स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
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(स्वरोदय विज्ञान)
नक्शा - १
लग्न या राशि | यात्रा की दिशाएं स्वरानुसार | कालज्ञान | शुभ कार्यों का वर्णन जो स्वर्गों में किये जाते हैं ---|---|---|--- वृष, कर्क कन्या | पश्चिम दक्षिण | चार, आठ, बारह या बीस दिन चले तो योगी की आयु बढ़ें | ब्याह करना, दान देना, तीर्थ करना वस्त्र या भूषण बनवाना या पहनना, घर जाना, वृश्चिक मकर | | | पुस्तक लेना, योगाभ्यास करना, प्रीति करना, औषधि देना, पानी मीन | | | पीना, दीक्षा मन्त्र लेना-देना, बाग या गुफा बनवाना, अन्न बोना इत्यादि मेघ, सिंह | पूर्व | ८ पहर १६ पहर २ दिन ३ वर्ष २ वर्ष १ वर्ष | शुद्ध करना, भोजन करना, स्नान करना, मैथुन करना, तुला, कुंभ | उत्तर | १६ दिन चले १ मास | विवाह करना, हाथी, घोड़ा मिथुन धन | | १ मास २ दिन | या हथियार लेना, विद्या पढ़ना, मंत्र जपना, ध्यान करना, कर्ज, देना-लेना।
के काम करना
(स्वरोदय विज्ञान)
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तत्त्व वर्णन
नाम तत्त्व | रंग | चाल | तत्त्व का स्वाद | प्रकृति | स्थान ---|---|---|---|---|--- आकाश | काला | दोनों नासिकाओं के भीतर | बुरा फीका | स्थिर | सिर में अग्नि | लाल | ४ अंगुल नासिका के बाहर आवे ऊपर होकर | चरपरा | तप्त | पित्त वायु | हरा | ८ अंगुल तिरछा चले | खट्टा | चर | नाभि में पृथ्वी | पीला | १२ अंगुल नासिका से बाहर | मीठा | कठिन | नाभि के ऊपर जल | श्वेत | १६ अंगुल | कम मीठा | शीतल | मगज
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(स्वरोदय विज्ञान)
नक्शा -२
| द्वार | कार्य | एक एक तत्त्व के पञ्च किरण का परिणाम जिससे शरीर में क्रियाएं होती हैं। | टीका |
|---|---|---|---|
| कान | शब्द | काम, क्रोध, लोभ, मोह मत्सर | स्वरोदय शास्त्र के अनुसार सब कृत्व तत्वों के अनुसार होते हैं और आत्मा का निर्लैप होता है। |
| नेत्र | देखना | भूख, प्यास, नींद, आलस, जम्हाई | |
| दोनों नासिका | सूंधना | दौड़ना, उछलना, हिलना, बढ़ना आदि | |
| मुख | भोजन करना | मांस, चर्म, हड्डी-नाड़ी रोम आदि | |
| लिङ्ग | मैथुन कार्य | खून, मूत्र, कफ, पसीना |
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अन्तःकरण की चार प्रवृत्तियाँ (नक्शा-३)
| नाम | मन | चित्त | बुद्धि | अहंकार |
|---|---|---|---|---|
| देवता | चन्द्रमा | विष्णु | ब्रह्मा | रुद्र |
| कार्य | संकल्प | चित्तमान | निश्चय | ममता |
| विकल्प | करना | 'मैं तू' का | ||
| सम्बन्ध |
पञ्च ज्ञानेन्द्रिय (नक्शा-४)
| श्रवण | त्वचा | नेत्र | रसना | नासिका |
|---|---|---|---|---|
| दिकपाल | पवन | सूर्य | वर्ण | अश्विनी |
| कुमार | ||||
| शब्द | स्पर्श | रूप | रस | गंध |
| आकाश | पवन | अग्नि | जल | पृथ्वी |
पञ्च कर्मेन्द्रिय (नक्शा -५)
| वाक्य | हस्त | पाद | लिङ्ग | गुदा |
|---|---|---|---|---|
| अग्नि | इन्द्र | उपेन्द्र | प्रजापति | यम |
| बोलना | लेना-देना | चलना | रतिभोग | मल त्याग |
| आकाश | पवन | अग्नि | जल | पृथ्वी |
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(स्वरोदय विज्ञान)
स्वरोदय शास्त्र और आरोग्यता
इस विद्या का अभ्यासी बहुत ही स्वस्थ रह सकता है। वह दूसरों की बीमारी भी दूर कर सकता है। तत्त्व और स्वर इनके विपरीत चलने से ही बीमारी होती है। और बीमारी होने से ये विपरीत चलने लगते हैं। यदि तत्त्व और स्वर समय पर चलें तो कोई बीमारी नहीं हो सकती। यदि जरा भी भेद मालूम हो, तो जान लो कि बीमारी का प्रवेश हो गया है। उसी समय स्वर को ठीक करने का प्रयत्न करो इससे एकदम तो बीमारी नष्ट न हो जावेगी परन्तु कम अवश्य होगी। साधारण बीमारी तो इसी से दूर हो जावेगी। यदि स्वर और तत्त्व ठीक चल रहे हों, तो उनको कभी भी नहीं बदलना चाहिए। स्वरों में चन्द्र स्वर और तत्त्वों में जल और पृथ्वी स्वास्थ्य के लिये बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुए हैं। आकाश तत्त्व मृत्युकारी है। अग्नि और वायु का भी जहाँ प्रवाह अधिक होगा,, वहाँ बीमारी अधिक होगी।
