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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

१३६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ अनन्तर अर्घपात्र में स्थित जलविन्दु से याग के सारभूत फूल आदि का प्रोक्षण हो जाना चाहिए। इसके अनन्तर प्रभामण्डल में (यागगृह में), सुलिप्त भूमि पर अथवा अपने शरीर के विशेष स्थान पर 'ॐ बाह्यपरि- वाराय नमः' इस मन्त्र के द्वारा पूजन करना चाहिए। यागगृह के द्वार पर 'ॐ द्वारदेवताचक्राय नमः' इस मन्त्र से पूजन होना आवश्यक है।१ उसके बाद अगर पूजन गुप्तरूप से न हो तो यागस्थान में प्रवेश कर मण्डल और स्थण्डिल के सम्मुख बाह्य परिवार के साथ द्वारदेवताचक्र का पूजन और पहले बताये गये न्यास करना चाहिए, बाहर पूजन नहीं करना चाहिए। इसके बाद फट् फट् फट् इस अस्त्रमन्त्र के द्वारा मन्त्रित पुष्प को निक्षेप कर२ विघ्न दूर हो गया ऐसे ध्यान करने का अनन्तर यागगृह के अभ्यन्तर में अनन्त परमेश्वर के किरणों से भास्वर दृष्टि के द्वारा यागगृह के चारों दिशाओं को देखना चाहिए। मुक्तिकामी शिष्य उत्तर दिशा के अभिमुख होकर बैठे, ताकि अघोर से उत्पन्न अग्नि उसके सभी पाशों को जला दें। परमेश्वर की स्वातन्त्र्य- शक्ति ही मूर्ति के आभासन के द्वारा दिक् रूप तत्त्वको प्रकाशित करती है।३ उस दिक् रूपी तत्त्व अर्थात् पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर आदि १. द्वार के ऊर्ध्व में गणेश और लक्ष्मी का, इसके दाहिने और बाँये में दिण्डी और महोदर का और मध्य में वागीश्वरी का पूजन करना आवश्यक है। अपने दाहिने नन्दी का, बाँये काल का, मध्ये गंगा का, द्वार के ऊर्ध्वशाखा में यमुना का, छाग और मेषास्य का, द्वार के निम्नभाग में अनन्त और आधार शक्ति और मध्य में सरस्वती का पूजन होना चाहिए। २. पुष्प का प्रक्षेप नाराचमुद्रा के द्वारा होना चाहिए। अस्त्र मंत्र (फट्) से मन्त्रित पुष्प विघ्नरूप पाश को जला डालता है। दिव्यदृष्टि से देखने का तात्पर्य यह है कि उस में विशेष प्रकार गुणों का आधान हो। विघ्नों का पुनः प्रवेश न हो इसलिए दिशाओं का बन्धन भी होना आवश्यक है। मुमुक्षु उत्तराभिमुख होकर और भोगेच्छु पूर्वाभिमुख होकर बैठे। ३. अद्वैत सिद्धान्त के अनुसार दिक् नाम का कोई पृथक् पदार्थ नहीं है। क्योंकि संवित्प्रकाश ही अपने स्वातन्त्र्य से विभिन्न वस्तुओं (मूर्तियों) को आभासित करता है। इसके फलस्वरूप एक आभास दूसरे आभास से दूर और निकट रूप में प्रकाशित होता है। पूर्व पश्चिम ऊर्ध्व अधः आदि दिग्विभाग भी आभास से अतिरिक्त कोई विषय नहीं है। तो भी व्यवहार

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १३७ दिशाओं में जो चित्प्रकाशरूप है वही मध्य है। यहीं से अर्थात् मध्य से ही भिन्न-भिन्न दिशाओं के विभाग उत्पन्न होते हैं। जहाँ प्रकाशस्वरूप को अपनाया जाता है वह ऊर्ध्व है, जो दिशा उस प्रकार नहीं है अर्थात् जहाँ प्रकाश को अस्वीकृत किया गया है वह अधः है, प्रकाश की उन्मुखता जहाँ है वह पूर्व है, इससे भिन्न पश्चिम है। सम्मुख में स्थित प्रकाश उस प्रकाशधारा का आरोह स्थान है वह दक्षिण है क्योंकि उस दक्षिण दिशा में प्रकाश की ओर अनुकूलता वर्तमान है। इसी दक्षिण दिशा के सम्मुख जो दिशा अवभासित होता है वह उत्तर दिशा है। ये ही चार दिशाएँ हैं।१ मध्यभाग में भगवान् हैं, ऊर्ध्व में उनका ईशान की सिद्धि के लिए दिक् के जो विभाग हैं वे निम्नप्रकार है। परप्रकाश रूप परमेश्वर के पर, परापर और अपर रूपों में कभी प्रकाशभाग मुख्य गौण बन जाता है जिससे दिग्विभाग की विचित्रताएँ आती हैं। जब परमेश्वर का परस्वरूप जो एकमात्र प्रकाश ही प्रकाश है तब उस स्थिति का नाम ऊर्ध्व पड़ता है। प्रकाश के स्पर्श प्राप्त करने में असमर्थ स्थिति अधः है। इन दो स्थितियों के अन्तराल में जो प्रकाश और अप्रकाशरूप है वह मध्य है। जिस दिशा में प्रकाश की ओर किंचित् उन्मुखता आती है वह पूर्व है। इसी प्रकार अप्रकाश के योग के कारण प्रकाश के प्रति जो विमुखता है वह पश्चिम है। वही किंचित् प्रकाश जब अपने प्रकाश में स्थित विक्षेप को परामर्शन करते हुए स्वप्रकाशमय परिपूर्ण आत्मस्वरूप में स्थित रहता है तब वह दक्षिण दिशा है जिसमें प्रकाश की अनुकूलता वर्तमान है। उत्तर दिशा में अप्रकाश स्थिति पुनः जग उठती है—जिसमें प्रमेयबोध की मुख्यता है। १. परमेश्वर का ईशानरूपी मुख ऊर्ध्व में स्थित है, जो परिपूर्ण प्रकाशमय है। तत्पुरुष प्रकाश की ओर उन्मुख है। यह पूर्व दिशा में है। अघोर वक्त्र प्रसृतप्रकाश के उद्रेक से अनुकूल है, इसलिए इस दिशा का नाम दक्षिण पड़ा। वामदेव में प्रकाश की प्रतिकूलता वर्तमान है, यह उत्तर दिशा है। यहाँ प्रमेयरूपी इन्दु का संस्पर्श वर्तमान है, अतः यह सोमारूप उत्तर दिशा में है। फिर सद्योजात मुख प्रकाश की विपरीतता या वैमुख्य है, इसलिए यह पश्चिम दिशा में है। अधोवक्त्र प्रकाश संस्पर्श का अयोग्य है। इसलिए इस वक्त्र का नाम है पिचुवक्त्र। इन वक्त्रों के साथ पञ्चभूतों का भी सम्बन्ध है। आकाश, वायु, वह्नि, जल और पृथ्वी आदि इन पाँचों का सम्बन्ध ईशान आदि वक्त्रों से है।

