्मूत्रसमीर्यात्वं कव्यगनिबृद्धयाशयलामवानि । रोगोपशान्तिः प्रकृतिस्थिता च, बलं च तत्स्यात् सुनिरुद्धलिङ्गम् । चरक० सि० अ० १ ॥४१॥

चरक में—“बस्ति ततः सव्यकरे निधाय सुबद्धमुच्छुवास्थ च निर्ण्यलीकम् । अंगुष्ठमध्यने मुखं पिधाय नेत्राग्रसंस्थापमपनीय-वर्त्तिम् ॥ तैलाकृत्तान् कृतमूत्रविट्कं नातिद्वुधात् शयने मनुष्यम् । समेऽथवेपन्नतशीर्षके वा नाल्युच्छित्ते स्वास्तरणोपपन्ने ॥ सव्यने पार्श्वेन मुखं शयानं कृतवृजुदेहं स्वभुजोपधानं । निकुञ्ज्य सव्य-

तरदस्य सक्रिय वामं प्रसार्य प्रणयेत्तत्तस्मत् ॥ स्तिग्धे गुदे नेत्र-चतुर्थभागं स्तिग्धं शनैः मुदु ऋद्धु पृथ्वंशम् ॥ अकभनावेपन-लाघवादीन्याणयोः गुणांश्चापि हि दशस्थंस्तम् । प्रपीड्य चैकग्रह-णेन, दत्तं, नेत्रं शनैरेव ततोऽपवर्षत् ॥ च० सि० अ० ३॥१०॥

सुनिरुद्धं ततो जन्तु स्नातवन्तं तु भोजयेत् ॥११॥

पित्तश्लेष्मानिलाविष्टं क्षीरयुषरसः क्रमात् ।

सर्वं वा जाङ्कलरसैर्भोजयेद्विकारिभिः ॥१२॥

त्रिभागहीनमर्धं वा हीनमात्रमथापि वा ।

यथाग्निदोषं मात्रेणं भोजनस्य विधीयते ॥१३॥

अनन्तरं ततो युक्त्याद्यथास्थं स्नेहबस्तिना ।

भली प्रकार निरुद्ध हो जाने पर रोगी को स्नान कराके भोजन देवे । पित्तवाले को दूध से, कफवाले को यूप से और वायुवाले को मांस रस के साथ भोजन देवे । अथवा सबको ही विकार न करनेवाले जांगल मांस रस के साथ भोजन दे । भोजन की मात्रा, अग्नि एवं दोष के अनुसार प्रतिदिन के भोजन से है भाग कम या इससे भी कम हो । इसके पीछे दोषों के अनुसार स्नेह बस्ति देवे । चरक में—“रसेन वाते प्रति-भोजने स्यात्क्षीरेण पित्तं तु कफं च यूषैः ॥११-१३॥

विविक्ता मनस्तुष्टिः स्तिग्धता व्याधिनिग्रहः ॥१४॥

आस्थापनस्नेहवस्त्योः सम्यग्दाने तु लक्षणम् ।

आस्थापन और स्नेहबस्ति के भली प्रकार देने पर सम्यग् अवधारण (विवेकबुद्धि) शक्ति, मन की प्रसन्नता, स्तिग्धता और रोग की शान्ति होती है ॥१४॥

तदहस्तस्य पवनाद्भ्रयं बलवद्विष्यते ॥१५॥

रसोदनस्तेन शस्तस्तदहन्नानुवासनम् ।

निरुद्ध देने के दिन वायु के कोप का बहुत भय रहता है, इसलिये मांसरस से मात देवे और उसी दिन अनुवासन देवे ॥

पश्चाद्गन्तिबलं मत्वा पवनस्य च चेष्टितम् ॥१६॥

अन्तोपस्तम्भिते कोष्ठे स्नेहबस्तिविधीयते ।

फिर अग्निबल को देखकर, वायु की गतिविधि जानकर, अन्न से कोष्ठ में सहारा हो जाने पर स्नेहबस्ति देनी चाहिये ॥

अनायान्तं मुहूर्तात् निरुद्धं गोधनैर्हरेत् ॥१७॥

तीक्ष्णैर्निरुद्धैर्भतिमान् क्षारमूत्रास्त्वसंयुतैः ।

एक मुहूर्त प्रतीक्षा करने पर यदि निरुद्ध, बस्ति वापिस नहीं आये, तब त्रिदुष्तादि शोधन एवं तीक्ष्ण निरुद्धों में यव-क्षार, गोमूत्र, कांजी मिलाकर देवे, इनसे उसे बाहर करे ॥१७॥

विगुणान्तलिङ्गवन्धं चिरं तिष्ठन्निरुद्धणम् ॥१८॥

शूलात्तिञ्चरानाहान्मरणं वा प्रवर्तयेत् ।

विपरीत गतिमान् वायु से रुका हुआ निरुद्ध, दैर्यक रुक जाता है । इससे शूल, आनाह, बेचैनी, ज्वर या मृत्यु भी हो जाती है ॥१८॥

१४२

मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ३८ ]

न तु मुक्तवतो देयमास्थापनमिति स्थितिः ॥१९॥ विमुचिका वा जनयेच्छर्दि वाऽपि सुदारुणम् । कोपयेत् सर्वदोषान् वा तस्मादद्यादभोजिते ॥२०॥ भोजन करने पर आस्थापन नहीं देना चाहिये, यह सिद्धान्त है। ऐसा न करने से या तो विमुचिका होती है, या भयानक बमन होता है। अथवा सब दोषों को निरुद्ध कुपित कर देता है, इसलिये भोजन न किये हुए को निरुद्ध देवे ॥ जीर्णोन्मत्त्याशये दोषाः पुंसः प्रव्यक्तिमागतः । निःशेषाः सुखमायान्ति भोजनेनाप्रपीडिताः ॥२१॥ न वाऽऽस्थापनविक्षिप्तमन्तमग्निः प्रधावति । तस्मादास्थापनं देयं निराहाराय जानता ॥२२॥ आवस्थिकं क्रमं चापि बुद्ध्वा कार्यं निरुहणम् । मल्लेऽपकृष्टे दोषाणां बलवत्त्वं न विद्यते ॥२३॥ अन्न के जीर्ण होने पर आशय (पकाशय) में वातादिदोष स्पष्ट हुए होने से—भोजन के कारण से न दवे होने पर सम्पूर्ण रूप में शान्त हो सकते हैं। अथवा आस्थापन से विक्षिप्त बनी अग्नि अन्न की ओर नहीं दौड़ती। इसलिये जाननेवाला बिना भोजन किये हुए में आस्थापन देवे ॥ आवस्थिक (अवस्थानुसार) विधि को समझकर भी निरुद्ध देना चाहिये। क्योंकि मल के निकल जाने पर दोषों का बल कम हो जाता है ॥२१-२३॥ क्षीराण्यम्लानि मूत्राणि स्नेहाः क्वाथा रसास्तथा । लवणानि फलं क्षौद्रं शताह्वा सषं पंच वा ॥२४॥ एता त्रिकटुकं रास्ता सरलो देवदारु च । रजनी मधुकं हिङ्कु कुष्ठं संशोघनानि च ॥२५॥ कटुका शर्करा मुस्तमुगौरं चन्दनं शटी । मज्जिष्ठा मदनं चण्डा त्रायमाणा रसाळजनम् ॥२६॥ बिल्बमध्वं यवानो च फलिनी शकजा यवाः । काकोली क्षीरकाकोली जीवकषभकावुभौ ॥२७॥ तथा मेदा महामेदा ऋद्धिर्दुष्टिर्मधूलिका । निरुहेषु यथालाभमेष वर्गो विधीयते ॥२८॥ दूध, अम्ल, मूत्र, स्नेह, क्वाथ, मांसरस, लवण, त्रिफला, मधु, रौप, सरसों, बच, इलायची, सोंठ, मरिच, पिप्ली, रास्ता, चौड, देवदार, हल्दी, मुलैहठी, हींग, कूट और त्रिवृत्त आदि संशोघन, कुटकी, शर्करा, मुस्ता, खर, चन्दन, कचूर, मजीठ, मैनफल, चण्डा (गठोना), त्रायमाण, रसौत, बिल्ब का गूदा, अजवायन, प्रियंगु, इन्द्रजो, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, ऋद्धि, दुष्टि, मधूलिका इनमें से जो मिल सके उनका निरुद्धों में उपयोग करे ॥ स्वस्थे क्वाथस्थ चत्वारो भागाः स्नेहस्थ पञ्चमः । कृद्धेऽनिले चतुर्थस्तु षष्ठः पित्ते कफेऽष्टमः ॥२९॥