सूर्यस्वर गर्म और चन्द्रस्वर ठण्डा है। इसलिये यदि कोई बीमारी शनि के कारण है, तो इसके लिये सूर्यस्वर लाभदायक है। इसी प्रकार गर्मी के कारण जो जो बीमारियाँ होती हैं, उनके लिये चन्द्रस्वर लाभदायक है। साथ साथ तत्त्वों का भी ध्यान रक्खा जावे।
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स्वर बदलने की विधि
पहली विधि -
जो स्वर चलाना चाहो, उसके विपरीत करवट बदल कर लेट जाओ। थोड़ी देर में स्वर बदल जावेगा। उदाहरणार्थ यदि सूर्य स्वर चल रहा है और चन्द्र चलाना है तो दाहिना करवट लेट जाओ।
दूसरी विधि -
पुरानी रुई की बत्ती बनाकर नासिका में लगा दो। जो स्वर चलाना हो, उसे ही खुला रखो।
तीसरी विधि -
लेट कर तीसरी पसली के पास तकिया दवा दो। बहुत शीघ्र स्वर बदल जाता है।
चौथी विधि-
एकाएक दौड़ने से या परिश्रम या कसरत करने से भी स्वर बदल जाता है। बीमार को भी इसी नियम का पाबन्द बनावे। बहुत शीघ्र औषधि का सुपरिणाम मालूम होगा और बीमारी भाग जावेगी।
गर्भाधान विधि
इस विषय में विद्या का अभ्यासी अपने और दूसरों के लिए बहुत कुछ कर सकता है। हजारों मनुष्य चाहते हैं कि वे सन्तान का मुख देख सकें। हजारों पूजा-पाठ बैठते हैं। कोई-कोई तो इसी धुन में अपनी प्रतिष्ठा भी खो देते हैं और धन भी गंवाते हैं; परन्तु उनको आशातीत सफलता नहीं होती; किन्तु इसका अभ्यासी इस विषय में बहुत कुछ कर सकता है।
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(स्वरोदय विज्ञान)
स्त्री सम्भोग केवल रात्रि के समय जबकि भोजन अच्छी तरह से पच जावे—होना चाहिए। दोनों हर तरह से प्रसन्नचित्त हों। दूसरे किसी समय में, स्त्री का संसर्ग ही नहीं होना चाहिए। प्रातःकाल के संभोग से शक्ति व्यर्थ ही नष्ट होती है। संभोग के समय पुरुष का स्वर सदा सूर्य चलना चाहिए। चन्द्रस्वर में गर्भ रहना असम्भव है। सूर्यस्वर के साथ तत्त्व का भी ख्याल रहे।
जल पृथ्वी के योग में, गर्भ रहे सो पूत। वायु तत्त्व में छोकड़ी, और सूत के सूत।। पृथ्वी तत्त्व में गर्भ जो, बालक होवे भूप। धन्वन्ता सोइ जानिये, सुन्दर होय स्वरूप।।
जल और पृथ्वी तत्त्व में यदि गर्भ रह जावे, तो लड़का होता है — वह भाग्यवान् तथा सदाचारी होता है। यदि वायु तत्त्व में स्वर चले तो लड़की होती है। आकाश तत्त्व में गर्भ रहते ही यदि लड़का पैदा होवे, तो उसकी माता की मृत्यु हो जावे। इस तत्त्व में एक तो गर्भ ही बहुत कम रह सकता है। अग्नि तत्त्व में गर्भ रहता नहीं, यदि रहा तो गर्भपात का और स्त्री के मरने का भय रहता है। सूर्यस्वर में लड़का और चन्द्रस्वर में लड़की पैदा होती है। गर्भ उसी समय रहता है, जबकि स्त्री का चन्द्रस्वर चलता हो और मर्द का दाहिना सूर्य स्वर। यह सबसे अच्छा समय है। तत्त्व साथ में पृथ्वी या जल होवे। यदि स्त्री बाँझ है या और कोई खराबी है, तो लिखा है कि यदि पुरुष अपना दाहिना स्वर करे और स्त्री का बाँया और दोनों का तत्त्व जल हो, तो बाँझ को भी गर्भ रह सकता है।
स्वर इच्छानुसार बदल सकता है। तत्त्व इच्छा और धारणा शक्ति से बदल सकता है। अभ्यासी के लिए, जिसने स्वर को और तत्त्वों को वशीभूत किया है, यह अति साधारण बात है। वह अपने और दूसरे के ऊपर जो चाहे स्वर और तत्त्व बदल सकता है। ज्यों ही तत्त्व का ध्यान किया कि वह बदल जाता है।