१३८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ वक्त्र है, अधोभाग में पाताल वक्त्र है, पूर्व आदि चार दिशाओं में क्रमशः तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात तथा वामदेव सम्बन्धी मुख हैं। इन चारों के बीच में अन्य चार हैं¹—इस प्रकार संवित् ही अपनी महिमा से मूर्तियों के भेद से दिशाओं के भेदों को प्रकाशित करती है। अतः दिक् कोई अलग तत्त्व नहीं है। अपने शरीर की छाया लाँघने की इच्छा होने पर भी वह जैसे सामने ही रह जाती है उसी प्रकार परमेश्वर मध्य में ही स्थित रहते हैं। सभी वस्तुओं का अधिष्ठातृत्व हो माध्यस्थ्य है ऐसा कहा जाता है। इसी प्रकार भगवान् जैसे दिशाओं के भेदों को उत्पन्न करने वाले होते हैं सूर्य भी उसी प्रकार है।² सूर्य स्वयं परमेश्वर सम्बन्धी ज्ञानशक्ति है ऐसा विभिन्न स्थानों में वर्णित हुआ है। इस ज्ञानशक्ति की अभिव्यक्ति जहाँ पहले होती है वह पूर्व है जहाँ सूर्य भी वहाँ है। इस सिद्धान्त के अनुसार पूर्व आदि दिशा आत्माधीन है इसलिए स्वसम्मुख देश का ही नाम पूर्व है। अतः निजी आत्मा, सूर्य और परमेश्वर इन त्रितय की एकात्मकभावना के द्वारा दिशा सम्बन्धी विचार होना चाहिए—यही श्री अभिनवगुप्त के गुरुओं का सिद्धान्त है। इस स्थिति के अनुसार उत्तराभिमुख होकर³ बैठ कर देहरूपी पुर्यष्टक आदि में अहं भाव (अहं अभिमान) को छोड़कर देहस्वरूप को जला देना चाहिए। जैसे दूसरे का देह निकट रहने पर उसमें १. ऊर्ध्व और अधः को छोड़कर अग्नि, नैऋत, वायु और ईशान जो क्रमशः पूर्व-दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम-उत्तर, उत्तर-पूर्व आदि दिशाएँ हैं ये मध्यरूपी परप्रकाश के सम्बन्ध से उदित होती हैं। जिसे माध्यस्थ्यरूप में वर्णित किया गया है वह सब दिशाओं का ही नहीं सभी के ही आधार हैं, वे प्रकाश-ही-प्रकाश है, किसी का प्रकाश्य नहीं बनते । २. शास्त्रीय दिग्विभाग जैसे प्रकाशरूपी शिव पर आश्रित है उसी प्रकार लौकिक दिग्विभाग भी सूर्य पर आश्रित है। ज्ञानशक्ति ही आदित्य-विग्रह के रूप में आकाश में भासमान है। सूर्य के द्वारा दिग्विभाजन निम्न उपाय से किया जाता है। विषुवत् दिन में जब दिन और रात समानकाल-स्थायी होते हैं उस दिन सूर्य जिस दिशा में स्थित रहता है वही पूर्व-दिशा है। ३. परमेश्वर जो मध्यस्थित हैं उन्हें ग्रहण करने की इच्छा से पूजक जिस दिशा की ओर बैठते हैं वह दक्षिण है। उसका पिछला भाग ही उत्तर है।

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १३९ अभिमान न रहने के कारण वह अदेह है। १ उसके अनन्तर निस्तरंग ध्रुवधाम में सुदृढ़निष्ठा उत्पन्न कर फिर से नवीन देह की रचना करनी चाहिए। वह ध्रुवधाम स्वभावतः सृष्टि का उदय करनेवाला है। संविद् जब तरंगित हो उठती है तब उसकी जो आद्या (प्रथम) कला है वह मूर्ति है। २ उस नवनिर्मित मूर्ति पर उपदिष्ट विधि के अनुसार याज्य देवता- चक्र का न्यास होना चाहिए। मुख्यतया शक्तियों का ही पूजन यहां अभिप्रेत है। भगवत्स्वरूप नवात्मा ३ आदि शक्तियों का आसन रूप होने १. शरीर में जो दृढ़ आत्माभिमान है—'मैं शरीरी हूँ' इस प्रकार भावना का नाश दीक्ष मन्त्र के द्वारा सम्पन्न होता है। यद्यपि देहरूपी पुर्यष्टक का नाश मन्त्ररूपी अग्नि के द्वारा सम्पन्न होने पर भी प्राकृत देह का नाश जली हुई लकड़ी के समान नहीं होता है, तो भी देह के विषय में जो अभिमान पहले था मन्त्र के प्रयोग से वह शुद्ध प्रमाता की विमर्शरूपता प्राप्त कर लेता है जिसके फलस्वरूप स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों शरीरों में अभिमान कट जाता है। उस समय स्थूल देह के रहते हुए भी उसमें अभिमान नहीं रहता है। वह शरीर दूसरे के शरीर के समान बन जाता है। केवल मन्त्र से देह का नाश ही इष्ट नहीं। स्थूल और सूक्ष्म शरीर का जो संस्कार है वह भस्म के सदृश है। वर्म मन्त्र के प्रयोग से उस भस्मराशि को हटाकर शुद्धचिदात्मक स्थिति में योगी को रहना चाहिए। वही निस्तरङ्ग ध्रुवधाम है। उसी ध्रुवधाम से शुद्धशरीर की उत्पत्ति होती है। सूक्ष्मशरीर की शुद्धि की विधि निम्न प्रकार हैं—हृदयकमल में सूक्ष्म जुगुनु के समान और दीप्त तारा की तरह उज्ज्वल जीवात्मा को हृदय, कण्ठ, तालु, ब्रह्मरन्ध्र इत्यादि स्थानों से ऊर्ध्व रेचक के द्वारा भेदन कराकर द्वादशान्त में ले जाना चाहिए और परतत्त्व में मन, बुद्धि और अहङ्कार को विलयन कर आत्मा को शून्यरूप में चिन्तन करना चाहिए। २. यह मूर्ति 'सोऽहं' इस प्रकार महामन्त्रात्मक है। सृष्टि के प्रति उन्मुख संवित् का जो आद्य स्पन्द है वही मूर्ति है। भैरव का ही उच्छ्राय (वहि- रुन्मेष) ही मूर्ति का तात्पर्य है। ३. प्रकृति, पुरुष, नियति, काल, माया, विद्या, ईश्वर, सदाशिव और शिव ये नौ हैं। आत्मस्वरूप विमर्शन ही वास्तव में पूजन का वास्तविक तात्पर्य है। विमर्श ही शक्ति है। शिव जो प्रकाशरूप हैं उनका स्वात्मविमर्श ही शक्ति है।

४. आह्निक १७-२२: कुलाचार, मुद्रा-विधान, समावेश एवं उपसंहार

१४० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ के कारण है और गुरुओं के कथन के अनुसार शक्ति ही पूजनीय है। उस पूजन क्रम में पाँच अवस्थाएँ हैं जो जाग्रदादि हैं¹ और जो षष्ठ है वह अनुत्तर नामक स्वभावदशा है जिसका अनुसन्धान सबमें होना चाहिए। अतः न्यास छः प्रकार के हैं, उसमें कारणरूपी ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर सदाशिव और शक्ति आदि रूपों का अधिष्ठान अलग-अलग रूप से छत्तीस तत्त्वों में वर्तमान है। लौकिक तत्त्वों से परे भैरव भट्टारक के साथ अभिन्नता लाने वाले न्यास के द्वारा वह पूजक पूर्ण हो जाता है और उसमें भैरवभाव आ जाता है। इसलिए इस विषय की आवश्यकता क्या है—जैसे कहा गया है— अतः केवल अन्तर्याग से ही वास्तविक कृतकृत्यता आती है।² क्योंकि अन्तर्याग से ही वास्तविक समावेश की प्राप्ति होती है, तो भी बाहर भी याग करणीय है क्योंकि उससे परिच्छिन्नता दूर हो जाती है। जिस साधक में उस प्रकार समावेश की प्राप्ति नहीं होती है उसके लिए बहिर्याग ही मुख्य है। बहिर्याग के अभ्यास से समावेश लाभ होता है— उसमें जो पशुभाव वर्तमान है, उसे हटाने के लिए उसे अन्तर्याग करना उचित है। अन्तर्याग में दृढ़ निष्ठा या परिपक्वता न आने पर भी उस विषय में संकल्प के बल से ही विशुद्धता आती है। इसके अनन्तर जो दीक्षा की अभिलाषी है उसके अधिवास³ के लिए १. अवस्थाएँ पांच हैं जो जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्य और तुर्यातीत हैं अनुत्तर इनसे परे हैं अथच वह सबमें अनुस्यूत है। २. अन्तर्याग से ही जब स्वरूप प्राप्ति होती है तो बहिर्याग का क्या महत्त्व है, इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि मानसयाग किये बिना बाह्ययाग करने पर वह शुभ फल प्रदान नहीं करता है और उस याग से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। जहाँ बहिर्याग मुख्य है वहाँ भी अन्तर्यजन परम आव- श्यक समझा जाता है क्योंकि बहिर्याग के द्वारा आन्तर वृत्तियों का विकास सम्पन्न होता है। योगमार्ग में चलने वालों के लिये बाह्ययजन आन्तर क्रम में आरूढ़ होने के लिए एक सोपान है। बाह्यविधि ही किसी समय आन्तर क्रम में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए बाह्यविधि उपेक्षणीय नहीं है। ३. देवता, गुरु, शिष्य और भविष्य में जो दीक्षा शिष्य को दी जायेगी उन सभी में योग्यताधायक संस्कार ही अधिवास है। यागगृह में वास करना