सर्वेषु चाष्टमो भागः कल्कानां लवणं पुनः । क्षौद्रं मूत्रं फलं क्षीरमम्लं मांसरसं तथा ॥३०॥ युक्त्या प्रकल्पयेद्द्वीमान् निरुहै कल्पना त्रिवयम् ॥३१॥ स्वस्थ अवस्था में क्वाथ के चार भाग और पाँचवाँ भाग स्नेह, वायु क्रोप में स्नेह चौथा भाग, पित्त में छठा भाग और कफ में स्नेह का आठवाँ भाग होना चाहिये। सब निरुद्धों में कल्क का आठवाँ भाग होना चाहिये। लवण, मधु, मूत्र, मैनफल, दूध, कांजी, मांसरस इनको बुद्धिमान् युक्ति से मिलाये। वक्तव्य—मधुस्नेहेनकल्कात्यकषाया वापतः क्रमात्। त्रीणि षड्द्रादशत्रिणि पलान्यनिलरोगिणाम् ॥ पित्ते चत्वारि चत्वारि द्वे द्विपंच चतुष्टयम्। षट्त्रिणि द्वे दशत्रिणि कफे चापि निरुहणम् ॥ चरक में—भागाः कषायस्य तु पंचपित्ते स्नेहस्य षष्ठः प्रकृतौ स्थिते च। वाते विरुद्धे तु चतुर्थभागो मात्रा निरुहेषु कफेऽष्टभागः ॥ चरक ॥२६-३१॥ कल्कस्नेहेकषायाणामत्रिवेकाद्विष्वरैः। वस्तेः सुकल्पना मोक्ता तस्य दानं यथार्थकृत् ॥३२॥ कल्पनाविधि—कल्क, स्नेह, और कषाय ये सब मिलकर एक हो जायें, यह कल्पना वैद्यों ने बताई है। वस्ति की सुकल्पना बनाकर उसका देना यथार्थ फलदायक है। वक्तव्य—न धावत्यौषधं पाणि न तिष्ठत्यावलप्य च। न करोति च सीमन्तं स निरुहः सुयोजितः ॥३२॥ द्रव्याऽऽदौ सैन्धवस्याक्षं मधुनः प्रसूतद्रव्यम्। पात्रे तलेन मथनीयात्तद्भ्रन् स्नेहं शनैः शनैः ॥३३॥ सम्यक् सुमथिते दद्यात् फलकल्कमतः परम्। ततो यथोचितान् कल्कान् भागैः स्वेः रलक्षणपेक्षितान्। गम्भीरे भाजनेऽन्यस्मिन्मथनीयात्तं खजेन च। यथा वा साधु मन्येत न सान्द्रो न तनुः समः ॥३४॥ रसक्षीराम्लमूत्राणां दोषावस्थामवेक्ष्य तु। कषायप्रसूतान् पञ्च सुपूतास्तत्र दापयेत् ॥३६॥ प्रथम सैन्धव एक कर्ष मात्रा में डाले, मधु दो प्रसूत मिलाकर पात्र में इनको हाथ से खूब मथे। मथने पर तैल धीरे धीरे मिलता जाये। भली प्रकार मथे जाने पर मैनफल का कल्क इसमें मिलाये फिर पीछे से कहे हुए दूसरे कल्कों को बारीक पीसकर मिलाये। इस सब को अब एक बड़े गहरे पात्र में डालकर मन्थन दण्ड से मथे। अथवा जैसे ठीक समझे, वैसे मथे। यह न तो बहुत घट्ट होना चाहिये और न पतला, अपितु समान रहना चाहिये। दोषों की अवस्था देखकर मांसरस, दूध कांजी, मूत्र मिलाये। इसमें भली प्रकार छाना हुआ कषाय पाँच प्रसूत मिलाये। वक्तव्य—अन्यत्र “माक्षिकं लवणं स्नेहं कल्कं क्वाथमिति क्रमात्” यह क्रम कहा है। चरक में—पूर्व हि योज्यं मधुस्नेहं

कापा नवि. 6

को चि-क्त क निःम

क य, "को गरि तिरे कीर

=

न यो न

1

|

| ॑ |

|

नि

चिकित्सास्थानम्‌ वाभ्यां स्नेहं विनिर्मथ्य ततोऽनुकल्कम्‌ । विमथ्य संयोज्य पुन-,

अ० ३८ |

्रवैस्तद्वस्तौ नि दध्यात्मथितं खजेन ॥ “ख्वण का परिमाण

मात्रा मं रखना चाहिये, अन्यथा दाह ओर अतिखार करता है ॥२३-३६॥

अत ऊध्वं द्वादशप्रस्तान्‌ वद्यामः-- दत्वाऽऽदो सेन्धवस्याक्षं मधुनः प्रखतिद्धयम्‌ | विनिमथ्य ततो दद्यात्‌ स्तेहस्य प्रसृतित्रयम्‌ ॥३५॥ एकोभूते ततः स्नेहे कल्फस्य प्रसतिं क्षिपेत्‌ । संमूच्छिते कषायं तु चतुःप्रसदिसंमितम्‌ ॥(२९॥ वितरेच्च तद्ावापमन्ते द्विप्रसतोन्मितम्‌ एवं प्रकल्पितो वस्तिद्धोदशप्रसतो भवेत्‌ ॥२९॥ ज्येष्ठायाः खलु मात्रायाः प्रमाणमिदमीरितम्‌। अपहासे भिषक्ङुयात्तहत्‌ प्रसृतिहापनम्‌ ॥४०॥ यथावयो निरूहाणां कस्पनेयमुदाह्ृता ।

सेन्धवादिद्रवान्तानां सिद्धिकामेमिषग्बरेः ॥४९॥

इसके आगे बारह प्रसृतवाले निरूहो को कहेगे- प्रथम सेन्धव एक कष, मधु दो प्रसृत (चार पल), इनको मिल]कर इसमे स्नेह तीन भ्रसृत मिलाय । जब स्नेह मिख्कर एक हो

जाये तव इसमे कल्क एक प्रसृत मिलाये । मिलकर एक हो जाने

पर कषाय चार प्रसृत मिखये । पीछे से इसमे प्रर्तेप दो प्रसृत

मिलाये । इस प्रकार बनाने से बस्ति वदरा प्ररत की बनती

हे । यह मात्रा शरेष्ठ बस्ति की उत्तम मात्रा दै। घटाने मे वेय

इसमे एक एक प्रसृति वय के अनुखार षटाये। सिद्धिकौ

सफर्ता चाहनेवाला वैद्य सैन्धव से ठेकर कषाय पयन्त द्रव्यो

मे इसी अनुपात मे कमी करे । चरक मे-निरूहमात्रा प्रसृताधमाये वपं ततोऽधप्रसृता-

भद्विः । आद्रादशास्स्यात्‌ प्रसृतामिद्द्िरशदशाद्‌ द्वादशतः

पर्‌ स्यु" । आससतेरु्तमिदं प्रमाणमतःपरं षोडशवद्‌ विधेयम्‌ ॥ निरुदमान्ना परसृतप्रमाणा बाले च बधे च मदुविंशेषः ॥२७.४२१॥

अत ऊध्वे' प्रव्यन्ते बस्तयोऽत्र बिभागञ्जः। यथादोषं प्रयुक्ता ये हन्युनोनाविधान्‌ गदान्‌ ॥४२॥

इसके आगे प्रथग्‌ सूप म बस्तर्यों को कहते ह। ये

बस्तियां रोग एवं दोघ के अनुसार दी जाने पर नाना प्रकार

के रोगो को नष्ट करती ह ॥४२॥

रस्पाकोरुबुवषौभूवाजिगन्धानिशाच्छदः ।

पञ्चमूखीवरारास्नागृड चाुरदारुभिः ||४३॥

कथितेः पाक्किरेभिमेदनाष्टकसंय॒तेः। _ .