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इस सम्बन्ध में हिन्दुस्तान के प्राचीन आचार्यों ने और बहुत सी बातें बतलाई हैं, परन्तु उनका सम्बन्ध स्वरोदय से नहीं है। लेकिन कुछ एक ऐसी आवश्यक बातें हैं जिन से अभ्यासी को बहुत कुछ सरलता होगी। यदि शुक्ल पक्ष में गर्भ रहे तो लड़की नहीं तो लड़का। कृष्ण पक्ष में लड़की होती है। यदि २, ४, ६, ८, १२, १४, १६ इत्यादि दिनों में संभोग किया जावे, तो लड़का और यदि १, ३, ५, ७, ९, ११, १३, १५ दिनों अर्थात् तिथियों में संभोग किया जावे तो लड़की होती है।
यदि पुरुष स्त्री की अपेक्षा बलवान् है तो लड़का होगा — अन्यथा लड़की। चाहिए कि इन सब बातों को मिलाकर काम लिया जावे, तो इच्छानुसार लड़का लड़की उत्पन्न हो सकते हैं।
(पृष्ठ ३१-३२ भी देखें)
यात्रा
दाहिने स्वर में जाइये, पूरब उत्तर राज। सुख सम्पत्ति आनन्द करें, सभी होइ शुभ काज॥
बायें स्वर में जाइये, दक्षिण पश्चिम देश। सुख आनन्द मंगल करें, जो जाए परदेश॥
यदि उत्तर और पूर्व की यात्रा करनी है तो दाहिने स्वर में प्रस्थान करें। यदि पश्चिम और दक्षिण की यात्रा करनी है, तो बायें स्वर में चले। इसके विपरीत चलने से हर प्रकार की हानि उठानी पड़ती है। यात्री घर भी वापिस नहीं आने पाता। कभी—कभी अकाल मृत्यु हो जाती है। लेखक को स्वयं अनुभव है, जबकि वह प्रयाग से छिन्दवाडे के लिए रवाना हुआ था, रात्रि का समय था। शाम से ही यह समस्या उपस्थित थी कि रेल का समय रात्रि का है। यात्रा विशेष कार्य के लिये है। एक आत्मीय की बीमारी का
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(स्वरोदय विज्ञान)
हाल सुन कर जाना है। उस समय उसके आश्चर्य की सीमा न रही जब रात्रि को असमय ही चन्द्रमा स्वर और पृथ्वी तत्व चलने लगे। दक्षिण यात्रा में यह बहुत ही शुभ घड़ी गिनी जाती है। उसने इसका वर्णन उसी समय किया। छिन्दवाड़ा पहुँचने पर सब कुशल पाया। स्वरोदय शास्त्र इस प्रकार से भावी घटनाओं का पता बतलाता है और अनिश्चित भविष्य का एवं प्रकृति के गुप्त भेदों का पर्दा खोल देता है।
जल पृथ्वी तत्व में चले, सुनो कान दे वीर। सुफल कारज दोनों करे, कै धरती कै नीर।
पृथ्वी और जल तत्व की यात्रा सहायक यात्रा कहलाती है। आकाश, वायु व अग्नि तत्व में जो यात्रा की जाती है, उसमें बड़ी हानि होती है। एक आचार्य का कथन है कि आकाश तत्व में यात्रा करें तो यात्रा में मृत्यु हो या बीमारी हो। वायु तत्व की यात्रा से बीमारी होती है। अग्नि तत्व से किसी प्रकार का आघात होवे। निराशा और कार्य में असफलता इन तत्वों की यात्रा के प्रधान लक्षण हैं। जब यात्रा को चले तो देखें कि श्वास दाहिना है या बायाँ। यदि श्वास दाहिना चल रहा हो तो तीन पग दाहिने पैर पहिले उठा क चले और एक क्षण ठहर वही पैर आगे रखे और चला जावे। इच्छित कार्य हो जावेगा। चन्द्रमा में बायें पैर को ४ बार पहले उठाना पड़ता है।
दाहिने स्वर में जाइये, दहिने डग धर तीन। बायें स्वर में चार डग, बायें कर प्रवीन॥
सुषुम्ना स्वर में कभी भी यात्रा नहीं करनी चाहिए अन्यथा हर प्रकार की हानि होती है।
गाँव परगने खेत पुनि, इधर उधर सुन मीत। सुषुम्ना चलत न चालिए, वर्जत हे रणजीत॥
विज्ञान)
न रही । दक्षिण न उसी स्त्र इस का एवं
आकाश, है। एक तृप्त्यु हो । किसी जो यात्रा है या ले उठा त कार्य
प्रकार
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प्रश्नोत्तर विधि
इसका अभ्यासी भविष्य का वर्णन बहुत अच्छी तरह से कर सकता है। यदि वह तत्त्व और स्वरो के साधन को पूरा कर चुका हो, तो प्रश्नों का उत्तर अति उत्तमता से दे सकता है। जब कोई आकर प्रश्न पूछे, तो देखो कि कौन सा स्वर चलता है और इस समय कौनसा तत्त्व चलता है। प्रश्नोत्तर करने वालों को और स्वरोदय के प्रेमियों को नीचे लिखे उपदेशों पर अवश्य रोज ध्यान रखना चाहिए।
१- आज प्रातःकाल कौन सा स्वर चल रहा था। वह गलत तो नहीं है अर्थात् वह विपरीत तो नहीं है। जिस तिथि में या पक्ष में जो स्वर चलना चाहिए वह ठीक है या नहीं।
२- आज कौन तिथि है? पक्ष कौन सा है?