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४१ भूमिपरिग्रह, गणेश की अर्चना, कुम्भ और कलशों की पूजा, वेदी की अर्चना और हवन करना चाहिए। नित्य और नैमित्तिक दोनों कार्यों में स्थण्डिल आदि का अर्चन और हवन करना हैं। इस अधिवासनरूप कृत्य के द्वारा शिष्य में संस्कारयोग्यता का आधान होता है जैसे खट्टा के खा जाने से दाँतों का खट्टा हो जाने के समान यह संस्कार देवस्वरूप प्राप्त करना ही कर्तव्य है शिष्य में इस प्रकार उन्मुखभाव प्राप्त करना और गुरु के द्वारा इस प्रकार शिष्य को ग्रहण करना ही संस्कार है। याग के उपयोग में आने वाले द्रव्यों को परमेश्वर के तेज के द्वारा समृद्ध होकर यागगृह के अभ्यन्तर में स्थित हैं और उस तेज से समृद्ध होने के कारण वे पूजा के उपकरण होने के योग्य बन गये हैं—इस प्रकार से उनमें योग्यता अर्पित की जाती है। इसलिए उन न्यासों की आवश्यकता प्रतीत नहीं होता है। जैसे कि कहा गया है—'अन्तरङ्गभाव के अधिगत हो जाने पर तत्त्वों के सृष्टि- न्यास आदि से क्या लाभ है'। वही वास्तविक अन्तरंग है जो भैरवरूप है, वे ही अपने स्वरूप में सृष्टि-संहाररूप नाना विचित्रताओं को प्रकाशित करते हैं—इस प्रकाशन कार्य में वे ही पर्यन्तभूमि हैं या अन्तिम स्थिति है। इसी प्रकार से परस्पर मेलक योग से (कौलिक प्रक्रिया के अनुसार) प्राण, शरीर और बुद्धि आदि परमेश्वर स्वरूपता को प्राप्त किये हैं ऐसे चिन्तन करने के बाद बाहर और अन्दर पुष्प, धूप और तर्पण के द्वारा यथासम्भव पूजन करना चाहिए। शरीर, प्राण और बुद्धि में शूल और कमल-न्यास करना चाहिए जो निम्न प्रकार है आधार शक्ति के मूल में मूल शक्ति है, कन्द का स्थान लम्बिका तक है, कलातत्त्व के अन्त तक दण्ड है, ग्रन्थि मायात्मक है। शुद्धविद्यारूप कमल ही चतुष्किका है ही अधिवास शब्द का तात्पर्य है। यह अधिवासरूपी कृत्य गुरु शिष्य के लिए करते हैं। १. दीक्षा में आनेवाली वस्तुएँ निम्न प्रकार हैं—श्वेत पुष्प, तिल, व्रीहि, घृत, आम्रपल्लव, कुश, सिद्धार्थ, खड़ी, करणी, कतंरो, पाशबन्धनसूत्र, वार्घानी, शिवकुम्भ, २४ समिध्, परिधि (सपत्र शाखा ४), समिध्, दन्तकाष्ठ, चरुस्थाली, स्रुक्, स्रुव्, चावल, दूध, मण्डल की रचना के लिये पाँच प्रकार रंगीन चूर्ण, शिष्य की आँखें बन्द करने यो वस्त्र का खण्ड आदि।

१४२] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ उस चतुष्किका पर सदाशिव भट्टारक स्थित हैं।१ वह महाप्रेतरूप हैं— प्रेत इसलिए है कि सभी वस्तुओं का विलयन उन्हीं में हुआ है। उस स्थिति में बोध की ही प्रधानता है, क्योंकि वेद्यरूप शरीर के नाश हो १. पूजन यथायथ सम्पन्न हो, इसलिए अध्वन्यास होना चाहिए। अतः अन्तर्याग के अन्तर्गत आसन का स्वरूप प्रदर्शित किया जा रहा है। यहाँ आसन ही अन्तरंग है। नाभि से चार अंगुल नीचे आधारशक्ति का स्थान है। कन्द नाभि तक विस्तृत है ऐसी कल्पना होनी चाहिए। उस कन्द के सबसे नीचे धरा, उसके ऊपर सुरा समुद्र जो अप् तत्त्व का व्यापक है। उसके बाद तेजस्तत्त्व का स्थान है जिससे मेय की परिच्छिन्नता आती है। वायु पोतरूपी है। इस प्रकार चार अँगुलियों से व्याप्त स्थान क्रमशः धरा आदि के स्थान समझने चाहिए। इन चार तत्त्वों का व्यापक व्योम है। इसके बाद कमल का नाल है जो लम्बिका (तालुरंध्र) तक विस्तृत है। तन्मात्राओं से कला तक तत्त्व समूह इस नाल में स्थित हैं। नाल में जो काँटें हैं वे भुवनों के प्रतिनिधियां हैं। उनके ऊपर जो ग्रन्थि है वह माया है। इस मायात्मक ग्रन्थि में धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य आदि स्थित हैं। इस ग्रन्थि के ऊपर शुद्ध विद्या का आसन है जिसके निचले भाग में माया का आवरण है जो स्वरूप का आच्छादक है, और ऊपर का भाग माया को ही आच्छादित करता है। शुद्धविद्या का यह आसन एक पलंग के सदृश है और जो दो आवरणों की बातें कही गयी हैं वे दो चद्दर के समान है। यह विद्यारूपी कमल में वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरिणी, बलविकरिणी, बलमथनी, भूतदमनी, मनोन्मनी आदि नौ शक्तियाँ और विभी, ज्ञाना, कृति, इच्छा, वागीशी, ज्वालिनी, वामा, ज्येष्ठा, रौद्री आदि नौ शक्तियाँ कमल के दलों में स्थित हैं। इनके मध्य में मनोन्मनी है। कमल के दल, केसर, और मध्य भाग सूर्य, चन्द्र और अग्निरूप है जिनके अधिपति ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र है। इनके ऊपर ईश्वर है और ईश्वर के बाद सदाशिव है जो उस कमल पर शयान है। सदाशिव को महाप्रेत कहा गया है। यह महाप्रेत इसलिये है कि यह प्रकृष्ट स्थान जो शिवरूप है वहाँ तक जाता है—निम्नभूमि को नहीं जाता है। जितने मन्त्र, मन्त्रेश्वर प्रभृति हैं वे सदाशिवता को प्राप्तकर शिवतालाभ करते हैं। यह ऊर्ध्वदृष्टिसम्पन्न है क्योंकि यह प्रकाशोन्मुख है, मेय यहाँ दुर्बल है और वह सदा नादामर्शशील हैं।

