वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
गये, अगले सूत्र में वेद की साक्षी भी देते हैं-
९२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद इसी अर्थ की पुष्टि में अनुमान प्रमाण और ऐतिहासिक प्रमाण तो कहे गये, अगले सूत्र में वेद की साक्षी भी देते हैं- १८४-वेदलिङ्गाच्च ॥ १२ ॥ (वेदलिङ्गात्) वेदों में चिन्ह पाये जाने से (च) भी ॥ ऋग्वेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋचा ५ "विश्वाञ् देवान् जगत्या विवेश। तेन चाक्लृपे ऋषयो मनुष्याः" तथा ऋग्वेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋचा १० "तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः" तथा यजुर्वेद अध्याय ३१ मन्त्र ८ भी अक्षरशः इसी ऋचा के समान है तथा अथर्व काण्ड १० अनुवाक ४ मन्त्र ८ " प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम्। इत्यादि अनेक वेदमन्त्रों में पाया जाता है कि परमात्मा ने उपादान कारण से बिना योनिविशेष के अनेक ऋषि मुनि आदि मनुष्यों, पशुओं और पक्षी आदि की सृष्टि को अयोनिज उत्पन्न किया । जैसा कि सूत्र संख्या १६० में भी कुछ विस्तार से निरूपण किया गया है। वे वेदमन्त्र भी अयोनिज सृष्टि में प्रमाण हैं ॥ १२ ॥ इस चतुर्थाध्याय के द्वितीय आह्निक में पृथिवी आदि का शरीर इन्द्रिय विषयभेद से त्रिविध होना तथा फिर योनिज अयोनिज भेद से शरीर का द्विविध होना कहा गया ॥ इति चतुर्थाध्याये द्वितीयमाह्निकम् —**— इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते वैशेषिक दर्शन भाषानुवादे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
ओ३म् अथ पञ्चमोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् द्रव्यों की परीक्षा हो चुकी, आगे गुणों की परीक्षा करनी है, उस में गुणों की परीक्षा से पहले कर्मों की परीक्षा करना चाहते हुए पञ्चमाध्याय का आरम्भ करते हुवे वैशेषिकाचार्य मुनिवर कणाद ग्रन्थ पढ़नेवालों के उपकारार्थ प्रथम उत्क्षेपण नाम कर्म के विषय में कहते हैं कि- १८३-आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म ॥ १ ॥ ( आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्याम् ) मन सहित आत्मा के संयोग और प्रयत्न से ( हस्ते ) हाथ में ( कर्म ) उठाने वा उछलने की क्रिया होती है ॥ जब कि कोई पुरुष यज्ञ वा वेदपाठ आदि कर्मों में हाथ उठाना चाहता है तब उस के आत्मा में एक प्रकार का प्रयत्न उत्पन्न होता है, उस प्रयत्न से मन और आत्मा हाथ से संयोग करते हैं और तब हाथ में उठाने वा उछलने का कर्म प्रकट होता है ॥ आशय यह है कि यद्यपि आत्मा अणु और सूक्ष्म है तथा हृदय में रहता है इस लिये आत्मा का संयोग हाथ के साथ साक्षात् नहीं हो सक्ता तथापि मन जो कि आत्मा और हाथ के बीच में है, वह एक ओर से आत्मा के प्रयत्न को ग्रहण करलेता है और दूसरी ओर हाथ से छूकर आत्मा से लिये हुए प्रयत्न को हाथ से लगा देता है तब उस प्रयत्न से प्रेरा हुवा हाथ उठने वा उछलने का काम करने लगता है ॥ १ ॥ हाथ का उठना कहकर आगे मूसल का उठना कहते हैं- १८४-तथा हस्तसंयोगाच्च मुशले कर्म ॥ २ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( हस्तसंयोगात् ) हाथ के संयोग से ( च ) और भारी होने से ( मुशले ) मूसल में ( कर्म ) क्रिया होती है ॥ जिस प्रकार आत्मा की प्रेरणा से मन में प्रयत्न होता है और मन के संयोग से हाथ में, इसी प्रकार मूसल के बोझ से मूसल में उत्क्षेपणकर्म होता है ॥ २ ॥
९४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद क्यों जी ! जब मूसल ओखली में चोट खाकर फिर ऊपर को उछलता है, तब उस के ऊपर उठने में कारण क्या है ? क्या हाथ का संयोग ही उस का कारण है ? उत्तर, नहीं- १८५-अभिघातजे मुशलादौ कर्मणि व्यतिरेका- दऽकारणं हस्तसंयोगः ॥ ३ ॥ (अभिघातजे) चोट देने से उत्पन्न हुए (मुशलादौ) मूसल आदि में (कर्मणि) जो क्रिया उत्पन्न होती है उस में (हस्तसंयोगः) हाथ का संयोग (अकारणम्) कारण नहीं है (व्यतिरेकात्) तद्भिन्न होने से ॥ हाथ से पकड़ कर जब मूसल को ओखली में मारते हैं तब मूसल फिर ऊपर को उठता है उस के उठने में केवल हाथ का संयोग कारण नहीं है क्यों कि चोट खाया हुवा मूसल आदि विना हाथ लगाये अपने आप भी ऊपर को उछलता है इस लिये हाथ का संयोग मूसल के उठने में कारण नहीं है किन्तु वेग कारण है ॥ ३ ॥ और भी- १८६-तथात्मसंयोगो हस्तकर्मणि ॥ ४ ॥ (तथा) इसी प्रकार (आत्मसंयोगः) आत्मा का संयोग (हस्तकर्मणि) हाथ के उठने रूप कर्म में [कारण नहीं है ] ॥ ४ ॥ प्रश्न-तौ फिर हाथ के उठने में कारण क्या है ? उत्तर- १८७-अभिघातान्मुशलसंयोगाद्धस्ते कर्म ॥ ५ ॥ (अभिघातात्) चोट मारने से (मुशलसंयोगात्) मूसल को पकड़े रहने से (हस्ते) हाथ में (कर्म) उठने की क्रिया होती है ॥ मूसल को ओखली में मारने से मूसल में वेग उत्पन्न होता है और वेग- वान् मूसल के संयोग से हाथ में ऊपर को उठना रूप कर्म होता है, उस कर्म में आत्मा का संयोग वा मन का संयोग कारण नहीं, किन्तु मूसल में उत्पन्न हुवा वेग ही हाथ लगने से हाथ के उठने में कारण है ॥ ५ ॥ क्यों जी ! हाथ के उठने में तौ मूसल का वेग कारण है परन्तु हाथ के साथ २ अन्य शरीर के उभार में क्या कारण है ? उत्तर- १८८-आत्मकर्म हस्तसंयोगाच्च ॥ ६ ॥ (हस्तसंयोगात्) हाथ के संयोग से (च) और वेग से (आत्मकर्म) आपे [देह] में कर्म होता है ॥