३- कौन दिन है?
४- नक्षत्र कौन सा है? और कब तक है? जब कोई प्रश्न करें तो इन नीचे लिखी हुई बातों का ध्यान रखें -
१- प्रश्न करते समय कौन सा स्वर चल रहा है?
२- कौन सा तत्त्व चल रहा है?
३- लग्न कौन सी है?
४- प्रश्नकर्ता ने किस दिशा से बैठ कर प्रश्न किया है?
५- कौन सा नक्षत्र है?
६- कौनसी तिथि है?
७- स्वर अन्दर को जा रहा है या बाहर को अर्थात् प्रश्न करते समय साँस अन्दर ले रहे हो या निकाल रहे हो।
८- प्रश्नकर्ता का कौन सा स्वर चल रहा है?
९- कौन दिन है?
जिस दिन अभ्यासी का स्वर ठीक न हो- अर्थात् तिथि के अनुकूल न
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(स्वरोदय विज्ञान)
हो, उस दिन या तो प्रातःकाल में उसे शुद्ध कर ले या उस दिन भर प्रश्न का काम न करें।
यदि इडा नाडी (चन्द्रनाडी) चल रही हो और प्रश्नकर्ता ने नीचे से या पीछे से या दाहिने से पूछा हो, तो काम नहीं होगा। यदि स्वर पिंगला है और प्रश्न नीचे, पीछे या दाहिने से किया गया है तो काम हो जायेगा।
नीचे पीछे दाहिने स्वर सूरज को राज।
यदि स्वर पिंगला है और प्रश्नकर्ता ने प्रश्न ऊपर से या सामने या बायीं ओर से किया है, तो काम न होगा। यदि स्वर इडा है और प्रश्न ऊपर, सामने या बायें से किया गया है, तो काम हो जावेगा।
यदि आकाश-तत्व में प्रश्न किया गया है, तो प्रश्न दिल्लीगी का है। यदि वायु तत्व में प्रश्न किया गया है तो प्रश्न यात्रा विषयक है। यदि अग्नि तत्व में प्रश्न किया गया हो, तो धातु सम्बन्धी प्रश्न होगा। जैसे रुपया पैसा इत्यादि। जल तत्व में प्रश्न जीव के सम्बन्ध में है। पृथ्वी तत्व का प्रश्न 'मूल' विषयक होगा।
वायु तत्व में प्रश्न यात्रा और कष्ट दूर करने के विषय में होगा। उत्तर दो कि फल मध्यम है।
अग्नि तत्व में प्रश्न धन, लाभ, हानि इत्यादि का होगा, उत्तर दो कि सफलता होगी, परन्तु परिश्रम के बाद। पृथ्वी तत्व में पृथ्वी के सम्बन्ध में प्रश्न होगा—खेती बाड़ी देश इत्यादि सम्बन्धी होगा। उत्तर दो कि कार्य उत्तमता से पूरा होगा। परन्तु देरी थोड़ी सी जरूर होगी। जल तत्व में प्रश्न जन्म, मरण, जीव का आना, प्रेम, इत्यादि के सम्बन्ध में होगा। उत्तर दो कि मन-मानी सफलता प्राप्त होगी।
जल पृथ्वी के योग में, जो कोई पूछे बात।
शशि घर में सूरज चले, कहो कारज हो जात।
पावक और आकाश में, वायु कमी जो होय।
जो कोई पूछे आयकर, शुभ कारज नहि होय॥
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जल पृथ्वी में दृढ़ता के काम किये जाते हैं। अग्नि और वायु दहिने स्वर में चरकारज से सम्बन्ध रखते हैं। जिस दिशा से प्रश्नकर्ता बैठ कर पूछे यदि वह स्वर चलता हो तो काम हो जावेगा अन्यथा नहीं। यदि इडा स्वर में प्रश्न किया गया है और तिथि इडा के अनुकूल है, तो काम बहुत अच्छी तरह हो जावेगा। अन्यथा कुछ विघ्न होगा। दिन और नक्षत्र यदि स्वर के अनुकूल हों तो काम शीघ्र ही हो जावेगा अन्यथा जितने अंश प्रतिकूल है, उतनी ही देरी से या विघ्नों से काम होगा।
यदि बहते स्वर की तरफ से; अर्थात् चलते श्वास की तरफ से बन्द स्वर पर कोई आकर बैठ जाये तो कह दो काम में विघ्न है।
जब स्वर भीतर को चले, कारज पूछे कोय।
पैज बाँध वासों कहो, मनसा पूर्ण होय।।
जब स्वर बाहर को चलें, तब पूछे कोई तोय।
वाकों ऐसे भासियो, नहिं कारज विधि कोय।।