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४३ जाने से वहाँ नाद का परामर्शन उनका स्वरूप है। उनको नाभि से उदित और उनके मस्तक के तीन छिद्रों से निकली नादान्त के प्रान्तवति शक्ति, व्यापिनी और समानरूपी तीन अराएँ द्वादशान्त तक गयी हैं। इस प्रकार चिन्तन करना चाहिए। उनके ऊपर तीन शुद्ध कमलमय उन्मनापद है। इस विश्वमय भेदात्मक स्थिति ही आसनरूप है। उसी आसन में अधिष्ठाता के रूप में जो सबका व्यापक है ऐसे आधेयरूप अपनी इष्ट देवता की कल्पना होनी चाहिए। जहाँ सब भावों की समरसता आती है उस समस्वभाव में विश्वरूपी भावों का अर्पण ही पूजन है। उस विषय में तन्मयता ही ध्यान है। उस विषय में अन्तःकरण में परामर्शनरूप नादान्दोलन ही जप है। इस परामर्श क्रम से जो प्रबुद्धतारूप महान तेज के प्रदीप्त होने पर उसमें विश्व का समर्पण ही होम है। इस प्रकार पूजन के अनन्तर परिवाररूपी देवताओं को अग्निसे उत्पन्न स्फुलिंग (चिनगारियाँ) के समान ध्यान करते हुए उसी रीति से पूजन करना चाहिए। द्वादशान्त तक विस्तृत त्रिशूल को मूल से उत्पन्न हुए तथा देवीचक्र के अग्र तक जाने वाले जैसे चिन्तन करना चाहिए, इस प्रकार चिन्तन क्रमरहित होने पर पूजक खेचरता को प्राप्त करता है। मूलाधार से द्वादशान्त तक व्योम का आपूरणात्मिका यह खेचरी आकाश सञ्चार, आकाश में स्थिति आकाशरूप अमृत को पान करने वाली है।१ उस यागगृह को सब प्रकार उपकरणों से सम्पन्न करने के अनन्तर भगवती मालिनी या मातृकाओं को स्मरण करते हुए उन तेजोमय वर्णों से परिपूर्ण पुष्पाञ्जलि उठाई गयी है—इस प्रकार भावना करते हुए उन फूलों को अर्पित कर देना चाहिए। इसके अनन्तर अस्त्रामन्त्र ( फट् ) का यथासम्भव जप करते हुए सिद्धार्थ (श्वेत सर्षप), धान्य, चावल, लाज (लावा) आदि वस्तुओं को तेजोरूप में भावना करते हुए ईशान आदि दिशाओं के क्रम से विकिरण करना चाहिए—यह हुआ भूपरिग्रह। १. मूलाधार से तालु, भ्रूमध्य और ब्रह्मरंध्र आदि शून्यात्मक स्थानों से दण्ड के समान गमनशील और द्वादशान्त के ऊपर चार अंगुलि स्थान जो आकाशरूप है और जहाँ शक्ति, व्यापिनी और समना हैं उनके साथ तदात्मता प्राप्त करते हुये योगी परबोधानन्द रूप अमृत का सेवन करता है। यही सर्वोत्तम खेचरीरूपी महामुद्रा है।

१४४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ इसके अनन्तर शुद्धविद्या तक व्याप्त आसन को अर्पित कर गणपति की पूजा होनी चाहिए। इसके बाद आनन्दद्रव्य (सुरा) से पूर्ण और अलंकृत कुम्भ को पूजन करना चाहिए। १ तब उसमें पूग (?) अर्पित कर उसमें मूल मन्त्र जो सब का अधिष्ठाता है उसका स्मरण विधिपूर्वक करने के बाद एकसौ आठ बार उस मन्त्र से कुम्भ को अभिमन्त्रित करना चाहिए। दूसरे कलश पर विघ्न के नाश के हेतु अस्त्र मन्त्र की अर्चना करनी चाहिए। इसके अनन्तर अपनी-अपनी दिशाओं में स्थित लोकपालों को जो अस्त्रों से सज्जित हैं २ पूजन करना चाहिए। इसके बाद दीक्षा प्राप्त होने के पहले शिष्य के हाथ में अस्त्र कलश को देना चाहिए और गुरु स्वयं कुम्भ को ग्रहण करें। इसके अनन्तर गृह तक स्थानों के विघ्न की शान्ति के लिए जलधारा देते हुए शिष्य के पश्चात् चलते हुए गुरु इस मन्त्र का पाठ करें— हे इन्द्र, आप अपने दिशा में विघ्न के नाश के उद्देश्य से कर्म के (दीक्षा रूप कर्म) अन्त तक शिवजी की आज्ञा से अवहित होकर रहें। जब देवता का नाम तीन अक्षरवाला हो तब भो शब्द ('हे शब्द) १. कुम्भ को ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में स्थापित कर मूलमन्त्र से उसका पूजन करना चाहिए। उसके बाँयी दिशा में कलश स्थापित करना चाहिए। पूजन के अनन्तर शिष्य अस्त्र कलश उठाकर उससे जल छिड़क कर आगे-आगे चलता है और आचार्य उसके पीछे, उनके हाथ में उस समय कुम्भ रहता है। इस प्रकार जलधारापातन और अनुगमन गृह के चारों ओर तक हो ताकि याग का सब प्रकार विघ्न का विनाश हो। इस प्रकार कार्य की समाप्ति होने के बाद कुम्भ ईशान कोण में ही स्थापित करना चाहिए और अस्त्र कलश को उसके दाहिने भाग में। २. लोकपालों के पूजन के साथ अष्टमातृकाओं जैसे इन्द्राणी आदि जो विभिन्न प्रकार आयुधों से भूषित हैं, पूजन होना चाहिए। यह याद रखना उचित है कि कलश और कुम्भ दोनों ही आम अश्वत्थ आदि पल्लवों से भूषित, फूल की माला और रक्षोघ्न तिलक, श्वेतवस्त्र युगल से सुशोभित होना चाहिए। जो जलधारा पातन की बातें कही गयी है, उसके सम्बन्ध में यह ज्ञातव्य है कि शिष्य पूर्वदिशा की ओर से चलते हैं और जब वह दक्षिण- पश्चिम दिशा में पहुँचता है तब गुरु 'भो-भो शक्र' इस मन्त्र का पाठ करेंगे।

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४५ एक ही बार होना चाहिए। उसके बाद ईशान दिशा में कुम्भ को स्थापित करना चाहिए। विकिर के ऊपर अस्त्र कलश को स्थापित कर देना चाहिए। स्थण्डिल के मध्यभाग में परमेश्वर का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर अग्निकुण्ड को परमेश्वर की शक्ति के रूप में चिन्तन करते हुए¹ उसमें ( कुण्ड में ) अग्नि को प्रज्वलित कर हृदय के अन्तःस्थल में स्थित बोधरूपी अग्नि के साथ उसकी तदात्मता के चिन्तन करते हुए और मन्त्र के परामर्शन करते हुए उस प्रज्वलित अग्नि को शिवाग्नि रूप में चिन्तन करना चाहिए।² वहाँ मातृका और मालिनियों का न्यास और अर्चना के अनन्तर मन्त्रों का तर्पण घृत और तिलों से होना चाहिए। अर्घपात्र के जल से प्रोक्षण ही तिल और घृत का संस्कार है। परमेश्वर- सम्बन्धी अभेद दृष्टि ही स्रुक् और स्रुव का संस्कार है। इसके अनन्तर यथाशक्ति हवन के बाद स्रुक् स्रुव् दोनों को उर्ध्व और अधोमुख स्थापित कर जो शक्ति शिवरूप हैं और दोनों परस्पर उन्मुख हैं इस प्रकार चिन्तन करते हुए दोनों पैरको सम ( एक दूसरे से मिलित ) रखकर खड़े होकर द्वादशान्त रूपी गगन में उदित शिवरूपी पूर्णचन्द्र से निःसृत परमामृत धारा पतित हो रही है इस प्रकार भावना करते हुए वौषडान्त मन्त्रके १. अग्निकुण्ड वस्तुतः कुण्डलिनी शक्ति का ही बाहरी रूप है। कुण्डलिनी शक्ति परमेश्वर की क्रियाशक्तिरूप है। अतः बाहर भी उसकी उसी प्रकार भावना होनी चाहिए। इस प्रकार भावना ही परम संस्कार है। केवल इतना ही नहीं शरीर, स्थण्डिल, लिङ्ग, पात्र, जल, अनल, पुष्प और शिष्य आदि में भावनात्मक संस्कार होना पहली आवश्यकता है। लेकिन जिसके हृदय में इस प्रकार भावना की उत्पत्ति होना कठिन है उसके लिए बाहरी अनुष्ठान आवश्यक है। कुण्ड का पूजन 'ॐ क्रियाशक्त्यात्मने कुण्डाय नमः' इस मन्त्र से किया जाता है। २. वागीश्वरी के गर्भ से अग्नि का जन्म होता है, इसलिए अग्निकुण्ड में त्रिकोणाकार स्थान ही भगवती वागीश्वरी की योनि है, वह क्रियात्मक है, ज्ञान ही शुक्रकण है। ताँवे के पात्र में प्रज्वलित अग्नि को लाकर उसे शिववीर्य के रूप में चिन्तन करते हुए विद्यारूपी योनि में स्थापित करना चाहिए। यह हुआ गर्भाधान। इस क्रिया के अनन्तर पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण आदि कर्म के अनन्तर उस अग्नि में होमादि कार्यों का सम्पादन होता है। १०

