भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

इती (२)

एक

ता, के नु व

द्वैरायशतक ३४

अरे मूले ! विश्वेग की शरण में क्यों नहीं जाता, जिनके द्वार पर रोकनेवाले दरवान नहीं हैं । जहाँ निर्दय और कठोर बच्चनों का नाम भी नहीं है ?

( ३१७ )

96 It is a wonder why wise men like to take up their abode in any other place than Kashi ; where partaking of different kinds of eatables in gardens is the most austere penance, where the wearing of a narrow strip of loin-cloth is considered as respectable dress, where unrestricted wandering beggary is thought to be honourable and where the near approach of death is looked upon as bringing everlasting bliss !

नायते सम्यो रहस्यमधुना निद्राति नाथो यदि

स्थित्वा ऋच्यति कुप्यति प्रसुरिति द्वारेषु येषां वचः

चेतस्तानपहाय याहि भवनं देवस्य विश्वेश्वरिभु-

निर्दौवारिकनिर्दयोक्त्यपरुषं निःसीमशर्मप्रदम् ॥६७॥

हे मन ! जिनके द्वार पर,—“मालिक मकानसे मिलनेका समय नहीं है, वे इस समय एकान्तमें बैठे हैं, वे इस वक्त सो रहे हैं, अगर तुम्हें यहाँ खड़ा देखेंगे तो नाराज़ होंगे”—ऐसी बातें सुनाई देती हैं, उनको त्याग कर विश्वेश्वर की शरण में जा, जिनके द्वार पर रोकनेवाला दरवान नहीं, जहाँ निर्दय और कठोर बचन कभी सुननेमें नहीं आते, जो अनन्त और नित्य सुखके देनेवाले हैं ॥६७॥

मूर्ख मनुष्य, ना-सप्रभोके कारण, वृथा अमीरों के दरवाजे पर जाता है और अपमानसूचक बाते सुनता है ; जिनके यह

परमात्मा उनके हृदय-कमल में मौजूद है। हाँ, जो अज्ञानी हैं, वे ही तीथवास करते और तीर्थमें शरीर त्यागना चाहते हैं।

( ३१८ )

जाता है उनसे मिलने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करता है, दरबानोंको तरह-तरहको बेदङ्गों बातें सुनता है । अगर वह कुछ भी अङ्कसे काम ले, तो उसे उसके द्वार पर जाना चाहिये, जहाँ कोई रोकने वाला नहीं, जहाँ दिल दुखानेवाली बातोंका नाम भी नहीं, जो खारे संसारका स्वामी और नित्य सुख के देने वाला है । वह क्या उसकी इच्छा पूरी न करेगा ? अवश्य पूरी करेगा । जो बिना जड़ की अमरबेलको पोषता है, उसे छोड़कर और को खोजना भूलकी बात है । रहीम कवि कहते हैं :—

अमरबेलि बिन मूलकी, प्रतिपालत है ताहि । “रहिमन” ऐसे प्रभुहि तजि, खोजत फिरिये काहि ॥

रहीम कवि कहते हैं, जो प्रभु बिना मूल की अमरबेल की प्रतिपालना करता है, ऐसे प्रभु को छोड़कर किसे खोजते फिरें ?

और भी—

( ? )

जा दिनतें गर्भवास तज्यो नर ।

आइ आहार लियो तवही को ॥

खाताहि खात भये इतने दिन ।

जानत नाहि न भूल कहीं को ॥

( ३१६ )

दौरत धावत पेट दिखावत ।

तू शठ कीट सदा अनही को ॥

सुन्दर क्यूँ विश्वास न राखत ? ।

सो प्रभु विश्व भरे सब ही को ॥

( २ )