अर्थात् उछलते हुए मूसल के साथ संयुक्त हुवा हाथ ऊपर को उठता है और उठते हुए हाथ के साथ संयुक्त होने से शरीर भी ऊपर को उठता है, तब शरीर के ऊपर उठने में भी आत्मा का प्रयत्न कारण नहीं, किन्तु हाथ का संयोग और वेग ही कारण है ॥ ६ ॥ प्रश्न-अच्छा, हाथ और मूसल के उठने में तो वेग कारण हुवा परन्तु मूसल के फिर नीचे गिरने में क्या कारण है क्योंकि हाथ अलग करलेने पर भी मूसल नीचे गिरा करता है ? उत्तर- १८६-संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ ७ ॥ ( संयोगाभावे ) हाथ का संयोग न रहने पर ( गुरुत्वात् ) भारी होने से ( पतनम् ) गिरना होता है ॥ ७ ॥ क्यों जी ! भारी होने से केवल नीचे ही को गिरना क्यों होता है जब कि उठे हुए मूसल के चारों ओर एकसा आकाश है तब मूसल केवल नीचे ही को क्यों गिरता है ? पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर वा ऊपर को क्यों न गिरने लगे ? उत्तर- १९०-नोदनविशेषाभावान्नोर्ध्वं न तिर्यग् गमनम् ॥ ८ ॥ ( नोदनविशेषाभावात् ) प्रेरणा विशेष के न होने से ( ऊर्ध्वम् ) ऊपर को ( न ) नहीं और ( तिर्यग् ) पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर को तिरछा ( गम- नम् ) गमन भी ( न ) नहीं होता ॥ ऊपर को उठा हुवा मूसल और भी ऊपर को उठता अथवा पूर्व पश्चि- मादि दिशाओं को तिरछा जाता, यदि आत्मा में प्रेरणा विशेष होती, परन्तु प्रेरणा विशेष न होने से मूसल किसी अन्य दिशा को नहीं चलता किन्तु सूत्र ७ में कहे गुरुत्वकारण से जिस में पृथिवी और मूसल का गुरुत्वधर्म आकर्षक है, केवल नीचे को गिरता है ॥ ८ ॥ प्रश्न-प्रेरणा विशेष क्यों नहीं होती और क्यों होती है ? उत्तर- १९१-प्रयत्नविशेषात्नोदनविशेषः ॥ ९ ॥ ( प्रयत्नविशेषात् ) विशेष प्रयत्न से ( नोदनविशेषः ) विशेष प्रेरणा होती है ॥
९६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जब आत्मा में कोई विशेष प्रयत्न होता है तब उस प्रयत्न से मन में, मन से हाथ में, और हाथ से मूसल में प्रेरणा उत्पन्न होती है तब मूसल तिरछा वा ऊपर को चलता है और प्रेरणा नहीं होती तब नहीं चलता ॥९॥ प्रश्न-अच्छा, विशेष प्रयत्न से विशेष प्रेरणा होती है सही परन्तु भारी द्रव्य के ऊपर को वा तिरछा चलने में क्या कहा गया ? उत्तर-यह कहा गया है कि- १६२-नोदनविशेषादुदसनविशेषः ॥ १० ॥ (नोदनविशेषात्) विशेष प्रेरणा से (उदसनविशेषः) विशेष उछाल होता है ॥ अर्थात् जैसी प्रेरणा होती है वैसा उछाल होता है। दूर फेंकने की प्रेरणा हो तो दूर तक उछाल होता है और अति दूर फेंकने की प्रेरणा हो तो अति दूर तक उछाल होता है। उछाल में ही तिरछा फेंकना भी अन्तर्गत समझना चाहिये ॥१०॥ प्रश्न-यदि प्रेरणा विशेष से विशेष उछलना होता है तो फिर खेलते हुए बालक के हाथ पांव चलना न होना चाहिये क्योंकि बालक में कोई प्रेरणा विशेष नहीं होती तो भी इधर उधर हाथ पांव चलते हिलते देखे जाते हैं ? उत्तर- १६३-हस्तकर्मणा दारककर्म व्याख्यातम् ॥ ११ ॥ (हस्तकर्मणा) हाथ की क्रिया से (दारककर्म) बालकों की क्रिया (व्याख्यातम्) व्याख्या की गयी ॥ कन्दुक आदि फेंकने के समय आत्मा का संयोग और प्रयत्न मन की सहायता से हाथ में पहुंचता है, उस से हाथ चलता है, उस के साथ अन्य अङ्गों में भी क्रिया उत्पन्न हो जाती है ॥ ११ ॥ प्रश्न-क्या कोई और भी ऐसा कर्म है जो विशेष प्रेरणा के बिना ही प्रेरणा मात्र से उत्पन्न हो जाता हो ? उत्तर, हां- १६४-तथा दग्धस्य विस्फोटने ॥ १२ ॥ (तथा) इसी प्रकार (दग्धस्य) फुंकी हुई वस्तु के (विस्फोटने) फोड़ने में॥ जैसे कन्दुक आदि फेंकने में बालकों के हाथ आत्मा और मन के प्रयत्न से चलते हैं और उस से अन्य अङ्गों में क्रिया उत्पन्न हो जाती है। इसी