१४६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ उच्चारण के साथ पूर्णाहुति देनी चाहिए और जब तक घृत रहे तब तक स्थिर रहना चाहिए । यह पूर्णाहुति सब मन्त्रचक्रों का सन्तर्पण करती है । इसके बाद प्रोक्षित चरु लाकर स्थण्डिल, कलश और अग्नि में एक- एक भाग निवेदन कर एक भाग शेष रखकर, शिष्य को एक भाग दें । १ इसके अनन्तर दन्तकाष्ठ का प्रकरण है । २ उसका पतन अग्निकोण, दक्षिण, नैर्ऋत या अधः हो तो शुभ नहीं होती है। इसके निराकरण के लिए अस्त्र मन्त्र से होम करना उचित है । इसके अनन्तर सब विक्षेपों ( चञ्चलता ) को त्याग करते हुए भविष्य में होने वाले मन्त्र के दर्शन की योग्यता की प्राप्ति उसमें हो इसके लिए उस शिष्य के नेत्र को बाँधकर याग मण्डप में प्रवेश कराकर और घुटने पर उसे बिठालाकर उसके द्वारा पुष्पाञ्जलि फेकवाना चाहिए ३ । इसके १. चरु से होमकार्य सम्पन्न कर जो एक भाग चरु शेष रहता है उस भाग केवल शिष्य ही नहीं आचार्य भी सेवन करते हैं । जो मुक्तिकामी है वह पलाशपत्र में और मुक्तिकामी पिपल के पत्ते में भोजन करें । भोजन के अनन्तर आचमन तथा मूलमन्त्र के द्वारा षडंगन्यास से सकलीकरणरूप क्रिया करणीय है । २. शिष्य में सकलीकरण सम्पन्न होने पर गुरु शिष्य के हाथ में वृद्धांगुष्ठि से मध्यमांगुलि तक लम्बा दाँत के मञ्जन के लिए एक दन्तकाष्ठ प्रदान करते हैं । दाँतों को उत्तमरूप से साफ करने के अनन्तर शिष्य उस दन्तकाष्ठ को धोकर जमीन पर फेंकता है । अगर वह ऊपर मुह होकर गिरता है तो मोक्ष अधिगत होता है, अधोमुख होकर गिरे तो फल मृत्यु है । पूर्वमुख होकर गिरता है तो योगसिद्धि होती है । जहाँ फल उत्तम है वहाँ कुछ कृत्य की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन अशुभ फल हो तो जपक्रिया की आवश्यकता है । ३. शिष्य के हाथ में एक पुष्प प्रदान करने के पहले उसकी आँखों को कपड़े से बाँध देना चाहिए और उसके हाथ पकड़ कर परदे के भीतर ले जाना चाहिए । बाद में अन्य क्रिया समाप्त करने के अनन्तर उसे परदे के आड़ से बाहर लाकर देवता के अभिमुख स्थापित कर उसके हाथ में एक फूल देकर आचार्य उससे कहें—फूल फेको । जब वह फूल फेकता रहता है तब आचार्य मूल मन्त्र का उच्चारण करते रहते हैं और सावधानी से

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४७ बाद अचानक उसके नेत्र के बन्धन खोल दिये जाने पर शक्तिपातरूपी अनुग्रह उसमें सम्पन्न हो जाने के कारण उसकी इन्द्रियों की मलिनता दूर हो जाती हैं, अतः उस स्थान में मन्त्र को सन्निहित ( निकट स्थित ) और प्रत्यक्षरूप में देखकर उस मन्त्र के साथ उसकी तन्मयता आ जाती है। जिनकी इन्द्रियाँ अनुग्रह के कारण मलिनता से मुक्त होती हैं उनके सामने मन्त्र का सन्निधान प्रत्यक्ष होता है जिससे ( जिसके दर्शन से ) पशुओं का भय उत्पन्न होता है । इसके उपरान्त शिवहस्तविधि¹ है। आचार्य अपने दाहिने हाथ में दीप्त देवताचक्र का पूजन करने के बाद उस हाथ को शिष्य के मस्तक, हृदय, नाभि आदि स्थानों में पाशों को जलाते हुए रखते हैं। इसके बाद बायें में शुद्ध तत्त्वों के आप्यायन करने वाले को पूजन करने के अनन्तर प्रणाम करना चाहिए। इसके अनन्तर भूतवलि और दिग् वलि हैं जो मद्य, मांस और जल से पूर्ण वलि है जिसे याग गृह के बाहर अर्पित करना चाहिए और बाद में आचमन करना चाहिए। तब आचार्य स्वयं चरु का भोजन करने के बाद शिष्य की आत्मा के साथ एकत्व अपनाते हुए प्रबुद्धास्थिति में वर्तमान रहें। शिष्य निद्रित रहने के बाद अगर प्रातःकाल अशुभ स्वप्न की बातें करें तो आचार्य उसका भेद उसे निरीक्षण करते हैं कहाँ फूल गिरता है। इसके बाद शिष्य का नेत्रबन्धन खोल दिया जाता है। उस समय शिष्य के अज्ञान रूपी उस बन्धन खोल दिये जाने पर वह अपने सम्मुख सभी मन्त्रों और विद्याओं को प्रत्यक्ष देखता है। उस समय उसकी प्रबुद्धदशा जाग्रत हो जाती है और सहस्र जन्म में भी जिस भगवत्स्वरूप को देखने में वह असफल रहा सहसा उसके दर्शन से विस्मित होकर वह जमीन पर दण्डवत् गिर पड़ता है। १. गुरु शिष्य के मस्तक पर आशीर्वाद के रूप में शिवहस्त प्रदान करते हैं। गुरु पहले अपने दाहिने हाथ में अमितोज्ज्वल शिवजी के स्वरूप को ध्यान करते हैं। उनके ध्यान का स्वरूप इस प्रकार है—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव आदि में अधिष्ठित शिव उनके हाथ में दीप्तमूर्ति होकर विराजमान हैं। उनकी ( आचार्य की ) पाँच अंगुलियाँ चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया रूपी पाँच शक्तियों से अधिष्ठित होकर पाशों का दहन करती हैं। उस हाथ से विभिन्न स्थानों के स्पर्श से पाशों के अंकुर विनष्ट हो जाते हैं।