कल्केमागधिकाम्भोदहपुषामिसिसेन्धवेः ९ .॥ वत्साह्यप्रियंगूप्रायश्टयाह्यरसाञ्ञनेः। दयादार्थापनं कोष्णं क्षौद्रायेरभिखस्छृतम्‌ ॥४५॥

। ५८४१

परोरुत्रिकशूलाश्मविण्मूत्रानिरसङ्किनाम्‌ । ग्रहणीमारुतार्शोषनं रक्तमांसवटप्रदम्‌ ॥४६॥।

अमलतास, एरण्ड, पुननवा, अजवायन्‌, शटी, वृहयं च￾मृक, बरा, रास्ना, गिखोय, देव दाङ इन द्रव्यो को सोद पठ

लेकर ( चार मेनफठ से एक पल वनता दै )- एक सौ अद्धा्स पर पानी में क्वाथ करके, छानकर बत्तीस पर व चाये | इसे से आठ पल लेकर पिप्पली, मुस्ता, दाऊबेर, सफ, सेन्धव,

इन्द्रजो, प्रियंगु, मुेहटी, वच, रसौत इनका कल्क मिखये | मधु, क्वण आदि से संस्छृत करके सुहाता हआ गरम आस्था-

पन देवे । पीठ, ऊरू, भिकशुल, अश्मरी-मल-मूत्र-वायु के अवरोध, ग्रहणी, वायु-अशं को नष्ट करता दै, रक्त-मांख तथा

चर देताहे। (क्वाथमेसे आठ पलल, शेष क्वाथको

दुसरी या तीसरी बार के श्ये रख लेवे-डल्दण ) ॥४२-४६॥

गुड़ चीत्रिफारास्तादशमूख्वरापलेः । कथितः श्छदर्णापष्टस्तु प्रियज्खघन पैन्धवेः ॥४७॥

जतपुष्पावचाकरष्णायवानीकुषएबिल्वजेः |

सगुडरक्षमात्रस्तु मदनाधेपडान्वितेः ॥४०॥ छ्षोद्रतेखधृतक्षोरशयुक्तकाञ्ञिकमस्तुभिः।

समालोड्य च मूत्रेण दयादास्थापनं परम्‌ ॥४<॥

तेजोबणेबरोत्साह वोयोग्निप्राणवधंनम्‌ ।

सवेमारुतरोगष्नं वथःस्थापनमुत्तमम्‌ ॥५०॥

गिलोय, त्रिफला, रासना, दशमूर, बला ये सोकह्‌ द्रव्य,

ओर मांख (इन द्रव्यं के बरार) द्रञ्य एक एक पठ ओर मांस

सोलह पल लेकर एक सो कत्तीस य पानी मे क्वाथ करे। चतुर्थांश रहने पर छानकर इसमे एक पुटक के किए आठ

पल टेकर, प्रियंगु, सुस्ता, सेन्ध्र, सोर, बच, पिप्पली, अज￾वायन, कूट, विल्व, इनका बारीक कल्क, ओर गुड़ एक एक्‌ अक्ष मिलाकर इसमे मेनफल आधा पल, मधु, घी, दूष, शुक्त,

कांजी, मस्तु आर मूर इन सबको घोठकृर आस्थापन देवे ।

यह निरूह तेज, वणे, बर, उत्साह, वीयं, अग्नि ओर प्राण को

दाने मे श्रेष्ठ है । सव वात रोगोंको नष्ट करता है। वय को

स्थिर रखने मे उत्तम हे ॥ ७-५०॥ कुशादिपद्चमूखाञ्दत्रिफरोतपर्वासकेः ।

सारिवोीरमजिजष्ठारास्नारेणुपरूषकेः॥५९॥ पाटिकिः कथितेः सस्यग्‌ द्रग्येरमिश्च पेषितेः।

टकास्मगुपरभकेसरारुरुचन्दनैः ॥५२॥ सिः |

परपद्यकयश्टयाहेः क्षो द्रक्षीरघृताप्ठुतेः ॥५२॥

द्त्तमास्थापं शीतमम्छदीनेस्तथा द्रवः ।

दाहास ग्द्रपित्तासुकपित्तगुरमञ्वराञ्जयेत्‌ ॥५४॥

ङः काश, नङ; द्गः इछ, मुस्ता, जनिफला, नीलकमल अ ¢ अद्धा; साख, खस? मजीठ, रास्ना, रेणु (पष्क), काक

"+ (र

इ [५ १५ =, कनै ९. । 9. = न = ना, ।

४४

मुश्रतसहिता

[ ३० ]

इनको एक-एक पल लेकर क्वाथ करे । इसमें सिंधाड़ा, कौंच, नागकेसर, अगह, चन्दन, विदारी, सौफ, मजीठ, निशोध, इन्द्रजो, सैन्धव, मैनफल, पद्माल, मुलेहठी इनका बारीक पिसा करूक, मधु, दूध, घी इनको घोलकर बनाये आस्थापन को शीतल होने पर देवे । इसमें कांजी आदि खट्टे द्रव्य न मिलाये । यह दाह, रक्तप्रदर, पित्तरक्त, भित्तगुल्म और ज्वर को नष्ट करता है ॥५१-५४॥

रोध्रचन्दनमझिछाटारान्तानन्तावलधिभिः । सारिवावृषकारमयमेदामधुकपदमकैः ॥५५॥

स्थिरादितृणमूलैश्च क्वाथः कर्षत्रयोन्मितः । पिष्टैर्जीवककाकोलीयुर्गधिमधुकोत्पलैः ॥५६॥

प्रपौण्डरीकजीवन्तीमेदारेणुरूपकैः । अभोरुमिसिसिन्धुस्थवत्सकोगीरपदमकैः ॥५७॥

कसेरुशर्करायुक्तः सर्पिमधुपयप्लुतैः । द्रवैस्तीक्ष्णाम्लवज्यैश्च दत्तो बस्तिः सुश्रीतलः ॥५८॥

गुल्मासुरदरहृत्पाण्डुरोगान् सविषमज्वरान् । असूकृप्तितातिसारो च हन्यापित्तकृतान् गदान् ॥५९॥

लोघ, चन्दन, मजीठ, रास्ता, सारिवा, बला, ऋद्धि, कालीसारिवा, अडूसा, गम्भारी, मेदा, मुलेहठी, पद्माल, लघुपंचमूल, पंचतृणमूल, प्रत्येक तीन कर्ष इनका क्वाथ, जीवक, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि, मुलेहठी, नीलाकमल, प्रपौण्डरीक (कमल) जीवन्ती, मेदा, पपटक, फालसा, शतावरी, सैन्धव, इन्द्रजो, खस, पद्माल, कसेरु, इनका करूक, शर्करा तीनपल, घी, मधु, दूध में इनको घोलकर तीक्ष्ण एवं अम्ल द्रव्यों को छोड़कर बनाई शीतल बस्ति देने पर गुल्म (रक्त या पित्त गुल्म) रक्तप्रदर, हृदयरोग, पाण्डुरोग, विषमज्वर, रक्त-पित्त, अतिसार और पित्तजन्य रोगों को नष्ट करती है ॥५५-५९॥

भद्रान्तिबकुलस्थार्ककोशातक्यमृतामरैः । सारिवावृहतीपाठामूर्वारंगवधवत्सकैः ॥६०॥

क्वाथः, कल्कस्तु कर्तव्यो वचामदन्तसर्पयैः । सैन्धवामरकुष्ठैलापिप्लीबिल्वनगरैः ॥६१॥

कटुतैलमधुक्षारमूत्रतैलाम्लसंयुतैः । कार्यमास्थापनं तूष्णं कामलापाण्डुमेहिनाम् ॥६२॥

मेदस्विनामनननानां कफरोगाग्नद्विषाम् । गल्लगण्डगरलानिर्झलीपदोदररोगिणाम् ॥६३॥

कटफल, नीम, कुलथी, आक, तुरई, गिलोय, देवदारु, सारिवा, कटेरी, पाठा, मूर्वा, अमलतास, इन्द्रजो इनका क्वाथ, बच, मैनफल, सरसो, सैन्धव, देवदारु, इलायची, कूट, पिप्पली, बिल्व, सौठ, इनका करूक, सरसो का तेल, मधु, यवक्षार, मूत्र, तैल, कांजी इनसे बनाया आस्थापन देने पर शीघ्र ही कामला, पाण्डु, प्रमेह को नष्ट करता है । मेदस्वी, अग्निमान्द्य रोगी, कफरोग से पीड़ित, भोजन में अरुचिवाले

गल्लगण्ड, गर, ग्लानि, श्लोपद और उदररोगियों के लिये उत्तम है ॥६०-६३॥

दशमूलीनिशाबिल्वपटोलत्रिफलाभरैः । कथितैः कल्कपिष्टैस्तु मुस्तसैन्धवदारुभिः ॥६४॥ पाठामागधिकेन्द्रहैस्तैलक्षारमधुप्लुतैः । कुर्यादास्थापनं सम्यङ्मूत्राम्लफलयोजितैः ॥६५॥ कफपाण्डुगदालस्यमूत्रमाश्रुतसंविनाम् । आमाटोपापचोरैलेषमगुल्मकुम्भिविकारिणाम् ॥६६॥ दशमूल, हल्दी, बिल्व, पटोल, त्रिफला, देवदारु, इनका क्वाथ, मुस्ता, सैन्धव, दारुहल्दी, पाठा, पिप्पली, इन्द्रजो इनका करूक, तैल, क्षार, मधु, मूत्र, खट्टे फल (विजौरा का रस) मिलाकर बनाया आस्थापन कफ, पाण्डुरोग, आलस्य, मूत्रावरोध, वायुरोध, आम, आधमान, अपची, कफगुल्म, कुम्भिरोगों को नष्ट करता है ॥६४-६६॥

