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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

उपदेशसाहस्री प्राकृत ‘हृदयस्पर्शिनी’ टीकासहित UPADESHASAHASRI With Hindi ‘Hridayasparshini’ Tika

Advaita Grantha Ratna Manjusha—Ratna—31 SHRI SHANKARABHAGAVATPADA'S UPADESHASAHASRI with HINDI HRIDAYASPARSHINI TIKA by Dr. GAJANAN SHASTRI MUSALGAONKAR under directions from MAHAMANDALESHWAR SHRI SWAMI MAHESHANANDGIRI MAHARAJ PONTIFF OF SHRI DAKSHINAMURTI PEETHA Mahesh Research Institute Mount Abu Varanasi

अद्वैतग्रन्थरत्नमञ्जूषा-३१ वाँ रत्न— श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्यविरचिता उपदेशसाहस्री श्रीदक्षिणामूर्तिपीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर श्री स्वामी महेशानन्दगिरि जी महाराज के निर्देशानुसार पण्डितप्रवर डॉ० गजाननशास्त्री मुसलगांवकर द्वारा 'हृदयस्पर्शिनी' प्राकृत टीका से समलंकृत महेश-अनुसन्धान-संस्थानम् माउण्ट आबू वाराणसी

प्रकाशक— महेश-अनुसन्धान-संस्थानम् श्री शंकर कुल श्री दक्षिणामूर्ति मठ माउण्ट आबू-३०७५०१ डी ४९/९, मिश्र पोखरा (दूरभाष-१४७) वाराणसी-२२१०१० प्राप्तिस्थान महेश अनुसन्धान संस्थानम् श्री दक्षिणामूर्ति मठ डी ४९/९, मिश्र पोखरा वाराणसी-२२१०१० भगवत्पादाब्द—१२०० विक्रम संवत् —२०४५ ईसवी सन् —१९८८ सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन प्रथम आवृत्ति मूल्य : पचहत्तर रु० मुद्रक तारा प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी

प्रतिपाद्यविषयानुक्रम-बोधिनी पद्यभागः १. उपोद्घातप्रकरणम् (पृ० १-१५) श्लोकसंख्या १. मंगलाचरणपूर्वक ब्रह्मविचारारंभ का समर्थन ... ... १-५ २. ज्ञान ही मोक्षप्राप्ति में एकमात्र कारण है ... ... ६-७ ३. ज्ञान-कर्मसमुच्चयवाद और उसका खण्डन ... ... ८-१५ ४. कर्मकाण्ड के अप्रामाण्य की शंका और उसका खण्डन ... ... १६-१७ ५. अविद्या की पुनः अनुत्पत्ति ... ... १८-१९ ६. किसी सहकारी की अपेक्षा के बिना ही विज्ञा (ज्ञान) मोक्ष-प्राप्ति में कारण है ... ... २०-२४ ७. ‘उपनिषद्’ शब्द के अर्थ का प्रतिपादन ... ... २५-२६ २. प्रतिषेधप्रकरणम् (पृ० १६-१८) १. वाक्य से ब्रह्मात्मज्ञान की अनुत्पत्ति की आशंका और उसका परिहार ... ... १-२ २. उत्पन्न हुए ब्रह्मात्मज्ञान के बाध की प्रत्यक्षादि प्रमाण के द्वारा शंका और उसका निरसन ... ... ३-४ ३. ईश्वरात्मप्रकरणम् (पृ० १९-२०) १. जीव-ब्रह्म दोनों का अभेद ... ... १-२ २. अभेद न मानने पर श्रुतिवाक्यों की अनुपपत्ति का प्रदर्शन ... ... ३-४ ४. तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम् (पृ० २१-२३) १. संचित कर्म, प्रतिबन्धक रहने से आत्मज्ञान, मोक्ष का साधन कैसे हो सकता है—यह आशंका ... ... १-२ २. प्रारब्धकर्म का फलभोग समाप्त होने पर ज्ञान की उत्पत्ति होती है, यह समाधान ... ... ३-५ ५. बुद्धयपराधप्रकरणम् (पृ० २४-२६) १. आत्मस्वरूप का ज्ञान न हो पाने में उदङ्क की आख्यायिका का वर्णन ... ... १ २. संसारविभ्रम के होने में कारण और प्रमाण ... ... २-४ ३. मुमुक्षु को पदार्थविवेकशील होने का उपदेश ... ... ५ ६. विशेषापोहप्रकरणम् (पृ० २९-२९) १. स्थूल उपाय से पदार्थशोधन के प्रकार का उपदेश ... ... १-२ २. विशेषणों की अनात्मता ... ... ३-४ ३. आत्मा की अन्यनिरपेक्ष स्वतःसिद्धि ... ... ५-६ ७. बुद्ध्यारूढप्रकरणम् (पृ० ३०-३२) १. निर्धारित वाक्यार्थ के विषय का स्वानुभव से स्पष्टीकरण ... ... १-२ २. आत्मा में विकारित्व आदि दोषाभावों का उपपादन ... ... ३-४ ३. आत्मा का शुद्धत्व और अद्वितीयत्व ... ... ५-६

( ii )

८. मतिविलापनप्रकरणम् (पृ० ३३-३५) १. आत्मा और मन के संवाद के द्वारा मनोलय का उपदेश ... ... १-४ २. इस प्रकरण की रचना में दुःखपीड़ित लोगों के प्रति करुणा ही एकमात्र कारण है ... ... ५-६

९. सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् (पृ० ३६-४०) १. आत्मा की निरतिशय सूक्ष्मता और व्यापकता ... ... १-३ २. ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक सभी कोई 'आत्मा' के ही शरीर हैं ... ... ४-६ ३. आत्मस्वरूपज्ञान की निर्विषयता और नित्यता ... ... ७-९

१०. दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् (पृ० ४१-४८) १. आत्मा की निर्विषयज्ञानस्वभावता का स्वानुभव के अभिनय के द्वारा प्रकटन ... ... १-२ २. जन्म-जरा आदि विकारों के न होने से आत्मा की कूटस्थता एवं अद्वयता का उपपादन ... ... ३-९ ३. आत्मज्ञान का फल कैवल्य है ... ... १०-१२ ४. आत्मज्ञानी का स्वरूप ... ... १३-१४

११. ईक्षितृत्वप्रकरणम् (पृ० ४९-५५) १. ज्ञान-कर्मसमुच्चय मानने में अनुपपत्ति ... ... १-३ २. द्वैत (भेद) के अभाव में प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विरोध रहने से लौकिक एवं वैदिक व्यवहार के लोप हो जाने का प्रसङ्ग और उसका निराकरण ... ... ४-१४ ३. अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति कर्म से नहीं हुआ करती ... ... १५-१६

१२. प्रकाशप्रकरणम् (पृ० ५६-६४) १. साभास अन्तःकरण और आत्मा दोनों के अविवेक से यथार्थ आत्मस्वरूप का ज्ञान नहीं होता है .. १-४ २. आत्मा के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान कराने के लिये श्रुति 'तत्-त्वम्' का उपदेश दे रही है ... ... ५-१५ ३. चित्रप्रकाश की नित्यता का उपपादन करते हुए 'आत्मा' में नियोज्यता के होने का प्रतिपादन ... ... १६-१९

१३. अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् (पृ० ६५-७३) १. आत्मा की शुद्धता और अचलता की व्यवस्था का निरूपण .... .... १-१० २. संसार से निवृत्ति के उपायों (साधनों) की शिक्षा .... .... ११-१३ ३. आत्मा के अविकारित्व का निश्चय होने पर समाधि और विक्षेप की अवस्था नहीं होती .... .... १४-१८ ४. वह एक आत्मतत्त्व ही समस्त प्राणियों के भीतर स्थित रहने से उसकी पूर्णब्रह्मरूपता का अनुभव होने का औचित्यनिरूपण .... .... १९-२४ ५. 'मैं ब्रह्म हूँ' - यह अनुसन्धान सर्वदा करते रहने का प्रोत्साहन, मुमुक्षु को गुरु देता रहे .... .... २५-२६ ६. उक्त अर्थ के ग्रहण करने योग्य मुख्य अधिकारी २७

१४. स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् (पृ० ७४-९४) १. अन्तःकरण की अपरोक्षता और उसका फल .... .... १-१० २. आत्मा में हेयोपादेयता की कल्पना नहीं की जा सकती, यह अनुभव से भी जाना जा सकता है .... .... १०-१५ ३. चिन्मयी दृष्टि हो जाने पर स्मरण या विस्मरण भी नहीं होता है .... ... १६-१९ ४. द्रष्टा-श्रोता-मन्ता-विज्ञाता ही वह अक्षर ब्रह्म है .... ... २०-२२ ५. आत्मज्ञानी का कर्म सफल होता है, यह शंका और उसका निवारण ... ... २३-२६

( iii ) ६. ब्रह्मात्मैक्यज्ञान का फल ... .... २७-२९ ७. आत्मज्ञ के लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं है ... .... ३०-४० ८. स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहों से पृथक् ही आत्मा है ... .... ४१-५० १५. नान्यदन्यत्प्रकरणम् (पृ० ९५-११६) १. स्वभाव से ही शुद्ध आत्मा की साधनविशेष से शुद्धि बताने वालों के मतका खण्डन .... ... १-३ २. आत्मा का साक्षित्व ... ... ४ ६ ३. वीतराग विद्वान् के लिये कर्मसंन्यास बताकर शुद्धात्मस्वरूप का अनुचिन्तन का प्रतिपादन ... ... ७-१८ ४. ब्रह्मात्मैक्यज्ञान के लिये पदार्थविवेक के अनुष्ठान की आवश्यकता का प्रतिपादन ... ... १९-२० ५. अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा साक्षी और साक्ष्य का विचार करके अवस्थात्रय के विवेक द्वारा उसके तुरीय साक्षी के अधिगम का प्रकार ... .... २१-२६ ६. कार्य-कारणात्मक माया की उपाधि के कारण आत्मा में ज्ञातृत्व-कर्तृत्व-सर्वज्ञत्वादि व्यवहार .... .... २७-२८ ७. आत्मा का निरुपाधिक स्वरूप, मन या वाणी से नहीं, वेदान्त से ही जाना जाता है ... ... २९-३२ ८. तीनों अवस्थाओं के अभिमान को त्यागने का प्रकार .... ... ३३-३५ ९. मुमुक्षु के लिये उसके कर्तव्य का उपदेश .... ... ३५-३९ १०. ज्ञेयत्व-अज्ञेयत्वादि के प्रतिभास की व्यवस्था एवं ब्रह्मात्मतत्त्व की स्वयम्प्रकाशता का प्रतिपादन ... ... ४०-५४ १६. पार्थिवप्रकरणम् (पृ० ११९-१४७) १. स्थूल शरीर को ही आत्मा समझनेवालों के मत का निराकरण .... .... १ २. इन्द्रियों को ही आत्मा कहनेवालों के मत का खण्डन ... ... २-३ ३. बुद्धि को ही आत्मा माननेवालों के मत का निरसन .... ... ४-१४ ४. शून्य को ही आत्मा कहनेवाले बौद्धों के सिद्धान्त का खण्डन .... .... १५-२१ ५. दिगम्बर जैनों के आत्मसिद्धान्त का खण्डन .... ... २२ ६. शाक्यों (बौद्धों) के आत्मसिद्धान्त का खण्डन .... ... २३-२९ ७. स्वकीय सिद्धान्त का सामञ्जस्य बताते हुए शून्यमत का निराकरण ... .... ३०-४४ ८. सांख्यसम्मत पुरुष (आत्मा) की निर्गुणता के सिद्धान्त का खण्डन ... .... ४५-५० ९. वैशेषिकसम्मत प्रक्रिया में दोषप्रदर्शन ... ... ५१-५७ १०. बन्ध की अज्ञानात्मकता .... ... ५८-६१ ११. मोक्ष का स्वरूप .... .... ६२-६७ १२. परपक्ष का निराकरण समाप्त करके स्व-मत का उपसंहार : .... ६८-७४ १७. सम्यङ्मतिप्रकरणम् (पृ० १४८-१८२) १. गुरु-देवता नमस्कार .... .... १-३ २. आत्मलाभ ही परमलाभ है .... .... ४-६ ३. ज्ञान से ही अज्ञाननाशलक्षण मोक्ष की प्राप्ति होती है, 'कर्म' से नहीं ... ... ७-८ ४. सम्पूर्ण वेद, एकार्थज्ञानपरक होने से एकवाक्यरूप हैं ... ... ९-१० ५. दृश्यमान समस्त व्यवहार, वस्तुतः सत् नहीं है ... ... ११-२१ ६. यम-नियम-यज्ञ और तप के द्वारा चित्त का शोधन .... .... २२-२६ ७. आत्मा का मायाकल्पित बहुत्व ... .... २७-३२ ८. परमात्मा में फल की अव्याप्यता (अविषयता) रहने पर भी वृत्तिव्याप्यता (वृत्ति- विषयता) और नित्यता आदि के रहने का प्रतिपादन ... ... ३३-४३