दहिने सेती आय कर, बार्ये पूछे कोय।
जो बार्ये स्वर बन्द हैं, सफल काज नहिं होय।।
बार्ये सेती आयकर, दहिने पूछे धाय।
जो दहिनो स्वर बन्द हैं, कारज अफल बताय।।
यदि प्रश्नकर्ता और अभ्यासी के स्वर एक ही हों और सब बातें मिलती हो तो काम हो जायेगा। यदि स्वर और तत्व दोनों मिल जावें तो काम अवश्य हो जावें। उत्तर देते समय इन सब बातों का ख्याल रखना चाहिए। खूब सोच समझ कर उत्तर देना चाहिए कभी भी उत्तर झूठ न होगा।
गर्भ सम्बन्धी प्रश्न
प्रश्न — गर्भ है या नहीं?
उत्तर — यदि प्रश्न बन्द स्वर की ओर बैठ कर करें तो है अन्यथा नहीं। काम होगा या नहीं, इस प्रकार के प्रश्नों का निर्णय चलते स्वर से किया जाता
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(स्वरोदय विज्ञान)
है परन्तु इसके प्रश्न बन्द स्वर से लिये जाते हैं।
प्रश्न – इस गर्भ से लड़का होगा या लड़की?
उत्तर – अभ्यासी का बायां स्वर है तो लड़की और यदि दायां है तो लड़का पैदा होगा। यदि दोनों स्वर चलते हों तो दो लड़कें पैदा हों या दो लड़कियाँ।
प्रश्न – लड़का या लड़की दीर्घायु होंगे या अल्पायु?
उत्तर – यदि प्रश्नकर्ता और अभ्यासी के स्वर एक सामान हों तो लड़का या लड़की चिरायु है अन्यथा अल्पायु। यदि वायु तत्व है तो गर्भपात हो या लड़की हो। सुषुम्ना स्वर में आकाश तत्व चलता हो, तो गर्भपात है। आकाश तत्व में हिजड़ा पैदा होता है। यदि अभ्यासी का दाहिना स्वर हो और प्रश्नकर्ता का बायाँ और प्रश्नकर्ता यदि बायीं ओर से प्रश्न करता हो तो लड़की और उसकी माता दोनों का देहांत हो जाय। यदि पृथ्वी तत्व चल रहा हो, तो लड़की दीर्घायु हो। जल तत्व से सदाचारी लड़का हो। अग्नि तत्व हो तो गर्भपात हो।
शेष सम्बन्धी प्रश्न (पृष्ठ २३, २४, २५ भी देखें )
प्रश्न-उत्तर यदि बन्द स्वर की तरफ से प्रश्नकर्ता चलते स्वर की तरफ बैठ कर प्रश्न करें तो रोगी को आराम हो जायेगा। यदि प्रश्नकर्ता और अभ्यासी दोनों एक ही तरफ हो तो रोगी को आराम हो जायेगा। यदि नक्षत्र, लग्न, दिन, तिथि इत्यादि सब उस स्वर के अनुकूल हों तो बहुत जल्द बीमारी दूर होगी, अन्यथा उतनी ही देरी होगी जितनी की इनसब की अनुकूलता में भेद पड़ेगा। यदि प्रश्नकर्ता ऊपर से, ठहर कर प्रश्न करें तो आसार बुरे होंगे। यदि बहते स्वर की ओर से आकर बन्द स्वर की तरफ आवे तो बीमार मर जावे। यदि प्रश्न के समय बायें स्वर में जल या पृथ्वी तत्व हो तो शीघ्र ही आराम हो। वायु और आकाश तत्व प्रश्न के समय जारी हों, तो मरीज मर जावे, अन्यथा उसको आराम हो।
यात्रा सम्बन्धी प्रश्न
यदि प्रश्नकर्ता और अभ्यासी दोनों का दाहिना स्वर चलता हो, तो
(स्वरोदय विज्ञान)
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यात्री शीघ्र ही वापिस आ जायेगा। यदि दोनों का बायाँ स्वर चलता हो तो देर से वापिस आवे। यदि दोनों के स्वर भिन्न-भिन्न हों तो बहुत देर में यात्री वापस आवे। यदि चलते स्वर से आकर बन्द स्वर की ओर बैठ कर प्रश्नकर्ता किसी प्रकार का प्रश्न करे, तो कार्य कदापि न हो संभव है बना बनाया काम भी बिगड़ जाय। यदि प्रश्नकर्ता बन्द स्वर की ओर से आकर चलते स्वर की ओर बैठकर प्रश्न करे तो चाहे उस काम में कौसी भी निराशा हो- वह काम बन जायेगा। यदि उसी समय पृथ्वी या जल तत्त्व चलता हो, तो चाहे कितने भी विघ्न सामने हों, कार्य अवश्य पूरा हो जाय।