सेवर भूचर जे जलके चर ।

देत आहार चराचर पोवे ।

वे हरि जो सब कूँ प्रतिपालत ।

ज्यूँ जिहि भौति तिसी विधि तोषै ॥

तू अब क्यूँ विश्वास न राखत ? ।

भूलत है कित धोखहि धोखै ॥

तोहि तहाँ पहुँचाय रहे प्रभु ।

सुन्दर बैठि रहै कित खोखै ॥

ईश्वरकी शरणमें जानेसे अभाव नहीं रहता ।

—*—

एक राजा बड़ा आलसो और विषयी था । वह राज-काज को अरा भी न देखता था । सारा भार वज्रौर के लिए पर था । वज्रौर यदि किसी ज़रूरी कामकी आज्ञा लेने को आता, तो राजा उसे घण्टों द्वारा पर विटाय रखता, पर अन्दर न बुलाता ;

( ३२० )

इससे मन्त्रीको घृणा हो गई ; उसने घर आकर पुत्रोंसे कहा कि, चार घण्टोंमें जितना धन और सामान ले जा सकते हो, दूसरे राजाके राज्यमें ले जाओ। मैं अब इस संसार को त्याग कर परमात्मासे लौ लगाऊँगा। लड़के जितना धन ले जा सके लेगये। शेष धन वज्रोंरने गुरीबोंको लुटा दिया और आप किसी और राजाके राजमें कोंपड़ी बनाकर तप करने लगा।

दो तीन दिन बाद जब उस विषयी राजाके राज्यमें गड़बड़ फैली, उसे अपने प्रधान मन्त्रीकी याद आई। बुलानेको आदमी भेजे, तो मालूम हुआ, कि वह तो सन्यासी हो गया है। राजा स्वयं उसके पास गया और बोला—“हे मन्त्रिवर ! तुम इतने बड़े राज्यके प्रधान मन्त्री और कर्त्ता-धर्त्ता थे, तुमने वह सब सुबेश्वर्य छोड़ क्यों बनमें डेरा लगाया है ? तुम्हें इसमें क्या मिला ?” मन्त्रीने कहा—“महाराज ! ईश्वरकी शरण में आनेसे इतना तो दो-चार दिनोंमें ही मिल गया कि, घण्टों आपके द्वारपर आपकी प्रतीक्षामें पाँच पीटा करता था ; पर आप दर्शन तक न देते थे ; पर आज श्रीमान्, सपरिवार, मेरे स्थानपर, मुझे आदरणीय समझकर, इस सघन बनमें पधारें हैं। यह तो दो-तीन दिनोंकी कमाई है। आगेकी बात फिर पूछ सकते हैं।” इसमें शक नहीं, जो सबकी आशा तजकर एक परमात्माकी शरणमें जाता है, उसे कोई अभाव नहीं रहता ; पर . पक्के और दृढ़ विश्वासकी ज़रूरत है।

( ३२१ )

ईश्वरको जो जिसी कामनासे भजता है, उसकी वह कामना अवश्य पूरी होती है। पर जो कोई उसे निष्काम भक्तिसे भजता है, उसे स्वयं ईश्वर मिलता है, और जब वह मिल जाता है, तब कुछ भी घाटा नहीं रहता; त्रिलोकी की सम्पदा उसके चरणोंमें ज्वलंतो आना चाहती है। अतः बुद्धिमानोंको परमात्माको छोड़ और किसीके आगे दीनता न करनी चाहिये। मनुष्यके पास है ही क्या? कोई छोटा मिबारी है और कोई बड़ा। जिसे किसी भी चीज़की चाह नहीं, वही सच्चा धनी है। ऐसा धनी करोड़ोंमें एक भी नहीं; तब मँगतेको मँगतेसे माँगना क्या उचित है?

ईश्वर ही कामना पूरी कर सकता है।

एक राजाने किसी राजाका राज्य छीन लिया। वह राजा तप करने लगा। कुछ दिन बाद उसकी प्रशंसा सुन कर राजा उस तपस्वी-राजाके पास गया और बोला—“आप अपना राज्य वापस लीजिये; इसके सिवा आप जो और माँगें सो दूँ।” तपस्वी राजाने कहा—“राजन्! आपको धन्यवाद है; पर यदि आप मृत्युरहित जीवन, नित्यधन, वृद्धावस्था-रहित जवानी, बिना दुःखका सुख और बिना रंजकी खुशी दे सकें तो दीजिये।” राजाने कहा—“इन्हें तो मैं नहीं दे सकता। ये सब तो ईश्वर

