वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
वराभ्यशतक
तपस्वी स्त्रीपर मुग्ध होकर जबरदस्ती उसके घरमें घुसने लगा। स्त्रीने द्वार बन्द करना चाहा और ऋषिने सिर अड़ा कर घुसना चाहा। स्त्री ने जोर से द्वार बन्द करने की चेष्टा की; इससे ऋषिका सिर कट गया।
पृष्ठ ५५
Popular Press, Calcutta.
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वैराग्यशतक
महापुरुष ज्ञान-दृष्टिसे कामिनी की असलियत को देख रहे हैं। कामी लोग भी स्त्रियों की असलियत को बगौर देखें और इनसे घृणा करें। वास्तवमें, स्त्री में कुछ भी नहीं है। सांस्वर्भ-हीन स्त्री कंकाल है।
(पृ० ५८)
Popular Press, Calcutta.
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( ६१ )
हाड़ मांस मज्जा मेद, चाममुँ लपेटि राखै । ठोर-ठोर रक्तके, भेड़ भगडार हैं ॥ मूत्रह पुरीष आत, एकमेक मिलि रहौं । और ही उदर माँहि, विविध विकार हैं ॥ सुन्दर कहत, नारी नखशिख निन्दा-रूप । ताहि जा सराहै, सो तो बड़ेई गँवार है ॥२॥
( ३ )
( राग सोरठ )
अनाड़ी मन ! नारी नरकका मूल । रंग रूप पर भया लुभाना, क्यों मूल गया हरि नाम दिवाना ? । इस धन यौवनका नाहि ठिकाना, दो दिनमें हो जाय घूल ॥१॥ कंचन भरे दो कलश बतावे, ताहि पकड़ आनन्द मनावे । यह तो चमड़ेकी थैली हैं मूरख, जिन पै रहो तू भूल ॥२॥ जा सुखको तू चन्दा कर माने, थूक राल वामें लिपटाने । धिक धिक धिक ! तेरे या सुख पै, मिथामें रहो तू भूल ॥३॥
( ६२ )
कैसा भारी घोका खाया,
तन पर कायिनके ललचाया ! ।
कहैं कवीर आँखसे देखा,
यह तो माटीका स्थूल ॥४॥
( ४ )
उदरमें नरक, अर्ध द्वारनमें नरक,
कुचनमें नरक, नरक भरी छाती है ।
कयठमें नरक, गाल चिबुक नरक-बिम्ब,
मुखमें नरक, जीभ लालहू चुवाती है ।
नाकमें नरक, आंख कानमें नरक बहें,
हाथ पाँउ नखशिख, नरक दिखाती है ।
सुन्दर कहत, नारी नरकको कुण्ड यह,
नरकमें जाइ परे, सो नरक पाती है ॥
स्त्रीमें रूप नहीं ।
स्त्रियोंके जिस शरीरकी कामियोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, तत्त्वविद् वेदान्तियोंने उसीकी पेट-भर निन्दा की है । वास्तवमें बात भी ऐसी ही है । असलमें नारी उतनी सुन्दरी नहीं, जितनी कि कवियोंने लिखी है । गुम्बद पर कलई है । सचमुच ही नारी नरकका रूप है ; इसके भीतर मल-मूत्र शूक और खवार भरे हैं । पर लोग ऊपरकी चमक-दमक पर मरे मिटते
बेरास्युहाटक
महात्मा कहते हैं—“सैया ! सव आपने मलबक्स प्रीति करते है । अगर निश्वास न हो तो फरीवा कर लो । पृष्ठ ६६
बहुँ आपनी सेवा-दहला कोर नाच- नखरुसि पलिको बरामि करती है ।
Popular Press—Calcutta.
पृष्ठ ६५
तत्त्व बात जितन ही ना
वैराग्यशतक
लड़का ससल चढ़कर पड़ गया और मुर्छा सा हो गया । आवाज़ देने पर जब बह खासिको न आया ; खोने जाकर देखा और उसे मरा हुआ पाया । ( पृष्ठ ६५ )
झपार में पहलें रोना पिटना आरंभ कर दें; तो न जाने कब तक भूखी मरूँगी, हसीलिये पहले खीर खा लें और बचे सो बकि पर घर दूँ । ( पृष्ठ ६६ )
Popular Press—Calcutta.