प्रकार अग्नि के संयोग से थोड़े फुंके हुए पत्थर या फल आदि के फोड़ने या फाड़ने में उस पत्थर वा फल आदि के अवयवों का दायें बायें या ऊपर को फटकर जाना इत्यादि क्रिया भी विशेष प्रेरणा के विना केवल साधारण प्रेरणा से होजाती है ॥ १२ ॥ प्रश्न जब कि मनुष्य सो जाता है वा मर जाता है वा अन्य कारण से अचेत होजाता है, तब भी कभी २ उस के हाथ पांव हिल जाते हैं, तब प्रयत्न के विना भी हाथ पांव के हिलने में क्या कारण होता है ? उत्तर- १८५-यत्नाभावे प्रसुप्तस्य चलनम् ॥ १३ ॥ १८६-तृणे कर्म वायुसंयोगात् ॥ १४ ॥ (प्रसुप्तस्य) सोये हुए वा अचेत हुए के (यत्नाभावे) प्रयत्न न होने पर (चलनम्) हाथ पांव का हिलना (तृणे) तिनके में (कर्म) हिलने की क्रिया (वायुसंयोगात्) वायु के संयोग से होती है ॥ अचेत अवस्था में पड़े हुए मनुष्य के हाथ पांव हिलने में अथवा तृण आदि के हिलने में जो क्रिया होती है, उस का कारण वायु का संयोग है ॥ १३-१४ ॥ प्रश्न-चुम्बक पत्थर आदि के साथ लोहे की सुई आदि के चलने में क्या कारण है ? उत्तर- १८७-मणिगमनं सूच्यभिसर्पणमदृष्टकारणम् ॥ १५ ॥ (मणिगमनम्) कोई २ तृण विशेष जो तृणकान्तमणि की ओर चलता है और (सूच्यभिसर्पणम्) चुम्बकमणि की ओर सुई चलती है सो (अदृष्ट कारणम्) अदृष्टकारण वाली है ॥ इसी सूत्र के भाष्य में शङ्कर मिश्रादिकों ने कैसी मोटी भूल की है कि जो अदृष्ट शब्द का अर्थ पाप पुण्य कर दिया है। भला चुम्बक पत्थर के अभिमुख लोह शङ्कु वा सुई के चलने में सुई ने क्या पाप वा पुण्य किया है ? वास्तव में यहां अदृष्ट शब्द का अर्थ प्रारब्ध पाप पुण्य कर्म नहीं किन्तु तृणकान्तमणि और चुम्बक मणि में स्थित अदृष्ट (विना देखी) आकर्षणशक्ति कारण है ॥१५॥ तथा- १८८-इषावयुगपत् संयोगविशेषाः कर्मान्यत्वे हेतुः ॥ १६ ॥ (इषौ) धनुष् के रोदे से भिन्न हुए बाण में (अयुगपत्) अनेक समयों में (संयोगविशेषाः) भिन्न २ संयोग (कर्मान्यत्वे) कर्म के अन्य होने में (हेतुः) कारण बन जाते हैं ॥ १३
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९८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद धनुष के रोदे से छूटे हुए बाण से उस बाण के गिरने तक बीच में अनेक कर्म होते हैं, उनका हेतु क्या है ? उत्तर- अनेक समयों में होने वाले अनेक संयोग उन अन्य अनेक कर्मों का कारण होते हैं। कल्पना करो कि किसी धनुर्धरी ने धनुष में बाण लगाकर और बलपूर्वक आकर्णान्त खींच कर एक बाण चलाया और वह बाण रोदे से छूटकर इतने बल से आगे बढ़ा कि आधे कोस पर भूमि पर गिरेगा। बीच में कहीं वृक्षों की पत्तियों में को और कहीं लघुकाय पक्षियों में को होकर बाण निकला चलागया तो बाण के छोड़ने में प्रथम कारण धनुर्धारी के आत्मा, मन, हाथ और धनुष की प्रत्यञ्चा; ये चार कारण हैं, परन्तु बीच में आने वाले वृक्षों की पत्तियों में छिद्र होना और पक्षियों के देहों का बिन्धना इत्यादि अनेक कर्मों का कारण बीच में होने वाले अनेक संयोग हैं ॥ १६ ॥ प्रश्न-किस २ कारण से बाण के गिरने तक बाण में अनेक कर्म उत्पन्न होते हैं ? उत्तर- १९९-नोदनादाद्यमिषोः कर्म, तत्कर्मकारिताच्च संस्कारादुत्तरं तथोत्तरमुत्तरं च ॥ १७ ॥ ( नोदनात् ) प्रेरणा से ( इषोः ) बाण का ( आद्यम् ) पहला ( कर्म ) काम आरम्भ होता है ( च ) और ( तत्कर्मकारितात् ) उस कर्म के कर्त्ता पने से (संस्कारात् ) संस्कार वश ( उत्तरम् ) अगला ( तथा ) इसी प्रकार ( उत्तरम् ) अगला ( च ) और ( उत्तरम् ) अगला [ कर्म उत्पन्न होता है ] ॥ जब बाण को प्रेरणा से छोड़ते हैं तब बाण के चलने में प्रेरणा कारण होती है, फिर बाण का चलना और वृक्षादि की पत्तियों का संयोग उन के बिन्धने का कारण होता है, इसी प्रकार आगे २ होने वाले कर्मों का कारण उन के पिछले २ कर्म होते हैं ॥ १७ ॥ परन्तु- २००-संस्काराभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ १८ ॥ ( संस्काराभावे ) संस्कार के न रहने पर ( गुरुत्वात् ) भारी होने से ( पतनम् ) पतन हो जाता है ॥ जब बाण में धनुर्धारी की प्रेरणा का बलसंस्कार समाप्त हो जाता है तब बाण अपने बोझ से आप गिर पड़ता है अर्थात् पृथिवी की आकर्षण शक्ति से पृथिवी की ओर खिंच जाता है ॥ १८ ॥ जिस प्रकार लोक में हर एक कर्म किसी प्रयत्न का परिणाम होता है वही बात प्रसङ्गवश इस आह्निक में अच्छे प्रकार से वर्णित की गई है ॥ इति पञ्चमाध्याये प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥
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पञ्चमोऽध्याय २ आह्निक ९५