२१

( ३२२ )

से ही मिल सकते हैं।” यह जवाब सुन तपस्वी-राजाने कहा—“इसीसे मैं अब सबको छोड़ ईश्वरकी शरणमें आया हूँ कि, मेरी इच्छा पूरी हो; क्योंकि मनुष्योंसे यह काम हो न सकेगा।”

अनेक अज्ञानी जिन्हें ईश्वर पर विश्वास नहीं, मनमें समझते हैं कि, ईश्वर हमें खाने को देने थोड़े ही आवेगा। यह उनकी गलती है। ईश्वर उनको भी खाना पहुँचाता है, जो उसे कभी याद भी नहीं करते। फिर, जो उसे याद करते हैं, उन्हें वह क्यों न खाना पहुँचावेगा? अवश्य पहुँचावेगा, वशतः कि उसमें दृढ़ विश्वास हो। अपने भक्तोंके लिये ईश्वर हरदम तैयार रहता है।

नापित-भक्तके लिये ईश्वर नापति बना।

एक नाई दुर्घोषनके पैर चापा करता था। एक दिन उसके चलनेके समय दो महात्मा उसे उसके द्वारपर मिल गये। वह उन्हें ईश्वरभक्त समझ, उनकी सेवामें लग गया और राजा के यहाँ जानेकी बात भूल गया। समय पर राजाने नाईकी याद की। भगवान् नाईका रूप धरकर दुर्घोषनके पास पहुँचे और उसके पैर दाबने लगे। अन्तमें अपने भक्तकी नौकरी पूरी करके, वह वहाँसे चले गये। इतनेमें नाई डरता काँपता हुआ

( ३२३ )

पहुँचा और राजासे क्षमा-प्रार्थना करने लगा। दुर्घोषनने कहा—“अरे पागल हो गया है क्या ! अभी-अभी तो तू मेरे पैर दाबही रहा था।” इस बातको सुनकर नाई समझ गया कि, भगवान् ने स्वयं मेरे लिये नाईका काम किया। इतनीसी भक्ति-उपासनाका यह फल ! अब मैं उनको छोड़ दूसरेकी खुशामद और सेवा क्यों करूँ ? ऐसा विचारकर वह घर छोड़ बनमें चला गया।

भगवान्का दूसरा नाम विश्वम्भर है। जो विश्व—संसार का पालन करता है, उसेही विश्वम्भर कहते हैं। भगवान् त्रिलोकी के जीवमात्रको उनका आहार पहुँचाते हैं, इसमें शक् नहीं। एक सच्ची घटना है, पाठक सुनें :—

ईश्वर ही सब की पालना करता है।

एक बार महाराज शिवाजी एक बहुत बड़ा महल बनवा रहे थे। उसमें हज़ारों मज़दूर और कारीगर लग रहे थे। उन्हें देखकर शिवाजीके मनमें अहंकार हुआ कि, मैं ऐसा हूँ, जो इतने मनुष्योंको रोज रोटा देता हूँ। इतनेमें समर्थ स्वामी रामदास आ गये। वे महाराजके मनको ताड़ गये। बोले—“राजन ! सामने जो पत्थर पड़ा है उसके दो टुकड़े कराइये।” राजाके हुकमसे पत्थरके दो टुकड़े किये गये। उस शिलाके भीतर

( ३२४ )

एक मोटा-ताज़ा मैडक निकला। उसे देखते ही शिवाजी विस्मयमें डूब गये। स्वामीजीने कहा—“राजन् ! इस पत्थरके भीतर इस मैडकको खाना कौन पहुँचाता था ? मनुष्य कोई चीज़ नहीं, उसे स्वयं तृष्णा है, अतः वह दरिद्री है। सबकी पालना करने वाले और प्रेमके साथ पालना करने वाले वही भगवान् हैं !