( iv ) ९. कर्मों की त्याज्यता का प्रतिपादन .... ... ४४-५० १०. गुरु के शरणागत होने का प्रतिपादन .... ... ५१-५३ ११. पदार्थविवेक-प्रतिपादन .... ... ५४-५६ १२. प्रबुद्ध मुमुक्षु के अनुसन्धान करने का प्रकार .... ... ५७-८१ १३. प्रकरणप्रतिपादित विषय का उपसंहार .... ... ८२-८९ १८. तत्त्वमसिप्रकरणम् (पृ० १८३-२५९) १. नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण के व्याज से प्रकरण-प्रतिपाद्य अर्थ एवं स्व-सम्प्रदाय की विशुद्धता का निरूपण .... .... १-२ २. 'तत्त्वमसि'-वाक्य से ही अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञान और आरोपित अनर्थ की निवृत्ति होती है .... .... ३-८ ३. प्रसंख्यानवादी (वाक्यानुचिन्तनवादी) का मत .... .... ९-१६ ४. स्व-सिद्धान्त का प्रतिपादन .... .... १९-२३ ५. 'आत्मा' कभी प्रत्यय का विषय नहीं होता .... .... २४-२७ ६. 'आत्मा' कभी शब्द का विषय नहीं .... .... २८-३२ ७. आभास की अनिर्वचनीयता .... .... ३३ ८. एकदेशियों के मत .... .... ३४-३६ ९. आत्माभासनिरूपणपूर्वक चिच्छायावादिप्रभृतियों के मत का निराकरण .... .... ३७-५० १०. आत्मा में 'जानाति' आदि शब्दव्यवहार की अनुपपत्ति की शंका .... .... ५१-५६ ११. उस शंका का परिहार .... ... ५७-६७ १२. बुद्धि के विषय में तार्किक और बौद्ध आदि के मतों का निरसन .... .... ६८-७४ १३. आभास के विषय में शंका और उसका परिहार .... ... ७५-९० १४. 'युष्मद्' और 'अस्मद्' का विवेक .... .. ९१-९८ १५. तत्त्वज्ञान होनेपर पुरुष में फल के समान महावाक्य से ज्ञान पैदा होता है ... ... ९९-१०४ १६. ज्ञातव्य अर्थ के स्वरूप का निरूपण ... ... १०५-१४० १७. विज्ञानवादी बौद्ध के मत का खंडन ... ... १४१-१५२ १८. प्रत्यक्ष और अध्यक्ष—दोनों का सम्बन्ध क्या है? ... .... १५३-१६० १९. विवेक और अविवेक—दोनों के बाध्य-बाधक भाव का निरूपण .... ... १६१-१७२ २०. 'तत्' और 'त्वम्' दोनों की एकार्थनिष्ठता रहने पर पर्याय की शंका और उसका परिहार ... ... १७३-१८० २१. 'त्वम्' पदार्थ का विचार .... ... १८१-१८३ २२. 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य के अर्थ का विचार .... .... १८४-२०५ २३. प्रकारान्तर से प्रसंख्यानप्राप्ति का निरास ... ... २०६-२२९ २४. प्रकरणप्रतिपादित अर्थ का उपसंहार ... ... २३०-२३३ १९. तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् (पृ० २६०-२७२) १. संसार में मनोध्यास कारणता प्रकाशित करने के लिए आत्मा और मन का संवाद ... ... १-८ २. आत्मा का अद्वितीयत्त्व .... .... ९-१२ ३. आत्मा विकल्पना आदि का विषय नहीं है ... ... १३ ४. अद्वैत का निश्चय करने में विचार की कारणता ... ... १४-१८ ५. उक्तार्थ के निश्चय से रहित लोगों को अनर्थ की प्राप्ति ... ... १९-२०

( ४ ) ६. वस्तुमात्र में कारणता और कार्यता का निरसन ... ... २१-२४ ७. द्वैत के आभास का निरूपण और मंगलाचरण ... ... २५-२८ गद्यभागः १. शिष्यानुशासनप्रकरणम् (पृ० २७३-२९८) वाक्य संख्या १. चिकीर्षित प्रतिज्ञा का उल्लेख करते हुए शास्त्रीय अनुबन्धों का संग्रह ... ... १ २. संक्षेप से उक्त अर्थ का स्पष्टीकरण ... ... २ ३. गुरु के समीप जाने की आवश्यकता ... ... ३ ४. गुरु के द्वारा बार-बार उपदेश दिये जाने का कारण ... ... ४ ५. ज्ञानोत्पत्ति के होने में अनेक हेतुओं का होना ... ... ५ ६. गुरु के द्वारा किये जाने वाले उपदेश का क्रम ... ... ६ ७. श्रुति तथा स्मृतिपठित वाक्यों के द्वारा ब्रह्म के लक्षण का ज्ञान, शिष्य को करावे ... ... ७-८ ८. शिष्य की बुद्धि (ज्ञान) को सुदृढ बनाने के लिये उसे गुरु पुनः प्रश्न करे ... ... ९ ९. शिष्य के उत्तर को सुनकर उसे यथार्थज्ञान न हो पाने का गुरु को बोध होना ... ... १० १०. यथार्थज्ञानोत्पत्ति में प्रतिबन्धक दोषों के निवारणार्थ शिष्य को आचार्य के द्वारा पुनः उपदेश ... ... ११ ११. आत्मा और अनात्मा में विवेक (भेद) और 'क्रम' शब्द से 'एक भविकल्यवाद' का निरास ... ... १२ १२. शिष्य के मुख से उसे अवगत हुए विवेक को सुनकर गुरु के द्वारा प्रशंसा किया जाना ... ... १३ १३. भ्रान्ति के होने में वर्णाश्रमादि के प्रति अभिमान होना ही मूल कारण है ... ... १४-१५ १४. उक्त अर्थ को ही अधिक स्पष्ट करते हुए परमात्मा के लक्षण का अनुसन्धान कराना ... ... १६-१७ १५. शरीर की भिन्न जाति, कुल, संस्कार को बोधित करने के लिए संघात की उत्पत्ति का प्रकार और ब्रह्म की अभिन्ननिमित्तोपादानता का निरूपण ... ... १८ १६. नाम और रूप की व्याकृति ... ... १९ १७. शरीर की उत्पत्ति का प्रकार ... ... २० १८. शरीर की भिन्न जाति, अन्वय और संस्कार का निरूपण ... ... २१ १९. मन आदि सूक्ष्म संघात भी आत्मा नहीं है ... ... २२ २०. स्रष्टा का ही जीवरूप में प्रवेश और परमात्मा ही क्षेत्रज्ञ है ... ... २३-२४ २१. अनुभवविरोधशंकासमाधानपूर्वक भेददृष्टि की निन्दा ... ... २५-२७ २२. ब्रह्मात्मैक्य के ज्ञान से कर्म और उसके साधन का निषेध ... ... २८-३२ २३. युक्ति से ब्रह्मात्मैक्य का व्यवस्थापन ... ... ३२-३५ २४. वेदादि में अनात्मत्व का उपपादन ... ... ३५ २५. रूपादि संस्कारों में बुद्ध्याश्रयता ... ... ३६ २६. ब्रह्म और आत्मा की एकता में श्रुतिस्मृति के प्रमाणों का प्रतिपादन ... ... ३७-३८ २७. ब्रह्म और आत्मा की एकता में लौकिक-वैदिक व्यवहार की आशंका और परिहार ... ... ३९-४० २८. कर्मकाण्ड के अप्रामाण्य की आशंका और उसका परिहार ... ... ४१-४२ २९. अविद्या के उन्मूलन का फल ... ... ४३ ३०. मोक्ष में कर्म की साधनता न होने का निरूपण ... ... ४४

( vi ) २. कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणम् (पृ० २१९-३२४) १. संसार विषयक प्रश्न ... .... ४५ २. दुःख का अनुभव नैमित्तिक है .... .... ४६ ३. उसका निमित्त अविद्या है .... ... ४७-४८ ४. अविद्याविषयक प्रश्न ... ... ४९ ५. अविद्या चिन्मात्राश्रयविषयक है ... ... ५० ६. अध्यास की अनुपपत्ति बताते हुए शिष्य का प्रश्न ... ... ५१ ७. प्रसिद्ध का प्रसिद्ध में ही अध्यारोप होने का कोई नियम नहीं है ... ... ५२ ८. आक्षेप-समाधान पूर्वक अध्यारोप की सिद्धि .... ... ५३-५४ ९. इतर का इतर में अध्यास होने से आत्मा के असत्त्व-प्रसंग की शंका .... ... ५५ १०. गुरु का उत्तर .... ... ५६ ११. वैनाशिक पक्ष की प्राप्ति की आशंका और उसका परिहार ... ... ५७-५८ १२. परमत में दूषण का आपादन ... ... ५९ १३. प्रकारान्तर के अध्यास की अनुपपत्ति की आशंका और उसका परिहार .... ... ६०-७३ १४. आत्मा स्वतन्त्र है अथवा परतन्त्र ? ... ... ६६-७० १५. चितिमान् परतन्त्र नहीं रहता ... .... ७१ १६. एक चितिमान् दूसरे चितिमान् के लिये नहीं है .... ... ७२-७३ १७. कूटस्थ के विषय में संशय एवं उसका परिहार .... .... ७४-७५ १८. उपलब्धा के रूप में कूटस्थत्व के अनुपपत्ति की आशंका और उसका परिहार .... ... ७६-८५ १९. उपाधि के कारण उपलब्धि में फल का उपचार ... ... ७७ २०. बुद्धि और उसके धर्माध्यास के द्वारा आत्मा का संसारित्व .... .... ८१ २१. तीन अवस्थाओं का आगंतुकत्व .. .... ८६-८९ २२. चैतन्य आगंतुक नहीं है ... .... ९०-९१ २३. आत्मा का नित्यत्व, प्रकाश, कूटस्थचिद्रूपता ... ... ९२-९३ २४. संविद् में नित्यत्व का आक्षेप और परिहार .... .... ९४-१०१ २५. प्रमाता की स्वतःसिद्धि निरपेक्ष ही होती है .... ... ९९ २६. आत्मा में प्रकाशगुण की उत्पत्ति के अभाव का निश्चय ... .... १००-१०१ २७. आत्मा में प्रमातृत्व आदि का व्यवस्थापन .... ... १०२-१०३ २८. आत्मा में कर्तृत्व का प्रतिभास उपाधि के अविवेक के कारण हो होता है ... ... १०४-१०७ २९. ज्ञान में फलत्व की प्रसिद्धि उपचार के कारण होती है ... ... १०८ ३०. द्वैत के मृषात्व का निरूपण ... .... १०९-१११ ३. परिसंख्यानप्रकरणम् (पृ० ३२५-३२८) १. उपस्कार के सहित परिसंख्यान के प्रकार का उपदेश .... ११२-११३ २. शब्द आदि के द्वारा आत्मा के अभिभवराहित्य का विचार .... ... ११४-११५ ३. शब्द आदि से होनेवाले अनुभव तथा आत्मा की अविकारिता का अनुचिंतन .... ... ११६