वृषाडमभेदवर्षाभृधान्यगन्धर्वहस्तकैः । दशमूलबलामूर्वायवकोलतिग्राच्छदैः ॥६७॥ कुलस्थबिल्वभूमिन्मैवैः कवथितैः पलसंमितैः । कल्कैर्मदनयष्टचाहृषडग्रन्थामरसर्पयैः ॥६८॥ पिप्पलीमूलसिन्धुस्थवानीमिसिक्त्सकैः । क्षौद्रैच्छारोगोमूत्रसर्पितैलरसाप्लुतैः ॥६९॥ तूष्णमास्थापनं कार्यं संसृष्टबहुरोणिणाम् । गुग्ग्रीशकैराष्टीलातूनीगुल्मगदापहम् ॥७०॥

बासा, पाषाणमेद, पुनर्नवा, धनिया, एरण्ड, दशमूल, बला, मूर्वा, जो, वेर, शटी, कुलथी, बिल्व, चिरायता एक एक पल लेकर क्वाथ करे । मैनफल, मुलेहठी, बच, देवदारु, सरसो, पिप्पलीमूल, सैन्धव, अजवायन, सौफ, इन्द्रजो, इनको एक-एक पल लेकर इनका करूक, मधु, ईल का रस, दूध, गोमूत्र, घी, तैल, मांसरस घोलकर बनाया आस्थापन दोषों के संसर्ग एवं सन्नपातजन्य रोगों में देना चाहिये । इससे गुग्ग्रीश, शर्करा, अष्टीला, तूनी, गुल्मरोग नष्ट होते हैं ॥६७-७०॥

राक्षारगवधवर्षाभूकटुकोशैरवारिदैः । त्रायमाणामृतारत्तापञ्चमूलीभिर्भितकैः ॥७१॥ सबलैः पालिकैः क्वाथः कल्कस्तु मदनान्वितैः । यष्टचाहृमिसिसिन्धुस्थफलिनोन्द्रयवाहृयैः ॥७२॥ रसाञ्जन्तरसक्षौद्रद्राक्षासौवीरसंयुतैः । यत्को बस्तिः सुखोष्णोऽयं सांसुशुक्लबलोजसाम् ॥७३॥ आयुषोऽग्नेश्च संस्कृतां हन्ति चाशु गदानिमान् । गुल्मासुरदरवीसर्पमूत्रकृच्छ्रक्षतक्षयान् ॥७४॥ विषमज्वरमर्शासि ग्रहणी वातकुण्डलीम् । जानुजङ्घागिरोबस्तिग्रहोदावर्तमाश्रुतान् ॥७५॥ वातासूकशर्कराष्टीलाकुक्षिश्लोदराशुचीः । रक्तपित्तकफोन्मादग्रमेहाध्वमानहृदग्रहान् ॥७६॥ रास्ता, अमलतास, पुनर्नवा, कुटकी, खस, मुस्ता, त्राय-माण, गिलोय, मजीठ, बृहत्पंचमूल, बहेड़ा, बला, एक-एक

अण २८ ] ६€

॑ पठ लेकर क्वाथ करे । मेनफल, मुठेहटी, सौफ, सैन्धव, प्रियं,

1, +.

इ्द्रजौ, रखौत, मांसरस, मधु, द्राक्षा, सौवीर (काजी) इनको , मिलाकर दी गई गरम सुहाती वस्ति मांख, शुक्र, वल, ओज,

आयु, अग्नि को बद़ाती है ओर गुल्म, रक्तप्रद्र, वीसपं, मूर

कृच्छर, उरःश्चत, क्चय,विषमज्वर,अशं, ग्रहणी, वातक्रुण्डलिका को नष्ट करती हं । जानु-जंघा-शिर वस्ति का पकड़ा जाना, उद्‌ा-

वत्त, वायु, वातरक्त, खकरा, अष्ठीला, कुक्षिशू, उदर, अर्चि,

रक्तपित्त, कफोन्माद, प्रमेह, आध्मान, दूह को नष्ट करती दै ।

वक्तव्य-- यहा पर स्तेह नदीं कहा है, फिर भी मिलाना

चाहिये । यथा--स्नेहो गुडो मांसरसः पयांसि साम्छानि मून

मधु सेन्धवं च । एते निरूहैः विदुषा प्रयोज्याः -काथश्च कल्को

मदनात्‌ फर च ॥। हारीतः ।७१-७६।

वातष्नौषधनिष्क्वाथाः सेन्धव्रिबृतायुताः। साम्ाः सुखोष्णां योऽयाः स्यु बस्तयः कुपितेऽनिडे ॥

वायु के कुपित होने पर भद्रदाग्यादि वातघ्न ओषधि्यों के

क्वाथ में सेन्धव, निरोय, कांजी मिलाकर सुदहाती इद गरम बस्तियां देनी चादिये ॥७७॥

, ` न्यम्रोधादिगणक्वाथाः काकोस्यादिसमायुताः ।

विधेया बस्तयः पित्ते ससपिष्काः सञ्ञकंराः ॥७८॥ `

पित्त में न्यग्रोधादिगण के क्वाथ मे काकोल्यादिगण का कल्क, घी, ओर शकरा मिलाकर बस्तियां ( शीतल ) देनी

चाहिये ॥७८॥

आरग्बधादिनिष्क्वाथाः पिष्पल्यादिसमायुताः। सक्षोद्रमूत्रा देयाः स्युबेस्तयः कुपिते कफे ॥७६॥

कफ के कुपित होने प्र आरग्वधादि गणके क्वाथमें

पिपपल्यादिगण का प्रक्षेप देकर मधु ओर. गोमूत्र मिलाकर

हाती गरम बस्तियां देनी चादिये ॥७६॥

शकरेल्लरसक्षोरघृतयुक्ताः सुशीतटाः।

्षीरबरक्षकषायाव्या बस्तयः ओणिते हिताः ॥८०॥ रक्त मे- न्यग्रोधादि इक्षो के क्वाथमें शकरा, ईव का

रख, दुध, घी मिलाकर दी गई अतिशीतल बस्तियां उत्तम

है ।८०॥

शोधनद्रभ्यनिष्क्वाथांस्तत्कलकस्नेह सैन्धवः । ` युक्ताः खजेन मथिता बस्तयः शोघनाः स्मृताः ॥८९॥

शोधनं वस्तियां-- वमन, विरेचन मे कदे इए ` योधन द्रव्योके क्वाथमे, इन्दं द्रव्यो का कल्क, स्नेहः सेन्धव

मिलाकर, मन्थनदण्ड से मथकर बना$ बस्ति शोधनबस्तियां ६।८९॥ तरिफठाक्वाथगोमू्रक्षोद्रक्षारसमायुताः। ऊषकादिप्रतीवापा बस्तयो टेखनाः स्ताः ॥८२॥

| त्रिफला का क्वाथ, गोमून्न, मधु, श्वार, इनके साथ ऊपकादिगण का] प्रततेप देकर बनाई बस्तियां केखन कही जाती ॥८२॥ `

चिकित्सास्थानम्‌ ८४५

बरहणद्रव्य निष्क्वाथाः कल्केमेधुरकैयंताः।

सर्पिर्मासरसोपेता वस्तयो बृंहणाः स्मरताः ।८३॥

विदारीगन्धादि बृहण द्रव्यो के क्वाथ म काकोल्यादि का

परचेप देकर, मांसरस, घी मिलाकर वनाई गई वस्तिर्या वृंदण ह ॥८२॥

चटकाण्डोच्चटाक्वाथाः सक्षीरघृतश्कंराः ।

आत्मगुप्राएखावापाः स्खता बाजीकरा चणाम्‌ ॥८४॥

चिद्यो के अण्डे, उच्चटा ( श्वेत घेंॐची ) का क्वाय,

इसमें दुध, घी, शकरा ओर कोच के फल का कल्क मिलाकर

बनाई वस्तथा वाजीकर कही दँ ।८४॥

वदयंरावतीशेलुलारमरीधन्बनाङ्राः कषीरसिद्धाः क्षौद्रयुताः साखाः पिच्छिरसंन्िताः ॥८५॥

वाराहमादिषौरभरवेडारणेयकौकङ्टम्‌ ।

सदयस्कमखगाजं वा देयं पिच्छिखत्रस्तिषु ॥८६॥

पिच्छात्रस्ति- वेर, नागवला, रसुडा, सिम्बर, धामन

इनके कोमल पत्ते, इनको तीन-तीन पक लेकर चौबीख पल दूष म चौगुना जल मिलाकर दुघ मात्र शेष रक्ते । इसमे रुधिर मिलाकर बस्ति देब । यह पिच्छिटवस्ति रै । पिच्छिक्बस्तियों