नरसी मेहताकी हुण्डीका भुगतान साहूकारका रूप धरकर स्वयं भगवान्ने किया। द्रौपदी और दुर्वासाके मामलेमें भगवान् वनमें दौड़े आये और द्रौपदीकी लाज रक्खी तथा राजा अम्बरीषकी—दुर्वासासे रक्षा की। ऐसे बहुतसे दृष्टान्त हैं। मनुष्यको सदा परमात्मासे माँगना चाहिये। उसका भण्डार अक्षय है और वह परम दयालु है।

पिता पुत्र की इच्छा अवरय पूरी करता है।

✠ ✠ ✠

एक वैश्य निर्धनतासे तंग आकर काशी चला गया और वहाँ रोज़गार करने लगा। कुछ समय बाद उसके पास लाखों-करोड़ों का धन हो गया। वह एक मन्दिर बनवाने लगा। घरसे चलते समय वह एक छोटासा लड़का छोड़ गया था। लड़का जब १६१७ वर्षका हो गया, उसने माँसे पिताका पता पूछा। माँने कहा—“मुझे तो पता नहीं।” यह सुनते ही पुत्र अपने पिताकी

( ३२५ )

तलाशमें चल निकला। माँको भी उसने अपने साथ ले लिया। कुछ दिनों बाद, बड़ी-बड़ी तकलीफें उठाकर, वह काशी पहुँचा और पेट पालनेके लिये उसी मन्दिरमें मजदूरी करने लगा। सेठने उसे नया मजदूर समझ, उससे उसका निवास स्थान और पिताका नाम पूछा। उसने सब बता दिया और कहा कि माँ भी आई है। सेठने अपनी खीको पहचान, पुत्रको छाती से लगा लिया और उसे सारा धन दे दिया। इस दृष्टान्तसे यह समझना चाहिये कि, इसी तरह जो पुरुष तकलीफें उठाकर परमेश्वरकी खोज करता है, परमेश्वर उसे अवश्य मिल जाता है और अपने पुत्रकी इच्छा पूरी करता है।

अहंकारको त्यागकर, विशुद्ध मनसे, परमात्माकी खोज करो। वह दूर नहीं, तुम्हारे भीतर ही मौजूद है। खोज करनेसे तुम्हें अवश्य मिल जायगा। किसीने बिल्कुल ठीक कहा है:—

है तजस्सुस शर्त्त यों, मिलनेको क्या मिलता नहीं।

है खुदी जब तक इन्हींमें, खुदा मिलता नहीं ॥

तलाश शर्त्त है; तलाश करनेवालोंको क्या नहीं मिलता? जब तक मनुष्यमें खुदी या अहंकार है, तबतक उसे ईश्वर नहीं मिलता। अहंकार से हृदय शुद्ध हुआ और ईश्वर-दर्शन हुए। यदि ईश्वर मिल गया, तो जगत्का राज्य मिल गया। अतः मनुष्यो! मनुष्योंकी खुशामद छोड़, केवल दयासिन्धु जगदीश

इती (२)

एक

ता, के रन्तु मत, रन्तु रना

कि के

( ३२६ )

की शरणमें जाओ ! वह बिना अपमान किये, प्रेम के साथ आपके अभावोंको सुने और दूर करेगा तथा आपको नित्य- शायी सुख-शान्ति बख्शेगा ।

व्यप्यय ।

बैठ पौरिया द्वार, छड़ी कर पहरी राखत । सोचत स्वामि हमार, जाहु तुम ऐसे भाषत । करि हैं क्रोध अपार, लखैं जो तुमको द्वारे । जाहु विश्वपति द्वार, तहाँ नहि रोकनहारे । जहाँ निर्दय कटुवादी नहीं, अवशि तहाँ चलिजाइये । वहैं निर्भय ब्रह्मचंद सुख, ब्रह्मचंद तहाँ पाइये ॥६७॥

97. O mind, leaving dependence on those at whose doors such answers are heard, as, "It is not the proper time for you to see the master of the house, as he likes to be alone now, or is asleep, and if he happens to find you standing here, he will be offended," etc, do thou take thy shelter in the mansion of the Lord of the universe at Whose doors there is no sentinel, where no unsympathetic and harsh words are heard and who is the Giver of eternal happiness.