आशीर्वचन

भारतीय धर्मगगन के सर्वोज्ज्वल ग्रह कृष्ण, बुद्ध व शङ्कर हैं, इस बात को सारा संसार स्वीकारता है। वर्तमान हिन्दू धर्म के संस्थापक होने के नाते हिन्दू धर्म के तो शङ्कर ही सर्वस्व हैं ❀। गत बारह सौ वर्षों में उनके द्वारा प्रदत्त संकेतों को ही विस्तृत कर अनेक सम्प्रदाय निर्मित हुए हैं। उनके भाष्यग्रन्थ जटिल व दार्शनिक युक्तियों से भरपूर होने से सामान्य व्यक्ति न केवल उन्हें पढ़ने पर घबड़ा उठता है वरन् उनके भावों को समझना भी उसके लिये असम्भव हो उठता है। कई बार तो पूर्वपक्ष की युक्तियों से प्रभावित हो उसे ही ठीक मान बैठता है। आचार्य शङ्कर की शैली है कि विरोधी की बातों को विस्तार से रख कर उनकी आधारशिला को अपनी एक या दो युक्तियों से ऐसा ध्वस्त कर देना कि उसकी सारी अट्टालिका भूमिगत हो जावे। अतः उन्होंने अनुग्रह करके मध्यमाधिकारियों के लिये ऐसे प्रकरण-ग्रन्थों की रचना की, जिनमें इतना काठिन्य न हो एवं सिद्धान्त-पक्ष को पूर्ण रूप से उपस्थित कर दिया जाय। जो पूर्व में ही भिन्न दर्शनों से प्रभावित न हुआ हो उसकी ज्ञाननिष्ठार्थ इतना ही पर्याप्त है। ऐसे ग्रन्थों में कई तो इतने छोटे हैं कि बिना टीका के उनका अर्थ ही तिरोहित रहता है। इसके दो उदाहरण श्री दक्षिणामूर्ति स्तोत्र व दशश्लोकी हैं। सुरेश्वराचार्य के वार्तिक के बिना प्रथम एवं मधुसूदन व ब्रह्मानन्द सरस्वती के बिना द्वितीय का अर्थ कभी भी उजागर न हो सकता था। परन्तु वर्तमान ग्रंथ ‘उपदेशसाहस्री' स्वयं अपने में स्पष्ट है। इसको सुरेश्वराचार्य ने अपनी नैष्कर्म्यसिद्धि में तथा वार्तिकामृत में उद्धृत किया है। आचार्य के सिद्धान्त को ठीक-ठीक समझाने वाले ग्रन्थों में यह श्रेष्ठ है। श्रीमत्परमहंस स्वामी आनन्दगिरि जी की भव्य टीका के साथ इसे पूर्व में प्रकाशित किया गया है। रामतीर्थ टीका भी निर्णयसागर प्रेस से प्रकाशित हो चुकी है। इन्हीं के आधार पर श्री गजाननशास्त्री मुसलगाँवकर जी ने इसकी विस्तृत टीका लिखकर इसे हिन्दी मात्र जानने वालों के लिये सुलभ कर दिया है। विद्वान् लेखक ने अनेक अन्य ग्रन्थों के अनुवाद भी प्रकाशित किये हैं, जो उनकी दार्शनिक परि- पक्वता के द्योतक हैं। हमें आशा है कि वे वेदान्त के अन्य ग्रन्थों के अनुवाद भी समय-समय पर उपस्थित करते रहेंगे। इनके अनुवादों की विशेषता यही है कि स्पष्टतया आवश्यक पदार्थों को वहीं उपस्थित कर जो दर्शनों से अपरिचित हैं, उनके लिये भी ग्रन्थों को सुगम कर देते हैं।

वेदान्त-धर्म का प्रधान विषय ईश्वर है। वस्तुतः संसार के सभी धर्मों का प्रतिपादन अन्ततोगत्वा ईश्वर ही है। जो संसार का मूल कारण हो व संसार का अन्तिम उद्देश्य हो, वही ईश्वर है। अतः माध्यमिकों का शून्य व विज्ञानवादियों का विज्ञान भी ईश्वर ही है। मीमांसकों का कर्ता भी ईश्वर ही है। सांख्यशास्त्र का पुरुष भी ईश्वर ही है। योगियों ने तो उसे विशेष पुरुष कहा भी है। ईश्वर के विशेष रूप के विषय में अनेक मतभेद हैं। इसका कारण ईश्वर के अनुभव- काल में संस्कारों की झिल्ली का बने रहना है। अनुभूत्यनन्तर पुनः अन्तःकरण के माध्यम से ही उसे प्रकट करने को बाध्य होना पड़ता है अतः अन्तःकरण की कारणता भी प्रविष्ट हो जाती है। वाणी में प्रकट करने पर तत्तद्भाषाओं की सीमाएँ भी प्रविष्ट हो जाती हैं। अनेक अनुभवियों का स्वतः न लिखना एवं उनके उपदेश को सुनकर जैसा समझा वैसा लिखने का प्रयत्न उनके शिष्यों द्वारा होना भी एक कारण है। अतः शिष्यों की समझ व प्रकाशन-सामर्थ्य की सीमाएँ भी आ ही जाती हैं। इन सब सीमाओं के पार जाने पर निर्विशेष प्रत्यगात्मा ही बचता है। औपनिषद् पुरुष भी इसे ही कहा

  • “In the history of Hinduism, the establishment of Shankara’s Advaita System of Philosophy is a great landmark. The ancient period ends with the establishment of Shankara’s System, the final triumph of Hinduism over Buddhism and Jainism in the ninth century”. — Kenneth W. Morgan’s The Religion of the Hindus, p. 27.

( viii ) जा सकता है। एक बार इसको समझ लेने पर सभी ईश्वर-विषयक मान्यताएँ संगत हो जाती हैं और सभी साम्प्रदायिक व धार्मिक विरोधों का अन्त हो जाता है। आचार्य शङ्कर ने इसी को आधार बनाकर तत्कालीन सभी सम्प्रदायों को एक हिन्दू-धर्म में अन्तर्भूत किया। आज भी उनकी दृष्टि से देखकर सभी विश्वधर्मों को सनातन धर्म में अन्तर्भूत करने की आवश्यकता है। अन्य धर्मावलम्बी प्रायः एक साम्प्रदायिक मान्यता को सभी पर लागू करने को धर्म-परिवर्तन मानकर लोगों को अपने झण्डे के नीचे लाने में विश्वास करते हैं। वेदान्ती उन्हें अपने धर्म में रहते हुए, अपनी सनातन कुल- मर्यादाओं को मानते हुए, सभी मान्यताओं को व्यावहारिक दृष्टि से एक-जैसी मान कर उन्हें पारमार्थिक दृष्टि से निर्विशेष प्रत्यगात्मा से अभिन्न स्वीकारने को ही वास्तविक धर्म-परिवर्तन एवं सनातन धर्म के झण्डे के नीचे आना मानता है। युग की पुकार है कि इस दृष्टि का प्रचार कर कम-से-कम प्रारम्भ में भारत के सभी धार्मिक समूहों में शान्ति व सौहार्द की स्थापना की जा सके एवं चूंकि भारत में विश्व के सभी धर्म पुष्कलरूपेण मौजूद हैं अतः इस प्रयोग के सफल होने पर विश्व भर में इसी सौहार्द की स्थापना की जा सके। सभी धर्म किसी माध्यम से ही ईश्वर की प्राप्ति मानते हैं। वेदान्त स्वयं जीव के वास्तविक स्वरूप प्रत्यगात्मा को ही माध्यम मानता है। चूंकि दूसरे माध्यम भी अन्ततोगत्वा प्रत्यगात्मा रूप से ही माध्यम सिद्ध होते हैं, अतः उनसे अविरोध ही आचार्य शङ्कर को मान्य है। उपदेशसाहस्री में प्रत्यगात्मा के माध्यम का जितना स्पष्ट व सटीक विवेचन हुआ है, अन्यत्र दुर्लभ है। अतः इसका आज के युग में विशेष महत्त्व है। ब्रह्मसूत्र को सर्वज्ञ शङ्कर 'शारीरिक मीमांसा' कहते हैं। उनकी दृष्टि में ब्रह्म का विचार शरीर में स्थित चेतना से प्रारम्भ होता है एवं सर्वशरीररूप में सर्व में स्थित ब्रह्म रूप की प्राप्ति में समाप्त होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि संसार में किसी भी दर्शन या धर्म में मनुष्य उतना मूल्यवान नहीं है जितना अधिक मूल्य उसे शाङ्कर वेदान्त में प्राप्त है। सर्वज्ञ शङ्कर मानते हैं कि अविचार से जो जीव है, विचार से वही ब्रह्म है। 'अशनायादिनिर्मुक्तः सिद्धो मोक्षस्त्वमेव सः' (उ० सा० तत्त्वमसि० २०६)। विचार से पूर्व जीव के कष्टों को स्वीकार करते हुए भी उसकी वास्तविकता को आचार्य ने अस्वीकारा है। आचार्य के समस्त दृष्टिकोण को समझने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य का जो चित्र वे खींचते हैं, उसमें उसका परम-प्रयोजन या अन्त अत्यन्त सुरक्षित है। उसकी पूर्णता (integrity) व असामान्य अभिव्यक्तियों का विस्तार अनुपम है। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण का जो निराशा का माहौल है, उसको मानो आचार्य शङ्कर चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य की जो शारीरिक सीमाएँ उसे अनगिनत कमजोरियों व दुःखों का घर बना रही हैं, वे केवल क्षणिक हैं। मनुष्य का मूल्य उन कमजोरियों से नहीं लगाना है वरन् हमें तो उसको उसके ब्रह्मरूप से आंकना है, जो उसकी अन्तिम अपितु सहज पूर्णता है। यही उसका निश्चित् रूप है। वर्तमान जीवनक्रम व उसके भिन्न रूप तभी मूल्यवान् लगते हैं जब उन्हें उन्नति के सोपान के रूप में, व विकासशील रूप में समझा जाता है। इसी से इसे दिशा-निर्देश भी प्राप्त होता है। यह सत्य है कि आपाततः मनुष्य-जीवन एक पहेली है। पहेली को समझे बिना मनुष्य क्रिया व निष्क्रियता के बीच डोलता रहता है। संशय में पड़ा रहता है कि वह पशु है या देव। विवेक व कामनाओं के बीच अपने को झुंझलाता हुआ पाता है। इस असीम विश्व की विस्तृति उसकी समझ के परे लगती है। वह अपने को अति तुच्छ रूप में देखता है। उसे आत्मज्ञान व्यर्थ-सा लगता है। परन्तु इतने पर भी वह पाता है कि वह ऐसा यन्त्र है जिसमें विश्व के पदार्थों की ज्ञानरूप आहुति डालते हैं। ये पदार्थ अर्थशून्य हैं, अनर्ह हैं। परन्तु मनुष्य में जाकर इन्हें प्रयोजनवत्ता की नवीन गुणवत्ता प्राप्त हो जाती है। ये अर्ह हो जाते हैं। यह जो मानव की आध्यात्मिक शक्ति है कि विश्व को समझ कर विश्वातीत्त का दर्शन कर सके, यही उसकी वास्तविकता है क्योंकि वह स्वयं ही विश्वातीत तत्त्व है। निरन्तर परिवर्द्धमान, विकासशील और सप्रयोजन जिज्ञासा ही इसे 'प्रज्ञानं ब्रह्म' का साक्षात्कार कराती है। 'अज्ञानं कल्पनामूलं संसारस्य नियामकम् । छित्वाऽऽत्मानं परं ब्रह्म विद्यान्मुक्तं सदाऽभयम्' (उ० सा० पार्थिव० १७)। विश्वधर्म को उपनिषद् की सबसे बड़ी देन है जीव, जगत् व ईश्वर की अधिष्ठानदृष्ट्या एकरूपता। यह बात दूसरी है कि जगत् का स्वरूप से बाध होता है व जीव तथा ईश्वर की उपाधिमात्र का। 'आत्माभासाश्रयाच्चैवं मुखा- भासाश्रया यथा। गम्यन्ते शास्त्रयुक्तिभ्यामाभासासत्त्वमेव च (उ० सा० तत्त्वमसि० ४३)। यह आभास बनना या अनुप्रवेश क्या है? सदाशिव का स्थूल-सूक्ष्म देहों के साथ अभिन्नतया प्रतीत होना ही प्रवेश है। असंभव होने से यह