मँ-सुअर, भस, मेदा, बिल्ली, हरिण, सगां अथवा बकरा इनको

तुरन्त का ताजा र्त पिच्छिक्बस्तियों मे भिलाना चादिये ॥ परियङ्ग्वादिगणक्वाथा अम्बष्ठायेन संयुताः । सक्षौद्राः सघृताश्चेव भ्राहिणो बस्तयः स्मरताः ॥८७॥

प्रियंगु आदि द्रव्यो के गण के क्वाथ मे अम्बष्ठादिगण

का प्रत्तेप मिकाकर-मधु ओर धृत डारुकर बनाई बस्तियां

ग्राही ह ।८७॥ एतेष्वेव च योगेषु स्नेहाः सिद्धाः प्रथक्‌ पथक्‌ । समस्तेऽवथवा सम्यण्विघेयाः स्तेह बस्तयः ॥८्ट॥ इन्दी उपयुक्त योगों मे पथक्‌ पथक्‌ सिद्ध किय स्तेह या

इनको मिलाकर इनसे सिद्ध किया स्नेह बस्तियों के स्पमं भी

मी प्रकार देना चादिये ८८

वन्ध्यानां अतपाकेन ओधितानां यथाक्रसम्‌।

बरातेरेन देयाः स्युबेस्तयसखेबृतेन च ॥८९॥

वन्ध्या चयो का अमन विरेचनादि से ओधन्‌ करके शत्‌-

पाक किये बलातैक से या चेदत स्नेह से (घी, तैर, वसां से )

बरत देनी चादिये । ( जैदृत स्नेह महाग्याधि से, बलातेक मूढ

गभचिकित्सा मे कहा है । उल्हण शतपाकतेर से अलग बस्ति

मानता दै, वातव्यापि में कहा तपाकतेर बरतने को कहता

है । परन्तु शतपाक, बरातेर उत्तम है ) ॥८६॥ | नरस्योत्तमसत्तवस्य तीदणं बस्ति निधापयेत्‌ ।

` तीच्तण ट स्ति स्त देवे वे

॥ २4 ।) (क, भ । गि, ४न८ =" मे ८३ पद

मध्यमं मभ्यसत्तवस्य विपरीतस्य बे सृदुम्‌ ॥6०॥ _

ऊनत्त ॥ त्‌ म । सत्त्ववाले <| म १ 1 ४. | +" मनुष्य रोः अ ^ प च त ४ | ५ क. \ प ५

ध्यम्‌

ध य

` २ अ मौर ^ ¦ ४. १ : हीनस

तत्ववाके "<

9

  • क्विच + ऋ ^ र ~ 15 (भु > ४

"ष्क ६९ श {) । न । 0 ह्व | न + - ५ . मं ॥ ~ कि ("कि नदि 44७५ १5, 9 र श्‌ कृ पोरे ष * (4 १ ५०९^ १५ प त ॐ ६५४,

= 9, ~ 4 9 2 १४९. ०. < १ भ # [न ॐ ~. >

+“ अः "क ® क १५1 ^ | ५ ॥

वं। ९. 2४

  1. {= 8 | `"

ॐ ॥ छे ६:

४) भ न चनु ₹1 चद ~ § व { = ९ 9 8 | क च । ट ७

~~ ११ कक्कर नर ४०) १ ~ > > {४4 न्ग ` +" कद्‌ 1 )

४४६

मुश्रुतसंहिता

[ अ० ३८ ]

एवं कालं बलं दोषं विकारं च विकारवित् । बस्तिद्रव्यबलं चैव वीक्ष्य बस्तीन् प्रयोजयेत् ॥९१॥ इसी प्रकार समय, बल, दोष, रोग, बस्तिद्रव्य के बल को देखकर रोग को समझनेवाला वैद्य बस्तियों देवे ॥९१॥

दद्यादुकलेअनं पूर्वं मध्ये दोषहरं पुनः । पश्चात् संगमनीयं च दद्याद्भस्ति विचक्षणः ॥९२॥ बुद्धिमान् पहले दोषों को उत्कलेश करनेवाली बस्ति देवे, मध्य में दोषनाशक और अन्त में संशमनीय बस्ति देवे ॥९२॥

एरण्डबीजं मधुकं पिप्पली सैन्धवं वचा । हपुषाफलकल्कश्च बस्तिरुत्कलेअनः स्मृतः ॥९३॥ शताह्ना मधुकं बीजं कोटजं फलमेव च । सकाञ्चिकाः सगोमूत्रो बस्तिदौषहरः स्मृतः ॥९४॥ प्रियङ्गुमधुकं मुस्ता तथाव च रसाञ्जनम् । सस्त्रीरः शस्यते बस्तिदौषाणां शमनः परः ॥९५॥

एरण्डबीज, मुलेहटी, पिप्पली, सैन्धव, वच, हाऊबेर, मेनफल, इनके कल्कवाली बस्ति उत्कलेशक कही है । सौफ, मुलेहटी, इन्द्रजो, मेनफल, कांजी, गोमूत्रवाली बस्ति दोषहर है । प्रियंगु, मुलेहटी, मुस्ता, रसौत और दूधवाली बस्ति दोषों का शमन करती है ॥९३-९५॥

नृपाणां तत्समानानां तथा सुमहतामपि । नारीणां सुकुमारानां गिगृस्थविरयोरपि ॥९६॥ दोषनिर्हणार्थाय वलवर्णोदयाय च ।

समासेनोपदेष्ट्यामि विधानं माधुतैलिकम् ॥९७॥ यान्खीभोज्यपानेषु नियमश्चात्र नोच्यते । फलं च विपुलं दृष्टं व्यापदां चाप्यसंभवः ॥९८॥ योज्यस्त्वतः सुखेनैव निरुहृकमभिच्छ्रुता । यदेच्छति तदैवैष प्रयोक्तव्यो विपश्चित्ता ॥९९॥

राजाओं या राजाओं के समान वैभवशाली बड़े पुरुषों के लिये, स्त्रियों के लिये, नाशुक्त प्रकृति एवं बालक तथा बूढ़ों के दोषों को निकालने के लिये, बल-वर्ण को बढ़ाने के लिये संक्षेप में माधुतैलिक बस्तियों को विधि कहूँगा । इन बस्तियों में—खारी, स्त्री-सेवन, भोजन आदि का कोई परहेज नहीं है । फल भी बहुत अधिक है और हानियों के होने की सम्भावना नहीं है । इसलिये निरुह विधि को चाहनेवाले सुखपूर्वक इनका व्यवहार कर सकते हैं । बुद्धिमान् जब चाहे, तब इनको बरत सकता है (इनमें शोधनविधि आवश्यक नहीं) ॥९६-९८॥

मधुतैले समे स्यातां क्वाथश्चैरण्डमूलजः । पलायं शतपुष्पायास्ततोऽर्धं सैन्धवस्य च ॥१००॥ फलेनैकेन संयुक्तः खजेन च विलोडितः । देयः सुखोष्णो भिषजा माधुतैलिकसंज्ञितः ॥१०१॥

मधु और तैल परस्पर समान ( चार प्रसृत, दो कर्ष ), एरण्डमूल का क्वाथ भी चार प्रसृत और दो कर्ष, सौफ आधा पल, सैन्धव एक कर्ष, मेनफल-एक संख्या में यह नौ प्रसृत

बनाकर मन्थनदण्ड से मथकर—सुहाती गरम बस्ति वैद्य देवे । इनका नाम माधुतैलिक है । ( गयी ने 'पलेनैकेन संयुक्तः' पाठ दिया है । इससे मांसरस, कांजी आदि मिलाते हैं ) ॥१००,१०१॥

क्वाचामधुकतैलं च क्वाथः सरससैन्धवः । पिप्पलीफलसंयुक्तो बस्तिर्द्युक्तस्थः स्मृतः ॥१०२॥

बच, सैन्धव, पिप्पली, मुलेहटी, मेनफल प्रत्येक एक कर्ष, मधु और तैल चार प्रसृत, एरण्ड का क्वाथ चार प्रसृत, इनको मिलाकर बनाई बस्ति युक्तस्थ है । ( जब चाहे तब दे सकते हैं, रथ के तैयार जुड़ा होने पर भी दी जा सकती है ) ॥१०२॥

सुरदारु वरा रास्ता शतपुष्पा वचा मधु । हिङ्कुसैन्धवसंयुक्तो बस्तिर्दौषहरः स्मृतः ॥१०३॥ देवदारु, त्रिफला, रास्ता, सौफ, बच, मधु, हींग, सैन्धव से मिलाकर बनाई बस्ति दोषहर है ॥१०३॥