पिय सखि विपदगड्वातप्रताप परम्परा- तिपरिचले चिन्ताचक्रे निधाय विधिः खलः ॥ मुदमिव वलात्पिणडीकृत्य प्रगल्भकुलालवद्- अमयति मनो नो जानीमः किमत्र विधास्यति ॥६८॥

( ३२७ )

हे प्यारी सखी बुद्धि ! कुम्हार जिस तरह गीली मिट्टीके लौदों को चाकपर चढ़ाकर डंडेसे चाकको बारम्बार घुमाता है और उससे इच्छानुसार वर्तन तैयार करता है ; उसी तरह संसारको गढ़नेवाला ब्रह्मा हमारे चित्तको चिन्ताके चाकपर चढ़ाकर, विपत्तियोंके डगडेसे चाकको लगातार घुमाता हुआ, हमारा क्या करना चाहता है, यह हमारी समझमें नहीं आता ! ॥६८॥

मनुष्य के पीछे भगवान् ने चिन्ता बुरी लगा दी है। बात यह है, कि मनुष्यके पूर्व जन्मके कर्मोंके कारण या इस जन्म की भूलोंके कारण, उसे विपत्तियाँ भोगनी ही पड़ती हैं। विपत्तियोंसे पार होनेके लिये, मनुष्य रात-दिन चिन्तित रहता है। चिन्ता या फिकसे मनुष्यका रूप-रङ्ग आदि सब नष्ट होकर शीघ्र ही बुढ़ापा आ जाता है। आज-कल ४० बरसकी उम्र में हो लोग बूढ़े हो जाते हैं, इसका कारण चिन्ता ही है। अगर चिन्ता न होती, तो मनुष्यको कुछ दुःख न होता। जहाँतक हो, मनुष्यको चिन्ताको पास न आने देना चाहिये ; क्योंकि चिन्ता चितासे भी डुरी है। चिता मरे हुए को भस्म करती है, पर चिन्ता जीते हुए को ही जलाकर खाक कर देती है ; अतः चिन्तासे दूर रहो। खी पुत्र और धन की चिन्ता में अपनी अमूल्य दुर्लभ कायाको नाश न करो ; क्योंकि ये खी पुत्र प्रभुति तुम्हारे कोई नहीं। अगर चिन्ता और विचार ही करना है, तो इस बातका करो कि, तुम कौन हो और

( ३२८ )

कहाँसे आये हो? स्वामी शङ्कराचार्यने “मोहमुद्गर” में कहा है:—

का तव कान्ता: ? कस्ते पुत्र: ?

संसारोऽयमतीव विचित्र: ।

कस्य त्वं वा ? कुत आयात:

तत्त्वं चिन्तय तदिदं भ्रात: ॥

कौन तेरी स्त्री है? कौन तेरा पुत्र है! यह संसार अतीव विचित्र है। तु कौन है? कहाँ से आया है? हे भाई! इस तत्त्व की चिन्ता कर; अर्थात् न कोई तेरी स्त्री है और न कोई तेरा पुत्र है, तथा चिन्ता क्यों करता है?

तु कौन है? कहाँ से आया है? क्यों आया है? तूने अपना कर्त्तव्य पालन किया है या नहीं? तेरा अन्तिम परिणाम क्या है? इत्यादि विचारों द्वारा अपने स्वरूपको पहचान जाने अथवा ईश्वरकी शरण में चले जानेसे ही चिन्ता से पीड़ा छूटेगा और शान्ति मिलेगी। निश्चय ही, चिन्ता और विपत्तियोंसे बचने के लिये, भगवान्का आश्रय लेना सर्वोपरि उपाय है। विपत्ति रूपी समुद्रमें डूबते हुए के लिए भगवान्का नाम ही सच्चा सहारा है। गोस्वामि तुलसीदासजीने कहा है:—

तुलसी साथी विपत्तिके, विद्या विनय विवेक ।

साहस सुकुल सत्यव्रत, राम भरोसो एक ॥

( ३२६ )

तुलसी असमयके तखा, साहस धर्म विचार । सुकृत शील स्वभाव श्रुतु, रामशरण आधार ॥ खेलेत बालक व्याल संग, पावक मेलत हाथ । तुलसी शिशु पितु मातु इव, राखत सिय रघुनाथ ॥ तुलसी केवल राम पद, लागे सरल सनेह । तौ घर घट बन वाट महँ, कताहूँ रहै किन देह ॥