( ix ) आविद्यक ही हो सकता है। देह आपस में भिन्न हैं, पर उन सभी में वह तो एक जैसा ही प्रविष्ट है। 'विविच्यस्मात्स्वमात्मानं विद्याच्छुद्धं परं पदं । द्रष्टारं सर्वभूतस्थ समं सर्वभयातिगम् ( उ० सा० नात्यदन्यत्० ३६) । तात्पर्य है कि हार्दाकाश में निरुपाधिक साक्षात्कार होने के निमित्त से ही अनुप्रवेश कहा गया है। जीव स्थूल-सूक्ष्म उपाधि में वर्तमान परब्रह्म ही है एवं वही व्यावहारिक अनुभूतियों का प्रमाता है। 'तस्मात्पर एवैकः सर्वेषां भूतानां अन्तर्रात्मा जीवभावेन अवस्थितः'। तत्त्वमीमांसा करने पर महेश्वर ही उपाधि द्वारा मनुष्य कहा जाता है। इससे अधिक श्रेष्ठता मनुष्य की क्या बतायी जा सकती है ? यह सत्य है कि उपाधि अविद्या का ही कार्य है। अविद्या ही शिव, विश्व और जीव का भेद उपस्थापित करती है। मानव के स्थूल-सूक्ष्म शरीर रूपी उपाधि की भौतिकता वेदान्तमान्य है। मन भी भौतिक है एवं दृश्य के अन्तःपाती है, द्रष्टा के अन्तःपाती नहीं। उपाधियों की आविद्यकता महत्त्वपूर्ण है। आत्मज्ञान उनका बाधक इसीलिए है कि वे आविद्यक हैं। परन्तु वे व्यावहारिक सत्य हैं एवं वही प्रति जीव के विशेष भाव का हेतु हैं। श्रीडिङ्कर अपने 'किञ्जीवनम्' नामक ग्रन्थ में बताते हैं कि जैसे हम कई मटके या मकान देखते हैं, वैसे हमें कभी भी कई चेतन नहीं दीखते । 'मैं' चेतन ही एकमात्र प्रतीत होता है। वे आगे कहते हैं कि आकाश व काल ही बहुत्व निर्माण करने वाले हैं। अतः दिक्कालातीत होने से चैतन्य कभी बहुत्व को प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिये 'ज्ञातेवाहम्विज्ञेयः शुद्धो मुक्तः सदेत्यपि । विवेकी प्रत्ययो बुद्धेर्हृष्टत्वान्नाशवान्यतः ( उ० सा० प्रकाश० १४) । जीव में ईश्वर का अन्तर्यामित्व अभेद से है, दो चैतन्य भिन्न होकर नहीं। अतः वेदादि सच्छास्त्रों में जहाँ इस प्रकार के वचन हैं, वे भेदप्रतिपादनार्थ नहीं हैं। भेदसिद्धि के लिए उनका प्रयोग करने पर चैतन्य के बहुत्व का अनुभव तथा युक्तिविरोध प्राप्त होकर वेदार्थ ही सन्दिग्ध या अविश्वस्त हो जायगा। अतः द्वैतवादियों के 'द्वा सुपर्णा' या अन्तर्यामी ब्राह्मण के द्वारा जीव व ईश्वर के भेद का प्रतिपादन सर्वथा असंगत है। अयौक्तिक, अननुभूत अथच अविचारित भेद का अनुवाद श्रुति करे यह तो सम्भव है, पर उसका प्रतिपादन करे यह सम्भव नहीं। परमतत्त्व के तीन प्रकार के वर्णन उपनिषद् में प्राप्त होते हैं। निर्विशेष ब्रह्म का ज्ञेयार्थ निरूपण एवं सविशेष ब्रह्म का ध्यान करने के लिए प्रतिपादन श्रुतियों में तात्पर्य से किया गया है। कर्म व कर्मफल का कर्ता व भोक्ता रूप जिज्ञासु को अनुभवसिद्ध होने से उसका अनुवाद किया है एवं उसका तात्पर्य जीव के वास्तविक स्वरूप का विवेक करके उसकी ब्रह्म से अभिन्नता प्रतिपादन करना है। ब्रह्म की चेतनता श्रुति बताती है परन्तु चेतनता क्या चीज है, यह तो जीव को अपने स्वरूप में ही अनुभूत है। अतः ब्रह्म जीव से अभिन्नरूप न हो तो सदा ही परोक्ष रहेगा, ब्रह्मसाक्षात्कार असम्भव हो जायगा। वेदादि शास्त्र मुमुक्षु के लिए रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक हो जावेंगे। अतः जीव ही, जो चेतन का एकमात्र अपरोक्ष रूप है, ब्रह्मापरोक्षता का स्थल हो सकता है। जीव की उपाधियों से ही वह जीव है अन्यथा ब्रह्म ही है। ईश्वरश्चेदनात्मा स्यान्नासावस्मीति धारयेत् । ......... अज्ञेयत्वेऽस्य किन्तैस्स्यादात्मत्वे त्वन्यधीहुतिः' ( उ० सा० ईश्वर० १,२) । अतः चेतन में भेद केवल उपाधिनिष्ठ है। तीन प्रकार के वर्णनों से तीन प्रकार के भिन्न चेतनों का कथन न होकर एक चेतन के तीन प्रकार की उक्ति अविचारित प्राप्त भेद की निवृत्ति के लिये ही है। कर्म व कर्मफल की व्यवस्था के बिना मानव के समग्र यत्न निरर्थक हो जावेंगे। यह शास्त्रीय उपासना रूप कर्म के लिए भी उतना ही सत्य है। अतः कर्मफलदाता ईश्वर ही ध्येय ब्रह्म होने से ध्यान का विषय भी है व ध्यान का फल देनेवाला भी। कर्म के द्वारा भी वही आराध्य है व वही फलदाता भी। इतना निश्चय होने पर वही ईश्वर लौकिक कर्मों के फलदाता रूप से भी स्वीकारा जाता है। इस प्रकार ईश्वर व जीव का सम्बन्ध स्वामी व सेवक भाववाला है। इसी भाव की भक्ति वेदान्तसम्मत है। ईश्वरत्व के भाव से रहित जिस भक्ति का प्रतिपादन किया जाता है, वह तो मूल को काटकर पत्ते को सींचने की तरह व्यर्थ है। पत्ते की चमक की तरह मन की एकाग्रता तो वहाँ भी उपलब्ध हो ही जायगी। 'ओमित्येवं सदात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ । सेतुं सर्वव्यवस्थानां अहोरात्रादि- वर्जितम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ७७) ।