पञ्चमूलीकषायं च तैलं मागधिका मधु । बस्तिरेष विधातव्यः सशताह्नाः ससैन्धवः ॥१०४॥ बृहत्पञ्चमूल के कषाय में तैल, पिप्पली, मधु, सौफ, सैन्धव मिलाकर बस्ति देवे ॥१०४॥

यवकोलकुलस्थानां क्वाथो मागधिका मधु । ससैन्धवः सयष्ट्याहः सिद्धबस्तिरिति स्मृतः ॥१०५॥ जो, बेर, कुलस्थी का क्वाथ, पिप्पली, मधु, सैन्धव, मुलेहटी इनसे बनी बस्ति सिद्ध बस्ति है ॥१०५॥

मुस्तापाठाभूतातिक्वाबलाराक्षापुनर्नवाः । मञ्जिष्टारवधोगीरत्रायमाणाल्यगोलुत्रान् ॥१०६॥ पालिकान् पञ्चमूलाल्पसहितान्मदनान्छकम् । जलठके पचेत् क्वाथं पादशेषं पुनः पचेत् ॥१०७॥ क्षीरार्धादकसंयुक्तमाक्षोरात् सुपरिच्छतम् । पादेन जाङ्गुलरसस्तथा मधुघृतं समम् ॥१०८॥

शताह्नाफलिनौयष्टोवस्त्कैः सरसाञ्जनैः । काषिकैः सैन्धवोन्मिश्रैः कल्कैर्वस्तिः प्रयोजितः ॥१०९॥ वातासूडमेहशोफाशं गुल्ममूत्रविवन्धनुत् । विसर्पञ्चरविडुभङ्गरक्तपित्तविनाशनः ॥११०॥ बल्यः संजीवनो वृष्यश्चतुष्टयः शूलनाशनः ।

यापनानामयं राजा बस्तिमुस्तादिको मतः ॥१११॥ यापन बस्ति—मुस्ता, पाठा, गिलोय, कुटकी, बला, रास्ता, पुनर्नवा, मजीठ, अमलतास, खस, त्रायमाण, गोखरू, बृहत्पञ्चमूल, लघुपञ्चमूल प्रत्येक एक पल, मेनफल, संख्या में आठ लेकर एक आदक जल में क्वाथ करे । चौथाई शेष रहने पर छान ले । इसमें दूध आधा आदक मिलाकर फिर पकावे । दूध मात्र रह जाने पर इसमें चौथाई, जांगलपशु-पक्षियों का मांसरस, मधु, और घृत (छेः पल), सौफ, प्रियंगु, मुलेहटी, इन्द्रजो, रसौत से प्रत्येक एक कर्ष कल्क रूप में और सैन्धव मिलाकर बस्ति देवे । यह वातरक्त, प्रमेह, शोफ, अर्श, गुल्म, मूत्रावरोध, विसर्प, ऊवर, अतिशार, रक्तपित्त को नष्ट करती है । बलदायक,

अ० ३६ ]

चिकित्सास्थानम्

४४७

जीवनदायी, वृष्य, चत्तुष्य, शूलनाशक है। यह मुस्तादिक यापन बस्ति सबमें श्रेष्ठ है ॥१०६-१११॥

अवेक्ष्य भेषजं बुद्धया विकारं च विकारवित् ।

बीजेनानेन शाखुङ्गः कुर्याद्भस्तिशतान्यपि ॥११२॥

रोग को समझनेवाला वैद्य बुद्धि से औषध और रोग को समझकर इस बीज रूप न्याय से सैकड़ों बस्तियों को बनाये। ('बीजमिव कर्षकस्य सूत्रं बुद्धिमतामल्पमप्यनल्पज्ञानायतनं भवति तस्माद् बुद्धिमताम्हापोहवितकः-च०) ॥११२॥

अजीर्णे न प्रयुञ्जीत दिवास्वप्नं च वज्रयेत् ।

आहाराचारिकं शेषमन्यत् कामं समाचरेत् ॥११३॥

अजीर्ण में बस्ति न देवे। बस्ति लेने पर दिन में न खोये।

शेष आहार-आचार विधान का यथेच्छानुसार पालन करे ॥

यस्मान्मधुं च तैलं च प्राधान्येन प्रदीयते ।

माधुतैलिक इत्येवं भिषग्भिर्यस्तिरुच्यते ॥११४॥

रथेवपि च युक्तेषु हृस्त्यश्वे चापि कल्पिते ।

यस्मान्न प्रतिषिद्धोऽयमतो युक्तस्थः स्मृतः ॥११५॥

बल्लोपचयवर्णानां यस्माद् व्याधिशतस्य च ।

भवत्येतेन सिद्धिस्तु सिद्धवस्तिरतो मतः ॥११६॥

सुखिनामल्पदोषाणां नित्यं स्निग्ध्याश्व ये नराः ।

मृदुकोष्ठाश्च ये तेषां विधेया माधुतैलिकाः ॥११७॥

क्याँकि मधु और तैल इनमें मुख्यतः दिये जाते हैं, इसलिये वैद्य इनको माधुतैलिक कहते हैं। जुड़े हुए तैयार रथों के तैयार घोड़े, तथा हाथी के होने पर भी इनका उपयोग किया जा सकता है, इसलिये इनको युक्त रथ कहते हैं। सैकड़ों रोगों में इनसे बल, वर्ण और पुष्टि में सिद्धि मिलती है, इसलिये इनको सिद्धवस्ति कहते हैं। जो मनुष्य सुखी जीवन व्यतीत करते हों, थोड़े दोषवाले हों; और जो नित्य स्निग्ध रहते हों, जो मृदु कोष्ठवाले हों, उनमें माधुतैलिक बस्तिथॉ बरतनी चाहिये ॥

मृदुत्वात् पादहीनत्वाद्बकुस्तनविधिसेवन्नात् ।

एकबस्तिप्रदानान्च सिद्धवस्तिष्वन्यत्रणा ॥११८॥

सिद्धवस्तियों के कोमल होने से, इसमें पादहीन होने से, वमनादि सम्पूर्णविधि का सेवन न करने से और केवल एक ही बस्ति दिये जाने के कारण सिद्ध वस्तियों में किसी प्रकार का परहेज नहीं रहता ॥११८॥

इति श्री सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने निरुहकम-

चिकित्सतं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥३८॥

एकोनचत्वारिंशतमोऽध्यायः

अथात आतुरोपद्रवचिकित्सतं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अव इसके आगे आतुरोपद्रवचिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

स्नेहपीतस्य वान्तस्य विरिक्तस्य सूतासूजः ।

निरुहस्य च कायामिर्नमन्दो भवति देहिनः ॥३॥

सोऽन्नेरत्यर्थगुरुभिरुपयुक्तः प्रज्ञाम्यति ।

अल्पो महद्धिर्वहुभिश्छादितोऽग्निरिवेन्धनैः ॥४॥

स चाल्पैलैर्घुभिश्चान्नेरुपयुक्तैर्विर्धते ।

काष्ठैर्णुभिरत्यपैश्च सन्धुश्चित्त इवानलः ॥५॥

स्नेहपान किये, वमन किये, विरेचन लिये, रक्तमोक्षण करवाये पुरुष की और निरुह लिये व्यक्ति की कायामिर्नमन्द हो जाती है। यह अग्नि अतिशय भारी अन्न के सेवन से शान्त हो जाती है जिस प्रकार थोड़ी सी अग्नि बड़ी २ बहुत सी लकड़ियों के डालने से बुझ जाती है। और यही अग्नि थोड़े, एवं लघु अन्न के सेवन से तीव्र हो जाती है, जिस प्रकार बाह्य अग्नि सूक्ष्म और थोड़ी लकड़ियों से बढ़ जाती है। इसी से कहा है—

यथाऽग्निरनस्तृणोमयाद्यैः सन्धुक्षमाणो भवति क्रमेण ।

महान्तिथरः सर्वसहस्तयैव शुद्धस्य पेयादिभिरन्तरग्नः ॥ च० सि० अ० १ ॥१२॥३-५॥

हृत्दोषप्रमाणेन सदाऽऽहारविधिः स्मृतः ।

दोषो के निकलने के अनुसार सदा आहार विधि कही है।

पेयां विलेपीमकृतं कृतं च, यूर्ध रसं त्रिद्विरथैकशश्च। क्रमेण

सेवेत विशुद्धकायाः प्रधानमध्यावरशुद्धिशुद्धः ॥ च० सि० अ० १ ॥१२॥

त्रोणि चात्र प्रमाणानि प्रस्थोऽर्धाढकमाढकम् ॥६॥

तत्रावरं प्रस्थमात्रं द्वे शेषे मध्यमोत्तमे ।

यहाँ पर तीन माप हैं। यथा—प्रस्थ, आधा आढक और आढक। इनमें प्रस्थ अवर माप, आधा आढक मध्य माप, और आढक उत्तम माप है। (प्रस्थ यहाँ पर साढ़े तेरह पल का लेना चाहिये)।