सारांश यह, कि जो हमारे चित्तको चिन्ताके चाक पर चढ़ाकर विपत्तियोंके डण्डे से घुमाता है, यदि हम उसको ही शरणमें चले जायँ, उसीसे प्रेम करें, तो वह हमारे चित्तको चिन्ताके चाक पर न रखे ; अर्थात् हमें चिन्ताश्रियें न जलना पड़े ; सुख-शान्ति सदा हमारे सामने हाथ बाँधे रखें। यह बला उन्हींको खाती है, जो भगवान्से विमुख रहते हैं। इसलिये यदि इस चिन्ता-डायनसे बचना चाहो, तो परमात्माको भजो।

दोहा।

मनको चिन्ताचक धर, खल विधि रहौं सुभाय । रवि है कहा कुलालसम, जान्यौ कङ्क न जाय ? ॥६८॥

98. O friend, we do not know what the unfriendly Brahma, the creator of the world, will do to us, bent as he is on revolving our minds mercilessly fixing them on the wheel of cares, made unceasingly to turn round and round by the application of the stick of vicissitudes like a clever potter who puts a lump of wet clay on his wheel and by turning it round with a stick shapes it into any desired vessel.

( ३३० )

महेश्वरे वा जगतायधीश्वरे जनार्दने वा जगदन्तरात्मनि ।

तयोर्न भेदयतिपरितिरस्ति ये तथापि शक्तिस्तत्त्वोन्दुशेखरे ॥६६॥

यद्यपि मुक्ते विश्वेश्वर शिव और सर्वात्मन विष्णुमें कोई भेद नहीं दीखता ; तथापि मेरा मन उन्होंनेकी और सुकता है, जिनके मस्तकमें तरुण चन्द्रमा विराजमान है ; अर्थात् मैं शिवको ही चाहता हूँ ॥६६॥

विष्णु और शिवमें कोई भेद नहीं, एक ही परमात्माके अलग-अलग नाम हैं, वही कृष्ण हैं, वही रघुनाथ हैं, वही राम हैं और वही शिव हैं। पर फिर भी ; जिस नाम का आश्रय ले लिया उसीका भरोसा करना ठीक है। मन भटकाना अच्छा नहीं।

एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी ब्रह्मावन गये। वहाँ उन्हें भगवान् कृष्णके दर्शन हुए। भगवान्की बाँको भाँकी देखकर गोस्वामी जी मुग्ध हो गये, पर उन्होंने उनको खिर न नवाया ; क्योंकि उनके इष्टदेव रामचन्द्र जी थे। उन्होंने उस समय कहा :—

“कहा कहूँ छवि आजकी, भले बने हो नाथ ।

तुलसी मस्तक जब नवै, धनुषवाण लेब्रो हाथ ॥”

आपकी छवि आज बहुत ही मनोमुग्धकर है, पर मैं तो आप को तभी प्रणाम करूँगा, जब आप धनुषवाण हाथ में

( ३३१ )

लेकर रामचन्द्र बनोगे। भगवान् को तत्काल रामरूप धर, धनुषवाण हाथमें लेना पड़ा। यह काम भगवान् को भक्तकी दृढ़ता देख कर करना पड़ा।

प्रीति पथेहियेकी सच्ची और आदर्श है। वह चाहे प्यासा मर जाय, पर मेवके सिवा किसी भी जलाशयका जल नहीं पीता। "उत्तर वातकाष्टक" में लिखा है :—

पयोद हे ! वारि ददासि वा न वा ।

त्वदेकचित्तः पुनरेष चातकः ॥

वरं महत्या श्रियते पिपासया

तथापि नान्यस्य कोरात्युपासनाम् ॥

हे मेघ ! तू जल दे चाहे न दे, चातक तो तेरा ही आश्रय रखता है। वोर प्याससे मर भले ही जाय, पर वह दूसरेको उपासना नहीं करता। गोस्वामि तुलसीदासजीने भी कहा है :—