सच्चिदानन्द परब्रह्म ही सारी साधनाओं का लक्ष्य वेदान्त के अनुसार स्वीकृत है। यह सत्य है कि उसका किसी भी प्रकार से निरूपण अशक्य है, परन्तु यह भी सत्य है कि 'सत्यं ज्ञानं अनन्तम्', 'आनन्दं प्रपञ्चोपशमं शान्तम्', 'अद्वैतं शिवं' आदि के द्वारा स्वयं श्रुति ने उसका निरूपण भी किया है एवं उस निरूपण से साधक स्वकीय प्रज्ञा के द्वारा अन्वेषण करके कृतार्थ भी हुए हैं और हो रहे हैं। जितना यह सत्य है कि असंस्कृत पुरुष को इन सभी शब्दों में त्रुटि प्रतीत होती है, उतना ही सत्य यह भी है कि गुरु द्वारा संस्कार को प्राप्त शिष्य को इन्हीं के द्वारा पूर्णता की प्राप्ति होती है। अन्तिम गुरुक्ति 'तत्त्वमसि' इन्हीं पर आधारित है। सभी सप्रयोजन उद्बुद्ध कर्म शिवकेन्द्रित ही हों, सभी भावनाओं व स्नेहों का एकमात्र उद्देश्य शिव ही हो, सभी बौद्धिक गवेषणाओं का लक्ष्य शिव ही हो, यही वेदान्त सम्प्रदाय है। 'आत्मलाभात्परो नान्यो लाभः कश्चन विद्यते । यदर्था वेदवादाश्च स्मार्ताश्चापि तु याः क्रियाः' ( उ० स० सम्यङ्मति० ४)। इसीलिए वेद मानवदेह को ब्रह्मपुर कहता है। ब्रह्म की उपलब्धि के लिए प्राप्त यह देह जब इस उद्देश्य से प्रवृत्त होता है तो ब्रह्म ही सर्वोच्च अर्हा व परमसत्य होने से मानव का समग्र जीवन दिव्य हो पड़ता है। इसमें जीवन के किसी भी पक्ष का निरास नहीं है। जीवन के सभी पक्षों को उच्च व अधिकतम क्रियाशील स्तर पर पूर्ण दीप्ति से कार्य करना जरूरी हो जाता है। 'सत्यं ज्ञानं अनन्तं च रसादेः पञ्चकात्परम् । स्यामहंश्चादि- शास्त्रोक्तमहं ब्रह्मेति निर्भयः ॥ यस्माद्भीताः प्रवर्तन्ते वाङ्मनः पावकादयः । तदात्मानन्दतत्त्वज्ञो न बिभेति कुतश्चन ( उ० सा० सम्यङ्मति० ६२-६३)। दैवी सम्पत्ति उसमें स्वभावतः प्रतिष्ठित है अतः वह दिव्य है। दैवी सम्पत्ति उसके लिए साधनरूप नहीं है। आचार्य शङ्कर के पट्टशिष्य सुरेश्वर अपनी प्रसिद्ध कृति नैष्कर्म्यसिद्धि में कहते हैं— 'अमानित्वादिनिष्ठो यो यश्चाद्वेष्ट्रादिसाधनः ज्ञानमुत्पद्यते तस्य न बहिर्मुखचेतसः (नैष्कर्म्यसिद्धि ४.६८)। साधक व सिद्ध में केवल यही भेद है कि सिद्ध में यह जीवन की दिव्यता या क्रियाशील दीप्ति अप्रयत्न से ही प्रकट होती है जब कि साधक में प्रयत्न से । 'उत्पन्नात्मप्रबोधस्य स्वद्वेष्टृत्वादयो गुणाः अयत्नतो भवन्त्यस्य न तु साधनरूपिणः' (नैष्कर्म्यसिद्धि ४.६९)। ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र, जो अद्वैत के साधक के लिये है, स्पष्टतः ईश्वर से सारे परिदृश्यमान अर्थात् कार्य-कारणसंघात और उसकी क्रियास्थली को आच्छादन करने का आदेश देता है। धर्म व दर्शन दोनों का संश्लिष्ट लक्ष्य शिवज्ञान ही है। यहाँ और अभी वह ज्ञान सम्भव है, क्योंकि मानव के अन्तस्तल में वह कालातीत भाव से उपस्थित है। सर्वज्ञ शङ्कर ब्रह्म को ही लक्ष्य स्वीकारते हैं, जो सोपाधिक व निरुपाधिक रूप से उपनिषद् द्वारा प्रतिपाद्य है। यह ब्रह्म साधक की तात्त्विक वास्तविकता (metaphysical reality) है। यह शरीरी नहीं है पर शरीरभाव में शरीरी रूप से प्रतीत होता है। व्हाइटहेड ने विज्ञान व साम्प्रत जगत् में धर्म का लक्षण करते हुए कहा है, 'विश्वातीत, विश्वसंचालक एवं विश्व का आधार ऐसा सत्य है, जिसका सत्यापन ज्ञान द्वारा करना है। इसका परोक्ष ज्ञान धर्म का प्रारम्भ है एवं अपरोक्ष ज्ञान लक्ष्य है। यह सुदूर सत्य भी है एवं अतिसन्निहित तत्त्व भी। यही सभी प्रवह्रित अनुभूतियों को सार्थक करता है पर स्वयं अज्ञात बना रहता है। यही अन्तिम सत्य भी है और अप्रकट भी है, जिसे पकड़ना या जानना असम्भव लगता है।' इसे ही शङ्कर 'ब्रह्म' कहते हैं, जो नित्यसिद्ध होने पर भी जिज्ञासु जीव को साध्य लगता है। इसीलिए साधना व ईश्वरदर्शन आवश्यक हो जाता है। 'नित्यमुक्तः सदेवास्मीत्येवं चेन्न भवेन्मतिः । किमर्थं श्रावयत्येवं मातृवच्छू तिरादृता ( उ० सा० तत्त्वमसि० ३)। व्हाइटहेड व आचार्य शङ्कर की दृष्टि में एक बड़ा भारी भेद यह है कि व्हाइटहेड की दृष्टि में अन्वेषण का उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा परन्तु शङ्कर की दृष्टि में अवश्य पूर्ण होगा क्योंकि वह हृदयाकाश में आत्मरूप से सदा मौजूद है। अतः धर्म चाहे अदृष्ट फल हो, परन्तु परमधर्मस्वरूप शिव तो दृष्टफल ही है।

इसकी प्राप्ति के लिये शङ्कर ने अधिकारमीमांसा को प्रधानता दी है। अधिकारवाद के द्वारा ही हमें पता चलता है कि अद्वैत के आचार्य की पकड़ विश्व की अनन्त उलझनों के विषय में कितनी गहरी है। धर्म-विचार वैसा सरल नहीं है, जैसा कई आधुनिक लोग समझते हैं। जीव व ब्रह्म की तात्त्विक एकता का अर्थ है कि प्रत्येक जीव ब्रह्मभाव का अनुभव करे, मानवयोनि को छोड़ इस बन्धन का अनुभव एवं बन्धन को बन्धन समझने की योग्यता भी नहीं आती। मानवों में भी सभी लोग तड़पन के साथ बन्धनिवृत्ति की कामना नहीं करते। इसीलिये मनुष्यता व मुमुक्षुता की आवश्यकता होती

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है। मानवों में भी कोई-कोई ही आध्यात्मिक जगत् में साहसिक बनकर साधनों का जुगाड़ पाते हैं। पूर्ण स्वतन्त्रता की इच्छा मानव के मन में अत्यन्त देर से आती है। इसके प्रति अप्रमाद एवं ब्रह्मज्ञान के साधनों से अतिरिक्त सभी का त्याग करने की तैयारी भी आवश्यक है। विश्व के अन्तःपाती ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, स्वर्ग, राज्य, धन, पुत्र आदि सभी पदार्थों की प्रातीतिक सुखदता का खोखलापन जानने के बाद ही चरित्र में वह प्रौढता आती है, जो अद्वैतापरोक्षता के लिये उद्दाम वासना बनकर आत्मज्ञान के साधनों में एकाग्रता से प्रवृत्ति कराती है। सामान्यतः मानव अनुकूल की प्राप्ति के निमित्त प्रवृत्त होता है व प्रतिकूल से निवृत्त। पर शनैः शनैः समझ में आता है कि इससे तृष्णा सर्वथा शान्त नहीं होती। कर्ममात्र निश्चित लक्ष्य को पूरा करने में पर्याप्त नहीं हैं। इस स्थिति पर आकर वह शास्त्र के आदेश को समझ पाता है कि अपने अन्दर ही खोजा जाय। जबतक अपने तात्त्विक रूप का पता न लगे, सारे प्रयोजन अनिर्णीत ही रहेंगे। ‘कर्माणि देहयोगाथं देहयोगे प्रियाप्रिये ध्रुवे स्यातां, ततो रागो, द्वेषश्चैव ततः क्रियाः’ (उ. सा. उपोद्० ३) एवं ‘विविच्यस्मात्स्वमात्मानं विद्याच्छुद्धं परं पदं’ (उ. सा. नान्यदन्यत्० ३६)। अन्दर अन्वेषण करने के लिये शान्त चित्त आवश्यक है क्योंकि चित्त का ही सहारा भीतर के ज्ञान के लिये है। इसलिये तो इसे अन्तःकरण कहा है। परन्तु इन्द्रियाँ चञ्चल होने पर बलपूर्वक वे चित्त को अशान्त कर देती हैं, अतः उनका संयमन भी आवश्यक है। इस अन्वेषण में गुरूपसत्ति अनिवार्य है क्योंकि यह अध्यात्मयात्रा अति दुरूह है एवं अनुभवसम्पन्न गुरू के बिना रास्ते में भटक कर अपने उद्देश्य पर न पहुँच कहीं अन्यत्र पहुँचा जा सकता है। अतः गुरु की आज्ञा का पालन व उनके अनुगत होने का अभ्यास आवश्यक है, अन्यथा ब्रह्मज्ञानी गुरू का उपदेश ही सम्भव नहीं होगा। स्वभावतः जितने गुणों से सम्पन्न शिष्य होगा उतना ही वह गुरू के उपदेश को जीवन में उतारने में सक्षम होगा। ‘प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्सततं मुमुक्षवे’ (उ. सा. पार्थिव० ७२)। परन्तु ये अधिकार प्राप्त कैसे हों ? यह तो स्पष्ट ही है कि बहुत कम मानव ही इन अधिकारों को प्राप्त करने के योग्य होते हैं। इसके लिये यम, नियम, शिवार्पण किये हुए यज्ञ, पूजन, तप, जप, देवोपासन आदि कर्तव्य हैं। ‘यमैर्नित्यैश्च यज्ञैश्च तपोभिस्तस्य शोधनम् शारीरादि तपः कुर्यात्तद्विशुद्धयर्थ- मुत्तमम्’ (उ. सा. साम्यङ्मति० २३)।

यम का वर्णन करके हुए सुरेश्वराचार्य मनकी प्रसन्नता, सन्तोष, मौन, इन्द्रियसंयम, दया, दक्षता, आस्तिकता, सरलता, स्वभाव की कोमलता, क्षमा, मनकी सफाई, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, ईश्वर-स्मरण, धृति आदि मनके धर्मों का सामूहिक वर्णन करते हैं जिनको न करने पर साधक पतित हो जाता है। स्नान, सफाई, यज्ञ, सत्य, जप, होम, तर्पण, तप, दान, कष्टसहन, ईश्वर-नमस्कार, प्रदक्षिणा, व्रत, उपवास आदि शरीर से होनेवाले धर्मसमूह नियम कहे जाते हैं। इस प्रकार दीर्घकाल तक आचरण करने पर मनमें वह योग्यता आती है जिसमें ब्रह्मज्ञान धारण किया जा सके। कहा जाता है कि शेरनी का दूध स्वर्णपात्र में ही धारण किया जा सकता है, अन्यथा दूध विकृत हो जाता है। इसी प्रकार योग्य चित्त में ही ब्रह्मविद्या धारण की जा सकती है अन्यथा काम आदि विकारों से वह विकृत हो जाती है। ‘सभयादभयं प्राप्तं तदर्थं यतते च यः स पुनः सभयं गन्तुं स्वतन्त्रश्चेन्न हीच्छति’ (उ. सा. तत्त्व० २२८)। यहाँ स्वतंत्र का अर्थ भी समझने लायक है। आइन्स्टाइन कहते हैं कि निरपेक्ष स्वतन्त्रता अर्थहीन है। प्रत्येक व्यक्ति अपने बाह्य एवं आभ्यन्तर दबावों से ही जो करता है, सो करता है *। इसीको गीता मे स्वभाव कहा है, जिसके द्वारा परमेश्वर अन्तर्यामी कहा जाता है। अतः यदि कामनाओं आदि के संस्कारों से रहित नहीं हो गया है तो अस्वतन्त्र की तरह प्रवृत्त होकर अपने को बद्ध या परतन्त्र अनुभव करेगा। अतः ब्रह्मविद्या का उदय होने के लिये बाह्य व आभ्यन्तर परतंत्रता दूर होना आवश्यक है। यह ठीक है कि जीवन रहते प्रारब्धवशात् कुछ न कुछ स्वभाव तो बना ही रहेगा। परन्तु उतना आवश्यक मात्र बचा रहने पर परतंत्रता का अनुभव नहीं हो पायगा। कामनाओं की आज्ञा के अनुसार अदम्य प्रवृत्ति की इच्छा ही मानव की परतन्त्रता का व्यक्त रूप है। साधनाएं इस इच्छा को इस रोग से मुक्त करने के लिये ही हैं। कामना से निर्मुक्त होने पर मानव का


  • ‘I do not at all believe in human freedom in the philosophical sense. Everybody acts not only under external compulsions, but also in accordance with inner necessity’.-Einstein in Window on the world. Published by Oxford University Press 1972.