तस्व
बात
जि
वाहिये। किसी ही पुण्यात्मा को ऐसी स्त्री मिलती है, जो उसे दिलसे चाहती हो। स्त्री का स्वभाव है कि, वह देखती किसी को है, बात किसी से करती है और चाहती किसी को है।
स्त्री की प्रीति-परीक्षा ।
एक सेठ का पुत्र, सत्संगके लिये, नित्य किसी महात्मा के पास जाया करता था। माँ-बापको उसका महात्मा के पास जाना पसन्द न था। उन्हें भय था कि, हमारा पुत्र वैरागियों की संगतिमें कहीं वैरागी न हो जाय, इसलिये उन्होंने शीघ्र ही उसकी शादी कर दी। घर में वह आ गयी। फिर भी लड़के का महात्माके पास जाना कम न हुआ। तब सेठ-सेठानीने बहुसे कहा कि, तू इसकी ऐसी सेवा कर, जो यह महात्माके पास जाना छोड़ दे। बहुने अपनी सेवा-टहल और नाज़-नखरों से पति को वशमें कर लिया। लड़के का मन महात्माकी संगतिसे हटने लगा। पहले वह रोज जाता था, आगे दूसरे-तीसरे दिन जाने लगा। एक दिन स्त्रीने कहा—“आप जब रातको चले जाते हैं, मैं अकेली पड़ी रहती हूँ। रात में स्त्रीका अकेला रहना अच्छा नहीं; इसके सिवा, रातको मुझे डर भी लगता है। यह बात सुन कर, लड़केने महात्माके पास जाना कृतई छोड़ दिया।
५
एक दिन महात्मा कहीं जा रहे थे। राहमें वही लड़का उन्हें मिल गया। उन्होंने उससे न आनेको वजह पूछी। लड़केने कहा—“महाराज ! मेरी खी बड़ी ही पतिव्रता है। वह मुझे हर तरह सुखी रखती है। मेरे बिना वह क्षण-भर भी अकेली नहीं रह सकती। मेरे लिये वह प्राण देती हैं। उसको सच्ची प्रीति देखकर, मैं उसके वशमें हो गया हूँ और इसीसे आपकी सेवामें नहीं आ सकता।”
महात्माने कहा—“भैया ! सब अपने मतलबसे प्रीति करते हैं। तुम्हारी खी भी अपने सुखके लिये तुमसे प्रीति करती है, तुम्हारे सुखके लिये नहीं। अगर विश्वास न हो, तो आज-माइश कर लो।” लड़का इस बात पर राजी हो गया। महात्मा ने उसे श्वास रोकनेकी विधि समझा दी और कहा,—“एक दिन तुम अपनी खीसे कहना कि, आज हम खीर-पूरी खायेंगे। जब वह खीरपूरी बनाने लगे, तब तुम श्वास रोककर लम्बे पड़ जाना। जब वह संभस्केगी कि तुम मर गये, तब हमारी बातकी सवाईकी परीक्षा हो जायगी।”
त वा जि ही खर
एक दिन लड़केने घर पहुँचतेही खीसे कहा—“आज हमारा मन खीर-पूरी खाने पर है।” खीने कहा—“खामिन् ! अभी बनाती हूँ।” यह कह वह खीर-पूरी बनाने लगी। उधर लड़का साँस चढ़ाकर पड़ गया और मुर्दा हो गया। थोड़ी देर बाद जब खीर-पूरी बन गयी, खीने आवाज़ दी,—“आईये, खाना खा लीजिये।” जब वह न आया, तो खी स्वयम् आयी। देखा
( ६७ )
तो लड़का मरा पड़ा है। कहीं साँस नहीं है। स्त्री ने विचार किया, यह तो मर गया। अगर मैं अभी रोना-पीटना आरम्भ करती हूँ, तो न जाने कब तक भूखी मरूँगी, और खीर भी बिगड़ जायगी। इसलिये पहले खातूँ और जो बचे उसे डींकि पर रख दूँ। स्त्री ने अपने विचारानुसार पहले खूब खीर-पूरी खाई, और शेष रख दी। इसके बाद रोना और छाती-माथा कुटना शुरू किया। उसका रोना सुन, घरके लोग इकट्ठे हो गये और पूछा, "यह कैसे मर गया?" स्त्री ने कहा—"पेटमें दर्द बताते थे, शायद उसीसे मरे हैं।" लोगोंने कहा—"अब दैर करना व्यर्थ है। इसे शीघ्र शमशान पर ले चलो।" वे लोग उसे उठाने लगे, लेकिन उसके पैर दो खंभोंमें फँस जानेसे न निकले। तब लोगोंने कहा कि, इन खंभोंको काटकर पाँव निकालने चाहिये। यह सुनते ही स्त्री ने कहा—"ऐसा न करो ; खंभे कट जायँगे, तो फिर कौन बनवा देगा ? इसलिये खंभ न कटाकर, इनके पैर ही काट डालो ; क्योंकि पाँव आखिर जलाये ही जायेगे।" लोगोंने कहा "ठीक है।" ज्योंही उन्होंने पैर काटनेको कुल्हाड़ा उठाया कि, लड़का उठ बैठा और बोला—"मेरा दर्द मिट गया।" यह देख, लोग अपने-अपने ठिकाने चले गये। लड़का महात्म्याके पास गया और कहने लगा—"महात्मन् ! आपका कहना राई रत्नी सब है। अब मुझे ज़रा भी शक नहीं। निस्सन्देह स्त्री अपने ही लिये पतिको प्यार करती है। सबकी प्रीति भटी है। अब मैं गृहस्थाश्रममें न