चातक धन तजि दूसरे, जियत न नाई नारि ।

मरत न मैंगे अर्धजल, सुरसरिहु को वारि ॥

व्याधा वधो पपीहरा, पुरो गंगजल जाय ।

चौंच गूँदि पीवे नहीं, धिक पीवन प्रण जाय ॥

चातकने मेघको छोड़ और किसीको अपनी जिन्दगी में स्त्रि न नवाया। मरते समय गंगाका जल भी ग्रहण न किया। किसी शिकारी ने किसी चातकको मारा। वह गंगाजी में गिर

( ३३२ )

पड़ा, प्यास के मारे धबरा रहा था, पर गंगा जल नहीं पोता था। उसने उठती बाँच बन्द कर ली ; कि कहीं जल मुखमें न चला जाय और मेरा प्रण दूद जाय। वाह वाह ! प्रीति और भक्ति हो तो ऐसी ही हो।

सारंगश यह है, कि भगवान् के भी जिस नामसे प्रेम हो, उसे छोड़ कर दूसरेसे प्रेम न करना चाहिये। एक ही पतिकी खी होने में भलाई है। जिसके अनेक पति होते हैं, उसका भला नहीं होता। अनेक देवी देवताओं के उपासक वातक से शिक्षा ग्रहण करें। कहा है :—

पतिव्रताको सुख धना, जाके पति है एक।

मन मैली व्यभिचारिणी, जाके खसम अनेक ॥

पतिव्रता पतिकों भजे, और न अन्यसुहाय।

सिंह-बचा जो लंघना, तोभी धास न खाय ॥

“कबिरा” सीप समुद्र की, रटे पियास पियास।

सकल बूँदको ना भिने, स्वाति बूँदकी धास ॥

प्रीति रीति तुम्ह सो मेरे, बहु गुनियाला कन्त।

जा हंसि बैलूँ और सँ, तो नील रंगाऊँ दन्त ॥

पतिव्रता, जिसके एक पति होता है, सदा सुखी रहती है ; किन्तु अनेक खसमवाली व्यभिचारिणी सदा दुखी रहती है। पतिव्रता सदा अपने पतिको ही चाहती है ; उसे दूसरा अच्छा नहीं लगता। सिंहका बच्चा, लंघन पर लङ्घन करने पर भी,

इती (२)

एक

गा, के लु त, लु ना

के के

( ३३३ )

घास नहीं खाता । कबीरदास कहते हैं, समुद्रकी सीप प्यास- ही-प्यास रटा करती है ; कितनी ही बूँदें क्यों न गिरे, उसे तो स्वातिकी बूँद ही प्यारी लगती है । मेरे गुणनिधान कन्त ! मेरी प्रीति तुझसे है । जो मैं दूसरेसे हँसकर बोल्छूँ तो मेरा काला सुँद हो ।

दोहा ।

नाहिं शिव अरु विष्णुमें, सूर्य अन्तर मोग । तदिप चन्द्रशेखर लखत, प्रीति अधिक कछु होय ॥६६॥

99. Although I see no difference between Shiva, 'the Lord of the universe, and Vishnu the Omnipresent, but my love flows towards the One who bears the new moon on his forehead, i. e., Shiva.

रे कंदर्प करं कर्दर्थयसि किं कोदण्डकारितैः

रेरे कोकिल कोमलैः कलरवैः किं त्वं वृथाजल्पसि ॥

मुग्धे क्षिप्रविदग्धमुग्धमधुरैलोलेः कटाचैरलं

चेतरनुम्बितचन्द्रचूडचरणभ्यानामृतं वर्त्तते ॥१००॥

हे कामदेव ! तू धनुष्यकार सुतानेके लिये क्यों बारबार हाथ उठाता है ? हे कोकिला ! तू मीठी-मीठी सुहावनी आवाज़में क्यों कुड-कुड करती है ? ऐ मूर्खा स्त्री ! तू अपने मनोमोहक मधुर कटाक्ष मुझपर क्यों चलाती है ? अब तुम मेरा कुछ नहीं कर