सुषुम्णा स्वर में यदि कोई प्रश्न किया जायगा तो वह कभी भी पूरा न हो परन्तु यदि सामने से ठहर कर प्रश्न किया जाय तो उसका फल मध्यम है संभव है कि कार्य हो जाय।
साधारण-फल
यह बात स्वरोदय शास्त्रियों में प्रसिद्ध है जब कोई प्रश्नकर्ता प्रश्न करता है और उस समय यदि दाहिना स्वर चले तो काम बन जाता है; परन्तु यह भूल है, कभी-कभी इससे उत्तर ठीक मिल जाता है, जबकि प्रश्नकर्ता दाहिनी ओर बैठ कर प्रश्न करता है अन्यथा नहीं।
भविष्य-फल
वर्ष फल
चैत्र मास में जब शुक्ल पक्ष आरम्भ हो उस दिन सवेरे यह देखें कि, कौन सा स्वर चल रहा है और कौन सा तत्त्व है। यदि संक्रांति का फल मालूम करना है तो सूर्योदय के समय स्वर और तत्वों का निरीक्षण करे। यदि बायाँ तत्त्व चलता हो और उसमें पृथ्वी तत्त्व भी हो, तो वर्ष अच्छा है, राजा और प्रजा शान्तिपूर्वक रहेंगे; देश की वृद्धि हो, पानी बरसे, कृषि अच्छी रहें और अभ्यासी का भी वर्ष अच्छा जाये।
यदि जल तत्त्व चलता हो तो वर्षा खूब हो, अनाज की उपज अच्छी हो। प्रजा में आनन्द और मंगल रहें।
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(स्वरोदय विज्ञान)
जल और पृथ्वी तत्व तथा दाहिना स्वर चले, तो भी अच्छा फल होता है।
यदि प्रातःकाल सुषुम्ना स्वर चले, तो राजा का नाश हो या कोई दूसरा राजा राज्यारूढ़ हो। देखने वाला एक वर्ष में मर जायें और अकाल या दुर्भिक्ष पड़े।
आकाश तत्व में दुर्भिक्ष हो, वर्षा न हो, प्रजा दुःखी रहे, राज्य में उत्पात हो और घास भी कम हो। अग्नि तत्व में अकाल पड़े, रोगादिक बढ़ें और वर्षा थोड़ी हो। वायु तत्व में नगर में उत्पात हो, वर्षा थोड़ी हो और अकाल पड़े।
यह मालूम करने के लिए कि इस समय कौन दिन का दौरा है — यह मालूम करें कि इस समय कितने घड़ी दिन चढ़ा है। सूर्योदय से ढाई घड़ी तक उसी दिन का दौरा और बाद की २॥ घड़ी तक उसके छठवें दिन का दौरा रहता है। इस तरह के हिसाब से मालूम कर ले कि, इस समय किस दिन का दौरा है।
(स्वरोदय विज्ञान)
(२६)
उदाहरण के लिए आज रविवार है, पहली ढाई घड़ी रविवार, दूसरी ढाई घड़ी शुक्र, तृतीय बुध इत्यादि।
कालज्ञान
मृत्यु के पूर्व ही मृत्यु का हाल मालूम करना असाधारण बात है। परन्तु स्वरोदय शास्त्र ने इस विषय के अनुभव से कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं जिनसे मनुष्य बहुत पहले से ही अपनी मृत्यु का हाल मालूम कर सकता है। यदि आठ पहर तक दाहिना स्वर चले और स्वर न बदले, तो जानो कि मृत्यु तीन वर्ष के भीतर हो जावेगी। यदि १६ पहर तक दाहिना स्वर चले और बदले नहीं तो दो वर्ष जीवन के शेष समझो।
यदि तीन दिन और तीन रात बराबर दाहिना स्वर चले तो एक वर्ष जीवन का शेष है।
यदि सोलह दिन और सोलह रात दाहिना स्वर चले, तो एक मास जीवन शेष है। यदि एक मास रात दिन दाहिना स्वर चले तो दो दिन जीवन के बाकी हैं। यदि पाच घड़ी बराबर सुषुम्पा स्वर चले तो मनुष्य शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो। यदि मुंह से श्वास निकलने लगे, तो अधिक से अधिक चार घड़ी वह और जीवित रह सकता है।
यदि बायीं सांस चार दिन या आठ दिन या इससे अधिक चले तो अभी जीवन यात्रा लम्बी है— शीघ्र समाप्त न होगी।