वि० मन्तव्य—जिस परिमाण में विरेचन में दोष (पुरीष के अतिरिक्त द्रव) निकलें उसके अनुसार आहार की व्यवस्था करनी चाहिये। उत्तम कोटि के विरेचन में एक आढक, मध्यम कोटि के विरेचन में आधा आढक और अवर कोटि के विरेचन में १ प्रस्थ दोष निकल जाना चाहिये। परन्तु कुछ आचार्यों का कथन है कि वह विरेचन उत्तम कोटि का माना जाता है जिसके अन्त में कफ का निःसरण हो भले ही एक ही विरेचन में कफ का निःसरण हो जाय (देखिये श्लो० १६) और कुछ आचार्यों का कथन है कि हीन कोटि के विरेचन में १०, मध्यम कोटि के विरेचन में २० और उत्तम कोटि के विरेचन में ३० वेग (बार विरेचन होना) माने जाते हैं (दे० च०

धट

खि० अ० १ श्छो° १४) । इन तीर्नो में कफान्त विरेचन का

सिद्धान्त सर्वोत्तम प्रतीत होता ह क्योकि वह निर्विवाद है ॥६।।

प्रस्थे परिखते देया यवागू : स्वल्पतण्डुला ॥७॥ दरं चैवाधोढके देये तिखच्याप्याढके गते । विङेपीमुचिताद्भक्ताच्चतुथाशङ्रतां ततः ॥८॥ द्द्यादुक्तेन विधिना क्छिन्नसिक्थामपिच्छिखाम्‌ ।

अस्तिधलवणं स्वच्छुद्‌ गयुषयतं ततः ।€।

अंशद्वयप्रमाणेन दद्यात्‌ सुस्िन्नमोदनम्‌ । ततस्तु कृतसंज्ञेन हद्यनेन्द्रियबोधिना ॥१०॥

घरीनंलान्‌ वितरेद्भोक्तुमातुरायोदनं खदु ।

ततो यथोचितं भक्तं भोक्तुमस्मे विचक्षणः ॥११॥

छावेणहरिणादीनां रसेदे्यात्‌ सुसंस्छृतेः।

परस्थविरेचन मे थोडे से चावटों से बनाई (अष्टं तण्डुर)

यवागू देनी चाहिये (यह यवागू पेया एक बार देनी चादिये)

ओर आघे आद्क विरेचन मे यवागू दो वार देनी चाहिये ।

एक आद्क विरेचन में सिद्ध यवागू तीन बार (तीन समय)

देनी चाहिये । अभ्यास किये रोज के भोजन से चौोथाई माग

से बनाई विह्ेपी देवे । यह विलेपी अच्छी प्रकार गलायी

कणिर्योवाखी एवं चावल रदित होनी चोदये इसके उपरान्त

बिना स्नेहन ओर ल्वण के स्वच्छ (पते) मुंग के यूष क

साथ अच्छी प्रकार गलाया हुआ भात, प्रतिदिन के भोजन की आधी मात्रा मे देवे । इसके आगे कृत संक यूष (स्नेह, नमक आदि से वारे संस्कृत) जो कि मन को प्रिय एवं इन्द्रियो

को जाग्रत करनेवाला हो, उस यूष के साथ नरम भात प्रतिदिन के भोजन का ई तीन चोथाई भाग रोगी को दे। इसके वाद चुर वेय रोगी को मोजन, बेर, हरिण, चित्ितहरिण आदि के मली प्रकार संस्कृत मांसरस के साथ खने को देषे। ` वक्तव्य--यवागृ--“सिक्थकेरदितो मण्डो पेया सिक्थसम￾न्विता । यवागृवहुखिक्या स्यात्‌ विलेपी विरलद्रवा ॥» कृत￾युष--“अस्नेहल्वणं संमृतं कटुकैर्विना । विजेय स्नेद्वण.

कटुकेः संस्कृतं कृतमिति ॥ चरक में प्रथम तीन अन्न काटो म पेया, दूसरे तीन कालों मे विलेपी, तीसरे तीन अन्न कां , मे कृता-कृतयुष, चौथे तीन कालों भ कत-कृतरख, इस प्रकार बारहं अन्न कारों मं अथात्‌ सातवे दिन खाधारण भोजन पर आ जायेगा । इसके अतिरिक्त--“अथेनं साया परे बाहि खलोदकपरिषिकत पुराणानां ोदहितशालितण्डुलानां स्ववक्छिन्नानां मण्डपूवा खलोष्णां वाग पाययेदग्निवलममिसमीच्य च । एवं

द्वितीये तृतीये चा्काछे । चतुथे त्वन्नकाठे तथा विधानामेव शाछतष्डुलानामुल्छिननानां विलेपीयष्णोदकद्धितीयामस्नेहर्व￾शामलसतहल्वणां वा मोजयेत्‌। एं पञ्चमे षष्ठे चान्लकाठे । । ततरालुकरममेकं वु. बरस्थः सष्दाचरेत्‌॥९०॥ ` 1

सुश्रतसं हितां

मोदनमुष्णोदकानुपानं तनुना तनुस्नेहख्वणोपपन्नेन रये

भोजयेत्‌ । एवमष्टमे नवमे चान्नकाले । दशमे त्वन्नकाछे ल

कपिञ्ञलादीनामन्यतमस्य मंसरसेनौदकलावणिकेनापि सारता भोजयेत्‌ उष्णोदकानुपानम्‌ । एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले |

अत ऊष्वेमन्नगुणान्‌ क्रमेणोपसुज्ञानः सतरात्रेण प्रकृतिमोजन

मागच्छेत्‌ ।। चरक सू° अ० १५ ॥७-११।

हीनमध्योत्तमेष्वेषु विरेकेषु प्रकीर्तितः ॥१२॥

एकद्ित्रिगुणः सम्यगाहारस्य क्रमस््वयम्‌ ।

एक प्रस्य विरेचन दीनविरेचन है, इसमें पेया क्रम एक एक अन्न कालमेंदेना चादिये। आधा आढक विरेचन मध्यविरेचन रै । इसमे पेयादिक्रम दो दो अन्न काठदे।

आढक विरेचन उत्तमविरेचन ई, इसमे पेयादिक्रम तीन तीन

अन्नकाल तक देवे ॥१२॥

कृफपित्ताधिकान्मयनित्यान्‌ दीनविशोधितान्‌ ॥१३॥ पेयाऽभिष्यन्दयेत्तषां तपेणादिक्रमो हितः

कफ-पित्त की अधिकतावाटे, नित्य मद्यपान करनेवाहे, ,

ठीक प्रकार से जिनका शोधन नदीं हुआ उनमें पेया अभिष्यन्द ।

(लोतो मे कफ वृद्धि) उत्पन्न करती है । इसल्यि इनमें तपणादि- |

विधि बरते | (तर्प॑णलाजा के सन्तु से बनाया तपण दे) ॥१३॥

वेदनाङाभनियमसोकवे चिन््यदेतुभिः ॥१४॥

नरालपोषिताश्वापि विरिक्तवदुपाचरेत्‌ ।

वेदना, इच्छित वस्तु की अप्रासि, उपवाखादि नियम थोक

उन्माद आदि मानसिक कारण से उपवास किये या इर ए

पुरषो को विरेचन दिये इष्ट कौ भांति चिकित्सा करे ।

वि° मन्तन्य-लद्कन के पश्चात्‌ भी जब आद्र देनेका समय आपे तव.बिरेचनोक्त विधि से पेथा-विरेपी आदि %

व्यवस्था करे ॥१४॥ _ थ

आढकाधोढकप्रस्थसंख्या ह्येषा विरेचने ॥१५॥

श्ेष्मान्तत्वाद्धिरेकस्य न ताभिच्छन्ति तद्विदः ।

एको विरेकः श्छेष्मान्तो न द्वितीयोऽस्ति कश्चन ।९५

आद क, आधा आढक ओर प्रस्य यहं मात्रा विस्चन

विषय मँ है। परन्तु विरेचन को सखमश्चनेवाटे इसको न

मानते, क्योकि कफ का आना ही विरेचन की उत्तम!