( ६८ )
रहूंगा। बस, उसी दिनसे उसने अपनी स्त्रीको त्यागकर वैराग्य ले लिया।
स्त्री आफ़्तोंकी जड़ है।
स्त्री अनेक आपदाओं की मूल है। अनेक रूपवती स्त्रियाँ के कारण उनके पतियोंके प्राण नष्ट हुए हैं। नूरजहाँके कारण शेर अफ़ग़ानकी जान मारी गई। स्त्रीके पीछे सुन्द-उपसुन्द आपसमें लड़कर मर गये। स्त्रीके पीछे राजा नहुषको स्वर्ग से गिरना पड़ा। स्त्रीके कारण बालि मारा गया और रावण का सर्वनाश हुआ एवं शिशुपालका खिर काटा गया। स्त्री के पीछे ही भारतको भारत करने वाला महाभारत हुआ। स्त्री साँपसे भी भयङ्कर है। साँपके तो काटनेसे मनुष्य मरता है, पर स्त्रीकी रूप-चिन्तना-मात्रसे ही मनुष्य मर जाता है। विष खानेसे मनुष्य एक बार ही मरता है, पर स्त्री-विष के सम्बन्धसे मनुष्यको बारबार जन्म लेना और मरना पड़ता है; क्योंकि मरते समय पुरुष का मन अपनी स्त्रीमें ज़रूर जाता है। मरण-समय जिसकी वासना जिसमें रहती है, वह उसे अवश्य मिलता है। कहा है :—
वासना यत्र यस्य स्यात्संतं स्वप्नेषु परयति । स्वप्नवन्तरणो ह्येवं वासनातो वपुर्नृणाम् ॥
( ७२ )
( ३ )
कामिनि काली नागिनी, तीन लोक मंझारि । नाम-सनेही ऊवरा, विषिया खाये भारि ॥
( ४ )
नारी कहुँ कि नाहरी, नख-सिरखसों यह खाय । जल बूड़ा तो ऊवरे, भग बूड़ा बहि जाय ॥
( ५ )
एक कनक अरु कामिनी, तजिये भगिये दूर । हरि विच परें अन्तरा, यम देसी मुख धूर ॥
( ६ )
जहाँ काम तहाँ राम नहीं, राम तहाँ नहीं काम । दोऊ कजहुँ ना रहें, काम राम इक ठाम ॥
( ७ )
अविनाशी विच धार तिन, कुल कंचन अरु नार । जो कोई इन ते बचै, सोई उतरे पार ॥
( १ )
स्त्रीको घूर कर न देखना चाहिये और देख कर उसके पीछे न लगना चाहिये ; क्योंकि स्त्रीको देखने-मात्रसे ही जहर चढ़ जाता है और मन और ही तरहका ही जाता है ।
( ७२ )
( २ )
सुन्दरों सोनेकी ही क्यों न हो और उसमें मनभावन सुगंध भी क्यों न आती हो, यदि वह अपनी जननी भी हो, तोभी उसके पास न बैठे।
( ३ )
स्त्री काली नागिन है। केवल ईश्वरका नाम अपने वाले उससे बचे; विषय-भोगियोंको तो वह एकदमसे खागई—कोई न छोड़ा।
( ४ )
इसे मैं नारी कहूँ या नाहरी—सिंहनी कहूँ? क्योंकि यह नख-सिखसे खा जाती है। जलमें डूबा बच जाता है; पर स्त्रीमें डूबा नहीं बचता।
( ५ )
• एक सुवर्ण और दूसरी स्त्री इनसे बच कर रहा। यह भगवान् के और जीवके बीचमें खाई बताते हैं, जिससे यमराज मुँहमें धूल डालता है।
( ६ )
जहाँ स्त्री है वहाँ राम नहीं है और जहाँ राम है वहाँ स्त्री नहीं। स्त्री और राम दोनों एक जगह नहीं रह सकते।
( ७ )
अविनाशी भगवान् और जीवके बीचमें तीन खाहूँयाँ हैं:— (१) कुल, (२) कंचन, और (३) कामिनी। जो इन तीनों से बचता है, वही पार होकर भगवान् तक पहुँच जाता है।
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वैराग्यशतक ॥ ४ ॥
गोस्वामी तुलसीदासजी नदी पार कर छतराल पहुँचे, द्वार बन्द पाकर सर्प को रस्सी समझ डले पकड़ ऊपर चढ़ गये। जब स्त्री के सामने पहुँचे—स्त्री कहने लगी:—“आप का जितना प्रेम मुझ में है, उतना उस जगदीश में हो, तो आप का भला हो जाय।
( ७३ )
क्या स्त्रीमें आनन्द है ?