रात को दाहिना स्वर और दिन को बायीं चले, तो मनुष्य दीर्घायु रहे। यदि रात को बायीं और दिन को दाहिना स्वर लगातार एक मास तक चले, तो मनुष्य ६ मास में भर जावे। यदि आकाश तत्त्व तीन रात और तीन दिन बराबर चले तो मनुष्य एक वर्ष में मर जावे।
तत्त्वज्ञान
तत्त्वों को वश में लाने से मनुष्य प्रकृति के गुप्त भेदों को भलीभाँति समझ सकता है और अपने जीवन को नियमित जीवन बना सकता है।
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(स्वरोदय विज्ञान)
तत्त्वों को वश में करने का पहला साधन तो यह है कि मनुष्य अपने सब काम स्वर के अनुसार करें—जिससे स्वर उसके अधीन हो जावें।
दूसरा साधन यह है कि, प्रातःकाल या जिस समय मन संसारिक झंझटों से निश्चित हो, परन्तु प्रातःकाल का समय ही अच्छा होता है, उस समय आकाश में किसी स्थान पर दृष्टि जमावे। कुछ दिनों के पश्चात् उसको रंगबिरंग की आकृतियाँ इधर उधर आकाश में फिरती दिखाई देंगी और अभ्यास के बाद जो तत्त्व अभ्यासी का चल रहा है उसी का रंग आकाश में दिखाई देगा। नेत्र बन्द कर लेने से भी वही रंग दिखाई देगा।
तृतीय साधन यह है कि, जब इतना अभ्यास हो जावे और तत्त्वों को आप भलीभाँति पहचान सकें, तब रात्रि को तीन चार बजे सोकर उठें। सब प्रकार से निश्चित होकर आसन मारकर बैठ जाय और मालूम करें कि, इस समय कौन सा तत्त्व चल रहा है। जब यह मालूम हो जावे कि इस समय कौन सा तत्त्व चल रहा है तो इस प्रकार के साधन करें।
तत्त्व-साधन
यदि आकाश तत्त्व चल रहा है तो उस समय यह ध्यान करें, कि बहुत सा प्रकाश है—जिसका कोई रूप नहीं उस समय (है) का जप करें।
यदि अग्नि तत्त्व चल रहा हो, तो एक त्रिकोण आकृति का ध्यान करें—कि इसका रंग लाल है—जो शरीर में गर्मी रखती है, भोजन जिससे पचता है और यह देखा कि तुम इस स्वरूप को गर्मी को एकाएक बरदाश्त नहीं कर सकते। इस समय (रै) का जप करो।
यदि जल तत्त्व का वेग है तो अर्द्ध चन्द्रमा का ध्यान करो जो अति प्रज्वलति और अति निर्मल है। यह गर्मी और प्यास को दूर करता है। मानसिक योग के बल से गहरे पानी में गोता लगाओ। इस समय (वै) का जप करो।
यदि पृथ्वी तत्त्व चलता हो, तो, चतुष्कोण आकृति का ध्यान करो,
(स्वरोदय विज्ञान)
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जिसका रंग पीला है। इसमें से मीठी वास निकल रही है—जो कि सब प्रकार की बीमारियों को दूर कर सकती है। इस समय (लै) का जप करो।
यदि वायु तत्त्व चल रहा हो, तो गोल आकृति का ध्यान करो जिसका रंग हरा है—जो तूफान में से पक्षी के समान ऊँचा उठता दिखाई देगा। इस समय (यँ) तत्त्व का जप करो।
इन तत्वों के साधने से मनुष्य को बड़ी भारी शक्ति प्राप्त हो जाती है। इन्हीं के बाद मनुष्य योग और स्वरोदय का सम्बन्ध समझ सकते हैं, इसकी स्वाभाविकता पर विश्वास ला सकते हैं।
स्वरोदय शास्त्रियों ने और शिवजी ने लिखा है कि आकाश तत्त्व जिसके वश में है—वह त्रिकालज्ञ हो जाता है। वायु से अति वली हो जाता है। अग्नि से गर्मी बरदाश्त कर सकता है। जल तत्त्व से पानी का भय नहीं रहता। पानी बरसा सकता है। पृथ्वी तत्त्व से स्वास्थ्य को बनाये रख सकता है।
कुछ समय अभ्यास करने से तत्त्व सिद्ध हो जाते हैं और फिर हमेशा के लिए ये अपने वश में हो जाते हैं। इनसे बड़े-बड़े काम निकाले जाते हैं।
प्रति दिवस तत्वोदय ज्ञान-तालिका
| सू | च | म | बु | वृ | शु | श |