पञ्चमोऽध्याय २ आह्निक ९५ ओ३म् अथ द्वितीयमाह्निकम् आत्मा के अधिष्ठातृत्व में शरीर के अवयवों और उस से सम्बन्ध पाये हुए मूसल आदि साधन विशेषों में प्रयत्नादि कारण से उत्क्षेपणादि कर्मों का लक्षण और परीक्षा समाप्त हुई । इस अगले आह्निक में पृथिवी आदि द्रव्यों में प्रेरणादि से उत्पन्न होने वाले गमन आदि कर्म की परीक्षा के लिये प्रथम यह वर्णन करते हैं कि पृथिवी में अपने आप उत्पन्न होने वाला कर्म (भूकम्प आदि) किस प्रकार होता है— २०१-नोदनाभिघातात्संयुक्तसंयोगाच्च पृथिव्यां कर्म ॥ १ ॥ (नोदनाभिघातात्) प्रेरणा की चोट से (च) और (संयुक्तसंयोगात्) संयुक्त पदार्थों के साथ संयोग से (पृथिव्याम्) पृथिवी में (कर्म) गमन और भूकम्पादि क्रिया होती है ॥ पृथिवी में ऐसे द्रव्यों का संयोग विशेष है, जिन से उस का सूर्य के साथ आकर्षण हो और वह गति क्रिया से युक्त होकर आगे को चले और सूर्य की ओर आकर्षण के बल से उस की गति स्वयं अपनी परिक्रमा का कारण आप ही बने और उस की गति से जो हिलोर और रगड़ उत्पन्न हो उस से अपूर्व स्थानों में अपूर्व द्रव्यों का संयोग हो और उन संयुक्त द्रव्यों के संयोग से उस का फटना वा हिलना वा कांपना इत्यादि क्रिया उत्पन्न होवें॥१॥ पृथिवी के अपनी और सूर्य की परिक्रमा करने रूप क्रिया का कारण बतलाते हैं:— २०२-तद्विशेषेणादृष्टकारितम् ॥ २ ॥ (तद्विशेषेण) पृथिवीस्थ पृथिवी की विशेषता से (तत्) वह गति क्रिया (अदृष्टकारितम्) अदृष्ट आकर्षणशक्ति से कराई हुई है ॥ २ ॥ पृथिवी की क्रिया परीक्षित हो चुकी। अब जल की क्रिया की परीक्षा करेंगे, उस का आरम्भ करते हैं:— २०३-अपां संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ ३ ॥ (अपाम्) जलों के (गुरुत्वात्) भारी होने से (संयोगाभावे) संयोग न रहने पर (पतनम्) गिरना होता है ॥
१०० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद अर्थात् ऊपर से छोड़ा हुवा जल, धारक पदार्थ के संयोग बिना भारी होने से पृथिवी की आकर्षणशक्ति से पृथिवी पर गिर पड़ता है ॥ ३ ॥ २०४-द्रवत्वात् स्यन्दनम् ॥ ४ ॥ ( द्रवत्वात् ) गीला और पतला होने से ( स्यन्दनम् ) नीचान में को बहाव होता है ॥ ४ ॥ प्रश्न-यदि गीला और पतला होने से जल नीचे को बहता है तो फिर समुद्र का जल मेघ में पहुंचने के लिये ऊपर कैसे चढ़ता है ? वह तो सदा नीचे ही को बहना चाहिये ? उत्तर- २०५-नाड्यवायुसंयोगादारोहणम् ॥ ५ ॥ ( नाड्यवायुसंयोगात् ) सूर्यकिरण और वायु के संयोग से [ जलों का ] ( आरोहणम् ) ऊपर को चढ़ाव होता है ॥ इस सूत्र से यह भी ध्वनि निकलती है कि यदि किसी नाड़ी ( नली ) में गर्मी भरी जावे और वह वायु को ऊपर को फेंके और फिर नीचे नली रिक्त होजावे तो अपने से छुए हुए पानी को ऊपर को खींचेगी ॥ ५ ॥ प्रश्न-सूर्य की किरण और वायु का संयोग के सिवाय कभी २ बिना सूर्य की किरणों के भी पानी ऊपर को चढ़ता देखा जाता है, जैसे फ़ौवारे में । सो क्यों ? उत्तर- २०६-नोदनापीडनात् संयुक्तसंयोगाच्च ॥ ६ ॥ ( नोदनापीडनात् ) धक्के और दबाव से ( च ) और ( संयुक्तसंयोगात् ) संयुक्त पदार्थ के संयोग से [ भी पानी ऊपर को उठता है ] ॥ २०७-वृक्षाभिसर्पणमित्यदृष्टकारितम् ॥ ७ ॥ ( इति ) यह ( अदृष्टकारितम् ) अदृष्ट वृक्षस्थ जीव शक्ति का कराया हुवा काम है कि ( वृक्षाभिसर्पणम् ) वृक्ष की ओर पानी का खिंच जाना ॥ वृक्ष की जड़ में दिया हुवा पानी जो ऊपर को वृक्ष के पत्र और शाखाओं में पहुंच जाता है, उस का कारण वह अदृष्ट शक्ति है जो जीवित वृक्ष में परमात्मा ने छिपी हुई रक्खी है ॥ ७ ॥ और- २०८-अपां संघातो विलयनञ्च तेजःसंयोगात् ॥ ८ ॥ ( अपाम् ) जल का ( संघातः ) जमाव ( च ) और ( विलयनम् ) गलकर पतला होजाना ( तेजःसंयोगात् ) तेज के संयोग से होता है ॥
आकाश से जमे हुए पानी के ओले वर्षने में अथवा बर्फ़ जमाने की कलों में पानी के जमजाने में कारण दिव्य तेज का संयोग है और फिर बर्फ़ से वा ओले से गलकर पानी होजाने का कारण लौकिक गर्मी का संयोग है ॥८॥ २०९-तत्र विस्फूर्जथुलिङ्गम् ॥ ९ ॥ ( तत्र ) उस मेघमण्डल में ठहरे हुए जलों के जमाव में ( विस्फूर्जथुः ) बिजली की चमक और कड़क ( लिङ्गम् ) तेज की पहचान है ॥ यदि मेघ में दिव्यतेज का संयोग न होता तौ बिजली की चमक और कड़क न पाई जाती । पाई जाती है, इस से जाना जाता है कि मेघस्थ जलों में दिव्यतेज बिजली का संयोग है, जो जल के पतला रहने के कारण लौकिक गर्मी को बल से बाहर फेंक देता है और जल को जमा देता है, जिस से सघन जल के संयोग से पाषाणतुल्य कठिन शिला सी बन जाती हैं और वे ही टूट २ कर ओले के रूप में वर्षती हैं । यही कारण बर्फ़ की कलों में है । फिर जब बिजली का प्रभाव बर्फ़ में से निकलता जाता है और उस के स्थान में लौकिक गर्म वायु घुसता जाता है तब बर्फ़ पिघल कर फिर पतला पानी हो जाता है ॥ ९ ॥ तथा- २१०-वैदिकञ्च ॥ १० ॥ ( च ) और ( वैदिकम् ) वेद का भी यही सिद्धान्त है ॥ “ गर्भोऽस्योषधीनां गर्भोवनस्पतीनाम् । गर्भोविश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि ” ॥ ( यजुः १२-३७ ) अर्थ-अग्नि ओषधियों का गर्भ है, वनस्पतियों का गर्भ है, सब भूत मात्र का गर्भ है ( और ) “ जलों का गर्भ= भीतर रहने वाला है ” ॥ इसी प्रकार- “गर्भोयो अपां गर्भोवनानां गर्भश्च स्थातां गर्भश्चरथाम् । अद्रौ चिदस्मा अन्तर्दुरोणे विशां न विश्वो अमृतः स्वाधीः” ॥ ( ऋ० १ । ७० । २ ) अर्थ-जो जलों के गर्भ में रहता है, वनस्थ वनस्पतियों के गर्भ में रहता है और स्थावर जङ्गम के गर्भ में रहता है और पहाड़ों के नीचे दुर्गम छिपे