—*—
स्त्रीमें कुछ भी आनन्द नहीं है। स्त्री हर तरह दुःखोंकी ध्वान और मनकी अशान्तिकी मूल है। स्त्रीसे मैथुन करनेमें पुरुषको जो आनन्द आता है, वह उसका अपना आनन्द है; स्त्रीका नहीं। कुत्ता सूखी हड्डी खवाता है; पर सूखी हड्डीमें धून नहीं होता। कुत्तेका अपना धून निकलता है और उसे उसीका स्वाद आता है, पर वह अज्ञानी उस आनन्दको हड्डी में समझता है। विषयी पुरुष भी कुत्तेकी तरह ही है। विषय जड़ है। विषयोंमें आनन्द कहाँ? आनन्द आत्मामें है। जब पुरुषका वीर्य मैथुनके अन्तमें स्खलित होता है, तब क्षण-भरके लिये मनकी वृत्ति स्थिर हो जाती है। उस स्थिर वृत्तिमें चेतन आत्माका अक्स पड़ता है। बस, उसीसे पुरुषको आनन्द आता है। पर अज्ञानसे, कुत्तेकी तरह, वह उस आनन्दको स्त्रीमें समझता है। तात्पर्य यह निकला कि, स्त्रीमें कुछ भी आनन्द नहीं, आनन्द आत्मामें है।
स्त्री-त्यागी ही परिणत है।
मनुष्यों और पशुओंमें क्या भेद है? मनुष्य खाते, सोते, डरते और स्त्री-भोग करते हैं और पशु भी यही चारों काम करते हैं। पर इन दोनोंमें अन्तर यही है कि, मनुष्यको धर्म-
( ७४ )
ज्ञान है और पशु को नहीं। यदि मनुष्य पशुओंकी तरह अज्ञानी हो, तो वह भी पशु ही है। कहा है—
अधीत्य वेदशास्त्राणि, संसारे रागिणश्च ये ।
तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति, सर्वां श्वाश्वसूकरैः ॥
जो पुरुष वेद-शास्त्रोंको पढ़कर भी संसार से या स्त्री-पुत्र आदिकी प्रीति रखते हैं, उनसे बढ़कर मूर्ख कौन है? क्योंकि स्त्री-पुत्र प्रभृतिमें तो कुत्ते, घोड़े और सूअर भी प्रेम रखते हैं। शुक्रदेवजाने भी “भागवत”में कहा है :—
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य, वेदशास्त्राण्यधीत्य च ।
वध्यते यदि संसारे, का विमुच्येत मानवः ?
दुर्लभ मनुष्य-बोला पाकर और वेद-शास्त्र पढ़कर भी यदि मनुष्य संसारमें फँसा रहे, तो फिर संसार-बन्धनसे छुट्टेगा कौन ?
कबीरदासजी कहते हैं :—
काम क्रोध मद लोभकी, जब लग घटमें खानि ।
कहा मूर्ख कहा पंडिता, दोनों एक समान ॥
जब तक मनमें काम, क्रोध, मद और लोभ है, तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों समान हैं। जिसमें काम, क्रोध, मद और लोभ नहीं, वही पण्डित है और जिसमें ये हैं वह मूर्ख या अज्ञानी है।