(विरेचन मं पदे प्रत्त. आता है, पित्त

रान्त दूरस्य आमः रूपी.कफ आता है) | कफ का आना

एक (घस्य) विरेचन ह, दूसरे विरेचन कौ क्या बात

कषा भी रै-“तस्मान्मतिमता नित्यमात्मान पिन्तं बमनं स्थाप्यं कफान्तं च विरेचनम्‌ ११५१९

` . बलं यत्त्रिविधं प्रोक्तमतस्तत्र क्रमद्जिधा ।

[अ० ३६ , स्मे खन्नकाले त॑था विधानामेवं शारीनां दविप्रसतं ल |

के निकलने के उप. |

एवा

न 9षं + क्कत", #

---~--------------- -- र

"यु" व ५न्व = ॐ "क दुक क "~ + छ ्कनतवीि

=

+” ~ "~~ क


` अ क

कि

# भ) ति>

न ~< द ------ ६ -~---~ क

- द 5.क १ ० + ~ च

योनि तिकि "न मनु =

ॐ० ३ ९१।

द्विराचरेन्मभ्यवर्ल्ीन्‌ वारान्‌ डुबङस्तथा । केचिदेवं कमं प्राहुमन्दमधभ्योत्तमाभ्िषु ॥१८॥ कर्योकिं बर प्रवर, मध्य ओर अवर भेद से तीन प्रकारका

कहा है, इसलिये आहार क्रम भी तीन प्रकार का दै । बल्वान्‌

मनुष्य एक अनुक्रम को एकही वार बरते। मध्यम बख्वाखा दो बार ओर दुबल मनुष्य तीन बार बरते | कई आचार्यं इस विधि को मन्दाग्नि; मध्यमाग्नि ओर उत्तमाग्नि के विचार ते मानते ३ ॥१७,१८॥

संसगेण विच्द्धेऽमौ दोषकोपभयाद्‌भजेत्‌ । प्राक्‌ स्वादुतिक्तो स्निग्धाम्टङ्वणान्‌ कटुकं ततः ॥१९॥ स्वाद्रम्खख्वणान्‌ भूयः स्वादुतिक्तावतः परम्‌ । स्निग्धरूक्षान्‌ रसश्विव भ्यत्यासात्‌ स्वस्थवत्ततः॥२०।

पेयादि अन्न संसजन क्रम से बढ़ी इई अग्निम दोषों के

कुपित होने के भय से प्रथम मधुर, तिक्त; स्निग्ध, अम्ल,

ववण. कटु रस खाये । पी मधुर, अम्ल, ख्वण रसो को,

फिर मधुर ओर तिक्त को, इसके बद्‌ स्निग्ध, रक्ष को अदल￾ब्रदलकर खाये । इससे आगे स्वस्थ की भांति बरते |

कहा मी ईै--““दद्यान्मधुरहयानि ततोऽम्ल्वणौ . रसौ ।

स्वादुतिक्तो ततो मयः कषायकटुको ततः ॥ अन्योन्यप्रस्यनीकानां

रसानां स्निग्धरूक्चयोः । व्यत्यासादुपयोगेन क्रमात्तं प्रकृतिं

नयेत्‌ ॥ ब्रद्धवागमड । अन्योन्यप्रवयनीकानां रसानां स्निग्ध￾रुक्चयोः । व्यत्यासादुपयोगेन प्रकृति गमयेद्‌ भिषक्‌ || चरक ।

वि° मन्तव्य-पेया विलेपी आदि आहार कल्पना का नाम

“संसगक्रमः तथा “संसजन क्रमः” है । इस क्रम से जठराग्नि का सन्धुक्षण होने पर प्राकृतिक आहार देना प्रारम्भ करे ॥

केवख स्नेहपीतो वा वान्तो यश्चापि केवलम्‌ । स सप्तरात्रे मुजो सुज्ञीत खघु भोजनम्‌ ॥२१॥ जिसने केवर स्नेह ही पीया शो अथवा केवल वमन ही किया हो, वह मनुष्य सात दिन केवर लशु भोजन ही करे ॥२१॥ कृतः सिराभ्यथो यस्य कृतं यस्य च ओधनम्‌ । स ना परिहरेन्मासं यावद्रा बख्वान्‌ भवेत्‌ ॥२२॥ जिसने सिरावेध कराया हो, जिसको विरेचन दिया गया ह, रसे मनुष्य एक मास तक या जव तक बल्वान्‌ न हो, । कोष आदि को छोड देवे ॥२२॥

यहं ज्यहं परिहरेदेकैकं बस्तिमातुरः। तृतीये तु परीहारे यथायोगं समाचरेत्‌ ॥२३॥

चिकित्सास्थानम्‌ ५४९ तेखपूणोममद्धाण्डसधमोणो ब्रणातुराः । स्निग्धजञुद्धाक्षिरोगातो उवरातीसारिणश्च ये ॥२४॥ ब्रणरोगी, स्निग्धशरीर, शुद्धशरीर, आंख के रोगी, उव्र ओर अतिसाररोगी ये तैल से मरे पात्र की माति (जरा क्षयका लगने से शिरनेवाे) एवं मिद्ध के कचे वतन की माति (शीघ्र टूयनेवाके) होते है ।

यथेव तर्णं पूणे तैखपात्रं तथेव च । गोपाक इव दण्डी गाः सवस्माद्पचारतः। शून्यदेहं प्रतीकारासदिष्णं परिपा्येद्‌ ॥ चरक सि° अ० १२-४-५ ॥(२४॥

क्रध्यतः कुपितं पित्तं कुयोत्तास्तानुपद्रवान्‌ । आयास्यतः ओचतो वा चित्तं विभ्रममृच्छति ॥२५॥ मथुनोपगमाद्घोरान्‌ वउ्याधीनाप्नोति दुरमेतिः। आत्तेपकं पक्षघातमङ्गप्रमरहमेव च ॥२६॥

गुह्यप्रदेशो इवयथुं कासश्वासौ च दारुणो । रुधिरं शुक्रवच्चापिं सरजस्कं प्रवतेते ॥२७॥

रभते च दिवास्वप्नात्तास्तान्‌ व्याधीन्‌ कफात्मकान्‌ ।

प्टीहोदरं प्रतिश्यायं पाण्डुतां इवय ५रम्‌ ॥२८॥ मोहं सदनमङ्गानामविपाकं तथाऽरुचिम्‌ । तमसा चाभिभूतस्तु स्वप्नमेवाभिनन्दति ॥२९॥ उच्चैः सं भाषणाद्वायुःशिरस्यापादयेद्रजम्‌।

आन्ध्यं जाञ्यमजिघ्रस्वं बाधियं मूकतां तथा ॥३०॥ हलुमोक्षमधोमन्थमर्दिंतं च सुदारुणम्‌ ।

नत्रस्तम्भं निमेषं वा ठष्णां कासं प्रजागरम्‌ ॥२१॥ छभते दन्तचाखं च तास्तांश्चान्यानुपद्रवान्‌ । यानयानेन भते छर्दिमूच्छोभ्रमक्छमान्‌ ॥३२॥ तथेवाङ्गमहं घोरमिन्द्रियाणां च विभ्रमम्‌ । चिरासनात्तथा स्थानच्छोण्यां भवति वेदना ॥३३॥

अतिचङ्कृमणाद्वायुजेङ्कयोः ङुरुते रुजः ।

सक्थिप्रओोषं शोफं वा पादहषमथापि वा ॥३४॥ शीतसंभोगतायानां सेवा मारुतशृद्धये। ततोऽङ्गमद विष्टम्भशूटाध्मानभ्वेपकाः॥३५॥

वातातपाभ्यां वेवण्य उवरं चापि समाप्लुयात्‌। विरुद्धाथ्यञनान्सरत्युं व्याधि वा घोरस्च्छति ॥३६॥

असार्म्यभोजनं हन्यादरख्वणेमसंशयम्‌।

अनात्मवन्तः पञ्चुवदुमुञ्जते येऽप्रमाणतः ।

रोगानीकस्य ते मूरमजीणं प्राप्ठुबन्ति हि ॥३७॥ रोगी एक एक अनुवासनवस्ति लेकर तीन तीन दिन , तक कोष आदि परहेज का पालन करे । तीसरे परहेज ॐ पालने क उपरान्त जैसा ठीक जंचे, ` वेसा करे । ( दुसरे कहते

दकि अग्नि बल आदि का विचार करके चार-पाँंच दिनके

4 पीछे जब ठीक समे तब अनुवासन दे.) ॥२३॥ .

क्रोध करने पर . कुपित इआ पित्त, दाह, प्यास आदि. पित्तजन्य उपद्रवो को करता हे। परिभम कतेसेया सोचने से चित्त विभ्रम उत्पन्न होता है । खरी सेवन कलनेपर _

भयानक रोग, आक्तेपक, पक्चाधात, अंगो का जकङ्ा जाना, । ५ र । । 3 शोथ 8 ६ ६ 5 (च: ~ 3 । + (1 अआ ॥ गुष्यभाग मं शोथ, -भयानक्‌ कास, श्वं स,-नाय-का

इ ~ +

२ १ ४१२ र # |~

"न्वं त भ. क - १५ न ^~ * ` ५ ५4 ः ।

न 9 ~ = क + + क -4 केके

"=+ `

3४ भ कि.