( xii ) व्यक्तित्व संश्लिष्ट हो जाता है। अधिकारसम्पन्नता पर जोर देकर नैतिक शिक्षण व जीवन में उसे उतारने पर आचार्य जोर देते हैं। 'नैतद्देयमशान्ताय रहस्यं ज्ञानमुक्तमं (उ. सा. सम्यङ्मति० ८६)। इस संश्लिष्ट व्यक्तित्व की प्राप्ति के बिना दिया ज्ञान भी निष्ठा नहीं बन पाता। ऐसे ही किसी साधक को लक्ष्य करके स्वामी विद्यारण्य जी कहते हैं कि तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके तुम ग्रामशूकर बनने की इच्छा मत करो। थोड़ा-सा प्रयास करने पर ही तुम देवताओं की तरह पूज्य हो सकोगे। विड्वराहादितुल्यत्वं माकांक्षीस्तत्त्वविद्द्वान् सर्वधीदोषसन्त्यागाल्लोकैः पूज्यस्व देववत् (पंचदशी ४।५७)। यद्यपि यह सत्य है कि तत्त्वसाक्षात्कार होने पर देवता की तरह पूज्य होना भी साधक नहीं चाहेगा। उसे तो लगेगा कि प्रतिष्ठा भी शूक़री विष्ठा की तरह अनुपादेय है। पर जो जगत् में कामना से प्रवृत्त हो रहा है, उसकी कामना को उच्चतर नैतिकता की ओर ले जाकर उसे अधिकारसम्पन्न करने में ही तात्पर्य है। अनैतिकता का मूल व्यक्तिमूलक कामनाएँ ही है। वे भूख की तरह हैं व भूख को बृहदारण्यक उपनिषद् में मृत्यु ही कहा है। कामना मन को भविष्य की ओर न देखने देकर उसे संकीर्ण व क्षणिक वर्त्तमान पर केन्द्रित कर देती है। अतः जीव अपनी उच्चतर संभावनाओं को व्यक्त करने पर ध्यान नहीं दे पाता। अतः अन्यत्र उपनिषद् ऐसे मानव को कृपण कहती है। अपनी पूर्णात्मा को प्रकट किये बिना, उसका साक्षात्कार किये बिना, इस संसार से जाना ही कृपण बनकर जाना है। इसी को जीतने का तरीका नैतिक जीवन का निर्माण है। इच्छा के उत्पन्न होने पर उसे नियंत्रित कर उपयुक्त मार्ग में बहाकर उपयोगी बनाना साधना के प्रथम सोपान हैं। पर यह केवल किसी की आज्ञा से नहीं करना है वरन् अपनी शुद्ध वास्तविक आत्मा की अभिव्यक्ति के लिये करना है। इसके लिये अपनी वर्त्तमान प्रतीतिक आत्मा के साथ समझौता करना आवश्यक है, अन्यथा वह ऐसा विप्लव मचायेगी कि साधक निराश हो जायगा। अन्ततः नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त आत्मा के व्यक्त होने पर संघर्ष समाप्त हो जायगा क्योंकि प्रतीतिक आत्मा का बाध हो जायगा। परन्तु तब तक बुद्धि से समझी शुद्धरूपता की तरह इस कामनापुंज का प्रवाह आवश्यक होगा। वेदान्त के विद्वान् शर्मण्यदेशवासी डायसन का कहना है कि मानवता की एकता, उनके सह- अस्तित्व के लिये आवश्यक उनकी आवश्यकताओं और कामनाओं की तरफ आचार्य ने ध्यान नहीं दिया है। परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उन्होंने वेदान्त साधना का अभिन्न अंग कर्मयोग को माना है, जिसमें हिन्दू सामाजिक जीवन के रूप वर्णाश्रमधर्म में इन सबका समावेश हो जाता है। गीता भाष्य में यह और स्फुट हो जाता है। 'देहाद्यैरविशेषेण देहिनो ग्रहणं निजम्, प्राणिनां तदविद्योत्थं तावत्कर्मविधिर्भवेत्' (उ. सा. उपोद्० १६)। चूंकि धर्मशास्त्र में इसका विस्तृत वर्णन है, आचार्य ने इसका अलग से प्रतिपादन करना आवश्यक नहीं समझा। व्यक्ति की उन्नति और जिस समाज में वह रहता है, उसकी उन्नति व्यष्टि और समष्टि की उपाधि की एकता के द्वारा शङ्कर ने ऐसे दार्शनिक धरातल पर रख दी है जो अभेद्य है। किंच उनका जीवन, जो किसी भी वेदान्त अनुयायी के लिये अजस्र प्रेरणा का स्रोत है, स्पष्ट कर देता है कि वे समाज के प्रति कितने संवेदनशील थे। वर्णाश्रमव्यवस्था को स्वीकारने का अर्थ है व्यक्तिगत कामना को समाज की स्थिति के साथ समन्वित करना। सामाजिक अर्हाओं के साथ मिलकर चलने से ही उस दृष्टि को प्राप्त किया जा सकता है, जिससे निष्कामावस्था में समाज को अधिकतम उन्नति की प्रेरणा दी जा सके। लोकसंग्रह आचार्य शंकर के जीवन-दर्शन में विशिष्ट स्थान रखता है। वेदान्त का नैतिक दर्शन मानव की स्वतंत्रता को ऐसे मार्ग से स्फुट करने का प्रयत्न है जो उसकी कामनाओं को रुद्ध करके उसकी परतंत्रता को और अधिक न उलझा दे। विश्व में क्रिया अत्यन्त गहन है, जिस जंगल में से सीधा मार्ग निकालना जरूरी हैं। इसी मार्ग से कर्त्ता स्वतंत्रता के खुले वातावरण में प्रवेश करके शुद्ध पार- मेश्वरी वायु को ग्रहण कर सकेगा। पहला सोपान तो इस बात को समझना है कि सारे कर्म बन्धन का कारण नहीं है। फलप्राप्ति की इच्छा से किया कर्म ही बन्धन का कारण है। इच्छाप्रेरित कर्म क्यों बाँधते हैं? वे कर्त्ता को फल देने के लिये उसे जन्म-मरण के चक्र में डालकर बाँधते हैं। किंच उनसे उत्पन्न वासना पुनः कर्मेच्छा उत्पन्न कर इस चक्र को निरन्तर चलाती रहती है। कर्म का व्यापक कानून इसकी व्यवस्था करता है। 'यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं त्वज्ञः प्रपद्यते' (उ. सा. सम्यङ्० ४८)। निष्फलता की दृष्टि से काम करने वाले को ये बन्धन नहीं हो सकते। तब ईश्वर की प्रेरणा के अनुकूल ही कर्म करना आरम्भ हो जाता है जो अन्ततः नैष्कर्म्य पद की प्राप्ति करा देता है। ईश्वरेच्छा में जीव की इच्छा का विलीन हो

( xiii ) जाना ही कर्म का उद्देश्य है। इसी को अन्यत्र संसिद्धि शब्द से कहा गया है। परन्तु कर्म मोक्ष का कारण नहीं ही हो सकता है। कर्म में कर्तृत्वाभिमान अवश्यंभावी है। 'मैं ईश्वर के नौकर की तरह करता हूँ' में प्रेरकता ईश्वर में होने पर भी कर्तृता तो मैं में रहेगी ही। 'विद्यायाः प्रतिकूलं हि कर्म स्यात्साभिमानतः.........अहं कर्त्ता ममेदं स्यादिति कर्म प्रवर्त्तते' उ. सा. उपोद्० १२-१३ । ) अगले सोपान में समझना पड़ता है कि ईश्वर मानव-कल्पना की उच्चतम कोटि है। ईश्वर के माया से प्राकट्य होने को समझना ईश्वर की कृपा से ही संभव है। इसी में जीव का शिव से प्रेम व शिवका जीव पर अनुग्रह छिपा हुआ है। अवतार का उद्देश्य धर्म व साधुओं का रक्षण ही है। इसके लिये असाधु अधर्मी आसुरी प्रकृतिवालों का नाश आवश्यक होने से वह भी अवतार-जीवन का आवश्यक अंग हो जाता है। धर्म में अप्रवृत्ति के दो कारण होते हैं। युगानुरूप जो कार्य असंभव हो जाते हैं उनमें असामर्थ्य के कारण दूसरे धर्मकार्यों के प्रति भी अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। धर्म के नियम एक अगाध जंगल हैं। उनमें से किसी भी देश, काल आदि परिस्थितियों का विचार करके किन धर्मसमूहों का पालन संभव है एवं किनको छोड़ना ही पड़ेगा इसका निर्णय साधारण व्यक्ति के बूते का नहीं है। भीष्म पितामह जैसे वसु भी युधिष्ठिर के समक्ष सभी धर्मों व मोक्षसाधनों का प्रतिपादन करके भी द्रौपदी वस्त्रपहरण के समय धर्माधर्म का निर्णय करने में अक्षम ही रहे। अतः अवतार का प्रयोजन धर्मव्यवस्था के द्वारा संभव धर्मों को उपदिष्ट व प्रचारित करना है। 'विमथ्य वेदो दधितः समुद्धृतं' ( उ० सा० तृष्णा० २८)। इसी के फलस्वरूप लोगों में धर्मप्रवृत्ति सुलभ हो जाती। ज्ञान होने पर भी सर्वस्व बलिदान करके धर्मपालन भी सबके बूते का नहीं है। अधार्मिक लोग संगठित होकर धार्मिकों का उत्पीड़न करते हैं। यह आज के समाज व राज्य में स्पष्ट है। जब तक इस प्रकार के संगठित अधर्मियों का नाश न हो तब तक धार्मिक आचरण कठिन हो जाता है। अतः यह भी अवतार का कार्य हो जाता है। कई बार अधर्म का प्रचार धर्म के नाम से होता है। ऐसो परिस्थिति में जिन युक्तिजालों से अधर्म को धर्म कहा जा रहा है, उसका खण्डन भी संगठित अधर्मियों का नाश ही है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति के नाश से अधर्म का नाश संभव न होकर विचार का नाश ही अधर्मियों का नाश हो सकता है। 'अगुणग्रहोऽगुणं न याति मोहं ग्रहदोषमुक्तितः' ( उ० सा० तृष्णा० २६)। इस प्रकार परमेश्वर की कृपा को इतिहास में प्रत्यक्ष देखकर परमेश्वर पर अपूर्व प्रेम उत्पन्न हो जाता है। यहाँ अवतार का अर्थ केवल पूर्णावतार नहीं समझना चाहिये। पूर्ण जीवन अर्थात् बचपन आदि सारी अवस्थाओं में जो अवतार प्रकट हो वह पूर्णावतार है, जैसे कृष्ण, शंकर आदि। भक्तानुग्रह के लिए थोड़े समय के लिये प्रकट होने वाले अंशावतार भी अवतार ही हैं। उनसे भी प्रभु का जीवों के प्रति प्रेम प्रकट होता है। गुरु भी ज्ञानोपदेश के समय ऐसा ही अवतार है। 'सर्वज्ञेभ्यो नमस्तेभ्यो गुरुभ्योऽज्ञानसंकुलम्' ( उ० सा० सम्यग्दृ० ८९)। प्रेम मानवहृदय की सौन्दर्य के प्रति उद्भूत भावना है। स्वरूपतः यह निष्काम सुख है। सौन्दर्य का मूल समन्वय है। शिव में सभी समन्वित होने से वही परम निरतिशय सौन्दर्य का आश्रय है। अतः पूर्ण प्रेम भी वहीं संभव है। प्रकृति का सौन्दर्य निखर कर आत्मा के अपूर्ण सन्तुष्टि का कारण होने से ही त्याज्य है। इससे होने वाला सुख भी निष्काम तो है पर इसका विषय पूर्ण समन्वित न होने से प्रेम की पूर्णता का बाधक बना रहता है। वस्तुतः शिव का सौन्दर्य ही अविद्या से परिच्छिन्न होकर प्राकृत पदार्थों में उल्लसित होता है। अतः शिवातिरिक्त सभी कुछ शिव पर अध्यस्त होकर ही सुन्दर होता है। सौन्दर्य के अन्वेषण को शिव की प्रकृति से हटाकर शिव में केन्द्रित करना ही शिवभक्ति है। बगीचे की सुन्दरता से बागवान की सुन्दरता देखना है। 'आरामं अस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चन' ( बृ० ३.४.३.१४ ) ज्ञानेच्छा भी ईश्वर को ही विषय करे यह ज्ञानमार्ग है। इसी प्रकार भक्ति भी ईश्वर को ही विषय करने की इच्छा है। भक्ति व ज्ञान में भेद विषय को लेकर नहीं; साधन को लेकर है। एक में बुद्धि व दूसरे में मन साधन है। फल में भी दोनों में ईश्वरज्ञान की प्राप्ति होने पर भी एक में प्रमा होने से अज्ञाननिवृत्ति होती है, तो दूसरे में अप्रमा होने पर भी आनन्द की अभिव्यक्ति होती है। ज्ञान में कोटियाँ संभव नहीं हैं तो भक्ति में अनन्त कोटियाँ संभव हैं। एक का फल मोक्ष है तो दूसरे का रसास्वादन। 'सदस्मीति प्रमाणोत्था धीः' ( उ० सा० तत्त्वमसि० ७) 'ओमित्येवं स्वमात्मानं सर्वं शुद्धं प्रपद्यथ सेतुं सर्वव्यवस्थानामहोरात्रादिवर्जितम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ७७) । शिवानन्दलहरी में आचार्य शंकर ने