|---|---|---|---|---|---|---|
| पृथिवी | जल | अग्नि | पृथिवी | वायु | अग्नि | आकाश |
विशेष—मंगल के दिन तिथि तथा दिन दोनों से विपरीत स्वर अर्थात् चन्द्र पहिले पहल चले तो अशुभ हो, गर्मी अधिक हो।
(३२)
(स्वरोदय विज्ञान)
॥ श्री गणेशायनमः ॥
स्वरोदय
अथ स्वरोदय लिख्यते -
सतगुरु ने कृपा करी जाप बतायो जाप। निसवासर तासे लगै, छोड़ न छिन्ताई॥
सुर दाता सब बात कौ मालिक और न कोई। उदै अस्त लखिवै करै, अटल अमर यह होई॥
तब सुर को विचारन लगै। रोज पानी से गैल सीवन लगै। हमेसा अलोप रहे। चारि दिन डेरे स्वर के हैं। बुध, बृहस्पति, शुक्र और सोमवार ये चार दिन चन्द्र स्वर के हैं। इनके उदै में डेरी सुर चलत है। सब काहू को चारि वरन मैं। और कोहू बचै नहीं है। भली-बुरी सब ही पर बीति जाति है। काहू को खबर नाहि परति है।
ईश्वर मानस से कहत है। मनुष्य की देही सब औतारन से बड़ी है। सो कोई स्वास घटाई जानत है और साधत है। राजा होई कै स्वर की मरजाद बाँधत है। तौ सूरज का सात पुतेज होई। तब कोई कुछ माँगै चाहे तो ततीछन फल पावै। परजा सुखी सब देस में रोग जन-मन आवै। महा गौन होई और पृथ्वी पर सकल आनन्द रहै। संसार की उपज खिपज जाती जाइ। ऐसे राजा होई और जो साधंगी होई। तो दसौं दिसा के दरसन होई। सब देवतन का दरबार करै। और जे संसार में बीजक बातै हैं। वे सब जानै और बहुत काल जीवै। सब धर्म को जाने। जुगति को जाने, मुक्ति को देखै। ये लछिन योगी जीतै।
और भोगी साथै तो इतने फल पावै। प्रथम पुत्र लाभ होई, सम्पत्ति
(स्वरोदय विज्ञान)
(३३)
लाभ होई। राजा प्रजा सनमान करै और की नहरू जगार करै तो फतै होई और गरीब साधे तो गरीबी मिटि जाइ। तन से मन से धन से आनन्द से रहे। हमेश और सतगुरु मिले तो फल पावै और तीन देवता सुर के रखवारे है। ज करै। फौज लड़े तो जीतै। स्त्री से संगति करै, घोड़े हाथी पर सवारी करै, पोशाक करै, पूजा करै, भोजन करै, पराये घर जाई। इतने चर कारज उलाइते दाहिने सुर में कीजै।
शनीचर, रविवार, मंगल ये दिन दाहिने स्वर के हैं। इन के उदैं में डेरा स्वर चलै तो असुभ जानिये। कछू कारज न करै और जब लौ डैरो सुर चले तब लौ काहूँ सौ न बोले और दोनों सुर बराबर चलते होई और शनीचर का दिन होई। आकास तत्व होई और पहर भर चलै सनीचर में उदय में तो जीवन मुक्ति होई।
पाँच पहर में देवलोक होई और बचाय चाहे तो प्यास लगे तो पानी न देई। अन्न न दे। भूख लगै तौ दूध देई पीव को और कछू न देई। तो सुर फिर जाई। मरै नहीं काल हुमसि जाई। सुख पावै। और इतवार दिन होई, पृथ्वी तत्व होई चारि पहर एक सौ चलै। दाहिने सुर में तो बड़ो फल होई। मरै तो दोऊ जनम की खबर कहै कौनहू जोन में जनम लेई।
और सोमवार के दिना चन्द्र सूर सोलह पहर चलै रात दिन तो जानिये के बड़ी आनन्द हुई है। और कदाचित मरै तो ब्राह्मण होई तो जल दाग देई तौ नौ नाथ के हर बारे जाई। तीन आसमान को खबरें कहे। सब देवतन को दरबार करै।
जलतत्तु के गुण—मंगल के उदैं में अग्नि तत्तु बहे चारि पैहर। तो देही को कछू कष्ट उपजै। बचाये चाहे तो कछू उपाई करै। दोऊ सुरन में ठैंठा देई, मुख होकैं स्वाँस कढ़नन न दै। नाक होई न कढ़न देई, अन्न पानी कछू न देई। तौ कष्ट छूटै सुख पावै।
और बुध के उदय में पृथ्वी तत्त चलै चार पहर तौ जानियो कि मनसा पूर्ण होई है और बृहस्पति के उदय तो सरदी को नास होई। जन सुख पावै