१४८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ न बतलावें। क्योंकि उससे उसके मन में सन्देह और शंका उठ सकते हैं, इसलिए केवल अशुभ का निराकरण अस्त्र मन्त्र से करना चाहिए ! इसके अनन्तर पहले जैसे परमेश्वर के पूजन करने के अनन्तर शिष्य के प्राण में प्रवेश करते हुए उसके हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त आदि छः स्थानों में स्थित कारण षटकों को स्पर्श³ करते हुए प्रत्येक स्थल में आठ-आठ संस्कार⁴ सम्पन्न हो गये हैं इस प्रकार चिन्तन करते हुए शिष्य के प्राणों को उन-उन स्थानों में कुछ समय तक विश्राम प्राप्त कराकर फिर अपने स्थानों में लौट आवें । इस प्रकार उपाय से अड़तालिस संस्कारों से शिष्य में रुद्रांशपात सम्पन्न हो जाता है और जिसके फलस्वरूप शिष्य समयी५ बन जाता है। इसके अनन्तर उसे १. कारण षट्क छः हैं जो निम्न प्रकार हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव और शिव हैं जो क्रमशः हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट और ब्रह्मरन्ध्र आदि स्थानों में स्थित हैं। गुरु ऊर्ध्वरेचन की क्रिया से अपने शरीर से निकल कर शिष्य के शरीर में प्रवेश करते हैं और इन देवताओं से शिष्यचैतन्य को मुक्त करते हैं। २. संस्कार कुल अड़तालिस हैं जो निम्न प्रकार हैं। गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकर्म, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, व्रत- बन्ध, ऐष्टिक, मौञ्जी, भौतिक, सौमिक, गोदान, विवाह, अष्टका, पार्वणी, श्राद्ध, श्रावणी, आग्रायणी, चैत्री, आश्वयुजी अग्न्याधान, अग्निहोत्र, पौर्णमास, दर्श, चातुर्मास्य, पशूद्बन्ध, सौत्रामणि, अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोड़शी, वाजपेय, आतोर्याम, अतिरात्र, हिरण्यपादादिमख, अश्वमेध, वानप्रस्थ, पारिव्राज्य, दया, क्षमा, अनसूया, शुद्धि, सत्कार, मंगल, अकार्पण्य, अस्पृहा। ब्रह्मादि कारणषट्क जो हृदय आदि स्थानों में स्थित हैं गुरु के बोधरूपी स्पर्श से शिष्य के नवीन शरीर के गर्भाधानादि सभी संस्कार सम्पन्न हो जाते हैं और फलस्वरूप उसके आहार और बीज से जो कुछ दोष पहले उसमें वर्तमान था उसका निराकरण हो जाता है और वह द्विज बन जाता है। ३ समय शब्द का तात्पर्य आगमसम्मत नियमों का पालन है। जो शिष्य उन नियमों का पालन करता है उसे समयी कहते हैं। समयों के पालन से शिष्य में ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार मिलता है। जात्युद्धार, द्विजत्व- लाभ और रुद्रांशता की प्राप्ति इन तीन कार्यों से समयी का शुद्ध-संस्कार

आ. १३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १४९ ( शिष्य को ) पूज्य मन्त्र पुष्प आदि के साथ अर्पण करना चाहिए। बाद में समयों को उसे बतला देना चाहिए। गुरु को सर्वथा भक्ति करना, उसी प्रकार शास्त्र तथा देवता में भी करना है। उसके प्रतिकूल विषयों से पराङ्मुख रहना है, गुरु के समान गुरु के पुत्र आदि के प्रति उसी प्रकार व्यवहार रखना है। विद्या सम्बन्ध जिनके साथ है और जिनकी दीक्षा उसके पहले हो गयी है उनको भी उसी प्रकार देखना है। यौन सम्बन्ध से उनकी उत्पत्ति हुई इस प्रकार से देखना न चाहिए इससे गुरु के प्रति भक्ति वास्तव में होती है—यह स्वतः नहीं होता है—ऐसा जानना चाहिए। वन्ध्या स्त्रियों को घृणा के पात्र के रूप में न देखना चाहिए। देवता का नाम, गुरु का नाम तथा मन्त्र पूजा के समय भिन्न अन्य समय उच्चारित न करना चाहिए। गुरु के द्वारा व्यवहृत शय्या आदि व्यवहार न करना चाहिए। लौकिक खेल आदि गुरु के समीप न करना चाहिए। गुरु से भिन्न किसी व्यक्ति पर उत्कर्ष विचार नहीं रखना चाहिए। श्राद्ध आदि कार्यों में गुरु को ही पूजन करना चाहिए। नैमित्तिक कार्यों में शाकिनी आदि शब्दों का परिहार करना चाहिए। पर्व दिनों में पूजन करना चाहिए। जो निम्न दृष्टि सम्बन्त वैष्णवादि हैं उनकी संगति छोड़ देना चाहिए। इस शास्त्र के अनुशासन में जो लोग स्थित हैं उन्हें पूर्व जाति के रूप में न देखना चाहिए। गुरुवर्ग जब घर में आ जाते हैं तब शक्ति के अनुसार याग करना चाहिए। निम्न मार्ग में स्थित किसी वैष्णव आदि को शास्त्र सम्बन्धी ज्ञान के कौतूहल से उसके द्वारा गुरु बनाये जाने पर भी उसे त्याग कर देना चाहिए। किसी वैष्णव को उत्कर्ष बुद्धि से देखना न चाहिए। जो लिङ्ग चिह्नधारी है उनके साथ समाचार मेलन न करना चाहिए। उन्हें यथाशक्ति पूजन करना चाहिए। संशय त्यागना चाहिए। चक्र में स्थित रहकर यह अन्त्यज है या यह ब्राह्मण है इस प्रकार जाति सम्बन्धी भेदभावना मन में न रखना चाहिए। शरीर से भिन्न किसी

उत्पन्न होता है। वागीश्वरी के गर्भ में जन्म होने पर उसका वास्तविक द्विजत्वप्राप्ति होती है और अड़तालिस संस्कारों से उसकी द्विजता में परिपूर्णता आती है।

१५० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १३ तीर्थ और क्षेत्र को अधिक सम्मान से नहीं देखना चाहिए। मन्त्र का हृदय जो विमर्शरूप है उसका निरन्तर स्मरण करना चाहिए। इस प्रकार समयों का श्रवण करने के बाद गुरु के समीप जाकर उन्हें प्रणाम करने के अनन्तर धन दार और इतना तक कि शरीर भी दक्षिणा के रूप में देकर उन्हें तुष्ट कर जिन्होंने पहले दीक्षा प्राप्त कर ली हैं उन्हें तथा दीन और अनाथों को तृप्त करना चाहिए। आगे आनेवाली विधि से मूर्तिचक्र का तर्पण करना चाहिए। इस विधि से शिष्य समयी बन जाता है। समयी बन जाने पर मन्त्र के अभ्यास में, नित्य पूजा में, शास्त्र के श्रवण और अध्ययन में अधिकार आता है। नैमित्तिक कार्यों के लिए गुरु से ही प्रार्थना करनी चाहिए। इतना तक सामयिक विधि है। सभी अध्वाओं को अपने स्वरूप में चिन्तन करने के बाद अपने पूर्ण आत्म स्वरूप को अवलोकन करें। उसके बाद द्वादशान्त तक व्याप्त शिष्य के स्वरूप को अनुग्रह रूपी बोध से देखें—उसी से शिष्य समयी १ बन जाता है। श्री अभिनवगुप्त द्वारा रचित तन्त्रसार का समयीदीक्षा प्रकरण नामक त्रयोदश आह्निक है। १. समय शब्द से आगमशास्त्रों में निर्धारित अवश्य पालनीय नियमों को समझना चाहिए। समयदीक्षा प्राप्त होने पर शास्त्रों का अध्ययन, श्रवण, पूजन, जप, ध्यान आदियों में अधिकार प्राप्त होता है। गुरु के द्वारा कथित आचारों का पालन, ध्यान आदि करने का अधिकार प्राप्त होता है। आगे चलकर समयी पुत्रक दीक्षा प्राप्त कर सकता है। समयी की पाश- शुद्धि अवश्य होती है, पाशों का निर्मूलन नहीं होता, इसलिए पूर्णता की प्राप्ति नहीं होती है। इस दीक्षा के द्वारा परतत्त्व की ओर चलने का मार्ग खुल जाता है। 'सम्यगयनं ज्ञानमस्मादिति' ज्ञान का सम्यक् अयन इससे होता है इसलिए इसे समय कहते हैं।