( xiv ) इस भक्ति के रहस्य का उद्घाटन करते हुए सौन्दर्य-निखार पर जोर दिया है। जगत् के प्रति वैराग्य व शिव के प्रति राग एक ही सिक्के के दो पीठ हैं। यह ईश्वर का प्रेम शनैः शनैः पकता है। प्रकृति का सौन्दर्य भी उसके विकास का सोपान बनाया जा सकता है, बशर्ते उसको उद्दीपक रखा जा सके, तर्पक नहीं। पर यह मार्ग कठिन है। जैसे फलाशा से रहित होकर कर्म करना कठिन हैं, वैसे ही माया को छोड़कर मायी का चिन्तन कठिन है। उपाधि के बिना उपहित का कथन जितना सरल है, अनुभूति उतनी ही क्लिष्ट है। सामान्यतः उपाधिगत सौन्दर्य चित्त को विक्षिप्त ही करता है एवं आध्यात्मिक साधना की प्रतिरोधता का कारण ही बनता है। आचार्य स्पष्ट करते हैं कि जो वासुदेव की तरह पीपल व अपने शरीर में समान रूप से चैतन्य सत्ता की उपस्थिति को अनुभव करता है वही उसे वस्तुतः जानता है। जबतक ध्याता व ध्येय का भेद रहेगा, ध्येयानुसार ही प्राप्ति होगी। यही प्रेम का रूप है। ज्ञान में यह सापेक्षता नहीं है। 'यन्मनास्तन्मयोऽन्यत्वे नात्मत्वाप्तौ क्रियाऽत्मनि' (उ० सा० नाट्य० १४)। मुमुक्षा की तीव्रता में ज्ञानयोग की सफलता छिपी है। यहाँ ज्ञान व प्राप्ति में (Knowing and Being) भेद नहीं है। सत्य, जो वेदान्त शास्त्र में ईश्वर का पर्याय है, वस्तुतः सारे विश्व की समन्वय भूमि है। ऐसा न हो तो वह 'एकमेवाद्वितीयं' हो ही नहीं सकता। इसका अज्ञान ही तो जगत् का जनक है। यह न किसी के किसी कर्म की अपेक्षा रखता है, न किसी के किसी भावना की अपेक्षा रखता है। कर्म की अपेक्षा वहीं संभव है, जहाँ विकृति संभव हो। अविकारी में कर्म की गति नहीं। जो सर्वरूप न हो, वहाँ किसी भावना से अतिशय का आधान न हो सकेगा। अध्यास अधिष्ठान में परिवर्तन नहीं लाता, यह सर्ववादिसम्मत है। अतः कर्म व भावना से निरपेक्ष ही सत्य का साक्षात्कार है। 'वस्तवधीना भवेद्विद्या' (उ० सा० उपो० १३)। वस्तुतस्तु ज्ञान उत्पन्न होते ही भावना व कर्म के साधनों को ही समाप्त कर देता है जैसे मृगतृष्णा की अधिष्ठान बालू का ज्ञान मृगतृष्णा को ही समाप्त कर देता है। 'कारकाण्युप- मृद्नाति विद्या बुद्धि इव ऊषरे' । (उ० सा० उपो० १४) ब्रह्म ही ब्रह्मज्ञान का निरूपक है, ज्ञाता नहीं, यह पारमार्थिक सत्य है। ज्ञाता को दैवी संपत्तियुक्त व ज्ञानसाधनों से सम्पन्न होना चाहिये। बस, यही अपेक्षित है। जैसे आँख का ठीक होना विष्णुमित्र के दर्शन में अपेक्षित है, पर विष्णुमित्र के ज्ञान का निरूपक तो विष्णुमित्रदेह ही है, वैसे ही यहाँ समझना चाहिये। प्रश्न हो सकता है कि ज्ञान भी तो अन्तःकरण की वृत्ति ही है। यह भी तो मानसक्रियारूप है। परन्तु ऐसा इसीलिये लगता है कि क्रिया के रूप को नहीं समझा जा रहा है। जहाँ उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार या संस्कार रूपी फल हो, वहीं क्रिया मानी जा सकती है। 'उत्पाद्याप्यविकार्याणि संस्कार्यं च क्रियाफलम् नातोऽन्यत्कर्मणा कार्य' (उ० सा० सम्व० ५०)। ज्ञान ऐसा कोई फल उत्पन्न नहीं करता। यद्यपि घड़ा इत्यादि जानने में घड़ा ज्ञात हो गया ऐसी उत्पत्ति प्रतीत भी हो जाती है, पर ब्रह्म ज्ञात हो गया, ऐसी प्रतीति भी नहीं होती। 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी ही प्रतीति होती है। अतः ज्ञान ही सीधा अज्ञाननाशक होने से मोक्ष का एकमात्र साक्षात् कारण हो सकता है। अन्य साधन तो ज्ञानोत्पत्ति के साधनों को उपलब्ध कराकर गतार्थ हो जाते हैं। अध्यास की निवृत्ति लोक में भी जप, ध्यान, पूजा, यज्ञ, देवताराधन आदि किसी साधन से न होकर अधिष्ठान के ज्ञान से ही होती है। अध्यास ही सभी बन्धनों की प्रतीति का स्वरूप है। जो लोग कहते हैं कि ज्ञानमार्ग कठिन है, वे वस्तुतः ज्ञान को उपाय मानते ही नहीं। ज्ञान अज्ञान को हटाने के अतिरिक्त कुछ भी करने में असमर्थ है। अतः बन्धन अज्ञानप्रसूत होगा तो ही ज्ञानमार्ग मोक्ष के लिये संभव होगा। यदि कर्म से मोक्ष संभव हो भी जाय तो वह बन्धन अज्ञानप्रसूत नहीं रह जायगा। अतः वैकल्पिक मार्ग तो असंभव है। कर्म व भक्ति या उपासना तो क्रियारूप होने से विकल्प बन सकते हैं, पर ज्ञान क्रियारूप होने से विकल्प नहीं हो सकता। बन्धन को अज्ञानप्रसूत न मानने से मोक्ष आदि में जन्यता एवं तज्जन्य अनित्यता आदि को ब्रह्मा भी नहीं मिटा सकेंगे। अतः ज्ञानमार्ग एकमात्र मोक्षोपाय होने से कठिनता का प्रश्न ही नहीं उठता। भोजन बनाना जितना भी कठिन हो, भूखनिवृत्ति का एकमात्र उपाय होने से, भूखे व्यक्ति को मार्गान्तर से लक्ष्य प्राप्ति न होने से, कठिन वा सरल नहीं कहा जा सकता। कठिन और सरल सापेक्षिक शब्द हैं, अतः दो या अधिक संभव होने पर ही प्रयुक्त हो सकते हैं। सावधानी के लिये शास्त्रों में कहीं कठिनता का वर्णन किया है। उससे केवल सावधान रहने का ही निर्देश सच्छास्त्रों का इष्ट है। 'ज्ञेयस्यातिसूक्ष्मत्वाज्ज्ञानमार्गस्य दुःसंपाद्यत्वं वदन्ति' (क० भा० )