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १०२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद स्थान में रहता है, जैसे कि प्रजाओं में स्वतन्त्र असृत सर्वत्र वर्त्तमान है (वह अग्नि है) ॥ इसी प्रकार- “ गर्भो अस्योषधीनां गर्भोहिमवतामुत । गर्भोविश्वस्य भूतस्येमं मे अगदं कृधि ” ॥ ( अथर्व ६ । १० । ५३ । ३ ) अर्थ-( अग्नि ) ओषधियों का गर्भ है और बर्फीले पर्वतों का गर्भ है। सब भूतमात्र का गर्भ है, ( वह ) इस मेरे नैरोग्य को करे ॥ तथा- “ अग्निमूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपां रेतांसि जिन्वति ” ॥ ( साम उ० १ । ३ । ९) अर्थ-यह अग्नि ऊपर को जाने वाला द्युलोक की टाट है तथा पृथिवी और जलों के कणों को जोड़ता और पिंघलाता है ॥ इस प्रकार वेद में अन्य भी अनेक मन्त्र हैं जो जल के जमने और पिंघलने में दिव्य और लौकिक अग्नि को कारण बताते हैं ॥ १० ॥ आगे बिजली की चमक का कारण बतलाते हैं- २११-अपां संयोगाद्विभागाच्च स्तनयित्नोः ॥ ११ ॥ ( अपाम् ) तेज को गर्भ में लिये हुए जलों के ( संयोगात् ) संयोग से ( च ) और ( विभागात् ) विभाग से ( स्तनयित्नोः ) बिजली की उत्पत्ति चमक और कड़क होती है ॥ आकाश में बिजली की चमक और कड़क का कारण मेघस्थ जलों, बिजलियों और वायुओं की आपस में रगड़ है ॥ ११ ॥ आगे अग्नि और वायु की क्रियाओं की परीक्षा को पृथिवी की क्रिया की परीक्षा में अन्तर्गत होना कहते हैं- २१२-पृथिवीकर्मणा तेजःकर्म वायुकर्म च व्याख्यातम् ॥ १२॥ (पृथिवीकर्मणा) पृथिवी की क्रिया के साथ (तेजःकर्म) तेज की क्रिया (च) और (वायुकर्म) वायु की क्रिया का ( व्याख्यातम् ) व्याख्यान हो चुका समझो ॥ प्रजिस कार पृथिवी में प्रेरणा बादि से क्रिया उत्पन्न होती है इसी CC-0. Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
पञ्चमोऽध्यायं २ आह्निक १०३
पञ्चमोऽध्यायं २ आह्निक १०३ प्रकार अग्नि और वायु की क्रिया भी उत्पन्न होती समझनी चाहिये ॥ १२ ॥ अग्नि वायु और मन की अलक्ष्य अदृष्टकारित क्रिया क्या है ? उत्तर- २१३-अग्नेरूर्ध्वज्वलनं वायोस्तिर्यक्पवनमणूनां मनसश्चाद्यं कर्मादृष्टकारितम् ॥ १३ ॥ (अग्नेः) अग्नि का (ऊर्ध्वज्वलनम्) ऊपर को लपट निकलना (वायोः) वायु का (तिर्यक्पवनम्) आगे पीछे दायें बायें चलना (अणूनाम्) पर- माणुओं (च) और (मनसः) मन का (आद्यं) पहला (कर्म) काम (अदृष्टकारितम्) अदृष्ट का कराया हुवा है ॥ अर्थात् हमारी आंखों से अदृष्ट=न देखा हुवा कोई कारण है, जिस को इन स्वभाव कहते हैं, उसी कारण से अग्नि ऊपर को लपट लेता है, वायु तिरछा चलता है, परमाणु और मन में पहली क्रिया (हरकत) उत्पन्न होती है ॥ १३ ॥ तथा- २१४-हस्तकर्मणा मनसः कर्म व्याख्यातम् ॥ १४ ॥ (हस्तकर्मणा) हाथ की क्रिया से (मनसः) मन की (कर्म) क्रिया का (व्याख्यातम्) व्याख्यान समझलो ॥ अर्थात् जैसे जीवात्मा की प्रेरणा से हाथ क्रिया करता है वैसे ही जी- वात्मा की प्रेरणा से मन में भी क्रिया होती है ॥ १४ ॥ २१५-आत्मेन्द्रियमनोर्थसन्निकर्षात् सुखदुःखे ॥ १५ ॥ (आत्मेन्द्रियमनोर्थसन्निकर्षात्) आत्मा=जीवात्मा, इन्द्रिय=नाक कान आदि, मन और विषय=रूपादि के परस्पर छूने से (सुखदुःखे) सुख और दुःख होते हैं ॥ अर्थात् आत्मा मन से छूता है, मन इन्द्रियों से छूता है और इन्द्रियां विषयों से छूती हैं। इस प्रकार विषयों का सुख और दुःख आत्मा तक पहुं- चता है ॥ १५ ॥ अब इस सब कथन का फल निकालते हैं कि- २१६-तदनारम्भ आत्मस्थे मनसि, शरीरस्य दुःखाभावः स योगः ॥ १६ ॥ (मनसि) मन के (आत्मस्थे) अपने आपे ही में ठहर जाने पर (तद्- नारम्भः) इन्द्रियों द्वारा उन विषयों का विषयग्रहण आरम्भ नहीं होता
[ तब ] ( शरीरस्य ) शरीर को ( दुःखाभावः ) दुःख नहीं रहता ( सः ) वह ( योगः ) योग कहाता है ॥ अर्थात् योग उस अवस्था का नाम है जब कि मन अपने आपे में ही ठहर जावे और इन्द्रियों को प्रेरणा न करे और इन्द्रियां मन की सहायता न पाकर विषयों को न छुवें तब आत्मा को दुःख नहीं पहुंच सकता । यद्यपि योगदशा में जैसे इन्द्रियों और विषयों का स्पर्श होने से आत्मा को विषयों का दुःख नहीं पहुंच सकता, इसी प्रकार विषयों का सुख भी तौ नहीं पहुंच सकता ? तौ भी सूत्रकार ने केवल दुःख का अभाव कहा है, सुख का अभाव नहीं कहा, सो क्यों ? उत्तर-सुख का अभाव इस लिये नहीं कहा कि साधारण पुरुषों को दूसरे शब्दों में लौकिक पुरुषों को जिन रूपादि विषयों से सुख की प्रतीति होती है, उन्हीं विषयों से योगी को दुःख की प्रतीति होती है क्योंकि योगी का आत्मा योगसाधन की क्रिया करते २ ऐसा सुकुमार=नाजुक हो जाता है कि जो स्थूल विषय अन्यों को सुखदायक प्रतीत होते हैं वे ही विषय योगी को दुःखदायक प्रतीत होते हैं । इस में दृष्टान्त यह है कि जैसे मकड़ी का जाला जो रेशम से भी नरम होता है, अङ्गुली से छूने में कैसा सुखदायक प्रतीत होता है क्योंकि अङ्गुली का चमड़ा बड़ा मोटा और गंवार है । परन्तु वही मकड़ी का जाला यदि आंख से छू जावे तो आंख को सुखदायक होने के बदले दुःखदायक प्रतीत होता है क्योंकि आंख अङ्गुली के चमड़े की नाईं गंवार नहीं है किन्तु नगरनिवासियों के समान सुकुमार है । बस ऐसे ही योगी की दृष्टि में सब विषयों के सुख भी अपनी सुकुमारता के कारण दुःखों ही की गिनती में हैं। इस लिये सूत्रकार ने स्थिरचित्त योगी को केवल दुःख का अभाव कहा, सुख का अभाव नहीं कहा ॥ १६ ॥ अब मन की अन्य क्रियाओं को वर्णित करते हैं जो अदृष्ट=न देखे हुए प्रारब्धकर्मसंस्कार से होती हैं- २१७-अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगाः कार्यान्तरसंयोगाश्चेत्यदृष्टकारितानि ॥ १७ ॥ ( अपसर्पणम् ) बाहर निकलजाना ( उपसर्पणम् ) समीप चलाजाना ( अशितपीतसंयोगाः ) खाये पिये के संयोग (च) और (कर्मान्तरसंयोगाः) अन्य कर्मों के साथ अनेक संयोग; [ ये सब ] ( अदृष्टकारितानि ) बिना देखे पूर्व जन्मकृत पाप पुण्यों से बने प्रारब्ध संस्कार से कराये हुए होते हैं।
पञ्चमोऽध्याय २ आन्हिक १०५ अर्थात् मन का एक देह से निकलना, दूसरे देह में जाना, खाये पिये से मन का नवीन नवीन उत्पन्न होना, बढ़ना घटना और अन्य कार्यों में मन का लगन; ये सब फल प्रारब्ध कर्मानुसार होते हैं, जो अदृष्ट है ॥ १७ ॥ और जब ऐसा नहीं होता तब- २१८-तदभावे संयोगाभावोऽप्रादुर्भावश्च मोक्षः ॥ १८ ॥ ( तदभावे ) उस कर्माऽरम्भ के अभाव में (संयोगाभावः) आत्मा का मन आदि के साथ संयोग नहीं होता (च) और (अप्रादुर्भावः) जन्म नहीं होता (मोक्षः) वही मोक्ष है ॥ १८ ॥ २१९-द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्यादभावस्तमः ॥ १६ ॥ (द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्यात् ) पृथिव्यादि द्रव्यों, रूपादि गुणों और उत्क्षेपण आदि कर्मों की सिद्धि से विरुद्ध धर्म होने से (अभावः) प्रकाश का न होना (तमः) अन्धकार होता है ॥ अर्थात् प्रकाश कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है किन्तु प्रकाश का अभाव ही अन्धकार कहाता है और प्रकाश के अभाव का कारण द्रव्यों, गुणों और कर्मों की सिद्धि का विपरीत होना है। तैल, बत्ती आदि द्रव्यों के वैधर्म्य से दीपशलाका के न रगड़ने रूप कर्म से प्रकाश गुण का न होना ही अन्धकार है; अन्धकार कोई भाव पदार्थ नहीं ॥ १९ ॥ २२०-तेजसो द्रव्यान्तरेणावरणाच्च ॥ २० ॥ (तेजसः) तेज के (द्रव्यान्तरेणावरणात्) अन्य द्रव्य का आवरण होजाने से (च) भी [प्रकाश का अभाव = अन्धकार होता है] ॥ २० ॥ २२१-दिक्कालाबाकाशं च क्रियावद्वैधर्म्यान्निष्क्रियाणि ॥२१॥ (दिक्कालौ) दिशा और काल (च) और (आकाशम्) आकाश (नि- ष्क्रियाणि) क्रियारहित पदार्थ हैं क्योंकि (क्रियावद्वैधर्म्यात् ) क्रिया वाले पदार्थों से विरुद्धधर्मी हैं ॥ जो पदार्थ मूर्त्तिमान् होते हैं, उन में क्रिया होती है, इस के विरुद्ध दिशा काल और आकाश अमूर्त्त हैं, इस वैधर्म्य से वे निष्क्रिय हैं। इस सूत्र में चकार से शङ्कर मिश्रादि टीकाकार आत्मा का ग्रहण करते हैं, आत्मा भी अमूर्त होने से निष्क्रिय है, यह दूसरी बात है कि आत्मा के सामीप्य से मन और इन्द्रियों में क्रिया उत्पन्न होती है ॥ २१ ॥ १४
१०६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद २२२-एतेन कर्माणि गुणाश्च व्याख्याताः ॥ २२ ॥ ( एतेन ) इसी से ( कर्माणि ) कर्म ( च ) और ( गुणाः ) गुणों की ( व्याख्याताः ) व्याख्या की गयी ॥ अर्थात् जिस प्रकार दिशा काल और आकाश अमूर्त्त होने से निष्क्रिय हैं और आत्मा भी निष्क्रिय है, इसी प्रकार कर्मों और गुणों का भी नि- ष्क्रिय होना समझ लेना चाहिये क्योंकि कर्म और गुण भी अमूर्त्त हैं ॥२२॥ यदि कहो कि गुण और कर्म तौ मूर्त्तिमान् द्रव्यों में भी समवाय सम्बन्ध से रहते हैं, फिर उन में क्रिया क्यों न मानी जाय, जब कि उन के आश्रय द्रव्यों में क्रिया है ? उत्तर- २२३-निष्क्रियाणां समवायः कर्मभ्यो निषिद्धः ॥ २३ ॥ ( निष्क्रियाणाम् ) निष्क्रिय गुण कर्मों का ( समवायः ) समवाय सम्बन्ध ( कर्मभ्यः ) कर्मों से ( निषिद्धः ) निषिद्ध किया गया है ॥ अर्थात् क्रिया तौ संयोग से होती है न कि समवाय से । समवाय और संयोग में भेद यह है कि एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में अनादिकाल से मिलाव=समवाय कहलाता है और भिन्न २ दो पदार्थों का एक दूसरे से नवीन मिलाव=संयोग कहाता है ॥ २३ ॥ प्रश्न-यदि गुण और कर्म दोनों निष्क्रिय हैं तौ उन से कर्मों की उत्पत्ति क्यों होती है ? उत्तर- २२४-कारणं त्वऽसमवायिनो गुणाः ॥ २४ ॥ ( गुणाः ) संयोगादि गुण, जो ( कारणम् ) कर्म का कारण होते हैं ( तु ) वे तो ( असमवायिनः ) समवायी गुण नहीं होते ॥ २४॥ अच्छा तौ गुण और कर्म निष्क्रिय सही, परन्तु दिशा और काल तौ निष्क्रिय नहीं हो सकते क्योंकि उन में क्रिया देखी जाती है, जैसा कि पूर्व दिशा में सूर्य उदय हो रहा है, पश्चिम में अस्त हो रहा है, दक्षिण में समुद्र उमण्ड रहा है और उत्तर में झरने बह रहे हैं इत्यादि । क्या ये दिशाओं के कर्म नहीं हुए ? इसी प्रकार-प्रातःकाल भ्रमण करता हूं, रात्रि में सोता हूं, दिन में अनेक काम करता हूं, इत्यादि। क्या इस से काल में क्रिया नहीं सिद्ध होती ? उत्तर-नहीं, क्योंकि- २२५-गुणैर्दिग्व्याख्याता ॥ २५ ॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पञ्चमाऽध्याय २ आन्हिक १०७ (गुणैः) गुणों से (दिक् ) दिशा का (व्याख्याता) व्याख्यान हो चुका ॥ जिस प्रकार अमूर्त्त होने से कर्मों का समवायी कारण गुण नहीं होते, इसी प्रकार अमूर्त्त होने से पूर्वादि दिशाऐं भी सूर्योदयादि क्रियाओं का समवायी कारण नहीं हैं किन्तु क्रियाओं का आधार होने से उपचार की रीति पर उन में क्रिया कही जाती है, वास्तव में नहीं । जैसे 'चटाई पर भोजन करता हूं' इस कथन में यद्यपि चटाई भोजन क्रिया का आधार है, परन्तु समवायी कारण नहीं ॥ २५ ॥ तथा- २२६-कारणेन कालः ॥ २६ ॥ (कारणेन) निमित्त कारण होने से (कालः) काल का व्याख्यान भी हो चुका ॥ अर्थात जिस प्रकार वस्त्र की उत्पत्ति में सूत के डोरे तो समवायी कारण हैं परन्तु तुरी वेमादि अथवा तन्तुवाय=जुलाहा समवायी कारण नहीं किन्तु निमित्त कारण है, इसी प्रकार काल भी किसी क्रिया का समवायी कारण नहीं किन्तु निमित्त कारण है, इस लिये उस को सक्रिय नहीं कह सकते ॥२६॥ पञ्चमाध्याय के इस द्वितीय आन्हिक में पृथिवी आदि के कर्म और प्रसङ्गवश अन्यद्वार का वर्णन किया गया ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २ ॥ इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे पञ्चमः कर्माध्यायश्च समाप्तः ॥ ५ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
ओ३म् अथ षष्ठोऽध्यायः तत्र प्रथममाह्निकम् इस वैशेषिकदर्शन में प्रथमाध्याय के तृतीय सूत्र में कहा गया था कि 'धर्म का प्रतिपादक होने से वेद को प्रामाणिकता है' इस लिये कर्म की परीक्षा के पश्चात् वेद का प्रामाण्य सिद्ध करने के लिये कहते हैं कि- २२७-बुद्धिपूर्वा* वाक्यकृतिर्वेदे ॥ १ ॥ (वेदे) वेद में (वाक्यकृतिः) वाक्यरचना (बुद्धिपूर्वा) बुद्धिपूर्वक है अर्थात् वेदों में कोई वाक्य ऐसा नहीं है, जो बुद्धि के विपरीत हो, जैसा कि मनुष्यों की वाक्यरचना में कभी २ हो जाता है ॥ १ ॥ २२८-ब्राह्मणे संज्ञाकर्म सिद्धिलिङ्गम् ॥ २ ॥ (ब्राह्मणे) ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थ में (संज्ञाकर्म) संज्ञापूर्वक कर्मानुष्ठान (सिद्धिलिङ्गम्) प्रथम सूत्रोक्त विषय की सिद्धि का चिन्ह है। अर्थात् ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थों में वेदोक्त पदार्थों की संज्ञा जानकर जो कर्मानुष्ठान बताया है वह कर्मानुष्ठान और उस का ठीक २ फल इस बात की सिद्धि में पहचान है कि वेदों की वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक है ॥ २ ॥ और भी- २२९-बुद्धिपूर्वो ददातिः ॥ ३ ॥ (ददातिः) दानक्रिया (बुद्धिपूर्वः) बुद्धिपूर्वक पाई जाती है ॥ वेदों में जिस प्रकार दान का वर्णन है, उस से पाया जाता है कि वेदों की वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक है। वेद के प्रकाशक ईश्वर ने उस को बुद्धिपूर्वक प्रकाशित किया है। जैसेः- दक्षिणाश्वं दक्षिणा गां ददाति दक्षिणा चन्द्रमुत यद्धि- रण्यम्। दक्षिणाऽन्नं वनुते यो न आत्मा दक्षिणां वर्म कृणुते विजानन् ॥ ऋ० । १० । १०७ । ७ ॥
- किसी २ पुस्तक में वाक्प्रकृति और किसी २ में वाक्कृति पाठ पाया जाता है, परन्तु अर्थ सब का एक है ॥
छष्ठाऽध्याय १ आन्हिक १८५ इस में वर्णन किया गया है कि दान करने से घोड़ा, गौ, आदि पशु, चांदी सोना आदि रत्न और अन्न जिस से हमारा जीवन है, मिलता है। इस लिये बुद्धिमान् मनुष्य दान=दक्षिणा को अपनी रक्षा के लिये कवचरूप से धारण करता है ॥ यह समस्त सूक्त दान के माहात्म्य में कथन किया गया है, जिस के पढ़ने से वेदों के प्रकाशक ईश्वर की चमत्कारिणी बुद्धिपूर्वक रचना का पता लगता है ॥ ३ ॥ और- २३०-तथा प्रतिग्रहः ॥ ४ ॥ (तथा) इसी प्रकार (प्रतिग्रहः) किये हुए दान को ग्रहण करने [का वर्णन भी बुद्धिपूर्वक है ] ॥ ४ ॥ २३१-आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् ॥ ५ ॥ (आत्मान्तरगुणानाम्) अन्य आत्मा के गुणों को (आत्मान्तरे) अन्य आत्मा में (अकारणत्वात्) कारण न होने से ॥ वेद में दान का फल दाता को और प्रतिग्रह का फल लेने वाले को बतलाया गया है और यही बुद्धिपूर्वक है क्योंकि एक आत्मा के अनुष्ठान किये हुये कर्म का फल दूसरे आत्मा को नहीं मिलना चाहिये किन्तु दाता को दान का फल और प्रतिग्रहीता को ग्रहण का फल मिलना चाहिये क्योंकि दाता दान क्रिया का कर्त्ता है और ग्रहीता ग्रहण क्रिया का कर्त्ता है ॥ ५ ॥ २३२-तद् दुष्टभोजने न विद्यते ॥ ६ ॥ (तत्) वह फल (दुष्टभोजने) दुष्टभोजन में (न) नहीं (विद्यते) है ॥ यदि दाता दुष्टभोजन का दान करे और प्रतिग्रह लेने वाला दुष्ट अन्न का भोजन करे तो वेद कहता है कि उन दोनों को शास्त्र में बताया फल नहीं होगा ॥ ६ ॥ प्रश्न-दुष्टभोजन किसे कहते हैं ? उत्तर- २३३-दुष्टं हिंसायाम् ॥ ७ ॥ (हिंसायाम्) हिंसा में (दुष्टम्) भोजन दुष्ट होता है ॥ किसी प्राणी को दुःख देकर वा मारकर जो भोजन सिद्ध किया जावे वा जो भोजन दिया जावे वे दोनों भोजन दुष्ट हैं । चोरी से वा अन्याय से अथवा सब से बड़े अन्याय=प्राण लेकर जो दाता दान करता है और जो प्रतिग्रहीता उस दान को लेता है वे दोनों ही वेदोक्त फल नहीं पाते ॥ ७ ॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ११० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद २३४-तस्य सम्भिव्याहारतो दोषः ॥ ८ ॥ (तस्य) उस दुष्ट भोजन के (सम्भिव्याहारतः) खाने खिलाने से (दोषः) [हिंसा का] दोष लगता है ॥ यद्यपि दाता ने स्वयं हिंसा न की हो और प्रतिग्रहीता ने भी स्वयम् हिंसा न की हो किन्तु जिस हिंसाजनित भोजन को उन्होंने खिलाया और खाया है, उस के खाने खिलाने से भी खाने और खिलाने वाले को वेद में दोष बताया गया है ॥ ८ ॥ परन्तु- २३५-तददुष्टे न विद्यते ॥ ९ ॥ (तत्) वह दोष (अदुष्टे) निर्दोष भोजन में (न) नहीं (विद्यते) है ॥ जो भोजन हिंसादिदोषरहित है, उस में खाने खिलाने वालों को वेद में दोष नहीं बतलाया गया ॥ ९ ॥ २३६-पुनर्विशिष्टे प्रवृत्तिः ॥ १० ॥ (पुनः) फिर (विशिष्टे) उत्तम सात्त्विक भोजन में (प्रवृत्तिः) खाने खिलाने की प्रवृत्ति करनी विहित है ॥ दुष्ट भोजन को त्यागकर श्रेष्ठ भोजन देना कहा है ॥ १० ॥ २३७-समे हीने वा प्रवृत्तिः ॥ ११ ॥ (वा) अथवा (समे) साधारण भोजन में (हीने) घृत दुग्धादि उत्तम गुण- कारक द्रव्यों से रहित भोजन में भी (प्रवृत्तिः) दान की प्रवृत्ति [विहित] है॥११॥ २३८-एतेन हीनसमविशिष्टधार्मिकेभ्यः परस्वादानं व्याख्यातम् ॥ १२ ॥ (एतेन) इस से (व्याख्यातम्) व्याख्यात समझना चाहिये कि (हीन, सम, विशिष्ट धार्मिकेभ्यः) अधम, मध्यम और उत्तम धार्मिक पुरुषों से (पर- स्वादानम्) परधन का ग्रहण करना विहित है ॥ अर्थात् हिंसादि दुष्ट कर्मों से रहित धार्मिक पुरुषों से प्रतिग्रह लेना चाहिये, चाहे वे उत्तम, मध्यम, अधम किसी कक्षा के धार्मिक हों किन्तु हिंसक पापी न हों ॥ १२ ॥ और- २३९-तथा विरुद्धानां त्यागः ॥ १३ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
षष्ठाऽध्याय. १ .आह्निक १११
षष्ठाऽध्याय. १ .आह्निक १११ (तथा) उसी प्रकार (विरुद्धानाम्) धर्मविरो धियों का (त्यागः) प्रतिग्रह त्याग देना कहा है ॥ १३ ॥ २४०--हीने परे त्यागः ॥ १४ ॥ (परे) यदि दाता (हीने) धर्मानुष्ठान में अधम हो तो (त्यागः) दान लेना त्याग दे ॥ १४ ॥ २४१-समे आत्मत्यागः परत्यागो वा ॥ १५ ॥ (समे) यदि दाता मध्यम धार्मिक हो तो (आत्मत्यागः) चाहे प्रति- ग्रहीता अपने ग्राह्य पदार्थ का त्याग कर दे (वा) अथवा (परत्यागः) दाता त्याग कर देवे ॥ १५ ॥ और- २४२-विशिष्टे आत्मत्याग इति* ॥ १६ ॥ (विशिष्टे) यदि दाता अपने से उत्तम धार्मिक हो तो (आत्मत्यागः) प्रतिग्रहीता अपने आप त्याग देवे ॥ हम को बड़ा आश्चर्य होता है कि शङ्कर मिश्रादि टीकाकारों ने और उन की देखा देखी वर्तमान काल के संस्कृत और भाषा के टीकाकारों ने १४ से १६ तक सूत्रों के अर्थ में दान और प्रतिग्रह के प्रकरण से विरुद्ध शत्रु के मारने और न मारने का अर्थ अकारण क्यों उपजा लिया ? ॥ १६ ॥ इति षष्ठाध्यायस्य प्रथममाह्निकम् ॥ १ ॥ ─:*:─ अथ द्वितीयमाह्निकम् २४३-दृष्टादृष्टप्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोजनमभ्युदयाय ॥१॥ (दृष्टादृष्टप्रयोजनानाम्) दृष्ट और अदृष्ट प्रयोजन वाले कर्मों में (दृष्टाभावे) दृष्ट के अभाव में (प्रयोजनम्) प्रयोग = अनुष्ठान (अभ्युदयाय) परलोक के सुख के लिये है ॥ अर्थात् वेद में दो प्रकार के कर्मानुष्ठान हैं। कुछ कर्मों का फल दृष्ट है, जो इस ही जन्म में होता देखा जाता है और दूसरे कर्मों का फल अदृष्ट है, जो जन्मान्तर में मिलता है, उसी के लिये ऐहिकफल के अभाव में अनुष्ठान बतलाये गये हैं ॥ १ ॥ जैसेः-
- कितनी ही पुस्तकों में 'इति' शब्द नहीं है, परन्तु यह शब्द आह्निक की समाप्ति में और अर्थ की समाप्ति में होने से सार्थक जान पड़ता है ॥