अथ चतुर्दशमाह्निकम् अथ पुत्रकदीक्षाविधिः । स च विस्तीर्णः तन्त्रालोकात् अवधार्यः । संक्षिप्तस्तु उच्यते । समय्यन्तं विधिं कृत्वा तृतीयेऽह्नि त्रिशूलाब्जे मण्डले सामुदायिकं यागं पूजयेत्, तत्र बाह्यपरिवारं द्वारदेवताचक्रं च बहिः पूजयेत्, ततो मण्डलपूर्वभागे ऐशकोणात् आरभ्य आग्नेयान्तं पंक्ति- क्रमेण गणपतिं गुरुं परमगुरुं परमेष्ठिनं पूर्वाचार्यान् योगिनीचक्रं वागीश्वरौ क्षेत्रपालं च पूजयेत् । तत आज्ञां समुचिताम् आदाय शूल- मूलात् प्रभृति सितकमलान्तं समस्तम् अध्वानं न्यस्य अर्चयेत्, ततो मध्यमे त्रिशूले मध्यरायां भगवती श्रीपराभट्टारिका भैरवनाथेन सह, वामारायां तथैव श्रीमदपरा, दक्षिणारायां श्रीपरापरा, दक्षिणे त्रिशूले मध्ये श्रीपरापरा, वामे त्रिशूले मध्ये श्रीमदपरा, द्वे तु यथास्वम् । एवं सर्वस्थानाधिष्ठातृत्वे भगवत्याः सर्वं पूर्णं तदधिष्ठानात् भवति इति । ततो मध्यशूलमध्यरायां समस्तं देवताचक्रं लोकपालास्त्रपर्यन्तम् अभिन्नतयैव पूजयेत् तदधिष्ठानात् सर्वत्र पूजितम् । ततः कुम्भे कलशे मण्डले अग्नौ स्वात्मनि च अभेदभावनया पञ्चाधिकरणम् अनुसन्धिं कुर्यात्, ततः पर- मेश्वराद्वयरसबृंहितेन पुष्पादिना विशेषपूजां कुर्यात् । किं बहुना— तर्पणनैवेद्यपरिपूर्णं वित्तशाठ्यविरहितो यागस्थानं कुर्यात् । असति वित्ते तु महामण्डलयागो न कर्तव्य एव । पशूंश्च जीवतो निवेदयेत् । तेऽपि हि एवम् अनुगृहीता भवन्ति, इति कारुणिकतया पशुविधौ न विचिकित्सेत् । ततोऽग्नौ परमेश्वरं तिलाज्यादिभिः संतर्प्य तदङ्गेऽन्यं पशुं वपाहोमार्थं कुर्यात्, देवताचक्रं तद्रूपया तर्पयेत्, पुनर्मण्डलं पूजयेत्, ततः परमेश्वरं विज्ञप्य सर्वाभिन्नसमस्तषडध्वपरिपूर्णम् आत्मानं भावयित्वा शिष्यं पुरोऽवस्थितं कुर्यात् । परोक्षदीक्षायां जीवन्मृतरूपायाम् अग्रे तं ध्यायेत्, तदीयां वा प्रतिकृतिं दर्भगोमयादिमयीम् अग्रे स्थापयेत् । तथाविधं शिष्यम् अर्घपात्रविप्रुड्प्रोक्षितं पुष्पादिभिश्च पूजितं कृत्वा समस्तमध्वानं तद्देहे न्यसेत् । तत इत्थं विचारयेत्, भोगेच्छोः शुभं न शोधयेत् । मुमु- क्षोस्तु शुभाशुभम् उभयमपि । निर्बीजायां तु समयपाशान् अपि शोधयेत्, सा च आसन्नमरणस्य अत्यन्तमूर्खस्यापि कर्तव्या इति परमेश्वराज्ञा, तस्यापि तु गुरुदेवताग्निभक्तिनिष्ठत्वमात्रात् सिद्धिः । अत्र च सर्वत्र

१५२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १४ वासनाग्रहणमेव भेदकम्—मन्त्राणां वासनानुगुण्येन तत्तत्कार्यकारित्वात् । एवं वासनाभेदमनुसंधाय मुख्यमन्त्रपरामर्शविशेषेण समस्तमध्वानं स्वदेहगतं शिवाद्वयभावनया शोधयेत्। एवं क्रमेण पादाङ्गुष्ठात् प्रभृति द्वादशान्तपर्यन्तं स्वात्मदेहस्वात्मचैतन्याभिन्नीकृतदेहचैतन्यस्य शिष्यस्य आसाद्य तत्रैव अनन्तानन्दसरसि स्वातन्त्र्यैश्वर्यसारे समस्तेच्छाज्ञान- क्रियाशक्तिनिर्भरसमस्तदेवताचक्रेश्वरे समस्ताध्वभरिते चिन्मात्राशेष- विश्वभावमण्डले तथाविधरूपैकीकारेण शिष्यात्मना सह एकीभूतो विश्रान्तिमासादयेत्, इत्येवं परमेश्वराभिन्नोऽसौ भवति । ततो यदि भोगे- च्छुः स्यात् ततो यत्रैव तत्त्वे भोगेच्छा अस्य भवति तत्रैव समस्तव्यस्त- तया योजयेत् । तदनन्तरं शेषवृत्तये परमेश्वरस्वभावात् झटिति प्रसृतं शुद्धतत्त्वमयं देहम् अस्मै चिन्तयेत्, — इत्येषा समस्तपाशवियोजिका दीक्षा। ततः शिष्यो गुरुं दक्षिणाभिः पूर्ववत् पूजयेत् । ततोऽग्नौ शिष्यस्य विधिं कुर्यात्, श्रीपरामन्त्रः अमुकस्यामुकं तत्त्वं शोधयामि, इति स्वाहान्तं प्रतितत्त्वं तिस्र आहुतयः, अन्ते पूर्णा वौषडन्ता । एवं शिवान्त- तत्त्वशुद्धिः, ततो योजनिकोक्तक्रमेण पूर्णाहुतिः । भोगेच्छोः भोगस्थाने योजनिकार्थमपरा, शुद्धतत्त्वसृष्ट्यर्थमन्या । ततो गुरोः दक्षिणाभिः पूजनम्, इत्येषा पुत्रकदीक्षा । यत्र वर्तमानमेकं वर्जयित्वा भूतं भविष्यच्च कर्म शुध्यति ॥ अन्तः समस्ताध्वमयीं स्वसत्तां बहिश्च संधाय विभेदशून्यः । शिष्यस्य धोप्राणतनूर्निजासु तास्वेकतां संगमयेत्प्रबुद्धः ॥ शिष्यैकभावं झटिति प्रपद्य तस्मिन्महानन्दविबोधपूर्णे । यावत्स विश्राम्यति तावदेव शिवात्मभावं पशुरभ्युपैति ॥ जे सहु एकीभाउलये विणु अच्छइ एहु विबोह समुद्द । सो पशु भइरव हो इलये विणु अन्तर्नावजिउ अस असमुद्दु ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे पुत्रकदीक्षाप्रकाशनं नाम चतुर्दशमाह्निकम् ॥१४॥