( xv ) इस सावधानी के लिए ही गुरु की अत्यन्त आवश्यकता होती है। गुरु वही हो सकता है जो ब्रह्मसाक्षात्कारवान् हो एवं शिक्षा देने में समर्थ हो। उसमें शिष्य के हृदय में शूलवत् चुभने वालो शंकाओं को समझने की व उनका हृदय- ग्राही युक्तियों से निराकरण करने की सामर्थ्य आवश्यक है। जिस गुरु से अपनी शंका निवृत्त न हो वह अपना गुरु नहीं हो सकता। दुःखी के दुःखकी निवृत्ति करने की इच्छा व प्रवृत्ति गुरु में उपस्थित होनी चाहिये । जिसने स्वयं परम्परा से ज्ञान प्राप्त नहीं किया है उसका दूसरे को उपदेश करने का अधिकार नहीं है क्योंकि उसका ज्ञान कभी प्रामाणिक नहीं हो सकेगा। ‘आचार्यश्वोहापोहग्रहण .........दयानुग्रहादिसम्पन्नो लब्धागमो .......ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः’ (उ० सा० शिष्या० ६)। शुकदेव ने साक्षात् वेदव्यास के पुत्र होने से उनसे आगम प्राप्त किया व गौडपाद ने घोर तपस्या व उपासना करके साक्षात् शुक से बद्रिकाश्रम में यह ज्ञान प्राप्त किया। गौडपाद के ही प्रशिष्य शंकर होने से उनकी लब्धागमता निःशंक है। शंकर से आज तक परमहंसों में यह परम्परा अविच्छिन्न चल ही रही है। अतः परमहंस ही अद्वैत वेदान्त के उपदेष्टा रहे हैं व आज भी हैं। स्वयं जो मार्ग पर चल चुका है व लक्ष्य का साक्षात्कार कर चुका है, वही दूसरे को भी ठीक मार्गदर्शन करा सकता है व लक्ष्य पर पहुँचा या नहीं इसे निश्चित बता सकता है। यह लोकसिद्ध भी है। आचार्य शंकर स्वयं इस सम्प्रदाय के प्रति अति विनम्र थे एवं अपने गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा अपार थी। ‘यद्वाक्सूर्यां- शुसन्तापप्रणष्टध्वान्तकल्मषः । प्रणम्य तान् गुरून् वक्ष्ये ब्रह्मविद्याविनिश्चयम् (उ० सा० सम्य० ३)। जिनकी वाणी रूप सूर्यकिरणों से अज्ञानान्धकार व उससे जनित शोकमोहादि समूल नष्ट हो गये, उनके सामने विनत रहते हुए ही मैं ब्रह्मज्ञान के परमार्थस्वरूप को निःसन्दिग्ध रूप से प्रतिपादित करूँगा—कहकर वे इसे स्पष्ट करते हैं। अद्वैत दर्शन में ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप ही है अतः वस्तुतः गुरुरूप से साक्षात् परब्रह्म ही जीव की मुक्ति करता है। ज्ञानमार्ग में ईश्वर व गुरु अभिन्न हैं व गुरु की सेवा ही ईश्वरसेवा है तथा गुरु में प्रेम ही ईश्वरप्रेम है। यही निवृत्ति मार्ग का हृदय है। गुरु में श्रद्धा व उसकी आज्ञा का बिना किसी विचार के पालन ही विधिनिषेधों का स्थान ले लेता है। फलोत्पादक कर्मों का सर्वथा त्याग करना आवश्यक है। गुरु का अनुग्रह ही ईश्वरानुग्रह है। आत्मा का अज्ञाननाश ही उपेय है। इसके सिवाय किसी भी अन्य उद्देश्यार्थ उपाय का अवलम्बन ही नहीं, उपाय की संभावना वाले साधनों का त्याग भी आवश्यक है। ‘तच्चैतत्परमार्थदर्शनम्प्रतिपत्तिमिच्छता ............सर्वकर्मणां तत्साधनानाञ्च यज्ञोपवीतादीनां त्यागः कर्त्तव्यः’ (उ० सा० शिष्या० ४४)। यद्यपि ज्ञान तो सभी को हो सकता है परन्तु ब्रह्मनिष्ठा या साक्षात्कार तो सर्वथा सर्वदा सर्वतः लगने पर ही संभव है। एल्डस हक्सली कहते हैं कि ईश्वर को ढूँढ कर पाना सब समय लगकर थकानेवाला काम है*। कई बार प्रश्न उठता है कि ऐसा निवृत्तिमार्गी क्या जीवन को नकार नहीं रहा है ? वस्तुतः जीवन का अर्थ सभी के लिए एक ही नहीं है। जिसको जो सर्वाधिक अर्ह प्रतीत होती है उसके लिए अन्य सभी को छोड़ पूर्णरूपेण उसमें लग जाना ही तो जीवन को सकारना है। अतः सहजता व आनन्दपूर्वक ब्रह्मान्वेषण में लगना ही ब्रह्मान्वेषी का जीवन सकारना है। इससे भिन्न किसी कार्य में रत होना ही उसके लिए जीवन नकारना है। हम प्रायः अपने जीवन में द्वन्द्वों से इसीलिए परेशान रहते हैं कि हममें अपनी इष्ट देवता की प्राप्ति में सभी कुछ झोंकने का साहस नहीं हो पाता। हम कई इष्ट देवताओं को स्वीकार लेते हैं। यह बहुदेवतावाद ही हमारे लक्ष्यप्राप्ति में सर्वाधिक बाधक है। बिना एकदेवतावादी हुए कभी भी सफलता या सन्तोष और शान्ति सम्भव नहीं है। ‘कर्मनाशभयाज्जन्तोरात्मज्ञानाग्रहस्तथा ( उ० सा० बुद्धय० १)। अतः यह झूठा आरोप है कि वेदान्त जीवन को नकारता है। वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति अपनी मान्यतानुसार जो नहीं चलता, उसे जीवन को नकारनेवाला मानता है। चार्वाक ऋण से भी घी पीने को कहता है तो उसे देशभक्त कर्त्तव्यच्युत मानता है, और देशभक्त को चार्वाक मूर्खता से जीवन को नकारनेवाला बताता है, अतः ब्रह्म को साक्षात् जानने में प्रवृत्त अन्य सभी को मानव जीवन के सर्वोत्तम लक्ष्य का परित्याग करके जीवन को नकारनेवाला ही मानता है। योगवासिष्ठ को पढ़ने से ऐसे लोगों का अपनी मूर्खता से अपना व समाज का नाश करना स्पष्ट हो जाता है। करुणामूर्त्ति होने से आचार्य शंकर ऐसी कठोर भाषा का प्रयोग नहीं करते पर अपने प्रसन्न-गम्भीर शब्दों से साधक को सावधान तो करते ही हैं। इस

  • ‘The seeking of God is a tiresome, wholetime job !’—Aldous Huxley in Perennial Philosophy.

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जीवन को सकारने की प्रक्रिया में गुरु का विशेष स्थान है क्योंकि इह वा पारलौकिक फलेच्छा के त्याग से लौकिक व शास्त्रीय विधि-निषेध उसे प्रवृत्त नहीं कर सकते। दृष्ट फल के लिए गुरु ही उसे श्रवणादि सब साधनों को बताकर प्रवृत्त करेगा व प्रत्येक शिष्य के संस्कारानुसार उसके विशेष मार्ग का प्रतिपादन कर सकेगा। शिष्यों के अनन्त संस्कारों के भेद होने से यहाँ नियतता ( Codification ) सम्भव ही नहीं है। अतः गुरुशरण के बिना निवृत्तिमार्ग पेंदी से रहित लोटा हो जायगा। 'यो हि यस्माद् विरक्तः स्यात् नासौ तस्मै प्रवर्तते । लोकत्रयाद्विरक्तत्वान्मुमुक्षुः किमितीहते ( उ० सा० तत्त्वमसि० २३०)। 'स गुरुस्तारयेद्युक्तं शिष्यं शिष्यगुणान्वितम् ब्रह्मविद्याप्लवेनाशु स्वान्तध्वान्त- महोदधिम्' ( उ० सा० सम्यङ्मति० ५३ ) । ब्रह्मज्ञान का वास्तविक फल तो सद्योमुक्ति ही है। 'सद्योमुक्तिकारणमात्मज्ञानम् ( ब्र० सू० भा० १-१-६)। इस अनुभव का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन कटे हाथ का दृष्टान्त है। काट कर फेंक दिये हाथ के साथ अपने को हाथवाला जैसे नहीं मानते वैसे ही विवेक की तलवार से सभी अनात्म विशेषणों को त्याग देने पर निर्विशेष ज्ञानी रह जाता है। 'छित्त्वा त्यक्तेन हस्तेन स्वयं नात्मा विशेष्यते…………अनात्मत्वेन तस्माज्ज्ञो मुक्तः सर्वविशेषणैः ( उ० सा० विशेषापोह० १, २)। पर यह ज्ञान आत्मा का है, बुद्धि का नहीं। बुद्धि में ही विद्या व अविद्या हैं, यह साङ्ख्य की मान्यता है। पर अद्वैत ज्ञानी के स्वानुभव में बुद्धि भी स्वरूप से आत्मा से अभिन्न ही है। इसे बड़े सुन्दर रूप से आचार्य ने बुद्धि व आत्मा के संवाद के द्वारा निरूपित किया है। बुद्धि कहती है कि आपके किसी सम्बन्धी का ही शायद मेरे से उपकार हो जाय, तो आत्मा कहती है कि मैं एकाकी हूँ, अतः मेरा न कोई अंश, गुण या सम्बन्धी है और न मैं किसी का अङ्ग या सम्बन्धी हूँ और असङ्ग होने से मुझे तेरा कोई प्रयोजन नहीं। अतः अब तुम निवृत्त ही हो जाओ। पर तुम्हें भी घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुम स्वयं भी तो मेरे अज्ञान से ही कल्पित होने से मुझ में अध्यस्त हो। अतएव मैं ही तुम्हारी वास्तविकता या अधिष्ठाता हूँ। 'अहं ममैको न मदन्यदिष्यते तथा न कस्यापि अहमस्म्यसङ्गतः । असङ्गरूपोऽहमतो न मे त्वया कृतेन कार्यं तव चाद्यवत्त्वतः' ( उ० सा० मतिविलापन० ४)। अतः भौतिक रूप से देह को छोड़ना आवश्यक नहीं है। उसकी प्रातिभासिकता से मुक्ति में विघ्न नहीं होता। इसकी दृढ़ता के लिये ही परिसंख्यानप्रकरण है। इसमें 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' न्याय से अपने शत्रु-मित्र या उदासीन का भाव नष्ट हो जाता है। शत्रु आदि इस संघात पर ही क्रिया या चिन्तन करते हैं और संघातारूप न होने से मैं उनकी शत्रुता का विषय नहीं। परम कारण तो अनात्मा की तुच्छता ही है। यह अद्वैत का विश्व को परम शान्ति का सन्देश है। इसको यदि बुद्धि में संस्कार रूप से किञ्चित् भी स्थान मिल जाय तो युद्ध, हिंसा, संघर्ष, प्रतियोगिता आदि को स्थान ही न रह जाय। स्थितप्रज्ञ, गुणातीत, भगवद्भक्त, तुरीयातीत, अतिवर्णाश्रमी आदि शब्दों से ऐसे ज्ञानी के शरीर का व्यवहार निरूपित किया गया है। इसका उद्देश्य ज्ञानी के लिये विधि करना नहीं है परन्तु साधकों को जीवन-प्रणाली बतलाना है। वेदान्त धर्म का यही प्राण है क्योंकि यह ऐसी वास्तविकता है, जो जीवन्मुक्त के बाह्याचरणों से उपलक्षित होती है और यज्ञादि अन्य धर्मों के पारलौकिक फल का स्थान ले लेती है। पर स्वर्गादि फल कभी अपरोक्ष नहीं होते, लेकिन ज्ञान की यह अवस्था ज्ञानियों में अपरोक्ष रूप से प्रकट है। वह मानो खिड़की है, जिससे ईश्वर का प्रत्यक्ष होता है। अप्पर का स्पष्ट कथन है कि शिवभक्त व शिव में कोई भेद नहीं है। ईसा के विषय में भी यही कहा जाता है कि वहाँ आदमियत व देवभाव युगपत् मौजूद है। परन्तु ईसाई धर्म की मान्यता है कि केवल ईसा में ही यह सम्भव है, जब कि वेदान्त मानता है कि प्रत्येक मानव में यह सम्भव है। हिन्दू धर्म का इतिहास इस बात में प्रमाण है कि यह युगलभाव सभी कालों में किसी-किसी में व्यक्त होता ही रहता है। जैसे वर्तमान ईसाई मान्यताओं से ईसा का परीक्षण नहीं हो सकता वैसे ही उन ज्ञानियों के सम्प्रदायविशेषों से उनका परीक्षण नहीं हो सकता। परन्तु उसकी आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि हमें तो अपने युग के प्रत्यक्ष ज्ञानियों से ही मतलब होना चाहिये। विट्- जेन्सटाइन ( Wittgenstein ) अपने दर्शनान्वेषण ( Philosophical Investigation ) नामक ग्रन्थ में कहते हैं कि भाषा एक ऐसा चित्र है जो हमको मोह में डालकर रखता है। इसे ही वेदान्त माया कहता है। नामरूपात्मक सृष्टि में नाम की प्रधानता को मानना ही पड़ता है। वेदान्त का एक पक्ष तो शब्दस्फोट या नाद को ही रूप का कारण स्वीकारता है। पर जब तक मोह रहता है तब तक हम मोहक की अवास्तविकता को नहीं जान सकते। उसे किसी भी नाम से कहा