चतुर्दश आह्निक अब पुत्रकदीक्षा १ की विधि है। यह विधि अत्यन्त विस्तीर्ण है' तन्त्रालोक ग्रन्थ से इसे जान लेना चाहिए। संक्षिप्तविधि का विवरण दिया जा रहा है। समयी के लिए किए जाने वाले कृत्यों को समाप्तकर तीसरे दिन त्रिशूल और कमल चिह्नित मण्डल में सामुदायिक याग और पूजन करना चाहिए। मण्डल के बाहर बाह्यपरिवार और द्वारदेवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर मण्डल के पूर्वभाग में ईशान कोण से आरम्भकर अग्निकोण तक पंक्तिक्रम से गणपति, गुरु, परमगुरु, परमेष्ठिगुरु पूर्वतन आचार्य, योगिनीचक्र, वागीश्वरी और क्षेत्रपालों को पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर समुचित आज्ञा लेकर त्रिशूल २ के मूल से श्वेत कमल तक स्थानों में अध्वाओं के न्यास के बाद अर्चना करनी चाहिए। इसके बाद मध्यस्थ त्रिशूल के मध्यस्थअरा में भगवती श्रीपराभट्टारिका को भैरवनाथ के साथ, बायी अरा मे' उसी प्रकार श्री भगवती अपरा भट्टारिका, दाहिनीअरा में श्री भगवती परापरा भट्टारिका का पूजन तथा न्यास होना चाहिए। दक्षिण त्रिशूल के मध्य में श्री परापरा, वाम त्रिशूल के मध्य में श्री भगवती अपरा भट्टारिका का पूजन होना चाहिए। अन्य दो १. समयदीक्षा के अनन्तर पुत्रकदीक्षा की व्यवस्था है। पुत्रक शब्द का तात्पर्य पुत्र से है। शिष्य आचार्य का निजपुत्र न होते हुए भी पुत्रतुल्य है। पुत्रकदीक्षा से जो दीक्षा प्राप्त करता है वह मोक्षार्थी है, भोगेच्छु नहीं है। जो भोगरूप फल का अभिलाषी है वह भोगार्थी है। मोक्षार्थी शिष्य दो प्रकार हैं—एक है पुत्रक और दूसरा आचार्य है। २. त्रिशूल तीन हैं जिनके मध्य में एक स्थित है और उसके दाहिने में एक और बायें में एक है। प्रत्येक में तीन तीन अराएँ हैं। इन अराओं में तीन मुख्य देवियाँ स्थित हैं इन त्रिशूलो में एक हैं शाम्भव, दूसरा शक्ति और तीसरा आणव है। द्वादशान्त तक शाम्भव शूल व्याप्त है उससे चार अंगुलि नीचे शाक्त शूल की स्थिति है, फिर उससे चार अंगुलि नीचे आणव शूल स्थित है।

१५४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १४ अराओं के दक्षिण तथा वाम के त्रिशूलों में अन्य दो-दो देवियों का पूजन होना चाहिए। अतः सब स्थानों में भगवती शक्तियों का अधिष्ठान होने के कारण सभी स्थितियाँ पूर्ण हो जाती हैं। इसके बाद मध्यस्थ अरा में सब देवताचक्र, लोकपाल और उनके आयुधों की अभिन्नता बोध को अपनाते हुए पूजन करना चाहिए, उनके अधिष्ठान के कारण एक स्थान के पूजन से सभी स्थानों में पूजन सम्पन्न होता है। उसके उपरान्त कुम्भ, कलश, मण्डल, अग्नि और निज आत्मा की अभेदभावना के द्वारा इन पाँचों अधिकरणों का अनुसन्धान करना चाहिए¹। इसके उपरान्त परमेश्वराद्वय-रस से पुष्ट पुष्प आदि से विशेषपूजा करनी चाहिए। अधिक क्या कहूँ-तर्पण, नैवेद्य आदि उपकरणो से परिपूर्ण त्रिशूलों में जो मध्य में स्थित है उसके दाहिने और बायें में क्रमशः परापरा तथा अपरा शक्तियाँ अधिष्ठित हैं और मध्य में पराशक्ति स्थित है। त्रिशूल जो दाहिने है वह श्री परापरा देवी के द्वारा अधिष्ठित है। उस त्रिशूल के दाहिने तथा बायी अराएँ श्री परा और अपरा देवियों के द्वारा अधिष्ठित हैं। इस विवरण से प्रतीत होता है कि प्रत्येक त्रिशूल के मध्य भाग क्रमशः श्री परा, श्री परापरा और श्री अपरा देवियों के द्वारा अधिष्ठित है, मध्यस्थ त्रिशूल का मध्यभाग श्रीपरा देवी के द्वारा अधिष्ठित है अतः अन्य दो शक्तियाँ उनके अंग है और वह स्वयं अंगी है। यद्यपि त्रिशूलों में देवियाँ स्थित हैं तो भी देवियाँ देवरहित नहीं हैं, उनके भैरव भी उनके साथी हैं जैसे मध्य में भैरवसद्भाव, दक्षिण में रतिशेखर और वामभाग में नवात्मा स्थित हैं। श्री परादेवी पूर्णचन्द्र प्रतिमा हैं अर्थात् श्वेतवर्ण है, श्री परापरा रक्तवर्ण है और वाम में श्री अपरादेवी कृष्णपिंगल वर्ण हैं। १. यद्यपि कुम्भ, कलश आदि एक दूसरे से भिन्न है तो भी मैं ही सभी जगह स्थित हूँ इस प्रकार अद्वयभावना का अनुसन्धान यथायथ होने पर उनके द्वैतरूप समाप्त हो जाता है। इस प्रकार शिवात्मक अद्वयव्याप्ति का अनुसन्धान जिससे होना सम्भव नहीं है वह मध्यनाड़ी के प्रयोग से अद्वयमार्ग में प्रवेश करता है। अर्थात् बहिर्याग न करके मध्यनाड़ी में त्रिशूल की कल्पना कर उसके सहारे अद्वयबोध में स्थित हो सकता है।

आ. १४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १५५ यागस्थान की रचना करनी चाहिए, इस विषय में वित्तशाठ्य १ न होना चाहिए। धन की कमी हो तो महामण्डलयाग नहीं करना चाहिए। जीवित पशुओं को निवेदित करना चाहिए। इसी उपाय से उन पर अनुग्रह होता है अतः उन पर करुणाभाव दिखलाकर शास्त्रविधि पर सन्देह न करना चाहिए। इसके बाद अग्नि में परमेश्वर को तिल और घृत से तर्पण कर उस अग्नि में दूसरे पशु को वपा होम के लिए रखना चाहिए। फिर मण्डल का पूजन करना चाहिए। इसके अनन्तर परमेश्वर से विज्ञापित कर सब से अभिन्न षडर्ध परिपूर्ण अपने स्वरूप को चिन्तन करते हुए शिष्य को अपने सम्मुख स्थापित करना चाहिए। परोक्षदीक्षा में अर्थात् दीक्षा प्राप्त करनेवाले जब आचार्य के समीप उपस्थित न हो ऐसे जीवन्मृत व्यक्ति आचार्य अपने समीप उपस्थित है ऐसा ध्यान करना चाहिए अथवा उसकी प्रतिकृति कुश या गोबर आदि से बनाकर अपने सामने रखना चाहिए। सामने उपस्थित शिष्य को अर्घपात्र में स्थित जलबिन्दु से प्रोक्षण करने के अनन्तर फूलों से पूजित करना चाहिए। उसके बाद सभी अध्वाओं का न्यास उसके शरीर में कर देना चाहिए। इसके बाद इस विषयका विचार होना चाहिए जो व्यक्ति भोग का अभिलाषी है उसकी शुभ वासना का शोधन नहीं करना चाहिए। लेकिन मुमुक्षु शिष्य के शुभ तथा अशुभ दोनों का ही शोधन आवश्यक हैं। निर्बीज दीक्षा २ हो तो १. धन की प्रचुरता रहने पर भी अपने को निर्धन प्रतिपादन करना ही वित्तशाठ्य है। २. मुमुक्षु दो प्रकार हैं—एक निर्बीज और दूसरा सबीज । मूर्ख, वृद्ध जो अनुष्ठान आदि करने में असमर्थ हैं और जो नानाप्रकार व्याधियों से पीड़ित हैं, उन्हें निर्बीज दीक्षा देनी चाहिए। समयाचार भी एक प्रकार बन्धन है। निर्बीज दीक्षा प्राप्त करने वालों का समयाचार पाशों की शुद्धि आवश्यक है। इन पाशों की शुद्धि हो जाने के कारण उन्हें समयों का पालन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, गुरु और देवताओं के प्रति भक्ति ही उनके लिए समय है। जिनकी मृत्यु निकट है आचार्य अरिष्टलक्षणों से उनकी मृत्यु आसन्न समझकर और उनमें शक्तिपात हुआ ऐसा जानकर उन्हें सद्योनिर्वाण- दायिनी दीक्षा प्रदान करते हैं। आचार्य अपने शिवहस्त आसन्नमृत्यु शिष्य के मस्तक पर अर्पित करते हुए उन्हें परतत्त्व के साथ नियोजित करते हैं।